सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः
| स्तम्भ १ | स्तम्भ २ | स्तम्भ ३ |
|---|---|---|
| पौरैर्भ्यो न भयं ६८।७५ | प्रणालीदीर्घस्य (विद्ध ४ १४) २६०।१०८ | प्रत्युपकुर्वे (भा १२ ४९९३) ८०।२९ |
| पौलस्त्य. (पच. २.४) १७९।१०२४ | प्रणीतक्षा (शा प १३१४) ३९२।६०० | प्रत्युपस्थित (मा.१२ ५२८०) ३७८।५९ |
| पौलस्त्यपीनभुज (दश रू ४ २८) ११।२० | प्रतापभीत्या (भोजप्र १९५) ११७।७७ | प्रत्यूह पुलका ३२०।४७ |
| पौलोमीकुच ३०२।१३३ | प्रतिकामिनीति (शिशु ९ ३५) ३००।६० | प्रत्यूहू (हि ३ ४५) १६६।५६८ |
| पौलोमी (भामिनी. अ. ४४) २४५।२४२ | प्रतिकूलता (शिशु ९ ६) ९२।७० | प्रत्येकं दिक्प १८४।७६ |
| प्रकटमपि न (सु.४३५) ५९।२०९ | प्रतिक्षणमय (हि ४ ६६) ३९२।५९७ | प्रथम कला (शिशु ९.२९) ३००।५४ |
| प्रकटं (शिशु १६ १९) १७५।९२४ | प्रतिक्षणसमुल्ल (शा प ३६६७) ३१७।३ | प्रथमं युद्धकारित्व (हि ३ ८६) १४३।६० |
| प्रकटमलिन (शिशु ११ ३०) ३२२।११ | प्रतिगतमर्थि (शा प.३८२५) ३३५।३ | प्रथमं संस्थिता (भा १ ३०३३) ३७८।६० |
| प्रकटान्यपि (शिशु १६ ३०) ४९।१५३ | प्रतिगृहकोणं १७०।१४४ | प्रथमदिवस १७७।९७५ |
| प्रकाममभ्यस्यतु ४९।१६५ | प्रतिदिनमयलसुलभे (भर्तृ स ६०७) ९६।१ | प्रथममन्यमृता ३३२।४४ |
| प्रकीर्ण (काम नी १ २५) ३९०।५२२ | प्रतिदिवस (पच ५ ४) ३९२।६२७ | प्रथममरुण (सूक्ति ७२ ४) ३०१।८५ |
| प्रकुप्यत्प्र (राजत ६ २७८) ३९०।५२३ | प्रतिदिशमभि (किरात १० ०१) ३४०।२३ | प्रथमवयसि (विक्रम ९१) ५१।२२० |
| प्रकीर्णकेशामन १७४।९०० | प्रतिनगरमटन्ती १३५।२३ | प्रथमा गति (र २ ६०) ३८०।१३९ |
| प्रकुर्वता सगति २१।०२० | प्रतिपक्षेणापि (मालवि ५ १९) ३५१।२२ | प्रथमे ना (चाणक्य. ९३) ३७८।६१ |
| प्रकृति (हि ३ १४४) १४५।१२७ | प्रतिपक्षो यदि २६५।२६९ | प्रथितोऽसि यत २१।२३० |
| प्रकृतिखलत्वाद (सु ४१३) ५८।१८६ | प्रतिबिम्बितगौरीमुख ४।२३ | प्रदह्यमाना (शा प ३७५) ३९०।५३७ |
| प्रकृतिप्रत्ययो ४६।५० | प्रतिबिम्बितप्रिया १।४९ | प्रदान प्रच्छन्नं (भर्तृ २.५४) ५२।२४९ |
| प्रकोष्ठबन्धे २६४।२३७ | प्रतिरजनि प्रति (शा प.३७६०) ३५१।२० | प्रदीप किमु २४७।६६ |
| प्रखला एव गुण (सु.३९७) ५८।१७३ | प्रतीक्ष्यन्ते वीरा १३१।११४ | प्रदोषमातङ्ग ३०४।१४८ |
| प्रगल्भाना (शा प ३२८१) २५५।२८ | प्रतीप (कथास ३१ ८७) ३९२।५८९ | प्रदोषे दीपकश्चन्द्र १५८।२१५ |
| प्रचण्डचण्डमुण्ड ११।२३ | प्रतीपभूपैरिव (नै १ १३) १०५।१२७ | प्रदोषे (चाणक्य ९९) १६२।४२४ |
| प्रचण्डवासनावा ३६७।९ | प्रतीयमानं पुनर (सु १५७) ३३।३४ | प्रधानाध्वनि १०३।७५ |
| प्रचण्डसूर्य. ३३५।७ | प्रत्यक्षरक्षुत १०५।१४० | प्रबुद्धाया प्रातलं ३२८।३ |
| प्रजा न (पच. ३ २४९) १४५।१२१ | प्रत्यक्षे गुरव १५९।२७३ | प्रभव को १९६।११ |
| प्रजां सर (काम नी १ १२) १४५।११७ | प्रत्यग्रज्व (सूक्ति ८२ २७) ३२५।५९ | प्रभव. खलु (किरात २ १२) १५१।३९० |
| प्रजाना धर्मसङ्घ (वे २७) १४९।३०० | प्रत्यस्मै पत्रनिश्चयै (सु ७८४) २३६।३ | प्रभवति मनसि (प्रब ७) २५१।१८ |
| प्रजाना (पच १ २४०) १४९।२९० | प्रत्यग्रोन्मेष (मुद्रा ३ २१) १५।४९ | प्रभाते पृच्छन्ती ३२८।१३ |
| प्रजापीडन (याज्ञ. १ ३४०) १४५।१२३ | प्रत्यङ्गमङ्कुरित (प्र राघव १ ७) ३२।१ | प्रभुप्रसाद (पच १ ५५) १४८।२६२ |
| प्रजावृद्ध धर्म (मा.५ १५५) ३७७।३० | प्रत्यङ्गर्णं प्रति २२८।२१२ | प्रभुप्रसादे (शा प १५२०) १५४।७४ |
| प्रज्ञया (मा ३ १४०७९) ३८१।१६० | प्रत्यङ्गमस्यामभि (नै ७ १९) २७०।२३ | प्रभुभि पूज्यते(भोजप्र.६८) ८१।१९ |
| प्रज्ञया वा विसारण्या ९०।३ | प्रत्यार्थिवामनयना १३३।८ | प्रभुर्विवेकी धन १७३।८५१ |
| प्रज्ञागुप्त (भोजप्र १५) १४५।१३६ | प्रत्यहं प्रत्य (शा प १४२१) १५३।२ | प्रभूतमल्प (चाणक्य ६७) १६२।३९८ |
| प्रज्ञातृतीयोग्रवि १२३।२ | प्रत्याख्याने च (हि १ १३) १६३।४३७ | प्रभूतवयस (वृ श. २३) १६९।६८० |
| प्रज्ञावास्त्वे(मा ३ १५३८३) ३८९।४९७ | प्रत्यादिष्टविशे (सूक्ति ४२ ५) २७४।७ | प्रश्रश्यच्युति ११२।२६७ |
| प्रज्ञाशरेणा (मा ५ १३९१) ३९३।६३९ | प्रत्यावासक १०९।२१४ | प्रभ्रष्टै सरभ (शिशु ८ ४९) ३३९।१०६ |
| प्रणतिमिरपि ३४३।१०२ | प्रत्यावृत्तं (शिशु १८ ५५) १३०।८६ | प्रमदा मदिरा १६०।३२५ |
| प्रणमत्युन्नति (हि २.२७) ९७।१४ | प्रत्यावृत्य यदि ३५६।२८ | प्रमाणाभ्यधिक(पच १ ३१८)३९०।५३० |
| प्रणयकुपितप्रिया ४।२० | प्रत्यासत्ति (राजत.४.३५४) ३७७।२७ | प्रमादिना (पच १ १६७) १४९।२८६ |
| प्रणयकुपिता दृष्ट्वा (दश रू ४.६०) ५।४४ | प्रत्यासन्नतुषारदीधिति १४१।९ | प्रमोदं जनय १९५।५२ |
| प्रणयकोप (शिशु ६ ३८) ३४१।४४ | प्रत्यासन्न (सूक्ति. ६५ २६) ३४२।७७ | प्रमोदे खेदे ४४।५ |
| प्रणयमधुरा (भर्तृ सं २७३) ३९१।५८६ | प्रत्यासन्नविवा (सूक्ति २.३७) १२।२८ | प्रम्लाना (सूक्ति. १५ ७) २२२।३५ |
| प्रणयादुप (हि. ४ १०) ३९१।५५० | प्रत्यासन्नसुरेन्द्र ३२५।५८ | प्रयच्छति चम (सु १९०) ३१।३७ |
| प्रणिपातेन (काम नी.३.३२) ३९२।५९१ | प्रत्यासन्ने (शिशु १८ २८) १२९।७० | प्रयच्छतोञ्चै कु(किरात ८.१४)३५७।४५ |
| प्रत्युपकुर्वन्मूर्ख (सु.५१५) ७०।२४ | प्रयत्ने समके (वृ. श ७०) १६९।७०२ |
७ सुभा०अनु०
| ५० | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
|---|
| प्रयत्नै रस्तोकैः परि | ४३।६ | प्रहरति न पञ्च (शा प ५०६) | १८४।५ | प्रातर्नीलनिचोलमच्युत | २५१।७५ |
| प्रयाणे तव | १२५।१ | प्रहरविर (अमरु १२) | ३२९।११ | प्रातर्मूत्रपुरीषा (सु ३३३६) | ३६७।१९ |
| प्रयाति शमनं (पञ्च ३ ३१) | ३९१।५६३ | प्रहरिष्यन्प्रियं (शा प १४२९) | १५३।८ | प्रातर्हन्त कृतापराधोऽपि रज | ९९।२८ |
| प्रयातुमस्माक (नै १ ६९) | १२३।४ | प्राकारगोपुरा (शा प १५६५) | १४३।३८ | प्रातिभ त्रिसर (शिशु १० २२) | ३१५।१५ |
| प्रयातेऽस्तं भानौ (सु १०९०) | २७५।२८ | प्राक्पादयो (हि १ ८१) | ६०।२३५ | प्राथमिकी घनवृष्टि प्राप्ता | २१४।४ |
| प्रयाहि तत्रैव | ३०९।२ | प्राकृतो हि (भा १२ ४२१७) | ३८९।४७२ | प्रादुर्भवन्ति वपुष (प्रब ९३) | ३७१।१२९ |
| प्रयोगव्युत्पत्तौ प्रति | ३४।१ | प्रागल्भ्यं पुरुषा | ३०१।२१ | प्रादुर्भूते नवजलधरे त्वत्पथं | २८९।५६ |
| प्रयोजनेषु ये (भा ५ २४४१) | ३८०।१४२ | प्रागल्भ्य प्रयय | २४८।७६ | प्रादुष्यातपण्डिताना कवि | ४२।७७ |
| प्रलयसहायकरा (शा प ५१०) | १८१।२४ | प्रागल्भ्यहीनस्य (ज्योतिस्तत्त्व) | १७३।८५६ | प्रापितेन चटुकानुविडम्ब | ६९।१९ |
| प्रवसतः (शिशु ६ ३०) | ३४१।३६ | प्रागेतद् (नै १२ ९३) | ११०।२४६ | प्राप्तं प्राज्यमिव श्रम | ३३५।१३४ |
| प्रवातान्नीलोत्पल (कुमार १ ४६) | २५९।७७ | प्राज्ञा मेति ततो (भर्तृ १ २५) | ३१।७७ | प्राप्तमदो मधुमास प्रबला | १९४।३७ |
| प्रविश झटिति (शृं ति ६) | २६२।१९३ | प्राची वासकसज्जिकामुपगते | ३२५।६१ | प्राप्ताविद्यार्थ (पञ्च १ ४३२) | ३९०।५३२ |
| प्रविष्टं सर्वं (र २.१२२ २०) | ३९१।५५५ | प्राचीकुङ्कुमतिल (प्र राघव ७ ९०) | २७।४ | प्राप्तव्यमर्थ लभ (पञ्च २ १३३) | ९२।४९ |
| प्रवीणे पाक्पदु (शा प १३३५) | १४४।७४ | प्राची दिगम्बरमणौ दयिते | ३२३।१० | प्राप्ता श्रिय (भर्तृ ३ ६८) | १७६।९४९ |
| प्रशस्त्यायुक्त | १९४।३२ | प्राचीनाचलचुम्बिचन्द्र | ३०२।११६ | प्राप्ता जरा (शा प ४१६५) | ३७४।१९६ |
| प्रशान्त (किरात ८ २८) | ३३८।७३ | प्राचीभागे सरागे धरणि | ३०३।१२२ | प्राप्तानपि न (सूक्ति ९ १९) | ७२।३७ |
| प्रशान्ते नूपुरा (शा प ३६९६) | ३२०।१ | प्राचीमहीधरशिलाविनिवे | ३४३।११० | प्राप्तार्थग्रहणं द्रव्य (हि २ १०३) | १४२।२४ |
| प्रसत्तेर्य. पात्रं | ३१।४१ | प्राचीमालम्ब (प्र राघव २.३३) | २९५।७० | प्राप्ताज्ञासात्पिपासातिशय | १३३।४४ |
| प्रसङ्गा (सु १४७) | ३९२।५९३ | प्राचीविभ्रमकर्णिकाकमलिनी | ३२५।५६ | प्राप्ते भये परि (पञ्च २ १९३) | ३९०।५२६ |
| प्रसरति (पञ्च ३ २४५) | १७७।९९४ | प्राचेतसस्यापसराशराधा | ३७।६६ | प्राप्ते वसन्तसमये (सु ७९४) | २०२।९४ |
| प्रसरदल (सूक्ति ६१ २७) | ३४३।१०५ | प्राज्ञो वा (भा १२.५७१७) | ३८९।४६७ | प्राप्यं कार्यं गरी (र ५ ८४) | ३८८।४६० |
| प्रसह्य मणिमुद्धरे (भर्तृ. २ ४) | ४०।५६ | प्राञ्जलावपि (किरात ९ १०) | २९४।२९ | प्राप्य चलानधिकारा | १७०।७४० |
| प्रसाद कुरुते (हि ३ १९) | ३७७।२८ | प्राज्ञे नियोज्य (चाणक्य ८५) | १४६।१७८ | प्राप्यते गुणव (किरात ९ ५८) | ३१५।५० |
| प्रसाद्माधुर्यगुणौ | ४९।१६७ | प्राज्ञो हि जल्पता | ३८।६ | प्राप्यते स्म (शिशु १० ७८) | ३१९।२१ |
| प्रसादग्म्य (किरात ११.३८) | ८५।३ | प्राणवद्रक्ष्ये (पञ्च ३ १२२) | ३९२।६०७ | प्राप्य नाम्नि (शिशु १० ६०) | ३१७।२१ |
| प्रसादे व (सूक्ति ५७ २३) | ३०६।४४ | प्राणब्रुवन्त्येव (भाग ११ ७) | ३८५।३०९ | प्राप्य प्रमाणपद (भोजप्र १३४) | २४७।६९ |
| प्रसादो (सु.२७८५) | १४६।१५८ | प्राणघातान्नि (भर्तृ २ ६०) | १८०।१०५६ | प्राप्य मन्मथर (शिशु १० ८०) | ३१९।२३ |
| प्रसादो नि (भोजप्र ४७) | ३७७।२९ | प्राणातिपात (भा १२.५८४) | १५४।३९ | प्राप्य वित्त जडास्तूर्ण (दृ श ४४) | ५५।७७ |
| प्रसाधिकाल (रघु ७ ७) | १२६।३३ | प्राणत्यागे (पञ्च २ १७८) | ३९१।५८३ | प्रांभ्रश्राद्विष्णु (का प्र ७ १७४) | १८८।४३ |
| प्रसारणपरै करै. | ३०१।८७ | प्राणाना च (शा प ३०८९) | २५१।६ | प्रामाण्यं स्वत एव नैव | १०९।२१५ |
| प्रसारितकरे (शा प.११३८) | ३९१।५७६ | प्राणाना बत कि (शान्ति १ १८) | ७४।४३ | प्रामाण्यं परत खतोऽपि | १०९।२१६ |
| प्रसार्य (शा प.३८७८) | ३४२।७४ | प्राणा यथात्मनो (हि.१ १२) | १६३।४३६ | प्रामाण्यं परतो न शक्ति | ११७।९९ |
| प्रसीदेति (रत्ना.२.१९) | ३०६।४५ | प्राणायामोपदेष्टा सरसिरुह | ३०२।११८ | प्राय कार्ये न मुह्यन्ति | १९९।१२ |
| प्रसूतकलिका | ३३३।९० | प्राणेश तव विरहिणी हिम | २८७।६ | प्राय काव्यैर्गमितवयस | ४३।५ |
| प्रसूनबाणाद्वय (नै ७ ४८) | २६३।२२१ | प्राणेशमभिस (शा प ३६१२) | २९८।५ | प्राय. कुकवयो लोके | ३७।४ |
| प्रसूनशृङ्गै (शा प.३७९१) | ३३१।१६ | प्राणेश विज्ञाप्ति (शृ.ति.१७) | ३३०।४ | प्राय. खलप्रकृतयो (सु ४०२) | ५८।१७७ |
| प्रस्ताव (चाणक्य.१४.१५) | १५८।२५० | प्राणेशेन प्रहितनखरैश्छिन्न | ३२८।४ | प्राय परोपतापाय (सु ३५१) | ५६।९३ |
| प्रस्तावे हेतुयुक्तानि | ३२।२ | प्राणेश्वरपरि (काव्या सू. १५) | १७३।३०३ | प्राय प्रकाशता याति (सु ३५०) | ५६।९२ |
| प्रस्थान (अमरु.३५) | ३२९।२१ | प्राणेश्वरे किमपि जल्पति | ३२९।९ | प्राय प्रकुप्यतितरा (दृ श ३०) | ५५।७६ |
| प्रस्थाने तव | १२५।१८ | प्राणैरपि हिता वृत्तिरद्रोहो | ८८।१७ | प्राय सन्त्युप (दृ श ६) | १६८।६७० |
| प्रस्फुरत्प्रचुर | ३३२।७३ | प्रात क्षालितलोचना कर | ९६।५ | प्राय स्वभावमनिलो (सु ४४२) | ६०।२४३ |
| प्रस्वेदमलदिग्धेन (सु.३३४२) | ३६६।१ | प्रात प्रात समुत्थाय द्वौ | १९३।२ | प्राय स्वभावं (दृ. श ८०) | ४६।६५ |
| प्रहरकमपनीय (शिशु ११.४) | ३२३।२२ | प्रातः प्रातरुपा (अमरु ३३) | ३५६।१९ | प्रायश्चरित्वा वसुधा (कुव ११०) | ३२५।९ |
| प्रात. सीमन्ति (शा.प.३७३१) | ३२६।३२ | प्रायश्चित्त न गृहीतस्तन्वङ्ग्या | २६४।२५२ |
सस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः ५१
| प्रायेण धनिनामेव (शा प ४३४) ६९।७ | प्रिये सदा पूर्णतरं मनोहरे ३१३।४० | बकुलमालिकायापि २८४।१४ |
| प्रायेण नीचलोकस्य क १९९।२७ | प्रिये सलीलं (किरात ८ ४९) ३३८।९२ | बकोट ब्रूम (शा प.८९१) २२९।२२८ |
| प्रायेण श्रीम (भा ५ १।४५) ३९०।५४३ | प्रियो मयैवावचित्ते प्रसूनै ३५२।२३ | बङ्गालिदाम भवतः शुभ ११६।६७ |
| प्रायेण सुकरं (शा प ३९६२) ३६०।२ | प्रीणाति य (भर्तृ स २७९) ३७८।४७ | बत सखि (का प्र १० ४३१) २८४।२१ |
| प्रायेणात्र (पच १ ४४८) १७९।१०२३ | प्रीतिं न प्रकटीकरोति (सु ४९३) ७२।६० | बदरामलका (भामिनी शु ८) २६५।२८५ |
| प्रायो दुरन्त (प्र राघव५ ४९) १५८।२३५ | प्रीतिं वस्तुगुना हरि कुत्र २५१।७६ | बद्धकोपोविकृती (किरात.९ ३४) ३१६।५६ |
| प्रायो यत्किंचिदपि प्राप्नो ८६।९ | प्रीतिर्लक्ष्मीर्व्यय क्लेश १५७।१८४ | बद्धकोशमपि तिष्ठति २९४।१८ |
| प्रारभ्यते न (मुद्रा २ १७) ३९०।५४८ | प्रेक्षणीयकमिव (शिशु १० ८२) ३२९।८ | बद्धा मणिम (पार्वती ५ १५) २६८।३८० |
| प्रारब्धे रति (शा प ३६९७) ३२०।१७ | प्रेङ्खणप्रेक्षणालापान्कुर्वत्य २५३।७ | बद्धा यदर्पणरसेन ४०।५२ |
| प्रारब्धे विपरीतनामनि रते ३२०।१९ | प्रेङ्खद्भाजितरगमुन्मदगज २७२।२ | बद्धा पद्मासनं यो नयन २६।२०७ |
| प्रारम्भतोऽतिविपुलं (सु ४२३) ५८।१९३ | प्रेम सत्यं तयोरेव १६०।३१४ | बद्धा हियोमा त्रिवली गुणेन २६६।३१८ |
| प्रारम्भे (भामिनी. अ. ४६) २२४।१०९ | प्रेमार्द्रा (मालती.५ ७) २८०।९३ | बधिरयति कर्णविवर वाचं ६४।१२ |
| प्रालेयमिश्रमकर (वेणी २ ७) ३२३।१३ | प्रेमैव मास्तु यदि चेत्पथि ५०।१९३ | बन्दीकृस्य (का प्र ५ ११९) ११२।२६८ |
| प्रालेयलेशमिश्रे (पच ३ २३९) ३९१।५८२ | प्रेम्णोऽामितरेवतीमुख २६१।९६ | बन्दी (भर्तृ स ६१२) १८०।१०५२ |
| प्रालेयशैल (शा प ३९२५) ३४६।२३ | प्रेरयति परम (शा प ३६४) ५७।१३१ | बन्धं लब्धत परस्य २२८।२२२ |
| प्रावारैरङ्गारैर्गर्भ (शा प ३९३७) ३४७।१ | प्रेरितः शश (किरात ९ २८) ३००।४४ | बन्धनस्थो हि (शा प.१२०९) २३१।५८ |
| प्रावृषि शैलश्रेणीनितम्ब २१२।२१ | प्रेषिक. प्रैष्यक (शा.प ४०६४) ३६४।९ | बन्धनानि (चाणक्य १५ १७) ३९०।५११ |
| प्रावृषेण्यस्य (शा प ७६८) २११।१ | प्रेषितस्य कुतो (चाणक्य ६१) १६२।३९२ | बन्धु को नाम (हि २ १७४) १६४।४९३ |
| प्रासस्रोतप्रवीरोल्बणरुधिर १३१।१२३ | प्रोज्वलज्वलनज्वाला १९।६३ | बन्धुत्याग (काव्या ३ १४७) ३८१।१५७ |
| प्रासादीयति वैणवादिगहन २५०।२२ | प्रोद्यत्प्रौढार (शा प ३९२४) ३४६।३३ | बन्धुलीकृत्य (हि २ ८०) १६४।४८३ |
| प्रासादे सा दिशि (अमरु १०२) २७९।६५ | प्रोषितवति (प्र राघव ५ ५) २१०।१० | बन्धुकद्युति (शा प ३६५८) ३१४।६८ |
| प्रियकृतपटस्येय (अमरु ११५) ३२१।१९ | प्रौढमौक्तिकरुच पयोमुचा ३४१।४८ | बन्धूकबन्धनुभव २६१।१४९ |
| प्रियतमेन यया (शिशु ६ ५७) ३४६।१८ | प्रौढच्छेदानुरु (छलितराम) ३६५।११ | बन्धूकबन्धुरधर (प्र रा २.८) २७१।३२ |
| प्रियप्राया (उ रामच २ २) ५१।२३७ | प्रौढिं धत्ता कलासु प्रथ १२१।१६५ | बन्धूना सुहृदा चैव १६६।५८१ |
| प्रियमनु (राज त ४ ३२१) ३९१।५९९ | प्लवन्ते धर्मे (भा १३ २२) ३९१।५५९ | बभूव वल्मीकभव कवि. ३६।४२ |
| प्रियमेवा (काम नीति.३ २६) ३७८।४४ | बर्बरेश्च तपस्वी (शा प १४९६) १५४।५९ | |
| प्रियवसतेरपया (सूक्ति ८२ १३) ३२३।४ | फ | बर्ही रौति बका (शा प ३८८७) ३४३।८८ |
| प्रियवाक्य (चाणक्य १६ १७) १५५।८३ | फणीन्द्रेस्ते (कुव ६३) १०२।३५ | बलमार्तभयो (रघु ८ ३१ ) १०४।८६ |
| प्रियविरहमहो (विद्ध ३ २३) २८५।४८ | फल कतक (मनु ६ ६७) ३९०।५२५ | बलवदपि (किरात १० ३७) ३३६।१४ |
| प्रियसखि न तथा पटीरपङ्के २८४।१८ | फल दूरतरे (शा प १०४८) २४२।१७३ | बलवानपि (किरात २.३७) १६४।४९२ |
| प्रियसखि विपद् (शा प ४५१) ९३।८६ | फलं धर्मस्य (शुक ४०) ३९०।५३८ | बलाङ्गीतो (शा प ३६७८) ३१८।११ |
| प्रियसखीसदृशं (शिशु ६ ८) ३३२।६३ | फल स्वेच्छाल् (भोज २७०) ७२।५४ | बलि पातालानिल (भोज २२१) १०१।७ |
| प्रियस्य सुहृदो (मालती ९ ४१) ३६१।७ | फलतीह (पच ५ ९) ३९०।५२८ | बलिकर्णदधी (शा प १२२९) १०२।१७ |
| प्रियदर्शनमेवास्तु (सूक्ति ४९ २) २०३।१ | फलहीनं नृपं (पच १ १६३) १४९।२८१ | बलिना सह (काम नी ९ ४९) १४८।२३२ |
| प्रिया न्याय्या वृ (भर्तृ २ ६१) ५२।२४८ | फलाना च दलाना च २२२।४२ | बलीयसा हीन (पच ३ १२६) ३७७।२२ |
| प्रियामुखीभूय सुखी सुधांशु २६१।१५२ | फलायते कुचद्वन्द्वमिय २७०।४ | बलोपपन्नो (पच ३ १११) ३७७।२३ |
| प्रियाया (सूक्ति ४३.१८) ३२१।२२ | फलार्थी (पच १ ३७८) १४९।२९२ | बल्लाल क्षोणिपाल (भोज ६४) ११६।६८ |
| प्रिया वा (महाना ९ १५) ३८८।४५७ | फलाशिनो मूलतृणाम्बु ६७।४९ | बल्हबलसमर्था मेघनादा १८४।४१ |
| प्रियाविरहितस्या (सूक्ति ४२ १) २७४।१ | फलितस्य रसालशाखिन २३९।१०५ | बहव. पन्नवोऽपीह (सु.२२५५) ७८।२ |
| प्रियासखीभूतवतो मुदं २६९।४१६ | फुलेषु य कम (शा प ८२५) २२३।८० | बहवोऽविनया (म.५.४०) ३९३।६६५ |
| प्रिया हिता (पच.१ ३२) ३७८।५७ | फेनमा (भा १२ १२०५०) ३८८।४५५ | बहि सर्वा (मालती.१ १७) १७७।९७८ |
| प्रियेण संप्रथ्य (किरात ८ ३७) ३३८।८० | बहिरतिनिर्मलरूपं २४७।६३ | |
| प्रियेण सिक्ता (किरात.८.५४) ३३८।९७ | ब | बहिर्न लोला दृगपाङ्ग ३५१।२८ |
| बककोयष्टिमिरुष्टे पल्वले २२।७ | बहु जगद पुर (शिशु ११.३९) ३२८।११ | |
| बकुलकुलमिलन्मिलिन्दमाला ३३२।७५ |
५२ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| बहुतरहृते रसातलं १७०।७४३ | बाहू द्वौ च मृणाल (शृ ति १) ३७८।५५ | ब्रह्मघ्ने च सुरापे (पंच ४ ११) ७५।१ |
| बहुधा बहुभि (पच ३ ७५) ३९०।५४० | बाहू प्रियाया जयता मृणा २६४।२२८ | ब्रह्मघ्नोऽपि नर (चाणक्य ८२) ६४।४ |
| बहुधा राज्यलाभेन यस्तो १०१।९ | बिडालभक्षिते दु ख ३७२।१६३ | ब्रह्मज्ञान (भर्तृ ३ १४) ३७५।२२४ |
| बहुनात्र किमु (शा प ३५०६) २९२।२ | बिडौजा पुरा पृष्टवान् १००।३ | ब्रह्म नान्तमपि १८७।२४ |
| बहुनिष्कपद्रोही बहुधा ५४।१३ | बिन्दुद्वन्द्वतरङ्गि (सूक्ति.४.१०६) ३५।२९ | ब्रह्महत्या (मनु ११ ५४) १५४।४७ |
| बहुभिर्न (पच ३ ११९) १६५।५६५ | बिभर्ति वदनेन किं क २०३।१०३ | ब्रह्माण्ड कियद ८०।४३ |
| बहुभिर्बत (शा प २०८५) १४५।१९३ | बिभेति पिशुना (सु ३७८) ५६।१०८ | ब्रह्माण्डं प्रवि १२६।३० |
| बहुभिर्मू (वृ चाणक्य ७ ११) १६९।७१६ | बिभेषि सखि (शा प ३४३३) २८३।२ | ब्रह्माण्डकुम्भकारं १६।५९ |
| बहुनामप्यसा (सु २७४२) १४४।८३ | बिभ्रतौ (शिशु १० ८) ३१४।११ | ब्रह्माण्डच्छत्र (दशकु. पू १) २०१।६६ |
| बहूनामल्पसाराणा (भोजप्र १४५) ८३।३ | बिभ्रत्पाथ कपर्दे सुर ८१।१७ | ब्रह्माण्डमण्डली (भर्तृ स २८४) ७९।३ |
| बहूनि नरशीर्षाणि (सु १४४) ३९।२३ | बिभ्राणा गरलं कण्ठे भुजंग ५५।५२ | ब्रह्माण्डसपुटक्लेवर २७।८ |
| बह्वपि स्वेच्छया (शिशु २ ७२) ८४।५ | बिभ्राणा हृदये (कुव.१५५) २९०।८४ | ब्रह्मा दक्ष कुबेरो (सु ८३) ९।१९ |
| बह्वाशी स्वल्प (चाणक्य ६९) १६२।४०० | बिभ्राणे त्वयि (शा प ११६०) २४५।४ | ब्रह्मादयोऽपि ९१।०८ |
| बाणं हरिरिव कुरुते सुजनो ४७।९७ | बिभ्राणोऽभिनवे (सूक्ति २ ७२) १८।३५ | ब्रह्मानन्दप्रचुरं ३१८।४ |
| बाणकरवीरदमनकशत १०३।६९ | बिम्बाकारंसुधा (भर्तृ स ६१२) १९४।१५ | ब्रह्मा येन (गरुड अ ११३) ९३।९८ |
| बाणाः पञ्च (रत्न ३ १) २८२।१४१ | बिम्बितं मृतपरि (शिशु १० ५) ३१४।८ | ब्रह्मा विष्णुदिने ३७३।१९३ |
| बाणाशिक्षा (शिशु १८ ५६) १३०।८७ | बिम्बोष्ठ एव (नवसाहसाङ्क ) ३१२।९ | ब्रह्मैव सत्यमखिल ३५२।२९ |
| बाणाग्निमस्तकरुणे विकिरण् २८२।१३५ | बिलाद्वहिर्बिलस्यान्त ३६४।१४ | ब्राह्मण ब्राह्म (भा ५ १४२५) ३९०।५२० |
| बाणान्सहर (विद्ध १ २२) २८२।१४३ | बिसमलमशनाय खादु पाना ६०।२४६ | ब्राह्मण (हि.० ९६) १४७।२०२ |
| बाणेष्वारोप्य गुणान्विधाय ६५।१६ | बीजं चिन्तामणिश्चेत्क १२२।१६७ | ब्राह्मण (भा ३ १४०७५) ३८०।१२१ |
| बालक्रीडनमिन्दुशेखर २१।८७ | बीजं चेदिन्द्रदन्तिस्फुरित १३८।८५ | ब्राह्मणा गणका १५६।१३१ |
| बालक्रीडनमिन्दुशेखर १२१।१५३ | बीजैरङ्कुरितं (शा प ८५६) २२६।१६३ | ब्रूत नूतन (दश २ १३) ७९।२ |
| बालया वा (मनु ५ १४७) ३५१।१५ | बीभत्सा (शान्ति १ ७) ३७६।२५७ | ब्रूतेऽन्यस्या (शा प २४२) ३८८।४५० |
| बालसखित्वमकारणहास्यं १७४।८९५ | बीभत्सा (शान्ति १ २०) ३७०।९३ | ब्रूते सप्रति (शा प १२५६) १२२।१८२ |
| बालस्यापि रवे (पचं १ ३५७) ७८।१ | बुध कीटग्वचो ब्रूते २००।३० | भ |
| बाला चन्दन (शा प ३५२९) ३०५।२ | बुधामे न (भोजप्र १२८) १६१।३६७ | भक्तं रक्तं (शा प १५१७) १५४।७२ |
| बालाटाक्षसूत्रितमसती ३७।१५ | बुद्धिं वर्धयति श्रियं वित ८७।३६ | भक्ताना (पच १ ३०७) ९७।१७ |
| बाला तन्वी (सु १४०१) ३१७।२ | बुद्धिप्रभाव (भा ५ १३७४) ३८२।२३५ | भक्ति प्रेयसि (शा प.३७५६) ३५१।३५ |
| बालातप (गरुड पू १०८) ३८२।४८५ | बुद्धिमन्तं (भा १२ ६४९८) ३८३।२३७ | भक्तिप्रह्वविलोकन (रसगगा २ ७) १५।३२ |
| बालादपि (हि २.७९) १६४।४८२ | बुद्धिमत्त्वाभि (वृ श.६९) १६९।७०० | भक्तिप्रह्वाय (शा प १३८) २७।१२ |
| बाला मामियमित्छतीन्दुवद ३७२।१३५ | बुद्धिरूप (प्रसगा.१३) ३८३।२३९ | भक्तिर्भवे (का प्र १० ५२४) ४८।१२६ |
| बालिकारचितवस्त्रपुत्रिका ३७५।२४१ | बुद्धिर्या सत्त्वरहिता (सु ५१२) ७०।२० | भक्ते द्वेषो जडे (शा प ३४१) ६४।४ |
| बालिशस्तुनरो (र ४ ७ १०) ३९३।६३६ | बुद्धिशस्त्र. (शिशु २ ८२) १४६।१८४ | भक्तो गुणी (हि २ १६) १४४।७१ |
| बाले तवाधरसुधारसपान ३१३।४९ | बुद्धिश्च हीयते (भा ३.३०) ३७९।७० | भगवदनभ्युपगमनं ४३।१ |
| बाले नाथ (अमरु ५७) ३०९।७ | बुद्धिश्रेष्ठा (मा ५ १०५६) ३८३।२४० | भगवन्तौ (शा प ४४०) ९०।५ |
| बालेन्दुवक्राण्य (कुमार ३ २९) ३३१।२६ | बुद्धेरगोचर (शान्ति ३ १४) ३६८।३६ | भगिनि (सूक्ति ३९ ७) २८६।१४ |
| बाले बाला विदुषि विबुधा १७८।१००५ | बुद्धौ कल्ल (भा २.२६८०) १६६।६०३ | भगीरथाय (शा प ४००३) ३७४।१९७ |
| बाले मालेयमु (शा प ३८२९) ३३६।३१ | बुभुक्षित किंन (पच ४ १६) ३९०।५४२ | भग्नकुम्भशकल्येन ५९।२१५ |
| बाले ललामले (शा प ३२९३) २५८।४१ | बुभुक्षितैर्व्याकिर (भर्तृ सं.६२१) ६४।११ | भग्ना वयं (सु ३१७९) ६७।५१ |
| बालोऽपि नावमन्त (मनु ७.८) १४२।८ | बृहत्सहाय (शिशु २ १००) ८७।१९ | भग्नाशस्य (भर्तृ २ ९२) ९४।१०९ |
| बाल्ये गेहपतौ निमीलति २५६।४८ | बोधयन्ति न (शा.प.२७४) ७१।९ | भग्नासु रिपुसे (शा प १२४४) १०२।१९ |
| बाष्पाकुलं प्रलपतोर्गृहिणी ३२९।३ | बोधितोऽपि बहुसूक्तिवि ५९।२११ | भग्नेर्दण्डैरात (शिशु १८ ६७) १३०।९६ |
| बाहुपीडनकच (शिशु १० ७२) ३१८।१५ | बोद्धारो (भर्तृ.३.२) ३९०।५३६ | भङ्क्त्वा (शृगाररसाष्टक ५) २९६।१३ |
| बाहुवीर्यं (वृ.चाणक्य.६.११) ३८६।३५९ | भञ्जकीर्तिमपीम १३४।१७ | |
| बाहू तस्या कुचाभोग २६४।२२७ |
सस्थाननिर्देशसमनुक्रमकोशः
५३
भजन्त्यास्त (शा प ३६८.१) ३९।१३३
भण्डस्ताण्ड (सु ४६३) ६२।२७९
भद्रं तस्य तरो (शा प ३७७.१) ३५३।४५
भद्रं ते सदृशं (शा प ५८.१) २०८।३२
भद्रं भद्रं (नीतिरत्न ११) २२५।११८
भद्रामनो (रसगंगा २ श्लो) १०५।१४१
भद्रात्र ग्रामके (शा प ३८९५) ३४३।१६
भद्रे वाणि ममान (सु ३१९४) ६७।६९
भयं ताव (मुद्रा ५ १२) १३९।४
भयं प्रमत्तस्य (भाग ५ १) ३८९।४९०
भयादिवाश्लिष्य ३३८।८२
भयेन कृष्णान्यर्ह १२६।२८
भये वा (पच १ ११८) १६८।५०४
भर्ता देवो (दर्पदल ५८) १५६।१४५
भर्ता यद्यपि (भर्तृ स ६२५) ३५०।७९
भर्तारं किल (र २ २९ २०) ३८८।४६३
भर्तु पिण्डानुण (शा प ३९६१) ३६०।१
भर्तुर्यस्य कृते ३०९।१४
भर्तृभि प्रणय (किरात ९ ५४) ३१५।४६
भर्तृषुपसखि (किरात ९ ६६) ३१६।५८
भल्लैर्भिन्ना प्रति १३१।१९६
भवत इवाति १९६।८
भवतामहमिव १०३।६६
भवति गमनयो २०३।९८
भवति जघिनी २०३।९९
भवति (मालती. १० १५) ३१०।१
भवति (वासव ४) ४७।१०२
भवति (शा प १००८) १७७।९७६
भवतु विदितं (अमरु ३०) ३५६।१६
भवतु विदितं (सु १६१७) २९१।१४
भवत्कृते खञ्जन ३१२।३५
भवत्तुरगनिघुर १३०।१११
भवत्येकस्थले १६७।५३०
भवत्या विश्लेषे २९२।१६
भवनभुवि (विद्ध ४ १२) २६०।१०७
भवनमिव मदीयं ३५४।७७
भवनेत्रभवो २८२।१२४
भवने सुहृदो (पच २ १७) ३८९।४७६
भवनोदरेषु परि(शिशु ९ ३९) ३००।६४
भवन्ति ते ८५।१०
भवन्ति नम्रा (भर्तृ २ ६२) ७५।११
भवन्ति नरका (कुव १०४) ६९।५
भवन्तो वे (भर्तृ १ ५२) २५२।४८
भवबीजाङ्कुरजल (सु २६) १।९
भवभूतिमानाम्य (शा प १७८) ३६।३८
भवभूते सवन्वा ३६।३२
भवानिशकरोमेश १९५।४५
भवान्दि भगवा १०२।३०
भवितव्य (विक्रम १४८) ९१।२२
भवितव्यं यथा ९१।३०
भवित्री र (महा ना १० १२) २०५।९
भवेत्खपर (हि २ ३४) १४४।७८
भस्मनि स्मररिपो २४५।१
भस्मना (वृ चाणक्य ६ ३) ३८९।५३०
भस्माङ्गलिर्बको (शा प ४०६३) ३६४।८
भस्मान्धोरगफूत्कृति ५।६०
भस्मीभूत २८४।२९
भस्मोद्धूलन (कुव १२१) ३७०।८६
भागीरथी (कुमार ११ ३) २००।३६
भाग्यवन्तं (शा प ४४२) ९०।२
भाति निर्विवरे २६४।२५४
भाति रोमा (सूक्ति ५३ ६६) २६७।३४०
भाति विन्यस्तक (शा प ३२८७) २५७।२
भानु नाम (शिशु १० ८६) ३२१।१२
भानुबिम्बमिद २९४।११
भानो. पादैर्दहन ३३७।४१
भानो शीतकरस्य ४४।६
भानावभ्युदिते ३०२।१०
भानुर्वै जायते १९४।३६
भारं स (मा १२ १११४१) ३९२।६१७
भारत चेक्षुदण्डं २०५।१
भारत्या वदनं १३६।४७
भार्या पति (भा १ ३०२४) ३९०।५१७
भार्या हि (भा १२ ५५०६) ३९३।६४१
भार्या पुत्र (म ८ ४१६) ३७८।५६
भार्याविन्त (भा १ ३०२९) ३७८।५३
भार्यावियोग (चाण ३ १४) १७२।८२७
भाषासु मुख्या २९।१
भासते प्रति (का प्र ९ ३८७) २०५।१०
भासो रामिलसो (शा प १८८) ३७।६९
भास्वत्कर्कश ३०३।१२९
भास्वतकुण्डलमणि २५९।६९
भास्वद्वंश (प्र राघव १ ९) ३६।५२
भास्वाश्वततरू ३३०।७
भिक्षवो रुचिरा १९६।११
भिक्षार्थी स (कुव १५९) १३।४७
भिक्षाशनं (भर्तृ ३.१६) ७६।३७
भिक्षाशनं (शान्ति.१.२३) ३७५।२४३
भिक्षाहार (भर्तृ ३ २१) ३७०।१०१
भिक्षितकमल ३२५।५
भिक्षु कास्ति १२।४२
भिक्षुश्वोऽपि सक्लेप्सित ४।२७
भिक्षुद्वारि ११२।२७२
भिक्षो कन्था (सु २४०२) ६२।२८०
भिक्षो मास (दश ४ ७५) ६१।२७१
भित्त्वा (शिशु १८ २०) १२९।६७
भित्त्वा सद्य (मेघ २ ४४) २९२।२६
भिनत्ति (नीतिरत्न ७) २३०।२२
भिन्दन्नरातिहृदयानि (सु ४७) १६।४४
भिन्दानो (शा प ३८१४) ३२५।६६
भिन्ना महा (भामिनी अ १००) २३०।२९
भिन्ने चित्ते १६७।६३६
भिद्योरस्कौ (शिशु १८ ६५) १३०।९५
भिषजो (मा १२ ५१८४) ३८८।४४२
भीतवत्स (भा १ ५६२२) ३७७।१०
भीतासि नैव ३५५।२३
भीतिर्नास्ति भुजंगपुगव ५।५५
भीतो वाडववासतो २११।४९
भीमं यज्जलधिं १२०।१४०
भीमं वनं (मर्तृ २ ९९) ९२।७४
भीमश्यामप्रतनु (शा प ११४७) २२०।९
भीमभीमशुभ्रै (शा प ५००) १८१।१६
भुक्तं खाडुफलं (शा प ९७९) २३६।२०
भुक्तानि यैस्तव (शा प ९८०) २३६।१३
भुक्ता मृणा (भामिनी अ ४५) २२१।२३
भुक्तिमुक्तिञ्च (का प्र ४ ७८) ८७।१४
भुक्त्वा भव्य २३४।१२२
भुजभ्रूयुगलै १३१।१९८
भुजालंकं (प्र राघव ७ १५) ३०६।२७
भुजगकुण्डली व्यक्त ३।५
भुजंगभोग (काव्या ३ ३४६) १०१।१०
भुजतरुवनच्छाया (राजत १ ४६) ३३१।४५
भुजपञ्जरे (भामिनी शृ ३७) ३१।८४
भुजप्रभादण्ड २२१।१७
भुज्यन्ते खगहस्तिथा ७१।४०
भुजे विशाले विमले (सु २२७४) ७८।६
भुज्ञाना (राज त ३ १९४) ३७७।११
भुवनमोहनजेन २८२।१२९
भू पर्यङ्को (भर्तृ ३ ९३) १६९।६०
भूजाने किं न जाने १३४।३०
भूतानामपर (३ १३८५१) ३८८।४४५
भूतानाम (भा १२ २५२३) ३९३।६६०
५४ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| स्तम्भ १ | स्तम्भ २ | स्तम्भ ३ |
|---|---|---|
| भूतावेशनिवेशिता ३४।५६ | भोगाक्षमस्य १७१।८०६ | भ्रात कोकिल (शा प ८५१) २२९।१४४ |
| भूतैराक्रम्य (भाग ११ ७) ३८५।३०८ | भोगा न (भर्तृ ३ ८) ३७४।२०९ | भ्रात पञ्जर (शा प.१२०६) २४६।४३ |
| भूत्यालेपनभूषित ६।६३ | भोगा (भर्तृ ३ ३६) ३७३।१८६ | भ्रात पान्य (कुव १७८) ३४३।९३ |
| भूत्वा कल्प (प्रब ०१) ३७३।१८४२ | भोगा भङ्गुर (भर्तृ स २०२) ३८५।३२७ | भ्रात पान्थ (शा प ३४०६) ३५५।८६ |
| भूप कूप १४९।२८२ | भोगासक्तैकचेता १९८।१०६ | भ्रात पान्थ प्र (शा प ३८९४) ३४३।९५ |
| भूस्तन्मौलित १२६।१२ | भोगास्तुङ्ग (भर्तृ ३ ३५) ३७३।१८५ | भ्रात प्राणगणप्रयाण ३५७।३६ |
| भूयन्मीलितटीषु १२३।१९१ | भोगिन (पच १.६९) १४६।१७४ | भ्रातप्रम्ये कुविन्द २४६।२८ |
| भूमात्रं कियदेन ३६।१३९ | भोगीन्द्र प्रमदो (सु २६३८) १३७।६४ | भ्रातर्द्विरेफ २८३।१५९ |
| भूमिपतावर्ध १६९।७२० | भोगेच्छा नोप १६८।६८५ | भ्रातर्धार्तराश (भर्तृ स ४९) ७४।३६ |
| भूमिर्मित्रं (काम नी १० २८) १४९।३११ | भोगे रोगभय (भर्तृ ३ ३२) ३७०।९० | भ्रातर्भ्रम्य (शा प ११८४) २२४।१०६ |
| भूमौ स्थिता (भामिनी क २३) ३६२।३० | भोज त्वत्कीर्ति (भोजप्र १२७) ११७।७८ | भ्रातश्चन्दन कि (शा प ९९३) २३७।५४ |
| भूय कण्ठावधृति १९।५६ | भोज त्वद्दानपाथो ११७।७५ | भ्रान्त याचन (शा प ४२१) ७७।५३ |
| भूयस्तराणि यदमूनि ३०१।७२ | भोजनाच्छादने (पच.५ ६०) ३४९।३१ | भ्रान्त देशमनेक (भर्तृ ३ ४) ७७।५४ |
| भूयादेश सता १९।३७ | भोजनान्ते च कि १९६।५ | भ्रान्ता वेदान्तिन ४४।६ |
| भूयिष्ठ द्रविणात्मज ९४।११५ | भोजप्रतापं तु (भोजप्र ९२) ११७।८५ | भ्रान्त्वा (सूक्ति ९७ २८) ११९।१३२ |
| भूयो गर्जितमम्बु (शा प ७८७) २१३।६७ | भोजप्रतापामिर (भोजप्र २१८) ११७।८६ | भ्राम्यची (शा प ३८५७) ३४०।१३० |
| भूयो निपीय ३२७।९ | भोज्यं (चाणक्य २ २) १५५।१२१ | भ्राम्यन्मन्दर (पार्वती ५ २३) १५।३५ |
| भूयो भूयस्त्व १२२।१७३ | भो पान्थ त्वरितो ३५५।८७ | भ्रुवौ काञ्चिल्ली (शा प ३२७४) २५५।२६ |
| भूरिभारभरा (शा प ५६२) २०५।४ | भो पान्य (भर्तृ स ८५०) ३५४।७४ | भ्रूचातुर्या (भर्तृ १ ३) २५१।४१ |
| भूरिशोऽपि च २३९।१०३ | भो मो. करी (शा प ९०५) २३१।६९ | भ्रूचापवल्ली (कुव ८५) २७७।१२ |
| भूरेणुदिग्धा ( ध्वन्या ३) ३६०।२२ | भो भो कि कि (शा प ११५२) २२०।६ | भ्रूचापे निहि (शा प ३५०२) ३१४।७० |
| भूर्ज (शा प १०५६) २४३।१८४ | भो भो श्रीभो (शा प १२५२) ११७।९५ | भ्रूपल्लवो धनुर (शा प ३३८०) २५५।२३ |
| भृशक्रस्य यशा (सूक्ति ९७ २५) १३९।९ | भो मेघ (मृच्छ ५ ४७) २८३।१५१ | भ्रूभङ्ग न करोषि ३०७।६३ |
| भूशय्या (पच १.२९२) ९७।१० | भो रोहिणि त्वमसि २८५।४९ | भ्रूभङ्गे रचि (अमरु २८) ३५९।९९ |
| भूषणाद्युप (मुद्रा ३ २३) १०२।३२ | भो हंसास्ताव (शा प ८०७) २२२।४० | भ्रूभङ्गै क्रियते ३०७।६२ |
| भूसर्पकरंजो (शा.प १२७४) १३२।३१ | भ्रमच्चरणपल्लवक्वण ३४६।२९ | भ्रूभेदै कति (शा प ३७६३) ३५३।४१ |
| भ्रुकुटीकुटिल ३६४।२० | भ्रमति गिरि (सूक्ति १०८ २) २३५।४ | भ्रूभेदो रचित (अमरु ९७) ३५८।६७ |
| भृङ्गश्रेणीश्याम (शिशु १८ ४१) १२९।७८ | भ्रमन्वनान्ते नवमञ्ज ९२।५९ | भ्रूभ्या प्रियाया भवता मनोभू २५९।५८ |
| भृङ्गाङ्गनाजनम (शा प ७९९) २२१।१६ | भ्रमन्स (वृ चाणक्य ६ ६) १५९।२८१ | भ्रूयुग्ममुच्चैर्धनुरञ्जितञ्जय ३६७।३० |
| भृङ्गालीकण्ठमाला ३२७।४१ | भ्रमन्स्वैरं भ्रातर्भ्रमर २२४।९८ | भ्रूरेखायुगल (शा प ३२९७) २५८।५२ |
| भृङ्गालीमुदरे २७२।६६ | भ्रम भ्रमर यूथीषु २२२।४५ | भ्रूविलास (किरात ९ ५६) ३१५।४८ |
| भृत्यैर्विना (पच १ ८८) १४४।८६ | भ्रमय (मालती ९.४२) २८३।१५२ | भ्रूविभ्रमरेखा च तिलोत्तमा २७०।२४ |
| भृशमद्यत याधर ३४६।१९ | भ्रमर भ्रमता (शा प ८१८) २२३।११ | म |
| भेकेन कणता (भट्ट १६) २७७।४६ | भ्रमर मरणमीति २२३।१० | मकरीविरचनभङ्ग्या (शा प ७७) २२१।०८ |
| भैके कोटरशा (भोज २०१) २१३।६५ | भ्रमरहित कीदृक्षो १९६।१० | मक्षिका मशको वेश्या १५६।१२८ |
| भेतव्य (मुद्रा ३ १४) १३९।८ | भ्रमरहिता सा ३०।१९ | मक्षिका व्रणमि (चाणक्य ५८) १६७।६३७ |
| भेदाभेदौ सपादि ३६९।६६ | भ्रमात्प्रकीर्णे (शा प ३०१७) ३४५।४९ | मग्ने मेरो पतति तपने १७।५ |
| भेरीझाङ्कृति १२२।१८४ | भ्रष्टं नृपति (शा प ११०५) २१७।५१ | मङ्गलकलशाद्वयमय २।१२ |
| भैषज्यमेतद्दु (भा ११ ७२) ३९३।६५६ | भ्राजिष्णवो (सु ७८०) २२९।२३८ | मज्जत्वम्भसि (भर्तृ स ४८) ९४।११६ |
| भोक्तुं पुरुष (काम १३ १०) ३८९।४९९ | भ्रात कङ्कण किं ३५६।२९ | मज्जन्तोऽपि (सूक्ति ६ २९) ५२।२५८ |
| भोक्तुं (काम.नी.१३.१०) ३८९।४९९ | भ्रात (शा प ४१६४) ३७४।२०० | मञ्जिष्ठारागदी (शा प २२८०) ३२८।२४ |
| भोग. परो (हृ. श ७२) १६९।७०३ | भ्रात कस्त्व १००।७ | मञ्जुलघौ सभाचितगुणे १८४।४९ |
| भोगस्य भाजन (हि.२.१२५) ३४७।२०८ | भ्रात काञ्चन (शा प ११९३) २४८।७२ | मणि शाणोल्ली ( |
संस्थाननिर्देशमनुक्रमकोशः ५५
| मणिर्लुठति (नीतिरत्न १२) २१७।४७ | मधुर सुधाव (सा द १० १७) २७०।१५ | मनोभुर्मुग्धासु क्षिपति १०६।१५९ |
| मणिहारलता विभाति तन्व्या २६६।३०५ | मधुरमिव वदन्ति स्वागतं १४१।३ | मनो मधुकरी मेघो मानिनी १५७।१८५ |
| मण्डलीकृत्य (शा प ५६९) २०७।२० | मधुरया (शिशु ६ २०) ३३२।६८ | मनोरथरथारूढ (सु ३२४१) ७६।१९ |
| मण्डले मण्डलाकारो रेखा २०७।१० | मधुरवचनै (सुधारति १ ४२) २५४।३९ | मनोरथान्करोत्युच्चैर्जनो ९१।१९ |
| मतिरेव (गुणरत्न ८) १७५।९२५ | मधुरस्वना घृतोर्णा मध्या १८६।६ | मनोरागस्तीव्रं (मालती २ १) २८४।२७ |
| मत्तेभकुम्भपरि (पचं १ २२०) ३१९।२७ | मधुरिमरुचि (का प्र १० ५१६) ५९।२०८ | मन्त्रतन्त्रार्पित (शा प १३५१) १४२।२१ |
| मत्तो हिनस्ति सर्वं मिथ्या १००।५ | मधुरेणदृशा (काव्या ३ २०) ३८९।४६९ | मन्त्रबीजमिदं (हि २ ४५) १४७।२१४ |
| मत्वा परीक्ष्य (भा ५ १४८७) ३८८।४६१ | मधुरोन्नतश्रु (शिशु ९ ७९) ३११।११ | मन्त्रभेदेऽपि (भा १५ १९३) १४७।२२८ |
| मत्वा चापं शशिमुखि निज २६७।३३८ | मञ्चुव्रतौघ (कुव १११) ३०४।१५२ | मन्त्रसस्कारसपन्नास्तव २९३।१ |
| मत्वा लोकम (सा द ६ १८७) १०३।५७ | मञ्जूके माध्वीक पिबसि २२४।९७ | मन्त्रिणा पृथ्वि (हि २ १६७) १४७।२१५ |
| मत्वा सारं गुणाना (सु ४९४) ७२।६१ | मथो मन्दं मन्दं मरुति १८२।४३ | मन्त्रिणा (पच १ १३८) १६४।५०७ |
| मत्स्यादयोऽपि जानन्ति नीर १५५।९१६ | मध्यं तनुकृत्य (नैषध ७ ८०) २६५।२८१ | मन्त्रे तीर्थे द्विजे (विक्रम ६४) ३७८।५४ |
| मदकलकृतान्तकासर २८४।८ | मध्यं तव (सा द १० १५) २६६।३१४ | मन्त्रो द्वावि (शा प ४१५८) ३७५।२२१ |
| मदनदहन (शा प ३४१३) २७५।२१ | मध्यं विष्णुपदं कुचौ शिव २७२।६८ | मन्त्रो योव (शिशु २ २९) १४६।१८१ |
| मदनमपि गुणैर्विशेषयन्ती २७२।१३ | मध्यत्रिवली (शा प ३३४६) २६७।३३४ | मन्थक्ष्माधरघूर्णिता (सु ३५) १५।३७ |
| मदनमवलोक्य (शा प ८२४) २२२।४९ | मध्यमोपलनिभे (किरात ९ २) २९०।२२ | मन्थानभूमिधर (कुव २७) ३०४।१५७ |
| मदमयमदमयदुरगं (सु ३१) २२१।१५ | मध्यस्य प्रथ्रिमा (सा द ३ ५८) २५६।५१ | मन्यायस्तारणी (वेणी १ २२) ३६६।१३ |
| मदरक्तस्य (भा ५.१४८४) २९४।७०० | मध्यात्ससानीय सुसारभा २६७।३३७ | मन्दं निक्षिपते पदानि ३३।५२ |
| मदर्थसद्भू (नैषध १ १३७) ३६२।१९ | मध्याह्ने (दश रू २ ५०) ३३९।१२३ | मन्दं निधेहि (शा प ३६२०) २९८।१५ |
| मदसिफमुखै (किरात २ १८) ७९।१८ | मध्याह्नार्क मरीचिका ११।३ | मन्दं मन्दं श्रवणपुटकोपान्त २५६।४१ |
| मदाम्भसा (शिशु १७ ६८) १२७।३७ | मध्याह्ने चलतालवृन्त ३३७।४८ | मन्द मरुद्वहति गर्जति वारि २७४।३ |
| मदुक्तिश्वेद्दन्तर्मद (कुव १३६) ३३।४६ | मध्याह्नेऽति (शा प ३८६१) ३३९।१२१ | मन्दं मुद्रितपास (अमरु.१२७) ३४१।५२ |
| मदेकपुत्रा जननी (नैषध १ ३५) ३६२।१८ | मध्याह्ने दव (शा प ४०१४) ३६२।३६ | मन्दमग्रिमधुर्य्य (कुव ६५) ३२२।४ |
| मदोपशमनं शास्त्र ३९।११ | मध्याह्ने नूनमापोऽपि तिग्म ३३६।३४ | मन्दमन्दगमना करिणो २४४।१४ |
| मद्गेहे मुशकीव (सु ३१९७) ६८।७७ | मध्याह्ने हरितो हुताशन २३७।७७ | मन्दश्चन्द्रकिरी (शा प १२५४) ११६।६६ |
| मद्यपस्य कुत सत्य दया १००।३ | मध्ये न कृशिमा स्तने ३५६।९ | मन्दस्मितेन (भामिनी क १२) २७८।४६ |
| मद्यपा कि न जल्पन्ति १६६।५९२ | मध्यन (सा द १०८६) २६५।२६७ | मन्दाकिनीपय पान १५८।२४१ |
| मद्यमन्दविगल (शिशु १० १७) ३१५।२० | मध्यन सा (कुमार १ ३९) २६७।३२५ | मन्दार कुसुम (विद्ध २ ३) २७९।५६ |
| मद्युगमध्योत्पन्ना कृतयुग ९८।८ | मध्येऽथ बलिसद्म दृष्टि २६६।२९८ | मन्दारमाला (शा प ६७) १०१।६१ |
| मद्वाणि मा कुरु (भामिनी शा २८) ४०।५० | मन प्रकृत्यैव (सु १२०६) २७७।१३ | मन्दारमेदुरमरदरसाल २२२।८७ |
| मधुकरगणश्वतं (शा प ८२९) १७७।९९८ | मनसा चिन्तित (दृ श ३८) १६१।३७६ | मन्दोद्धूते शिरोभिर्मणि ११२।२८३ |
| मधुकर तव (शा.प ८१५) २२२।४७ | मनसि (शा प ३३८१) ३२९।५ | मन्दोप्यमन्दतामे (मालवि.२ ७) ८६।१० |
| मधुकर मा कुरु शोकं २२२।६२ | मनसि वचसि (भर्तृ स १९) ५१।२२१ | मन्दोऽयं (सूक्ति ५९९) ३३२।९२ |
| मधुकरैरपवाद (शिशु ६ ९) ३३२।६४ | मनसैव कृतं पाप न १६७।६३५ | मन्दिन्द्या (शान्तिश ३ ८) ७५।१६ |
| मधु द्राक्षा (भामिना शा २९) ३५।१६ | मनस्यन्यद्वचस्य (वृ चा २ ६०) ५५।५० | मन्ये तद्रूप (शा प ३३५७) २६८।३८८ |
| मधु द्विरेफ कुछ (कुमार ३.३६) ३३१।३१ | मनस्विनो न (दृ श ८७) ८०।२१ | मन्ये मायैमम (शा प ४०९०) ३६७।३ |
| मधुधारेव न मुञ्चसि मानिनि ३०५।१३ | मनस्सिहृदय धत्ते (दृ श ९) ८०।२० | मन्येऽमुना कर्ण (नैषध ७ ६४) २६१।१२९ |
| मधुना सिञ्चेन्निम्ब्र निम्बं १६०।३१६ | मनस्वी म्रियते (हि १ १३३) ८०।१९ | मन्ये मृत्यो सपत्नी जगति १२२।१६८ |
| मधुप इव (भामिनी प्रा १७) २४४।२१७ | मनागनभ्यावृ (शिशु २ ४३) १६३।७१७ | मन्येऽरण्ये कुलगिरि ११४।२० |
| मधुपराजिपरा (हरिविजय) ३३०।१ | मनीषिण (भोजप्र ५८) १७४।९०२ | मन्ये सत्यमहं लक्ष्मी समु ६२।७ |
| मधुपानप्रवृ (सा द १० ९५) १०२।४२ | मनुष्यजातौ तुल्याया (सु ३२१४) ९७।७ | मन्ये समास (शा प ३३५०) २६७।३२४ |
| मधुपानसमुल्लसत्प्रवाल ३२०।१० | मनोजराजस्य सितातपत्र २९१।१६ | मन्ये शशरीरमपि तवैव १०७।१८९ |
| मधुपे मालतीपुष्पं सतुण २२२।४६ | मनो धावति सर्वत्र १५८।२२६ | मम करग्रहणाय (शा.प.५९३) १८२।३८ |
| मधुमधुरिमभङ्गी मेजिरे ३४४।४२ | मनोऽपि शङ्कमानाभि २१३।८ | मम प्रिया कैरविणी करेण ३०४।१४९ |
५६ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| पाद / प्रतीक | पृष्ठ।संख्या | पाद / प्रतीक | पृष्ठ।संख्या | पाद / प्रतीक | पृष्ठ।संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| मम रूपकीर्तिं (शिशु.) | २८८।२७ | महतोऽपि हि विश्वासा | ४७।९९ | मा गमनमदवि (किरात.९ ७०) | ३१६।६२ |
| ममत्वं हिन (भा २ १९५६) | ३८९।४९६ | महतो हि (भाव.३१) | ३७७।१ | मा गर्वमुद्वह (सूक्ति ८६ १४) | ३५५।२ |
| मया कुमार्यापि (शा प ३७६२) | ३५२।२१ | महतो सुवृत्तयो सखि | ४७।९८ | मा गा प्रत्युप (भर्तृ स ६४६) | ११४।११ |
| मयास्योप (काम नीति ९ १०) | ३८९।४७४ | महल्पल्पेऽप्युपा (हि ३ ४९) | १८४।२३४ | मा गा विषाद (सूक्ति १९ ४) | २२३।८५ |
| मयि जीवति बीजाढ्ये | २४१।१३८ | महद्भि स्पर्धे (पच १ ४०४) | ३७७।२ | माघश्वोरो मयूरो सुररिपु | ३७७।१ |
| मयि ते पादपतिते (पंच ४ ८) | ३०५।३ | महद्भिरोधैस्तम (सु.१९०३) | २९४।४२ | माघेन विम्रितोत्सा (सूक्ति ४ ५९) | ३७।६४ |
| मयि मलयसमीरो वर्षतीव | ३०९।२ | महागजाना गुरुबृंहितै | १२८।३८ | मा चक्र चक्रि(शा प १२५७) | १२३।१९४ |
| मयि सकपटं (सा द ३ १६२) | २७९।७० | महागजाना (कुमार १६ ४२) | १२८।४३ | मा जीवन्ध (शिशु २ ४५) | ८१।१ |
| मयि स्थितिर्न (सु २५२१) | ००४।११५ | महाजनस्य संसर्ग (पच ३ ५९) | ८६।२ | माणिक्यद्रव (राघवचैतन्य) | २२७।२०० |
| मयूखनखरत्रुट (सु.१९८१) | ३०१।८६ | महातरुर्वा (सु.७८८) | २४१।१४६ | मात क हृदये (दश रू २ ३९) | २८६।३२ |
| मय्यायाते सपदि शयना | ३५७।४९ | महादेवो देव (भर्तृ स २९९) | ३८८।४५८ | मात किं यदुनाथ देहि | २४१।५२ |
| मरणं प्रकृति (रघु.८ ८६) | ३७२।१७० | महात्मानोऽनुगृ (शिशु २ १०४) | ४५।१४ | मातङ्ग कुम्भ (सूक्ति.५३.३८) | २६६।३०२ |
| मरालश्रेणीभिर्नियतमुप | २७५।३० | महानदीप्रतरणं (विक्रमच १६) | १६७।६५० | मातङ्गा किमु (सूक्ति २२ ६) | २३१।४९ |
| मरौ नास्त्येव सलि (सु ९३८) | २२०।१ | महानपि (सूक्ति ९८.२१) | १९५।७ | मातज्ञाना (शिशु.१८ ३४) | १२९।७३ |
| मर्कटस्य सुरापानं तस्य | १५९।२६८ | महानप्यल्पता (हि.३ १२) | १६४।४९८ | मातङ्गीमिव (भोजप्र २६१) | ३४।६६ |
| मर्तव्यमिति (विक्रम.१४३) | १६५।५४९ | महानुभावसंसर्ग (शा प ३२१) | ८६।१ | मातङ्गैरथ यैर्महे(शा प १५७६) | १४३।४६ |
| मर्दितरावणक्सौ सरयू | २२१।७ | महानुभावसंसर्ग कस्य नो | ८६।३ | मातरं पितरं पुत्र (भोजप्र ३) | ६९।४ |
| मर्यादानिलयो महोदधि | २४९।१०३ | महान्तमप्य (भा ५ १५३३) | ३८८।४६४ | मातर्जीव किमेत (सु ६९) | ७।९४ |
| मलयज (काव्याल सू ४ ३ १०) | २९९।२३ | महाप्रलयमारु ( वेणी ३ ४) | ३६५।५ | मातर्धर्मपरे दया (सूक्ति ९६ ३) | २०८।३१ |
| मलयभुवि विरुद्धश्चन्दनेना | ६०।२४७ | महाबलान्प (भा ५ १५४६) | ३८८।४५३ | मातर्नति परमनुचितं यत् | ९७।११ |
| मलयमग्ना (अमरू ३२) | २८३।१५३ | महामतिरपि प्राज्ञो न | १६४।५०६ | मातमयि (शान्ति ४.२३) | ३६९।६४ |
| मलयशिखरादाकैलास | ३३४।१३० | महाराज श्रीमज्जग (भोजप्र.८२) | १३५।२९ | मातर्मेदिनि (भर्तृ स ३०१) | ३६९।७५ |
| मलयस्य गिरेरपत्यमादौ | २१९।५ | महाशयमतिस्वच्छं नीर | १९५।१ | मातर्लक्ष्मि (भर्तृ स.३०२) | ३७०।१०२ |
| मलयाचलगन्धेन विन्ध्यनं | ८६।४ | महाशय्या (शान्ति.४ ८) | ३६८।५४ | मातस्तर्णकर (सु १०१) | २३१।४६ |
| मलयानिल (सु १६६७) | ३६७।२८ | महासेनो यस्य प्रमदमय | ३६०।३२ | मातस्तातजटासु कि | १२।३१ |
| मलयानिल (काव्याल ३ ३०) | ३३१।१० | महास्वन (कुमार १४ ३२) | १२८।३७ | मा तात सपदा (सु २७४९) | १४५।१३३ |
| मलिनयितुं खलवदन (कुव ९४) | १३८।२ | महिम्नामन्तर पश्य (सु २२५७) | ७८।४ | मा तात साहस (सु २७४७) | १४५।१३० |
| मलिनहुतभुग्धूम (सु १७६०) | ३४१।५४ | महिष्या दृष्टया भाव्यं | १४४।४२ | माता नताना सघट्ट | २०५।८ |
| मलिना अपि सय्यमनात्कृ | २५७।१० | महीपते सन्ति (शा प १६७) | ३३।३२ | माता निन्दति (नीतिसार २) | ६४।१६ |
| मलिनात्मना (सूक्ति १४.४) | २२४।१३० | महीमण्डलीमण्डपीभूत | ३४१।४७ | माता पिता (शा प १३४७) | १४६।१५२ |
| मलिनेऽ |
| पाठ | संख्या | पाठ | संख्या | पाठ | संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| मायति प्रमदा | ३४०।४५ | मार्गं देहि पदं (शा प ५८९) | १४१।३ | मीलत्कैरवलोचना | ३४२।२३ |
| माद्यद्विग्गज (शा.प.११३१) | २१९।११ | मार्गे कर्दम (शा प ९६२) | २४१।४५५ | मुकुटे रोपित. (हि २ ७३) | १६४।४८१ |
| माद्यद्द्रैतण्डगण्ड | १२१।१६६ | मार्गे पञ्चचिते (सूक्ति ७१.२) | ३५०।३२ | मुकुलितमति (किरात १० २७) | ३४०।२९ |
| माद्यन्मातङ्गकु (शा.प.४०७२) | ३६६।१२ | मार्गो भूरि (शा प ७७६) | २१३।६४ | मुक्तं मौक्तिकदाम | २९८।२० |
| मा धनानि कृपण | ७२।४७ | मार्जारो महिषो (हि १ ८७) | १६३।४४९ | मुक्तमूललघु (किरात ९ ५) | २९४।२४ |
| माधवस्य मुरली | २४६।३६ | मार्तण्डमण्डलसमं | १३३।९ | मुक्ता (सूक्ति ९७ १९) | ११७।९२ |
| मा धाव मा धाव | ९२।५० | मार्दव सर्वे (भा ५ १४९८) | ३८९।५०० | मुक्ता पतन्ति भूमौ | ३२०।७ |
| माधुर्यं (वामर्योक्त १) | १७९।१०३५ | मालतीकुसुमे | २३८।८० | मुक्ताताटङ्कयुग | २६१।१३१ |
| माधुर्यंसाराधरि | २४३।१८९ | मालतीमुकुला | २४३।२०९ | मुक्ताफलै किं | ४०।३३ |
| माधुर्यैरपि धुर्यैर्दाक्षा | ३५।१४ | मालाबहर्मनोज्ञ | २५१।८१ | मुक्ताभा ऋकपाल (शा प.१०६) | ९।१२९ |
| माध्वीके विधुमण्डले | १८३।६४ | माला बालाम्बुज | ३५९।८४ | मुक्ताभूषणमिन्दु(भोजप्र.२५१) | ३२१।२७ |
| मानं मानिनि मुञ्च (शृ ति २९) | ३०७।६९ | मालिन्यमब्ज (कुव.१२४) | ३१३।५३ | मुक्तावली स्मर | २६६।३११ |
| मानं मानिनि मुञ्च | ३०८।१७ | मालिन्यमवलम्बे | ५५।६८ | मुक्ता विद्रुमम (कुव ३७) | २७२।७६ |
| मानभ्रष्टपुना (शिशु १० २५) | ३१५।२८ | मालिन्यं परिदृश्यते | ३२५।६२ | मुक्ताहारगुणीभूय | २४६।२४ |
| मानम्लानमाना | ३५८।५७ | मा वन (भा ५ १३७८) | ३८९।५०८ | मुक्ताहार न च | २८६।१७ |
| मानसदुद्गहत (भर्तृ सं ६४८) | ३८५।३३८ | मा वम सत्तृणु | ४।१७ | मुक्ताहारलता (प्रव ७१) | ३५०।८२ |
| मानव्याधि (अमरु १५७) | ३०९।१० | मासि मासि (शा प ४८३) | १५५।११५ | मुक्तिर्हि नाम परम (सु ९४) | ४।३८ |
| मानाभिवर्धनम | ३५१।३१ | मितं ददाति (भा १२ ५५६६) | ३६१।४ | मुक्ते काञ्चनकुण्डले | ३४५।५४ |
| मानिनीजन (किरात.९ २६) | २९९।२२ | मितं भुङ्क्ते (भा ५ १०८८) | ३८८।४४० | मुक्तेषु रश्मिषु (अ.शाकु १.८) | १४०।३ |
| मानिनो हतमानस्य | ८०।१८ | मितमायुर्वयो (शा प ४०९२) | ३६७।५ | मुक्तेर्यास्यति (सूक्ति २ ७१) | १९।३६ |
| मातुर्व्यं वरवंश (सु २९४९) | ८९।५ | मित्रं कलत्र (शा प ४१२५) | १७२।१७५ | मुक्तोत्कर (सा द १० ४५) | २६३।२१७ |
| मातुव्ये सति (प्रसंगा ८) | १८०।१०५० | मित्रं परित्यज (पंच ५ २४) | ३८१।१७८ | मुक्तो मानपरिग्रह (सु १६३५) | ३०९।४ |
| माने नेच्छति (भट्ट.७) | ७७।५१ | मित्रं प्रीतिरसाय (हि १ २१४) | ८८।१९ | मुक्त्वानङ्ग (विद्ध शा ३ २५) | २७६।४० |
| माने म्लायिनि (भर्तृ स ३०३) | ३७६।२५४ | मित्रे स्वेच्छतया (नवरत्न.१) | १७८।१००९ | मुख जुम्भारम्भि | ३२१।२१ |
| मानोन्नेतेत्य (शा.प ३५४७) | ३०९।५ | मित्रखजनबन्धू (भोजप्र १५६) | १५३।१५ | मुख तस्या (शा प ३४७२) | २७०।६ |
| मानो वा द (पंच ५.३) | ३७८।४५ | मित्रद्रुह (सु २९९०) | १५५।९२ | मुखं पद्मदला (चाणक्य ७१) | ४९०।५१६ |
| मान्याता स (भोजप्र ३८) | ३७४।२०४ | मित्रद्रोही (विक्रम ५७) | १६४।४५९ | मुख पाण्डुच्छायं (सु १०९६) | २८६।१९ |
| मान्या एव हि | ४५।१७ | मित्रवान्सा (पच २ ८२) | १६४।५२२ | मुख प्रसन्न (हि २ ५९) | ३७७।१९ |
| मा पुनस्तमभि (शिशु १० २१) | ३१५।२४ | मित्रखजन (शा प १४३८) | ३७७।२४ | मुख प्रियाया | ३३०।३ |
| मा बोधि वैद्यकमथापि | ४३।४ | मित्राणि शत्रुत्वं (मुद्रा ५ ८) | १५१।२८१ | मुखं यदि किमिन्दु | २७१।४० |
| मा भूत्सज्जनयोगो | ४८।१४९ | मित्राण्येव हि (र ४ २० १८) | ३७०।२५ | मुख वहति | २६२।१६३ |
| मा भूजन्म महाकुले (सु ३१९९) | ६८।८३ | मित्रार्थे (पंच १.३४६) | ३७७।२६ | मुख विकसित (शा प ३२७७) | २५६।३५ |
| मा भैष्ट नैते (शा प.३९६४) | ३६०।३ | मित्रे कापि (सूक्ति ६८ १४) | २९६।१२ | मुखकमलक (शिशु ७ ४४) | ३३४।१०८ |
| मामाकाशप्रणि (मेघ २ ४३) | २९२।२५ | मिथ्योऽर्धचन्द्र (कुमार १६ ४९) | १२८।२४ | मुखकृतबिस (शा प ३८२६) | ३३६।१९ |
| मा मालति म्लायसि | २३९।८३ | मिथ्यौषधैर्हन्त | ४४।६ | मुखमात्रेण (सु ९९६) | ३७।७ |
| मा मा ससाध्वसम | ३०५।२२ | मिलितमिहिर | १३०।११० | मुखमिन्दुर्यथा (सा द १० १८) | ३०५।५ |
| मायामयः प्रकृत्यैव (सु ३३७) | ५६।८३ | मिश्रीभूते तत्र (शिशु १८ १८) | १२९।६३ | मुखविधुपरिवृत्तो | २५५।९६ |
| मायामीनतनोरूनोतु | १७।९ | मीन. ज्ञानपर. (कविता ६०) | ३८६।३५८ | मुखसरोरुहं (शिशु ६ ४८) | ३४४।३६ |
| मा याहीत्यपमङ्ग (सु १०४९) | ३३०।८ | मीनवती नयना (रसग २रू) | २५३।९ | मुखारविन्ददत्त | २६१।१४१ |
| मारमासुषमा (सा.द १० १३) | २०६।११ | मीमासका कति | ४३।२ | मुखारविन्दोपरि | २५५।७८ |
| मारयन्त्या (शा प.३३६५) | २६९।४२३ | मीमासको मही | १०२।२४ | मुखेन गरल (कुव १७१) | २३६।६ |
| मारस्य मित्रमसि | २१०।२६ | मीमासा पठिता | ४१।७२ | मुखेन चन्द्रका (सूक्ति ५३.१७) | २७०।२ |
| मारारिशकरामेभ (काव्याल.५.६) | २०५।७ | मीमांसाणर्वसोमं | २२१।०६ | मुखेन नोद्गिर (शा प २४९) | ४५।१५ |
| मा रोषीश्चिरमेहि (गा.प.४०८) | ६७।६२ | मीयता कथमभी (नैषध.५.३८) | ६९।१८ | मुखेनैकेन विध्यन्ति (छ्र.३७५) | ५३।१०५ |
| मा वनं छि (भा.५.१६७८) | ३८९।५०४ |
८ सुभा०अनु०
५८ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| मुखेन्दुच (सूक्ति ५३ ४६) ५६४।२६० | मूर्ख व्यसनिनं १४२।३० | मृत्युर्मायति मूर्ध्नि ७५।१९ |
| मुखे यद्वैरस्यं (शा प १०५३) २४२।१८० | मूर्ख खल्प (हि ३ १२५) ३९।१३ | मृत्योर्बिभेषि किं (सु ३२९५) ३७५।२३१ |
| मुखे हारावाप्तिर्नय (शा प १२६२) ११३।७ | मूर्खेष्विहानि षडिति ३९।२ | मृत्योर्वा (भा १२ ९९५२) ३८८।४४३ |
| मुखैरसौ (किरात.४ ३६) ३४४।२८ | मूर्खत्वं सुलभं (उद्भट १) ४१।६६ | मृदुचरणतलाप्रदु ३३४।११२ |
| मुख्यमेक १५९।२६३ | मूर्खशिष्योप (वृ चाणक्य १४) १५५।९१ | मृदुनातिसुवृत्तेन (पञ्च.१.२९४) ९७।१२ |
| मुग्धस्य कलिंविजि २९६।६ | मूर्खश्विरा (वृ चाणक्य ४ ६) ३८९।४७१ | मृदुपवनवि (विक्रमोर्व ४ २२) २८३।१६६ |
| मुग्धस्य ते वद (शा प ३४३०) २८५।४७ | मूर्खस्तु (वृ चाणक्य.३ ७) ३८८।४४३ | मृदुभिर्बहुभि (दृ श.५४) १५१।३६० |
| मुग्धा कान्तस्य (काव्या २ १५५) ३२९।१ | मूर्खा यत्र (वृ चाणक्य ३ २१) ३८१।१९० | मृदुराई. (हरिवश ११६८) ३८१।१९१ |
| मुग्धा दुग्ध (सा द १० ३६) ३०३।१३६ | मूर्खाणा (पञ्च १ ४४९) १६४।५१८ | मृदुलकनककान्ति ३१३।५७ |
| मुग्धा खप्रस (शृङ्गारति १ ५१) २७६।५१ | मूर्खे नियोज्य (चाणक्य ८५) १४६।१७९ | मृदुलवलितमध्यं २५५।९ |
| मुग्धे किं (शा प ३५५३) ३०८।२० | मूर्खों (वानर्यष्टक ५) १७१।८२१ | मृदुव्यवहितं (शिशु २ ८५) १४७।१८७ |
| मुग्धे तवास्मि (सु २१२७) ३२०।१३ | मूर्खोऽपि मूर्ख ३९।६ | मृद्ना खादन्ता (शा प १००५) २३८।७६ |
| मुग्धे दोर्लतिका (शा प ३४१९) २८६।२३ | मूर्खोऽशान्त (नवरत्न ६) १८०।१०५४ | मृदो परि (सु २६९२) १४६।१६८ |
| मुग्धे धानुष्कता (सूक्ति ७४ १८) ३१२।१ | मूर्खो हि (भा १ ३०७७) ३९।३ | मृद्वटवत्सुख (हि १ ९२) ५७।१३५ |
| मुग्धे प्रतार (शा प ३३३२) २६४।२३५ | मूर्तिमन्तमिवरा (सु २०१६) ३१४।३ | मृद्वङ्गि कठिनौ (शा.प.३३३९) २६४।२४७ |
| मुग्धे मानं न ते ३०७।१ | मूर्ध्न्यध्याधूयमान (सा द ७ १६) १०।१५५ | मृष्टचन्दनवि (शिशु १० ८४) ३२१।१० |
| मुग्धे मानिनि ३०७।६८ | मूर्ध्ना कल्याण ११८।११५ | मेखलीयति मेदिन्या. १२३।१ |
| मुग्धे मुग्ध (अमरु ७०) ३०८।२१ | मूल स्थूलमती(भामिनी प्रा ३२) २३६।२२ | मेघाटोपै स्वनित (सु १७८९) ३४१।५६ |
| मुग्धे मुश्व विषा (सु ८४) १५।२९ | मूल दोषस्य (किरात ११ २०) १६१।३६३ | मेघालये भवति २०२।८६ |
| मुग्धे विधेहि (गीत १० १९ २) ३०५।२३ | मूल बालकवीरुधा (विद्ध ४ ५) ३३६।२५ | मेघालये भवति २०२।९३ |
| मुञ्चन्तश्चापलरस ४६।५२ | मूलं भुजगै (शा प ९९९) २३७।४६ | मेघालये भवति २०२।९० |
| मुञ्चति मुञ्चति (कुव ४१) १२३।१९२ | मूलभृत्यान्परि (हि २ १३६) १४७।२१३ | मेघा वर्षन्तु (मृच्छ ५.१६) २९८।१ |
| मुञ्चद्विर्मदवारि १३१।११७ | मूलमेवादित (भा १ ५५५७) ३८१।१९२ | मेघैर्मेदुरमम्बरं (गीत.१ १ १) २३१।४१ |
| मुञ्च मुञ्च सटिलं २१२।२४ | मूलादेव (शा प १०३७) २४१।१५० | मेघैर्व्योम नवा (सु १७७७) ३४३।१०६ |
| मुण्ड पृच्छति २०४।११० | मृग प्रमील ११८।१०० | मेघो भाति १०९।२२० |
| मुण्डी जटी (शा प ४१७३) ३७५।२३७ | मृगत्रय भाति १९०।७१ | मेदरच्छेदकृशो (अ शाकुं २ ५) १४५।१०९ |
| मुण्डो जटिलो (शा प ४०३०) ३६४।१९ | मृगमदकर्पूरा (सु ४१५) ५८।१८७ | मेदिन्या विषमेषु १०८।२०७ |
| मुदं विषाद (हि.३.११८६) १७४।१९० | मृगमीनसज्ज (भर्तृ स ३२) ५७।१३६ | मेधावी (स पाठोप ५५) १४४।६९ |
| मुद्रदाली धृत (भोजप्र १४२) १८८।४२ | मृगशिशुदृश (दश रू २ २९) २८९।६५ | मेरु स्थितो (शा.प ४०४९) ३६४।३० |
| मुद्रीदालिशुशालित् १९३।९५ | मृगशिशुनयनाया १८२।४२ | मेरुर्द्रुरगतो हिमा १११।२६२ |
| मुनिर्नयति (कुव १७१) २१७।४२ | मृगसबन्धिनी २५९।६६ | मेरूरुकेसरसुदार (सु ५४) १८।२८ |
| मुनेरपि (भा.१२.४१४२) १६५।५५४ | मृगा प्रियालद्रु (कुमार ३ ३१) ३३१।२८ | मोमारामममादंदे १८८।३६ |
| मुरारातिर्लक्ष्मी (शा प १०६८) २१५।९ | मृगाङ्गोड्य (शा प ३६२७) ३०१।७८ | मोहं रुन्द्धि विमली ४२।३ |
| मुरारिपदभक्तिश्चेत्तदा ३६।३९ | मृगा मृगै (पञ्च.१ ३०५) १७२।८४० | मोहान्मया सु (अ शाकु.७ २४) ३०६।२० |
| मुहुरनुपतता (किरात १० ३३) ३३३।७८ | मृगेन्द्रं वा भृगारिं (शा प ९०१) २२९।२ | मौढ्येन विपदा (कविता ७६) ३८१।१९४ |
| मुहुर्मुहुरवेक्षणं ३०६।३७ | मृगेभ्यो रक्ष्यते (शा प ९०२) २२९।३ | मौनं कालविलम्ब १५८।२४३ |
| मुहुर्लक्ष्योद्भेदा(मुद्रा.रा ५ ३) १५२।४१४ | मृगैर्नष्टं शशैलौघ (शा प ९०३) २२९।४ | मौनादस्तमितेव (सूक्ति.१.१०) ५।५२ |
| मुहुर्व्यजनवीजनै. २८९।६६ | मृणालव्यालवलया (शा प ४६३२) ११।४ | मौनान्मूक (हि २.२६) ९७।१५ |
| मुहूर्तंमपि (वृ चाणक्य १३ १) १६९।२७६ | मृत प्राप्नोति (हि २ १५९) १४७।२१७ | मौनी पादप्रहारे (शा.प.२८६) ७८।३ |
| मूक परापवादे ४८।१२४ | मृतस्य लिप्सा १७२।८२५ | मौने मौनी १७८।१००० |
| मूकारब्ध कमपि ३६३।२० | मृताना (पञ्च.२.३३८) १४९।२९७ | मौर्ये सर्वापदा (सु ३१५७) ६६।१६ |
| मूकीभूय तमेव (सु ७२१) २२५।१४१ | मृत्तो दरिद्र (विक्रमच १५६) १६५।५२९ | मौलि खर्णकि (शा प ११८८) २४७।५२ |
| मूढ जहीहि (मोहमूद्गर ) ८३।११०७ | मृत्पिण्डो जल (भर्तृ.स ३०४) ८०।४० | मौलिं मानविधि १३२।३४ |
| मूढे निरन्तरपयो २९८।१६ | मृत्यु शरीर (शा.प.३८०) ७१।४ | मौलीं किं नु महेश ६।६६ |
संस्थाननिर्देशानुक्रमकोशः (पृष्ठ ५९)
| मौलौ केकिशिख २५।१८० | य स्तोकेना (पञ्च २ १४८) १६५।५३२ | यत्प्रत्यग्रदलावलीकवल २३३।९५ |
| मौलौ मन्दारदाम ३४।६७ | य स्यात्क्रवललक्ष्य (सु १९२) ३८।३० | यत्प्रदेशमुपनीय (नैषध ५ ८५) ६९।२० |
| मौलौ सन्मणयो (उद्भट ६३) २३५।१६३ | य स्वभावो हि (हि १ ५८) ८४।३ | यत्प्रियव्यति (शिशु १० ५१) ३१६।११ |
| प्रदीयसीपि (शिशु २ ७४) ८४।६ | य एवादि स एवा १८५।१८ | यत्र क्षिपामि दृशमन्य २७८।४५ |
| प्रदीयस्त्वा (शा प १००७) २३९।८७ | यक्ष विरहिण क्वचि ३०३।१४० | यत्र देशेऽथ (पञ्च १ ४४३) १६४।५१६ |
| म्रियमाणं (शा प ४१६९) ३७३।१९२ | यच्च कामसु (भा १२ ६५०३) ७६।१६ | यत्र न फलितास्तरवो १६९।७३४ |
| म्लानस्य जीवकुसु(मालती ६ ८) ३१३।५२ | यच्चिन्तितं तदिह १७६।९७१ | यत्र न मदनवि (शा प.३६६६) ३१७।२ |
| यच्छक्यं प्र (भा ५ ११०७) १६६।६०२ | यत्र नार्यस्तु(भा १३ २८८८) ३८९।४९३ | |
| य | यच्छजलमपि जल (पञ्च २ ७९) ७०।२६ | यत्र नास्ति दधिमन्थन ८९।१ |
| यं दृष्ट्वा मीनरूप १८।१४ | यच्छति प्रतिमु (किरात ९ १४) २९६।६ | यत्र पतत्यव (सा द १० ६३) २५१।२६ |
| य प्राक्प्रत्यगवा ३०२।१९४ | यजमानेन क स्वर्गं १९९।३२ | यत्र यत्र चलते शनै २६०।१०६ |
| य मातापितरौ (म २ २२७) १६७।६१७ | यज्जातोऽसि (शा प ७५८) २१०।३५ | यत्र विद्वज्जनो नास्ति (हि १ ६३) ३८।२ |
| यं य नृपोऽनु (भोजप्र १३९) १४७।२०१ | यज्जीवति क्षणमपि (पञ्च १ २४) ९८।९ | यत्र श्यामाकवी ९५।१२९ |
| यं शैवा समुपास (महा ना १ ३) १५।२७ | यत प्रभृति ते कान्तं २९१।४ | यत्र सूक्त (भा ५ ३२९०) ३८८।४४१ |
| य कन्दुकैरिव ४।२७ | यत सत्यं त (विष्णु प्र अ ९) १४३।३५ | यत्र स्त्री यत्र (पञ्च ५ ६१) ३४९।३२ |
| य करोति (किरात ११ १९) १६१।३६ | यत एवागतो (वृ श ६६) १६९।६९९ | यत्राकृतिस्तत्र गु(पञ्च.१ २०८) २७८।३२ |
| य काकिनी (सु २९११) १५१।३७९ | यती व्रती चापि १७४।८८२ | यत्राखण्डलदन्तिद ९४।१२० |
| यः कुन्तपाणिरिह २४८।९१ | यतो गजैर्र्विना (शा प १५६०) १४३।३६ | यत्रात्मीयो जनो १५०।३३३ |
| य कुर्यात्सन्धि (हि २ १३०) १४७।२११ | यतो यत षट्चर ३४५।५१ | यत्रानुल्लिखि (का प्र ७.२७३) २१८।६२ |
| य. कुलाभिज्ञ (हि १ १३०) १४५।१९६ | यतो यतोऽङ्गा (शा प ३३७५) २७०।२८ | यत्रानेके क (भर्तृ स १७१) ३७४।१९९ |
| य कृत्वा सुकृ (पञ्च १ ९३) १४९।२७५ | यत्कण्ठे गरल (शा प ५०२) १८२।५० | यत्रापि कुत्रापि २२९।१४ |
| य कृष्णं कुरु (शा प ८६४) २२६।१६५ | वत्करोल्यरतिं केश (गुणरत्न २) ७१।३ | यत्राभ्यागतदानमान ६३।४० |
| य कोटिहोमानल १३५।१३ | यत्कर्म कुर्व (मनु ४ १६१) १६७।६०३ | यत्रायुद्धे ध्रुवं (हि २ १७०) १४७।२१८ |
| य कौमारहर (सा द १ २) ३५३।४२ | यत्कस्यामपि (नैषध १२ ८१) ११०।२४३ | यत्रार्जवेन लघिमा १६९।७३८ |
| य पठति लिखति १७०।७६० | यत्कीर्ति कापि गङ्गा १३८।८८ | यत्रास्ति लक्ष्मीर्विप १७३।८४७ |
| य. परस्य विषमं १७१।८१२ | यत्कीर्तिर्वलयं भुव १३७।६७ | यत्रैकं श्रुतमक्षरं ३६९।८१ |
| य पित्रा (मार्क पु २१ ९५) ३८५।३२६ | यत्कीर्त्या धवलीकृत १०७।१७९ | यत्रैता लहरीच (कुव.१७१) २५२।५६ |
| य पीयूषसहो (शा प ११६४) २४५।१२ | यत्कोवनो(भा १२.११०१८) ३८९।५०५ | यत्रोदक (वृ चाणक्य ७ १३) ३८८।४४४ |
| य पूतनामारणलब्ध २२।९८ | यत्क्षान्ति. (शान्तिश ३.१२) ३७०।९७ | यत्सग्रहो (राज.त ६.२२७) ३८८।४५१ |
| य. पृष्ट्वा कुरु (पञ्च ४ ६४) १६५।५४४ | यत्खलु खलमूखेषु ५७।१४३ | यत्सकाशाच्च (पञ्च २.१००) १४९।२८० |
| य पृष्टुं युधि (नैषध १२ ९७) १०८।१९२ | यत्तादृशेषु सरलेषु न २१२।४२ | यत्सत्यव्रतभङ्गी (वेणी १ २४) ३६६।५ |
| य प्रशंसति नरो ७०।३३ | यत्तालीदलपा (विद्ध शा.२.१५) २८६।२६ | यत्सद्गुणोऽपि (शा प ११९८) २४८।७४ |
| य. प्रागासीदभि ३१३।५८ | यत्तीर्थाम्बु मुखाम्बुजा २७२।६९ | यत्सारस्वतवैभव गुरु(भोजप्र ९५) ३४।६३ |
| य प्रीणयेत्सुच (भर्तृ स २७९) ५०।१९२ | यत्तु (काम नी ११ ३९) ३९०।५१४ | यत्स्मृत्यैव परां यान्ति (सु ३४८) ५६।९० |
| य. शौर्यावधिरे (शा.प ९१७) २३१।४६ | यत्त्वन्नेत्रसमान(सुवृत्तति २.३९) २९२।३० | यथा काष्ठ (भा १२ १३३८) १६६।५८९ |
| य श्रीख (प्र राघव ७ ६२) ३०२।१०४ | यत्नादन्विष्य का ग्राह्या १९९।२५ | यथा खननख् (मनु २ २१८) १६७।६१६ |
| य सतापमपाक (शा प ८०९) २२१।३१ | यत्नादपि क (पञ्च १ ४४१) २२६।१७० | यथा खरश्चन्दन (सुश्रु १.१३) ३८८।४५४ |
| य समानं समा (पञ्च २ २२) १४९।३०४ | यत्नोत्थापन (शा.प ४०५६) ३६५।५० | यथा गजपति श्रान्त (सु ३५४) ५६।९४ |
| य सत्पदस्थमिह (सु १९१) ३८।२३ | यत्पङ्केरुहलक्ष्म ३०९।९५ | यथा गौर्दुह्य (का नी ५ ८४) १४९।२९४ |
| य सर्वैका (राज त ४.५२९) ३८८।४८४ | यत्पद्ममादित्यु(नैषध २२ ११५) ३१२।३७ | यथा ग्रामान्त(र २ १०८.५.६) ३७७।३१ |
| य. ससर्ज कमल २६२।१७७ | यत्पल्लव समभवत्कुसु २१२।४३ | यथा चतुर्भि (वृ.चा ५ २) १७५।९१४ |
| य सिन्धौ फेनराशि ३।३४ | यत्पादा शिर (शा प.७४७) २०९।१६ | यथा चित्तं तथा (विक्रम २५२) ४६।३६ |
| य सुन्दरस्तद्वनिता ९२।५८ | यत्पीयूषमयूखमालि ३०२।११३ | यथा छायातमौ (पञ्च २ १३६) ३७७।३३ |
| य सृष्टिस्थितिसंहतीर्वि १।१५ | यत्पूर्वं पवना (शा.प.११७२) २४६।३१ | यथा तथापि य पूज्यो (सु.१९) १।६ |
| य सैन्यै स्मर (शा प ३७२१) ३२४।४५ |
६० | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| यथा तैलस्य (भा १३ ३३८) ३८८।४५९ | यदकांशुकान्त (शा प ५९५) २०७।१४ | यदि रामा (वृ.चाणक्य १७ १६) ८९।२ |
| यथा दोषो हिमालयस्य (दृ श ४) ५५।७४ | यदर्ज्यते परिक्ले (शा प ३७८) ७१।२ | यदि वै मनसि १०४।९२ |
| यथा धेनुसहस्रेषु (पच २ १३२) ९१।१२ | यदवधि वि (भामिनी शृ वि ६०) २५५।७ | यदि सत्सङ्गनिरतो (सु ४६१) ८७।१५ |
| यथा नयति कै (शा प २०६१) १८८।३७ | यदवधि विबुद्ध ३५२।१७ | यदि सन्ति गुणा (कुव ५१) ८१।६ |
| यथा परोपकारेषु ५६।१०७ | यदशक्य न त (हि १ ९०) १६३।४५० | यदि समर (वेणी ३ ६) १५२।४०२ |
| यथा प्रभुक्रुता (हि ३ ८८) १४८।२३६ | यदसेवनीयमसता ३१।२२ | यदि स्मरामि (शा प ३४६२) २७७।५ |
| यथा बीजं विना(मा १३ २०१)३७७।३५ | यदस्माभि (शा प ४१२८) ३७३।१७८ | यदि स्याच्छीत (पंच १ २८७) ३४९।३५ |
| यथा बीजा (शा प १२९२) १४५।१२४ | यदस्य यात्रासु बलो (नैषध १८) १२५।६ | यदि स्यात्पाव (पंच ३ १९३) ३४८।२३ |
| यथामिषं ज (स्कंद नागर १८४) ६४।९ | यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहं (भर्तृ स ५) ४१।५८ | यदि स्यान्म (सा.द १० ४७) २५९।७२ |
| यथा मृत्पिण्डत (पञ्च भूमि ८१) ८२।८ | यदा तु भाग्य (मृच्छ १ ५३) ६७।४७ | यदिच्छसि (शा प.१४२६) १५८।२१० |
| यथायर्थ ता. (किरात ८ २) ३३४।१२० | यदा त्वं चन्द्रो (शा प ३५६४) ३०९।३ | यदीयबलमालोक्य २८३।४ |
| यथा यथा भोज (भोजप्र ७६) ११७।८७ | यदानतोऽयदान २०६।१३ | यदुपात्तं (मार्क पु २१.९३) ३८५।३३२ |
| यथा यथाय वल २५८।३२ | यदा न योगो ३८९।४८० | यदेक कासारं रच २९२।१९ |
| यथा यथा विश (शा प ३२७०) २५४।१ | यदा पूर्वं ना (शान्तिश २ ६)३७६।३५० | यदेकस्मिन्वर्षे २४०।११७ |
| यथा यथास्या (शा प ३२८५) २५५।१७ | यदा प्रकृत्यैव (शान्तिश २ ४) ३२।३ | यदेतच्चन्द्रान्त (भोजप्र २३६) २०५।८ |
| यथा यथैव स्नेहे (शा प ३७२) ५४।२२ | यदालोके सूक्ष्मं (अ शाकु १ ९) १४०।४ | यदेतत्कामिन्या (शा प ४१७०) २४६।३५ |
| यथा यूनस्तद्व (नैषध २२ १५०) ३१।३९ | यदा वि (किरात.१४ २४) १७४।९०४ | यदेतत्क्षेत्राम्भ (शा प.१४०१) ५१।२३४ |
| यथा रन्ध्रे व्योम्न (कुव १७१) ३४२।८७ | यदा विनाश (र ३ ६२ २०) ३८३।२४३ | यदेतत्स्वच्छन्दं (भर्तृ.३.५१) ३६८।४६ |
| यथा विहंगास्तरुमा १७४।८८१ | यदा विनाशो (र ३ ६२ २०)३८८।४५६ | यदेते साधूना (शान्तिश ३ २३) ७२।५५ |
| यथा वृष्टि समुद्रेषु ५५ ७१ | यदा शरीरस्य शरी(शाकु ९४)३८९।४६८ | यदेव भर्त्ता (शा.प.४९५) १६६।६०४ |
| यथा शरीर किल (सु ५२६) ७०।३४ | यदासीदज्ञानं (भर्तृ स ६) ३७५।२४६ | यद्रन्ध्रद्विपदानवा १३७।६६ |
| यथा शरीर (कथास २२ ४०)३८२।२२८ | यदासौ दु (शान्तिश १ २२) ३६८।४८ | यद्रम्यं गुरुगौर (अमरु १५९) ३०७।६७ |
| यथा सत्प्रसव १९५।४ | यदि कुप्यसि ना (मृच्छ ५ ३४) ३०८।५ | यद्गुणैर्मथिते १३४।४ |
| यथा हि पुरुष (स.पातोप ५६)३८२।२२९ | यदि क्षुण्ण पूर्वे १११।१२४ | यद्ददाति यदश्नाति (भोजप्र ६३) ६८।२ |
| यथा हि (याज्ञ ३ १६२) ३८२।२३२ | यदि गन्तासि ३५४।७२ | यद्ददासि विशिष्ठे (हि १ १६९) ६८।३ |
| यथा हि मलिनैर्वस्त्रै (पच ४ ३०) ८४।९ | यदि गर्जति (मृच्छ ९ ३२) २९८।९ | यद्दुर्गामटवीमट ६९।११ |
| यथा हि शृङ्गं (भा १२ ९९२०) ७६।२० | यदि तव हृदयं (भोजप्र ४९) १५१।३७२ | यद्धात्रा निजभाल (भर्तृ स ५६) ९२।९९ |
| यथा ह्येकेन चक्रेण (याज्ञ १ ३५१) ८२।७ | यदि त्रिलोकी (नैषध ३ ४०) १०४।१०३ | यद्बाहू व (प्र राघव ३ २६) १०९।२२६ |
| यथेयं वाग्देवी (शा प १८२) ३५।२२ | यदिदमगणयित्वा ३०६।३२ | यद्विम्बमम्बरमणि २७।६ |
| यथोदयगिरौ द्रव्यं (हि प्र ४६) ८७।६३ | यदि दह्येतन (आनन्द देवीश.) ५०।१९० | यद्बीजानि च १२१।१५७ |
| यथोर्ध्वाक्ष पिब (कुव ९८) ३३९।११७ | यदि न स्यान्न (पच ४ ७१) १४५।१२६ | यद्धनु धनुरीश्वरस्य ९४।११३ |
| यदक्षिभ्रूलतापा (शा प ४०५९) ३६४।५ | यदि नाम कुले (सु ३१५८) ६६।१७ | यद्भर्तुं कुरुते(नैषध १२.९२)११०।२४५. |
| यदचेतनोऽपि (भर्तृःस ६५) ७९।१५ | यदि नाम दैव (भर्तृ स ३०७) २२१।९ | यन्मूलते तरलिते २०८।४० |
| यदधोऽध (हि १ १५७) ७१।१७ | यदिन्दोरन्वेति ५१।२३५ | यद्यत्परवशं कर्म (म ४ १५९)१६७।६२० |
| यदन्तस्तन्न जि (पच ४ ५३) ३४९।२७ | यदिन्दोर्लक्ष्मीस्ते २९१।१५ | यद्यदिष्टतमं तत्तद्धे ५६।१११ |
| यदपथ्यवता १६६।५७८ | यदि परगुणा (दश रू ४ १७) ६१।२५६ | यद्यदेव रुचे (शिशु १० ७१) ३१९।२२ |
| यदपि कटकयात्रा ११६।६५ | यदि प्रभुरुदारधी ३३।४८ | यद्यदेव हि वाञ्छे(हि १ १९१)१६३।४६४ |
| यदपि जन्म बभूव ९२।६९ | यदि प्रसारीकु (नैषध ७ ४३) २६३।२१० | यद्यप्यनीनं चिर २४०।११४ |
| यदपि मेघगणेन २२३।७५ | यदि प्राणा एव २९२।१८ | यद्यपि क्षितिपा(हनु ११.१९)१४७।१९४ |
| यदपि रतिमहोत्सवे ३५।५१ | यदि प्रियावियो (शा प ३४४९) २७७।१ | यद्यपि खदिरारण्ये २३८।६५ |
| यदभावि न (भर्तृ स ६६६) १६२।४२९ | यदि प्रिये वेत्सि तब ३०५।१५ | यद्यपि च दैवयो २२९।१६ |
| यदमरशैलै सिन्धो २६२।१९४ | यदि भवति दै (पच.१ १९२) ३५२।१६ | यद्यपि चन्दन (भर्तृ स ६७१) २३७।४१ |
| यदमी दश (शा प.२४४) ४८।११५ | यदि भवति (पच १ १९२) ७२।३३ | यद्यपि चातकप (चातक ८) २२६।१५३ |
| यदम्बुकणमादा (शा प ७८९) २११।६ | यदि मत्तोऽसि (शा.प ९३६) २३१।६२ | यद्यपि तरणे कि २२९।२३३ |
सस्थाननिर्देशानुक्रमकोशः
६१
| यद्यपि दिशि (शा प ११२१) २३९।९९ | यमो वैवस्वत (भा १ ३०१८) ३७७।९ | यस्मिन्सृष्टे (वृ चाणक्य ९ ९) १५७।१७६ |
| यद्यपि दैवाल्लब्धा २४७।५८ | यममिव करधृतदण्डं ९५।८ | यस्मिन्वशे समु (शा प.३६३) ५४।१५ |
| यद्यपि न भ (भर्तृ स ६७२) २४१।१३७ | यमाश्रित्य न (पच १ ५२) १४८।२६० | यस्मिन्वस्तु (शा प ४१७१) ३७५।२३६ |
| यद्यपि बद्ध शै (शा प.१०७८) २१५।७ | ययोरारोपित (सा द १० ८०) १०२।४१ | यस्मिन्विश्वं ३६९।६९ |
| यद्यपि बहुगुणग (शा प १४९) २२०।५ | ययोरेव समं (पच१ ३०४) १४४।४९१ | यस्मिन्वेल्लति २३५।३ |
| यद्यपि बहु नाधीषे तथा ४२।२ | यवनीनयनाम्बु २७।२११ | यस्मै ददाति (शा प ११७६) २३५।१६२ |
| यद्यपि भ्रात(भा १२ ५०६४)३८५।३५६ | यवनैरवनि क्रान्ता ९८।१ | यस्य कृत्यं न (भा ५ ९९३) ३८९।४९५ |
| यद्यपि रटति (भर्तृ स ६७४) २२९।१७ | यश करणधोरणी १०६।१७१ | यस्य क्षेत्र (पच १ २२९) १६२।४१५ |
| यद्यपि शिरोऽधि (शा प.१७५६) २१०।९ | यश पटोडयमङ्गुष्ठे १२३।१ | यस्य क्षोणिपते १३६।४२ |
| यद्यपि सन्ति बहू २१२।२२ | यश पदाङ्गुष्ठ (नैषध ७ १०७) २७०।२६ | यस्य चाप्रिय (शा प १४२८) १५।३७ |
| यद्यपि स्वच्छ (शा प.२०७९) २१५।२ | यश पूरं (प्र राघव ७ ९२) १०६।१६५ | यस्य चित्तं (वृ चाणक्य १५ १)३८८।४६५ |
| यद्यप्याप्रतरोरमु २२४।११२ | यश शशाङ्क ११८।१०३ | यस्य चेतसि (कुमार ६ १८) १०२।४३ |
| यद्यप्युच्चैर्वि (काम नी ५.२७) ३७७।१७ | यश सौरभ्य (भामिनी प्रा ८०) ५५।६१ | यस्य जिह्वा ३४९।५५ |
| यद्रात्रौ रहसि (अमरु १५०) ३२८।१८ | यश स्तोमानुच्चै १०६।१५७ | यस्य जीवन्ति ९७।१ |
| यद्वक्तृ मु (शान्तिश १ १८) २३३।१९९ | यशश्चन्द्रैरुद्य १०६।१६० | यस्य त्वया व्रण (शाकु ४.१३) ३६२।२६ |
| यद्वञ्चनाहितमति (ध्वन्या उ ३) ५०।२०६ | यशस्करे (शा प १४०६) १७५।९२० | यस्य द्वारि सदा १८४।७१ |
| यद्ददन्ति चपले ६३।२२ | यशोदयामण्डि (शा प.१२३१) १०४।९७ | यस्य न ज्ञायते (पच २ ६३) १६५।५२७ |
| यद्ददहल्याहे (मृच्छ ५.३०) २९८।८ | यशोधननिधे ३५।२३ | यस्य न ज्ञायते (पच ४.२०) १६७।६४७ |
| यद्वद्धनमार्सिह च १४३।३७ | यशोऽधि (किरात ३.४०) १७२।८३२ | यस्य न सविधे (सा द १० ७) २५१।२५ |
| यद्वन्नयोदधिसम ३६९।७० | यशो यस्माद्धस्मी ८३।३ | यस्य नास्ति विवे (भा २ १९४५) ३९।८ |
| यद्वात्मान सकलव ३६९।६७ | यश्वत्वारि शतानि ३५।१८ | यस्य नास्ति स्वय (हि ३ ११९) ३९।१ |
| यद्विस्मयस्तिमि (मालती १ २२)२७९।४८ | यक्ष निम्बं (कुव ४६) २४१।१५६ | यस्य पुत्रो न वै ९०।७ |
| यद्वीक्ष्यते खलाना ५७।१४२ | यक्ष मूढतमो १५७।२०१ | यस्य पुत्रो (प्रसगाभ १४) ३८९।४९८ |
| यद्वीचीभि स्पृशसि २१६।२२ | यस्तीर्थानि २१।९२ | यस्य प्रसादे पद्मा (मनु ७ ११) १४२।९ |
| यद्वीर्यं कूर्म (सा द ६ १८६) १०२।३९ | यस्तु कृच्छ्र (भा १ ४५५७) ३९०।५१२ | यस्य भार्या विरू(गरुड पूर्व १०८)३५१।१ |
| यश्वान्द्रावितके(विद्ध शा ३ १४)३०३।१३५ | यस्तु शूद्रो (भा ३ १४०७५) ३८०।१२४ | यस्य भार्या (भा १२ ५५०५)३८५।४०२ |
| यन्नाकृष्टसुवर्णस् (शा प १५४) ३१।४६ | यस्तु संचरते ९८।२ | यस्य भार्या शुचि ३५०।१ |
| यन्न माति (शा प ३३४२) २६४।२४९ | यस्तोषं न २२२।६३ | यस्य मित्राणि मित्रा (का प्र ४ ३०) ९७।२ |
| यन्नम्र सरल (पच २ १८८) ३७७।१५ | यस्माच्च येन च (पच.२ २०) ९२।७१ | यस्य मित्रेण सभाषा (हि.१ ३९) ८८।२ |
| यन्नवे भाजने (हि प्र ८) ३७७।१६ | यस्मार्दार्य (शा प १०४१) २४१।१५९ | यस्य यस्य हि (पच १ ७४) १६३।४७८ |
| यन्नादृतस्त्वमलिना २३८।६९ | यस्मादाक्रामतो २०१।६७ | यस्य वक्त्रकुहरे २९।१६ |
| यन्नाब्यभ्रमिघूर्णमान ६।७२ | यस्मादासीत्कुमार १४।१० | यस्य वज्रमणे (शा प १०९९) २१८।६४ |
| यन्नाद्यापि समा ३५९।१०१ | यस्माद्विक्षुमुदेति १।१४ | यस्य षष्ठी चतुर्थी १८६।५ |
| यन्नाम्न प्रथमाक्षर ९।१२८ | यस्मिञ्जीवति जीव (भर्तृ स ६८०) ९८।६ | यस्य स्त्री तस्य ३४९।५४ |
| यन्नि शब्द (राज न ४ ३०८) ३७७।८ | यस्मिञ्जीवति (विक्रमच ४) २२९।१३ | यस्य स्नेहो (वृ चा १३ ६) ३९०।५१९ |
| यन्निमित्त भवे (शा प १४६१) ३७८।७ | यस्मिन्कुलेय (पच १ ३१४) १७४।८९२ | यस्य स्त्रीषु (प्रसगाभ.१३ ) ३९०।५२१ |
| यन्मञ्जुसिञ्जितमि २६२।१९२ | यस्मिन्कुल (पच १ ९४) १४९।२७४ | यस्या महत्त्व २२०।२ |
| यन्मध्यदेशा (कुव ९७) ३१२।१५ | यस्मिन्खङ्गे (शा प ४६६०) १४३।५९ | यस्या मौलि १०१।५३ |
| यन्मध्ये यच्च (शा प ४१२१) ३७२।१५० | यस्मिन्देशे (पच २ ८३) १५५।८८ | यस्या यस्यामव (भा ११ ७८)३८८।४६२ |
| यन्मनोरथशतैर (शा प.४५३) ९१।४६ | यस्मिंस्तुच्छे २३४।१३३ | यस्या स केस (शा प १२१३) २१५।१६ |
| यन्माता विष्णु १५।१३० | यस्मिन्नेवाधि (पच १ २६६) १४६।१६२ | यस्या सगम (शा.प ८३०) २२४।१०२ |
| यन्मुक्तामण (शा प १११२) २१८।६१ | यस्मिन्बुद्धुदसक ५।५३ | यस्याः सन्नत २३४।१३७ |
| यम प्रतिमही १०६।१७२ | यस्मिन्व्यथा व(भा ५ १३४०)३८९।४७३ | यस्याकर्ण्य वच.(शा प.८४६) २२८।२२० |
| यस्मिन्यदा पुष्क (भाग ४ ६) ३८९।४८९ | यस्यामि कोप ११६।७१ |
६२ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्यपद्यार्धा
| श्लोक/पाद | पृष्ठ/संख्या | श्लोक/पाद | पृष्ठ/संख्या | श्लोक/पाद | पृष्ठ/संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| यस्याङ्गिदितयं | १३।४५ | याते मध्य (भामिनी प्रा १५) | २१९।१३ | यावद्दृष्टिर्मृगाक्षीणां (धूर्तश.८४) | २५१।१२ |
| यस्याञ्जनश्याम | १३५।१२ | यातेयं रजनी | २११।४१ | यावद्यावत्कुव (शा.प ३३१६) | २६१।१५८ |
| यस्यात्मबुद्धि (भा.११.७८) | ३८४।३०३ | याते यात | २२८।२०१ | यावद्याव | २८९।५१ |
| यस्यादौ व्रज (शा प ९६८) | २३५।१४९ | यातोऽस्मि पद्म (रत्ना ३ ६) | २९५।५० | यावन्त. कुरुते (शा प ४१३९) | ३६७।८ |
| यस्यार्थास्तस्य मित्राणि (पच १ १) | ६५।६ | यात्येकतोऽस्त (अ शाकु ४ १) | ३२३।११ | यावन्चीरनिवे | ३२७।२३ |
| यस्यालीयत | ७७२ | यात्रामङ्गल (शा.प ३४३७) | २८४।३२ | याविपत्तिर्धना | ७१।२६ |
| यस्यावन्ध्यरुष (शा.प.९१६) | २३४।१४५ | दन्त्राश्रु यस्य | १२५।४ | यासा कटा (शा प ३२९९) | २६०।१०० |
| यस्याश्वोरश्चिकुर | ३७।६८ | या दक्षिणा | २८८।१५ | यासा नाम्नापि (पच ४.३५) | २५१।११ |
| यस्यासीज्जव (शा प ९५५) | २३४।१३५ | यादृग्जानासि | १६।१३ | यासा सत्यपि (सा द ३ १०) | २५२।५३ |
| यस्यास्ति वित्तं स नर (भर्तृ स ५१) | ६४।९ | यादृशि तादृशि | ६५।११ | या सा जग | ७६।३८ |
| यस्याहुरागमविद. | ४।३५ | यानि मिथ्या (शा प.१३११) | १४५।१३२ | या साधूश्च | ९३।३७ |
| यस्येषव | १०४।१०१ | यानेन तन्व्या (नैषध ७ १०२) | २६९।४१५ | या साधूनिव | ३२।५ |
| यस्योच्छिन्ना | १२२।१८८ | यान्ति न्याय | १५५।८५ | यासामबल | २५१।९ |
| यस्योदये गुरु | २१२।४९ | यान्ती गुरु (भामिनी शृ वि.५४) | २६०।९७ | या सृष्टि स्रष्टुराद्या (अ शाकु १ १) | ७।९९ |
| यस्योदये नैव | २१०।१९ | यान्त्या सर | २७९।५५ | यास्यति जलधर (भर्तृ स ६८८) | २१८।३ |
| यस्योद्यद्वाणबाहु (सु ५१) | १६।४३ | यान्त्या मुहु (मालती.१ ३२) | २७८।५१ | यास्यति सजन (पच १.२२४) | ३३।२६ |
| यस्योद्यद्भुज | ११५।३० | या पाणिग्रह | १८६।१५ | यास्यत्यद्य शकु (अ शाकु ४ ५) | ३६२।३८ |
| यस्योपवीत | १११।६३ | या प्रकृत्यैव चपला (हि २ २४) | ९७।६ | यास्यामीति (शा प.३४३५) | २८४।३१ |
| या कान्ति | २४७।६५ | या बिम्बोष्ठरुचि (शा प ३३९६) | ३३०।२ | या खसञ्जानि पद्मे (शा प ४७१) | ६२।१ |
| या दृष्ट्वा यमुना | २४।१६१ | या भार्या दुष्ट (पच ४.१५१) | ३४८।२४ | या हि शश्वद्ध | ३४९।४७ |
| या या प्रिय. (शिशु ३.१६) | २७३।२ | याभिरनङ्ग | २५०।८ | युक्तं मध्ये | २६६।३१२ |
| या पश्यन्ति प्रियं (भर्तृ ६८९) | २८३।३ | यामस्ते शिव | २१५।१५ | युक्तं यया (सु ४४०) | ६०।२४२ |
| या कटाक्षच्छटा | १९४।३८ | या महेश | २१०।१२ | युक्त प्रमा (किरात ११.२९) | १६१।३७२ |
| या कर्थचन (शिशु.१० १८) | ३१५।२१ | या माताममता | २०५।४ | युक्तमुक्तं (स्कांद काशी १) | १५९।२९२ |
| या कर्षति निज | ८४।८ | यामि न यामीति धवे (कुव ४२) | ३२९।४ | युक्तियुक्तं प्रगृह्णी (शा.प ४५२) | १५३।२५ |
| या कामिनी सा | ३४०।२ | यामिन्येषा बह (शृगारति १३) | ३५४।७९ | युक्तोऽसि | २३५।१६५ |
| या कुन्देन्दुतुषार | ३।१३ | यामि प्रेयसि | ३२९।१९ | युक्त्या परो | १५०।३५७ |
| या केलिच्युत | ३६३।४० | यामि विधाय | १८८।४५ | युगपत्खगण्ड | २।१४ |
| या गम्या (किरात.११ २२) | १६१।३६५ | यामीति प्रिय (शा प.३३८७) | ३२९।२ | युगपद्विकास (शिशु ९ ४१) | ३००।६६ |
| याचकघीरो | ७३।२१ | यामीत्यप्रिय | ३२९।२० | युगान्तकालप्रति (शिशु.१०२३) | ३६३।१५ |
| याचते कार्यकाले य (हि २.३१) | ८८।८ | यामीत्युक्ते | ३२९।१४ | युगान्ते (वृ चाणक्य १३.२१) | ३८९।४७५ |
| याचना हि पुरुषस्य (प्रसगा.१७) | ७३।२७ | या राका (गुप्तरत्न.१०) | १७८।१०१७ | युद्धं च (चाणक्य ७२) | १६२।४०३ |
| या चन्द्रस्य | २९०।८१ | या लाक्षा | १११।२६१ | युद्धकालेऽप्रगो (पच १ ५८) | १४८।२६७ |
| याचमानजन (नैषध ५ ८८) | ७२।४६ | या लोभा | ६१।२६० | युद्धा चामि (नैषध १२ ४८) | ११०।२३९ |
| याचितो यः (भोजप्र ७१) | ७०।४ | यावकरसार्द्र (का.प्र ७.१४५) | ३१७।१ | युधिष्ठिर कस्य | १९६।४ |
| याज्ञापद (वृ २७४) | ५०।२१२ | यावच्चक्रे नाज (शिशु १८ २६) | १२९।६९ | युधिष्ठिरोऽसि (शा.प.१२२८) | १०२।१६ |
| याज्ञाशून्यम (शांतिश १ १३) | ३७०।९२ | यावच्छकलितो | २०७।९ | युध्यन्ति | १६७।६४३ |
| या जयश्रीर्मनो (सा द ७ ९) | २७७।१४ | यावज्जीव | १५७।१८६ | युध्यन्ते पक्षिणश | ७०।८ |
| यातं यौवन (भर्तृ.स.६८३) | ३७४।२०७ | यावत्तिष्ठति | २१३।६२ | युष्मत्प्रौढतर | १३४।२० |
| यातस्यास्य | ३०२।९९ | यावत्त्वा न | २४४।२२६ | युष्मद्दोर्दण्ड | १३१।१२५ |
| याता. किं न मिल (अमरु.१०) | २८०।९० | यावत्पौलस्त्य (नैषध १२ ४७) | १३८।८२ | युष्मद्राजि | १२५।१३ |
| याता यान्ति च या (शा.प १५०) | ३०।३ | यावत्फलो (शा प १०२३) | २३९।११० | युष्माकमम्बर (भट्ट.१) | २७।१८ |
| यातास्ते रससार (सु १०८) | ४१।७६ | यावत्स्वस्थ (भर्तृ स ६८६) | १६१।३६१ | यूथान्त्यग्रे | २३३।९८ |
| यातीत. पान्थ (शा प १२७६) | १३३।४२ | यावत्स्वस्थमिदं (भर्तृ १९४) | १७८।१००७ | यूथि यथो | २३८।७८ |
| संस्थाननिर्देशानुक्रमणिकोशः | ६३ |
|---|
| यूना धैर्यं २६८।३६८ | ये बालभावा (विक्रम १२३) ३८४।२९४ | यो धत्ते शेष १८४।२२ |
| यूना मोह २६५।२९४ | ये बाहवो न युधि (दश ४ ९) १५२।४०८ | यो धर्म (पञ्च सृष्टि २२४) ३८९।४९० |
| यूना येन २३१।४७ | येऽभिक्षा २४०।१२२ | योधैरेव १२७।२० |
| ये कन्द (का प्र.१०.५४७) १३२।१६ | ये मजन्ति (महा ना ७ १९) ११९।१३३ | यो ध्रुवाणि परि (गरुड १०८) १६२।३९४ |
| ये कायस्थ ९९।१८ | ये मुष्णन्ति ९९।२१ | यो न ददाति न (शा प ३८७) ६५।१६ |
| ये कुण्ठीकृत (शा प ३७२६) ३२४।४६ | ये ये खञ्जनमेक (शृङ्गारति ५) ३१४।७१ | यो न वेत्ति १८४।२५६ |
| ये के विचित्र ४०।४९ | ये लब्धाश्रय १११।२५३ | यो न सचरते ९८।१ |
| ये गृह्णन्ति (शा प ११०९) २१७।६० | येवर्धन्ते धनपति (भर्तृ स १७४) ९७।१० | यो नात्मजे न च (पञ्च १.११) ९८।१० |
| ये च प्राहुर्दुरा (पञ्च १ ४०) १४८।२५० | ये वर्धिता (विक्रमच २५९) २२१।१९ | यो नात्यु(भा १२ ११००८) ३९२।५९६ |
| ये च मूढ (भा १२ ७५९) ३९१।५७९ | येवर्धिता करि(विक्रमच.२५७) २२३।८१ | यो नानाद्युति (राज त ३ २१८)३७८।६३ |
| ये जाते व्यसने (शा प २४८) ५२।२५६ | ये शान्त १७३।८६२ | यो नास्ता १३४।२२ |
| ये जात्यादि (पञ्च १ ३९) १४८।२४९ | ये शिरसा २४७।५० | योऽनाहूत सम (पञ्च १ ९८) १४४।९० |
| ये जात्या लघव. (भल्लट ६०) २१४।१० | ये श्रमं हर्तुमी (सु ३४३) ५६।८६ | यो नोद्धतं (भा ५ १०८१) ३९१।५८८ |
| येऽणृत्वं १११।२५२ | येषा कण्ठ (का प्र १० ४८४) ११०।२३३ | योऽन्यथा स (मनु ४.२५५) ३७७।३६ |
| ये तावत्त्वद्गुणो (सु १६४) ४१।७५ | येषा कोमल (प्र राघव १ १८) ३४।६० | योऽभ्यर्थित (भा ५.१५३२)३९१।५६८ |
| ये त्वेनमभि (भा १.८४०५) ३९०।५०८ | येषा दोर्बल (का प्र ४ १०४) ११०।२३१ | योऽमित्रं कुरुते (पञ्च २ १३) १६५।५२४ |
| ये दीनेषु दयालव (शा प.२२८) ५२।२६४ | येषा न विद्या न (भर्तृ स ६०७) ४०।३२ | यो मे गर्भगतस्यापि (शा प.३१२) ७५।४ |
| ये दोलाकेलि (शा प ३८१६) ३३५।१३७ | येषा निमेषो (शा प ४१११) ३७२।१४६ | यो मोहान्मन्यते(पञ्च १ १५०) ३४८।१३ |
| येन ध्वस्त (ध्वन्या २.२५) १९२।४९ | येषा प्राणिवध (सु ३६७) ५६।९९ | यो य शस्त्रं (वेणी ३ ३२) ३६७।१६ |
| येन पाषाण (सु ८९५) ७९।१३ | येषा वल्लभया (भर्तृ स ६९८) ३६९।७७ | यो यत्र कुशल(भा.१ ३३२४)१४६।१४५ |
| येन भिन्न (भामिनी प्रा ४९) २३०।२४ | येषा श्री (वृ चाणक्य १२ ५) ३७६।२६३ | यो यत्र सतत (चा नी ४२) ३९१।५७७ |
| येन यत्रैव भोक्तव्यं (भर्तृ स ६९२) ९१।३३ | येषामन्यकल ६३।४१ | यो यमर्थं प्रार्थ (शा प.१४३६) १५३।१३ |
| येन शुक्लीकृता (हि १ १८३) १६३।४६१ | येषु येषु दृढं (शा.प ४१२०) ३७२।१४९ | यो येन प्रतिबद्ध. (हि ३ १३०) १४८।२४१ |
| येन स्वा विनिहत्य (शा प ४०८३) ३६६।६ | ये सतोषसुखप्रबुद्ध (भर्तृ स ३१४) २१५।५ | यो रक्ततामतित २७।७ |
| येनाकारि १८७।१० | ये ससत्सु विवादिन (शा प २०६) ४१।६४ | यो रामो निज २१।८२ |
| येनाकारि २४६।२९ | ये सूक्तीन्दुकला (शा प १४३) ८५।१६ | योऽर्थकामस्य(भा ५ ४१४६) ३९२।६२३ |
| येनाकारि मृणाल (नीतिप्र ३) ९५।१२२ | यै ह्याहवेषु १५०।३४४ | यो व्योमा १९२।९० |
| येनाञ्चलेन सर ९२।७७ | यै कारुण्यपरि (सु ३२००) ६८।८४ | योषित पति (शिशु १०.८५) ३२१।११ |
| येनात्मा पण्यता (दृ श ५५) १६८।६९३ | यै. प्राणापहति ३६६।८ | योषिदुद्धत (किरात.९ ६८) ३१६।६० |
| येनानन्दमये (शा प ८४४) २२५।१४२ | यैरिहोडसि १११।२५१ | योषिद्भिरप्या (भाग ११.८) ३८९।४८२ |
| येनानर्गलकाल (शा.प ९०८) २३०।४१ | यैर्वातुलो (सु ३२१) ५१।२३२ | योऽसकृत्वर (का प्र.९ ३७६) १०२।४८ |
| येनामन्दमरन्दे (भामिनी प्रा ९) २२२।५२ | यैस्त्वं गुणगण (भामिनी प्रा.१९) २३०।४४ | यो हि दिष्टमु (भा ३.२९१५)३९२।६०५ |
| येनामोदिनि (शा प ८३७) २२४।१०५ | यो गङ्गामतर ६८।७० | यो हि (भा १२.११३४१) ३९२।६१५ |
| येनास्य (का प्र १० ४४४) २११।४५ | योगीन्द्रश्छन्द ३६।४६ | यौ तौ शङ्खकपाल (शा प १११) १४।८ |
| येनाहंकार (पञ्च १० ४४४) १६४।५१७ | योग्यतयैव (सु २३९) ४८।१४० | यौवनं जरया (सु ३१४३) ७६।१५ |
| येनैवाम्बरखण्डेन (भर्तृ स ३१३) ६५।५ | योग्यस्य त्रिन (शिशु ८ ३३) ३३९।१०२ | यौवनं धन (द्वि.प्र १०) १५९।२६२ |
| येनोत्थाप्य १५।२८ | योजनाना सह ८२।११ | यौवने वर्ती ३४९।४६ |
| येनोत्पलानि २७१।३३ | यो जित (भा ५ ११४९) ३९१।५८१ | र |
| येनोन्मथ्य तमासि(शा.प ७४४) २०९।१५ | योऽत्ति यस्य (सु २९८४) १६५।५४८ | रक्त मर्कचरोध (शा.प.३९७५) ३६६।६ |
| येनोषितं २२५।१३६ | यो दिव्याम्बुज (शा प ८०५) २२१।२८ | रक्तत्वं कमलाना (भर्तृ.स.७०२) ८४।१४ |
| ये पाप १८४।४८ | यो दृष्ट (शा प १०१९) २४०।१२४ | रक्तभावमप २९९।२८ |
| ये पूर्वं परिपालि (शा प ९८५) २३६।२३ | योऽद्वा योद्धा २१।१० | रक्तमासमयं (शा प ४१४२) ३७१।११७ |
| ये पूर्वं यव (विद्ध.शा.३ १०) ३०२।१०५ | यो द्रोणाचल १८४।३४ | रक्तस्त्वं नवप (हनु ५.२४) २८३।१५४ |
| येऽप्यासन्निम (राज.त.१.४७) ३४।६६ | रक्ताब्जपुञ्जर (शा.प.८५८) २२६।१५९ |
६४ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| पद्यांशः (सन्दर्भः) | पृष्ठ/पद्यसंख्या | पद्यांशः (सन्दर्भः) | पृष्ठ/पद्यसंख्या | पद्यांशः (सन्दर्भः) | पृष्ठ/पद्यसंख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| रक्ताशोक (विक्रमोर्व.४.४१) | २८३।१५५ | रत्नान्यधो (सु २१२७) | १११।२५७ | रहस्यभेदो (हि.१.९८) | ८८।२ |
| रक्तैर्नैव | १११।२६० | रत्नावलीपूर्वं | ३६।३३ | रा. पुण्यं | १६६।५८७ |
| रक्तोत्फुल्ल (सा द ३ २६५) | ३६६।११ | रत्नैरापूरितस्यापि (शा प.१०८०) | २१५।३ | राकायाम (का.प्र.१० ४५१) | २६२।१६६ |
| रक्तोऽभिजायते (पच १ १५५) | ३४८।१६ | रत्नैर्महार्हेस्तुतुषुर्न (भर्तृ स.५२) | ७७।१० | राकाविभा (का प्र ७.१५६) | ३१२।१८ |
| रक्षन्ति कृपणा (शा प ४७२) | ७०।३ | रत्नाप्तप्रिय (कुव १४०) | २६६।२९७ | राका सुधाकरकरें | २८८।४३ |
| रक्षन्ति पक्षं ((शा प १५७३) | १४३।४४ | रथ शरीरं (भा ५ ११९३) | ३८५।३४० | राकासुधाकर (का प्र.४ ४९) | २७९।५४ |
| रक्ष पात्रगतं (शा प.१११५) | २४७।६२ | रथस्थिताना (कुव ३५) | ३३१।२० | राक्षसा कलि | ९८।४ |
| रक्षाधिका | १५०।३२२ | रथस्यैक चक्र (भोजप्र.१६९) | ५२।२५१ | राक्षसेभ्य. | १९४।२० |
| रक्षामालिका (शा प ३६६९) | ३१७।१ | रथिनो रथि | १२८।२३ | रागकान्तनयने (किरात ९.६३) | ३१६।५५ |
| रक्षेत्कन्या (याज्ञ १ ८५) | ३९२।६३५ | रथेभ्यो गज (शा प ३९८४) | ३६०।७ | रागादिरोगान्सत | ४३।२ |
| रघुतिलक | ११८।१२२ | रथो रथाङ्ग | १२८।२७ | रागिणि नलिने | ७४।८ |
| रङ्गावङ्क | ३०४।१६३ | रथ्याघोषैर्बृंहणै (शिशु १८.३) | १२९।५४ | रागिण्यपि | ३६७।१० |
| रचयति | २६८।३६१ | रथ्यान्तरश्वरत (शान्तिश ४ ९) | ३७०।८८ | रागी बिम्बाध (पच.१ २२१) | ३७८।६२ |
| रचयति सहसा | ११।२२ | रथ्यारजोषु (शा प ३४०७) | ३५४।७६ | रागी भिनत्ति | १८६।७ |
| रजनिचर (विद्ध शा ४ २) | ३३६।२० | रभसादभिस | २९८।१० | रागे द्वेषे | १६६।५८० |
| रजनीमवाप्य (शिशु ९ ३३) | ३००।५८ | रभसेन हार (शिशु १३ ३२) | १२६।३९ | राघवस्य | १९४।१६ |
| रजनीषु विमल (सा द ४ ९) | १३५।९ | रमणीय | १७०।७४५ | राजंस्त्वत्कीर्ति | १३४।१ |
| रजन्यामन्वस्या (शा प ३५०९) | २९३।६ | रमणे चरण (सा द ७ ८) | ३०८।४ | राजंस्त्वद्दर्शने | १०१।१ |
| रजोजुषे जन्मनि | १४।३ | रम्भातरु | १२८।३५ | राजचन्द्रं (भोजप्र १७६) | १०२।४५ |
| रज्यन्न | २६४।२४५ | रम्भापि (नैषध ७ ९३) | २६९।३९२ | राजत सलि (भा ३ ८५) | ६४।१० |
| रजिता न | २१०।१३ | रम्यं द्वेष्टि (अ शाकु ६ ५) | २७४।६ | राजति त्रिवली | २६७।३३३ |
| रजिता नु विवि (किरात ९.१५) | २९७।९ | रम्यं हर्म्यतलं (भर्तृ स ३१५) | ३४५।४५ | राजते राजरामा (भर्तृ स ७०९) | ३२८।२ |
| रटतु जलवर (शा.प ३८७४) | ३४०।३० | रम्यं हर्म्यतलं (भर्तृ स ७०८) | २७३।१८१ | राजनि (हि २ ६४) | १७०।७४९ |
| रणत्कङ्कणाना | ३३१।२ | रम्याणि वीक्ष्य (अ शाकु ) | ३९२।६१८ | राजन्कनक (भोजप्र ३१४) | १०२।२६ |
| रणे बाणगणै (कुमार १६ २४) | १२८।१० | रम्या रामा (प्रसगाभ १३) | ३९२।६२८ | राजन्कमल | १८४।७ |
| रण्डा पीन | ३६५।५३ | रम्यार्थोक्ति | ३१।४४ | राजेन्द्रधुक्षसि (भर्तृ.स.५८) | १५२।४०५ |
| रतखिन्नतरा प्रात(शा प ३७४५) | ३२८।१ | रवि करसह | १०१।६ | राजेन्द्रौवारि (भोजप्र ३१०) | १०२।२५ |
| रतरीतिवीत | ८५।९ | रविचन्द्रौ घना | ७४।३ | राजेन्द्रिष्टस्ते भय (शा प १२७९) | १३२।८ |
| रतान्ते प्राणेशे | ३२१।२३ | रविजा शशि | १८४।७ | राजन्प्रम्यु (भोजप्र ७५) | १११।२६६ |
| रतिकृति गते (शा प ३७१२) | ३२२।५ | रवितप्तो गज (कुव ३७) | २३१।६० | राजन्नवद्य | १९३।६ |
| रतिकेलिकल (सा द ६ १९३) | २९६।१ | रवितुरङ्गतनूरुह (शिशु ६ २२) | ३३५।१० | राजनमुञ्ज (भोजप्र २१२) | ११७।९० |
| रतिक्रीडाद्यूते कथ(दशरू २.३९) | ३१६।३ | रविमणि (सु २२७३) | ३६०।१५ | राजन्नजन्यु (राज त ५ ३१७) | ३८६।३७५ |
| रतिपतिप्रहितेव (शिशु ६ ७) | ३३२।६२ | रविमावसते | २८।२ | राजनराजसुता (शा प १२६८) | १३२।२८ |
| रतिरभसनि (शा प ३६८८) | ३१९।३० | रविरपि न | ५६।१९६ | राजनिव (का प्र ७.२११) | १०५।१४६ |
| रतिरभसविला (शिशु ११ २) | ३२३।२१ | रविसुतकृत | १८९।५४ | राजनवीर | १२४।१० |
| रत्नभित्तिषु (काव्या २ ३०२) | ३६३।२ | रचे कवे• (शा प ५५४) | १९७।२१ | राजन्ससाप्य (कुव १६३) | १३३।२ |
| रत्नसानु | १०४।८४ | रवेरस्तं तेज | २९५।५९ | राजपत्नी (वृ चाणक्य ४ २०) | १६०।३२६ |
| रत्नाकर किं कुरुते (नीतिप्र.१) | ४९।१७१ | रवेरेवोदय (वेणी ?) | २०९।१ | राजश्लाट (प्र राघव ७ ८) | २७८।४४ |
| रत्नाकरतनुजनु (शा प ११४०) | ६२।१६ | रवेर्मयूखैरभि (शा प ३८३८) | ३३६।३६ | राजसेवा (कुव ५४) | १३९।१ |
| रत्नाकरस्तव | ६३।२८ | रसति तरुणीके (शा प ३८९०) | ३४२।८५ | राजा कुल (हि १ १७३) | ८६।५ |
| रत्नाकरे परि (भर्तृ स ७०५) | २४६।२२ | रसायनविद (भा १२ ८७३) | ३९२।६२२ | राजा धृणी (शा प १५४१) | १७२।८२० |
| रत्नाकरो | २१०।२७ | रसालशिखरा (शा प ८४८) | २२५।११७ | राजा तुष्टोऽपि (भोजप्र १७) | १४४।१०१ |
| रत्नाना न (शा.प.१०७२) | २१५।१८ | रसालानामन्त | १४।१६ | राजा धर्मविना (समरञ्जन.२) | ३७८।४३ |
| रत्नानि विभूष (शा.प.३०८६) | २५१।३० | रसा सार (काव्याल.५.२०) | २०६।१२ | राजानं प्रथम (हि.१.२०४) | १४३।२ |
संख्याननिर्देशसप्तमक्रमकोशः ६५
| राजानं ११२।२७४ | रामं सीता १८९।६२ | रे खल तव ५७।१३७ |
| राजानमेव (पंच १ ४२) १४८।२५२ | राम त्वत्की १८४।७३ | रेखा काचन २५६।५० |
| राजा नाम १५०।३२३ | रामरामे (रामरक्षा ३८) १८८।३६ | रे चाञ्चल्य (भामिनी.प्रा ५७) २३२।८० |
| राजानो यं (शा प.१३२४) १४५।१३५ | रामाणा रमणीय (अमरु १२३) ३२६।२८ | रेजुरंश्ट्या ६३०।९७ |
| राजा पश्य १६६।५६७ | रामायाचय १२।२९ | रेजे पुष्पैर्भ्रीष्म ३३५।१ |
| राजा बन्धु (पच १ ३७७) १४९।३०१ | रामाभिषेके (ऋतु ३ ३) १८१।२८ | रेत शोणि (शाति श १ २६) ३७६।२५९ |
| राजा मत्तं (हि ३ १८) १४७।२२४ | रामार्चिता १२।५३ | रेतोरक्तमया २६।२०४ |
| राजा राजा (सु ९७) ८।११८ | रामाविलोल २५९।९५ | रे धाराधर (चान ७) २१४।८० |
| राजा (वृ चाणक्य ६ १०) १६०।३१२ | रामेण त्रि सप्त (शिशु १८ ७०) १३०।९९ | रे धूष्टा वार्त (शा प ४०८७) ३६७।१४ |
| राजा राष्ट्र (वृ चाणक्य ६ १०) ३९१।६०६ | रामे प्रव्रजन (विक्रमच ८०) ९४।१०८ | रे पद्माकर याव (शा प.१८४३२) २१९।१२ |
| राजा वे (वृ चाणक्य १७.१९) ३९२।६०६ | रामो नाम (कृष्ण कर्णा २ ७२) २४१।५५ | रे पद्मिनीदल (शा प ११३३) २४४।२२७ |
| राजाश्रय १७३।८५७ | रामो हेममृग (वै १५) ३७८।४१ | रे पद्मिनी २४४।२१९ |
| राजा सप (भोजप्र ५२) १४७।१९८ | राक्षस चित्त १७८।२८९ | रे पान्था ३३५।१४१ |
| राजस्य जगतो (का नी १ ९) १४२।१ | रासोल्लासम (गीत १ ४ १२) २४१।६८ | रे पुत्र सत्सङ्ग १८२।३४ |
| राजीव जीव (प्र राघव १.३६) २७१।३५ | रिक्ता कर्मणि (शा प १३३०) १५१।३६३ | रेफ व्यञ्जन १२०।१४४ |
| राजीवमिव (काव्या २ १६) ३४४।१० | रिक्तेषु वारि (कुव ३१) ३३६।१८ | रे बालकोकिल (शा प ८४७) २२५।१३३ |
| राजीविनीवि २१४।९ | रिङ्गत्तुङ्गतरेङ्ग १३७।७२ | रे राजहस (शा प ८०४) २२१।१८ |
| राजेति क्षण ११५।२१ | रिपुरिव सखी (गीत.७ १६ २) २८४।२३ | रे रे कोकिल (भर्तृ स.७१९) २२५।१३१ |
| राज्ञौ द्विजा (नैषध ७ ४६) २६१।१५७ | रिपुश्रिय कि १२४।४ | रे रे खला ३१।३२ |
| राज्ञ सबो २००।३८ | रुचि वात्रि भर्तरि (शिशु ९ १३) २९४।४१ | रे रे घरट्ट २६०।१०१ |
| राज्ञस्तु १५०।३३० | रुचिभिर ३०४।१६० | रे रे चातक (भर्तृ स ७२१) २२६।१६६ |
| राज्ञामस्य (नैषध १२ ५८) १९०।२४० | रुचिरति २४४।२२३ | रे रे दीप २४७।६७ |
| राज्ञामाज्ञा १५०।३२४ | रुचिरखरखणंपदा (शा प ५२३) १८६।२ | रे रे निर्दय (ऋतु ५.२२) २८२।१३९ |
| राज्ञि धर्मिणि (भोजप्र.४४) १४५।१९९ | रुजन्ति (मा १२ १२५।४) ३९२।६१६ | रे रे पान्थ ३५५।८३ |
| राज्ञि मात १४६।१६३ | रुद्धनिर्गमन (कुमार ८.६०) २९९।२५ | रे रे रसाल २४०।११३ |
| राज्ञो मानधन (वेणी ४ १) २६६।९ | रुद्रस्यापि १२२।१७५ | रे रे रासभ २३४।१३८ |
| राज्ञो विपद्धनुवियो (दश रू.) ३८५।३३४ | रुद्रोऽद्रिं जलधिं (सु ५४३) ७१।४४ | रे रे लोका ३६५।५६ |
| राज्यं येन २१।८३ | रविरविसर (का प्र ४ ७७) ११६।७२ | रे रे शिष्टबकोट (शा प ८९५) २२९।२३१ |
| राज्य शत १४३।५५ | रुन्धती नयन (किरात ९.६७) ३९६।५९ | रे लाङ्गलिक (शा प ११८४) २४६।३९ |
| राज्य (हि २ १८१) १४७।२२२ | रुष्टे का परपुष्टे (भर्तृ स ७१७) २८८।१९ | रेवावारिणि (शा प ९२२) ९५।१२५ |
| राज्ये सारं (काव्याल ७ ९७) १७१।८०२ | रुष्टोऽपि १५०।३३६ | रे सारङ्गा २८३।१६५ |
| रात्रि काल २९२।३४ | रूक्षं वपुर्न (सूक्ति २४ ४) २३४।१२९ | रोगशोक (हि १ ४१) १६९।७१९ |
| रात्रि सैव (भर्तृ ३ ४५) ३७५।२२७ | रूक्षं विरौति (सु ४३८) ६०।२४१ | रोगी चिर (शा प २५८९) १७०।७६८ |
| रात्रिरागमलि (किरात ९ १६) २९७।१० | रूक्षस्यामधुरस्य (शा प ८८४) २२८।२१६ | रोगोऽण्ड (सु ३८३) ५८।१६७ |
| रात्रिर्गमिष्यति (भर्तृ.स ७१२) २२३।७८ | रूक्षाया स्नेह (पच ४ ५८) ३४९।३० | रोदोरन्ध्रं (शिशु १८.१५) १२९।६१ |
| रात्रिर्मे २८५।३८ | रूढस्य सिन्धु (शा प १०६०) २४३।१९४ | रोमन्थमारेचय(भर्तृ स ७२३) २३३।१०६ |
| रात्रौ जानु (भोजप्र २३३) ६६।११ | रूपं जरा (वानरा ४) १७३।८७२ | रोमावलिङ्क २६७।३५२ |
| रात्रौ रखे (कुव.३५) १३८।१ | रूपमप्रति (शिशु १० ३७) ३१५।४० | रोमावली २६७।३४३ |
| रात्रौ वारिभरा (अमरु ५४) ३४३।९१ | रूपयौवनसपन्ना (स पाठोप ५३) ३९।९ | रोमावलीदण्ड (नैषध ७.९०) २६८।३७९ |
| राधा पुनातु(कृष्ण कर्णा २ २५) २६१।९९ | रूपवाश्चापि ८६।२ | रोमावली सु १४।११ |
| राधामधु २२१।१२ | रूपसपन्न (नल.च १.२२) ३५०।५ | रोमावली र (नैषध ७ ८४) २६७।३५० |
| राधामुग्ध (गीत.५.११.६) २५१।७२ | रूपसौरभ २३८।६६ | रोलम्बस्य (शा प.१०११) २३९।९६ |
| राधामोहन (साहिल.कौ.४.६) २५१।८६ | रूपेणा (पच.४ २२६) १७९।१०२८ | रोलम्बा. २८५।४० |
| रामं वानर १९१।८७ | रे कूप जीव ३२०।२ | रोलम्बेन (शा.प.९७६) १८०।१०४८ |
१ सुभा०अनु०
६६ सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
| प्रतीक / पाद | पृष्ठ।पद्य | प्रतीक / पाद | पृष्ठ।पद्य | प्रतीक / पाद | पृष्ठ।पद्य |
|---|---|---|---|---|---|
| रोलम्बैर्निमि | २३७।२७ | लङ्काधा | १२२।१८४३ | लाभप्रणयिनो (सु २३०) | ४७।८० |
| रोलम्बो | २८५।३६ | लङ्कापते सकुचित (शा प १६१) | ३३।२९ | लाभस्तेषा | १६६।५८३ |
| रोषावेशादामि(शिशु १८ १२) | १२९।५८ | लङ्काभूप | १९७।३७ | लालने बह (भाग १० ११५) | १६१।३४३ |
| रोषावेशाङ्गच्छ (शिशु १८ ४) | १२९।५५ | लज्जा गुणौघ (भर्तृ स ३१८) | ३८५।३२८ | लालयन्तमर (प्र राघव ३।३) | २८।१ |
| रोहणं सूक्तिरत्ना (नल च १.८) | ३८।४ | लज्जा विहाय (शा प ३३८५) | ३२९।७ | लालयेत्पञ्च (भाग १० ११४) | १६०।३०८ |
| रोहणाचल (शा प १०७१) | २१५।१३ | लज्जा कीर्ति | ११९।१२६ | लाला वक्रास (दश रू ४ ७३) | ३७१।१२५ |
| रोहते सायकै (पञ्च ३ १०९) | ३८५।३२२ | लज्जा प्रौढ | ३४६।३० | लावण्य क नु | २०४।१९८ |
| रोहन्तो प्रथमं (अमरु १११) | ३१०।११ | लज्जामहे (सु ८६७) | २१६।२० | लावण्यं तद् (का प्र ४ ७५) | ३६७।११ |
| ल | लज्जावत (सु ३१७१) | ६६।२७ | लावण्यकान्तिप (दश ४ ३६) | ३०६।२८ | |
| लक्ष्मणेयुत्त | १९९।११ | लज्जावशा (शा प ३७५०) | ३५१।२९ | लावण्यद्रविण (औचित्य ११) | २८६।२९ |
| लक्ष्मणो लघु (शा प.३९८७) | ३६०।१० | लज्जा स्नेहः (पञ्च ५ ९१) | ३७९।७५ | लावण्यमधु (सा द १० ३२) | २६२।१६९ |
| लक्ष्मि क्षमस्व | ६३।२९ | लज्जे त्वं मज | ७७।५७ | लावण्यामृतदी (नल च ७ ४३) | २५४।४१ |
| लक्ष्मी तनोतु | २।२३ | लज्जैवोद्व | २८१।१११ | लावण्यामृतमा (शा प ३२.८४) | २५६।४७ |
| लक्ष्मी स्वय (सु १८४८) | २४४।२३३ | लता पुष्पवती | ३२५।१ | लावण्यामृतनव (दश ४.६९) | ३१४।७४ |
| लक्ष्मीकपोल (सु २९) | १४।३ | उताकुञ्ज (सा द ८ ४) | २३४।१२९ | लावण्यौकसि (खडप्रशस्ति) | १०९।२१२ |
| लक्ष्मीकेलि (सु २००५) | २११।४० | लताकुञ्जे | ३२६।२३ | लिखति न (शा प ३४०३) | २७५।६ |
| लक्ष्मीकौस्तुभ (भोजप्र २९) | ९४।११७ | लतानाामे (का.प्र १० ४९८) | २४५।२४३ | लिखन्त्या | २६७।३४४ |
| लक्ष्मीक्रीडा (भोजप्र २५९) | ३०२।१३८ | लतामूले (अल कौस्तु अति १) | २७५।२३ | लिखन्नास्ते (अमरु ७) | ३०८।१२ |
| लक्ष्मीधर | २००।५३ | लतास्ता | २२४।९६ | लिखिता चित्रगुप्तेन | ९१।३२ |
| लक्ष्मीपङ्क (सु ३४१९) | २४४।२३२ | लब्ध जन्म सह (शा प ७५९) | ९४।१०७ | लिम्पतीव (मृच्छ १ ३४) | २९६।१ |
| लक्ष्मीपयोधरोत्स (दश रू ४ ७२) | ७०।१० | लब्ध्व्यमर्थ (महा.ना २१४?) | ३९१।५७८ | लीढग्रस्त (शा प ५९२) | २०७।२ |
| लक्ष्मीपाणि (सूक्ति सहस्र ) | १५।२३ | लब्धसौरभ (शिशु १० २४) | ३१५।२७ | लीनानसूनसरोरुहदष्टे | २७५।१२ |
| लक्ष्मीरस्य हि (अनर्घ ७ ९३) | १४०।२ | लब्धार्थं (विक्रमच २७७) | १०३।६७ | लीनेव प्रति (मालती ५ १०) | २८१।१०५ |
| लक्ष्मीधर्मं (प्रसगाम १७) | ३९२।६२६ | लब्धास्य (शा प ४१३३) | ३७२।१५६ | लीने श्रोत्रेकदे (खडप्रशस्ति २२) | १९।३८ |
| लक्ष्मीर्निर्वृति (शातिश ४ १) | ८१।४६ | लब्धोच्छ्रायो (शा प ३५१) | ५७।१२७ | लीलयैव (शिशु १० ३८) | ३१५।४१ |
| लक्ष्मीर्यादोनिधे (शा प ५२९) | ६२।९ | लब्धोदयो (सु ३९५) | ५८।१७१ | लीलातामरसा (अमरु ७२) | २११।३१ |
| लक्ष्मीर्या | १९८।११२ | लब्ध्वा जन्म(सु ३१०५) | १०४।१०२ | लीलादोला (शा प ३८१५) | ३२७।४० |
| लक्ष्मीर्वसति | १५५।८७ | लभेत सिकतासु (भर्तृ स ३१९) | ४१।५७ | लीलाद्यूतजिता | ६।६२ |
| लक्ष्मीवन्कृत | १९२।९१ | लभेयदयुनं | ६५।१९ | लीलासु (भामिनी प्रा ६२) | २३१।६४ |
| लक्ष्मीवन्तो | ६४।२ | लम्बोदर तव | १८९।५७ | लीलायन्त्य (मा १३ १४७५) | ३७८।४० |
| लक्ष्मीश्चेन्न | १११।२५८ | लम्भिता | २६८।३८९ | लीलालु (भामिनी प्रा ७०) | ३८।२७ |
| लक्ष्मीसपर्क (शा प ११३९) | २७३।२०० | ललाटतिल | १९३।४ | लीलावतीना (भर्तृ स.८२) | ३७९।६९ |
| लक्ष्मीस्ते | १०९।२२२ | ललाटदेशे (पञ्च १ ३३४) | ३८६।३५७ | लीलावली | २७६।४६ |
| लक्ष्मीस्ते | १०९।२२४ | ललाटे कस्तूरीतिलक | २५२।४७ | लीलास्मितेन (शा.प ५४६) | २७८।५० |
| लक्ष्म्या परिपूर्णो (शा प १५०१) | ६४।१३ | ललितगमना नार्यो | २३१।३२ | लुब्ध स्तब्धो (सु ३७३) | ५६।१०३ |
| लक्ष्म्या (काम नी ५ ७३) | ३९२।६२६ | ललितमुरसा (अमरु १६१) | ३३७।६० | लुब्धमर्थेन (हि ४ १०४) | १५५।९७ |
| लक्ष्म्या श्री | २१७।३७ | ललितविभ्रम | ३३२।४६ | लुब्धाना (वृ चा १० ६) | १५६।१५७ |
| लग्नं रागा (वेणीदत्त.पद्यवेर्णी २) | १३८।७९ | ललितान्तानि | १६०।३३१ | लुब्धो न (कुव १०३) | ७१।२५ |
| लग्न केलिकच (का.प्र ७ २३७) | १२।४० | लवङ्गलतिका | ३२५।२ | लुलाये गोमायौ | ९३।९१ |
| लग्नाद्विरेफा (कुमार ३ ३०) | ३३१।२७ | लसन्नौक्तिक | २५७।२० | लुलित (शिशु.११ २०) | ३२४।३३ |
| लग्न पाद | २७४।२७ | लाक्षालक्ष्म (अमरु.६०) | ३७९।७४ | लूनग्रीवा (शिशु १८.५९) | १३०।८९ |
| लग्ना नांशुक (अमरु.६२) | ३२९।१७ | लाङ्गूलचालन (भर्तृ सं ५७) | २३१।७१ | लूनं मत्त (भामिनी प्रा.३९) | २४२।१८२ |
| लघुनि तृणकुटीरे(दशरू.४ २२) | ३४९।२५ | लाङ्गूलेनाभिहत्य (सा.द.१०.९२) | २०७।५ | लेखनी पुस्तक | १५८।२३२ |
| लघुरय | २१६।११ | लाटीनेत्र (सुकुन्द.३२) | ३७१।१०० | लेखन्ती व्योमगर्भे | १२४।१९ |
सस्थाननिर्देशमनुक्रमणिकोशः ६७
| लेखया विमल (किरात ९.२२) ३००।३९ | वक्रं निर्मल (विक्रमांक ८.८७) २७२।६७ | वदति राममनुष्य जघन्यजो २०२।८५ |
| लोक शुभ (शा प ३९६९) ३६०।१७ | वक्र शीतकरो (शा प ९४) १२।३७ | वदनं दशनविहीनं (पच ५ ७३) ९५।९ |
| लोक क्षय (भाग.५ ५) ३८४।३०६ | वक्रश्रीजितज (विद्ध शा २.११) २७४।३३ | वदनं प्रसादसदन ४७।१०३ |
| लोक एष (सु ३०४१) १७७।८११ | वक्रश्रीजितल (शा प ३९२८) ३४७।४० | वदनमिद न (अल कौ अप १) २८३।१५८ |
| लोक एष परलोक (नैषध ५ ९१) ७२।४८ | वक्रसन्दि (का प्र १० ५३७) ३२०।० | वदनशशिन (शा.प ३७११) ३२२।४ |
| लोकत्रय (सू ९१) ९।११ | वक्रस्याधर ३५६।५ | वदनसौर ३३२।६६ |
| लोकद्वयप्रति ९८।३ | वक्राणि पञ्च (अल कौस्तु रसा. १) ४।३३ | वदनाच्च बहि ७३।१२ |
| लोकयात्राऽमर्थ (हि १.१०५) १६३।४५३ | वक्रादुद्रूस मे ७४।४० | वदनेन निर्जित (कुव ५०) ३१२।२८ |
| लोकानन्दन (कुव १३५) २३८।५७ | वक्राम्भोजं (भोजप्र २३०) ११३।२८७ | वदने विनिवेशिता ५५।२०५ |
| लोकानामपि ३४९।५० | वक्राम्मोरुहि ६।७५ | वदन्ती जारवृत्तान्त (कुव ३०) १८६।१ |
| लोकाना मानमात्र ११३।२९३ | वक्रे गुह्यत्व २७०।५ | वदन्तु कतिचिद्बठात्ख ३३।४९ |
| लोकानुग्रह (पच १ २४८) १४९।२९५ | चक्रे वल्गाप्रकर्षी ५३।२७८ | वदन्तु देव १३३।११ |
| लोके कलङ्कम (कुव ००) २६२।१९१ | वक्रोपान्त २७४।२२ | वद प्रादुर्भावा २३९।९० |
| लोकेश कर्ण ११३।९ | वक्रता विश्रतो ५४।१९ | वद वल्लभ १९९।२४ |
| लोकेषु निर्धनो १५८।२४८ | वक्रत्वं ननु ६१।२६८ | वध्यन्ते न ३९०।५०९ |
| लोकोत्तरं चरित (अल सर्वस्व) ७८।७ | वक्ता नैष (शा प ११९१ २४९।९८ | वनानि दहतो (शा प ४८८) १५५।१२० |
| लोको वहति (हि ४ ६०) ३७९।७२ | वका कपटर्नि (कविनामृ १२) ५८।१६३ | वनान्ते खेल (अल कोस्तु विष १) २४५।९ |
| लोचन (भामिनी शृ ५०) २५८।४५ | वकेण शिरसि (सु १६६९) ३३५।१३८ | वनान्यमूनि (काव्या २ २८९) ३६७।१५ |
| लोचना (किरात ९.६०) ३१५।५२ | वक्तै क्रूतरैरै (शा प १५१५) १५४।७० | वनिताकरतामर (भोज प्र ) ३४६।३५ |
| लोचने हरिण २५९।९३ | वक्रोऽपि पङ्कज ८२।४३ | वनी मुनीनाम ३६२।१३ |
| लोडितमखिलं २३९।१०१ | वक्रोऽस्तु बाल्ये २१०।१७ | वनेऽखिलकला (सा द.१० ९६) १३१।५ |
| लोभ प्रतिष्ठा (भोजप्र १) ६९।१ | वक्ष किमु ३५६।१० | वने जने ९२।५६ |
| लोभ सदा (शा प ४२८) ६९।८ | वक्षःपीठे (शा प १०३) १३।५२ | वने जाता (शा प ५१५) १८४।२ |
| लोभमूलानि पापानि १५८।२१४ | वक्षस्ते दृढलम ३२८।१६ | वनेऽपि सिंहा (पच ५ ७१) ४९।१६८ |
| लोभश्चेदगुणेन (भर्तृ स ३७) १७८।१०१५ | वक्ष स्थली रक्षतु १४।१५ | वने वसति १८४।६ |
| लोभात्क्रोध (भा.१२ ५८८०) ६९।३ | वक्ष स्थलीवदनवा २५०।१३ | वनेषु दोषा (शाति श २ २८) १७४।९०५ |
| लोभात्क्रोध प्रभवति (भोजप्र २) ६९।२ | वक्षत्यावरणा (शा प ३२८०) २५६।४६ | वनेषु वन १३५।२७ |
| लोभादेव (हि १ २४) ३८२।२०० | वक्षोजच्चि ३५६।१४ | वन्दामहे महे २०।७५ |
| लोभाविष्टो नरो ६९।६ | वक्षोजौ निबिट २५८।२९ | वन्दे देवं जलधिशरधि (कुव ६८) ५।४६ |
| लोभेन बुद्धिश्चलति (हि १ ४२) ६९।५ | वचनैरनमता (शिशु १६ २७) ४९।१५२ | वन्दे वन्दारुमन्दार २।१ |
| लोलचोलचमत्कृति ३५७।४० | वचसि भवति (भर्तृ स १४७) २५२।५१ | वन्द्य स पुमा (सु ३१९) ४९।१८३ |
| लोलदृष्टि (किरात ९ ४७) ३१६।१२ | वचस्तत्रैव वक्त्त (पच १ ३४) १५९।२६४ | वन्द्याश्चिन्दति (सु ४५९) ६२।२७७ |
| लोलाशुक्स्य (वेणी ५ २८) ३११।१२ | वचासि वाचस्पति (विक्रमांक १ ७) ३।९ | वपु कुञ्जीभूत (कविता ६४) ७६।४२ |
| लोले ब्रूहि १४।९ | वचो वीचीदान ३११।१४ | वपु परीणाह (शा प.११०३) २५७।५२ |
| लोलैलौचन (अमरु ६१) ३३०।६ | वचो हि सत्य ८४।१५ | वपुरनुपम (शा प ३३५४) २६८।३८५ |
| लोहितायति (शा प ३९८३) ३६०।६ | वज्र च राजते (हि २ १६८) १४७।२१६ | वपुरविहितसिद्धा एव ५१।२२४ |
| लौकिकाना हि (उत्तर रा १ १०) ३६।४७ | वज्रादपि कठो (उत्तर रा २१५) ४५।४ | वपुर्दलनसभ्रमा (खड प्र ३०) १९।४७ |
| व | वज्रेण त्रिजग (सूक्ति ६१ ९) ३४१।६१ | वपुर्विषमसस्थान (भल्हट ?) २३४।१२४ |
| वंश प्राशुरसौ (शा प ११८७) २४७।५१ | वटवृक्षो महानेष (शा प ५३९) १९५।४३ | वय काका वय काका २२८।२०४ |
| वंशभवो गुणवानपि ८७।२१ | वणिक्प्र (शौनकी नी.अ.११५) ३८९।४७७ | वयं बाल्ये बाला(शा प ३७६१) ३५२।३२ |
| वंशावलम्बन ५७।१४४ | वणिगालोक्य निजे ३९०।५३९ | वय येभ्यो (शा प ४११३) ३७३।१७७ |
| वंशे गुण इव ५७।१५६ | वत्स गच्छ सम वाचिक ३६२।१० | वय.प्रकर्षांदु (शा प.३३४४) २६६।३१७ |
| वंशो विश्वावतंसो ८९।६ | वत्से मा गा विषादं (कुव १५५) १७।१५ | वयमपि कवयः कवयः ३५।५ |
| वक्र चन्द्रविका (भर्तृ स ००) २५४।४३ | वदतानुत्तमवचनं ध्वनि २००।४४ | वयभिह परितुष्टा (शा प.३०८) ७५।१७ |
| वयस परि (बृ.चा १२.२३) ३९२।६१३ |
| ६८ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
|---|
| वयसि गते कः काम १७४।८९६ | वर्णैः कतिपयैरेव (शिशु २ ७२) ८४।४ | वाक्यं तु यो ३८२।२२० |
| वयसी शिशुता (नैषध २ ३०) २६७।३४७ | वर्धते येन न (सूक्ति १२६ १८) ७६।२५ | वागर्थाविव (रघु १ १) १८१।२० |
| वयस्या क्रोष्टार प्रति ३६०।३० | वर्धते न चिर लोके वंश ८९।४ | वागुच्चारोत्सवं ९८।६ |
| वयो नव्यं स्वान्तं विषयतरल ३३०।१ | वर्धनं वाथ समानं (हि २ १३९) ५५।४० | वाग्वादमर्थं १६७।६४० |
| वयोभिमानादपमानता २३०।२१ | वर्धिते सेवि (शा प १०३३) २४१।१४५ | वाङ्मात्रार्यन्नान्य (शा प.१४२७) ८५।११ |
| वयोवृद्धास्तपोवृद्धा (शा प ३३४) ६५।२ | वर्धेत स्पर्धयैवोभौ (सु ३४६) ५६।८९ | वाच पल्लवयत्यु (गीत १ ४) ३७।७० |
| वरं कृतध्वस्तगुणादप्य १६६।५९० | वर्षेन्ति स्तन (शा प ३४९०) २९०।७४ | वाचयति नान्य (सु २३४४) ३६४।२६ |
| वरं गर्भस्रावो (पञ्च.भू ५) ९०।११ | वर्षानिलरजो(शा प १४१२) १४५।१०६ | वाचाशौचं च (वृ चा ७ २०) ३८६।३५२ |
| वरं तुङ्गाच्छृङ्गा (भर्तृ २ ७७) १७७।९८१ | वर्षासु का भवति निर्मधु २०२।८७ | वाचो वाग्मिनि (शृं ति २ ३५) ३११।१९ |
| वर दरिद्र श्रुतिशास्त्र(सु ३४४०)४०।३६ | वर्षासु जाता(अल कौस्तु अस १)३४०।१६ | वाच्य तस्मै २८७।६ |
| वरं दारिद्र्यम (शा प १४४१) १५३।१८ | वर्षासु भीतमवशाद्विभुजं १३२।१४ | वाजिवारण (गरुड पूर्व ११०) १६३।४७४ |
| वरं न राज्यं न (वृ चा ६ १३) | वलिभिर्मुखमाक्रान्तं (भर्तृ स १५६) ७६।४ | वाजी चारु (शा.प १५५५) १४५।११० |
| वरं पक्षच्छेद (भर्तृ स ३२१) २१५।११ | वल्गतकुच व्याकु(शा प ३६०८) ३२०।८ | वाञ्छा सज्जन (भर्तृ स ४३) ५२।२५९ |
| वरं पर्वतदुर्गेषु (भर्तृ स ३२०) ३९।५ | वल्गतकचानि वलनासट २९१।११ | वाञ्छैव सूच (पंच २ ८७) १७६।९५१ |
| वर प्राणपरि (शा प १७४३) १४७।२०९ | वल्मीकप्रभवेण (सु १८६) ३४।६५ | वाणिज्येन गत ३५५।८२ |
| वरं मौनं कार्यं (हि १ १३७) ३७८।६७ | वल्लभोसङ्गसङ्गेन (सा द १० ६८)२७५।४ | वाणि त्वत्पद (प्र राघव.१.८) ३२।५० |
| वरं वनं वरं भैक्ष्यं (शा प १३७४) ९७।५ | वल्लीना कति (शा प १०६१) २४३।१९९ | वाणी दरिद्रस्य ६५।१० |
| वरं वन व्याघ्रगजे (नीति र १५) ६६।४६ | वंशं प्राप्ते (प्र ९५) ३७८।३८ | वाणी ममैव ३१।३३ |
| वरं वरयते कन्या १६५।५४३ | वश्यभावेन सुमना ३५०।१० | वाणी रसवती ९७।३ |
| वरं विन्ध्याटव्यामन्न (सु ३०५५)८४।१८ | वसति कुत्र सरोरुहसन्तति २०१।६४ | वात स्थावर १२४।१० |
| वरं विभवहीनेन (हि १ १३५) ७१।१३ | वसन्तनीलोत्पलषट्पदाना २६०।१०४ | वातार्कीणे (शा प ३८५६) ३४०।१२८ |
| वरं शून्या (हि १.१३८) १७७।९८६ | वसन्तप्रारम्भे (सु १६८८) ३३५।१४० | वाताच्छीतिर १८९।५६ |
| वर सखे सत्पुरुषापमानि १७४।८८५ | वसन्तमासाथ २०२।७९ | वातान्दोलित (विक्रमच २६०) २२१।२७ |
| वरं हालाहल पीतं (शा प.२५९) ६४।३ | वसन्तमासाद्य २०२।८१ | वाता वान्तु (भट्ट.१०१) ३४३।१०७ |
| वरं हि नरके वासो (सु ३१६३) ६६।२० | वसन्तविश्लेषमपारयन्त्या ३४०।१७ | वाताहारतया (भट्ट.८७) ६१।२६९ |
| वरतरुविघटनपटव (शा.प ७९०) २१४।५ | वसन्त्यरण्येषु (शा प ९४५) १७४।८८३ | वाति गन्ध (र २.६१ १९) ३९२।६०२ |
| वरममी तरवो वन (सु.४८८) ७२।५० | वसुधान्तनिःसृत (शिशु.९ २५) ३००।५० | वाते वाति यद ९१।२६ |
| वरमल्पबलं सारं (हि ३ ८९) १४३।६२ | वसुमतीपतिना नु सरस्वती ३०।११ | वातैर्विधूनय (चात ३) २१२।४६ |
| वरमत्यन्तविफल (सु ३८५) ५६।११२ | वस्तुनि चिराभिलषिते १७१।७८५ | वातोद्भूतमुखी (शा.प ३६११) २९८।१९ |
| वरमश्रीकता (शा प.११३६) २४३।२०५ | वह्नं गा च (शा प ४४१७) १६६।५७९ | वातोल्लासित २१५।५ |
| वरमसिधारा तरु (पञ्च.स.९) ६५।१५ | वह्नहीनस्त्वलं (चाणक्य.५१) १६१।३८४ | वादानाशान्नु ११३।२९४ |
| वरमसौ दिवसो (अमरु १२५) २८४।१२ | वहति भुवनश्रेणीं (भोजप्र २०७) ५१।२२६ | वानीरप्रसवैर्नि (मालती ९.१५) १४०।३ |
| वरमहिमुखे क्रोधा' (शा प २५५) ८०।३८ | वहति विषधरा ५९।२०७ | वान्ति कहार (अमरु.१२२) ३४५।५६ |
| वरमुन्नतलाङ्गला (शा.प.४९३) २२९।११ | वहल्यस्या दृष्टि (प्र.राघव २ १६) २७१।४५ | वान्ति रात्रौ (शा.प.२९१५) ३४५।५५ |
| वरमेको गुणी पुत्रो (स पाठो ५३) ९०।७ | वहद्वहलमारुत ३३७।४२ | वापी कापि कदा २४७।५६ |
| वरुणेन यथा (र २.१२२.१२) ३७९।७३ | वहन्ति शोक ४५।१२ | वापी कापि स्फु (कुव.३६) २७१।५० |
| वर्जनीयो मतिमन्ता (शा प.३६७) ५४।१८ | वहन्ती सिन्दूरं (कुव.६७) २५८।३८ | वापीतोयं तटरूह (शा प.३६००) २९६।९ |
| वर्जयेदिन्द्रिय (शा प.१५१९) १५४।७३ | वहसि बलि २३९।१०७ | वापी पाताल १३८।७७ |
| वर्णं सितं समभि (भर्तृ सं ३२३) ९५।१४ | वहेदमित्रं (मा १२ ५२६४) १५५।८९ | वापी स्वल्प (पू चातका ५) २२६।१६७ |
| वर्णनदयित (शा प ४०५३) ३६४।३३ | वह्निं शीतयितु हिम (सु २२८७) ७८।१४ | वाप्या ज्ञाति ३५५।११ |
| वर्णप्रकर्षे सति (कुमार.३ २८) ३३१।२५ | वह्निज्यालेव १६०।३०५ | वाप्यो भव (सा द.१० ७८) १७१।८०३ |
| वर्णयामि विमलत्वमम्भस १२४।१ | वह्निस्तस्य (भर्तृ सं ४३) ८४।१९ | वामस्कन्धनिक्ष (कवि क ५ १) २०८।२९ |
| वर्णस्थं गुरुलाघवं न ६२।२७६ | वह्ने शक्तिर्जल (बाल रा ५ ३५) ३४७।१३ | वामासस्थल २५१।७८ |
| वर्णाकारप्रतिष्ठा (हि ३ ३२) १४७।२२५ | वाक्चक्षुःश्रोत्र ६२।१४ | वामाङ्गीकृतवामाक्षी (शा.प ६२) ३।२ |