श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
17/34-45 ] अनुवाद-तत्पश्चात् महाप्रभुने श्रीवासके घरपर एक वर्षतक निरन्तर रात्रिकालमें सङ्कीर्त्तन किया ॥ ३४ ॥ द्वेषी-पाषण्डी व्यक्तियोंका प्रवेश निषेध :- कपाट दिया कीर्त्तन करे परम आवेशे। पाषण्डी हासिते आइसे, ना पाय प्रवेशे ॥ ३५ ॥ श्रीवासके प्रति ईर्ष्या और विद्वेष :- कीर्त्तन शुनि' बाहिरे तारा ज्वलि' पुड़ि' मरे। श्रीवासेरे दुःख दिते नाना युक्ति करे ॥ ३६ ॥ अनुवाद-द्वार बन्द करके महाप्रभु परमावेशमें सङ्कीर्त्तन करते थे। पाषण्डी लोग उनका उपहास करनेके लिये आते, परन्तु द्वार बन्द होनेके कारण वे भीतर प्रवेश नहीं कर पाते। वे बाहरसे ही कीर्त्तन सुनकर ईर्ष्याके कारण जल मरते थे। तब वे श्रीवासको दुःख देनेके लिये अनेक प्रकारकी युक्तियाँ करने लगे ॥ ३५-३६ ॥ श्रीवासके विरुद्ध गोपाल-चापालका काण्ड :- एकदिन विप्र, नाम-'गोपाल चापाल'। पाषण्डि-प्रधान सेइ दुर्मुख, वाचाल ॥ ३७ ॥ भवानी-पूजार सब सामग्री लञा। रात्रे श्रीवासेर द्वारे स्थान लेपाञा ॥ ३८ ॥ अनुवाद-एक दिन रात्रिमें पाषण्डियोंमें प्रधान दुर्वचन और अधिक बोलनेवाला 'गोपाल-चापाल' नामका एक ब्राह्मण भवानी-पूजाकी सारी सामग्री लाया और उसने श्रीवास पण्डितके घरके द्वारके बाहर भूमिको लेपकर वह सामग्री रख दी ॥ ३७-३८ ॥ अनुभाष्य-चैतन्यभागवतमें 'गोपाल-चापाल' का कोई वृत्तान्त प्राप्त नहीं होता है ॥ ३७ ॥ श्रीवासको शक्तिके उपासक दिखलानेकी चेष्टा :- कलार पात उपरे थुइल ओड़-फुल। हरिद्रा, सिन्दूर आर रक्तचन्दन, तण्डुल ॥ ३९ ॥ मद्यभाण्ड-पाशे धरि' निज-घरे गेल। प्रातःकाले श्रीवास ताहा त' देखिल ॥ ४० ॥ श्रीवासको शक्तिका उपासक सिद्ध करनेकी चेष्टा :- बड़ बड़ लोकेर आनिल बोलाइया। सबारे कहे श्रीवास हासिया हासिया ॥ ४१ ॥ "नित्य रात्रे करि आमि भवानी-पूजन। आमार महिमा देख, ब्राह्मण-सज्जन ॥" ४२ ॥ अनुवाद-वह केलेके पत्तेके ऊपर जवा-पुष्प, हल्दी, सिन्दूर, लाल-चन्दन, चावल और साथमें मदिराका पात्र रखकर अपने घर चला गया। प्रातःकाल श्रीवासने उठकर जब उस सामग्रीको देखा, तो वे पड़ोसके सभी सम्माननीय व्यक्तियोंको बुलाकर हँसते-हँसते कहने लगे, "हे ब्राह्मणों ! हे सज्जनों ! मेरी महिमा देखो। मैं प्रत्येक रात्रिमें भवानीकी पूजा करता हूँ ॥" ३९-४२ ॥ अनुभाष्य-'बोलाइया'-बुलाकर ॥ ४१ ॥ स्थानीय सज्जन व्यक्तियोंके मनमें क्षोभ और स्थान-शुद्धिकरण :- तबे सब शिष्टलोक करे हाहाकार। 'ऐछे कर्म हेथा कैल कोन् दुराचार ॥' ४३ ॥ हाड़िके आनिया सब दूर कराइल। जल-गोमय दिया सेइ स्थान लेपाइल ॥ ४४ ॥ अनुवाद-तब सब सज्जन लोग हाहाकार करके कहने लगे, "किस दुराचारीने ऐसा नीच कर्म किया है?" उन्होंने जमादारको बुलवाकर वह सब सामग्री दूर फिंकवा दी और जल तथा गोबरसे उस स्थानको लीपकर शुद्ध किया ॥ ४३-४४ ॥ वैष्णव-अपराधके फलस्वरूप गोपाल-चापालको कोढ़ :- तिन दिन रहि' सेइ गोपाल-चापाल। सर्वाङ्गे हइल कुष्ठ, बहे रक्तधार ॥ ४५ ॥ अनुवाद-तीन दिन बाद उस गोपाल-चापालके सभी अङ्गोंमें कुष्ट रोग हो गया और उनमेंसे रक्त बहने लगा ॥ ४५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिस समय महाप्रभु श्रीवास सतरहवाँ अध्याय | 227
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आङ्गनमें द्वार बन्द करके कीर्तन-आनन्दका आस्वादन करते थे, उस समय नगरके अनेक बहिर्मुख ब्राह्मण वैष्णवोंका परिहास करनेके लिये अनेक प्रकारसे चेष्टा करने लगे। 'गोपाल-चापाल' नामका कोई एक वाचाल भट्टाचार्य देवी-पूजाकी सामग्री, केलेका पत्ता, जवाफूल और लाल-चन्दनादि मदिराके बर्तनके साथ उस बन्द द्वारके बाहर रखकर चला गया। प्रातःकालमें श्रीवासपण्डितने उसे देखकर परिहास करते हुए सभीसे कहा, — 'देखो देखो, मैं प्रत्येक रात्रिमें भवानीकी पूजा करता हूँ, इसके द्वारा मेरे 'शाक्त' होनेके परिचयकी जो महिमा है, उसे आप लोग जान लें।' सभी सज्जन लोग उसे देखकर बहुत दुःखी हुए और उन्होंने जमादारको बुलाकर मंदिरादि गन्दी वस्तुओंको दूर फिंकवा दिया। तब जल और गोबरके द्वारा उस स्थानको लीपकर शुद्ध किया। इस वैष्णवापराधके कारण गोपाल-चापालको रक्तस्राव होनेवाला कुष्टरोग हो गया ॥ 35-45 ॥
सर्वाङ्ग बेड़िल कीटे, काटे निरन्तर। असह्य वेदना, दुःखे ज्वलये अन्तर ॥ 46 ॥
अनुवाद—उसके सभी अङ्गोंमें कीड़े पड़ गये, जो उसे निरन्तर काटने लगे और उसको असहनीय पीड़ा होने लगी। उस दुःखकी ज्वालासे उसका अन्तःकरण जलने लगा ॥ 46 ॥
गङ्गातटपर वास और महाप्रभुसे उद्धार-कामना :— गङ्गाघाटे वृक्षतले रहे त' बसिया। एक दिन बले किछु प्रभुके देखिया ॥ 47 ॥ “ग्राम-सम्बन्धे आमि तोमार मातुल। भागिना, मुइ कुष्ठव्याधिते हञाछि व्याकुल ॥ 48 ॥ लोक सब उद्धारिते तोमार अवतार। मुञि बड़ दुःखी, मोरे करह उद्धार ॥” 49 ॥
अनुवाद—[कुष्टरोग संक्रामक रोग होनेके कारण वह ग्रामसे निकाल दिया गया था, इसलिये] वह गङ्गाके तटपर एक वृक्षके नीचे रहने लगा। एक दिन उसने महाप्रभुको देखकर उनसे कहा, — “ग्रामके सम्बन्धसे मैं तुम्हारा मामा लगता हूँ। हे भाञ्जे ! मुझे यह कुष्ट रोग हो गया है, जिसके कारण मैं बहुत कष्टमें हूँ। लोगोंका उद्धार करनेके लिये तुम्हारा यह अवतार हुआ है। मैं बहुत दुःखी हूँ, मेरा भी उद्धार करो ॥" 47-49 ॥
उसके वैष्णवापराधी होनेके कारण महाप्रभुके क्रोधपूर्ण वचन और उद्धारके लिये असम्मति :— एत शुनि' महाप्रभुर हइल क्रु क्रोधावेशे बले तारे तर्ज्जन-वचन ॥ 50 ॥ “आरे पापि, भक्तद्वेषि, तोरे ना उद्धारिमु। कोटिजन्म एड् मते कीड़ाय खाओयाइमु ॥ 51 ॥ श्रीवासे कराइलि तुइ भवानी-पूजन। कोटि जन्म हबे तोर रौरवे पतन ॥ 52 ॥ पाषण्डी संहारिते मोर एइ अवतार। पाषण्डी संहारि' भक्ति करिमु सञ्चार ॥” 53 ॥
अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुको क्रोध आ गया और क्रोधके आवेशमें उसे डाँटते हुए कहा, — “अरे पापी, भक्तद्वेषी ! मैं तुम्हारा उद्धार नहीं करूँगा। करोड़ों जन्म इसी प्रकार कीड़ोंके द्वारा तुम्हारे शरीरको कटवाऊँगा। तुमने श्रीवासपर भवानी पूजाका दोष लगाया है, करोड़ों जन्म तुम्हें रौरव नरक भोगना पड़ेगा। पाषण्डियोंके संहारके लिये ही मेरा यह अवतार हुआ है। पाषण्डियोंका संहार करके मैं जगत्में भक्तिका सञ्चार करूँगा ॥” 50-53 ॥
अनुभाष्य—अवैष्णव लोग ही भवानीकी पूजा करते हैं, यह वैष्णवोंका कार्य नहीं है। उसकी निन्दा करके महाप्रभुने बतलाया है कि अपने हृदयमें बहु-ईश्वरवादका पोषण करनेवाले अर्थात् अनेक देव-देवीकी उपासनाके पक्षपाती प्राकृत बिद्ध-वैष्णवोंका (जो शुद्ध वैष्णव नहीं हैं, उनका) सङ्ग वास्तवमें 'दुःसङ्ग' ही है॥ 52 ॥
228 | श्रीचैतन्यचरितामृत
17/54-61 ] वैष्णवापराधीका निरन्तर कष्ट भोग करनेके कारण सहज मृत्यु नहीं :- एत बलि' गेला प्रभु करिते गङ्गास्नान। सेइ पापी दुःख भोगे, ना याय पराण ॥ 54 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु गङ्गास्नानके लिये चले गये। वह पापी बहुत दुःख भोगता रहा, परन्तु उसके प्राण नहीं निकलते थे॥54॥ अनुभाष्य—'भोगे'—भोग रहा था॥54॥ महाप्रभुके पुनः आनेपर उसकी शरणागति :- संन्यास करिया यबे प्रभु नीलाचले गेला। तथा हैते यबे कुलिया ग्रामे आइला ॥ 55 ॥ तबे सेइ पापी प्रभुर लइल शरण। हित-उपदेश कैल हइया करुण ॥ 56 ॥ श्रीवास पण्डितसे अपराध-क्षमा प्रार्थनाके लिये महाप्रभुका उपदेश :- “श्रीवास पण्डितेर स्थाने आछे अपराध। तथा याह, तेंहो यदि करेन प्रसाद ॥ 57 ॥ शरणागतिके बाद पुनः पापाचरणका निषेध :- तबे तोमार हबे एइ पाप-विमोचन। यदि पुनः ऐछे नाहि कर आचरण॥" 58 ॥ अनुवाद—संन्यास लेनेके बाद महाप्रभु नीलाचल चले गये और वहाँसे जब वे कुलिया लौटकर आये, तब उस पापीने उनकी शरण ग्रहण की। महाप्रभुने करुणा करके उसके हितके लिये उपदेश दिया,—“श्रीवास पण्डितके चरणोंमें तुम्हारा अपराध हुआ है, इसलिये उनके पास जाकर क्षमा याचना करो। यदि वे तुमपर कृपा करेंगे और पुनः ऐसे पापका आचरण नहीं करोगे, तो तुम्हारी इस पापसे मुक्ति हो जायेगी॥”55-58॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘कुलियाग्राम’—गङ्गाके पूर्व तटपर उस समय नवद्वीप था और गङ्गाके दूसरी ओर कुलियाग्राम था, जिसे अब नवद्वीप कहते हैं॥55॥ अनुभाष्य—‘कुलिया’-ग्राम अर्थात् जिसे अब नवद्वीप शहर कहते हैं। ‘सबे गङ्गा मध्ये नदीयाय-कुलियाय’— चैःभाः अन्त्यखण्ड, 3/380; कुलिया गङ्गाके पश्चिम तटपर और नवद्वीप पूर्व तटपर था। ‘भक्तिरत्नाकर’—बारहवीं तरङ्ग, ‘चैतन्य-चरित महाकाव्य’, ‘चैतन्य-चन्द्रोदय’ नाटक और ‘चैतन्यभागवत’ में गङ्गाके पश्चिम तटपर स्थित कुलियाका उल्लेख द्रष्टव्य है। कोलद्वीपके अन्तर्गत कुलिया-ग्राममें आजतक ‘कुलियार गञ्ज’ नामक एक पल्ली (मोहल्ला) है; ‘कुलियार दह’ नामक जो जलस्रोत है, वह इस समय नवद्वीप शहरमें है। महाप्रभुके समय गङ्गाके पश्चिम तटपर जो ‘कुलिया’ और ‘पहाड़पुर’ नामक ग्राम थे, वे ‘बाहिर द्वीप’ के अन्तर्गत थे। नवद्वीप उस समय गङ्गाके पूर्व तटपर था, जिसे अब ‘अन्तर्द्वीप’ कहते हैं। वह श्रीमायापुरमें ‘द्वीपेर मठ’ के नामसे अभी भी प्रसिद्ध है। काँचड़ा-पाड़ाके निकट जो ‘कुलिया’ नामक गाँव है, वह उपरोक्त कुलिया ग्राम अथवा ‘अपराध-भञ्जन पाट’ नहीं है। धामविद्वेषके कारण कल्पना और भ्रमवश कुछेक वर्षोंसे वैसी मिथ्या धारणाकी उत्पत्ति हुई है॥55॥ गोपाल-चापालकी श्रीवास-चरणोंकी शरण ग्रहण और अपराध-मोचन :- तबे विप्र लइल श्रीवासेर शरण। ताँहार कृपाय हैल पाप-विमोचन ॥ 59 ॥ अनुवाद—तब उस ब्राह्मणने श्रीवास पण्डितकी शरण ग्रहण की और उनकी कृपासे उसकी पापसे मुक्ति हुई॥59॥ और एक दुर्बुद्धि ब्राह्मणके द्वारा महाप्रभुको शाप-प्रदान-कार्य :- आर एक विप्र आइल कीर्त्तन देखिते। द्वारे कपाट,—ना पाइल भितरे याइते ॥ 60 ॥ फिरि' गेल विप्र घरे मने दुःख पाञा। आर दिन प्रभुके कहे गङ्गाय देखिया ॥ 61 ॥ सतरहवाँ अध्याय | 229
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“शापिब तोमारे मुञि, पाञाछि मनोदुःख।” पैता छिण्डिया शापे प्रचण्ड दुर्मुख ॥ 62 ॥ “संसार-सुख तोमार हउक विनाश।” शाप शुनि' महाप्रभुर हइल उल्लास ॥ 63 ॥ अनुवाद-कीर्तनको देखनेके लिये एक और ब्राह्मण आया था, परन्तु द्वार बन्द होनेके कारण वह भीतर नहीं जा सका। वह मन-ही-मन दुःखी होकर अपने घर लौट गया। वह ब्राह्मण कटु भाषी और दूसरोंको शीघ्र ही शाप देनेवाला था। बादमें एक दिन उसने महाप्रभुको गङ्गा तटपर देखकर कहा,-“मैं तुम्हें शाप दूँगा, क्योंकि तुमने मेरे मनको कष्ट दिया है।” उसने अपने जनेऊको तोड़कर महाप्रभुको शाप दिया,-“तुम्हारा संसार सुख नष्ट हो जाय।” इसे सुनकर महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए॥ 60-63॥ प्रभुर शाप-वार्त्ता सुने हञा श्रद्धावान्। ब्रह्मशाप हैते तार हय परित्राण ॥ 64 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके प्रति ब्राह्मणके शापकी कथा जो श्रद्धापूर्वक सुनेगा, ब्रह्मशापसे भी उसकी मुक्ति हो जायेगी ॥ 64॥ अनुभाष्य-मायाधीश महाप्रभुको शापादिके अधीन अथवा यमदण्ड तथा कर्मफलके अधीन जीव समझकर पाषण्डी होनेकी अपेक्षा उन्हें नित्य सेव्य परमेश्वर जाननेपर जीवोंकी अनादि-कृष्णबहिर्मुखता दूर होती है। यह घटना चैतन्यभागवतमें नहीं है॥ 64॥ मुकुन्दको दण्ड देकर उसपर कृपा :- मुकुन्द-दत्तेरे कैल दण्ड-परसाद। खण्डिल ताहार चित्ते सब अवसाद ॥ 65 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने मुकुन्द-दत्तपर दण्डरूप कृपा की और उनके चित्तके सभी दुःखोंको दूर किया॥ 65॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुके महाप्रकाशके दिन मुकुन्ददत्त द्वारके बाहर खड़े थे। महाप्रभुने एक-एक करके अन्य सभी भक्तोंपर कृपा की। उन भक्तोंने महाप्रभुको बतलाया कि मुकुन्ददत्त बाहर खड़े हैं। तब महाप्रभुने कहा,-'मैं मुकुन्ददत्तपर शीघ्र ही प्रसन्न नहीं होऊँगा, क्योंकि वह भक्तोंको तो शुद्धभक्तिकी कथा कहता है और मायावादियोंके पास जाकर योगवाशिष्ठमें लिखे मायावादको स्वीकार करता है। उसके इस आचरणसे मुझे सदा दुःख होता है।' मुकुन्ददत्तने बाहर यह बात सुनकर कहा,-'मैं धन्य हूँ, क्योंकि जगत्-तारण महाप्रभु यदि शीघ्र कृपा नहीं करेंगे, तो कभी-न-कभी तो वे मुझपर अवश्य ही कृपा करेंगे।' तब महाप्रभुने मुकुन्ददत्तका दृढ़तापूर्वक मायावादियोंके सङ्गके परित्यागका निश्चय जानकर उसी क्षण उनको अपने पास बुलाकर अपनी प्रसन्नता प्रकाश की। इस कार्यसे महाप्रभुने मुकुन्ददत्तको मायावादियोंके सङ्गरूप अपराधका दण्ड प्रदानकर उन्हें शुद्धभक्तसङ्गके फलस्वरूप कृपा दी॥ 65॥ अनुभाष्य-'मुकुन्दके ऊपर दण्ड-रूपी कृपा'-चैःभाः मध्यखण्ड, दसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ 65॥ श्रीअद्वैतको दण्डरूपी कृपा :- आचार्य-गोसाञिरे प्रभु करे गुरुभक्ति। ताहाते आचार्य बड़ हय दुःखमति ॥ 66 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीअद्वैताचार्यका गुरुकी भाँति सम्मान करते थे, जिससे श्रीअद्वैताचार्यके मनमें बहुत दुःख होता था॥ 66॥ भङ्गी करि' ज्ञानमार्ग करिल व्याख्यान। क्रोधावेशे प्रभु तारे कैल अवज्ञान ॥ 67 ॥ तबे आचार्य-गोसाञिर आनन्द हइल। लज्जित हइया प्रभु प्रसाद करिल ॥ 68 ॥ अनुवाद-जान-बूझकर श्रीअद्वैताचार्य ज्ञानमार्गकी श्रेष्ठताकी व्याख्या करने लगे। यह सुनकर महाप्रभुने क्रोधके आवेशमें उनको दण्ड दिया, जिससे श्रीअद्वैताचार्यको
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बहुत आनन्द हुआ। तब महाप्रभुने लज्जित होकर उनपर कृपा की॥67॥ अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुके गुरु श्रीईश्वरपुरीके गुरुभ्राता थे, इस सम्बन्धसे महाप्रभु स्वयंको दास मानकर उनकी गुरुके समान भक्ति करते थे। श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुके द्वारा इस प्रकार गौरव प्रदान किये जानेपर दुःखी होते थे और उनसे दण्डरूपी कृपा पानेके लिये शान्तिपुरमें कुछ दुर्भागे व्यक्तियोंको ज्ञानमार्गकी श्रेष्ठताकी व्याख्या करने लगे। यह सुनकर महाप्रभुने क्रोधमें आविष्ट होकर शान्तिपुर जाकर श्रीअद्वैतप्रभुकी अच्छी प्रकारसे पिटाईयी की। वह पिटाईयी खाकर श्रीअद्वैतप्रभु यह कहकर नाचने लगे,–“देखो, आज मेरी इच्छा पूर्ण हुई। महाप्रभु कृपणतापूर्वक मुझे गुरुके समान मानते थे और आज उन्होंने मुझे अपना दास और शिष्य मानकर मेरी मायावादरूप दुर्मतिसे रक्षा करनेकी चेष्टा की।” श्रीअद्वैताचार्यकी यह भङ्गी देखकर महाप्रभु लज्जित हुए और उनके प्रति प्रसन्न हुए॥66-68॥
मुरारि गुप्तकी ऐकान्तिकी श्रीरामनिष्ठा :- मुरारिगुप्त-मुखे शुनि' राम-गुणग्राम। ललाटे लिखिल ताँर 'रामदास' नाम॥69॥
अनुवाद- महाप्रभुने मुरारिगुप्तके मुखसे श्रीरामचन्द्रके गुणोंका बखान सुनकर उनके माथेपर उनका 'रामदास' नाम लिख दिया॥69॥ अमृतप्रवाह भाष्य- एक दिन महाप्रभुने राममन्त्रोपासक मुरारिगुप्तको श्रीरामके स्तवका पाठ करनेको कहा। तब मुरारिगुप्तने महाप्रेममें आविष्ट होकर श्रीरामाष्टकका पाठ किया,– “इत्थं निशम्य रघुनन्दनराजसिंहश्लोकाष्टकं स भगवान् चरणं मुरारेः। वैद्यस्य मूर्ध्नि विनिधाय लिलेख भाले त्वं 'रामदास' इति भो भव मत्प्रसादात्॥” “'रघुनन्दनराजसिंहश्लोकाष्टकं' को सुनकर महाप्रभुने अपने चरण मुरारिगुप्तके मस्तकपर रख दिये और उनके माथेपर 'रामदास' लिखकर कहा कि तुम मेरी कृपासे सदाके लिये रामदास हुए हो॥” 69॥
अनुभाष्य- चैतन्यमङ्गल मध्यखण्ड- 'रामं जगत्त्रयगुरूं सततं भजामि।' “एइमते रघुवीराष्टक श्लोक शुनि'। मुरारि-मस्तके पद दिला त' आपनि॥ 'रामदास' बलि' नाम लिखिला कपाले। मोर परसादे तुमि 'रामदास' हइले॥ इहा बलि' राम-रूप देखाइल तारे। स्तव करे मुरारि पड़िया पदतले॥” “'तीनों जगत्के गुरु श्रीरामचन्द्रका मैं निरन्तर भजन करता हूँ, इस प्रकार रघुवीराष्टकका श्लोक सुनकर महाप्रभुने अपने चरणोंको मुरारि गुप्तके मस्तकपर रखा और उनके माथेपर 'रामदास' लिख दिया। तब महाप्रभुने कहा कि मेरी कृपासे तुम 'रामदास' हुए हो। यह कहकर महाप्रभुने उन्हें अपना रामरूप दिखलाया। उसे देखकर मुरारिगुप्त उनकी स्तुति करते हुए उनके चरणोंमें गिर पड़े।” मुरारिगुप्तके प्रति महाप्रभुकी कृपा-चैःभाः मध्यखण्ड, दसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥69॥
श्रीधरके घरमें लोहेके पात्रमें जलपान और वरप्रदान :- श्रीधरेर लौहपात्रे कैल जलपान। समस्त भक्तरे दिल इष्ट वरदान॥70॥
अनुवाद- महाप्रभुने श्रीधरके घरमें उसके टूटे हुए लोहेके पात्रमें जलका पान किया। महाप्रभुने सभी भक्तोंको उनके इष्ट वरको प्रदान किया॥70॥ अमृतप्रवाह भाष्य- प्रथम नगरकीर्त्तन-रात्रिमें काजीका उद्धार करनेके बाद चाँदकाजी कीर्त्तनके साथ-साथ श्रीधरके आङ्गनतक आया था। वहाँपर कीर्त्तनका विश्राम होनेपर महाप्रभुने कृपापूर्वक श्रीधरके टूटे हुए लोहेके पात्रमें जो जल था, उसे 'भक्तके द्वारा दिया गया जल' कहकर उसका पान किया। काजी उस स्थानसे वापिस लौट गया। मायापुरके उत्तर-पूर्वांशमें उस स्थानको अभी भी 'कीर्त्तन-विश्रामस्थान' कहते हैं॥70॥
सतरहवाँ अध्याय | 231
[ 17/70-76 अनुभाष्य-‘श्रीधरके लौह-पात्रमें महाप्रभुके द्वारा अनुवाद—एक दिन महाप्रभुने भक्तोंको नामकी जलपान'—चैःभाः मध्यखण्ड, तेइसवाँ अध्याय द्रष्टव्य महिमा सुनायी। इसे सुनकर एक छात्रने उसमें अर्थवादका है॥ 70 ॥ आरोप किया। नाममें स्तुतिवाद सुनकर महाप्रभुको दुःख हुआ और उन्होंने सभी भक्तोंसे कहा,—“आजसे इसका ठाकुर श्रीहरिदासपर कृपा, शचीमाताके मुख भी मत देखना।” महाप्रभुने तब अपने परिकरोंके अपराध-मोचनका अभिनय :— साथ वस्त्रोंके सहित स्नान किया और वहाँ उन्होंने हरिदास ठाकुरेर करिल प्रसाद। भक्तिकी महिमाकी व्याख्या की—‘ज्ञान, कर्म, योग, आचार्य-स्थाने मातार खण्डाइल अपराध ॥ 71 ॥ धर्मादि साधनोंके द्वारा श्रीकृष्णको वशीभूत नहीं किया अनुवाद—महाप्रभुने हरिदास ठाकुरपर कृपा की जा सकता। श्रीकृष्णको वशमें करनेका एकमात्र उपाय और शचीमाताके द्वारा श्रीअद्वैताचार्यके प्रति हुए अपराधको श्रीकृष्णप्रेम-रस ही है॥'72-75॥ खण्डित करवाया॥ 71 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एकदिन महाप्रभुने भक्तोंको नामकी अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रकाशके दिन महाप्रभुने अपार महिमाका वर्णन किया, उसे सुनकर किसी दुर्भागे हरिदास ठाकुरको आलिङ्गन करके उनको प्रह्लादका छात्रने कहा, - 'यह सब नामकी महिमा वास्तविक नहीं अवतार बतलाकर उन्हें वरदान दिया। है, शास्त्रमें नामका स्तुतिवाद मात्र किया गया है।' इस विश्वरूपके संन्यास लेनेपर शचीमाताने इसका दोष प्रकार नाम-महिमाका अन्य अर्थ करनेसे नाममें श्रीअद्वैताचार्यपर लगाया। इस प्रकार मातासे जो यह 'अर्थवादरूप' नामापराध होता है। नामापराधके समान वैष्णवापराध हुआ, उसे उनके द्वारा श्रीअद्वैताचार्यकी और किसी प्रकारका अपराध उतना भयङ्कर नहीं है। पदधूलि लेकर खण्डन करवाया॥ 71 ॥ उस अपराधी छात्रका मुख भी देखनेका निषेध करके अनुभाष्य—'हरिदास ठाकुरपर कृपा'—चैःभाः मध्यखण्ड, महाप्रभुने अपने परिकरोंके साथ वस्त्र-सहित गङ्गास्नान दसवाँ और 'शचीमातापर महाप्रभुकी कृपा'—चैःभाः मध्यखण्ड, किया। इसका तात्पर्य यह है कि नामापराधीका मुख बाइसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ 71 ॥ देखनेपर वस्त्रोंके साथ ही स्नान करना उचित है—यही इसकी शिक्षा है॥ 72-73 ॥ एक पाषण्डी छात्रका श्रीनाममें अर्थवाद :— भक्तगणे प्रभु नाम-महिमा कहिल। अनुभाष्य—साक्षात् श्रीकृष्णसे अभिन्न श्रीनामप्रभुकी शुनिया पड़ुया ताहाँ अर्थवाद कैल ॥ 72 ॥ महिमाको 'अतिस्तुति' (महिमाको बढ़ा-चढ़ाकर कहा नामे स्तुतिवाद शुनि' प्रभुर हैल दुःख। गया है), 'अप्रकृत' (वास्तवमें नहीं है), इसलिये उसे सबारे निषेधिल,—“इहार ना देखिह मुख॥”73 ॥ 'असत्य' मानकर (नाम और नामीमें) भेद-बुद्धिका नाम सगण वस्त्र-सहित गङ्गास्नान और एकमात्र ही 'अर्थवाद' अथवा (मिथ्या) स्तुतिवाद अथवा निन्दावाद अभिधेय भक्तिकी महिमा-गान :— है। यह केवल पाषण्डता अथवा नास्तिकता अर्थात् सगणे सचेले गिया कैल गङ्गास्नान। केवल ईश्वरका विरोध मात्र ही है॥ 72 ॥ भक्तिर महिमा ताहाँ करिल व्याख्यान ॥ 74 ॥ श्रीमद्भागवत (11/14/20)— ज्ञान-कर्म-योग-धर्मे नहे कृष्ण वश। ना साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव। कृष्णवश-हेतु एक—कृष्णप्रेम-रस ॥ 75 ॥ न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥ 76 ॥ 232 | श्रीचैतन्यचरितामृत
17/76–78 ] अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे उद्धव! मेरे प्रति की गयी प्रबल भक्ति जिस प्रकार मुझे वशीभूत कर सकती है, अष्टाङ्ग-योग, अभेद-ब्रह्मवादरूप सांख्यज्ञान, ब्राह्मणोंका स्वशाखा-अध्ययनरूप स्वाध्याय, सब प्रकारकी तपस्या और त्यागरूप संन्यासादिके द्वारा मुझे वैसा वशीभूत नहीं किया जा सकता है॥७६॥ अनुभाष्य—हे उद्धव, योगः (मरुन्नियमज-यमनियमासन- प्राणायामादिः), सांख्यं (कपिलकथितं तत्त्वसंख्यानं) धर्मः (वर्णाश्रम धर्मः), स्वाध्यायः (वेदाध्ययनं), तपः, त्यागः (संन्यासः), [तथा] मां न साधयति (वशीकरोति) यथा मम उर्जिता (वर्द्धिता) भक्तिः [मां वशीकरोति]। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७६॥ मुरारिकी प्रशंसा :— मुरारिके कहे प्रभु,—कृष्ण वश कैला। शुनिया मुरारि श्लोक कहिते लागिला॥७७॥ अनुवाद—अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥७७॥ अनुभाष्य—महाप्रभुने मुरारिगुप्तसे कहा,—'तुमने अपनी प्रेमाभक्तिके द्वारा श्रीकृष्णको वशीभूत कर लिया है।' मुरारिगुप्तने 'सुदामा'-विप्रके द्वारा कहे गये भागवतके श्लोकका उच्चारण करके उसका उत्तर दिया॥७७॥ श्रीमद्भागवत (10/81/16)— क्वाहं दरिद्रः पापीयान् क्व कृष्णः श्रीनिकेतनः। ब्रह्मबन्धुरिति स्माहं बाहुभ्यां परिरम्भितः॥७८॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—(सुदामाने कहा)—कहाँ मैं अति पापी दरिद्र, कहाँ श्रीनिकेतन (लक्ष्मीके निवासस्थान) श्रीकृष्ण! उन्होंने मुझे अयोग्य ब्राह्मण-पुत्र जानकर मेरा आलिङ्गन किया, यह अति आश्चर्यका विषय है॥७८॥ अनुभाष्य—घर जानेको तत्पर 'श्रीसुदामा' अथवा 'श्रीदाम' विप्रकी मन-ही-मनमें उक्ति— दरिद्रः (समृद्धिरहितः) पापीयान् (पापसहितः) अहं क्व? श्रीनिकेतनः (ऐश्वर्यमूलविग्रहः निखिल-पुण्याश्रयः) कृष्णः क्व? अहं ब्रह्मबन्धुः (शौक्रविप्राधमः) [तया कृष्णेन] बाहुभ्यां परिरम्भितः (आलिङ्गितः)। (अयोग्ये मयि ब्रह्मबन्धौ कृष्णालिङ्गनं कदापि न सम्भवतीति कृष्णस्य महत्त्वमेव दर्शितं वक्तु श्लोक भावानुवाद—"कहाँ मैं दरिद्र और पापी? और कहाँ ऐश्वर्यके मूल विग्रह तथा समस्त पुण्योंके आश्रय श्रीकृष्ण? परन्तु श्रीकृष्णने मुझे ब्रह्मबन्धु (अर्थात् जन्मके कारण ब्राह्मण, परन्तु गुणोंमें अधम) जानकर अपनी भुजाओंसे मेरा आलिङ्गन किया। (मेरा अयोग्य ब्रह्मबन्धु होना श्रीकृष्णके आलिङ्गनका कारण नहीं है, अपितु यह श्रीकृष्णकी ही महिमा है, ऐसा वचन सुदामाकी दैन्यताका सूचक है।)।" महाप्रभुके द्वारा कहे गये वाक्यको अनुकूलरूपसे स्वीकार करनेपर यह अर्थ होता है कि श्रीकृष्णको वशीभूत करनेकी शक्ति मुरारिगुप्तमें नहीं है, श्रीकृष्ण अपने भक्तवात्सल्य-गुणसे ही अयोग्य दासके किसी एक तुच्छ गुणको लक्ष्य करके उसे अकल्पनीय सौभाग्यका अधिकारी बनाते हैं। ऐसी भावनासे ही मुरारिगुप्तने इस श्लोकका उच्चारण किया गया है। महाप्रभुके द्वारा कहे गये वाक्यको अपने हितके प्रतिकूल समझकर स्वयंको अयोग्य दिखलानेके उद्देश्यसे यह श्लोक उच्चारण करनेके पश्चात् मुरारि गुप्तने कहा,—'मैं श्रीकृष्णको वशमें करनेमें सम्पूर्ण अयोग्य हूँ, मैं उन्हें वशीभूत नहीं कर पाया।' सुदामा-विप्रने अपनी दरिद्रता, पापमें प्रवृत्ति, अ-ब्राह्मणतादि अपनी अयोग्यताका उल्लेख करके श्रीकृष्ण-आलिङ्गन रूप अपने सौभाग्यको सूचित किया था, किन्तु मुरारि गुप्तकी भावना इस प्रकार है,—'मैं इस प्रकारकी भावनाके भी अयोग्य हूँ।' दशम-टिप्पणी 'वैष्णव-तोषणी' में इस श्लोकका अर्थ इस प्रकार कहा गया है,— “क्वेति। पापीयान् दुर्भगः; कृष्ण साक्षात् भगवान्; एवं कृष्णत्व-पापीयस्त्वयोस्तथा दारिद्र्य-श्रीनिकेतत्वयोर्विरोधः, तथापि सतरहवाँ अध्याय | 233
[ 17/77-78
ब्रह्मबन्धुः विप्रकुलजात इति बाहुभ्यां द्वाभ्यामेव परिरम्भितः परिरब्धः। 'स्म'-विस्मये। एवं परिरम्भे विप्रत्वमेव कारणमुक्तं, न तु सख्यं, तत्रात्मनोऽतीवायोज्यत्वमननात्। अतो भगवतो ब्रह्मण्यतैव श्लाघिता, न तु भक्तवत्सलतापीति।" “'क्वाहं दरिद्रः'-श्लोकका अर्थ बतला रहे हैं। सुदामा कह रहे हैं,-"मैं 'पापीयान्' अर्थात् भाग्यहीन हूँ और श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् हैं। इस प्रकार श्रीकृष्णत्व और पापीयत्व जिस प्रकार परस्पर विरुद्ध हैं, उसी प्रकार दारिद्र्य और श्रीनिकेतनत्व भी हैं। तथापि मैं अधम, ब्राह्मण-कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ, इसी कारण 'बाहुभ्यां'-दो बाहुओंके द्वारा 'परिरम्भित'-आलिङ्गित हुआ हूँ। मेरा ब्राह्मण कुलमें जन्म लेना ही उस आलिङ्गनका कारण है, मेरा सखाभाव नहीं।" यहाँपर उन्होंने अपनी अतीव अयोग्यताका मनन करनेके कारण ऐसा कहा है। इसलिये इस श्लोकमें भगवान्की ब्राह्मणोंके प्रति प्रीतिकी ही प्रशंसा हुई है, उनके भक्त-वात्सल्यकी नहीं। इससे पहलेवाले श्लोकमें सुदामाका भाव इस प्रकार कहा गया है,-जिस वक्षपर श्रीकृष्णकी प्राणोंसे अधिक प्रिया कमला विराजती हैं, उस वक्षके द्वारा उनकी ब्राह्मण-सम्बन्धी प्रीतिके वशीभूत होकर ब्रह्मण्यदेवने मेरे जैसे लक्ष्मीहीन दरिद्रका आलिङ्गन किया। इस श्लोकके भावानुसार ही उद्धृत श्लोककी टीकामें कहा गया है,-'ब्राह्मण होना ही आलिङ्गनका कारण है, सखा होना नहीं; तथा दैन्यताके कारण सुदामा विप्र स्वयं नितान्त अयोग्य हैं, वे स्वयं ब्राह्मणका धर्म पालन करने योग्य नहीं हैं, केवल भगवान्ने ही ब्राह्मणकी श्रेष्ठता और अपनी गरिमाके प्रदर्शनके लिये एक ब्रह्मबन्धुके लिये भी वैसी ही प्रीति दिखलायी-यही विस्मयका कारण है। सुदामा विप्रने दैन्यवशतः और स्वयंको अधम ज्ञापन करनेके उद्देश्यसे अपने आपको 'ब्रह्मबन्धु' कहकर अपना तिरस्कार किया। तथा ब्रह्मबन्धुके प्रति भी श्रीकृष्णका असामान्य अनुग्रह है, इसको व्यक्त करके उन्होंने अपने दैन्य और ब्राह्मण स्वभावका वास्तविक परिचय दिया। ऐसी दैन्यताके द्वारा सुदामा-विप्रने अपनी महिमाके त्यागका ज्वलन्त आदर्श प्रस्तुत किया। सुदामा ब्रह्मबन्धु अर्थात् पतित ब्राह्मण नहीं हैं, किन्तु ब्रह्मबन्धुत्व रूप विषयान्तर ही [जो सुदामा विप्रकी निज-सम्पत्ति नहीं है अर्थात् वे वास्तवमें ब्राह्मण हैं, परन्तु स्वयंको ब्रह्मबन्धु मान रहे हैं] वही कृष्णप्रीतिका कारण है, उनका अपना महत्त्व अथवा अपनी श्रीकृष्णभक्ति, श्रीकृष्णको उस प्रकारसे वशीभूत नहीं करती। मुरारि गुप्तने भी वैसे भावोंका अवलम्बन करके निज-महत्त्व आवरण करके दैन्य प्रकाशित किया। उस समयके सामाजिक-दृष्टिकोणसे मुरारिगुप्त शूद्रकुलमें उत्पन्न हुए थे और उन्हें 'ब्रह्मबन्धु' भी नहीं कहा जा सकता था। तब भी 'स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा' इस (भाः 1/4/25) श्लोकका तात्पर्य विचार करके मुरारिगुप्तने शूद्रके समान द्विजबन्धुत्वकी भी उपमा ग्रहण की थी। छान्दोग्य उपनिषद्की टीकामें शङ्कराचार्यने 'ब्रह्मबन्धु' की व्याख्या करते हुए कहा है- 'ब्राह्मणान् बन्धून्-व्यपदिशति, न स्वयं ब्राह्मण-वृत्तः।' (भाः 1/7/57)- “वपनं द्रविणादानं स्थानान्निर्यापणं तथा। एष हि ब्रह्मबन्धूनां वधो नान्योऽस्ति दैहिकः ॥” “शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार सिरका मुण्डन कर देना, धन छीन लेना और अपने स्थानसे बाहर निकाल देना-यह सब पतित ब्राह्मणके लिये उसका वध करनेके समान ही हैं। इसके अतिरिक्त सिर काटना आदिके द्वारा ब्राह्मणके शारीरिक-वधकी आज्ञा शास्त्रोंमें नहीं दी गयी है।” कूर्मपुराण (उत्तरभाग 21/28)- “शूद्रप्रेष्यो भृतो राज्ञो वृषलो ग्रामयाजकः। वधबन्धोपजीवी च षड़ेते ब्रह्मबन्धवः ॥" “जो ब्राह्मण शूद्रका दास हो, राजाका सेवक रहा हो, अन्त्यजोंका याजक रहा हो, किसीका वध करके अथवा अपहरण करके आजीविका चलाता हो-ऐसे
234 | श्रीचैतन्यचरितामृत
छह प्रकारके ब्रह्मबन्धु अर्थात् नीच ब्राह्मण कहे गये हैं।” ब्रह्मबन्धु अथवा केवल ब्राह्मणकुलमें जन्म अपनी योग्यताका परिचय नहीं हैं, परन्तु उससे वस्तुभेदका सापेक्षत्व ही प्रमाणित होता है॥ 77-78 ॥ महाप्रभुके द्वारा आमका वृक्ष लगाना और फल-दान कहानी :- एकदिन प्रभु सब भक्तगण लञा। सङ्कीर्त्तन करि' कैसे श्रमयुक्त हञा॥ 79 ॥ एक आम्रबीज प्रभु अङ्गने रोपिल। ततक्षणे जन्मिया वृक्ष बाड़िते लागिल॥ 80 ॥ देखते देखिते वृक्ष लागिल फलिते। पाकिल अनेक फल, सबेइ विस्मिते॥ 81 ॥ शत दुइ फल प्रभु शीघ्र पाड़ाइल। प्रक्षालन करि' कृष्णे भोग लगाइल॥ 82 ॥ रक्त-पीतवर्ण, —नाहि अष्ठि-वल्कल। एकजनेर पेट भरे —खाइले एक फल॥ 83 ॥ अनुवाद-एक दिन महाप्रभु सब भक्तोंको लेकर सङ्कीर्तन करते हुए कुछ थककर बैठ गये। तब महाप्रभुने एक आमके बीजको अङ्गनमें रोपित किया। उसी क्षण ही उससे एक वृक्ष निकला और वह बढ़ने लगा। देखते-ही-देखते उस वृक्षमें फल लगने लगे और अनेक फल पक गये। यह देखकर सभी विस्मित हो गये। तब महाप्रभुने शीघ्र ही दो सौ फल तुड़वाये और उन्हें धोकर श्रीकृष्णको भोग लगाया। वे फल लाल-पीले रंगके थे और उनमें गुठली और छिलका भी नहीं था। एक फल खानेसे ही एक व्यक्तिका पेट भर जाता था ॥ 79-83 ॥ देखिया सन्तुष्ट हैला शचीर नन्दन। सबाके खाओयाल आगे करिया भक्षण॥ 84 ॥ अष्ठि-वल्कल नाहि, —अमृत-रसमय। एक फल खाइले रसे उदर पूरय॥ 85 ॥ एइमत प्रतिदिन फले बारमास। वैष्णव खायेन फल, —प्रभुर उल्लास॥ 86 ॥ एइसब लीला करे शचीर नन्दन। अन्य लोक नाहि जाने बिना भक्तगण॥ 87 ॥ एइ मत बारमास कीर्त्तन-अवसाने। आम्रमहोत्सव प्रभु करे दिने दिने॥ 88 ॥ अनुवाद-उन फलोंको देखकर महाप्रभु सन्तुष्ट हुए और पहले स्वयं फलको खाकर बाकी फलोंको सबको खिलाया। छिलके-गुठलीसे रहित वह फल अमृतके समान रसमय था और उस एक फलके रससे ही पेट भर जाता था। इसी प्रकार बारह मास प्रतिदिन वैष्णवोंने फल खाये, जिसे देखकर महाप्रभुके हृदयमें उल्लास हुआ। महाप्रभुने जो ये सब लीलाएँ की, इन्हें भक्तोंके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं जान सकता है। इस प्रकार बारह मास तक प्रतिदिन कीर्तनके विश्राम होनेपर महाप्रभु आम-महोत्सव करते रहे ॥ 84-88 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसी दिन महाप्रभु भक्तोंके साथ नगर-कीर्तन करते हुए थककर जिस स्थानपर पहुँचे, वहाँपर उस भक्तके आङ्गनमें उन्होंने एक आमके बीजको रोपण किया और उसी क्षण उससे वृक्ष निकला तथा उसपर फल लग गये। तब महाप्रभुने उन आमोंसे आम-महोत्सव किया। वह स्थान आज भी 'आम्रघट्ट' (आम-घाटा) के नामसे प्रसिद्ध है॥ 79-86 ॥ अनुभाष्य-यह घटना चैतन्यभागवतमें नहीं है॥ 79-86॥ कीर्तनके समय महाप्रभुका मेघोंको न बरसनेका आदेश :- कीर्त्तन करिते प्रभु, आइला मेघगण। आपन-इच्छाय कैल मेघ निवारण॥ 89 ॥ सत्रहवाँ अध्याय | 235
[ 17/89–94 अनुवाद—एक दिन जिस समय सङ्कीर्तन चल रहा था, उस समय आकाशमें घनघोर मेघ घिर आये। महाप्रभुकी इच्छासे वे मेघ शीघ्र ही छिन्न-भिन्न हो गये ॥ 89 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एकदिन महाप्रभु (अपने वासस्थानसे) दूर स्थानपर सङ्कीर्तन कर रहे थे, उसी समय आकाशमें घनघोर मेघ छा गये। महाप्रभुने उनको वहाँसे चले जानेकी इच्छा की और मेघोंको जानेकी आज्ञा दी। वे मेघ तत्क्षणात् वहाँसे चले गये। इस कारणसे गङ्गातटकी उस भूमिको 'मेघेर चर' कहते हैं। आजकल गङ्गाका प्रवाह परिवर्तन होनेसे 'बेलपुखुरिया' ग्राम उस 'मेघेर चर' में स्थानान्तरित हो गया है। बेलपुखुरिया पहले जिस स्थानपर था, उसका वर्तमान नाम 'तारणवास' अथवा 'टोटा' हो गया है ॥ 89 ॥ अनुभाष्य—चैतन्यमङ्गल मध्यखण्ड— “दिन अवसान, सन्ध्या धन्य दिगन्तर। आचम्बिते मेघारम्भ गगनमण्डल॥ घन घन गरजय गम्भीर निनादे। देखिया वैष्णवगण गणिल प्रमादे॥ तबे महाप्रभु से मन्दिरा करि' करे। नामगुण-सङ्कीर्त्तन करे उच्चैःस्वरे॥ देवलोक कृतार्थ करिब हेन मने। ऊर्ध्वमुखे चाहे प्रभु आकाशेर पाने॥ दूर गेल मेघगण प्रकाश आकाश। हरिषे वैष्णवगणे बाड़िल उल्लास॥ निरमल भेल शशी-रञ्जित रजनी। अनुगत गुण गाये नाचये आपनि॥” “दिनके ढल जानेपर सन्ध्याका धन्य समय था, तभी गगनमें मेघ एकत्रित होने लगे और गम्भीर गर्जना करने लगे। उसे देखकर वैष्णव भयभीत हो गये। तब महाप्रभु अपने हाथोंमें करताल लेकर उच्च-स्वरसे श्रीकृष्णनाम-गुणका सङ्कीर्तन करने लगे। देवता कीर्तन सुनकर उन्हें कृतार्थ करेंगे, ऐसा मनमें विचार करके वे ऊपर आकाशकी ओर देखने लगे। तभी सभी मेघ वहाँसे दूर चले गये और निर्मल आकाशमें चन्द्रमा उदित हो गया। वैष्णवोंके मनमें हर्ष और उल्लास हुआ तथा महाप्रभु आनन्दसे नाचने लगे ॥ 89 ॥ श्रीवासका विष्णु-सहस्रनाम पाठ :- एकदिन प्रभु श्रीवासे आज्ञा दिल। 'बृहत् सहस्रनाम' पड़, शुनिते मन हैल ॥ 90 ॥ अनुवाद—एक दिन महाप्रभुने श्रीवासको आज्ञा दी कि 'बृहत् सहस्रनाम' सुननेका मेरा मन कर रहा है, इसलिये उसका पाठ करो ॥ 90 ॥ महाप्रभुकी नृसिंहावेश-लीला :- पड़िते आइला स्तवे नृसिंहेर नाम। शुनिया आविष्ट हैला प्रभु गुणधाम ॥ 91 ॥ पाषण्डियोंके एकमात्र दण्डविधाता श्रीनृसिंहके आवेशमें महाप्रभुका पाषण्डियोंको भय-प्रदान :- नृसिंह-आवेशे प्रभु हाते गदा लञा। पाषण्डी मारिते याय नगरे धाइया ॥ 92 ॥ नृसिंह-आवेश देखि' महातेजोमय। पथ छाड़ि' भागे लोक पाञा बड़ भय ॥ 93 ॥ महाप्रभुका क्रोध-सम्वरण और करुणा :- लोक-भय देखि' प्रभुर बाह्य हइल। श्रीवास-गृहेते गिया गदा फेलाइल ॥ 94 ॥ अनुवाद—(सहस्रनाम) पढ़ते-पढ़ते स्तवमें नृसिंह भगवान्का नाम आया, तो उसे सुनकर महाप्रभु नृसिंहके आवेशमें आ गये। उस आवेशमें उन्होंने अपने हाथमें गदा ले ली और पाषण्डियोंको मारनेके लिये नगरमें भागे। उनके महातेजोमय नृसिंह-आवेशको देखकर लोग डरकर मार्ग छोड़कर इधर-उधर भागने लगे। लोगोंको भयभीत देखकर महाप्रभुको बाह्य-ज्ञान हुआ और उन्होंने श्रीवासके घर जाकर गदा फेंक दी ॥ 91-94 ॥ अनुभाष्य-'भागे' - पलायन करना। यह घटना चैतन्यभागवतमें नहीं है ॥ 93 ॥ 236 | श्रीचैतन्यचरितामृत
17/95–101 ]
श्रीवासे कहेन प्रभु करिया विषाद। “लोक भय पाय, — मोर हय अपराध ॥” 95 ॥ अनुवाद—महाप्रभु बहुत दुःखी होकर श्रीवाससे कहने लगे,—“मुझे देखकर लोग भयभीत हो गये, मुझसे यह अपराध हो गया॥”95॥ अनुभाष्य—चैतन्यमङ्गल मध्यखण्ड— “पितृकर्म करे सेइ श्रीवासपण्डित। शुनये 'सहस्रनाम' अति शुद्धचित्त॥ हेनकाले सेइ ठाञि गेला गौरहरि। शुनये 'सहस्रनाम' मनोरथ पूरि'॥ शुनिते-शुनिते भेल नृसिंह-आवेश। क्रोधे राङ्गा दुंनयन, ऊर्ध्व भेल केश॥ पुलकित सब अङ्ग अरुण वरण। घनघन हुँकार सिंहेर गर्जन॥ आचम्बिते गदा लञा धाइल सत्वर। देखिया सकल लोक काँपिल अन्तर॥ सब सम्वरिया प्रभु बसिला आसने। ना जानि, कि अपराध भैगेला आमार॥” “वे श्रीवास पण्डित पितृ-कर्म करते हुए शुद्ध चित्तसे 'सहस्रनाम' सुन रहे थे। उस समय गौरहरि वहाँ पहुँचे और 'सहस्रनाम' सुनकर उनकी मनोवाञ्छा पूर्ण हुई। सुनते-सुनते उनमें नृसिंह भगवान्का आवेश आ गया। क्रोधसे उनके नेत्र लाल हो गये और केश खड़े हो गये। उनके सभी अङ्ग पुलकित होकर लाल रङ्गके हो गये और वे जोरसे सिंहके समान गर्जन करने लगे। वे हाथमें गदा लेकर भागे और उनके ऐसे उग्र रूपको देखकर सभीके हृदय काँपने लगे। तब उस आवेशको सम्वरण करके महाप्रभु आकर आसनपर बैठ गये और कहने लगे, “मैं नहीं जानता कि मुझसे क्या अपराध हो गया है?”॥ 90-95 ॥ श्रीवासकी उक्ति, श्रीगौरनामसे अपराध क्षय :— श्रीवास बलेन,—“ये तोमार नाम लय। तार कोटि अपराध सब हय क्षय ॥ 96 ॥ श्रीगौरदर्शनसे संसार-ध्वंस :— अपराध नाहि, कैले लोकेर निस्तार। ये तोमा' देखिल, तार छुटिल संसार ॥” 97 ॥ अनुवाद—श्रीवास बोले,—“जो आपका नाम लेता है, उसके कोटि-कोटि अपराध नष्ट हो जाते हैं। आपसे कोई अपराध हो ही नहीं सकता, अपितु आपने लोगोंका उद्धार किया है। जिन्होंने भी आपके दर्शन किये हैं, वे संसार बन्धनसे मुक्त हो गये हैं॥”96-97॥ एत बलि' श्रीवास करिल सेवन। तुष्ट हञा प्रभु आइला आपन-भवन ॥ 98 ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीवास उनकी सेवा करने लगे। तब महाप्रभु सन्तुष्ट होकर अपने घर लौट आये॥ 98 ॥ महाभाग्यवान् शैवके कन्धेपर चढ़े महाप्रभुका शिवावेश :— आर दिन शिवभक्त शिवगुण गाय। प्रभुर अङ्गने नाचे, डम्बुरु बाजाय ॥ 99 ॥ महेश-आवेश हैला शचीर नन्दन। तार स्कन्धे चड़ि' नृत्य कैल बहुक्षण ॥ 100 ॥ अनुवाद—और एक दिन एक शिवभक्त शिवजीके गुण गाता हुआ महाप्रभुके आङ्गनमें आकर डमरु बजा-बजाकर नाचने लगा। उसे देखकर महाप्रभुको शिवजीका आवेश हो गया और उसके कन्धेपर चढ़कर महाप्रभुने बहुत देर तक नृत्य किया॥ 99-100 ॥ अनुभाष्य—चैःभाः मध्यखण्ड, अष्टम अध्याय द्रष्टव्य है॥ 99-100 ॥ नृत्यपरायण भिक्षुकको प्रेमदान :— आर दिन एक भिक्षुक आइला मागिते। प्रभुर नृत्य देखि' नृत्य लागिला करिते ॥ 101 ॥
सतरहवाँ अध्याय | 237
[ 17/101-111
प्रभु सङ्गे नृत्य करे परम उल्लासे। प्रभु तारे प्रेम दिल, प्रेमरसे भासे ॥ 102 ॥ अनुवाद—और एक दिन एक भिक्षुक भिक्षा माँगते हुए आया और महाप्रभुका नृत्य देखकर वह भी नृत्य करने लगा। वह महाप्रभुके साथ परम-उल्लाससे नृत्य करता रहा। महाप्रभुने उसे प्रेम प्रदान किया और वह प्रेमरसमें डूब गया ॥ 101-102 ॥ महाप्रभुके द्वारा ज्योतिषीसे अपने पूर्वजन्मकी जिज्ञासा :- आर दिने ज्योतिष एक सर्वज्ञ आइल। ताहारे सम्मान करि' प्रभु प्रश्न कैल ॥ 103 ॥ “के आछिलुँ पूर्वजन्मे आमि, कह गणि'।” गणिते लागिला सर्वज्ञ प्रभुवाक्य शुनि' ॥ 104 ॥ अनुवाद—और एक दिन एक सर्वज्ञ ज्योतिषी आया। महाप्रभुने उसका सम्मान करके एक प्रश्न पूछा, “मैं पूर्व जन्ममें कौन था ?” यह सुनकर वह सर्वज्ञ गणना करने लगा ॥ 103-104 ॥ अनुभाष्य—'सर्वज्ञ'—भूत, भविष्य और वर्तमानको जाननेवाला त्रिकालज्ञ। अभी भी पूर्व बङ्गाल (बाङ्गलादेश) में 'छिल', 'छिले' और 'छिलाम' आदि क्रिया विभक्तिके स्थानपर 'आछिल', 'आछिला' और 'आछिलाम' व्यवहार होता आ रहा है ॥ 103-104 ॥ ज्योतिषीकी महाप्रभुमें परमेश्वर-बुद्धि :- गणि' ध्याने देखे सर्वज्ञ,—महाज्योतिर्मय। अनन्त वैकुण्ठ-ब्रह्माण्ड—सबार आश्रय ॥ 105 ॥ परमतत्त्व, परब्रह्म, परम-ईश्वर। देखि' प्रभुर मूर्ति सर्वज्ञ हइल फाँफर ॥ 106 ॥ अनुवाद—गणना करके सर्वज्ञने ध्यानमें महाप्रभुको महाज्योतिर्मय अनन्त वैकुण्ठ-ब्रह्माण्डोंके आश्रय, परमतत्त्व, परब्रह्म, परमेश्वर रूपमें देखा और वह असमञ्जसमें पड़ गया ॥ 105-106 ॥
बलिते ना पारे किछु, मौन हइल। प्रभु पुनः प्रश्न कैल, कहिते लागिल ॥ 107 ॥ “पूर्वजन्मे छिला तुमि परम-आश्रय। परिपूर्ण भगवान्—सर्वैश्वर्यमय ॥ 108 ॥ पूर्वे यैछे छिला तुमि एबेह सेरूप। दुर्विज्ञेय नित्यानन्द—तोमार स्वरूप ॥”109 ॥ अनुवाद—वह कुछ बोल नहीं पाया और मौन धारण करके रहा। जब महाप्रभुने पुनः उससे वही प्रश्न किया, तो वह कहने लगा—“पूर्वजन्ममें आप सबके पराश्रय, सर्वैश्वर्यमय परिपूर्ण भगवान् थे। पूर्व जन्ममें आप जैसे थे, अब भी वैसे ही उसी स्वरूपमें हो। आपका नित्यानन्द स्वरूप दुर्विज्ञेय है॥” 107-109 ॥ महाप्रभुके द्वारा अपने गोपस्वरूपका परिचय प्रदान :- प्रभु हासि' कैला,—“तुमि किछु ना जानिला। पूर्वे आमि छिलाम जातिते गोयाला ॥ 110 ॥ गोपगृहे जन्म छिल, गाभीर राखाल। सेइ पुण्ये हैलाङ आमि ब्राह्मण-छाओयाल ॥” 111 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने हँसकर कहा—“तुम कुछ भी नहीं जानते हो। मैं तो पूर्व जन्ममें ग्वाला था। मेरा जन्म गोपके घरमें हुआ था और मैं गायोंका रखवाला था। गायोंकी सेवाके पुण्यसे ही मैं इस जन्ममें ब्राह्मणका पुत्र हुआ हूँ॥” 110-111 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गायोंकी सेवा करनेसे पुण्य होता है। गायोंकी देखभाल करनेवाला होनेके कारण मैंने पूर्वजन्ममें उनकी सेवा करके जो पुण्य अर्जित किया था, उसके फलसे मैं इस जन्ममें 'ब्राह्मण' हुआ हूँ॥ 111 ॥ अनुभाष्य—सर्वज्ञ ज्योतिषीके साथ महाप्रभुका रहस्यमय वाक्य ॥ 110-111 ॥
238 | श्रीचैतन्यचरितामृत
17/112-117 ] ज्योतिषीके द्वारा शरण ग्रहण और प्रेमलाभ :- सर्वज्ञ कहे, — “आमि ताहा ध्याने देखिलाङ। ताहाते ऐश्वर्य देखि' फाँफर हइलाङ ॥ 112 ॥ सेइरूपे एइरूपे देखि एकाकार। कभु भेद देखि, एइ मायाय तोमार ॥ 113 ॥ ज्योतिषीपर कृपा और प्रेमदान :- ये हओ, से हओ तुमि, तोमाके नमस्कार।” प्रभु तारे प्रेम दिल, कैल पुरस्कार ॥ 114 ॥ अनुवाद—सर्वज्ञने कहा— “मैंने वह ध्यानमें देखा था, परन्तु आपका ऐश्वर्य देखकर मैं असमञ्जसमें पड़ गया था। आपका वह रूप और यह रूप कभी एक समान और कभी उनमें भेद देखता हूँ, यह आपकी माया ही है। आप जो हैं, सो हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ।” तब महाप्रभुने प्रसन्न होकर कृपाकर उसे प्रेम प्रदान किया॥ 112-114॥ अनुभाष्य—ज्योतिषीका वृत्तान्त चैतन्यभागवतमें दिखलायी नहीं देता है॥ 103-114॥ महाप्रभुकी बलदेव-आवेशमें यमुनाकर्षण-लीला :- एकदिन प्रभु विष्णुमण्डपे बसिया। 'मधु आन', 'मधु आन' बलेन डाकिया॥ 115 ॥ नित्यानन्द-गोसाञि प्रभुर आवेश जानिल। गङ्गाजल-पात्र आनि' सन्मुखे धरिल ॥ 116 ॥ जल पान करिया नाचे हञा विह्वल। यमुनाकर्षण-लीला देखये सकल ॥ 117 ॥ अनुवाद—एक दिन महाप्रभु विष्णुमण्डपमें बैठकर जोर-जोरसे कहने लगे—'मधु लाओ', 'मधु लाओ'। श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुके आवेशको समझकर गङ्गाजलका पात्र उनके सामने लाकर रखा। महाप्रभु जलपान करके आनन्दसे नृत्य करने लगे। सबने देखा कि महाप्रभु यमुना-आकर्षण लीला कर रहे हैं॥ 115-117॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'यमुनाकर्षणलीला'—श्रीबलदेव प्रभुने एक दिन यमुनापर क्रोध करके हल-मूसलके द्वारा यमुनाको खींचा था। महाप्रभु जब श्रीबलदेवके आवेशमें 'मधु लाओ', 'मधु लाओ' कह रहे थे, उस समय अन्य सभी उपरोक्त यमुनाकर्षण-लीलाको देख रहे थे॥ 117 ॥ अनुभाष्य—चैःभाः मध्यखण्ड, छब्बीसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ 116॥ श्रीबलदेव प्रभु गोकुलमें आकर चैत्र और वैशाख, दो मास गोपियोंसे परिवृत होकर वास कर रहे थे। वारूणी पान करते हुए उन्होंने जलक्रीड़ाके लिये यमुनाजीको अपने निकट आह्वान किया। (भाः 10/65/25-30, 33)— “स आजुहाव यमुनां जलक्रीड़ार्थमीश्वरः। निजं वाक्यमनादृत्य मत्त इत्यापगां बलः। अनागतां हलाग्रेण कुपितो विचकर्ष ह॥ पापे त्वं मामनादृत्य यन्नायासि मयाहता। नेष्ये त्वां लाङ्गलाग्रेण शतधा कामचारिणीम्॥ एवं निर्भर्त्सिता भीता यमुना यदुनन्दनम्। उवाच चकिता वाचं पतिता पादयोर्नृप ॥ राम राम महाबाहो न जाने तव विक्रमम्। यस्यैकांशेन विधृता जगती जगतः पते॥ परं भावं भगवतो भगवन्मामजानतीम्। मोक्तु ततो व्यमुञ्चत् यमुनां याचितो भगवान् बलः। विजगाह जलं स्त्रीभिः करेणुभिरिवेभराट् ॥ अद्यापि दृश्यते राजन् यमुनाकृष्टवर्त्मना। बलस्यानन्तवीर्यस्य वीर्यं सूचयतीव हि।” “श्रीबलदेव प्रभुने जलकेलिके लिये यमुनाजीका आह्वान किया। यमुनाजीने यह समझकर कि ये तो मतवाले हो रहे हैं, उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन किया और वे नहीं आयीं। तब श्रीबलदेव प्रभुने क्रोधित होकर उन्हें अपने हलकी नोकसे खींचा। उन्होंने कहा,—'पापिनी यमुने! क्योंकि तुम मेरी आदेशकी अवज्ञा करके यहाँ नहीं आ रही हो और स्वेच्छाचार करके तुम जो अपराध कर रही हो, उसका फल मैं तुम्हें अभी चखाता हूँ। मैं अपने हलकी नोकके द्वारा सतरहवाँ अध्याय | 239
[ 17/117-123 तुम्हारे सौ-सौ भाग किये देता हूँ।' हे राजन्! श्रीबलदेव प्रभुकी इस प्रकार फटकारसे भयभीत होकर यमुनाजी काँपते हुए उनके चरण-युगलमें गिर पड़ीं और प्रार्थना करने लगीं, - 'हे जगन्नाथ! हे महाबाहो! हे राम! आप अपने एक अंश (शेष) के द्वारा इस जगत्को धारण करते हैं, ऐसे प्रभावशाली आपके पराक्रमको मैं भूल गयी थी। हे अखिलान्तर्यामी भक्तवत्सल, भगवन्! मैं आपके मुख्य स्वरूपसे अवगत नहीं हूँ, इसलिये मुझ शरणागतको मुक्ति दान करें।' यमुनाजीकी इस प्रकार प्रार्थना सुनकर भगवान् श्रीबलरामने यमुनाजीको मुक्त कर दिया और फिर जैसे गजराज हथिनियोंके साथ क्रीड़ा करता है, वे गोपियोंके साथ जलक्रीड़ा करने लगे। हे राजन्! अभी भी यमुनाजी श्रीबलदेव प्रभुके द्वारा खींचे हुए मार्गसे बहती हैं और ऐसा जान पड़ता है कि वे महाविक्रमशाली श्रीबलदेव प्रभुके यश-पराक्रमका गान कर रही हों॥" 117॥ अनुभाष्य-चैतन्यमङ्गल मध्यखण्ड- “वनमाली-नाम ताँर पुत्र एक सङ्गे। विप्रकुले जन्म, वैसे पूर्वदेश बङ्गे॥ देखिलेक काञ्चन-निर्मित कलेवर। रत्नविभूषित येन सुमेरु-शिखर ॥ हलायुध-वेशे नाचे तिनलोक-नाथ॥ “वनमाली नामका उनका एक पुत्र था। उनका जन्म ब्राह्मण कुलमें हुआ था और वे पूर्व बङ्गालमें रहते थे। उन्होंने देखा कि महाप्रभुका शरीर मानो सोनेका बना है। वह ऐसा लग रहा था मानो रत्नोंसे जड़ित सुमेरु पर्वत हो। हलायुधको लेकर त्रिलोकी-नाथ नृत्य कर रहे थे।" चैःचः आदुलीला, 10/73 संख्यामें कहा गया है कि 'वनमाली पण्डित' ने भी महाप्रभुके हाथोंमें सोनेका हल-मूसल देखा था। उनकी 'पण्डित'-पदवी, और इनकी 'आचार्य'-पदवी, दोनों एक ही व्यक्ति हैं अथवा पृथक् व्यक्ति हैं? ॥ 119॥ चन्द्रशेखर आचार्यरत्नका महाप्रभुका बलदेवरूपमें दर्शन :- मदमत-गति बलदेव-अनुकार। आचार्य शेखर ताँरे देखे रामाकार ॥ 118॥ वनमाली आचार्यका महाप्रभुके हाथमें स्वर्ण हल-दर्शन :- वनमाली आचार्य देखे सोणार लाङ्गल। सबे मिलि' नृत्य करे आनन्दे विह्वल ॥ 119॥ एइमत नृत्य हइल चारि प्रहर। सन्ध्याय गङ्गास्नान करि' सबे गेला घर ॥ 120॥ महाप्रभुकी आज्ञासे घर-घरमें श्रीकृष्ण-कीर्त्तन :- नगरिया लोके प्रभु यबे आज्ञा दिला। घरे घरे सङ्कीर्त्तन करिते लागिला ॥ 121 ॥ नामगीति :- 'हरि हरये नमः, कृष्ण यादवाय नमः। गोपाल गोविन्द राम श्रीमधुसूदन ॥' 122॥ मृदङ्ग-करताल सङ्कीर्त्तन-महाध्वनि। 'हरि' 'हरि'-ध्वनि बिना अन्य नाहि शुनि ॥ 123 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने जब नगरके लोगोंको आज्ञा दी, वे घर-घरमें सङ्कीर्तन करने लगे। 'हरि हरये नमः, कृष्ण यादवाय नमः। गोपाल गोविन्द राम श्रीमधुसूदन' का कीर्तन होने लगा। मृदङ्ग-करतालके साथ सङ्कीर्तनकी ध्वनि सर्वत्र होने लगी और 'हरि-हरि' की ध्वनिके अतिरिक्त कुछ भी सुनायी नहीं देता था॥ 121-123॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीबलदेव प्रभुके समान मदमत्त गतिसे चलने लगे। श्रीचन्द्रशेखर आचार्यने उन्हें श्रीबलरामके रूपमें देखा। वनमाली आचार्यने महाप्रभुके हाथमें सोनेका हल देखा। सभी भक्त मिलकर आनन्दसे नृत्य करने लगे। इस प्रकार चार प्रहर तक नृत्य हुआ। सन्ध्यामें सभीने गङ्गास्नान किया और सब अपने-अपने घरोंको गये॥ 118-120 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-नगरमें नाम प्रचार करनेके समय महाप्रभुने श्रीवास-अङ्गनके निकटमें रहनेवाले 240 | श्रीचैतन्यचरितामृत
17/121–130 ] नगरवासियोंको पहले करतालके साथ हरिनाम करनेकी आज्ञा दी; क्रमशः सङ्कीर्त्तनमें मृदङ्ग-करताल़ादि बजने लगे। तबसे घर-घरमें सङ्कीर्त्तनका प्रचार होता आ रहा है॥121॥ कीर्त्तन-विरोधी यवन और काजी :- शुनिय़ा ये क्रु काजी-पाशे आसि' सब कैल निवेदन ॥ 124॥ अनुवाद-सङ्कीर्त्तनकी ध्वनि सुनकर यवन लोग क्रोधित हो गये और उन्होंने काजीके पास आकर सङ्कीर्त्तन बन्द करवानेका निवेदन किया॥ 124॥ अनुभाष्य-नगरवासियोंका श्रीकृष्ण-कीर्त्तन और काजीका क्रोध तथा काजीका उद्धार-चैः भाः मध्यखण्ड, तेइसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है। ‘काजी’—फौजदार, चाँदकाजी। पहले जमींदार, राजा अथवा मण्डल भूमिके करका संग्रह करते थे। दण्डका विधान और शासन आदिका कार्य काजी लोगोंके द्वारा ही सम्पादित होता था। जमींदार अथवा काजी-ये दोनों ही बङ्गाल-सूबाके सूबेदारके अधीन थे। नदिया, इस्लामपुर और बागोयान आदि परगना ही उस समय हरि होड़के अथवा उनके अधीन कृष्णदास होड़के अधीन था। इनके भूमि अधिकारी होनेपर भी शासनका भार काजीके पास ही था। कहा जाता है कि चाँदकाजी बङ्गालके नवाब 'हुसेन शाह' के गुरु थे। किसीके मतसे इनका दूसरा नाम 'मौलाना सिराजुद्दीन' तथा किसीके मतसे 'हबिबर रहमान' था। इनके वंशज अभी भी उस स्थानपर वर्तमान है और चाँदकाजीकी समाधि भी वहाँ विद्यमान है॥ 124॥ काजीका मृदङ्ग तोड़ना, कीर्त्तनका विरोध और न करनेकी आज्ञा :- क्रोधे सन्ध्याकाले काजी एक घरे आइल। मृदङ्ग भाङ्गिय़ा लोके कहिते लागिल॥ 125॥ “एतकाल प्रकटे केह ना कैल हिन्दुयानि। एबे ये उद्यम चालाओ कार बल जानि' ॥ 126॥ केह कीर्त्तन ना करिह सकल नगरे। आजि आमि क्षमा करि' याइतेछों घरे॥ 127॥ आर यदि कीर्त्तन करिते लाग पाइमु। सर्वस्व दण्डिय़ा तार जाति ये लइमु॥”128॥ अनुवाद-सन्ध्याके समय काजी क्रोधित होकर एक हिन्दूके घरमें आया और मृदङ्ग तोड़कर कहने लगा-“अभी तक तो हिन्दुओंका ऐसा आचरण नहीं था, किसके बलपर तुम लोग यह सब कर रहे हो? आज मैं तुम्हें क्षमा करके अपने घर जा रहा हूँ, परन्तु कोई भी अबसे नगरमें कहीं भी कीर्त्तन नहीं करेगा। और यदि मैंने किसीको कीर्त्तन करते हुए पाया, तो मैं उसका सब कुछ हरण करके उसकी जाति भ्रष्ट कर दूँगा॥”125॥ अमृतप्रवाह भाष्य-बख्तियार खिलजीके आनेके समयसे लेकर चाँदकाजीके समय तक हिन्दुओंका धर्माचरण बहुत कमजोर हो गया था। जिनकी वास्तविक हिन्दू धर्ममें आस्था थी, वे चुपचाप एक बार “हरि हरि” बोलकर चुप हो जाते थे। इसलिये काजीने कहा-‘अभी तक तो हिन्दुओंका ऐसा आचरण नहीं था, किसके बलपर ऐसा प्रयास कर रहे हो?'॥ 126॥ अनुभाष्य-अब भी वह स्थान मायापुरमें ‘खोलभाङ्गार डाङ्गा’ के नामसे प्रसिद्ध है॥ 125॥ दुःखी सज्जन व्यक्तियोंका महाप्रभुके निकट आवेदन :- एत बलि' काजी गेल, -नगरिया लोक। प्रभु-स्थाने निवेदिल पाञा बड़ शोक॥ 129॥ महाप्रभुका क्रोध तथा सभीको सङ्कीर्त्तन करनेका आदेश :- प्रभु आज्ञा दिल-“याह, करह कीर्त्तन। मुञि संहारिमु आजि सकल यवन॥”130॥ सतरहवाँ अध्याय | 241
[ 17/130-139 अनुवाद—यह कहकर काजी चला गया। नगरके लोगोंको बहुत दुःख हुआ और वे महाप्रभुके पास जाकर निवेदन करने लगे। महाप्रभुने उन्हें आज्ञा दी—"तुम लोग जाकर निर्भय होकर कीर्तन करो। मैं आज ही सभी यवनोंका संहार करूँगा॥" 130 ॥ घरे गिया सब लोक करय कीर्त्तन। काजीर भये स्वच्छन्द नहे, चमक्ति मन ॥ 131 ॥ ता-सबार अन्तरे भय प्रभु मने जानि'। कहिते लागिला लोके शीघ्र डाकि' आनि' ॥ 132 ॥ “नगरे नगरे आजि करिमु कीर्त्तन। सन्ध्याकाले कर सबे नगर मण्डन ॥ 133 ॥ सन्ध्याते देउटि सबे ज्वाल घरे घरे। देख, कोन् काजी आसि मोरे माना करे ॥" 134 ॥ अनुवाद—सभी लोग अपने-अपने घरमें जाकर कीर्तन करने लगे। परन्तु काजीका भय उनके मनमें था, इसलिये वे स्वच्छन्द रूपसे कीर्तन नहीं कर पा रहे थे। महाप्रभु मन-ही-मनमें उन सबके हृदयके भयको जानते थे, इसलिये उन्होंने कहा,—“शीघ्र ही सभी लोगोंको बुलाकर लाओ। आज मैं नगर-नगरमें कीर्तन करूँगा। सन्ध्याकालमें सारे नगरको सजा दो और उस समय सब घरोंमें मशालें जला दो। मैं देखूँगा कि कौन काजी आकर मुझे ऐसा करनेसे मना करता है?॥” 131-134 ॥ एत कहि' सन्ध्याकाले चले गौरराय। कीर्त्तनेर कैल प्रभु तिन सम्प्रदाय ॥ 135 ॥ तीन गुटोंमें कीर्तन-विभाग :- आगे सम्प्रदाये नृत्य करे हरिदास। मध्ये नाचे आचार्य-गोसाञि परम उल्लास ॥ 136 ॥ पाछे सम्प्रदाये नृत्य करे गौरचन्द्र। ताँर सङ्गे नाचि' बुले प्रभु नित्यानन्द ॥ 137 ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीगौरराय सन्ध्याके समय चले और उन्होंने कीर्तन करनेवालोंके तीन मण्डलियाँ बना दीं। सबसे आगेवाली मण्डलीमें श्रीहरिदास नृत्य कर रहे थे। बीचवाली मण्डलीमें श्रीअद्वैताचार्य परमोल्लासके साथ नृत्य कर रहे थे और पीछेवाली मण्डलीमें स्वयं श्रीगौरचन्द्र नृत्य कर रहे थे। श्रीनित्यानन्द प्रभु भी महाप्रभुके साथ चलते हुए नृत्य कर रहे थे॥ 135-137 ॥ वृन्दावन-दास इहा 'चैतन्यमङ्गले'। विस्तारि' वर्णियाछेन, चैतन्य-कृपाबले ॥ 138 ॥ अनुवाद—श्रीवृन्दावन-दासने महाप्रभुकी कृपाके बलपर इसका 'चैतन्यमङ्गल' में विस्तारसे वर्णन किया है॥ 138 ॥ कीर्तन करते-करते नवद्वीप-नगर भ्रमण :- एइमत कीर्त्तन करि' नगरे भ्रमिला। भ्रमिते भ्रमिते प्रभु काजीद्वारे गेला ॥ 139 ॥ अनुवाद—इस प्रकार वे नगरमें भ्रमण करते हुए कीर्तन करने लगे। समस्त नगरमें भ्रमण करते-करते महाप्रभु काजीके द्वार तक जा पहुँचे ॥ 139 ॥ अनुभाष्य—चैःभाः तेइसवाँ अध्याय— “तुया चरणे मन लागहुँ रे। (शार्ङ्गधर) तुया चरणे मन लागहुँ रे ॥ 241 ॥ चैतन्यचन्द्रेर एइ आदि सङ्कीर्त्तन। भक्तगण गाय नाचे श्रीशचीनन्दन ॥ 242 ॥ 'गङ्गातीरे तीरे पथ आछे नदीयाय। आगे सेइ पथे नाचि' याय गौरराय ॥ 298 ॥ आपनार घाटे आगे बहु नृत्य करि'। तबे माधाइर घाटे गेला गौरहरि ॥ 299 ॥ 'नाचे विश्वम्भर, सबार ईश्वर, भागीरथी-तीरे तीरे'। (ध्रु) ॥ 271 (क) ॥ वारकोणा-घाटे नागरिया-घाटे गिया। गङ्गानगर दिया प्रभु गेला 'सिमुलिया' ॥ 300 ॥ नदीयार एकान्ते नगर 'सिमुलिया'। नाचिते नाचिते प्रभु उत्तरिल गिया ॥ 348 ॥ काजिर बाड़ीर पथ धरिला ठाकुर ॥ 359 (क) ॥ आइला नाचिया यथा काजिर नगर ॥ 379 ॥” 242 | श्रीचैतन्यचरितामृत
17/139–147 ] “चैतन्यचन्द्रका यह आदि कीर्तन है—'तुम्हारे चरणोंमें मेरा मन लग जाये, हे शार्ङ्गधर ! तुम्हारे चरणोंमें मेरा मन लग जाये।' (नगर-कीर्तनमें) भक्त लोग गा रहे थे और श्रीशचीनन्दन नृत्य कर रहे थे। 'नदियामें गङ्गाके किनारे जो मार्ग था, उसपर श्रीगौरसुन्दर आगे-आगे नृत्य करते हुए जा रहे थे। पहले 'अपने-घाट' पर बहुत नृत्य किया और तब श्रीगौरहरि 'माधाइ-घाट' पर गये। 'नाचे विश्वम्भर, सर्वेश्वर, भागीरथीके तीरे-तीरे। (ध्रु०)। फिर 'बारकोणा-घाट' और 'नगरिया-घाट' से 'गङ्गानगर' होते हुए महाप्रभु 'सिमुलिया' पहुँचे। नदीयाके एक प्रान्त भागमें 'सिमुलिया' नगर है, नाचते-नाचते महाप्रभु वहाँ पहुँच गये। तब ठाकुर (महाप्रभु) काजीके घरकी ओर चल पड़े। नाचते-नाचते वे काजीके नगरमें पहुँचे॥” 139 ॥ तर्ज-गर्ज करे लोक, करे कोलाहल। गौरचन्द्र-बले लोक प्रश्रय-पागल ॥ 140 ॥ अनुवाद—श्रीगौरसुन्दरके बलके आश्रयके कारण लोग पागलसे हो गये और वे तर्जन-गर्जन करते हुए कोलाहल करने लगे॥ 140 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीश्रीगौरचन्द्रके बलसे लोग तब उनके आश्रय प्राप्तकर पागल हो गये॥ 140 ॥ काजीका अपनेको छिपाना :– कीर्त्तनेर ध्वनिते काजी लुकाइल घरे। तर्ज्जन गर्ज्जन शुनि' ना हय बाहिरे ॥ 141 ॥ अभद्र व्यक्तियोंका काण्ड :– उद्धत लोक भाङ्गे काजीर घर-पुष्पवन। विस्तारि' वर्णिला इहा दास-वृन्दावन ॥ 142 ॥ अनुवाद—कीर्तनकी ध्वनि सुनकर काजी अपने घरमें छिप गया और तर्जन-गर्जन सुनकर भयसे बाहर नहीं आया। कुछ अभद्र लोग उत्तेजित होकर काजीके घरमें घुसकर उसके घर और वाटिकाको नष्ट करने लगे। इस प्रसङ्गको श्रीवृन्दावनदासने विस्तारसे कहा है॥ 141-142 ॥ अनुभाष्य—चैःभाः तेइसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ 138-142 ॥ भद्र सज्जन व्यक्तियोंके द्वारा काजीका आह्वान :– तबे महाप्रभु तार द्वारेते बसिला। भव्यलोक पाठाइया काजी बोलाइला ॥ 143 ॥ काजीको लौकिकी मर्यादा-दान :– दूर हइते आइला काजी माथा नोडाइया। काजीरे बसाइला प्रभु सम्मान करिया ॥ 144 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु काजीके द्वारपर बैठ गये और उन्होंने कुछ शिष्ट लोगोंको भीतर भेजकर काजीको बुलवाया। काजीने बाहर आकर दूरसे महाप्रभुको अपना शीश नवाया। महाप्रभुने काजीको सम्मानपूर्वक वहाँ बैठाया॥ 143-144 ॥ काजीके आचरणसे महाप्रभुकी विस्मयसूचक उक्ति :– प्रभु बलेन, — “आमि तोमार आइलाम अभ्यागत। आमा देखि' लुकाइला, – ए धर्म केमत ॥” 145 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, – “मैं तुम्हारा अतिथि बनकर आया हूँ और मुझे देखकर तुम छुप रहे हो, यह कैसा धर्मका आचरण है?” ॥ 145 ॥ काजीका प्रत्युत्तर :– काजी कहे, – “तुमि आइस क्रु तोमा शान्त कराइते रहिनु लुकाइया ॥ 146 ॥ एबे तुमि शान्त हैले, आसि' मिलिलाङ। भाग्य मोर, – तुमि-हेन अतिथि पाइलाङ ॥ 147 ॥ अनुवाद—काजीने कहा, – “आप तो क्रोधित होकर आये हो, आपके क्रोधको शान्त करनेके लिये ही मैं छुपा हुआ था। अब आप शान्त हो गये हो, इसलिये मैं आपसे आकर मिल रहा हूँ। यह तो मेरा सौभाग्य है कि आप मेरे अतिथि बने हैं॥ 146-147 ॥ सतरहवाँ अध्याय | 243
[ 17/148-158 ग्राम-सम्बन्धे 'चक्रवर्त्ती' हय मोर चाचा। देह-सम्बन्ध हैते ग्राम-सम्बन्ध साँचा॥ 148 ॥ नीलाम्बर चक्रवर्त्ती हय तोमार नाना। से सम्बन्धे हओ तुमि आमार भागिना॥ 149 ॥ भागिनार क्रोध मामा अवश्य सहय। मातुलरे अपराध भागिना ना लय॥" 150 ॥ अनुवाद-ग्रामके सम्बन्धसे नीलाम्बर चक्रवर्ती मेरे चाचा लगते हैं और देहके सम्बन्धसे भी श्रेष्ठ ग्रामका सम्बन्ध होता है। नीलाम्बर चक्रवर्ती तुम्हारे नाना हैं और इस सम्बन्धसे तुम मेरे भाञ्जे लगते हो। भाञ्जेका क्रोध मामा अवश्य ही सहन करता है और मामाका अपराध भाञ्जा नहीं लेता है॥" 148-150 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'ब्राह्मणपुष्करिणी' ग्रामके एक भागमें काजियोंका पुराना घर अभी भी वर्तमान है। उस ग्रामके दूसरे भागसे लगा हुआ 'तारणवास' है, जो पहले 'बिल्वपुष्करिणी' था। वह ग्राम और काजियोंका 'ब्राह्मणपुष्करिणी' एक ही ग्राम होनेसे चाँदकाजीका महाप्रभुके साथ मामाका सम्बन्ध था॥ 148 ॥ अनुभाष्य - 'चक्रवर्त्ती'- नीलाम्बर चक्रवर्त्ती। 'चाचा'- पिताका छोटा भाई, बङ्गालमें चलती भाषामें उन्हें 'काका' कहते हैं। 'साँचा'-वास्तविक, शुद्ध, सच्चा॥ 148 ॥ एह मत दुँहार कथा हय ठारे-ठोरे। भितरेर अर्थ केह बुझिते ना पारे॥ 151 ॥ अनुवाद-इस प्रकार उन दोनोंकी सङ्केतमें बातें हो रही थीं, उनका भीतरी अर्थ कोई नहीं समझ पाया॥ 151 ॥ महाप्रभु और काजीकी उक्ति एवं प्रत्युक्ति :- प्रभु कहे,–“प्रश्न लागि' आइलाम तोमार स्थाने।” काजी कहे,–“आज्ञा कर, ये तोमार मने ॥” 152 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "मेरे मनमें कुछ प्रश्न हैं, जिनके समाधानके लिये मैं आपके घरपर आया हूँ।" काजीने कहा, - "आज्ञा करो जो आपके मनमें है॥" 152 ॥ इस्लाम धर्मके आचारके सम्बन्धमें महाप्रभुका प्रश्न :- प्रभु कहे, - "गोदुग्ध खाओ, गाभी तोमार माता। वृष अन्न उपजाय, ताते तँहो पिता॥ 153 ॥ पिता माता मारि' खाओ-एबा कोन् धर्म। कोन् बले कर तुमि एमत विकर्म ॥" 154 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "आप गायका दूध पीते हैं, इस कारण गाय आपकी माता हुई। बैल [खेतोंमें हल चलाकर] अन्न उत्पन्न करते हैं, इसलिये वे आपके पिता हुए। पिता-माताको मारकर खाना, यह कौनसा धर्म है। किसके बलपर आप ऐसा पाप करते हैं?"॥ 153-154 ॥ अनुभाष्य - 'अन्न उपजाय'-बैल हलको खींचकर धानादि फसलको बोने और रोपणके लिये खेतको तैयार करके किसानको बीज और चावलादि अन्नके उत्पादनमें मुख्यरूपसे सहायता करता है। 'एबा'-यह॥ 153-154 ॥ काजीका उत्तर :- काजी कहे, - "तोमार यैछे वेद-पुराण। तैछे आमार शास्त्र-केताब 'कोराण' ॥ 155 ॥ सेइ शास्त्रे कहे, -प्रवृत्ति-निवृत्ति-मार्ग-भेद। निवृत्ति-मार्गे जीवमात्र-वधेर निषेध॥ 156 ॥ प्रवृत्ति-मार्गे गोवध करिते विधि हय। शास्त्र-आज्ञाय वध कैले नाहि पाप-भय ॥ 157 ॥ तोमार वेदेते आछे गोवधेर वाणी। अतएव गोवध करे बड़ बड़ मुनि॥" 158 ॥ अनुवाद-काजीने कहा, - "आपके जैसे वेद-पुराण हैं, वैसे ही हमारा शास्त्र-ग्रन्थ 'कुरान' है। उस शास्त्रमें 244 | श्रीचैतन्यचरितामृत
प्रवृत्ति और निवृत्ति भेदसे दो मार्ग दिखलाये हैं। निवृत्ति-मार्गमें जीवमात्रका वध निषेध है। प्रवृत्ति-मार्गमें गोवधकी विधिका विधान है, इसलिये हमें शास्त्रकी आज्ञानुसार वध करनेसे पापका भय नहीं है। आपके वेदोंमें भी तो गोवधके विषयमें कहा गया है, इसलिये बड़े-बड़े मुनि भी तो गोवध करते हैं॥" 155-158॥ अनुभाष्य-'केताब'-ग्रन्थ। 'सरियत्', 'तरिकत्' और 'मारफत्'—ये तीन प्रकारके पथ हैं॥ 155-158॥ अमृतानुकणिका-श्रीमद्भागवतम् ग्यारहवें स्कन्ध (11/5/11, 13-15) में आठवें योगेन्द्र चमसेने राजा निमिसे कहा— “लोके व्यवायामिषमद्यसेवा नित्या हि जन्तोर्न हि तत्र चोदना। व्यवस्थितिस्तेषु विवाहयज्ञ- सुराग्रहैरासु निवृत्तिरिष्टा॥ 11॥ यद्घ्राणभक्षो विहितः सुरायास्तथा पशोरालभनं न हिंसा। एवं व्यवायः प्रजया न रत्यै इमं विशुद्धं न विदुः स्वधर्मम्॥ 13॥ ये त्वनेवंविदोऽसन्तः स्तब्धाः सदभिमानिनः। पशून् द्रुह्यन्ति विश्रब्धाः प्रेत्य खादन्ति ते च तान्॥ 14॥ द्विषन्तः परकायेषु स्वात्मानं हरिमीश्वरम्। मृतके सानुबन्धेऽस्मिन् बद्धस्नेहाः पतन्त्यधः॥" 15॥ “कर्म मीमांसक वेदोंके अर्थवादमें निरत होकर ऐसा सिद्धान्त स्थापित करते हैं कि स्त्रीसङ्ग, आमिष (मांस) भोजन एवं मदिरापान करनेके लिये वेदोंकी प्रेरणा है, अर्थात् इन सभी क्रियाओंको करनेकी प्रेरणा देनेके लिये ही वेदोंमें इस प्रकारके यज्ञोंकी व्यवस्था दी गयी है। किन्तु वे यह नहीं जानते कि ये सभी प्रवृत्तियाँ जीव-जन्तुमात्रके (वास्तविक आत्माके स्वभावमें नहीं, बल्कि देहके) निसर्गगत स्वभावमें ही हैं, इसलिये वे प्रेरणाकी अपेक्षा नहीं रखतीं। इन सभी प्रवृत्तियोंकी निवृत्तिके लिये ही विवाहके द्वारा स्त्रीसङ्ग, यज्ञके माध्यमसे आमिष भोजन और (सौत्रामणि यज्ञमें ही) सुरा-ग्रहणकी व्यवस्था वेदोंमें दी गयी है। इसलिये निवृत्ति ही वेदोंका गूढ़ तात्पर्य है। किसी विशेष परिस्थितिमें मद्यके सूँघनेमात्रको ही भक्षणके रूपमें कहा गया है और (वृद्ध) पशुओंका वध करके उसे पुनर्जीवितकर युवा शरीर देनेके उद्देश्यसे ही विधान है, पशु वधका नहीं। इसी प्रकार स्त्रीसङ्ग भी केवल सन्तानोत्पत्तिके लिये विहित है, रतिक्रीड़ाके लिये नहीं। यह विशुद्ध वेदमत ही स्वधर्म है, परन्तु वेदार्थवादीगण इस निगूढ़ सिद्धान्तको जानते ही नहीं हैं। जो व्यक्ति वेदोंके इस तात्पर्यको नहीं जानते, वे वास्तवमें धर्मके तत्त्वको नहीं जाननेवाले, अविनीत और साधु होनेका अभिमान करनेवाले हैं। ये लोग निर्भीक होकर पशुओंका वध करते हैं और इन लोगोंके मरनेके बाद वे पशु ही इन्हें खाते हैं। देखो ! आत्मास्वरूप ईश्वर श्रीहरि (हमारे एवं अन्यान्य) सभी प्राणियोंके शरीरमें अवस्थान कर रहे हैं, किन्तु मूर्ख लोग (अन्योंके शरीरमें स्थित हरिके प्रति विद्वेष करके) अपने शवतुल्य अनित्य शरीरके पोषणके अभिप्रायसे पशुओंका वध करते हैं, जिसके फलस्वरूप वे देहमें आसक्त होकर अधःपतित हो जाते हैं॥” 155-158॥ पुनर्जीवन प्राप्तिके कारण वेद-विहित वध-समर्थन :- प्रभु कहे,—“वेदे कहे गोवध निषेध। अतएव हिन्दुमात्र ना करे गोवध॥ 159॥ जियाइते पारे यदि, तबे मारे प्राणी। वेद-पुराणे आछे हेन आज्ञा-वाणी॥ 160॥ अतएव जरद्गव मारे मुनिगण। वेदमन्त्रे सिद्ध करे ताहार जीवन॥ 161॥ जरद्गव हञा युवा हय आरबार। ताते तार वध नहे, हय उपकार॥ 162॥ कलिकालमें ब्राह्मण निःशक्तिक :- कलिकाल तैछे शक्ति नाहिक ब्राह्मणे। अतएव गोवध केह ना करे एखने॥ 163॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, – “वेदोंमें गोवध निषेध
[ 17/156-169 किया गया है। इसलिये कोई भी हिन्दू गोवध नहीं करता है। वेद-पुराणोंकी यह आज्ञा है कि यदि किसी प्राणीको जीवन दे सकते हो, तभी उसे मार सकते हो। इसलिये हमारे मुनि लोग बूढ़ी गायका वध करके वेदके मन्त्रोंके द्वारा उसे पुनः जीवित कर देते थे। बूढ़ी गायको वे पुनः युवा बना देते थे, इसलिये वे वध नहीं अपितु उसका उपकार करते थे। कलिकालमें ब्राह्मणोंके पास वैसी शक्ति नहीं है, इसलिये वे अब गोवध नहीं करते हैं॥ 159-163 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—(काजीने कहा,—) उस कुरानशास्त्रमें 'प्रवृत्ति' और 'निवृत्ति'—इन दो प्रकारसे मार्गका भेद है। निवृत्ति-मार्गमें जीवोंके वधका निषेध है, किन्तु मेरे जैसे जो प्रवृत्ति-मार्गमें हैं, वे शास्त्र आज्ञानुसार गोवध करनेपर पापके भागी नहीं होते हैं। और देखो, आपके वेदशास्त्रोंमें गोवधकी विधिके निर्देश प्राप्त होते हैं, इसलिये बड़े-बड़े मुनि लोग चिरकालसे गोवध करते आये हैं। महाप्रभुने कहा,—वेदशास्त्रोंमें गोवधकी विधि नहीं है, तो भी गोवधके द्वारा जो यज्ञ करनेका वाक्य शास्त्रमें देखा जाता है, वह केवल अत्यन्त वृद्ध गायके सम्बन्धमें कहा गया है। मुनि लोग अति वृद्ध गायको मारकर वेदमन्त्रोंके द्वारा उसे पुनः युवा रूपमें जीवित करते थे। उस प्रकारका वध, वध नहीं है, वह तो वृद्ध गायके लिये उपकार मात्र है। कलियुगमें ब्राह्मणोंमें वैसी शक्ति नहीं है, इसलिये अब गोवध नहीं हो सकता है॥ 156-163 ॥ मलमासतत्त्वमें उद्धृत ब्रह्मवैवर्त्तीय कृष्णजन्मखण्डमें (185/180)— अश्वमेधं गवालम्भं संन्यासं पलपैतृकम्। देवरेण सुतोत्पत्तिं कलौ पञ्च विवर्ज्जयेत् ॥ 164 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 164 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अश्वमेध, गोमेध, संन्यास, मांसके द्वारा पितृ-श्राद्ध, देवरके द्वारा पुत्रोत्पत्ति—कलियुगमें ये पाँच कार्य निषिद्ध हैं॥ 164 ॥ अनुभाष्य—अश्वमेधं (अश्वहनन-यज्ञविशेषं), गवालम्भं (गोमेधं) संन्यासं (चतुर्थाश्रमग्रहणं), पलपैतृकं (मांसेन पितृश्राद्धं) देवरेण (पत्युः कनिष्ठ भ्राता) सुतोत्पत्तिं (पुत्रोत्पादनं)—[एतानि] पञ्च कलौ (कलियुगे) विवर्ज्जयेत् (परित्यज्येत)। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 164 ॥ महाप्रभुके द्वारा इस्लाम-धर्माचारकी समालोचना :— तोमरा जीयाइते नार, —वधमात्र सार। नरक हइते तोमार नाहिक निस्तार ॥ 165 ॥ गो-अङ्गे यत लोम, तत सहस्र वत्सर। गोवधे रौरव-मध्ये पचे निरन्तर ॥ 166 ॥ तोमा-सबार शास्त्रकर्त्ता—सेह भ्रान्त हैल। ना जानिं' शास्त्रेर मर्म ऐछे आज्ञा दिल ॥”167 ॥ अनुवाद—तुम लोग पशुओंको जीवित नहीं कर सकते हो, इसलिये तुम केवल उनका वध करते हो। इस पापके फलस्वरूप नरकमें जानेपर भी तुम्हारा उद्धार नहीं हो सकेगा। गायके शरीरमें जितने रोम हैं, उतने हजार वर्षतक गोवध करनेवाला रौरव नरकमें सड़ता रहता है। तुम्हारे शास्त्रकर्त्ता भ्रान्त हो गये थे, इसलिये शास्त्रके वास्तविक अर्थको न जानकर उन्होंने तुम्हें ऐसी (गोवधकी) आज्ञा दी है॥”165-167 ॥ अनुभाष्य—'भ्रान्त'—द्वितीयाभिनिवेश (देहमें आत्मबुद्धि) के फलस्वरूप बुद्धि विपरीत अथवा भ्रमयुक्त होनेके कारण वृथा ही जीव-हिंसाका अनुमोदन किया है॥ 167 ॥ काजी निरुत्तर और शास्त्रकी असम्पूर्णता-स्वीकार :— शुनि' स्तब्ध हैल काजी, नाहि स्फुरे वाणी। विचारिया कहे काजी पराभव मानिं' ॥ 168 ॥ “तुमि ये कहिले, पण्डित, सेइ सत्य हय। आधुनिक आमार शास्त्र, विचार-सह नय ॥ 169 ॥ अनुवाद—यह सुनकर काजी स्तब्ध हो गया और 246 | श्रीचैतन्यचरितामृत