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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
अध्याय ९ ]पशु, पाश एवं पशुपतिकी व्याख्या... पशुपाशमोक्षविवरण६१३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सनत्कुमार उवाच<br>कथं पशुपतिर्देवः पशवः के प्रकीर्तिताः ॥ ९<br>कैः पाशैस्ते निबध्यन्ते विमुच्यन्ते च ते कथम्।सनत्कुमार बोले— भगवान् शिव पशुपति कैसे हुए, कौन लोग पशु कहे गये हैं, वे किन पाशोंसे बाँधे जाते हैं और पुनः वे कैसे मुक्त होते हैं?॥ ९१/२॥
शैलादिरुवाच<br>सनत्कुमार वक्ष्यामि सर्वमेतद्यथातथम् ॥ १०<br>रुद्रभक्तस्य शान्तस्य तव कल्याणचेतसः।<br>ब्रह्माद्याः स्थावरान्ताश्च देवदेवस्य धीमतः ॥ ११<br>पशवः परिकीर्त्यन्ते संसारवशवर्तिनः।<br>तेषां पतित्वाद्भगवान् रुद्रः पशुपतिः स्मृतः ॥ १२शैलादि बोले— हे सनत्कुमार! मैं रुद्रभक्त, शान्तस्वभाव तथा कल्याणभावनासे युक्त चित्तवाले आपको यह सब यथार्थ रूपमें बताऊँगा। ब्रह्मासे लेकर स्थावर-जंगमपर्यन्त सभी मायावशवर्ती हैं और धीमान् देवदेव शिवके पशु कहे जाते हैं। उनका स्वामी होनेके कारण भगवान् रुद्र पशुपति कहे गये हैं॥ १०—१२॥
अनादिनिधनो धाता भगवान् विष्णुरव्ययः।<br>मायापाशेन बध्नाति पशुवत्परमेश्वरः ॥ १३<br>स एव मोचकस्तेषां ज्ञानयोगेन सेवितः।<br>अविद्यापाशबद्धानां नान्यो मोचक इष्यते ॥ १४<br>तमृते परमात्मानं शङ्करं परमेश्वरम्।आदि तथा अन्तसे रहित, धारण करनेवाले, अव्यय, षडैश्वर्यसम्पन्न, सर्वव्यापक, परमेश्वर महेश्वर ही इन जीवोंको मोहाभिभूत पशुके समान मायापाशमें बाँधते हैं तथा वे ही ज्ञानयोगसे आराधित होनेपर उन्हें मुक्ति देनेवाले भी हैं; क्योंकि अविद्यापाशमें बँधे जीवोंको मुक्ति देनेवाला परमात्मा परमेश्वर शंकरके अतिरिक्त कोई अन्य है ही नहीं॥ १३-१४१/२॥
चतुर्विंशतितत्त्वानि पाशा हि परमेष्ठिनः ॥ १५<br>तैः पाशैर्मोचयत्येकः शिवो जीवैरूपासितः।<br>निबध्नाति पशूनेकश्चतुर्विंशतिपाशकैः ॥ १६<br>स एव भगवान् रुद्रो मोचयत्यपि सेवितः।<br>दशेन्द्रियमयैः पाशैैरन्तःकरणसम्भवैः ॥ १७<br>भूततन्मात्रपाशैश्च पशून्मोचयति प्रभुः।<br>इन्द्रियार्थमयैः पाशैर्बद्धा विषयिणः प्रभुः ॥ १८<br>आशु भक्ता भवन्त्येव परमेश्वरसेवया।चौबीस तत्त्व ही भगवान् परमेष्ठीके पाश हैं, वे एकमात्र शिव ही जीवोंके द्वारा आराधित होनेपर उन पाशोंसे मुक्त करते हैं। वे भगवान् रुद्र चौबीस पाशोंसे पशुओं (जीवों)-को बाँधते हैं और वे ही सेवित होनेपर बन्धनमुक्त भी करते हैं। दस इन्द्रियों (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय), अन्तःकरणजन्य भावों [मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त], शब्द आदि पाँच तन्मात्राओं तथा पृथ्‍वी आदि पाँच महाभूतों—इन समस्त विषयरूप पाशोंसे भगवान् शिव पशुओंको छुड़ाते हैं। इन इन्द्रियोंके विषयरूप पाशोंसे बँधे हुए विषयग्रस्त लोग परमेश्वर शिवकी सेवासे शीघ्र ही उनके भक्त हो जाते हैं॥ १५—१८१/२॥
भज इत्येष धातुर्वै सेवायां परिकीर्तितः ॥ १९<br>तस्मात्सेवा बुधैः प्रोक्ता भक्तिशब्देन भूयसी।<br>ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं पशून् बद्ध्वा महेश्वरः ॥ २०<br>त्रिभिर्गुणमयैः पाशैः कार्यं कारयति स्वयम्।<br>दृढेन भक्तियोगेन पशुभिः समुपासितः ॥ २१<br>मोचयत्येव तान् सद्यः शङ्करः परमेश्वरः।भज्—यह धातु सेवा अर्थमें कही गयी है, अतः विद्वज्जनोंने सेवाको भक्ति शब्दसे सम्बन्धित बताया है। ब्रह्मा आदिसे लेकर तृणपर्यन्त सभी पशुओंको [सत्त्व आदि] तीनों गुणरूपी पाशोंसे बाँधकर महेश्वर स्वयं कार्य कराते हैं। पशुओंके द्वारा दृढ़ भक्तियोगसे सम्यक् आराधित होनेपर वे परमेश्वर शंकर उन्हें शीघ्र ही [बन्धनसे] छुड़ा देते हैं॥ १९—२११/२॥
भजनं भक्तिरित्युक्ता वाङ्मनःकायकर्मभिः ॥ २२मन, वचन तथा कर्मसे [प्रभुका] भजन ही
६१४श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
श्लोकअर्थ
सर्वकार्येण हेतुत्वात्पाशच्छेदपटीयसी।<br>सत्यः सर्वग इत्यादि शिवस्य गुणचिन्तना ॥ २३<br>रूपोपादानचिन्ता च मानसं भजनं विदुः।<br>वाचिकं भजनं धीराः प्रणवादिजपं विदुः ॥ २४भक्ति कही गयी है। समस्त प्रपंचोंके पति विष्णुका भी हेतु होनेके कारण वह भक्ति बन्धनको काटनेमें समर्थ है। वे सत्य हैं तथा सर्वव्यापी हैं—शिवके इन गुणोंको जानने तथा उनके रूप और उपादानोंके चिन्तनको विद्वानोंने मानस भजन कहा है और प्रणव (ॐकार)-के जप आदिको उन्होंने वाचिक भजन कहा है, इसी प्रकार सत्पुरुषोंके द्वारा प्राणायाम आदिको कायिक भजन कहा जाता है॥ २२–२४१/२॥
कायिकं भजनं सद्भिः प्राणायामादि कथ्यते।<br>धर्माधर्ममयैः पाशैर्बन्धनं देहिनामिदम् ॥ २५<br>मोचकः शिव एवैको भगवान् परमेश्वरः।<br>चतुर्विंशतितत्त्वानि मायाकर्मगुणा इति ॥ २६<br>कीर्त्यन्ते विषयाश्चेति पाशा जीवनिबन्धनात्।<br>तैर्बद्धाः शिवभक्त्यैव मुच्यन्ते सर्वदेहिनः ॥ २७<br>पञ्चक्लेशमयैः पाशैः पशून् बध्नाति शङ्करः।<br>स एव मोचकस्तेषां भक्त्या सम्यगुपासितः ॥ २८धर्माधर्ममय पाशोंसे जीवोंका यह बन्धन होता है और एकमात्र वे भगवान् परमेश्वर शिव ही [उन पाशोंसे जीवोंको] मुक्त करनेवाले हैं। चौबीस तत्त्व, मायाके गुण और शब्द आदि विषय—ये जीवको बाँधनेके कारण पाश कहे जाते हैं। उन पाशोंसे बँधे हुए सभी प्राणी शिवभक्तिके द्वारा ही मुक्त होते हैं। [अविद्या आदि] पाँच क्लेशरूप पाशोंसे भी वे शिव जीवोंको बाँधते हैं और वे ही भक्तिके द्वारा भलीभाँति उपासित किये जानेपर पाशोंसे उन्हें मुक्त कर देते हैं॥ २५–२८॥
अविद्यामस्मितां रागं द्वेषं च द्विपदां वराः।<br>वदन्त्यभिनिवेशं च क्लेशान् पाशत्वमागतान् ॥ २९<br>तमो मोहो महामोहस्तामिस्र इति पण्डिताः।<br>अन्धतामिस्र इत्याहुरविद्यां पञ्चधा स्थिताम् ॥ ३०<br>ताञ्जीवान् मुनिशार्दूलाः सर्वांश्चैवाप्यविद्यया।<br>शिवो मोचयति श्रीमान्नान्यः कश्चिद्विमोचकः ॥ ३१<br>अविद्यां तम इत्याहुरस्मितां मोह इत्यपि।<br>महामोह इति प्राज्ञा रागं योगपरायणाः ॥ ३२<br>द्वेषं तामिस्र इत्याहुरन्धतामिस्र इत्यपि।<br>तथैवाभिनिवेशं च मिथ्याज्ञानं विवेकिनः ॥ ३३मनुष्योंमें श्रेष्ठ लोग अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेशको जीवोंको बाँधनेवाले [पाँच] क्लेश कहते हैं। पण्डितजन तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्धतामिस्र—इन पाँच प्रकारसे अविद्या आदिको स्थित कहते हैं। हे मुनिश्रेष्ठो! केवल शिव ही उन समस्त जीवोंको अविद्यासे मुक्त कर सकते हैं, उन्हें मुक्त करनेवाला कोई दूसरा नहीं है। योगपरायण महाज्ञानियोंने अविद्याको तम, अस्मिताको मोह और रागको महामोह कहा है, इसी प्रकार विवेकयुक्त जनोंने द्वेषको तामिस्र और मिथ्या ज्ञानरूपी अभिनिवेशको अन्धतामिस्र बताया है॥ २९–३३१/२॥
तमसोऽष्टविधा भेदा मोहश्चाष्टविधः स्मृतः।<br>महामोहप्रभेदाश्च बुधैर्दश विचिन्तिताः ॥ ३४<br>अष्टादशविधं चाहुस्तामिस्रं च विचक्षणाः।<br>अन्धतामिस्रभेदाश्च तथाष्टादशधा स्मृताः ॥ ३५तमके आठ भेद हैं। मोह आठ प्रकारका कहा गया है। विद्वानोंने महामोहके दस भेद बताये हैं। बुद्धिमान् लोगोंने तामिस्रको अठारह भेदोंवाला कहा है। अन्धतामिस्रके अठारह प्रकारके भेद बताये गये हैं॥ ३४-३५॥
अविद्ययास्य सम्बन्धो नातीतो नास्त्यनागतः।<br>भवेद्रागेण देवस्य शम्भोरङ्गनिवासिनः ॥ ३६सर्वान्तर्यामी देवदेव शिवका सम्बन्ध अविद्या तथा रागसे न तो वर्तमानमें है, न पूर्वकालमें रहा है

अध्याय ९ ] पशु, पाश एवं पशुपतिकी व्याख्या 'पशूपाशमोक्षविवरण ६१५


| कालेषु त्रिषु सम्बन्धस्तस्य द्वेषेण नो भवेत्।<br>मायातीतस्य देवस्य स्थाणोः पशुपतेर्विभोः॥ ३७<br>तथैवाभिनिवेशेन सम्बन्धो न कदाचन।<br>शङ्करस्य शरण्यस्य शिवस्य परमात्मनः॥ ३८<br>कुशलाकुशलैस्तस्य सम्बन्धो नैव कर्मभिः।<br>भवेत्कालत्रये शम्भोरविद्यामतिवर्तिनः॥ ३९<br>विपाकैः कर्मणां वापि न भवेदेव सङ्गमः।<br>कालेषु त्रिषु सर्वस्य शिवस्य शिवदायिनः॥ ४० | और न तो भविष्यमें होगा। मायासे परे, देवताओंके भी देव, स्थाणु, पशुपति तथा सर्वैश्वर्यसम्पन्न उन शिवका सम्बन्ध द्वेषसे तीनों कालोंमें नहीं हो सकता। उसी प्रकार शरणदाता तथा कल्याणकारक परमात्मा शिवका सम्बन्ध अभिनिवेशसे भी कभी नहीं सम्भव है। पुण्य तथा पापकर्मोंसे भी अविद्याका अतिवर्तन करनेवाले उन शिवका सम्बन्ध तीनों कालोंमें नहीं है। कल्याण प्रदान करनेवाले सर्वरूप शिवका सम्बन्ध [शुभाशुभ] कर्मोंके फलसे भी तीनों कालोंमें नहीं है॥ ३६-४०॥ | | सुखदुःखैरसंस्पृश्यः कालत्रितयवर्तिभिः।<br>स तैर्विनश्वरैः शम्भुर्बोधानन्दात्मकः परः॥ ४१<br>आशयैरपरामृष्टः कालत्रितयगोचरैः।<br>धियांपतिः स्वभूरेष महादेवो महेश्वरः॥ ४२<br>अस्पृश्यः कर्मसंस्कारैः कालत्रितयवर्तिभिः।<br>तथैव भोगसंस्कारैर्भगवानन्तकान्तकः॥ ४३ | वे बोधानन्दस्वरूप परम शिव तीनों कालोंमें विद्यमान रहनेवाले उन विनाशशील सुख-दुःखोंसे स्पर्श होनेयोग्य नहीं हैं। बुद्धिके स्वामी तथा स्वयं प्रकट होनेवाले वे महादेव महेश्वर तीनों कालोंमें अनुभूत होनेवाली कामनाओंसे भी अस्पृश्य हैं। इसी प्रकार कालका विनाश करनेवाले भगवान् शिव तीनों कालोंमें वर्तमान कर्मसंस्कारों तथा भोगसंस्कारोंसे अस्पृश्य हैं॥ ४१-४३॥ | | पुंविशेषपरो देवो भगवान् परमेश्वरः।<br>चेतनाचेतनायुक्तप्रपञ्चादखिलात्परः ॥ ४४<br>लोके सातिशयत्वेन ज्ञानैश्वर्यं विलोक्यते।<br>शिवेनातिशयत्वेन शिवं प्राहुर्मनीषिणः॥ ४५ | वे परमेश्वर भगवान् महादेव सम्पूर्ण जीवोंसे श्रेष्ठ हैं और जड़-चेतनरूप सम्पूर्ण सृष्टिप्रपंचसे परे हैं। जैसे संसारमें ज्ञान और ऐश्वर्यको अत्यन्त श्रेष्ठ रूपमें देखा जाता है, वैसे ही अतिशय कल्याणरूप होनेसे ही मनीषियोंने महादेवको शिव कहा है॥ ४४-४५॥ | | प्रतिसर्गं प्रसूतानां ब्रह्मणां शास्त्रविस्तरम्।<br>उपदेष्टा स एवादौ कालावच्छेदवर्तिनाम्॥ ४६<br>कालावच्छेदयुक्तानां गुरूणामप्यसौ गुरुः।<br>सर्वेषामेव सर्वेशः कालावच्छेदवर्जितः॥ ४७ | प्रत्येक सर्गमें उत्पन्न होनेवाले तथा कालसीमामें बँधे सभी ब्रह्माओंको सम्पूर्ण शास्त्रोंका आरम्भमें उपदेश करनेवाले वे शिव ही हैं। कालसीमासे रहित वे सर्वेश्वर शिव कालावच्छेदसे युक्त सभी गुरुओंके भी गुरु हैं॥ ४६-४७॥ | | अनादिरेष सम्बन्धो विज्ञानोत्कर्षयोः परः।<br>स्थितयोरीदृशः सर्वः परिशुद्धः स्वभावतः॥ ४८<br>आत्मप्रयोजनाभावे परानुग्रह एव हि।<br>प्रयोजनं समस्तानां कार्याणां परमेश्वरः॥ ४९ | देहमें विद्यमान जीव तथा ईश्वरका यह सेवक तथा सेव्यका सम्बन्ध अनादि है। स्वभावसे अत्यन्त निर्मल तथा विश्वरूप वे शिव माया-सम्बन्धसे रहित हैं। [नित्यानन्दस्वरूप होनेके कारण] अपने प्रयोजनके अभावमें भी वे परमेश्वर शिव जीवके प्रति समस्त कार्योंका प्रयोजनरूप अनुग्रह हैं॥ ४८-४९॥ | | प्रणवो वाचकस्तस्य शिवस्य परमात्मनः।<br>शिवरुद्रादिशब्दानां प्रणवोऽपि परः स्मृतः॥ ५० | प्रणव उन परमात्मा शिवका वाचक है। यह प्रणव |

६१६श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| शम्भोः प्रणववाच्यस्य भावना तज्जपादपि।<br>या सिद्धिः स्वपराप्राप्या भवत्येव न संशयः॥ ५१ | शिव-रुद्र आदि शब्दोंमें श्रेष्ठ कहा गया है। शिवके वाचक प्रणवके जपसे तथा उसकी भावनासे जो सिद्धि होती है, वह अन्य मन्त्रोंके जपसे प्राप्त नहीं होती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५०-५१॥ | | ज्ञानतत्त्वं प्रयत्नेन योगः पाशुपतः परः।<br>उक्तस्तु देवदेवेन सर्वेषामनुकम्पया॥ ५२ | देवदेव आदित्यरूपी शिवने [याज्ञवल्क्यकी तपस्यासे प्रसन्न होकर] सभीकी अनुकम्पासे ज्ञानतत्त्वरूप श्रेष्ठ पाशुपत योगका उपदेश उन्हें दिया था। तत्पश्चात् याज्ञवल्क्यने | | स होवाचैव याज्ञवल्क्यो यदक्षरं गार्ग्ययोगिनः।<br>अभिवदन्ति स्थूलमनन्तं महाश्चर्यमदीर्घमलोहित-<br>ममस्तकमासायमत एवो पुनरसमसङ्गमगन्धमरस-<br>मचक्षुष्कमश्रोत्रमवाङ्मनोतेजस्कमप्रमाणमनुसुख-<br>मनामगोत्रममरमजरमनामयममृतमोंशब्दममृत-<br>मसंवृतमपूर्वमनपरमनन्तमबाह्यं तदश्नाति किञ्चन<br>न तदश्नाति किञ्चन॥ ५३॥ | गार्गीसे कहा—हे गार्गि! अयोगी लोग नाशशून्य जो शिवतत्त्व है, उसे विराट्रूप, अनन्त तथा अत्यन्त आश्चर्यजनक बताते हैं, किंतु योगीलोग उसे अदीर्घ, अलोहित, मस्तक-विहीन, कभी अस्त न होनेवाला, अतएव नित्यानन्दरस-स्वरूप, स्पर्शशून्य, अगन्ध, अरस (रसविहीन), अचक्षुष्क (नेत्रविहीन), अश्रोत्र (कर्णरहित), मन तथा वाणीसे परे, अतेजस्क (अदाहक), अप्रमाण, सुखकारी, नाम तथा गोत्रसे विहीन, मृत्युरहित, जराशून्य, अनामय (रोगरहित), अमृत (मोक्षरूप) ॐकार शब्दसे प्रतिपाद्य, सुधारूप, अनाच्छादित, पूर्वभागसे शून्य, अपरभागशून्य तथा अन्तरहित कहते हैं। वह ब्रह्म सब कुछ खाता है और वह ब्रह्म कुछ भी नहीं खाता है॥ ५२-५३॥ | | एतत्कालव्यये ज्ञात्वा परं पाशुपतं प्रभुम्।<br>योगे पाशुपते चास्मिन् यस्यार्थः किल उत्तमे॥ ५४ | इस उत्तम पाशुपतयोगमें जिस मनुष्यकी अभिरुचि होती है, वह इस श्रेष्ठ पाशुपत योगको जानकर अन्तकालमें परमेश्वरमें विलीन हो जाता है। | | कृत्वोङ्कारं प्रदीपं मृगय गृहपतिं<br>सूक्ष्ममाद्यान्तरस्थं<br>संयम्य द्वारवासं पवनपटुतरं<br>नायकं चेन्द्रियाणाम्।<br>वाग्जालैः कस्य हेतोर्विभटसि तु भयं<br>दृश्यते नैव किंचि-<br>द्देहस्थं पश्य शम्भुं भ्रमसि किमु परे<br>शास्त्रजालेऽन्धकारे॥ ५५ | ॐकाररूप दीपकको प्रज्वलित करके वायुसे भी अधिक वेगसे गति करनेवाले तथा इन्द्रियोंके स्वामी मनको भलीभाँति नियन्त्रित करके अन्तर्यामी, सूक्ष्म तथा सबके आदिस্বরূপ उस परमात्माका अन्वेषण करो। तुम वाग्जालोंमें पड़कर किसलिये वृथा विवाद कर रहे हो। भय तो कुछ भी नहीं दिखायी दे रहा है। अतः तुम अपनी ही देहमें विद्यमान शम्भुको देखो; अन्धकारमय शास्त्रजालमें क्यों भटक रहे हो? इस प्रकार मुमुक्षुको चाहिये कि वह शिवजीके द्वारा मुनियोंके प्रति कहे गये उपदेशपर विद्वानोंके साथ भलीभाँति विचार | | एवं सम्यग्बुधैर्ज्ञात्वा मुनीनामथ चोक्तं शिवेन।<br>असमरसं पञ्चधा कृत्वोभयं चात्मनि योजयेत्॥ ५६ | करके आनन्दरूप आत्मस्वरूपको पंचकोशसे परे करके अभयरूपी मोक्ष प्राप्त करे॥ ५४—५६॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे पाशुपतव्रतवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'पाशुपतव्रतवर्णन' नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ९॥

१०- उमापति शिवके माहात्म्यका वर्णन तथा शिवके आदेशसे ही सृष्टि-पालन आदि सभी कार्योंका संचालन

अध्याय १०] उमापति शिवके माहात्म्यका वर्णन ६१७


दसवाँ अध्याय

उमापति शिवके माहात्म्यका वर्णन तथा शिवके आदेशसे ही सृष्टि-पालन आदि सभी कार्योंका संचालन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सनत्कुमार उवाच<br>भूय एव ममाचक्ष्व महिमानमुमापतेः।<br>भवभक्त महाप्राज्ञ भगवन्नन्दिकेश्वर॥ १ ॥सनत्कुमार बोले— हे शिवभक्त! हे महाप्राज्ञ! हे भगवन्! हे नन्दिकेश्वर! आप उमापति शिवजीकी महिमाका पुनः वर्णन कीजिये॥ १॥
शैलादिरुवाच<br>सनत्कुमारसङ्क्षेपात्तव वक्ष्याम्यशेषतः।<br>महिमानं महेशस्य भवस्य परमेष्ठिनः॥ २ ॥<br>नास्य प्रकृतिबन्धोऽभूद्बुद्धिबन्धो न कश्चन।<br>न चाहङ्कारबन्धश्च मनोबन्धश्च नोऽभवत्॥ ३ ॥<br>चित्तबन्धो न तस्याभूच्छ्रोत्रबन्धो न चाभवत्।<br>न त्वचां चक्षुषां वापि बन्धो जज्ञे कदाचन॥ ४ ॥<br>जिह्वाबन्धो न तस्याभूद्घ्राणबन्धो न कश्चन।<br>पादबन्धः पाणिबन्धो वाग्बन्धश्चैव सुव्रत॥ ५ ॥<br>उपस्थेन्द्रियबन्धश्च भूततन्मात्रबन्धनम्।<br>नित्यशुद्धस्वभावेन नित्यबुद्धो निसर्गतः॥ ६ ॥<br>नित्यमुक्त इति प्रोक्तो मुनिभिस्तत्त्ववेदिभिः।शैलादि बोले— हे सनत्कुमार! मैं परमेष्ठी भगवान् महेश्वरकी सम्पूर्ण महिमाको आपसे संक्षेपमें ही कहूँगा। इन शिवजीको प्रकृतिका बन्धन तथा बुद्धिका बन्धन कभी नहीं हुआ, इसी प्रकार अहंकारबन्धन तथा मनोबन्धन भी इन्हें नहीं हुआ। उन्हें न तो चित्तका बन्ध हुआ और न तो श्रोत्रका बन्ध हुआ, उन्हें त्वचा और नेत्रका भी बन्ध कभी नहीं हुआ। हे सुव्रत! उन शिवको जिह्वा, घ्राण, पाद, हाथ, वाणी, जननेन्द्रिय और शब्द आदि पाँच गुणोंका भी कोई बन्धन नहीं हुआ। तत्त्ववेत्ता मुनियोंने नित्य शुद्ध स्वभावके कारण उन शिवको नैसर्गिकरूपसे नित्यबुद्ध तथा नित्यमुक्त बतलाया है॥ २—६ १/२॥
अनादिमध्यनिष्ठस्य शिवस्य परमेष्ठिनः॥ ७ ॥<br>बुद्धिं सूते नियोगेन प्रकृतिः पुरुषस्य च।<br>अहङ्कारं प्रसूतेऽस्या बुद्धिस्तस्य नियोगतः॥ ८ ॥<br>अन्तर्यामीति देहेषु प्रसिद्धस्य स्वयम्भुवः।<br>इन्द्रियाणि दशैकं च तन्मात्राणि च शासनात्॥ ९ ॥<br>अहङ्कारोऽतिसंसृते शिवस्य परमेष्ठिनः।<br>तन्मात्राणि नियोगेन तस्य संसुवते प्रभोः॥ १० ॥<br>महाभूतान्यशेषेण महादेवस्य धीमतः।<br>ब्रह्मादीनां तृणान्तं हि देहिनां देहसङ्गतिम्॥ ११ ॥<br>महाभूतान्यशेषाणि जनयन्ति शिवाज्ञया।<br>अध्यवस्यति सर्वार्थान् बुद्धिस्तस्याज्ञया विभोः॥ १२ ॥आदि, मध्य तथा अन्तसे रहित परमेष्ठी पुरुषरूप शिवकी आज्ञासे प्रकृति बुद्धिको उत्पन्न करती है और पुनः उन्हीं शिवके आदेशसे इस प्रकृतिकी बुद्धि अहंकारकी उत्पत्ति करती है। अन्तर्यामीरूपसे देहमें स्थित रहनेवाले प्रसिद्ध स्वयम्भू परमेष्ठी शिवके आदेशसे अहंकार दस इन्द्रियों, मन तथा शब्द आदि तन्मात्राओंको उत्पन्न करता है। उन्हीं धीमान् प्रभु महादेवके आदेशसे ये तन्मात्राएँ आकाशादि महाभूतोंको उत्पन्न करती हैं। तदनन्तर शिवकी आज्ञासे ये सब महाभूत ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त देहधारियोंके देहको उत्पन्न करते हैं। उन्हीं सर्वव्यापी शिवकी आज्ञासे बुद्धि समस्त अर्थोंका निश्चय करती है॥ ७—१२॥
अन्तर्यामीति देहेषु प्रसिद्धस्य स्वयम्भुवः।<br>स्वभावसिद्धमैश्वर्यं स्वभावादेव भूतयः॥ १३ ॥<br>तस्याज्ञया समस्तार्थानहङ्कारोऽतिमन्यते।<br>चित्तं चेतयते चापि मनः सङ्कल्पयत्यपि॥ १४ ॥<br>श्रोत्रं शृणोति तच्छक्त्या शब्दस्पर्शादिकं च यत्।<br>शम्भोराज्ञाबलेनैव भवस्य परमेष्ठिनः॥ १५ ॥देहोंमें अन्तर्यामीरूपसे प्रसिद्ध स्वयम्भू शिवका ऐश्वर्य स्वभावसिद्ध है और उनकी विभूतियाँ भी स्वभावसे ही हैं। उन्हीं शिवकी आज्ञासे अहंकार सभी अर्थोंका स्वायत्तीकरण करता है, चित्त स्मरण कराता है और मन संकल्प करता है। कान उन्हींकी शक्तिसे श्रवण करता है। उन्हीं परमेष्ठी प्रभु शम्भुके आज्ञाबलसे
६१८श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| वचनं कुरुते वाक्यं नादानादि कदाचन।<br>शरीराणामशेषाणां तस्य देवस्य शासनात्॥ १६<br><br>करोति पाणिरादानं न गत्यादि कदाचन।<br>सर्वेषामेव जन्तूनां नियमादेव वेधसः॥ १७<br><br>विहारं कुरुते पादो नोत्सर्गादि कदाचन।<br>समस्तदेहिबृन्दानां शिवस्यैव नियोगतः॥ १८<br><br>उत्सर्गं कुरुते पायुर्र्न वदेत कदाचन।<br>जन्तोजातस्य सर्वस्य परमेश्वरशासनात्॥ १९<br><br>आनन्दं कुरुते शश्वदुपस्थं वचनाद्विभोः।<br>सर्वेषामेव भूतानामीश्वरस्यैव शासनात्॥ २० | ही शब्द-स्पर्श आदि जो भी हैं, वे अपने-अपने विषयोंमें व्यवहार करते हैं। उन्हीं भगवान् शिवके आदेशसे सभी देहधारियोंकी वाणी बोलनेका काम करती है; वह ग्रहण आदिका कार्य कभी नहीं करती। उन्हीं शिवके [बनाये गये] नियमसे ही सभी प्राणियोंका हाथ ग्रहणका कार्य करता है, वह चलने-फिरनेका कार्य कभी नहीं कर सकता। शिवके आदेशसे सभी प्राणिसमुदायका पैर गमनकार्य करता है, वह [मल आदिका] उत्सर्जन कभी नहीं कर सकता। उन परमेश्वरके आदेशसे सम्पूर्ण प्राणिसमुदायका गुदास्थल उत्सर्जन-कार्य करता है, वह बोलनेका कार्य कभी नहीं करता। उन्हीं सर्वव्यापी ईश्वरके वचन तथा आदेशसे सभी प्राणियोंकी जननेन्द्रिय सदा आनन्द प्रदान करती है॥ १३—२०॥ | | अवकाशमशेषाणां भूतानां सम्प्रयच्छति।<br>आकाशं सर्वदा तस्य परमस्यैव शासनात्॥ २१<br><br>निर्देशेन शिवस्यैव भेदैः प्राणादिभिर्निजैः।<br>बिभर्ति सर्वभूतानां शरीराणि प्रभञ्जनः॥ २२<br><br>निर्देशाद्देवदेवस्य सप्तस्कन्धगतो मरुत्।<br>लोकयात्रां वहत्येव भेदैः स्वैरावहादिभिः॥ २३<br><br>नागाद्यैः पञ्चभिर्भेदैः शरीरेषु प्रवर्तते।<br>अपदेशेन देवस्य परमस्य समीरणः॥ २४ | उन्हीं परमेश्वरके आदेशसे आकाश सभी प्राणियोंको अवकाश प्रदान करता है। उन्हीं शिवके निर्देशसे अपने प्राण आदि भेदोंसे प्रभंजन (वायु) सभी प्राणियोंके शरीरको धारण करता है। सात स्कन्धोंवाला मरुत् उन्हीं देवदेवके निर्देशपर अपने आवह आदि भेदोंसे स्थित होकर लोकयात्रा करता है। यही वायु परम प्रभु शिवकी आज्ञासे नाग आदि पाँच भेदोंसे शरीरोंमें विद्यमान रहता है॥ २१—२४॥ | | हव्यं वहति देवानां कव्यं कव्याशिनामपि।<br>पाकं च कुरुते वह्निः शङ्करस्यैव शासनात्॥ २५<br><br>भुक्तमाहारजातं यत्पचते देहिनां तथा।<br>उदरस्थः सदा वह्निर्विश्वेश्वरनियोगतः॥ २६ | शंकरकी आज्ञासे ही अग्नि देवताओंके लिये हव्य तथा पितरोंके लिये कव्यका वहन करती है और भोजनका परिपाक करती है। उदरमें स्थित अग्नि उन विश्वेश्वरके ही आदेशसे प्राणियोंके द्वारा ग्रहण किये गये सम्पूर्ण आहारको पचाती है। | | सञ्जीवयन्त्यशेषाणि भूतान्यापस्तदाज्ञया।<br>अविल्लङ्घ्या हि सर्वेषामाज्ञा तस्य गरीयसी॥ २७<br><br>चराचराणि भूतानि बिभर्त्येव तदाज्ञया।<br>आज्ञया तस्य देवस्य देवदेवः पुरन्दरः॥ २८ | जल उन्हींकी आज्ञासे सभी प्राणियोंको जीवन प्रदान करता है। उनकी श्रेष्ठ आज्ञा सबके लिये अनुल्लंघनीय है। पृथ्वी उन्हींकी आज्ञासे चराचर जीवोंको धारण करती है और उन्हीं देव शिवकी आज्ञासे इन्द्र भी सभी प्राणियोंका पालन करते हैं। | | जीवतां व्याधिभिः पीडां मृतानां यातनाशतैः।<br>विश्वम्भरः सदाकालं लोकैः सर्वैरलङ्घ्यया॥ २९<br><br>देवान् पात्यसुरान् हन्ति त्रैलोक्यमखिलं स्थितः।<br>अधार्मिकाणां वै नाशं करोति शिवशासनात्॥ ३० | यमराज भी उन्हीं शिवकी आज्ञासे जीवित प्राणियोंको व्याधियोंसे तथा मृतलोगोंको सैकड़ों प्रकारकी यातनाओंसे कष्ट प्रदान करते हैं। तीनों लोकोंमें हर समय विद्यमान रहकर भगवान् विष्णु उन्हीं शिवकी सभी लोगोंके द्वारा |

अध्याय १० ] उमापति शिवके माहात्म्यका वर्णन [ ६१९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अनुल्लङ्घ्य आज्ञासे देवताओंकी रक्षा करते हैं और असुरोंका संहार करते हैं तथा उन्हीं शिवके शासनसे अधार्मिकोंका नाश करते हैं॥ २५-३०॥
वरुणः सलिलैर्लोकान् सम्भावयति शासनात्।<br>मजयत्याज्ञया तस्य पाशैर्बध्नाति चासुरान्॥ ३१<br><br>पुण्यानुरूपं सर्वेषां प्राणिनां सम्प्रयच्छति।<br>वित्तं वित्तेश्वरस्तस्य शासनात्परमेष्ठिनः॥ ३२<br><br>उदयास्तमये कुर्वन् कुरुते कालमाज्ञया।<br>आदित्यस्तस्य नित्यस्य सत्यस्य परमात्मनः॥ ३३<br><br>पुष्पाण्यौषधिजातानि प्रह्लादयति च प्रजाः।<br>अमृतांशुः कलाधारः कालकालस्य शासनात्॥ ३४उन्हीं शिवकी आज्ञासे वरुणदेव अपने जलसे सभी लोकोंको सन्तुष्ट करते हैं और उन्हींकी आज्ञासे असुरोंको अपने पाशोंसे बाँधते हैं तथा बादमें जलमें डुबा देते हैं। उन परमेष्ठी शिवके ही आदेशसे धनके स्वामी कुबेर समस्त प्राणियोंको उनके पुण्यके अनुसार धन प्रदान करते हैं। उन्हीं शाश्वत तथा सत्यस्वरूप परमात्माकी आज्ञासे सूर्यदेव उदय तथा अस्तरूप कार्यको करते हुए कालनिर्धारण करते हैं। कालके भी काल शिवके ही आदेशसे कलाधार चन्द्रमा पुष्पों, औषधियों तथा जीवोंको आनन्दित करते हैं॥ ३१-३४॥
आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ मरुतस्तथा।<br>अन्याश्च देवताः सर्वास्तच्छासनविनिर्मिताः॥ ३५<br><br>गन्धर्वा देवसङ्घाश्च सिद्धाः साध्याश्च चारणाः।<br>यक्षरक्षःपिशाचाश्च स्थिताः शास्त्रेषु वेधसः॥ ३६<br><br>ग्रहनक्षत्रताराश्च यज्ञा वेदास्तपांसि च।<br>ऋषीणां च गणाः सर्वे शासनं तस्य धिष्ठिताः॥ ३७<br><br>कव्याशिनां गणाः सप्तसमुद्रा गिरिसिन्धवः।<br>शासने तस्य वर्तन्ते काननानि सरांसि च॥ ३८<br><br>कलाः काष्ठा निमेषाश्च मुहूर्ता दिवसाः क्षपाः।<br>ऋत्वब्दपक्षमासाश्च नियोगात्तस्य धिष्ठिताः॥ ३९<br><br>युगमन्वन्तराण्यस्य शम्भोस्तिष्ठन्ति शासनात्।<br>पराश्चैव परार्थाश्च कालभेदास्तथापरे॥ ४०सभी आदित्य, वसुगण, समस्त रुद्र, दोनों अश्विनीकुमार, मरुद्गण तथा अन्य समस्त देवता उन्हीं शिवके शासनसे विनिर्मित हैं। गन्धर्व, देवसमुदाय, सिद्ध, साध्य, चारण, यक्ष, राक्षस तथा पिशाच शिवके ही शासनमें स्थित हैं। ग्रह, नक्षत्र, तारा, यज्ञ, वेद, तप तथा ऋषिगण—ये सब उन्हींके शासनमें अधिष्ठित हैं। पितरोंके समूह, सातों समुद्र, पर्वत, नदियाँ, वन तथा सरोवर भी उन्हींके शासनमें रहते हैं। कला, काष्ठा, निमेष, मुहूर्त, दिन, रात, ऋतु, वर्ष, पक्ष तथा मास उन्हींके अनुशासनमें अधिष्ठित हैं; उसी प्रकार युग, मन्वन्तर, पर, परार्ध तथा दूसरे अन्य कालभेद भी इन्हीं शम्भुके शासनसे प्रवर्तित होते हैं॥ ३५-४०॥
देवानां जातयश्चाष्टौ तिरश्चां पञ्चजातयः।<br>मनुष्याश्च प्रवर्तन्ते देवदेवस्य धीमतः॥ ४१<br><br>जातानि भूतवृन्दानि चतुर्दशसु योनिषु।<br>सर्वलोकनिषण्णानि तिष्ठन्त्यस्यैव शासनात्॥ ४२<br><br>चतुर्दशसु लोकेषु स्थिता जाताः प्रजाः प्रभोः।<br>सर्वेश्वरस्य तस्यैव नियोगवशवर्तिनः॥ ४३उन्हीं बुद्धिसम्पन्न देवदेवके शासनसे देवताओंकी [विद्याधर आदि] आठ जातियाँ, पशु-पक्षियोंकी पाँच जातियाँ तथा मनुष्य प्रवर्तित होते हैं। सभी लोकोंमें रहनेवाले इन देवता आदि चौदह योनियोंमें उत्पन्न सभी प्राणीसमूह इन्हीं शिवके शासनमें रहते हैं। चौदह लोकोंमें स्थित रहनेवाली सभी प्रजाएँ उन्हीं परमेश्वर प्रभु शिवके शासनके अधीन रहती हैं॥ ४१-४३॥
पातालानि समस्तानि भुवनान्यस्य शासनात्।<br>ब्रह्माण्डानि च शेषाणि तथा सावरणानि च॥ ४४पाताल आदि समस्त भुवन तथा [जल आदि] आवरणोंसे युक्त ब्रह्माण्ड इन्हींके शासनसे स्थित हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि सभीसे युक्त समस्त वर्तमान

११- भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीकी विभूतियोंका वर्णन एवं लिङ्गपूजनका माहात्म्य

६२०श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

| वर्तमानानि सर्वाणि ब्रह्माण्डानि तदाज्ञया।<br>वर्तन्ते सर्वभूतौधैः समेतानि समन्ततः॥ ४५<br>अतीतान्यप्यसंख्यानि ब्रह्माण्डानि तदाज्ञया।<br>प्रवृत्तानि पदार्थौधैः सहितानि समन्ततः॥ ४६<br>ब्रह्माण्डानि भविष्यन्ति सह वस्तुभिरात्मकैः।<br>करिष्यन्ति शिवस्याज्ञां सर्वैरावरर्णैः सह॥ ४७ | ब्रह्माण्ड सब प्रकारसे उन्हींकी आज्ञासे स्थित हैं; उन्हींकी आज्ञासे असंख्य ब्रह्माण्ड अनेक पदार्थोंसहित उत्पन्न हुए और समाप्त भी हो गये। इसी प्रकार आगे होनेवाले अनेक ब्रह्माण्ड होंगे और वे अपने सभी पदार्थों तथा आवरणोंके साथ शिवकी आज्ञाका पालन करेंगे॥ ४४-४७॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे उमापतेर्महिमवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'उमापतिमहिमावर्णन' नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०॥


ग्यारहवाँ अध्याय

भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीकी विभूतियोंका वर्णन एवं लिङ्गपूजनका माहात्म्य

सनत्कुमार उवाच<br>विभूतीः शिवयोर्मह्यमाचक्ष्व त्वं गणाधिप।<br>परापरविदां श्रेष्ठ परमेश्वरभावित॥ १सनत्कुमार बोले—परापरवेत्ताओंमें श्रेष्ठ तथा परमेश्वर शिवको प्राप्त कर लेनेवाले हे गणाधिप! अब आप मुझसे शिव तथा पार्वतीकी विभूतियोंका वर्णन करें॥ १॥
नन्दिकेश्वर उवाच<br>हन्त ते कथयिष्यामि विभूतीः शिवयोरहम्।<br>सनत्कुमार योगीन्द्र ब्रह्मणस्तनयोत्तम॥ २नन्दिकेश्वर बोले—ब्रह्माके पुत्रोंमें श्रेष्ठ तथा योगिप्रवर हे सनत्कुमार! मैं शिव तथा पार्वतीकी विभूतियोंको आपको अवश्य बताऊँगा [वे इस प्रकार हैं—]॥ २॥
परमात्मा शिवः प्रोक्तः शिवा सा च प्रकीर्तिता।<br>शिवमेवेश्वरं प्राहुर्मायां गौरीं विदुर्बुधाः॥ ३<br>पुरुषं शङ्करं प्राहुर्गौरीं च प्रकृतिं द्विजाः।<br>अर्थः शम्भुः शिवा वाणी दिवसोजः शिवा निशा॥ ४<br>सप्ततन्तुर्महादेवो रुद्राणी दक्षिणा स्मृता।<br>आकाशं शङ्करो देवः पृथिवी शङ्करप्रिया॥ ५<br>समुद्रो भगवान् रुद्रो वेला शैलेन्द्रकन्यका।<br>वृक्षः शूलायुधो देवः शूलपाणिप्रिया लता॥ ६वे परमात्मा शिव (कल्याणरूप) कहे गये हैं तथा वे पार्वती शिवा (कल्याणरूपिणी) कही गयी हैं। विद्वानोंने शिवको ही ईश्वर कहा है तथा पार्वतीको माया कहा है। द्विजोंने शंकरको पुरुष तथा गौरीको प्रकृति बताया है। शिव अर्थस्वरूप हैं तो पार्वती वाणी हैं और शिव दिन हैं तो पार्वती रात हैं। महादेव सप्ततन्तुरूप यज्ञ हैं और रुद्राणीको दक्षिणा कहा गया है। भगवान् शंकर आकाश हैं तथा शंकरप्रिया पार्वती पृथ्वी हैं। भगवान् रुद्र समुद्र हैं और गिरिराजकुमारी उसकी लहरें हैं। शूलको आयुधरूपमें धारण करनेवाले भगवान् शिव वृक्ष हैं तो हाथमें शूल धारण करनेवाले शिवकी प्रिया पार्वती उसकी लता हैं॥ ३—६॥
ब्रह्मा हरोऽपि सावित्री शङ्करार्धशरीरिणी।<br>विष्णुर्महेश्वरो लक्ष्मीर्भवानी परमेश्वरी॥ ७<br>वज्रपाणिर्महादेवः शची शैलेन्द्रकन्यका।<br>जातवेदाः स्वयं रुद्रः स्वाहा शवार्थकायिनी॥ ८शिव ब्रह्मा हैं तो शंकरकी अर्धांगिनी पार्वती सावित्री हैं। महेश्वर शिव विष्णु हैं तो परमेश्वरी भवानी लक्ष्मी हैं। महादेव हाथमें वज्र धारण करनेवाले इन्द्र हैं तो पर्वतराजकी

अध्याय ११ ] भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीकी विभूतियोंका वर्णन एवं लिङ्गपूजनका माहात्म्य ६२१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यमस्त्रियम्बको देवस्तत्प्रिया गिरिकन्यका।<br>वरुणो भगवान् रुद्रो गौरी सर्वार्थदायिनी ॥ ९<br><br>बालेन्दुशेखरो वायुः शिवा शिवमनोरमा।<br>चन्द्रार्धमौलियक्षेन्द्रः स्वयमृद्धिः शिवा स्मृता ॥ १०<br><br>चन्द्रार्धशेखरश्चन्द्रो रोहिणी रुद्रवल्लभा।<br>सप्तसप्तिः शिवः कान्ता उमादेवी सुवर्चला ॥ ११पुत्री उमा शची हैं। स्वयं रुद्र ही अग्नि हैं तो शिवकी अर्धाङ्गिनी पार्वती स्वाहा हैं। त्रिनेत्र शिव यम हैं तो गिरिपुत्री पार्वती उनकी प्रिया हैं। भगवान् रुद्र वरुण हैं तो समस्त अभीष्ट प्रदान करनेवाली पार्वती उनकी भार्या हैं। बालचन्द्रको मस्तकपर धारण करनेवाले शिव वायु हैं तो शिववल्लभा पार्वती उनकी भार्या हैं। मस्तकपर अर्धचन्द्रसे सुशोभित होनेवाले शिव कुबेर हैं तो साक्षात् शिवा कुबेरपत्नी ऋद्धि कही गयी हैं। अर्धचन्द्रसे सुशोभित मस्तकवाले शिव चन्द्रमा हैं तो रुद्रप्रिया शिवा रोहिणी हैं। भगवान् शिव सूर्यदेव हैं तो उनकी प्रिया भगवती उमा [ सूर्यपत्नी ] सुवर्चला हैं ॥ ७—११॥
षण्मुखस्त्रिपुरध्वंसी देवसेना हरप्रिया।<br>उमा प्रसूतिर्वै ज्ञेया दक्षो देवो महेश्वरः ॥ १२<br><br>पुरुषाख्यो मनुः शम्भुः शतरूपा शिवप्रिया।<br>विदुर्भवानीमाकूतिं रुचिं च परमेश्वरम् ॥ १३<br><br>भृगुर्भगाक्षिहा देवः ख्यातिस्त्रिनयनप्रिया।<br>मरीचिर्भगवान् रुद्रः सम्भूतिर्वल्लभा विभोः ॥ १४<br><br>विदुर्भवानीं रुचिरां कविं च परमेश्वरम्।<br>गङ्गाधरोऽङ्गिरा ज्ञेयः स्मृतिः साक्षादुमा स्मृता ॥ १५<br><br>पुलस्त्यः शशभृन्मौलिः प्रीतिः कान्ता पिनाकिनः।<br>पुलहस्त्रिपुरध्वंसी दया कालरिपुप्रिया ॥ १६<br><br>क्रतुर्दक्षकतुध्वंसी सन्नतिर्दयिता विभोः।<br>त्रिनेत्रोऽत्रिरुमा साक्षादनुसूया स्मृता बुधैः ॥ १७<br><br>ऊर्जामाहुरुमां वृद्धां वसिष्ठं च महेश्वरम्।<br>शङ्करः पुरुषाः सर्वे स्त्रियः सर्वा महेश्वरी ॥ १८त्रिपुरका नाश करनेवाले शिव कार्तिकेय हैं तो शिवप्रिया पार्वती [ कार्तिकेयभार्या ] देवसेना हैं। भगवान् महेश्वर दक्षप्रजापति हैं तो उमाको प्रसूति जानना चाहिये। शम्भु पुरुष नामक मनु हैं तो शिवप्रिया पार्वती शतरूपा हैं। परमेश्वर शिवको रुचिप्रजापति तथा भवानीको आकूति कहा गया है। भगके नेत्रको विनष्ट करनेवाले शिव भृगु हैं तो त्रिनेत्र शिवकी प्रिया पार्वती ख्याति हैं। भगवान् रुद्र मरीचि हैं तो प्रभु शिवकी प्रिया पार्वती सम्भूति हैं। परमेश्वरको कवि (शुक्र) तथा भवानीको रुचिरा कहा गया है। गङ्गाधर शिवको अंगिराके रूपमें जानना चाहिये और साक्षात् उमाको स्मृतिके रूपमें समझना चाहिये। चन्द्रशेखर शंकरजी पुलस्त्य हैं तो पिनाकधारी शिवकी प्रिया पार्वती प्रीति हैं। त्रिपुरका विध्वंस करनेवाले शिव ऋषि पुलह हैं तो कालरिपु शिवकी प्रिया उमा दया हैं। दक्षके यज्ञको नष्ट करनेवाले शिव क्रतु हैं तो सर्वव्यापी शिवकी भार्या पार्वती सन्नति हैं। विद्वानोंने तीन नेत्रोंवाले शिवको अत्रि तथा साक्षात् उमाको अनसूया कहा है। महेश्वर शिवको वसिष्ठ तथा श्रेष्ठ उमाको ऊर्जा कहा गया है। [ संसारके ] सभी पुरुष शिवरूप हैं और सभी स्त्रियाँ महेश्वरी पार्वतीरूपा हैं ॥ १२–१८॥
पुल्लिङ्गशब्दवाच्या ये ते च रुद्राः प्रकीर्तिताः।<br>स्त्रीलिङ्गशब्दवाच्या याः सर्वा गौर्या विभूतयः ॥ १९<br><br>सर्वे स्त्रीपुरुषाः प्रोक्तास्तयोरेव विभूतयः।<br>पदार्थशक्तयो या यास्ता गौरीति विदुर्बुधाः ॥ २०<br><br>सा सा विश्वेश्वरी देवी स च सर्वो महेश्वरः।<br>शक्तिमन्तः पदार्था ये स च सर्वो महेश्वरः ॥ २१पुल्लिंगशब्दवाची जो भी पदार्थ हैं, वे सब रुद्र कहे गये हैं; स्त्रीलिङ्गशब्दवाची जो भी हैं, वे सब गौरीकी विभूतियाँ हैं। सभी स्त्री-पुरुष उन्हीं दोनोंकी ही विभूतियाँ कही गयी हैं। पदार्थोंकी जो-जो शक्तियाँ हैं, वे सब गौरी

| ६२२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अष्टौ प्रकृतयो देव्या मूर्त्तयः परिकीर्त्तिताः।<br>तथा विकृतयस्तस्या देहबद्धविभूतयः ॥ २२<br><br>विस्फुलिङ्गा यथा तावदग्नौ च बहुधा स्मृताः।<br>जीवाः सर्वे तथा शर्वे द्वन्द्वसत्त्वमुपागताः ॥ २३<br><br>गौरीरूपाणि सर्वाणि शरीराणि शरीरिणाम्।<br>शरीरिणस्तथा सर्वे शङ्करांशा व्यवस्थिताः ॥ २४<br><br>श्राव्यं सर्वमुमारूपं श्रोता देवो महेश्वरः।<br>विषयित्वं विभुर्धत्ते विषयात्मकतामुमा ॥ २५<br><br>स्रष्टव्यं वस्तुजातं तु धत्ते शङ्करवल्लभा।<br>स्रष्टा स एव विश्वात्मा बालचन्द्रार्धशेखरः ॥ २६<br><br>दृश्यवस्तु प्रजारूपं बिभर्ति भुवनेश्वरी।<br>द्रष्टा विश्वेश्वरो देवः शशिखण्डशिखामणिः ॥ २७हैं—ऐसा विद्वानोंने कहा है। वह शक्ति विश्वेश्वरी देवी उमा ही हैं और वह समस्त पदार्थ भगवान् महेश्वर ही हैं। शक्तिसे युक्त जो भी पदार्थ हैं, वे सब महेश्वर शिवरूप हैं। आठों प्रकृतियाँ देवीकी मूर्तियाँ हैं और सभी विकृतियाँ उनकी देहबद्ध विभूतियाँ कही गयी हैं। जैसे अग्निमें अनेक विस्फुलिङ्ग बताये गये हैं, वैसे ही द्वन्द्वसत्त्वको प्राप्त शिवमें सभी जीव स्थित हैं। जीवोंके समस्त शरीर गौरीरूप हैं और समस्त जीव शंकरके अंशरूपसे उनमें व्यवस्थित हैं। श्रवणके योग्य सब कुछ उमाका रूप है और उसके श्रोता भगवान् महेश्वर हैं। शिव विषयका आस्वादकत्व धारण करते हैं और पार्वती विषयात्मकता धारण करती हैं। शंकरप्रिया पार्वती सृजन करनेयोग्य सभी वस्तुओंको धारण करती हैं और अर्धबालचन्द्रको मस्तकपर धारण करनेवाले वे विश्वात्मा ही उनके स्रष्टा हैं। भुवनेश्वरी उमा समस्त प्रजारूप दृश्य वस्तुओंको धारण करती हैं और चन्द्रखण्डको सिरपर धारण करनेवाले भगवान् विश्वेश्वर उनके द्रष्टा हैं॥ १९–२७॥
रसजातमुमारूपं घ्रेयजातं च सर्वशः।<br>देवो रसयिता शम्भुर्घाता च भुवनेश्वरः ॥ २८<br><br>मन्तव्यवस्तुतां धत्ते महादेवी महेश्वरी।<br>मन्ता स एव विश्वात्मा महादेवो महेश्वरः ॥ २९<br><br>बोद्धव्यं वस्तुरूपं च बिभर्ति भववल्लभा।<br>देवः स एव भगवान् बोद्धा बालेन्दुशेखरः ॥ ३०<br><br>पीठाकृतिरुमा देवी लिङ्गरूपश्च शङ्करः।<br>प्रतिष्ठाप्य प्रयत्नेन पूजयन्ति सुरासुराः ॥ ३१<br><br>ये ये पदार्था लिङ्गाङ्कास्ते ते शर्वविभूतयः।<br>अर्था भगाङ्किता ये ये ते ते गौर्या विभूतयः ॥ ३२<br><br>स्वर्गपाताललोकान्तब्रह्माण्डावरणाष्टकम् ।<br>ज्ञेयं सर्वमुमारूपं ज्ञाता देवो महेश्वरः ॥ ३३<br><br>बिभर्ति क्षेत्रतां देवी त्रिपुरान्तकवल्लभा।<br>क्षेत्रज्ञत्वमथो धत्ते भगवानन्धकान्तकः ॥ ३४सम्पूर्ण रस उमारूप है और शम्भु रस ग्रहण करनेवाले हैं; सूँघनेयोग्य वस्तुसमूह उमारूप है और शिव उसके घ्राता हैं। महादेवी महेश्वरी माननेयोग्य वस्तुता (भाव)-को धारण करती हैं और वे विश्वात्मा महादेव महेश्वर उसका मनन करनेवाले हैं। शिवप्रिया पार्वती बोध करनेयोग्य वस्तुओंको धारण करती हैं और बालचन्द्रको मस्तकपर धारण करनेवाले वे भगवान् शिव उनके बोद्धा हैं। उमा पीठाकृति (जलहरी) हैं और शिव [उसमें स्थित] लिङ्गरूप हैं। देवता तथा दानव लिङ्ग तथा वेदीके रूपमें स्थापित करके प्रयत्नपूर्वक उनकी पूजा करते हैं। जो-जो पदार्थ पुरुषचिह्नोंवाले हैं, वे शिवकी विभूतियाँ हैं और जो-जो पदार्थ स्त्रीचिह्नोंवाले हैं, वे गौरीकी विभूतियाँ हैं। स्वर्गसे पाताललोकपर्यन्त आठ आवरणोंवाले ब्रह्माण्डमें जो भी जाननेयोग्य है, वह सब उमारूप है और उसके ज्ञाता भगवान् महेश्वर हैं। त्रिपुराका नाश करनेवाले शिवकी प्रिया देवी [पार्वती] क्षेत्रता (लिङ्गशरीररूपता)-को धारण करती हैं और अन्धकका संहार करनेवाले भगवान् [शिव] क्षेत्रज्ञत्व (जीवरूपत्व)-को धारण करते हैं॥ २८–३४॥

अध्याय ११] भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीकी विभूतियोंका वर्णन एवं लिङ्गपूजनका माहात्म्य ६२३


श्लोकहिन्दी अर्थ
शिवलिङ्गं समुत्सृज्य यजन्ते चान्यदेवताः।<br>स नृपः सह देशेन रौरवं नरकं व्रजेत्॥ ३५<br><br>शिवभक्तो न यो राजा भक्तोऽन्येषु सुरेषु यः।<br>स्वपतिं युवतिस्त्यक्त्वा यथा जारेषु राजते॥ ३६<br><br>ब्रह्मादयः सुराः सर्वे राजानश्च महर्द्धिकाः।<br>मानवा मुनयश्चैव सर्वे लिङ्गं यजन्ति च॥ ३७<br><br>विष्णुना रावणं हत्वा ससैन्यं ब्रह्मणः सुतम्।<br>स्थापितं विधिवद्भक्त्या लिङ्गं तीरे नदीपतेः॥ ३८[जिस राजाके राज्यमें] लोग शिवलिङ्गको छोड़कर अन्य देवताओंका पूजन करते हैं, वह राजा अपने देशसहित रौरव नरकमें जाता है। जो राजा शिवभक्त नहीं है और अन्य देवताओंके प्रति भक्तिपरायण रहता है, वह वैसे ही है, जैसे कोई युवती अपने पतिको छोड़कर परपुरुषोंमें आसक्ति रखती है। ब्रह्मा आदि सभी देवता, बड़े-बड़े ऐश्वर्यशाली राजा, मनुष्य तथा मुनिगण शिवलिङ्गकी पूजा करते हैं। भगवान् विष्णुने [रामावतारमें] सेनासहित ब्राह्मणपुत्र रावणका संहार करके समुद्रके तटपर विधिपूर्वक शिवलिङ्गकी स्थापना की थी॥ ३५—३८॥
कृत्वा पापसहस्त्राणि हत्वा विप्रशतं तथा।<br>भावात्समाश्रितो रुद्रं मुच्यते नात्र संशयः॥ ३९<br><br>सर्वे लिङ्गमया लोकाः सर्वे लिङ्गे प्रतिष्ठिताः।<br>तस्मादभ्यर्चयेल्लिङ्गं यदिच्छेच्छाश्वतं पदम्॥ ४०<br><br>सर्वाकारौ स्थितावेतौ नरैः श्रेयोऽर्थिभिः शिवौ।<br>पूजनीयौ नमस्कार्यौ चिन्तनीयौ च सर्वदा॥ ४१हजारों पाप करके तथा सैकड़ों विप्रोंका वध करके भी जो भक्तिपूर्वक रुद्रका आश्रय ग्रहण करता है, वह मुक्त हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। समस्त लोक लिङ्गमय है और सभी लिङ्गमें ही स्थित हैं; अतः यदि कोई शाश्वत पदकी इच्छा रखता हो, तो उसे शिवलिङ्गका पूजन अवश्य करना चाहिये। अपने कल्याणकी कामना करनेवाले मनुष्योंको सर्वरूपमें स्थित इन दोनों (शिव-पार्वती)-का सर्वदा पूजन, नमस्कार और चिन्तन करना चाहिये॥ ३९—४१॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवविभूतिमहिमवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवविभूतिमहिमावर्णन' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ११॥

१२- भगवान् शिवकी अष्टमूर्तियोंका स्वरूप तथा उनकी विश्वरूपता

६२४श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग

बारहवाँ अध्याय

भगवान् शिवकी अष्टमूर्तियोंका स्वरूप तथा उनकी विश्वरूपता

श्लोकअर्थ
सनत्कुमार उवाच<br>मूर्तयोऽष्टौ समाचक्ष्व शङ्करस्य महात्मनः।<br>विश्वरूपस्य देवस्य गणेश्वर महामते॥ १सनत्कुमार बोले— हे गणेश्वर! हे महामते! विश्वरूप महात्मा भगवान् शंकरकी आठ मूर्तियोंको आप मुझे बतायें॥ १॥
नन्दिकेश्वर उवाच<br>हन्त ते कथयिष्यामि महिमानमुमापतेः।<br>विश्वरूपस्य देवस्य सरोजभवसम्भव॥ २<br><br>भूरापोऽग्निर्मरुद् व्योम भास्करो दीक्षितः शशी।<br>भवस्य मूर्तयः प्रोक्ताः शिवस्य परमेष्ठिनः॥ ३<br><br>खात्मेन्दुवह्निसूर्याम्भोधराः पवन इत्यपि।<br>तस्याष्टमूर्तयः प्रोक्ता देवदेवस्य धीमतः॥ ४<br><br>अग्निहोत्रेऽर्पिते तेन सूर्यात्मनि महात्मनि।<br>तद्विभूतीस्तथा सर्वे देवास्तृप्यन्ति सर्वदा॥ ५<br><br>वृक्षस्य मूलसेकेन यथा शाखोपशाखिकाः।<br>तथा तस्यार्चया देवास्तथा स्युस्तद्विभूतयः॥ ६नन्दिकेश्वर बोले— हे कमलयोनि (ब्रह्मा)-के पुत्र! मैं उमापति विश्वरूप महादेवकी महिमाका वर्णन आपसे अवश्य करूँगा। भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, भास्कर, यजमान तथा चन्द्र—ये परमेष्ठी भगवान् शिवकी आठ मूर्तियाँ कही गयी हैं। आकाश, आत्मा (जीव), चन्द्र, अग्नि, सूर्य, जल, पृथ्वी, पवन—ये भी उन बुद्धिसम्पन्न देवाधिदेवकी आठ मूर्तियाँ कही गयी हैं। इसीलिये अग्निमें विधिपूर्वक दी गयी आहुति, सूर्यको प्रदत्त अर्घ्य आदि तथा परमात्माके प्रति समर्पित पदार्थसे उनकी समस्त विभूतियाँ और सभी देवता सदैव तृप्त होते हैं। जिस प्रकार वृक्षके मूलको सींचनेसे उसकी शाखाएँ तथा उपशाखाएँ स्वयं पोषित होती हैं, उसी प्रकार उन शिवकी पूजासे देवगण तथा उनकी विभूतियाँ स्वयं सन्तुष्ट हो जाती हैं॥ २—६॥
तस्य द्वादशधा भिन्नं रूपं सूर्यात्मकं प्रभोः।<br>सर्वदेवात्मकं याज्यं यजन्ति मुनिपुङ्गवाः॥ ७उन प्रभु शिवके बारह प्रकारके भिन्न सूर्यात्मक रूप हैं; श्रेष्ठ मुनिगण उसी सर्वदेवात्मक पूज्य रूपका यजन करते हैं॥ ७॥
अमृताख्या कला तस्य सर्वस्यादित्यरूपिणः।<br>भूतसञ्जीवनी चेष्टा लोकेऽस्मिन् पीयते सदा॥ ८उन आदित्यरूप भगवान् शिवकी अमृता नामक कला प्राणियोंको जीवन प्रदान करती है; इस लोकमें सभीके लिये प्रिय इस कलाका सदा पान किया जाता है॥ ८॥
चन्द्राख्यकिरणास्तस्य धूर्जटेर्भास्करात्मनः।<br>ओषधीनां विवृद्ध्यर्थं हिमवृष्टिं वितन्वते॥ ९सूर्यरूप उन भगवान् शिवकी चन्द्र नामक किरणें औषधियोंकी वृद्धिके लिये हिमवृष्टिका विस्तार करती हैं॥ ९॥
शुक्लाख्या रश्मयस्तस्य शम्भोर्मार्तण्डरूपिणः।<br>घर्मं वितन्वते लोके सस्यपाकादिकारणम्॥ १०मार्तण्डरूपी उन शिवकी शुक्ल नामक किरणें फसलोंके पाक आदिकी कारणरूप ऊष्माका लोकमें विस्तार करती हैं॥ १०॥
दिवाकरात्मनस्तस्य हरिकेशाह्वयः करः।<br>नक्षत्रपोषकश्चैव प्रसिद्धः परमेष्ठिनः॥ ११उन सूर्यरूप परमेष्ठी शिवकी हरिकेश नामसे

अध्याय १२] भगवान् शिवकी अष्टमूर्तियोंका स्वरूप तथा उनकी विश्वरूपता ६२५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विश्वकर्माह्वयस्तस्य किरणो बुधपोषकः।<br>सर्वेश्वरस्य देवस्य सप्तसप्तिस्वरूपिणः॥ १२<br>विश्वव्यच इति ख्यातः किरणस्तस्य शूलिनः।<br>शुक्रपोषकभावेन प्रतीतः सूर्यरूपिणः॥ १३<br>संयद्वसुरिति ख्यातो यस्य रश्मिस्त्रिशूलिनः।<br>लोहिताङ्गं प्रपुष्णाति सहस्रकिरणात्मनः॥ १४<br>अर्वावसूरिति ख्यातो रश्मिस्तस्य पिनाकिनः।<br>बृहस्पतिं प्रपुष्णाति सर्वदा तपनात्मनः॥ १५<br>स्वराडिति समाख्यातः शिवस्यांशः शनैश्चरम्।<br>हरिदश्वात्मनस्तस्य प्रपुष्णाति दिवानिशम्॥ १६<br>सूर्यात्मकस्य देवस्य विश्वयोनेरुमापतेः।<br>सुषुम्णाख्यः सदा रश्मिः पुष्णाति शिशिरद्युतिम्॥ १७प्रसिद्ध किरण नक्षत्रोंको दीप्ति प्रदान करती है। उन सूर्यरूप सर्वेश्वर प्रभुकी विश्वकर्मा नामक किरण बुधका पोषण करती है। उन शूलधारी सूर्यरूप शिवकी विश्वव्यच—इस नामसे प्रसिद्ध किरण शुक्रके पोषकभावसे प्रतिष्ठित है। उन सूर्यरूप त्रिशूलधारी शिवकी संयद्वसु—इस नामसे प्रसिद्ध किरण मंगलका पोषण करती है। उन सूर्यरूप पिनाकी शिवकी अर्वावसु—इस नामवाली किरण सर्वदा बृहस्पतिका पोषण करती है। सूर्यरूप उन शिवकी स्वराट्—इस नामसे प्रसिद्ध किरण दिन-रात शनैश्चरका पोषण करती है। विश्वकी उत्पत्ति करनेवाले उमापति सूर्यरूप महादेवकी सुषुम्णा नामक किरण सदा चन्द्रमाका पोषण करती है॥ ११—१७॥
सौम्यानां वसुजातानां प्रकृतित्वमुपागता।<br>तस्य सोमाह्वया मूर्तिः शङ्करस्य जगद्गुरोः॥ १८<br>तस्य सोमात्मकं रूपं शुक्रत्वेन व्यवस्थितम्।<br>शरीरभाजां सर्वेषां देवस्यान्तकशासिनः॥ १९<br>शरीरिणामशेषाणां मनस्येव व्यवस्थितम्।<br>वपुः सोमात्मकं शम्भोस्तस्य सर्वजगद्गुरोः॥ २०उन जगद्गुरु शंकरकी सोम (चन्द्र) नामक मूर्ति समस्त शान्त किरणोंकी प्रकृतिको प्राप्त है। कालपर शासन करनेवाले उन शिवका सोमात्मकरूप सभी देहधारियोंमें शुक्र (वीर्य)-रूपसे व्यवस्थित है। समस्त जगत्के गुरु उन शिवका चन्द्ररूप शरीर ही सभी जीवोंके मनमें प्रतिष्ठित है॥ १८—२०॥
शम्भोः षोडशधा भिन्ना स्थितामृतकलात्मनः।<br>सर्वभूतशरीरेषु सोमाख्या मूर्तिरुत्तमा॥ २१चन्द्ररूप शिवकी सोम नामक उत्तम मूर्ति सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरोंमें सोलह प्रकारके विभिन्न रूपोंमें स्थित है॥ २१॥
देवान् पितॄंश्च पुष्णाति सुधयामृतया सदा।<br>मूर्तिः सोमाह्वया तस्य देवदेवस्य शासितुः॥ २२उन देवाधिदेव प्रभुकी 'चन्द्र' नामक मूर्ति अपनी अविनाशी सुधासे देवताओं और पितरोंको सदा तृप्त करती रहती है॥ २२॥
पुष्णात्योषधिजातानि देहिनामात्मशुद्धये।<br>सोमाह्वया तनुस्तस्य भवानीमिति निर्दिशेत्॥ २३उन शिवकी सोम नामक मूर्ति प्राणियोंकी देहशुद्धिके लिये समस्त औषधियोंको पोषित करती है; उस मूर्तिको भवानीरूप ही समझना चाहिये॥ २३॥
यज्ञानां पतिभावेन जीवानां तपसामपि।<br>प्रसिद्धरूपमेतद्वै सोमात्मकमुमापतेः॥ २४<br>जलानामोषधीनां च पतिभावेन विश्रुतम्।<br>सोमात्मकं वपुस्तस्य शम्भोर्भगवतः प्रभोः॥ २५उमापति शिवकी यह चन्द्ररूप मूर्ति यज्ञों, जीवों और तपोंके स्वामीके रूपमें प्रसिद्ध है। उन सर्वशक्तिमान् भगवान् शम्भुका चन्द्ररूप विग्रह जल और औषधियोंके स्वामीके रूपमें विख्यात है॥ २४-२५॥
देवो हिरण्मयो मृष्टः परस्परविवेकिभिः।<br>करणानामशेषाणां देवतानां निराकृतिः॥ २६आत्मा और अनात्मा-सम्बन्धी विचारसम्पन्न जनोंसे सुविचारित जो सदाशिव हैं, वे समस्त इन्द्रियों तथा उनके देवताओंसे अग्राह्य हैं तथा विशुद्ध अमृतरूप हैं॥ २६॥
६२६श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जीवत्वेन स्थिते तस्मिन् शिवे सोमात्मके प्रभौ।<br>मधुरा विलयं याति सर्वलोकैकरक्षिणी॥ २७उन चन्द्ररूप भगवान् शिवके जीवरूपमें आत्मामें निश्चल हो जानेपर समस्त लोकोंपर एकमात्र शासन करनेवाली माया तिरोहित हो जाती है॥ २७॥
यजमानाह्वया मूर्तिः शैवी हव्यैरहर्निशम्।<br>पुष्णाति देवताः सर्वाः कव्यैः पितृगणानपि॥ २८शिवकी यजमान नामक मूर्ति हव्य द्रव्योंसे सभी देवताओं तथा कव्य द्रव्योंसे पितरोंको भी निरन्तर सन्तृप्त करती है॥ २८॥
यजमानाह्वया या सा तनुश्चाहुतिजा तया।<br>वृष्ट्या भावयति स्पष्टं सर्वमेव परापरम्॥ २९यजमान नामक जो [शिवकी] मूर्ति है, वह आहुतिजन्य वृष्टिसे सभी परापर पदार्थोंको उत्पन्न करती है—यह प्रसिद्ध ही है॥ २९॥
अन्तःस्थं च बहिःस्थं च ब्रह्माण्डानां स्थितं जलम्।<br>भूतानां च शरीरस्थं शम्भोर्मूर्तिर्गरीयसी॥ ३०ब्रह्माण्डोंके भीतर तथा बाहर व्याप्त जल तथा प्राणियोंके शरीरमें स्थित जल उन्हीं शिवकी श्रेष्ठ मूर्ति है॥ ३०॥
नदीनाममृतं साक्षान्नदानामपि सर्वदा।<br>समुद्राणां च सर्वत्र व्यापी सर्वमुमापतिः॥ ३१<br><br>सञ्जीविनी समस्तानां भूतानामेव पाविनी।<br>अम्बिका प्राणसंस्था या मूर्तिरम्बुमयी परा॥ ३२नदियों, नदों और समुद्रोंके अमृतमय सारे जलके रूपमें सर्वत्र उमापति शिव ही सर्वदा व्याप्त हैं। यह मूर्ति समस्त जीवोंको जीवन प्रदान करनेवाली तथा उन्हें पवित्र करनेवाली है। चन्द्ररूपा उमाके हृदयमें जो मूर्ति स्थित है, वह भगवान् शिवकी जलमयी परामूर्ति ही है॥ ३१-३२॥
अन्तःस्थश्च बहिःस्थश्च ब्रह्माण्डानां विभावसुः।<br>यज्ञानां च शरीरस्थः शम्भोर्मूर्तिर्गरीयसी॥ ३३<br><br>शरीरस्था च भूतानां श्रेयसी मूर्तिरैश्वरी।<br>मूर्तिः पावकसंस्था या शम्भोरत्यन्तपूजिता॥ ३४<br><br>भेदा एकोनपञ्चाशद्वेदविद्भिरुदाहृताः।<br>हव्यं वहति देवानां शम्भोर्यज्ञात्मकं वपुः॥ ३५<br><br>कव्यं पितृगणानां च हूयमानं द्विजातिभिः।<br>सर्वदेवमयं शम्भोः श्रेष्ठमग्न्यात्मकं वपुः॥ ३६<br><br>वदन्ति वेदशास्त्रज्ञा यजन्ति च यथाविधि।<br>अन्तःस्थो जगदण्डानां बहिःस्थश्च समीरणः॥ ३७ब्रह्माण्डोंके भीतर तथा बाहर व्याप्त और यज्ञविग्रहमें स्थित अग्नि भगवान् शिवकी श्रेष्ठ [अग्निरूप] मूर्ति ही है। जीवोंके शरीरमें भी जठराग्निरूपसे ईश्वर शिवकी कल्याणमयी मूर्ति ही विराजमान है। भगवान् शिवकी जो अग्निरूप मूर्ति है, वह अत्यन्त पूजित है। वेदवेत्ताओंने इसके उनचास भेद बताये हैं। भगवान् शिवका यह अग्निरूप विग्रह द्विजातियोंके द्वारा आहुति प्रदान किये जानेपर देवताओंके लिये हव्य तथा पितरोंके लिये कव्यका वहन करता है। वेद तथा शास्त्रोंको जाननेवाले भगवान् शिवकी अग्निरूप मूर्तिको सर्वदेवमय तथा श्रेष्ठ कहते हैं और विधिपूर्वक उसकी पूजा करते हैं॥ ३३-३६ १/२॥
शरीरस्थश्च भूतानां शैवी मूर्तिः पटीयसी।<br>प्राणाद्या नागकूर्माद्या आवहाद्याश्च वायवः॥ ३८<br><br>ईशानमूर्तेरेकस्य भेदाः सर्वे प्रकीर्तिताः।<br>अन्तःस्थं जगदण्डानां बहिःस्थं च वियद्विभोः॥ ३९ब्रह्माण्डोंके भीतर तथा बाहर स्थित और जीवोंके शरीरमें स्थित जो वायु है, वह शिवकी महिमामयी मूर्ति ही है। प्राण आदि, नाग-कूर्म आदि और आवह आदि वायु हैं; वे सब उसी एकमात्र शिवकी मूर्तिके भेद कहे गये हैं॥ ३७-३८ १/२॥

१३- भगवान् सदाशिवके शर्व, भव आदि आठ स्वरूपों तथा उनकी शक्तियों एवं पुत्रोंका वर्णन

अध्याय १३] भगवान् सदाशिवके शर्व, भव आदि आठ स्वरूपोंका वर्णन ६२७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शरीरस्थं च भूतानां शम्भोर्मूर्तिर्गरीयसी।<br>शम्भोर्विश्वम्भरा मूर्तिः सर्वब्रह्माधिदेवता ॥ ४०<br><br>चराचराणां भूतानां सर्वेषां धारणे मता।<br>चराचराणां भूतानां शरीराणि विदुर्बुधाः ॥ ४१<br><br>पञ्चकेनेशमूर्तीनां समारब्धानि सर्वथा।<br>पञ्चभूतानि चन्द्राकार्वात्मेति मुनिपुङ्गवाः ॥ ४२<br><br>मूर्तयोऽष्टौ शिवस्याहुर्देवदेवस्य धीमतः।<br>आत्मा तस्याष्टमी मूर्तिर्यजमानाह्वया परा ॥ ४३<br><br>चराचरशरीरेषु सर्वेष्वेव स्थिता तदा।<br>दीक्षितं ब्राह्मणं प्राहूरात्मानं च मुनीश्वराः ॥ ४४<br><br>यजमानाह्वया मूर्तिः शिवस्य शिवदायिनः।<br>मूर्तयोऽष्टौ शिवस्यैता वन्दनीयाः प्रयत्नतः ॥ ४५<br><br>श्रेयोऽर्थिभिर्नरैर्नित्यं श्रेयसामेकहेतवः ॥ ४६ब्रह्माण्डोंके भीतर तथा बाहर स्थित और प्राणियोंके देहमें स्थित जो आकाश है, वह सर्वव्यापी शम्भुकी ही महिमायुक्त मूर्ति है। भगवान् शिवकी धरारूप मूर्ति सभी ब्राह्मणोंकी मुख्य देवता है तथा समस्त चराचर प्राणियोंको धारण करनेवाली कही गयी है ॥ ३९-४० १/२ ॥<br><br>स्थावर-जंगम प्राणियोंके शरीर भगवान् शिवकी मूर्तियोंके [पृथ्वी, जल आदि] पंचमहाभूत समुदायसे सम्यक् उत्पन्न किये गये हैं—ऐसा विद्वानोंने कहा है। श्रेष्ठ मुनियोंने बताया है कि पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश), चन्द्र, सूर्य और आत्मा—ये ही देवदेव धीमान्‌की आठ मूर्तियाँ हैं। उन शिवकी जो आठवीं श्रेष्ठ मूर्ति आत्मा है, वह यजमान नामवाली भी है; यह सभी चराचर प्राणियोंके शरीरोंमें सदा स्थित रहती है। मुनीश्वरोंने दीक्षित ब्राह्मणको भी आत्मा कहा है। इसे ही कल्याणकारी शिवकी यजमान नामक मूर्ति कहा गया है। अपने कल्याणकी कामना करनेवाले मनुष्योंको शिवकी इन कल्याणकी साधनभूता अष्टमूर्तियोंकी प्रयत्नपूर्वक नित्य वन्दना करनी चाहिये ॥ ४१-४६ ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवविश्वरूपवर्णनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवविश्वरूपवर्णन' नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥


तेरहवाँ अध्याय

भगवान् सदाशिवके शर्व, भव आदि आठ स्वरूपों तथा उनकी शक्तियों एवं पुत्रोंका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सनत्कुमार उवाच<br>भूयोऽपि वद मे नन्दिन् महिमानमुमापते।<br>अष्टमूर्तेर्महेशस्य शिवस्य परमेष्ठिनः ॥ १<br><br>नन्दिकेश्वर उवाच<br>वक्ष्यामि ते महेशस्य महिमानमुमापतेः।<br>अष्टमूर्तेर्जगद्व्याप्य स्थितस्य परमेष्ठिनः ॥ २<br><br>चराचराणां भूतानां धाता विश्वम्भरात्मकः।<br>शर्व इत्युच्यते देवः सर्वशास्त्रार्थपारगैः ॥ ३<br><br>विश्वम्भरात्मनस्तस्य सर्वस्य परमेष्ठिनः।<br>विकेशी कथ्यते पत्नी तनयोऽङ्गारकः स्मृतः ॥ ४सनत्कुमार बोले—हे नन्दिन्! उमापति परमेष्ठी अष्टमूर्ति महेश्वर शिवकी और भी महिमा मुझे बताइये ॥ १ ॥<br><br>नन्दिकेश्वर बोले—मैं जगत्‌को व्याप्त करके स्थित रहनेवाले परमेष्ठी उमापति महेशकी अष्टमूर्तिकी महिमा आपको बताऊँगा। चराचर प्राणियोंको धारण करनेवाले उन पृथ्वीरूप शिवको सभी शास्त्रोंके पारगामी विद्वान् शर्व—ऐसा कहते हैं ॥ २-३ ॥<br><br>उन पृथ्वीरूप परमेष्ठी शर्वकी पत्नी विकेशी कही जाती हैं और पुत्रको अंगारक (मंगल) कहा गया है ॥ ४ ॥
६२८श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भव इत्युच्यते देवो भगवान् वेदवादिभिः ।<br>सञ्जीवनस्य लोकानां भवस्य परमात्मनः ॥ ५<br>उमा सङ्कीर्तिता देवी सुतः शुक्रश्च सूरिभिः ।<br>सप्तलोकाण्डकव्यापी सर्वलोकैकरक्षिता ॥ ६वेदवेत्ता लोग जलमूर्ति शिवको भव—ऐसा कहते हैं। विद्वानोंके द्वारा लोगोंको जीवन प्रदान करनेवाले परमात्मा भवकी भार्या देवी उमा कही गयी हैं और उनके पुत्र शुक्र कहे गये हैं॥ ५<sup></sup>/<sub></sub>
वह्र्यात्मा भगवान् देवः स्मृतः पशुपतिर्बुधैः ।<br>स्वाहा पत्यात्मनस्तस्य प्रोक्ता पशुपतेः प्रिया ॥ ७<br>षण्मुखो भगवान् देवो बुधैः पुत्र उदाहृतः ।<br>समस्तभुवनव्यापी भर्ता सर्वशरीरिणाम् ॥ ८सभी लोकोंमें व्याप्त रहनेवाले तथा सभी लोकोंके एकमात्र रक्षक अग्निरूप भगवान् शिवको विद्वानोंने पशुपति कहा है। उन परमात्मा पशुपतिकी प्रिय भार्या स्वाहा कही गयी हैं। विद्वानोंके द्वारा भगवान् कार्तिकेय उनके पुत्र कहे गये हैं॥ ६-७<sup></sup>/<sub></sub>
पवनात्मा बुधैर्देव ईशान इति कीर्त्यते ।<br>ईशानस्य जगत्कर्तुर्देवस्य पवनात्मनः ॥ ९<br>शिवा देवी बुधैरुक्ता पुत्रश्चास्य मनोजवः ।<br>चराचराणां भूतानां सर्वेषां सर्वकामदः ॥ १०समस्त भुवनोंमें व्याप्त रहनेवाले तथा सभी जीवोंका भरण-पोषण करनेवाले पवनरूप शिवको विद्वानोंके द्वारा ईशान—ऐसा कहा जाता है। विद्वानोंके द्वारा पवनात्मा जगत्कर्ता भगवान् ईशानकी पत्नी भगवती शिवा कही गयी हैं और इनके पुत्र मनोजव कहे गये हैं॥ ८-९<sup></sup>/<sub></sub>
व्योमात्मा भगवान् देवो भीम इत्युच्यते बुधैः ।<br>महामहिम्नो देवस्य भीमस्य गगनात्मनः ॥ ११<br>दिशो दश स्मृता देव्यः सुतः सर्गश्च सूरिभिः ।<br>सूर्यात्मा भगवान् देवः सर्वेषां च विभूतिदः ॥ १२सभी स्थावर-जंगम प्राणियोंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेवाले आकाशरूप भगवान् शिवको विद्वान् भीम—ऐसा कहते हैं। विद्वान् पुरुषोंने दसों दिशाओंको उन महामहिम व्योमात्मा प्रभु भीमकी पत्नियाँ तथा सर्गको उनका पुत्र कहा है॥ १०-११<sup></sup>/<sub></sub>
रुद्र इत्युच्यते देवैर्भगवान् भुक्तिमुक्तिदः ।<br>सूर्यात्मकस्य रुद्रस्य भक्तानां भक्तिदायिनः ॥ १३<br>सुवर्चला स्मृता देवी सुतश्चास्य शनैश्चरः ।<br>समस्तसौम्यवस्तूनां प्रकृतित्वेन विश्रुतः ॥ १४सभीको ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले सूर्यरूप भगवान् शिवको देवता लोग भुक्तिमुक्तिदाता भगवान् रुद्र कहते हैं। भक्तोंको भक्ति प्रदान करनेवाले उन सूर्यात्मा रुद्रकी भार्या सुवर्चला कही गयी हैं और शनैश्चर इनके पुत्र कहे गये हैं॥ १२-१३<sup></sup>/<sub></sub>
सोमात्मको बुधैर्देवो महादेव इति स्मृतः ।<br>सोमात्मकस्य देवस्य महादेवस्य सूरिभिः ॥ १५<br>दयिता रोहिणी प्रोक्ता बुधश्चैव शरीरजः ।<br>हव्यकव्यस्थितिं कुर्वन् हव्यकव्याशिनां तदा ॥ १६समस्त सौम्य वस्तुओंकी प्रकृतिके रूपमें प्रसिद्ध सोमरूप शिवको विद्वानोंने महादेव—ऐसा कहा है। मनीषियोंने रोहिणीको उन सोमात्मक प्रभु महादेवकी पत्नी और बुधको उनका पुत्र बताया है॥ १४-१५<sup></sup>/<sub></sub>
यजमानात्मको देवो महादेवो बुधैः प्रभुः ।<br>उग्र इत्युच्यते सद्भििरीशानश्चेति चापरैः ॥ १७<br>उग्राह्वयस्य देवस्य यजमानात्मनः प्रभोः ।<br>दीक्षापत्नी बुधैरुक्ता सन्तानाख्यः सुतस्तथा ॥ १८हव्य-कव्य ग्रहण करनेवाले देवताओं तथा पितरोंके लिये हव्य-कव्यकी व्यवस्था करनेवाले यजमानरूप प्रभु शिवको विद्वानोंने उग्र—ऐसा कहा है तथा दूसरे श्रेष्ठ जनोंने उन्हें ईशान भी कहा है। विद्वानोंने दीक्षाको उन यजमानरूप उग्र नामक शिवकी पत्नी बताया है। उनका पुत्र सन्तान नामवाला है॥ १६-१८॥

अध्याय १३] भगवान् सदाशिवके शर्व, भव आदि आठ स्वरूपोंका वर्णन ६२९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शरीरिणां शरीरेषु कठिनं कोङ्कणादिवत्।<br>पार्थिवं तद्वपुर्ज्ञेयं शर्वतत्त्वं बुभुत्सुभिः॥ १९<br>देहे देहे तु देवेशो देहभाजां यदव्ययम्।<br>वस्तुद्रव्यात्मकं तस्य भवस्य परमात्मनः॥ २०<br>ज्ञेयं च तत्त्वविद्भिर्वै सर्ववेदार्थपारगैः।जीवोंके शरीरोंमें कोंकण आदि स्थलोंकी भाँति जो कठोर पार्थिव भाग है, उसे जिज्ञासुओंको शर्व-तत्त्व समझना चाहिये। प्राणियोंके शरीरमें जो शाश्वत द्रवरूप वस्तु है, वह उन परमात्मा भवका अंश है—ऐसा सभी वेदार्थोंके पारगामी विद्वानों तथा तत्त्वज्ञोंको जानना चाहिये॥ १९-२०१/२॥
आग्नेयः परिणामो यो विग्रहेषु शरीरिणाम्॥ २१<br>मूर्तिः पशुपतिर्ज्ञेया सा तत्त्वं वेत्तुमिच्छुभिः।<br>वायव्यः परिणामो यः शरीरेषु शरीरिणाम्॥ २२<br>बुधैरीशेति सा तस्य तनुर्ज्ञेया न संशयः।प्राणियोंके शरीरोंमें जो तेजोरूप अग्निभाग है, उसे तत्त्वज्ञानकी इच्छावालोंको पशुपतिमूर्ति जाननी चाहिये। जीवोंके शरीरोंमें जो प्राण आदि वायुरूप है, उसे विद्वानोंको उन परमेश्वरकी ईशानमूर्ति समझनी चाहिये; इसमें संशय नहीं है॥ २१-२२१/२॥
सुषिरं यच्छरीरस्थमशेषाणां शरीरिणाम्॥ २३<br>भीमस्य सा तनुर्ज्ञेया तत्त्वविज्ञानकाङ्क्षिभिः।<br>चक्षुरादिगतं तेजो यच्छरीरस्थमङ्गिनाम्॥ २४सभी जीवोंके शरीरोंमें जो छिद्ररूप [आकाश] भाग है, उसे तत्त्वविज्ञानकी आकांक्षा रखनेवालोंको भीमकी मूर्ति समझनी चाहिये। सभी प्राणियोंके शरीरोंमें चक्षु आदिमें जो सूर्यरूप तेज है, उसे परमार्थके जिज्ञासुओंको रुद्रमूर्ति जाननी चाहिये॥ २३-२४१/२॥
रुद्रस्यापि तनुर्ज्ञेया परमार्थं बुभुत्सुभिः।<br>सर्वभूतशरीरेषु मनश्चन्द्रात्मकं हि यत्॥ २५<br>महादेवस्य सा मूर्तिर्बोद्धव्या तत्त्वचिन्तकैः।<br>आत्मा यो यजमानाख्यः सर्वभूतशरीरगः॥ २६सभी प्राणियोंके शरीरोंमें चन्द्ररूप जो मन है, उसे तत्त्वचिन्तकोंको महादेवकी मूर्ति जाननी चाहिये। सभी जीवोंके शरीरोंमें यजमान नामक जो आत्मा है, उसे परमात्मज्ञानकी कामनावाले लोगोंको उग्र नामक मूर्ति जाननी चाहिये॥ २५-२६१/२॥
मूर्तिरुग्रस्य सा ज्ञेया परमात्मबुभुत्सुभिः।<br>जातानां सर्वभूतानां चतुर्दशसु योनिषु॥ २७<br>अष्टमूर्तेरनन्यत्वं वदन्ति परमर्षयः।<br>सप्तमूर्तिमयान्याहुरीशस्याङ्गानि देहिनाम्॥ २८महर्षिगण चौदहों योनियोंमें उत्पन्न होनेवाले समस्त जीवोंमें अष्टमूर्तिकी अभिन्नता बताते हैं और उन्होंने प्राणियोंके शरीरोंको शिवकी सात मूर्तियोंसे समन्वित कहा है। सभी जीवोंके शरीरमें स्थित आत्मा उस शिवकी आठवीं मूर्ति है॥ २७-२८१/२॥
आत्मा तस्याष्टमी मूर्तिः सर्वभूतशरीरगा।<br>अष्टमूर्तिममुं देवं सर्वलोकात्मकं विभुम्॥ २९<br>भजस्व सर्वभावेन श्रेयः प्राप्तुं यदीच्छसि।<br>प्राणिनो यस्य कस्यापि क्रियते यद्यनुग्रहः॥ ३०<br>अष्टमूर्तेर्महेशस्य कृतमाराधनं भवेत्।<br>निग्रहश्चेत् कृतो लोके देहिनो यस्य कस्यचित्॥ ३१[हे सनत्कुमार!] यदि आप कल्याण प्राप्त करना चाहते हैं तो इन सर्वलोकस्वरूप तथा सर्वव्यापी अष्टमूर्ति भगवान् शिवकी सब प्रकारसे आराधना कीजिये। जिस किसी भी प्राणीके प्रति जो अनुग्रह किया जाता है, वह अष्टमूर्ति महेश्वरकी ही आराधना की गयी होती है। यदि लोकमें जिस किसी भी जीवको क्लेश दिया जाता है, तो वह मानो अष्टमूर्ति महेशको ही दिया गया। लोकमें यदि जिस किसी भी प्राणीका अनादर किया गया, तो वह मानो सर्वव्यापी अष्टमूर्ति

१४- भगवान् महेश्वरके पंचब्रह्मात्मक ईशान, तत्पुरुष आदि स्वरूपोंका वर्णन

६३०श्रीलिङ्गमहापुराण[ उत्तरभाग
अष्टमूर्तेर्महेशस्य स एव विहितो भवेत्।<br>यद्यवज्ञा कृता लोके यस्य कस्यचिदङ्गिनः॥ ३२<br>अष्टमूर्तेर्महेशस्य विहिता सा भवेद्विभोः।<br>अभयं यत् प्रदत्तं स्यादङ्गिनो यस्य कस्यचित्॥ ३३<br>आराधनं कृतं तस्मादष्टमूर्तेर्न संशयः।<br>सर्वोपकारकरणं प्रदानमभयस्य च॥ ३४<br>आराधनं तु देवस्य अष्टमूर्तेर्न संशयः।<br>सर्वोपकारकरणं सर्वानुग्रह एव च॥ ३५<br>तदर्चनं परं प्राहुरष्टमूर्तेर्मुनीश्वराः।<br>अनुग्रहणमन्येषां विधातव्यं त्वयाङ्गिनाम्॥ ३६<br>सर्वभयप्रदानं च शिवाराधनमिच्छता॥ ३७महेशका ही अनादर किया गया है। जिस किसी भी प्राणीको जो अभय प्रदान किया जाता है, उससे मानो अष्टमूर्ति शिवकी आराधना कर ली गयी; इसमें सन्देह नहीं है॥ २९-३३१/२ ॥<br>सभीका उपकार करना तथा सबको अभय प्रदान करना अष्टमूर्ति शिवकी ही आराधना है; इसमें संशय नहीं है। सबका उपकार करना तथा सबपर कृपा करना—इसे मुनीश्वरोंने अष्टमूर्तिकी ही परम पूजा बतायी है। अतः [हे सनत्कुमार!] शिवकी प्रसन्नताकी कामना करनेवाले आपको अन्य सभी प्राणियोंपर अनुग्रह तथा उन्हें सर्वविध अभय प्रदान करना चाहिये॥ ३४-३७॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे शिवाष्टमूर्तिवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'शिवाष्टमूर्तिवर्णन' नामक तेरहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥

चौदहवाँ अध्याय

भगवान् महेश्वरके पंचब्रह्मात्मक ईशान, तत्पुरुष आदि स्वरूपोंका वर्णन

सनत्कुमार उवाच<br>पञ्च ब्रह्माणि मे नन्दिन्नाचक्ष्व गणसत्तम।<br>श्रेयःकरणभूतानि पवित्राणि शरीरिणाम्॥ १<br><br>नन्दिकेश्वर उवाच<br>शिवस्यैव स्वरूपाणि पञ्च ब्रह्माह्वयानि ते।<br>कथयामि यथातत्त्वं पद्मयोनेः सुतोत्तम॥ २<br>सर्वलोकैकसंहर्ता सर्वलोकैकरक्षिता।<br>सर्वलोकैकनिर्माता पञ्चब्रह्मात्मकः शिवः॥ ३<br>सर्वेषामेव लोकानां यदुपादानकारणम्।<br>निमित्तकारणं चाहुस्स शिवः पञ्चधा स्मृतः॥ ४<br>मूर्तयः पञ्च विख्याताः पञ्च ब्रह्माह्वयाः पराः।<br>सर्वलोकशरण्यस्य शिवस्य परमात्मनः॥ ५<br>क्षेत्रज्ञः प्रथमा मूर्तिः शिवस्य परमेष्ठिनः।<br>भोक्ता प्रकृतिवर्गस्य भोग्यस्येशानसंज्ञितः॥ ६<br>स्थाणोस्तत् पुरुषाख्या च द्वितीया मूर्तिरुच्यते।<br>प्रकृतिः सा हि विज्ञेया परमात्मगुहात्मिका॥ ७सनत्कुमार बोले—हे गणोंमें श्रेष्ठ नन्दिन्! जीवोंके लिये कल्याणकारी तथा परम पवित्र पंचब्रह्मोंके विषयमें मुझे बताइये॥ १॥<br><br>नन्दिकेश्वर बोले—हे ब्रह्माजीके उत्तम पुत्र! मैं आपसे शिवजीके पंचब्रह्म नामक स्वरूपोंका यथार्थरूपमें वर्णन कर रहा हूँ। समस्त लोकोंके एकमात्र संहारक, सभी लोकोंके एकमात्र रक्षक तथा समग्र जगत्के एकमात्र स्रष्टा पंचब्रह्मरूप शिव ही हैं॥ २-३॥<br>जिन्हें सभी लोकोंका उपादानकारण तथा निमित्तकारण कहा गया है, वे शिव पाँच भेदोंवाले बताये गये हैं। सभी लोकोंको शरण प्रदान करनेवाले परमात्मा शिवकी पंचब्रह्म नामक पाँच श्रेष्ठ मूर्तियाँ विख्यात हैं॥ ४-५॥<br>परमेष्ठी शिवकी पहली मूर्ति क्षेत्रज्ञ है, भोगके योग्य समस्त प्रकृतिवर्गका भोग करनेवाली वह मूर्ति 'ईशान' नामवाली है॥ ६॥<br>भगवान् शिवकी दूसरी मूर्तिको 'तत्पुरुष' नामसे कहा जाता है। उसे परमात्माकी गुहास्वरूपिणी प्रकृति ही समझना चाहिये॥ ७॥

अध्याय १४ ] भगवान् महेश्वरके पंचब्रह्मात्मक ईशान, तत्पुरुष आदि स्वरूपोंका वर्णन ६३१


श्लोकअर्थ
अघोराख्या तृतीया च शम्भोर्मूर्तिर्गरीयसी।<br>बुद्धेः सा मूर्तिरित्युक्ता धर्माद्यष्टाङ्गसंयुता ॥ ८शिवकी ‘अघोर’ नामक तीसरी महिमामयी मूर्ति है; धर्म आदि आठ अंगोंसे युक्त वह बुद्धिकी मूर्ति कही गयी है ॥ ८ ॥
चतुर्थी वामदेवाख्या मूर्तिः शम्भोगरीयसी।<br>अहङ्कारात्मकत्वेन व्याप्य सर्वं व्यवस्थिता ॥ ९शम्भुकी ‘वामदेव’ नामक चौथी श्रेष्ठ मूर्ति है; वह अहंकाररूपसे सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त करके स्थित है ॥ ९ ॥
सद्योजाताह्वया शम्भोः पञ्चमी मूर्तिरुच्यते।<br>मनस्तत्त्वात्मकत्वेन स्थिता सर्वशरीरिषु ॥ १०शिवकी ‘सद्योजात’ नामक पाँचवीं मूर्ति कही जाती है, वह सभी प्राणियोंमें मनतत्त्वके रूपमें विराजमान है ॥ १० ॥
ईशानः परमो देवः परमेष्ठी सनातनः।<br>श्रोत्रेन्द्रियात्मकत्वेन सर्वभूतेष्ववस्थितः ॥ ११परमेष्ठी शाश्वत परम प्रभु ईशान श्रोत्र-इन्द्रियरूपसे सभी प्राणियोंके भीतर स्थित हैं ॥ ११ ॥
स्थितस्तत्पुरुषो देवः शरीरेषु शरीरिणाम्।<br>त्वगिन्द्रियात्मकत्वेन तत्त्वविद्भिरुदाहृतः ॥ १२तत्त्ववेत्ताओंने भगवान् तत्पुरुषको त्वक् (त्वचा)-रूपसे जीवोंके शरीरोंमें विराजमान बताया है ॥ १२ ॥
अघोरोऽपि महादेवश्चक्षुरात्मतया बुधैः।<br>कीर्तितः सर्वभूतानां शरीरेषु व्यवस्थितः ॥ १३विद्वानोंने महादेव अघोरको भी चक्षुरूपसे सभी प्राणियोंके शरीरोंमें व्यवस्थित बताया है ॥ १३ ॥
जिह्वेन्द्रियात्मकत्वेन वामदेवोऽपि विश्रुतः।<br>अङ्गभाजामशेषाणामङ्गेषु परिधिष्ठितः ॥ १४वामदेव भी समस्त देहधारियोंके शरीरोंमें जिह्वा-इन्द्रियरूपसे विराजमान कहे गये हैं ॥ १४ ॥
घ्राणेन्द्रियात्मकत्वेन सद्योजातः स्मृतो बुधैः।<br>प्राणभाजां समस्तानां विग्रहेषु व्यवस्थितः ॥ १५विद्वानोंने सद्योजातको घ्राणेन्द्रियरूपसे समस्त प्राणधारियोंके शरीरोंमें विद्यमान बताया है ॥ १५ ॥
सर्वेष्वेव शरीरेषु प्राणभाजां प्रतिष्ठितः।<br>वागिन्द्रियात्मकत्वेन बुधैरीशान उच्यते ॥ १६भगवान् ईशान विद्वानोंके द्वारा वाक् (वाणी)-इन्द्रियरूपसे सभी प्राणधारियोंके शरीरोंमें प्रतिष्ठित कहे गये हैं ॥ १६ ॥
पाणीन्द्रियात्मकत्वेन स्थितस्तत्पुरुषो बुधैः।<br>उच्यते विग्रहेष्वेव सर्वविग्रहधारिणाम् ॥ १७भगवान् तत्पुरुष विद्वानोंके द्वारा पाणि-इन्द्रियरूपसे सभी जीवोंके शरीरोंमें विराजमान कहे जाते हैं ॥ १७ ॥
सर्वविग्रहिणां देहे ह्यघोरोऽपि व्यवस्थितः।<br>पादेन्द्रियात्मकत्वेन कीर्तितस्तत्त्ववेदिभिः ॥ १८तत्त्ववेत्ताओंने भगवान् अघोरको सभी प्राणियोंके शरीरोंमें पाद-इन्द्रियरूपसे अवस्थित बताया है ॥ १८ ॥
पाय्विन्द्रियात्मकत्वेन वामदेवो व्यवस्थितः।<br>सर्वभूतनिकायानां कायेषु मुनिभिः स्मृतः ॥ १९प्रभु वामदेव मुनियोंके द्वारा सभी प्राणिसमुदायके शरीरोंमें पायु (गुदा)-इन्द्रियरूपसे स्थित कहे गये हैं ॥ १९ ॥
उपस्थात्मतया देवः सद्योजातः स्थितः प्रभुः।<br>इष्यते वेदशास्त्रज्ञैर्देहेषु प्राणधारिणाम् ॥ २०वेद तथा शास्त्रोंको जाननेवाले लोग भगवान् सद्योजातको जननेन्द्रियरूपसे सभी प्राणधारियोंके शरीरोंमें प्रतिष्ठित बताते हैं ॥ २० ॥
ईशानं प्राणिनां देवं शब्दतन्मात्ररूपिणम्।<br>आकाशजनकं प्राहुर्मुनिवृन्दारकप्रजाः ॥ २१प्रमुख मुनियोंने प्राणियोंके स्वामी प्रभु ईशानको शब्दतन्मात्रारूप कहा है और उन्हें आकाशका जनक बताया है ॥ २१ ॥

६३२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ उत्तरभाग


प्राहुस्तत्पुरुषं देवं स्पर्शतन्मात्रकात्मकम्।<br>समीरजनकं प्राहुर्भगवन्तं मुनीश्वराः॥ २२मुनीश्वरोंने भगवान् तत्पुरुषको स्पर्शतन्मात्रारूप कहा है और उन्हें वायुको उत्पन्न करनेवाला बताया है॥ २२॥
रूपतन्मात्रकं देवमघोरमपि घोरकम्।<br>प्राहुर्वेदविदो मुख्या जनकं जातवेदसः॥ २३प्रमुख वेदवेत्ताओंने भगवान् अघोरको रूपतन्मात्रात्मक कहा है और उन्हें अग्निका जनक बताया है॥ २३॥
रसतन्मात्ररूपत्वात् प्रथितं तत्त्ववेदिनः।<br>वामदेवमपां प्राहुर्जनकत्वेन संस्थितम्॥ २४तत्त्वदर्शी लोगोंने रसतन्मात्रारूपसे विख्यात प्रभु वामदेवको जलके जनकरूपमें प्रतिष्ठित बताया है॥ २४॥
सद्योजातं महादेवं गन्धतन्मात्ररूपिणम्।<br>भूम्यात्मानं प्रशंसन्ति सर्वतत्त्वार्थवेदिनः॥ २५समस्त रहस्योंको जाननेवाले [मनीषीगण] महादेव सद्योजातको गन्धतन्मात्रारूप बताते हैं और उन्हें भूमिका जनक कहते हैं॥ २५॥
आकाशात्मानमीशानमादिदेवं मुनीश्वराः।<br>परमेण महत्वेन सम्भूतं प्राहुरद्भुतम्॥ २६मुनीश्वरोंने अत्यन्त विस्तारके साथ उत्पन्न होनेके कारण आकाशरूप अद्भुत आदिदेव शिवको 'ईशान' कहा है॥ २६॥
प्रभुं तत्पुरुषं देवं पवनं पवनात्मकम्।<br>समस्तलोकव्यापित्वात्प्रथितं सूरयो विदुः॥ २७समस्त लोकोंमें व्याप्त रहनेके कारण पवनरूपसे प्रसिद्ध शिवको विद्वानोंने तत्पुरुष कहा है॥ २७॥
अथार्चिततया ख्यातमघोरं दहनात्मकम्।<br>कथयन्ति महात्मानं वेदवाक्यार्थवेदिनः॥ २८वेदमन्त्रोंको जाननेवाले ज्योतिर्मय होनेके कारण अग्निरूपसे प्रसिद्ध महात्मा शिवको अघोर कहते हैं॥ २८॥
तोयात्मकं महादेवं वामदेवं मनोरमम्।<br>जगत्सञ्जीवनत्वेन कथितं मुनयो विदुः॥ २९जगत्को जीवन प्रदान करनेके गुणसे युक्त कहे गये जलरूप महादेवको मुनियोंने मनोरम वामदेवकी संज्ञा प्रदान की है॥ २९॥
विश्वम्भरात्मकं देवं सद्योजातं जगद्गुरुम्।<br>चराचरैकभर्तारं परं कविवरा विदुः॥ ३०श्रेष्ठ कवियोंने चराचर जगत्के एकमात्र पालक विश्वम्भर (पृथ्वी)-रूप जगद्गुरु शिवको सद्योजात कहा है॥ ३०॥
पञ्चब्रह्मात्मकं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्।<br>शिवानन्दं तदित्याहुर्मुनयस्तत्त्वदर्शिनः॥ ३१जो [ईशान आदि मूर्तिरूप] पंचब्रह्मात्मक सम्पूर्ण चराचर जगत् है, वह भगवान् शिवका क्रीड़ा-विलास है—ऐसा तत्त्वदर्शी मुनियोंने कहा है॥ ३१॥
पञ्चविंशतितत्त्वात्मा प्रपञ्चे यः प्रदृश्यते।<br>पञ्चब्रह्मात्मकत्वेन स शिवो नान्यतां गतः॥ ३२इस जगत्प्रपंचमें पचीस तत्त्वोंसे युक्त जो कुछ दिखायी पड़ता है, वह [ईशान आदि] पंचब्रह्मरूप शिव ही हैं, उनसे अन्य कुछ भी नहीं॥ ३२॥
पञ्चविंशतितत्त्वात्मा पञ्चब्रह्मात्मकः शिवः।<br>श्रेयोऽर्थिभिरतो नित्यं चिन्तनीयः प्रयत्नतः॥ ३३अतः अपने कल्याणकी कामना करनेवाले लोगोंको सदा प्रयत्नपूर्वक पचीस तत्त्वोंसे युक्त विग्रहवाले पंचब्रह्मात्मक शिवका चिन्तन करना चाहिये॥ ३३॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे पञ्चब्रह्मकथनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'पंचब्रह्मकथन' नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १४॥