वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
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298 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता विद्वानों का, इन्हीं कारणों से दृष्टिपात करते हुए अभिमत है कि भारत एक राष्ट्र है। भारत के समस्त निवासी सदा से इस देश के प्रति एक आन्तरिक प्रेम और प्रगाढ़ एकता का अनुभव करते रहे हैं। यह भावना चिर स्थायी है। इस का प्रतीक है हमारी तीनों सेनाएँ, जिनमें राष्ट्र के सभी प्रदेशों, सभी जातियों के लोग देश की सुरक्षा के लिए दिन-रात सीमाओं पर चौकन्ने रहते हैं। वे सिर्फ अपने राष्ट्र के लिए चौकन्ने रहते हैं, देश के सजग प्रहरी होते हैं और उनमें सिर्फ भारतीय होने की भावना ही समाहित होती है। जन सामान्य में भी यह भावना राष्ट्र के ऊपर संकट के समय देखी जा सकती है। सामान्य दिनों में राष्ट्रीयएकता और अखण्डता का प्रमाण देने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। यह भावना तभी प्रदर्शित करने की आवश्यकता पड़ती है जबकि राष्ट्र संकट की घड़ी से गुजर रहा हो। इसके ज्वलंत उदाहरण है १९६२ में हुई भारत और चीन की लड़ाई, जहाँ भारतीय जवानों ने अपनी जान की बाजी लगाई, वहीं साधारण लोगों ने अपने जेवर, कपड़े, धन, जिसके पास जो था जवानों के लिए, देश की रक्षा के लिए राष्ट्रीय रक्षाकोष में दान कर दिया। १९६५ की भारत- पाक लड़ाई भी ऐसी ही सिद्ध हुई। १९७१ में बांग्लादेश के सहायतार्थ लड़ी गई लड़ाई भी हमारे परीक्षा के क्षणों में से एक थी। वह राष्ट्रीयएकता और अखण्डता का प्रमाण था कि हम हमेशा विजयी होते रहे हैं। दुश्मन को हमारी पवित्र भावनाओं ने तोड़ कर रख दिया। राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के बारे में हमारे स्व० डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपने भावों को इस तरह व्यक्त किया है— 'राष्ट्रीयएकता' विविधताओं के बीच ऐसी स्थिति का नाम है जिसमें व्यक्ति अपने सभी देशवासियों के साथ एकजुटता का भाव अपनाते हुए राष्ट्र की रक्षा और विकास हेतु राष्ट्र के प्रति अपना सब कुछ बलिदान करने के लिए तत्पर हो जाता है। हमारी राष्ट्रीयएकता और अखण्डता की नींव खोखली नहीं है बल्कि वट वृक्ष की तरह अन्दर मीलों गहराई में फैली हुई है, जिन्हें सेंध लगाकर काटा नहीं जा सकता है। वह वैदिककाल से इस जमीन की तह में समाई हुई है। इस बारे में डॉ० वासुदेव शरण अग्रवाल ने कहा है— 'अंग्रेजी शासन काल में हमारी राष्ट्रीयएकता को गहरा आघात पहुँचा। 'फूट डालो और राज करो' की नीति के कारण हमारी एकता भंग हुई। अंग्रेज अधिकारियों के प्रयास और प्रोत्साहन से देश का विभाजन हुआ, भारत का अंग विच्छेदन करके एक पृथक् और स्वतंत्र राष्ट्र पाकिस्तान की स्थापना हुई। विभाजन के बाद भी भारत
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri नवम अध्याय 299 एक विशाल देश है। यहाँ अब भी लोग विभिन्न भाषाएँ बोलते हैं। भिन्न-भिन्न धर्मों को मानते हैं और उनके रीति-रिवाज भी अलग-अलग हैं। ऐसी विभिन्नता वाले देश को एकता के सूत्र में मजबूती से बाँधना एक महत्त्वपूर्ण समस्या है। जहाँ विभिन्नता पाई जाती है वहाँ पर मत-वैभिन्न की सम्भावना हमेशा बनी रहती है। यथार्थ स्थिति से अवगत व्यक्ति इसको सूक्ष्म दृष्टि से देखने के बाद ही विवेचन करता है। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ० राजेन्द्र प्रसाद का मत इस प्रकार है— "सांस्कृतिक अथवा सामूहिक चेतना ही हमारे देश का प्राण है। इसी नैतिक चेतना के सूत्र में हमारे नगर और ग्राम, हमारे प्रदेश और सम्प्रदाय, हमारे विभिन्न वर्ग और जातियाँ आपस में बँधी हुई हैं। जहाँ उनमें और सब तरह की विभिन्नतायें हैं, वहीं उन सबमें एक एकता भी विद्यमान है।" यह एकता एक स्थायी भावना है जो कि इस पावन भूमि पर जन्म लेते ही मानव के मन में समाहित हो जाती है। बचपन से माँ की गोद में बैठकर सुनी गई भगत सिंह और चन्द्रशेखर आजाद की बलिदान-गाथाओं से बच्चों के मन-मानस को एक नया स्वरूप देश के प्रति मिलता है, जो अमिट होता है। यही चिर स्थायी रूप उनके लिए आदर्श बन जाता है। इस बारे में प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्रज्ञ रजनी कोठारी का मत इस प्रकार है— "भारत जैसे विशाल देश में जहाँ इतने विविध प्रकार के लोग रहते हैं, एकता की स्थापना इसी से हो सकती है कि सब तत्त्वों को राजनीतिक सत्ता व अधिकार में बाँट दिया जाये और सबको साथ लेकर चला जाये। इसके लिए आवश्यक है कि समाज के सब वर्गों का राजनीतिक व्यवस्था में प्रवेश हो। राजनीति की इस रचनात्मक भूमिका से ही एकीकरण की प्रवृत्तियों को बल मिलता है।"¹ यदि वैदिक काल में राष्ट्र और राष्ट्रीयता की भावना प्रबल थी, जिससे विविधताओं के होते हुए भी प्राचीन भारतीय संस्कृति ने भौगोलिक एकीकरण और समुच्चय की भावना को बचाये रखा। इसी बात को डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल ने निम्न शब्दों में व्यक्त किया है— "यहाँ की कोटि-कोटि जनता के मन में भारत की भौगोलिक एकता का गहरा संस्कार था। हमारी संस्कृति विविधताओं को स्वीकार करती है, किन्तु एकत्व की प्राप्ति उसकी निजी विशेषता है।" १. कोठारी- भारत में राजनीति, पृ० ३४७ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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300 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता आज विश्व के पटल पर जो भारत का नाम उभरता ही जा रहा है, उसके पीछे कोई राजनीतिक उपलब्धियों का इतिहास नहीं है बल्कि वह राष्ट्रवासियों में रहने वाला राष्ट्र के प्रति प्रेम है जो उन्हें हर क्षेत्र में, चाहे वह विज्ञान हो, प्रौद्योगिकी, कला या शिक्षा कोई भी क्षेत्र क्यों न हो, सभी अपने देश के नाम को उसमें ऊँचा देखने की इच्छा रखते हैं। इसके लिए सतत् प्रयत्नशील रहेंगे कि देश का नाम ऊँचाइयों तक पहुँचे। यही राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का एक नया स्वरूप है। देश की राष्ट्रीयएकता को हम अपने देश के सन्दर्भ में इन शब्दों में भी व्यक्त कर सकते हैं- " राष्ट्रीय एकता का अर्थ है भारत के विभिन्न प्रदेशों, जातियों, वर्गों, भाषाओं, धर्मों आदि की बहुरंगी विविधता के बीच एकता की व्यापक धारणा, जो क्षुद्र सीमित स्वार्थों की उपेक्षा कर देश के विभिन्न प्रदेशों पर अखिल राष्ट्रीय दृष्टिकोण से विचार और व्यवहार की प्रेरणा दे।" इसी राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता पर सम्पूर्ण राष्ट्र को गर्व है कि हमारा एक संविधान, एक राष्ट्रीय ध्वज और एक ही राष्ट्रीय सम्मान सदैव अक्षुण्ण रहेंगे। ३. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के सम्बन्ध में प्राचीन एवम् आधुनिक विचारधारा की तुलना- राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का हर युग में उतना ही महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है जितना कि यह आज है। एकता से तात्पर्य वैचारिक एकता, मतैक्यता और उनके कार्यों में भी एकता का पाया जाना, माना जा सकता है। इस बारे में ऋग्वेद में वर्णित है- सं ग॑च्छध्वं॒ सं व॑दध्वं॒ सं वो॒ मना॑ंसि जानताम्। दे॒वा भा॒गं यथा॒ पूर्वे॑ सञ्जाना॒ना उ॒पास॑ते॥१ अर्थात् सभी लोग साथ-साथ चलें, साथ बोलें, तुम सभी का मन ऐकमत्ययुक्त हो जाय, जिस प्रकार पुरातन देवता ऐकमत्य के साथ अपना भाग लेने के लिए बैठते हैं। स॒मा॒नी व॒ आकू॑तिः समा॒ना हृदया॑नि वः। स॒मा॒नम॑स्तु वो॒ मनो॒ यथा॑ वः॒ सुस॒हास॑ति॥२ १. ऋग्वेद १०/१९१/२ २. अथर्ववेद ६/६४/४
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नवम अध्याय 301 अर्थात् प्रतिज्ञा तुम लोगों की समान हो, तुम लोगों का हृदय एक हो, तुम लोगों का मन एक हो जिससे तुम लोगों में आनन्दपूर्वक ऐकमत्य रहे। इस एकता के बारे में ऋग्वेद में भी अनुभव किया गया था। इस एकता में एक अपूर्व शक्ति होती है जिससे कि शेष शक्तियों को पराजित किया जा सकता है। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की अवधारणा का भाव यहाँ पर अनुभव किया जा सकता है। आज भी राजनैतिकज्ञों, विचारकों, देशभक्तों का यही विचार है कि सम्पूर्ण राष्ट्र में मतभेद न हो। राष्ट्र के प्रत्येक विषय पर वे ऐकमत्य हों, उनमें आत्मिक समानता हो, एक दूसरे की भावनाओं के प्रति सम्मान हो। चाहे सामाजिक अवसर हो या कि राजनैतिक अवसर, सभी लोग साथ बैठें और फिर विचार करें। उनमें एक सुदृढ़ संगठन की भावना विद्यमान हो। प्राचीन काल में जिस ऐकमत्य का विवेचन होता आ रहा है उसे आधुनिक काल में डॉ० वासुदेव शरण अग्रवाल ने इन शब्दों में व्यक्त किया है— "यहाँ की कोटि-कोटि जनता के मन में भारत की भौगोलिक एकता का संस्कार था। हमारी संस्कृति विविधताओं को स्वीकार करती है, किन्तु एकत्व की प्राप्ति उसकी निजी विशेषता है।" राष्ट्र में अनेक श्रेणियों के लोग रहते हैं जिनमें स्वार्थ या अज्ञान के कारण द्वेष उत्पन्न हो सकता है और उनकी यह भावना राष्ट्र के लिए शुभ और कल्याणकारी बिल्कुल भी नहीं मानी जा सकती है। व्यक्तियों में सामूहिक उन्नति की भावना होनी चाहिए ताकि वे राष्ट्र के लिए योगदान दे सकें। अ॒सं॒बा॒धं ब॑ध्य॒तो मान॑वानां॒ यस्या॑ उ॒द्वतः॑ प्र॒वत॑: स॒मं ब॒हु। नाना॑वी॒र्या॒ ओष॑धी॒र्या बिभ॑र्ति पृथि॒वी न॑: प्रथ॒तां राध्य॑तां नः॥१ अर्थात् जिस राष्ट्र में मननशील विद्वानों के मध्य उच्चता या निम्नता के भाव रहने पर भी आपस में समता, एकता एवं मैत्री भाव विद्यमान रहता है, उस मातृभूमि या राष्ट्र में पृथिवी अपने पर्यावरण में बलदायक, रोगानाशक वनस्पतियों की उत्पत्ति करके हमें स्वस्थ रहने में सहायता करती है। हमारे यश व कीर्ति के साधनों में विस्तार करती है। प्राचीन काल की तरह आज भी राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के सन्दर्भ में मानव में मानव के प्रति भ्रातृत्व की भावना होनी चाहिए। समाज में वर्ग विभेद सदियों से चला आ रहा है लेकिन उस वर्ग भेद को मानवीय सम्बन्धों में कहीं भी नहीं आना चाहिए। सभी मानव है और पंचतत्वों के समावेश से ही सभी का निर्माण हुआ है। १. अथर्ववेद १२/१/२
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302 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता अतः उनमें समता का भाव रहना चाहिए। राष्ट्र के सभी नागरिक आपस में भाई-बहन हैं, चाहे जिस वर्ग या जाति के क्यों न हों। जीवन मूल्यों या नैतिक मूल्यों में काल के अनुसार परिवर्तन हो सकता है लेकिन राष्ट्रीय मूल्य और मानवीय मूल्य सभी कालों में समान ही रहते हैं और भविष्य में भी रहेंगे। नागरिकों में एक प्रकार की उदात्त भावना उसी दशा में संभव है जबकि प्रत्येक व्यक्ति आपस में एक दूसरे को एक ही पथ का पथगामी समझे क्योंकि सभी का एक उद्देश्य है राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता को कायम रखना और उसके लिए राष्ट्र को समृद्धशाली एवम् प्रगतिशील बनाना होगा। आत्मनिर्भर राष्ट्र जो अपने निवासियों का भरण-पोषण स्वयं कर सके, उससे अच्छी और क्या बात हो सकती है। ते अज्येष्ठा अकनिष्ठास उद्भिदोऽमध्यमासो महसा वि वावृधुः। सुजातासो जनुषा पृश्निमातरो दिवो मर्या आ नो अच्छा जिगातन॥१ अर्थात् राष्ट्रभक्तों में किसी भी प्रकार की परस्पर ज्येष्ठता या कनिष्ठता की भावना का अभ्युदय नहीं होना चाहिये। सामान्यतया प्रयत्नशील रहते हुए राष्ट्र की एकता और उन्नति की दिशा में अग्रसर होते रहना चाहिए। ऐसे विचारशील मानवों से ही राष्ट्र उत्तम फल की आशा कर सकता है। सामूहिक हित की भावना से युक्त राष्ट्र सदा ही स्थायी एवं दृढ़ दुर्ग के समान सुदृढ़ रहता है। ईश्वर से यही प्रार्थना की गई है कि जनमानस में यह भावना अधिक से अधिक पाई जाती हो तो देश का हित या कल्याण शीघ्र हो सकता है। इसे यदि आधुनिक दृष्टिकोण से देखा जाय तो इसमें कहीं भी परिवर्तन नहीं हुआ है। राष्ट्र का हित सदैव नागरिकों के द्वारा ही संभव होता है। समाज में सद्भावना को बनाये रखना, ऊँच और नीच का भाव मन में न आने देने से ही व्यक्ति व राष्ट्र का समुचित विकास होता है। इन परिस्थितियों या आवश्यकताओं में कभी भी परिवर्तन नहीं होता है। राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को कायम करने वाले तत्त्व हैं जिनका मूल्य सभी कालों में समान रहा है। मातृभूमि हर वर्ग के व्यक्ति के लिए अनाज, फल, फूल, जल और विद्युत समान रूप से उपजाती है। उसकी दृष्टि में कोई भी भेदभाव नहीं होता है। समभाव और समान स्तर का जीवन सभी जियें, तभी उनमें ऊँच और नीच की भावना का समावेश नहीं रहेगा। यह सब गुण उतने ही आवश्यक हैं जितने की रात्रि और दिन का अस्तित्व। १. अथर्ववेद ५/५९/६ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri नवम अध्याय 303 ४. राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के साधक एवं बाधक तत्त्व : किसी भी राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता उसके दृढ़ अस्तित्व के लिए आवश्यक तत्त्व हैं। राष्ट्रीय एकता, एक राष्ट्र में निवास कर रहे लोगों के हृदय की वह एकता है जो एक बार बनने के बाद कभी खण्डित नहीं होती। यह भावना ऐतिहासिक क्रम में पृथक् अस्तित्व की उस चेतना का प्रतीक है जो सामान्य आदतों, परम्परागत रीति- रिवाजों, स्मृतियों, आकांक्षाओं, अवर्णनीय सांस्कृतिक समस्याओं तथा हितों पर आधारित है। भारत एक राष्ट्र है जबकि उसमें अनेक भाषाएँ, अनेक धर्म, अनेक प्रकार के रीति-रिवाज पाये जाते हैं और उसमें भौगोलिक एकता भी नहीं है। एक ओर थार का मरुस्थल है तो दूसरी ओर कश्मीर की घाटी है। जातीय विभिन्नता भी यहाँ विद्यमान है। इन्हीं कारणों से कतिपय विद्वानों का मत है कि भारत एक राष्ट्र है ही नहीं, यह तो अनेक राज्यों का एक संघ है। भारत की इस विभिन्नता में भी एकता पाई जाती है। हम सांस्कृतिक दृष्टि से एक हैं, धार्मिक सहिष्णुता ही हमारी एकता और अखण्डता का आधार है। समस्त निवासी सदा से उस देश के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति, विशेष प्रकार के प्रेम और परस्पर विशिष्ट प्रकार की प्रगाढ़ एकता का अनुभव करते रहे हैं और यही अनुभव सम्पूर्ण विश्व के समक्ष राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस राष्ट्रीयएकता और अखण्डता को स्थायी बनाये रखने में कुछ घटक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं- १. संस्कृति :- भारतीय संस्कृति में ऐसा गुण है कि उसने मानव में सदैव मानवता का गुण समाहित किया है। हमारे वैदिक साहित्य, काव्य, रामायण और श्रीमद्भगवद्गीता, सभी ने भारतीयों के मन-मस्तिष्क में नैतिक, आध्यात्मिक और सदाचार का ऐसा समावेश किया है कि उसको वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा सदैव साकार होती दृष्टिगोचर होती है। सम्पूर्ण भारत में हम कहीं भी रहें- वेद, पुराण, उपनिषद्, रामायण और गीता, सभी भाषाओं में उपलब्ध हैं। उनके आदर्शों के अनुयायी देश भर में निवास करते हैं। यह संस्कृति हमें एकता के सूत्र में बाँधे रखती है। २. संविधान में निष्ठा :- स्वतंत्रता के बाद हमारे संविधान का निर्माण किया गया जिसमें भारत के सभी वर्गों के लोगों का प्रतिनिधित्व था। देश ने सभी लोगों को आत्मसात कर लिया था। जो अल्पसंख्यक थे, शरणार्थी थे या विदेशी थे, उनके वर्ग के अनुसार ही उन्हें प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया। सबको धर्म की स्वतंत्रता CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 304 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता प्रदान की गई। अपने लिए व्यवसाय के चुनाव की पूर्ण स्वतंत्रता दी गई। सभी धर्मों को सम्मान की दृष्टि से देखा गया। राष्ट्र में कहीं भी निवास करने की एवं सम्पत्ति अर्जित करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई। ऐसे संविधान की छाया में जीवन व्यतीत करने वालों में वैमनस्यता जैसी भावना आने का प्रश्न ही कहाँ उठता है? ३. धर्मनिरपेक्षता :- हमारा राष्ट्र एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है और ऐसे राष्ट्र में धर्म के आधार पर कोई भी भेदभाव नहीं किया जा सकता। हम जब सभी धर्म वालों को सम्मान की दृष्टि से देखेंगे तो आपस में प्रेम और सद्भाव में वृद्धि अवश्य ही होगी। सभी धर्मों के लोग अपने पूजा स्थलों के निर्माण, पूजा पद्धति अपनाने और अपने धार्मिक उत्सवों को पूर्ण करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। एक हिन्दू मुसलमान को ईद पर बधाई देता है तो मुसलमान दीपावली और होली पर प्रेम से सम्मिलित होते हैं। जहाँ इतने विशाल हृदय के लोग हों, वहाँ एकता पर प्रश्नचिह्न कहाँ लगाया जाये? ४. लोकतांत्रिक व्यवस्था :- स्वतंत्रता के बाद देश में संघात्मक लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया गया। इसमें देश में व्याप्त विविधता का पूर्ण रूप से सम्मान किया गया है। सभी वर्गों को अपनी सरकार चयन का अधिकार प्रदान किया गया। शासन में उनकी अपनी भागीदारी से उनमें देश के प्रति निष्ठा में वृद्धि होती है। अपनी बात कहने का अधिकार उन्हें संविधान से प्राप्त है। सभी राज्य अपने-अपने कार्यों के लिए स्वतंत्र है। इससे देशवासियों का अपने राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता के प्रति विश्वास और निष्ठा में वृद्धि ही होती है। ५. अनेकता में एकता :- भारत एक विशाल देश है, उसमें अनेकता होना स्वाभाविक है। इसके बाद भी समग्र रूप से दृष्टिपात किया जाय तो इस अनेकता में ही एकता का सूत्र बँधा हुआ है। सदियों से यहाँ विभिन्न धर्म हैं लेकिन सबमें एक दूसरे के प्रति सम्मान है। सामाजिक व्यवस्थाओं में खान-पान में प्रादेशिक रूप में विभिन्नता है लेकिन दक्षिणवर्ती भारतीय व्यवस्थाएँ उत्तर भारत में लोकप्रिय हैं। सम्पूर्ण राष्ट्र की भौगोलिक स्थितियाँ भिन्न-भिन्न हैं, फिर भी प्राचीन काल से ही यह राष्ट्र एकता के सूत्र में बँधा हुआ है। उन एकता और अखण्डता की गहरी जड़ों को खोदने का प्रयास व्यर्थ ही कहा जायेगा। ६. स्वतंत्रता संग्राम :- भारत की आजादी के लिए जो महासंग्राम लड़ा गया, तब इस पर शहीद होने वाले वीर हिन्दू, मुस्लिम, सिख, पारसी, जैन और बौद्ध सभी लोग थे। उस महायज्ञ में सबने अपने-अपने प्राणों की आहुति दी थी। अब स्वतंत्र भारत की खुली हवा में हमने सांस ली हैं। कोई नहीं भूलता हैं उन बलिदानों CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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नवम अध्याय 305 को। भगत सिंह और चन्द्रशेखर आजाद की बलिदान-गाथा आज भी नवजवानों को एक स्वर में 'जय हिन्द' और 'भारत माता की जयकार' लगाने के लिए पर्याप्त है। उनके पावन बलिदान की कहानी और त्याग की गाथा का सम्मान हम अपने राष्ट्र की एकता और अखण्डता की पावन भावना से ही कर सकते हैं। यह सभी तत्त्व है जिससे लाखों विभिन्नताओं के बाद भी यदि देश पर संकट आता है, तो पूरा राष्ट्र एक स्वर में उस संकट का जवाब देने के लिए तैयार रहता है। पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक सिर्फ एक भारत अखण्ड राष्ट्र के रूप में स्थायी राष्ट्र है। राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के बाधक तत्त्व- भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहाँ विभिन्नता में एकता पाई जाती है, फिर भी यह विभिन्नता कहीं-कहीं अपना संकुचित दृष्टिकोण इस तरह से अपनाने लगती है कि देश में विभिन्न दृष्टिकोण आपस में ही संघर्ष करने लगते हैं और जब ये विघटनकारी तत्त्व पनपने लगते हैं तो देश की राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के लिए खतरा पैदा हो जाता है। ये कारण निम्नलिखित हैं :- १. जाति :- हमारे देश में विभिन्न धर्मों के साथ विभिन्न जातियाँ निवास करती हैं जिनमें कुछ उच्च और कुछ निम्न कहलाती हैं। सदियों से उच्च जातियों ने निम्न जातियों का शोषण किया है। सिर्फ हिन्दू ही नहीं, अपितु मुसलमान, सिख और ईसाई भी अनेक जातियों में बँटे हुए हैं। स्वतंत्रता के बाद संविधान द्वारा सबको समान अधिकार देने के बाद भी उच्च जातियों ने अपना श्रेष्ठत्व नहीं छोड़ा। दलितों और निम्न जातियों में भी चेतना अब पहले से बढ़ गई है। परिणामस्वरूप जातिगत राजनीतिक दलों का भी निर्माण होने लगा। इससे जातीय तनावों में वृद्धि हो गई। जातिभेद संकीर्णता के द्योतक है और जातियों के मध्य द्वेष और वैमनस्य बढ़ाते हैं। यह स्थितियाँ राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता में बाधक सिद्ध होती हैं। २. साम्प्रदायिकता - हमारे विद्वानों, धर्मगुरुओं और दार्शनिकों ने एक ही ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार किया है, चाहे वे ईश्वर कहें, खुदा या ईशु कहें। किसी ने भी कहीं भी दूसरे धर्म के प्रति विद्वेष रखने की बात स्वीकार नहीं की है। साम्प्रदायिकता धर्म का संकुचित दृष्टिकोण है। संसार में विविध धर्म के मूलभूत सिद्धान्तों को सभी ने स्वीकार किया है, यथा- प्रेम, सेवा, परोपकार, सच्चाई, समता, नैतिकता, अहिंसा और पवित्रता आदि सभी धर्मों में मान्य है। सच्चा धर्म कभी एक दूसरे से घृणा करना या वैर करना नहीं सिखाता, लेकिन धर्म के नाम
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 306 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता पर राजनीति करने वालों ने धर्म के नाम पर दीवार खड़ी की है और ये दीवारें देश की एकता में बाधक बन सकती हैं। ३. भाषावाद - भारत एक बहुभाषी राष्ट्र है, यहाँ अनेक भाषायें, विभाषायें और बोलियाँ प्रचलित हैं। यद्यपि स्वतंत्र भारत में हिन्दी को राष्ट्रभाषा घोषित किया गया है लेकिन भाषायी संकीर्णता भी अपना सिर उठाने लगी है। भाषा के आधार पर राज्यों की माँग सिर उठाने लगी है। हिन्दी के विरोध में उर्दू और अन्य प्रादेशिक भाषाएँ भी विवाद का कारण बनकर मानव-मानव के मध्य भेद पैदा कर रही हैं और यह विभेद राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के लिए बाधक साबित हो रहे हैं। ४. प्रान्तीयता - एक संघराष्ट्र के लिए उसके प्रान्त एक अभिन्न अंग होते हैं। संघ में सभी प्रान्तों को बराबर अधिकार प्रदान किये गये हैं। अंग्रेजों ने हमें सिर्फ धर्म के आधार पर ही नहीं बाँटा अपितु प्रान्तीय आधार पर भी बाँट दिया है। कभी क्षेत्र को लेकर, कभी भाषा को लेकर, प्रान्तीयता की बात होने लगती है और यह प्रान्त स्वराज्य की माँग भी करते हैं जो संघ के शासन में रहने से इन्कार करते हैं। इन माँगों को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। खालिस्तान की माँग वर्षों से आतंकवादी गतिविधियों का सहारा लेकर अशान्ति फैला रही है लेकिन अनुचित को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। फिर भी इस तरह की भावना की उपस्थिति राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के मार्ग में रोड़ा अवश्य ही बन जाती है। ५. अल्पसंख्यकों का प्रश्न - आज देश में अल्पसंख्यकों की समस्या महत्त्वपूर्ण है। विभिन्न राज्यों में भाषागत अल्पसंख्यक सम्प्रदायों से अल्पसंख्यकों का निवास है। मुम्बई, कोलकत्ता, चेन्नई, दिल्ली आदि महानगरों में तो उद्योग तथा व्यापार की दृष्टि से बाहरी राज्यों के हजारों लोग निवास करते हैं। कई राज्यों में बाहरी लोगों के प्रति असन्तोष पैदा हुआ है। महाराष्ट्र में गुजरातियों, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और उड़ीसा में मारवाड़ियों का विरोध किया गया। महाराष्ट्र में शिवसेना और असम में लांछ्छित सेना जैसे उग्र संगठनों का निर्माण कर बाहरी लोगों के प्रति हिंसात्मक कार्यवाही की गई जो कि एक राष्ट्र की मर्यादा के विरुद्ध है और राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के लिए बाधक है। ६. राजनैतिक अवसरवादिता - राजनैतिक अवसरवादिता राष्ट्र के लिए सर्वाधिक घातक है। देश में राजनैतिक दल जाति, धर्म, भाषा, प्रान्त आदि के बल पर चुनाव लड़ने और जीतने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने देना चाहते हैं। राजनैतिक दल ही युवा वर्ग को हिंसात्मक कार्यों के लिए भड़काते हैं और इस तरह की घटनाओं से अपने राजनैतिक स्वार्थ को सिद्ध करना चाहते हैं। देश में होने वाले CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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नवम अध्याय 307 साम्प्रदायिक दंगों और पृथकतावादी आन्दोलनों के पीछे राजनीतिज्ञों का हाथ सदैव रहता है और यह सारी विचारधारा देश हित में सहायक नहीं कही जा सकती है। ७. आर्थिक विषमता - देश में व्याप्त आर्थिक विषमता भी राष्ट्रीयएकता और अखण्डता के मार्ग में बाधक बन जाती है। जो लोग अत्यधिक निर्धन हैं या अभावग्रस्त हैं, जिन्हें दिनभर कड़ी मेहनत के बाद भी पेट भर भोजन नहीं मिलता, वे अपने मालिकों या बड़े-बड़े बंगलों में सुख-सुविधाओं से युक्त जीवन जीने वालों के प्रति ईर्ष्या का भाव रखें तो अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता है। आर्थिक विषमता ने वर्गसंघर्ष के सिद्धान्त को जन्म लिया है, जो समाज में अशान्ति और संघर्ष का सृजन करता है। यह आर्थिक विषमता सदैव ही राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के लिए घातक तत्त्वों का निर्माण करती है। ८. आतंकवादी गतिविधियाँ - देश में आतंकवादी गतिविधियों ने सम्पूर्ण राष्ट्र की जड़ों को हिला दिया है। कभी कश्मीर में सामूहिक हत्याओं का तांडव होता है, कभी बिहार में गाँव उजाड़ दिया जाता है। इन सब का अर्थ क्या समझा जा सकता है? हम अखण्ड राष्ट्र में निर्भीक जीवन व्यतीत कर रहे हैं? हम अपने ही देश में डर डर कर जी रहे हैं। सुरक्षित ठिकानों के लिए यह सब देश की राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के लिए अभिशाप है। आज उत्तरी पूर्वी भारत के कुछ राज्यों में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के लिए समस्याएँ चुनौती बनकर खड़ी हैं। भ्रष्टाचार, अशिक्षा, शोषण, बेरोजगारी- ऐसी समस्यायें हैं जो कि जन सामान्य को दिशा भ्रमित होने के लिए पर्याप्त हैं और जहाँ देश का जनसामान्य इन समस्याओं से जूझ रहा हो वहाँ राष्ट्र का निर्माण और विघटन की चिन्ता किसे होती है ? ५. वैदिकवाङ्मय में निरूपित राष्ट्रीय एकता एवम् अखण्डता का वर्तमान राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के लिए योगदान- भारतीय जनजीवन में वेदों का अतिशय महत्त्व है। वैदिकवाङ्मय को परमेश्वर का निःश्वास कहा गया है।१ वेद सत्य है। वेद सत्य ज्ञान की अप्रतिम निधि, सत्य विधाओं का अनन्य एवं अपूर्व संग्रह तथा समस्त सिद्धान्तों का पोषक अद्वितीय ग्रंथ है। इन ग्रन्थों में मात्र धार्मिक कर्मकाण्डों का ही वर्णन नहीं है, अपितु आज के सन्दर्भ में देखा जाय तो आज की समस्याओं को अनुभव करके उनका समाधान भी इनमें १. बृहदारण्यकोपनिषद् २/४/१०
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 308 वैदिक वाङ्गमय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
प्रस्तुत कर दिया गया था। सिर्फ सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक परिवेश का ही वर्णन इसमें नहीं है अपितु राजनीति का भी विशद विवेचन किया गया है। राष्ट्र की सुरक्षा, नागरिकों के प्रति राजा के कर्त्तव्य, राजा का चयन, प्रजा का धर्म— सभी का सम्यक् विवेचन इन वैदिक ग्रन्थों में पाया जाता है। राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता का पर्याय हर युग में एक ही रहा है। राष्ट्र को सुदृढ़, सुरक्षित और सशक्त सैन्य शक्ति से युक्त बनाना ही एक समृद्धशाली राष्ट्र के लिए आवश्यक होता है। प्रजा के निजी प्रयासों से ही राष्ट्र एकता और अखण्डता के भाव से युक्त हो सकता है। वैदिकवाङ्गमय में निरूपित स्वराज्य की अवधारणा ही आज के समय में स्वअनुशासित, स्वशिक्षित एवं स्वनियंत्रित समाज की रचना का सन्देश देती है। वैदिक काल में मानव की विचारधारा, भावनाएँ और प्रवृत्तियाँ स्वभावतः सात्विक होती थीं। काल के चक्र के साथ सभी चीजों में हो रहे परिवर्तन से वह सभी चीजें भी परिवर्तित हो गई। राजनीति का अर्थ बदल गया लेकिन भाव वही है। राष्ट्र वही है, उसकी आवश्यकताएँ वही हैं। आदर्श राष्ट्र की परिकल्पना आज भी लोगों में शेष है और साकार देखने की इच्छा आज भी शेष है। वैदिक काल में प्रस्तुत स्वराज्य का अर्थ अपने ऊपर शासन या नियंत्रण करना था। वास्तविक स्वराज्य उसी स्थिति में संभव है जबकि मानव को सर्वप्रथम अपने शरीर, इन्द्रियों, मस्तिष्क एवं मन पर पूर्ण नियंत्रण हो। एक मानव के नियंत्रण से ही परिवार, मुहल्ला, गाँव, नगर, प्रदेश, राष्ट्र और विश्व सभी नियंत्रित हो सकते हैं। नाम् नामा॑ जोहवीति पुरा सूर्या॒त् पुरोषस॑ः। यदुजः प्रथ॒मं संब॒भूव॑ स हु तत् स्व॒राज्य॑मियाय॒ यस्मा॒न्नान्यत् पर॒मस्ति भूतम्॥१ इस मंत्र में राष्ट्र के संचालन के बारे में उत्तम ढंग से वर्णन किया गया है। वे राष्ट्रभक्त जो प्रातः काल ब्राह्ममुहूर्त में निद्रा त्याग कर उषाकाल में परमेश्वर की उपासना एवं विधिवत् यज्ञ करते हैं और किसी दिन विलम्ब होने पर भी सूर्योदय से पूर्व यह दैनिक कृत्य अवश्य ही निपटा देते है, वे ही स्वराज्य संचालन में सक्षम हो सकते हैं। इस प्रकार परमेश्वर एवं राष्ट्रभक्ति से प्रेरित होकर वे संगठित होते हैं। राष्ट्र की गम्भीर समस्याओं पर चिन्तन का विधान है। इन विषयों पर विचार करके स्वशासन के अनुरूप अनुगमन करने से आज के सन्दर्भ में महत्त्वपूर्ण समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर सुलझाया जा सकता है।
१. अथर्ववेद १०/७/३१ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri नवम अध्याय 309 राष्ट्रभक्त आदर्श नागरिक राष्ट्र से भी कुछ अपेक्षा कर सकते हैं और आशा करते हैं कि उन्हें अपने कार्य के लिए विस्तृत क्षेत्र प्राप्त होगा। स्वाधीन राष्ट्र में ही इस प्रकार की परिस्थितियाँ होती हैं कि प्रत्येक नागरिक जिस दिशा में चाहे उसे सम्यक् उन्नति करने का अवसर मिले। यदि अवसर प्राप्त हो तो साधारण प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्ति भी वैज्ञानिक, कवि, राजनीतिक, दार्शनिक और समाज के अनुकरणीय-चरित्र बन सकते हैं। यां रक्ष॑न्त्यस्व॒प्ना विश्व॑दानीं॑ देवा भूमिं॑ पृथि॒वीमप्र॑मादम्। सा नो॒ मधु॑ प्रि॒यं दु॑हामथो॑ उक्षतु वर्च॑सा॥१ अर्थात् निद्रा, तंद्रा, आलस्य एवं अज्ञान से रहित कुशल, वीर एवं संयमी व्यक्ति, दुर्गुणों को त्याग कर, कार्यकुशलता, वीरता एवं आत्मोन्नति करते हैं। समाज और राष्ट्र भी उनकी उन्नति में प्रयत्नशील रहता है और उनकी सतत उन्नति होती रहती है। वे ही राष्ट्र के सच्चे सेवक कहे जा सकते हैं और उन्हीं पर राष्ट्र का कल्याण निर्भर रहता है। ऐसी भावनाओं से युक्त व्यक्ति के प्रयासों से ही राष्ट्रीय एकता और अखण्डता की भावना विकसित हो सकती है। राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता के प्रसंग में राष्ट्र की सभ्यता एवं संस्कृति का सम्बल विशेष रूप से प्राप्त होता है। यही वह शक्ति है जो सबको आपस में जोड़कर रखती है। अपने देश की परम्पराओं, रीति-रिवाजों एवं नैतिक मूल्यों का महत्त्वपूर्ण स्थान है— इला सरस्वती मही तिस्रो देवीमयो भुवः। बर्हिः सीदन्त्व स्निधः॥२ राष्ट्रभक्तों में समानता की भावना को आवश्यक बतलाते हुए इस तथ्य का निरूपण इस मंत्र द्वारा किया गया है कि प्रत्येक राष्ट्र की भाषा, संस्कृति एवं भूमि सुख-प्रदाता एवं श्रेयस्कर देवता है। इनकी उन्नति करने से ही राष्ट्र की वास्तविक उन्नति हो सकती है और सामूहिक सुख की प्राप्ति की जा सकती है। भाषा एवं संस्कृति राष्ट्र को एकता व अखण्डता प्रदान करने वाले देवता हैं। भाषा के द्वारा ही संस्कृति की रक्षा हो सकती है, यदि भाषा और संस्कृति संरक्षित रहें तो मातृभूमि या राष्ट्र पर कोई बाह्य शक्ति या शत्रु अपना प्रभुत्व स्थापित नहीं कर सकता। १. अथर्ववेद १२/१/७ २. अथर्ववेद १/१३/९ CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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310 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता वैदिकवाङ्मय में प्रस्तुत संस्कृति एवं भाषा की सुरक्षा का महत्त्व उतना ही सत्य है जितना कि दिन व रात्रि। आज भी इनका स्थायित्व देश की एकता और अखण्डता के लिए सदैव दृढ़ आधार बना हुआ है। सा नो॒ भूमि॒रा दि॑शतु॒ यद्धनं॑ का॒मया॑महे। भगो॑ अनु॒प्रयु॑ङ्क्ता॒मिन्द्र॑ एतु पुरोग॒वः॥१ अर्थात् राष्ट्रभक्त परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हमको जिस ऐश्वर्य अथवा धन की आवश्यकता हों, मातृभूमि वह सब हमको प्रदान करे। स्वतंत्र राष्ट्र का यह सबसे महत्त्वपूर्ण गुण होता है कि यहाँ के स्रोतों से सभी की आजीविका सरलतापूर्वक चलती रहे। राजकीय व्यवस्थाओं से सभी आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रयास होना चाहिये। इसके अभाव में विघटनकारी तत्त्व देश के असंतुष्ट नागरिकों को बहकाकर राष्ट्र के विरुद्ध प्रयोग कर सकते हैं। ऐसे शत्रुओं का नाश होना चाहिए। आज की आतंकवादी ताकतों की ओर यह मंत्र इंगित कर रहा है। जब हम देशवासियों को भर पेट भोजन नहीं दे सकेंगे, तो विघटनकारी आतंकवादी शक्तियाँ उनका गलत प्रयोग करने लगती हैं। अत इन परिस्थितियों से निपटने का हमेशा प्रयास करना चाहिए। हमारे देश की राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के लिए वाङ्मय से प्राप्त प्रेरणाएँ और दिशाएँ एक नया सन्देश देती है कि उनसे प्राप्त शिक्षाओं को ही आज भी जीवन में उतार लिया जाय तो कुछ प्राप्त किया सकता है। यह सब प्राचीन वैदिक वाङ्मय की देन है जो हमें आज के परिप्रेक्ष्य में एक शक्ति प्रदान कर सकता है। इससे प्रेरणा लेकर ही यह अखण्ड भारत आज ही नहीं अपितु आगे भी सदियों तक एकता के सूत्र में आबद्ध रहेगा। १. अथर्ववेद १२/१/४०
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri दशम अध्याय उपसंहार हमारे देश में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का जितना अधिक महत्वपूर्ण स्थान है उतना ही देश के भीतरी एवं बाहरी शत्रुओं की दृष्टि में देश की एकता और अखण्डता पर आघात करने का प्रयास निरन्तर चल रहा है। मनुष्य भय से निष्क्रिय एवं पलायनवादी बन जाता है। इसीलिए लोगों में भय उत्पन्न करने के लिए कुछ असामाजिक तत्त्व अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए प्रयास करते हैं। इस कार्य के लिए वे हिंसापूर्ण साधनों का प्रयोग करते हैं। ऐसी स्थिति ही आतंकवाद का आधार है। आतंकवाद शब्द का निर्माण आतंक + वाद से हुआ है और इस शब्द का सामान्य अर्थ है— आतंक का सिद्धान्त। 'आतंक' का अर्थ होता है— पीड़ा, डर, आशंका, नीति-त्रास। इस प्रकार आतंकवाद एक ऐसी विचारधारा है जो अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बल प्रयोग में विश्वास रखती है। ऐसा बल प्रयोग विरोधी वर्ग, समुदाय या सम्प्रदाय को भयभीत करने के लिए किया जाता है। आतंकवादी अपने रातनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिये हिंसा से या अवैध रूप से सरकार को गिराने और शासन तंत्र पर अपना अधिकार जमाने का प्रयास भी करते हैं। राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के लिए आतंकवाद सदैव से एक अभिशाप रहा है। इसका अस्तित्व मात्र हमारे देश में ही व्यास नहीं है, बल्कि इसका अस्तित्व सम्पूर्ण विश्व में विद्यमान है। यह सम्पूर्ण विश्व में भय, तनाव, असुरक्षा की भावना भर देना चाहता है। इससे इसकी नींव में छिपे इरादों को कोई नहीं जानता है। ये आतंकवादी समस्त विश्व में राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए सार्वजनिक हिंसा और हत्याओं का सहारा ले रहे हैं। भौतिक दृष्टि से विकसित देशों में तो आतंकवाद की इस प्रवृत्ति ने विकराल रूप धारण कर लिया है। कुछ आतंकवादियों ने तो मिलकर अन्तर्राष्ट्रीय संगठन बना लिया है। जे०सी० स्मिथ अपनी बहुचर्चित पुस्तक 'लीगल कंट्रोल ऑफ इण्टरनेशनल टेरेरिज्म' में लिखते हैं कि इस समय संसार में जैसा तनावपूर्ण वातावरण बना हुआ है, उसको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि भविष्य में अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद में और तेजी आयेगी। किसी देश द्वारा अन्य देश में आतंकवादी गुटों को समर्थन देने की घटनायें बढ़ेगी। राजनयिकों की हत्यायें, विमान अपहरण, CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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312 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता बम विस्फोट, सामूहिक हत्याएँ, रासायनिक हथियारों का प्रयोग अधिक तेज होगा। श्रीलंका में तमिलों, जापान में रेड आर्मी, भारत में सिख होमलैण्ड चाहने वालों आदि के हिंसात्मक संघर्ष आतंकवाद की श्रेणी में आते हैं। भारत में आतंकवाद :- स्वाधीनता के पश्चात् भारत के विभिन्न भागों में अनेक आतंकवादी संगठनों द्वारा आतंकवादी उग्र हिंसा फैलाई गई। उन्होंने बड़े-बड़े सरकारी अधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया और इतना आतंक फैलाया कि जनसामान्य ने पलायन करना आरम्भ कर दिया। सर्वप्रथम स्वतंत्रता के बाद तेलंगाना के साम्यवादियों ने हिंसक विद्रोह किया, उसकी असफलता के बाद भारत के उत्तरी पूर्वी क्षेत्र में आतंकवाद उभरने लगा। संगठित रूप से आतंकवाद नागालैण्ड में सामने आया जब फिजी में नागा राष्ट्रीय परिषद का गठन किया गया और अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रशिक्षित गुरिल्ला दस्तों का गठन हुआ। इसके बाद मिजोरम में लाल डेंगा ने 'मिजोरम-नेशनल फ्रंट' और मणिपुर में विश्वेश्वर सिंह ने 'पीपुल्स लिबरेशन आर्मी' के रूप में आतंकवादी संगठनों की स्थापना की। भारत में आतंकवाद का सबसे भयावह रूप पंजाब में खालिस्तान के समर्थकों ने प्रस्तुत किया। इस आतंकवाद का जन्मदाता जरनैल सिंह भिंडरवाले को दिया जा सकता है। इसी के अन्तर्गत अमृतसर के पवित्र स्वर्ण मन्दिर को आतंकवादी गतिविधियों का गढ़ बना दिया गया। वहाँ से हिंसात्मक गतिविधियों का संचालन होने लगा। जून १९८४ में भारत सरकार को बाध्य होकर सेना का उपयोग करना पड़ा और आपरेशन ब्लू स्टार नामक कार्यवाही ने उग्रवादियों की संगठन शक्ति को समाप्त कर दिया। इसके प्रतिक्रिया स्वरूप ही ३१ अक्टूबर १९८४ को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की हत्या की गई। इसके बाद हुए दंगों से हिन्दू और सिखों के मध्य विद्वेष की भावना परिलक्षित हो गई। इस आतंकवादी संगठन को लगातार विदेशी सहायता प्राप्त होती रही। इसके बाद आतंक फैलाने की दृष्टि से जगह-जगह 'ट्रांजिस्टर बम विस्फोट' किये गये जिससे कि सैकड़ों लोगों की जानें चली गयीं। भारतीय लोकतंत्र और स्वयं भारत राष्ट्र के लिए 'आतंकवाद' एक गम्भीरतम चुनौती बना हुआ है। देश की राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के लिए एक बारुद का गोला बना हुआ है। कश्मीर प्रदेश तो सिर्फ पाकिस्तान की अनाधिकार चेष्टा के कारण ही इसका शिकार बना हुआ है। आतंकवाद सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक— विविध आयामों वाली एक समस्या है। अतः इसके निवारण हेतु सभी स्तर पर प्रयास करना आवश्यक है। उसके लिए सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर कठोर प्रयास होना अत्यन्त आवश्यक है।
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दशम अध्याय 313 आतंकवाद के नियंत्रण हेतु सुझाव :- समस्या कितनी भी जटिल क्यों न हो, यदि उसको जड़मूल से समास नहीं किया जा सकता है, फिर भी उसे नियंत्रित तो अवश्य ही किया जा सकता है। इसके लिए सभी स्तरों पर प्रयास आवश्यक है— (क) राष्ट्रीय समस्याओं पर आम सहमति :- आतंकवाद केवल कानून और प्रशासनिक व्यवस्था का प्रश्न नहीं है वरन् इसका एक राजनैतिक पक्ष भी है। इसके लिए आवश्यकता इस बात की है कि चाहे 'पंजाब समस्या', 'जम्मू-कश्मीर समस्या' या 'असम समस्या' हों, उनके समाधान के लिए 'राजनैतिक स्वार्थों' को त्याग कर कठोर प्रयास करने चाहियें। वे राजनैतिक दल जो सत्ता में नहीं हैं, सत्ता पक्ष पर प्रहार करने के लिए उनको एक विषय बना लेते हैं और मात्र 'विरोध के लिए विरोध' की ही दृष्टि से सरकार के क्रियमाण प्रयासों का विरोध ही करते रहते हैं। वस्तुतः राष्ट्रीय समस्याओं पर आम सहमति कायम करके दलीय राजनीति से ऊपर उठकर विचार किया जाना चाहिये और इनका समाधान खोजना चाहिये। (ख) विधि एवं न्याय व्यवस्था में सुधार :- अपनी विधि एवं न्याय व्यवस्था में १०० वर्ष पूर्व ब्रिटेन को आदर्श मानकर अपनाई गई विधि प्रक्रिया और न्याय व्यवस्था इतनी जटिल एवं दीर्घकालीन और व्ययी है कि साधन सम्पन्न अपराधी के लिए विधि और न्याय का पालन कोई आवश्यक नहीं है। वे मुक्त और जनसामान्य को आतंकित करते हुये घूमते रहते हैं। आतंकवाद को नियंत्रित करने के लिए 'अपराधी के लिए लगभग तत्काल दण्ड की व्यवस्था' को अपनाते हुए साधारण जनता के मन मस्तिष्क में विधि और न्याय के प्रति विश्वास और अपराधी तत्त्वों में आवश्यक रूप से भय उत्पन्न करना होगा। (ग) पुलिस और सुरक्षाबलों का आधुनिकीकरण :- पुलिस और सुरक्षा बलों का आधुनिकीकरण किया जाना अत्यन्त आवश्यक है। आज की स्थिति यह है कि 'केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल' के जवान जिन सुरक्षा साधनों से युक्त होते हैं— वहीं आतंकवाली उनसे अधिक अति आधुनिक साधनों से सम्पन्न होते हैं। एक दूसरे का सामना करने में भारतीय जवान अपने को कहीं भी सक्षम नहीं पाते। इनकी पुलिस एवं सुरक्षा बल की सेवा-शर्तों में भी सुधार अपेक्षित है क्योंकि अपनी जान की बाजी लगाने वाले इन सुरक्षा प्रहरियों को अपने परिवार की सुरक्षा का भय भी बना रहता हैं। उनकी निष्ठाथें कहाँ तक समर्पित हो सकती हैं? अपने प्रशासनिक पद्धति में सुधार करना होगा तभी निपटा जा सकेगा आतंकवाद से। (घ) आतंकवाद के विरुद्ध शासन और जनता के बीच सहयोग :- राष्ट्र की समस्याओं का समाधान सिर्फ शासन नहीं खोज सकता है, हर चरण पर उन्हें जन
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 314 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता सामान्य के सहयोग की आवश्यकता होती है। आतंकवाद से भी निपटने के लिए जन सहयोग बहुत सहयोगी प्रयास सिद्ध होगा। इसके लिए जन जागृति पैदा करनी होगी, उन्हें आतंकवादी घटनाओं के प्रति सिर्फ सहानुभूति प्रकट करना ही नहीं अपितु उनसे निपटने के लिए संघर्षशक्ति एवं इच्छा प्रकट करनी होगी। इसके लिए 'अखिल भारतीय शान्ति सेना' के गठन का सुझाव दिया जा रहा है, इस पर सही तरीके से ध्यान देने की आवश्यकता है। (ङ) सामाजिक स्तर पर कार्य :- इस प्रसंग में महत्त्वपूर्ण सुझाव यह हो सकता है कि आतंकवाद का जवाब आतंकवाद से देने पर इसका हल नहीं हो सकता है, अपितु इसमें कई गुना वृद्धि हो सकती है। 'आतंकवाद' समाज और देश की ही सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारणों से उत्पन्न 'मानसिक रोग' के रूप में होता है। केवल बल के प्रयोग के आधार पर इसको सुलझाया नहीं जा सकता है। इनके मूल कारणों को समझने के लिए सामाजिक संस्थाओं को अध्ययन करना होगा। विभिन्न समुदायों के बीच के भेदभाव को मिटाने के लिए प्रयत्न करना होगा। उनके अन्दर कमजोर पड़ गई भाई-चारे की भावना को पुनः जगाकर इसे मिटाने का प्रयास करना होगा। (च) संवैधानिक प्रावधानों के दुरुपयोग पर प्रभावी रोक :- पंजाब और जम्मू कश्मीर राज्य में जो स्थिति है उसका सबसे बड़ा कारण है कि कुछ परिस्थितियों में स्वयं केन्द्रीय सरकार ने संवैधानिक प्रावधानों, विशेषतया राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की व्यवस्था का दलगत हितों की दृष्टि से प्रयोग किया। 'सरकारिया आयोग' ने अपनी रिपोर्ट (नवम्बर १९३७) में अनुच्छेद ३५६ के आधार पर राष्ट्रपति शासन लागू करने की व्यवस्था का दुरुपयोग रोकने की आवश्यकता पर बल दिया है और इस सम्बन्ध में कुछ सुझाव दिये हैं; प्रथम राज्य में राष्ट्रपति शासन अन्तिम विकल्प के रूप में ही लागू होना चाहिए, जबकि राज्य का कामकाज संविधान में दी गई व्यवस्था के अनुसार चलना असम्भव हो जाये। राष्ट्रपति शासन लागू करने से पहले केन्द्र सरकार द्वारा सम्बन्धित राज्य को इस बारे में चेतावनी देकर स्पष्टीकरण माँगा जाना चाहिए और निर्णय लेते समय इस स्पष्टीकरण पर विचार करना चाहिए। द्वितीय, राष्ट्रपति शासन लागू करने के पीछे जो कारण हैं उन्हें स्पष्ट रूप से बतलाया जाना चाहिए। तथ्य यह है कि यदि अनुच्छेद ३५६ के दुरुपयोग को रोकने की प्रभावी व्यवस्था नहीं की गई तो आतंकवादी-तत्त्वों को शक्तिशाली होने के अवसर प्राप्त होते रहेंगे। (छ) आर्थिक-सामाजिक न्याय की प्राप्ति :- हमारे देश में अन्य देशों की भाँति बेरोजगारी और विशेषतया शिक्षित वर्ग में बेरोजगारी का व्याप्त होना ही आतंकवादी CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
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दशम अध्याय 315
भावना को पनपने की पृष्ठभूमि तैयार करता है। बेरोजगारों को रुपये के लालच में आसानी से बरगलाया जा सकता हैं, उन्हें भटकते हुए देर नहीं लगती हैं। अतः शिक्षा को रोजगार से जोड़ा जाय और प्रतिवर्ष करोड़ों व्यक्तियों के लिए रोजगार जुटाये जायें। आर्थिक असमानता को समाप्त तो नहीं किया जा सकता, लेकिन उसे नियंत्रित करना होगा और आर्थिक-सामाजिक न्याय की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे। (ज) शासन की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करना :- पिछले लगभग २५ वर्षों में शासन, चाहे वह केन्द्रीय शासन हो या राज्य शासन, की प्रतिष्ठा का बहुत अधिक क्षय हुआ है। अतः शासन की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करना होगा और इस सम्बन्ध में कुछ सुझाव हैं :- प्रथम, भारतीय संविधान के निर्माताओं ने भारत में 'सहयोगी- संघवाद' की कल्पना की थी और आज इस 'सहयोगी-संघवाद' की नितान्त आवश्यकता अनुभव की जा रही है। इसमें राज्य व केन्द्र की सरकारें एक दूसरे की कठिनाइयों को समझें और एक दूसरे के साथ सहयोग करें। द्वितीय आज स्थिति यह है कि आतंकवादी तत्त्व केन्द्र सरकार पर भी दबाव डालने की कोशिश करते हैं और इसमें कई बार वे सफल भी हो जाते हैं। अधिक स्पष्ट रूप से यह स्थिति 'रूबैया प्रकरण' (१९८९) से सामने आई है। ऐसी घटनाएँ आतंकवादी तत्त्वों को बढ़ावा देने वाली होती हैं। किसी भी स्थिति में शासन को इन ताकतों के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए। राष्ट्रहित व्यक्तिगत हित से कहीं ऊँचा होता है। आवश्यकता अनुभव होने पर आतंकवाद के विरुद्ध भारी बल प्रयोग करना भी उचित है। इससे शासन की दृढ़बद्धता का प्रमाण मिलता है। दृढ़-प्रतिज्ञ शासन ही सभी प्रकार के आतंकवाद से निपट सकता है। (झ) पाकिस्तान के अनुचित हस्तक्षेप पर प्रतिबन्ध :- आतंकवाद का एक अति प्रमुख कारण पड़ोसी राज्य पाकिस्तान द्वारा भारत में आतंकवादियों को दिया जाने वाला भारी प्रोत्साहन है। सीमाओं के रास्ते से देश में प्रशिक्षित आतंकवादियों को अनाधिकार प्रविष्ट कराने की घटनायें, हमारे ही देश के कितने युवाओं का अपहरण कर उन्हें आतंकवाद के लिए बाध्य करना, यह सब आम बात हो गई है। इसके लिए सर्वप्रथम, तो पाकिस्तान से जुड़ी हुई सभी सीमाओं को सील कर देना चाहिए, तभी यह प्रवेश रोका जा सकता है। द्वितीय, हमें अपने इस पड़ोसी देश को समझाना होगा कि भारतीय मामलों में दखलंदाजी उसके लिए भयानक परिणामों को जन्म देगी। मैत्री के स्वर में कही गई बात को यदि पड़ोसी देश उचित महत्त्व नहीं देता है तो चेतावनी देनी होगी और नितान्त आवश्यक हो जाने पर उसे 'शक्ति की भाषा' में भी समझना होगा। इस प्रसंग में हमें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद को प्रोत्साहित करने
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316 | वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता वाले इस देश के विरुद्ध जनमत जागृत करना होगा। यदि इस प्रसंग में भारत ने दृढ़ता का परिचय दिया तो वह इसको रोकने में सफल हो सकेगा। प्रथम : इसके अतिरिक्त भी कुछ सुझाव हैं कि जो वास्तविकता में बहुत ही पास है। आतंकवादियों में एक वर्ग ऐसा भी है जो कि परिस्थितिवश या केवल क्षणिक आवेश में या नासमझी के दौर में आतंकवाद से जुड़ गया है और सत्यता से परिचित होने पर भी उससे बाहर आने में अपने आपको असमर्थ पा रहा है। शासन और समाज की स्वयंसेवी संस्थाओं और कार्यकताओं का यह कर्तव्य है कि इनके साथ पूरी सद्भावना और सहानुभूति का परिचय देते हुए इन युवकों के शस्त्रों सहित आत्मसमर्पण की व्यवस्था की जाये और उनके पुनर्वास की पूरी व्यवस्था की जाये। द्वितीय : वनांचल, तैलंगाना और बोडोलैण्ड आदि भी भारतीय संघ में ही अलग राज्य के रूप में स्थापना की जो माँग और आन्दोलन कर रहे हैं, इनसे समय- समय पर आतंकवाद को जन्म मिला है। इसीलिए यह सुझाव प्रस्तावित है कि एक नवीन राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना करके इन मामलों को विचारार्थ सौंप दिया जाना चाहिए। यह सुझाव गम्भीरता से विचारणीय है और सभी दलों की सहमति से ही किया जाना चाहिए। तृतीय : आतंकवाद केवल कानून और व्यवस्था का प्रश्न ही नहीं है, आतंकवाद एक राजनैतिक परिप्रेक्ष्य है, एक मनोवैज्ञानिक पक्ष है। केवल बल प्रयोग से कोई भी राजनैतिक या जटिल राष्ट्रीय समस्या का समाधान नहीं खोजा जा सकता है। बल प्रयोग भी विवेक और सद्भावना के साथ, साहस के समन्वय के साथ करना चाहिए। शासन द्वारा आतंकवादियों से बातचीत अवश्य ही की जानी चाहिए, शर्त केवल यह है कि बातचीत संविधान के दायरे में हो, बातचीत के लिए आगे आने वाले आतंकवादी तत्त्व आज की घड़ी और भविष्य में अपने आपको देश की एकता और अखण्डता के लिए प्रतिबद्ध घोषित करें और आतंकवाद का रास्ता छोड़ने की घोषणा करें।
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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सहायक ग्रन्थसूची १. ऋग्वेद चौखम्बा संस्कृत भवन, वाराणसी २. यजुर्वेद चौखम्बा संस्कृत भवन, वाराणसी ३. सामवेद चौखम्बा संस्कृत भवन, वाराणसी ४. अथर्ववेद चौखम्बा संस्कृत भवन, वाराणसी ५. शतपथ ब्राह्मण चौखम्बा संस्कृत भवन, वाराणसी ६. ईशादि नौ उपनिषद् गीताप्रेस, गोरखपुर ७. छान्दोग्योपनिषद् गीताप्रेस, गोरखपुर ८. बृहदारण्यकोपनिषद् गीताप्रेस, गोरखपुर ९. पातञ्जल योगदर्शन स्वामी श्री ब्रह्मलीन मुनि १०. कौटिलीय अर्थशास्त्र टीका वाचस्पति गैरोला १२. श्रीमद्भागवतम् गीताप्रेस, गोरखपुर १३. वाल्मीकिरामायणम् गीताप्रेस, गोरखपुर १४. ऋग्वेदभाष्यभूमिका वाराणसी १५. निरुक्तम् वाराणसी १६. कौषीतकिब्राह्मणआचारविचाराः डॉ० मंगल देव शास्त्री १७. वेदान्त परिभाषा डॉ० गजाननन शास्त्री मुसलगाँवकर १८. सर्वदर्शन संग्रह डॉ० उमाशङ्कर शर्मा १९. ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, स्वामी श्री हनुमानदास षटशास्त्री २०. महाभारत गीताप्रेस, गोरखपुर २१. अष्टादशपुराणदर्पण ज्वालाप्रसाद मिश्र २२. पुराणातत्त्वमीमांसा श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी २३. आर्यसंस्कृति के आधार ग्रन्थ पं० बलदेव उपाध्याय २४. वैदिक साहित्य और संस्कृति पं० बलदेव उपाध्याय २५. धर्म औव समाज डॉ० एस० राधाकृष्णन २६. धर्मशास्त्र का इतिहास पी०वी० काणे CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar