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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

अनुभाष्यमें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका अध्यात्म रामायण-9/11; अमृतप्रवाह भाष्य-6/97; आदिपुराण-8/246; इतिहाससमुच्चय-8/246; उज्ज्वलनीलमणि-1/87; 2/66; 6/13; 8/172, 175, 202-205; 14/141-153, 159, 165, 168; उपदेशामृत (रूपगोस्वामीकृत)-12/195; ऐतरयोपनिषद्-6/143-144; कठोपनिषद्-6/87; 8/307-309; 9/195; 11/37-38; कर्णूल-म्यानुयेल-1/106; कल्याण-कल्पतरु-12/7-9, 59-61; कात्यान-गृह्यसूत्र-8/127; काशीखण्ड-9/157; कूर्मपुराण-6/180; कौपीन-पञ्चक (शङ्कराचार्य)-6/121; गज्जाम-म्यानुयेल-7/113; गरुड़-पुराण-8/246; गोपालतापनी-उपनिषद्-8/137; गोविन्द भाष्य (श्रीमद्भागवत)-11/195; गौतमीय-तन्त्र-13/142; चैतन्यचन्द्रामृत-7/37; 8/246; 10/175-177; चैतन्यचन्द्रोदय-नाटक-10/106; चैतन्यचन्द्रोदय-नाटक (टिप्पनी)-10/105; चैतन्यभागवत-4/186; 5/140; चैतन्याष्टक-13/207; छान्दोग्योपनिषद्-6/145; 9/270; 12/194; तत्त्व-सन्दर्भ-6/135; तन्त्र-12/212, 215; ताञ्जोर गेजेटियार-9/74, 78-79; तैत्तरीय उपनिषद्-6/143-145, 172; 8/266; तैत्तरीय श्रुतिभाष्य (राघवेन्द्र यति)-6/143-144; दक्षिण आर्कट म्यानुयेल-9/38, 73; दक्षिण कानाड़ा म्यानुयेल-9/245; दुर्गम-सङ्गमनी-8/202-205; नरोत्तमदास ठाकुरकी प्रार्थना-8/137; 11/67; 12/135; नारायणव्यूह स्तव-8/246; पदामृत-समुद्र (राधामोहन ठाकुर)-3/114; पद्मपुराण-8/35-36, 44; 11/32; पूर्णप्रज्ञ-दर्शन-6/135; पत्थरके पटलपर लिखे श्लोक-7/113; प्रेमविवर्त्त-8/192; प्रेमविलास-विवर्त्त-8/192; बाजसेनकी शाखा-8/121; बाधूल-शाखा-6/143-144; बृहदारण्यक-श्रुति-12/194; बृहद्वामन-पुराण-8/246; बृहद्विष्णु-पुराण-3/99; बृहद्भागवतामृत-8/248; 14/126; बृहन्नारदीय-पुराण-8/246; बोम्बाइ गेजेटियार-9/245, 280, 281, 316; ब्रह्मसंहिता-8/137; 10/179-181; ब्रह्मसूत्र-6/135, 147; 8/266, 308-310; भक्तिरत्नाकर-1/35-44, 189; 9/82; भक्तिरसामृतसिन्धु-2/35, 47, 66, 72; 3/127, 162; 4/202; 6/12; 8/202-205; 12/135; 13/142; 14/157; भविष्यपुराण-6/137; भरद्वाज-संहिता (पञ्चरात्र)-1/263; भागवत-1/189; 2/29-34; 3/96, 97, 181; 4/179, 186; 5/28; 6/95, 143, 144, 263-265; 8/5, 44, 57, 60, 64, 127, 245-257, 264-266; 9/74, 80, 94-96, 102, 181, 195, 201, 218, 234, 260, 264, 270, 360, 362; 10/10, 11, 175-177; 12/32, 56, 184; 13/139, 142; भागवत-तात्पर्य (मध्व)-9/11; भावार्थ-दीपिका-6/95, 144; 8/5; भिजागापटम्-गेजेटियार-8/3; मध्व-विजय-9/245; मध्व-भाष्य-6/137, 147; मनःशिक्षा (दास गोस्वामी)-8/64; मनुसंहिता-10/154; महाभारत-8/127; 9/175, 310; मुकुन्दमालास्तोत्र-9/271; मुण्डकोपनिषद्-6/172; 8/307-309; 12/59-61; मुरारी-कड़चा-10/185; राधारस-सुधानिधि-13/207; रामायण-9/218, 312; लघुभागवतामृत-6/263-265; 9/138-139; 12/212, 215; लघुभागवतामृत-टीका (बलदेव)-6/263-265; विद्यापतिको गीतिग्रन्थ-3/114; विवर्त्तविलास (बाउलका ग्रन्थ)-8/192; विलापकुसुमाञ्जली-1/283-284; वेदान्तदर्शन (गौड़ीय)-8/192; वेदान्त-पारिजात-6/135; वेदार्थसंग्रह (श्रीरामानुज)-8/57; वैष्णव-मञ्जुषा-9/244-245; 10/90; 11/84; शरणागति (ठाकुर भक्तिविनोद)-3/194; 7/69; श्वेताश्वतरोपनिषद्-6/143-144, 150; 8/264; 9/102; श्रीभाष्य-6/135; श्रुति-8/266; सप्तशती-8/90; सर्वज्ञसूक्त-6/198; सर्वसम्वादिनी-6/135; 8/192; स्कन्दपुराण-6/147; 8/246; स्तवमाला-7/37; स्मृति-10/137; हरिभक्तिविलास-4/59-62; 8/127; 12/126-127 । ii ।

अमृतानुकणार्मे उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका उपदेशामृत—5/142-143; गीता—13/80; चैतन्यभागवत—3/4; छान्दोग्य-भाष्य—9/276; जावालोपनिषद्—3/4; नारायणसंहिता—9/276; न्यायरक्षामणि—5/142-143; बृहदारण्यक—13/80; ब्रह्मवैवर्त्त-पुराण—3/4; ब्रह्मसूत्र—9/276; ब्रह्मसूत्र (मध्वभाष्य)—9/276; भागवत—3/4, 9/276, 13/80; मध्वमत-प्रकाशक—9/276; महाभारत—9/276; महाभारत-तात्पर्य—9/276; माठर श्रुति—9/276; मनुसंहिता—3/4; मुण्डकोपनिषद् (मध्यभाष्य)—9/276; रघुनन्दन—3/4; शिवार्क-मणिदीपिका—5/142-143; श्रुति—13/80। अमृतानुकणिकामे उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका उज्ज्वलनीलमणि—2/5, 2/66-70; गरुड़पुराण—9/192; गीता—8/57, 59; 9/192; दानकेलिकौमुदी—2/61; नारद-पञ्चरात्र—8/57, 60; भक्तिरसामृतसिन्धु—8/67; 9/94-96; भक्तिसन्दर्भ—8/68; भागवत—8/59, 63, 67-68, 97-99; 9/94-96; महाभारत—8/57; माठरश्रुति—8/67; विदग्धमाधव—8/1; श्रुति—8/59; । iii

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (प्रथम भाग) अध्याय-विवरण पहला अध्याय— 3-48 मध्य और अन्त्य लीलाकी भूमिका या सूत्रवर्णन। दूसरा अध्याय— 51-79 अन्तिम 12 वर्ष गम्भीरामें अन्तरदशामें अवस्थित महाप्रभुका श्रीराधाके आवेशमें दिव्योन्माद और प्रलाप आदि, एवं श्रीचैतन्यचरितामृत ग्रन्थके मूल आधारका कथन। तीसरा अध्याय— 81-110 संन्यास ग्रहण करनेके बाद महाप्रभुका राढ़देशमें भ्रमण, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी चेष्टासे शान्तिपुरमें श्रीअद्वैताचार्यके घरमें आकर शचीमाताके द्वारा बनाया गया भोजन ग्रहण करना और नृत्य-कीर्तनलीला, पुरीमें निवास स्वीकार और श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि चार भक्तोंके साथ पुरीकी यात्रा। चौथा अध्याय— 113-139 रेमुणामें उपस्थित होकर श्रीनित्यानन्द आदिको श्रीईश्वरपुरीके मुखसे सुनी हुयी श्रीमाधवेन्द्र पुरी गोस्वामीके द्वारा गोवर्धनधारी गोपालकी प्रतिष्ठा और अन्नकूट महोत्सव, श्रीमाधवेन्द्रपुरीके रेमुणामें आनेपर श्रीगोपीनाथके द्वारा उनके लिये क्षीरकी चोरी एवं श्रीमाधवेन्द्रपुरीके द्वारा चन्दन-कर्पूर संग्रह करके श्रीगोपीनाथके अङ्गमें लेपन आदिका वृत्तान्त वर्णित है। पाँचवाँ अध्याय— 141-159 साक्षीगोपालमें आनेपर श्रीनित्यानन्द प्रभुके मुखसे महाप्रभु आदिका बड़े ब्राह्मण, छोटे ब्राह्मण और साक्षी गोपालके चरित्रका श्रवण, कमलपुरमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा महाप्रभुका दण्ड भङ्ग, आठारनालामें आनेपर दण्ड भङ्गकी बात सुनकर महाप्रभुका अकेले पुरीमें आगमन और श्रीजगन्नाथजीके दर्शनसे मूर्च्छाकी प्राप्ति। छठा अध्याय— 161-209 श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीमुकुन्द आदिके द्वारा महाप्रभुका दर्शन, महाप्रभुको बाह्य दशाकी प्राप्ति, सभीके द्वारा प्रसादका सम्मान। अन्य एक दिन महाप्रभुके परमेश्वरत्वके सम्बन्धमें श्रीगोपीनाथाचार्यके साथ सशिष्य श्रीभट्टाचार्यका कुतर्क, मायावादी पण्डित सार्वभौमके मुखसे सात दिन चुपचाप वेदान्त व्याख्याका श्रवण और वेदान्तके निर्विशेष ब्रह्मपरतारूप कुतर्कका खण्डन। श्रीसार्वभौमके द्वारा ‘आत्मारामश्च’ श्लोककी नौ प्रकारकी व्याख्या, महाप्रभुकी उन नौ प्रकारके अतिरिक्त अठारह प्रकारकी व्याख्या; श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यकी पराजय, श्रीसार्वभौमको चतुर्भुज और द्विभुजरूपका प्रदर्शन और उद्धारका साधन। सातवाँ अध्याय— 211-230 कृष्णदास ब्राह्मणके साथ महाप्रभुकी दक्षिणयात्रा, मार्गमें प्रत्येक ग्राम और नगरवासियोंको वैष्णव बनाना और कूर्मस्थानमें वासुदेव ब्राह्मणको कुष्ठरोगसे मुक्त करना। आठवाँ अध्याय— 233-337 गोदावरी तटपर श्रीरामनान्दके साथ महाप्रभुका iv ।

मिलन और श्रीरायके मुखसे साध्य-साधन तत्त्वकी अन्तिम सीमातक श्रवण, श्रीरायको महाप्रभुका रसराज-महाभाव रूपका प्रदर्शन और श्रीरायको राजकार्य त्यागकर पुरी आकर मिलनेका आदेश देकर पुनः दक्षिणयात्रा।

नौवाँ अध्याय— 339-402

दक्षिण देशमें अनेक तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए अन्य अभिलाषी, ज्ञानी और पाषण्डी लोगों और अन्य साम्प्रदायिक वैष्णवोंका कृष्ण नाममें प्रवर्त्तन, सिद्ध होनेपर भी राम-नामकारी ब्राह्मणको कृष्णनाममें प्रवर्त्तन। मार्गमें तार्किक, मीमांसक, मायावादी, पाषण्डी आदि समस्त भक्ति विरोधी मतोंका खण्डन करके कृष्णभक्ति सिद्धान्तका स्थापन, बौद्ध आचार्यकी पराजय, रङ्गक्षेत्रमें वेङ्कटभट्टके घरमें चातुर्मास्य यापन और श्रीलक्ष्मीनारायण उपासक श्रीसम्प्रदायी भट्टको सपरिवार श्रीराधाकृष्णकी उपासनामें प्रवर्त्तन, ऋषभ पर्वतमें श्रीपरमानन्दपुरी गोस्वामीके साथ भेंट और पुरी गोस्वामीकी नीलाचलकी ओर यात्रा, दक्षिण मथुरामें रामसीताके भक्त ब्राह्मणको ‘अप्राकृत वैकुण्ठेश्वरी सीतादेवी प्राकृत असुर रावणके द्वारा दर्शनसे अतीत हैं’—ऐसा कहकर सान्त्वना प्रदान करना; बादमें रामेश्वरसे कूर्मपुराण-श्लोक लाकर उनको दिखाना। मालावार देशमें भट्टथारियोंके हाथोंसे सङ्गी कृष्णदासका उद्धार, पयस्विनी तटपर ब्रह्मसंहिताके पञ्चम अध्यायका संग्रह; शृङ्गेरी मठमें जाना; उडुपीमें मठाधीश मध्वाचार्यकी पराजय, पाण्डरपुरमें श्रीरङ्गपुरीके मुखसे श्रीशङ्करारण्य अर्थात् बड़े भाई श्रीविश्वरूपकी स्वधाम प्राप्ति (अप्रकट)का संवाद श्रवण। कृष्णवेन्वा नदीके तटपर ‘कृष्णकर्णामृत’का संग्रह और विद्यानगरमें पुनः लौटकर श्रीरामानन्दके साथ भेंट करके अलालनाथसे होते हुये पुरीमें वापस लौटना।

दसवाँ अध्याय— 405-431 महाप्रभुका श्रीकाशीमिश्रके घरमें अवस्थान, श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके द्वारा क्षेत्रवासी वैष्णवोंके परिचयकी प्राप्ति करना, कृष्णदासको नवद्वीपमें भेजना, गौड़ीय भक्तोंकी पुरीमें आनेकी तैयारी, श्रीपरमानन्द पुरीका नवद्वीपसे पुरीमें आगमन, श्रीदामोदर स्वरूपका काशीसे आगमन और महाप्रभुसे मिलन, श्रीईश्वरपुरीके शिष्य श्रीगोविन्दका आगमन और महाप्रभुकी सेवामें उनकी नियुक्ति, ब्रह्मानन्द भारतीसे चर्माम्बरका त्याग करवाना और उनका महाप्रभुमें श्रीकृष्ण ज्ञान; बलवान काशीश्वरका आगमन।

ग्यारहवाँ अध्याय— 433-463 श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके द्वारा प्रतापरुद्रकी महाप्रभुसे मिलन सम्पादन करनेकी चेष्टा, महाप्रभुकी अनिच्छा, राजकार्यसे मुक्त होकर श्रीरायका महाप्रभुका दर्शन और राजा प्रतापरुद्रके गुणोंका कीर्त्तन, राजाके प्रति महाप्रभुके चित्तभावका परिवर्तन, पुरुषोत्तममें अनवसर-कालमें महाप्रभुका आलालनाथमें गमन और वहाँसे लौटनेपर गौड़देशसे समागत श्रीअद्वैताचार्य आदि भक्तोंके साथ मिलन, श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके साथ श्रीगोपीनाथाचार्यके द्वारा महलके ऊपर चढ़कर राजा प्रतापरुद्रको गौड़ीय भक्तोंका परिचय-दान, राजाके द्वारा उनको रहनेके स्थान और महाप्रसादकी व्यवस्था, महाप्रभुका श्रीहरिदासको तोटामें अर्थात् एक बगीचेमें स्थान प्रदान करना और सभीके प्रसाद सेवन करनेके बाद संध्याके समय मन्दिरमें चार मण्डलियाँ बनाकर कीर्तन।

बारहवाँ अध्याय— 465-494 श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि भक्तोंका महाप्रभुके पास प्रतापरुद्रकी आर्त्तिका ज्ञापन करना और राजाको सान्त्वना देने हेतु महाप्रभुके द्वारा व्यवहार किये गये एक बहिर्वासका खण्ड प्रदान करना, बादमें श्रीरामानन्दके आग्रहसे निकट आये राजकुमारको ‘कृष्ण’ जानकर महाप्रभुका उसे आलिङ्गन दान, उस प्रेमाविष्ट पुत्रके स्पर्शसे राजाको महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति और प्रेम उदय, गुण्डिचा-मन्दिर मार्जन और धुलाई, एक गौड़ीय

। v

भक्तके द्वारा महाप्रभुके चरणोदकका पान, श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र गोपालकी नृत्य करते हुये मूर्च्छा और महाप्रभुकी कृपासे पुनः चेतनताकी प्राप्ति, सभीके द्वारा स्नान और उसके बाद प्रसादका सम्मान, श्रीनित्यानन्द और अद्वैतप्रभुकी प्रेम-कलहलीला और सभीके द्वारा श्रीजगन्नाथके नव-यौवनका दर्शन। तेरहवाँ अध्याय— 497-527 श्रीजगन्नाथकी पाण्डुविजयका दर्शन, राजाके द्वारा मार्गकी झाडू लगाकर सफाई करना, रथके आगे सात मण्डलियोंमें महाप्रभुका नृत्य और बलगण्डि उपवनमें विश्राम। चौदहवाँ अध्याय— 529-562 विश्रामकालमें प्रतापरुद्रका वैष्णववेशमें एकान्तमें महाप्रभुके चरण दबाना, उनके मुखसे कालोचित श्लोकका पाठ सुनकर प्रेममें आविष्ट महाप्रभुका उनको आलिङ्गनका दान, सभीके द्वारा बलगण्डिमें भोगके प्रसादका सम्मान, महाप्रभुके द्वारा रथका सञ्चालन, इन्द्रद्युम्न सरोवरमें भक्तोंके साथ जलक्रीड़ा, हेरा पञ्चमी-यात्राका दर्शन, स्वरूप दामोदरका महाप्रभु और श्रीवाससे वैकुण्ठ धाम एवं लक्ष्मीके ऐश्वर्यके साथ ब्रजधाम और श्रीराधाके ऐश्वर्य, माधुर्य तथा प्रेमके तारतम्यको बतलाना; कुलीन-ग्रामके भक्तोंको महाप्रभुके द्वारा प्रत्येक वर्ष श्रीजगन्नाथके लिये मजबूत रेशमी डोरी लानेका आदेश। vi ।

॥श्री श्रीचैतन्यचरितामृत ॥ मध्यलीला प्रथम भाग अध्याय 1-14

पहला अध्याय कथासार—इस अध्यायमें महाप्रभुकी सम्पूर्ण मध्यलीला और शेषलीलाके प्रथम छह वर्षोंकी लीलाका सूत्ररूपमें वर्णन हुआ है। “यः कौमारहरः” श्लोकका पाठ करते हुए महाप्रभुने जिस भावका प्रकाश किया था, उसी भावको श्रीरूप गोस्वामीने “सोऽयं कृष्णः” श्लोक रचकर स्पष्ट किया था। श्रीरूप गोस्वामीके इस श्लोकको पढ़कर महाप्रभुने उनके ऊपर विशेष कृपा की थी। इस अध्यायमें श्रीरूप, श्रीसनातन और श्रीजीव गोस्वामीके द्वारा विरचित सभी ग्रन्थोंका उल्लेख किया गया है। महाप्रभुने रामकेलि ग्राममें श्रीरूप और श्रीसनातन गोस्वामीपर कृपा की थी, इसका वर्णन भी इस अध्यायमें हुआ है। —(अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीगौर-निताइको प्रणाम :- वन्दे श्रीकृष्णचैतन्य-नित्यानन्दौ सहोदितौ। गौड़ोदये पुष्पवन्तौ चित्रौ शन्दौ तमोनुदौ॥२॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं श्रीकृष्णचैतन्य और श्रीनित्यानन्दकी वन्दना करता हूँ, जो सबका मङ्गल करनेके लिये तथा अज्ञानरूपी अन्धकारको दूर करनेके लिये गौड़देशरूपी क्षितिजपर एक साथ चन्द्र एवं सूर्यके समान आश्चर्यजनक रूपसे उदित हुए हैं॥२॥ सम्बन्धाधिदेवताको प्रणाम :- जयतां सुरतौ पङ्गोर्मम मन्दमतेर्गती। मत्सर्वस्वपदाम्भोजौ राधामदनमोहनौ॥३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं पङ्गु और मन्दमति हूँ; जो मेरी एकमात्र गति हैं और जिनके चरणकमल ही मेरा समस्त धन हैं, वे परम कृपालु श्रीश्रीराधा-मदनमोहन जययुक्त हों॥३॥ अभिधेयाधिदेवताको प्रणाम :- दीव्यद् वृन्दावनकल्पद्रुमाधः श्रीमद्रत्नागारसिंहासनस्थौ। श्रीश्रीराधाश्रीलगोविन्ददेवौ प्रेष्ठालीभिः सेव्यमानौ स्मरामि॥४॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ज्योतिर्मय-शोभायुक्त वृन्दावनके कल्पवृक्षके नीचे रत्नमन्दिरमें स्थित सिंहासनके ऊपर विराजमान श्रीश्रीराधागोविन्दकी प्रियसखियाँ उनकी सेवा कर रही हैं; मैं उनका स्मरण करता हूँ॥४॥ श्रीगौरकृपासे अज्ञानीको भी सर्वज्ञताकी प्राप्ति :- यस्य प्रसादादज्ञोऽपि सद्यः सर्वज्ञतां व्रजेत्। स श्रीचैतन्यदेवो मे भगवान् संप्रसीदतु॥१॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अज्ञानीजन भी जिनकी कृपासे तत्क्षणात् सर्वज्ञता लाभ करते हैं, वे भगवान् श्रीचैतन्यदेव मेरे प्रति प्रसन्न हों॥१॥ अनुभाष्य— यस्य (श्रीचैतन्यदेवस्य) प्रसादात् (अनुकम्पया) अज्ञः (अनभिज्ञः) अपि सद्यः सर्वज्ञतां व्रजेत् (सर्वेषु विषयेषु पारङ्गतो विज्ञो भवति), स भगवान् श्रीचैतन्यदेवः मे (मयि) संप्रसीदतु (सम्यक् प्रसन्नो भवतु)। श्लोक-भावानुवाद—जिनकी कृपासे अनभिज्ञ व्यक्ति भी तुरन्त सभी विषयोंमें पारङ्गत हो जाते हैं, वे भगवान् श्रीचैतन्यदेव मेरे प्रति सम्पूर्ण रूपसे प्रसन्न हों॥१॥

[ 1/5-14 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला प्रयोजनाधिदेवताको प्रणाम :- श्रीमान्रासरसारम्भी वंशीवटतटस्थितः । कर्षन् वेणुस्वनैर्गोपीर्गोपीनाथः श्रियेऽस्तु नः ॥ ५ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-रासरसके प्रवर्तक वंशीवटके तटपर स्थित होकर श्रीमद्गोपीनाथ वेणुध्वनिके द्वारा गोपियोंको आकर्षित कर रहे हैं; वे हमारे मङ्गलका विधान करें ॥ ५ ॥ जय जय गौरचन्द्र जय कृपासिन्धु। जय जय शचीसुत जय दीनबन्धु ॥ ६ ॥ अनुवाद-कृपासिन्धु श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, जय हो। दीन-पतितोंके एकमात्र बन्धु शचीनन्दन सदा जययुक्त होंवे ॥ ६ ॥ जय जय नित्यानन्द जयाद्वैतचन्द्र। जय जय श्रीवासादि गौरभक्तवृन्द ॥ ७ ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैतचन्द्र प्रभु की जय हो, जय हो, श्रीवासादि गौरभक्तोंकी जय हो ॥ ७ ॥ पहले आदिलीलामें सूत्रके साथ ही मूल घटनाएँ वर्णित हुईं :- पूर्वे कहिलुँ आदिलीलार सूत्रगण। याहा विस्तारियाछेन दास-वृन्दावन ॥ ८ ॥ अतएव तार आमि सूत्र-मात्र कैलुँ। ये किछु विशेष, सूत्रमध्येइ कहिलुँ ॥ ९ ॥ अनुवाद-मैंने पहले सूत्ररूपमें आदिलीलामें उन लीलाओंका वर्णन किया जिनका श्रीवृन्दावनदासने विस्तारसे वर्णन किया है। इसलिये मैंने उन लीलाओंका सूत्ररूपमें ही वर्णन किया और उनमें भी जो कुछ विशेष लीलाएँ थीं, उन्हें भी उन सूत्रोंके बीचमें ही कहा ॥ ८-९ ॥ अब शेषलीलाका मुख्यसूत्र-वर्णनारम्भ :- एबे कहि शेषलीलार मुख्य सूत्रगण। प्रभुर अशेष लीला ना याय वर्णन ॥ १० ॥ अनुवाद-यद्यपि महाप्रभुकी असीम लीलाओंका वर्णन सम्भव नहीं है, तथापि अब उनकी मुख्य शेषलीलाओंका सूत्र रूपमें वर्णन करूँगा ॥ १० ॥ श्रीचैतन्यभागवतमें विस्तारसे वर्णित घटनाओंको सूत्ररूपमें और उसमें संक्षेपमें वर्णित मुख्य-मुख्य घटनाओंका सविस्तार वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा :- तार मध्ये येइ भाग दास-वृन्दावन। 'चैतन्यमङ्गले' विस्तारि' करिला वर्णन ॥ ११ ॥ सेइ भागेर इहाँ सूत्रमात्र लिखिब। ताहाँ ये विशेष किछु, इहाँ विस्तारिब ॥ १२ ॥ अनुवाद-जिन लीलाओंका श्रीवृन्दावनदासने 'चैतन्यमङ्गल'में विस्तारसे वर्णन किया है, उनको यहाँ सूत्र रूपमें ही लिखूँगा और उसमें जो कुछ विशेष लीलाएँ हैं, उन्हें विस्तारपूर्वक कहूँगा ॥ ११-१२ ॥ अनुभाष्य-ऐसा जाना जाता है कि चैतन्यचरितामृतके रचनाकाल तक श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके द्वारा रचित श्रीचैतन्यभागवतका नाम 'चैतन्यमङ्गल' था। जयानन्दके 'चैतन्यमङ्गल' नामसे जो अति आधुनिक भक्तिसिद्धान्त-विरोधी ग्रन्थका उल्लेख किया जाता है, वह एक नकली ग्रन्थ है। प्राचीनकालके किसी भी ग्रन्थमें उसका या उसके रचियता जयानन्दका कोई उल्लेख नहीं मिलता है। इससे यह सहज ही जाना जाता है कि 'जयानन्द' एक कृत्रिम नाम है ॥ ११-१२ ॥ वृन्दावनदास ठाकुरकी वन्दना :- चैतन्यलीलार व्यास-दास वृन्दावन। ताँर आज्ञाय करौं ताँर उच्छिष्ट चर्वण ॥ १३ ॥ भक्ति करि' शिरे धरि ताँहार चरण। शेषलीलार सूत्र एबे करिये वर्णन ॥ १४ ॥ 4 ।

पहला अध्याय 1/13-23 ] अनुवाद—श्रीव्यासदेवके अवतार श्रीवृन्दावनदास ही चैतन्यलीलाके अधिकारी रचियता हैं, मैं तो उनकी आज्ञासे उनके उच्छिष्टको चबानेकी चेष्टा कर रहा हूँ। भक्ति-भावसे उनके चरणोंको अपने शीशपर रखकर अब मैं शेषलीलाका सूत्ररूपमें वर्णन कर रहा हूँ॥ 13-14 ॥ अनुभाष्य—'चैतन्यलीलाके व्यास'—भगवान्के अवतारों और श्रीकृष्णकी लीलाओंके लेखक श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासदेव हैं। श्रीचैतन्यलीलाके लेखक श्रीवृन्दावनदास ठाकुर श्रीव्यास-स्वरूप अर्थात् उनके ही अवतार हैं। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने जिन श्रीचैतन्य-लीलाओंका वर्णन नहीं किया है, उन्हीं बची हुई लीलाओंको उनके आनुगत्यमें ही उनके दास और पाल्य श्रीकृष्णदास लिख रहे हैं॥ 13॥ शेषलीलाका सूत्र-वर्णन आरम्भ; प्रथम चौबीस वर्ष गृहस्थ-अभिनयसे आदिलीला :- चब्बिंश वत्सर प्रभुर गृहे अवस्थान। ताहाँ ये करिला लीला—'आदि-लीला' नाम ॥ 15 ॥ अनुवाद—प्रथम चौबीस वर्ष महाप्रभु गृहमें रहे और उन्होंने वहाँ जो-जो लीलाएँ कीं, वे 'आदिलीला'के नामसे कही जाती हैं॥ 15 ॥ शेष चौबीस वर्षोंकी संन्यासीके अभिनयसे 'शेषलीला' :- चब्बिंश वत्सर शेष येइ माघमास। तार शुक्लपक्षे प्रभु करिला संन्यास ॥ 16 ॥ संन्यास करिया चब्बिंश वत्सर अवस्थान। ताहाँ येइ लीला, तार 'शेषलीला' नाम ॥ 17 ॥ अनुवाद—चौबीसवें वर्षके अन्तमें माघमासके शुक्लपक्षमें महाप्रभुने संन्यास ग्रहण किया। संन्यास ग्रहण करनेके पश्चात् महाप्रभुने चौबीस वर्षों तक इस जगत्में रहकर जो लीलाएँ कीं, उन्हें 'शेषलीला' कहा जाता है॥ 16-17॥ मध्य और अन्त्य-भेदसे शेषलीला :- शेषलीलार 'मध्य' 'अन्त्य',—दुइ नाम हय। लीलाभेदे वैष्णव सब नाम-भेद कय ॥ 18 ॥ अनुवाद—शेषलीलाके 'मध्य' और 'अन्त्य'—ये दो नाम हैं। लीलाके भेदानुसार सब वैष्णव इनका इन दो नामोंसे उल्लेख करते हैं॥ 18 ॥ शेष चौबीस वर्षोंके प्रथम छह वर्ष समस्त भारतमें प्रचाररूप मध्यलीला :- तार मध्ये छय वत्सर—गमनागमन। नीलाचल-गौड़-सेतुबन्ध-वृन्दावन ॥ 19 ॥ अन्तिम अठारह वर्षोंकी आस्वादनरूप अन्त्यलीला :- ताहाँ येइ लीला, तार 'मध्यलीला' नाम। तार पाछे लीला—'अन्त्यलीला' अभिधान ॥ 20 ॥ 'आदिलीला', 'मध्यलीला', 'अन्त्यलीला' आर। एबे 'मध्यलीला' किछु करिये विस्तार ॥ 21 ॥ अनुवाद—(संन्यासके पश्चात्) पहले छह वर्ष महाप्रभुने यात्रामें बिताये। उन्होंने पुरीसे बङ्गाल और कन्याकुमारीसे वृन्दावन तक लगभग सम्पूर्ण भारतकी यात्रा की। इन छह वर्षोंमें उन्होंने जो लीलाएँ कीं, उनका नाम 'मध्यलीला' है और अन्तिम अठारह वर्षकी लीलाओंको 'अन्त्यलीला' कहा जाता है। महाप्रभुकी लीलाएँ समयके भेदसे 'आदि', 'मध्य' और 'अन्त्य' लीला कही जाती हैं। अब मैं मध्यलीलाको कुछ विस्तारसे कहूँगा॥ 19-21 ॥ बाकी अठारह वर्षोंमें पहले छह वर्ष भक्तसङ्गमें वास और पुरीमें आचार्यत्व :- अष्टादशवर्ष केवल नीलाचले स्थिति। आपनि आचरि' जीवे शिखाइला भक्ति ॥ 22 ॥ तार मध्ये छय वत्सर भक्तगण-सङ्गे। प्रेमभक्ति प्रवर्त्ताइला नृत्यगीतरङ्गे ॥ 23 ॥ अनुवाद—महाप्रभु अन्तिम अठारह वर्ष केवल नीलाचल (श्रीजगन्नाथपुरी) में रहे और अपने आचरणसे उन्होंने जीवोंको भक्तिकी शिक्षा दी। इसमें छह वर्षोंतक अपने भक्तोंके सङ्ग महाप्रभुने नृत्य और गीतके माध्यमसे प्रेमाभक्तिकी शिक्षा दी॥ 22-23 ॥ । 5

[ 1/24-32 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला प्रचारकवर्ग—(1) गौड़मण्डलमें निजगणोंके साथ श्रीनित्यानन्द प्रभुका प्रचार :— नित्यानन्द-गोसाञिरे पाठाइल गौड़देशे। तेंहो गौड़देश भासाइल प्रेमरसे ॥ 24 ॥ कृष्णप्रेमकी बाढ़में गौड़देशका डूबना :— सहजेइ नित्यानन्द—कृष्णप्रेमोद्दाम। प्रभु-आज्ञाय कैल याहाँ ताहाँ प्रेमदान ॥ 25 ॥ श्रीनित्यानन्द-वन्दना और गुण-वर्णन :— ताँहार चरणे मोर कोटि नमस्कार। चैतन्येर प्रिय येहाँ लओयाइल संसार ॥ 26 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको नीलाचलसे गौड़देश (बङ्गाल) कृपा वितरणके लिये भेजा। श्रीनित्यानन्द प्रभुने पूरे गौड़देशको श्रीकृष्णप्रेममें डुबो दिया। श्रीनित्यानन्द प्रभुमें स्वाभाविक रूपसे कृष्णप्रेम विराजमान है और महाप्रभुकी आज्ञासे उन्होंने उसे जहाँ-तहाँ-सर्वत्र ही दान किया। उनके श्रीचरणोंमें मेरा करोड़ों बार नमस्कार है, उन्होंने श्रीचैतन्य महाप्रभुकी भक्तिको लाकर सम्पूर्ण जगत्में वितरित किया है॥ 24-26 ॥ श्रीगौराङ्गके 'गौरवके भाई' और स्वयं प्रभु होनेपर भी श्रीनिताइका गौर-दासाभिमान :— चैतन्य-गोसाञि याँरे बोले 'बड़ भाई'। तेंहो कहे, मोर प्रभु—चैतन्य-गोसाञि ॥ 27 ॥ यद्यपि आपनि हुये प्रभु बलराम। तथापि चैतन्येर करे दास-अभिमान ॥ 28 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभु उन्हें अपना बड़ा भाई कहते हैं, परन्तु वे चैतन्य महाप्रभुको अपना स्वामी कहते हैं। यद्यपि श्रीनित्यानन्द प्रभु स्वयं बलराम हैं, तथापि सदा वे अपनेमें महाप्रभुका दास होनेका अभिमान रखते हैं॥ 27-28 ॥ अचित्की सेवा और भोग छोड़कर नित्य चिद्-ईश्वरकी सेवासे ही जीवको नित्य-आनन्दकी प्राप्ति :— 'चैतन्य' सेव, 'चैतन्य' गाओ, लओ 'चैतन्य'-नाम। 'चैतन्य' ये भक्ति करे, सेइ मोर प्राण ॥ 29 ॥ महापापी तक सभीको ही विभु चित्की सेवामें नियुक्त करना और उनका उद्धार :— एइ मत लोके चैतन्य-भक्ति लओयाइल। दीन-हीन, निन्दक, सबारे निस्तारिल ॥ 30 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु सभीसे यही भिक्षा करते हैं कि 'श्रीचैतन्य-महाप्रभु' की सेवा करो, 'श्रीचैतन्य-महाप्रभु' की लीलाओंका गान करो और 'श्रीचैतन्य-महाप्रभु'के नामका जप करो। जो ऐसी 'श्रीचैतन्य-महाप्रभु'की भक्ति करता है, उसे श्रीनित्यानन्द प्रभु अपने प्राणोंके समान प्रिय मानते हैं। इस प्रकार श्रीनित्यानन्द प्रभुने संसारमें श्रीचैतन्य-भक्तिका मुक्त-हस्तसे वितरण करके सभी दीन-हीन (भक्तिहीन) और निन्दक व्यक्तियोंका भी उद्धार किया॥ 29-30 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 6/50-51 संख्या देखें॥ 27-30 ॥ (2) माथुरमण्डलमें श्रीरूप-सनातनके द्वारा प्रचार :— तबे प्रभु व्रजे पाठाइल रूप-सनातन। प्रभु-आज्ञाय दुइ भाइ आइला वृन्दावन ॥ 31 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीरूप और श्रीसनातन गोस्वामीको व्रजमें भेजा। महाप्रभुकी आज्ञासे दोनों भाई उनकी मनोभीष्ट सेवाके लिये वृन्दावनमें आकर वास करने लगे॥ 31 ॥ (क) शुद्धभक्ति प्रचार, (ख) लुप्ततीर्थ उद्धार, (ग) मठादि-स्थापनके द्वारा श्रीमूर्त्तिसेवा प्रचार :— भक्ति प्रचारिये सर्वतीर्थ प्रकाशिल। मदनगोपाल-गोविन्देर सेवा प्रचारिल ॥ 32 ॥ अनुवाद—उन्होंने व्रजमें श्रीकृष्ण-भक्तिका प्रचार किया, व्रजमें लुप्त श्रीकृष्ण लीला-स्थलियाँका जगत्में प्रकाश किया। श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीमदनगोपाल और श्रीरूप गोस्वामीने श्रीगोविन्ददेवजीके विग्रहोंको प्रकट करके उनकी सेवा परिपाटीको जगत्में स्थापित किया॥ 32 ॥ अनुभाष्य—अप्राकृत सेवामें रत और संसारसे विरक्त शुद्ध श्रीकृष्णभक्त ही भक्तिका प्रचार कर सकते 6 |

पहला अध्याय 1/32-36 ] हैं तथा उनके द्वारा ही तीर्थके स्वरूपका प्रकाश होता है। कृत्रिम भक्तवेशधारी बाउलिया तो स्वयं ही चरित्रहीन होते हैं और वे केवल अपनी इन्द्रियोंके भोगोंके लिये भक्तिके प्रचार कार्य और मन्दिरोंके निर्माणमें प्रवृत्त होते हैं, इसलिये उनके इन कार्योंसे वैकुण्ठ तीर्थ प्रकाशित नहीं होते। वह तो केवल मायाकी क्रीड़ामात्र है॥ 32 ॥ (घ) सात्वतशास्त्र-प्रचार, (ङ) अधम-तारण :- नाना शास्त्र आनि' कैला भक्तिग्रन्थ सार। मूढ़ अधमजनेरे तैं हो करिला निस्तार ॥ 33 ॥ सर्वशास्त्र-मीमांसा और अप्राकृत व्रज-रागभक्ति-प्रचार :- प्रभु-आज्ञाय कैल सब शास्त्रेर विचार। व्रजेर निगूढ़ भक्ति करिल प्रचार ॥ 34 ॥ अनुवाद-वे अनेक शास्त्रोंको व्रजमें लेकर आये और उनके सारको अपने व्रजकी प्रेमाभक्तिके प्रतिपादक ग्रन्थोंमें प्रकाश किया। इस प्रकार उन्होंने अज्ञानी और पतित जीवोंका उद्धार किया। महाप्रभुकी आज्ञासे उन्होंने समस्त शास्त्रोंका विचार करके सर्वश्रेष्ठ और परम रहस्यमयी व्रजकी मधुर रसमयी भक्तिका प्रचार किया ॥ 34-35 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'निगूढ़भक्ति'—पाठान्तरमें निगूढ़ रस ॥ 34 ॥ अनुभाष्य-प्राकृत सहजिया लोग शास्त्रविचारका त्याग करके कृत्रिम आँसू बहाकर भगवान्‌के लिये रोनेका नाटक करते हैं, जिस कारण सत्यस्वरूप (प्रेममयी) भगवत्सेवा उनके अश्रुओंमें बह जाती है। अर्थात् वे सेवाका त्याग करके केवल कृत्रिम भावोंके प्रदर्शनके द्वारा भक्त होनेका अभिनय करते हैं। इस प्रकार वे महाप्रभुकी आज्ञाका उल्लङ्घन करते हैं। शास्त्रके सिद्धान्तोंको भली-भाँति समझनेवाले भक्तोंके द्वारा ही निगूढ़ व्रजसेवा प्रचारित होती है, अन्यथा इन्द्रिय-भोगके विचार आकर भक्तिसिद्धान्तोंको उलट देते हैं॥ 34 ॥ श्रीसनातन गोस्वामीके चार ग्रन्थ :- हरिभक्तिविलास, आर भागवतामृत। दशम-टिप्पनी, आर दशम-चरित ॥ 35 ॥ एइ सब ग्रन्थ कैल गोसाञि सनातन। रूपगोसाञि कैल यत, के करु गणन ॥ 36 ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीहरिभक्तिविलास, बृहद्भागवतामृत, दशम-टिप्पनी और दशम-चरित आदि ग्रन्थोंकी रचना की। श्रीरूप गोस्वामीने जितने ग्रन्थोंकी रचना की, कौन उसकी गणना कर सकता है? ॥ 35-36 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'भागवतामृत' अर्थात् बृहद्भागवतामृत। 'दशम-टिप्पनी' अर्थात् दशम स्कन्धकी 'बृहद्-वैष्णवतोषणी' नामक टीका। 'दशम-चरित' अर्थात् दशम स्कन्धमें वर्णित श्रीकृष्णलीला-चरित (श्रीलीलास्तव) ॥ 34-36 ॥ अनुभाष्य- 'हरिभक्तिविलास'-श्रील सनातन गोस्वामी प्रभुके द्वारा रचित तथा श्रील गोपालभट्ट गोस्वामी प्रभुके द्वारा सङ्कलित वैष्णव-स्मृतिग्रन्थ है, इसमें कुल बीस विलास हैं। पहले विलासमें-गुरु, शिष्य और मन्त्र; दूसरे विलासमें-दीक्षा; तीसरे विलासमें-सदाचार, स्मरण और शुचि (स्नान और सन्ध्या); चौथे विलासमें-संस्कार, तिलक, मुद्रा, माला और गुरुपूजा; पाँचवें विलासमें-आसन, प्राणायाम, न्यास, शालग्रामादि श्रीमूर्त्ति; छठे विलासमें-श्रीमूर्त्तिका आह्वान, स्नान कराना और आनुषङ्गिक आवश्यक कृत्य; सातवें विलासमें-श्रीविष्णुपूजा योग्य पुष्पोंका विवरण; आठवें विलासमें-श्रीमूर्तिके सम्मुख धूप, दीप, नैवेद्य, नृत्य, वाद्य, आरती, स्तुति, नमस्कार और अपराधोंके लिये क्षमा-प्रार्थना; नवें विलासमें-तुलसी, वैष्णव-श्राद्ध और नैवेद्य; दसवें विलासमें-भगवद्भक्त अथवा वैष्णव अथवा साधु; ग्यारहवें विलासमें-श्रीमूर्त्तिका अर्चन, श्रीहरिनाम, श्रीनामका जप और कीर्तन, नामापराध और उनका मोचन, भक्तिका माहात्म्य और शरणागति; बारहवें विलासमें-एकादशी-विधि; तेरहवें विलासमें-उपवास, महाद्वादशी-व्रत; चौदहवें विलासमें-विभिन्न मासोंमें किये । 7

[ 1/35-39 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

जानेवाले अनेकानेक कृत्य; पन्द्रहवें विलासमें-निर्जला एकादशी, तप्तमुद्रा-धारण, चातुर्मास्य, जन्माष्टमी, पार्श्व एकादशी, श्रवणाद्वादशी, रामनवमी, विजयादशमी; सोलहवें विलासमें-कार्तिक मासके कृत्य अथवा दामोदर (ऊर्जा) व्रत, दीपदानादि, गोवर्धन-पूजा, रथयात्रा; सत्तरहवें विलासमें-पुरश्चरण, जप और माला; अठारहवें विलासमें-विष्णुकी श्रीमूर्तिके विभिन्न प्रकार; उन्नीसवें विलासमें-श्रीमूर्तिकी प्रतिष्ठा करना तथा उनको स्नानादि कराना; बीसवें विलासमें-श्रीमन्दिर-निर्माणादि और ऐकान्तिक भक्तोंके कृत्य वर्णित हैं। मध्यलीला 24/325-341 संख्या देखें। 'हरिभक्तिविलास' ग्रन्थके कुछ अंश जिनका श्रीमद् गोपालभट्ट गोस्वामीने सङ्कलन किया था, उसका विवरण श्रील कविराज गोस्वामीने मध्यलीलाके चौबीसवें अध्यायमें लिखा है। श्रीगोपालभट्ट गोस्वामीके द्वारा सङ्कलित ग्रन्थमें अब वैष्णवस्मृतिका पूर्ण विकास लक्षित नहीं होता। श्रीगौरसुन्दरके आदेशानुसार श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा किये गये विपुल स्मृति-संग्रहके तात्कालोचित आंशिक विषयसमूह ही इस ग्रन्थमें प्रकाशित हुए हैं। वैष्णवस्मृति-कल्पद्रुमके अथवा श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा सङ्कलित पूर्ण श्रीहरिभक्तिविलासके प्रकाशित होनेसे ही वैष्णवसमाजमें सभी व्यवहारिक अभाव दूर होंगे। श्रीहरिभक्तिविलासमेंसे श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी प्रभुने 'भक्तिविलास'-ग्रन्थ संक्षिप्त रूपमें लिखा था और उस समय स्मार्त्तकुलका अधिक प्रभाव होनेके कारण इस भक्तिविलास-ग्रन्थके द्वारा सभी व्यवहारिक कार्योंकी मीमांसा प्राप्त नहीं होती। श्रीसनातन गोस्वामीने स्वसङ्कलित श्रीहरिभक्तिविलासकी 'दिग्दर्शिनी' नामक टीका भी स्वयं ही लिखी थी, इस टीकाके कुछ अंश वर्तमानकालके भक्तिविलास-ग्रन्थमें टीकारूपमें प्रकाशित हुए हैं, परन्तु कोई-कोई श्रीगोपीनाथ पूजाधिकारीके द्वारा सङ्कलित 'दिग्दर्शनी' कहकर उसका प्रचार करते हैं। ये श्रीगोपीनाथ वृन्दावनमें श्रीराधारमणजीकी सेवामें रत श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी प्रभुके एक शिष्य हैं।

'बृहद्भागवतामृत'-यह दो खण्डोंमें विभाजित भगवद्भक्तिसिद्धान्तपूर्ण ग्रन्थ है। पहले खण्डका नाम- 'भगवत्कृपाभरनिर्द्धार' है; इसमें भौम, दिव्य, ब्रह्मलोक और वैकुण्ठ, भक्त, प्रिय, प्रियतम और पूर्ण-ये सात अध्याय हैं। दूसरे खण्डका नाम 'गोलोक-माहात्म्यनिरूपण' है; इसमें वैराग्य, ज्ञान, भजन, वैकुण्ठ, प्रेम, अभीष्टलाभ और जगदानन्द-ये सात अध्याय हैं; कुल चौदह अध्यायोंमें ग्रन्थ सम्पूर्ण होता है। 'दशम-टिप्पनी'-यह श्रीमद्भागवतके दशम स्कन्धकी टीका है, जो 'बृहद्वैष्णवतोषणी'के नामसे प्रसिद्ध है। भक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें कहा गया है- "चौदह सौ छहत्तर (1476) शकाब्द (1554 ईसवी) में 'बृहत्' (वैष्णवतोषणी) सम्पूर्ण हुई। पन्द्रह सौ चार (1504) शकाब्द (1582 ईसवी) में लघु (तोषणी) पूर्ण हुई। आदिलीला 10/84 संख्याका अनुभाष्य देखें॥ 35-36 ॥ श्रीरूपके अनेक ग्रन्थ मधुरसेवा-विषयक :- प्रधान प्रधान किछु करिये गणन। लक्ष ग्रन्थे कैल व्रजविलास वर्णन ॥ 37 ॥ अनुवाद-श्रीरूप गोस्वामीके कुछ मुख्य-मुख्य ग्रन्थोंकी गणना करूँगा, उन्होंने लाखों श्लोकोंमें व्रजविलासका वर्णन किया है ॥ 37 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'ग्रन्थ'-अनुष्टुप्। (एक श्लोक परिमाणमें शब्द-संख्या) ॥ 37 ॥ अनुभाष्य-'ग्रन्थ'-अनुष्टुप। ग्रन्थका तात्पर्य यहाँ पुस्तकसे नहीं है। एक श्लोकके चार पाद अथवा चार ग्रन्थ-इस प्रकार समझना चाहिये। गद्य-ग्रन्थका अर्थ भी इसी प्रकारसे ही है॥ 37 ॥ श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा विरचित ग्रन्थ :- रसामृतसिन्धु, आर विदग्धमाधव। उज्ज्वलनीलमणि, आर ललितमाधव ॥ 38 ॥ दानकेलिकौमुदी, आर बहु स्तवावली। अष्टादश लीलाछन्द, आर पद्यावली ॥ 39 ॥

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पहला अध्याय 1/38–41 ] गोविन्द-विरुदावली, ताहार लक्षण। मथुरा-माहात्म्य, आर नाटक-वर्णन ॥ 40 ॥ लघुभागवतामृतादि के करु गणन। सर्वत्र करिल व्रजविलास वर्णन ॥ 41 ॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीके प्रमुख ग्रन्थ हैं- श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु, विदग्धमाधव, ललितमाधव, उज्ज्वलनीलमणि, दानकेलिकौमुदी, अठारह लीलाछन्द, पद्यावली, बहु-स्तवावली अर्थात् स्तवमाला, गोविन्द-विरुदावली और उसके लक्षण, मथुरा-माहात्म्य और नाटक-वर्णन। इसके अतिरिक्त लघुभागवतामृतादि अन्य ग्रन्थोंकी कौन गणना कर सकता है? उन्होंने सभी ग्रन्थोंमें व्रजकी लीलाओंका वर्णन किया है॥ 38-41 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘बहु-स्तवावली’ अर्थात् ‘स्तवमाला’ ग्रन्थ। ‘गोविन्दविरुदावली’—यह स्तवमालाके अन्तर्गत ही है। ‘नाटक-वर्णन’—नाटकचन्द्रिका ॥ 38-40 ॥ अनुभाष्य—भक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें वर्णन है कि श्रीलरूप गोस्वामीने सोलह ग्रन्थोंकी रचना की। आदिलीला 10/84 संख्या देखें। ‘श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु’—यह श्रीकृष्णभक्ति और भक्तिरस-सम्बन्धी संग्रह ग्रन्थ है। इस ग्रन्थकी रचना 1463 शकाब्दमें हुई। इसमें पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर—ये चार विभाग हैं। पूर्व विभागका नाम— ‘स्थायिभावोत्पादन’ है; इसमें सामान्यभक्ति, साधनभक्ति, भावभक्ति और प्रेमभक्ति—ये चार लहरियाँ हैं। दक्षिण विभागका नाम—‘भक्तिरस-सामान्य-निरूपण’ है; इसमें विभाव, अनुभाव, सात्त्विक, व्यभिचारी और स्थायीभाव—ये पाँच लहरियाँ हैं। पश्चिम विभागका नाम— ‘मुख्यभक्तिरस-निरूपण’ है; इसमें शान्त, प्रीतिभक्तिरस अथवा दास्य, प्रेयोभक्तिरस अथवा सख्य, वात्सल्यभक्तिरस, और मधुरभक्तिरस—ये पाँच लहरियाँ हैं। उत्तर विभागका नाम—‘गौणभक्तिरसादि-निरूपण’ है; इसमें हास्य-भक्तिरस, अद्भुत-भक्तिरस, वीर-भक्तिरस, करुण-भक्तिरस, रौद्र-भक्तिरस, भयानक-भक्तिरस, वीभत्स-भक्तिरस, रसोंकी मैत्री-वैर-स्थिति और रसाभास—ये नौ लहरियाँ वर्तमान हैं। ‘विदग्धमाधव’—यह श्रीकृष्णकी व्रजलीला विषयक नाटक ग्रन्थ है। 1454 शकाब्दमें इस ग्रन्थकी रचना हुई थी। इस नाटकमें सात अङ्क हैं। पहले अङ्कका नाम—वेणुनादविलास; दूसरे अङ्कका नाम—मन्मथलेख; तीसरे अङ्कका नाम—राधासङ्ग; चौथे अङ्कका नाम—वेणुहरण; पाँचवें अङ्कका नाम—राधाप्रसादन; छठे अङ्कका नाम—शरद्-विहार; सातवें अङ्कका नाम—गौरीविहार है। ‘श्रीउज्ज्वलनीलमणि’—यह अप्राकृत मधुर-व्रजरस- विषयक अलङ्कार ग्रन्थ है। इसके द्वितीय श्लोकमें श्रीरूप गोस्वामी लिखते हैं— मुख्यरसेषु पुरा यः संक्षेपेणोदितोऽति रहस्यत्वात्। पृथगेव भक्तिरसराट् सविस्तारेणोच्यतेऽत्र मधुरः ॥ अर्थात् ‘भक्तिरसामृतसिन्धु’ ग्रन्थमें शान्तादि मुख्यरससमूहमें अति रहस्यमय मधुररसका संक्षेपमें ही वर्णन किया था। श्रीउज्ज्वलनीलमणि ग्रन्थमें पृथक् रूपसे केवल इस भक्तिरसराज मधुररसका ही वर्णन है। इसमें नायकभेद, सहायभेद, कृष्णवल्लभा, श्रीराधिका, नायिकाभेद, यूथेश्वरीभेद, दूतीभेद, सखी, हरिवल्लभा, उद्दीपन, अनुभाव, उद्भास्वर, सात्त्विक एवं व्यभिचारीभाव, स्थायीभाव, शृङ्गारभेदके अन्तर्गत विप्रलम्भ, पूर्वराग, मान, प्रेमवैचित्त्य, प्रवास, संयोगवियोगस्थिति, सम्भोग (मुख्य और गौण) आदि विषयोंका वर्णन है। ‘ललितमाधव’—यह श्रीकृष्णकी द्वारकालीला विषयक नाटकग्रन्थ है। 1459 शकाब्दमें इस ग्रन्थकी रचना हुई। इस नाटकमें दस अङ्क हैं। पहले अङ्कका नाम—सायं उत्सव; दूसरे अङ्कका नाम—शङ्खचूड़ वध; तीसरे अङ्कका नाम—उन्मत्ता राधिका; चौथे अङ्कका नाम—राधिकाभिसार; पाँचवें अङ्कका नाम—चन्द्रावलीलाभ; छठे अङ्कका नाम—ललिता-प्राप्ति; सातवें अङ्कका नाम—नववृन्दावन-सङ्गम; आठवें अङ्कका नाम— नववृन्दावन-विहार; नौवें अङ्कका नाम—चित्रदर्शन; दसवें अङ्कका नाम—पूर्णमनोरथ है। । 9

[ 1/38-45 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'लघुभागवतामृत'—यह ग्रन्थ कृष्णामृत और भक्तामृत—दो खण्डोंमें विभक्त है। प्रथम खण्डमें— शब्द-प्रमाणकी श्रेष्ठता, तत्पश्चात् सर्वप्रथम स्वयंरूप श्रीकृष्ण, उनके विलास स्वांश और आवेश भेदसे तदेकात्मरूप, तीन पुरुषावतार, तीन गुणावतारोंमें विष्णु और विष्णुभक्तिकी निर्गुणता, पच्चीस लीलावतार (चतुःसन, नारद, वराह, मत्स्य, यज्ञ, नरनारायण ऋषि, सेश्वर, कपिल, दत्तात्रेय, हयग्रीव, हंस, पृश्निगर्भ, ऋषभ, पृथु, नृसिंह, कूर्म, धन्वन्तरि, मोहिनी, वामन, परशुराम, दाशरथि रामचन्द्र, कृष्णद्वैपायन, बलराम अथवा शेष सङ्कर्षण, वासुदेव, बुद्ध और कल्कि); चौदह मन्वन्तरावतार (यज्ञ, विभु, सत्यसेन, हरि, वैकुण्ठ, अजित, वामन, सार्वभौम, ऋषभ, विष्वक्सेन, धर्मसेतु, सुदामा, योगेश्वर और बृहद्भानु); चार प्रकारके युगावतार (शुक्ल, रक्त, श्याम और कृष्णवर्ण); विभिन्न कल्प और उनके अवतारसमूह तथा “आवेश, प्राभव, वैभव और पर”—ये चार अवस्थामें अवस्थित अवतार-विचार। लीलाभेदसे भगवन्नाम-महिमा-वैचित्र्य, शक्ति और शक्तिमान् विचार, भगवत्ताके परस्पर-विरुद्ध गुणसमूहका अचिन्त्य समन्वय; श्रीकृष्णकी स्वयं भगवत्ता, वे सबसे श्रेष्ठ हैं, वे सभी अवतारोंके अवतारी हैं, सभी अवतार उनके अंश हैं, वे सर्वेश्वर हैं, निर्विशेष-ब्रह्म श्रीकृष्णकी अङ्गप्रभामात्र है, श्रीकृष्णकी द्विभुज-नरलीलाका माधुर्य असमोध्र्व है, अप्राकृत वैकुण्ठवस्तुके देह और देहीमें भेद नहीं है, श्रीकृष्ण अजन्मा हैं और अनादिकालसे उनका आविर्भाव होता आ रहा है—ये परस्पर विरोधी दिखनेपर भी इनमें कोई विरोध नहीं है; लीलाकी नित्यता, प्रकट और अप्रकट भेदसे दो प्रकारकी लीला, प्रकटलीलाका रस-वैचित्र्य, व्रज, मथुरा और द्वारका लीलाकी नित्यता, विभिन्न धामतत्त्व और माहात्म्य-विचार, 'बाल्य, पौगण्ड, कैशोर और यौवन'-भेदसे आयु-भेदका माधुर्य-वैचित्र्य एवं चार विशेष माधुरियाँ (ऐश्वर्य, क्रीड़ा, वेणु और श्रीविग्रह) आदि विषयोंका वर्णन हुआ है। द्वितीय खण्डमें—भक्तके द्वारा पूजाका प्रयोजन, भजनके तारतम्यसे भक्तोंका तारतम्य; प्रह्लाद, पाण्डवों, यादवों, उद्धव और व्रजगोपियों एवं सर्वापेक्षा श्रीमती राधिका और राधाकुण्डके माहात्म्यका वर्णन हुआ है॥38-41॥ श्रीजीव गोस्वामी :- ताँर भ्रातृपुत्र नाम-श्रीजीवगोसाञि। यत भक्तिग्रन्थ कैल, तार अन्त नाइ॥ 42 ॥ श्रीभागवतसन्दर्भ-नाम ग्रन्थ-विस्तार। भक्तिसिद्धान्त ताते लिखियाछेन सार॥ 43 ॥ गोपालचम्पू-नामे ग्रन्थ महाशूर। नित्यलीला स्थापन याहे व्रजरस-पूर॥ 44 ॥ ग्रन्थकी रचना और सपरिवार वृन्दावन वास :- एइ मत नाना ग्रन्थ करिया प्रकाश। गोष्ठी सहिते कैला वृन्दावने वास॥ 45 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन और श्रीरूप गोस्वामीके भतीजे श्रीजीव गोस्वामी हैं और उन्होंने जितने भक्तिग्रन्थ लिखे हैं, उसका कोई अन्त नहीं है। श्रीभागवतसन्दर्भ नामक ग्रन्थमें उन्होंने भक्ति-सिद्धान्तका सार लिखा है। गोपालचम्पू तो उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति है, जिसमें उन्होंने श्रीकृष्णकी व्रजमें माधुर्य-प्रधान (पारकीय रसकी) नित्यलीलाका निरूपण किया है। इस प्रकार अपने परिवार (श्रीरूप और सनातन गोस्वामी)के साथ वृन्दावनमें वास करते हुए उन्होंने अनेक ग्रन्थोंका प्रकाश किया॥ 42-45 ॥ अनुभाष्य—भक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें कहा गया है— श्रीमद्भागवत-अर्थ यैछे आस्वादिल। ताहा श्रीवैष्णवतोषणीते प्रकाशिल॥ 535 ॥” × × × “हेन सनातन-रूप प्रभुर आज्ञाते। वर्णिल यतेक ताहा व्यापिल जगते॥ 790 ॥ श्रीरूप श्रीहंसदूत-आदि ग्रन्थ कैला। सनातन भागवतामृतादि वर्णिला॥ 791 ॥ श्रीवैष्णव-तोषणी करिया सनातन। 10 ।

पहला अध्याय 1/42–45 ]

श्रीजीवेरे आज्ञा दिला करिते शोधन॥ 792 ॥ आज्ञा पाइया श्रीजीव लघूतोषणी करिला। यैछे करिलेन ताहा तथाइ लिखिला॥ 793 ॥ चौद्दशत सप्तछये (1476) सम्पूर्ण 'बृहत्'। पनरशत चारि (1504) शके 'लघु' सुसम्मत॥ 794 ॥ तथाहि लघु-तोषण्याम्— “तयोरनुजसृष्टेषु काव्यं श्रीहंसदूतकम्। श्रीमदुद्धवसन्देशश्छन्दोऽष्टादशकं तथा॥ 796 ॥ स्तवस्योत्कलिकावल्ली गोविन्दविरुदावली। प्रेमेन्दुसागराद्याश्च बहवः सुप्रतिष्ठिताः॥ 797 ॥ विदग्ध-ललिताग्र-माधवं नाटकद्वयम्। भाणिका दानकेल्याख्या रसामृतयुगं पुनः॥ 798 ॥ मधुरामहिमा पद्यावली नाटकचन्द्रिका। संक्षिप्त-श्रीभागवतामृतमेते च संग्रहाः॥ 799 ॥ तथाग्रजकृतेष्वग्रं श्रील-भागवतामृतम्। हरिभक्तिविलासश्च तट्टीका दिक्प्रदर्शिनी॥ 800 ॥ लीलास्तवटिप्पनी च सेयं वैष्णवतोषणी। या संक्षिप्ता मया क्षुद्रजीवेनापि तदाज्ञया॥ 801 ॥ शके षट्सप्ततिमन्नौ पूर्णेयं टिप्पणी शुभा। संक्षिप्ता युगशून्याग्रपञ्चैकगणिते तथा॥ 803 ॥” श्रीजीवेर शिष्य कृष्णदास अधिकारी। तिँह निज-ग्रन्थे इहा कहिल विस्तारि'॥ 805 ॥ “तयोर्येष्ठस्य कृतिषु श्रीसनातननामिनः। सिद्धान्तग्रन्थसन्दोहाल्लेखोल्लेखो विधीयते॥ 809 ॥ प्रथमादिद्वयं खण्डयुग्मं भागवतामृतम्। हरिभक्तिविलासश्च तट्टीका-दिक्प्रदर्शिनी। लीलास्तव-टिप्पनी च नाम्ना वैष्णवतोषणी॥ 810 ॥ तयोरनुजसृष्टेषु काव्यं श्रीहंसदूतकम्। श्रीमदुद्धवसन्देशः कृष्णजन्मतिथेर्विधिः॥ 822 ॥ बृहल्लघुतया ख्याता श्रीगणोद्देशदीपिका। श्रीकृष्णस्य प्रियाणाञ्च स्तवमाला मनोहरा॥ 823 ॥ विदग्धमाधवः ख्यातस्तथा ललितमाधवः। दानलीलाकौमुदी च तथा भक्तिरसामृतम्॥ 824 ॥ उज्ज्वलाख्यो नीलमणिः प्रयुक्ताख्यातचन्द्रिका। मधुरामहिमा पद्यावली नाटकचन्द्रिका॥ 825 ॥ संक्षिप्त-श्रीभागवतामृतमेते च संग्रहाः 1826 (क)। श्रीमद्वल्लभपुत्र-श्रीजीवस्य कृतिषूच्यते। शब्दानुशासनं नाम्ना हरिनामामृतं तथा॥ 843 ॥ तत्सूत्रमालिका तत्र प्रयुक्तो धातुसंग्रहः। कृष्णार्थादीपिका सूक्ष्मा गोपालविरुदावली॥ 844 ॥ रसामृतस्य शेषश्च श्रीमाधवमहोत्सवः। सङ्कल्प-कल्पवृक्षो यश्चम्पूभावार्थसूचकः॥ 845 ॥ टीका गोपालतापन्याः संहितायाश्च ब्रह्मणः। रसामृतस्योज्ज्वलस्य योगसार-स्तवस्य च॥ 846 ॥ तथा चाग्निपुराणस्थ-गायत्रीविवृतिरपि। श्रीकृष्णपदचिह्नानां पाद्मोक्तानामथापि च॥ 847 ॥ लक्ष्मीविशेषरूपा या श्रीमद्वृन्दावनेश्वरी। तस्याः करपदस्थानां चिह्नानाञ्च समाहतिः॥ 848 ॥ पूर्वोत्तरतया चम्पूद्वयी या च त्रयी त्रयी। सन्दर्भाः सप्तविख्याताः श्रीमद्भागवतस्य वै॥ 849 ॥ तत्त्वाख्यो भगवत्संज्ञः परमात्मारव्य एव च। कृष्णभक्तिप्रीतिसंज्ञाः क्रमाख्यः सप्तमः स्मृतः॥ 850 ॥ सम्बन्धश्चाभिधेयश्च प्रयोजनमिति त्रयम्। हस्तामलकवद् येषु सद्भिराधैः प्रकाशितम्॥ 851 ॥”

अर्थात् “श्रीमद्भागवतका अर्थ जिस रूपमें श्रीसनातन गोस्वामीने आस्वादन किया, उसे उन्होंने अपने द्वारा रचित श्रीवैष्णवतोषणी-टीकामें प्रकाशित किया। महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीसनातन और श्रीरूप गोस्वामीने अपने ग्रन्थोंमें जितना वर्णन किया, वह समस्त जगत्में व्याप्त हुआ। श्रीरूप गोस्वामीने हंसदूतादि ग्रन्थोंकी रचना की। श्रीसनातन गोस्वामीने भागवतामृतादिकी रचना की। श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीवैष्णवतोषणीकी रचना करके श्रीजीव गोस्वामीको उसका संशोधन करनेकी आज्ञा दी। आज्ञा प्राप्त करके श्रीजीवने वैष्णवतोषणीके अनुरूप ही लघुतोषणीकी रचना की। 1476 शकाब्दमें बृहद्-वैष्णवतोषणी सम्पूर्ण हुई और 1504 शकाब्दमें लघुतोषणी पूर्ण हुई, यह सर्वसम्मत है। श्रीसनातन गोस्वामीके छोटे भाई श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा लिखित श्रीहंसदूत काव्य, श्रीमद्-उद्धवसन्देश, छन्दोऽष्टादशक ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं। (इनके अतिरिक्त) उनके स्तवमाला, गोविन्दविरुदावली, प्रेमेन्दुसागरादि बहुत सुप्रसिद्ध ग्रन्थ हैं। (इन सबके अतिरिक्त) ललितमाधव और विदग्धमाधव नामसे दो नाटक, दानकेली-नाटिका, रसामृत-युगल, मधुरामहिमा, नाटक-चन्द्रिका तथा संक्षिप्त (लघु) श्रीभगवतामृत आदि संग्रह ग्रन्थ हैं।

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[ 1/35-45 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

श्रीरूपके बड़े भाई श्रीसनातन गोस्वामीके द्वारा लिखित ग्रन्थोंमें पहले श्रीभागवतामृत, उसके बाद दिग्दर्शिनी-टीका सहित हरिभक्तिविलास, उसके बाद लीलास्तव और अनन्तर यह दशमटिप्पनी वैष्णवतोषणी उनकी आज्ञासे क्षुद्रजीव होनेपर भी मेरे (जीव गोस्वामीके) द्वारा संक्षिप्त रूपमें लिखी गयी है। 1476 शकाब्दमें यह मङ्गल प्रदान करनेवाली वैष्णवतोषणी टिप्पणी पूर्ण हुई। और 1504 शकाब्दमें लघुतोषणी समाप्त हुई। श्रीजीव गोस्वामीके प्रिय शिष्य श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी हैं, जिन्होंने अपने ग्रन्थमें इस विषयमें विस्तारसे लिखा है। श्रीसनातन गोस्वामी, जो ज्येष्ठ भ्राता हैं, उनके द्वारा रचित सिद्धान्तग्रन्थ-समूहसे उनके द्वारा रचित ग्रन्थमालाका नाम उल्लेख कर रहा हूँ। श्रीसनातन गोस्वामी प्रभुके द्वारा लिखित ग्रन्थ ये हैं—प्रथम और द्वितीय खण्डयुक्त भागवतामृत, हरिभक्तिविलास, उसकी दिग्दर्शिनी टीका, लीलास्तव और वैष्णवतोषणी नामक टिप्पणी। श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा प्रणीत कुछ विशिष्ट ग्रन्थोंके नाम—श्रीहंसदूत काव्य, श्रीमद्-उद्धवसन्देश, श्रीकृष्णजन्मतिथि-विधि, श्रीबृहद्-गणोद्देशदीपिका, श्रीलघुगणोद्देशदीपिका, श्रीकृष्ण और उनके प्रिय गणोंकी मनोहर स्तवमाला, प्रसिद्ध विदग्धमाधव और ललितमाधव, दानलीलाकौमुदी, भक्तिरसामृतसिन्धु, उज्ज्वलनीलमणि, प्रयुक्ताख्यातचन्द्रिका, मथुरा-महिमा, पद्यावली, नाटकचन्द्रिका तथा लघुभागवतामृत आदि संग्रह ग्रन्थ। श्रीवल्लभके पुत्र श्रीजीव गोस्वामीके द्वारा रचित ग्रन्थोंमें कुछके नाम इस प्रकार हैं—श्रीहरिनाममृत नामक व्याकरण, उसकी सूत्रमालिका, उसके साथ धातुसंग्रह, अल्प आकारमें कृष्ण-अर्चन-दीपिका, गोपालविरुदावली रसामृतका शेष अंश, श्रीमाधवमहोत्सव, सङ्कल्प-कल्पवृक्ष, भावार्थसूचक-चम्पू, गोपालतापनी-टीका, ब्रह्मसंहिता-टीका, भक्तिरसामृतसिन्धुकी टीका, उज्ज्वलनीलमणिकी टीका, योगसार-स्तवकी टीका, अग्निपुराणमें वर्णित गायत्रीकी विवृति, पद्मपुराणमें उक्त श्रीकृष्णपदचिह्नकी विवृति, मूललक्ष्मीरूपा श्रीवृन्दावनेश्वरी श्रीराधिकाके हस्त-पदके चिह्नसमूहका संग्रह, गोपालचम्पू- पूर्वभाग, गोपालचम्पू-उत्तरभाग। श्रीमद्भागवतके विख्यात सात सन्दर्भ, जैसे—तत्त्वसन्दर्भ, भगवत्सन्दर्भ, परमात्म-सन्दर्भ, कृष्णसन्दर्भ, भक्तिसन्दर्भ, प्रीतिसन्दर्भ और क्रमसन्दर्भ—जिनके द्वारा श्रेष्ठ महाजन श्रीजीव गोस्वामीने सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन, इन तीनों तत्त्वोंको हथेलीमें रखे आँवलेके समान सहज ही समझ आनेवाले रूपमें प्रकाशित किया है।” 'भागवतसन्दर्भ'—इसका दूसरा नाम 'षट्सन्दर्भ' है। प्रथम 'तत्त्वसन्दर्भ' में—सभी प्रमाणोंकी अपेक्षा श्रीमद्भागवतकी श्रेष्ठता और तत्त्व-निरूपण। द्वितीय 'भगवत्-सन्दर्भ' में—ब्रह्म-परमात्माका विचार, वैकुण्ठ और विशुद्धसत्त्वका निरूपण, भगवद्-स्वरूपका स्वशक्तित्व, श्रीभगवान् विरुद्ध शक्तियोंके आश्रय, उनमें अचिन्त्य शक्ति है और यह अनेक प्रकारकी है; अन्तरङ्गादि भेद, मायाशक्ति, स्वरूपशक्तिके गुण स्वरूपभूत हैं, भगवान्का श्रीविग्रह नित्य है, उनकी विभुता, सर्वाश्रयता, स्थूल-सूक्ष्मसे पृथक्ता, उनका स्वप्रकाशत्व, रूप-गुण- लीलामयत्व, अप्राकृतत्व, पूर्ण स्वरूपत्व; परिकर-समूहका स्वरूपांशत्व; वैकुण्ठ, पार्षद और त्रिपादविभूतिका अप्राकृतत्व, ब्रह्म और भगवान्का तारतम्य, भगवत्तामें पूर्णत्व, सभी वेदोंका अभिधेयत्व, स्वरूप शक्तिका विवरण, श्रीभगवान् एकमात्र भक्ति-ग्राह्य। तृतीय 'परमात्म-सन्दर्भ' में—परमात्मा, उनके भेद, गुणावतारोंका तारतम्य, जीव, माया, जगत्, परिणामवाद-स्थापन, विवर्त्त-समाधान, जगत् और परमात्माका अनन्यत्व, जगत्की सत्यता और श्रीधर स्वामीका मत, निर्गुण ईश्वरकी कर्तृत्व-योजना, लीलावतार-समूहकी भक्तोंके उद्देश्यसे प्रवृत्ति, छह प्रकारके चिह्नोंके (लक्षणोंके) द्वारा भगवान्का ही तात्पर्यत्व। चतुर्थ 'कृष्ण सन्दर्भ' में—कृष्णकी स्वयं भगवत्ता, कृष्ण-लीलागुण, पुरुषावतारोंका कर्तृत्व, श्रीधर स्वामीकी सम्मति, सभी शास्त्रोंमें कृष्ण-समन्वय,

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पहला अध्याय [1/35–45]

बलदेव आदिका महासङ्कर्षणत्व, कृष्णमें सभी अंशोंके प्रवेशका विचार और उनमें नित्यस्थिति, द्विभुजत्व, गोलोक-निरूपण, वृन्दावनादि कृष्णके नित्यधाम, गोलोक और वृन्दावन एक ही वस्तु, यादव और गोप कृष्णके नित्य परिकर, प्रकट-अप्रकट लीलाकी व्यवस्था, प्रकट-अप्रकट लीलाका समन्वय, श्रीकृष्णका गोकुलमें सर्वाधिक प्रकाश, पट्टमहिषियोंका स्वरूप-शक्तित्व, उनकी अपेक्षा गोपियोंका उत्कर्ष, उनके नाम और राधिकाकी सर्वोत्कर्षता। पञ्चम 'भक्ति-सन्दर्भ' में-भगवद्भक्ति साक्षात् अभिधेय तत्त्व, अन्वय और व्यतिरेक भावसे भक्तितत्त्वका निरूपण, सर्वशास्त्र-श्रवण, वर्णाश्रम आचार और उसके अन्तर्भुक्त ज्ञानके द्वारा अन्वय भावसे कर्मका अनादर, हरिविमुख ब्राह्मणकी निन्दा, भगवदर्पित कर्मका अनादर, योगका अनादर, ज्ञानके श्रमत्व-प्रदर्शनसे और अन्याश्रयोंकी (अन्य देवी-देवताओंकी) स्वतन्त्रताके अनादरके द्वारा उन देवी-देवताओंका भगवान्‌के भक्तरूपमें आदर-विधान, अभक्तमात्रका अनादर, जीवन्मुक्त और परम मुक्त शिवादि तक भक्तोंकी भक्तिकी नित्यता और अभिधेयत्व, भक्तिमें सर्वफल देनेकी योग्यता, निर्गुणता, स्व-प्रकाशता और परमसुखरूपता, भगवत्-प्रीति हेतु वैशिष्ट्य, भजनाभाससे भी फललाभ, निष्काम भक्तिकी प्रशंसा, अधिकारी-भेदसे पुनः निष्काम-भक्तिकी स्थापना, साधुसङ्गका मूल कारण, महाभागवतोंमें भेद और विशेषता, सर्वाश्रय-विवेक, भक्ति-भेद-निरूपणमें ज्ञानका लक्षण, अहंग्रहोपासनाका लक्षण, भक्ति-लक्षण, आरोपसिद्धा आदिके लक्षण, वैधीभक्तिमें शरणागति, गुरुसेवा, महाभागवत-प्रसङ्ग, उनकी परिचर्या, साधारण वैष्णवसेवा; श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, अपराध और उनको दूर करनेके उपाय, वन्दन, दास्य, सख्य, आत्मनिवेदन; रागानुगा भक्तिका विचार, कृष्ण-भजनका वैशिष्ट्य और सिद्धिका क्रम। छठे 'प्रीति-सन्दर्भ' में-प्रीतिका परम पुरुषार्थ निरूपण, मुक्तिमें सविशेष और निर्विशेष भेद, जीवन्मुक्ति (शरीर रहते हुए मुक्ति) और उत्क्रान्त (देहत्यागके बाद) मुक्तिमें भेद, सभी प्रकारकी मुक्तियोंकी अपेक्षा भगवत्-प्रीतिका आधिक्य, परतत्त्वके साक्षात्कारसे परम-पुरुषार्थकी प्राप्ति, सद्यो-मुक्ति, क्रम-मुक्ति, ब्रह्मसाक्षात्कार और भगवत्-साक्षात्कार- लक्षणारूपा जीवन्मुक्ति और उत्क्रान्त मुक्ति। अन्तर और बाहरके भेदसे भगवत्-साक्षात्कारके लक्षणोंके दो प्रकार, ब्रह्मसाक्षात्कार-लक्षणाकी अपेक्षा श्रेष्ठत्व, बाहरी साक्षात्कार लक्षणा जीवन्मुक्ति और उत्क्रान्त मुक्ति, सालोक्यादि भेद, सामीप्यका आधिक्य, भक्तिका मुक्तित्व और उपादेयत्व; उसकी उपपत्ति, प्रीतिका स्वरूप-लक्षण, गुणातीत प्रीतिका तटस्थ लक्षण और आविर्भाव-भेद, प्रीति-रति आदिका भेद, व्रजदेवियोंके कामका शुद्धप्रेमके रूपमें स्थापन, ज्ञान-भक्ति आदिका मिश्रत्व, परिकर अभिमानी गणोंकी प्रीतिका उत्कर्ष, ऐश्वर्य और माधुर्यके अनुभवका तारतम्य, गोकुलवासियोंकी श्रेष्ठता, उनकी अपेक्षा सखाओं, पितृगणों, गोपियों और राधिकाका उत्तरोत्तर श्रेष्ठत्व, अनुकरण-कार्यमें रसत्व, लौकिक रसकी अपेक्षा श्रेष्ठता, आलम्बन-विभाग, उद्दीपन-विभाग, गुण, धीरोदात्तादि भेद, माधुर्यकी उत्तमता, अनुभाव, सञ्चारी, रसके पाँच प्रकार, गौणरसके सात प्रकार; रसाभास, शान्त, दास्य, प्रश्रय (सख्य), वात्सल्य और उज्ज्वलमें वल्लभभेद, स्थायी, सम्भोग और विप्रलम्भ-भेद, पूर्वराग, मान, प्रेमवैचित्त्य, प्रवास और श्रीराधिका देवीकी महिमा। गोपालचम्पूके दो विभाग हैं—पूर्व और उत्तर। पूर्वचम्पूमें तैंतीस पूरण और उत्तरचम्पूमें सैंतीस पूरण हैं। पूर्वचम्पू 1510 शकाब्द (1588 ईसवी) में सम्पूर्ण हुआ। पूर्व चम्पूके पूर्व विभागके 33 पूरण-1) वृन्दावन और गोलोक, 2) प्रस्तावना, पूतनावध लीला वर्णन, यशोदाके आदेशसे गोपियोंका गृह-गमन, राम-कृष्णका स्नान, स्निग्धकण्ठ और मधुकण्ठ, 3) यशोदाजीका स्वप्न, 4) जन्मोत्सव, 5) नन्द-वसुदेवका मिलन, पूतनावध, 6) औत्थानिक (उठनेकी) लीला, शकटभञ्जन, नामकरण, 7) तृणावर्तवध, मिट्टी-भक्षण, बाल-चापल्य, चोरी करना, 8) दधिमन्थन, स्तनपान, दधिभाण्ड-भञ्जन,

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[ 1/35-49 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

बन्धन, यमलार्जुन भञ्जन, यशोदा-विलाप, 9) वृन्दावन 34) राधाकृष्णका अलङ्करण, 35) राधामाधव-विवाह प्रवेश, 10) वत्सासुरवध, बकासुरवध, व्योमासुरवध, निर्वाह, 36) राधा-माधवका मिलन, 37) गोलोक प्रवेश। 11) अघासुरवध, ब्रह्ममोहन, 12) गोष्ठ गमन, आदिलीला 10/85 संख्याका अनुभाष्य देखें॥ 35-44 ॥ 13) गोचारण, कालियदमन, 14) गर्दभासुरवध, कृष्णलालन, महाप्रभुके संन्यासके बादके पहले वर्षमें श्रीअद्वैतादि 15) गोपियोंका पूर्वानुराग, 16) प्रलम्बासुरवध, दावाग्नि-पान, गौड़ीय भक्तोंका पुरीमें गमन :— 17) गोपियोंकी कृष्णचेष्टा अर्थात् कृष्णकी लीलाओंका प्रथम वत्सरे अद्वैतादि भक्तगण। अनुकरण, 18) गोवर्धन धारण, 19) कृष्णाभिषेक, प्रभुरे देखिते कैला नीलाद्रि-गमन॥ 46 ॥ 20) वरुणालयसे नन्द महाराजको लाना, गोपोंका पुरीमें कीर्तनादिके द्वारा चातुर्मास्य व्यतीत करना :— गोलोक दर्शन, 21) कात्यायनीव्रतानुष्ठान, 22) यज्ञपत्नियोंसे रथयात्रा देखि' ताहाँ रहिला चारिमास। अन्नभिक्षा, 23) गोपियोंका मिलन, 24) गोपीविहार, प्रभुसङ्गे नृत्यगीत परम उल्लास॥ 47 ॥ राधा-कृष्णका अन्तर्धान होना, गोपियोंके द्वारा ढूँढ़ना, अनुवाद-महाप्रभुके संन्यास ग्रहणके एक वर्ष बाद 25) कृष्णका प्रकट होना, 26) गोपियोंका सङ्कल्प, श्रीअद्वैताचार्य आदि भक्त महाप्रभुके दर्शनके लिये 27) जलविहार, 28) सर्पग्रस्त नन्द महाराजका उस बङ्गालसे नीलाचल गये। नीलाचलमें उन्होंने श्रीजगन्नाथदेवकी बन्धनसे मोचन, 29) विविध रहःक्रीड़ा, 30) शङ्खचूड़वध, रथयात्रामें भाग लिया और महाप्रभुके सङ्ग नृत्य-गीत होली, 31) अरिष्टासुरवध, 32) केशीवध, 33) नारदका करते हुए आनन्दसे चार मास बिताये॥ 46-47 ॥ आगमन, ग्रन्थ रचनाका शक और सम्वत्। महाप्रभुका भक्तोंको प्रति वर्ष रथयात्रा-दर्शनके उत्तरचम्पूके 37 पूरण-1) ब्रजानुराग, 2) अक्रूरकी लिये आनेका आमन्त्रण :— क्रूरता, 3) मथुरापुर नामक स्थानमें प्रस्थान, 4) मथुरान्त विदाय-समय प्रभु कहिला सबारे। प्रदेशका निर्देश, 5) कंसवध, 6) ब्रजपति-विसर्जन-कष्ट "प्रत्यब्द आसिबे सबे गुण्डिचा देखिबारे॥" 48 ॥ (अर्थात् नन्द महाराजको ब्रजमें भेजनेका कष्ट), अनुवाद-चार मासके अन्तमें महाप्रभुने उन्हें विदा 7) नन्दका ब्रजमें प्रवेश, 8) अध्ययन आदि, करते हुए प्रत्येक वर्ष श्रीजगन्नाथदेवकी गुण्डिचा मन्दिर 9) गुरुपुत्रको लाना, 10) उद्धवका ब्रजागमन, तककी रथयात्राके दर्शनके लिये आनेके लिये आमन्त्रित 11) भ्रमरमें दूतका भ्रम, 12) उद्धवका वापिस लौटना, किया॥ 48 ॥ 13) जरासन्ध-बन्धन, 14) यवन जरासन्ध, अमृतप्रवाह भाष्य-'गुण्डिचा'-श्रीजगन्नाथदेव रथयात्रामें 15) बलभद्र-विवाह, 16) रुक्मिणी विवाह, 17) सप्तविवाह, 'सुन्दराचल'-नामक स्थानमें 'गुण्डिचा'-नामक मन्दिरमें 18) नरकासुर वध, पारिजात हरण, सोलह हज़ार जाकर नौ दिन लीला करते हैं, इसलिये रथयात्राको महिषियोंके साथ विवाह, 19) बाणासुरपर विजय, उड़ीसावासी 'गुण्डिचा-यात्रा' कहते हैं॥ 48 ॥ 20) बलरामजीकी व्रजमें जानेकी कामना, 21) पौण्ड्र प्रति वर्ष गौड़ीय भक्तोंका पुरीमें रथयात्रा-दर्शन :— 22) द्विविध-वध, हस्तिनापुर आलोचना, 23) कुरुक्षेत्रकी प्रभु-आज्ञाय भक्तगण प्रत्यब्द आसिया। यात्रा, 24) व्रजवासियोंकी कुरुक्षेत्र यात्रा, 25) उद्धव-मन्त्रणा, गुण्डिचा देखिया या'न प्रभुरे मिलिया॥ 49 ॥ 26) राज-मोचन, 27) राजसूय, 28) शाल्व-वध, अनुवाद-महाप्रभुकी आज्ञानुसार भक्त लोग प्रति 29) व्रज आगमन-विषयक विचार, 30) कृष्णका व्रज-आगमन, 31) राधादिकी बाधाका समाधान, 32) सर्वसमाधान, 33) राधामाधव-अधिवास,

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यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति (लाइन मार्कर सहित) प्रस्तुत है:

पहला अध्याय 1/49–56 ] वर्ष रथयात्राके समय नीलाचल आते और महाप्रभुके साथ मिलकर 'गुण्डिचा-यात्रा'के दर्शन करते ॥ 49 ॥ अन्तिम चौबीस वर्षोंमेंसे बारह वर्षोंतक भक्तोंके साथ महाप्रभुका मिलन :— द्वादश वत्सर ऐछे कैला गतागति। अन्योऽन्ये दुँहार दुँहा बिना नाहि स्थिति ॥ 50 ॥ अनुवाद—भक्त लोग बारह वर्षोंतक प्रतिवर्ष महाप्रभुसे मिलने नीलाचल आते रहे, क्योंकि उनका प्रेम इतना प्रगाढ़ था कि वे एक दूसरेके बिना नहीं रह सकते थे ॥ 50 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभु और उनके भक्त एक-दूसरेसे मिले बिना सुखी नहीं हो सकते ॥ 50 ॥ अन्तिम बारह वर्षोंमें महाप्रभुका श्रीकृष्णविरह :— तार शेष येइ रहे द्वादश वत्सर। कृष्णेर विरहलीला प्रभुर अन्तर ॥ 51 ॥ अनुवाद—नीलाचलमें अन्त्यलीलाके जो बाकी बारह वर्ष थे, महाप्रभुने उनमें केवल श्रीकृष्ण-विरहमें विप्रलम्भ रसका आस्वादन किया ॥ 51 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गोपियोंकी श्रीकृष्णविरह-लीला महाप्रभुके अन्तःकरणमें सदा जाग्रत रहती थी ॥ 51 ॥ रात-दिन कृष्णविरहसे उत्पन्न दिव्योन्माद :— निरन्तर रात्रि-दिन विरह उन्मादे। हासे, कान्दे, नाचे, गाय परम विषादे ॥ 52 ॥ अनुवाद—दिन-रात निरन्तर वे विरहके उन्मादमें ग्रस्त होकर कभी हँसते, कभी रोते, कभी नाचते और कभी दुःखमें विकल होकर गाते ॥ 52 ॥ दीर्घ-विरहके अन्तमें श्रीराधिकाके कृष्णदर्शनसे उत्पन्न भावोंमें विभोर भावमय महाप्रभुका श्रीजगन्नाथ दर्शन :— ये-काले करेन जगन्नाथ-दरशन। मने भावेन, कुरुक्षेत्रे पाञाछि मिलन ॥ 53 ॥ अनुवाद—महाप्रभु जब भी श्रीजगन्नाथजीके दर्शन करते, उनके हृदयमें कुरुक्षेत्रमें श्रीकृष्णसे मिल रहीं राधाजीके भाव उदित हो जाते ॥ 53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णने कुरुक्षेत्रमें यज्ञका आयोजन किया और व्रजवासियोंको उसमें आमन्त्रित किया। गोपियोंने वहाँ जाकर श्रीकृष्णदर्शन-सुखको प्राप्त किया। महाप्रभुके अन्तःकरणमें सदा श्रीकृष्णविरहके भाव उद्दीप्त रहते थे। केवल जब-जब वे श्रीजगन्नाथजीके दर्शन करते, तब-तब कुरुक्षेत्र-मिलन-भाव उनके हृदयमें उदित होते थे ॥ 53 ॥ रथके आगे नृत्य करते समय महाप्रभुका गान :— रथयात्राय आगे यबे करेन नर्त्तन। ताहाँ एइ पद मात्र करये गायन ॥ 54 ॥ वह पद :— “ 'सेइत' पराण-नाथ पाइनु। याहा लागि' मदनदहने झुरि' गेनु ॥” 55 ॥ अनुवाद—महाप्रभु जब रथयात्रामें श्रीजगन्नाथजीके सामने नृत्य करते, तब वे यही एक पद गाया करते थे—मैंने उन्हीं प्राणनाथको पा लिया है, जिनके विरहमें मैं कामाग्निकी ज्वालामें जलकर म्लान हो रही थी ॥ 54-55 ॥ श्रीजगन्नाथजीके गुण्डिचा जाते समय महाप्रभुके भाव :— एइ धुया-गाने नाचेन द्वितीय प्रहर। कृष्ण लञा व्रजे याइ—एभाव अन्तर ॥ 56 ॥ अनुवाद—राधाजी श्रीकृष्णको वृन्दावन ले जा रही हैं, अन्तरमें इस राधा-भावसे महाप्रभु द्वितीय प्रहरमें विशेष रूपसे यही गान करते हुए नाचते ॥ 56 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कुरुक्षेत्रमें मिलनसे सन्तोष प्राप्त नहीं हुआ, इसलिये श्रीकृष्णको व्रजमें ले जाकर वहाँ उनके साथ मिलन हो, ऐसे भाव महाप्रभुके हृदयमें सदा उठते थे ॥ 56 ॥ । 15

[ 1/53-58 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—महाप्रभुने राधाभावमें विभावित होकर सुदीर्घ माथुरविरहभावको ग्रहण किया। इसके द्वारा निरन्तर सम्भोगके पुष्टिकारक विप्रलम्भ-रसके मूर्त्तिमान् विग्रह बनकर उन्होंने जीवोंके एकमात्र भजन-साधनको जगत्को जनाया है। श्रीमद्भागवतके दसवें स्कन्धके 82वें अध्यायमें वर्णित है कि श्रीकृष्ण दर्शनके लिये उत्सुका गोकुलवासिनी सभी व्रजगोपियाँ स्यमन्तपक्षके ग्रहणके उपलक्ष्यमें कुरुक्षेत्र गयी थीं। वहाँ पहुँचकर उन्होंने जिस प्रकार हृदयके भावोंका प्रकाश किया था, दूसरी बार वही भाव श्रीगौरसुन्दरने नीलाचलपति श्रीजगन्नाथके दर्शनमें प्रकाशित किये थे। कुरुक्षेत्रमें गोपियाँ जिस प्रकार श्रीकृष्णके ऐश्वर्य-भावको दूर करके उन्हें गोकुलके माधुर्य-आस्वादनमें ले जानेका प्रयास कर रही थीं, उसी प्रकार श्रीगौरहरि कुरुक्षेत्ररूप नीलाचल मन्दिरसे श्रीकृष्णरूप श्रीजगन्नाथदेवको वृन्दावनरूप गुण्डिचा मन्दिरकी ओर ले जा रहे थे। रथके सामने श्रीगौरसुन्दर स्वयंमें उदित वृषभानुनन्दिनीके हृदयके भावका गान करते हुए श्रीकृष्णको पारकीय विहारस्थली गुण्डिचामें ले जा रहे थे॥ 53-56॥ गुह्य श्लोक :— एइभावे नृत्यमध्ये पड़े एक श्लोक। सेइ श्लोकेर अर्थ केह नाहि बूझे लोक॥ 57॥ अनुवाद—इस भावमें डूबकर नृत्य करते हुए महाप्रभुने एक श्लोक पढ़ा जिसका गूढ़ अर्थ कोई नहीं समझ सका॥ 57॥ पूर्वोक्त भावद्योतक श्लोक :— काव्यप्रकाश (1/4); साहित्य-दर्पण (1/10); पद्यावली (382) :— यः कौमारहरः स एव हि वरस्ता एव चैत्रक्षपा- स्ते चोन्मीलितमालतीसुरभयः प्रौढ़ाः कदम्बानिलाः। सा चैवास्मि तथापि तत्र सुरतव्यापारलीलाविधौ रेवारोधसि वेतसीतरुतले चेतः समुत्कण्ठ्यते॥ 58॥

अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 58॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिसने कौमारकालमें रेवानदीके तटपर मेरा चित्त हरण किया था, वही अब मेरा पति है; वही मधुमासकी रात्रि भी है; खिले हुए मालती पुष्पोंकी सुगन्ध भी है; कदम्बवनसे वायु भी मधुररूपमें बहकर आ रही है; सुरत-व्यापारलीलाके (प्रेममय विहारके) लिये मैं वही नायिका भी उपस्थित हूँ; तथापि मेरा चित्त इस अवस्थामें सन्तुष्ट नहीं होकर रेवानदीके तटपर वेतसी वृक्षके तलपर जानेके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित हो रहा है॥ 58॥ अनुभाष्य— [हे सखि], यः [कान्तः] कौमारहरः (कौमारं हरति अपनयति यः सः) स एव हि वरः, ताः एव चैत्रक्षपाः (मधुचैत्रमासस्य ज्योत्स्नावत्यः रजन्यः), [तथा] ते च उन्मीलितमालतीसुरभयः (उन्मीलितानिः विकशितानिः यानि मालती पुष्पाणि तैः सुरभयः सुगन्धाः), प्रौढाः (घनसखप्रदाः) कदम्बानिलाः (कदम्ब-सुरभिपूर्णाः समीराणाः) [वहन्ति], सा च अहमेवास्मि, तथापि तत्र रेवारोधसि (रेवानदीतटे) वेतसीतरुतले (वेतसीकण्टक-वेष्टिते निर्जन-सुशीतलप्रदेशे) सुरतव्यापारलीलाविधौ (नायकसङ्गाकाङ्क्षायां यत्र पूर्वसङ्गमो जातस्तत्रैव) चेतः (मनः) समुत्कण्ठते (विहर्तुं उत्सहते)। श्लोक-भावानुवाद—एक नायिका अपनी एक सखीसे कहती है,–“जिसने कौमारावस्थामें मेरे चित्तका हरण किया था, अब वही मेरा वर है अर्थात् वैवाहिक पति है। उसके साथ कौमारावस्थामें प्रथम मिलनके समय जो चैत्रमाहकी ज्योत्स्नामयी रात्रि थी, अब भी वही चैत्रमाहका ज्योत्स्नामय रात्रिकाल है। प्रथम मिलनके समयकी भाँति खिली हुई मालती पुष्पोंकी भीनी-भीनी मधुर सुगन्धयुक्त वायु अब भी कदम्ब वनकी ओरसे प्रवाहित हो रही है; मैं भी वही हूँ; फिर भी उसी रेवा नदीके तटपर निर्जन सुशीतल प्रदेशमें बेंतके वृक्षके नीचे प्रथम मिलनके समयवाली सुरत-व्यापारलीला अर्थात् प्रेममय विहारके लिये मेरा मन उत्कण्ठित हो रहा है॥” 58॥ 16 ।