श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ ५/४१-४८ ही परा प्रकृति अर्थात् मूल कारण है। सङ्कर्षणादि वासुदेव-व्यूहसे उत्पन्न हुए हैं, इसलिये सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—ये परा प्रकृतिका कार्य हैं। जीव बहुत समय तक भगवत्-गृह (मठ-मन्दिर) में जाकर उपादान, पूजा, स्वाध्याय और योगसाधनमें रत रहकर पापसे मुक्त होता है। तब वह पुण्यशरीरी होकर परा प्रकृति भगवान्को प्राप्त करता है। भागवत-लोग यह कहते हैं कि नारायण प्रकृतिसे परे और परमात्माके नामसे प्रसिद्ध तथा सर्वात्मा हैं, यह बात श्रुतिके विरुद्ध नहीं है और वे स्वयं अपने अनेक प्रकारके व्यूहरूपोंमें अवस्थित या विराजमान हैं, इस बातको भी हमलोग स्वीकार करते हैं। इसलिये भागवत-मतका यह अंश इस सूत्रके द्वारा निराकरणीय नहीं है। परन्तु भागवत-लोग जो यह कहते हैं कि वासुदेवसे सङ्कर्षण, सङ्कर्षणसे प्रद्युम्न और प्रद्युम्नसे अनिरुद्धकी उत्पत्ति हुई है, इस अंशका निषेध करनेके लिये ही आचार्य वेदव्यासने इस सूत्रकी रचना की है। अनित्यत्वादि दोषकी आशङ्काके कारण वासुदेव नामक परमात्मासे सङ्कर्षण नामक जीवकी उत्पत्ति सम्पूर्ण रूपसे असम्भव है। जीव यदि उत्पत्तिमान हो, तो उसमें अनित्य होनेका दोष अवश्य ही होगा। तब जीवका नश्वर स्वभाव होनेके कारण उसका भगवत् प्राप्तिरूप मोक्ष हो ही नहीं सकता है, क्योंकि कारण-विनाशमें कार्य-विनाश अवश्यम्भावी है। आचार्य वेदव्यासने जीवकी उत्पत्तिका निषेध दूसरे अध्यायके तीसरे पाद “नात्माश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः” सूत्रके द्वारा की है और उत्पत्तिनिषेधके द्वारा नित्यता प्रमाणित करेंगे, इसलिये यह कल्पना असङ्गत है।” “न च कर्त्तुः करणम्” (सूत्र ४३, शङ्करभाष्य)—‘इतश्चासमञ्जसैषां कल्पना, यस्मान्न हि लोके कर्त्तुर्देवदत्तादेः करणं परश्वाद्युत्पद्यमानं दृश्यते। वर्णयन्ति च भागवताः—कर्तुर्जीवात् सङ्कर्षणासंज्ञकात् करणं मनः प्रद्युम्नसंज्ञकमत्पद्यते, कर्त्तृजाच्च तस्मादनिरुद्ध-संज्ञकोऽहङ्कार उत्पद्यते इति। न चैतद्द्दष्टान्तमन्तरेणाध्यवसितुं शक्नुमः। न चैवम्भूतां श्रुतिमुपलभामहे।” भाष्यका अर्थ— “इस प्रकारकी कल्पनाको जो असङ्गत कहा है, इसका कारण है। उदाहरण स्वरूप जैसे देवदत्तादि (अनिश्चित रूपसे कोई एक व्यक्ति) कर्त्तासे कुल्हाड़ी आदि करणकी उत्पत्ति दृष्टिगोचर नहीं होती है, तो भी भागवत-लोग कहते हैं- सङ्कर्षण नामक कर्त्ता-जीवसे प्रद्युम्न नामक करण-मनने जन्म लिया है। पुनः उन्हीं कर्त्तासे जन्म ग्रहण किये प्रद्युम्नसे अनिरुद्ध अर्थात् अहङ्कारकी उत्पत्ति होती है। भागवत-लोग इस बातको दृष्टान्तके द्वारा समझानेमें अक्षम हैं, तो उसे किस प्रकार ग्रहण किया जा सकता है? इस तत्त्वका बोध करानेवाला कोई श्रुति-वाक्य भी नहीं सुना जाता है।” “विज्ञानादिभावे वा तदप्रतिषेधः” (सूत्र ४४, शङ्करभाष्य)—“तथापि स्यात्र चेते सङ्कर्षणादयो जीवादिभावेनाभिप्रायन्ते, किं तर्हि, ईश्वरा एवैते सर्वे ज्ञानैश्वर्यशक्तिबलवीर्यतेजोभिरैश्वर्यधर्मैरन्विता अभ्युपगम्यन्ते, वासुदेवा एवैते सर्वे निर्दोषा निरधिष्ठाना निरवद्याश्चेति, तस्मान्नायं यथावर्णित उत्पत्त्यसम्भवो दोषः प्राप्नोतीति, अत्रोच्यते—एवमपि तदप्रतिषेध उत्पत्त्यसम्भवस्याप्रतिषेध प्राप्नोत्येव। अयमुत्पत्त्यसम्भवो दोषः प्रकारान्तरेणेत्यभिप्रायः। कथम्? यदि तावदयमभिप्रायः —परस्परभिन्ना एवैते वासुदेवादयश्चत्वार ईश्वरास्तुल्यधर्माणो नैषामेकात्मकत्वमस्तीति, ततोऽनेकेश्वर- कल्पनाऽनर्थक्यं, एकेनैवेश्वरेणेश्वरकार्यसिद्धेः; सिद्धान्तहानिश्च—भगवानेको वासुदेवः परमार्थतत्त्वमित्यभ्युपगमात्। अथायमभिप्राय— एकस्यैव भगवत एते चत्वारो व्यूहास्तुल्यधर्माण इति, तथापि तदवस्थ एवोत्पत्त्यसम्भवः। न हि वासुदेवात् सङ्कर्षणस्योत्पत्तिः सम्भवति, सङ्कर्षणाच्च प्रद्युम्नस्य, प्रद्युम्नाच्चानिरुद्धस्य, अतिशयाभावात्। भवितव्यं हि कार्यकारणयोरतिशयेन २७२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/४१-४८ ] यथा मृद्घटयोः। न ह्यसत्यतिशये कार्यं कारणमित्यवकल्पते। न च पञ्चरात्रसिद्धान्तिष्वेकैकस्मिन् सर्वेषु वा ज्ञानैश्वर्यादितारतम्यकृतः कश्चिद्भेदोऽभ्युपगम्यते। वासुदेवा एव हि सर्वे व्यूहा निर्विशेषा इष्यन्ते। न चैते भगवद्व्यूहाश्चतुःसंख्यायामेवावतिष्ठेरन्, ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तस्य समस्तस्यैव जगतो भगवद्व्यूहत्वावगमात्।” भाष्यका अर्थ—“भागवत-लोगोंका इस प्रकार अभिप्राय भी हो सकता है कि उक्त सङ्कर्षणादि जीव-कोटि नहीं हैं; वे लोग सभी ईश्वर, सभी ज्ञानशक्ति, ऐश्वर्यशक्तियुक्त, बल, वीर्य और तेजःसम्पन्न, सभी वासुदेव, सभी निर्दोष, निराधिष्ठित, निरवद्य हैं। इसलिये उनके सम्बन्धमें उत्पत्त्यसम्भव-दोष नहीं है। इस अभिप्रायके ऊपर यह कह सकते हैं—इस प्रकारका अभिप्राय रहनेपर भी उत्पत्त्यसम्भव-दोषका निवारण नहीं होता है, क्योंकि यह दोष दूसरे प्रकारसे रह जाता है। वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—ये परस्पर भिन्न हैं, एकात्मक नहीं हैं; किन्तु सभी समधर्मी और ईश्वर हैं। यह अर्थ अभिप्रेत होनेपर अनेक ईश्वरोंको स्वीकार करना होगा। अनेक ईश्वर स्वीकार करनेका कोई प्रयोजन नहीं है, क्योंकि एक ईश्वरके द्वारा ही ईश्वर-कार्य सिद्ध (सम्पादन) हो जाता है। और भी भगवान् वासुदेव एक अर्थात् अद्वितीय और परमार्थ-तत्त्व हैं, इस प्रकार प्रतिज्ञा रहनेसे सिद्धान्तहानिका दोष भी जुड़ जाता है। अभिप्राय यह है—यह चतुर्व्यूह एकमात्र भगवान्का ही है और वे सभी समधर्मी हैं। ऐसा होनेपर भी उत्पत्त्यसम्भव-दोषसे बचा नहीं जा सकता, क्योंकि वे किसी प्रकार एक-दूसरेसे कम या अधिक नहीं होनेपर वासुदेवसे सङ्कर्षणका, सङ्कर्षणसे प्रद्युम्नका और प्रद्युम्नसे अनिरुद्धका जन्म नहीं हो सकता है। कार्य-कारणमें कोई वैशिष्ट्य होता है, यह स्वीकार करना होगा। जिस प्रकार मिट्टी (कारण) से घड़ा (कार्य) बनता है। दोनोंमें तारतम्य ना रहनेसे कौन कार्य है, कौन कारण है, यह निर्देश नहीं किया जा सकता। और भी देखें, पञ्चरात्र-सिद्धान्ती लोग वासुदेवादिके ज्ञानादि तारतम्यकृत किसी भेदको नहीं मानते, अपितु चतुर्व्यूहको एकमात्र वासुदेव ही मानते हैं। तो भगवान्के व्यूह क्या चार ही पर्याप्त हैं? अवश्य ही ऐसा नहीं है। ब्रह्मादिसे लेकर घासके तिनके तक समुदाय जगत् सभी भगवत्-व्यूह हैं—यह श्रुति और स्मृति, दोनोंके द्वारा प्रमाणित हुआ है।” विप्रतिषेधाच्च’ (सूत्र ४५, शङ्करभाष्य)—“विप्रतिषेधश्चास्मिन् शास्त्रे बहुविध उपलभ्यते गुणगुणित्व-कल्पणादिलक्षणः। ज्ञानैश्वर्यशक्तिबलवीर्यतेजांसि गुणाः, आत्मान एवैते भगवन्तो वासुदेवा इत्यादिदर्शनात्।” भाष्यका अर्थ—“भागवत-लोगोंकी पञ्चरात्रादि शास्त्रोंमें गुण और गुणी आदिमें अनेक प्रकारसे विरोधी कल्पना दिखायी देती है। स्वयं ही गुण और स्वयं ही गुणी, यह किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है। वे कहते हैं कि ज्ञानशक्ति, ऐश्वर्यशक्ति, बल, वीर्य और तेज, ये सब गुण हैं, प्रद्युम्नादि भिन्न होनेपर भी ये आत्मा और भगवान् वासुदेव हैं।” श्रीपाद शङ्कराचार्यके मतवादके उत्तरमें श्रीरूप गोस्वामीकृत लघुभागवतामृतमें (चतुर्व्यूह-वर्णन- प्रसङ्गमें ८०-८३ श्लोकमें)— “महावस्थाख्यया ख्यातं यद्व्यूहानां चतुष्टयम्। तस्याद्योहयं तथोपास्यश्चित्ते तदधिदैवतम्। तथा विशुद्धसत्त्वस्य यश्चाधिष्ठानमुच्यते॥ निजांशो यस्य भगवान् श्रीसङ्कर्षण इष्यते। यस्तु सङ्कर्षणो व्यूहो द्वितीय इति सम्मतः। जीवश्च स्यात् सर्वजीवप्रादुर्भावास्पदत्वतः॥ पूर्णशारद-शुभ्रांशुपरार्द्धमधुरद्युतिः। उपास्योऽयमहाङ्कारे शेषन्यस्तनिजांशकः॥ स्मराारातैरधर्मस्य सर्वान्तकसुरद्विषाम्। अन्तर्यामित्वमास्थाय जगत्संहारकारकः॥ व्यूहस्तृतीयः प्रद्युम्नो विलासे यस्य पाँचवाँ अध्याय | २७३
[ ५/४१-४८
विश्रुतः। यः प्रद्युम्नो बुद्धितत्त्वे बुद्धिमद्भिरुपास्यते ॥ स्तवत्या च श्रिया देव्या निषेव्यत इलावृते। शुद्धजाम्बूनदप्रख्यः क्वचिन्नोलघनच्छविः॥ निदानं विश्वसर्गस्य कामन्यस्तनिजांशकः। विधेः प्रजापतीनाञ्च रागिणाञ्च स्मरस्य च। अन्तर्यामित्वमापन्नः सर्गं सम्यक् करोत्यसौ॥ व्यूहस्तर्योऽनिरुद्धाख्यो विलासो यस्य शस्यते। योऽनिरुद्धो मनस्तत्त्वे मनीषिभिरुपास्यते॥ नीलजीमूतसङ्काशो विश्वरक्षणतत्परः। धर्मस्यायं मनूनाञ्च देवानां भूभुजां तथा। अन्तर्यामित्वमास्थाय कुरुते जगतः स्थितिम्॥ मोक्षधर्मे तु मनसः स्यात् प्रद्युम्नोऽधिदैवतम्। अनिरुद्धस्त्वहङ्कारस्येति तत्रैव कीर्त्तितम्॥ सर्वेषां पञ्चरात्राणामप्येषा प्रक्रिया मता। पाद्मे तु परमव्योम्नः पूर्वाद्ये दिक्चतुष्टये। वासुदेवादयो व्यूहश्चत्वारः कथिता क्रमात्॥" “परव्योम-महावैकुण्ठनाथ नारायणके ‘महावस्थ’ नामक विख्यात चतुर्व्यूहमें ये वासुदेव ‘आदिव्यूह’ हैं और चित्तके उपास्य हैं। इसलिये ये चित्तके अधिष्ठातृ देवता हैं और विशुद्ध-सत्त्वमें अधिष्ठित हैं। (भाः ४/३/२३) श्रीसङ्कर्षण इनके स्वांश अर्थात् विलास हैं। सङ्कर्षणको ‘द्वितीयव्यूह’ और सभी जीवोंके प्रादुर्भावका स्रोत होनेके कारण उन्हें ‘जीव’ भी कहा जाता है। असंख्य शारदीय पूर्ण-चन्द्रमाओंकी उज्ज्वल किरणोंसे भी सुमधुर उनकी कान्ति है। वे अहङ्कारतत्त्वके उपास्य हैं; उन्होंने अनन्तदेवमें अपनी आधारशक्ति स्थापित की है और वे कामदेवको भस्म करनेवाले रुद्र और अधर्म, अहि (सर्प), अन्तक (मृत्यु) एवं असुरोंके अन्तर्यामी रूपमें रहकर जगत्के संहार कार्यका सम्पादन करते हैं। उन्हीं सङ्कर्षणकी विलासमूर्ति प्रद्युम्न तीसरा व्यूह हैं। बुद्धिमान लोग बुद्धितत्त्वसे प्रद्युम्नकी उपासना करते हैं। लक्ष्मीदेवी इलावृतवर्षमें उनका गुणगान करते-करते सेवा करती हैं। कहीं पिघले स्वर्णकी भाँति, तो कहीं नवीन-नील मेघकी भाँति उनकी अङ्गकान्ति है। वे विश्वसृष्टिका मूल कारण हैं और उन्होंने अपनी सृष्टि करनेकी शक्ति कामदेवमें निहित की है। वे विधाता हैं और सभी प्रजापतियों, विषयोंमें अनुरक्त देव-मानवादि प्राणियों एवं कन्दर्पके अन्तर्यामी रूपमें सृष्टि कार्यका सम्पादन करते हैं। चौथे व्यूह अनिरुद्ध सङ्कर्षणकी विलासमूर्ति हैं। मनीषीगण मनःतत्त्वमें इन अनिरुद्धकी उपासना करते हैं। उनकी अङ्गकान्ति नीलमेघके सदृश है। वे विश्वके पालनमें सदा तत्पर हैं। वे धर्म, मनु, देवता और राजाओंके अन्तर्यामी रूपमें जगत्का पालन करते है। मोक्षधर्ममें प्रद्युम्नको मनका अधिदेवता और अनिरुद्धको अहङ्कारका अधिदेवता कहा गया है, परन्तु चतुर्व्यूहके विषयमें पूर्वोक्त वाक्य (अर्थात् प्रद्युम्न बुद्धिके और अनिरुद्ध मनके अधिदेवता, यह) पूर्ण रूपसे पञ्चरात्र-सम्मत है।” भगवान्का विलास और अचिन्त्यशक्तिके सम्बन्धमें लघुभागवतामृतमें (४४-४६ संख्या) — “नन्विदं श्रूयते शास्त्रे महावाराह-वाक्यतः। 'सर्वे नित्याः शाश्वताश्च देहास्तस्य परात्मनः। हानोपादानरहिता नैव प्रकृतिजाः क्वचित्॥ परमानन्दसन्दोहा ज्ञानमात्राश्च सर्वतः। सर्वे सर्वगुणैः पूर्णा सर्वदोषविवर्जिताः ॥ इति। किञ्च श्रीनारद-पञ्चरात्रे- 'मणैर्यथा विभागेन नील-पीतादिभिर्युतः। रूपभेदमवाप्नोति ध्यानभेदात् तथाच्युतः ॥' इति। तस्मात् कथं तारतम्यं तेषां व्याख्यायते त्वया॥ अत्रोच्यते—'एकत्वञ्च पृथकत्वञ्च तथांशत्वमृतांशता। तस्मिन्नेकत्र नायुक्तमचिन्त्यानन्तशक्तितः ॥' तत्रैकत्वेऽपि पृथक्प्रकाशता, यथा- (भाः १०/६९/२) 'चित्रं वतैनदेकेन वपुषा युगपत् पृथक्। गृहेषु द्व्यष्टसाहस्रं स्त्रिय एक उदावहत्॥' इति। पृथक्त्वेऽप्योकरूपतापत्तिः, यथा पाद्मे- 'स देवो बहुधा भूत्वा निर्गुणः पुरुषोत्तमः। एकीभूय पुनः शेते निर्दोषा हरिरादिकृत् ॥' इति। एकस्यैव अंशांशित्वं विरुद्धशक्तित्वञ्च, यथा (भाः १०/४०/७) - 'यजन्ति त्वन्मायास्त्वां वै बहुमूर्त्येकमूर्त्तिकम्॥' इति। कौर्मे च—'अस्थूलश्चाणुरूंश्चैव स्थूलोऽणुश्चैव सर्वतः। अवर्णः सर्वतः प्रोक्तः श्यामो रक्तान्तलोचनः। ऐश्वर्योगाद् भगवान्
२७४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
विरुद्धार्थोऽभिधीयते॥ तथापि दोषा परेमे नैवाहार्याः कथञ्चन। गुणा विरुद्धा अप्येते समाहार्याः समन्ततः॥' इति। श्रीषष्ठस्कन्धे मिथो विरुद्धाचिन्त्यशक्तित्वं यथा गद्येषु (भाः ६/९/३४-३७)- 'दुरवबोध इवायं तव विहारयोगो यदशरणोऽशरीर इदमनवेक्षितास्मत्समवाय आत्मनैवाविक्रियमाणेन सगुणमगुणः सृजसि हरसि पासि। अथ तत्रभवान् किं देवदत्तवदिह गुणविसर्गपतितः पारतन्त्र्येण स्वकृतकुशलाकुशलं फलमुपाददाति? आहोस्व्यादात्माराम उपशमशीलः समञ्जसदर्शन उदास्ते? इति ह वाव न विदामः॥ न हि विरोध उभयं भगवत्यपरिगणितगुणगणे ईश्वरे अनवगाह्यमाहात्म्येऽर्वाचीन-विकल्प-वितर्क-विचार-प्रमाणाभासकुतर्क-शास्त्रकलिलान्तः- करणाशय-दुरवग्रहवादिनां विवादानवसरे॥ उपरतसमस्तमायामये केवल एवात्ममायामन्तर्द्धाय को न्वर्थो दुर्घट इव भवति, स्वरूपद्वयाभावात् सम-विषममतीनां मतमनुसरसि यथा रज्जुखण्डः सर्पादिधियाम्' ॥ इति। अत्र कारिकाः- 'विना शरीरचेष्टत्वं विना भूम्यादिसंश्रयम्। विना सहायांस्ते कर्माविक्रियस्य सुदुर्गमम्॥ उक्तो गुणविसर्गेण देवासुररणादिकः॥ तस्मिन् पतित आसक्त पारतन्त्र्यन्तु तद्भवैत्। यदाश्रितेषु देवेषु पारवश्यं कृपाकृतम्॥ तेन स्वकृतमात्मीयकृतं शुभशुभेतरत्। सुखदुःखादिरूपं किं फलं स्वीकुरुते भवान्। आत्मारामतया किंवा तत्रोदास्तेतरामिति। ना विद्मः किन्तु नैवेदं विरुद्धमुभयं त्वयि॥ तत्र हेतुर्भगवतीत्यादि प्रोक्तं पदद्वयम्। तथैवेश्वर-इत्यादिपदानां पञ्चकं मतम्॥ भगवत्त्वेन सार्वज्ञ्यं सद्गुणत्वं तथान्यतः। ब्रह्मत्वं केवलत्वेन लभ्यते तत्र च स्फुटम्॥ यद्यपि ब्रह्मतहेतोः सर्वत्र स्यात् तटस्थता। तथाप्यादिगुणद्वया भवेद्भक्तानुकूलता॥ नन्वेकस्य स्वरूपस्य द्वैरूप्यं कथमेकदा। तत्राह अर्वाचीनेति तद्दृशानां हि वादिनाम्। विवादस्यानवसरस्ते सस्य तावद्गोचरे॥ अतोऽचिन्त्यत्मशक्तिं तां मध्येकृत्यात्र दुर्घटः। को न्वर्थ स्याद् विरुद्धोऽपि तथैवास्या ह्यचिन्त्यता। सा च नानावरुद्धानां कार्याणामाश्रयान्मता॥ 'श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात्' इति च ब्रह्मसूत्रकृत्। 'अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्।' इति स्कान्दवचस्तच्च मण्यादिष्वपि दृश्यते॥ तादृशीञ्च विना शक्तिं न सिद्धेत् परमेशता। यतश्चानवगाह्यत्वेनास्य माहात्म्यमुच्यते॥ अज्ञानमिन्द्रजालं वा वीक्ष्यते यत्रकुत्रचित्। अतो न पारमैश्वर्यं तेन तस्य प्रसिद्ध्यति॥ तच्च न हीत्याह स्फुटञ्चोपरतेत्यदः॥ तथा भगवतीत्यादिपदानां षट्तयस्य च। भवेत् प्रयोगतात्पर्यमत्र निष्फलमेव हि॥ तस्मान्न शास्त्रयुक्तिभ्यामुभयं तद्विरुद्ध्यते। तथाप्युच्चावचधियामनेवंतत्त्व- वेदिनाम्। मतानुसारतो भासि रज्जुवत् त्वं तथा तथा॥ ननु भोः केवलं ज्ञानं ब्रह्म स्याद् भगवान् पुनः। नानाधर्मेति तत्रापि स्वरूपद्वयमीक्ष्यते॥ इति प्राह स्वरूपेति तत्स्वरूपस्य नैव हि। कदापि द्वैतमेकस्य धर्मद्वयमिदं ध्रुवम्॥ ततो विरोधस्तच्छक्तिविलासानां यदीक्ष्यते। तदेवाचिन्त्यमैश्वर्यं भूषणं न तु दूषणम्॥ इयमेव विरोधिकोक्तिस्तृतीयेऽपि च दृश्यते॥ (भाः ३/४/१६)- 'कर्माण्यनीहस्य भवोऽभवस्य ते, दुर्गाश्रयोऽथारिभयात् पलायनम्। कालात्मनो यत् प्रमदायुताश्रमः, स्वात्मन्रतेः खिद्यति धीर्विदामिह॥' इति। तत्तन्न वास्तवं चेत् स्यात् विदां बुद्धिभ्रमस्तदा। न स्यादेवेत्यचिन्त्यैव शक्तिलीलासु कारणम्॥ यथा यथा च तस्येच्छा सा व्यन क्ति तथा तथा॥" “यहाँपर यह आपत्ति हो सकती है कि महावराहपुराणमें ऐसा सुननेको मिलता है—'उन परमात्मा हरिके सब प्रकारके शरीर ही नित्य हैं और सभी शरीर ही जगत्में पुनः-पुनः आविर्भूत होते रहते है। ये सब शरीर हानोपादानशून्य हैं, इसलिये ये कभी भी प्रकृतिसे उत्पन्न नहीं हैं। सभी शरीर ही घनीभूत-परमानन्द, चिदेकरस-स्वरूप, सब प्रकारके चिन्मयगुणोंसे युक्त और सभी दोषोंसे मुक्त हैं।' और नारदपञ्चरात्रमें भी कहा गया है कि 'जिस प्रकार वैदूर्यमणि अलग-अलग स्थानपर नीला-पीला आदि अलग रङ्ग धारण करती है, उसी प्रकार भगवान् अच्युत भी उपासना भेदसे अपने स्वरूपको विभिन्न आकारोंमें प्रकाश करते रहते हैं।' इसलिये किस कारणसे उन सभी अवतारोंके तारतम्यकी व्याख्या कर रहे हैं? इस आशङ्काके उत्तरमें यही कहा जा सकता है—अचिन्त्य-अनन्तशक्तिके प्रभावसे उन एक ही पुरुषोत्तममें एकत्व और पृथक्त्व, अंशत्व और अंशित्व हो सकता है, उनके लिये कुछ भी असम्भव या असङ्गत
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नहीं है। उनमें एकत्वके साथ ही पृथक् प्रकाश सम्भव है, जैसे श्रीमद्भागवत दशम स्कन्धमें नारदजीकी उक्ति—'बड़े ही आश्चर्यका विषय है कि एक ही श्रीकृष्णने एक ही समयमें अलग-अलग गृहोंमें सोलह हजार रमणियोंका पाणिग्रहण किया है।' पृथकत्वमें भी एकरूपत्व है, जैसे पद्मपुराणमें—'वही निर्गुण, निर्दोष, आदिकर्त्ता, पुरुषोत्तमदेव हरि अनेक रूप होकर पुनः एक रूपमें शयन करते हैं।' एकका ही अंश-अंशित्व तथा विरुद्ध-शक्तित्व है, जैसे श्रीमद्भागवत दशम स्कन्धमें—'आप बहुमूर्त्ति होकर भी एकमूर्त्ति हैं, इसलिये भक्तलोग आपमें आविष्टचित्त होकर आपकी पूजा करते हैं।' और कूर्मपुराणमें कहा गया है—'वे सभी प्रकारसे स्थूल होकर भी स्थूल, अनणु होकर भी अणु, अवर्ण होकर भी श्यामवर्ण और रक्ताक्तलोचन (दोनों छोरोंमें लालिमावाले नेत्रोंसे युक्त) हैं। ये सभी गुण परस्पर विरोधी होकर भी अचिन्त्यशक्तिके प्रभावसे भगवान्में नित्य अवस्थित हैं। तो भी परमेश्वरमें अनित्यत्व आदि किसी प्रकारके दोषारोपण करना उचित नहीं है, क्योंकि ये सभी गुण परस्पर विरोधी होनेपर भी भगवान्में सभी प्रकार इसका सामञ्जस्य हो सकता है।' जैसे छठे स्कन्धमें परस्पर विरुद्ध-अचिन्त्यशक्तिका वर्णन हुआ है—'हे भगवन्! आपकी अप्राकृत लीला या क्रीड़ा दुर्बोध दिखलायी देती है अर्थात् साधारण कार्य-कारण-भाव आपमें दिखलायी नहीं देता; क्योंकि आप बिना किसी आश्रय और शरीरकी चेष्टाके, स्वयं निर्गुण होकर हम लोगोंकी सहायताकी अपेक्षा ना करके अपने स्वरूपके द्वारा ही इस सगुण विश्वकी सृष्टि, स्थिति और संहार करके भी निर्विकार रहते हैं। हे प्रभो! क्या आप देवदत्त-नामक प्राकृत व्यक्तिकी भाँति इस संसारमें देव-असुरादि रूप गुणविसर्गमें पतित होकर पराधीनतावशतः अपने देवताकृत सुख-दुःखादि फलको अपना मानकर स्वीकार करते हैं? अथवा पूर्ण-चित्-शक्तिमान् रहकर आत्माराम और विरक्त होकर इन सभी विषयोंमें उदासीन अर्थात् साक्षीके रूपमें ही अवस्थान करते हैं? यह हम लोग नहीं जानते हैं। आप षडैश्वर्यसे परिपूर्ण हैं और आपमें अनन्त दिव्य गुण हैं। आप सभीके शासनकर्त्ता हैं और आपका माहात्म्य किसीकी भी बुद्धिका विषय नहीं हो सकता। वस्तुके स्वरूपबोधक विकल्प, वितर्क, विचार, प्रमाणाभास और कुतर्करूपी जालसे अच्छादित शास्त्रोंके द्वारा जिनकी बुद्धि मोहित हो गयी है, उन वादिगणोंका विवाद जिनको स्पर्श करनेमें असमर्थ है, उन अचिन्त्य शक्तिशाली आपमें पहले वर्णित दोनों गुण ही अविरोधी हैं। समस्त प्राकृत ज्ञानसे अतीत केवल शुद्धज्ञानमय आपमें आपकी इच्छाशक्तिके द्वारा क्या विषय दुर्घट हो सकता है? निर्विशेष और सविशेष अथवा चित्-गुणमय और निर्गुण—ये आपके दो भिन्न स्वरूप नहीं हैं, अपितु भावना-भेदसे आपके एक ही स्वरूपकी दो प्रकारकी प्रतीतिमात्र है। जिनकी बुद्धिका विषय सर्प आदि है, उनको रस्सीका एक टुकड़ा सर्पादि भिन्न-भिन्न रूपोंमें प्रतीत होता है, उसी प्रकार जिनकी बुद्धि सम है और जिनकी विषम अर्थात् अनिश्चित है, आप उनके अभिप्रायके अनुसार उनमें भिन्न-भिन्न मतवाद प्रकाशित करते हैं।' इति। इसी श्लोककी कारिका—शरीरकी चेष्टा, भूमि आदि आश्रय और दण्ड-चक्र आदिकी सहायताके बिना विकारशून्य आपके कर्म अतिशय दुर्गम हैं। 'गुण-विसर्ग' शब्दके द्वारा देवासुर संग्रामादि कहा गया है। उसमें भाग लेना अर्थात् उसमें आसक्त होनेको पराधीनता कहा जाता
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५/४१-४८ ] है। क्योंकि आप कृपावशतः अपने आश्रित देवताओंके पराधीन दिखायी देते हैं, इसलिये इसमें आपकी स्वतन्त्रताकी हानि नहीं होती। आप इसलिये स्वकृत अर्थात् अपने देवताओंके द्वारा अर्जित सुख-दुःखादि रूप शुभाशुभ फलको क्या अपना मानते हैं? अथवा आत्मारामताके कारण उसमें सम्पूर्णरूपसे उदासीन रहते हैं? यह हम नहीं जानते हैं। किन्तु (विरुद्धगुणशाली) आपमें ये दोनों ही असम्भव नहीं है। 'भगवति' आदि दो विशेषण और 'ईश्वरमें' आदि पाँच विशेषण इसके कारण हैं। उसमें 'भगवत्' शब्दके द्वारा सर्वज्ञता, 'अपरिगणित' आदि विशेषणके द्वारा सद्गुणशालिता और 'केवल' पदके द्वारा ब्रह्मत्वकी सुस्पष्ट उपलब्धि होती है। ब्रह्मत्वके कारण सर्वत्र उदासीनताकी सम्भावना होनेपर भी 'भगवति' आदि दो गुणोंके द्वारा भक्त पक्षपातकी सम्भावना है। यदि कहें कि एक ही स्वरूपके एक साथ दो रूप किस प्रकार सम्भव हैं? इस आशङ्काके उत्तरमें “अर्वाचीन” आदि कहा है, अर्थात् जिस वस्तुके स्वरूपसे अवगत नहीं हुआ जा सकता, आप उन वादियोंके विवादसे अगोचर हैं। इसलिये अचिन्त्य आत्मशक्तिके कारण विरुद्ध होनेपर भी आपमें कौनसा विषय दुर्घट हो सकता है? आपका स्वरूप विवाद करनेवाले अभक्तोंके लिये अचिन्त्य हैं और उसी प्रकार आपकी शक्ति भी अचिन्त्य है। आपको नाना प्रकारके विरुद्धकार्योंका आश्रय देखकर यही अनुमान किया जा सकता है कि आपकी शक्ति अचिन्त्य है। ब्रह्मसूत्रकारोंने कहा है—'अचिन्त्य सेव्य-विषय एकमात्र श्रुति अर्थात् शब्द-प्रमाणके द्वारा गोचर होता है।” और स्कन्दपुराणमें भी कहा गया है—“अचिन्त्य विषयमें तर्कका कोई स्थान नहीं है।” जैसे प्राकृत मणि-महौषधादिमें भी यह अचिन्त्य प्रभाव दिखायी देता है, उसी प्रकार अचिन्त्यशक्तिके अतिरिक्त परमेश्वरका परमेश्वरत्व सिद्ध हो नहीं सकता। इस अचिन्त्यशक्तिके प्रभावसे ही ईश्वरके माहात्म्यको समझना अत्यन्त कठिन कहा गया है। अज्ञान और इन्द्रजालविद्या जहाँ-तहाँ दिखलायी देती है, इसलिये अज्ञान और इन्द्रजालादिके द्वारा परमेश्वरका पारमैश्वर्य सिद्ध नहीं होता है। क्योंकि 'उपरत' आदि विशेषणके द्वारा ईश्वरमें इन दोनोंका अभाव प्रतिपादित हुआ है। ईश्वरमें अज्ञान और इन्द्रजाल स्वीकार करनेपर 'भगवति' इत्यादि छः प्रकारके विशेषण-प्रयोगका तात्पर्य निष्फल हो जाता है। इसलिये अचिन्त्यशक्ति निरूपक शास्त्रों और युक्तिके द्वारा, विश्वपालकत्व और उसमें उदासीनता, ये दो गुण विरोधी नहीं हो सकते। अज्ञानवशतः जिनका चित्त सर्पादि भावसे भावित है, उनकी बुद्धिमें रस्सी जिस प्रकार सर्प प्रतीत होती है, उसी प्रकार जिनकी मति नाना भावोंसे भावित है, इसलिये जो वास्तविक तत्त्व-ज्ञानशून्य हैं, आप भी उनके मतोंके अनुसार उन-उन भावोंमें प्रकाशित होते हैं। यदि कहें कि केवल-ज्ञानको 'ब्रह्म' और नाना प्रकारके धर्मोंकी आश्रय वस्तुको 'भगवान्' कहा जाता है, तो क्या ये दो भिन्न-भिन्न स्वरूप दिखायी देते हैं? इस आशङ्काको दूर करनेके लिये कहा है—'स्वरूपद्वयाभावात्'। इसके द्वारा कभी भी उनके स्वरूपमें द्वैतत्व नहीं कहा गया, केवल एक ही स्वरूपके दो प्रकारके धर्मोंका निर्णय किया गया है। इसलिये उनकी शक्ति-विलासकी जो विरोध प्रतीति होती है, उसीको ही उनका अचिन्त्य ऐश्वर्य कहा जाता है। यह उनका दोष ना होकर भूषण ही है। तीसरे स्कन्धमें भी इस प्रकार विरोध वर्णित हुआ है— 'प्राकृत-चेष्टाहीनता और कर्म, अजन्माका जन्म, कालस्वरूप होकर भी शत्रुके पाँचवाँ अध्याय | २७७
[ ५/४१-४८ भयसे दुर्गमें आश्रय लेना और मथुरासे पलायन तथा आत्माराम होकर भी सोलह हजार रमणियोंके साथ विलास, इन सब विषयोंमें तत्त्वज्ञानीकी बुद्धि भी भ्रान्त हो जाती है।' यदि ये सभी कर्मादि वास्तविक ना हों, तो कभी भी तत्त्वज्ञानीकी बुद्धि भ्रान्त नहीं होगी। इसलिये भगवान्की अचिन्त्यशक्ति ही लीलाका कारण है। उनकी जैसी-जैसी इच्छा प्रकटित होती है, अचिन्त्यशक्ति भी उन-उन रूपोंमें ही लीलाका आविष्कार करती रहती है।' पञ्चरात्र-शास्त्र सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा अनुमोदित उपासनाकाण्डमय वेदोंका विस्ताररूपी ग्रन्थ है। यह राजस या तामस तन्त्र नहीं है, अपितु विद्वान लोग इसे 'सात्वत-संहिता' नामसे कहते हैं। इस ग्रन्थके वक्ता स्वयं श्रीनारायण हैं, ऐसा महाभारतमें शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्म-पर्वमें ३४९/६८ श्लोकमें विशेषरूपसे उल्लेख हुआ है। श्रीनारदादि दिव्य विद्वान, जो भ्रम-प्रमादादि चार दोषोंसे रहित हैं, वे लोग ही इस ग्रन्थके प्रवर्त्तक हैं। श्रीभागवत ग्रन्थ भी 'सात्वत-संहिता' नामसे परिचित है। श्रीपाद शङ्करका पाञ्चरात्रिक मतके सम्पूर्ण विपरीत होकर विरुद्ध बातको पाञ्चरात्रिक-मतरूपमें पूर्वपक्ष प्रस्तुतकर उसके खण्डनका प्रयास, केवल न्याय और सत्यको नकारना ही है। इस प्रयासका संक्षेपमें खण्डन करनेके उद्देश्यसे नीचे वर्णन किया जा रहा है- (१) ब्रह्मसूत्रके ४२-संख्या सूत्रके भाष्यमें श्रीपाद शङ्करने सङ्कर्षणको 'जीव' कहा है। वास्तविक वैष्णवोंने कभी भी सङ्कर्षणको 'जीव' नहीं कहा है। वे (सङ्कर्षण) स्वयं अधोक्षज, अच्युत, विष्णुवस्तु, जीवके अधिष्ठातृ-देवता, पूर्ण, अंशी, विभुचैतन्य, समस्त प्राकृत-अप्राकृत सृष्टिके कारण हैं। वे कभी भी अणुचैतन्य और अंश जीव नहीं हैं। जीवात्माका जन्म और मृत्यु नहीं है-इसको वैष्णव और कोई भी श्रौतपन्थी शास्त्रद्रष्टा तथा शास्त्रश्रोता स्वीकार करेंगे। (२) ४३-संख्या सूत्रके भाष्यके उत्तरमें मूल-सङ्कर्षणसे अन्य-अन्य समस्त प्रकारके विष्णुतत्त्वके प्राकट्यके विषय 'ब्रह्मसंहिता' में उल्लेख किया गया है-'दीपाचिरिव हि दशान्तरमभ्युपेत्य दीपायते विवृतहेतु-समानधर्मा। यस्तादृगेव हि च विष्णुतया विभाति गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥' अर्थात् 'जिस प्रकार मूल प्रदीपसे प्रज्ज्वलित होकर अन्य दीप मूल प्रदीपके तुल्य ही प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार जो आदिपुरुष गोविन्द विष्णु होकर प्रकाश पा रहे हैं, उनका मैं भजन करता हूँ।' (३) ४४-संख्या सूत्रके भाष्यमें 'ये परस्पर भिन्न हैं, एकात्मक नहीं हैं'-श्रीशङ्कराचार्यके इस पूर्वपक्षको पाञ्चरात्रिकगण कभी भी अपने मतके रूपमें स्वीकार नहीं करते हैं। श्रीपाद शङ्करने अपने ही ४२वें सूत्रके भाष्यमें स्वीकार किया है (“स आत्मात्मानमनेकधा व्यूह्मावस्थित इति, तन्न निराक्रियते” अर्थात् “वे स्वयं अपने ही अनेक प्रकारके व्यूहरूपोंमें अवस्थित या विराजमान हैं, यह श्रुतिसङ्गत है, इस बातको हमलोग स्वीकार करते हैं।) यह बात उनकी इस सूत्रमें पूर्वपक्षकी आपत्तिकी विरोधी है अर्थात् उनके ४४वें सूत्रके भाष्य और ४२वें सूत्रोंके भाष्यके वक्तव्य परस्पर विरोधी हैं-जिसे वे पहले स्वीकार कर चुके हैं, पूर्वपक्षके रूपमें अब उसका खण्डन करनेकी चेष्टा कर रहे हैं। भागवत-लोगोंने नारायणके चतुर्व्यूहको स्वीकार करनेपर भी 'बहुईश्वरवाद' को स्वीकार नहीं किया। वे लोग तत्त्व-वस्तुको अद्वयज्ञान भगवान्के रूपमें २७८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/४१-४८ ] स्वीकार करते हैं, वे कभी भी वेदविरोधी बहु-ईश्वरवादी नहीं हैं। उनका श्रीनारायणकी अचिन्त्य-महाशक्तिमत्तामें दृढ़ विश्वास है। लघुभागवतामृतका मर्मानुवाद द्रष्टव्य है। वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध-इन चार तत्त्वोंमें कारण-कार्य-भाव नहीं है। 'नान्यत् यत् सदसत्परम्', 'देहदेहि-विभेदोऽयं नेश्वरे विद्यते क्वचित्' (कूर्म पुराण), वे सभी मायाधीश तत्त्व, शुद्धसत्त्वके अधिष्ठाता और तुरीय हैं, उनके प्रकाशोंमें भी मायाका कोई विक्रम या विकार अथवा परिणाम या खण्डत्व नहीं रह सकता। वे एक ही अद्वयज्ञान, अधोक्षज और पूर्णवस्तु हैं। श्रुतिप्रमाण (बृः आः ५/१)-“ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥” ब्रह्मासे लेकर घासके तिनके तक या भगवान् विष्णुके स्थूल बाह्य-अङ्ग विश्वरूपको त्रिशक्तिके (अन्तरङ्गा, तटस्था और बहिरङ्गा शक्तिके) अधीश श्रीचतुर्व्यूहके साथ एक अथवा समज्ञान-'चित्-अचित्-समन्वयवादियों'का वृथा प्रयास और नितान्त भगवत्-विरोधमूलक नास्तिकवाद मात्र है। ब्रह्मासे लेकर घासके तिनके तक या विश्वरूप विष्णुका बहिरङ्गवैभव-एकपादविभूति है। यह माया या प्रकृति-सम्बन्धी होनेके कारण प्राकृत है। इसके साथ चित्-अचित्के ईश्वर चतुर्व्यूहका साम्यज्ञान या प्रयास-यह मायावादियोंका धर्म है। (४) ४५-संख्या भाष्यके उत्तरमें लघुभागवतामृतमें भगवत्-गुणोंके अप्राकृतत्व-वर्णन प्रसङ्गमें (९७-९९ संख्यामें) उद्धृत वाक्यका मर्मानुवाद-'यदि कहें कि गुणमात्र ही प्रकृतिका कार्य है, इसलिये मरीचिकाके समान उसकी गिनती नहीं की जाती है। इससे और अधिक आश्चर्यकी बात क्या हो सकती है? आप यह बात कह नहीं सकते, क्योंकि भगवान्के गुण कभी भी प्राकृत नहीं हो सकते। उनके सारे गुण ही उनके स्वरूपभूत हैं, इसलिये वे सभी गुण निश्चय ही सुखस्वरूप हैं। जैसे ब्रह्मतर्कमें-'भगवान् हरि निज-स्वरूपभूत गुणोंसे गुणवान् हैं, इसलिये विष्णु और मुक्तजीवोंके गुण कभी भी उनके निज-स्वरूपसे पृथक् नहीं हैं।' श्रीविष्णुपुराणमें— 'जिन परमेश्वरमें सत्त्वादि प्राकृतगुणोंका संसर्ग नहीं है, वही परमशुद्ध आदिपुरुष हरि प्रसन्न हों।' और उसी विष्णुपुराणमें—'हेय अर्थात् प्राकृत-गुणोंसे परे समग्र ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य और तेज-ये भगवत्शब्दके अभिधेय हैं।' पद्मपुराणमें भी- 'परमेश्वरको जिन शास्त्रोंमें 'निर्गुण' कहा गया है, उसके द्वारा उनमें हेय या प्राकृत गुणका अभाव ही कहा गया है।' प्रथम स्कन्ध, सोलहवें अध्यायमें भी - 'हे धर्म, मैंने जो सब गुण बतलाये, वह सब गुणपरम्परा और अन्य महागुणराशि जो श्रीकृष्णमें नित्यरूपमें विराजमान हैं, महत्त्वाभिलाषी व्यक्ति भी जिन सभी गुणोंके लिये प्रार्थना करते हैं, वह सभी गुणावली कभी भी श्रीकृष्णसे अलग नहीं होती।' इसलिये ये श्रीकृष्ण असंख्य-अप्राकृत-गुणशाली, असीम-शक्तिशाली और पूर्ण-आनन्द-घनविग्रह हैं।” भागवत ३/२६/२१,२५,२७,२८ श्लोक द्रष्टव्य हैं।” श्रीरामानुजका 'श्रीभाष्य' जिसमें शाङ्कर युक्तियोंका खण्डन किया गया है, उसका मर्मानुवाद इस प्रकार है- 'श्रीशङ्करने श्रीभगवान्के द्वारा कहे गये परममङ्गल-साधन पञ्चरात्र-शास्त्रके किसी-किसी अंशको कपिलादि-शास्त्रोंकी भाँति श्रुतिविरुद्ध मानकर पञ्चरात्र-शास्त्रको अप्रमाणिक होनेकी पाँचवाँ अध्याय | २७९
[ ५/४१-४८ आशङ्का करके उसका त्याग किया है।' पञ्चरात्र-शास्त्रमें कहा गया है—'परमकारण ब्रह्मस्वरूप वासुदेवसे 'सङ्कर्षण' नामक जीवकी उत्पत्ति हुई है, सङ्कर्षणसे 'प्रद्युम्न' नामक मनकी उत्पत्ति और मनसे 'अनिरुद्ध' नामक अहङ्कारकी उत्पत्ति हुई है।' किन्तु यहाँपर जीवकी उत्पत्ति कहा नहीं जा सकता, क्योंकि यह श्रुतिविरुद्ध है। (कठोपनिषद् २/१८) में कहा है—'चिन्मय जीवात्माका कभी भी जन्म या मृत्यु नहीं होती।' यह वाक्य और सभी श्रुतियाँ ही जीवको अनादि या उत्पत्तिरहित कहती हैं। इसलिये यहाँपर सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धको क्रमशः जीव, मन और अहङ्कारके अधिष्ठातृदेव कहा गया है और उत्पत्ति शब्दके द्वारा उनका आविर्भाव ही उद्दिष्ट हुआ है (४२ सू०)। सङ्कर्षणसे प्रद्युम्न नामक मनकी उत्पत्ति कही गयी है। यहाँ भी कर्त्ता-जीवसे करण-मनकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है, क्योंकि श्रुतिमें कहा गया है—“परमात्मासे ही प्राण, मन और इन्द्रियों, सभीकी उत्पत्ति होती है।" इसलिये यदि जीवसे मनकी उत्पत्ति कही गई है, तब 'परमात्मासे इन सबकी उत्पत्ति होती है', इस प्रकार श्रुतिवचनसे उसका विरोध होता है। यह वाक्य श्रुतिविरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करता है, इसलिये इसका प्रमाणके रूपमें निषेध किया है (४३ सू०)। सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इनमें परब्रह्मभाव विद्यमान रहनेके कारण उसके प्रतिपादक शास्त्रोंकी प्रमाणिकताको कभी भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता। अर्थात् ये सङ्कर्षणादि व्यूह साधारण जीवकी भाँति मायावशयोग्य रूपमें अभिप्रेत नहीं हैं—ये सभी ईश्वर हैं—सभी ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज आदि षडैश्वर्यसम्पन्न हैं, इसलिये पञ्चरात्रका मत अप्रमाणिक नहीं है। जो पञ्चरात्र या भागवत-प्रक्रियासे अनभिज्ञ हैं, उनके पक्षमें ही ‘(पञ्चरात्रादिमें) जीवोंकी उत्पत्तिरूपा विरुद्धकथा अभिहित हुई है'—इस प्रकार अशास्त्रीय बात कहना सम्भव है। भागवत-प्रक्रिया इस प्रकार है—'जिन्हें स्वाश्रितभक्तवत्सल, वासुदेव नामक परब्रह्म कहा गया है, वे स्वेच्छासे स्वाश्रित और समश्रेणियताके लिये चार प्रकारसे अवस्थान करते हैं। जैसे पौष्कर-संहितामें कहा गया है—'जो शास्त्र ब्राह्मणोंके द्वारा क्रमागत (वंशपरम्पराप्राप्त) संज्ञाओंके द्वारा अवश्य-कर्त्तव्य रूपमें चतुर्व्यूहकी उपासनाका निर्देश करते हैं, वे शास्त्र ही 'आगम' हैं।' सात्वत-संहितामें भी कहा गया है कि इन चतुर्व्यूहकी उपासना वासुदेव नामक परब्रह्मकी ही उपासना है। वासुदेव नामक परब्रह्म, सम्पूर्ण षडैश्वर्ययुक्त विग्रह, सूक्ष्म, व्यूह और विभव, इन सब भेदभिन्न और अधिकारानुसारसे भक्तोंके द्वारा ज्ञानपूर्वक कर्मके द्वारा अर्चित होकर सम्यक् रूपसे उनको प्राप्त होते हैं। विभव अर्थात् नृसिंहदेव, रघुनाथ (रामचन्द्र) या मत्स्य-कूर्मादि अवतारोंके अर्चनसे सङ्कर्षणादि व्यूहकी प्राप्ति होती है और उस व्यूहके अर्चनसे वासुदेव-नामक परब्रह्मकी प्राप्ति होती है। क्योंकि पौष्कर-संहितामें कहा है—'इस शास्त्रकी विधि अनुसार ज्ञानपूर्वक कर्मोंके द्वारा वासुदेव-नामक अव्यय परमब्रह्मकी प्राप्ति होती है।' इसलिये सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धका भी परब्रह्मत्व सिद्ध हुआ है, क्योंकि वे भी स्वेच्छासे विग्रह-विशिष्ट हैं अर्थात् उन्होंने स्वेच्छासे वे विशिष्ट विग्रह धारण किये हैं। 'वे प्राकृत प्राणीकी भाँति जन्म ग्रहण ना कर अनेक रूपोंमें अवतीर्ण अथवा प्रकटित होते हैं', २८० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
यह श्रुतिके द्वारा सिद्ध है। भक्तवात्सल्यके कारण वे स्वेच्छासे कोई भी रूप धारण कर सकते हैं, यह बात पञ्चरात्र-शास्त्रके विरुद्ध नहीं है। इस शास्त्रमें सङ्कर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध-क्रमशः जीव, मन और अहङ्कार सत्त्वसमूहके अधिष्ठातृदेव हैं, इसलिये 'जीवादि' शब्दके द्वारा इनका जो उल्लेख किया गया है, वह शास्त्र विरुद्ध नहीं है। जैसे 'आकाश' और 'प्राणादि' शब्दोंसे कभी ब्रह्मको सम्बोधित किया जाता है (४४ सूः)। इस शास्त्रमें जीवोत्पत्तिका निषेध हुआ है। क्योंकि परम-संहितामें कहा है-'अचेतन, दूसरोंके द्वारा प्रयोगके योग्य और सदा विकारयोग्य त्रिगुण ही कर्मियोंका क्षेत्र है-यही प्रकृतिका रूप है। इसका परब्रह्मके साथ सम्बन्ध व्याप्ति रूपमें है, वे भी अनादि हैं और यह भी सत्य है।' इस प्रकार सभी संहिताओंमें ही 'जीव' को नित्य कहा गया है, इसलिये पञ्चरात्र-मतमें उसकी उत्पत्तिका निषेध हुआ है। जिसकी उत्पत्ति होती है, उसका विनाश अवश्यम्भावी है,-यदि जीवकी उत्पत्तिको स्वीकार किया जाता है, तो उसके विनाशको भी स्वीकार करना होगा। किन्तु जीव जब नित्य है, तब नित्यत्व होनेके कारण उसकी उत्पत्तिका स्वयं ही निषेध होगा। परमसंहिताके प्रारम्भमें कहा गया है-'प्रकृतिका रूप सदा विकारयुक्त है', इसलिये उत्पत्ति और विनाशादिको इस 'सदा विकार'के अन्तर्गत जानना होगा। इसलिये सङ्कर्षणादि जीवरूपसे उत्पन्न होते हैं, ऐसा कहकर श्रीशङ्कराचार्यने जो दोष दिखलाये हैं, उसका खण्डन हुआ है (४५ सूः)। भागवत ३/१/३४ श्लोककी श्रीधरस्वामीकी टीका द्रष्टव्य है। 'श्रीशङ्कराचार्यके चतुर्व्यूहवादखण्डन'के खण्डनको विस्तृत रूपसे जाननेके इच्छुक श्रीभाष्यकी श्रीमत्सुदर्शनाचार्यकृत "श्रुतप्रकाशिका" टीकाकी आलोचना करें॥४१-४८॥ अष्टम श्लोकेर कैल संक्षेप विवरण। नवम श्लोकेर अर्थ शुन दिया मन॥४९॥ अनुवाद-आठवें श्लोकका मैंने संक्षेपमें वर्णन किया। नवें श्लोकका अर्थ अब ध्यानपूर्वक श्रवण करो॥४९॥ मङ्गलाचरणके चौदह श्लोकोंमें नवें श्लोकका अर्थ :- श्रीस्वरूपगोस्वामीके कड़चासे- मायाभर्त्ताजाण्डसङ्घाश्रयाङ्गः शेते साक्षात् कारणाम्भोधि-मध्ये। यस्यैकांशः श्रीपुमानादिदेव- स्त श्रीनित्यानन्दरामं प्रपद्ये ॥५०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिनके एक अंशस्वरूप मायाके स्वामी, ब्रह्माण्डोंके आश्रयरूप कारणाब्धिशायी, आदिदेव पुरुषावतार हैं, उन श्रीनित्यानन्द-रामको मैं प्रणाम करता हूँ॥५०॥ अनुभाष्य-साक्षात् मायाभर्त्ता (मायायाः भर्त्ता अधीश्वरः) अजाण्डसङ्घाश्रयाङ्ग (अजाण्डानां ब्रह्माण्डानां सङ्घः समूहः तस्य आश्रयः अङ्ग यस्य सः) कारणाम्भोधिमध्ये (कारणसमुद्र-जलोपरि) शेते, असौ श्रीपुमान् आदिदेवः (आदिपुरुषावतारः) यस्य (श्रीनित्यानन्दस्य) एकांश तं श्रीनित्यानन्दरामम् [अहं] प्रपद्ये। पाँचवाँ अध्याय | २८१
[ ५/५०-५६ श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५०॥ कारणजलका वर्णन :- वैकुण्ठ-बाहिरे सेइ ज्योतिर्मय धाम। ताहार बाहिरे 'कारणार्णव' नाम॥५१॥ परव्योमकी सीमापर कारण-सागर :- वैकुण्ठ बेड़िया एक आछे जलनिधि। अनन्त, अपार-तार नाहिक अवधि॥५२॥ अनुवाद-परव्योमधामके बाहर ज्योतिर्मय ब्रह्मधाम है और उसके बाहर 'कारण-समुद्र' है। वैकुण्ठके बाहर एक अनन्त-अपार जलराशि है, जिसके विस्तारकी कोई सीमा नहीं है॥५१-५२॥ अनुभाष्य-'जलनिधि'-'विरजा' या 'कारणजल' (मध्यलीला १५/१७५-१७६, मध्यलीला २०/२६८-२६९ और मध्यलीला २१/५२ द्रष्टव्य हैं)॥५२॥ वैकुण्ठमें स्थित महाभूतादि मायातीत :- वैकुण्ठेर पृथिव्यादि सकल चिन्मय। मायिक भूतेर तथि जन्म नाहि हय॥५३॥ अनुवाद-वैकुण्ठके पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाशादि शुद्धसत्त्वसे उत्पन्न होनेके कारण पूर्ण रूपसे चिन्मय है, उसमें मायाके पञ्चमहाभूतोंका लेशमात्र भी नहीं है॥५३॥ अनुभाष्य-'मायिक भूत' अर्थात् पृथ्वी आदि पञ्चमहाभूत॥५३॥ कारणजलकी चिन्मयता :- चिन्मय-जल सेइ परम-'कारण'। यार एक कणा गङ्गा पतितपावन॥५४॥ अनुवाद-कारण-समुद्र इस जगत्का मूल कारण है और उसका जल पूर्ण चिन्मय है। उसकी एक बूँद स्वरूप गङ्गा हैं, जो पतितोंको पवित्र करनेवाली हैं॥५४॥ अनुभाष्य-'कारण'-माया-सम्बन्धयुक्त उपाधि होनेपर भी वस्तुतः मिश्र रज-तमसे शून्य या सत्त्वमय है। आदिलीला २/५३ द्रष्टव्य है॥५४॥ परव्योममें स्थित सङ्कर्षण ही एकांशसे कारणोदशायी :- सेइ त' कारणार्णवे सेइ सङ्कर्षण। आपनार एक अंश करेन शयन॥५५॥ अनुवाद-उस कारण समुद्रमें वे सङ्कर्षण अपने एक अंश कारणोदशायी विष्णु रूपमें शयन करते हैं॥५५॥ वे ही आदि पुरुषावतार और मायाके ईक्षणकर्त्ता :- महत्स्रष्टा पुरुष, तिँहो जगत्-कारण। आद्य-अवतार करे मायार दरशन॥५६॥ २८२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/५६-५८ ] कारण-समुद्र मायाके स्पर्शसे अतीत :- मायाशक्ति रहे कारणाब्धिर बाहिरे। कारण-समुद्र माया परशिते नारे॥५७॥ अनुवाद—आदि-अवतार, महत्-तत्त्वकी सृष्टि करनेवाले और जगत्के कारणस्वरूप, कारणोदशायी विष्णु मायापर दृष्टिपात करते हैं। कारण-समुद्र चिन्मय होनेके कारण मायाशक्ति उसके बाहर ही अवस्थान करती है, वह उसे स्पर्श नहीं कर सकती॥५६-५७॥ मायाके दो रूप, प्रधान और प्रकृति :- सेइ त' मायार दुइविध अवस्थिति। जगतेर उपादान 'प्रधान', 'प्रकृति'॥५८॥ अनुवाद—मायाशक्तिकी दो प्रकारसे अवस्थिति है। एक वह जगत्के उपादान कारण 'प्रधान' के रूपमें और दूसरे वह जगत्के निमित्त कारण 'प्रकृति' के रूपमें अवस्थान करती है॥५८॥ अनुभाष्य—'प्रधान' और 'प्रकृति' इस विषयमें मध्यलीला २०/२७१ द्रष्टव्य है। श्रीजीव गोस्वामीकृत परमात्मसन्दर्भ (४९ संख्या)में— “तस्याः मायायाश्चांशद्वयम्। तत्र गुणरूपस्य मायाख्यस्य निमित्तांशस्य, द्रव्यरूपस्य प्रधानाख्यस्योपादानांशस्य च परस्परं भेदमाह चतुर्भिः (भाः ११/२४/१)”×× (५३ संख्या) “अन्यत्र तयोरुपादाननिमित्तयोरंशेन वृत्तिभेदेनभेदानप्याह (भाः १०/६३/२६)— 'कालो दैवं कर्म जीवः स्वभावो, द्रव्यं क्षेत्रं प्राणमात्मा विकारः। तत्सङ्घातो बीजरुहप्रवाहस्तन्मायैषा तन्निषेधं प्रपद्ये॥' अत्र कालदैवकर्मस्वभावा निमित्तांशाः, अन्ये उपादानांशाः, तद्वान् जीवस्तूभयात्मकस्तथोपादानवर्गे निमित्तशक्त्यंशोऽप्यनुवर्त्तते।' ×× (५५ संख्यामें) “निमित्तांशरूपया मायाख्ययैव प्रसिद्धा शक्तिस्त्रिधा दृश्यते—ज्ञानेच्छाक्रियारूपत्वेन। ×× अथोपादानांशस्य प्रधानस्य लक्षणः (भाः ३/२६/१०)—'यत्तत् त्रिगुणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम्। प्रधानं प्रकृतिं प्राहुरविशेषं विशेषवत्॥' यत् खलु त्रिगुणं सत्त्वादिगुणत्रय- समाहारस्तदेवाव्यक्तं प्रधानं प्रकृतिञ्च प्राहुः। तत्राव्यक्तसंज्ञत्वे हेतुः—'अविशेषं गुणत्रयसाम्यरूपत्पादनभि-व्यक्तविशेषम्, अतएवाव्याकृतसंज्ञञ्चेति गमितम्। प्रधानसंज्ञत्वेहेतुः—विशेषवत् स्वकार्यरूपाणां महदादिविशेषाणामाश्रयरूपतया तेभ्यः श्रेष्ठम्।' ×× निमित्तांशो माया, उपादानांशः प्रधानमिति।” ‘भगवान्की बहिरङ्गा-शक्ति मायाके दो अंश हैं—निमित्तांश 'गुणरूपा माया' और उपादानांश 'द्रव्यरूप प्रधान'—इन दोनों संज्ञाका भेद भागवतके चार श्लोकों (११/२४/१-४) में वर्णित हुआ है।' अन्यत्र १०/६३/२६ में उपादान और निमित्त, इन दो अंशोंका वृत्ति भेदसे विभाग वर्णित हुआ है—“हे भगवन्! क्षोभक 'काल', निमित्त 'कर्म', फलरूपमें प्रकाशित 'दैव' और उसका संस्कार 'स्वभाव'—ये चारों निमित्तांशयुक्त बद्धजीव—सूक्ष्मभूतसमूह 'द्रव्य', प्रकृति 'क्षेत्र', सूत्र 'प्राण', अहङ्कार आत्मा और ग्यारह इन्द्रियाँ और पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश—ये सोलह विकार',—इन सबका एकत्रित रूप 'देह' है। देहसे बीजरूप कर्म और कर्मसे अङ्कुररूप देह, इस प्रकारका पुनः-पुनः प्रवाह—यही 'माया' है। हे प्रभो! आप मायाके निषेध-अवधिभूत तत्त्व हैं, मैं आपका भजन करता हूँ।” जीव निमित्तशक्त्यांश होनेपर भी उभयात्मक अंशविशिष्ट जीव उपादानवर्गका भी अनुसरण करते हैं। निमित्तांशरूपा 'माया' शक्तिके—'ज्ञान', 'इच्छा' और 'क्रिया' रूप तीन विभाग देखे जाते हैं। उपादानांश 'प्रधान'के लक्षण—'जहाँ सत्त्व, रजो और तमो गुणोंकी साम्यावस्था
पाँचवाँ अध्याय | २८३
[ ५/५८-६१ है, उसे ही 'अव्यक्त', 'प्रधान' और 'प्रकृति' कहा जाता है। 'अव्यक्त'-संज्ञा निर्देश करनेका कारण यह है—यह विशेषरहित है अर्थात् तीनों गुण साम्यावस्थामें होनेके कारण उनका विशेषधर्म अप्रकाशित है, इसलिये प्रधानको 'अव्याकृत' कहा जाता है। 'प्रधान'-संज्ञाका कारण—विशेषकी भाँति मायाके स्वकार्यरूप महात्तत्त्वादि विशेषसमूहका आश्रयरूप होनेके कारण उनसे श्रेष्ठ है।"॥५८॥ गुणमयी माया कभी भी जगत्का मुख्य कारण नहीं :- जगतकारण नहे, प्रकृति जड़रूपा। शक्ति सञ्चारिया तारे कृष्ण करे कृपा॥५९॥ भगवान्के ईक्षणके प्रभावसे प्रकृति जगत्का गौण-कारण :- कृष्णशक्त्ये प्रकृति हय गौण-कारण। अग्निशक्त्ये लौह यैछे करये जारण॥६०॥ भगवान् ही जगत्के मूलकारण :- अतएव कृष्ण मूल-जगतकारण। प्रकृति-कारण, यैछे अजा-गलस्तन॥६१॥ अनुवाद—माया जगत्का कारण नहीं है, क्योंकि प्रकृति जड़रूपा है। श्रीकृष्ण ही कृपा करके उसमें अपनी शक्ति सञ्चारित करते हैं। जैसे अग्निसे शक्ति प्राप्त करके लोहा जला सकता है, वैसे ही कृष्णशक्तिके द्वारा प्रकृति सृष्टिका गौण कारण है। इसलिये श्रीकृष्ण ही जगत्के मूल कारण हैं। बकरेके गलेमें स्तन जैसे मांसपिण्ड [जो दूध नहीं दे सकते], उसके समान ही प्रकृति भी जगत्का कारण दिखलायी देती है॥५९-६१॥ अनुभाष्य—मध्यलीला २०/२५९-२६१ संख्या द्रष्टव्य है। बहिरङ्गा मायाशक्ति जगत्के उपादानांशसे 'प्रधान' और 'प्रकृति' [प्रकृतिको कहीं प्रधान और कहीं माया भी कहा गया है] नामसे प्रसिद्ध है और जगत्के निमित्तांशसे 'माया' नामसे परिचित है। जड़रूपा प्रकृति जगत्का कारण नहीं है, क्योंकि श्रीकृष्ण कारणोदकशायी महाविष्णुरूपमें प्रकृतिमें उपादान या द्रव्यशक्ति प्रदानकर 'शक्ति' सञ्चार करते हैं। उदाहरण स्वरूप, जिस प्रकार लोहेकी जलाने या ताप देने आदिकी शक्ति नहीं है, किन्तु अग्निके स्पर्शसे तप्त लोहा दूसरे वस्तुओंको जलानेमें या ताप प्रदान करनेमें समर्थ हो जाता है, उसी प्रकार लोहेकी भाँति जड़ा-प्रकृतिकी भी द्रव्य या उपादान होनेकी स्वतन्त्रता नहीं है। [अग्नि-सदृश] कारणोदकशायीकी ईक्षणशक्ति सञ्चारित होनेपर ही [लोहे-सदृश] प्रकृति उपादानके समान शक्तिविशिष्टा हो जाती है। उपादानके रूपमें परिचित प्रकृतिको उपादान-कारण मानना भ्रान्ति मात्र है। श्रीकपिलदेवने भी कहा है (भाः ३/२८/४०)— “यथोल्मुकाद्विस्फुलिङ्गात् धूमाद्वापि स्वसम्भवात्। अप्यात्मत्वेनाभिमताद् यथाग्निः पृथगुल्मुकात्॥” अर्थात् “अग्निके साथ आपाततः एक प्रतीत होनेपर भी जिस प्रकार धुआँ, जलती हुई लकड़ी और चिङ्गारियाँ—तीनों ही अग्निसे पृथक् हैं, उसी प्रकार जलती हुई लकड़ी स्थानीय 'प्रधान', धुआँ स्थानीय 'पञ्चभूत, इन्द्रियों और अन्तकरण' (स्थूल और सूक्ष्म देह) तथा चिङ्गारी २८४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
स्थानीय 'जीव', सभी अग्नि स्थानीय सर्व-उपादान भगवान्से शक्ति प्राप्तकर अपना-अपना पृथक् परिचय देते हैं; इसलिये भगवान् ही सबके उपादान हैं।" जगत्का उपादान कहकर जिस 'प्रधान' को स्थिर किया जाता है, उस प्रधानमें भगवान्के द्वारा प्रदत्त उपादानसे ही उसका इस प्रकार परिचय है। 'प्रधान' का उपादानत्व भगवान्से स्वतन्त्र विषय नहीं हो सकता। उपादानके मूलाश्रय श्रीकृष्णको भूलकर सांख्यवादियोंका प्रकृतिमें उपादानत्व आरोप करना-बकरेके गलेमें स्थित स्तनाकृति-मांसपिण्डकी दूध देनेमें असमर्थताके समान निष्फल प्रयास मात्र है॥५९-६१॥ श्रीनारायण ही निमित्त कारण :- माया-अंशे कहि तारे निमित्त-कारण। सेइ नहे, याते कर्त्ता-हेतु-नारायण॥६२॥ मूल-परिचालक विभु-चैतन्य भगवान् :- घटेर निमित्त-हेतु यैछे कुम्भकार। तैछे जगतेर कर्त्ता-पुरुषावतार ॥६३॥ मायाके द्वारा श्रीकृष्णकी जगत्की सृष्टि :- कृष्ण-कर्त्ता, माया ताँर करेन सहाय। घटेर कारण-चक्र-दण्डादि उपाय॥६४॥ अनुवाद-'माया' अंशसे जिसे निमित्त कारण कहा जाता है, वह भी सत्य नहीं है, क्योंकि नारायण ही वास्तविक निमित्त-कारण हैं। कुम्हार जैसे घटका निमित्त-कारण है, वैसे ही प्रथम पुरुषावतार ही जगत्के निमित्त कारण हैं। श्रीकृष्ण ही जगत्के सृष्टिकर्त्ता हैं। इस कार्यमें माया केवल उनकी सहायिका है, जैसे चक्र-दण्डादि घट निर्माणमें उपाय (सहायक) हैं॥६४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-परव्योमधामके बाहर ज्योतिर्मय 'ब्रह्मधाम' है और उसके बाहर 'कारणसमुद्र' है। चिन्मय जगत् कारण-शून्य है अर्थात् उसका कोई कारण नहीं है और माया कारणमयी है। इन दोनोंके मध्यवर्ती-स्थलको चिन्मयजलनिधिके रूपमें 'कारण-समुद्र' कहा गया है; क्योंकि उसी जलमें शयन करनेवाले महाविष्णुका ईक्षण ही उसके बाहर स्थित मायाको लक्ष्य करके सृष्टि आदि क्रिया करता है। सृष्टिादि-क्रियाशून्य श्रीकृष्ण और परव्योमनाथ नारायणके स्वरूपमें कोई माया-सम्बन्धी क्रिया नहीं होती। महासङ्कर्षण कारणजलमें शयन करते हुए अपने सुदूर ईक्षणांशसे महत्तत्त्वकी सृष्टि करते हैं, ये आदि-अवतार हैं। कारणजलके बाहर मायाशक्तिकी अवस्थिति है; भगवान् उसके प्रति दृष्टिपात करते हैं। माया कारण-समुद्रको स्पर्श नहीं कर सकती। भगवान्का ईक्षण मायामें प्रवेश करके मायाको क्रियाशील बनाता है। मायाशक्तिकी दो रूपोंमें अवस्थिति है-जगत्के उपादानरूपमें 'प्रधान' और जगत्के निमित्तरूपमें 'माया'। वास्तवमें प्रकृति जड़रूपा है। जिस प्रकार आग लोहेके अन्दर प्रवेशकर जलानेकी शक्ति प्रदान करती है, उसी प्रकार भगवान्की ईक्षणशक्ति सञ्चारित होनेसे प्रकृति उस शक्तिबलसे जगत्-सृष्टिका 'गौण कारण' होती है। इसलिये श्रीकृष्ण ही जगत्के मूल कारण हैं, बकरेके गलेके स्तनकी भाँति प्रकृतिका केवल द्रव्यरूप कारणत्व है। माया-अंशसे अर्थात् गुणरूप अंशसे जिसे निमित्त कारण कहा जाता है, उसमें भी नारायण ही निमित्त कारण हैं। घड़ेके निर्माणमें
[ ५/५९-६६ चक्र, दण्डादि और कुम्हार, ये निमित्त कारण हैं। नारायण-कुम्हार-स्थानीय (मुख्य) निमित्त कारण हैं और माया-चक्र-दण्डादि-स्थानीय (गौण) निमित्त कारण है। इसलिये जिस प्रकार कुम्हारके बिना घड़ा नहीं बन सकता है, उसी प्रकार नारायणके बिना भी जगत्की सृष्टि नहीं होती। चक्र-दण्ड-स्थानीय 'गुणरूप' निमित्त-कारण 'मूल' निमित्त-कारण नारायणके सहायक रूपमें कार्य करता है॥५१-६४॥ कारणोदशायीका मायापर ईक्षण और जीवके प्राकट्यका विधान :- दूर हैते पुरुष करे मायाते अवधान। जीवरूप वीर्य ताते करेन आधान ॥ ६५ ॥ अङ्गाभाससे मायास्पर्शके कारण नारायण ही उपादान-कारण :- एक अङ्गाभासे करे मायाते मिलन। माया हैते जन्मे तब ब्रह्माण्डेर गण ॥ ६६ ॥ अनुवाद-दूरसे ही पुरुष (कारणोदकशायी विष्णु) मायापर दृष्टिपातकर जीवरूप वीर्यको उसमें स्थापित करते हैं। उन पुरुषका एक अङ्गाभाससे मायासे मिलन होता है और उसके फलस्वरूप मायासे असंख्य ब्रह्माण्डोंका जन्म होता है ॥ ६५-६६ ॥ अनुभाष्य-वैदिक विचारके अनुसार वस्तुसे शक्तिके योगसे बद्धजीवोंके निकट प्रकाशित जगत्की सृष्टि होती है। अवैदिक विचारसे यह दृश्यमान् जगत् प्रकृतिसे उत्पन्न हुआ है। वस्तुशक्तिकी तीन प्रकारकी वृत्ति हैं-चित्, अचित् और चित्-अचित्मिश्र (तटस्था)। अश्रौत-पन्थामें कोई-कोई मानते हैं कि जड़ा-प्रकृतिसे जगत्की उत्पत्ति होती है; वैदिक-विचारमें वह स्वीकृत नहीं है। भगवत्-वस्तु चिन्मयी शक्तिसे अभिन्न है। अचिन्मयी शक्तिमें चित्-शक्ति सञ्चारित होनेपर तात्कालिक नश्वर चिद्भावाभास प्रकाशित होता है। भगवान्की चित्-अचित्-मिश्र तटस्था नामक जीवशक्ति नित्यकाल चिन्मयी शक्तिके अनुगत होनेपर भी अनादिकालसे अचित्-शक्ति-परिणत दृश्यमान् जगत्में भ्रमणके उपयोगी है। चिन्मात्र स्वतन्त्रताके अपव्यवहारसे वस्तुसे विच्छिन्न होकर जीवकी बद्धानुभूति होती है। जीव वास्तवमें अपने स्वरूपसे अवगत होनेपर ही जान पाता है कि भगवत्-सेवोन्मुखता ही उसके नित्य चरम मङ्गलका आधार है। जिस समय जीव सेवासे विमुख होता है, उसी समय वह 'शक्ति' होनेपर भी स्वयंको 'शक्तिमान्' मानकर भोगोंमें प्रवृत्त हो पड़ता है। वह अपनी इन्द्रियोंसे अचित् जगत्का प्रभु बननेके लिये अपनी चिन्मात्र-शक्तिके विपरीत अनुष्ठान (कार्य) कर बैठता है। श्रीकृष्णकी निजशक्तिके द्वारा ही उनकी विजातीय अचित्-शक्तिमें शक्ति अर्पित होती है। उदाहरणस्वरूप-अग्नि और अग्निकी दाहिका शक्ति निरग्निक लोहेमें सञ्चारित होनेपर लोहेका अग्नि रूपमें परिचय प्रकाशित करती है। वास्तवमें अचित्-शक्ति श्रीकृष्णकी चित्-शक्तिसे ही क्रिया लाभ करती है। अचित्-शक्तिके प्रभावसे बद्धजीव जड़जगत्को प्रकृतिसे उत्पन्न समझता है, किन्तु चिन्मात्रमें अवस्थित मुक्तजीव यह समझ पाता है कि शक्तिमान्की चित्-शक्ति ही अचित्-शक्तिमें आंशिक बल विधानकर उसे क्रियावती करती है। अचित्-शक्तिकी मूल कारण 'प्रकृति' अनेक प्रकारसे जीवके लिये अकल्याण, बन्धन और विमुखताका आह्वान करती है। बद्ध-अभिमानमें तर्कपन्थी २८६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/५९-६७ ] जीवका बकरीके दूध प्रसव करनेवाले स्तन देखकर भी उसके गलेमें स्तनाकृति मांसपिण्डसे दुग्धके लिये प्रार्थना करना जिस प्रकार विफल मनोरथ होता है, उसी प्रकार अचित्-मूला प्रकृतिको अचित्-जगत्का कारण कहना मूर्खता ही है। भगवान्की अचित्-शक्ति 'माया'-'निमित्त' और 'उपादान'के रूपमें हरिविमुख जीवोंके निकट प्रकट होकर उनको सत्यवस्तु ग्रहण करनेसे विमुख कराती है। जीव, स्वरूप-ज्ञान उदय होनेपर ही अचित्-शक्तिकी 'आवरणी' और 'विक्षेपात्मिका'-इन दो प्रकारकी चेष्टाओंको समझ पाता है। निमित्त-कारणरूपमें कुम्हार और उपादान-कारण एवं उपायरूपमें मिट्टी तथा चक्र-दण्डादि जैसे घड़ा बनानेमें जैसे दो कारण हैं, वैसे दृश्यजगत् और भूतसमूहके भी नियामकरूपमें वस्तुविचारसे शक्तिमान् तत्त्व ही निर्दिष्ट हुए हैं। शक्तिभेद-विचारसे त्रिगुणमयी माया गुणोंके द्वारा उपादानांश भूतसमूहका परिचालन करती है। तटस्थाशक्ति जीव इस दृश्यजगत्में हरिविमुख होकर भोक्ता होनेका अभिमान ग्रहण करता है। दृश्यजगत्में वस्तुकी अचित् प्रतीति श्रीकृष्ण-विमुखताका ही फलमात्र है। अचित् प्रतीतिमें भोग-प्रवृत्ति अर्थात् इन्द्रिय-परायणता दिखलायी देती है, किन्तु सेवोन्मुखतासे भगवत्-प्रतीतिमें अपने सम्बन्धका दर्शन होता है। श्रीकृष्ण ही नित्य चित्-जगत्का कारण हैं, वे ही आवृत-सत्य अचित्-जगत्का कारण हैं और वे ही तटस्था नामक जीवका मूल-कारण तथा विधाता हैं। अचित्-प्रतीति भगवान्की बहिरङ्गा-शक्तिकी क्रिया और चित्-प्रतीति अन्तरङ्गा-शक्तिकी क्रिया हैं। चिन्मय-प्रतीतकी वाणीसे अर्थात् गुरु-परम्परासे प्राप्त शास्त्रज्ञानसे हम लोग जान पाते हैं कि सभी स्वतःकर्तृत्व-धर्म और सबका मूल कारण भगवत्तामें प्रतिष्ठित हैं। वही वस्तु बृहद् है, उनके खण्डांश ही 'जीव' कहलाते हैं। वही भगवत्-वस्तु विभक्त होकर भी खण्डित होनेका धर्म प्रकाश नहीं करती अर्थात् विभक्त होनेपर भी वह पूर्ण ही रहती है, परन्तु खण्ड-प्रतीति कभी भी अखण्ड-प्रतीतके साथ अभिन्न नहीं होती अर्थात् उनमें सदा भेद रहता है। व्याप्य-व्यापक विचारमें ब्रह्म और जीव सजातीय होनेपर भी ईशवस्तु-मायाके प्रभु, और वश्यवस्तु (जीव) - मायाके अधीन है। जब मायाधीन मायाधीशके अधीन हो जाता है, तब उसकी मायाधीनता और नहीं रहती ॥ ५९-६६॥ मध्यलीला २०/२७१-२७३ और भागवत ३/५/२६ एवं ३/२६/१८ श्लोक द्रष्टव्य हैं॥६५-६६॥ कारणोदशायीके ईक्षणका फल :- अगण्य, अनन्त यत अण्ड-सन्निवेश। ततरूपे पुरुष करे सबाते प्रवेश ॥ ६७ ॥ अनुवाद-इस प्रकार अगणित, अनन्त जितने भी ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि होती है, वे पुरुष उतने रूप धारण करके उन सभी ब्रह्माण्डोंमें प्रवेश कर जाते हैं॥६७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कारणाब्धिशायी पुरुष दूरसे ही मायाके प्रति दृष्टिपात करते हैं, वह दृष्टि चित्फलस्वरूप होकर दो प्रकारसे कार्य करती है। अर्थात् वह उनके किरणकलारूपसे अनन्त जीवोंको मायामें प्रवेश कराती है और स्वयं अङ्गाभाससे मायासे योग करके अगण्य अनन्त ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करती है। उन प्रत्येक ब्रह्माण्डमें वे पुरुष एक-एक पुरुषाकारमें प्रवेश कर जाते हैं। 'अङ्गाभास'का अर्थ अङ्गमिलनका आभासमात्र है, वास्तविक अङ्गमिलन नहीं॥६५-६७॥ पाँचवाँ अध्याय | २८७
[ ५/६८-७२ उनके निश्वाससे ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि और प्रश्वाससे लय :- पुरुष-नासाते यबे बाहिराय श्वास। निश्वास सहिते हय ब्रह्माण्ड-प्रकाश॥६८॥ पुनरपि श्वास यबे प्रवेशे अन्तरे। श्वास-सह ब्रह्माण्ड पैशे पुरुष-शरीरे॥६९॥ अनुवाद-आदि पुरुषावतार जब नासिकासे श्वासको बाहर छोड़ते हैं, तब उस श्वासके साथ सभी ब्रह्माण्ड प्रकट हो जाते हैं। पुनः जब वे श्वासको भीतर लेते हैं, तब उस श्वासके साथ सभी ब्रह्माण्ड उनके शरीरमें प्रवेश कर जाते हैं॥६८-६९॥ उनके लोमकूपमें अनन्त ब्रह्माण्ड-समूह :- गवाक्षेरे रन्ध्रे येन त्रसरेणु चले। पुरुषेर लोमकूपे ब्रह्माण्डरे जाले॥७०॥ अनुवाद-झरोखेके छिद्रोंमेंसे जैसे धूलिकण आते-जाते हैं, वैसे ही उन पुरुषके रोमकूपोंमेंसे ब्रह्माण्ड आते-जाते हैं॥७०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-तीन परमाणुओंका एक त्रसरेणु होता है॥७०॥ अनुभाष्य-मध्यलीला २०/२७७-२८० संख्या द्रष्टव्य है॥६९-७०॥ ब्रह्मसंहिता (५/४८)- यस्यैकनिश्वासित-कालमथावलम्ब्य जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथाः। विष्णुर्महान् स इह यस्य कलाविशेषो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥७१॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ब्रह्माण्डनाथ अर्थात् ब्रह्मा-विष्णु-महेश, जिनके रोमकूपोंसे जन्म ग्रहण करते हैं और उनके निःश्वास-काल तक अवस्थित रहते हैं, वे महाविष्णु जिनकी कला हैं, उन आदिपुरुष गोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥७१॥ अनुभाष्य-अथ यस्य लोमविलजाः (लोमकूपात् जाताः) जगदण्डनाथाः (ब्रह्माण्डपतयः समष्टिविष्णवादयः) एकनिश्वासितकालं (निश्वासैकपरिमितकालम्) अवलम्ब्य (आश्रित्य) इह जीवन्ति (आविर्भूताः भवन्ति) सः महान् विष्णुः यस्य (गोविन्दस्य) कलाविशेषः, तमादिपुरुषं गोविन्दम् अहं भजामि। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७१॥ श्रीमद्भागवत (१०/१४/११)- क्वाहं तमो-महदहं-ख-चराग्निवार्भू- संवेष्टिताण्डघट-सप्तवितस्तिकायः क्वेदृग्विधाऽविगणिताण्डपराणुचर्या- वाताध्वरोमविवरस्य च ते महित्वम्॥७२॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७२॥ २८८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/७२-७६ ] अमृतप्रवाह भाष्य-प्रकृति, महत्तत्त्व, अहङ्कार और पञ्चभूतोंसे बना अपने हाथसे मापकर सात हाथके जितना बड़ा कहाँ मैं, और समस्त ब्रह्माण्ड परमाणुरूपमें जिनके रोमकूपोंमें विचरण करते हैं, कहाँ वे आप ? आपकी महिमा कैसी है ? अर्थात् मेरा ब्रह्माण्ड-विग्रह आपकी महिमाकी तुलनामें कुछ भी नहीं है ॥ ७२ ॥ अनुभाष्य-ब्रह्माजीने गो-वत्स हरण करनेके बाद अपना अपराधके निवारणके लिये जो स्तव किये, उनमेंसे यह एक है, - तमोमहदहं-ख-चराग्नि-वार्भू-संवेष्टिताण्ड-घट-सप्तवितस्ति कायः (तमः अव्यक्तं, महत्तत्त्वम् अहङ्कारः, खम् आकाशम्, चरः वायुः, अग्निस्तेजः वार्ज्जलं, भूः पृथिवी, एतैः प्रधानादि-क्षित्यन्तैः संवेष्टितः यः अण्डघटः ब्रह्माण्डरूपः घटः देहः स एव तस्मिन् निजमानेन सप्तवितस्तिकायः यस्य सः) अहं क्व, ईदृग् विधाविगणिताण्डपराणुचर्यावाताधवरोमविवरस्य (ईदृग्विधानि यानि अगणितानि अण्डानि तानि एव परमाणवः तेषां चर्या परिभ्रमणं तदर्थं वाताधवनः गवाक्षाः इव रोमविवराणि यस्य तस्य) ते (तव) महित्वं च क्व ? श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ७२ ॥ मूलसङ्कर्षण, महासङ्कर्षण और तीन पुरुषावतारोंका सम्बन्ध :- अंशेर अंश येइ, 'कला' तार नाम। गोविन्देर प्रतिमूर्त्ति श्रीबलराम ॥ ७३ ॥ ताँर एक स्वरूप-श्रीमहासङ्कर्षण। ताँर अंश 'पुरुष' हय कलाते गणन ॥ ७४ ॥ याँहाके त' कला कहि, तिँहो महाविष्णु। महापुरुषावतारी तेँहो सर्वजिष्णु ॥ ७५ ॥ अनुवाद-अंशके अंशको कला कहते हैं। श्रीबलराम श्रीकृष्णकी प्रतिमूर्ति अर्थात् उनसे अभिन्न हैं। उनका एक स्वरूप महासङ्कर्षण है। महासङ्कर्षणके अंश 'पुरुष' की गणना कलामें होती है। जिनको वह कला कहा है, वे कारणाब्धिशायी महाविष्णु हैं और वे अन्य पुरुषावतारोंके अवतारी हैं तथा सर्वव्यापी हैं ॥ ७३-७५ ॥ अनुभाष्य-'प्रतिमूर्त्ति'-द्वितीय देह (आदिलीला ५/४-५; मध्यलीला २०/१७४ द्रष्टव्य है)। 'महाविष्णु', 'महापुरुषावतारी' शब्दसे कारणाब्धिशायीको समझना चाहिये ॥ ७३-७५ ॥ गर्भोद-क्षीरोद-शायी दोँ हे 'पुरुष' नाम। सेइ दुइ, याँर अंश, - विष्णु, विश्वधाम ॥ ७६ ॥ अनुवाद-महाविष्णु समस्त ब्रह्माण्डोंके आश्रय हैं, दो पुरुषावतार गर्भोदशायी और क्षीरोदशायी उनके अंश हैं ॥ ७६ ॥ अमृतप्रवाहभाष्य-श्रीकृष्णकी विलासमूर्त्ति श्रीबलराम ही मूलसङ्कर्षण हैं। उनके स्वरूपांश परव्योममें सङ्कर्षण हैं। उनके अंश कारणाब्धिशायी महाविष्णु हैं, वे श्रीबलरामके अंशके अंश हैं, इसलिये उन्हें कला कहा जाता है। गर्भोदशायी और क्षीरोदशायी, ये दोनों पुरुष महाविष्णुके अंश हैं॥ ७३-७६ ॥ अनुभाष्य-लघुभागवतामृतमें अवतार वर्णन प्रसङ्ग (संख्या ४) में उद्धृत विष्णुपुराणके (६/८/५९) श्लोकका अनुवाद- "षड्विकारहीन पुरुषोत्तम श्रीकृष्णके जो अंश गुणोंके संसर्गको पाँचवाँ अध्याय | २८९
[ ५/७६-७९ स्वीकार करते हैं अर्थात् प्रकृति और महत्तत्त्वादि प्राकृत तत्त्वोंके ईक्षणकर्त्ता हैं, जो तत्त्वतः एक स्वरूपका त्याग ना करके अनेक स्वांश विभाग करके सभी प्राणियोंके विस्तारकर्त्ता हैं और जो शुद्ध अर्थात् मायासङ्ग-रहित होकर भी अवतीर्ण होकर अशुद्धकी अर्थात् मायासङ्गीकी भाँति प्रकाशित होते हैं तथा जो नित्य चिन्मय हैं, उन्हीं अव्यय पुरुषके प्रति (मैं) सदा प्रणत होता हूँ।” इस श्लोककी श्रीरूप गोस्वामीकृत कारिका— “परमेशांशरूपो यः प्रधानगुणभागिव। तदीक्षादिकृतिर्नानावतारः पुरुषः स्मृतः ॥ ” अर्थात् “परमेश्वरके जो अंश प्रधानके गुणोंसे संलग्न व्यक्तिकी भाँति प्रकृति और महत्तत्त्व आदिके ईक्षणकर्त्ता हैं, जो नाना प्रकारके अवतारोंके प्रकटकर्त्ता हैं, शास्त्रोंमें उनको ही 'पुरुष' नामसे कहा गया है॥”७६॥ लघुभागवतामृतमें पूर्वखण्डमें (३३) सात्वततन्त्र-वचन :— विष्णोस्तु त्रीणि रूपाणि पुरुषाख्यान्यथो विदुः। एकन्तु महतः स्रष्टृ तृतीयं सर्वभूतस्थं तानि ज्ञात्वा विमुच्येत ॥ ७७ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ७७ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—नित्यधाममें विष्णुके तीन रूप हैं। प्रथम—महत्तत्त्वके स्रष्टा कारणाब्धिशायी महाविष्णु; द्वितीय—गर्भोदशायी और समष्टिब्रह्माण्डगत पुरुष; तृतीय—क्षीरोदशायी व्यष्टिब्रह्माण्डगत पुरुष, वे प्रत्येक जीवके अन्तर्यामी ईश्वर और परमात्मा हैं। इन तीनोंको तत्त्वसे जान लेनेपर जीव जड़बुद्धिसे मुक्त हो जाता है॥ ७७॥ अनुभाष्य—विष्णोस्तु पुरुषाख्याणि त्रीणि रूपाणि विदुः। अथ तेषु एकम् (आद्यं) तु महतः (महत्तत्त्वस्य) स्रष्टृ रूपाणि ज्ञात्वा विमुच्यते (मायाबन्धनात् विज्ञो मुक्तो भवति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७७॥ मत्स्यादि समस्त अवतारोंके अंशी कारणोदशायी :— यद्यपि कहिये ताँरे कृष्णेर 'कला' करि। मत्स्य-कूर्माद्यवतारेर तिँहो अवतारी ॥ ७८ ॥ अनुवाद—यद्यपि कारणोदशायी विष्णुको श्रीकृष्णकी 'कला' कहा जाता है, तो भी मत्स्य-कूर्मादि अवतारोंके ये अवतारी हैं॥७८॥ श्रीमद्भागवत (१/३/२८)— एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्। इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृड़यन्ति युगे युगे ॥ ७९ ॥ अनुवाद—राम-नृसिंहादि, पुरुषावतारके अंश या कला (अंशके अंश) हैं, किन्तु श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। दैत्योंके द्वारा पीड़ित लोगोंकी प्रत्येक युगमें ये (अवतार) रक्षा करते हैं॥७९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आदिलीला २/६७ द्रष्टव्य है॥७९॥ २९० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/८०-८१ ] तीन पुरुषावतारोंके कार्य :- सेइ पुरुष सृष्टि-स्थिति-प्रलयेर कर्त्ता। नाना अवतार करे, जगतेर भर्त्ता॥८०॥ अनुवाद—वे पुरुष सृष्टि, पालन और प्रलयके कर्त्ता हैं, वे नाना अवतार ग्रहण करते हैं और वे जगत्का पालन करनेवाले हैं॥८०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जगत्पालकरूपमें वे पुरुषावतार क्षीरोदशायी हैं॥८०॥ अनुभाष्य—(भाः ३/१/५)— “एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम्। यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देव-तिर्यङ्-नरादयः।” अर्थात् “वे कारणाब्धिशायीरूपमें सृष्टि-स्थिति-प्रलयके कारण हैं, गर्भोदशायीरूपमें विभिन्न अवतारोंका सूतिकाधाम (उद्गमस्थल) और क्षीरोदशायीरूपमें क्षौणी (जगत्) के भर्त्ता हैं॥८०॥ अवतारगण अंशमात्र :- सृष्ट्यादि-निमित্তে येइ अंशेर अवधान। सेइ त' अंशেরে कहि 'अवतार' नाम॥८१॥ अनुवाद—भगवान् श्रीकृष्णके जो अंश जगत्की सृष्टि-पालन-संहारके लिये प्रकट होते हैं, उनको 'अवतार' कहा जाता है॥८१॥ अनुभाष्य—लघुभागवतामृतमें अवतार-लक्षण वर्णन प्रसङ्गमें प्रथम संख्यामें— “पूर्वोक्ता विश्वकार्यार्थमपूर्वा इव चेत् स्वयम्। द्वारान्तरेण वाविःस्युरवतारास्तदा स्मृताः॥ तच्च द्वारं तदेकात्मरूपस्तद्भक्त एव च। शेषशायादिको यद्वद् वसुदेवादिकोऽपि च॥” अर्थात् “पहले वर्णन किये गये स्वयंरूप श्रीकृष्ण विश्वकार्यके लिये स्वयं अथवा द्वारोंके द्वारा आविर्भूत होनेपर उनको 'अवतार' कहा जाता है। वे 'द्वार' दो प्रकारके हैं—तदेकात्मरूप (जैसे शेषशायी) और भक्त (जैसे वसुदेवादि)।” श्रीबलदेव विद्याभूषणकृत टीकामें— “स्वयम् अद्वारकत्या, द्वारान्तरेण वा जगति आविः स्युः, तदा अवताराः स्मृताः। अप्रपञ्चात् प्रपञ्चेऽवतरणं खल्ववतारः। सद्बारकस्तु—यथा शेषशायिनः कारणार्णवशयात् गर्भोदकशयः, यथा वसुदेवात् कृष्णः, दशरथात् रामः। कार्यं—प्रकृतिक्षोभ-महदाद्युत्पादनं, दुष्टविमर्द्देन देवादीनां सुखवर्धनं, समुत्कण्ठितानां साधकानां स्वसाक्षात्कारेण प्रेमानन्दवितरणं, विशुद्धभक्तिप्रचारणञ्च, तदर्थमित्यर्थः।” अर्थात् “भगवत्स्वरूप जब स्वयं अर्थात् अद्वारक-रूपमें (अर्थात् किसीका आश्रय स्वीकार ना करके स्वयं ही) अथवा किसीके द्वारा जगत्में आविर्भूत होते हैं, तब उनको अवतार कहा जाता है। वैकुण्ठधामसे प्रपञ्चमें अवतीर्ण होनेवाले ही अवतार कहलाते हैं। श्रीमत्स्य, श्रीहंस आदि अद्वारक-रूपमें आविर्भूत हुए। सद्बारक-अवतार; जैसे—शेषशायी श्रीकारणोदशायीसे श्रीगर्भोदकशायी, और जैसे—श्रीवसुदेवसे श्रीकृष्णचन्द्र, श्रीदशरथसे श्रीरामचन्द्र आदि। अवतारगण विभिन्न कार्योंके उद्देश्यसे अवतीर्ण होते हैं, जैसे—प्रकृतिको क्षुभितकर महत्तत्त्वादिका उत्पादन पाँचवाँ अध्याय | २९१