सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
संस्थाननिर्देशानुक्रमकोशः — ३७
| दूरेऽपि श्रुत्वा भव १३५।१० | दृष्ट्या केशव (सूक्ति २ ९३) २४।१५९ | देवेऽर्पितवरणस्रजि बहु १६।३ |
| दूरे मार्गा (नीतिप्रदीप १०) २४१।१५२ | दृष्ट्वाडम्बरमम्बरे ३४२।७१ | देवे वर्षत्यक्ष (सूक्ति ६१ २२) ३४१।५९ |
| दूरोक्षिप्तक्षिप्त (शिशु १८ ४५) १३०।८१ | दृष्ट्वा दर्पणमण्डले नि ३५९।९४ | देवैर्यद्यपि तक्रव २१६।३३ |
| दूर्वाङ्कुरतृणाहारा (शा प ९३७) ८०।२२ | दृष्ट्वापि दृश्यते दृश्य (सु २२८) ४६।७८ | देवो राजा ३८७।४२१ |
| दूर्वाया भूषणं पत्र (चा २४) ३८०।४१८ | दृष्ट्वा मण्डलम् १०८।२१० | देवो हरिव्र्हतु व (शा प ७४०) २०९।८ |
| दृकपात कमलासने (शा प ७५) १५।२५ | दृष्ट्वा वेद्यं परमथ ३६९।७१ | देव्या प्राक्परिरम्भणे ६।६७ |
| दृगन्तव्यापारप्रबल २८०।८४ | दृष्ट्वा शाखावकीर्णं २२८।२०२ | देश सोऽयमराति (वेणी ३ ३३) ३६६।७ |
| दृग्भङ्गभङ्ग्रिम (शा प ३७७७) ३५२।२८ | दृष्ट्वा स्फीतोऽभवद (अमरुश ६) २२३।९२ | देशकालविहीनानि (र ६ ६३) ३८०।३९७ |
| दृग्भ्या यस्य विलोक १८।२१ | दृष्ट्वाकासनसस्थिते (अमरु १९) ३११।१६ | देशाटन पण्डि १७३।८६४ |
| दृढ प्रेमा भग्न १७७।९८७ | दृष्ट्वैव विकृतं (शा.प ४१४५) ३७१।१२० | देशानामुपरि (पञ्च १ १६६) १४९।२८५ |
| दृढतरगलकनि (शा प ११९७) २४८।७० | दृष्ट्वैवाङ्कुशमुद्रया १११।२६४ | देशानुत्सृज्य ग १६७।६३९ |
| दृढतरनिबद्धमुष्टे को (कुव ५७) ७२।३५ | देय भो ह्यघने (वृ चा ११ १८) ६९।२८ | देशे देशे कलत्राणि ३६१।६ |
| दृप्यद्दैत्यनितम्बिनी (शा प १२५)१८।३३ | देयमार्तस्य शय(भा ३ १०१)३८६।३७४ | देशे देशे किमपि कुतुका ९८।४ |
| दृश पृथुतरीकृ (सूक्ति ५० ८) २५३।२८ | देव पायात्पयसि २३।१३३ | देशे देशे जडिमकु ३३५।५ |
| दृशा किंचि (शा प ३७६४) ३५२।३३ | देव पायादपा(सा द १० ९८) २२।१०० | देशे देशे दुराशा ३७५।२३० |
| दृशा दग्धं मनसिज (विद्ध.१ २) २५०।१ | देव क्षीरसमुद्रसान्द्र १३७।६३ | देशैरन्तरिता शते (अमरु ९९) २०८।३३ |
| दृशा विदधिरे दश ३४२।७६ | देव त्व जय (शा प १२२३) १०८।१९३ | देह हेमद्युति परि २६६।३२२ |
| दृशा सपदि मीलि(सू २०९७) ३१९।३६ | देव त्व मल (सूक्ति ९७ ३३) १०७।१७७ | देहावान्निद्रकान्ता ८।११४ |
| दृशो सीमावाद (सूक्ति ५२ १)२५५।२४ | देव त्वत्करनीरदे १०७।१७४ | देहि देहीति ज (शा प २६९) ३८३।२६१ |
| दृशौ किमस्या (नैषध ७ ३४) २५९।८७ | देव त्वत्करपद्म कोश १२५।१४ | देहि मटकन्दुकं राधे (कुव ६९) २२।१०४ |
| दृशौ तव मदा (गीत १०.७) ३१३।६६ | देव त्वच्चरणप्रतापत १३३।१४ | देहीति वक्तुकाम (शा प ३९२) ७२।१३ |
| दृश्य दशा सह (शा प ३२७३) २५४।५ | देव त्वत्तुरणप्रतापाशि ११५।४९ | देहीति वचनं श्रु(भर्तृ स ५३५)३८२।२६१ |
| दृश्यते पानगोष्ठीषु (सूक्ति ७३.७)३१४।१ | देव त्वद्धजवाजिप १२५।१५ | देहे दुर्ललितस्य देव ३५३।५५ |
| दृश्यन्ते भुवि भूरिनि ५३।२६० | देव त्वहानपाथो १०२।४४ | देहे पातिनि का (भोज ५३) ३५१।३५८ |
| दृश्यन्ते मानसोत्तं २६९।४०७ | देव त्वद्भुजद (सु २६४०) १३४।१६ | दैल्यानामधिपे न (शा प ८४) १९।५४ |
| दृष्टं दुर्जनचेष्टितं (सु ३१९३) ६८।८१ | देव त्वद्भुजदण्ड १३४।२५ | दैत्याना मनसि दया १८१।२६ |
| दृष्ट कातरनेत्रया (अमरु ८५) ३२९।१६ | देव त्वद्यशसा सदा १३६।४४ | दैत्यारातिरसो वरा २०३।१०८ |
| दृष्टः कापि स के (सु १००) २५।१८७ | देव त्वद्यशसि (शा प १२२६) १३६।३९ | दैत्यास्थिपञ्जरविदारण (सु ५२) १९।४६ |
| दृष्टः सप्रेम देव्या कि(वेणी १.३)८।१०८ | देव त्वद्विजयप्र (शा प.१२४५) १२५।१० | दैन्यं क्वचित्कच(शा प ४१०७)३६८।३३ |
| दृष्टः साक्षादसुरवि १०७।१७८ | देव त्वद्विजयोद्यमे १२५।१२ | दैवं पुरुष (मत्स्य अ २२१) ८२।१० |
| दृष्टदुर्जनदौरात्म्य (सु.२९८) ४६।६२ | देव त्वमेव पा(का प्र ९.१२०) १०३।६० | दैवं फलति सर्वत्र ९१।१० |
| दृष्टस्य यस्य हरिणा रण (सु ४९) १६।४६ | देव त्वामसमानदान १०७।१८५ | दैवं फलति सर्वत्र ९१।११ |
| दृष्ट्वा सकष्टदाहाः ९।१३३ | देव ब्रह्माण्डभाण्डे १४८।८४ | दैवमुल्लङ्घ्य यत्कार्य ९०।१ |
| दृष्ट्वा दृष्टिम् (नागानन्द ३ ३५) ३१८।१४ | देवराजो मया दृष्टो १८८।३१ | दैववशादुपलब्धे (पञ्च १ ३) ७१।३१ |
| दृष्टान्तो न तवा १०९।२१९ | देव श्रीनृप रामचन्द्र १२०।१४८ | दैवात्पश्येर्जगति (मालती.९ २६) २९१।१ |
| दृष्टिं देहि पुनर्बलि (शृङ्गारति.१) ३१२।६ | देवस्याम्बु (सूक्ति १०५ २) ३८३।३६३ | दैवादभ्युत्थमाना (हनु १३ १४) ६२।२८१ |
| दृष्टिं सालसता बिभ २५४।४७ | देवस्त्रैगुण्यभेदात्सू १०१।५९ | दैवादहमत्र (रुद्रट ७ २९) २७८।२१ |
| दृष्टिं हे प्रति (शा प ३७६९) ३५३।४३ | देवा दिक्पतय (शा प १०८) १०१।५० | दैवायद्यपि २०९।२ |
| दृष्टि. कापि सुरा २७२।७२ | देवाधिपो वा भुज १०४।१०५ | दैवीर्गीर केऽपि (सु १९४) ३८।३३ |
| दृष्टि शैशवमण्ड (सूक्ति.५१.६)२५६।५२ | देवानामिदमाम (सूक्ति १०९ ७२) ३२।२ | दैवेन प्रभुणा (भर्तृ. २ ९०) १५१।२३ |
| दृष्टिस्तृणीकृत (सूक्ति १०३ ६)३६०।२७ | देवी वाचमुपामते हि (कुव ५२) ३६।४० | दैवे पराग्वदन (भामिनी.क १) ३६२।२७ |
| दृष्टे चन्द्रमसि प्रल्लु(सु १३८७) २८९।६८ | देवी श्रीर्जे ३८३।२६४ | दैवे विमुखता याते ९१।७ |
| दृष्टे लोचनव (अमरु १६०) ३११।२१ | देवे तीर्थे द्विजे (धर्मवि १८) १६८।६६८ | दैवे समर्थ्य (शान्तिश ३ २०) ९२।७६ |
| दृष्टो वा सुकृतशतो ६०।२३१ | देवे दिग्विजयोद्यते १२५।११ | दो सदेहवशंवद ९४।१२१ |
३८ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| पद्य / पाद | पृष्ठ/संख्या | पद्य / पाद | पृष्ठ/संख्या | पद्य / पाद | पृष्ठ/संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| दोग्ध्री धान्यं(मा १२ २७३३) | ३८८।४३९ | द्वन्द्वो द्विगुरपि | १८९।५१ | धत्ते बर्हभरे | ३१४।७२ |
| दोर्दण्डद्वयकुण्ड (रसगङ्गाधर) | १०८।२०८ | द्वयमिदमलन्तस (सु १८१३) | ३४४।१२ | धत्ते भरं (भामिनी अ ८९) | २३६।१४ |
| दोर्दण्डद्वयलीलया | १०।१५१ | द्वात्रिंशद्द (शा प ११९९) | २४८।८० | धत्ते वक्षसि | ३६५।५१ |
| दोर्दण्डाञ्चित (सूक्ति ५५ ३) | ३६३।२३ | द्वारं खद्भि (सूक्ति १७ ७८) | १०८।२०२ | धत्ते वियोगि | १९९।२९ |
| दोर्योस्तदन्तखण्ड सक | २।२८ | द्वार गृहस्य (सु १८४३) | ३४७।१२ | धत्से मूर्धनि | २३७।२९ |
| दोर्भ्यां (काव्यप्र १० ११) | १०६।१४८ | द्वार द्वार रट | ७१।१० | धनं तावदसुलभं (हि १ १८९) | ६४।७ |
| दोर्भ्यां सय (शा प ३६८६) | ३१।९४० | द्वारि चक्षुर (किरात. ९.४३) | ३५७।४१ | धनं तावलब्ध कथ (प्रव ७७) | ३६८।४४ |
| दोलाया जघ (सूक्ति ५१.१४) | २५६।४५ | द्वारि प्रविष्ट | १७३।८४८ | धनं यदि गतं (कविता ४३) | ६७।५२ |
| दोषजातमवधीर्य | ४९।१६१ | द्वारि स्तम्भ | ३५२।११ | धन यदिह मे | ७१।२३ |
| दोषपोषमभियाति | ५९।२१३ | द्वारे कल्पतरुगृहे | २०१७३ | धन (वृ.चा १५ २१) | १५९।२७५ |
| दोषभीतेर (हि १ ५७) | १६४।४७९ | द्वारे द्वारे परेवाम | ७४।४८ | धनक्षय शिष्टगर्हा(प्र भ १७) | ३८८।४२७ |
| दोषमपि गुणवति (सु २४४) | ८२।३८ | द्वारे रुद्धमुपे (सु ३२३८) | १५३।४२० | धननाशेद (भा १२ ६६१९) | ३८७।४२३ |
| दोषाकरोऽपि (भोज १३८) | ५०।१९५ | द्वारोपान्तनिर (काव्यप्र. ३ २) | ३०४।६ | धनधैर्यमराजैश्च | १०१।३ |
| दोषागमन | ३०३।१३९ | द्वाविमावम्भसि (भा ५ १०३०) | ६५।८ | धनबाहुल्यमहेतु (सु ५२२) | ७०।३० |
| दोषानपि गुणीकर्तुं (सु २१५) | ४६।७२ | द्वाविमौ न (भा.५ १०२७) | ३८३।२५३ | धनमपि परदत्तं (सु ३०७) | ६५।१८ |
| दोषालोकन | ५७।१५१ | द्वाविमौ पुरुषौ (सु २९७३) | १५५।१०८ | धनमर्जय काकुत्स्थ (प्र म.४) | ६४।३ |
| दोषो गुणानां | ४८।१३८ | द्वाविमौ (भा ५ १०२८) | १५५।१०५ | धनमस्तीति (शा प १४४६) | १५३।२१ |
| दोषोऽपि | १५८।२४५ | द्वाविमौ पुरुषौ(शा प १५४९) | १५५।१०९ | धनवानिति हि (हि १ १६८) | ३७४।२०८ |
| दौर्गल्येन समीरिना | ७४।३९ | द्वाविमौ पुरुषौ(शा प १५४७) | १५५।१०४ | धनवान्क्रोध | ३७९।९४ |
| दौर्जन्य (शा प १०३१) | २४१।२४३ | द्वाविमौ पुरुषौ(शा प १९३३) | १५५।१०६ | धनवान्बलवाँलोके (हि १ १२३) | ६५।१ |
| दौर्मनष्या (भर्तृ स २३) | १७८।१०१० | द्वाविमौ पुरुषौ(शा प १५५०) | १५५।१०७ | धनहीनो न ही(वृ चा १० १) | ३८७।४२१ |
| द्या निरुन्ध (किरात. ९ २०) | ३००।३७ | द्वावेव क (र गो २ ६१ १७) | ३८८।४३६ | धनहेतोर्य ईहे(भा १२ ७८५) | ३८६।३५१ |
| द्वामारोहति (सूक्ति २७ १५) | २१६।३० | द्वि शर नाभि (हनु १ ४९) | १६५।५५३ | धनागमेऽधिकं | १६८।६८१ |
| द्युति वहन्तो (किरात ८ ३९) | ३३८।८२ | द्विजकुलपते | २२७।१९६ | धनानि जीवित चै (हि १ ४४) | २८६।३४६ |
| द्यूतं पुस्तक | १५७।२०५ | द्विजराजशेखरो | ३६४।३६ | धनानि भूमौ पश (भर्तृ ३ ३५) | ९२।५५ |
| द्यूतं यो यम (पच. १ ५७) | १४८।२६६ | द्विजा (शा प १३८४) | १४४।१०० | धनानि विद्वत्क | ११७।७३ |
| द्रवतवात्सर्वं (हि.१ ९३) | १६३।४५१ | द्विजातिपूजा (भा.५ १२५४) | ३८७।४२० | धनाशाया खली (वृ श ६१) | ६४।११ |
| द्रविणार्जनज परि (सु ५२४) | ७०।३१ | द्वित्रै केलि | ३५७।३५ | धनाशा कैतव | ३५५।४ |
| द्रव्यप्रकृति (काम नी. ५ २) | १४८।२५७ | द्वित्रैव्योम्नि | ३२५।५४ | धनाशा जीवि (हि १ ११२) | १६६।५८४ |
| द्रष्टव्येषु किमुत्तम (भर्तृ १ ७) | २५२।५५ | द्विधा (सूक्ति १०९ ८) | २६१।१५५ | धनिक (गरुड.पू.अ ११०) | १५३।३४ |
| द्राक्षा प्रवेहि | २२७।१८६ | द्विरददन्तवलक्ष (शिशु ६ ३४) | २४१।४० | वनिनोऽपि नि (सा द १०.६६) | ४६।५३ |
| द्राक्षा म्लानमुखी | २९।१० | द्विर्भव पुष्प (रसगङ्गाधर) | ११६।५८ | वनिनोऽप्यदानभोगा (भोज.१६) | ७२।४३ |
| द्रागाक्रम्योद | १३४।२७ | द्विषतामुदय. (किरात २ ८) | १५१।३८६ | धनु पौष्प मौवीं (भोज १७१) | ५२।२५२ |
| द्रागैन्द्रीमनु | २९५।६६ | द्विषा त्रास (कुमार १६ ४२) | ९१।३९ | धनेन कि यो (हि २ ९) | १७४।८९८ |
| द्राघीयसा धाष्ट्य (सूक्ति ५ १) | ३७।१६ | द्वीपादन्यस्मादपि (रत्ना १ ७) | ९१।३९ | धनेन वाससा प्रे (द श ४४) | ३८७।४०४ |
| द्राघीयास (शिशु १८.३३) | १२९।७२ | द्वेषादिवैक्क | ३८३।१६९ | वनेनाधर्मल (भा ५ १२५१) | ३९४।७०० |
| द्रुत यस्या | २५२।४५ | द्वेषिद्वेष (पच १.६०) | १४८।२६५ | धनेतु जीवित (शा प ४२५) | १६८।६५७ |
| द्रुततरकरदक्षा. (शिशु ११ ८) | ३२३।२४ | द्वेष्या (नैषध १२ १२) | ११०।२३४ | धनैर्निष्कुलीना (नीतिसार ३) | ६४।१२ |
| द्रुततरमितो (सु ६४९) | २३३।१०९ | ध | धनैर्वियुक्तस्य (मृच्छ ५ ४०) | ६६।४४ | |
| द्रुतद्रवद्रथचरण | १२७।९ | धत्तरकण्टक | २४३।१११ | धन्यस्तन्वि स | २९२।३२ |
| द्रुतशातकुम्भ (शिशु ९ ९) | २९४।३७ | धत्तूर धूर्तं | २४३।११० | धन्यस्त्वमसि | २८३।१५६ |
| द्रुतसमीरचले (शिशु ६ २८) | ३४१।३४ | धत्ते चक्षुर्मुफु (मालती.३.१२) | २७४।५ | धन्या शरदि | ३४४।७ |
| द्रुमा पाण्डुप्रथा | ३२४।४० | धत्ते नायक | १२०।१४१ | धन्या शुचीति (सु १८१) | २९।१९ |
| द्रोग्धव्यं न च(भा.३ ११४७) | ३९४।६९२ | धत्ते पद्मल्ल | ३३७।४४ | धन्या (शा प. १०४७) | २४२।१७२ |
| सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः | ३९ | |
|---|---|---|
| धन्या केयं स्थिता (मुद्रा १ १) ८।१०५ | धान्याना (हि ३ ५५) १४८।२३५ | धैर्यमाधाय लज्जा ३०४।२ |
| धन्याना गिरि (भर्तृ ३ १५) ३७४।२२० | धारयित्वा त्वया(भोज २३४) १०२।४६ | धैर्यमुलबण (शिशु १० ६८) ३१८।११ |
| धन्या सा गृह २८०।९४ | धाराधरस्त्वद (भोज २२५) १२५।७ | धैर्यलावण्य १०३।५४ |
| धन्यासि या (काव्यप्र ४ १७) ३२८।१० | धारावीश (भोज २०२) ११७।८९ | ध्माता भालत २११।४३ |
| धन्यास्ता (शा प ३७४८) ३२८।२० | धाराधौतं (शा प ३८८१) ३४२।७९ | ध्माता भालत २९५।६७ |
| धन्यास्ते कवयो ३४।५८ | धारेश त्वत्प्रतापेन(भोज १७३) ११०।८० | ध्यानव्याज (शा.प १३१) २६।२०५ |
| धन्यास्ते ये (गरुड पू अ ११५) ६६।२९ | धार्मिक (काम नी १ ११) १४२।३ | ध्यानशस्त्र १६०।३३० |
| धन्योऽय मणि २१७।५० | धार्ष्टर्यलङ्घित (किरात ० ७२) ३१६।६४ | ध्रियते याव (शिशु २ ३५) १५१।३६२ |
| धन्वन्तरिक्षपण ३७।३७ | धावन्त (शा प ६१००) ३६९।१८ | ध्रुवं ध्वसो (प्रब ८२) ३६२।३३ |
| धम्मिल्लं परि (शा प ३१७४) ३२८।५ | धावन्तमनु १२३।२ | ध्वजपट ३३२।५५ |
| धम्मिले नव (सा द ४ ९) १९४।१३ | धावित्वा सुस (शा प ४१५९) ३७५।२२२ | ध्वनिरिति २१८।७८ |
| धम्मिल्लो भंग (सूक्ति ७८ १५) ३२०।५१ | धिक् चेष्टितानि (शा.प ९९६) २३७।४८ | ध्वस्त काव्यो (शा.प ३९९९)३६३।४१ |
| धरणिधर ११५।५१ | धिक् तस्य मूर्ख (शा प ३३२३)२६२।१८६ | ध्वान्तोघे ३०२।१०२ |
| धराध्र तव १३२।२७ | धिक्त्वा रे (शा प १९४) १००।३२ | न |
| धर्म पालय ११२।२७० | धिग्गृहं (स्काद वै अ २०) १५६।१३५ | न कठोर न (काव्या. २ ३२४) २५०।३ |
| धर्मे प्रसङ्गादपि ३७५।२४० | धिग्जीवि (स्काद काशी अ १) १७३।८७१ | न कदाचित्सता (सु ३०५) ४७।८३ |
| धर्मे प्रत्न (गरुड पू अ ११५)२८०।४८८ | धिग्धिन्ता (शाति ४ १०) ३७१।१९२ | न करोति १९४।२४ |
| धर्म प्रागेव (नवरत्न ४) १५३।४२२ | धिग्स्वैतां ६५।१४ | न कर्मणा ल (भा १२.७३६)१९२।४६० |
| धर्म एव प्लवो (भा ३ ११८३)३९४।६९० | धिग्वारिंदं (शा प ८६५) २२६।१६१ | न कश्चि (शा प १३७६) १४६।१६० |
| धर्मशास्त्रार्थं (शा प १३४३) १४२।१६ | धीर वारि (अमरु १२) ३४३।९४ | न कश्चि (बृहस्पति नी ११४) १६१।३४६ |
| धर्महन्त्यर्जिते १६६।५८८ | धीरध्वनिमिर (भामिनी अ ५९) २९२।१८ | न कश्चिदपि (शा प. ६४७) १५४।४० |
| धर्मात्मा (र गो २ ११४ १८)३९४।६९४ | धीराणा १६७।६४९ | न कस्यचित्कश्चि (हि.२ ४६) १७२।८३५ |
| धर्माख्याने श्म (वृ चा १४.६)३९४।६८६ | धुनोति चांसि (काव्यप्र.१०.३०) ९३।९२ | न काकारि ३७४।२१२ |
| धर्मार्थं प्रभ (र ३ ९ ३०) ३९४।६७७ | धुनोतु ध्वान्तं २५७।२५ | न का निशि (नैषध १ ३०) २५३।९ |
| धर्मार्थौपजवनो (का.नी १ १४)३८७।३८७ | धुन्वन्त्यमूनि ३३३।८२ | न कामभोगा ३४९।५१ |
| धर्मारम्भेऽप्य ५७।१४१ | धुन्वानाश्चन्द ३२६।३३ | न कार्येषु न ३५०।११ |
| धर्मार्थ यस्य (भा ३ ९५) १६२।४६२ | धूम पयो (सु ४४३) ६०।२४४ | न काल (शा प १३२०) १६०।३३४ |
| धर्मार्थकामत (हि २ १७९) १६४।४९४ | धूमव्याकुल १२।३२ | न कालस्य न (शा प ३९८८) ३६०।११ |
| धर्मार्थकाम (ब्रह्म अ १२०) १५९।२५५ | धूमाङ्गाढमली (राजत ४ ११) ३९३।६४९ | न कालस्य (र ४ २७ ७) ३९३।६५३ |
| धर्मार्थकाममोक्षेषु ३०।११ | धूमायन्ते व्य (भा ५ १३१९)२९३।१६६२ | न किंचित्(काम नी.११ ४७) ३९२।६४६ |
| धर्मार्थकामहीनस्य (सु २१६७) ६६।२४ | धूमायिता (भामिनी अ ९९) २४८।८२ | न कुर्या २३२।७८ |
| धर्मार्थो यत्र न १६७।६११ | धूर्त स्त्री वा (हि ३ १३१) १४८।२४२ | न कुर्यादभि (शा.प १५२६) १५५।८० |
| धर्मे तत्परता (वृ चा १२ १५) ५३।२६२ | धूर्तधोरण १२५।१४ | न कुल वृत्त (भा ५ ११३४) ३९४।६७१ |
| धर्मो यशो नयो २९।७ | धूलिधूसरसर्वाङ्गो (शा.प ५७५) ८९।७ | न कुले वापि २४४।२१८ |
| धवलकुसुमभाख १२२।७ | धूलीधारामिरन्धास्त १३३।४७ | न केनापि श्रुतं ३६।३४ |
| धवलयति समग्र ५१।२१९ | धूलीधूसर (काव्याल ७.३२) २०८।३५ | न केवलं मनुष्येषु (शा प ४४४) ९०।३ |
| धवलान्यात (पच.१.४३) १४८।२५३ | धूलीभिर्दिवमन्ध (नैषध १२.९९)१२४।९ | न कोकिला (शा प ८९२) २२९।२२७ |
| धवलीकरोति २६३।२०९ | धृततुषार (शिशु ६ ६०) ३४६।२१ | नक्र. खस्थान (पञ्च.३ ४४) ८६।१ |
| धातस्तात (भर्तृ स ५४५) ६१।२६५ | धृतधनुषि (शा.प ३९६५) ३६०।१३ | न क्रीडासु ३७२।६२ |
| धातु परीक्षा १६०।३३२ | धृतबिस (किरात. १० २४) ३४०।२६ | न क्रोध ६।६८ |
| धातु (काव्यप्र. १० ३९) २८९।५४ | धृत्वा पदस्खलन (भामिनी क ५)३६२।२९ | न क्रोधयालु १६६।६०५ |
| धातुवादेषु १५५।१०३ | धृष्ट कि ३०७।६४ | न क्वचिच्च ८०।१६ |
| धातुश्चतुर्मुखीकण्ठ ३।१ | धैर्य यस्य (शान्तिश ४ ९) ३७०।१०३ | न क्वापि १८२।३२ |
| धान्याकनागर (शा प ४०३३) ३६४।४१ | धैर्य हि कार्यं (पच / २२५) ३८३।२६० | नक्षत्रक्षिति ३२२।१३ |
४० | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| पद्यांश / सन्दर्भ | पृष्ठ।सङ्ख्या | पद्यांश / सन्दर्भ | पृष्ठ।सङ्ख्या | पद्यांश / सन्दर्भ | पृष्ठ।सङ्ख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| नक्षत्रभू | १०४।९८ | न दानेन न (गरुड पू अ.१०९) | ३४९।३९ | न पश्यति च | १५९।२८२ |
| नक्षत्रभूषण चन्द्रो (चाणक्य ८) | १६१।३४२ | न दानं शु (वृ चा १७ १०) | ३९३।६५५ | न पाणि (सूक्ति ६६ १०) | ३४८।१६ |
| नक्षत्राणि बहूनि | २११।४२ | न दिष्टमप्य (म ६ ७८) | ३९३।६५७ | न पिता ना (र २ २७ ६) | ३८१।१८६१ |
| न क्षुधा पीड्यते (पच १.९९) | १४४।९२ | नदीकूले च ये (वृ चा २ १५) | १६२।४२० | नपुंसकमिति ज्ञात्वा (कुव ९०) | २७७।३ |
| नखक्षतमुर स्थले | ३२८।१५ | नदीजलक्लेशवनिारि (बालभारत) | १९०।६४ | न पुत्रत्वेन पूज्यन्ते (शा प १४८६) | ८१।४ |
| न खनति खुरै (शा प ९७०) | ८२।४४ | नदीतीरेषु ये वृ (वृ चा २ १५) | १७७।६४४ | न पुत्रात्परमो | १६०।३३८ |
| न गजाना (शा.प १३६३) | १४३।६३ | नदीना च कुला (चाणक्य २७) | १६५।५४० | न पुत्रात्त (शा प.१५२४) | १५४।७७ |
| न गर्जनै नरै (शा प १६१०) | १४३।५४ | नदीना (गरुड वृ अ १०८) | १५४।७९ | न प्रसाद (किरात.९ २५) | ३००।४२ |
| न गणस्याग्रतो (शा प १४६४) | १५३।३३ | न दुर्जन (वृ चा ११ ६) | ५९।२२४ | न प्रीति पवने | २८६।३१ |
| न गम्यो (भर्तृ स १२६) | २५०।१८ | न दुर्जनानामिह | ४९।१८० | न बरीभरीति | ३५७।४६ |
| न गुणा क्वापि | ४६।६९ | न दूतीसचारो न | २८०।८२ | न ब्रह्मविद्या न च (प्र.राघव १ २३) | ३१।२७ |
| न गृहं गृहमित्याहु (पच ३ १४६) | ३५०।६ | नदेभ्योऽपि (पूर्वचातका ७) | २११।११ | न ब्रूते परुषा गि (सा द ३ ९७) | ३५८।६८ |
| न गृह्णाति ग्रास (शा प ९२६) | २३२।७५ | न देवकन्यका (काव्या २ ३२५) | २५३।२ | न भयान्यभाष्य (मा १३ २२१९) | ३४९।४४ |
| न च गन्ध (शा प १०१०) | २३९।८९ | न देवसेवया याति | ९।१२८ | न भवति (भर्तृ सं ५५९) | ४७।१०७ |
| न च मेडव (शिशु ९ ५६) | २८७।२ | न देवाय (गरुड पू आ अ १०९) | ५५।५७ | न भवति मलयस्य | २०९।६५ |
| न च रात्रौ (मा ५ १४३७) | ३८१।१६३ | न देवे देवत्व (भर्तृ स ५५५) | ९९।१३ | नभसि जलद (अमरु १०३) | ३४३।१०३ |
| न च विद्यासमो (चाणक्य ७५) | १६२।४०६ | न देयो विद्यते | १६६।५९६ | नभसि निरव (भोज.२०८) | २१३।५१ |
| न च शत्रुर (मा १२ २१०८) | ३८१।१६६ | न देव न पित्र्य च | ४४।३ | नभसि विरलतारा | ३२४।३५ |
| न चाभिमानी | ३८०।११२ | न दवमिति सञ्चिन्त्य (शा प ४५४) | ८२।४ | न भिक्षा दुर्भिक्षे | ६७।५८ |
| न चाराधि राधा | ३७४।२११ | नद्यो नीचगता (शा.प ८१४) | २२२।३३ | न भिक्षा दुष्प्रा (भर्तृ ३ ९७) | ३८६।३५५ |
| न चिर मम तापाय (कुव ७५) | ३३०।३ | न द्वारि द्विरदावली | २३७।३६ | न भूतपूर्वो न च केन | ९२।५४ |
| न चोरहार्यं न च (प्र भ ८) | ३०।१३ | न द्विषन्ति न (शा प १४२३) | १५३।४ | नभोदिगन्तप्रतिघोष | १२८।४६ |
| न जल्प दशनत्विषा | २९४।१८ | न द्रव्याणामविज्ञाय | १६७।६२२ | नभोन्दीव्य (शिशु.१७ ६५) | १२७।१३ |
| न जातु (वायु ९३.९५) | १६६।६०९ | न धर्मशास्त्र पठतीति (हि १ १७) | ८४।१६ | नभोभूषा पूषा (प्र.म १५) | १७७।९९१ |
| न जाने समुख (अमरु ६४) | २७३।१ | न धातोर्विज्ञानं न च | ४४।८ | नभोलताकुञ्जुमुपा | २९९।१५ |
| न जिघ्रत्याघ्रातं स्पृशति | ४३।५ | न ध्यात पदं (शा प ४१५२) | ३७४।२१८ | नभोवन नक्तमसौ | ३२३।६ |
| न जीमूतच्छेद स | २५७।२४ | न ध्वानं कुरुषे (शा प ९६७) | २३५।१४८ | न भ्रूणा स्फुरणं न | २२९।२३२ |
| न ज्ञातुं नाप्यनु (प्र.राघव ५.२) | १५८।२३४ | न नटा न विटा (भर्तृ स १६५) | ८०।३० | नम खलेभ्य क (सु ३२६) | ५९।२२० |
| नटोऽपि दयाद्रणकोऽपि | ४४।७ | न नरस्य नरो दासो (हि ३ ७८) | ६४।७ | नम शिवाय नि शेष (सु १६) | ४।९ |
| न तच्छत्त्रेर्न (पंच १ १३५) | १४६।१४७ | न निर्यायान्ति (सु ४८६) | ७२।५१ | नम सर्वविदे तस्मै | ३६।५५ |
| न तज्जल यन्न (भट्टि २ १९) | ३३१।३५ | न र्नातमुपनासिकं | २७६।३७ | नम स्तवन्नचिच्छक्ति (सु २१) | १।७ |
| न तथा तप्य (भाग ११ २३) | ३८४।३०१ | ननु नीलाञ्चल | २६२।१७० | न मणेरितोऽधिका | २४७।६४ |
| न तथा बाध्यते (पच २ ९५) | ६६।२२ | ननु सदिशोऽति (शिशु.९ ६१) | २८७।३ | न मध्यव्यसनी (शा प १५०७) | १५४।६४ |
| न तथेच्छन्त्य (सु ३६९) | ५६।१०० | नन्दनजन्मा मधुप | २२२।५७ | न मया गोर (काव्या ३ १०८) | १९५।४७ |
| न तथोत्थाप्यते (हि ३ ४२) | १४८।२२९ | नन्दनरेन्द्राधिषणे (शा प ३८१) | ७२।३८ | न मया रचित | २३७।३२ |
| न तद्युक्तं न (शा.प ४७५) | १५५।१९३ | नन्दन्ति म (शा प ४१२४) | ३७२।१६७ | नमस्कुर्म कूर्म नमद | १८।१८ |
| नतध्रुवो लोचन | २५५।८९ | नन्दयति कस्य न (सु.१७४१) | ३४०।१० | नमस्तस्मै गणेशाय | २।४ |
| न तस्यादिनं | १८५।१७ | नन्वाश्रय (सु ४४१) | २४८।६९ | नमस्तस्मै वराहाय (सु ७) | १८।२३ |
| न तादृक्कर्पूरे (शा प १०१६) | २४०।१९९ | न पक्षकृत्तिर्न सपक्षक | १२४।३ | नमस्तुङ्गशिरश्चुम्बिचन्द्र (सूक्ति १ १) | ३।१ |
| न तिर्यगवलोकितं | २६१।४८ | न पङ्करालेप (सूक्ति १ ३५) | १८।२९ | नमस्तुभ्यं देवासुरसुकु (सूक्ति १.५) | ५।४९ |
| न तृणाडु (नैषध १२ ४९) | १०९।१६३ | न पण्डिता साह (दशरू ४ २६) | ३९।२२ | नमस्त्रिभुवनोत्पत्तिस्थिति (सु ५) | १।४१ |
| न तेजस्तेजस्वी (सूक्ति १० ९) | ७९।२० | न पर फलति हि (सु ४१८) | ५८।१८९ | नमश्छिमूर्तये तुभ्यं | १४।१ |
| न दन्तुरमुर स्थलं | २५६।३६ | न परस्यापराधे (हि २ १०३) | १६४।४८८ | नमस्यामो देवाञ्जतु (भर्तृ २ ९२) | ९३।८८ |
| न दातुं नोपभोक्तु च (भोज ७०) | ७१।११ | न पर्वताग्रे नलिनी (मृच्छ ४ १७) | ३५५।६ | न मातरि न (गरुड पू अ ११४) | ८८।१३ |
संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः ४१
| न माता शपते (धर्मवि १८) १६८।६६९ | न लज्जते सज्जन (सु ३५९) ५९।२२५ | नवे वयसि (गरुड पू अ ११४) १५६।१३४ |
| नमामि मामनो (शा.प ५४८) २०५।१ | न लज्जा न (हि १ १२०) ३४९।३८ | न वै ताडनात्ता २४६।१९ |
| नमिता फलभारेण न ३४४।८ | न लभन्ते विनोयोगं (दृ श ३५) ८३।१७ | न वैरमुद्दीपेय (मा ५ १०८२) ३९४।६९७ |
| न मिथ्यावादस्ते १०६।१५४ | नलिकागतमपि ५६।१९९ | न वैरण्यभि (मा २ २४३८) ३९४।६७८ |
| न मुग्धदयिता (शा प १८३) ३७।६१ | नलिनं मलिन (नैषध २ २३) २५९।९१ | नवोक्तिजतिरि (शा प १५२) ३०।४ |
| न मुद्रीयान्मुद्री (सु ५५) १८।३० | नलिनान्तिकोप (शिशु १३ ४३) १२६।४३ | न व्यावयो (मा.२ १९७४) ३८६।३७७ |
| न मे दु ख (शा प ३४५६) २७७।४ | नलिनि निपुणता २४४।२२४ | न व्याधिर्न (योगवा सा १ २७) ३८६।३७८ |
| नमो नम काव्यरसाय (सु.१६८) ३१।३० | नलिनीदलगत (शा प ५५७) १७१।७९० | न व्यासिरेषा (दृ श ४१) १६८।६८९ |
| नमो रामपदाम्भोजं २०१।६ | नलिनीदलगत (मोहमुद्गर) ३७३।१७२ | न शब्दशास्त्रे (पञ्च सू १९) ३८९।४८४ |
| नमो वाङ्मनसातीत (सु १५) १।५ | नलिनीदलताल २८५।६ | न शान्तान्तस्तुष्णा (सु ४९१) ७२।५६ |
| नमो विश्वसृजे (रघु १० १६) १४।२ | न लोकायत (शा प १५२१) १६६।६०६ | न शीलं दृग्भङ्गी २५५।३३ |
| नम्रत्वेनोन्नमन्त (भर्तृ २ ५९) ५३।२७७ | न लोपो वर्णाना १०६।१५३ | नश्यतो युध्य (मार्कण्डेयर ४९) ३८६।३७७ |
| नयगुणोपचितामि (रघु ९ २७) ३३२।४० | नवं वयो (शा प.२०८३) १४५।१११ | न श्लाघते खल १९९।१९ |
| न यज्वानो (पच १ ३२३) १४९।२९८ | नव वस्त्रं नव (नीतिप्र १५) १५९।२९६ | न श्वेतांगुव (शा प ११११) २१८।६५ |
| न यत्नकोटिशतकैरपि ५५।४४ | नवकदम्बरजोरु (शिशु ६ ३२) ३४१।३८ | नष्ट मृतमति (पच १ ३६३) १६४।५१३ |
| न यत्र गुणव (सूक्ति ३६ ३७) २४७।५५ | नवकनकपिंशङ्ग(शिशु ११ ४३)३२७।१२ | नष्टमपात्रे दान (सु ३४१) ५८।१६६ |
| न यत्र स्थेमानं २३०।३३ | नवकिसलयतल्प (ताराश १२२)२७५।२२ | नष्टे वारिजविपिने २२२।५९ |
| नयनच्छलेन सुत २५९।७५ | नवकुङ्कुमचर्चिका २९९।१८ | न सशयमना (मा १ ५६१३) १६३।४३४ |
| नयननिपाते (शा प ३५५५) ३१२।२६ | नवकुङ्कुमारुणपयो (शिशु ९ ७)२९४।३५ | न ससारोत्पन्नं (भर्तृ स २६३) ३६८।४३ |
| नयननीरज (शा प ३३३६) २६५।२८४ | नवकुमुदवनश्रीहा(शिशु ११ २२)३०२।९ | न सदश्वा कशाघातं (सु २२६५)८०।२७ |
| नयनपंथनिरोधा (शा प ५९४) २७७।८ | न नवोज्जालैषप्रभृति २८०।८६ | न समास समर्थस्य १०३।५२ |
| नयनमसि (शा प ७५५) २१०।२१ | नवचन्द्रिकाकुसुम(शिशु ९.२८)३००।५३ | न सर्पस्य मुखे १४७।१९३ |
| नयनयुगासेचन (सा द ३ २६७)२७०।१८ | न वध्यन्ते ह्य (पच १ १२३)१६४।५०५ | न सवर्णो न च रूप २८८।९ |
| नयनविकारै (शा प ३७६५) ३५९।५७ | नवनखपदमङ्ग (शिशु ११ ३४) ३०९।६ | न साधु कुत्रापि ५२।२३९ |
| नयनस्य तुला चक्रे २५९।७० | नवनीतोप (सूक्ति १३०.३) ३८५।३१२ | न सारणीया १५५।१०२ |
| नयनाञ्चलचञ्चरी २६०।१०५ | नवनीलमेघरुचिर (शा प ७३) ३६७।२९ | न सा (स्काद नागर अ ११५) ६५।३ |
| नयनानन्द (काव्यप्र १० ५४) २९९।५ | नवपय कणकोम (शिशु ६ ३६) ३४१।४२ | न सा प्रीति (मा १३ १८१८) ३९४।६७३ |
| नयनेन निरीक्षिता २७८।३१ | नवपलाशपलाशव (शिशु.६ २) ३३२।५८ | न सा सभा (शौन नी ११५) १७४।८८४ |
| नयनोत्पलजलधारा २७५।११ | न वाचा दुर्गम (र ६ ६७) ३९३।६६८ | न साहसैकान्त(हि ३० ११६)१७४।९०९ |
| न यस्य चेष्टितं(पच १ २८४)१६४।५१२ | न वारयामो भवती २१९।८ | न सुख न च सौभाग्यं ८३।२ |
| नयेन जाग्र (काम नी ७.५८) ३९४।६६९ | न वित्तं दर्शये (पच १ ४३३) ६४।२ | न सौख्यसौभाग्य(शा प ३००) ८३।४ |
| न येनाङ्कुरितं (वृ श ५३) १५०।३५९ | न विद्यया नैव कुलेन ६५।१२ | न स्कन्दते न (म ७ ८४) ३९४।६९१ |
| नं योजनशतं दूरं (हि १ १४८) ७५।११ | न विना परिवादेन (शा प ३४६) ५४।२ | न स्त्रीजित (शा प. १५११) १५४।६६ |
| नरत्वं दुर्लभं लो(अग्निपुराण) १६७।६६० | न विना पार्थिवो (पच १ ८७) १४४।८५ | न स्त्रीणामप्रिय (हि १ ११७) ३४९।४१ |
| नरनारीसमुत्पन्ना १८५।१५ | न विप्रापादोदकपङ्कि ८९।२ | न स्वातन्त्र्य (शा प ३२४) १६७।६२६ |
| नरपतिहित (शा प १३५३) १५२।४०९ | न विमोचयितु ४८।१३२ | न ज्ञानं न च २९२।३३ |
| न रम्य नारम्य १७७।९८९ | न विश्वसे (शा प.१३०१) १६०।३२३ | न स्पृशल्या (काव्या ३ १२१) ३९४।७०३ |
| नरस्य चिह्नं १७४।८९० | न विश्वासा (मा ५ १३६१) ३९४।६९५ | न स्म माति (शिशु १०५०) ३१६।१० |
| नरस्याभरणं रूपं रूप (चा नी ४३) ८३।२ | न विष विष (स ७ ४४) ९८।१ | न स्वप्नेन (गरुड पू अ १०८) १६६।५७३ |
| नरा सस्कार (सु ३०६) १७७।९८० | न विषममृतं (शा प ३७७) ६१।२५५ | न स्वल्पमप्यध्य (हि १ १७२) १७२।८३४ |
| नराणा नापितो (पच ३ ७४) १५९।२७९ | न विषयभोगो ३६७।२२ | न स्वल्पस्य कृते (भोज १३) १६१।३५५ |
| नराधिपा नीच(पच १ ४१४)१५०।३९६ | न विषेण न (कुव १२३) ३४९।५६ | न खा करेणुमपि २३१।७३ |
| नरेशे जीवलो(काम.नी ४.४२) १४५।१२८ | नवीनदीनभावस्य याच(कविता ३९) ७३।७ | न खादुनौषधमिदं १००।४ |
| नरैर्विफलजन्मभिर्गिरि ३१७।४ | न वेत्ति यो य (वृ चा ११ ८) १७३।८६५ | न खे सुखे (मा.५ १०८२) ३९४।६८८ |
६ सुभा०अनु०
४२ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां ---|---|---
| न द्वयेन च (शा प ३०८०) २५।१२ | नानीयन्ते मधुनि ८०।३९ | नालम्बते दैष्टि(शिशु २ ८६) १४७।१८६ |
| न हायनैर्न (भा ३ १०६३२) १६७।६१४ | नान्नृषि कुरुते १६०।३०३ | नालसा (भा १२ ५२६९) १५३।१० |
| न हार नाहार २८९।६१ | नान्त प्रवेशमरणं (अमरु ११४) २७३।५ | नालस्य (शा.प ११३७) २४४।२३६ |
| नहि कस्य (श्रीकृष्णजन्मख ५) २९४।६८२ | नान्तरज्ञा (किरात ११.२४) १६१।३६७ | नालिङ्गन्ति (शा प १२४३) १०८।२०० |
| नहि जन्मनि ज्येष्ठ (शा प गुण ४) ८२।२९ | नान्तर्विचिन्तयति (सु २७६) ५१।२१४ | नािलङ्गिता नवलवङ्ग २२३।८६ |
| नहि बुद्धिगुणेनैव (मालवि ४ ६) ८८।१६ | नान्दीपदानि (दश २ ४०) २५२।४३ | नालीकभङ्गकृदतीव ११८।१२० |
| नहि भवति यन्न (भर्तृ स ५६९) ९१।४२ | नान्बौ स्कन्ध्नति २१४।७७ | नालेनेव स्थित्वा (शा प ८८९) २०८।२३ |
| नहि भवति वियोग ५१।२१८ | नापरीक्ष्य नयेद्दण्डं १५०।२३७ | नालोक क्रियते (सु २२६) ४६।७७ |
| न हीदृश सव (शा प १४७०) १५४।५१ | नापितस्य गृह ३९४।६८४ | नाल्पीयसि (शा प.२११) ३८६।३६३ |
| नाकालतो (भा १२ ८८१) ३७९।१०३ | नापुष्ट (पञ्च पा अ.११०) १६६।६१० | नावज्ञया प्रदा (र १ १२ ३१) ३८७।३९२ |
| नाकालतो म्रि(भा १२ ७४२) ३७९।१०६ | नापेतोऽनुनयेन (अमरु ४२) ३११।२७ | नावज्ञा नाप्यवैद (सूक्ति २७ २) २१५।१ |
| नाकालमत्ता (भा १२ ७४१) ३८०।१०९ | नाप्तं यत्केनचिदपि (सु ५१९) ७०।२७ | नावर्तो न च तरला २१६।६ |
| नाकाले म्रियते(नीतिसार १९) १६०।३०१ | नाप्राप्यमभि (भा ५ ९९३) १६३।४५८ | नाविदग्ध प्रियं १६४।५१० |
| नाकाश न दि (सूक्ति ६९ ११) २९८।३४ | नाभिप्रभिन्नाम्बु(सा द १० १४) १४०।४ | नाशयन्तो घनध्वान्त(मा द ७ ८) २९९।६ |
| नाक्रोशी स्या (भा ५ १२६५) ३८०।११२ | नाभिरन्ध्र २६७।३३९ | नाश्नन्ति पित(गरुड पू १०८) ३८९।४८६ |
| नाक्षराणि पठता (नै १२५) ७०।३२ | नाभिषेको (शैन नी ११५) २२०।७ | नाश्रिय किमभूद्भव २०।७१ |
| नागच्छन्नुपहूयते न ६१।२६१ | नाभिसङ्गेन २६७।३४१ | नाश्नाति सेवयौ (पच १ २९०) ९७।९ |
| नागविशेषेषु शेषे २०६।१५ | नाभीपद्मवस (प्र राघव १ ३) १५।३० | नाश्चर्यमेतदधुना (सु ४४५) ६०।२४५ |
| नागुणी गुणिन ४५।१३ | नाभीबिलान्तर २६७।३५९ | नाश्रम कारण ३८७।३९४ |
| नागेन्द्रहस्ता (कुव ४५) २६९।३१७ | नाभीवलयसबद्धा २६७।३४२ | नासत्यवादििन सख्य ८३।१ |
| नागो भाति (पञ्चरत्न १) १८०।१०४२ | नाभूतिकालेषु(भा १२.७३८) ३८७।३९६ | नासा कश्चि (भा १३.१२१८) ३४८।१५ |
| नाग्निस्तृप्यति (पंच २ १४८) १५४।६० | नाभूवन्भुवि यस्य (शा प ९२४) २३२।८३ | नासादसीया (नै ७ ३६) २६०।११६ |
| नाङ्गीकृतव्याकरणौष ४२।७ | नाभ्यस्ता (भर्तृ स.१९५) ३७४।२१७ | नासामौक्तिकमबले २६०।११८ |
| नाजारज १६५।५६२ | नामृत न विषं (भर्तृ स ९१) २५१।१० | नासावंशविनिर्मुक्त २५८।४४ |
| नात पर (शा प ३७५२) ३५१।३० | नामोदस्ताखिलामो २६१।९३ | नास्ति कामस (वृ चा ५ १२) १५९।२८६ |
| नात पापीयसी (सु ३१६४) ६६।२१ | नाम्बुजैर्न कुसुमैरु ३५२।२७ | नास्ति वर्मसमो (प्रसगा १२) ३८०।३८९ |
| नातिप्रसङ्ग (पच १ १४८) ३४९।६७ | नायं धार्यमधी २६३।२३१ | नास्ति क्षुवासमं दुख ९६।१ |
| नात्यक्त्वा (भा १२ ६५८३) ३८६।३६५ | नाय प्रयाति विकृतिं २९।१८ | नास्ति मेघ (वृ चा ५ १७) १५९।२८८ |
| नात्यर्थमर्थार्थी (शा प ४३३) १६७।६२५ | नायं मुवति २८९।७६ | नास्ति (भा.३ १३६४९) १५६।१४२ |
| नात्युच्चशिखरो (सु २२६०) ८३।१८ | नायाति वाडवशि ७८।८ | नास्ति (वराह अ १५३) १६७।६२४ |
| नात्र व्याधशरा २३४।१२० | नायातो यदि (सु १४३८) ३५८।७३ | नास्ति सत्य १६५।५५६ |
| नाथ मयूरो नृत्यति १८४।१९ | नारब्धं कुचपरि ३१३।४७ | नास्ति सत्या(भा १ ३०९७) ३८७।३९० |
| नाथ विलोकय मेघ १८४।९ | नारमेतान्यसा(भा २ १९७२) ३८७।४०२ | नास्ति स्त्रीणा (म ५ १५५) ३५१।१६ |
| नाथे श्रीपुरु (शांति १ ११) ३७६।२५८ | नारसिंहाकृतिं वीक्ष्य १९४।१२ | नास्तीदृशं (मत्स्य अ ३६) ३८४।३०० |
| नाथो मे विपणिं (कुव १५४) ३५५।८८ | नारिकेलसमाकारा (हि.१ ९४) ४५।२४ | नास्त्यन्या तृष्णया (शा प ४२२) ७६।५ |
| नाद्रव्ये निहिता (हि प्र ४४) १६२।४३० | नारीणा खलु ३५४।५८ | नास्माक शिबिका ८०।४४ |
| नाधन्याना (सूक्ति १०३.२६) २१५।१ | नारीणा मृगनाभि ३२६।३१ | नास्मिन्सततवेष्ट (सु २२९०) ७८।१५ |
| नाधीतेऽत्र जनो यदि ९९।९ | नारीणा वचनेन ६१।२६७ | नास्य भारग्रहे (शा प ९६१) २३४।१३९ |
| नाध्यापयिष्यन्निगमाश्च ४२।१ | नारी परमुखद्रष्ट्री १५७।१८० | नास्योच्छायवती (शा प ९०६) २३०।३९ |
| नानन्दि कैरवमवर्धि २१०।२८ | नारीभिर्गुरुज (शिशु ८ ४७) ३३९।१०४ | नाहं रक्षो न (शा प ४०८८) ३६७।१५ |
| नानन्वयस्ते न च ते १०४।९३ | नारुतुद (मनु २.१६१) १६७।६१५ | नाह दुश्चरिणी न ६३।३८ |
| नानाभूषणभूषित १०९।२१३ | नारुहेद्विषमं वृक्ष १६७।६५१ | नाह धार्यमधी २६४।२३१ |
| नानाविध (काव्य प्र १०.२७) १०५।१४४ | नार्य कुङ्कुमशङ्कया १३४।२१ | नाहूतापि पुर पद १०१।१३ |
| नानिवेद्य (हि २ ९०) १४६।१४२ | नार्यस्तन्वि (अमरु ८) ३१७।४ | नि पद्म शिशिरेण २१४।७८ |
| सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः | ४३ |
|---|
| नि पीतपीनति | २१६।१७ | नितरा नीचो (भामिनी अ ७) | २२०।६ | निम्नोन्नत वक्ष्यति | ८४।१७ | | नि पीते कलशो | ३६१।४७ | नितान्तस्वच्छहृदय | १९५।५० | निम्बे किं (शा प १०४०) | २४१।१५५ | | नि शङ्कं गजपति | २२३।७७ | नित्य छेदस्तुणूनाना (अष्टरत्न ३) | ३८५।२१८ | नियत (काम नी २ ४३) | १५२।४१० | | नि शङ्क बहिरम्ब | ३६५।९ | नित्यं (स्काद आ अ २५) | १६६।५९९ | नियत्तै पदैर्निक्षेप्य | १७१।७९७ | | नि शङ्कसोचित(नै ७ ७७) | २६५।२७८ | नित्य निरावृत्ति (सु ८९) | ९।१० | नियमयसि (अ शाकु ५ ८) | १०६।१९६७ | | नि शेषं व्यपनीय | ३२०।२० | नित्यं ब्रह्म (शा प १५५८) | २९१।३ | नियुक्त क्षत्रियो(हि २ ९७) | १४७।२०३ | | नि शेषच्युत (अमरु १०५) | २९३।७ | नित्यं मनोरथस्यापि | ३०४।१ | नियुक्तहस्ता (महा ना ९ ३४) | १५१।३८३ | | नि श्वासानलविद्ध | २७७।५८ | नित्य या (सु ५३८) | ७१।४२ | नियोगिभि (शा प १३३२) | १४४।-३ | | नि श्वासा वदनं (अमरु ९२) | ३०९।११ | नित्य वृद्धिसुपेषि | १८।१९४ | निरक्षरे वीक्ष्य | १७३।८५९ | | नि श्वासोद्गी (काम नी ३ १८) | ३८४।२८८ | नित्यं ज्ञाता सुगन्धा | ३५०।२ | निरञ्जने (किरात ८ ५२) | ३३८।९५ | | नि सारस्य (शा प ४८१) | १५५।११४ | नित्यमाचरतः | ३७१।११५ | निरतिशय (पच १ ३१) | १७१।७७५ | | नि सीम (भामिनी शृ.४६) | २५९।६१ | नित्यमाराधिता देवै | १९७।४९ | निरर्थकं जन्म (स क २ २५३) | २०५।५ | | नि सृप्तोऽह (शा प.४३२७) | ३७२।१४२ | नित्यमास्यं शुचि(शा प ६१२) | १५६।१४४ | निरवद्यानि पद्यानि | ३०।२ | | नि स्नेह नि करुण | ३५८।८० | नित्यानित्यविचारणा | ३७०।८४ | निरवधि (काव्यप्र १० ४२८) | १८।१६ | | नि स्नेह पतिरुज्झिता | २८७।९ | नित्यार्यपृथिवी | १५०।३२५ | निरस्थचालीके | ६७।५९ | | नि स्नेहो याति (शा.प ४१००) | ३६७।६ | निदधिरे (शिशु ६ २४) | ३३५।१२ | निरा (काव्यालं सू ३ १।१२) | २२३।९४ | | नि स्वो वष्टि शतं (अष्टरत्न ९) | ७७।५० | निद्रातुन्दिलशोण | ३२९।२३ | निरीक्षितुं (शिशु १७ ६२) | १२७।११ | | निकटस्थं (दृ श ७५) | १६९।७०६ | निद्रानिवृत्ता (का प्र १० २२) | ३२८।१ | निरीक्ष्य विद्युन्नयनै (कुव ६१) | ३४०।२० | | निकटस्थं दहल्यम्रिनं | १८४।११ | निद्रामीळित (भर्तृ.स ५७९) | २३१।५१ | निरीक्ष्य वेणी | ३३८।७१ | | निकाामं क्षामाङ्गी (मालती २ ३) | २७६।३४ | निद्रार्धमीलित (दश ४ २३) | २७८।४० | निरुत्साहं निरानन्दं(हि २ ७) | ९०।१० | | निखिलं जगदेव(रसगङ्गाधर ) | ३६७।२७ | निद्रितस्य बत | ३४०।४ | निरुद्यमानवद्याझ्या | १९३।२ | | निखिलेषु गुणेषु | १०४।८८ | निद्रे लोचनमुद्रणं | २८१।११० | निरुपादानसम्भार (वेणीसंहार ?) | ३।३ | | निचयिनि (किरात १० २९) | ३४६।१४ | निधे कलानामपि | २१०।१५ | निर्गतामलवाक्यस्य | ३४।३ | | निजकरनिकर (शा प ७५२) | २१०।८ | निन्दन्तु नीति (भर्तृ स.२६५) | ७८।११ | निर्गत्य न विशे | ३९३।६३५ | | निजगुणगरिमा | ८३।५ | निन्दा य (दृ श २७) | १६८।६८३ | निर्गुण इति मृत | ४०।२७ | | निजदोषा (का प्र.१० २३) | १७१।८०१ | निन्यते पितृभिस्त | ८९।८ | निर्गुणमप्यनुरक्त (सु २४२) | ४८।१४१ | | निजनयन (सा द ८ १५) | ३३४।१०३ | निन्यन्ते यदि (प्र राघव १ २०) | ३२।४८ | निर्गुणस्य हतं रूपं(वृ चा ८ १६) | ३८८।४३८ | | निजपतिराद्यः | १८१।२५ | निपतति किल | ९२।६२ | निर्गुणेष्वपि (शा प २३२) | ४६।३९ | | निजपदगतिगुप्परञ्जित | ४७।९६ | निपत्य युधि (शा प १६०७) | १४३।५१ | निर्जितसकलाराति | २०१।५९ | | निजपाणिपल्लव (शिशु ९.५२) | ३५९।८८ | निपपात संभ्रमभूत (शिशु ९ ७१) | ३१०।३ | निर्गतव्यो | २६८।३६५ | | निजप्रियमुरुखप्रान्त्या | ३३७।५९ | निपानमिव (हि १ १७६) | ८२।९ | निर्णेत्रुं शक्य (कुव १७१) | ३१२।१७ | | निजरज पटवास (६.३७) | ३४१।४३ | निग्रन्धनी (भा १२ ६५४८) | ३८०।१४८ | निर्दयं खङ्ग (कुमार १६ ६) | १२७।४ | | निजवर्षािहितस्नेहा | १४५।१२५ | निबिडतमत्तमाल | ३५४।७३ | निर्दहति कुल (प्रसंगा ८२) | ३८८।४२९ | | निजसौख्यं (हि १ १५८) | ७१।१८ | निबिडानुषक्त | २६६।३०८ | निर्धौते सति (शिशु ८.५१) | ३३९।१०८ | | निजा काय (शा प ३८३२) | ३३६।२१ | निभृत निभृतं | ३५२।२४ | निर्मग्नेन मयाम्भसि | १५।२६ | | निजांशुकावृता (शा.प ३७३४) | ३२७।२ | निमग्नस्य (घट नीति २०) | १६०।३०२ | निर्मजचक्षु (सूक्ति ९३ ३) | ३६६।१४ | | निजानपि गजा | ११७।७६ | निमित्तमुद्दि (घट नीति १०) | १७४।९०८ | निर्मासि मुखमण्डले | १२४।८ | | निजानुत्पत्त (भा ५ ११६५) | ३८६।३८४ | निमीलदाकेक (किरात ८ ५३) | ३३८।९६ | निर्माणकौशल(सा द १० ३३) | २५३।६ | | निजाशयवदाभाति | १८८।६९७ | निमीलनन्शंशजुषा(नै १ २७) | २५३।७ | निर्मथ्य खलजिह्वाग्रं (सु ३७६) | ५६।१०६ | | नितम्बगौरवेणासौ | २६८।३७५ | निमीलनाय (शा प.७४३) | २०९।४ | निर्मित्सु शुंदती | २५४।४५ | | नितम्बपीड्य | २६९।४०८ | निमेष (भा १२ १२५०३) | १६१।३५९ | निर्मुक्तरशेषधवलैरचले | १३५।२२ | | नितम्बबिम्ब | २६८।३७२ | निम्ननाभि (का प्र.१०.४६) | ३३८।९९ | निर्मुक्तांशैश (प्र.राघव २ १९) | २५३।२३ | | नितम्बिन्यो नित्यं विनय | ३५२।३७ | निम्नप्रदेशा (कुमार १४ १४) | १२८।४५ | निर्यच्छोणितपूरताम्र | ११५।४८ | | नितम्ब्यो विशाल. | १७५।९८४ | निस्त्रैण्वोधीभूत(शिशु १८ ६९) | १३०।९८ | निर्यद्द्वाससरजीव (विद्ध २ २२) | २९५।६२ |
| ४४ | सुभाषीतरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां | |
|---|---|---|
| निर्यान्त्या (शा प ३७२८) ३२४।४८ | नीचस्तनोत्वश्रु निता (सु १७५) ४०।४३ | नृत्यत्तद्वद्विजिराजी (रसगङ्गाधर)१२६।२५ |
| निर्लेपौ कुचकुड्मलौ ३२१।२९ | नीचावमानमलि (दृ श.२०) १६८।६७७ | नृत्यद्भगोदृहास (कुव १४८) ११६।५६ |
| निर्वाणदीपे (नीतिप्र १३) १७३।८७४ | नीचेषु यावनी (शा प ५५९) ९९।१३३ | नृत्यारम्भसरत्सद्गरि ६।७० |
| निर्विवेकतया बाल्यं ३६७।१८ | नीचैर्धुर्यवने शुनी १००।३० | नृप. कराभ्यासु (नै १२ ८०)१०४।११६ |
| निर्विशेषो यदा (पंच १ ८६) १४६।१५७ | नीतं जन्म (अमरा ४ १२) २२४।१०८ | नृप कामासक्तो (हि २.१४२)१५२।४११ |
| निर्विशेषेणापि (पच १ २२५) १५७।१७८ | नीत नवनवनीतं २२।१११ | नृपतिनिजाम तया ११५।३३ |
| निर्विषोऽपि (शा प.१२९७) १४९।३१० | नीता कुम्भस्थल क १२३।१ | नृपतिपुरुषशक्ति (मृच्छ ३ १०) २९६।२ |
| निर्वीर्या पृथिवी ९९।२३ | नीतानामाकुली (कुव ६५) ३१२।१४ | नृपतिसुकुटरत्न (हनु ७ ३) ११८।१२१ |
| निर्वृत्ताध्वरकृत्य १७८।१०८० | नीतिर्भूमिभुजा (नवरत्न ३) १७९।१०३२ | नृपदीपौ धन (पच.१.२४४) १४९।२९३ |
| निर्वृत्ते सुरतोत्सवे (सु २११६) ३२१।२६ | नीतिर्लक्ष्मीमुकुरो १११।२५६ | नृपाणा च नरा(शा.प १२८७)१४५।१२० |
| निर्व्याजा (शा प ३७५०) ३५१।३८ | नीते मेदं धौत (शिशु १८.२०)१२९।६५ | नृपोऽपकृष्ट (मुद्रा ४ १४) १५२।३९७ |
| निर्ह्लादं क्रकचकक्षतै. ३१।४५ | नीत्वोच्चैर्विशिख (अमरु ११९) ३४७।४६ | नृसिंहदेवे चलिते १९०।७३ |
| निलय श्रिय. (शिशु ९ १६) २९६।४ | नीपस्कन्धे कुहरिणि १४१।४ | नेता यस्य बृह (भर्तृ.स ४९) ९३।१०० |
| निलीना वेश्मान्त २५४।३४ | नीपस्कन्धे निवसति १४०।१ | नेतु प्रयाणोन्मुखता १९०।६८ |
| निलीयमानैर्विहगै (कुव १७१) २९३।६ | नीर दूर तदपि वि २१३।५७ | नेत्रे खञ्जनगञ्जने (सा.द ३ ५९)२७२।७१ |
| निवासश्चिन्ताया (मृच्छ १.१५) ६७।५५ | नीरक्षीरविचे (भामिनी.अ १२) २२१।१० | नेत्रे खञ्जनगञ्जने नव २८१।१०८ |
| निविशते यदि (नै ४.११) २७५।१८ | नीरक्षीरे गृहीत्वा ११७।९६ | नेत्रैरिवोत्पलै (सा द १०.२५) १४०।१ |
| निवृत्ता (भर्तृ स.१७३) ७७।४४ | नीरजान्यापि निषेव्य २२३।६८ | नेत्रोपान्तवतंसिते २७२।६० |
| निशम्य केलीभवनोप ३३०।२ | नीरन्ध्रं परिरभ्य (शृ ति.२ ६७) ३१०।३ | नेदं नभोम (सा द १०.३८) ३०४।१५१ |
| निशाचरोऽपि दीनो २०९।६ | नीरसान्यापि (शा प.२९४) २४२।१८४ | नेदं मुख मृगवियुक्त २५३।२० |
| निशारत्नं चन्द्र (प्रसगा १५) ११५।४६ | नीरागा मृग (शा प ३४८८) २९०।७२ | नेदं समीरितमकारि ३५९।८९ |
| निशितशरधि (काव्यप्र ४ १९) २५५।१६ | नीराञ्जिभं (भामिनी.अ ६१) २४४।२३७ | नेदं सर सरसवारि २२१।२१ |
| निशीथे लीना (शा प ३८९२) ३४२।८६ | नीलनीरजनि (किरात ९ १९) ३००।३६ | नेपथ्यादपि रा (सूक्ति ८० २) ३२१।२५ |
| निश्चितं समुद को १८७।९ | नीलाब्जद्युतिनं १८४।३९ | नेपालीनामराले १३८।७८ |
| निषेवन्तामेते २३२।७७ | नीलाञ्जाना नय(स क २ ६७) २७१।४८ | नेयं विद्युद्भवमध्वि २७४।२१ |
| निष्पन्दा किमु (शान्तिश ४ ३) ७४।४६ | नीलेन्दीवर (स क ३ ११५) २८१।१०२ | नैतच्चित्रं यद (अ शा २.१५) १०७।१७५ |
| निष्पन्दामरवि(स क ४ ९४) २३५।१५५ | नीलोत्पलदल (सूक्ति ४ ९६) ३६।५४ | नैतद्दारिदगजितं ३४२।७० |
| निष्कलङ्ककलकैक (शा.प.४६४) ८२।४२ | नीलोत्पलाभ (शा प ४१२२) ३७२।१५१ | नैतद्विचित्रं म(भाग.१०.१२) ३८४।२९३ |
| निष्कासयन्त्यनेके २७८।२५ | नीलोत्पलोल्लसित २५३।२४ | नैतत्सा प्रह्यति(शा प.३९४२) ३४८।१७ |
| निष्कूजस्तिमिता. १४०।५ | नीवारप्रसवाग्रमुष्टि (सु.६३७) २३२।८१ | नैता स्वयमृप(शा प ७८८) २११।१७ |
| निष्क्रामन्नमृश ३७२।१४३ | नीवारा शुकको (अ शा १ १३) १४१।७ | नैयायिकाना नलिनाम्ब ४३।४ |
| निष्ष्णातोऽपि च (भामिनी.अ.८५) ५५।५९ | नीवारौदनमण्डमु १४६।१० | नैयायिका वा ननु शाब्दिक ४३।४ |
| निष्पाल्यासु हि • २६।१६५ | नीवीदर्भापरीतकरा ३१।८१८ | नैरन्तर्यच्छि (शिशु १८.७६) १३०।१०५ |
| निष्पीडितो यद्य २१०।१६ | नीवीबन्धोच्छ्वस (मालती २.५) २७६।४८ | नैर्मल्य वपुषस्त २२९।२२९ |
| निष्पेषोऽस्थिच २४३।१८६ | नीव्या सयमनं कचे ३२१।२८ | नैव व्याकरणाज्ञमे ३१।४३ |
| निष्प्रत्यृहमनल्प (शा प १२४) १८।१९ | नीहाराकरसार (शा प ७७२) २१३।६० | नैवाकृति फलति (भर्तृ स.४०) ९२।७२ |
| निष्प्रत्यूहमुपासहे १५।३१ | नूनं दुग्धाब्धिम (सूक्ति ६ २) ४६।४७ | नैवात्मनो विनाशं(पच १.४४३)५६।११५ |
| निसर्गसौरभोद्गान्त ३२०।३ | नून बादालशाइ शो(शा प ५५०)२०७।३ | नैवार्यं भगवानुद ३०३।१३४ |
| निसर्गादारामे (भामिनी.अ ५२) २३८।७२ | नूनं हि ते क (भर्तृ स ११८) २५२।४२ | नैवालवालवलयं २१२।४४ |
| निस्त्रिंशत्रुटि (नैषध.१२ ६६)११०।२४२ | नूनमयं मे पाप (सु १२६५) २७७।१८ | नैषा सध्याविधिरवि १३९।५ |
| निहत निहत तूर्ण १४१।१ | नूनमाज्ञाकरस्त (भर्तृ १ ११) २५९।६० | नैषा वेगं सुदुतर (मु २१०७) ३१९।३७ |
| नीचं समृद्धमपि १७६।९६८ | नृणा धुरि स एवैको (सु ५१०) ७०।१९ | नैष्ठुर्यं कलकण्ठको २९०।८० |
| नीच समुत्थितो (शा प.३५६) ५५।६९ | नृणामन+यस्तफणामूदी ४२।६ | नो काम प्रति (सु.२५७६) १०८।१९६ |
| नीचतामनवलम्ब्य ७२।२९ | नृत्यचन्द्रकिणि (सु.१७७३) ३४२।८९ | नो ग्लानिं भजते १२१।२५८ |
सस्थाननिर्देशसङ्क्रमकोशः (पृ. ४५)
| स्तम्भ १ | स्तम्भ २ | स्तम्भ ३ |
|---|---|---|
| नो चाटु श्रवणं (सा.द.३ ८२) ३०५।१३ | पक्ष्मालीपिज्र (मालती १ ४) ९।१४२ | पतिव्रता पतिप्रा (पच.३ १४४)३७७।१२ |
| नो चापाकलनं न १३१।१२१ | पङ्कज जलेषु वा (शा प ९९) २४३।२१० | पतिरतीव धनी सुभ ३५२।२६ |
| नो चारु चर (सूक्ति १७ ९) २२८।२१८ | पङ्कसकराविगर्हितम(नैषध ५ ८७) ६९।२२ | पतिभार्या (मनु ९ ८) ३८६।३६१ |
| नो चिन्तामणि (भर्तृ स.२६६) २१४।७५ | पङ्कानुषङ्गं पथि (शा प ३९१७)३४५।५७ | पतिर्हि देवो(बौधा स्मृ.१ १३) ३५१।१४ |
| नोच्चै सत्यपि चक्षु (वेणी २ १) १३९।७ | पङ्गुष्वपि च देवर्षे ३४९।४८ | पतित्रताया कुच १७३।६६३ |
| नो जानाति कुलीनमु ६३।४२ | पङ्गो वन्ध्यस्त्वम (स क.४ ११३)७४।३५ | पत्ति पंक्ति वाहमे १२९।५३ |
| नो तल्पं भजसे न ३०९।२३ | पञ्चत्व यान्तु बाणा २८५।४५ | पत्ति पत्तिम (कुमार १६ २) १२७।२ |
| नो तावत्कल्याणि ३६१।४६ | पञ्चत्वं तनुत्रेव भू (सु १३५५) २८४।३० | पत्ति पदातिं र (रघु.७ ३७) १२८।२५ |
| नोदन्वानर्थितामे (सु २६६५) १५३।११ | पञ्च त्वानुगमि (भा.५ १०४६) ३७७।२० | पत्यु प्रवृत्तस्य रतौ ३१९।२४ |
| नो धर्माय त (भर्तृ स ५८२) ३७५।२२३ | पञ्चदशीरजनिसमा १८६।१० | पत्युर्यरपतितावशेष (सु ६३९) २३२।९० |
| नोपभोक्तु नच (हि १ ११३) ३८४।२७५ | पञ्चभि. कामिता १५५।११७ | पत्रं नैव यदा क (भर्तृ २ ८९) ९३।९६ |
| नोपभोक्तुमपि क्लीबो (सु २६७६)७१।१५ | पञ्चभि. सम्भृत (हि.४ ७१) ३८६।३५० | पत्रच्छायासु हं (मालवि २ १२)३३७।५६ |
| नोपभोगपरानर्था १६९।७०४ | पञ्चभि सह गन्त १५५।८४ | पत्रपुष्पफलच्छाया (शा प ९७७) २३६।२ |
| नोपभोगो न(काव्या.२ ३२६)३८८।४३५ | पञ्चभिर्याति दास (हि २ ३८)१६३।४७३ | पत्रफलपु (भामिनी अ.२२) २४२।१६० |
| नोपेक्षा न च दाक्षि २११।७ | पञ्चमेऽहनि षष्ठे (शा.प ३१४) ७५।६ | पत्राणि कण्टक (शा.प १०१२)२३९।९२ |
| नोपेक्षितव्यो (सु २७६२) १४९।३१५ | पञ्चसायकमहेन्द्र २७८।३३ | पथि निपति (सूक्ति १७ ६) २२८।२१४ |
| नो मन्ये दृढब (शा प ९३४) २३२।८९ | पञ्चास्यपञ्चदशनेत्र ९१।१६ | पथि पथि लता ३३४।१३१ |
| नो मन्त्रीमयमी (शा प ८२०) २२४।१०० | पञ्चास्यस्य पराभवा (धर्मवि ७) ३७७।४ | पथि पथि (काव्य.प्र ४ २०) ३३३।८५ |
| नो रविनं च (सूक्ति ६८ २०) २९४।१० | पञ्चेन्द्रियस्य म (भा.५.१०४७) ३७७।५ | पदद्वयस्य सधान (सु १४०) ३९।१९ |
| नोर्ध्वं न चा (कुमार १४ ३८) १२८।४१ | पञ्चैतानि विलि १६५।५५५ | पदन्यासो गेहाद्वहि ३५१।३२ |
| नोर्ध्वमीक्षण (कुमार ८ ५६) २९७।११ | पञ्चैते पाण्डुपुत्राः ९५।१२८ | पदप्रणतमालोक्य ३१०।१ |
| नो वा कियन्त २२०।२० | पञ्चैव पूजयन् (भा ५.१०४५) ३७७।६ | पदबन्धोज्ज्वलो हारी ३५।३० |
| नो सलेन मृगा (भर्तृ १ ७७)३८४।२७६ | पटलमम्बुमुचा ३४१।३५ | पदमनन्तरवान्त्वि २०२।८४ |
| नो सध्या समुपासते २०।७४ | पटालमे पत्यौ नमय (अमरु.४१) ३१८।९ | पदव्यक्तिव्यक्ती (सूक्ति ४.३५) ३३।४४ |
| नो सेवा विहिता ६७।६५ | पटविघटितमपि २६५।२८८ | पदशब्दलीनहृद (सूक्ति ४६ ६) २९४।१ |
| नौका वै भजते २४८।८५ | पटुत्वं सत्यवादित्वं (हि १ ९९)१६३।४५२ | पदस्थितस्य पद्मस्य (शा प ४८७) ८६।४ |
| नौका च (शा प दुर्जन १८) ३८८।४३३ | पटु रटति पलितदूतो ९५।१० | पदानि क्रतु (याज्ञ १.३२४) १५०।३४५ |
| नौश्व दुर्जनजिह्वा (कविता.१०) ५४।१४ | पाठक पाठकश्चैव १५८।२५१ | पदाभ्यामुन्नि (प्र राघव २.९) २७१।४४ |
| न्यग्रोधे फलशा २४१।१४७ | पठतो नास्ति मू(शा प.१४२४) १५३।५ | पदे पदे च रत्नानि (वृ चा २ १)१६०।३११ |
| न्यञ्चञ्चल (सूक्ति.९६ १०) २०८।२५ | पण्डिते चैव मूर्खे १५८।२२९ | पदैश्चतुर्भि सुकृते (नै.१ ७) १०५।१२३ |
| न्यञ्चति (भामिनी.शू ४१) २५५।६ | पण्डिते हि गुणा (स पाठो.५३) ३८।१ | पद्माकरं दिनकरो (भर्तृ २ ६५) ७५।१३ |
| न्यस्तं यथा मू(शा प ४११५)३७२।१६६ | पण्डितै सह १५८।२५२ | पद्माकारैर्योधवक्रे १३०।१०१ |
| न्यस्तं पन्नगमूर्ध्नि ३५३।५७ | पतङ्गपाकसमये पत ३३१।८ | पद्माक्षस्रग्दाम(नैषध ७ ४९) ४२६३।२२२ |
| न्यस्तानि (सूक्ति ८६ ५) २६४।२४३ | पतति रविरपूर्ववारि २९४।४८ | पद्मातपन्नरसिके (कुव ९०) ३१३।५५ |
| न्याय खलै (सु ३१७) ५०।२०८ | पतति व्यसने (सूक्ति ११० २३) ४६।२८ | पद्मानना पद्मपलाश १०१।१० |
| न्यायनिर्णीत (किरात ११ ३०) ८५।४ | पततु तवोरसि स (सु २१२०) ३२०।२ | पद्मापयोधरत (गीत.१ २.१०) १४।१८ |
| न्यायार्जितधनस्तत्त्व ८९।१ | पततु नभसो गच्छ २०९।१४ | पद्माया स्तनहेमसद्म १६।१२ |
| न्याय्यं मार्गमनु (सु ५३९) ७१।४३ | पतत्यविरतं वारि नृत्य (कुव ११४)३४०।७ | पद्मा सद्मनि केशवस्य १११।२६५ |
| प | पतलेत्तत्तेजो (नैषध १२.४६) १३५।३१ | पद्मिनि किमिति २४४।२१४ |
| पकानि प्रच्यवन्ते १४२।१४ | पतन्ति खङ्गधारासु (शा प ३४३) ६५।४ | पद्मिन्या सकला ३२४।४९ |
| पकाक्षमिव (सु २७६६) १४४।८० | पतन्ति नासि (किरात ४.२३) ३४४।१९ | पद्मिन्या दयितेऽनु ३२१।१०९ |
| पक्षविकलश्च (मृच्छ.५ ४१) ६६।३३ | पतन्ति व्यसने दैवात् ४५।२८ | पद्मे त्वन्नयने स्म (कुव.२०) २४।१५८ |
| पक्षावुत्क्षिप्य धुन्व (सु.२४१८)२०८।२६ | पतिते पतद्द्मृगराजि २९७।१४ | पद्मे मूढजने ददा ६३।३४ |
| पक्षिभ्रेष्ठसखीबभूवुरा १९८।३ | पतितोऽपि राहुव (शा प.४८०) ४७।९२ | पद्मोदयदिना (सा.द १०.३०) १०३।५८ |
| पक्ष्माग्रग्रथि (सूक्ति ३९ ११) २८६।२० |
| ४६ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
|---|
| पन्था सङ्कर दीर्घ | ११७।८८ | परार्थव्यास (भामिनी अ ७४) | ५२।२४६ | परोपकार कर्तव्य (पाञ्च उ २२) | ७४।१ |
| पन्नगधारिकराग्रो गङ्गो | १३।४ | परार्थानुष्ठाने जड (मुद्रा ३ ४) | १३९।३ | परोपकारविज्ञानमा (सु २३१६) | ५६।९६ |
| पपात गङ्गा हरमौलि | ३२१।५ | परार्थे य (शा प १०१२) | २४२।१७९ | परोपकारशून्यस्य (शा प १४७८) | ७४।७ |
| ‘ पपात पाथ कणि | २१२।२९ | परीक्षणं कश्चि (भर्तृ २ ३७) | ६५।१५ | परोपकाराय फल (विक्रम ६६) | ७५।१० |
| पपात मेरो सुरसिं | ३२१।४ | परिचरितव्या (भर्तृ २ १०८) | ३८६।३४८ | परोपकृतिकैवल्ये लोल | ७४।५ |
| पम्पासरसि रामेण | १९३।५ | परिचुम्बति स (शा प ३७८५) | ३३१।५ | परोपदेशकशला दृश्यन्ते | ८४।४ |
| पयःपीठं दत्ते त्वरि | ३५७।५२ | परिच्छिन्नस्वादोऽमृत | ३१।४० | परोपदेशवेलाया | १५६।१५९ |
| पयसि सलिल (शिशु ११ ४५) | ३२७।१४ | परिच्छेदती (मालती १ ३३) | ३७५।२४७ | परोपदेशे पाण्डित्यं (हि १ १०३) | ४५।२६ |
| पयोदकेशेषु विक्रु | २४७।१५ | परिच्छेदो हि (हि १ १५०) | १६३।४५५ | परोपसर्पणानन्त (भामिनी अ ८४) | २३६।५ |
| पयोद हे वारि (उत्त.चातक ६) | २१२।३५ | परिच्युतस्तत्कुच(रत्ना २.१४) | २८३।१५७ | परोऽपि हितवा (सु २७०५) | १५६।१५२ |
| पयोधरघनीभाव | २६४।२५३ | परिणयविधौ भङ्क्त्वा | २०।८० | परोऽप्यपत्यं(भाग ७ ५ ३७) | ३८७।४१३ |
| पयोधरस्तावदय | २६७।३५' | परितप्यत एव (शिशु १६ २३) | ५९।२०१ | परोऽवजाना(किरात १४ २३) | १७४।९०३ |
| पयोधराकारघ (शा प.३९२७) | ३४६।३४ | परितोषयिता न(शिशु १६ २८) | ५९।१९७ | पर्जन्य इव भूता (शा प १८८३) | १४२।४ |
| पयोधे सर्वस्वं शिर | २१७।५७ | परिपतति पयो (शा.प ३५८८) | २९४।४५ | पर्यङ्क खास्तर (शा प ३७६६) | ३५२।३ |
| पयोमुच प (काव्या २ १७३) | २८८।४३० | परिपीड्य करद्वयेन | २४६।३७ | पर्यङ्कग्रन्थिबन्धद्वि (मृच्छ १ १) | ८।११२ |
| परं क्षिपति (भा.५ १००७) | ३८६।३४५ | परिपूर्णगुणाभोगगिरि (सु ५०५) | ७०।१७ | पर्यङ्कीकृतनागनायक | १५।३६ |
| परं तदिह नास्ति | २४२।१६६ | परिपूर्णेऽपि तटाके | ५६।१२३ | पर्यङ्को राजलक्ष्म्या | ११८।११० |
| परं पलितकायेन | १६५।५६० | परिमन्थरा (शा प ३९१४) | ३४५।५० | पर्यच्छे सरसि (शिशु ८ ४६) | ३३९।१०३ |
| परं विनीतत्वमुपै (भाव ४ ३) | १५२।४०० | परिमन्थराभि (शिशु ९.७८) | ३११।१० | पर्यत्तपुष्पस्तबक | ३३१।३४ |
| परकाव्येन क(राजन ५ १५९) | ३९७।४२२ | परिमलसुरभित (शा प ९९०) | २३७।३९ | पर्वतभेदि पवित्रं जैत्रं | ९।१२३ |
| परगुह्यगुप्ति (भामिनी अ ८७) | ५७।१३९ | परिमृदितमृणा (मालती १ २५) | २७५।२५ | पर्वताग्रे रथारूढो | १८५।२७ |
| परदारपरद्रव्यपर (शा प ६६७) | १५४।४६ | परम्लानं पीन (रत्ना.२ १२) | २७५।२७ | पर्वताग्रे रथो याति | १८५।१९ |
| परदारं परद्र (स पाठो ५४) | १६१।३४९ | परम्लाने माने मुख (अमरु २५) | ३१०।४ | पलायिता तवारि | ११८।१०१ |
| परदारा न गन्त (सु २९) | १५४।४४ | परिलुठति ललाटे | ३०६।३६ | पलाशकुसुमभ्रा (कुव २५) | २२२।४३ |
| परदु खं समा (राजन १ २२७) | ४७।८१ | परिशिथिलित (शिशु ११ ११) | ३२३।२५ | पल्लवत कल्पतरोरे (कुव ५७) | १०३।७९ |
| परपतिनिर्दयकुल्टा | ३५१।२६ | परिशुद्धामपि वृ (शा प ३५५) | ५७।१३० | पल्लवोपमितिसा(शिशु १०.५३) | ३१७।१५ |
| परपरितापनकुतुकी | ५८।१५७ | परिश्रमज्ञ जनमन्त (सु १९५) | ३८।२१ | पल्लीनामधिपस्य पङ्क | ३५७।३९ |
| परभृतशिशो (सूक्ति १४ ९) | २२५।१३८ | परिसुरपतिसू (किरात.१० २०) | ३४०।२२ | पवनापनीतसौरभद्गदो | २२२।६० |
| परमर्मघट्टनादिषु (सु ४०३) | ५८।१७८ | परिस्रुरन्मीन (किरात ८ ४५) | ३३८।८८ | पवित्रमतिसूक्तिकू | २०३।१०५ |
| परमर्मदिव्यदर्शिषु (सु ३९२) | ५७।१३९ | परिहर कृता (गीत.१० १९ ३) | ३०६।४९ | पश्चादङ्गी प्रसार्य (सु २४२०) | २०७।१३ |
| परमो महत्स (शा प ७९३) | २१४।३ | परिहरत पराङ्गना | १७५।९४१ | पश्यति परस्य युवति | १७१।७८० |
| परवादे दशवदन.-(सु ३८९) | ५७।१२९ | परिहरति भयात्तवा | २०१।६८ | पश्यन्ति नैव कवयो | १७६।९६१ |
| परश्लोकान्स्तोकान (सु १७९) | ४१।६० | परिहरति यथा य(भाव ३.११) | २५५।१५ | पश्यन्ति स्निग्धमुग्धं | ३५४।६५ |
| परस्परानु (शा प १९२९) | १५०।३५० | परिहरति रतिं मतिं | २९३।२ | पश्यन्तीं परिणामके | ३२०।४६ |
| परस्परेण (रघु ७ ५३) | १२८।३६ | परिरुह्य दुरारोहं | २६७।३३१ | पश्यन्नन्यसख्यपथगा | १०२।३८ |
| परा विनीत (काम नी १ ६५) | ३७८।४६ | परीक्ष्य सत्कुलं वि (शा प ४०५) | ६५।४ | पश्यन्हतो (सूक्ति ५३ ८०) | २६९।३९६ |
| परागै कर्पूरैरस्तृहि | २८०।७१ | परीवादस्तथ्यो (लक्ष्मणसेन) | १७७।९७७ | पश्य पकफलिनीफ | २९९।२६ |
| पराधीनं वृथा | १६०।३२८ | परेषा क्लेशदं (शा प १५१३) | १५४।६८ | पश्य पश्चिमदिगन्त | २९४।१३ |
| परावरं प्राप्य दुर्बुद्धे (सु.२३११) | ३६३।३ | परेषा चेतांसि (भर्तृ ३ ६२) | ३६८।४५ | पश्यानुरूपमिन्द | २४१।१५७ |
| पराङ्गेन मुखे दग्धं(वृ चा ४ २३) | ९८।३ | परेषामात्मन. (पंच ३.८७) | ३७७।२१ | पश्याम किमिदं (अमरु २०) | ३११।२४ |
| परापकारनिरतै | १६८।६५९ | परै प्रोक्ता गुणा यस्य | ८३।१ | पश्यामि तामि (मालती १.४३) | २७८।४९ |
| पराभवं परिच्छे (हि २ १५०) | १६४।४९० | परै समुन्न्यते रा (हि २ १७६) | १३९।१ | पश्यैकश्चिञ्चलचपल | १३२।२३ |
| परामृशन्तो लिङ्गानि | ४३।१ | परोक्तमात्रं (वृ. चा ४ ४९) | ३८१।१७२ | पश्योदञ्चदवाञ्चदञ्चित | २०७।३ |
| परोक्षे कार्यहन्तारं (स.पाठा.५४) | ८८।१ | पश्योदेति वि (प्र राघव ७.५९) | ३०१।९१ |
| सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः | ४७ | |
|---|---|---|
| पाकश्वेभ्र शु (राजत ३ ३०३) ६२।२७४ | पाथोदजालजटिलं ३४४।६ | पारीन्द्राणा धुरीणैरवनि १२६।३१ |
| पाटलया वन (शा प १०१४) २३९।९७ | पादन्यास (सु ५६१) २१०।३३ | पार्वतीमोषधीमेकमपर्णा ११।२ |
| पाटीर तव प (भामिनी अ ११) २३७।४३ | पादपाना (स पाठो.५४) १६२।४१४ | पार्श्वस्थपृथ्वीधरराजकन्या ४।२९ |
| पाठीन कमठ (शा प १३३) १७।३ | पादसवाहने वज्री २५१।१७ | पार्श्वभिया (शा प ३५०५) २९३।१ |
| पाणि पात्रं प (शान्ति ४ ७) ३७१।११३ | पादस्याविर्भवन्ती (मुद्रा १ २) १०१।५४ | पार्श्वस्फिाला (शा प ५८७) २०७।१९ |
| पाणिग्रहे पर्वतराज ४।२८ | पादा कन्दुकवत्स्थि १४३।५७ | पाशक्षुण्णखुरस्य २३४।१२३ |
| पाणिग्रहे पुलकितं वपु ४।१६ | पादाग्रस्थितया (सूक्ति २ ३८) १२।३८ | पाश्चात्यभागमिह (शिशु ४.२२) ३६३।१८ |
| पाणिग्राहस्य सा (म ५ १५६) ३५१।१७ | पादाघातविघूर्णिता (सु ६३५) २३२।८६ | पाश्चात्याम्बुधिदृष्टपूर्व २९५।६४ |
| पाणिपल्लवविधूत(किरात ९ ५०)३१८।१० | पादाङ्गुष्ठेन (अमरु परि १३६) २८१, २१ | पाश्चात्यैर्म (शा प १८३१) ३३६।२७ |
| पाणिरोधमविरो(शिशु १० ६९)३१८।१२ | पादसक्ते (अमरु ६८) ३०७।५२ | पाषाणखण्डे (शा प ४०९९) ३६७।२३ |
| पाणिर्नीरवरूक्षण स्तन २९१।९५ | पादस्त एव ३१३।५८ | पाषाणा पयसि १८३।६२ |
| पाणौ कङ्कणमुत्पर्गं (शृं ति ३ २) ७८९ | पादाहृत यदुत्थाय (शिशु २ ४६) ७९।५ | पाषाणो भिद्यते ५५।४५ |
| पाणौ गृहीतापि पुर ३५२।२२ | पादाहतोऽपि (शा प ३६१) ६०।२३७ | पास्यन्ति कस्य कुसुमे २४१।१३४ |
| पाणौ ताम्रघटी (सूक्ति ८९ ७) ३६५।४९ | पादेन क्रम्यते १५९।२७१ | पिकस्तावत्कृष्ण ८५।१२ |
| पाणौ पद्म (सूक्ति ६५ ४०) ३३४।११९ | पादे मूर्धनि (शा प ३५६९) ३१०।७ | पिका गी वाचालीभवति २८५।२६ |
| पाणौ मा कुरु (सु १३१३) २८२।१३८ | पादौ सस्तम्भयन्ती ९६।४८ | पिण्डे पिण्डे १५९।२६५ |
| पाण्डित्यस्य विभूष (सु ३०५४) ८४।२३ | पान दुर्जनसंसर्ग (म ९ १३) १६६।५७६ | पिता (गरुड पू अ ११५) १६६।५७५ |
| पाण्डु क्षामं वदन(काव्यप्र ७ १५)२८५।२ | पानं स्त्री (भा १२.५२७२) १४८।२३८ | पिता रत्नाकरो यस्य(वृ चा १७ ५)९१।२० |
| पात पूष्णो (भट्ट. १०) २०९।१३ | पानधौतनवया (शिशु १० २६)३१५।२९ | पिता रत्नावार शुचिसह ९३।१५ |
| पातकानां समास्ता १४७।१५७ | पानमक्षा (शा प १३८९) १४६।१६४ | पिता वा (पंच १ ४५७) १४७।२२१ |
| पात जले विष्णुपदापगा ४२।५ | पानायावरतोऽमृत २७२।६२ | पितुरधिपुर लङ्का ३२९।९२ |
| पातयति हृदयदेशे २७५।८ | पानीय (भा १२ ४११४) १६३।४५६ | पित्रो पादाब्जे १०१।४७ |
| पातालत. किमु (शा प ४०८०) ३६६।२ | पानीयं (शा प ३८०७) ३३५।१३५ | पित्रोर्निंल प्रियं १६७।६१८ |
| पातालमिव ते नाभि ३१२।१० | पानीय पातु (शा प ५३०) १८।४२ | पित्रोर्नैव वच शृणोति ९०।१२ |
| पातालाङ्गुवनावलो २७४।२४ | पानीयमानीय २१२।२८ | पिदधाति (शा प ३६०१) २९७।१३ |
| पातालाच्च विमो (शा प २५७) ८०।४४ | पान्तु वो (शा प ११३) २२।१०१ | पिदधानमन्वयुपग (शिशु ९ ७६)३१०।८ |
| पाताले मज्जु मूलं १२१।१६१ | पान्थ मन्दमते २५४।६८ | पिनष्टीव तरंगाग्रै (कुव ३५) २९९।४ |
| पातितोऽपि करा (भर्तृ २ ८३) ४५।३० | पान्थाधार इति (शा प ९८३) २३६।२१ | पिनाकफणिभालेन्दुभस्म (शा.प ६३) ३।६ |
| पातुं त्रीणि जग (शा प ४०१७) १८।३१ | पान्थाना प्रमदा ३३७।५६ | पिपासाक्षामकण्ठेन २२६।१४९ |
| पातु न प्रथम व्यव (अ शा ४ ८) ३६३।३९ | पापं समाचरति (सु २७२) ५०।२१० | पिपासुरिव चञ्चलं २६०।१११ |
| पातु श्रोत्ररसायनं (सूक्ति ४ ९९) ३६४।४३ | पापं कर्तुमृण कर्तुं ९८।२ | पिपि प्रिय (शा प.३६५१) ३१६।६७ |
| पातुमाहितर (किरात ९ ५१) ३१५।४३ | पापान्निवारयति (भर्तृ २ ६४) ८८।१८ | पिपीलिकार्जितं धान्यं १५५।१०१ |
| • पातु व कपटकैरळके १८।२७ | पामारागाभि (सूक्ति ९८ १) १९४।१७ | पिबतस्ते (शा प ५३८) १९५।४२ |
| पातु व शिति १०१।४४ | पार्यं पाय पिव (शा प ११५१) २२०।३ | पिबन्ति नद्य ४९।१७० |
| पातु वो निकषग्रावा ३।४ | पायात्पयोधिदुहितु (शा प १३४) १६।२ | पिबन्ति मधु (सु ६९०) ९१।८ |
| पातु वो (मृच्छ १ २) १०१।४२ | पायात्स व (सु.४८) १६।४५ | पिब पय (शा प १२११) २३५।१५६ |
| पातु वो मेदिनी (सु ३०) १८।२४ | पायादायासखे १०१।५७ | पिब स्तन्यं (भामिनी अ ५८) २३०।३६ |
| पातु श्रीस्तनपत्र १८।३२ | पायाद्गजेन्द्रवदन (सु ८०) २।२३ | पिशुन खलु ५८।१६२ |
| पात्र न तापयति ९०।१३ | पायाद् करणोऽरुणो २०६।१८ | पिशुनत्वमेव विद्या ५७।१५२ |
| पात्रं पवित्रयति (सु ३२४) ५१।२१६ | पायाद्दो जमदग्निवश २०।७२ | पीठा कच्छपवत्तरन्ति ६८।७८ |
| पात्रमपात्री (शा प ३७०) ८८।९ | पायान्मायामृगेन्द्रो १९।५८ | पीठीप्रक्षाल (शा प.४०२८) ३६५।५५ |
| पात्रविशेषे (भा.१३ १७७) ८६।७ | पारिजाततरु यावन्न २३७।३८ | पीठे पीठनिषण्णबालक २४।१५७ |
| पात्रापात्र (सु २९७५) १५७।२०३ | पारीन्द्रशावक न २३०।३० | पीडिते पुर (शिशु १० ४६) ३१६।६ |
| पात्रे त्यागी गुणे (प्रसगा ४) १४२।१२ | पारीन्द्रस्य (धर्मवि.८) १८३।५९ | पीतं येन पुरा पुरन्दरपुरे २३२।३७ |
| ४८ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
|---|
| पीतं यत्र हिम (शा प ९२१) २३२।८३ | पुमासो ये हि (भाव १ ४०) ३९०।५०६ | पूरयित्वा (शान्ति. २.२१) ३६७।१२ |
| पीत पङ्कजकानने २२४।११४ | पुर पूर्वमिव (रत्ना ३ ७) २०१।२८ | पूरोत्पीडे तडा १५६।१६६ |
| पीत क्रुद्धेन (वृ चा १५ १६) ३८७।४१७ | पुर स्थित्वा (सूक्ति ४१ १२) २७३।१४ | पूर्ण पङ्कज २११।४८ |
| पीतमत्र मधु यापिता २२३।६९ | पुरत कृच्छ्र ३९०।५१० | पूर्णचन्द्रमुखी १९६।१४ |
| पीतवल्यभिमते (शिशु १०.९) ३१४।१२ | पुरत प्रेय्यलाशा ७३।१६ | पूर्णनखेन्दुद्विगु ९१।३५ |
| पीतशीधुमधु (शिशु १० ११) ३१५।१४ | पुरंदरमहस्त्राणि (सु ३३०९) ३७३।१९० | पूर्णापूर्णे (पच १ १७) ३९३।६२९ |
| पीतस्तुषार (अमरु १२०) ३१६।६६ | पुरस्तन्व्या (अमरु ५१) ३५७।५३ | पूर्णेन्दुमा (माकडेय २७.२५) ३९३।६३१ |
| पीतस्त्वं कलशोद्भवेन १८३।६५ | पुरस्ताद्रच्छन्ती २८०।७८ | पूर्णेन्दु कर १३७।५५ |
| पीतोऽगस्त्येन तातश्वरण ६४।४३ | पुरा कवीना गण (कुव १६४) ३५।७ | पूर्णे शतसहस्रे (शा प ३९८५) ३६०।८ |
| पीतो यत. (अमरु १३०) २७९।५७ | पुराण (सूक्ति ५३ १३) २६०।११४ | पूर्वं तावत्कुवलय (शाति ४ १६) ३६९।६३ |
| पीत्वा गर्जन्त्यपस्ते २१७।३९ | पुराणमित्येव (मालवि १ २) १७४।८९३ | पूर्वं द्विरेफ (सूक्ति ६५ १२) ३३४।११६ |
| पीत्वा भृश (सूक्ति ८२ २८) ३२३।१५ | पुराणरश्मि २९३।३ | पूर्वं चेटी ततो (शा प ४०५२) ३६४।४ |
| पीनोत्तङ्ग (शा प ३९३९) ३४७।१४ | पुराणान्ते १५८।२३२ | पूर्वं यत्र सर्व २९३।५ |
| पीनोत्तुङ्गस्तनकलशयो २७६।४२ | पुरातनपरीमल ३२६।२१ | पूर्वजन्मकृतं कर्म (हि प्र ३२) ८२।६ |
| पीयूष वपुषोऽ (शा प ७६१) २१०।३६ | पुराभूद (शा प ३५५८) ३१३।६५ | पूर्वजन्मजनितं ८३।१९ |
| पीयूषाश्रयणं (सूक्ति ७२ ३०) ३०२।९७ | पुरा विद्वत्ता (भर्तृ ३ १००) ३७८।४२ | पूर्वत्रासिद्ध १२१।१६४ |
| पीयूषेण कृतार्थिता २१७।३६ | पुरारितनुहारिणी १२।२४ | पूर्वदत्ता च १५८।२२४ |
| पीयूषेण सुरा श्रिया २१७।३४ | पुरा शर (शिशु १७ ५५) १२७।४ | पूर्वभागतिमिर २९४।१६ |
| पीलूना फलव (शा प.९५६) २३४।१३६ | पुरा सरसि (भामिनी अ २) २२१।२६ | पूर्वा क्षणक्रम ३९५।५२ |
| पुंस सबोधन (शा.प ५५२) १९८।४२ | पुरीषस्य च ४५।१ | पूर्वाह्ने प्रतिबोध्य २०९।१७ |
| पुंसा दर्शय सुन्दरि १६२।१७४ | पुरुष कीदृशो १९९।३१ | पूर्वे वयसि (भा १३ १७८८) ३८७।४१५ |
| पुंसा सर्वसुखैक १४५।१९२ | पुरुष पौरुष ९१।२७ | पृच्छति पुरुष २००।४६ |
| पुसामुन्नत (सूक्ति ७ ५) ७०।१३ | पुरुहूतदिगङ्गना (सु २२२०) ३२७।४ | पृच्छति शिरसिरुहो २०१।६९ |
| पुंस्कोकिलकुलसैते १९४।१४ | पुरो (भामिनी अ ७९) २४५।११ | पृथिवी दह्यते (सु ३३०८) ३७२।१५४ |
| पुच्छं चेदहमुन्नयाम्य १७।१२ | पुरोजनमा नाय(महा ना १ ४७)३६०।३३ | पृथिवी रत्न (भा १ ३१७५) ३९०।५३४ |
| पुज्यमानानरुण १८२।३३ | पुरो दिगनुरा ३०६।४० | पृथिव्या त्रीणि (वृ चा १४ १) २९।६ |
| पुञ्जीभूतं प्रेम २२१।२४ | पुरोन्नम पक्षा (सूक्तिसङ्घ) २०७।११ | पृथुकार्तरस्वर (सूक्ति. १२७ ४) ६६।३५ |
| पुण्यतीर्थे कृतं (हि १७) ९०।६ | पुरो रेवापारे (नीतिरत्न ५) ३७८।६८ | पृथु गगन (सूक्ति ६८ ६) २९५।५४ |
| पुण्यान्नौ (सूक्ति ६४ १२) ३४८।२० | पुरो वा पश्चाद्वा ८०।३३ | पृथुवर्तुलतन्नि (नै २ ३६) २६८।२७७ |
| पुण्ये ग्रामे वने (भर्तृ ३ २४) ३७९।७६ | पुष्पं पुष्पं (भा ५ ११११) ३८८।४४९ | पृथ्वी तावन्त्रि ३५४।६६ |
| पुण्यैर्मूलफलै (भर्तृ ३ २७) ३७०।८५ | पुष्प प्रवा (शा प ३३१८) २६१।१४८ | पृथ्वीपते शुभ १३५।२० |
| पुत्र (शान्ति २ १०) ३७०।९४ | पुष्पाणि प्रथमं ३३३।१५ | पृथ्वी पृथ्वीगुणा (सु ५०२) ७०।१६ |
| पुत्रदारादि (शान्ति २.२५) ३६७।१३ | पुष्पे गन्धं (वृ चा ७ २१) ३९०।५१५ | पृथ्वी श्रीमदनङ्ग(शा प १२६०)११३।५ |
| पुत्रपौत्र (चाणक्य. १०७) १४४।७७ | पुष्पेषुमाता पुरुषा १९०।७० | पृथ्वीसबोधनं १९६।६ |
| पुत्रपौत्रवधू १५६।१३२ | पुष्पेष्वोरभिषेक (सु १५४६) २६५।२९३ | पृष्टो ब्रूते न १४२।२९ |
| पुत्रप्रयोजना (चाणक्य ५३) १६१।६८५ | पुष्पैरपि न (शा प १२९८) १५०।३२६ | पृष्ठत (हि २.३४) १६३।४७२ |
| पुत्रमित्रकल (वामन. अ ७७) ३६७।२ | पुस्तकस्था (चाणक्य ८३) १६२।४१३ | पृष्ठे श्राम्यद (सु.३६) १८।२० |
| पुत्रसू पाक १५७।१९४ | पुस्तकेषु च (हि प्र ३८) ३९।१५ | पृष्ठे कञ्चुकमुत्कल्यै ३१।८७ |
| पुत्रिण्य कति २३६।५ | पुस्तकप्रत्यया (वृ चा १७ १) ३९०।५१८ | पेटीचीवरपट्टवस्त्र ४१।७३ |
| पुन प्रभातं ३७४।२१० | पुस्तकेषु च या १५९।२६९ | पेशलमपि खल ४८।१२५ |
| पुनरपि मिलनं २७८।२८ | पूजाया कि पद १९८।१ | पोतो दुस्तर (पंचरत्न. २) ६१।२६४ |
| पुनर्वित्तं पुनर्मिं(वृ चा १४ ३) ३८७।४०९ | पूज्यो बन्धुरपि(पच १ २४०) ३७८।५१ | पौर सुतीयति १०५।१४७ |
| पुनर्दांरा पुन (वृ चा १४ ४) ३८५।३३९ | पूतिपङ्कमये (सूक्ति ९८ ९) १९८।२९ | पौरस्त्यैदर्दाक्षि (शा प ११०८) २१८।७२ |
| पुन्नाम्नो नर (भा.१ ३०२६) ३८९।५०१ | पूरयति पूर्णमेषा ६२।१७ | पौराणिकाना व्यभि ४४।१ |
संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः
| स्तम्भ १ | स्तम्भ २ | स्तम्भ ३ |
|---|---|---|
| पौरैर्भ्यो न भयं ६८।७५ | प्रणालीदीर्घस्य (विद्ध ४ १४) २६०।१०८ | प्रत्युपकुर्वे (भा १२ ४९९३) ८०।२९ |
| पौलस्त्य. (पच. २.४) १७९।१०२४ | प्रणीतक्षा (शा प १३१४) ३९२।६०० | प्रत्युपस्थित (मा.१२ ५२८०) ३७८।५९ |
| पौलस्त्यपीनभुज (दश रू ४ २८) ११।२० | प्रतापभीत्या (भोजप्र १९५) ११७।७७ | प्रत्यूह पुलका ३२०।४७ |
| पौलोमीकुच ३०२।१३३ | प्रतिकामिनीति (शिशु ९ ३५) ३००।६० | प्रत्यूहू (हि ३ ४५) १६६।५६८ |
| पौलोमी (भामिनी. अ. ४४) २४५।२४२ | प्रतिकूलता (शिशु ९ ६) ९२।७० | प्रत्येकं दिक्प १८४।७६ |
| प्रकटमपि न (सु.४३५) ५९।२०९ | प्रतिक्षणमय (हि ४ ६६) ३९२।५९७ | प्रथम कला (शिशु ९.२९) ३००।५४ |
| प्रकटं (शिशु १६ १९) १७५।९२४ | प्रतिक्षणसमुल्ल (शा प ३६६७) ३१७।३ | प्रथमं युद्धकारित्व (हि ३ ८६) १४३।६० |
| प्रकटमलिन (शिशु ११ ३०) ३२२।११ | प्रतिगतमर्थि (शा प.३८२५) ३३५।३ | प्रथमं संस्थिता (भा १ ३०३३) ३७८।६० |
| प्रकटान्यपि (शिशु १६ ३०) ४९।१५३ | प्रतिगृहकोणं १७०।१४४ | प्रथमदिवस १७७।९७५ |
| प्रकाममभ्यस्यतु ४९।१६५ | प्रतिदिनमयलसुलभे (भर्तृ स ६०७) ९६।१ | प्रथममन्यमृता ३३२।४४ |
| प्रकीर्ण (काम नी १ २५) ३९०।५२२ | प्रतिदिवस (पच ५ ४) ३९२।६२७ | प्रथममरुण (सूक्ति ७२ ४) ३०१।८५ |
| प्रकुप्यत्प्र (राजत ६ २७८) ३९०।५२३ | प्रतिदिशमभि (किरात १० ०१) ३४०।२३ | प्रथमवयसि (विक्रम ९१) ५१।२२० |
| प्रकीर्णकेशामन १७४।९०० | प्रतिनगरमटन्ती १३५।२३ | प्रथमा गति (र २ ६०) ३८०।१३९ |
| प्रकुर्वता सगति २१।०२० | प्रतिपक्षेणापि (मालवि ५ १९) ३५१।२२ | प्रथमे ना (चाणक्य. ९३) ३७८।६१ |
| प्रकृति (हि ३ १४४) १४५।१२७ | प्रतिपक्षो यदि २६५।२६९ | प्रथितोऽसि यत २१।२३० |
| प्रकृतिखलत्वाद (सु ४१३) ५८।१८६ | प्रतिबिम्बितगौरीमुख ४।२३ | प्रदह्यमाना (शा प ३७५) ३९०।५३७ |
| प्रकृतिप्रत्ययो ४६।५० | प्रतिबिम्बितप्रिया १।४९ | प्रदान प्रच्छन्नं (भर्तृ २.५४) ५२।२४९ |
| प्रकोष्ठबन्धे २६४।२३७ | प्रतिरजनि प्रति (शा प.३७६०) ३५१।२० | प्रदीप किमु २४७।६६ |
| प्रखला एव गुण (सु.३९७) ५८।१७३ | प्रतीक्ष्यन्ते वीरा १३१।११४ | प्रदोषमातङ्ग ३०४।१४८ |
| प्रगल्भाना (शा प ३२८१) २५५।२८ | प्रतीप (कथास ३१ ८७) ३९२।५८९ | प्रदोषे दीपकश्चन्द्र १५८।२१५ |
| प्रचण्डचण्डमुण्ड ११।२३ | प्रतीपभूपैरिव (नै १ १३) १०५।१२७ | प्रदोषे (चाणक्य ९९) १६२।४२४ |
| प्रचण्डवासनावा ३६७।९ | प्रतीयमानं पुनर (सु १५७) ३३।३४ | प्रधानाध्वनि १०३।७५ |
| प्रचण्डसूर्य. ३३५।७ | प्रत्यक्षरक्षुत १०५।१४० | प्रबुद्धाया प्रातलं ३२८।३ |
| प्रजा न (पच. ३ २४९) १४५।१२१ | प्रत्यक्षे गुरव १५९।२७३ | प्रभव को १९६।११ |
| प्रजां सर (काम नी १ १२) १४५।११७ | प्रत्यग्रज्व (सूक्ति ८२ २७) ३२५।५९ | प्रभव. खलु (किरात २ १२) १५१।३९० |
| प्रजाना धर्मसङ्घ (वे २७) १४९।३०० | प्रत्यस्मै पत्रनिश्चयै (सु ७८४) २३६।३ | प्रभवति मनसि (प्रब ७) २५१।१८ |
| प्रजाना (पच १ २४०) १४९।२९० | प्रत्यग्रोन्मेष (मुद्रा ३ २१) १५।४९ | प्रभाते पृच्छन्ती ३२८।१३ |
| प्रजापीडन (याज्ञ. १ ३४०) १४५।१२३ | प्रत्यङ्गमङ्कुरित (प्र राघव १ ७) ३२।१ | प्रभुप्रसाद (पच १ ५५) १४८।२६२ |
| प्रजावृद्ध धर्म (मा.५ १५५) ३७७।३० | प्रत्यङ्गर्णं प्रति २२८।२१२ | प्रभुप्रसादे (शा प १५२०) १५४।७४ |
| प्रज्ञया (मा ३ १४०७९) ३८१।१६० | प्रत्यङ्गमस्यामभि (नै ७ १९) २७०।२३ | प्रभुभि पूज्यते(भोजप्र.६८) ८१।१९ |
| प्रज्ञया वा विसारण्या ९०।३ | प्रत्यार्थिवामनयना १३३।८ | प्रभुर्विवेकी धन १७३।८५१ |
| प्रज्ञागुप्त (भोजप्र १५) १४५।१३६ | प्रत्यहं प्रत्य (शा प १४२१) १५३।२ | प्रभूतमल्प (चाणक्य ६७) १६२।३९८ |
| प्रज्ञातृतीयोग्रवि १२३।२ | प्रत्याख्याने च (हि १ १३) १६३।४३७ | प्रभूतवयस (वृ श. २३) १६९।६८० |
| प्रज्ञावास्त्वे(मा ३ १५३८३) ३८९।४९७ | प्रत्यादिष्टविशे (सूक्ति ४२ ५) २७४।७ | प्रश्रश्यच्युति ११२।२६७ |
| प्रज्ञाशरेणा (मा ५ १३९१) ३९३।६३९ | प्रत्यावासक १०९।२१४ | प्रभ्रष्टै सरभ (शिशु ८ ४९) ३३९।१०६ |
| प्रणतिमिरपि ३४३।१०२ | प्रत्यावृत्तं (शिशु १८ ५५) १३०।८६ | प्रमदा मदिरा १६०।३२५ |
| प्रणमत्युन्नति (हि २.२७) ९७।१४ | प्रत्यावृत्य यदि ३५६।२८ | प्रमाणाभ्यधिक(पच १ ३१८)३९०।५३० |
| प्रणयकुपितप्रिया ४।२० | प्रत्यासत्ति (राजत.४.३५४) ३७७।२७ | प्रमादिना (पच १ १६७) १४९।२८६ |
| प्रणयकुपिता दृष्ट्वा (दश रू ४.६०) ५।४४ | प्रत्यासन्नतुषारदीधिति १४१।९ | प्रमोदं जनय १९५।५२ |
| प्रणयकोप (शिशु ६ ३८) ३४१।४४ | प्रत्यासन्न (सूक्ति. ६५ २६) ३४२।७७ | प्रमोदे खेदे ४४।५ |
| प्रणयमधुरा (भर्तृ सं २७३) ३९१।५८६ | प्रत्यासन्नविवा (सूक्ति २.३७) १२।२८ | प्रम्लाना (सूक्ति. १५ ७) २२२।३५ |
| प्रणयादुप (हि. ४ १०) ३९१।५५० | प्रत्यासन्नसुरेन्द्र ३२५।५८ | प्रयच्छति चम (सु १९०) ३१।३७ |
| प्रणिपातेन (काम नी.३.३२) ३९२।५९१ | प्रत्यासन्ने (शिशु १८ २८) १२९।७० | प्रयच्छतोञ्चै कु(किरात ८.१४)३५७।४५ |
| प्रत्युपकुर्वन्मूर्ख (सु.५१५) ७०।२४ | प्रयत्ने समके (वृ. श ७०) १६९।७०२ |
७ सुभा०अनु०
| ५० | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
|---|
| प्रयत्नै रस्तोकैः परि | ४३।६ | प्रहरति न पञ्च (शा प ५०६) | १८४।५ | प्रातर्नीलनिचोलमच्युत | २५१।७५ |
| प्रयाणे तव | १२५।१ | प्रहरविर (अमरु १२) | ३२९।११ | प्रातर्मूत्रपुरीषा (सु ३३३६) | ३६७।१९ |
| प्रयाति शमनं (पञ्च ३ ३१) | ३९१।५६३ | प्रहरिष्यन्प्रियं (शा प १४२९) | १५३।८ | प्रातर्हन्त कृतापराधोऽपि रज | ९९।२८ |
| प्रयातुमस्माक (नै १ ६९) | १२३।४ | प्राकारगोपुरा (शा प १५६५) | १४३।३८ | प्रातिभ त्रिसर (शिशु १० २२) | ३१५।१५ |
| प्रयातेऽस्तं भानौ (सु १०९०) | २७५।२८ | प्राक्पादयो (हि १ ८१) | ६०।२३५ | प्राथमिकी घनवृष्टि प्राप्ता | २१४।४ |
| प्रयाहि तत्रैव | ३०९।२ | प्राकृतो हि (भा १२ ४२१७) | ३८९।४७२ | प्रादुर्भवन्ति वपुष (प्रब ९३) | ३७१।१२९ |
| प्रयोगव्युत्पत्तौ प्रति | ३४।१ | प्रागल्भ्यं पुरुषा | ३०१।२१ | प्रादुर्भूते नवजलधरे त्वत्पथं | २८९।५६ |
| प्रयोजनेषु ये (भा ५ २४४१) | ३८०।१४२ | प्रागल्भ्य प्रयय | २४८।७६ | प्रादुष्यातपण्डिताना कवि | ४२।७७ |
| प्रलयसहायकरा (शा प ५१०) | १८१।२४ | प्रागल्भ्यहीनस्य (ज्योतिस्तत्त्व) | १७३।८५६ | प्रापितेन चटुकानुविडम्ब | ६९।१९ |
| प्रवसतः (शिशु ६ ३०) | ३४१।३६ | प्रागेतद् (नै १२ ९३) | ११०।२४६ | प्राप्तं प्राज्यमिव श्रम | ३३५।१३४ |
| प्रवातान्नीलोत्पल (कुमार १ ४६) | २५९।७७ | प्राज्ञा मेति ततो (भर्तृ १ २५) | ३१।७७ | प्राप्तमदो मधुमास प्रबला | १९४।३७ |
| प्रविश झटिति (शृं ति ६) | २६२।१९३ | प्राची वासकसज्जिकामुपगते | ३२५।६१ | प्राप्ताविद्यार्थ (पञ्च १ ४३२) | ३९०।५३२ |
| प्रविष्टं सर्वं (र २.१२२ २०) | ३९१।५५५ | प्राचीकुङ्कुमतिल (प्र राघव ७ ९०) | २७।४ | प्राप्तव्यमर्थ लभ (पञ्च २ १३३) | ९२।४९ |
| प्रवीणे पाक्पदु (शा प १३३५) | १४४।७४ | प्राची दिगम्बरमणौ दयिते | ३२३।१० | प्राप्ता श्रिय (भर्तृ ३ ६८) | १७६।९४९ |
| प्रशस्त्यायुक्त | १९४।३२ | प्राचीनाचलचुम्बिचन्द्र | ३०२।११६ | प्राप्ता जरा (शा प ४१६५) | ३७४।१९६ |
| प्रशान्त (किरात ८ २८) | ३३८।७३ | प्राचीभागे सरागे धरणि | ३०३।१२२ | प्राप्तानपि न (सूक्ति ९ १९) | ७२।३७ |
| प्रशान्ते नूपुरा (शा प ३६९६) | ३२०।१ | प्राचीमहीधरशिलाविनिवे | ३४३।११० | प्राप्तार्थग्रहणं द्रव्य (हि २ १०३) | १४२।२४ |
| प्रसत्तेर्य. पात्रं | ३१।४१ | प्राचीमालम्ब (प्र राघव २.३३) | २९५।७० | प्राप्ताज्ञासात्पिपासातिशय | १३३।४४ |
| प्रसङ्गा (सु १४७) | ३९२।५९३ | प्राचीविभ्रमकर्णिकाकमलिनी | ३२५।५६ | प्राप्ते भये परि (पञ्च २ १९३) | ३९०।५२६ |
| प्रसरति (पञ्च ३ २४५) | १७७।९९४ | प्राचेतसस्यापसराशराधा | ३७।६६ | प्राप्ते वसन्तसमये (सु ७९४) | २०२।९४ |
| प्रसरदल (सूक्ति ६१ २७) | ३४३।१०५ | प्राज्ञो वा (भा १२.५७१७) | ३८९।४६७ | प्राप्यं कार्यं गरी (र ५ ८४) | ३८८।४६० |
| प्रसह्य मणिमुद्धरे (भर्तृ. २ ४) | ४०।५६ | प्राञ्जलावपि (किरात ९ १०) | २९४।२९ | प्राप्य चलानधिकारा | १७०।७४० |
| प्रसाद कुरुते (हि ३ १९) | ३७७।२८ | प्राज्ञे नियोज्य (चाणक्य ८५) | १४६।१७८ | प्राप्यते गुणव (किरात ९ ५८) | ३१५।५० |
| प्रसाद्माधुर्यगुणौ | ४९।१६७ | प्राज्ञो हि जल्पता | ३८।६ | प्राप्यते स्म (शिशु १० ७८) | ३१९।२१ |
| प्रसादग्म्य (किरात ११.३८) | ८५।३ | प्राणवद्रक्ष्ये (पञ्च ३ १२२) | ३९२।६०७ | प्राप्य नाम्नि (शिशु १० ६०) | ३१७।२१ |
| प्रसादे व (सूक्ति ५७ २३) | ३०६।४४ | प्राणब्रुवन्त्येव (भाग ११ ७) | ३८५।३०९ | प्राप्य प्रमाणपद (भोजप्र १३४) | २४७।६९ |
| प्रसादो (सु.२७८५) | १४६।१५८ | प्राणघातान्नि (भर्तृ २ ६०) | १८०।१०५६ | प्राप्य मन्मथर (शिशु १० ८०) | ३१९।२३ |
| प्रसादो नि (भोजप्र ४७) | ३७७।२९ | प्राणातिपात (भा १२.५८४) | १५४।३९ | प्राप्य वित्त जडास्तूर्ण (दृ श ४४) | ५५।७७ |
| प्रसाधिकाल (रघु ७ ७) | १२६।३३ | प्राणत्यागे (पञ्च २ १७८) | ३९१।५८३ | प्रांभ्रश्राद्विष्णु (का प्र ७ १७४) | १८८।४३ |
| प्रसारणपरै करै. | ३०१।८७ | प्राणाना च (शा प ३०८९) | २५१।६ | प्रामाण्यं स्वत एव नैव | १०९।२१५ |
| प्रसारितकरे (शा प.११३८) | ३९१।५७६ | प्राणाना बत कि (शान्ति १ १८) | ७४।४३ | प्रामाण्यं परत खतोऽपि | १०९।२१६ |
| प्रसार्य (शा प.३८७८) | ३४२।७४ | प्राणा यथात्मनो (हि.१ १२) | १६३।४३६ | प्रामाण्यं परतो न शक्ति | ११७।९९ |
| प्रसीदेति (रत्ना.२.१९) | ३०६।४५ | प्राणायामोपदेष्टा सरसिरुह | ३०२।११८ | प्राय कार्ये न मुह्यन्ति | १९९।१२ |
| प्रसूतकलिका | ३३३।९० | प्राणेश तव विरहिणी हिम | २८७।६ | प्राय काव्यैर्गमितवयस | ४३।५ |
| प्रसूनबाणाद्वय (नै ७ ४८) | २६३।२२१ | प्राणेशमभिस (शा प ३६१२) | २९८।५ | प्राय. कुकवयो लोके | ३७।४ |
| प्रसूनशृङ्गै (शा प.३७९१) | ३३१।१६ | प्राणेश विज्ञाप्ति (शृ.ति.१७) | ३३०।४ | प्राय. खलप्रकृतयो (सु ४०२) | ५८।१७७ |
| प्रस्ताव (चाणक्य.१४.१५) | १५८।२५० | प्राणेशेन प्रहितनखरैश्छिन्न | ३२८।४ | प्राय परोपतापाय (सु ३५१) | ५६।९३ |
| प्रस्तावे हेतुयुक्तानि | ३२।२ | प्राणेश्वरपरि (काव्या सू. १५) | १७३।३०३ | प्राय प्रकाशता याति (सु ३५०) | ५६।९२ |
| प्रस्थान (अमरु.३५) | ३२९।२१ | प्राणेश्वरे किमपि जल्पति | ३२९।९ | प्राय प्रकुप्यतितरा (दृ श ३०) | ५५।७६ |
| प्रस्थाने तव | १२५।१८ | प्राणैरपि हिता वृत्तिरद्रोहो | ८८।१७ | प्राय सन्त्युप (दृ श ६) | १६८।६७० |
| प्रस्फुरत्प्रचुर | ३३२।७३ | प्रात क्षालितलोचना कर | ९६।५ | प्राय स्वभावमनिलो (सु ४४२) | ६०।२४३ |
| प्रस्वेदमलदिग्धेन (सु.३३४२) | ३६६।१ | प्रात प्रात समुत्थाय द्वौ | १९३।२ | प्राय स्वभावं (दृ. श ८०) | ४६।६५ |
| प्रहरकमपनीय (शिशु ११.४) | ३२३।२२ | प्रातः प्रातरुपा (अमरु ३३) | ३५६।१९ | प्रायश्चरित्वा वसुधा (कुव ११०) | ३२५।९ |
| प्रात. सीमन्ति (शा.प.३७३१) | ३२६।३२ | प्रायश्चित्त न गृहीतस्तन्वङ्ग्या | २६४।२५२ |
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः ५१
| प्रायेण धनिनामेव (शा प ४३४) ६९।७ | प्रिये सदा पूर्णतरं मनोहरे ३१३।४० | बकुलमालिकायापि २८४।१४ |
| प्रायेण नीचलोकस्य क १९९।२७ | प्रिये सलीलं (किरात ८ ४९) ३३८।९२ | बकोट ब्रूम (शा प.८९१) २२९।२२८ |
| प्रायेण श्रीम (भा ५ १।४५) ३९०।५४३ | प्रियो मयैवावचित्ते प्रसूनै ३५२।२३ | बङ्गालिदाम भवतः शुभ ११६।६७ |
| प्रायेण सुकरं (शा प ३९६२) ३६०।२ | प्रीणाति य (भर्तृ स २७९) ३७८।४७ | बत सखि (का प्र १० ४३१) २८४।२१ |
| प्रायेणात्र (पच १ ४४८) १७९।१०२३ | प्रीतिं न प्रकटीकरोति (सु ४९३) ७२।६० | बदरामलका (भामिनी शु ८) २६५।२८५ |
| प्रायो दुरन्त (प्र राघव५ ४९) १५८।२३५ | प्रीतिं वस्तुगुना हरि कुत्र २५१।७६ | बद्धकोपोविकृती (किरात.९ ३४) ३१६।५६ |
| प्रायो यत्किंचिदपि प्राप्नो ८६।९ | प्रीतिर्लक्ष्मीर्व्यय क्लेश १५७।१८४ | बद्धकोशमपि तिष्ठति २९४।१८ |
| प्रारभ्यते न (मुद्रा २ १७) ३९०।५४८ | प्रेक्षणीयकमिव (शिशु १० ८२) ३२९।८ | बद्धा मणिम (पार्वती ५ १५) २६८।३८० |
| प्रारब्धे रति (शा प ३६९७) ३२०।१७ | प्रेङ्खणप्रेक्षणालापान्कुर्वत्य २५३।७ | बद्धा यदर्पणरसेन ४०।५२ |
| प्रारब्धे विपरीतनामनि रते ३२०।१९ | प्रेङ्खद्भाजितरगमुन्मदगज २७२।२ | बद्धा पद्मासनं यो नयन २६।२०७ |
| प्रारम्भतोऽतिविपुलं (सु ४२३) ५८।१९३ | प्रेम सत्यं तयोरेव १६०।३१४ | बद्धा हियोमा त्रिवली गुणेन २६६।३१८ |
| प्रारम्भे (भामिनी. अ. ४६) २२४।१०९ | प्रेमार्द्रा (मालती.५ ७) २८०।९३ | बधिरयति कर्णविवर वाचं ६४।१२ |
| प्रालेयमिश्रमकर (वेणी २ ७) ३२३।१३ | प्रेमैव मास्तु यदि चेत्पथि ५०।१९३ | बन्दीकृस्य (का प्र ५ ११९) ११२।२६८ |
| प्रालेयलेशमिश्रे (पच ३ २३९) ३९१।५८२ | प्रेम्णोऽामितरेवतीमुख २६१।९६ | बन्दी (भर्तृ स ६१२) १८०।१०५२ |
| प्रालेयशैल (शा प ३९२५) ३४६।२३ | प्रेरयति परम (शा प ३६४) ५७।१३१ | बन्धं लब्धत परस्य २२८।२२२ |
| प्रावारैरङ्गारैर्गर्भ (शा प ३९३७) ३४७।१ | प्रेरितः शश (किरात ९ २८) ३००।४४ | बन्धनस्थो हि (शा प.१२०९) २३१।५८ |
| प्रावृषि शैलश्रेणीनितम्ब २१२।२१ | प्रेषिक. प्रैष्यक (शा.प ४०६४) ३६४।९ | बन्धनानि (चाणक्य १५ १७) ३९०।५११ |
| प्रावृषेण्यस्य (शा प ७६८) २११।१ | प्रेषितस्य कुतो (चाणक्य ६१) १६२।३९२ | बन्धु को नाम (हि २ १७४) १६४।४९३ |
| प्रासस्रोतप्रवीरोल्बणरुधिर १३१।१२३ | प्रोज्वलज्वलनज्वाला १९।६३ | बन्धुत्याग (काव्या ३ १४७) ३८१।१५७ |
| प्रासादीयति वैणवादिगहन २५०।२२ | प्रोद्यत्प्रौढार (शा प ३९२४) ३४६।३३ | बन्धुलीकृत्य (हि २ ८०) १६४।४८३ |
| प्रासादे सा दिशि (अमरु १०२) २७९।६५ | प्रोषितवति (प्र राघव ५ ५) २१०।१० | बन्धुकद्युति (शा प ३६५८) ३१४।६८ |
| प्रियकृतपटस्येय (अमरु ११५) ३२१।१९ | प्रौढमौक्तिकरुच पयोमुचा ३४१।४८ | बन्धूकबन्धनुभव २६१।१४९ |
| प्रियतमेन यया (शिशु ६ ५७) ३४६।१८ | प्रौढच्छेदानुरु (छलितराम) ३६५।११ | बन्धूकबन्धुरधर (प्र रा २.८) २७१।३२ |
| प्रियप्राया (उ रामच २ २) ५१।२३७ | प्रौढिं धत्ता कलासु प्रथ १२१।१६५ | बन्धूना सुहृदा चैव १६६।५८१ |
| प्रियमनु (राज त ४ ३२१) ३९१।५९९ | प्लवन्ते धर्मे (भा १३ २२) ३९१।५५९ | बभूव वल्मीकभव कवि. ३६।४२ |
| प्रियमेवा (काम नीति.३ २६) ३७८।४४ | बर्बरेश्च तपस्वी (शा प १४९६) १५४।५९ | |
| प्रियवसतेरपया (सूक्ति ८२ १३) ३२३।४ | फ | बर्ही रौति बका (शा प ३८८७) ३४३।८८ |
| प्रियवाक्य (चाणक्य १६ १७) १५५।८३ | फणीन्द्रेस्ते (कुव ६३) १०२।३५ | बलमार्तभयो (रघु ८ ३१ ) १०४।८६ |
| प्रियविरहमहो (विद्ध ३ २३) २८५।४८ | फल कतक (मनु ६ ६७) ३९०।५२५ | बलवदपि (किरात १० ३७) ३३६।१४ |
| प्रियसखि न तथा पटीरपङ्के २८४।१८ | फल दूरतरे (शा प १०४८) २४२।१७३ | बलवानपि (किरात २.३७) १६४।४९२ |
| प्रियसखि विपद् (शा प ४५१) ९३।८६ | फलं धर्मस्य (शुक ४०) ३९०।५३८ | बलाङ्गीतो (शा प ३६७८) ३१८।११ |
| प्रियसखीसदृशं (शिशु ६ ८) ३३२।६३ | फल स्वेच्छाल् (भोज २७०) ७२।५४ | बलि पातालानिल (भोज २२१) १०१।७ |
| प्रियस्य सुहृदो (मालती ९ ४१) ३६१।७ | फलतीह (पच ५ ९) ३९०।५२८ | बलिकर्णदधी (शा प १२२९) १०२।१७ |
| प्रियदर्शनमेवास्तु (सूक्ति ४९ २) २०३।१ | फलहीनं नृपं (पच १ १६३) १४९।२८१ | बलिना सह (काम नी ९ ४९) १४८।२३२ |
| प्रिया न्याय्या वृ (भर्तृ २ ६१) ५२।२४८ | फलाना च दलाना च २२२।४२ | बलीयसा हीन (पच ३ १२६) ३७७।२२ |
| प्रियामुखीभूय सुखी सुधांशु २६१।१५२ | फलायते कुचद्वन्द्वमिय २७०।४ | बलोपपन्नो (पच ३ १११) ३७७।२३ |
| प्रियाया (सूक्ति ४३.१८) ३२१।२२ | फलार्थी (पच १ ३७८) १४९।२९२ | बल्लाल क्षोणिपाल (भोज ६४) ११६।६८ |
| प्रिया वा (महाना ९ १५) ३८८।४५७ | फलाशिनो मूलतृणाम्बु ६७।४९ | बल्हबलसमर्था मेघनादा १८४।४१ |
| प्रियाविरहितस्या (सूक्ति ४२ १) २७४।१ | फलितस्य रसालशाखिन २३९।१०५ | बहव. पन्नवोऽपीह (सु.२२५५) ७८।२ |
| प्रियासखीभूतवतो मुदं २६९।४१६ | फुलेषु य कम (शा प ८२५) २२३।८० | बहवोऽविनया (म.५.४०) ३९३।६६५ |
| प्रिया हिता (पच.१ ३२) ३७८।५७ | फेनमा (भा १२ १२०५०) ३८८।४५५ | बहि सर्वा (मालती.१ १७) १७७।९७८ |
| प्रियेण संप्रथ्य (किरात ८ ३७) ३३८।८० | बहिरतिनिर्मलरूपं २४७।६३ | |
| प्रियेण सिक्ता (किरात.८.५४) ३३८।९७ | ब | बहिर्न लोला दृगपाङ्ग ३५१।२८ |
| बककोयष्टिमिरुष्टे पल्वले २२।७ | बहु जगद पुर (शिशु ११.३९) ३२८।११ | |
| बकुलकुलमिलन्मिलिन्दमाला ३३२।७५ |
५२ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| बहुतरहृते रसातलं १७०।७४३ | बाहू द्वौ च मृणाल (शृ ति १) ३७८।५५ | ब्रह्मघ्ने च सुरापे (पंच ४ ११) ७५।१ |
| बहुधा बहुभि (पच ३ ७५) ३९०।५४० | बाहू प्रियाया जयता मृणा २६४।२२८ | ब्रह्मघ्नोऽपि नर (चाणक्य ८२) ६४।४ |
| बहुधा राज्यलाभेन यस्तो १०१।९ | बिडालभक्षिते दु ख ३७२।१६३ | ब्रह्मज्ञान (भर्तृ ३ १४) ३७५।२२४ |
| बहुनात्र किमु (शा प ३५०६) २९२।२ | बिडौजा पुरा पृष्टवान् १००।३ | ब्रह्म नान्तमपि १८७।२४ |
| बहुनिष्कपद्रोही बहुधा ५४।१३ | बिन्दुद्वन्द्वतरङ्गि (सूक्ति.४.१०६) ३५।२९ | ब्रह्महत्या (मनु ११ ५४) १५४।४७ |
| बहुभिर्न (पच ३ ११९) १६५।५६५ | बिभर्ति वदनेन किं क २०३।१०३ | ब्रह्माण्ड कियद ८०।४३ |
| बहुभिर्बत (शा प २०८५) १४५।१९३ | बिभेति पिशुना (सु ३७८) ५६।१०८ | ब्रह्माण्डं प्रवि १२६।३० |
| बहुभिर्मू (वृ चाणक्य ७ ११) १६९।७१६ | बिभेषि सखि (शा प ३४३३) २८३।२ | ब्रह्माण्डकुम्भकारं १६।५९ |
| बहुनामप्यसा (सु २७४२) १४४।८३ | बिभ्रतौ (शिशु १० ८) ३१४।११ | ब्रह्माण्डच्छत्र (दशकु. पू १) २०१।६६ |
| बहूनामल्पसाराणा (भोजप्र १४५) ८३।३ | बिभ्रत्पाथ कपर्दे सुर ८१।१७ | ब्रह्माण्डमण्डली (भर्तृ स २८४) ७९।३ |
| बहूनि नरशीर्षाणि (सु १४४) ३९।२३ | बिभ्राणा गरलं कण्ठे भुजंग ५५।५२ | ब्रह्माण्डसपुटक्लेवर २७।८ |
| बह्वपि स्वेच्छया (शिशु २ ७२) ८४।५ | बिभ्राणा हृदये (कुव.१५५) २९०।८४ | ब्रह्मा दक्ष कुबेरो (सु ८३) ९।१९ |
| बह्वाशी स्वल्प (चाणक्य ६९) १६२।४०० | बिभ्राणे त्वयि (शा प ११६०) २४५।४ | ब्रह्मादयोऽपि ९१।०८ |
| बाणं हरिरिव कुरुते सुजनो ४७।९७ | बिभ्राणोऽभिनवे (सूक्ति २ ७२) १८।३५ | ब्रह्मानन्दप्रचुरं ३१८।४ |
| बाणकरवीरदमनकशत १०३।६९ | बिम्बाकारंसुधा (भर्तृ स ६१२) १९४।१५ | ब्रह्मा येन (गरुड अ ११३) ९३।९८ |
| बाणाः पञ्च (रत्न ३ १) २८२।१४१ | बिम्बितं मृतपरि (शिशु १० ५) ३१४।८ | ब्रह्मा विष्णुदिने ३७३।१९३ |
| बाणाशिक्षा (शिशु १८ ५६) १३०।८७ | बिम्बोष्ठ एव (नवसाहसाङ्क ) ३१२।९ | ब्रह्मैव सत्यमखिल ३५२।२९ |
| बाणाग्निमस्तकरुणे विकिरण् २८२।१३५ | बिलाद्वहिर्बिलस्यान्त ३६४।१४ | ब्राह्मण ब्राह्म (भा ५ १४२५) ३९०।५२० |
| बाणान्सहर (विद्ध १ २२) २८२।१४३ | बिसमलमशनाय खादु पाना ६०।२४६ | ब्राह्मण (हि.० ९६) १४७।२०२ |
| बाणेष्वारोप्य गुणान्विधाय ६५।१६ | बीजं चिन्तामणिश्चेत्क १२२।१६७ | ब्राह्मण (भा ३ १४०७५) ३८०।१२१ |
| बालक्रीडनमिन्दुशेखर २१।८७ | बीजं चेदिन्द्रदन्तिस्फुरित १३८।८५ | ब्राह्मणा गणका १५६।१३१ |
| बालक्रीडनमिन्दुशेखर १२१।१५३ | बीजैरङ्कुरितं (शा प ८५६) २२६।१६३ | ब्रूत नूतन (दश २ १३) ७९।२ |
| बालया वा (मनु ५ १४७) ३५१।१५ | बीभत्सा (शान्ति १ ७) ३७६।२५७ | ब्रूतेऽन्यस्या (शा प २४२) ३८८।४५० |
| बालसखित्वमकारणहास्यं १७४।८९५ | बीभत्सा (शान्ति १ २०) ३७०।९३ | ब्रूते सप्रति (शा प १२५६) १२२।१८२ |
| बालस्यापि रवे (पचं १ ३५७) ७८।१ | बुध कीटग्वचो ब्रूते २००।३० | भ |
| बाला चन्दन (शा प ३५२९) ३०५।२ | बुधामे न (भोजप्र १२८) १६१।३६७ | भक्तं रक्तं (शा प १५१७) १५४।७२ |
| बालाटाक्षसूत्रितमसती ३७।१५ | बुद्धिं वर्धयति श्रियं वित ८७।३६ | भक्ताना (पच १ ३०७) ९७।१७ |
| बाला तन्वी (सु १४०१) ३१७।२ | बुद्धिप्रभाव (भा ५ १३७४) ३८२।२३५ | भक्ति प्रेयसि (शा प.३७५६) ३५१।३५ |
| बालातप (गरुड पू १०८) ३८२।४८५ | बुद्धिमन्तं (भा १२ ६४९८) ३८३।२३७ | भक्तिप्रह्वविलोकन (रसगगा २ ७) १५।३२ |
| बालादपि (हि २.७९) १६४।४८२ | बुद्धिमत्त्वाभि (वृ श.६९) १६९।७०० | भक्तिप्रह्वाय (शा प १३८) २७।१२ |
| बाला मामियमित्छतीन्दुवद ३७२।१३५ | बुद्धिरूप (प्रसगा.१३) ३८३।२३९ | भक्तिर्भवे (का प्र १० ५२४) ४८।१२६ |
| बालिकारचितवस्त्रपुत्रिका ३७५।२४१ | बुद्धिर्या सत्त्वरहिता (सु ५१२) ७०।२० | भक्ते द्वेषो जडे (शा प ३४१) ६४।४ |
| बालिशस्तुनरो (र ४ ७ १०) ३९३।६३६ | बुद्धिशस्त्र. (शिशु २ ८२) १४६।१८४ | भक्तो गुणी (हि २ १६) १४४।७१ |
| बाले तवाधरसुधारसपान ३१३।४९ | बुद्धिश्च हीयते (भा ३.३०) ३७९।७० | भगवदनभ्युपगमनं ४३।१ |
| बाले नाथ (अमरु ५७) ३०९।७ | बुद्धिश्रेष्ठा (मा ५ १०५६) ३८३।२४० | भगवन्तौ (शा प ४४०) ९०।५ |
| बालेन्दुवक्राण्य (कुमार ३ २९) ३३१।२६ | बुद्धेरगोचर (शान्ति ३ १४) ३६८।३६ | भगिनि (सूक्ति ३९ ७) २८६।१४ |
| बाले बाला विदुषि विबुधा १७८।१००५ | बुद्धौ कल्ल (भा २.२६८०) १६६।६०३ | भगीरथाय (शा प ४००३) ३७४।१९७ |
| बाले मालेयमु (शा प ३८२९) ३३६।३१ | बुभुक्षित किंन (पच ४ १६) ३९०।५४२ | भग्नकुम्भशकल्येन ५९।२१५ |
| बाले ललामले (शा प ३२९३) २५८।४१ | बुभुक्षितैर्व्याकिर (भर्तृ सं.६२१) ६४।११ | भग्ना वयं (सु ३१७९) ६७।५१ |
| बालोऽपि नावमन्त (मनु ७.८) १४२।८ | बृहत्सहाय (शिशु २ १००) ८७।१९ | भग्नाशस्य (भर्तृ २ ९२) ९४।१०९ |
| बाल्ये गेहपतौ निमीलति २५६।४८ | बोधयन्ति न (शा.प.२७४) ७१।९ | भग्नासु रिपुसे (शा प १२४४) १०२।१९ |
| बाष्पाकुलं प्रलपतोर्गृहिणी ३२९।३ | बोधितोऽपि बहुसूक्तिवि ५९।२११ | भग्नेर्दण्डैरात (शिशु १८ ६७) १३०।९६ |
| बाहुपीडनकच (शिशु १० ७२) ३१८।१५ | बोद्धारो (भर्तृ.३.२) ३९०।५३६ | भङ्क्त्वा (शृगाररसाष्टक ५) २९६।१३ |
| बाहुवीर्यं (वृ.चाणक्य.६.११) ३८६।३५९ | भञ्जकीर्तिमपीम १३४।१७ | |
| बाहू तस्या कुचाभोग २६४।२२७ |
सस्थाननिर्देशसमनुक्रमकोशः
५३
भजन्त्यास्त (शा प ३६८.१) ३९।१३३
भण्डस्ताण्ड (सु ४६३) ६२।२७९
भद्रं तस्य तरो (शा प ३७७.१) ३५३।४५
भद्रं ते सदृशं (शा प ५८.१) २०८।३२
भद्रं भद्रं (नीतिरत्न ११) २२५।११८
भद्रामनो (रसगंगा २ श्लो) १०५।१४१
भद्रात्र ग्रामके (शा प ३८९५) ३४३।१६
भद्रे वाणि ममान (सु ३१९४) ६७।६९
भयं ताव (मुद्रा ५ १२) १३९।४
भयं प्रमत्तस्य (भाग ५ १) ३८९।४९०
भयादिवाश्लिष्य ३३८।८२
भयेन कृष्णान्यर्ह १२६।२८
भये वा (पच १ ११८) १६८।५०४
भर्ता देवो (दर्पदल ५८) १५६।१४५
भर्ता यद्यपि (भर्तृ स ६२५) ३५०।७९
भर्तारं किल (र २ २९ २०) ३८८।४६३
भर्तु पिण्डानुण (शा प ३९६१) ३६०।१
भर्तुर्यस्य कृते ३०९।१४
भर्तृभि प्रणय (किरात ९ ५४) ३१५।४६
भर्तृषुपसखि (किरात ९ ६६) ३१६।५८
भल्लैर्भिन्ना प्रति १३१।१९६
भवत इवाति १९६।८
भवतामहमिव १०३।६६
भवति गमनयो २०३।९८
भवति जघिनी २०३।९९
भवति (मालती. १० १५) ३१०।१
भवति (वासव ४) ४७।१०२
भवति (शा प १००८) १७७।९७६
भवतु विदितं (अमरु ३०) ३५६।१६
भवतु विदितं (सु १६१७) २९१।१४
भवत्कृते खञ्जन ३१२।३५
भवत्तुरगनिघुर १३०।१११
भवत्येकस्थले १६७।५३०
भवत्या विश्लेषे २९२।१६
भवनभुवि (विद्ध ४ १२) २६०।१०७
भवनमिव मदीयं ३५४।७७
भवनेत्रभवो २८२।१२४
भवने सुहृदो (पच २ १७) ३८९।४७६
भवनोदरेषु परि(शिशु ९ ३९) ३००।६४
भवन्ति ते ८५।१०
भवन्ति नम्रा (भर्तृ २ ६२) ७५।११
भवन्ति नरका (कुव १०४) ६९।५
भवन्तो वे (भर्तृ १ ५२) २५२।४८
भवबीजाङ्कुरजल (सु २६) १।९
भवभूतिमानाम्य (शा प १७८) ३६।३८
भवभूते सवन्वा ३६।३२
भवानिशकरोमेश १९५।४५
भवान्दि भगवा १०२।३०
भवितव्य (विक्रम १४८) ९१।२२
भवितव्यं यथा ९१।३०
भवित्री र (महा ना १० १२) २०५।९
भवेत्खपर (हि २ ३४) १४४।७८
भस्मनि स्मररिपो २४५।१
भस्मना (वृ चाणक्य ६ ३) ३८९।५३०
भस्माङ्गलिर्बको (शा प ४०६३) ३६४।८
भस्मान्धोरगफूत्कृति ५।६०
भस्मीभूत २८४।२९
भस्मोद्धूलन (कुव १२१) ३७०।८६
भागीरथी (कुमार ११ ३) २००।३६
भाग्यवन्तं (शा प ४४२) ९०।२
भाति निर्विवरे २६४।२५४
भाति रोमा (सूक्ति ५३ ६६) २६७।३४०
भाति विन्यस्तक (शा प ३२८७) २५७।२
भानु नाम (शिशु १० ८६) ३२१।१२
भानुबिम्बमिद २९४।११
भानो. पादैर्दहन ३३७।४१
भानो शीतकरस्य ४४।६
भानावभ्युदिते ३०२।१०
भानुर्वै जायते १९४।३६
भारं स (मा १२ १११४१) ३९२।६१७
भारत चेक्षुदण्डं २०५।१
भारत्या वदनं १३६।४७
भार्या पति (भा १ ३०२४) ३९०।५१७
भार्या हि (भा १२ ५५०६) ३९३।६४१
भार्या पुत्र (म ८ ४१६) ३७८।५६
भार्याविन्त (भा १ ३०२९) ३७८।५३
भार्यावियोग (चाण ३ १४) १७२।८२७
भाषासु मुख्या २९।१
भासते प्रति (का प्र ९ ३८७) २०५।१०
भासो रामिलसो (शा प १८८) ३७।६९
भास्वत्कर्कश ३०३।१२९
भास्वतकुण्डलमणि २५९।६९
भास्वद्वंश (प्र राघव १ ९) ३६।५२
भास्वाश्वततरू ३३०।७
भिक्षवो रुचिरा १९६।११
भिक्षार्थी स (कुव १५९) १३।४७
भिक्षाशनं (भर्तृ ३.१६) ७६।३७
भिक्षाशनं (शान्ति.१.२३) ३७५।२४३
भिक्षाहार (भर्तृ ३ २१) ३७०।१०१
भिक्षितकमल ३२५।५
भिक्षु कास्ति १२।४२
भिक्षुश्वोऽपि सक्लेप्सित ४।२७
भिक्षुद्वारि ११२।२७२
भिक्षो कन्था (सु २४०२) ६२।२८०
भिक्षो मास (दश ४ ७५) ६१।२७१
भित्त्वा (शिशु १८ २०) १२९।६७
भित्त्वा सद्य (मेघ २ ४४) २९२।२६
भिनत्ति (नीतिरत्न ७) २३०।२२
भिन्दन्नरातिहृदयानि (सु ४७) १६।४४
भिन्दानो (शा प ३८१४) ३२५।६६
भिन्ना महा (भामिनी अ १००) २३०।२९
भिन्ने चित्ते १६७।६३६
भिद्योरस्कौ (शिशु १८ ६५) १३०।९५
भिषजो (मा १२ ५१८४) ३८८।४४२
भीतवत्स (भा १ ५६२२) ३७७।१०
भीतासि नैव ३५५।२३
भीतिर्नास्ति भुजंगपुगव ५।५५
भीतो वाडववासतो २११।४९
भीमं यज्जलधिं १२०।१४०
भीमं वनं (मर्तृ २ ९९) ९२।७४
भीमश्यामप्रतनु (शा प ११४७) २२०।९
भीमभीमशुभ्रै (शा प ५००) १८१।१६
भुक्तं खाडुफलं (शा प ९७९) २३६।२०
भुक्तानि यैस्तव (शा प ९८०) २३६।१३
भुक्ता मृणा (भामिनी अ ४५) २२१।२३
भुक्तिमुक्तिञ्च (का प्र ४ ७८) ८७।१४
भुक्त्वा भव्य २३४।१२२
भुजभ्रूयुगलै १३१।१९८
भुजालंकं (प्र राघव ७ १५) ३०६।२७
भुजगकुण्डली व्यक्त ३।५
भुजंगभोग (काव्या ३ ३४६) १०१।१०
भुजतरुवनच्छाया (राजत १ ४६) ३३१।४५
भुजपञ्जरे (भामिनी शृ ३७) ३१।८४
भुजप्रभादण्ड २२१।१७
भुज्यन्ते खगहस्तिथा ७१।४०
भुजे विशाले विमले (सु २२७४) ७८।६
भुज्ञाना (राज त ३ १९४) ३७७।११
भुवनमोहनजेन २८२।१२९
भू पर्यङ्को (भर्तृ ३ ९३) १६९।६०
भूजाने किं न जाने १३४।३०
भूतानामपर (३ १३८५१) ३८८।४४५
भूतानाम (भा १२ २५२३) ३९३।६६०
५४ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| स्तम्भ १ | स्तम्भ २ | स्तम्भ ३ |
|---|---|---|
| भूतावेशनिवेशिता ३४।५६ | भोगाक्षमस्य १७१।८०६ | भ्रात कोकिल (शा प ८५१) २२९।१४४ |
| भूतैराक्रम्य (भाग ११ ७) ३८५।३०८ | भोगा न (भर्तृ ३ ८) ३७४।२०९ | भ्रात पञ्जर (शा प.१२०६) २४६।४३ |
| भूत्यालेपनभूषित ६।६३ | भोगा (भर्तृ ३ ३६) ३७३।१८६ | भ्रात पान्य (कुव १७८) ३४३।९३ |
| भूत्वा कल्प (प्रब ०१) ३७३।१८४२ | भोगा भङ्गुर (भर्तृ स २०२) ३८५।३२७ | भ्रात पान्थ (शा प ३४०६) ३५५।८६ |
| भूप कूप १४९।२८२ | भोगासक्तैकचेता १९८।१०६ | भ्रात पान्थ प्र (शा प ३८९४) ३४३।९५ |
| भूस्तन्मौलित १२६।१२ | भोगास्तुङ्ग (भर्तृ ३ ३५) ३७३।१८५ | भ्रात प्राणगणप्रयाण ३५७।३६ |
| भूयन्मीलितटीषु १२३।१९१ | भोगिन (पच १.६९) १४६।१७४ | भ्रातप्रम्ये कुविन्द २४६।२८ |
| भूमात्रं कियदेन ३६।१३९ | भोगीन्द्र प्रमदो (सु २६३८) १३७।६४ | भ्रातर्द्विरेफ २८३।१५९ |
| भूमिपतावर्ध १६९।७२० | भोगेच्छा नोप १६८।६८५ | भ्रातर्धार्तराश (भर्तृ स ४९) ७४।३६ |
| भूमिर्मित्रं (काम नी १० २८) १४९।३११ | भोगे रोगभय (भर्तृ ३ ३२) ३७०।९० | भ्रातर्भ्रम्य (शा प ११८४) २२४।१०६ |
| भूमौ स्थिता (भामिनी क २३) ३६२।३० | भोज त्वत्कीर्ति (भोजप्र १२७) ११७।७८ | भ्रातश्चन्दन कि (शा प ९९३) २३७।५४ |
| भूय कण्ठावधृति १९।५६ | भोज त्वद्दानपाथो ११७।७५ | भ्रान्त याचन (शा प ४२१) ७७।५३ |
| भूयस्तराणि यदमूनि ३०१।७२ | भोजनाच्छादने (पच.५ ६०) ३४९।३१ | भ्रान्त देशमनेक (भर्तृ ३ ४) ७७।५४ |
| भूयादेश सता १९।३७ | भोजनान्ते च कि १९६।५ | भ्रान्ता वेदान्तिन ४४।६ |
| भूयिष्ठ द्रविणात्मज ९४।११५ | भोजप्रतापं तु (भोजप्र ९२) ११७।८५ | भ्रान्त्वा (सूक्ति ९७ २८) ११९।१३२ |
| भूयो गर्जितमम्बु (शा प ७८७) २१३।६७ | भोजप्रतापामिर (भोजप्र २१८) ११७।८६ | भ्राम्यची (शा प ३८५७) ३४०।१३० |
| भूयो निपीय ३२७।९ | भोज्यं (चाणक्य २ २) १५५।१२१ | भ्राम्यन्मन्दर (पार्वती ५ २३) १५।३५ |
| भूयो भूयस्त्व १२२।१७३ | भो पान्थ त्वरितो ३५५।८७ | भ्रुवौ काञ्चिल्ली (शा प ३२७४) २५५।२६ |
| भूरिभारभरा (शा प ५६२) २०५।४ | भो पान्य (भर्तृ स ८५०) ३५४।७४ | भ्रूचातुर्या (भर्तृ १ ३) २५१।४१ |
| भूरिशोऽपि च २३९।१०३ | भो मो. करी (शा प ९०५) २३१।६९ | भ्रूचापवल्ली (कुव ८५) २७७।१२ |
| भूरेणुदिग्धा ( ध्वन्या ३) ३६०।२२ | भो भो कि कि (शा प ११५२) २२०।६ | भ्रूचापे निहि (शा प ३५०२) ३१४।७० |
| भूर्ज (शा प १०५६) २४३।१८४ | भो भो श्रीभो (शा प १२५२) ११७।९५ | भ्रूपल्लवो धनुर (शा प ३३८०) २५५।२३ |
| भृशक्रस्य यशा (सूक्ति ९७ २५) १३९।९ | भो मेघ (मृच्छ ५ ४७) २८३।१५१ | भ्रूभङ्ग न करोषि ३०७।६३ |
| भूशय्या (पच १.२९२) ९७।१० | भो रोहिणि त्वमसि २८५।४९ | भ्रूभङ्गे रचि (अमरु २८) ३५९।९९ |
| भूषणाद्युप (मुद्रा ३ २३) १०२।३२ | भो हंसास्ताव (शा प ८०७) २२२।४० | भ्रूभङ्गै क्रियते ३०७।६२ |
| भूसर्पकरंजो (शा.प १२७४) १३२।३१ | भ्रमच्चरणपल्लवक्वण ३४६।२९ | भ्रूभेदै कति (शा प ३७६३) ३५३।४१ |
| भ्रुकुटीकुटिल ३६४।२० | भ्रमति गिरि (सूक्ति १०८ २) २३५।४ | भ्रूभेदो रचित (अमरु ९७) ३५८।६७ |
| भृङ्गश्रेणीश्याम (शिशु १८ ४१) १२९।७८ | भ्रमन्वनान्ते नवमञ्ज ९२।५९ | भ्रूभ्या प्रियाया भवता मनोभू २५९।५८ |
| भृङ्गाङ्गनाजनम (शा प ७९९) २२१।१६ | भ्रमन्स (वृ चाणक्य ६ ६) १५९।२८१ | भ्रूयुग्ममुच्चैर्धनुरञ्जितञ्जय ३६७।३० |
| भृङ्गालीकण्ठमाला ३२७।४१ | भ्रमन्स्वैरं भ्रातर्भ्रमर २२४।९८ | भ्रूरेखायुगल (शा प ३२९७) २५८।५२ |
| भृङ्गालीमुदरे २७२।६६ | भ्रम भ्रमर यूथीषु २२२।४५ | भ्रूविलास (किरात ९ ५६) ३१५।४८ |
| भृत्यैर्विना (पच १ ८८) १४४।८६ | भ्रमय (मालती ९.४२) २८३।१५२ | भ्रूविभ्रमरेखा च तिलोत्तमा २७०।२४ |
| भृशमद्यत याधर ३४६।१९ | भ्रमर भ्रमता (शा प ८१८) २२३।११ | म |
| भेकेन कणता (भट्ट १६) २७७।४६ | भ्रमर मरणमीति २२३।१० | मकरीविरचनभङ्ग्या (शा प ७७) २२१।०८ |
| भैके कोटरशा (भोज २०१) २१३।६५ | भ्रमरहित कीदृक्षो १९६।१० | मक्षिका मशको वेश्या १५६।१२८ |
| भेतव्य (मुद्रा ३ १४) १३९।८ | भ्रमरहिता सा ३०।१९ | मक्षिका व्रणमि (चाणक्य ५८) १६७।६३७ |
| भेदाभेदौ सपादि ३६९।६६ | भ्रमात्प्रकीर्णे (शा प ३०१७) ३४५।४९ | मग्ने मेरो पतति तपने १७।५ |
| भेरीझाङ्कृति १२२।१८४ | भ्रष्टं नृपति (शा प ११०५) २१७।५१ | मङ्गलकलशाद्वयमय २।१२ |
| भैषज्यमेतद्दु (भा ११ ७२) ३९३।६५६ | भ्राजिष्णवो (सु ७८०) २२९।२३८ | मज्जत्वम्भसि (भर्तृ स ४८) ९४।११६ |
| भोक्तुं पुरुष (काम १३ १०) ३८९।४९९ | भ्रात कङ्कण किं ३५६।२९ | मज्जन्तोऽपि (सूक्ति ६ २९) ५२।२५८ |
| भोक्तुं (काम.नी.१३.१०) ३८९।४९९ | भ्रात (शा प ४१६४) ३७४।२०० | मञ्जिष्ठारागदी (शा प २२८०) ३२८।२४ |
| भोग. परो (हृ. श ७२) १६९।७०३ | भ्रात कस्त्व १००।७ | मञ्जुलघौ सभाचितगुणे १८४।४९ |
| भोगस्य भाजन (हि.२.१२५) ३४७।२०८ | भ्रात काञ्चन (शा प ११९३) २४८।७२ | मणि शाणोल्ली ( |
संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः ५५
| मणिर्लुठति (नीतिरत्न १२) २१७।४७ | मधुर सुधाव (सा द १० १७) २७०।१५ | मनोभुर्मुग्धासु क्षिपति १०६।१५९ |
| मणिहारलता विभाति तन्व्या २६६।३०५ | मधुरमिव वदन्ति स्वागतं १४१।३ | मनो मधुकरी मेघो मानिनी १५७।१८५ |
| मण्डलीकृत्य (शा प ५६९) २०७।२० | मधुरया (शिशु ६ २०) ३३२।६८ | मनोरथरथारूढ (सु ३२४१) ७६।१९ |
| मण्डले मण्डलाकारो रेखा २०७।१० | मधुरवचनै (सुधारति १ ४२) २५४।३९ | मनोरथान्करोत्युच्चैर्जनो ९१।१९ |
| मतिरेव (गुणरत्न ८) १७५।९२५ | मधुरस्वना घृतोर्णा मध्या १८६।६ | मनोरागस्तीव्रं (मालती २ १) २८४।२७ |
| मत्तेभकुम्भपरि (पचं १ २२०) ३१९।२७ | मधुरिमरुचि (का प्र १० ५१६) ५९।२०८ | मन्त्रतन्त्रार्पित (शा प १३५१) १४२।२१ |
| मत्तो हिनस्ति सर्वं मिथ्या १००।५ | मधुरेणदृशा (काव्या ३ २०) ३८९।४६९ | मन्त्रबीजमिदं (हि २ ४५) १४७।२१४ |
| मत्वा परीक्ष्य (भा ५ १४८७) ३८८।४६१ | मधुरोन्नतश्रु (शिशु ९ ७९) ३११।११ | मन्त्रभेदेऽपि (भा १५ १९३) १४७।२२८ |
| मत्वा चापं शशिमुखि निज २६७।३३८ | मञ्चुव्रतौघ (कुव १११) ३०४।१५२ | मन्त्रसस्कारसपन्नास्तव २९३।१ |
| मत्वा लोकम (सा द ६ १८७) १०३।५७ | मञ्जूके माध्वीक पिबसि २२४।९७ | मन्त्रिणा पृथ्वि (हि २ १६७) १४७।२१५ |
| मत्वा सारं गुणाना (सु ४९४) ७२।६१ | मथो मन्दं मन्दं मरुति १८२।४३ | मन्त्रिणा (पच १ १३८) १६४।५०७ |
| मत्स्यादयोऽपि जानन्ति नीर १५५।९१६ | मध्यं तनुकृत्य (नैषध ७ ८०) २६५।२८१ | मन्त्रे तीर्थे द्विजे (विक्रम ६४) ३७८।५४ |
| मदकलकृतान्तकासर २८४।८ | मध्यं तव (सा द १० १५) २६६।३१४ | मन्त्रो द्वावि (शा प ४१५८) ३७५।२२१ |
| मदनदहन (शा प ३४१३) २७५।२१ | मध्यं विष्णुपदं कुचौ शिव २७२।६८ | मन्त्रो योव (शिशु २ २९) १४६।१८१ |
| मदनमपि गुणैर्विशेषयन्ती २७२।१३ | मध्यत्रिवली (शा प ३३४६) २६७।३३४ | मन्थक्ष्माधरघूर्णिता (सु ३५) १५।३७ |
| मदनमवलोक्य (शा प ८२४) २२२।४९ | मध्यमोपलनिभे (किरात ९ २) २९०।२२ | मन्थानभूमिधर (कुव २७) ३०४।१५७ |
| मदमयमदमयदुरगं (सु ३१) २२१।१५ | मध्यस्य प्रथ्रिमा (सा द ३ ५८) २५६।५१ | मन्यायस्तारणी (वेणी १ २२) ३६६।१३ |
| मदरक्तस्य (भा ५.१४८४) २९४।७०० | मध्यात्ससानीय सुसारभा २६७।३३७ | मन्दं निक्षिपते पदानि ३३।५२ |
| मदर्थसद्भू (नैषध १ १३७) ३६२।१९ | मध्याह्ने (दश रू २ ५०) ३३९।१२३ | मन्दं निधेहि (शा प ३६२०) २९८।१५ |
| मदसिफमुखै (किरात २ १८) ७९।१८ | मध्याह्नार्क मरीचिका ११।३ | मन्दं मन्दं श्रवणपुटकोपान्त २५६।४१ |
| मदाम्भसा (शिशु १७ ६८) १२७।३७ | मध्याह्ने चलतालवृन्त ३३७।४८ | मन्द मरुद्वहति गर्जति वारि २७४।३ |
| मदुक्तिश्वेद्दन्तर्मद (कुव १३६) ३३।४६ | मध्याह्नेऽति (शा प ३८६१) ३३९।१२१ | मन्दं मुद्रितपास (अमरु.१२७) ३४१।५२ |
| मदेकपुत्रा जननी (नैषध १ ३५) ३६२।१८ | मध्याह्ने दव (शा प ४०१४) ३६२।३६ | मन्दमग्रिमधुर्य्य (कुव ६५) ३२२।४ |
| मदोपशमनं शास्त्र ३९।११ | मध्याह्ने नूनमापोऽपि तिग्म ३३६।३४ | मन्दमन्दगमना करिणो २४४।१४ |
| मद्गेहे मुशकीव (सु ३१९७) ६८।७७ | मध्याह्ने हरितो हुताशन २३७।७७ | मन्दश्चन्द्रकिरी (शा प १२५४) ११६।६६ |
| मद्यपस्य कुत सत्य दया १००।३ | मध्ये न कृशिमा स्तने ३५६।९ | मन्दस्मितेन (भामिनी क १२) २७८।४६ |
| मद्यपा कि न जल्पन्ति १६६।५९२ | मध्यन (सा द १०८६) २६५।२६७ | मन्दाकिनीपय पान १५८।२४१ |
| मद्यमन्दविगल (शिशु १० १७) ३१५।२० | मध्यन सा (कुमार १ ३९) २६७।३२५ | मन्दार कुसुम (विद्ध २ ३) २७९।५६ |
| मद्युगमध्योत्पन्ना कृतयुग ९८।८ | मध्येऽथ बलिसद्म दृष्टि २६६।२९८ | मन्दारमाला (शा प ६७) १०१।६१ |
| मद्वाणि मा कुरु (भामिनी शा २८) ४०।५० | मन प्रकृत्यैव (सु १२०६) २७७।१३ | मन्दारमेदुरमरदरसाल २२२।८७ |
| मधुकरगणश्वतं (शा प ८२९) १७७।९९८ | मनसा चिन्तित (दृ श ३८) १६१।३७६ | मन्दोद्धूते शिरोभिर्मणि ११२।२८३ |
| मधुकर तव (शा.प ८१५) २२२।४७ | मनसि (शा प ३३८१) ३२९।५ | मन्दोप्यमन्दतामे (मालवि.२ ७) ८६।१० |
| मधुकर मा कुरु शोकं २२२।६२ | मनसि वचसि (भर्तृ स १९) ५१।२२१ | मन्दोऽयं (सूक्ति ५९९) ३३२।९२ |
| मधुकरैरपवाद (शिशु ६ ९) ३३२।६४ | मनसैव कृतं पाप न १६७।६३५ | मन्दिन्द्या (शान्तिश ३ ८) ७५।१६ |
| मधु द्राक्षा (भामिना शा २९) ३५।१६ | मनस्यन्यद्वचस्य (वृ चा २ ६०) ५५।५० | मन्ये तद्रूप (शा प ३३५७) २६८।३८८ |
| मधु द्विरेफ कुछ (कुमार ३.३६) ३३१।३१ | मनस्विनो न (दृ श ८७) ८०।२१ | मन्ये मायैमम (शा प ४०९०) ३६७।३ |
| मधुधारेव न मुञ्चसि मानिनि ३०५।१३ | मनस्सिहृदय धत्ते (दृ श ९) ८०।२० | मन्येऽमुना कर्ण (नैषध ७ ६४) २६१।१२९ |
| मधुना सिञ्चेन्निम्ब्र निम्बं १६०।३१६ | मनस्वी म्रियते (हि १ १३३) ८०।१९ | मन्ये मृत्यो सपत्नी जगति १२२।१६८ |
| मधुप इव (भामिनी प्रा १७) २४४।२१७ | मनागनभ्यावृ (शिशु २ ४३) १६३।७१७ | मन्येऽरण्ये कुलगिरि ११४।२० |
| मधुपराजिपरा (हरिविजय) ३३०।१ | मनीषिण (भोजप्र ५८) १७४।९०२ | मन्ये सत्यमहं लक्ष्मी समु ६२।७ |
| मधुपानप्रवृ (सा द १० ९५) १०२।४२ | मनुष्यजातौ तुल्याया (सु ३२१४) ९७।७ | मन्ये समास (शा प ३३५०) २६७।३२४ |
| मधुपानसमुल्लसत्प्रवाल ३२०।१० | मनोजराजस्य सितातपत्र २९१।१६ | मन्ये शशरीरमपि तवैव १०७।१८९ |
| मधुपे मालतीपुष्पं सतुण २२२।४६ | मनो धावति सर्वत्र १५८।२२६ | मम करग्रहणाय (शा.प.५९३) १८२।३८ |
| मधुमधुरिमभङ्गी मेजिरे ३४४।४२ | मनोऽपि शङ्कमानाभि २१३।८ | मम प्रिया कैरविणी करेण ३०४।१४९ |
५६ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| पाद / प्रतीक | पृष्ठ।संख्या | पाद / प्रतीक | पृष्ठ।संख्या | पाद / प्रतीक | पृष्ठ।संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| मम रूपकीर्तिं (शिशु.) | २८८।२७ | महतोऽपि हि विश्वासा | ४७।९९ | मा गमनमदवि (किरात.९ ७०) | ३१६।६२ |
| ममत्वं हिन (भा २ १९५६) | ३८९।४९६ | महतो हि (भाव.३१) | ३७७।१ | मा गर्वमुद्वह (सूक्ति ८६ १४) | ३५५।२ |
| मया कुमार्यापि (शा प ३७६२) | ३५२।२१ | महतो सुवृत्तयो सखि | ४७।९८ | मा गा प्रत्युप (भर्तृ स ६४६) | ११४।११ |
| मयास्योप (काम नीति ९ १०) | ३८९।४७४ | महल्पल्पेऽप्युपा (हि ३ ४९) | १८४।२३४ | मा गा विषाद (सूक्ति १९ ४) | २२३।८५ |
| मयि जीवति बीजाढ्ये | २४१।१३८ | महद्भि स्पर्धे (पच १ ४०४) | ३७७।२ | माघश्वोरो मयूरो सुररिपु | ३७७।१ |
| मयि ते पादपतिते (पंच ४ ८) | ३०५।३ | महद्भिरोधैस्तम (सु.१९०३) | २९४।४२ | माघेन विम्रितोत्सा (सूक्ति ४ ५९) | ३७।६४ |
| मयि मलयसमीरो वर्षतीव | ३०९।२ | महागजाना गुरुबृंहितै | १२८।३८ | मा चक्र चक्रि(शा प १२५७) | १२३।१९४ |
| मयि सकपटं (सा द ३ १६२) | २७९।७० | महागजाना (कुमार १६ ४२) | १२८।४३ | मा जीवन्ध (शिशु २ ४५) | ८१।१ |
| मयि स्थितिर्न (सु २५२१) | ००४।११५ | महाजनस्य संसर्ग (पच ३ ५९) | ८६।२ | माणिक्यद्रव (राघवचैतन्य) | २२७।२०० |
| मयूखनखरत्रुट (सु.१९८१) | ३०१।८६ | महातरुर्वा (सु.७८८) | २४१।१४६ | मात क हृदये (दश रू २ ३९) | २८६।३२ |
| मय्यायाते सपदि शयना | ३५७।४९ | महादेवो देव (भर्तृ स २९९) | ३८८।४५८ | मात किं यदुनाथ देहि | २४१।५२ |
| मरणं प्रकृति (रघु.८ ८६) | ३७२।१७० | महात्मानोऽनुगृ (शिशु २ १०४) | ४५।१४ | मातङ्ग कुम्भ (सूक्ति.५३.३८) | २६६।३०२ |
| मरालश्रेणीभिर्नियतमुप | २७५।३० | महानदीप्रतरणं (विक्रमच १६) | १६७।६५० | मातङ्गा किमु (सूक्ति २२ ६) | २३१।४९ |
| मरौ नास्त्येव सलि (सु ९३८) | २२०।१ | महानपि (सूक्ति ९८.२१) | १९५।७ | मातज्ञाना (शिशु.१८ ३४) | १२९।७३ |
| मर्कटस्य सुरापानं तस्य | १५९।२६८ | महानप्यल्पता (हि.३ १२) | १६४।४९८ | मातङ्गीमिव (भोजप्र २६१) | ३४।६६ |
| मर्तव्यमिति (विक्रम.१४३) | १६५।५४९ | महानुभावसंसर्ग (शा प ३२१) | ८६।१ | मातङ्गैरथ यैर्महे(शा प १५७६) | १४३।४६ |
| मर्दितरावणक्सौ सरयू | २२१।७ | महानुभावसंसर्ग कस्य नो | ८६।३ | मातरं पितरं पुत्र (भोजप्र ३) | ६९।४ |
| मर्यादानिलयो महोदधि | २४९।१०३ | महान्तमप्य (भा ५ १५३३) | ३८८।४६४ | मातर्जीव किमेत (सु ६९) | ७।९४ |
| मलयज (काव्याल सू ४ ३ १०) | २९९।२३ | महाप्रलयमारु ( वेणी ३ ४) | ३६५।५ | मातर्धर्मपरे दया (सूक्ति ९६ ३) | २०८।३१ |
| मलयभुवि विरुद्धश्चन्दनेना | ६०।२४७ | महाबलान्प (भा ५ १५४६) | ३८८।४५३ | मातर्नति परमनुचितं यत् | ९७।११ |
| मलयमग्ना (अमरू ३२) | २८३।१५३ | महामतिरपि प्राज्ञो न | १६४।५०६ | मातमयि (शान्ति ४.२३) | ३६९।६४ |
| मलयशिखरादाकैलास | ३३४।१३० | महाराज श्रीमज्जग (भोजप्र.८२) | १३५।२९ | मातर्मेदिनि (भर्तृ स ३०१) | ३६९।७५ |
| मलयस्य गिरेरपत्यमादौ | २१९।५ | महाशयमतिस्वच्छं नीर | १९५।१ | मातर्लक्ष्मि (भर्तृ स.३०२) | ३७०।१०२ |
| मलयाचलगन्धेन विन्ध्यनं | ८६।४ | महाशय्या (शान्ति.४ ८) | ३६८।५४ | मातस्तर्णकर (सु १०१) | २३१।४६ |
| मलयानिल (सु १६६७) | ३६७।२८ | महासेनो यस्य प्रमदमय | ३६०।३२ | मातस्तातजटासु कि | १२।३१ |
| मलयानिल (काव्याल ३ ३०) | ३३१।१० | महास्वन (कुमार १४ ३२) | १२८।३७ | मा तात सपदा (सु २७४९) | १४५।१३३ |
| मलिनयितुं खलवदन (कुव ९४) | १३८।२ | महिम्नामन्तर पश्य (सु २२५७) | ७८।४ | मा तात साहस (सु २७४७) | १४५।१३० |
| मलिनहुतभुग्धूम (सु १७६०) | ३४१।५४ | महिष्या दृष्टया भाव्यं | १४४।४२ | माता नताना सघट्ट | २०५।८ |
| मलिना अपि सय्यमनात्कृ | २५७।१० | महीपते सन्ति (शा प १६७) | ३३।३२ | माता निन्दति (नीतिसार २) | ६४।१६ |
| मलिनात्मना (सूक्ति १४.४) | २२४।१३० | महीमण्डलीमण्डपीभूत | ३४१।४७ | माता पिता (शा प १३४७) | १४६।१५२ |
| मलिनेऽ |