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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

50 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/54-65 ] पाक-सामग्री आनह, आमि याहा चाइ।” ये मागिल, शिवानन्द आनि' दिला ताइ ॥ 58 ॥ अनुवाद—श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने दो दिन तक ध्यान करनेके बाद श्रीशिवानन्द सेनसे कहा, —“मैं महाप्रभुको पाणिहाटि-ग्राम तक ले आया हूँ। कल दोपहर तक वे आपके घरपर आ जायेंगे। आप रसोई बनानेकी समस्त सामग्री लाकर मुझे दो, मैं स्वयं उन्हें भोजन बनाकर खिलाऊँगा। तभी मैं उन्हें यहाँ शीघ्रतासे ले आऊँगा। मेरी बातपर पूर्ण विश्वास रखो, मैं सत्य कह रहा हूँ, कुछ सन्देह मत करना। मैं जो कुछ भी चाहता हूँ, आप शीघ्रतासे उसे लाकर दे दो, क्योंकि मैं अभी भोजन बनाना प्रारम्भ करना चाहता हूँ। मुझे जो भी भोजनकी सामग्री चाहिये, आप उसे लेकर आइये।” श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने जो कुछ माँगा, श्रीशिवानन्द सेनने वह लाकर दे दिया ॥ 54-58 ॥ प्रद्युम्नका रसोई बनाना और महाप्रभु, श्रीजगन्नाथ एवं अपने इष्टदेव श्रीनृसिंह, प्रत्येकके लिये तीन अलग-अलग नैवेद्य-भोग सजाना :- प्रातःकाल हैते पाक करिला अपार। नाना सूप, व्यञ्जन, पिठा, क्षीर-उपहार ॥ 59 ॥ अनुवाद—श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने प्रातःकालसे प्रारम्भकर बहुतसे पकवान जैसे अनेक प्रकारकी रसेदार सब्जियाँ, व्यञ्जन, पीठा-पाना और खीर तथा दूधसे अनेक मिठाइयाँ बनायीं ॥ 59 ॥ जगन्नाथेर भिन्न भोग पृथक् बाड़िल। चैतन्यप्रभुर लागि' आर भोग कैल ॥ 60 ॥ इष्टदेव नृसिंह लागि' पृथक् बाड़िल। तिनजने समर्पिया बाहिरे ध्यान कैल ॥ 61 ॥ अनुवाद—श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने श्रीजगन्नाथदेव और महाप्रभुके प्रिय व्यञ्जनोंको पृथक्-पृथक् करके उन्हें भोग अर्पित किया। फिर अपने इष्टदेव श्रीनृसिंहदेवके लिये बनाये गये भोगको भी पृथक् सजाया। इस प्रकार उन्होंने तीन भाग करके भोग निवेदन किया। तब वे बाहर बैठकर ध्यान करने लगे ॥ 60-61 ॥ ब्रह्मचारीके ध्यानमें 'आविर्भूत' महाप्रभुके द्वारा तीनों नैवेद्योंको खाना :- देखे, शीघ्र आसि' बसिला चैतन्य-गोसाञि। तिन भोग खाइला, किछु अवशिष्ट नाइ ॥ 62 ॥ अनुवाद—श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने ध्यानमें देखा कि महाप्रभु शीघ्रतासे आकर बैठ गये और तीनों भोग खा गये, उन्होंने कुछ भी नहीं छोड़ा ॥ 62 ॥ ऐसा देखकर प्रद्युम्नके हृदयमें आनन्द, बाहरमें दुःखका आभास :- आनन्दे विह्वल प्रद्युम्न, पड़े अश्रुधार। “हाहा किबा कर” बलि' करये फुत्कार ॥ 63 ॥ अनुवाद—यद्यपि महाप्रभुको सम्पूर्ण भोग ग्रहण करते देखकर श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी आनन्दसे विह्वल हो रहे थे और उनके नेत्रोंसे अश्रुओंकी धारा प्रवाहित हो रही थी, तथापि वे बाहरसे दुःख प्रकट करते हुए कह रहे थे,—“हाय! हाय! [महाप्रभु!] आप यह क्या कर रहे हैं?” 63 ॥ महाप्रभुके प्रति प्रद्युम्नका आरोप; अपने इष्टदेव श्रीनृसिंहके प्रति निष्ठा :- “जगन्नाथे-तोमाय ऐक्य, खाओ ताँर भोग। नृसिंहेर भोग केने कर उपयोग ॥ 64 ॥ नृसिंहेर जानि हैल आजि उपवास। ठाकुर उपवासी रहे, जिये कैछे दास?? 65 ॥ अनुवाद—“हे महाप्रभु! आप और श्रीजगन्नाथ तो एक ही हैं, इसलिये आप यदि उनका भोग खा लेते हैं, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। किन्तु आप श्रीनृसिंह भगवान्का भोग क्यों ग्रहण कर रहे हो? मैं देख रहा

[ 2/64-74 दूसरा अध्याय 51 हूँ कि आज तो श्रीनृसिंहदेवका उपवास हो गया। यदि ठाकुरजी ही उपवासी रहेंगे, तब फिर दास किस प्रकारसे जीवित रहेगा?” 64-65 ॥ भोजन देखि' यद्यपि ताँर हृदये उल्लास। नृसिंह लक्ष्य करि' बाह्ये किछु करे दुःखाभास ॥ 66 ॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीनृसिंहानन्दके हृदयमें महाप्रभुको समस्त भोग खाते देखकर उल्लास हो रहा था, किन्तु श्रीनृसिंहदेवको लक्ष्य करके वे बाहरसे कुछ दुःखको प्रकट कर रहे थे॥ 66 ॥ महाप्रभुके द्वारा तीनों पात्रोंके भोजनकी लीलाके द्वारा श्रीप्रद्युम्नको समस्त विष्णुतत्त्वोंके साथ अपने अभेद अथवा एक होनेका प्रदर्शन :- स्वयं भगवान् कृष्णचैतन्य-गोसाञि। जगन्नाथ-नृसिंह-सह किछु भेद नाइ ॥ 67 ॥ इहा जानिवारे प्रद्युम्नेर गूढ़ हैल मन। ताहा देखाइला प्रभु करिया भोजन ॥ 68 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य-गोसाईं स्वयं भगवान् हैं। इसलिये श्रीजगन्नाथदेव एवं श्रीनृसिंहदेवके साथ उनका कोई भेद नहीं है, इस बातको समझनेके लिये श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीके मनमें प्रबल इच्छा थी। महाप्रभुने इस तथ्यको समझानेके लिये सम्पूर्ण भोजनको ग्रहण किया॥ 67-68 ॥ भोजनके अन्तमें महाप्रभुका पाणिहाटी स्थित राघव-भवनमें नित्य-अवस्थान हेतु गमन :- भोजन करिया प्रभु गेला पाणिहाटि। सन्तोष पाइला देखि' व्यञ्जन-परिपाटी ॥ 69 ॥ अनुवाद—भोजन करनेके बाद महाप्रभु पाणिहाटी चले गये। पाणिहाटीमें महाप्रभु श्रीराघव पण्डितके घरमें बनायी गयी व्यञ्जनकी परिपाटीको देखकर बहुत सन्तुष्ट हुए॥ 69 ॥ श्रीशिवानन्दकी ब्रह्मचारीके दुःखी होनेके कारणकी जिज्ञासा और ब्रह्मचारीके द्वारा सम्पूर्ण वृत्तान्तका वर्णन :- शिवानन्द कहे,—“केने करह फुत्कार?” ब्रह्मचारी कहे,—“देख, प्रभुर व्यवहार ॥ 70 ॥ तिनजनार भोग तेंहो अकेला खाइला। जगन्नाथ-नृसिंह उपवासी हइला ॥” 71 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीसे कहा,—“आप किसलिये दुःख प्रकाश कर रहे हैं?” श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीने उत्तर दिया,—“महाप्रभुके व्यवहारको तो देखो, वे तीन प्रभुओंके भोगको अकेले ही खा गये। इसलिये श्रीजगन्नाथदेव तथा श्रीनृसिंहदेव उपवासी रह गये॥” 70-71 ॥ श्रीशिवानन्दका सन्देह :- शुनि' शिवानन्देर चित्ते हइल संशय। किवा प्रेमावेशे कहे, किवा सत्य हय ॥ 72 ॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीशिवानन्द सेनके चित्तमें संशय हुआ कि श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी यह बात प्रेमके आवेशमें कह रहे हैं अथवा यह बात सत्य है॥ 72 ॥ श्रीशिवानन्दको श्रीनृसिंहके लिये भोगको लानेका आदेश :- तबे शिवानन्दे किछु कहे ब्रह्मचारी। “सामग्री आनह नृसिंहरे, पुनः पाक करि ॥” 73 ॥ अनुवाद—तब श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीने श्रीशिवानन्द सेनसे कहा,—“आप श्रीनृसिंहदेवके लिये फिरसे भोग-सामग्री लाकर दीजिये, मैं पुनः रसोई बनाऊँगा॥” 73 ॥ श्रीनृसिंहको पुनः भोग समर्पण :- तबे शिवानन्द भोग-सामग्री आनिला। पाक करि' नृसिंहरे भोग लागाइला ॥ 74 ॥ अनुवाद—तब श्रीशिवानन्द सेन पुनः भोग-सामग्री लेकर आये तथा श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीने पकवान बनाकर श्रीनृसिंहदेवको भोग लगाया॥ 74 ॥

52 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/75-84 ] अगली वर्षाऋतुके समय गौड़ीय-भक्तोंका पुरीमें गमन :- वर्षान्तरे शिवानन्द लञा भक्तगण। नीलाचले देखे याञा प्रभुर चरण॥ 75॥ अनुवाद—अगले वर्ष महाप्रभुके चरणकमलोंके दर्शनके लिये श्रीशिवानन्द सेन भक्तोंको साथ लेकर नीलाचल श्रीजगन्नाथपुरीमें गये॥ 75॥ एकदिन महाप्रभुके द्वारा श्रीनृसिंहानन्दके पूर्वोक्त भोजनके वृत्तान्तका वर्णन :- एकदिन सभाते प्रभु बात चालाइला। नृसिंहानन्देर गुण कहिते लागिला॥ 76॥ “गतवर्ष पौषे मोरे कराइल भोजन। कभु नाहि खाइ ऐछे मिष्टान्न-व्यञ्जन॥" 77॥ अनुवाद—एकदिन भक्तोंकी सभामें बातचीत करते हुए महाप्रभु प्रसङ्ग उठाकर श्रीनृसिंहानन्दके गुणोंका वर्णन करने लगे,—“पिछले वर्ष पौष मासमें नृसिंहानन्दने मुझे भोजन कराया था। मैंने वैसे मिष्टान्न और व्यञ्जन पहले कभी नहीं खाये थे॥" 76-77॥ अनुभाष्य—'बात चालाइला',—प्रसङ्ग उठाया॥ 76॥ महाप्रभुके वचनोंसे श्रीशिवानन्दका पूर्व-सन्देह भङ्ग :- शुनि' सभ्यगण मने आश्चर्य मानिल। शिवानन्देर मने तबै प्रत्यय जन्मिल॥ 78॥ अनुवाद—यह सुनकर सभी भक्तोंके मनमें आश्चर्य हुआ और श्रीशिवानन्द सेनके मनमें दृढ़ विश्वास उत्पन्न हुआ कि वह घटना सत्य थी॥ 78॥ चार स्थानोंपर महाप्रभुका 'नित्य-आविर्भाव' :- एइमत शचीगृहे सतत भोजन। श्रीवासेर गृहे करेन कीर्त्तन-दर्शन॥ 79॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु श्रीशचीमाताके घरमें सदा भोजन करते तथा श्रीवास पण्डितके घरमें कीर्तनके समय वहाँ उपस्थित होते॥ 79॥ नित्यानन्देर नृत्य देखेन आसि' बारे बारे। 'निरन्तर आविर्भाव' राघवेर घरे॥ 80॥ अनुवाद—महाप्रभु बार-बार आकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके नृत्यको देखते तथा श्रीराघव पण्डितके घरमें भी उनका 'निरन्तर आविर्भाव' होता॥ 80॥ भक्तोंके प्रेमके वशीभूत श्रीगौरसुन्दर :- प्रेमवश गौरप्रभु, याँहा प्रेमोत्तम। प्रेमवश हञा ताहा देन दरशन॥ 81॥ अनुवाद—श्रीगौराङ्ग महाप्रभु प्रेमके वशीभूत हैं। वे जहाँ कहींपर भी उत्तम प्रेमको देखते हैं, वहींपर ही प्रेमके वशीभूत होकर दर्शन देते हैं॥ 81॥ श्रीशिवानन्दका अनिर्वचनीय गौरप्रेम :- शिवानन्देर प्रेमसीमा के कहिते पारे? याँर प्रेमे वश प्रभु आइसे बारे बारे॥ 82॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनके प्रेमकी सीमाका कौन वर्णन कर सकता है? जिनके प्रेमके वशीभूत होकर महाप्रभु बार बार उनके निकट आते हैं॥ 82॥ श्रीगौरके 'आविर्भाव'के श्रवणसे श्रीकृष्णचैतन्यकी महिमाको जानना :- एइ त' कहिलु गौरेर 'आविर्भाव'। इहा येइ शुने, जाने चैतन्य-प्रभाव॥ 83॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने महाप्रभुके [नित्य और कभी-कभी] 'आविर्भाव'के विषयमें वर्णन किया। इसे जो कोई भी श्रवण करता है, वह श्रीचैतन्य महाप्रभुकी महिमाको जान जाता है॥ 83॥ अन्य प्रसङ्ग-वर्णन, भगवान् आचार्यका वृत्तान्त-वर्णन :- पुरुषोत्तमे प्रभु-पाशे भगवान् आचार्य। परम वैष्णव तँहो सुपण्डित आर्य॥ 84॥ अनुवाद—श्रीजगन्नाथपुरीमें महाप्रभुके पास भगवान् आचार्य रहते थे, वे परम वैष्णव, सुविद्वान और सज्जन व्यक्ति थे॥ 84॥

[ 2/84-91 दूसरा अध्याय 53 ]

अनुभाष्य—'भगवान् आचार्य'—आदिलीलाकी 10/136 संख्या देखें ॥ 84 ॥ सख्यभावाक्रान्त-चित्त, गोप-अवतार। स्वरूप-गोसाञि-सह सख्य-व्यवहार ॥ 85 ॥ अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यका चित्त सख्य-भावसे विभावित था, क्योंकि वे व्रजलीलाके गोपबालकके अवतार थे। श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीके साथ भी उनका सख्य व्यवहार था ॥ 85 ॥ बीच-बीचमें अपने घरपर रसोई बनाकर एकमात्र महाप्रभुको ही निमन्त्रण :— एकान्तभावे आश्रियाछेन चैतन्यचरण। मध्ये मध्ये प्रभुर तेंहो करेन निमन्त्रण ॥ 86 ॥ अनुवाद—उन्होंने एकान्तिक भावसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रय ग्रहण किया हुआ था। बीच-बीचमें वे रसोई बनाकर श्रीचैतन्य महाप्रभुको निमन्त्रण भी किया करते थे ॥ 86 ॥ घरे भात करि' करेन विविध व्यञ्जन। एकले गोसाञि लञा करान भोजन ॥ 87 ॥ अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्य अपने घरमें अनेक प्रकारके पकवान बनाते थे और वे महाप्रभुको अकेले ले जाकर उनको ही भोजन कराते थे ॥ 87 ॥ अनुभाष्य—'घरे भात करि'—श्रीजगन्नाथदेवके प्रसादको मँगवाकर उसके द्वारा अपने परिवारके सदस्यों, भिक्षुकों तथा निमन्त्रित व्यक्तियोंको तृप्त करनेके स्थानपर उन्हें घरपर भोजन करवाने हेतु चावल आदि अर्थात् साधारण द्रव्य आदि बनानेको 'घरभात' कहते हैं। उड़ीसामें 'आमानी' एवं 'प्रसादी'—दो शब्दोंका व्यवहार होता है; श्रीजगन्नाथदेवके उद्देश्यसे बनाये गये नैवेद्य-भोगके समर्पित होनेपर वह 'प्रसाद' एवं साधारण खाद्य वस्तुओंको पकानेपर वह 'आमानी' अर्थात् श्रीजगन्नाथदेवका 'उच्छिष्ट नहीं' है, ऐसा समझना होगा ॥ 87 ॥

भगवान् आचार्य एवं उनके पिता और छोटे भाईका चरित्र :— ताँर पिता 'विषयी' बड़ शतानन्द-खाँन। 'विषयविमुख' आचार्य—'वैराग्यप्रधान' ॥ 88 ॥ अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यके पिता शतानन्द खाँन बहुत ही अधिक 'विषयी' अर्थात् धनवान् थे, किन्तु श्रीभगवान् आचार्य धन-सम्पत्तिसे विरक्त थे। उनका जीवन वैराग्यपूर्ण था ॥ 88 ॥ 'गोपाल-भट्टाचार्य' नाम, ताँर छोट भाइ। काशीते वेदान्त पड़ि' गेला आचार्य ठाञि ॥ 89 ॥ अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यके छोटे भाईका नाम गोपाल भट्टाचार्य था, वह काशीमें वेदान्त पढ़कर श्रीभगवान् आचार्यके घर श्रीजगन्नाथ पुरीमें आया ॥ 89 ॥ अनुभाष्य—'वेदान्त',—यहाँपर वेदान्त या शारीरक सूत्रका तात्पर्य शङ्कराचार्य-कृत निर्विशेष-ब्रह्मपरक भाष्यसे है। 'आचार्य',—बड़े भाई श्रीभगवान् आचार्य ॥ 89 ॥ आचार्य ताहारे प्रभुपदे मिलाइला। अन्तर्यामी प्रभु चित्ते सुख ना पाइला ॥ 90 ॥ अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यने अपने छोटे भाईको महाप्रभुसे मिलवाया। अन्तर्यामी महाप्रभुको गोपाल भट्टाचार्यसे मिलकर हृदयमें आनन्द नहीं हुआ ॥ 90 ॥ शुद्धकृष्णभजनसे ही गौर-प्रीति, अभक्तकी भक्ति विरोधी बिद्धा-चेष्टासे महाप्रभुके द्वारा उसका अनादर :— आचार्य-सम्बन्धे बाह्ये करे प्रीत्याभास। कृष्णभक्ति बिना प्रभुर ना हय उल्लास ॥ 91 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीभगवान् आचार्यके भाई होनेके कारण उसके प्रति बाहरमें प्रसन्नता दिखलायी, किन्तु जिसके हृदयमें श्रीकृष्णभक्ति न हो, उससे मिलनेपर महाप्रभुको उल्लास नहीं होता ॥ 91 ॥

54 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/92-98 ] एकदिन श्रीस्वरूपको अपने छोटे भाईके मुखसे शाङ्कर- मायावाद-भाष्यके श्रवणके लिये आचार्यका अनुरोध :- स्वरूपेरे आचार्य कहे आर दिने। “वेदान्त पड़िया गोपाल आसियाछे एखाने ॥ 92 ॥ सबे मेलि' आइस, शुनि 'भाष्य' इहार स्थाने।” प्रेम-क्रोध करि' स्वरूप बलय वचने ॥ 93 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा तिरस्कार :- “बुद्धिभ्रष्ट हैल तोमार गोपालेर सङ्गे। मायावाद शुनिवारे उपजिल रङ्गे ॥ 94 ॥ समस्त वैष्णवोंके गुरु श्रीदामोदर-स्वरूपके द्वारा मायावादके दोषोंका वर्णन और उसकी निन्दा; शङ्करके मायावाद-भाष्यके प्रति शुद्धविष्णुभजन करनेके इच्छुक व्यक्तिके व्यवहारकी विधि :- वैष्णव हञा येबा शारीरक-भाष्य शुने। सेव्य-सेवक-भाव छाड़ि' आपनारे 'ईश्वर' माने ॥ 95 ॥ अनुवाद—एकदिन श्रीभगवान् आचार्यने श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीसे कहा, - “मेरा भाई गोपाल काशीसे वेदान्त पढ़कर यहाँ आया है। हम सब मिलकर उससे वेदान्तके भाष्यका श्रवण करेंगे।” श्रीभगवान् आचार्यके प्रति प्रेम होनेके कारण श्रीस्वरूप दामोदरने क्रोध करते हुए कहा, –“गोपालका सङ्ग करनेसे तुम्हारी बुद्धि भी भ्रष्ट हो गयी है, इसलिये तुम मायावाद सिद्धान्त सुननेके लिये उत्कण्ठित हो रहे हो। वैष्णव होकर भी जो वेदान्तके शारीरक-भाष्यका श्रवण करता है, वह सेव्य और सेवकके भावको छोड़कर स्वयंको ही 'ईश्वर' मानने लगता है ॥ 92-95 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'शारीरक-भाष्य', - श्रीमत् शङ्कराचार्य-कृत वेदान्त-सूत्र-भाष्य ॥ 95 ॥ अनुभाष्य-केवलाद्वैतवादी शङ्करने कल्पनाका आश्रय लेकर शारीरक-ब्रह्मसूत्र-भाष्यमें 'मायावाद' अथवा 'बिद्ध केवलाद्वैतवाद'की स्थापना की है; किन्तु ब्रह्मसूत्रके श्रीसम्प्रदायी श्रीरामानुज-कृत श्रीभाष्यमें 'विशिष्टाद्वैतवाद', ब्रह्म-सम्प्रदायी श्रीमध्व-कृत पूर्णप्रज्ञ-भाष्यमें 'शुद्धाद्वैतवाद', चतुःसन-सम्प्रदायी श्रीनिम्बार्क-कृत पारिजात-सौरभ-भाष्यमें 'द्वैताद्वैतवाद' एवं रुद्रसम्प्रदायी श्रीविष्णुस्वामि-कृत सर्वज्ञ-भाष्यमें 'शुद्धाद्वैतवाद' वेदान्त-तात्पर्य कहा गया है एवं उनमें सेव्य-सेवक-भाव विद्यमान रहनेके कारण ये-भगवान् विष्णुके भक्तोंके लिये पठनीय एवं उनमें निहित तत्त्वसमूह - सत्-सम्प्रदायके द्वारा अर्थात् वैष्णवोंके द्वारा चिरकालसे अत्यन्त आदरणीय हैं। आदिलाला 7/101 संख्याका अनुभाष्य देखें। ब्रह्मसूत्र अथवा वेदान्तकी व्याख्यामें बिद्ध केवलाद्वैतवाद अथवा निर्विशेषब्रह्म- मत-स्थापन हेतु प्रयास करनेपर, वह पूर्णतया शुद्धभक्तिके विरुद्ध कुमतवाद मात्र है ॥ 95 ॥ मायावाद-विषकी तीव्रताका वर्णन और श्रवणसे पतनकी आशङ्का :- महाभागवत, कृष्ण प्राणधन याँर। मायावाद-श्रवणे चित्त अवश्य फिरे ताँर ॥” 96 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 96 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - जिनके प्राणधन- कृष्ण हैं, ऐसे जो महाभागवत हैं, वे भी यदि मायावादपूर्ण शारीरकभाष्यको श्रवण करें, तब उनका चित्त भी उस ओर झुककर भक्तिसे च्युत हो जाता है ॥” 96 ॥ आचार्यके द्वारा अपनी श्रीकृष्ण-निष्ठाकी प्रशंसा :- आचार्य कहे, –“आमा सबार कृष्णनिष्ठ-चित्ते। आमा-सबार मन भाष्य नारे फिराइते ॥” 97 ॥ अनुवाद-श्रीभगवान् आचार्यने कहा, - “हम सबका चित्त तो कृष्णनिष्ठ है, इसलिये शारीरक भाष्य हम सबके मनको विचलित नहीं कर सकता ॥” 97 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा शुद्धभक्तोंके हृदयविदारक मायावादके अर्थका निरूपण :- स्वरूप कहे, –“तथापि मायावाद-श्रवणे। 'चित्, ब्रह्म, माया, मिथ्या'- एइमात्र शुने ॥ 98 ॥

[ 2/98-107 दूसरा अध्याय 55 जीवज्ञान-कल्पित, ईश्वरे-सकल अज्ञान। याहार श्रवणे भक्तेर फाटे मन-प्राण॥”99॥ महाप्रभुके ‘छोटा-हरिदास’ नामक कीर्तनीयाको अपने घरपर बुलाकर कहा,-“तुम शिखि-माहितिकी बहन माधवी देवीके घरमें जाकर मेरा नाम लेकर उनसे एक ‘मान’ श्वेत चावल माँगकर ले आओ॥”101-103॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 98-99॥ अमृतप्रवाह भाष्य-[श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,-] “यद्यपि तुम्हारा चित्त कृष्णनिष्ठ होनेके कारण शाङ्कर-भाष्य आदि सुनकर विकृत नहीं होता, तथापि उस मायावादमें, ‘ब्रह्म-चित्स्वरूप निराकार’; ‘यह जगत्-मायामात्र अथवा मिथ्या’, ‘जीव वास्तवमें नहीं है,-वह केवल अज्ञान-कल्पित है’ एवं ‘ईश्वरमें माया-मुग्धतारूप अज्ञान ही विद्यमान है’ आदि विचार हैं। इन सब बातोंको सुननेसे भक्तोंको अत्यन्त दुःख होता है॥”98-99॥ अनुभाष्य-पाठान्तरमें, ‘अड़ोया चाउलं’-‘अरोया’- नामक आतप चावल (धानको उबालनेके बदले सूर्यमें तपाकर प्राप्त चावल); ‘मान’-उड़ीसामें प्रचलित चावल और अन्य अनाजके भार मापनेकी इकाई॥103॥ महाभागवत माधवीदेवीका परिचय :- माहितिर भगिनीर नाम-माधवी देवी। वृद्धा तपस्विनी आर परमा वैष्णवी॥104॥ अनुभाष्य-आदिलीला 5/58 संख्या एवं 7/113, 121-126 संख्या देखें॥ 98-99॥ अनुवाद-श्रीमाहितिकी बहनका नाम माधवी देवी था। वे वृद्धा, तपस्विनी तथा परम-वैष्णवी थीं॥104॥ आचार्यको श्रीस्वरूपके वचनोंके वास्तविक अर्थकी उपलब्धि और छोटे भाईको अपने गाँवमें भेजना :- लज्जा-भय पाञा आचार्य मौन हइला। आर दिन गोपालेरे देशे पाठाइला॥100॥ महाप्रभुके समस्त भक्तोंमें-से केवल साढ़े तीन जन ही श्रीमतीके गण :- प्रभु लेखा करे यारे-‘राधिकार गण’। जगतेर मध्ये ‘पात्र’-साड़े तिनजन॥105॥ स्वरूप गोसाञि आर राय-रामानन्द। शिखि-माहिति-तिन, ताँर भगिनी-अर्द्धजन॥106॥ अनुवाद-श्रीभगवान् आचार्य बहुत लज्जित और भयभीत हो गये तथा वे कुछ नहीं कह सके। उन्होंने अगले दिन ही गोपालको अपने ग्राममें भेज दिया॥100॥ अनुवाद-महाप्रभु जिन्हें ‘श्रीमती राधिकाका गण’ कहकर गिनते थे, ऐसे पात्र इस जगत्में केवल साढ़े तीन व्यक्ति ही थे। श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीरामानन्द राय, श्रीशिखि माहिति-ये तीन लोग और श्रीशिखि माहितिकी बहन श्रीमाधवी देवीको आधा गिनकर कुल साढ़े तीन व्यक्ति होते हैं॥105-106॥ अन्य एकदिन छोटे-हरिदासको महाप्रभुके भोजनके उद्देश्यसे श्रीमाधवीदेवीसे चावल लानेके लिये भेजना :- एकदिन आचार्य प्रभुरे कैला निमन्त्रण। घरे भात करि’ करे विविध व्यञ्जन॥101॥ माधवीदेवीसे हरिदासके द्वारा सूक्ष्म-चावल लाना और आचार्यके द्वारा रसोई बनाना :- ताँर ठाञि तण्डुल मागि’ आनिल हरिदास। तण्डुल देखि’ आचार्येर अधिक उल्लास॥107॥ ‘छोट हरिदास’ नाम प्रभुर कीर्त्तनीया। ताहारे कहेन डाकि’ आपने आनिया॥102॥ “मोर नामे शिखि-माहितिर भगिनी-स्थाने गिया। शुक्लचाउल एक मान आनह मागिया॥”103॥ अनुवाद-छोटे-हरिदास श्रीमाधवी देवीसे चावल माँगकर ले आये। उन चावलोंको देखकर श्रीभगवान् आचार्यको बहुत आनन्द हुआ॥107॥ अनुवाद-एकदिन श्रीभगवान् आचार्यने महाप्रभुको निमन्त्रण किया। वे घरपर ही चावल और अनेक प्रकारके पकवान बनानेके लिये तत्पर हुए। उन्होंने

56 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/108-116 ] स्नेहे रान्धिल प्रभुर प्रिय ये व्यञ्जन। देउल-प्रसाद, आदा-चाकि, लेम्बु-सलवण ॥ 108 ॥ अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यने बहुत प्रेमसे महाप्रभुको प्रिय लगनेवाले पकवान बनाये। उन्होंने श्रीजगन्नाथदेवका प्रसाद और पचानेके लिये घिसी हुई अदरक, नींबूके साथ नमक एकत्रित करके रखे ॥ 108 ॥ अनुभाष्य— देउल प्रसाद,—देवालयका प्रसाद अर्थात् श्रीजगन्नाथ मन्दिरसे लाया गया महाप्रसाद ॥ 108 ॥ महाप्रभुके द्वारा भोजन और सूक्ष्म-चावलकी प्राप्तिके कारणकी जिज्ञासा :— मध्याह्ने आसिया प्रभु भोजने बसिला। शाल्यन्न देखि' प्रभु आचार्ये पुछिला ॥ 109 ॥ “उत्तम अन्न एत तण्डुल काँहाते पाइला ?” आचार्य कहे,—माधवी-पाश मागिया आनिला ॥ 110 ॥ अनुवाद—मध्याह्नके समय महाप्रभु श्रीभगवान् आचार्यके स्थानपर आकर भोजनके लिये बैठे। भोजनमें श्वेत पतले चावलोंको देखकर महाप्रभुने उनसे पूछा,—“ये बड़े उत्तम चावल हैं, इतने चावल तुम्हें कहाँसे मिले ?” श्रीभगवान् आचार्यने उत्तर दिया, —‘माधवी देवीसे माँगकर लाये गये हैं ॥'109-110 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'शाल्यन्न',—श्वेत पतले चावल ॥ 109 ॥ आचार्यके द्वारा माधवी और छोटे-हरिदासके नामका उल्लेख :— प्रभु कहे,—“कोन् याइ' मागिया आनिल ?” छोट हरिदासेर नाम आचार्य कहिल ॥ 111 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा, —“कौन जाकर माँगकर लाया है ?” श्रीभगवान् आचार्यने छोटे-हरिदासका नाम बताया ॥ 111 ॥ भोजनके अन्तमें महाप्रभुके द्वारा श्रीगोविन्दको छोटे- हरिदासके अपने घरमें प्रवेशके लिये निषेध-आज्ञा :— अन्न प्रशंसिया प्रभु भोजने बसिला। निजगृहे आसि' गोविन्देरे आज्ञा दिला ॥ 112 ॥ “आजि हैते एइ मोर आज्ञा पालिबा। छोट हरिदासे इँहा आसिते ना दिबा ॥”113 ॥ अनुवाद—चावलोंकी प्रशंसा करके बैठकर महाप्रभुने भोजन किया। तब अपने वासस्थानपर आकर उन्होंने अपने सेवक श्रीगोविन्दको आदेश दिया,—“आजसे मेरी इस आज्ञाका पालन करना—छोटे-हरिदासको यहाँ मत आने देना ॥”112-113 ॥ हरिदासका गम्भीर दुःख और उपवास :— द्वार-माना, हरिदास दुःखी हैल मने। कि लागिया द्वार-माना केह नाहि जाने ॥ 114 ॥ अनुवाद—'महाप्रभुका द्वार मेरे लिये बन्द हैं'—ऐसा सुनकर छोटे-हरिदासका मन बहुत दुःखी हुआ। कोई नहीं समझ पाया कि छोटे-हरिदासको वहाँ आनेके लिये मना क्यों किया है ॥ 114 ॥ तिन दिन हरिदास करे उपवास। स्वरूपादि सबे पुछिला प्रभुर पाश ॥ 115 ॥ महाप्रभुके निकट जाकर श्रीस्वरूप आदिके द्वारा हरिदासके प्रवेश-निषेधके कारणकी जिज्ञासा :— “कोन् अपराध प्रभु, कैल हरिदास ? कि लागिया द्वार-माना, करे उपवास ?”116 ॥ अनुवाद—छोटे-हरिदासने तीन दिन तक उपवास किया। तब श्रीस्वरूप दामोदर आदि सभी भक्तों ने महाप्रभुसे पूछा,—“हे प्रभो! छोटे-हरिदासने कौन-सा अपराध किया है ? आपने किस कारणसे उसे अपने द्वारपर आनेके लिये मना किया है ? वह तीन दिनसे उपवास कर रहा है ॥”115-116 ॥

[ 2/117-119 दूसरा अध्याय 57 स्त्रीसे बातचीत करनेवाले वैरागीके प्रति महाप्रभुका असन्तोष :- प्रभु कहे,–“वैरागी करे प्रकृति सम्भाषण। देखिते ना पारों आमि ताहार वदन ॥ 117 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“जो वैरागी होकर स्त्रीसे सम्भाषण अर्थात् भोगमय बुद्धिसे वार्तालाप करता है, मैं उस व्यक्तिका मुख नहीं देख सकता ॥ 117 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—वैष्णव, या तो गृहस्थ होकर स्त्री-परिवारके साथ रहेंगे, अन्यथा स्त्री-सम्बन्धको परित्याग करके 'वैरागी' होंगे। वैरागी होनेपर फिर स्त्रियोंका दर्शन अथवा उनसे वार्तालाप करनेका अधिकार नहीं रहता। पापवासनाके नहीं रहनेपर भी अथवा बाहरी रूपसे किसी भक्तिके कार्यको उद्देश्य करनेपर भी उस प्रकारसे [स्त्रीके साथ सम्बन्ध-युक्त होना] वैरागीका कर्त्तव्य नहीं है। इसलिये वैरागी होकर जो व्यक्ति स्त्रीसे सम्भाषण करता है, धर्मका नाश करनेवाला होनेके कारण उसका मुख मैं देख नहीं पाऊँगा ॥ 117 ॥ अनुभाष्य—'सरलता'—वैष्णवका प्रधान लक्षण है, एवं 'कपटता'—भक्तिकी विरोधी विशेष उपशाखा है। श्रीकृष्णसे आसक्ति होनेपर श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य वस्तुओंसे विरक्त होकर भक्त जड़़ीय-भोगमय-दर्शनसे उत्पन्न विषयोंका त्याग करता है। किन्तु लोगोंकी दृष्टिमें उसकी [श्रीकृष्णके प्रति] वैसी आसक्ति प्रमाणित हो जानेके पश्चात् भी पुनः कपटताके प्रकाशित होनेपर लोग उसके व्यवहारके प्रति श्रद्धा नहीं कर पाते ॥ 117 ॥ जड़़ीय इन्द्रियोंका भोग-उन्मुखतारूपी स्वभाव और स्त्री-दर्शनका विषममय फल :- दुर्वार इन्द्रिय करे विषय-ग्रहण। दारु-प्रकृति हरे मुनेरपि मन ॥ 118 ॥ अनुवाद—इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंको ग्रहण करनेसे निरोध करना इतना कठिन है कि लकड़ीसे बनी स्त्रीकी मूर्ति भी मुनि तकके मनको हरण कर लेती है ॥ 118 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'दारु-प्रकृति हरे मुनेरपि मन',—लकड़ीसे बनी नारी भी मुनिके मनका हरण कर सकती है, अतएव वैरागी व्यक्ति स्त्रीसे सम्बन्धका अवश्य ही त्याग करेंगे ॥ 118 ॥ अनुभाष्य—रूप, शब्द, गन्ध, रस और स्पर्श,—इन पाँच विषयोंको ग्रहण करना ही क्रमशः नेत्र, कान, नाक, जिह्वा और त्वचारूपी पाँच इन्द्रियोंका स्वभाव है। बद्धजीवोंमें-से किसी-किसीके द्वारा स्वयंको इन्द्रियोंके दमन करनेमें समर्थ समझनेपर भी वास्तवमें बहिर्मुखताके कारण उसके लिये इन्द्रियोंका दमन करना अति कठिन है। भोगमय दर्शनसे विषयोंके उपस्थित होनेपर प्राकृत-बुद्धिसम्पन्न मानव मुनिधर्मको ग्रहण करनेपर भी लकड़ीसे बनी नारीकी मूर्तिको देखकर ही क्षुब्ध तथा चञ्चल हो जाता है ॥ 118 ॥ अग्नि और घीकी भाँति पुरुष अभिमानीके लिये स्त्री-सङ्ग-निषेध :- श्रीमद्भागवत (9/19/17)में और मनुसंहिता (2/215) में— मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नाविविक्तासनो वसेत्। बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥ 119 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 119 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—माताके साथ, बहनके साथ एवं पुत्रीके साथ निर्जनमें कभी भी मत रहना; क्योंकि बलवान् इन्द्रियाँ विद्वान पुरुषके भी मनको आकर्षित कर सकती हैं ॥ 119 ॥ अनुभाष्य—महाराज ययाति कामके वशीभूत और स्त्रीके द्वारा पराजित होकर ग्राम्य विषयसमूह भोग करते-करते अपने सर्वनाशको समझकर अन्तमें निर्वेदयुक्त होकर पत्नी देवयानीको अपने चरित्र और व्यवहारका वर्णन करते हुए स्त्री-सङ्गकी निन्दा कर रहे हैं— मात्रा (जनन्या) स्वस्रा (भगिन्या) दुहित्रा (कन्यया वा सह) अविविक्तासनः (अविविक्तं सङ्कीर्णम् आसनं यस्य सः तथाभूतः) न वसेत् (भवेत् इति पाठान्तरम्; यतः) बलवान् (प्रचुरबल-

58 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/119-123 ] विशिष्टः) इन्द्रियग्रामः (इन्द्रियसमूहः) विद्वांसं (बन्धमोक्षवित्- पुरुषम्) अपि कर्षति (आकर्षति, बन्धाय नियोजयति)। श्लोक-भावानुवाद—माता, बहन अथवा पुत्रीके साथ सटकर नहीं बैठना चाहिये, क्योंकि प्रचुर बलयुक्त इन्द्रियाँ बन्धन और मोक्षके तत्त्वको जाननेवाले पुरुषको भी आकर्षित कर लेती हैं अर्थात् उसे बन्धनमें नियोजित कर देती हैं॥ 119॥ श्रीकृष्णकी इन्द्रियोंकी तृप्तिके विधानको छोड़नेपर ही अनधिकारी कृत्रिम-वैरागीका पुरुषाभिमानमें प्रकृतिका भोग एवं बाहरी वेषके आश्रयमें कृत्रिम अस्थिर वैराग्य हेतु जिह्वा-उदर-उपस्थ लाम्पट्य :- क्षुद्रजीव सब मर्कट-वैराग्य करिया। इन्द्रिय चराञा बुले 'प्रकृति' सम्भाषिया॥ ”120 ॥ अनुवाद—अनेक लोग संसारमें विषयोंको प्राप्त करनेमें असफल होकर वैरागीका वेश धारण करके मर्कट-वैराग्य (मध्यलीला 16/238 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य देखें) प्रदर्शित करते हैं। वे इन्द्रियोंके वशीभूत होकर इधर-उधर भ्रमण करते हुए स्त्रियोंसे सम्भाषण करते हैं॥ ”120 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—साधनभक्तिका विवेचन करते करते भावके उदित होनेपर जिस पुरुषमें विरक्ति उत्पन्न होती है, उसका ही वैराग्यमें अधिकार है। उस अवस्थाको प्राप्त करनेसे पहले जो 'भेक' (वैरागी-वेष) ग्रहण करते हैं, उन्हींके वैराग्यका नाम 'मर्कटवैराग्य' है। अनधिकारी जीव किसी-न-किसी कारणसे अनुचित समयपर वैराग्य ग्रहण करके उसके बाद इन्द्रियोंके वशीभूत होकर प्रकृति अर्थात् स्त्रियोंके साथ सम्भाषण करने लगता है। इन्हें धर्मध्वजी अथवा धर्मके नामपर कलङ्क जानकर अवश्य ही दूर रखना चाहिये॥ 120॥ अनुभाष्य—'मर्कट',—सौत्र मर्क (गत्यर्थक)+अटन् कर्तृवाच्ये,—चञ्चल, अस्थिर; 'इन्द्रिय चराञा',—इन्द्रियोंके वशीभूत होकर; 'बुले',—भ्रमण करता है। बाहरसे वैराग्य दिखलाकर जो लोगोंसे सम्मान संग्रह करते हैं एवं विषय-भोगवासनासे निर्मुक्त हृदयवाले नहीं हो सकनेके कारण स्त्रियोंके साथ भोगबुद्धिसे वार्तालाप करके स्वयंको 'पुरुष' मानकर आठ प्रकारसे स्त्रियोंके सङ्गकी वासना करते हैं, ऐसे प्राकृत-सहजिया जीव कभी भी 'महत्'-शब्दसे सम्बोधन योग्य नहीं हैं। विवित्सा अथवा धीर-संन्यासियोंमें स्त्री-सम्भाषणरूप अपराध—उनके स्वयंके लिये विशेष रूपसे अमङ्गलका कारण है, किन्तु श्रीरामानन्द आदि प्रमुख 'विद्वत्' अथवा 'नरोत्तम'-संन्यासी परमहंसोंको यदि कोई अक्षजज्ञानी [जिनका ज्ञान इन्द्रियोंसे प्राप्त ज्ञान तक ही सीमित है] अपने दुर्भाग्यवशातः स्त्री-सम्भाषी समझें, तब उनका पतन अवश्यम्भावी है॥ 120॥ महाप्रभुका क्रोधके आवेशमें स्थानका त्याग, सभी भक्तोंके द्वारा मौन धारण :- एत कहिं महाप्रभु अभ्यन्तरे गेला। गोसाञिर आवेश देखि' सबे मौन हैला॥ 121 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु भीतर चले गये। उनके क्रोधके आवेशको देखकर सभी मौन हो गये॥ 121 ॥ अनुभाष्य—'आवेश',—क्रोधका आवेश॥ 121 ॥ अगले दिन हरिदासके लिये भक्तोंका महाप्रभुके निकट आवेदन :- आर दिने सबे मेलि' प्रभुर चरणे। हरिदास लागि' किछु कैला निवेदने ॥ 122 ॥ “अल्प अपराध, प्रभु, करह प्रसाद। एबे शिक्षा हइल, ना करिबे अपराध ॥ ”123 ॥ अनुवाद—अगले दिन सभी भक्तोंने मिलकर छोटे-हरिदासके लिये महाप्रभुके चरणोंमें कुछ निवेदन किया,—“हे प्रभो! छोटे-हरिदाससे थोड़ा अपराध हो गया है, आप उसपर कृपा कीजिये। अब उसे अच्छी शिक्षा मिल गयी है, वह अब पुनः अपराध नहीं करेगा॥ ”122-123 ॥

[ 2/123-132 दूसरा अध्याय 59 अमृतप्रवाह भाष्य- 'अल्प अपराध',- माधवी देवीके पास जाकर चावलकी भिक्षा करनेमें छोटे-हरिदासका अन्य कोई उद्देश्य नहीं था, केवल महाप्रभुकी सेवासुख-वासना ही थी, तथापि उस कार्यमें एक अपराध हुआ था। वैरागीका वेश लेकर पुनः स्त्रियोंके साथमें सम्भाषण करना जो एक अपराध है, वह यद्यपि वैरागीके लिये महत् अपराध है, किन्तु प्रभुकी सेवाके लिये उस प्रकारके अपराधको 'सामान्य' कहकर भी कहा जा सकता है ॥ 123 ॥ जगद्गुरु लोकशिक्षक महाप्रभुकी निरपेक्षता और वज्रसे भी अधिक कठोरता :- प्रभु कहे,- “मोर वश नहे मोर मन। प्रकृति-सम्भाषी वैरागी ना करे स्पर्शन ॥ 124 ॥ महाप्रभुका तीव्र शासन :- निज कार्ये याह सबे, छाड़ वृथा कथा। कह यदि पुनः, आमा ना देखिबे हेथा ॥" 125 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “मेरा मन मेरे वशमें नहीं है। वह स्त्रीसे सम्भाषण करनेवाले वैरागीका स्पर्श नहीं करना चाहता। व्यर्थकी बातें छोड़कर सभी अपने-अपने कामपर जाओ। यदि पुनः आप लोगोंने ऐसी बात कही तो फिर मुझे यहाँपर कभी नहीं देखोगे ॥” 124-125 ॥ महाप्रभुके वचन सुनकर सभीको भय और लज्जा :- एत शुनि' सबे निज-कर्णे हस्त दिया। निज-निज कार्ये सबे गेल त' उठिया ॥ 126 ॥ अनुवाद-यह सुनकर सबने अपने कानोंको हाथोंसे ढक लिया और सभी उठकर अपने-अपने कामपर चले गये ॥ 126 ॥ दुर्बोध्य महाप्रभुकी लीलाका तात्पर्य :- महाप्रभु मध्याह्न करिते चलि' गेला। बुझन ना याय एइ महाप्रभुर लीला ॥ 127 ॥ अनुवाद-महाप्रभु भी मध्याह्नके कृत्य करनेके लिये चले गये। महाप्रभुकी इस लीलाको कोई भी समझ नहीं पा रहा था ॥ 127 ॥ हरिदासके लिये श्रीपरमानन्दपुरी गोस्वामीके द्वारा महाप्रभुके समीप आवेदन :- आर दिन सबे परमानन्दपुरी-स्थाने। 'प्रभुके प्रसन्न कर'-कैला निवेदने ॥ 128 ॥ अनुवाद-अगले दिन सभी भक्त श्रीपरमानन्द पुरीके स्थानपर गये और उनसे निवेदन किया,- 'आप ही महाप्रभुको शान्त कीजिये ॥' 128 ॥ तबे पुरी-गोसाञि एका प्रभुस्थाने आइला। नमस्करि' प्रभु ताँरे सम्भ्रमे बसाइला ॥ 129 ॥ अनुवाद-तब श्रीपरमानन्दपुरी गोस्वामी अकेले महाप्रभुके वासस्थानपर आये। महाप्रभुने उन्हें प्रणाम करके आदरसहित बैठाया ॥ 129 ॥ पुछिला,- “कि आज्ञा, केने हैल आगमन ?” हरिदासे प्रसाद लागि' कैला निवेदन ॥ 130 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने पूछा, - “मेरे लिये क्या आदेश है? आपका किस उद्देश्यसे आगमन हुआ है?" श्रीपरमानन्द पुरीने निवेदन करते हुए कहा कि 'छोटे-हरिदासके प्रति आप कृपा करें'- मैं इस उद्देश्यसे आया हूँ ॥ 130 ॥ महागम्भीर महाप्रभुके द्वारा असन्तुष्ट चित्तके कारण श्रीगोविन्दके साथ पुरी त्याग करके आलालनाथ जानेके भयका प्रदर्शन :- शुनिया कहेन प्रभु, - “शुनह, गोसाञि। सब वैष्णव लञा तुमि रह एइ ठाञि ॥ 131 ॥ मोरे आज्ञा हय, मुञि याङ आलालनाथ। एकले रहिब ताँहा, गोविन्द-मात्र साथ ॥" 132 ॥ अनुवाद-श्रीपरमानन्दपुरीकी बात सुनकर महाप्रभुने कहा,- “हे गोसाईं, सुनिये ! आप सभी वैष्णवोंके साथ मिलकर यहीं रहिये। मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं

60 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/131–142 ] आलालनाथ चला जाऊँ। मैं वहाँ अकेला रहूँगा, केवल गोविन्दको अपने साथ ले जाऊँगा॥"131–132॥ एत बलि' प्रभु यदि गोविन्दे बोलाइला। पुरीरे नमस्कार करि' उठिया चलिला ॥ 133 ॥ अनुवाद—यह कहकर तभी महाप्रभुने श्रीगोविन्दको बुलाया और श्रीपरमानन्द पुरीको प्रणाम करके उठकर चल दिये॥ 133 ॥ श्रीपुरी-गोस्वामीको लज्जा और भय एवं दैन्यपूर्वक महाप्रभुको घरमें लौटाकर लाना :— आस्ते-व्यस्ते पुरी गोसाञि प्रभु-आगे गेला। अनुनय करि' प्रभुरे घरे फिराइला ॥ 134 ॥ अनुवाद—शीघ्रतासे श्रीपरमानन्द पुरी गोसाईं महाप्रभुके आगे गये और अनुनय-विनय करके महाप्रभुको उनके वासस्थानमें लौटा लाये॥ 134 ॥ श्रीपुरीके द्वारा महाप्रभुकी स्तुति और अपने स्थानपर लौटना :— “तोमार ये इच्छा कर, स्वतन्त्र ईश्वर। केबा कि बलिते पारे तोमार उपर ? ? 135॥ लोकहित लागि' तोमार सब व्यवहार। आमि सब ना जानि गम्भीर हृदय तोमार ॥” 136 ॥ अनुवाद—श्रीपरमानन्द पुरीने कहा,—“आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं, आपकी जैसी इच्छा हो आप वैसा ही कीजिये। आपके ऊपर कौन क्या कह सकता है? आपके सभी व्यवहार लोगोंके हितके लिये ही हैं। हम उन सबको नहीं समझ सकते, क्योंकि आपके हृदयके विचार अति गम्भीर हैं॥” 135–136 ॥ विफल-मनोरथ होकर भक्तोंका हरिदासके समीप जाना :— एत बलि' पुरी-गोसाञि गेला निज-स्थाने। हरिदास-स्थाने गेला सब भक्तगणे ॥ 137 ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीपरमानन्द पुरी गोस्वामी अपने स्थानपर लौट गये। सभी भक्त मिलकर छोटे-हरिदासके स्थानपर गये॥ 137 ॥ श्रीस्वरूप-गोस्वामीके द्वारा हरिदासको आशा और सान्त्वना देना :— स्वरूप-गोसाञि कहे,—“शुन, हरिदास। सबे तोमार हित वाञ्छि, करह विश्वास ॥ 138 ॥ प्रभु हठ पड़ियाछे स्वतन्त्र ईश्वर। कभु कृपा करिबेन दयालु अन्तर ॥ 139 ॥ तुमि हठ कैले ताँर हठ से बाड़िबे। स्नान-भोजन कैले, आपने क्रोध याबे ॥” 140 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने कहा,—“हे हरिदास, सुनो! हम सब तुम्हारा हित चाहते हैं, तुम हमारी बातपर विश्वास करो। महाप्रभु स्वतन्त्र ईश्वर हैं, अभी उन्होंने हठ पकड़ ली है। कभी-न-कभी तो वे अवश्य ही तुमपर कृपा करेंगे, क्योंकि उनका हृदय तो भीतरसे दयासे पूर्ण है। यदि तुम हठ करोगे, तो फिर उसे देखकर महाप्रभुका हठ भी बढ़ जायेगा। इसलिये तुम स्नान तथा भोजन करो। धीरे-धीरे महाप्रभुका क्रोध भी स्वयं ही दूर हो जायेगा॥” 138–140 ॥ अनुभाष्य—'हठ',—बलका प्रयोग, ज़िद॥ 139 ॥ एत बलि' तारे स्नान-भोजन करावा। आपन भवन आइला तारे आश्वासिया ॥ 141 ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीस्वरूप दामोदरने छोटे-हरिदासको स्नान तथा भोजन करनेके लिये प्रेरित किया और उन्हें आश्वासन देकर वे अपने स्थानपर लौट गये॥ 141 ॥ दूर रहकर हरिदासके द्वारा महाप्रभुका दर्शन :— प्रभु यदि यान जगन्नाथ-दरशने। दूरे राहि' हरिदास करेन दर्शने ॥ 142 ॥ अनुवाद—जब महाप्रभु श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनके

[ 2/142-147 दूसरा अध्याय 61 लिये जाते, तब छोटे-हरिदास दूरमें रहकर ही उनके दर्शन करते ॥ 142 ॥ धर्मसेतु धर्मरक्षक महाप्रभुका परम कारुण्य :- महाप्रभु-कृपासिन्धु, के पारे बुझिते? निज-भक्ते दण्ड करेन धर्म बुझाइते ॥ 143 ॥ अनुवाद-महाप्रभु कृपाके सिन्धु हैं, इसे कौन समझ सकता है? जगत्में धर्मकी शिक्षा देनेके लिये वे अपने भक्त तकको दण्ड प्रदान करते हैं॥ 143 ॥ अनुभाष्य-यद्यपि कपटतापूर्वक अवैध स्त्री-सङ्ग भी पापोंमें-से एक पाप मात्र है, तथापि जगतवासियोंको दो मुख्य शिक्षा देनेके लिये महाप्रभुने अपने भक्त हरिदासको दण्ड प्रदान किया-(1) वास्तविक वैष्णवोंकी त्रिगुणातीत अप्राकृत परमोच्च स्थिति है एवं (2) भविष्यकालके बिद्ध प्राकृत-सहजिया आदि उपधर्म और अपधर्मका पालन करनेवाले नारकी व्यक्तियोंका व्यवहार अत्यन्त अधर्मकी नींवके ऊपर बना हुआ और शुद्ध वैष्णव धर्मके सम्पूर्ण विपरीत और स्वतन्त्र है। श्रीमाधवी देवी-उच्चाधिकारिणी महाभागवत हैं; उनके पास जाकर चावलकी भिक्षा ग्रहण करना हरिदास जैसे प्रभु-पार्षदका अवैध-कार्य नहीं होनेपर भी भविष्यमें ऐसे उदाहरण अथवा आदर्शका अनुकरण करके अनेक लोग शठता और कपटताका विस्तार करके कलिजनोचित अवैष्णव-मतका प्रचार कर सकते हैं, - उसको रोकनेके उद्देश्यसे जगद्गुरु लोकशिक्षक भगवान्की यह हरिदास-सम्बन्धिनी दण्ड-लीला है। श्रीगौरसुन्दरने असामान्य दयाके सागर होनेपर भी कलियुगके जीवोंकी दुर्बलताको समझकर ही इस प्रकारके सङ्गत्याग रूपी सुकठोर दण्डका विधान करके अमन्दोदया-दयाकी पराकाष्ठाको प्रदर्शित किया ॥ 143 ॥ छोटे हरिदासके दण्डको देखकर साधकोंका पुरुष अथवा भोक्ताके अभिमानसे इन्द्रिय-तर्पणके उद्देश्यसे भोगमय नेत्रोंसे भोग्य-स्त्री-दर्शनका त्याग :- देखि' त्रास उपजिल सब भक्तगणे। स्वप्नेह छाड़िल सबे स्त्री-सम्भाषणे ॥ 144 ॥ अनुवाद-छोटे-हरिदासको दिये जा रहे दण्डको देखकर सभी भक्तोंके हृदयमें भय उत्पन्न हो गया। इसलिये सभीने स्वप्न तकमें भी स्त्रीके साथ सम्भाषण करना छोड़ दिया ॥ 144 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'त्रास उपजिल सब भक्तगणे',- वैरागी-वेषधारी (साधक) भक्तोंमें ऐसा भय उपस्थित हुआ कि उन्होंने किसी स्त्रीके साथ बात तक करना छोड़ दिया ॥ 144 ॥ अनुभाष्य- 'स्त्री-सम्भाषण',- भोक्ता अथवा पुरुष- अभिमानसे अपनी इन्द्रियोंकी भोग्या समझकर स्त्रीके साथ विषयी व्यक्तिकी जो बातचीत होती है, वह स्त्री-सम्भाषण है॥ 144 ॥ एक वर्षके बाद भी महाप्रभुकी अटल निरपेक्षता :- एइमते हरिदासेर एकवत्सर गेल। तबु महाप्रभुर मने प्रसाद नहिल ॥ 145 ॥ अनुवाद-इस प्रकार छोटे-हरिदासका एक वर्ष व्यतीत हो गया, किन्तु तब भी महाप्रभुके मनमें उनके प्रति कृपाका आभास भी नहीं दिखा ॥ 145 ॥ महाप्रभुके ऐसे व्यवहारको देखकर छोटे-हरिदासके द्वारा महाप्रभुकी सेवाकी प्राप्तिका सङ्कल्प लेकर प्रयागमें जाकर त्रिवेणीमें देहत्याग :- रात्रि-शेषे प्रभुरे दण्डवत् हञा। प्रयागेते गेल कारेह किछु ना बलिया ॥ 146 ॥ अनुवाद-एक रात्रिके अन्तमें छोटे-हरिदास महाप्रभुको बाहरसे ही दण्डवत् प्रणाम करके बिना किसीको बताये प्रयाग चले गये ॥ 146 ॥ प्रभुपद-प्राप्ति लागि' सङ्कल्प करिल। त्रिवेणी प्रवेश करि' प्राण छाड़िल ॥ 147 ॥ अनुवाद-छोटे-हरिदासने महाप्रभुके चरणोंकी प्राप्तिका सङ्कल्प किया और त्रिवेणीमें प्रवेश करके उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये ॥ 147 ॥

62 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/148-157 ] छोटे-हरिदासके द्वारा अपनी दिव्य देहसे अलक्षित रूपमें महाप्रभुके समीप कीर्तन-गान-सेवा :- सेइक्षणे प्रभुस्थाने दिव्यदेहे आइला। प्रभुकृपा लञा अन्तर्धाने रहिला ॥ 148 ॥ अनुवाद-छोटे-हरिदास उसी समय दिव्य देह धारण करके महाप्रभुके निकट आये और महाप्रभुकी कृपा प्राप्त की। वे सभीके लिये अदृश्य ही रहे॥ 148 ॥ गन्धर्वदेहे गान करेन अन्तर्धाने। रात्रे प्रभुरे शुनाय, अन्य नाहि जाने ॥ 149 ॥ अनुवाद-छोटे-हरिदास अदृश्य रूपमें गन्धर्वके समान दिव्य देहके द्वारा रात्रिके समय महाप्रभुको अपने गानका श्रवण कराते। महाप्रभुके अतिरिक्त अन्य कोई भी इस बातको नहीं जानता था॥ 149 ॥ एकदिन महाप्रभुके द्वारा भक्तोंसे हरिदासके विषयमें पूछना :- एकदिन महाप्रभु पुछिला भक्तगणे। “हरिदास काँहा? तारे आनह एखाने ॥” 150 ॥ अनुवाद-एकदिन महाप्रभुने भक्तोंसे पूछा,—“छोटा- हरिदास कहाँ है? उसे यहाँपर लेकर आओ॥” 150 ॥ सभीके द्वारा हरिदासके सम्बन्धमें अपनी अनभिज्ञता बतलाना :- सबे कहे,—“हरिदास वर्षपूर्ण दिने। रात्रे उठि' काँहा गेला, केह नाहि जाने ॥” 151 ॥ अनुवाद-सभी भक्तोंने कहा,—“एक वर्ष पूर्ण होनेके बाद छोटा-हरिदास रात्रिमें उठकर कहीं चला गया। वह कहाँ गया, यह कोई भी नहीं जानता॥” 151 ॥ महाप्रभुका हास्य; उसे देखकर भक्तोंको विस्मय :- शुनि' महाप्रभु ईषत् हासिया रहिला। सब भक्तगण-मने विस्मय जन्मिला ॥ 152 ॥ अनुवाद-यह सुनकर महाप्रभु थोड़ा-सा मुस्कुराये। महाप्रभुको मुस्कुराते देखकर सब भक्तोंके मनमें विस्मय हुआ ॥ 152 ॥ एकदिन समुद्र-स्नानके समय श्रीस्वरूप और श्रीगोविन्दादि भक्तोंके द्वारा अलक्षित हरिदासके गानका श्रवण :- एकदिन जगदानन्द, स्वरूप, गोविन्द। काशीश्वर, शङ्कर, दामोदर, मुकुन्द ॥ 153 ॥ समुद्रस्नाने गेला सबे, शुने कथो दूरे । हरिदास गायेन, येन डाकि' कण्ठस्वरे ॥ 154 ॥ अनुवाद-एकदिन श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीगोविन्द, श्रीकाशीश्वर पण्डित, श्रीशङ्कर, श्रीदामोदर पण्डित और श्रीमुकुन्द-सभी भक्त मिलकर समुद्र स्नान करनेके लिये गये। उन्होंने छोटे-हरिदासको कुछ दूरीपर गान करते हुए सुना जैसे वे अपने पूर्व स्वरमें उन्हें बुला रहे हैं॥ 153-154 ॥ मनुष्य ना देखे-मधुर गीतमात्र सुने। गोविन्दादि सब मेलि' कैल अनुमाने ॥ 155 ॥ श्रीस्वरूपके अतिरिक्त श्रीगोविन्दादि भक्तोंका अनुमान-हरिदासको आत्महत्याके फलसे ब्रह्मराक्षसयोनिकी प्राप्ति :- “विषादि खाञा हरिदास आत्मघात कैल। सेइ पापे जानि 'ब्रह्मराक्षस' हैल ॥ 156 ॥ आकार ना देखि मात्र शुनि तार गान।” स्वरूप कहेन, - “एइ मिथ्या अनुमान ॥ 157 ॥ अनुवाद-परन्तु किसीको भी गान करते छोटे-हरिदास दिखलायी नहीं दिये, उन्हें केवल मधुर गीत ही सुनायी दे रहा था। इसी कारण श्रीगोविन्दादि सभी भक्तोंने अनुमान लगाया,—“लगता है कि छोटे-हरिदासने विष आदि खाकर आत्महत्या की है, जिस पापके फलस्वरूप वह 'ब्रह्मराक्षस' बन गया है। इसी कारण हमें उसका रूप दिखायी नहीं दे रहा, केवलमात्र उसका गान ही सुनायी दे रहा है।” श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,—“आप लोगोंका ऐसा अनुमान मिथ्या है॥ 155-157 ॥

[ 2/158–166 दूसरा अध्याय 63 श्रीस्वरूपके द्वारा छोटे-हरिदासके गुण और सद्गतिकी प्रशंसा :- आजन्म कृष्णकीर्त्तन, प्रभुर सेवन। प्रभु-कृपापात्र, आर क्षेत्रेर मरण ॥ 158 ॥ दुर्गति ना हय तार, सद्गति से हय। प्रभु-भङ्गी एइ, पाछे जानिबा निश्चय ॥” 159 ॥ अनुवाद—सम्पूर्ण जीवन ही छोटे-हरिदासने श्रीकृष्णका कीर्त्तन किया है, महाप्रभुकी सेवा की है, वह महाप्रभुका कृपा-पात्र है तथा क्षेत्रमें उसने देह त्याग किया है। उसकी कभी भी दुर्गति नहीं हो सकती, उसकी सद्गति ही हुई होगी। यह महाप्रभुकी कोई लीला है, निश्चय ही तुम लोगोंको बादमें उसका पता चलेगा॥” 158-159 ॥ प्रयागसे नवद्वीपमें लौटे एक वैष्णवके मुखसे श्रीवासादिके द्वारा हरिदासके देहत्यागका श्रवण :- प्रयाग हइते एक वैष्णव नवद्वीप आइल। हरिदासेर वार्त्ता तेंहो सबारे कहिल ॥ 160 ॥ अनुवाद—प्रयागसे एक वैष्णव नवद्वीपमें आये तथा उन्होंने छोटे-हरिदासकी आत्महत्याके विषयमें सबको बतलाया॥ 160 ॥ यैछे सङ्कल्प, यैछे त्रिवेणी प्रवेशिल। शुनि' श्रीवासादिरे मने विस्मय हइल ॥ 161 ॥ अनुवाद—छोटे-हरिदासने जिस प्रकारसे सङ्कल्प ग्रहण किया था, जिस प्रकारसे त्रिवेणीमें प्रवेश किया था, यह सब बतलाया। इसे सुनकर श्रीवासादि भक्तोंके मनमें बहुत विस्मय हुआ॥ 161 ॥ अगले वर्ष गौड़ीय भक्तोंका पुरीमें आगमन :- वर्षान्तरे शिवानन्द सब भक्त लञा। प्रभुरे मिलिला आसि' आनन्दित हञा ॥ 162 ॥ अनुवाद—एक वर्षके बाद श्रीशिवानन्द सेन सभी भक्तोंको अपने साथ लेकर श्रीजगन्नाथपुरी आये और बड़े आनन्दसे महाप्रभुसे आकर मिले॥ 162 ॥ श्रीवासके द्वारा महाप्रभुसे छोटे हरिदासके सम्बन्धमें जिज्ञासा और महाप्रभुका उत्तर :- “हरिदास काँहा ?” यदि श्रीवास पुछिला। “स्वकर्मफलभुक् पुमान्”—प्रभु उत्तर दिला ॥ 163 ॥ अनुवाद—तब श्रीवास पण्डितने पूछा,—“छोटा-हरिदास कहाँ है?” महाप्रभुने उत्तर दिया,—“मनुष्य अपने कर्मोंका फल भोग करता है॥” 163 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— “स्वकर्मफलभुक् पुमान्”—मनुष्य अपने कर्मोंके फलका भोग करता है॥ 163 ॥ श्रीवासके द्वारा छोटे-हरिदासके देहत्यागके वृत्तान्तका वर्णन :- तबे श्रीवास तार वृत्तान्त कहिल। यैछे सङ्कल्प, यैछे त्रिवेणी प्रवेशिल ॥ 164 ॥ अनुवाद—तब श्रीवास पण्डितने छोटे-हरिदासने जैसे सङ्कल्प किया और जैसे त्रिवेणीमें प्रवेश किया—यह सारा वृत्तान्त कह सुनाया॥ 164 ॥ सद्धर्मके रक्षक जगद्गुरु लोकशिक्षक महाप्रभुके द्वारा विधिकी व्यवस्थाका विधान :- शुनि' प्रभु हासि' कहे सुप्रसन्न चित्त। “प्रकृति-दर्शन कैले एइ प्रायश्चित ॥” 165 ॥ अनुवाद—श्रीवास पण्डितकी बात सुनकर महाप्रभुने हृदयमें बहुत प्रसन्न होकर मुस्कुराते हुए कहा,—“स्त्रीका भोगबुद्धिसे दर्शन करनेका यही प्रायश्चित है॥” 165 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भेकधारी अर्थात् वैरागी-वेषधारी साधक वैष्णव यदि इच्छापूर्वक स्त्रीका दर्शन करता है, तो अगले जन्ममें इस दोषसे मुक्त होनेके अभिप्रायसे त्रिवेणीमें डूबकर मरना ही प्रायश्चित्त है॥ 165 ॥ दूसरे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। त्रिवेणी आदि विष्णुतीर्थमें देहत्यागका फल :- स्वरूपादि मिलि' तबे विचार करिला। त्रिवेणी-प्रभावे हरिदास प्रभुपाश आइला ॥ 166 ॥

64 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/166-169 ] अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरादि भक्तोंने मिलकर विचार किया कि त्रिवेणीमें प्राण त्यागनेके प्रभावसे छोटा-हरिदास महाप्रभुके समीप आ गया है॥ 166 ॥ महाप्रभुकी लीला भक्तोंके हृदय और कानोंके लिये रसायन स्वरूप :- एइमत लीला करे शचीर नन्दन। याहा शुनि' भक्तगणेर जुड़ाय कर्ण-मन॥ 167 ॥ अनुवाद—शचीनन्दन श्रीगौरहरि ऐसी लीलाएँ करते हैं, जिन्हें सुनकर भक्तोंके कान तथा मन आनन्दित हो जाते हैं॥ 167 ॥ छोटे-हरिदासको दण्ड-प्रदान-लीलामें शिक्षणीय विषय :- आपन कारुण्य, लोके वैराग्य-शिक्षण। स्वभक्तेर गाढ़-अनुराग-प्रकटीकरण॥ 168 ॥ तीर्थेर महिमा, निज-भक्ते आत्मसात्। एक लीलाय करेन प्रभु कार्य पाँच-सात॥ 169 ॥ अनुवाद—छोटे-हरिदासको दण्ड-प्रदानकी एक लीलाके माध्यमसे महाप्रभुने पाँच-सात कार्य सिद्ध किये हैं। जैसे—अपनी करुणाका प्रकाश, लोगोंको वैराग्यकी शिक्षा, अपने भक्तोंके अपने प्रति गाढ़ अनुरागको प्रकट करना, तीर्थकी महिमा तथा अपने भक्तोंको आत्मसात् करना आदि॥ 168-169 ॥ अनुभाष्य—महाप्रभुके द्वारा छोटे-हरिदासको दण्ड प्रदान करनेकी लीलाके द्वारा शुद्ध गौरकृष्ण भजनके इच्छुक साधक महाप्रभुकी निम्नलिखित शिक्षाको लक्ष्य करेंगे—

  1. भगवान् श्रीगौरसुन्दरने जीवोंके प्रति परम करुणायुक्त होकर अपने पार्षद-भक्त छोटे-हरिदासका भी बाहरी रूपसे त्याग किया। यदि महाप्रभु उनका त्याग नहीं करते, तब फिर अवैधरूपसे आश्रय पाकर कलिकालके दुर्बल जीव प्राकृत-सहजिया आदि जड़ीय अपधर्म और उपधर्मको 'वैष्णवधर्म' मानकर नरकमें सड़ते रहते, उसमें महाप्रभुकी करुणाका परिचय नहीं होता।
  2. प्रचारकारी वैष्णवाचार्यका आसन और आचरणकारी भक्तका आसन कैसा होना उचित है, उसका इस दण्ड-प्रदानके माध्यमसे महाप्रभुने सर्वसाधारणको उपदेश दिया है।
  3. शुद्ध, सरल और निष्पाप जीवनयुक्त होकर भगवद्भक्तोंका जिस प्रकार श्रीगौरकी सेवा करना कर्त्तव्य है, महाप्रभुने जीवोंको वैसे कृष्णेतर-विषयभोग-त्यागरूपी वैराग्य'की शिक्षा प्रदान की।
  4. महाप्रभुके निजभक्तोंका सुनिर्मल चरित्र कितना उच्च और लोभनीय आदर्श-स्थल है एवं (शुद्ध) सद्भक्तोंको वे किस प्रकार अपना जन मानकर ग्रहण करते हैं तथा कृष्णके अतिरिक्त अन्य विषयोंके प्रति अनुरागकी छायासे कैसा विषमय फल उत्पन्न होता है,

[ 2/168-172 दूसरा अध्याय 65 उसे भी महाप्रभुने प्रदर्शित किया। अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी मधुर लीलाएँ समुद्रकी 5) छोटे-हरिदासके प्रति महाप्रभुकी दण्ड-विधानरूपी भाँति गहरी हैं जिनकी थाह पाना सम्भव नहीं हैं। इन्हें अमन्दोदया दया एवं महाप्रभुके प्रति छोटे-हरिदासकी साधारण लोग नहीं समझ सकते, केवल 'धीर' भक्त ही सेवाबुद्धि अथवा गाढ़ अनुराग कितना अधिक परिमाणमें इन्हें समझ सकते हैं॥ 170 ॥ था, उसे दिखलानेके लिये उनकी सामान्य त्रुटि भी तर्कपन्थाको त्याग करके श्रौत-पथके महाप्रभु सहन करनेके लिये सहमत नहीं थे। महाप्रभुके आश्रयमें सभीको अप्राकृत चैतन्य-लीलाका गाढ़ अनुरागके पात्र होनेकी इच्छा करनेपर शुद्धभजनके श्रवण करनेके लिये ग्रन्थकारका अनुरोध :— इच्छुक भक्तगण सब प्रकारके लौकिक इन्द्रियसुखकी विश्वास करिया शुन चैतन्यचरित। लालसाका सम्पूर्ण रूपसे त्याग करेंगे, अन्यथा श्रीगौरहरि तर्क ना करिह, तर्के हबे विपरीत ॥ 171 ॥ उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे। अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओंका श्रद्धा 6) यदि कोई प्रयागादि विष्णु-तीर्थमें देहत्याग करता और विश्वासपूर्वक श्रवण करो। इनमें किसी प्रकारका है, तो अपराध आदि शोधित और मुक्त होकर उसे कोई तर्क मत करना, तर्कसे विपरीत फल ही प्राप्त सुकृति तथा सद्गतिकी प्राप्ति होती है। होता है॥ 171 ॥ 7) लोकशिक्षाके लिये अपने भक्त छोटे-हरिदासको ग्रहण नहीं करके बादमें उनके मुखसे श्रीकृष्ण श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। कीर्तन-श्रवणरूप सेवा स्वीकार करके महाप्रभुने उनको चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 172 ॥ अपने भक्तके रूपमें स्वीकार किया ॥ 168-169 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे श्रीहरिदासदण्ड- दूसरे अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। रूप-शिक्षा-नाम द्वितीयः परिच्छेदः। असत्सङ्ग त्यागमें दृढ़ प्रयत्नवान् बुद्धिमान् निष्कपट अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृष्णभजनके इच्छुकका ही परम गम्भीर श्रीकृष्ण-चैतन्यकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका लीलाके मर्मको अनुभव करनेमें अधिकार :— वर्णन कर रहा है॥ 172 ॥ मधुर चैतन्यलीला—समुद्र-गम्भीर। श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें श्रीहरिदासदण्ड- लोके नाहि बुझे, बुझे येइ 'भक्त' 'धीर' ॥ 170 ॥ रूप-शिक्षा-नामक दूसरे अध्यायका अनुवाद समाप्त।

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तीसरा अध्याय कथासार-पुरुषोत्तम-क्षेत्रमें किसी सुन्दरी ब्राह्मणी युवतीका एक अत्यन्त सुन्दर पुत्र था। उसे प्रतिदिन महाप्रभुके पास आते देखकर श्रीदामोदर पण्डितने [महाप्रभुसे] कहा,-"बालकसे प्रीति करनेसे लोग आपके चरित्रपर सन्देह करेंगे।" यह बात सुनकर महाप्रभुने एकदिन श्रीदामोदरको श्रीनवद्वीपमें अपनी माता श्रीशचीकी देखभालके कार्यमें नियुक्त किया और कहा,-"मैं बीच-बीचमें माताके पास जाकर भोजन करता हूँ-यह बात उन्हें स्मरण करा देना।" श्रीदामोदर महाप्रसाद आदि लेकर नवद्वीप गये। उसके बाद एकदिन महाप्रभुने ब्रह्म-हरिदाससे पूछा,- "कलिकालमें सभी यवनोंका किस प्रकार उद्धार होगा?" श्रीहरिदासने उसके लिये उच्च-सङ्कीर्तनके माहात्म्यको बतलाकर सभी नामाभाससे उद्धार प्राप्त करेंगे- ऐसा सिद्धान्त वर्णन किया। यहाँपर श्रीहरिदास ठाकुरके पूर्व-वृत्तान्तका वर्णन करते हुए श्रीकविराज-गोस्वामीने बेनापोलके वनमें पाखण्डी ब्रह्मबन्धु रामचन्द्र-खाँनके द्वारा भेजी गयी वेश्या जिसका श्रीहरिदासकी कृपासे उद्धार हुआ था, उसका विवरण कहा। वैष्णव-अपराधसे और बादमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके अभिशापसे रामचन्द्र खाँनकी जो दुर्दशा हुई थी, वह भी वर्णित हुई है। बेनापोलसे चाँदपुरमें आकर श्रीहरिदास श्रीबलराम-आचार्यके घरपर रहे। उसके बाद हिरण्य और गोवर्धन मजुमदारकी सभामें नामतत्त्वको लेकर श्रीहरिदास ठाकुर और गोपाल चक्रवर्त्ती नामक आरिन्दा-ब्राह्मणके साथ जो सब वार्तालाप हुआ था एवं श्रीहरिदासके प्रति अपराध करनेसे गोपाल चक्रवर्त्तीको 'कोढ़-रोगरूपी' दण्डकी प्राप्ति हुई थी, उसका वर्णन है। श्रीहरिदास ठाकुर चाँदपुरसे शान्तिपुर जाकर श्रीअद्वैताचार्यके घरपर रहे। वहाँ मायादेवी छल करनेके लिये आयी और उसने श्रीहरिदासकी कृपासे श्रीकृष्णनामको प्राप्त किया। -(अमृतप्रवाह भाष्य) वन्देऽहं श्रीगुरोः श्रीयुत-पदकमलं श्रीगुरुन् वैष्णवांश्च श्रीरूपं साग्रजातं सहगण-रघुनाथान्वितं तं सजीवम्। साद्वैतं सावधूतं परिजनसहितं कृष्णचैतन्य-देवं श्रीराधा-कृष्णपादान् सहगण-ललिता-श्रीविशाखान्वितांश्च ॥ १ ॥ अनुवाद-मैं श्रीगुरु (मन्त्र-दीक्षागुरु और भजन-शिक्षागुरुओं)के चरणकमलों एवं समस्त गुरुओं (परम-परातपर आदि गुरुवर्ग, श्रीमत् आनन्दतीर्थ- श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी प्रमुख गुरुओं), समस्त वैष्णवों (चतुर्युगोंमें प्रकटित भागवतों); अग्रज श्रीसनातन गोस्वामी सहित, निजभक्तोंसहित और श्रीरूपानुग श्रीरघुनाथदास गोस्वामी एवं निज-अनुकम्पा-पात्र रूपानुग श्रीजीव गोस्वामी सहित उन श्रीरूप गोस्वामी; श्रीअद्वैतप्रभु, श्रीनित्यानन्दप्रभु एवं परिजन (आवरण-पार्षद) सहित श्रीकृष्णचैतन्यदेव (महाप्रभु); गणोंसहित (सखी-मञ्जरी सहित) श्रीललिता-विशाखा आदिसे युक्त श्रीराधाकृष्णके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ॥ १॥ अनुभाष्य-अन्त्यलीला 2/1 संख्या देखें ॥ १ ॥ जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ २ ॥ अनुवाद-श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो ॥ २॥ एक विधवा-ब्राह्मणीके महासौभाग्यवान् सुन्दर पुत्रके प्रति महाप्रभुका अहैतुक कृपा-स्नेह :- पुरुषोत्तमे एक उड़िया-ब्राह्मणकुमार। पितृशून्य, महासुन्दर, मृदुव्यवहार ॥ ३ ॥ अनुवाद-श्रीपुरुषोत्तम धाममें एक उड़िया ब्राह्मण बालक रहता था। उसके पिता परलोक सिधार गये थे।

68 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/3-12 ] वह बालक अत्यन्त सुन्दर था और उसका व्यवहार भी बहुत मृदु था ॥ ३ ॥ प्रभु-स्थाने नित्य आइसे, करे नमस्कार। प्रभु-सने बात् कहे, प्रभु- 'प्राण' तार ॥ 4 ॥ अनुवाद-वह बालक प्रतिदिन महाप्रभुके वासस्थानपर आता और महाप्रभुको प्रणाम करता था। उनसे निःसङ्कोच होकर बातें करता, क्योंकि महाप्रभु उसके 'प्राण' स्वरूप थे ॥ 4 ॥ इसमें श्रीदामोदर पण्डितका अनुमोदन नहीं :- प्रभुते ताहार प्रीति, प्रभु दया करे। दामोदर तार प्रीति सहिते ना पारे ॥ 5 ॥ अनुवाद-उस बालककी महाप्रभुके प्रति प्रीति और महाप्रभुकी उसपर कृपा थी। श्रीदामोदर पण्डित उसकी महाप्रभुके प्रति प्रीतिको सहन नहीं कर पा रहे थे॥ 5 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'दामोदर', - श्रीदामोदर-पण्डित ॥ 5 ॥ श्रीदामोदरके द्वारा मना करनेपर भी ब्राह्मण-बालकका महाप्रभुके प्रति अनुराग :- बार बार निषेध करे ब्राह्मणकुमारे। प्रभुरे ना देखिले सेइ रहिते ना पारे ॥ 6 ॥ अनुवाद-श्रीदामोदर पण्डित बार बार उस ब्राह्मण बालकको महाप्रभुके पास आनेके लिये मना करते, किन्तु वह बालक महाप्रभुको देखे बिना रह नहीं पाता था ॥ 6 ॥ बालसुलभ-धर्मवशतः स्नेहमय महाप्रभुके निकट उसका प्रतिदिन आगमन :- नित्य आइसे, प्रभु तारे करे महाप्रीत। याँहा प्रीति ताँहा आइसे, - बालकेर रीत ॥ 7 ॥ अनुवाद-वह बालक प्रतिदिन महाप्रभुके पास आता तथा महाप्रभु उससे बहुत अधिक स्नेह करते। बालकका तो स्वभाव ही ऐसा होता है कि उसे जहाँ प्रीति मिलती है, वह वहीं आता है ॥ 7 ॥ श्रीदामोदरके लिये दो सङ्कट :- ताहा देखि' दामोदर दुःख पाय मने। बलिते ना पारे, बालक निषेध ना माने ॥ 8 ॥ अनुवाद-ऐसा देखकर श्रीदामोदर पण्डितके मनमें बहुत दुःख होता। वे कुछ कह भी नहीं पाते, क्योंकि बालक उनके निषेधको नहीं मानता था ॥ 8 ॥ एकदिन महाप्रभुके निकटसे बालकका अपने स्थानपर प्रस्थान :- आर दिन सेइ बालक प्रभु-स्थाने आइला । गोसाञि तारे प्रीति करि' वार्त्ता पुछिला ॥ 9 ॥ कतक्षणे से बालक उठि' यबे गेला। सहिते ना पारे, दामोदर कहिते लागिला ॥ 10 ॥ अनुवाद-एकदिन वह बालक जब महाप्रभुके वासस्थानपर आया, तब महाप्रभुने उससे प्रीतिपूर्वक अनेक बातें पूछीं। थोड़ी देरीके बाद जब वह ब्राह्मण बालक उठकर चला गया, तब श्रीदामोदर पण्डित यह सब सहन नहीं कर पानेके कारण कहने लगे ॥ 9-10 ॥ अधीर दामोदरका अभियोग और महाप्रभुके कार्यकी समालोचना :- “अन्योपदेशे पण्डित”, कहे गोसाञिर ठाञि। 'गोसाञि' 'गोसाञि' एबे जानिमु 'गोसाञि' ॥ 11 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 11 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीदामोदर पण्डित महाप्रभुको कहने लगे, - “आप अन्योंको उपदेश प्रदान करते समय 'पण्डित' हैं और सभी आपको 'गोसाईं' 'गोसाईं' (आचार्य) कहते हैं; इस बार जाना जायेगा कि आप किस प्रकार 'गोसाईं' बने रह सकते हैं ॥ 11 ॥ एबे गोसाञिर गुण सब लोके गाइबे। गोसाञि-प्रतिष्ठा सब पुरुषोत्तमे हइबे ॥” 12 ॥ अनुवाद-अब सभी लोग गोसाईंके गुणोंका गान

[ 3/12-23 तीसरा अध्याय 69 करेंगे और सम्पूर्ण पुरुषोत्तम क्षेत्रमें गोसाईंको प्रतिष्ठाकी प्राप्ति होगी॥" 12 ॥ महाप्रभुको मर्यादा दिखलाकर श्रीदामोदरके द्वारा तिरस्कार और शासन :- शुनि' प्रभु कहे,—"क्या कह, दामोदर?" दामोदर कहे,–"तुमि स्वतन्त्र ईश्वर' ॥ 13 ॥ स्वच्छन्दे आचार कर, के पारे बलिते? मुखर जगतेर मुख पार आच्छादिते ॥ 14 ॥ पण्डित हञा मने केने विचार ना कर? राण्डी ब्राह्मणीर बालके प्रीति केने कर??15 ॥ यद्यपि ब्राह्मणी सेइ तपस्विनी सती। तथापि ताहार दोष—सुन्दरी युवती ॥ 16 ॥ तुमिह—परम युवा, परम सुन्दर। लोकेर काणाकाणि-बाते देह अवसर ॥" 17 ॥ अनुवाद—श्रीदामोदर पण्डितकी बात सुनकर महाप्रभुने कहा,—"हे दामोदर! क्या कह रहे हो?" श्रीदामोदर पण्डितने कहा,—"आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं। आप स्वतन्त्र होकर जैसा चाहें वैसा आचरण कर सकते हैं, आपको कौन कुछ कह सकता है? क्या आप वाचाल लोगोंके मुखको ढक सकते हैं? पण्डित होनेपर भी आप स्वयं विचार क्यों नहीं करते? आप विधवा ब्राह्मणीके पुत्रसे प्रीति क्यों करते हैं? यद्यपि वह ब्राह्मणी तपस्विनी सती-साध्वी स्त्री है, तो भी उसका एक दोष है कि वह सुन्दरी युवती है। आप भी परम युवा और परम सुन्दर हैं। आप लोगोंको कानाफूसी करनेका अवसर प्रदान कर रहे हैं॥" 13-17 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'राण्डी',–विधवा ॥ 15 ॥ श्रीदामोदरके वाक्य-दण्डको सुनकर महाप्रभुका मन-ही-मनमें विचार :- एत बलि' दामोदर मौन हइला। अन्तरे सन्तोष प्रभु हासि' विचारिला ॥ 18 ॥ "इहारे कहिये शुद्धप्रेमेर तरङ्ग। दामोदर-सम मोर नाहि 'अन्तरङ्ग' ॥" 19 ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीदामोदर पण्डित मौन हो गये। उनकी बात सुनकर महाप्रभुके हृदयमें सन्तोष हुआ तथा उन्होंने मुस्कुराकर मन-ही-मन विचार किया,—"इसीको शुद्धप्रेमकी तरङ्ग कहते हैं, वास्तवमें दामोदरके समान मेरा कोई 'अन्तरङ्ग' नहीं है॥" 18-19 ॥ एतेक विचारि' प्रभु मध्याह्ने चलिला। आर दिने दामोदरे निभृते बोलाइला ॥ 20 ॥ अनुवाद—ऐसा विचार करके महाप्रभु मध्याह्न कृत्योंके लिये चल दिये। अगले दिन उन्होंने श्रीदामोदर पण्डितको एकान्तमें बुलाया ॥ 20 ॥ नवद्वीपमें शचीमाताकी देखभाल करनेके लिये पण्डितको भेजना :- प्रभु कहे,—"दामोदर, चलह नदीया। मातार समीपे तुमि रह ताँहा याञा ॥ 21 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"दामोदर, तुम नदीया जाओ। वहाँ जाकर तुम मेरी माताके पास जाकर रहो ॥ 21 ॥ महाप्रभुके द्वारा दामोदरकी छलसे स्तुति :- तोमा बिना ताँहार रक्षक नाहि आन। आमाकेह याते तुमि कैला सावधान ॥ 22 ॥ तोमा सम 'निरपेक्ष' नाहि मोर गणे। 'निरपेक्ष' नहिले 'धर्म' ना याय रक्षणे ॥ 23 ॥ अनुवाद—तुम्हारे अतिरिक्त उनकी रक्षा अन्य कोई नहीं कर सकता। क्योंकि तुमने तो मुझे भी सावधान किया है। तुम्हारे समान 'निरपेक्ष' अन्य कोई भी मेरे परिकरोंमें नहीं है। वास्तवमें निरपेक्ष हुए बिना धर्मकी रक्षा नहीं की जा सकती ॥ 22-23 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—धर्मरक्षकगण निरपेक्ष होंगे, अर्थात्