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सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

१२४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् ज्ञात्वा रणस्तम्भपुरं तदानीं विप्रोषितस्वामिकमृद्धवैरः । सहाऽश्ववारैरतिदुर्निवारैरलावुदीनस्त्वरितं प्रतस्थे ॥६४॥ उस समय हम्मीरदेव को रणस्तम्भपुर से बाहर गया हुआ जानकर प्रवृद्ध वैर वाला अला- उद्दीन शीघ्र दुर्निवार घुड़सवारों के साथ रणस्तम्भपुर की ओर रवाना हुआ ॥६४॥ पञ्चाशद्भिः सैन्धवानां सहस्रैरग्रस्कन्धे गन्धवाहस्यदानाम् । उलूग्खानः प्राणतुल्यो नृपस्य भ्राता भीमः शात्रवाणाञ्चचाल ॥६५॥ आगे-आगे पचास हज़ार वायु के समान वेग वाले घोड़ों के साथ अलाउद्दीन का प्राणप्रिय भाई उलूगखाँ, जो शत्रुओं के लिये भयंकर था, रवाना हुआ ॥६५॥ हम्मीरदेवनृपतेरपि मन्त्रिमुख्या विद्याभटप्रभृतयः सुचिरं विचार्य । माद्यन्मतङ्गजतुरंगमसङ्कुलानि निन्युः सपत्नपृतनाभिमुखं बलानि ॥६६

एकादशः सर्गः १२५ द्रुततरमतिरौद्रः पारसीकस्य भर्तुः प्रबलबलसमूहः सूचयन् भाव्यनर्थम् । परिधिरिव गरीयान् मण्डलञ्चण्डभानो र्नगरमरमरौत्सोच्चाहुवाणान्वयस्य ॥ म्लेच्छपति अलाउद्दीन के अत्यन्त भयंकर और प्रवल सेनासमूह ने, भावी अनर्थ की सूचना देते हुए, चौहान वंश के हम्मीरदेव के रणस्तम्भपुर नामक नगर को शीघ्र घेर लिया, जिस प्रकार एक बड़ी भारी परिधि सूर्यबिम्ब को घेर लेती है (सूर्य के चारों ओर घेरा सा दिखाई देना अशुभ माना जाता है) ॥७१॥ अवनिः स्वयमीयुषी प्रकम्पं निजभर्तुर्व्यसनागमं समीक्ष्य । जनता यवनेशसैन्यभारे भृशमारोपयति स्म दूषणानि ॥७२॥ स्वयं पृथ्वी भी, अपने स्वामी हम्मीर के भावी व्यसन का विचार करके हिल उठी (भूकम्प आना भी अशुभ माना जाता है) ; लोगों ने व्यर्थ ही में यवनपति की सेना पर यह दोष दिया कि यवनसेना के चलने से पृथ्वी हिल रही है ॥७२॥ निर्घातोग्रस्वानमिश्रः समन्तादुल्कादण्डः प्रादुरासीत् प्रचण्डः । आग्नेयास्त्रं गोलकारावमिश्रं दुर्गान्तस्थैर्द्वेषिणां मन्यते स्म ॥७३॥ चारों ओर भीषण शब्द करता हुआ एक प्रचण्ड तारा आकाश से टूट गिरा (तारा टूटना भी अशुभ माना जाता है) ; किन्तु दुर्ग में रहनेवाले लोगों ने उसे शत्रुओं की विकट ध्वनि के साथ गोले छोड़ने वाले तोप की चमक और गर्जना समझा ॥७३॥ जैत्रात्मजोऽपि जितभीतिरनन्यचेता निर्वर्त्य कृत्यमखिलं विधिनोपनीतम् । श्रुत्वापि दुर्गमुपरुद्धममित्रसैन्यैर्नांतित्वरो निववृते निजपत्तनाय ॥७४॥ जैत्रसिंह के पुत्र निर्भय हम्मीरदेव, अनन्यचित्त से सम्पूर्ण कार्य को विधिपूर्वक समाप्त करवा कर, अपने रणस्तम्भपुर दुर्ग को शत्रुओं की सेना से घिरा हुआ जानकर भी, नगर की ओर बहुत अधिक व्यग्रता से नहीं लौटे ॥७४॥ इति श्री सुर्जनचरितमहाकाव्ये एकादशः सर्गः ।

द्वादशः सर्गः अथ वीक्ष्य पुरं परोपरुद्धं कुलभूपालपरम्परोपनीतम् । न जहौ निजमाननप्रसादं विमनाः सन्नपि मानवाधिनाथः ॥ १ ॥ इसके बाद, कुल-परम्परागत रणस्तम्भपुर को शत्रुओं से घिरा हुआ देखकर राजा हम्मीर- देव ने, दुःखी होकर भी, अपने मुख की प्रसन्नमुद्रा को नहीं छोड़ा ॥ १ ॥ अनुगृह्य वचोऽमृतेन पौरान् भृशमार्तानपि मर्त्यलोकभर्ता । स चिरात् सचिवैरुपास्यमानः समये संसद्माससाद शस्ते ॥ २ ॥ मर्त्यलोक के राजा हम्मीर ने अत्यन्त पीड़ित पुरवासियों को अपने वचनामृत से अनुगृहीत किया और फिर मुख्य मंत्रियों के साथ प्रशस्त समय में सभा में गये ॥२॥ उपविष्टममुं निवेद्य तत्र प्रतिहारैरुपलब्धप्रवेशः । अबदद् गिरमेत्य गाढगर्वमित्थ सन्देशहरः शकाधिपस्य ॥ ३ ॥ सभा में आसीन राजा हम्मीर को निवेदन करके और उनकी आज्ञा पाकर प्रतिहारों ने म्लेच्छपति अलाउद्दीन के सन्देशवाहक राजदूत को सभा में प्रविष्ट किया और उसने हम्मीरदेव से इस प्रकार अत्यन्त गर्वपूर्ण वचन कहे ॥ ३ ॥ प्रथितः पृथुविक्रमः पृथिव्यां यवनानामधिभूरलावुदीनः । प्रहितोऽत्र हितोपदेशकारी भवतोऽहं भुवनस्य तेन भर्त्रा ॥ ४ ॥ अपने महान् पराक्रम के कारण पृथ्वी में विख्यात लोकपति म्लेच्छों के स्वामी अलाउद्दीन ने मुझे आपको हितकारक उपदेश देने के लिये आपके पास भेजा है ॥ ४ ॥ उदयं चरमाद्रिमन्तराऽस्यां वसुमत्यां निवसन्ति येऽवनीशाः । वितरन्ति कृषीबला इवास्य प्रसभास्कन्दनभीरवः करं ते ॥ ५ ॥ उदयाचल से लेकर अस्ताचल तक इस पृथ्वी में जितने राजा हैं वे सब, अलाउद्दीन के प्रबल आक्रमण से डरकर, किसानों के समान, इनको कर देते हैं ॥ ५ ॥ इह कश्चन योऽभिमानशाली नहि दित्सेत नराधिपोऽस्य दण्डम् । भवति स्वयमेव तस्य मूर्ध्नि प्रबलो दण्डधरो धराधिनाथः ॥ ६ ॥ जो कोई अभिमानी राजा सुलतान को कर नहीं देता उसके मस्तक पर स्वयं पृथ्वीपति अला- उद्दीन का प्रबल दण्ड पड़ता है ॥ ६ ॥ अविमर्शनवशेन गर्वतो वा किमु भाविब्यसनस्य शासनाद् वा । मतिमानपि मूढधीरिव त्वं नृप जानासि हिताहिते न किञ्चित् ॥ ७ ॥ राजन् ! बुद्धिमान् होते हुये भी आप, अविवेक के कारण अथवा अभिमान के कारण अथवा भावी विपत्ति की प्रेरणा के कारण, मूर्ख के समान, अपने हिताहित के ज्ञान से क्यों शून्य हो गये हैं ? ॥ ७ ॥

द्वादशः सर्गः १२७ अखिलामपि शासतो धरित्रीं समतीताः शरदोऽस्य सप्तसङ्ख्याः । न करै र्न च सेवयापि तावद् भवता तस्य कृता मनोऽनुवृत्तिः ॥ ८ ॥ सारी पृथिवी पर शासन करते हुए सुलतान को सात वर्ष हो चुके हैं, किन्तु आपने अभी तक न तो कर देकर और न अपनी सेवा से सुलतान को प्रसन्न किया ॥ ८ ॥ कृपयाप्यवधीरणेन वाऽसौ हृदि नाधत्त नृपस्तवापराधम् । भवतोऽजनि दुर्मदो महीयानथ तेनात्मविनाशहेतुरेषः ॥ ९ ॥ अपनी कृपा के कारण अथवा अवज्ञा के कारण सुलतान ने आपके अपराध पर ध्यान नहीं दिया, किन्तु इससे आपका मिथ्याभिमान अत्यन्त बढ़ गया। जान लीजिये कि यह आपके विनाश का कारण सिद्ध होगा ॥ ९ ॥ बहुशः कृतविक्रियान् महीशे महिमाशाहमुखांस्तुरुष्कमुख्यान् । दधता निजसैनिकाधिपत्ये भवताऽयं विहितोऽपरोऽपराधः ॥ १०॥ सुलतान अलाउद्दीन के अनेक अपकार करने वाले महिमाशाह (मीर मुहम्मद शाह) आदि यवन-श्रेष्ठों को अपने सेनापति पद पर नियुक्त करके आपने यह दूसरा अपराध किया है ॥ १०॥ बहुभि र्बत शंसितैः किमन्यै र्जंगराख्यं पुरमेव यद् व्यभाङ्क्षीः । यवनेश्वरसोदरेण यस्मिन् निजसामन्तनिवेशनं वितेने ॥ ११ ॥ आपके अन्य अनेक अपराधों को कहाँ तक कहूँ, और तो और, आपने यवनेश्वर अलाउद्दीन के सगे भाई उलुग खाँ के, अपने सामन्तों के लिये, जगरपुर में बनाये गये शिविर तक को नष्ट भ्रष्ट कर दिया ॥ ११ ॥ चतुरम्बुधिमेखलान्तरे यः सहते न स्वनिदेशनस्य भङ्गम् । पुरभङ्गमभङ्गुरप्रतापः स कथं हन्त सहेत सोदरस्य ॥ १२॥ चारों समुद्र-रूपी रशना से सुशोभित पृथिवी में जो अक्षुण्ण प्रताप वाला सुलतान अपनी आज्ञा का भंग नहीं सहता वह अपने सगे भाई के नगर का भंग किस प्रकार सह सकता है ? ॥ १२॥ बलवत्यपि बालबुद्धितोऽयं गमितो वैरतरुस्त्वयाऽभिवृद्धिम् । उपनेष्यति निश्चयेन राजन्नचिरेणैव पचेलिमं फलं ते ॥ १३॥ राजन् ! आपने अपनी मूर्खता के कारण, शत्रु के बलवान् होने पर भी, इस वैर-वृक्ष को खूब सींच कर बढ़ाया है और अब बहुत शीघ्र ही निश्चित रूप से आपको इसका पका फल मिलेगा ॥ १३॥ सहजेतरकर्मणि प्रवृत्ताश्चपलत्वाल्लघवः प्रयान्ति नाशम् । गगनोत्पतने धृतप्रयत्ना बिलसंस्था इव कीटकाः सपक्षाः ॥ १४॥ क्षुद्र पुरुष चपलता के कारण सामर्थ्य से बाहर अस्वाभाविक कार्य में प्रवृत्त होकर नष्ट हो जाते हैं, जिस प्रकार बिल में रहने वाले छोटे-छोटे कीड़े अपने पंखों से आकाश को नापने का प्रयत्न करके नष्ट हो जाते हैं ॥ १४॥

१२८ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अधुनापि गताऽऽग्रहो यदि स्याः क्षणमन्धङ्करणं मदं निगृह्य । नियतं त्वयि धास्यति प्रसादं करुणार्द्रो हि महान् ममावनीशः ॥१५॥ अन्धा बनाने वाले मद को क्षण भर के लिये रोक कर यदि आप अब भी अपने दुराग्रह को छोड़ दें, तो सुलतान अवश्य ही आप पर प्रसन्न हो जायेंगे क्योंकि मेरे स्वामी अत्यन्त दयालु हैं ॥१५॥ घनशृङ्खलया निबध्य कण्ठं पशुमालभ्यमिवाशु पञ्जरस्थम् । प्रथमं सह तैस्तुरुष्कमख्यै र्महिमाशाहमुपायनीकुरुष्व ॥१६॥ सुलतान के भय से भागकर आये उन यवन-श्रेष्ठों के साथ पहले महिमाशाह (मीर मुहम्मद शाह) को पिंजरे में बन्द करके और कंठ में मोटी साँकल से बाँधकर, यज्ञ में बलिदान किये जाने वाले पशु के समान, सुलतान अलाउद्दीन की सेवा में शीघ्र उपस्थित कीजिये ॥१६॥ उपदीकृतमानतैः पुरा यत् तव वंश्यैः शकभृत्तेऽनुवर्षम् । समु

१७ द्वादशः सर्गः १२९

गिरमित्थमुदीर्य मुद्रितास्ये रिपुसन्देशहरे नरेन्द्रवर्यः । वदति स्म नवाम्बुदोपमानस्वरसंभेदसमुद्धुरां स वाणीम् ॥२२॥ इस प्रकार के वचन कह कर शत्रुसन्देशहारी दूत के चुप हो जाने पर राजश्रेष्ठ हम्मीरदेव नवीन मेघ के स्वर के समान गंभीर स्वर से शोभित वचन बोले ॥२२॥ बहुशोऽद्भुतपौरुषप्रपञ्चं भवता वर्णयता निजस्य भर्तुः । प्रतिपादित एव दूतयोग्यः प्रभुभक्तिप्रगुणीकृतो गुणौघः ॥२३॥ आपने अपने स्वामी सुलतान अलाउद्दीन के अद्भुत पराक्रम का विस्तृत वर्णन करने में, एक कुशल दूत के समान, अपने स्वामी के गुण-समूह को, प्रभुभक्ति के कारण, कई गुना बढ़ा-चढ़ा कर कहा है ॥२३॥ असतोऽपि समर्थयन्ति केचित् परदोषात्मगुणानतिप्रगल्भाः । प्रकटानपि तान् प्रवक्तुमन्ये विनयाधीनधियो न शक्नुवन्ति ॥२४॥ कोई-कोई अत्यन्त चतुर पुरुष दूसरे के दोषों का और अपने गुणों का, उनके वस्तुतः अविद्यमान होने पर भी, समर्थन करते हैं; किन्तु विनय से शोभित बुद्धि वाले पुरुष दूसरे के दोषों को को और अपने गुणों को, उनके प्रकट होने पर भी, अपने मुख से उन्हें कहना नहीं चाहते ॥२४॥ बहवो यवनेषु सार्वभौमाः श्रुतपूर्वाः प्रततीकृतप्रतापाः । विजिताः कतिचित् कृतोपकारा मिलिताः केचन पूर्वजैर्मदीयैः ॥ २५॥ बहुत से विस्तृत प्रताप वाले यवन राजाओं का वर्णन हमने सुना है। उनमें से बहुतों को तो हमारे पूर्वजों ने जीत लिया था और बहुत से हमारे पूर्वजों द्वारा कृत उपकार के कारण उनसे मिल गये थे ॥२५॥ रिपुमण्डलमर्कमण्डलं वा तरसोच्चैःपदलब्धये भिनत्ति । तनुते प्रणते करावलम्बं करदानं नहि चाहुवाणवंशः ॥२६॥ चौहाणवंश, उच्च पद को प्राप्त करने के लिये, वेग से या तो शत्रुमंडल को भेदता है या सूर्य मंडल को । (अर्थात् या तो शत्रुओं के मंडल को नष्ट करके राज्य-पद पर आरूढ रहता है और या युद्ध में काम आकर सूर्यमंडल को भेदकर स्वर्ग-पद प्राप्त करता है। युद्ध में मरने वाले वीर आदित्यमार्ग से स्वर्ग जाते हैं ।) चौहाणवंश, (अपने चरणों में) झुकने वाले पुरुष को करावलम्बन (हाथ का सहारा) देता है अर्थात् अपने हाथ के सहारे उसे उठाता है; वह (अन्य राजाओं को) कभी कर नहीं देता ॥२६॥ मम पूर्वभवः पुरा प्रवीरान् हरिराजः परिभूय पारसीकान् । उपयोधपुरं दुरन्तदुर्गं रचयामास चिराय चारुकीर्तिः ॥२७॥ हमारे पूर्वज हरिराज ने प्राचीन काल में वीर यवनों को परास्त करके जोधपुर के समीप दुर्धर्ष दुर्ग बनवाया था जिससे उनकी सुन्दर कीर्ति आज भी अमर है ॥२७॥


(२६) युद्धे निहता वीराः सूर्यमण्डलं भित्वा स्वर्गं गच्छन्ति । तदुक्तं—'द्वाविमौ पुरुषौ लोके सूर्यमण्डलभेदिनी । परिव्राड् योगयुक्तश्च रणे चाभिमुखो हतः ।।' इति ।

१३० सुर्ज्जनचरितमहाकाव्यम् अपरः परवीरचक्रहन्ता भुवि चामुण्डसमाख्यया प्रतीतः । समरे शकचक्रवर्तिनं तं विनियम्य स्वपुरं समानिनाय ॥२८॥ शत्रुवीरों के समुदाय को मारने वाले, चामुण्डराज नाम से विख्यात, हमारे एक और पूर्वज हुये हैं जो यवनों के चक्रवर्ती राजा को युद्ध में कैद करके अपने नगर में ले आये थे ॥२८॥ पुरुहूतदिशं जलालुदीने चलिते दूरमनन्तरैर्निरुद्धम् । पुरमस्य च योगिनीपुराख्यं निजशौर्येण ररक्ष जैत्रसिंहः ॥२९॥ सुलतान जलालुद्दीन के पूर्व दिशा में दूर तक चले जाने पर जब उनके योगिनीपुर नामक नगर को सीमावर्ती शत्रुओं ने घेर लिया था तब हमारे पिता जैत्रसिंह ने अपने पराक्रम से उस नगर की रक्षा की थी ॥२९॥ मम सैनिकपूरणं कियद् वा महिमाशाहमुखाः शका विदध्युः । तव भूमिपते र्भयात् प्रपन्नाः शरणं मामिति रक्षिताः स्वदेशे ॥३०॥ महिमाशाह आदि यवनश्रेष्ठ हमारी सेना की क्या पूर्ति करेंगे ? तुम्हारे सुलतान के भय से ये लोग हमारी शरण में आये हैं इसलिये हम अपने देश में इनकी रक्षा कर रहे हैं॥३०॥ निजजीवनमप्युपेक्षमाणैः शरणार्थी न विमुच्यते महद्भिः । शिबिरे यदि विप्रतिष्ठमानः प्रथमोदाहरणं बभूव तत्र ॥३१॥ महान् पुरुष अपने जीवन तक की उपेक्षा कर देते हैं, किन्तु शरणार्थी को नहीं छोड़ते। फिर यदि (वीर और कृतज्ञ) महिमाशाह हमारे शिविर में (सेनापति पद पर) प्रतिष्ठित हैं, तो यह (शरणार्थियों की रक्षा और सम्मान का) पहला उदाहरण है ॥३१॥ जगराख्यपुरस्य यद् विमर्दोऽजनि तत्राप्यपरस्य कोऽस्ति दोषः । यदिहाल्पतरेऽपि सम्पराये तदुलूग्खानपलायनं निदानम् ॥३२॥ जगरपुर नामक नगर यदि नष्टभ्रष्ट हुआ तो इसमें भी हमारा क्या दोष है ? इसका कारण तो जरा सा युद्ध छिड़ते ही उलूबखाँ का भाग जाना है ॥३२॥ समराङ्गणसीम्नि दत्तभङ्गे स्वयमेवाधिपतौ पताकिनीनाम् । शिविरं द्रविणाढ्यमप्रवीरं किमु लुण्टाकगणः क्षमेत मोक्तुम् ॥३३॥ युद्धक्षेत्र में सेनाओं के स्वामी को परास्त करके भगा देने पर यदि हमारी सेना ने विपुल धन राशि से युक्त और वीर रक्षकों से रहित शिविर को अधिकृत कर लिया तो इसमें कौन-सी बुरी बात है; अरक्षित और धनयुक्त स्थान को तो लुटेरे लोग भी नहीं छोड़ते ॥३३॥ निहतः कपटाज्जलालुदीनो यदि दीनो ननु सोऽस्ति वीरगोष्ठ्याम् । सुभटा हि निजक्षताङ्गजालैरभिषिञ्चन्ति यशोमयं शरीरम् ॥३४॥ तुम्हारे सुलतान अलाउद्दीन ने यदि छलपूर्वक (अपने चाचा और ससुर) बिचारे सुलतान (३३) लुण्टाकगणो दस्युसमूहः। (३४) अलाउद्दीनः स्वस्य पितृव्यं श्वसुरं जलालुद्दीनं कपटेन घातयित्वा राजा बभूव।

द्वादशः सर्गः १३१ जलालुद्दीन को मरवा दिया तो इसमें अभिमान की कौन बात है ? जलालुद्दीन ने तो वीर पद ही प्राप्त किया, क्योंकि वीर-पुरुष अपने घावों से बहने वाले रक्त से अपने यशः शरीर को सींचते हैं ॥३४॥ इयती कियती विकत्थना वा यदि रुद्धं पुरमङ्ग मत्परोक्षम् । सदनं यदि शून्यतामुपेतं प्रविशेत् तत्र जवेन जम्बुकोऽपि ॥३५॥ दूत ! यदि तुम्हारे सुलतान ने, मेरे यहाँ न रहने पर, इस रणस्तम्भपुर को घेर लिया तो इसमें इतनी बड़ी डींग हाँकने की क्या बात है ? शून्य घर में तो गीदड़ भी वेग से घुस जाता है ॥३५॥ उपरुध्य पुरं ममाऽसमक्षं स्वयमुद्गीर्णमनोमलस्त्वेशः । मयि सन्दिशति स्म सन्धिवार्ता विपरीतं चतुरत्वमेतदीयम् ॥३६॥ हमारे यहाँ न रहने पर रणस्तम्भपुर को घेर कर तुम्हारे स्वामी ने अपने मन का कपट- विष उगल दिया है और अब वे हमारे पास सन्धि का सन्देश भेजते हैं ! उनकी चतुरता विचित्र है ! ॥३६॥ शरवत् समरान्तरे प्रवीराः सुखमाविष्कृतनादमापतन्ति । भुजगा इव सञ्चरन्ति चौराः पररन्ध्रं परितो गवेषयन्तः ॥३७॥ वीर लोग बाण के समान गरजते हुये युद्धभूमि में कूदते हैं और चोर, साँपों की तरह, दूसरे के छेद (बिल को ; कमी को) ढूँढते हुये चारों ओर रेंगते हैं ॥३७॥ अकरोत् मम पामरः परोक्षं पुररोधं यदि पौरुषं कियद् वा । प्रकटीकुरुतां पुनः स्वशक्ति स पुरः सम्प्रति सम्परायसीम्नि ॥३८॥ हमारे परोक्ष में यदि उस नीच सुलतान ने हमारे नगर को घेर लिया तो इसमें क्या पराक्रम किया ! अब वह हमारे आगे युद्धक्षेत्र में अपनी शक्ति दिखलावे ! ॥३८॥ इतिवादिनि शत्रुवर्गजैत्रे तनये जैत्रमहीपतेः स दूतः । विरहय्य निजासनं यियासुः प्रखरो वाग्विषमुज्जगार घोरम् ॥३९॥ शत्रुवर्ग को जीतने वाले, जैत्रसिंह के पुत्र हम्मीरदेव के इस प्रकार कहने पर वह दूत अपने आसन को छोड़कर खड़ा हो गया और जाते-जाते उसने इस प्रकार के घोर वाग्विष को उगला ॥३९॥ निजकालनिदेशभाजि मृत्यौ भृशमास्कन्दितमूर्ध्नि मानवानाम् । सुहृदोऽपि गिरो विशन्ति नान्तः किमुताऽरातिवचोहरोपनीताः ॥४०॥ जब अपने काल के आदेश से युक्त मृत्यु मनुष्यों के मस्तक पर अच्छी तरह मँडराने लगती है तब मित्रों की बाणी भी उनके हृदय में नहीं उतरती, फिर शत्रु के सन्देश लाने वाले दूत की वाणी की तो बात ही क्या ! ॥४०॥

१३२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् सह सर्वबलेन तीर्णसिन्धुः प्रथितस्ते सविभीषणो विपक्षः । उपलम्भयिता भवन्तमिद्धं न चिरेणैव दशां दशाननस्य ॥४१॥ अपनी सारी सेना के साथ नदी पार करके यहाँ आने वाले आपके भयंकर शत्रु वे विख्यात अलाउद्दीन, जिनके साथ आपके घर का भेदी (आपका सेनापति रणमल्ल) जा मिला है, आपको शीघ्र ही उस दशा में पहुँचाने वाले हैं जिस दशा में विख्यात भगवान् राम ने, अपनी सारी सेना के साथ समुद्र पार करके, विभीषण को अपनी ओर मिला कर, रावण को पहुँचा दिया था ॥४१॥ घनसैनिकजालके हि तावद् विनिरुद्धोऽसि न निर्गमावकाशः । अलमुत्फलनेन मोक्ष्यसे त्वं नियतं मीनवदाशु जीवनेन ॥४२॥ आप चारों ओर से हमारे सैनिकों के घने जाल में घिर रहे हैं और आपके लिये बाहर निकल भागने का भी कोई मार्ग नहीं है । आपका उछल कूद मचाना बेकार है । निश्चित है कि आप अब शीघ्र ही जाल में फंसी हुई मछली के समान अपने जीवन से (प्राणों से; पानी से) अलग कर दिये जावेंगे ॥४२॥ अथ दुर्वचसं निरस्य दूतं नरनाथः परवाहिनीनिवेशम् । अभिवीक्षितुमाप्तमन्त्रिमुख्यैः सह दुर्गौघशिरः समारुरोह ॥४३॥ इस प्रकार के दुर्वचन बोलने वाले दूत को बाहर निकाल कर राजा हम्मीरदेव शत्रुसेना को देखने के लिये अपने मुख्य मंत्रियों के साथ दुर्ग के ऊपर चढ़े ॥४३॥ इदमाह च पश्यताऽश्वभर्तुर्वि निवेशं विपुलं वरूथिनीनाम् । अविभावितपारमम्बुराशेः प्रलयप्रेरितवारिपूरतुल्यम् ॥४४॥ और अपने मंत्रियों से इस प्रकार बोले—घुड़सवारों के स्वामी अलाउद्दीन की सेनाओं के, प्रलय वायु से प्रेरित समुद्र के जलसमूह के समान अपार, इस समूह को देखिये ॥४४॥ अनुवेलमियं सपत्नसेना मम सेनाभिरुपेयुषी विवृद्धिम् । गिरिनिर्झरिणीभिरुक्षिताया हरते हन्त रुचिं महाह्रदिन्याः ॥४५॥ हमारी सेनाओं के मिल जाने से निरन्तर बढ़ती हुई यह शत्रुसेना, पर्वतीय नदियों के संगम से निरन्तर बढ़ती हुई महानदी के समान लग रही है ॥४५॥ धनलालसया नवीनभूत्या यवनाऽऽपातभयेन चाभिजाताः । चिरकालनिरोधयन्त्रितत्वादिह निर्विण्णहृदः परे निरीयुः ॥४६॥ हमारी नगरी के कुछ नौजवान सैनिक धन के लोभ से उधर जा मिले हैं । नगरी के कुलीन लोग यवनों के आक्रमण के भय से और अन्य लोग बहुत दिनों से घेरा पड़े रहने के कारण दुखी होकर नगरी को छोड़-छोड़ कर जा रहे हैं ॥४६॥ (४१) स विभीषणो भयंकरो विभीषणसहितः रामश्च । विभीषणेनेव स्वपक्षविद्रोहिणा रणमल्लेन सहित इत्यपि गम्यते ।

द्वादशः सर्गः १३३ दिवसैरपरैः कियद्भिरेवं परिशून्या नियतं पुरी भवित्री । समरशममन्तरेण माभूत् करलभ्यं यवनस्य दुर्गमेतत् ॥४७॥ इस तरह अवश्य ही कुछ दिनों में हमारी नगरी जनशून्य हो जावेगी। फिर भी हमारी इच्छा है कि बिना युद्ध के यह दुर्ग यवन शत्रु के हाथ में नहीं पड़ने पावे ॥४७॥ न मुहूर्तविवेचनावकाशः पतितः संमुखमुल्वणः प्रतीपः । सदने सहसैव दह्यमाने जलशुद्धेर्नहि युज्यते विचारः ॥४८॥ उग्र शत्रु सामने उपस्थित है। अब क्षण भर भी सोचने-विचारने का अवकाश नहीं है। जब घर में सहसा चारों ओर प्रज्वलित आग लग जाय तो जल से बुझाने का विचार भी नहीं उठता ॥४८॥ समरे शमयन्ति वैरिवर्गानथवा जीवनमेव यापयन्ति । इह काचन चाहुवाणवंशे विदिता नैव हि पद्धतिस्तृतीया ॥४९॥ चौहाण वीर या तो युद्ध में शत्रु समुदायों को नष्ट कर देते हैं या स्वयं ही काम आ जाते हैं। इस चौहाणवंश के लिये और कोई तीसरा मार्ग नहीं है ॥४९॥ समयस्य नृशंसतां समीक्ष्य स्फुटचारित्र्यविभूषणा भवत्यः । यशसः सरणीषु वीरपत्नीव्रतचर्यासु भवन्तु सावधानाः ॥५०॥ अवरोधगणानधोमुखः सन्निति सन्दिश्य रहोगतः स राजा । विससर्ज पुरोहितं प्रणम्य प्रणयामन्त्रणयन्त्रितान्तरङ्गम् ॥५१॥ फिर राजा हम्मीरदेव ने अन्तःपुर में जाकर नीचा मुँहकरके रानियों से इस प्रकार कहा— शुद्ध चरित्र ही आप लोगों का आभूषण है, अतः आप समय की क्रूरता और प्रतिकूलता को देखकर, वीरपत्नियों की व्रतचर्याओं के लिये, जो यश (रूपी प्रासाद तक पहुँचने) की सीढ़ियाँ हैं, तैयार हो जाइये। रानियों से यह कहकर राजा ने प्रेमनिवेदन से जकड़े हुये हृदय वाले पुरो- हित को प्रणाम करके (जौहर की तैयारी के लिये) भेजा ॥५०-५१॥ वितरन् स वसूपमानविप्रप्रवरेभ्यः प्रचुराणि काञ्चनानि । प्रसभस्रुतमश्रुपूरमेव स्वकरस्थं कुरुते स्म दानतोयम् ॥५२॥ अग्नि के समान तेजस्वी श्रेष्ठ ब्राह्मणों को प्रचुर सुवर्ण दान देते समय हम्मीरदेव ने वेग से बहने वाले आँसुओं के प्रवाह को अपने हाथ में लेकर उसी को दान का संकल्पजल बनाया ॥५२॥ समरोत्सुकवैरिसिंहनादैरथ निर्भिन्नमनाः सनादमुच्चैः । नवनीरदगर्जितेन नुन्नः प्रतिगर्जन्निव केसरी चचाल ॥५३॥ फिर युद्ध के लिये उत्सुक शत्रुओं के सिंहनादों को सुनने से आवेश में आकर, नवीन मेघ के गंभीरगर्जन से उत्तेजित होकर ज़ोरों की गर्जना करने वाले सिंह के समान, गरजते हुये वीर हम्मीरदेव युद्ध में कूद पड़े ॥५३॥

१३४ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् यवनाः सवनायुजास्तदानीं महिमासाहसुमीरखेब्रुमध्ये । नृपतिं प्रथमं प्रतिष्ठमानं परितस्तं परिचक्रुरक्रमन्तम् ॥५४॥ उस समय अरबी घोड़ों पर सवार यवन, हम्मीरदेव को महिमाशाह और उनके भाई श्रेष्ठ मीर खेब्रु के बीच में बिराजमान देखकर क्रम का ध्यान न रखकर पहले उन्हीं पर टूट पड़े ॥५४॥ अवतीर्णममुं च दुर्गमध्यादवधार्य प्रयतान्तरा महिष्यः । हुतहव्यसमेधिते हुताशे जुहुवामासुरवारिता वपूंषि ॥५५॥ इधर रानियों ने, हम्मीरदेव को दुर्ग से उतर कर युद्ध में गये हुये जानकर, स्थिर मन से, बे रोकटोक, हवन की गई सामग्री से प्रज्वलित यज्ञाग्नि में अपने शरीरों की आहुतियां दे दीं (जौहर किया) ॥५५॥ × × × × × × × × × × ॥५६॥ धारासारैरुद्धुराणां शराणां धूलिव्रातैर्बद्धभोमान्धकारे । विद्युत्प्रायैर्मुक्तकोशैः कृपाणैस्तत्राकाले विभ्रमः प्रावृषोऽभूत् ॥५७॥ (सेना से उड़ने वाले) धूल के बादलों से चारों ओर अन्धकार छा जाने से, वेग से चलाये गये बाणों की घनघोर वर्षा से और म्यान से निकाली गईं तलवारों की बिजली जैसी चमक से उस युद्ध में असमय में ही वर्षाऋतु का विभ्रम उपस्थित हो रहा था ॥५७॥ रेणुव्रातैर्ग्रस्तभास्वद्गभस्तौ सान्द्रीभूतध्वान्तसन्दोहभाजि । दिव्यस्त्रीणां व्योम्नि वैमानिकीनां ताराकारा रेजिरे रत्नहाराः ॥५८॥ आकाश में, जहां देदीप्यमान सूर्य भी (सेना से उत्थित) धूल-समूह से ढक गया था और जहां चारों ओर गहरा अन्धकार छा गया था, विमान में बैठी हुईं (युद्ध में हत वीरों के स्वागतार्थ आईं हुईं) स्वर्ग की अप्सराओं के रत्नहार तारों के समान चमक रहे थे ॥५८॥ आलोक्यास्यच्छत्रमिन्दुप्रकाशं दूरादेव व्यद्रवच्छत्रुसैन्यम् । गन्धेभानां दानगन्धाद् यथास्य भ्रष्टारोहा वैरिणां वारणेन्द्राः ॥५९॥ हम्मीरदेव के चन्द्रबिम्ब के समान उज्ज्वल छत्र को दूर से ही देखकर शत्रु सेना भाग गई, जैसे हम्मीर के मदोत्कट हाथियों के मद जल की गन्ध को सूंघकर वैरियों के हाथी, अपने महावतों को पटक कर, भाग गये ॥५९॥ मूर्धाकम्पैरङ्कुशग्राहकाणां शश्वत् तीव्रं वन्ध्ययन्तः प्रयत्नम् । मातङ्गास्ते विद्रवन्तः पराञ्चः स्वीयान्येव द्रागमृद्नन्बलानि ॥६०॥ महावतों के अंकुश प्रहारों के तीव्र प्रयत्न को भी अपने सिर हिलाकर विफल कर देनेवाले शत्रु के हाथी भाग खड़े हुए और शीघ्र ही उन्होंने अपनी ही सेना को रौंद दिया ॥६०॥


(५५) दुर्वारघोरचरित्रसंकटे समुपस्थिते राजस्थानेषु पतिव्रताः पतिप्राणा महिलाः सविधि वह्निं प्रज्वाल्य समर्च्य परिक्रम्य हविरादिभिर्हुत्वा अन्ते देहरूपाभिरेवाहुतिभिर्वह्निं तर्पयन्ति स्मति महाव्रतं 'जौहर' नाम्ना प्रसिद्धम् ।

द्वादशः सर्गः १३५ संत्रस्तांस्तान् सन्निवर्त्य स्वसैन्यानुलूग्खानेनानुजेनानुयातः । अव्यग्रात्मा सम्पराये समागाद् वर्षन् भल्लांस्तूर्णमल्लावुदीनः ॥६१॥ अलाउद्दीन, जिसके पीछे उसका भाई उलूगखाँ चल रहा था, अपनी भयभीत सेना को (आश्वासन देकर) रणक्षेत्र में लौटाता हुआ और स्थिरतापूर्वक शीघ्रता से बाणों की वर्षा करता हुआ, युद्धस्थल में आया ॥६१॥ शस्त्राशस्त्रि व्यापृतानां भटानां साहङ्कारैः सङ्गतानां रणान्तः । द्रागुद्भूता रक्तधाराः क्षतोत्था नादुः खेदं स्वेदवत् संस्रवन्त्यः ॥६२॥ युद्धस्थल में आये हुये अभिमानी वीरों को, परस्पर शस्त्रप्रहार के कारण घावों से पसीने की तरह बहने वाली रक्त की धाराओं ने भी कष्ट नहीं दिया ॥६२॥ उत्क्षिप्योच्चैः प्रेरितस्तीक्ष्णखड्गो नालं भेत्तुं वैरिणो वारवाणम् । तत्संघट्टादुत्थितोऽङ्गे कृशानुर्निन्ये मूर्च्छां लम्बकूर्चावलम्बो ॥६३॥ किसी वीर ने अपनी तलवार उठाकर बड़े जोर से शत्रु पर जो प्रहार किया वह प्रहार शत्रु का कवच नहीं भेद सका, किन्तु तलवार और कवच के संघर्ष से शत्रु के वक्षःस्थल में जो आग निकल पड़ी वह शत्रु की लम्बी दाढ़ी में जा लगी और उसने शत्रु को मूर्च्छित कर दिया ॥६३॥ क्रोधान्मुक्ता धन्विभिस्तीव्रवेगैरग्रे लूनं वैरिणां वक्त्रपद्मम् । संबिभ्राणा व्योमकासारमध्ये बाणास्तिर्यग्नाललक्ष्मीमवापुः ॥६४॥ तीव्र वेग वाले धनुर्धरों ने क्रोध से जो बाण छोड़े वे शत्रुओं के मुख-कमलों को काटकर आकाश में ले उड़े और उन्होंने आकाश-सरोवर में शत्रुओं के मुख-कमलों के नीचे-टेढ़े कमल-नाल की शोभा को प्राप्त किया ॥६४॥ सङ्ग्रामान्ते पतितानां भटानां भूषारत्नज्योतिषाऽत्युज्ज्वलाभैः । अस्रापूरैर्लम्भिताः पावकाभैर्धूमच्छायामुच्छ्रिता दन्तिदेहाः ॥६५॥ युद्धक्षेत्र में काम आये हुये वीरों के रत्नाभूषणों की चमक से जिनकी आभा बढ़ गई थी ऐसे, अग्नि के समान प्रज्वलित रक्त-समूहों ने, मारे गये हाथियों के काले और उन्नत शरीरों को धुयें की शोभा प्राप्त करा दी ॥६५॥ उत्तानस्थं स्रस्तमुक्तहस्तादध्यारूढाः खेटकं बद्धकेल्यः । तत्राजस्रप्रस्रुतास्रस्रवन्तीः फेत्कारिण्यः फेरुकान्ताः प्रतेरुः ॥६६॥ खेल करने वालीं और 'फेत् फेत्' शब्द करने वालीं गीदड़ों की मादाओं ने, युद्धक्षेत्र में निरन्तर बहने वाले रक्त की नदियों को, किसी वीर के कटे हुए हाथ से गिरे हुए और सीधे खड़े हुए खेटक नामक शस्त्र पर चढ़कर (वहाँ से कूदकर) पार किया ॥६६॥ (६६) खेटकमायुधविशेषम् । 'फेत् फेत्' इति अपशब्दं कुर्वन्त्यः । फेरुकान्ताः शृगाल्यः ।

१३६ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् वीक्ष्य स्वीयं सैनिकं शीर्यमाणं मत्वा शत्रोः शौर्यमानन्त्यभाजः । अध्यारुढः कुञ्जरेन्द्रं नरेन्द्रः प्रायाद् यस्मिन् पारसीकक्षितीशः ॥६७॥ अपनी थोड़ी सी सेना को भी क्षीण होते हुये देख कर और शत्रु की अनन्त सेना को देख कर हम्मीरदेव, हाथी पर बैठे हुए, उधर गये जिस ओर सुलतान अलाउद्दीन था ॥६७॥ तं तेजोभिः प्रज्वलन्तं दुरन्तैरावव्रुस्ते यौगपद्येन योधाः । कल्पापाये क्रूररूपं यथोच्चैर्बिम्बं पूष्णः पुष्कराद्याः पयोदाः ॥६८॥ दुर्धर्ष तेज से प्रज्वलित वीर हम्मीरदेव को शत्रु सैनिकों ने एक साथ उस प्रकार घेर लिया जिस प्रकार पुष्कर आदि बादल, प्रलय के समय, सूर्य के भयानक तेजस्वी बिम्ब को वेग से ढक लेते हैं ॥६८॥ तान् दुर्वारान् वारयन् बाणवर्षै म्लेच्छव्रातानब्रवीत् तीव्रकर्मा । क्षुद्राः क्षुद्रासन्निभाः केऽत्र यूयं जाग्रत्युग्रे चाहूवाणप्रतापे ॥६९॥ उग्र कर्म में निपुण राजा हम्मीर, उन दुर्धर्ष म्लेच्छों के समूहों को अपने बाणों की वर्षा से हटाकर, यों बोले—तुच्छ बर्रों के समान (डंक मारने वाले) क्षुद्र पुरुषों ! उग्र प्रतापी चौहाण के प्रज्वलित रहते तुम क्या कर सकते हो ? ॥६९॥ उलूगखानोलूकमूकोऽत्र भूयः प्रागेव त्वं ज्ञातसारः परोक्षम् । क्षुद्रैरेव द्रावितः सङ्क्रान्तात् सौरं तेजः सोढुमेवाक्षमोऽसि ॥७०॥ उल्लू की तरह चुप रहने वाले उलूग खाँ ! तू फिर यहाँ आया है। तेरी शक्ति का पता तो हमारे परोक्ष में ही लग गया था जब हमारे साधारण सैनिकों ने ही तुझे हरा कर युद्धक्षेत्र से भगा दिया था। जैसे उल्लू सूर्य का तेज नहीं सह सकता, उसी प्रकार तू भी सूर्यवंशी चौहाण का तेज नहीं सह सकता ॥७०॥ शंसन्नित्थं सन्निपत्य प्रवीरान् सर्वैरम्भैर्बाधमानानरातीन् । अह्नायाऽसौ प्रत्यगृह्णान्नरेन्द्रो नागानन्यान् यूथनाथो यथैकः ॥७१॥ इस प्रकार कह कर वीर हम्मीर ने आगे बढ़कर अपनी शक्ति से वीर शत्रुओं को बाधित करके उन पर शीघ्र उसी प्रकार आक्रमण किया जिस प्रकार यूथनायक हाथी अकेला ही अन्य हाथियों पर आक्रमण करता है ॥७१॥ सर्वेष्वेव प्रेषितास्तुल्यकालं चापात्तस्य प्रापतन्तः पृषत्काः । स्थूलां मूर्तिं बुद्धिमप्याशु सूक्ष्मां भित्वा मोहं द्विप्रकारं वितेनुः ॥७२॥ हम्मीरदेव के धनुष से छूटे हुये बाण एक साथ सब शत्रुओं पर गिरे और उनके स्थूल शरीर को तथा सूक्ष्म बुद्धि को भेदकर उन्हें दोनों प्रकार से मूर्च्छित कर दिया ॥७२॥ (६९) क्षुद्राः वरटाः भ्रमर्यः ।

१८ द्वादशः सर्गः १३७ नालक्ष्यन्त क्षिप्रकर्तुः पृषत्काश्छिन्दन्तस्ते वातवेगा अरातीन् । उन्नीयन्ते पात्यमानैः शरीरैः स्फारां धारां रौधिरीमुद्वमद्भिः ॥७३॥ अत्यन्त शीघ्रता से बाण चलाने वाले हम्मीरदेव के वायु के समान गतिशील बाण शत्रुओं को काटते हुये दिखाई नहीं देते थे ; रक्त की विस्तृत धारा को उगलने वाले गिरते हुए शरीरों द्वारा उन बाणों का अनुमान किया जाता था ॥७३॥ म्लेच्छाधीशोऽप्यस्य मूर्च्छत्प्रतापः पत्रिव्रातैरातुदत् कुञ्जरेन्द्रान् । तैरत्यर्थं मर्मविद्धोऽपि युद्धे तस्थौ पक्षे रोद्धुराधोरणस्य ॥७४॥ म्लेच्छपति अलाउद्दीन भी हम्मीरदेव के बाण-समूहों के कारण मूर्छित प्रताप वाला बन गया और उसने अपने हाथियों को हम्मीर की सेना पर आक्रमण के लिये प्रेरित किया । किन्तु जब वह स्वयं हम्मीर के बाणों से युद्ध में मर्मविद्ध होने लगा तो उसे आक्रमण रोकने वाले महावत के पीछे छिपना पड़ा ॥७४॥ विश्राम्यन्ती तत्र शुभ्रातपत्रच्छायासीना स्वैरमेवोभयत्र । भूयो भूयो भूभृतोः सञ्चरन्ती पार्श्वं प्रापन्नैव खेदं जयश्रीः ॥७५॥ युद्धस्थल में, वीर हम्मीरदेव और अलाउद्दीन इन दोनों राजाओं के शुभ्र छत्रों की छाया में यथेच्छ बैठने वाली विजय-लक्ष्मी कभी हम्मीरदेव के और कभी अलाउद्दीन के पास जाती हुई खिन्न नहीं होती थी ॥७५॥ नागात् तस्मात् पतितात् यावदन्यं नागाद् वेगाद् वाहनं चाहुवाणः । तावद् भिन्दन् भिन्दिपालेन वक्षश्चिक्षेपैनं वीरतल्पे विपक्षः ॥७६॥ अपने मारे गये हाथी को छोड़कर ज्यों ही हम्मीरदेव चौहान दूसरे हाथी पर चढ़ने लगे उसी समय शत्रु ने भिन्दिपाल (बन्दूक ?) नामक शस्त्र से उनका वक्षःस्थल भेद कर उन्हें वीर-शय्या पर सुला दिया ॥७६॥ सुचिरमथविपक्षक्षोणिपानीकिनीनां क्षतजमयनदीभिः क्षोणिमाप्लाव्य कृत्स्नाम् । तनुमनुपमरूपां स्थेयसीं कीर्तिरूपामविशदसमतेजा वीरहम्मीरदेवः ॥७७॥ इस प्रकार सम्पूर्ण युद्धभूमि को बहुत देर तक शत्रु राजा की सेनाओं के घावों से बहने वाली रुधिर की नदियों से पाट कर, अद्वितीय तेजस्वी वीर हम्मीरदेव ने (अपने क्षणभंगुर पार्थिव शरीर को छोड़कर) अनुपम शोभायुक्त चिरस्थायी यशःशरीर में प्रवेश किया ॥७७॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये द्वादशः सर्गः (७६) भिन्दिपालः प्रायेण 'गुलेल' इति ख्यातः परन्तु नालिकास्त्रेऽपि अस्य शब्दस्य प्रयोगो दृश्यते । अत्र तु औचित्यवशात् नालिकास्त्रं 'बन्दूक' इति ख्यातमेव प्रतीयते ।

त्रयोदशः सर्गः पूर्वो हम्मीरदेवस्य सप्तमः शत्रुमर्दनः । शहाबुद्दीनमान्धोऽपि कुण्ठबाणेन योऽवधीत् ॥ १ ॥ पृथ्वीराजस्य तस्यैव समो भ्राता जयत्यजः । माणिक्यराजो मतिमानंशेन बुभुजे महीम् ॥ २ ॥ हम्मीरदेव के शत्रु को रौंदने वाले सातवें पूर्वज पृथ्वीराज के, जिन्होंने अन्धे होने पर भी कुण्ठित बाण से शहाबुद्दीन को मार दिया था, छोटे भाई बुद्धिमान् माणिक्यराज, जो अपने भाई के समान थे, अपने भाग की पृथ्वी पर शासन करते रहे ॥१-२॥ सदाऽरुणदरात्तीनां स दारुणधियां पुरम् । तमाऽऽहितधियः साधु तमाराहितकरं विदुः ॥ ३ ॥ माणिक्यराज दारुण बुद्धिवाले शत्रुओं के नगरों को सदा नष्ट-भ्रष्ट करते रहे। बुद्धिमान् लोग उनको अन्धकार को नष्ट करने वाले सूर्य के समान अथवा राहु के शत्रु भगवान् विष्णु के समान मानते थे ॥ ३ ॥ नित्यमाश्रित्य नृत्यन्ती सद्वंशालम्बिनो गुणान् । खेलति स्म निरालम्बे रङ्गे यत्कीर्तिनर्तकी ॥ ४ ॥ उत्तम वंश में उत्पन्न राजा माणिक्यराज के गुणों का आश्रय लेकर नाचती हुई उनकी कीर्ति रूपी नर्तकी आकाश में खेल किया करती थी, जैसे उत्तम बाँस में बाँधे हुये रस्सों का सहारा लेकर नाचती हुई नटी आकाश में अपने खेल दिखाया करती है ॥ ४ ॥ चक्रे न पात्रमालिन्यं पतङ्गे मित्रतामधात् । अतः प्रतापदीपोऽस्य जगदुत्तरतां गतः ॥ ५ ॥ (दीपक अपने पात्र को मलिन बना देता है और सूर्य से उसकी शत्रुता है क्योंकि सूर्योदय होते ही वह बुझ जाता है, किन्तु) माणिक्यराज का प्रताप-रूपी दीपक अलौकिक है क्योंकि वह कभी पात्रमालिन्य नहीं करता (अर्थात् सुपात्र पुरुषों के हृदयों को कभी मलिन नहीं करता) और सूर्य से उसकी मित्रता है (अर्थात् वह सूर्य के समान तेजस्वी है) ॥ ५ ॥ चण्डराजस्तनूजोऽस्य चण्डभानुसमप्रभः । चण्डराजकपद्मानांमचण्डकिरणोऽभवत् ॥ ६ ॥ माणिक्यराज के प्रचण्ड सूर्य के समान तेजस्वी चण्डराज नामक पुत्र हुये जो शत्रुराजाओं रूपी कमलों के लिये अचण्डकिरण चन्द्रमा के समान थे (जैसे चन्द्रोदय के समय कमल मुकुलित हो जाते हैं वैसे ही इनको देखकर शत्रु मुरझा जाते थे) ॥ ६ ॥ स पुत्रं भीमविक्रान्तं भीमराजमजीजनत् । भीमसेनसमः स्थाम्ना भीमसेनासमृद्धिमान् ॥ ७ ॥ उनके भयंकर पराक्रमी भीमराज नामक पुत्र हुये जो भीमसेन के समान पुष्ट थे और बल- वती सेना की समृद्धि से युक्त थे ॥ ७ ॥

त्रयोदशः सर्गः १३९ असौ विजयराजाख्यं राजा विजयशालिनम् । तनयं जनयामास जनरञ्जनचेष्टितम् ॥ ८ ॥ भीमराज के विजयराज नामक विजयशाली पुत्र उत्पन्न हुये जो प्रजा को प्रसन्न रखने का प्रयत्न किया करते थे ॥ ८ ॥ रयणस्तनयस्तस्य रयनर्तितविक्रमः । स्मयमानोद्धतानेकः स्मयमानोजयत् परान् ॥ ९ ॥ उनके रयण नामक पुत्र हुये जो अपने वेग से पराक्रम को नचाया करते थे और जो अकेले ही, गर्व और अभिमान से उद्धत शत्रुओं को हँसते हुये जीत लेते थे ॥ ९ ॥ तस्मान् महार्घनिःसीमगुणरत्नमहोदधेः । कोह्लणः कुलकल्हारकलानिधिरजायत ॥१०॥ उन बहुमूल्य और असीम गुणरत्नों के समुद्र रयण के कोह्लण नामक पुत्र हुये जो अपने कुल- कुमुद के लिये चन्द्रमा के समान थे ॥१०॥ विनीतो नीतिशास्त्रेषु विनीतोल्बणदूषणः । स्वनये सोऽभवत् ख्यातः स्वनयेऽस्य यथारिपुः ॥११॥ वे नीतिशास्त्रों में निष्णात थे और उन्होंने उग्र दोषों को दूर कर रक्खा था। जिस प्रकार उनके शत्रु अपनी अनीति में कुख्यात थे उसी प्रकार वे अपनी नीति में विख्यात थे ॥११॥ गङ्गदेवोऽभवत् तस्माद् भुवं गोपायति स्म यः । भ्रूभङ्गोद्धतदृक्पातः क्लृप्तभङ्गो विरोधिनाम् ॥१२॥ उन कोह्लण के गंगदेव उत्पन्न हुये जिन्होंने अपनी भृकुटी के क्रुद्ध कटाक्ष से शत्रुओं को नष्ट करके पृथ्वी पर शासन किया ॥१२॥ देवसिंहः सुतोऽस्यासीद् देवोपमपराक्रमः । नरदेवो नृणामिन्दुः शरदेवोपरञ्जितः ॥१३॥ गंगदेव के देवसिंह नामक पुत्र हुये जो देवता के समान पराक्रमी थे। वे नरदेव लोगों को शरद् ऋतु से शोभित पूर्ण चन्द्र के समान (सुन्दर और शीतल) प्रतीत होते थे ॥१३॥ तस्मात् समरसिंहोऽभूद् यथार्थामभिधां दधत् । कीर्तिहंसीमुखे यस्य विपच्छैवालमञ्जरी ॥१४॥ देवसिंह के समरसिंह नामक यथार्थनामा पुत्र हुये क्योंकि वे समर में वास्तव में सिंह के समान पराक्रमी थे। विपत्ति रूपी शैवालमंजरी उनकी कीर्ति-रूपी हंसी के मुख में रहती थी अर्थात् वे विपत्ति नष्ट करने में विख्यात थे ॥१४॥ नरपालमयं नाम्ना पुत्रं प्राप प्रतिष्ठितम् । नापोहति स्म यं लक्ष्मीनरपालक्रमा गता ॥ १५॥ समरसिंह के नरपाल (नापाजी) नामक प्रतिष्ठित पुत्र उत्पन्न हुये जिनको राजपरम्परा- गत लक्ष्मी ने कभी नहीं छोड़ा ॥१५॥

१४० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् हम्मीरस्तनयस्तस्य समीरणसखप्रभः । अजनिष्ट प्रतापेन जनिताऽनिष्टकृज्ज्वरः ॥११६॥ उनके हम्मीर (हामा जी) नामक अग्नि के समान तेजस्वी पुत्र हुये जिनके प्रताप के कारण शत्रुओं को ज्वर आ जाता था ॥११६॥ वरसिंहः सुतस्तस्य वरसिंहपराक्रमः । अभीरोषाञ्चकारारीन् वैरोपहितवैशसैः ॥११७॥ उनके वरसिंह नामक श्रेष्ठ सिंह (नरसिंह) के समान पराक्रमी पुत्र हुये जिन्होंने निर्भय होकर शत्रुता के कारण प्रवृद्ध क्रोधाग्नि से शत्रुओं को जला दिया॥ ११७॥ भारमल्लोऽभवत् तस्माद् भारमग्र्यं दधद् भुवः । स भारोचितदिग्वीरसभारोहणविश्रुतः ॥११८॥ उनसे भारमल्ल उत्पन्न हुये जो (अपने बलिष्ठ कंधों पर) पृथ्वी का भारी भार उठाते थे और प्रभायुक्त दिग्वीरों की सभा के स्वामी होने के कारण विख्यात थे ॥११८॥ तस्मान् नर्मदनामाऽभून् नृपधर्मधुरन्धरः । मर्मस्पृक् समरेऽरीणां शरैर्वर्मभृतामपि ॥११९॥ उनके राज-धर्म के पारंगत नर्मद नामक पुत्र हुये जो युद्ध में कवचधारी शत्रुओं के मर्मस्थलों को भी अपने बाणों से भेद देते थे ॥११९॥ तीक्ष्णकौशेयकस्तस्य वैरिवामदृशां दृशाम् । धारामश्रुमयीं दत्त्वा कज्जलश्रियमाददे ॥१२०॥ उनकी तेज (काली) तलवार शत्रुस्त्रियों के नेत्रों को आँसुओं की धारा देकर उनसे कज्जल की कालिमा ग्रहण कर लेती थी ॥१२०॥ धर्मपत्नी बभूवाऽस्य धारानाम्नी धरापतेः । अनतिक्रान्तमर्यादा यथा धारा महोदधेः ॥१२१॥ नर्मद राजा के धारा नामक धर्मपत्नी थीं जिन्होंने समुद्र की धारा के समान कभी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया ॥१२१॥ नर्मदस्य महीभर्तुर्महिषी तनुमध्यमा । उचितं नर्मदा साऽपि महावंशभवा यतः ॥१२२॥ नर्मद राजा की सुमध्यमा और अच्छे कुल में उत्पन्न रानी भी वास्तव में नर्मदा (आनन्द देने वाली) थीं । (रानी महान् वंश में उत्पन्न थीं और नर्मदा नदी के तट पर बड़े-बड़े बाँस उत्पन्न होते हैं) ॥१२२॥


(१७) अभीः निर्भयः । ओषाञ्चकार ददाह । वैशसं क्रोधः ।

त्रयोदशः सर्गः १४१ सुतमर्जुननामानं नृपस्तस्यामजीजनत् । शुद्धं स्वातीभवो बिन्दुः शुक्तौ मुक्ताफलं यथा ॥२३॥ नर्माद राजा न रानी धारा में अर्जुन नामक पुत्र को जन्म दिया, जैसे स्वाति नक्षत्र का जल- बिन्दु सीप में शुद्ध मोती को जन्म देता है ॥२३॥ कर्णमूर्जितसत्त्वेन जितवन्तममुं जनाः । विजयाभिख्यया दीप्तमर्जुनं साधु मेनिरे ॥२४॥ उत्कृष्ट पराक्रम के कारण कर्ण को जीतने वाले और विजय की शोभा से दीप्त अर्जुन को लोग वास्तव में कर्णविजयी 'विजय' नामक कुन्तीपुत्र अर्जुन ही मानते थे ॥२४॥ सञ्चरन् समराग्रेशु भीमसेनानुगोऽर्जुनः । पश्चाच्चकार नकुलं वाजिशिक्षाविशारदम् ॥२५॥ युद्धभूमि में भीमसेन के पीछे और नकुल के आगे चलने वाले अर्जुन के समान, राजा अर्जुन के आगे भीषण सेना चलती थी और पीछे अश्वविद्याविशारद चलते थे ॥२५॥ क्रमेणाक्रान्तभुवना द्विजेशोपरि

१४२ सुर्जनचरितमहाकाव्यम् आननेनाऽथ निन्दन्ती शारदीनं निशाकरम् । अलकान्तेन कान्तेन क्लेशयन्त्यलिसन्ततिम् ॥३०॥ नेत्रश्रीतर्जिताऽनेकद्राधीयःकेतकीदला । रदनच्छदरागेण रञ्जयन्ती रदान् सितान् ॥३१॥ अनीचस्तनसत्कान्त्या हसन्ती करिणां कटान् । नयन्ती कदलीकाण्डं जघनेन जघन्यताम् ॥३२॥ सरागचरणन्यासहसितस्थलसारसा । जैत्री शक्तिरनङ्गस्य सा चकाशे शरीरिणी ॥३३॥ जयन्ती अपने सुन्दर मुख से शरद्-ऋतु के चन्द्रमा को तिरस्कृत करती थी, अपने सुन्दर बालों से भ्रमरों की पंक्ति को (पराजय की) पीड़ा देती थी, अपने नेत्रों की शोभा से घने और लम्बे पत्तों वाली केतकी को दूर भगाती थी, अपने अधर की लालिमा से शुभ्र दाँतों को भी रक्त बना देती थी, उन्नत स्तनों की सुन्दर कान्ति से हाथियों के गण्डस्थलों का उपहास करती थी, अपनी जंघा की शोभा से केले के स्कन्ध को हेय समझती थी और अपने रंजित चरणों की कलापूर्ण चाल से, भूमि पर चलने वाले सारस पक्षियों का उपहास करती थी ; वह कामदेव की मूर्तिमती विजयशक्ति के समान शोभित होती थी ॥३०-३३॥ स तस्यां वंशधौरेयं सुतमिच्छन् सतां प्रियम् । प्राप पुण्यं सरः शौरेः पदाम्बुजमुपासितुम् ॥३४॥ राजा अर्जुन जयन्ती में वंशवाही और सज्जनों के प्रिय पुत्र प्राप्त करने की इच्छा से भग- वान् विष्णु के पद-कमलों की सेवा करने के लिये किसी पुण्य सरोवर के समीप गये ॥३४॥ संसारसारसरसों स संसार संसारसाम् । सरसः सुरसासाररसासिसुसारसाम् ॥३५॥ वे संसार के सार (जल) से सरस, तथा सुन्दर कमलों (सारस) से शोभित, एवं सरोवर के (सरसः) सुन्दर जल के (सुरसंस्य) बरसते हुये (आसारैः) विन्दुओं से (रसैः) चारों ओर (आ) नाचने वाले (रासिनः) सुन्दर हंसों से युक्त (सुसारसां) सरोवर के पास पहुँचे (ससार) ॥३५॥ अपोढकपटावेशैस्तपोभिः पृथिवीभुजा । नित्यमाराधयाञ्चक्रे पादपद्मं परात्मनः ॥३६॥ निष्कपट तप से राजा अर्जुन ने नित्य भगवान् के चरण-कमलों की आराधना की ॥३६॥ परापरपरेऽपारपापपूररिपौ पुरः । पुपूरेऽपि रमारामे परा प्रेमपरम्परा ॥३७॥ पर (कारण) और अपर (कार्य) दोनों के पारगामी (पर) तथा अपार पापों के समूह (पूर) के शत्रु (रिपु) लक्ष्मीपति (रमाराम) भगवान् विष्णु में राजा की प्रेमपरम्परा पूर्णता को प्राप्त हुई (पुपूरे) ॥३७॥ (३५) ससारसां कमलैः शोभिताम् । सरसः सरोवरस्य सुरसस्य सुन्दरजलस्य आसारैः वर्षद्भिारिव रसैः आ समन्तात् रासिनः क्रीडन्तः सुसारसाः शोभनाः हंसाः यस्यास्ताम् । (३७) परापराभ्यां कार्यकारणाभ्यां परे विचित्रे अतीते इत्यर्थः । अपाराणां पापानां पूरस्य समूहस्य रिपौ निवर्तके । रमारामे लक्ष्मीपतौ । पुपूरे पूर्णतां गता ।

अयन्तं सर्वसिद्धीनामाश्रयन्तं श्रियः पतिम् । Wait, look at the gap betweenसर्वसिद्धीनाम्andआश्रयन्तं: Is it सर्वसिद्धीनामाश्रयन्तंorसर्वसिद्धीनामाश्रयन्तं? It is joined: सर्वसिद्धीनामाश्रयन्तं! (दीर्घ सन्धि: सर्वसिद्धीनाम् + आश्रयन्तं -> no, सर्वसिद्धीनाम् ends in म्! म् + आ = मा! So सर्वसिद्धीनाम् + आश्रयन्तं = सर्वसिद्धीनामाश्रयन्तं!) YES! PERFECT! It's सर्वसिद्धीनामाश्रयन्तं`! What a brilliant realization. म् + आ = मा. So सर्वसिद्धीनाम् + आश्रयन्तं = सर्वसिद्धीनामाश्रयन्तं! Syllables: अ-यन्-तं स-र्व-सिद्-धी-नाम् (८) आ-श्र-यन्-तं श्रि-यः प-तिम् (८) सु-त-रा-माप्-नु-वन्-त्ये-व (८) सु-त-रा-मा-दि-सम्-प-दः (८) ॥३८॥ Meter is absolutely flawless Anushtubh!

Now let's check line 8 (Verse 40, first