श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
गीताध्याय-संगति ४६७ केवल सांप्रदायिक है। यद्यपि ये सब तात्पर्य सांप्रदायिक हों, तथापि यह प्रश्न किया जा सकता है, कि कुछ लोगोंको गीतामें ये सांप्रदायिक अर्थ — विशेषतः संन्यास-प्रधान अर्थ — ढूँढ़नेका मौक़ा कैसे मिल गया ? जबतक इस प्रश्नका भी विचार न हो जायगा, तब तक यह नहीं कहा जा सकता, कि सांप्रदायिक अर्थोंकी चर्चा पूरी हो चुकी है, इसलिये अब संक्षेपमें इसी बातका विचार किया जायगा, कि ये सांप्रदायिक टीकाकार गीताका संन्यास-प्रधान अर्थ कैसे कर सके, और फिर यह प्रकरण पूरा किया जायगा। हमारे शास्त्रकारोंका यह सिद्धान्त है, कि चूंकि मनुष्य बुद्धिमान् प्राणी है, इसलिये पिंड-ब्रह्मांडके तत्त्वको पहचाननाही उसका मुख्य काम या पुरुषार्थ है, और इसीको धर्मशास्त्रमें 'मोक्ष' कहते हैं। परंतु दृश्य सृष्टिके व्यवहारोंकी ओर ध्यान देकर शास्त्रोंमेंही यह प्रतिपादन किया गया है, कि पुरुषार्थ चार प्रकारके हैं — जैसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। यह पहलेही बतला दिया गया है, कि इस स्थानपर 'धर्म' शब्दका अर्थ व्यावहारिक, सामाजिक और नैतिक धर्म समझना चाहिये। अब पुरुषार्थको इस प्रकार चतुर्विध माननेपर यह प्रश्न सहजही उत्पन्न हो जाता है, कि पुरुषार्थके चारों अंग या भाग परस्पर पोषक हैं या नहीं ? इसलिये स्मरण रहे, कि पिंडमें और ब्रह्मांडमें जो तत्त्व है, उसका ज्ञान हुए बिना मोक्ष नहीं मिलता, फिर वह ज्ञान किसीभी मार्गसे प्राप्त हो। इस सिद्धान्तके विषयमें शाब्दिक मतभेद भलेही हो; परंतु तत्त्वतः कुछ मतभेद नहीं है। कमसे कम गीता-शास्त्रका तो यह सिद्धान्त सर्वथैव ग्राह्य है। इसी प्रकार गीताको यह तत्त्वभी पूर्णतया मान्य है, कि यदि अर्थ और काम, इन दोनों पुरुषार्थोंको प्राप्त करना हो, तो वेभी नीति- धर्मसेही प्राप्त किये जावें। अब केवल धर्म '(अर्थात् व्यावहारिक चातुर्वर्ण्य-धर्म) और मोक्षके पारस्परिक संबंधकाही निर्णय करना शेष रह गया। उनमेंसे धर्मके विषयमें तो यह सिद्धान्त सभी पक्षोंको मान्य है, कि धर्म के द्वारा चित्तको शुद्ध किये बिना मोक्षकी बात ही करना व्यर्थ है। परंतु इस प्रकार चित्तको शुद्ध करनेके लिये बहुत समय लगता है; इसलिये मोक्षकी दृष्टिसे विचार करनेपरभी यही सिद्ध होता है, कि तत्पूर्वकालमें पहले पहल संसारके सब कर्तव्योंको 'धर्म-से' पूरा कर लेना चाहिये (मनु. ६. ३५-३७)। संन्यासका अर्थ है 'छोड़ना'; और जिसने धर्मके द्वारा इस संसारमें कुछ प्राप्त या सिद्ध नहीं किया है वह त्यागही क्या करेगा ? अथवा जो 'प्रपंच' (सांसारिक कर्म) ही ठीक ठीक साध नहीं सकता, उस 'अभागी'से परमार्थभी कैसे ठीक सधेगा (दास. १२. १. १-१०; १२. ८. २१-३१)? किसीका अंतिम उद्देश्य या साध्य चाहे सांसारिक हो अथवा पारमार्थिक, परंतु यह बात प्रकट है, कि उसकी सिद्धिके लिये दीर्घ प्रयत्न, मनोनिग्रह और सामर्थ्य इत्यादि गुणोंकी एक-सी आवश्यकता होती है; और जिसमें ये गुण विद्यमान नहीं होते उसे किसीभी उद्देश्य या साध्यकी प्राप्ति नहीं होती। इस बातको मान लेनेपरभी कुछ
४६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लोग इससे आगे बढ़कर कहते हैं, कि जब दीर्घ प्रयत्न और मनोनिग्रहके द्वारा आत्मज्ञान हो जाता है, तब अंतमें संसारके विषयोपभोगरूपी सब व्यवहार निस्सार प्रतीत होने लगते हैं; और जिस प्रकार साँप अपनी निरुपयोगी केंचुलीको छोड़ देता है, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुषभी सब सांसारिक विषयोंको छोड़ केवल परमेश्वर-स्वरूपमेंही लीन हो जाया करते हैं (बृ. ४. ४. ७) । जीवन व्यतीत करनेके इस मार्गमें चूंकि सब व्यवहारोंका त्यागकर अंतमें केवल ज्ञानकोही प्रधानता दी जाती है, अतएव उसे ज्ञाननिष्ठा, सांख्यनिष्ठा अथवा सब व्यवहारोंका त्याग करनेसे संन्यास निष्ठाभी कहते हैं। परंतु इसके विपरीत गीताशास्त्रमें कहा है, कि आरंभमें चित्तकी शुद्धताके लिये 'धर्म'की आवश्यकता तो हैही, परंतु आगे चित्तकी शुद्धि होनेपरभी - स्वयं अपने लिये विषयोपभोगरूपी व्यवहार चाहे तुच्छ हो जावें; तोभी - उन्हीं व्यवहारोंको केवल स्वधर्म और कर्तव्य समझकर, लोकसंग्रहके लिये निष्काम बुद्धिसे करते रहना आवश्यक है। यदि ज्ञानी मनुष्य ऐसा न करेगा, तो लोगोंको आदर्श बतलानेवाला कोईभी न रहेगा, और फिर इस संसारका नाश हो जायगा। इस कर्मभूमिमें किसी- केभी कर्म छूट नहीं सकते; और यदि बुद्धि निष्काम हो जावे, तो कोईभी कर्म मोक्षके आड़े आ नहीं सकता। इसलिये संसारके कर्मोंका त्याग न कर सब व्यवहारोंको विरक्त-बुद्धिसे अन्य जनोंकी नाईं मृत्यपर्यंत करते रहनाही ज्ञानी पुरुषकाभी कर्तव्य हो जाता है। गीता-प्रतिपादित जीवन व्यतीत करनेके इस मार्गकोही कर्मनिष्ठा या कर्मयोग कहते हैं। परंतु यद्यपि कर्मयोग इस प्रकार श्रेष्ठ निश्चित किया गय- है, तथापि उसके लिये गीतामें संन्यास-मार्गकी कहींभी निंदा नहीं की गई है, उलटे, यह कहा है, कि वहभी मोक्षका देनेवालाही है। स्पष्टही है, कि सृष्टिके आरंभमें सनत्कुमार प्रभृतिने और आगे चल कर शुक-याज्ञवल्क्य आदि ऋषियोंने जिस मार्गका स्वीकार किया है, उसे भगवानभी किस प्रकार सर्वथैव त्याज्य कहेंगे ? संसारके व्यवहार किसी मनुष्यको अंशतः उसके प्रारब्ध-कर्मानुसार प्राप्त हुए जन्म-स्वभावसे नीरस या मधुर मालूम होते हैं; और यह पहले कह चुके हैं, कि ज्ञान हो जानेपरभी प्रारब्ध-कर्मको भोगे बिना छुटकारा नहीं। इसलिये इस प्रारब्ध-कर्मानुसार प्राप्त हुए जन्म-स्वभावके कारण यदि किसी ज्ञानी पुरुषका जी सांसारिक व्यवहारोंसे ऊब जावे; और यदि वह संन्यासी हो जाये, तो उसकी निंदा करनेसे कोई लाभ नहीं। आत्मज्ञानके द्वारा जिस सिद्ध पुरुषकी बुद्धि निःसंग और पवित्र हो गई है, वह इस संसारमें चाहे और कुछ करे, या न करे, परंतु इस बातको नहीं भूलना चाहिये, कि वह मानवी बुद्धिकी शुद्धताकी परम सीमा, और विषयोंमें स्वभावतः लुब्ध होनेवाली हठीली मनोवृत्तियोंको अपने ताबेमें रखनेकी सामर्थ्यकी पराकाष्ठा सब लोगोंको प्रत्यक्ष रीति-से दिखला देता है। उसका यह कार्य लोकसंग्रहकी दृष्टिसेभी कुछ छोटा नहीं है। लोगोंके मनमें संन्यास-धर्मके विषयमें जो आदर-बुद्धि विद्यमान है, उसका सच्चा कारण यही है; और मोक्षकी दृष्टिमे वह गीताकोभी संमत है। परंतु केवल
गीताध्याय-संगति ४६९ जन्म-स्वभावकी ओर, अर्थात् प्रारब्ध-कर्मकीही ओर ध्यान न देकर यदि शास्त्रकी नीतिके अनुसार इस बातका विचार किया जावे, कि जिसने पूरी आत्म-स्वतंत्रता प्राप्त कर ली है, उस ज्ञानी पुरुषको इस कर्म-भूमिमें किस प्रकार बर्ताव करना चाहिये; तो गीताके अनुसार यह सिद्धान्त करना पड़ता है, कि कर्मत्याग-पक्ष गौण है; और सृष्टिके आरंभमे मरीचि प्रभृतिने तथा आगे चल कर जनक आदिकोंने जिस कर्मयोगका आचरण किया है, उसीको ज्ञानी पुरुष लोकसंग्रहके लिये स्वीकार करे। क्योंकि, अब न्यायतः यही कहना पड़ता है, कि परमेश्वरकी निर्माण की हुई सृष्टिको चलानेका कामभी ज्ञानी मनुष्यकोही करना चाहिये; और, इस मार्गमे ज्ञान-सामर्थ्यके साथही कर्म-सामर्थ्यकाभी विरोधरहित मेल होनेके कारण, यह कर्मयोग केवल सांख्यमार्गकी अपेक्षा कहीं अधिक योग्यताका निश्चित होता है। सांख्य और कर्मयोग, इन दोनों निष्ठाओमें जो मुख्य भेद है, उसका उक्त रीति-से विचार करने पर सांख्य + निष्काम कर्म = कर्मयोग यह समीकरण निष्पन्न होता है, और वैशंपायनके कथनानुसार गीता-प्रतिपादन प्रवृत्ति-प्रधान कर्मयोगके प्रतिपादनमेंही सांख्य-निष्ठाके निरूपणकाभी सरलतासे समावेश हो जाता है (मभा. शां. ३४८. ५३) ; और इसी कारणसे गीताके संन्यास-मार्गीय टीकाकारोंको यह बतलानेके लिये अच्छा अवसर मिल गया है, कि गीतामें उनका सांख्य या संन्यास- मार्गही प्रतिपादित है। गीताके जिन श्लोकोंमें कर्मको श्रेयस्कर निश्चित कर कर्म करनेको कहा है, उन श्लोकोंकी ओर ध्यान न देनेसे अथवा यह मनगढ़ंत बात कह देनेसे, कि वे सब श्लोक अर्थवादात्मक अर्थात् आनुषंगिक एवं प्रशंसात्मक हैं या किसी अन्य युक्तिसे उपर्युक्त समीकरणके 'निष्काम कर्म' को उड़ा देनेसे, उसी समीकरणका 'सांख्य = कर्मयोग' यह रूपान्तर हो जाता है; और फिर यह कहनेके लिये अवसर मिल जाना है, कि गीतामें सांख्य-मार्गकाही प्रतिपादन किया है। परंतु इस रीतिसे गीताका अर्थ किया है, वह गीताके उपक्रमोपसंहारके अत्यंत विरुद्ध है; और इस ग्रंथमें हमने स्थान-स्थानपर स्पष्ट रीतिसे दिखला दिया है, कि गीतामें कर्मयोगको गौण तथा संन्यासको प्रधान मानना वैसेही अनुचित है, जैसे घर-मालिकको कोई उसीके घरमें पाहुना कह दे; और पाहुनेको घर-मालिक ठहरा दे; और जिन लोगोंका मत है, कि गीतामे केवल वेदान्त, केवल भक्ति या सिर्फ पातंजलयोगहीका प्रतिपादन किया गया है, उनके उन मतोंकाभी खंडन हम करही चुके हैं। गीतामें कौन-सी बात नहीं है? वैदिक धर्ममे मोक्ष-प्राप्तिके जितने साधन या मार्ग हैं, उनमेंसे प्रत्येक मार्गका कुछ-न-कुछ भाग गीतामें है; और इतना होनेपरभी, "भूतभृन्न च भूतस्थो"के (गीता ९. ५) न्यायसे गीताका सच्चा रहस्य इन मार्गोंकी अपेक्षा भिन्नही है। संन्यास-मार्ग अर्थात् उपनिषदोंका यह तत्त्व गीताको ग्राह्य है, कि ज्ञानके बिना मोक्ष नहीं; परंतु उसे निष्काम कर्मके साथ जोड़ देनेके कारण गीता-प्रतिपादित भागवत धर्ममेंही यति-धर्मकाभी सहजही समावेश हो गया है। तथापि गीताम
४७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र संन्यास और वैराग्यका अर्थ यह नहीं किया है, कि कर्मोंको छोड़ देना चाहिये; किन्तु यह कहा है, कि केवल फलाशाकाही त्याग करनेमें सच्चा वैराग्य या संन्यास है, और अन्तमें सिद्धान्त किया है, कि उपनिषत्कारोंके कर्म-संन्यासकी अपेक्षा निष्काम कर्मयोग अधिक श्रेयस्कर है। कर्मकांडी मीमांसकोंका यह मतभी गीताको मान्य है, कि यदि केवल यज्ञके लियेही वेदविहित यज्ञयागादि कर्मोंका आचरण किया जावे, तो वे बंधक नहीं होते; परंतु 'यज्ञ' शब्दका अर्थ विस्तृत करके गीताने उक्त मतमें यह सिद्धान्त और जोड़ दिया है, कि यदि फलाशा त्याग कर सब कर्म किये जावें, तो यही एक बड़ा भारी यज्ञ हो जाता है, इस लिये मनुष्यका यही कर्तव्य है, कि वह वर्णा- श्रमविहित सब कर्मोंको केवल निष्काम बुद्धिसे सदैव करता रहे। सृष्टिकी उत्पत्तिके क्रमके विषयमें उपनिषत्कारोंके मतकी अपेक्षा सांख्योंका मत गीतामें प्रधान माना गया है; तोभी प्रकृति और पुरुषतकही न ठहर कर, सृष्टिके उत्पत्तिक्रमकी परंपरा उपनिषदोंमें वर्णित नित्य परमात्मापर्यंत ले जाकर भिड़ा दी गई है। केवल बुद्धिके द्वारा अध्यात्मज्ञानको प्राप्त कर लेना क्लेशदायक है, इसलिये 'भागवत या नारायणीय धर्ममें जो कहा है, कि उसे भक्ति और श्रद्धाके द्वारा प्राप्त कर लेना चाहिये, उस वासुदेव-भक्तिकी विधिका वर्णनभी गीतामें किया गया है; परंतु इस विषयमेंभी भागवत धर्मकी सब बातोंमें कुछ नक़ल नहीं की गई है; वरन् भागवत् धर्ममेंभी वर्णित जीवके उत्पत्तिविषयक इस मतको वेदान्त-सूत्रकी नाईं गीतानेभी त्याज्य माना है, कि वासुदेवसे संकर्षण या जीव उत्पन्न हुआ है; और भागवत धर्ममें वर्णित भक्तिका तथा उपनिषदोंके क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-संबंधी सिद्धान्तका गीतामें पूरा पूरा मेल कर दिया है। इसके सिवा मोक्ष-प्राप्तिका दूसरा साधन पातंजलयोग है। यद्यपि गीताका कहना यह नहीं कि पातंजलयोगही जीवनका मुख्य कर्तव्य है; तथापि गीता यह कहती है, कि बुद्धिको सम करनेके लिये इंद्रियनिग्रह करनेकी आवश्यकता है, इसलिये उतने भरके लिये पातंजलयोगके यम-नियम-आसन आदि साधनोंका उपयोग कर लेन चाहिये। सारांश, वैदिक धर्ममें मोक्ष-प्राप्तिके जो जो साधन बतलाये गये हैं, उन सभीका कुछ-न-कुछ वर्णन, कर्मयोगका सांगोपांग विवेचन करनेके समय, गीतामें प्रसंगानुसार करना पड़ा है। यदि इस सब वर्णनोंको स्वतंत्र माना जाय, तो विसंगति उत्पन्न होकर ऐसा आभास होता है कि गीताके सिद्धान्त परस्पर विरोधी हैं; और यह आभास भिन्न भिन्न सांप्रदायिक टीकाओंसे तो औरभी अधिक दृढ़ हो जाता है। परंतु जैसा हमने ऊपर कहा है, उसके अनुसार यदि यह सिद्धान्त किया गया, कि ब्रह्मज्ञान और भक्तिका मेल करके अंतमें उनके द्वारा कर्मयोगका समर्थन करनाही गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषय है, तो ये सब विरोध लुप्त हो जाते हैं और पूर्ण व्यापक दृष्टिको स्वीकार कर जिस अलौकिक चातुर्यसे गीताके तत्त्वज्ञानके साथ भक्ति तथा कर्मयोगका यथोचित मेल कर दिया गया है, उसको देख दाँतों तले अँगुली दबाकर रह जाना पड़ता है। गंगामें कितनीही नदियाँ क्यों न आ मिलें;
गीताध्याय-संगति ४७१
परंतु इससे उसका मूल स्वरूप नहीं बदलता; बस, ठीक यही हाल गीताकाभी है। उसमें सब कुछ भलेही हो; परंतु उसका मुख्य प्रतिपाद्य विषय तो कर्मयोगही है। यद्यपि इस प्रकार कर्मयोगही मुख्य विषय है; तथापि कर्मके साथही मोक्ष-धर्मके मर्मकाभी इसमें भली भाँति निरूपण किया गया है, इसलिये कार्य-अकार्यका निर्णय करनेके हेतु बतलाया गया यह गीता-धर्मही- “स हि धर्मः सुपर्याप्तो ब्रह्मणः पदवेदने ” (मभा. अश्व. १६. १२) – ब्रह्मकी प्राप्ति करा देनेके लियेभी पूर्ण समर्थ है; और भगवानने अर्जुनसे अनुगीताके आरंभमें स्पष्ट रीतिसे कह दिया है, कि इस मार्गमे चलनेवालेको मोक्ष-प्राप्तिके लिये किसीभी अन्य अनुष्ठानकी आव- श्यकता नहीं है। हम जानते हैं, कि संन्यास-मार्गके उन लोगोंको हमारा उपरोक्त कथन रोचक प्रतीत न होगा, जो यह प्रतिपादन किया करते हैं, कि विना सब व्याव- हारिक कर्मोंका त्याग किये मोक्षकी प्राप्ति होती नहीं; परंतु इसके लिये कोई अन्य उपाय नहीं है। गीता-ग्रंथ न तो संन्यास-मार्गका है और न निवृत्ति-प्रधान किसी दूसरेही पंथकाभी। इतनाही नहीं, तो गीताशास्त्रकी प्रवृत्ति इसीलिये हुई है, कि वह ब्रह्मज्ञानकी दृष्टिसे ठीक ठीक युक्तिसहित इस प्रश्नका उत्तर दे, कि ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपरभी कर्मोंका संन्यास करना अनुचित क्यों है? इसलिये संन्यास-मार्गके अनुयायियोंको चाहिये, कि वे गीताकोभी ‘संन्यास देने’ की झंझटमें न पड़ ‘संन्यास- मार्ग-प्रतिपादक’ जो अन्य वैदिक ग्रंथ हैं, उन्हींमे संतुष्ट रहें। अथवा गीतामें संन्यास- मार्गकोभी भगवानने जिस निरभिमान बुद्धिसे निःश्रेयस्कर कहा है, उसी मम-बुद्धिसे सांख्यमार्गवालोंकोभी यह कहना चाहिये, कि “परमेश्वरका हेतु यह है, कि संसार चलता रहे; और जब कि इसीलिये वह बार बार अवतार धारण करता है, तब ज्ञानप्राप्तिके अनंतर निष्कामबुद्धिसे व्यावहारिक कर्मोंको करते रहनेके जिस मार्गका उपदेश भगवानने गीतामें दिया है, वही मार्ग कलिकालमें उपयुक्त है।” – और ऐसा कहनाही उनके लिये सर्वोत्तम पक्ष है।
पंद्रहवाँ प्रकरण उपसंहार तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च । *
- गीता ८. ७ चाहे आप गीताके अध्यायोंकी संगति या मेल देखिये, या उन अध्यायोंके विष- योंका मीमांसकोंकी पद्धतिसे पृथक् पृथक् विवेचन कीजिये; किसीभी दृष्टिसे विचार कीजिये; अंतमें गीताका यही सच्चा तात्पर्य सिद्ध होता कि "ज्ञान भक्ति- युक्त कर्मयोग" ही गीताका सार है; अर्थात् सांप्रदायिक टीकाकारोंने कर्मयोगको गौण ठहरा कर गीताके जो अनेक प्रकारके तात्पर्य बतलाये हैं, वे यथार्थ नहीं, हैं; किंतु उपनिषदोंमें वर्णित अद्वैत वेदान्तका भक्तिके साथ मेल कर उसके द्वारा बड़े बड़े कर्मवीरोंके चरित्रोंका रहस्य या उनके जीवनक्रमकी उपपत्ति बतलानाही गीताका सच्चा तात्पर्य है। मीमांसकोंके कथनानुसार केवल श्रौत-स्मार्त कर्मोंको सदैव करते रहना भलेही शास्त्रोक्त हो; तोभी ज्ञानरहित केवल तांत्रिक क्रियासे बुद्धिमान् मनुष्यका समाधान नहीं होता; और यदि उपनिषदोंमें वर्णित धर्मको देखें, तो वह केवल ज्ञानमय होनेके कारण अल्प-बुद्धिवाले मनुष्योंके लिये अत्यंत कष्टसाध्य है। इसके सिवा एक और बात है, उपनिषदोंका संन्यास-मार्गभी लोक- संग्रहका बाधक है; इसलिये भगवानने ऐसे ज्ञानमूलक, भक्ति-प्रधान और निष्काम कर्मविषयक धर्मका उपदेश गीतामें किया है, कि जिसका पालन आमरण किया जावे, जिसमे बुद्धि (ज्ञान), प्रेम (भक्ति) और कर्तव्यका ठीक ठीक मेल हो जावे; मोक्षकी प्राप्तिमें कुछ अंतर न पड़ने पावे; और लोक-व्यवहारभी सरलतासे होता रहे। इसीमें कर्म-अकर्मके शास्त्रका सब सार भरा हुआ है। अधिक क्या कहें, गीताके उपक्रम-उपसंहारसे यह बात स्पष्टतया विदित हो जाती है, कि अर्जुनको इस धर्मका उपदेश करनेमें कर्म-अकर्मका विवेचनही मूल कारण है। इस बातका विचार दो तरहसे किया जाता है, कि किस कर्मको धर्म्य, पुण्यप्रद, न्याय्य या श्रेयस्कर कहना चाहिये; और किस कर्मको इसके विरुद्ध अर्थात् अधर्म्य, पापप्रद, अन्याय्य या गर्ह्य कहना चाहिये। पहली रीति यह है, कि उपपत्ति, कारण या मर्म न बतलाकर केवल यह कह दे, कि किसी कामको अमुक रीतिसे करो, कि तो वह शुद्ध होगा, और अन्य रीतिसे करो, तो अशुद्ध हो जायगा। उदाहरणार्थ - हिंसा मत करो, चोरी मत
- "इसलिये सदैव मेरा स्मरण कर और लड़ाई कर।" लड़ाई कर - शब्दकी योजना यहापर प्रसंगानुसार की गई है; परंतु उसका अर्थ केवल 'लड़ाई कर' ही नहीं है यह अर्थभी समझा जाना चाहिये, कि "यथाधिकार कर्म कर।"
करो, सच बोलो, धर्माचरण करो, इत्यादि बातें इसी प्रकारकी हैं। मनुस्मृति आदि स्मृति-ग्रंथोंमें तथा उपनिषदोंमें ये विधियाँ, आज्ञाएँ अथवा आचार स्पष्ट रीतिसे बतलाये गये हैं। परंतु मनुष्य ज्ञानवान् प्राणी है; इसलिये उसका समाधान केवल ऐसी विधियों या आज्ञाओंमें नहीं हो सकता; क्योंकि मनुष्यकी यही स्वाभाविक इच्छा होती है, कि वह उन नियमोंके बनाये जानेका कारणभी जान ले; और इसलिये वह विचार करके इन नियमोंके नित्य तथा मूल तत्त्वकी खोज करता है - बस; यही दूसरी रीति है, कि जिसमें कर्म-अकर्म, धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप आदिका विचार किया जाता है। व्यावहारिक धर्मके अंतको इस रीतिसे देखकर उसके मूल तत्त्वोंको ढूँढ़ निकालना शास्त्रका काम है; तथा उस विषयके केवल नियमोंको एकत्र करके बतलाना आचारसंग्रह कहलाता है। कर्ममार्गका आचार-संग्रह स्मृति-ग्रंथोंमें है; और उनके आचारोंके मूल तत्त्वोंका शास्त्रीय अर्थात् तात्त्विक विवेचन भगवद्गीतामें संवाद- पद्धतिसे या पौराणिक रीतिसे किया गया है। अतएव भगवद्गीताके प्रतिपाद्य विषयको केवल कर्मयोग न कहकर कर्मयोगशास्त्र कहनाही अधिक उचित तथा प्रशस्त होगा; और यही योगशास्त्र शब्द भगवद्गीताके अध्याय-समाप्ति-सूचक संकल्पमें आया है। जिन पश्चिमी पंडितोंने पारलौकिक दृष्टिको त्याग दिया है या जो लोग उसे गौण मानते हैं, वे गीतामें प्रतिपादित कर्मयोगशास्त्रकोही भिन्न भिन्न लौकिक नाम दिया करते हैं - जैसे सद्व्यवहारशास्त्र, सदाचारशास्त्र, नीतिशास्त्र, नीतिमीमांसा, नीतिशास्त्रके मूल तत्त्व, कर्तव्यशास्त्र, कार्य-अकार्य व्यवस्थिति, समाजधारण- शास्त्र इत्यादि। इन लोगोंकी नीति-मीमांसाकी पद्धतिभी लौकिकही रहती है। इसी कारणसे ऐसे पाश्चात्त्य पंडितोंके ग्रंथोंका जिन्होंने अवलोकन किया है, उनमेंसे बहुतोंकी यह समझ हो जाती है, कि संस्कृत साहित्यमें सदाचरण या नीतिके मूल तत्त्वोंकी चर्चा किसीने नहीं की है। वे कहने लगते हैं कि, "हमारे यहाँ जो कुछ गहन तत्त्वज्ञान है, वह सिर्फ़ हमारा वेदान्तही है, और वर्तमान वेदान्त-ग्रंथोंको देखो; तो मालूम होगा, कि वे सांसारिक कर्मोंके विषयमें प्रायः उदासीन हैं। ऐसी अवस्थामें कर्मयोगशास्त्रका अथवा नीतिका विचार कहाँ मिलेगा ? यह विचार व्याकरण अथवा न्यायके ग्रंथोंमें तो मिलनेवाला हैही नहीं; और स्मृति-ग्रंथोंमें धर्मशास्त्रके संग्रहके सिवा और कुछभी नहीं; इसलिये हमारे प्राचीन शास्त्रकार, मोक्षहीके गूढ विचारोंमें निमग्न होनेके कारण सदाचरणके या नीतिधर्मके मूल-तत्त्वोंका विवेचन करना भूल गये !" परंतु महाभारत और गीताको ध्यानपूर्वक पढ़नेसे यह भ्रमपूर्ण समझ दूर हो जा सकती है। इतनेपरभी कुछ लोग कहते हैं, कि महाभारत एक अत्यंत विस्तीर्ण ग्रंथ है, इसलिये उसको पढ़कर पूर्णतया मनन करना बहुतही कठिन है; और गीता यद्यपि एक छोटा-सा ग्रंथ है तोभी उसमें सांप्रदायिक टीकाकारोंके मतानुसार केवल मोक्ष-प्राप्तिहीका ज्ञान बतलाया गया है। परंतु किसीने इस बातको नहीं जाँचा, कि संन्यास और कर्मयोग, दोनों मार्ग हमारे यहाँ वैदिक कालसेही
४७४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र प्रचलित है, किसीभी समय समाजमें संन्यास-मार्गियोंकी अपेक्षा कर्मयोगमेंही अनुयायियोंकी संख्या हजारों गुना अधिक हुआ करती है; और, पुराण-इतिहासके जिन कर्मशील महापुरुषोंका अर्थात् कर्मवीरोंका वर्णन है, वे सब कर्मयोग-मार्गकाही अवलंब करनेवाले थे। यदि ये सब बातें सच हैं, तो क्या इन कर्मवीरोंमें किसीकोभी यह नहीं सूझा होगा, कि अपने कर्मयोग-मार्गका समर्थन किया जाना चाहिये ? अच्छा; यदि कहा जाय, कि उस समय जितना ज्ञान था, वह सब ब्राह्मण जातिमेंही था; और वेदान्ती ब्राह्मण कर्म करनेके विषयमें उदासीन रहा करते थे; इसलिये कर्मयोगविषयक ग्रंथ नहीं लिखे गये होंगे; तोभी यह आक्षेप उचित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उपनिषत्कालमें और उसके बाद क्षत्रियोंमेंभी जनक और श्रीकृष्ण सरीखे ज्ञानी पुरुष हो गये हैं; और व्याससदृश बुद्धिमान् ब्राह्मणोंने बड़े बड़े क्षत्रियोंका इतिहासभी लिखा है। इस इतिहासको लिखते समय क्या उनके मनमें यह विचार न आया होगा, कि जिन प्रसिद्ध पुरुषोंका इतिहास हम लिख रहे हैं, उनके चरित्रके मर्म या रहस्यकोभी प्रकट कर देना चाहिये ? इस मर्म या रहस्यको कर्मयोग अथवा व्यवहारशास्त्र कहते हैं; और इसे बतलानेके लियेही महाभारतमें स्थान-स्थानपर सूक्ष्म धर्म-अधर्मका विवेचन करके, अंतमें संसारके धारण एवं पोषणके लिये कारणभूत सदाचरण अर्थात् धर्मके मूल तत्त्वोंका विवेचन मोक्ष-दृष्टिको न छोड़ते हुए गीतामें किया गया है। अन्यान्य पुराणोंमें भी ऐसे बहुतसे प्रसंग पाये जाते हैं। परंतु गीताके तेजके सामने अन्य सब विवेचन फीके पड़ जाते हैं; इसी कारणसे भगवद्गीता कर्मयोग- शास्त्रका प्रधान ग्रंथ हो गया है। हमने इस बातका पिछले प्रकरणोंमें विस्तृत विवेचन किया है, कि कर्मयोगका सच्चा स्वरूप क्या है। तथापि जबतक इस बातकी तुलना न की जावे, कि गीतामें वर्णन किये गये कर्म-अकर्मके आध्यात्मिक मूल तत्त्वोंमें पश्चिमी पंडितों द्वारा प्रतिपादित नीतिके मूलतत्त्व कहाँ तक मिलते हैं; तबतक यह नहीं कहा जा सकता, कि गीता-धर्मका निरूपण पूरा हो गया। इस प्रकार तुलना करते समय दोनों ओरके अध्यात्मज्ञानकीभी तुलना करनी चाहिये। परंतु यह बात सर्वमान्य है, कि अबतक पश्चिमी आध्यात्मिक ज्ञानकी पहुँच हमारे वेदान्तसे अधिक दूरतक नहीं होने पाई है; इसी कारणसे पूर्वी और पश्चिमी अध्यात्मशास्त्रोंकी तुलना करनेकी कोई विशेष आवश्यकता नहीं रह जाती।* ऐसी अवस्थामें अब केवल उस नीति- * वेदान्त और पश्चिमी तत्त्वज्ञानकी तुलना प्रोफेसर डायसनके The Elements of Metaphysics नामक ग्रंथमें कई स्थानोंमें की गई है। इस ग्रंथके दूसरे संस्करणके अंतमें ' On the Philosophy of Vedanta' इस विषयपर एक व्याख्यानभी छापा गया है। जब प्रो. डायसन सन १८९३ में हिंदुस्तानमें आयेथे, तब उन्होंने बंबईकी रायल एशियाटिक सोसायटीमें यह व्याख्यान दिया था। इसके अतिरिक्त The Religion and Philosophy of the Upanishads नामक डायसनसाहबका ग्रंथभी इस विषयपर पढ़ने योग्य है।
उपसंहार ४७५ शास्त्रकी अथवा कर्मयोगकी तुलनाकाही विषय बाकी रह जाता है, जिसके बारेमें कुछ लोगोंकी समझ है, कि इसकी उपपत्ति हमारे प्राचीन शास्त्रकारोंने नहीं बतलाई है। परंतु इस एकही विषयका विचारभी इतना विस्तृत है, कि उसका पूर्णतय प्रतिपादन करनेके लिये एक स्वतंत्र ग्रंथही लिखना पड़ेगा। तथापि, इस विषयपर इस ग्रंथमें थोड़ाभी विचार न करना उचित न होगा; इसलिये केवल दिग्दर्शन करनेके लिये उसकी कुछ महत्त्वपूर्ण बातोंका विवेचन इस उपसंहारमें किया जावेगा। - थोड़ाभी विचार करनेपर यह सहजही ध्यानमें आ सकता है, कि सदाचार और दुराचार, तथा धर्म और अधर्म शब्दोंका उपयोग यथार्थमें ज्ञानवान् मनुष्यके कर्मोंकेही लिये होता है; और यही कारण है, कि नीतिमत्ता केवल जड़ कर्मोंमें नहीं किंतु बुद्धिमें रहती है। "धर्मो हि तेषामधिको विशेषः" - धर्म-अधर्मका ज्ञान मनुष्यका अर्थात् बुद्धिमान् प्राणियोंकाही विशिष्ट गुण है - इस वचनका तात्पर्य और भावार्थही वही है। किसी गधे या बैलके कर्मोंके परिणामको देखकर हम उसे उपद्रवी तो बेशक कहा करते हैं, परंतु जब वह धक्का देता है, तब उसपर कोई नालिश करने नहीं जाता। इसी तरह किसी नदीमें बाढ़ आ जानेसे फसल बह जाती है, तो "अधिकांश लोगोंकी अधिक हानि" होनेके कारण कोई उसे दुराचारिणी, लुटेरी, या अनीतिमान् नहीं कहता। इसपर कोई प्रश्न कर सकते हैं, कि यदि धर्म- अधर्मके नियम मनुष्यके व्यवहारोंहीके लिये उपयुक्त हुआ करते हैं, तो मनुष्यके कर्मोंके भले-बुरेपनका विचारभी केवल उसके कर्मोंसेही करनेमें क्या हानि है? इस प्रश्नका उत्तर देना कुछ कठिन नहीं। क्योंकि अचेतन वस्तुओं अथवा पशुपक्षी आदि मूढ़ योनिके प्राणियोंका दृष्टान्त छोड़, यदि मनुष्यकेही कृत्योंका विचार करें, तोभी दीख पड़ेगा, कि जब कोई आदमी अपने पागलपनसे अथवा अनजानेमें कोई अपराध कर डालता है, तब वह संसारमें और कानून द्वारा क्षम्य माना जाता है। इससे यही बात सिद्ध होती है, कि मनुष्यकेभी कर्म-अकर्मकी भलाई-बुराई ठहरानेके लिये, सबसे पहले कर्ताकी बुद्धिकाही विचार करना पड़ता है - अर्थात् यह विचार करना पड़ता है, कि उसने उस कार्यको किस उद्देश्य, भाव या हेतुसे किया; और उसको उस कर्मके परिणामका ज्ञान था या नहीं। किसी धनवान् मनुष्यके लिये यह कोई कठिन काम नहीं, कि वह अपनी इच्छाके अनुसार मन-माना दान दे दें। यह दानविषयक काम 'अच्छा' भलेही हो; परंतु उसकी सच्ची नैतिक योग्यता उस दानकी स्वाभाविक क्रियासे नहीं ठहराई जा सकती। इसके लिये यहभी देखना पड़ेगा, कि उस धनवान् मनुष्यकी बुद्धि सचमुच श्रद्धायुक्त है, या नहीं; और उसका निर्णय करनेके लिये यदि स्वाभाविक रीतिसे किये गये दानके सिवा और कुछ प्रमाण न हो; तो इस दानकी योग्यता किसी श्रद्धापूर्वक किये गये दानकी योग्यताके बराबर नहीं समझी जाती; और कुछ नहीं, तो संदेह करनेके लिये उचित कारण अवश्य रह जाता है। सब धर्म-अधर्मका विवेचन हो जानेपर महाभारतमें यही बात एक आख्यानके रूपमें उत्तम रीतिसे समझाई
४७६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गई है। जब युधिष्ठिर राजगद्दी पा चुके तब उन्होंने एक बृहत् अश्वमेध-यज्ञ किया। उसमें अन्न और द्रव्य आदिके अपूर्व दान करनेसे और लाखों मनुष्योंके सन्तुष्ट होनेसे उनकी बहुत प्रशंसा होने लगी। उस समय वहाँ एक दिव्य नकुल (नेवला) आया; और युधिष्ठिरसे कहने लगा - "तुम्हारी व्यर्थही प्रशंसा की जाती है। पूर्वकालमें इसी कुरुक्षेत्रमें एक दरिद्री ब्राह्मण रहता था, जो उञ्छवृत्तिसे, अर्थात् खेतोंमें गिरे हुए अनाजके दानोंको चुनकर, अपना जीवन-निर्वाह किया करता था। एक दिन भोजन करनेके समय उसके यहाँ एक अपरिचित आदमी क्षुधासे पीड़ित अतिथि बन कर आ गया। यह दरिद्री ब्राह्मण और उसके कुटुंबी-जनभी कई दिनोंके भूखे थे; तोभी उसने अपने, अपनी स्त्रीके और अपने लड़कोंके सामने परोसा हुआ सब सत्तू उस अतिथिको समर्पण कर दिया। उस प्रकार उसने जो अतिथि-यज्ञ किया था, उसके महत्त्वकी बराबरी तुम्हारा यह यज्ञ - कितनाही बड़ा क्यों न हो - कभी नहीं कर सकता" (मभा. अश्व. ९०)। उस नेवलेका मुंह और आधा शरीर सोनेका था। उसने जो यह कहा, कि युधिष्ठिरके अश्वमेध-यज्ञकी योग्यता उस गरीब ब्राह्मणद्वारा अतिथिको दिये गये सेर भर सत्तूके बराबरभी नहीं है; उसका कारण उसने यह बतलाया है, कि - "उस ब्राह्मणके घरमें अतिथिकी जूठनपर लोटनेसे मेरा मुंह और आधा शरीर सोनेका हो गया; परन्तु युधिष्ठिरके यज्ञमंडपकी जूठन पर लोटनेसे मेरा बचा हुआ आधा शरीर सोनेका नहीं हो सका !" यहाँपर कर्मके बाह्य परिणामोंकोही देख कर यदि इसी बातका विचार करें - कि अधिकांश लोगोंका अधिक सुख किसमें है - तो यही निर्णय करना पड़ेगा, कि एक अतिथिको तृप्त करनेकी अपेक्षा लाखों आदमियोंको तृप्त करनेकी योग्यता लाखगुनी अधिक है। परन्तु प्रश्न यह है, कि केवल धर्म-दृष्टिसेही नहीं, किन्तु नीति-दृष्टिसेभी क्या यह निर्णय ठीक होगा ? किसीको अधिक धन-संपत्ति मिल जाना या लोकोपयोगी अनेक अच्छे काम करनेका मौक़ा मिल जाना केवल उसके सदाचारपरही अवलंबित नहीं रहता है। यदि वह गरीब ब्राह्मण द्रव्यके अभावसे बड़ा भारी यज्ञ नहीं कर सकता था; और इसलिये यदि उसने अपनी शक्तिके अनुसार कुछ अल्प और तुच्छ कामही किया, तो क्या उसकी नैतिक या धार्मिक योग्यता कम समझी जायगी ? यदि कम समझी जावे तो यही कहना पड़ेगा, कि गरीबोंको धनवानोंके सदृश नीतिमान् और धार्मिक होनेकी कभी इच्छा और आशा नहीं रखनी चाहिये। आत्म-स्वातन्त्र्यके अनुसार अपनी बुद्धिको शुद्ध रखना उस ब्राह्मणके अधिकारमें था; और यदि उसके स्वल्पाचरणमे इस बातमें कुछ संदेह नहीं रह जाता, कि उसकी परोपकार बुद्धि युधिष्ठिरकेही समान शुद्ध थी; तो उस ब्राह्मणकी और उसके स्वल्पकृत्यकी नैतिक योग्यता युधिष्ठिरके और उनके बहु- व्ययसाध्य-यज्ञके बराबरीकीही मानी जानी चाहिये। बल्कि यहभी कहा जा सकता है, कि कई दिनोंतक क्षुधासे पीड़ित होनेपरभी उस गरीब ब्राह्मणने अन्नदान करके अतिथिके प्राण बचानेमें जो स्वार्थत्याग किया, उससे उसकी शुद्ध बुद्धि औरभी अधिक
उपसंहार ४७७ व्यक्त होती है। यह तो सभी जानते हैं, कि धैर्य आदि गुणोंके समान शुद्ध बुद्धिकी सच्ची परीक्षा संकटकालमेंही हुआ करती है; और कांटनेभी अपने नीतिग्रंथके आरंभमें यही प्रतिपादन किया है, कि संकटके समयभी जिसकी शुद्ध बुद्धि (नैतिक सत्त्व) भ्रष्ट नहीं होती, वही सच्चा नीतिमान् है। उक्त नेवलेका अभिप्रायभी यही था। परंतु युधिष्ठिरकी शुद्ध बुद्धिकी परीक्षा कुछ राज्यारूढ होनेपर संपत्ति- कालमें किये गये एक अश्वमेध-यज्ञमेही होनेकी न थी; उसके पहलेही अर्थात् आपत्ति- कालकी अनेक अड़चनोंके प्रसंगोपर ब्राह्मणके समानही उसकी पूरी परीक्षा हो चुकी थी। इसीलिये महाभारतका यह सिद्धान्त है, कि धर्म-अधर्मके निर्णयके सूक्ष्म न्यायसेभी युधिष्ठिरको धार्मिकही कहना चाहिये। कहना नहीं होगा, कि वह नेवला निंदक ठहराया गया है। तथापि महाभारतमें यह वर्णन है, कि अश्वमेध करनेवालेको जो गति मिलती है, वही उस ब्राह्मणकोभी मिली। इससे यही सिद्ध होता है, कि उस ब्राह्मणके कर्मकी योग्यता युधिष्ठिरके यज्ञकी अपेक्षा अधिक भलेही नहो; तथापि इसमें संदेह नहीं, कि महाभारतकार उन दोनोंकी नैतिक और धार्मिक योग्यता एकसमान मानते हैं। व्यावहारिक कार्योंको देखनेसेभी मालूम हो सकता है. कि जब किसी धर्मकृत्यके लिये या लोकोपयोगी कार्यके लिये लखपति मनुष्य हजार रुपये चंदा देता है और कोई गरीब मनुष्य एक रुपया चंदा देता है; तब हम लोग उन दोनोंकी नैतिक योग्यता एक समानही समझते हैं! 'चंदा' शब्दको देखकर यह दृष्टान्त कुछ लोगोंको कदाचित् नया मालूम हो, परंतु यथार्थमें बात ऐसी नहीं है, क्योंकि उक्त नेवलेकी कथाका निरूपण करते समय महाभारतमेंही धर्म-अधर्मके विवेचनमें कहा गया है, कि :- सहस्रशक्तिश्च शतं शतशक्तिर्दशापि च । दद्यादपश्च यः शक्त्या सर्वे तुल्यफलाः स्मृताः ॥ "हजारवालेने सौ, सौवालेने दस, अथवा किसीने यथाशक्ति थोड़ासा पानीभी दिया, तोभी ये सब तुल्यफल हैं; अर्थात् इन सबकी योग्यता एकसमान है" (महा. अश्व. ९०.९७); और "पत्रं पुष्पं फलं तोयं" (गीता. ९. २६) - इस गीतावाक्यका तात्पर्यभी यही है। हमारे धर्ममेंही क्या, ईसाई धर्ममेंभी इस तत्त्वका संग्रह है। ईसा मसीहने एक जगह कहा है - "जिसके पास अधिक है, उससे अधिक पानेकी आशा की जाती है" (ल्यूक. १२.४८)। एक दिन जब ईसा मंदिर (गिरिजाघर) गया था, तब वहाँ धर्मार्थ द्रव्य इकट्ठा करनेका काम शुरू होनेपर एक अत्यंत गरीब विधवा स्त्रीने अपने पासके दो पैसे उस धर्मकार्यके लिये दे दिये। यह देखकर ईसाके मुँहसे यह उद्गार निकल पड़ा, कि "इस स्त्रीने अन्य सब लोगोंकी अपेक्षा अधिक दान दिया है।" इसका वर्णन बाइबलमें (मार्क. १२. ४३; ४४) है। इससे यह स्पष्ट है, कि यह बात ईसाकोभी मान्य थी, कि कर्मकी योग्यता कर्ताकी बुद्धिसेही निश्चित की जानी चाहिये; और यदि कर्ताकी बुद्धि शुद्ध हो. तो
४७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बहुधा छोटे छोटे कर्मोंकी नैतिक योग्यताभी बड़े बड़े कर्मोंकी योग्यताके बराबरही हो जाती है। इसके विपरीत - अर्थात् जब बुद्धि शुद्ध न हो तब - किसी कर्मकी नैतिक योग्यताका विचार करनेपर यह मालूम होगा, कि यद्यपि हत्या करना केवल एकही कर्म है; तथापि अपनी जान बचानेके लिये आक्रमणकारीकी हत्या करनेमें और किसी राह चलते धनवान् मुसाफ़िरको द्रव्यके लोभसे मार डालनेमें, नैतिक दृष्टिसे बहुत अंतर है। जर्मन कवि शिलरने इसी आशयके एक प्रसंगका वर्णन अपने 'विलियम टेल' नामक नाटकके अंतमें किया है; और वहाँ बाह्यतः एकहीसे दीख पड़नेवाले दो कृत्योंमें बुद्धिकी शुद्धता-अशुद्धताके कारण जो भेद दिखलाया गया है, वही भेद स्वार्थत्याग और स्वार्थके लिये की गई हत्यामेंभी है। इससे मालूम होता है, कि कर्म छोटे-बड़े हों या बराबर हों; उनमें नैतिक दृष्टिसे जो भेद हो जाता है, वह कर्ताके हेतुके कारणही हुआ करता है। इस हेतुकोही उद्देश्य, वासना या बुद्धि कहते हैं। इसका कारण यह है, कि 'बुद्धि' शब्दका शास्त्रीय अर्थ यद्यपि 'व्यवसायात्मक इंद्रिय' है; तोभी ज्ञान, वासना, उद्देश्य या हेतु सब बुद्धींद्रियके व्यापारकेही फल हैं, अतएव इनके लियेभी बुद्धि शब्दहीका सामान्यतः प्रयोग किया जाता है; और पहलेभी यह बतलाया जा चुका है, कि स्थितप्रज्ञकी साम्य-बुद्धिमें व्यवसायात्मक बुद्धिकी स्थिरता और वासनात्मक बुद्धिकी शुद्धता, दोनोंका समावेश होता है, भगवान्ने अर्जुनसे कुछ यह सोचनेको नहीं कहा, कि युद्ध करनेसे कितने मनुष्योंका कितना कल्याण होगा और कितने लोगोंकी कितनी हानि होगी; बल्कि अर्जुनसे भगवान् यही कहते हैं, कि इस समय यह विचार गौण है, कि तुम्हारे युद्ध करनेसे भीष्म मरेंगे कि द्रोण; मुख्य प्रश्न यही है, कि तुम किस बुद्धि (हेतु या उद्देश्य) से युद्ध करनेको तैयार हुए हो। यदि तुम्हारी बुद्धि स्थितप्रज्ञोंके समान होगी, और यदि तुम उस शुद्ध और पवित्र बुद्धिसे अपना कर्तव्य करने लगोगे, तो फिर चाहे भीष्म मरे या द्रोण; तुम्हें उसका पाप नहीं लगेगा। तुम कुछ इस फलकी आशासे तो युद्ध करही नहीं रहो हो, कि भीष्म मारे जावें। जिस राज्यपर तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार है, उसका हिस्सा तुमने माँगा; और युद्ध टालनेके लिये यथाशक्ति गम खाकर बीच-बचाव करनेकाभी तुमने बहुत कुछ प्रयत्न किया। परंतु जब इस मेलके प्रयत्नसे और साधुपनके मार्गसे निर्वाह नहीं हो सका, तब लाचारीसे तुमने युद्ध करनेका निश्चय किया है, इसमें तुम्हारा कुछ दोष नहीं है। क्योंकि दुष्ट मनुष्यसे किसी ब्राह्मणकी नाईं अपने धर्मानुसार प्राप्त अधिकारकी भिक्षा न माँगते हुए, आवश्यकता आ पड़नेपर क्षत्रिय-धर्मके अनुसार लोकसंग्रहार्थ उसकी प्राप्तिके लिये अंतमें युद्ध करनाही तुम्हारा कर्तव्य है (महा. उ. २८, ३२; वनपर्व ३३. १८, ५०)। भगवान्के उक्त युक्तिवादको व्यासजीनेभी स्वीकार किया है, और, उन्होंने इसीके द्वारा आगे चलकर शांतिपर्वमें युधिष्ठिरका समाधान किया है (शां. अ. ३०. ३३)। परंतु कर्म-अकर्मका निर्णय करनेके लिये बुद्धिको इस तरहसे श्रेष्ठ
उपसंहार ४७९ मान लें, तोभी अब यह अवश्य जान लेना चाहिये, कि शुद्ध बुद्धि किसे कहते हैं। क्योंकि, मन और बुद्धि दोनों प्रकृतिके विकार हैं; इसलिये वे स्वभावतः तीन प्रकारके अर्थात् सात्त्विक, राजस और तामस हो सकते हैं। इसलिये गीतामें कहा है, कि शुद्ध या सात्त्विक बुद्धि वह है, कि जो बुद्धिसेभी परे रहनेवाले नित्य आत्माके स्वरूपको पहचाने; और यह पहचान कर, कि सब प्राणियोंमें एकही आत्मा है, उसीके अनु- सार कार्य-अकार्यका निर्णय करे। इस सात्त्विक बुद्धिकाही दूसरा नाम साम्यबुद्धि है, और इसके 'साम्य' शब्दका अर्थ "सर्वभूतान्तर्गत आत्माकी एकता या समानता- को पहचाननेवाली" है। जो बुद्धि इस समानताको नहीं जानती, वह न तो शुद्ध है और न सात्त्विकभी। इस प्रकार जब यह मान लिया गया, कि नीतिका निर्णय करनेमें साम्य-बुद्धिही श्रेष्ठ है, तब यह प्रश्न उठता है, कि बुद्धिकी इस समता अथवा साम्यको कैसे पहचानना चाहिये? क्योंकि बुद्धि तो अंतरिंद्रिय है; इसलिये उसका भलाबुरापन हमारी आँखोंसे दीख नहीं पड़ता। अतः बुद्धिकी समता तथा शुद्धताकी परीक्षा करनेके लिये पहले मनुष्यके बाह्य आचरणको देखना चाहिये; नहीं तो कोईभी मनुष्य ऐसा कह कर - कि मेरी बुद्धि शुद्ध है - मनमाना बर्ताव करने लगेगा। इसीसे शास्त्रोंका सिद्धान्त है, कि सच्चे ब्रह्मज्ञानी पुरुषकी पहचान उसके स्वभावसेही हुआ करती है। जो केवल मुँहसे कोरी बातें करता है, वह सच्चा साधु नहीं। भगवद्गीतामेंभी स्थितप्रज्ञ तथा भगवद्भक्तोंके लक्षण बतलाते समय आम करके इसी बातका वर्णन किया गया है, कि वे संसारके अन्य लोगोंके साथ कैसा बर्ताव करते हैं; और तेरहवें अध्यायमें ज्ञानकी व्याख्याभी इसी प्रकार - अर्थात् यह बतलाकर, कि स्वभावपर ज्ञानका क्या परिणाम होता है - की गई है। इससे यह साफ़ मालूम होता है, कि गीता यह कभी नहीं कहती, कि बाह्य कर्मोंकी ओर कुछभी ध्यान न दो। परंतु इस बातपर ध्यान देना चाहिये, कि किसी मनुष्यकी विशेषकरके अपरिचित मनुष्यकी - बुद्धिकी समताकी परीक्षा करनेके लिये यद्यपि केवल उसका बाह्य कर्म या आचरण और, उसमेंभी, संकट-समयका आचरणही प्रधान साधन है; तथापि केवल इस बाह्य आचरण द्वाराही नीतिमत्ताकी अचूक परीक्षा हमेशा नही हो सकती। क्योंकि उक्त नकुलोपाख्यानसे यह सिद्ध हो चुका है, कि यदि बाह्य कर्म छोटाभी हो; तथापि विशेष अवसरपर उसकी नैतिक योग्यता बड़े कर्मोंकेही बराबर हो जाती है। इसीलिये हमारे शास्त्रकारोंने यह सिद्धान्त किया है, कि बाह्य-कर्म चाहे छोटा हो या बड़ा, एकहीको सुख देनेवाला हो या अधिकांश लोगोंको; उसको केवल बुद्धिकी शुद्धताका एक प्रमाण मानना चाहिये, इसमे अधिक महत्त्व उसे नहीं देना चाहिये। किंतु उस बाह्य-कर्मके आधारपर पहले यह देख लेना चाहिये, कि कर्म करनेवालेकी बुद्धि कितनी शुद्ध है; और अंतमें इस रीतिसे व्यक्त होनेवाली बुद्धिके आधारपरही उक्त कर्मकी नीतिमत्ताका निर्णय करना चाहिये, यह निर्णय केवल बाह्य-कर्मोंको देखनेमे ठीक नहीं हो सकता। यही कारण है, कि
४८० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र "कर्मकी अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है" (गीता. २. ४९) ऐसा कहकर गीताके कर्मयोगमें सम और शुद्ध-बुद्धिको अर्थात् वासनाकोही प्रधानता दी गई है। नारद-पंचरात्र नामक भागवतधर्मका गीतासे अर्वाचीन एक ग्रंथ है। उसमें मार्कंडेय नारदसे कहते हैं :- मानसं प्राणिनामेव सर्वकर्मैककारणम् । मनोनुरूपं वाक्यं च वाक्येन प्रस्फुटं मनः । "मनही लोगोंके सब कर्मोंका एक (मूल) कारण है। जैसा मन रहता है, वैसीही बात निकलती है; और बातचीतसे मन प्रकट होता है" (ना. पं. १. ७. १८) । सारांश यह है, कि मन (अर्थात् मनका निश्चय) सबसे प्रथम है, उसके अनन्तर सब कर्म हुआ करते हैं। इसीलिये कर्म-अकर्मका निर्णय करनेके लिये गीताके शुद्ध- बुद्धिके सिद्धान्तकोही बौद्ध ग्रंथकारोंने स्वीकृत किया है। उदाहरणार्थ, 'धम्मपद' नामक बौद्ध-धर्मोय प्रसिद्ध नीतिग्रंथके आरंभमेंही कहा है, कि :- मनोपुब्बंगमा धम्मा मनोसेट्ठा ( श्रेष्ठ ) मनोमया ॥ मनसा चे पदुट्ठेन भासति वा करोति वा ॥ ततो नं दुक्खमन्वेति चक्कंव वहतो पदं ॥ "मन याने मनका व्यापार प्रथम है। उसके अनंतर धर्म-अधर्मका आचरण होता है। ऐसा क्रम होनेके कारण इस काममें मनही मुख्य और श्रेष्ठ है, इसलिये इन सब धर्मोंको मनोमयही समझना चाहिये, अर्थात् कर्ताका मन जिस प्रकार शुद्ध या दुष्ट रहता है, उसी प्रकार उसके भाषण और कर्मभी भले-बुरे हुआ करते हैं, तथा उसी प्रकार आगे उसे सुख-दुःख मिलता है।"* इसी तरह उपनिषदों और गीताका यह अनुमानभी (कौषी. ३ १; गीता १८. १७) बौद्ध धर्ममें हो गया है, कि जिसका मन एक बार पूर्ण शुद्ध और निष्काम हो जाता है, उस स्थितप्रज्ञ पुरुषसे फिर कभी पाप होना संभव नही; अर्थात् सब कुछ करकेभी वह पाप-पुण्यसे अलिप्त रहता है। इसलिये बौद्ध धर्म-ग्रंथोंमें अनेक स्थलोंपर वर्णन किया गया है, कि 'अर्हत्' अर्थात् पूर्णावस्थामे पहुँचा हुआ मनुष्य हमेशाही शुद्ध और निष्पाप रहता है (धम्मपद २९४, २९५; मिलिंद प्र. ४. ५. ३) । पश्चिमी देशोंमें नीतिका निर्णय करनेके लिये दो पंथ हैं : पहला आधिदैवत पंथ, जिसके अनुसार, नीतिका निर्णय करनेके लिये सदसद्विवेक-देवताकी शरणमें
- पाली भाषाके इस श्लोकका भिन्न भिन्न लोग भिन्न भिन्न अर्थ करते हैं। परंतु जहाँतक हम समझते हैं, इस श्लोककी रचना इसी तत्त्वपर की गई है, कि कर्म- अकर्मका निर्णय करनेके लिये मानसिक स्थितिका विचार अवश्य करना पड़ता है। 'धम्मपद'का मैक्समूलर साहबने अंग्रेजीमें भाषांतर किया है, उसमें इस श्लोककी टीका देखिये । S. B. E. Vol. X, pp. 3-4.
उपसंहार ४८१ जाना पड़ता है; और दूसरा आधिभौतिक पंथ है, कि जो इस बाह्य कसौटीके द्वाराही नीतिका निर्णय करनेके लिये कहता है, कि "अधिकांश लोगोंका अधिक हित किसमें है ?" परंतु ऊपर किये गये विवेचनसे यह स्पष्ट मालूम हो सकता है, कि ये दोनों पंथ शास्त्र-दृष्टिसे अपूर्ण तथा एकपक्षीय हैं। कारण यह है, कि सदसद्विवेकशक्ति कोई स्वतंत्र वस्तु या देवता नहीं; किंतु वह व्यवसायात्मका बुद्धिमेंही शामिल है, इसलिये प्रत्येक मनुष्यकी प्रकृति और स्वभावके अनुसार उसकी सदसद्विवेकबुद्धिभी सात्त्विक, राजस या तामस हुआ करती है। ऐसी अवस्थामें उसका कार्य-अकार्य निर्णय सदैव दोषरहित नहीं हो सकता; और यदि केवल "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख "किसमें है, इस बाह्य आधिभौतिक कसौटीपरही ध्यान देकर नीति- मत्ताका निर्णय करें; तो कर्म करनेवाले पुरुषकी बुद्धिका कुछभी विचार नहीं हो सकेगा; तब यदि कोई मनुष्य चोरी या व्यभिचार करे; और उसके बाह्य अनिष्ट- कारक परिणामोंको कम करनेके लिये या छिपानेके लिये पहलेहीसे सावधान होकर कुछ कुटिल प्रबंध कर ले; तो यही कहना पड़ेगा, कि उसका दुष्कृत्य आधिभौतिक नीति-दृष्टिसे उतना निंदनीय नहीं है। अतएव यह बात नहीं, कि केवल वैदिक धर्म- मेंही कायिक, वाचिक और मानसिक शुद्धताकी आवश्यकताका वर्णन किया गया हो (मनु. १२. ३-८; ९. २९); किंतु वाइबलमेंभी व्यभिचारको केवल कायिक पाप न मानकर, परस्त्रीकी ओर दूसरे पुरुषोंका देखना या परपुरुषकी ओर दूसरी स्त्रियोंका देखनाभी व्यभिचार माना गया है (मेथ्यू. ५. २८); और बौद्ध धर्ममें कायिक अर्थात् बाह्य शुद्धताके साथ साथ वाचिक और मानसिक शुद्धताकीभी आव- श्यकता बतलाई गई है (धम्मपद ९६, ३९१)। इसके सिवा ग्रीन साहबका यहभी कहना है, कि बाह्य-सुखकोही परम साध्य माननेसे मनुष्य मनुष्यमें और राष्ट्र-राष्ट्रमें उसे पानेके लिये प्रतिद्वंद्विता उत्पन्न हो जाती है; और कलहका होनाभी संभव है। क्योंकि बाह्य-सुखकी प्राप्तिके लिये जो बाह्य साधन आवश्यक है, वे प्रायः दूसरोंके सुखको कम किये बिना हमें नहीं मिल सकते। परंतु साम्य-बुद्धिके विषयमें ऐसा नहीं कह सकते। यह आंतरिक सुख आत्मवश है, अर्थात् यह किसी दूसरे मनुष्यके सुखमें बाधा न डालकर प्रत्येकको मिल सकता है। इतनाही नहीं; किंतु आत्मैक्यको पहचानकर सब प्राणियोंसे समताका व्यवहार करनाही जिसका स्वभाव बन जाता है वह गुप्त या प्रकट, किसी रीतिसेभी कोई दुष्कृत्य करही नहीं सकता; और फिर उसे यह बतलानेकी आवश्यकताभी नहीं रहती, कि "हमेशा यह देखते रहो, कि अधिकांश लोगोंका अधिक सुख किसमें है।" कारण यह है, कि कोईभी मनुष्य हो; वह सार-असार-विचारके बादही किसी कृत्यको किया करता है। यह बात नहीं, कि केवल नैतिक कर्मोंका निर्णय करनेके लियेही सार-असार-विचारकी आवश्यकता होती है। सार-असार-विचार करते समय यही महत्त्वका प्रश्न होता है, कि अंतःकरण कैसा होना चाहिये ? क्योंकि सब लोगोंके अंतःकरण एक समान नहीं गी. र. ३१
४८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र होते । अतएव जबकि यह कह दिया जावे, कि "अंतःकरणमें सदा साम्य-बुद्धि जागृत रहनी चाहिये; " तब फिर यह बतलानेकी कोई आवश्यकता नहीं, कि अधिकांश लोगों या सब प्राणियोंके हितका सार-असार-विचार करो। पश्चिमी पंडितभी अब यह कहने लगे हैं, कि मानव-जातिके प्राणियोंके संबंधमें मनुष्यके जो कुछ कर्तव्य हैं, वे तो हैंही; परंतु मूक जानवरोंके संबंधमेंभी उसके कुछ कर्तव्य हैं, जिनका समावेश कार्य-अकार्य शास्त्रमें किया जाना चाहिये; और यदि इस व्यापक दृष्टिसे देखें तो मालूम होगा, कि "अधिकांश लोगोंका अधिक हित" की अपेक्षा 'सर्वभूतहित' शब्दही अधिक व्यापक और उपयुक्त है; तथा 'साम्य-बुद्धि'में इन सभीका समावेश हो जाता है। इसके विपरीत यदि ऐसा मान लें, कि किसीकी बुद्धि शुद्ध और सम नहीं है; तो वह इस बातका ठीक ठीक हिसाब भलेही कर ले, कि "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" किसमें है; परंतु नीति-धर्मकी ओर उसकी प्रवृत्ति होना संभव नहीं है। क्योंकि किसी सत्कार्यकी ओर प्रवृत्ति होना शुद्ध मनका गुण या धर्म है; हिसाबी मनका नहीं। यदि कोई कहे, कि "हिसाब करनेवाले मनुष्यके स्वभाव या मनको देखनेकी तुम्हें कोई आवश्यकता नहीं है, तुम्हें केवल यही देखना चाहिये, कि उसका किया हुआ हिसाब सही है या नहीं; और उस हिसाबसे कर्तव्य-अकर्तव्यका निर्णय हो कर तुम्हारा काम चल जाता है या नहीं" - तो वहभी सच नहीं हो सकता। कारण यह है, कि सामान्यतः यह तो सभी जानते हैं कि सुखःदुःख किसे कहते हैं, तोभी सब प्रकारके सुखदुःखोंके तारतम्यका हिसाब करते समय पहले यह निश्चय कर लेना पड़ता है, कि किस प्रकारके सुखदुःखोंको कितना महत्व देना चाहिये। परंतु सुखदुःखोंकी इस प्रकार माप करनेके लिये उष्णतामापक यंत्रके समान कोई निश्चित बाह्य साधन न तो वर्तमान समयमें है; और न भविष्यमेंभी उसके मिल सकनेकी कुछ संभावना है। इसलिये सुखदुःखोंकी ठीक ठीक कीमत ठहरानेका काम याने उनके महत्त्व या योग्यताका निर्णय करनेका काम, प्रत्येक मनुष्यको अपने मनमेंही करना पड़ेगा। परंतु जिसके मनमें ऐसी आत्मौपम्य-बुद्धि पूर्ण रीतिसे जागृत नहीं हुई है, कि "जैसा मैं हूँ, वैसाही दूसराभी है;" उसे दूसरोंके सुखदुःखोंकी तीव्रताका स्पष्ट ज्ञान कभी नहीं हो सकता, इसलिये वह इन सुखदुःखोंकी सच्ची योग्यता कभी जानही नहीं सकेगा, और फिर तारतम्य-निर्णय करनेके लिये उसने सुखदुःखोंकी जो कीमत पहले ठहरा ली होगी, उसमें भूल हो जायगी; और अंतमें उनका किया सब हिसाबभी गलत हो जायगा। इसीलिये कहना पड़ता है, कि "अधिकांश लोगोंके अधिक सुखको देखना" इस वाक्यकी 'देखना' इस हिसाबी बाह्य क्रियाको अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिये; किंतु जिस आत्मौपम्य और निर्लोभ बुद्धिसे (अनेक) दूसरोंके सुखदुःखोंकी यथार्थ कीमत पहले ठहराई जाती है, वह सब प्राणियोंके विषयमें साम्यावस्थाको पहुँची हुई, शुद्ध-बुद्धिही नीतिमत्ताकी सच्ची जड़ है। स्मरण रहे, कि नीतिमत्ता निर्मम, शुद्ध, प्रेमी, सम या ( संक्षेपमें कहें तो )
उपसंहार ४८३ सत्त्वशील अंतःकरणका धर्म है; वह केवल सार-असार-विचारका फल नहीं है। यह सिद्धान्त इस कथासे औरभी स्पष्ट हो जायगा। भारतीय युद्धके बाद युद्धिष्ठिरके राज्यासीन होनेपर जब कुंती अपने पुत्रोंके पराक्रममे कृतार्थ हो चुकी, और धृत- राष्ट्रके साथ वानप्रस्थाश्रमका आचरण करनेके लिये बनको जाने लगी, तब “तू अधिकांश लोगोंका कल्याण किया कर।” इत्यादि व्यर्थ बातें न कर उसने युधिष्ठिरसे सिर्फ़ यही कहा है, कि “मनस्ते महदस्तु च” (महा. अश्व. १७. २१)—“तू अपने मनको हमेशा विशाल बनाये रख।” जिन पश्चिमी पंडितोंने यह प्रतिपादन किया है, कि केवल “अधिकांश लोगोंका अधिक सुख किसमें है” यह देखनाही नीति- मत्ताकी सच्ची शास्त्रीय और सीधी कसौटी है। वे कदाचित् पहलेहीसे यह मान लेते हैं, कि उनके समानही अन्य सब लोग शुद्ध मनके हैं, और ऐसा समझकर वे अन्य सब लोगोंको यह बतलाते हैं, कि नीतिका निर्णय किस रीतिसे किया जावे। परंतु ये पंडित जिस बातको पहलेहीसे मान लेते हैं, वह सच नहीं हो सकती, इसलिये नीति- निर्णयका उनका नियम अपूर्ण और एकपक्षीय सिद्ध होता है। इतनाही नहीं; बल्कि उनके लेखोसे यह भ्रमकारक विचारभी उत्पन्न हो जाता है, कि मन, स्वभाव या शीलको यथार्थमें अधिकाधिक शुद्ध और पापभीरु बनानेका प्रयत्न करनेके बदले, यदि कोई नीतिमान् बननेके लिये अपने कर्मोंके बाह्य परिणामोंका हिसाब करना सीख ले, तो बस होगा; और फिर जिनकी स्वार्थ-बुद्धि नहीं छूटी हो, वे लोग धूर्त, मिथ्याचारी या ढोंगी (गीता ३. ६) बनकर सारे समाजकी हानिका कारण हो जाते हैं। इसलिये केवल नीतिमत्ताकी कसौटीकी दृष्टिसे देखें, तोभी कर्मोंके केवल बाह्य परिणामोंपर विचार करनेवाला मार्ग कृपण तथा अपूर्ण प्रतीत होता है। अतः हमारे निश्चयके अनुसार गीताका यही सिद्धान्त पश्चिमी आधिदैविक अथवा आधिभौतिक पक्षोंके मतोंकी अपेक्षा अधिक मार्मिक, व्यापक, युक्तिसंगत और निर्दोष है, कि बाह्य कर्मोंसे व्यक्त होनेवाली और संकटके समयमेंभी दृढ़ रहनेवाली साम्य-बुद्धिकाही सहारा इस काममें अर्थात् कर्मयोगमें लेना चाहिये; तथा, ज्ञानयुक्त निस्सीम शुद्ध-बुद्धि या शीलही सदाचरणकी सच्ची कसौटी है। नीतिशास्त्रसंबंधी आधिभौतिक और आधिदैविक ग्रंथोंको छोड़कर नीतिका विचार आध्यात्मिक-दृष्टिसे करनेवाले पश्चिमी पंडितोंके ग्रंथोंको यदि देखें, तो मालूम होगा, कि उनमेंभी नीतिमत्ताका निर्णय करनेके विषयमें गीताकेही सदृश कर्मकी अपेक्षा शुद्ध-बुद्धिकोही विशेष प्रधानता दी गई है। उदाहरणार्थ, प्रसिद्ध जर्मन तत्त्ववेत्ता कांटेके “नीतिके आध्यात्मिक मूल तत्त्व” तथा नीतिशास्त्रसंबंधी दूसरे ग्रंथोंको लीजिये। यद्यपि कांटने* सर्वभूतात्मैक्यका सिद्धान्त अपने ग्रंथोंमें
- Kant's Theory of Ethics, trans. by Abbott. 6th Ed. इस पुस्तक- में ये सब सिद्धान्त दिये गये हैं। पहला सिद्धान्त १०, १२. १६ और २४ वें पृष्ठमें; दूसरा ११२ और ११७ वें पृष्ठमें; तीसरा ३१, ५८, १२१ और २९० वें पृष्ठमें;
४८४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
नहीं दिया है, तथापि व्यवसायात्मक और वासनात्मक बुद्धिका ही मुख्य विचार करके उसने यह निश्चित किया है, कि ( १ ) किसी कर्मकी नैतिक योग्यता इस बाह्य फलपरसे नही ठहराई जानी चाहिये, कि उस कर्मद्वारा कितने मनुष्योंको सुख होगा, बल्कि उसको योग्यताका निर्णय यही देखकर करना चाहिये, कि कर्म करने- वाले मनुष्यको 'वासना' कहां तक शुद्ध है। ( २ ) मनुष्यकी इस वासनाको ( अर्थात् वासनात्मक बुद्धि ) तभी शुद्ध, पवित्र और स्वतंत्र समझना चाहिये, जब कि वह इंद्रियसुखोंमें लिप्त न रहकर सदैव शुद्ध ( व्यवसायात्मक ) बुद्धिकी आज्ञाके ( इस बुद्धि-द्वारा निश्चित कर्तव्य-अकर्तव्यके नियमोंके ) अनुसार चलने लगे। ( ३ ) इस प्रकार इंद्रियनिग्रह हो जाने पर जिसकी वासना शुद्ध हो गई हो, उस पुरुषके लिये किसी नीति-नियमादिके बंधनकी आवश्यकता नहीं रह जानी. ये नियम तो सामान्य मनुष्योंकेही लिये हैं। ( ४ ) इस प्रकारसे वासनाके शुद्ध हो जानेपर जो कुछ कर्म करनेको वह शुद्ध-वासना या बुद्धि कहा करती है, वह इसी विचारसे कहा जाता है कि " हमारे समानही यदि दूसरेभी करने लगें, तो परिणाम क्या होगा "; और ( ५ ) वासनाकी इस स्वतंत्रता और शुद्धताकी उपपत्तिका पता कर्म-सृष्टिको छोड़कर ब्रह्म-सृष्टिमें प्रवेश किये बिना नहीं चल सकता ! परंतु आत्मा और ब्रह्म- सृष्टिसंबंधी कांटके विचार कुछ अपूर्ण हैं, और ग्रीन यद्यपि कांटकाही अनुयायी है, तथापि उसने अपने 'नीतिशास्त्रके उपोद्घातमें' पहले यह सिद्ध किया है, कि बाह्य-सृष्टिका अर्थात् ब्रह्मांडका जो अगम्य तत्त्व है, वही आत्मस्वरूपसे पिंडमें अर्थात् मनुष्यदेहमें अंशतः प्रादुर्भूत हुआ है। इसके अनंतर उसने यह प्रतिपादन किया है,* कि मनुष्य-शरीरमें एक नित्य और स्वतंत्र तत्त्व है, अर्थात् आत्मा जिसमें यह उत्कट इच्छा होती है, कि सर्व भूतान्तर्गत अपने सामाजिक पूर्णस्वरूपको अवश्य पहुंच जाना चाहिये; और यही इच्छा मनुष्यको सदाचारकी ओर प्रवृत्त किया करती है। इसीमें मनुष्यका नित्य और चिरकालिक कल्याण है; तथा विषयसुख अनित्य है। सारांश यही दीख पड़ता है, यद्यपि कांट और ग्रीन, दोनोंकी दृष्टि आध्यात्मिक है, तथापि ग्रीन व्यवसायात्मका बुद्धिके व्यापारोंमेंही लिपटे नहीं रहा; किंतु उसने कर्म-अकर्म-विवेचनकी तथा वासना-स्वातंत्र्यकी उपपत्तिको पिंड और ब्रह्मांड दोनोंमें एकत्वसे व्यक्त होनेवाले शुद्ध आत्मस्वरूपतक पहुंचा दिया है। कांट और ग्रीन जैसे आध्यात्मिक पाश्चात्त्य नीतिशास्त्रज्ञोंके उक्त सिद्धांतोंकी और नीचे लिखे गये गीता-प्रतिपादित कुछ सिद्धांतोंकी तुलना करनेसे दीख पड़ेगा, कि यद्यपि वे दोनों अक्षरशः एक बराबर नहीं हैं, तथापि उनमें कुछ अद्भुत समता चौथा १८, ३८, ५५ और ११९ वें पृष्ठमें और पांचवां ७०-७३ तथा ८० वें पृष्ठमें पाठकोंको मिलेगा।
- Green's Prolegomena to Ethics. §§ 99. 174-179 and 223-2.23.
उपसंहार ४८५ अवश्य है। देखिये, गीताके सिद्धान्त ये हैं- (१) बाह्य कर्मकी अपेक्षा कर्ताकी (वासनात्मक) बुद्धिही श्रेष्ठ है। (२) व्यवसायात्मक बुद्धि आत्मनिष्ठ होकर जब संदेहरहित तथा सम हो जाती है, तब फिर वासनात्मक बुद्धि आपही आप शुद्ध और पवित्र हो जाती है। (३) इस रीतिसे जिसकी बुद्धि सम और स्थिर हो जाती है, वह स्थितप्रज्ञ पुरुष हमेशा विधि और नियमोंसे परे रहा करता है। (४) और उसके आचरण या उसकी आत्मैक्य-बुद्धिसे सिद्ध होनेवाले नीति-नियम सामान्य पुरुषोंके लिये आदर्शके समान पूजनीय तथा प्रमाणभूत हो जाते हैं; और (५) पिंड अर्थात् देहमें तथा ब्रह्मांड अर्थात् सृष्टिमें एकही आत्मस्वरूपी तत्त्व है, देहान्त- गत आत्मा अपने शुद्ध और पूर्णस्वरूपको (मोक्ष) प्राप्त कर लेनेके लिये सदा उत्सुक रहता है, तथा इस शुद्ध-स्वरूपका ज्ञान हो जानेपर सब प्राणियोंके विषयमें आत्मौपम्य-दृष्टि प्राप्त हो जाती है। परंतु यह बात ध्यान देने योग्य है, कि ब्रह्म, आत्मा, माया, आत्मस्वातंत्र्य, ब्रह्मात्मैक्य, कर्मविपाक इत्यादि विषयोंपर हमारे वेदान्तशास्त्रके जो सिद्धान्त हैं, वे कांट और ग्रीनके सिद्धान्तोंसेभी बहुत आगे बढ़े हुए तथा अधिक निश्चित हैं; इसलिये उपनिषदन्तर्गत वेदान्तके आधारपर किया हुआ गीताका कर्मयोग-विवेचन आध्यात्मिक दृष्टिसे असंदिग्ध, पूर्ण तथा दोषरहित हुआ है; और आजकलके वेदान्ती जर्मन पंडित प्रोफेसर डायसनने नीति-विवेचनकी इसी पद्धतिको अपने 'अध्यात्मशास्त्रके मूल तत्त्व' नामक ग्रंथमें स्वीकार किया है। डायसन शोपेनहरका अनुयायी है; उसे शोपेनहरका यह सिद्धान्त पूर्णतया मान्य है, कि "संसारका मूल कारण वासनाही है, इसलिये उसका क्षय किये बिना दुःखकी निवृत्तिका होना असंभव है; अतएव वासनाका क्षय करनाही प्रत्येक मनुष्यका कर्तव्य है"; और इसी आध्यात्मिक सिद्धान्त-द्वारा आगे नीतिकी उपपत्तिका विवेचन उसने अपने उक्त ग्रंथके तीसरे भागमें स्पष्ट रीतिसे किया है। उसने पहले यह सिद्ध कर दिखलाया है, कि वासनाका क्षय होनेके लिये, या हो जानेपरभी, कर्मोंको छोड़ देनेकी आवश्यकता नहीं है; बल्कि "वासनाका पूरा क्षय हुआ है, कि नहीं" यह बात परोपकारार्थ किये गये निष्काम कर्मसे जैसे प्रकट होती है, वैसे अन्य किसीभी प्रकारसे व्यक्त नहीं होती, अतएव निष्काम कर्म वासना-क्षयकाही लक्षण और फल है। इसके बाद उसने यह प्रतिपादन किया है, कि वासनाकी निष्कामताही सदाचरण और नीतिमत्ताकाभी मूल है; और इसके अंतमें गीताका "तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर" (गीता ३. १९) यह श्लोक दिया है।* इससे मालूम होता है, कि डायसनको इस उपपत्तिका भान गीतासेही हुआ होगा। जो हो; यह बात कुछ कम गौरवकी नहीं, कि डायसन, ग्रीन, शोपेनहर और कांटके पूर्व - अधिक क्या कहें, आरिस्टॉटलकेभी सैकड़ों वर्ष पूर्वही ये विचार हमारे देशमें प्रचलित हो चुके थे। आजकल बहुतेरे लोगोंकी यह समझ हो रही है, कि वेदान्त केवल एक ऐसा बखेड़ा है, जो हमें इस संसारको छोड़ देने और मोक्षकी प्राप्ति करनेका उपदेश देता है, परंतु
'४८६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यह समझ ठीक नहीं। संसारमें जो कुछ आँखोंसे दीख रहा है, उसके परे जाकर इन गहन प्रश्नोंका यथाशक्ति शास्त्रीय रीतिसे विचार करनेके लियेही वेदान्तशास्त्र प्रवृत्त हुआ है, कि "मै कौन हूँ ? इस सृष्टिकी जड़में कौनसा तत्त्व है? इस तत्त्वसे मेरा क्या संबंध है ? इस संबंधपर ध्यान दे कर इस संसारमें मेरा परम साध्य या अंतिम ध्येय क्या है ? इस साध्य या ध्येयको प्राप्त करनेके लिये मुझे जीवनयात्राके किस मार्गको स्वीकार करना चाहिये, अथवा किस मार्गसे कौनसा ध्येय सिद्ध होगा?" बल्कि निष्पक्ष-दृष्टिसे देखा जाय तो यह मालूम होगा, कि समस्त नीतिशास्त्र अर्थात् मनुष्योंके पारस्परिक व्यवहारका विचार उस गहन शास्त्रकाही एक अंग है। सारांश यह है, कि कर्मयोगकी उपपत्ति वेदान्तशास्त्रहीके आधारपर की जा सकती है, और अब संन्यास-मार्गीय लोग चाहे कुछभी कहें, परंतु इसमें संदेह नहीं, कि गणितशास्त्रके जैसे - शुद्ध गणित और व्यावहारिक गणित ये दो भेद हैं, उसी प्रकार वेदान्तशास्त्र- केभी दो भेद शुद्ध वेदान्त और नैतिक अथवा व्यावहारिक वेदान्त होते हैं। कांट तो यहाँ तक कहता है, कि मनुष्यके मनमें 'परमेश्वर' ( परमात्मा ), 'अमृतत्व' और ( इच्छा ) 'स्वातंत्य'के संबंधके गूढ़ विचार इन नीति-प्रश्नका विचार करते करतेही उत्पन्न हुए हैं, कि "मैं संसारमें किस तरह बर्ताव करूँ ? या इस संसारमें मेरा सच्चा कर्तव्य क्या है ? " और ऐसे प्रश्नोंके उत्तर न देकर नीतिकी उपपत्ति केवल किसी बाह्य-सुखकी दृष्टिसेही बतलाना मानो मनुष्यके मनकी उस पशुवृत्तिको - जो स्वभावतः विषयसुखमें लिप्त रहा करती है - उत्तेजित करना एवं सच्ची नीतिमत्ताकी जड़परही कुल्हाड़ी चलाना है।* अब इस बातको अलग करके समझानेकी कोई आवश्यकता नहीं, कि यद्यपि गीताका प्रतिपाद्य विषय कर्मयोगही है, तोभी उसमें शुद्ध वेदान्त क्यों और कैसे आ गया। कांटने इस विषयपर "शुद्ध ( व्यवसा- यात्मक बुद्धिकी मीमांसा " और "व्यावहारिक ( वासनात्मक ) बुद्धिकी मीमांसा " नामक दो अलग अलग ग्रंथ लिखे हैं। परंतु हमारे औपनिषदिक तत्त्वज्ञानके अनुसार भगवद्गीतामें इन दोनों विषयोंका समावेश किया गया है; बल्कि श्रद्धा-मूलक भक्ति-मार्गकाभी विवेचन उसीमें होनेके कारण गीता सबसे अधिक ग्राह्य और प्रमाणभूत हो गई है।
- "Empiricism on the contrary, cuts up at the roots the mora- lity of intentions (in which, and not in actions only, consists the high worth that men can and ought to give themselves) ... ... Empiricism, moreover, being on this account allied with all the inclinations which (no matter what fashion they put on) degrade humanity when they are raised to the dignity of a supreme practical principle,...is for that reason much more dangerous." Kant's Theory of Ethics, pp. 163 and 236-238. See also Kant's Critique of Pure Reason, (trans. by Max Muller) 2nd Ed. pp. 640-657.