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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

६१- पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र-शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन, सनत्कुमार-ब्रह्माका प्रसङ्ग, चतुर्मूर्तिका वर्णन और मुरु-वध

२७२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ५९ ]

उनसठवाँ अध्याय

ऋतध्वजका पातालकेतुपर आक्रमण कर प्रहार करना, अन्धकका गौरीको प्राप्त करनेके लिये प्रयत्न करना

संस्कृतहिन्दी अनुवाद
नारद उवाच<br>योऽसौ मन्त्रयतां प्राप्तो दैत्यानां शरताडितः।<br>स केन वद निर्भिन्नः शरेण दितिजेश्वरः ॥ १नारदने पूछा — आप हमें यह बतलायें कि सलाह करते हुए दैत्योंमेंसे जो वह दैत्य बाणद्वारा बिंध गया था उसे किसने बाणसे विदीर्ण कर दिया था॥ १॥
पुलस्त्य उवाच<br>आसीन्नृपो रघुकुले रिपुजिन्महर्षे<br>तस्यात्मजो गुणगणैकनिधिर्महात्मा।<br>शूरोऽरिसैन्यदमनो बलवान् सुहृत्सु<br>विप्रान्धदीनकृपणेषु समानभावः ॥ २<br>ऋतध्वजो नाम महान् महीयान्<br>स गालवार्थे तुरगाधिरूढः।<br>पातालकेतुं निजघान पृष्ठे<br>बाणेन चन्द्रार्धनिभेन वेगात् ॥ ३पुलस्त्यजी बोले — महर्षे! रघुकुलमें रिपुजित् नामके एक राजा थे। उनके ऋतध्वज नामका एक पुत्र था। वह सभी गुणोंकी निधि, महात्मा, वीर, शत्रुके सेनाओंका नाश करनेवाला, बली, मित्रों, ब्राह्मणों, अन्धों, गरीबों एवं दयापात्र दीनोंमें समान भाव रखनेवाला था। उसने गालवके लिये घोड़ेपर सवार होकर पातालकेतुकी पीठमें अर्धचन्द्रके सदृश बाणसे बड़ी तेजीसे मारा था॥ २-३॥
नारद उवाच<br>किमर्थं गालवस्यासौ साधयामास सत्तमः।<br>येनासौ पत्रिणा दैत्यं निजघान नृपात्मजः ॥ ४नारदने कहा (पूछा) — उस श्रेष्ठ राजपुत्रने जिस कारण बाणसे उस दैत्यको मारा, उससे गालवका कौन-सा कार्य सिद्ध किया?॥ ४॥
पुलस्त्य उवाच<br>पुरा तपस्तप्यति गालवर्षि-<br>र्महाश्रमे स्वे सततं निविष्टः।<br>पातालकेतुस्तपसोऽस्य विघ्नं<br>करोति मौढ्यात् स समाधिभङ्गम्॥ ५<br>न चेष्यतेऽसौ तपसो व्ययं हि<br>शक्तोऽपि कर्तुं त्वथ भस्मसात् तम्।<br>आकाशमीक्ष्याथ स दीर्घमुष्णं<br>मुमोच निःश्वासमनुत्तमं हि ॥ ६<br>ततोऽम्बराद् वाजिवरः पपात<br>बभूव वाणी त्वशरीरिणी च।<br>असौ तुरङ्गो बलवान् क्रमेत<br>अह्ना सहस्राणि तु योजनानाम्॥ ७<br>स तं प्रगृह्याश्ववरं नरेन्द्रं<br>ऋतध्वजं योज्य तदात्तशस्त्रम्।<br>स्थितस्तपस्येव ततो महर्षि-<br>र्दैत्यं समेत्य विशिखैर्नृपजो बिभेद ॥ ८पुलस्त्यजी बोले — पहले समयकी बात है कि गालव अपने आश्रममें तपस्यामें सदा लीन रहा करते थे। दैत्य पातालकेतु मूर्खताके कारण उनकी तपस्यामें बाधा डाला करता और उनकी समाधि (ध्यान)-को भंग किया करता था। वे उसको जलाकर राख कर देनेमें समर्थ होते हुए भी अपनी तपस्या क्षीण नहीं करना चाहते थे; (क्योंकि तपोबलसे दूसरोंका अनिष्ट करनेपर तपस्या क्षीण हो जाती है।) उन्होंने ऊपरकी ओर देखकर लंबा, गर्म निःश्वास छोड़ा। वह सर्वथा अनुपम था। उसके बाद आकाशसे एक सुन्दर घोड़ा गिरा और अशरीरिणी वाणी—आकाशवाणी हुई कि यह बलवान् अश्व एक दिनमें हजारों योजन जा सकता है। शस्त्रसे सजे हुए उस राजा ऋतध्वजको वह घोड़ा सौंपकर वे महर्षि (पुनः) तपस्या करने लगे। उसके बाद राजपुत्रने दैत्यके पास जाकर उसे बाणसे घायल कर दिया॥ ५-८॥
नारद उवाच<br>केनाम्बरतलाद् वाजी निसृष्टो वद सुव्रत।<br>वाक् कस्याऽदेहिनी जाता परं कौतूहलं मम ॥ ९नारदने कहा (पुनः पूछा) — सुव्रत! आप यह बतलायें कि किसने आकाशसे इस अश्वको गिराया था एवं आकाशवाणी किसकी थी? (इस विषयमें) मुझे बड़ी उत्सुकता है॥ ९॥

अध्याय ५९] ऋतध्वजका पातालकेतुपर आक्रमण कर प्रहार करना २७३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुलस्त्य उवाच<br>विश्वावसुर्नाम महेन्द्रगायनो<br>गन्धर्वराजो बलवान् यशस्वी।<br>निसृष्टवान् भूवलये तुरङ्गं<br>ऋतध्वजस्यैव सुतार्थमाशु॥ १०पुलस्त्यजी बोले— महेन्द्रका गुणगान करनेवाले बलशाली विश्वावसु नामके यशस्वी गन्धर्वराजने अपनी पुत्रीके लिये ऋतध्वजके हेतु उस समय अश्वको पृथ्वीपर गिराया था॥ १०॥
नारद उवाच<br>कोऽर्थो गन्धर्वराजस्य येनाप्रैषीन्महाजवम्।<br>राज्ञः कुवलयाश्वस्य कोऽर्थो नृपसुतस्य च॥ ११नारदने कहा (फिर पूछा)— महान् वेगशाली इस अश्वको भेजनेमें गन्धर्वराजका क्या उद्देश्य था तथा राजपुत्र राजा कुवलयाश्वका इसमें क्या लाभ था? (कृपया इसे भी बतलाइये।)॥ ११॥
पुलस्त्य उवाच<br>विश्वावसोः शीलगुणोपपन्ना<br>आसीत्पुरंध्रीषु वरा त्रिलोके।<br>लावण्यराशिः शशिकान्तितुल्या<br>मदालसा नाम मदालसैव॥ १२<br>तां नन्दने देवरिपुस्तरस्वी<br>संक्रीडतीं रूपवतीं ददर्श।<br>पातालकेतुस्तु जहार तन्वीं<br>तस्यार्थतः सोऽश्ववरः प्रदत्तः॥ १३<br>हत्वा च दैत्यं नृपतेस्तनूजो<br>लब्ध्वा वरोरूमपि संस्थितोऽभूत्।<br>दृष्टो यथा देवपतिर्महेन्द्रः<br>शच्या तथा राजसुतो मृगाक्ष्या॥ १४पुलस्त्यजी बोले— विश्वावसुकी मदसे अलसायी-सी मदालसा नामकी एक (भोलीभाली) कन्या थी। वह शील और गुणसे सम्पन्न, त्रिलोककी स्त्रियोंमें उत्तम, सुन्दरताकी खानि और चन्द्रमाकी कान्तिके समान (कोमलकिशोरी) थी। नन्दनवनमें क्रीडा कर रही उस सौन्दर्यशालिनीको देवताओंके शत्रु पातालकेतुने देखा और तुरन्त उसे उठा ले गया। उसीके कारण वह श्रेष्ठ घोड़ा दिया गया था। दैत्यको मारनेके बाद श्रेष्ठ ऊरुवाली स्त्रीको पाकर राजपुत्र निश्चिन्त हो गये। राजपुत्र (उस) मृगनयनीके साथ ऐसे सुशोभित हो रहे थे जैसे शचीके साथ इन्द्र सुशोभित होते हैं॥ १२—१४॥
नारद उवाच<br>एवं निरस्ते महिषे तारके च महासुरे।<br>हिरण्याक्षसुतो धीमान् किमचेष्टत वै पुनः॥ १५नारदने पुनः पूछा— इस प्रकार महान् असुर तारक और महिषके निरस्त—समाप्त हो जानेपर हिरण्याक्षके बुद्धिमान् पुत्र (अन्धक)-ने पुनः क्या किया?॥ १५॥
पुलस्त्य उवाच<br>तारकं निहतं दृष्ट्वा महिषं च रणेऽन्धकः।<br>क्रोधं चक्रे सुदुर्बुद्धिर्देवानां देवसैन्यहा॥ १६<br>ततः स्वल्पपरिवारः प्रगृह्य परिघं करे।<br>निर्जगामाथ पातालाद् विचचार च मेदिनीम्॥ १७<br>ततो विचरता तेन मन्दरे चारुकन्दरे।<br>दृष्टा गौरी च गिरिजा सखीमध्ये स्थिता शुभा॥ १८<br>ततोऽभूत् कामबाणार्त्तः सहसैवान्धकोऽसुरः।<br>तां दृष्ट्वा चारुसर्वाङ्गीं गिरिराजसुतां वने॥ १९पुलस्त्यजी बोले— तारक और महिष दोनोंको संग्राममें मारे गये देखकर देवसेनाके समूहोंका नाश करनेवाला, महामूर्ख अन्धक देवताओंपर कुपित हो गया। उसके बाद थोड़ी-सी सेनाके साथ वह हाथमें परिघ लेकर पातालसे बाहर निकल आया और पृथ्वीपर विचरण करने लगा। उसके बाद घूमते हुए ही उसने सुन्दर कन्दराओंवाले मन्दर गिरिपर सखियोंके बीचमें गिरिनन्दिनी कल्याणी गौरीको देखा। उस सर्वाङ्गसुन्दरी गिरिराजनन्दिनीको वनमें देखकर अन्धकासुर एकाएक काम-बाणसे पीड़ित हो गया॥ १६—१९॥
अथोवाचासुरो मूढो वचनं मन्मथान्धकः।<br>कस्येयं चारुसर्वाङ्गी वने चरति सुन्दरी॥ २०<br>इयं यदि भवेन्नैव ममान्तःपुरवासिनी।<br>तन्मदीयेन जीवेन क्रियते निष्फलेन किम्॥ २१तब कामसे अंधे हुए उस मूर्ख असुर अन्धकने कहा—वनमें भ्रमण कर रही यह सर्वाङ्गसुन्दरी ललना किसकी है? यदि यह मेरे अन्तःपुरमें निवास करनेवाली न हुई तो मेरे इस व्यर्थके जीवनसे क्या लाभ? यदि

| २७४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५१ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यदस्यास्तनुमध्याया न परिष्वङ्गवानहम्।<br>अतो धिङ् मां रूपेण किं स्थिरेण प्रयोजनम्॥ २२<br><br>स मे बन्धुः स सचिवः स भ्राता साम्परायिकः।<br>यो मामसितकेशां तां योजयेन्मृगलोचनाम्॥ २३इस कृशोदरी सुन्दरी ललनाका आलिङ्गन मुझे प्राप्त न हुआ तो मुझे धिक्कार है! मेरी इस स्थायी सुन्दरतासे क्या लाभ? मेरा वही बन्धु, वही सचिव, वही भ्राता तथा वही संकटकालका साथी है जो इस काले केशवाली मृगनयनी सुन्दरीको मुझसे मिला दे॥ २०—२३॥
इत्थं वदति दैत्येन्द्रे प्रह्लादो बुद्धिसागरः।<br>पिधाय कर्णौ हस्ताभ्यां शिरःकम्पं वचोऽब्रवीत्॥ २४<br><br>मा मैवं वद दैत्येन्द्र जगतो जननी त्वियम्।<br>लोकनाथस्य भार्येयं शङ्करस्य त्रिशूलिनः॥ २५<br><br>मा कुरुष्व सुदुर्बुद्धिं सद्यः कुलविनाशिनीम्।<br>भवतः परदारेयं मा निमज्ज रसातले॥ २६<br><br>सत्सु कुत्सितमेवं हि असत्स्वपि हि कुत्सितम्।<br>शत्रवस्ते प्रकुर्वन्तु परदारावगाहनम्॥ २७दैत्यराजके इस प्रकार कहनेपर महाबुद्धिमान् प्रह्लाद दोनों हाथोंसे दोनों कानोंको ढँककर सिर हिलाते हुए बोले—दैत्येन्द्र! इस प्रकार मत कहो। ये तो संसारकी जननी और लोकस्वामी, त्रिशूलधारी शङ्करकी पत्नी हैं। तुम कुलका सद्यः विनाश करनेवाली ऐसी दुर्बुद्धि मत करो। तुम्हारे लिये ये परस्त्री हैं। अतः रसातलमें मत गिरो; क्योंकि (ऐसा दुष्कर्म) सज्जनोंमें तो अत्यन्त निन्दित है ही, असत् पुरुषोंमें भी निन्दित है। ऐसा दुष्कर्म—परदारा-अभिगमन तुम्हारे शत्रु करें (जिससे उनका विनाश हो जाय)॥ २४—२७॥
किंचित् त्वया न श्रुतं दैत्यनाथ<br>गीतं श्लोकं गाधिना पार्थिवेन।<br>दृष्ट्वा सैन्यं विप्रधेनुप्रसक्तं<br>तथ्यं पथ्यं सर्वलोके हितं च॥ २८<br><br>वरं प्राणास्त्याज्या न च पिशुनवादेष्वभिरति-<br>र्वरं मौनं कार्यं न च वचनमुक्तं यदनृतम्।<br>वरं क्लीबैर्भाव्यं न च परकलत्राभिगमनं<br>वरं भिक्षार्थित्वं न च परधनास्वादमसकृत्॥ २९दैत्येश! ब्राह्मणकी गौपर प्रसक्त सेनाको देखकर गाधिराजने समस्त जगत्के लिये कल्याणकारी, सत्य एवं उचित जो श्लोक कहा है क्या उसे आपने नहीं सुना है? (उन्होंने कहा है—) प्राणोंका छोड़ देना अच्छा है, परंतु चुगलखोरोंकी बातमें दिलचस्पी लेना उचित नहीं। मौन रहना अच्छा है, किंतु असत्य बोलना ठीक नहीं। नपुंसक होकर रहना ठीक है, परंतु परस्त्रीगमन उचित नहीं। भीख माँगना अच्छा है, किंतु बार-बार दूसरेके धनका उपभोग करना उचित नहीं।
स प्रह्लादवचः श्रुत्वा क्रोधान्धो मदनार्दितः।<br>इयं सा शत्रुजननीत्येवमुक्त्वा प्रदुद्रुवे॥ ३०<br><br>ततोऽन्वधावन् दैतेया यन्त्रमुक्ता इवोपलाः।<br>तान् रुरोध बलान्नन्दी वज्रोद्यतकरोऽव्ययः॥ ३१प्रह्लादका वचन सुननेके बाद काम-पीड़ित अन्धक क्रोधसे अंधा होकर 'यह वही शत्रु की जननी है'—यह कहते हुए दौड़ पड़ा। उसके बाद दूसरे और दानव भी यन्त्रसे छूटे हुए पत्थरकी गोलीके समान उसके पीछे दौड़ चले। परंतु अव्यय नन्दीने हाथमें वज्र उठाकर बलपूर्वक उन सबको रोक दिया॥ २८—३१॥
मयतारपुरोगास्ते वारिता द्रावितास्तथा।<br>कुलिशेनाहतास्तूर्णं जग्मुर्भीता दिशो दश॥ ३२<br><br>तानर्दितान् रणे दृष्ट्वा नन्दिनाऽन्धकदानवः।<br>परिघेण समाहत्य पातयामास नन्दिनम्॥ ३३<br><br>शैलादिं पतितं दृष्ट्वा धावमानं तथान्धकम्।<br>शतरूपाऽभवद् गौरी भयात् तस्य दुरात्मनः॥ ३४वज्रकी मारसे रोक दिये गये और भगाये जाते हुए वे मय एवं तारक आदि सभी दैत्य डरकर दसों दिशाओंमें भाग गये। संग्राममें अन्धकासुरने उन सभीको नन्दीद्वारा पीड़ित देखकर नन्दीको परिघसे मारकर गिरा दिया। नन्दीको गिरा हुआ और अन्धकको दौड़कर आते हुए देखकर गौरी उस दुष्टात्माके भयसे सैकड़ों रूपवाली

अध्याय ५९ ] \hfill ऋतध्वजका पातालकेतुपर आक्रमण कर प्रहार करना \hfill २७५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततः स देवीगणमध्यसंस्थितः<br>परिभ्रमन् भाति महाऽसुरेन्द्रः।<br>यथा वने मत्तकरी परिभ्रमन्<br>करेणुमध्ये मदलोलदृष्टिः॥ ३५हो गयीं। उसके बाद देवियोंके बीच घूमता हुआ (वह) दैत्य ऐसा लग रहा था जैसे कि वनमें हथिनियोंके बीच घूमता हुआ मदसे चञ्चल दृष्टिवाला मतवाला हाथी सुशोभित होता है॥ ३२—३५॥
न परिज्ञातवांस्तत्र का तु सा गिरिकन्यका।<br>नात्राश्चर्यं न पश्यन्ति चत्वारोऽमी सदैव हि॥ ३६<br><br>न पश्यतीह जात्यन्धो रागान्धोऽपि न पश्यति।<br>न पश्यति मदोन्मत्तो लोभाक्रान्तो न पश्यति।<br>सोऽपश्यमानो गिरिजां पश्यन्नपि तदान्धकः॥ ३७<br><br>प्रहारं नाददत् तासां युवत्य इति चिन्तयन्।<br>ततो देव्या स दुष्टात्मा शतावर्या निराकृतः॥ ३८<br><br>कुट्टितः प्रवरैः शस्त्रैर्निपपात महीतले।<br>वीक्ष्यान्धकं निपतितं शतरूपा विभावरी॥ ३९<br><br>तस्मात् स्थानादपाक्रम्य गताऽन्तर्धानमम्बिका।<br>पतितं चान्धकं दृष्ट्वा दैत्यदानवयूथपाः॥ ४०<br><br>कुर्वन्तः सुमहाशब्दं प्राद्रवन्त रणार्थिनः।<br>तेषामापततां शब्दं श्रुत्वा तस्थौ गणेश्वरः॥ ४१(पर) वह नहीं समझ रहा था कि उनमें वे गिरिनन्दिनी कौन हैं? इसमें (उसके न समझनेमें) कोई आश्चर्य नहीं है; क्योंकि संसारमें ये चार प्रकारके व्यक्ति सदा ही (ठीक-ठीक) नहीं देख पाते। जन्मका अन्धा नहीं देखता, प्रेममें अन्धा हुआ नहीं देखता, मदोन्मत्त नहीं देखता एवं लोभसे पराभूत भी नहीं देखता है। अतः अन्धक उस समय देखते हुए भी गिरिजाको नहीं देख पा रहा था। उस दानवने उन सभीको युवती समझकर उनपर आघात नहीं किया, फिर तो शतावरीदेवीने (ही) उस दुष्टात्मापर आघात कर दिया। उत्कृष्ट कोटिके शस्त्रोंसे बिंधकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। अन्धकको गिरा हुआ देखकर शतरूपोंवाली विभावरी अम्बिका उस स्थानसे हटकर अन्तर्हित हो गयीं। अन्धकको गिरा हुआ देख दैत्यों एवं दानवोंके सेनापति युद्धके लिये ललकारते हुए दौड़ पड़े। आक्रमण करनेवाले उन (दैत्यों)-के शब्दको सुनकर गणेश्वर खड़े हो गये॥ ३६–४१॥
आदाय वज्रं बलवान् मघवानिव कोपितः।<br>दानवान् समयान् वीरः पराजित्य गणेश्वरः॥ ४२<br><br>समभ्येत्याम्बिकां दृष्ट्वा ववन्दे चरणौ शुभौ।<br>देवी च ता निजा मूर्तीः प्राह गच्छध्वमिच्छया॥ ४३<br><br>विहरध्वं महीपृष्ठे पूज्यमाना नरैरिह।<br>वसतिर्भवतीनां च उद्यानेषु वनेषु च॥ ४४<br><br>वनस्पतिषु वृक्षेषु गच्छध्वं विगतज्वराः।<br>तास्त्वेवमुक्ताः शैलेय्या प्रणिपत्याम्बिकां क्रमात्॥ ४५<br><br>दिक्षु सर्वासु जग्मुस्ताः स्तूयमानाश्च किन्नरैः।<br>अन्धकोऽपि स्मृतिं लब्ध्वा अपश्यनद्रिनन्दिनीम्।<br>स्वबलं निर्जितं दृष्ट्वा ततः पातालमाद्रवत्॥ ४६<br><br>ततो दुरात्मा स तदान्धको मुने<br>पातालमभ्येत्य दिवा न भुङ्क्ते।<br>रात्रौ न शेते मदनेषुताडितो<br>गौरीं स्मरन्कामबलाभिपन्नः॥ ४७क्रुद्ध हुए गणेश्वर इन्द्रके समान वज्र लेकर मयसहित दानवोंको हराकर अम्बिकाके निकट गये और (उन्होंने) उनके शुभ चरणोंमें प्रणाम किया। देवीने भी अपनी उन मूर्तियोंसे कहा—तुम सभी इच्छानुरूप स्थानोंको जाओ और मनुष्योंकी आराधना प्राप्त करती हुई पृथ्वीपर भ्रमण करो। तुम सबका निवास उद्यानों, वनों, वनस्पतियों एवं वृक्षोंमें होगा। अब तुम सभी निश्चिन्त होकर जाओ। पार्वतीके इस प्रकार कहनेपर वे सभी देवियाँ अम्बिकाको प्रणामकर किन्नरोंसे स्तुत होती हुई (दसों) दिशाओंमें चली गयीं। अन्धक भी होशमें आनेके बाद गिरिजाको न देखकर तथा अपनी सेनाको हारी हुई समझकर पातालमें चला गया। मुने! उसके बाद कामबाणसे घायल एवं कामके वेगसे पीड़ित दुष्टात्मा अन्धक पातालमें जाकर गौरीका चिन्तन करता हुआ न दिनमें खाता था और न रातमें सोता था—वह बेचैन-सा हो गया था॥ ४२–४७॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उनसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ५९ ॥

२७६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६०

साठवाँ अध्याय

पुनः तेजःप्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थकी उपलब्धि, शिवका सरस्वतीमें निमग्न होना, मुरासुरका प्रसंग और सनत्कुमारका प्रसंग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नारद उवाच<br>क्व गतः शङ्करो ह्यासीद् येनाम्बा नन्दिना सह।<br>अन्धकं योधयामास एतन्मे वक्तुमर्हसि॥ १नारदने कहा (पूछा)— आप मुझे यह बतलायें कि शङ्कर कहाँ चले गये थे, जिससे नन्दिसहित अम्बिकाने अन्धकसे (स्वयं) युद्ध किया॥ १॥
पुलस्त्य उवाच<br>यदा वर्षसहस्रं तु महामोहे स्थितोऽभवत्।<br>तदाप्रभृति निस्तेजाः क्षीणवीर्यः प्रदृश्यते॥ २<br>स्वमात्मानं निरीक्ष्याथ निस्तेजोऽङ्गं महेश्वरः।<br>तपोऽर्थाय तथा चक्रे मतिं मतिमतां वरः॥ ३<br>स महाव्रतमुत्पाद्य समाश्वास्याम्बिकां विभुः।<br>शैलादिं स्थाप्य गोप्तारं विचचार महीतलम्॥ ४<br>महामुद्रार्पितग्रीवो महाहिकृतकुण्डलः।<br>धारयाणः कटीदेशे महाशङ्खस्य मेखलाम्॥ ५पुलस्त्यजी बोले— वे (शंकरजी) जिस समय एक हजार वर्षतक महामोहमें पड़ गये थे, उस समयसे वे तेजरहित एवं शक्तिहीन-से दिखायी दे रहे थे। मतिमानोंमें श्रेष्ठ महेश्वरने स्वयं अपने अङ्गोंको निस्तेज देखकर तप करनेके लिये निश्चय किया। उन व्यापक शङ्करने महाव्रतका निर्णय करनेके बाद अम्बिकाको धैर्य धारण कराया और वे शैल आदि (नन्दी)-को उनकी रक्षाके लिये नियुक्त कर पृथ्वीपर विचरण करने लगे। उन्होंने गलेमें तन्त्रानुसार महामुद्रा पहन ली। महासर्पोंके कुण्डल एवं कमरमें महाशङ्खकी मेखला धारण कर ली॥ २–५॥
कपालं दक्षिणे हस्ते सव्ये गृह्य कमण्डलुम्।<br>एकाहवासी वृक्षे हि शैलसानुनदीष्वटन्॥ ६<br>स्थानं त्रैलोक्यमास्थाय मूलाहारोऽम्बुभोजनः।<br>वाय्वाहारस्तदा तस्थौ नववर्षशतं क्रमात्॥ ७<br>ततो वीटां मुखे क्षिप्य निरुच्छ्वासोऽभवद् यतिः।<br>विस्तृते हिमवत्पृष्ठे रम्ये समशिलातले॥ ८<br>ततो वीटा विदार्यैव कपालं परमेष्ठिनः।<br>सार्चिष्मती जटामध्यान्निषण्णा धरणीतले॥ ९दाहिने हाथमें कपाल एवं बायें हाथमें कमण्डलु लेकर वे वृक्षोंके नीचे (कभी) पड़े रहते, कभी पहाड़ोंकी चोटियोंपर तथा नदियोंके तटपर चक्कर लगाते रहते। प्रथम (आरम्भमें) मूल-फल खाकर फिर जल पीकर, उसके बाद वायु पीकर (यम-नियमका) व्रत पालन करनेवाले उन्होंने क्रमशः तीनों लोकोंमें नौ सौ वर्ष व्यतीत किये। उसके बाद उन्होंने हिमालयके ऊपर रमणीय तथा समतल पर्वतीय चट्टानपर आसन लगा लिया और अपने मुखमें काष्ठकी बनी गुल्ली डालकर श्वास रोक लिया—कुम्भक प्राणायाम कर लिया। उसके बाद शंकरके कपालको फोड़कर ज्वालामयी वह गुल्ली (उनकी) जटाके बीचसे निकलकर पृथ्वीपर गिर पड़ी॥ ६–९॥
वीटया तु पतन्त्याऽद्रिर्दारितः क्ष्मासमोऽभवत्।<br>जातस्तीर्थवरः पुण्यः केदार इति विश्रुतः॥ १०उस गुल्लीके गिरनेसे पर्वत टूट-फूटकर पृथ्वीके समान (समतल) हो गया और वहाँ केदार नामका प्रसिद्ध तीर्थ बन गया।
ततो हरो वरं प्रादात् केदाराय वृषध्वजः।<br>पुण्यवृद्धिकरं ब्रह्मन् पापघ्नं मोक्षसाधनम्॥ ११ब्रह्मन्! उसके बाद वृषध्वज महादेवने केदारको पुण्यकी वृद्धि करनेवाले एवं पापके विनाश करनेवाले और मोक्षके साधनका वर दिया तथा
अध्याय ६० ]पुनः तेजःप्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थकी उपलब्धि२७७
श्लोकअर्थ
ये जलं तावके तीर्थे पीत्वा संयमिनो नराः।<br>मधुमांसनिवृत्ता ये ब्रह्मचारिव्रते स्थिताः॥ १२<br><br>षण्मासाद् धारयिष्यन्ति निवृत्ताः परपाकतः।<br>तेषां हृत्पङ्कजेष्वेव मल्लिंगं भविता ध्रुवम्॥ १३यह भी वर दिया कि जो संयमी मनुष्य परान्न-भोजनको त्यागकर तथा ब्रह्मचर्यव्रत धारणकर तुम्हारा जल पीते हुए यहाँ छः महीनेतक निवास करेंगे उनके हृदयकमलमें निश्चय ही मेरे लिङ्गकी सत्ता प्रत्यक्ष प्रकट होगी॥ १०—१३॥
न चास्य पापाभिरतिर्भविष्यति कदाचन।<br>पितॄणामक्षयं श्राद्धं भविष्यति न संशयः॥ १४<br><br>स्नानदानतपांसीह होमजप्यादिकाः क्रियाः।<br>भविष्यन्त्यक्षया नृणां मृतानामपुनर्भवः॥ १५<br><br>एतद् वरं हरात् तीर्थं प्राप्य पुष्णाति देवताः।<br>पुनाति पुंसां केदारस्त्रिनेत्रवचनं यथा॥ १६<br><br>केदाराय वरं दत्त्वा जगाम त्वरितो हरः।<br>स्नातुं भानुसुतां देवीं कालिन्दीं पापनाशिनीम्॥ १७उन्हें कभी पापमें अभिरुचि नहीं होगी तथा उनसे किया गया पितरोंका श्राद्ध अक्षय होगा—इसमें कोई सन्देह नहीं है। मनुष्योंद्वारा यहाँ की गयी स्नान, दान, तपस्या, होम एवं जप आदिकी क्रियाएँ अक्षय होंगी तथा इस स्थानपर मनुष्योंके मरनेपर उनका पुनर्जन्म नहीं होगा। महादेवसे इस प्रकारका वर पाकर वह केदारतीर्थ त्रिनेत्र महादेवके वचनके अनुकूल प्राणिवर्गको पवित्र एवं देवताओंका पोषण करने लगा। केदारतीर्थको वर देकर महादेव पापविनाशिनी रवितनया देवी कालिन्दी (यमुना)-में स्नान करनेके लिये शीघ्र चले गये॥ १४—१७॥
तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा जगामाथ सरस्वतीम्।<br>वृतां तीर्थशतैः पुण्यैः प्लक्षजां पापनाशिनीम्॥ १८<br><br>अवतीर्णस्ततः स्नातुं निमग्नश्च महाम्भसि।<br>द्रुपदां नाम गायत्रीं जजापान्तर्जले हरः॥ १९<br><br>निमग्ने शङ्करे देव्यां सरस्वत्यां कलिप्रिय।<br>साग्रः संवत्सरो जातो न चोन्मज्जत ईश्वरः॥ २०<br><br>एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मन् भुवनाः सप्त सार्णवाः।<br>चेलुः पेतुर्धरण्यां च नक्षत्रास्तारकैः सह॥ २१वहाँ स्नान करके पवित्र होकर भगवान् शंकर सैकड़ों पवित्र तीर्थोंसे घिरी (वृत) और प्लक्षवृक्षसे उत्पन्न पापनाशिनी सरस्वतीके निकट गये। उसके बाद वे स्नान करनेके लिये उसमें उतरे एवं अगाध जलमें भलीभाँति स्नान कर द्रुपदा गायत्रीका जप करने लगे। कलिप्रिय! देवी सरस्वतीके जलमें शङ्करको डुबकी लगाये हुए एक वर्षसे अधिक बीत गया; परंतु भगवान् ऊपर नहीं उठे। ब्रह्मन्! उस समय समुद्रोंसहित सातों भुवन काँपने लगे और ताराओंके साथ नक्षत्र (टूट-टूटकर) भूतलपर गिरने लगे॥ १८—२१॥
आसनेभ्यः प्रचलिता देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>स्वस्त्यस्तु लोकेभ्य इति जपन्तः परमर्षयः॥ २२<br><br>ततः क्षुब्धेषु लोकेषु देवा ब्रह्माणमागमन्।<br>दृष्ट्वोचुः किमिदं लोकाः क्षुब्धाः संशयमागताः॥ २३<br><br>तानाह पद्मसंभूतो नैतद् वेद्मि च कारणम्।<br>तदागच्छत वो युक्तं द्रष्टुं चक्रगदाधरम्॥ २४<br><br>पितामहेनैवमुक्ता देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>पितामहं पुरस्कृत्य मुरारिसदनं गताः॥ २५इन्द्र प्रमुख हैं जिनमें, ऐसे देवता अपने-अपने आसनोंसे उचक पड़े और महर्षिगण 'संसारका कल्याण हो'—इस भावनासे जप करने लगे। तत्पश्चात् जगत्के अशान्त हो जानेपर देवगण ब्रह्माके निकट आये और उन्हें देखकर उन लोगोंने पूछा—ब्रह्मन्! संसार अशान्त होकर क्यों सन्देहके झोंके खा रहा है? कमलयोनि ब्रह्माने उनसे कहा—मैं इसके कारणको नहीं जान पा रहा हूँ। तुमलोग जाओ, (इसके लिये) चक्र-गदाधारी विष्णुका दर्शन करना उचित है। पितामहके इस प्रकार कहनेपर इन्द्र आदि सभी देवता पितामहको आगे कर मुरारिलोक (विष्णुलोक)-में गये॥ २२—२५॥

६२- शिवके अभिषेक और तप्त-कृच्छ्र-व्रतका उपदेश, हरि-हरके संयोगसे विष्णुके हृदयमें शिवकी संस्थिति, शुक्रको संजीवनी विद्याकी शिक्षा, मङ्कणकी कथा और सप्त सारस्वततीर्थका माहात्म्य

२७८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६०

| नारद उवाच<br>कोऽसौ मुरारिर्देवर्षे देवो यक्षो नु किन्नरः।<br>दैत्यो राक्षसो वापि पार्थिवो वा तदुच्यताम् ॥ २६ | नारदने पूछा— देवर्षे! आप यह बतलायें कि ये मुरारि कौन हैं? ये देवता हैं या यक्ष, किन्नर हैं या दैत्य, राक्षस हैं या मनुष्य?॥ २६॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>योऽसौ रजः सत्त्वमयो गुणवांश्च तमोमयः।<br>निर्गुणः सर्वगो व्यापी मुरारिर्मधुसूदनः ॥ २७ | पुलस्त्यजीने कहा— देवताओ! जो ये मुरारि हैं वे मधु नामके राक्षसके विनाशकारी हैं; वे सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुणसे युक्त हैं; निर्गुण और सगुण हैं; सर्वगामी और सर्वव्यापी हैं॥ २७॥ | | नारद उवाच<br>योऽसौ मुर इति ख्यातः कस्य पुत्रः स गीयते।<br>कथं च निहतः संख्ये विष्णुना तद् वदस्व मे ॥ २८ | नारदने (पुलस्त्यजीसे) पूछा— आप मुझे यह बतलायें कि यह मुर-नामधारी दानव किसका पुत्र है और लड़ाईके मैदानमें भगवान् विष्णुने उसे किस प्रकार मारा?॥ २८॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां कथयिष्यामि मुरासुरनिबर्हणम्।<br>विचित्रमिदमाख्यानं पुण्यं पापप्रणाशनम् ॥ २९<br>कश्यपस्यौरसः पुत्रो मुरो नाम दनूद्भवः।<br>स ददर्श रणे शस्तान् दितिपुत्रान् सुरोत्तमैः ॥ ३०<br>ततः स मरणाद् भीतस्तप्त्वा वर्षगणान्बहून्।<br>आराधयामास विभुं ब्रह्माणमपराजितम् ॥ ३१<br>ततोऽस्य तुष्टो वरदः प्राह वत्स वरं वृणु।<br>स च वव्रे वरं दैत्यो वरमेनं पितामहात् ॥ ३२ | पुलस्त्यजी बोले— नारद! मुर असुरके विनाशकी कथा अद्भुत है; वह पापका विनाश करनेवाली और पवित्रकारिणी है; मैं उसे कहूँगा; तुम सुनो। दनुकी कोखसे कश्यपका औरस पुत्र मुर उत्पन्न हुआ। उसने श्रेष्ठ देवोंद्वारा संग्राममें दैत्योंको पराजित देखा। उसके बाद मृत्युसे भयभीत होकर उसने बहुत वर्षोंतक तपस्या करते हुए व्यापक अजेय ब्रह्माकी आराधना की। उसके बाद उसके ऊपर संतुष्ट होकर ब्रह्माने कहा—वत्स! वर माँगो। उस दैत्यने पितामहसे यह श्रेष्ठ वर माँगा—॥ २९—३२॥ | | यं यं करतलेनाहं स्पृशेयं समरे विभो।<br>स स मद्धस्तसंस्पृष्टस्त्वमरोऽपि मरत्वतः ॥ ३३<br>बाढमित्याह भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>ततोऽभ्यागान्महातेजा मुरः सुरगिरिं बली ॥ ३४<br>समेत्याह्वयते देवं यक्षं किन्नरमेव वा।<br>न कश्चिद् युयुधे तेन समं दैत्येन नारद ॥ ३५<br>ततोऽमरावतीं क्रुद्धः स गत्वा शक्रमाह्वयत्।<br>न चास्य सह योद्धुं वै मतिं चक्रे पुरंदरः ॥ ३६ | विभो! युद्धमें मैं जिसे हाथसे छू दूँ वह मेरे हाथसे छूते ही अमर (देवता) होनेपर भी मृत्युको प्राप्त हो जाय। लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने कहा—बहुत ठीक; ऐसा ही होगा। उसके बाद महातेजस्वी बलशाली मुर देवगिरिपर जा पहुँचा। [पुलस्त्यजी कहते हैं कि] नारदजी! वहाँ पहुँचकर उसने देवता, यक्ष, किन्नर आदिको युद्धके लिये ललकारा, किंतु किसीने भी उसके साथ युद्ध नहीं किया। उसके बाद क्रुद्ध होकर वह अमरावतीकी ओर चला गया और इन्द्रको संग्राम करनेके लिये ललकारने लगा। किंतु इन्द्रने भी उसके साथ युद्ध करनेका विचार नहीं किया॥ ३३—३६॥ | | ततः स करमुद्यम्य प्रविवेशामरावतीम्।<br>प्रविशन्तं न तं कश्चिन्निवारयितुमुत्सहेत् ॥ ३७<br>स गत्वा शक्रसदनं प्रोवाचेन्द्रं मुरस्तदा।<br>देहि युद्धं सहस्राक्ष नो चेत् स्वर्गं परित्यज ॥ ३८<br>इत्येवमुक्तो मुरुणा ब्रह्मन् हरिरयस्तदा।<br>स्वर्गराज्यं परित्यज्य भूचरः समजायत ॥ ३९ | उसके बाद हाथ उठाये हुए उसने अमरावतीमें प्रवेश किया। परंतु किसीने भी प्रवेश करते हुए उसको रोकनेका साहस नहीं किया। उसके बाद इन्द्रके भवनमें जाकर मुरने इन्द्रसे कहा—सहस्राक्ष! मुझसे संग्राम करो, अन्यथा स्वर्गको छोड़ दो। ब्रह्मन्! मुरके इस प्रकार कहनेपर इन्द्र (युद्ध न कर) स्वर्गका राज्य छोड़कर |

| अध्याय ६० ] | पुनः तेजःप्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थकी उपलब्धि | २७१ | | :--- | :--- |

| ततो गजेन्द्रकुलिशौ हृतौ शक्रस्य शत्रुणा ।<br>सकलत्रो महातेजाः सह देवैः सुतेन च ॥ ४०<br><br>कालिन्द्या दक्षिणे कूले निवेश्य स्वपुरं स्थितः ।<br>मुरुश्चापि महाभोगान् बुभुजे स्वर्गसंस्थितः ॥ ४१ | पृथ्वीपर विचरण करने लगे। उसके बाद (उस) शत्रुने इन्द्रके गजराज (ऐरावत) और वज्रको छीन लिया। महातेजस्वी इन्द्र अपनी पत्नी, पुत्र और देवताओंके साथ कालिन्दीके दक्षिण तटपर अपना नगर बसाकर रहने लगे और मुर स्वर्गमें रहते हुए महान् भोगोंका उपभोग करने लगा ॥ ३७-४१ ॥ | | दानवाश्चापरे रौद्रा मयतारपुरोगमाः ।<br>मुरमासाद्य मोदन्ते स्वर्गे सुकृतिनो यथा ॥ ४२<br><br>स कदाचिन्महीपृष्ठं समायातो महासुरः ।<br>एकाकी कुञ्जरारूढः सरयूं निम्नगां प्रति ॥ ४३<br><br>स सरय्वास्तटे वीरं राजानं सूर्यवंशजम् ।<br>ददृशे रघुनामानं दीक्षितं यज्ञकर्मणि ॥ ४४<br><br>तमुपेत्याब्रवीद् दैत्यो युद्धं मे दीयतामिति ।<br>नो चेन्निवर्ततां यज्ञो नेष्टव्या देवतास्त्वया ॥ ४५ | मय और तारक आदि दूसरे भयंकर दानव भी मुरके निकट पहुँचकर स्वर्गमें पुण्यात्माओंके समान आमोद-प्रमोद करने लगे। वह महान् असुर किसी समय पृथ्वीपर आया और अकेला ही हाथीपर चढ़कर सरयू नदीके तटपर उपस्थित हुआ। उसने सरयूके किनारे सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए एवं यज्ञकर्ममें दीक्षित रघु नामके राजाको देखा। उनके पास जाकर उस दैत्यने कहा— मुझसे संग्राम करो, नहीं तो यज्ञ करना बंद कर दो। तुम देवताओंकी पूजा नहीं कर सकते ॥ ४२-४५ ॥ | | तमुपेत्य महातेजा मित्रावरुणसंभवः ।<br>प्रोवाच बुद्धिमान् ब्रह्मन् वसिष्ठस्तपसां वरः ॥ ४६<br><br>किं ते जितैर्नरैर्दैत्य अजिताननुशासय ।<br>प्रहर्तुमिच्छसि यदि तं निवारय चान्तकम् ॥ ४७<br><br>स बली शासनं तुभ्यं न करोति महासुर ।<br>तस्मिञ्जिते हि विजितं सर्वं मन्यस्व भूत लम् ॥ ४८<br><br>स तद् वसिष्ठवचनं निशम्य दनुपुङ्गवः ।<br>जगाम धर्मराजानं विजेतुं दण्डपाणिनम् ॥ ४९ | ब्रह्मन् ! मित्रावरुणके पुत्र महातेजस्वी, बुद्धिमान् और तपस्वियोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठने उस दैत्यके पास जाकर कहा—दैत्य ! मनुष्योंको जीत लेनेसे तुम्हें क्या लाभ होगा ? जो नहीं जीते गये हैं उनको पराजित करो। यदि तुम (चढ़ाई कर) प्रहार करना चाहते हो तो उन यमराजका अवरोध करो। महासुर ! वे बलशाली हैं। तुम्हारा शासन नहीं मानते। उनको जीत लेनेपर समस्त भूतलको पराजित हुआ समझो। वसिष्ठका वह वचन सुनकर दानवश्रेष्ठ दण्ड धारण करनेवाले धर्मराजको जीतनेके लिये चल पड़ा ॥ ४६-४९ ॥ | | तमायान्तं यमः श्रुत्वा मत्वाऽवध्यं च संयुगे ।<br>स समारुह्य महिषं केशवान्तिकमागमत् ॥ ५०<br><br>समेत्य चाभिवाद्यैनं प्रोवाच मुरचेष्टितम् ।<br>स चाह गच्छ मामद्य प्रेषयस्व महासुरम् ॥ ५१<br><br>स वासुदेववचनं श्रुत्वाऽभ्यागात् त्वरान्वितः ।<br>एतस्मिन्नन्तरे दैत्यः सम्प्राप्तो नगरीं मुरः ॥ ५२<br><br>तमागतं यमः प्राह किं मुरो कर्तुमिच्छसि ।<br>वदस्व वचनं कर्त्ता त्वदीयं दानवेश्वर ॥ ५३ | उसे आता हुआ सुनकर तथा संग्राममें वह अवध्य है—ऐसा विचारकर वे यमराज महिषपर सवार होकर भगवान् केशवके पास चले गये। उनके पास जाकर प्रणाम करनेके पश्चात् (यमराजने) मुरके कृत्योंको बताया। उन्होंने कहा—तुम जाकर अभी उस महासुरको मेरे पास भेज दो। वासुदेवके वचनको सुनकर वे शीघ्र चले आये। इतनेमें मुर दैत्य उनकी नगरीमें आया। उसके आनेपर यमने कहा—हे मुर ! बतलाओ तुम क्या करना चाहते हो ? दानवेश्वर ! मैं तुम्हारी आज्ञाका पालन करूँगा ॥ ५०-५३ ॥ | | मुरुवाच<br>यम प्रजासंयमनान्निवृत्तिं कर्त्तुमर्हसि ।<br>नो चेत् तवाद्य छित्त्वाऽहं मूर्धानं पातये भुवि ॥ ५४ | मुरु या मुरने कहा— यम ! तुम प्रजाओंके ऊपर नियन्त्रण करना बंद कर दो, नहीं तो मैं तुम्हारा सिर |

२८०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६०

| तमाह धर्मराड् ब्रह्मन् यदि मां संयमाद् भवान्।<br>गोपायति मुरो सत्यं करिष्ये वचनं तव ॥ ५५<br><br>मुरस्तमाह भवतः कः संयन्ता वदस्व माम्।<br>अहमेनं पराजित्य वारयामि न संशयः॥ ५६<br><br>यमस्तं प्राह मां विष्णुर्देवश्चक्रगदाधरः।<br>श्वेतद्वीपनिवासी यः स मां संयमतेऽव्ययः ॥ ५७ | काटकर पृथ्वीपर फेंक दूँगा। ब्रह्मन्! धर्मराजने उससे कहा—यदि तुम मेरे ऊपर संयम करनेवालेसे मेरी रक्षा कर सको तो मैं सत्य कहता हूँ कि तुम्हारे वचनका पालन करूँगा। मुरने उनसे कहा—मुझे बतलाओ कि तुम्हारा संयन्ता (शासक) कौन है? मैं निस्सन्देह उसे पराजित कर रोक दूँगा। यमने उससे कहा—जो श्वेतद्वीपके निवासी, चक्र-गदा धारण करनेवाले, अविनाशी भगवान् विष्णु हैं, वे ही मुझे शासित करते हैं॥ ५४–५७॥ | | तमाह दैत्यशार्दूलः क्वासौ वसति दुर्जयः।<br>स्वयं तत्र गमिष्यामि तस्य संयमनोद्यतः॥ ५८<br><br>तमुवाच यमो गच्छ क्षीरोदं नाम सागरम्।<br>तत्रास्ते भगवान् विष्णुर्लोकनाथो जगन्मयः॥ ५९<br><br>मुरस्तद्वाक्यमाकर्ण्य प्राह गच्छामि केशवम्।<br>किं तु त्वया न तावद्धि संयम्या धर्म मानवाः॥ ६०<br><br>स प्राह गच्छ त्वं तावत् प्रवर्तिष्ये जयं प्रति।<br>संयन्तुर्वा यथा स्याद्वि ततो युद्धं समाचर॥ ६१<br><br>इत्येवमुक्त्वा वचनं दुग्धाब्धिमगमन्मुरः।<br>यत्रास्ते शेषपर्यङ्के चतुर्मूर्तिर्जनार्दनः॥ ६२ | दैत्योंमें श्रेष्ठ मुरने यमराजसे कहा—यम! वह कहाँ रहता है, जिसे कठिनतासे जीता जा सकता है? उसका संयमन करनेके लिये मैं तैयार होकर वहाँ स्वयं जाऊँगा। यमराजने उससे कहा—तुम क्षीरसागरमें जाओ। वहाँ लोकस्वामी जगन्मूर्ति भगवान् विष्णु रहते हैं। मुरने उनकी बात सुनकर कहा—धर्मराज! मैं केशवके पास जा रहा हूँ, परंतु तुम तबतक मनुष्योंका नियमन मत करना। उस (मुर)-ने कहा—तुम जाओ। तबतक मैं तुम्हारे नियामकको जैसे भी हो जीतनेका प्रयत्न करूँगा। उसके बाद तुम युद्ध करना। इतना कहकर मुर या मुर दैत्य क्षीरसागरमें जा पहुँचा। वहाँ (जाकर उसने देखा कि) चतुर्भुजाधारी जनार्दन अनन्त नागकी शय्यापर (पड़े हुए) हैं॥ ५८–६२॥ | | नारद उवाच<br><br>चतुर्मूर्तिः कथं विष्णुरेक एव निगद्यते।<br>सर्वगत्वात् कथमपि अव्यक्तत्वाच्च तद्वद॥ ६३ | नारदजीने पूछा— आप (कृपया) यह बतलायें कि विष्णु एक होनेपर भी चतुर्मूर्ति क्यों कहे जाते हैं। क्या सर्वगत एवं अव्यक्त होनेके कारण तो नहीं कहा जाता? (आप) उसे कहें॥ ६३॥ | | पुलस्त्य उवाच<br><br>अव्यक्तः सर्वगोऽपीह एक एव महामुने।<br>चतुर्मूर्तिर्जगन्नाथो यथा ब्रह्मांस्तथा शृणु॥ ६४<br><br>अप्रतर्क्यमनिर्देश्यं शुक्लं शान्तं परं पदम्।<br>वासुदेवाख्यमव्यक्तं स्मृतं द्वादशपत्रकम्॥ ६५ | पुलस्त्यजी बोले— ब्रह्मन्! अव्यक्त एवं सर्वव्यापी होनेपर भी वे एक ही हैं। जिस कारणसे जगन्नाथ चतुर्मूर्ति कहे जाते हैं, उसे बताता हूँ, सुनो। वासुदेव नामक श्रेष्ठ पद (तर्क या अनुमानद्वारा अज्ञेय) एवं निर्देश किये जानेमें अशक्य, शुक्ल (शुद्ध), शान्तियुक्त, अव्यक्त (अप्रकट) एवं द्वादशपत्रक ('ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'—) द्वादशाक्षर मन्त्रवाला कहा गया है॥ ६४-६५॥ | | नारद उवाच<br><br>कथं शुक्लं कथं शान्तमप्रतर्क्यमनिन्दितम्।<br>कान्यस्य द्वादशैवोक्ता पत्रका तानि मे वद॥ ६६ | नारदजीने [पुनः] पूछा— किस प्रकार वे शुक्ल, शान्त, अप्रतर्क्य एवं अनिन्दित हैं? मुझे बतलाइये कि उनके कथित द्वादशपत्रक कौन हैं॥ ६६॥ | | पुलस्त्य उवाच<br><br>शृणुष्व गुह्यं परमं परमेष्ठिप्रभाषितम्।<br>श्रुतं सनत्कुमारेण तेनाख्यातं च तन्मम॥ ६७ | पुलस्त्यजी बोले— पितामह ब्रह्माने जिस परम गुह्य वचनको कहा है, उसे सुनिये। सनत्कुमारने उसे सुना था और उन्होंने मुझसे कहा था॥ ६७॥ |

अध्याय ६० ]पुनः तेजःप्राप्तिके लिये शिवकी तपश्चर्या, केदारतीर्थकी उपलब्धि२८१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नारद उवाच<br>कोऽयं सनत्कुमारोति यस्योक्तं ब्रह्मणा स्वयं।<br>तवापि तेन गदितं वद मामनुपूर्वशः॥ ६८नारदजीने [फिर] कहा— इस विषयमें स्वयं ब्रह्माजीने जिनसे कहा है, वे सनत्कुमार कौन हैं? और उन्होंने भी आपसे जो कहा है उसे क्रमशः मुझसे कहें॥ ६८॥
पुलस्त्य उवाच<br>धर्मस्य भार्याहिंसाख्या तस्यां पुत्रचतुष्टयम्।<br>संजातं मुनिशार्दूल योगशास्त्रविचारकम्॥ ६९<br>ज्येष्ठः सनत्कुमारोऽभूद् द्वितीयश्च सनातनः।<br>तृतीयः सनको नाम चतुर्थश्च सनन्दनः॥ ७०<br>सांख्यवेत्तारमपरं कपिलं वोढुमासुरिम्।<br>दृष्ट्वा पञ्चशिखं श्रेष्ठं योगयुक्तं तपोनिधिम्॥ ७१<br>ज्ञानयोगं न ते दद्युर्ज्यायांसोऽपि कनीयसाम्।<br>मानमुक्तं महायोगं कपिलादीनुपासतः॥ ७२<br>सनत्कुमारश्चाभ्येत्य ब्रह्माणं कमलोद्भवम्।<br>अपृच्छद् योगविज्ञानं तमुवाच प्रजापतिः॥ ७३पुलस्त्यजी बोले— धर्मकी पत्नी अहिंसा है। उससे चार पुत्र हुए। मुनिश्रेष्ठ! वे सभी योगशास्त्रके विचार करनेमें कुशल थे। उनमें सनत्कुमार ज्येष्ठ, सनातन द्वितीय, सनक तृतीय एवं चतुर्थ सनन्दन हुए। वे सभी सांख्यवेत्ता कपिल, वोढु, आसुरी एवं योगसे युक्त तपोनिधि श्रेष्ठ पञ्चशिख नामक (ऋषि)-को देखकर उनके पास गये। बड़े होनेपर भी उन लोगोंने अपनेसे छोटोंको ज्ञानयोगका उपदेश नहीं दिया। कपिल आदिकी उपासना करनेवालोंको महायोगका परिणाममात्र बतला दिया। सनत्कुमारने कमलोद्भव ब्रह्माके पास जाकर योग-विज्ञान पूछा। प्रजापतिने उनसे कहा॥ ६९—७३॥
ब्रह्मोवाच<br>कथयिष्यामि ते साध्य यदि पुत्रत्वमिच्छसि।<br>यस्य कस्य न वक्तव्यं तत्सत्यं नान्यथेति हि॥ ७४ब्रह्माने कहा— साध्य! यदि तुम पुत्र होना चाहो तो मैं तुमसे कहूँगा। उसे जिस-किसीसे नहीं कहना चाहिये; क्योंकि यह सत्य है, अन्यथा नहीं है॥ ७४॥
सनत्कुमार उवाच<br>पुत्र एवास्मि देवेश यतः शिष्योऽस्म्यहं विभो।<br>न विशेषोऽस्ति पुत्रस्य शिष्यस्य च पितामह॥ ७५सनत्कुमारने कहा— देवेश! मैं पुत्र ही हूँ; क्योंकि विभो! मैं शिष्य हूँ। पितामह! पुत्र और शिष्यमें कोई भेद नहीं होता॥ ७५॥
ब्रह्मोवाच<br>विशेषः शिष्यपुत्राभ्यां विद्यते धर्मनन्दन।<br>धर्मकर्मसमायोगे तथापि गदतः शृणु॥ ७६<br><br>पुन्नाम्नो नरकात् त्राति पुत्रस्तेनेह गीयते।<br>शेषपापहरः शिष्य इतीयं वैदिकी श्रुतिः॥ ७७ब्रह्माने कहा— धर्मनन्दन! शिष्य और पुत्रमें धर्म-कर्मके संयोगमें (जो) कुछ भेद होता है उसे बताता हूँ, मुझसे सुनो। यह वैदिकी श्रुति है—जो 'पुम्' नामक नरकसे उद्धार कर देता है उसे 'पुत्र' कहा जाता है और शेष पापोंका हरण करनेवाला होनेसे 'शिष्य' कहा जाता है (—यही दोनोंमें भेद है)॥ ७६-७७॥
सनत्कुमार उवाच<br>कोऽयं पुन्नामको देव नरकात् त्राति पुत्रकः।<br>कस्माच्छेषं ततः पापं हरेच्छिष्यश्च तद्वद॥ ७८सनत्कुमारने कहा (पूछा)— देव! वह 'पुम्' नामक नरक कौन है? जिस नरकसे पुत्र रक्षा करता है और शिष्य किससे अवशिष्ट पापका हरण करता है; आप कृपया इन्हें बतलाइये॥ ७८॥
ब्रह्मोवाच<br>एतत् पुराणं परमं महर्षे<br>योगाङ्गयुक्तं च सदैव यच्च।<br>तथैव चोग्रं भयहारि मानवं<br>वदामि ते साध्य निशामयैनम्॥ ७९ब्रह्माने कहा— महर्षे! मैं तुमको अत्यन्त प्राचीन,<br><br>योगाङ्गसे युक्त, उग्र भय दूर करनेवाली परम पवित्र<br><br>कथा सुनाता हूँ। हे साध्य! तुम इसे सुनो॥ ७९॥
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॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें साठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६०॥


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२८२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६१

इकसठवाँ अध्याय

पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र-शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन, सनत्कुमार-ब्रह्माका प्रसंग, चतुर्मूर्तिका वर्णन और मुरु-वध

ब्रह्मोवाचब्रह्माने कहा—
परदाराभिगमनं पापीयांसोपसेवनम्।<br>पारुष्यं सर्वभूतानां प्रथमं नरकं स्मृतम्॥ १<br><br>फलस्तेयं महापापं फलहीनं तथाऽटनम्।<br>छेदनं वृक्षजातीनां द्वितीयं नरकं स्मृतम्॥ २<br><br>वर्ज्यादानं तथा दुष्टमवध्यवधबन्धनम्।<br>विवादमर्थहेतूत्थं तृतीयं नरकं स्मृतम्॥ ३<br><br>भयदं सर्वसत्त्वानां भवभूतिविनाशनम्।<br>भ्रंशनं निजधर्माणां चतुर्थं नरकं स्मृतम्॥ ४परस्त्रीसे संगत होना, पापियोंके साथ रहना और सब प्राणियोंके प्रति (किसी भी प्राणीके साथ) कठोरताका व्यवहार करना पहला नरक कहा गया है। फलोंकी चोरी, (अच्छे) उद्देश्यसे रहित घूमना (आवारापन) एवं वृक्ष आदि वनस्पतियोंका काटना घोर पाप तथा दूसरा नरक कहा गया है। दोषयुक्त एवं वर्जित—ग्रहण न करने योग्य—वस्तुओंका लेना, जो वधके योग्य नहीं है उसे मारना अथवा बन्धनमें डालना (बन्दी बनाना) और अर्थ (धन—रुपये-पैसे)-के लिये किया जानेवाला विवाद (मुकदमा उठाना) तीसरा नरक होता है। सभी प्राणियोंको भय देना, संसारकी सार्वजनिक सम्पत्तिको नष्ट करना तथा अपने नियत धर्म-नियमोंसे विचलित होना चौथे प्रकारका नरक कहलाता है॥ १—४॥
मारणं मित्रकौटिल्यं मिथ्याऽभिशपनं च यत्।<br>मिष्टैकाशनमित्युक्तं पञ्चमं तु नृपाचनम्॥ ५<br><br>पत्रफलादिहरणं यमनं योगनाशनम्।<br>यानयुग्यस्य हरणं षष्ठमुक्तं नृपाचनम्॥ ६<br><br>राजभागहरं मूढं राजजायानिषेवणम्।<br>राज्ये त्वहितकारित्वं सप्तमं निरयं स्मृतम्॥ ७<br><br>लुब्धत्वं लोलुपत्वं च लब्धधर्मार्थनाशनम्।<br>लालासंकीर्णमेवोक्तमष्टमं नरकं स्मृतम्॥ ८पुरश्चरण आदि तान्त्रिक अभिचारोंसे किसीको मारना, मृत्यु-जैसा अपार कष्ट देना तथा मित्रके साथ छल-छद्म, झूठी शपथ और अकेले मधुर पदार्थ खाना पाँचवाँ नरक कहा जाता है। पत्र (पुष्प आदि) एवं फल चोराना, किसीको बाँध (बन्धुवा बनाये) रखना, किसीके प्राप्तव्यकी प्राप्तिमें विघ्न-बाधा डालकर उसे नष्ट कर देना, घोड़ा-गाड़ी आदि सवारीके जूए (आदि सामानों)-की चोरी कर लेना छठा पाप कहा गया है। भुलावेमें पड़कर राजाके अंशका चुरा लेना एवं मूर्खतावश साहस कर राजपत्नीका संसर्ग एवं राज्यका अमङ्गल (नुकसान) करना सातवाँ नरक कहा जाता है। किसी वस्तु या व्यक्तिपर लुभा जाना, लालच करना, पुरुषार्थसे प्राप्त धर्मयुक्त अर्थका विनाश करना और लारमिली वाणीको आठवाँ नरक कहते हैं॥ ५—८॥
विप्रोष्यां ब्रह्महरणं ब्राह्मणानां विनिन्दनम्।<br>विरोधं बन्धुभिश्चोक्तं नवमं नरपाचनम्॥ ९ब्राह्मणको देशसे निकाल देना, ब्राह्मणका धन चुराना, ब्राह्मणोंकी निन्दा करना तथा बन्धुओंसे विरोध

६३- अन्धकासुरका प्रसङ्ग, दण्डकाख्यानका कथन, दण्डकका अरजासे चित्राङ्गदाका वृत्तान्त-कथन

अध्याय ६१ ]पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र-शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन२८३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शिष्टाचारविनाशं च शिष्टद्वेषं शिशोर्वधम्।<br>शास्त्रस्तेयं धर्मनाशं दशमं परिकीर्तितम्॥ १०<br><br>षडङ्गनिधनं घोरं षाड्गुण्यप्रतिषेधनम्।<br>एकादशममेवोक्तं नरकं सद्भिरुत्तमम्॥ ११<br><br>सत्सु नित्यं सदा वैरमनाचारमसत्क्रिया।<br>संस्कारपरिहीनत्वमिदं द्वादशमं स्मृतम्॥ १२करना नवाँ नरक कहा जाता है। शिष्टाचारका नाश, शिष्टजनोंसे विरोध, नादान बालककी हत्या, शास्त्रग्रन्थोंकी चोरी तथा स्वधर्मका नाश करना दसवाँ नरक कहा जाता है। षडङ्गनिधन अर्थात् छः अङ्गोंवाली वेद-विद्याको नष्ट करना और षाड्गुण्य अर्थात् सन्धि-विग्रह, यान, आसन-द्वैधीभाव, समाश्रय (राजनीति-गुणों)-का प्रतिषेध ग्यारहवाँ घोर नरक कहा गया है। सज्जनोंसे सदा वैर-भाव, आचारसे रहित रहना, बुरे कार्यमें लगे रहना एवं संस्कार-विहीनताको बारहवाँ नरक कहा गया है॥ ९—१२॥
हानिर्धर्मार्थकामानापवर्गस्य हारणम्।<br>संभेदः संविदामेतत् त्रयोदशममुच्यते॥ १३<br><br>कृपणं धर्महीनं च यद् वर्ज्यं यच्च वह्निदम्।<br>चतुर्दशममेवोक्तं नरकं तद् विगर्हितम्॥ १४<br><br>अज्ञानं चाप्यसूयत्वमशौचमशुभावहम्।<br>स्मृतं तत् पञ्चदशममसत्यवचनानि च॥ १५<br><br>आलस्यं वै षोडशममाक्रोशं च विशेषतः।<br>सर्वस्य चाततायित्वमावासेष्वग्निदीपनम्॥ १६धर्म, अर्थ एवं सत्कामनाकी हानि, मोक्षका नाश एवं इनके समन्वयमें विरोध उत्पन्न करनेको तेरहवाँ नरक कहा जाता है। कृपण, धर्महीन, परित्याज्य एवं आग लगानेवालेको चौदहवाँ निन्दित नरक कहते हैं। विवेकहीनता, दूसरेके गुणमें दोष निकालना, अमङ्गल करना, अपवित्रता एवं असत्य वचन बोलनेको पंद्रहवाँ नरक कहते हैं। आलस्य करना, विशेष रूपसे क्रोध करना, सभीके प्रति आततायी बन जाना एवं घरमें आग लगाना सोलहवाँ नरक कहलाता है॥ १३—१६॥
इच्छा च परदारेषु नरकाय निगद्यते।<br>ईर्ष्याभावश्च सत्येषु उद्वृत्तं तु विगर्हितम्॥ १७<br><br>एतैस्तु पापैः पुरुषः पुन्नामाद्यैर्न संशयः।<br>संयुक्तः प्रीणयेद् देवं संतत्या जगतः पतिम्॥ १८<br><br>प्रीतः सृष्ट्या तु शुभया स पापाद् येन मुच्यते।<br>पुन्नामनरकं घोरं विनाशयति सर्वतः॥ १९<br><br>एतस्मात् कारणात् साध्य सुतः पुत्रेति गद्यते।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि शेषपापस्य लक्षणम्॥ २०परस्त्रीकी कामना, सत्यके प्रति ईर्ष्या रखना, निन्दित एवं उद्दण्ड व्यवहार करना नरक देनेवाला कहा गया है। इन पुन्नाम आदि पापोंसे युक्त पुरुष (भी) निस्संदेह 'पुत्र' के द्वारा जगत्पति जनार्दनको प्रसन्न कर सकता है। पापहारी सुसन्ततिसे प्रसन्न होकर भगवान् जनार्दन पुन्नामके घोर नरकको पूर्णतया नष्ट कर देते हैं। साध्य! इसीलिये सुतको 'पुत्र' कहा जाता है। अब इसके बाद मैं शेष पापोंका लक्षण बतलाता हूँ॥ १७—२०॥
ऋणं देवर्षिभूतानां मनुष्याणां विशेषतः।<br>पितॄणां च द्विजश्रेष्ठ सर्ववर्णेषु चैकता॥ २१<br><br>ओंकारादपि निर्वृत्तिः पापकार्यकृतश्च यः।<br>मत्स्यादश्च महापापमगम्यागमनं तथा॥ २२<br><br>घृतादिविक्रयं घोरं चण्डालादिपरिग्रहः।<br>स्वदोषाच्छादनं पापं परदोषप्रकाशनम्॥ २३<br><br>मत्सरित्वं वाग्दुष्टत्वं निष्ठुरत्वं तथा परम्।<br>टाकित्वं तालवादित्वं नाम्ना वाचाऽप्यधर्मजम्॥ २४द्विजश्रेष्ठ! देवऋण, ऋषिऋण, प्राणियोंके ग्रहण—विशेषतः मनुष्यों एवं पितरोंका ऋण, सभी वर्णोंको एक समझना, ॐकारके उच्चारणमें उपेक्षा-भाव रखना, पापकामोंका करना, मछली खाना तथा अगम्या स्त्रीसे संगत होना—ये महापाप हैं। घृत-तैल आदिका बेचना, चाण्डाल आदिसे दान लेना, अपना दोष छिपाना और दूसरेका दोष प्रकट करना—ये घोर पाप हैं। दूसरेका उत्कर्ष देखकर जलना, कड़वी बात बोलना, निर्दयपना, नाम कहनेसे भी अधर्मजनक टाकिता और तालवादिता,
२८४श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६१

| दारुणत्वमधार्मिक्यं नरकावहमुच्यते।<br>एतैश्च पापैः संयुक्तः प्रीणयेद् यदि शङ्करम्॥ २५<br><br>ज्ञानाधिकमशेषेण शेषपापं जयेत् ततः।<br>शारीरं वाचिकं यत् तु मानसं कायिकं तथा॥ २६<br><br>पितृमातृकृतं यच्च कृतं यच्चाश्रितैर्नरैः।<br>भ्रातृभिर्बान्धवैश्चापि तस्मिञ्जन्मनि धर्मज॥ २७<br><br>तत्सर्वं विलयं याति स धर्मः सुतशिष्ययोः।<br>विपरीते भवेत् साध्य विपरीतं पदक्रमः॥ २८<br><br>तस्मात् पुत्रश्च शिष्यश्च विधातव्यौ विपश्चिता।<br>एतदर्थमभिध्याय शिष्याच्छ्रेष्ठतरः सुतः।<br>शेषात् तारयते शिष्यः सर्वतोऽपि हि पुत्रकः॥ २९ | भयङ्करता तथा अधार्मिकताके कार्य नरकके कारण हैं। इन पापोंसे युक्त मनुष्य (भी) यदि परमज्ञानी शङ्करको (अपनी आराधनासे) संतुष्ट कर लेता है तो शेष पापोंको वह पूर्णरूपसे जीत लेता है। धर्मपुत्र! उस जन्ममें किये गये (अपने) सभी कायिक, वाचिक एवं मानसिक कर्म तथा माता-पिता एवं आश्रितजनों और भाइयों एवं बान्धवोंद्वारा किये गये कर्म भी विलीन हो जाते हैं। साध्य! सुत और शिष्यका यही धर्म है। इसके विपरीत होनेपर विपरीत गति प्राप्त होती है, अतएव विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि पुत्र और शिष्यकी (परम्परा) बनाये रखे। इसी अभिप्रायकी दृष्टिसे शिष्यकी अपेक्षा पुत्र अत्यन्त श्रेष्ठ होता है कि शिष्य केवल शेष पापोंसे मुक्त करता है और पुत्र सम्पूर्ण पापोंसे बचा लेता है॥ २१—२९॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>पितामहवचः श्रुत्वा साध्यः प्राह तपोधनः।<br>त्रिः सत्यं तव पुत्रोऽहं देव योगं वदस्व मे॥ ३०<br><br>तमुवाच महायोगी त्वन्मातापितरौ यदि।<br>दास्येते च ततः सूनुर्दायादो मेऽसि पुत्रक॥ ३१<br><br>सनत्कुमारः प्रोवाच दायादपरिकल्पना।<br>येयं हि भवता प्रोक्ता तां मे व्याख्यातुमर्हसि॥ ३२<br><br>तदुक्तं साध्यमुख्येन वाक्यं श्रुत्वा पितामहः।<br>प्राह प्रहस्य भगवाञ्शृणु वत्सेति नारद॥ ३३ | पुलस्त्यजी बोले—पितामहकी बात सुनकर साध्य तपोधन सनत्कुमारने कहा—देव! मैं तीन बार सत्यका उच्चारण करके कहता हूँ कि मैं आपका पुत्र हूँ। अतः मुझे आप योगका उपदेश दीजिये। तब महायोगी पितामहने उनसे कहा—पुत्र! तुम्हारे माता-पिता यदि तुमको मुझे दे दें तो तुम मेरे (स्वत्वप्राप्तिमें अधिकृत) ‘दायाद’ (भागीदार) पुत्र हो जाओगे। सनत्कुमारने कहा—भगवन्! आपने जो यह ‘दायाद’ शब्द कहा है उसका अर्थ क्या है? (कृपया) उसकी विवेचना कीजिये। नारदजी! भगवान् पितामह साध्य-प्रधान सनत्कुमारका वचन सुनकर हँसते हुए बोले—वत्स! सुनो॥ ३०—३३॥ | | ब्रह्मोवाच<br>औरसः क्षेत्रजश्चैव दत्तः कृत्रिम एव च।<br>गूढोत्पन्नोऽपविद्धश्च दायादा बान्धवास्तु षट्॥ ३४<br><br>अमीषु षट्सु पुत्रेषु ऋणपिण्डधनक्रियाः।<br>गोत्रसाम्यं कुले वृत्तिः प्रतिष्ठा शाश्वती तथा॥ ३५<br><br>कानीनश्च सहोढश्च क्रीतः पौनर्भवस्तथा।<br>स्वयंदत्तः पारशवः षडदायादबान्धवाः॥ ३६<br><br>अमीभिर्ऋणपिण्डादिकथा नैवेह विद्यते।<br>नामधारका एवेह न गोत्रकुलसंमताः॥ ३७ | ब्रह्माने कहा—औरस, क्षेत्रज, दत्त, कृत्रिम, गूढोत्पन्न और अपविद्ध—ये छः बान्धव दायाद अर्थात् (दायभागके अधिकारी) होते हैं। इन छः पुत्रोंसे ऋण, पिण्ड, धनकी क्रिया, गोत्रसाम्य, कुलवृत्ति और स्थिर प्रतिष्ठा रहती है। (इसके अतिरिक्त) कानीन, सहोढ, क्रीत, पौनर्भव, स्वयंदत्त और पारशव—ये छः दायाद-बान्धव कहे जाते हैं। इनके द्वारा ऋण एवं पिण्ड आदिका कार्य नहीं होता। ये केवल नामधारी होते हैं। ये गोत्र एवं कुलसे सम्मत नहीं होते॥ ३४—३७॥ |

अध्याय ६१ ]पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र-शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन२८५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत् तस्य वचनं श्रुत्वा ब्रह्मणः सनकाग्रजः।<br>उवाचैषां विशेषं मे ब्रह्मन् व्याख्यातुमर्हसि॥ ३८<br><br>ततोऽब्रवीत् सुरपतिर्विशेषं शृणु पुत्रक।<br>औरसो यः स्वयं जातः प्रतिबिम्बमिवात्मनः॥ ३९<br><br>क्लीबोन्मत्ते व्यसनिनि पत्त्यौ तस्याज्ञया तु या।<br>भार्या ह्यनातुरा पुत्रं जनयेत् क्षेत्रजस्तु सः॥ ४०<br><br>मातापितृभ्यां यो दत्तः स दत्तः परिगीयते।<br>मित्रपुत्रं मित्रदत्तं कृत्रिमं प्राहुरुत्तमाः॥ ४१सनत्कुमारने उनकी बात सुनकर (पुनः) कहा—ब्रह्मन्! आप इन सभीका विशेष लक्षण मुझे बतलाइये। उसके पश्चात् देवोंके स्वामी ब्रह्माने कहा—पुत्र! इन्हें मैं विशेषरूपसे बतलाता हूँ; सुनो—अपने द्वारा उत्पन्न किया गया पुत्र 'औरस' कहलाता है। यह अपना ही प्रतिबिम्ब होता है। पतिके नपुंसक, उन्मत्त (पागल) या व्यसनी होनेपर उसकी आज्ञासे अनातुरा (कामवासनासे रहित) पत्नी जो पुत्र उत्पन्न करती है, उसे 'क्षेत्रज' कहते हैं। माता-पिता यदि दूसरेको अपने पुत्रको सौंप दें तो वह 'दत्तक' (या गोद लिया हुआ) कहा जाता है। श्रेष्ठजन मित्रके पुत्र और मित्रद्वारा दिये गये पुत्रको 'कृत्रिम पुत्र' कहते हैं॥ ३८—४१॥
न ज्ञायते गृहे केन जातस्त्विति स गूढकः।<br>बाह्यतः स्वयमानीतः सोऽपविद्धः प्रकीर्तितः॥ ४२<br><br>कन्याजातस्तु कानीनः सगर्भोढः सहोढकः।<br>मूल्यैर्गृहीतः क्रीतः स्याद् द्विविधः स्यात्पुनर्भवः॥ ४३<br><br>दत्त्वैकस्य च या कन्या हृत्वाऽन्यस्य प्रदीयते।<br>तज्जातस्तनयो ज्ञेयो लोके पौनर्भवो मुने॥ ४४<br><br>दुर्भिक्षे व्यसने चापि येनात्मा विनिवेदितः।<br>स स्वयंदत्त इत्युक्तस्तथान्यः कारणान्तरैः॥ ४५वह पुत्र 'गूढ' होता है, जिसके विषयमें यह ज्ञान न हो कि गृहमें किसके द्वारा वह उत्पन्न हुआ है। बाहरसे स्वयं लाये हुए पुत्रको 'अपविद्ध' कहते हैं। कुमारी कन्याके गर्भसे उत्पन्न पुत्रका नाम 'कानीन' होता है। गर्भिणी कन्यासे विवाहके बाद उत्पन्न पुत्रको 'सहोढ' कहते हैं। मूल्य देकर खरीदा हुआ पुत्र 'क्रीत' पुत्र कहलाता है। 'पुनर्भव' पुत्र दो प्रकारका होता है। एक कन्याको एक पतिके हाथमें देकर पुनः उससे छीनकर दूसरे पतिके हाथमें देनेपर जो पुत्र उत्पन्न होता है उसे 'पौनर्भव' पुत्र कहते हैं। दुर्भिक्ष, व्यसन या अन्य किसी कारणसे जो स्वयंको (किसी दूसरेके हाथमें) समर्पित कर देता है उसे 'स्वयंदत्त' पुत्र कहते हैं॥ ४२—४५॥
ब्राह्मणस्य सुतः शूद्रायां जायते यस्तु सुव्रत।<br>ऊढायां वाप्यनूढायां स पारशव उच्यते॥ ४६<br><br>एतस्मात् कारणात् पुत्र न स्वयं दातुमर्हसि।<br>स्वमात्मानं गच्छ शीघ्रं पितरौ समुपाव्हय॥ ४७<br><br>ततः स मातापितरौ सस्मार वचनाद् विभोः।<br>तावाजग्मतुरीशानं द्रष्टुं वै दम्पती मुने॥ ४८<br><br>धर्मोऽहिंसा च देवेशं प्रणिपत्य न्यषीदताम्।<br>उपविष्टौ सुखासीनौ साध्यो वचनमब्रवीत्॥ ४९सुव्रत! ब्याही गयी या क्वाँरी अविवाहित शूद्राके गर्भसे ब्राह्मणका जो पुत्र होता है उसका नाम 'पारशव' पुत्र है। पुत्र! इन कारणोंसे तुम स्वयं आत्मदान नहीं कर सकते। अतः शीघ्र जाकर अपने माता-पिताको बुला लाओ। [पुलस्त्यजी कहते हैं—] मुने! इसके बाद सनत्कुमारने विभु ब्रह्माके कहनेसे अपने माता-पिताका स्मरण किया। नारदमुनि! वे दम्पति पितामहका दर्शन करनेके लिये वहाँ आ गये। धर्म और अहिंसा—दोनों ब्रह्माको प्रणाम कर बैठ गये। उनके सुखसे बैठ जानेपर सनत्कुमारने यह वचन कहा॥ ४६—४९॥

| २८६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६१ | | :--- | :--- |

| सनत्कुमार उवाच<br>योगं जिगमिषुस्तात ब्रह्माणं समचूचुदम्।<br>स चोक्तवान् मां पुत्रार्थे तस्मात् त्वं दातुमर्हसि॥ ५०<br>तावेवमुक्तौ पुत्रेण योगाचार्यं पितामहम्।<br>उक्तवन्तौ प्रभोऽयं हि आवयोस्तनयस्तव॥ ५१<br>अद्यप्रभृत्ययं पुत्रस्तव ब्रह्मन् भविष्यति।<br>इत्युक्त्वा जग्मतुस्तूर्णं येनैवाभ्यागतौ यथा॥ ५२<br>पितामहोऽपि तं पुत्रं साध्यं सद्विनयान्वितम्।<br>सनत्कुमारं प्रोवाच योगं द्वादशपत्रकम्॥ ५३ | सनत्कुमारने कहा—तात! मैंने योग जाननेके लिये पितामहसे प्रार्थना की थी। उन्होंने मुझसे अपना पुत्र होनेके लिये कहा था। अतः आप मुझे प्रदान कर दें। पुत्रके इस प्रकार कहनेपर उन दोनों योगाचार्योंने पितामहसे कहा—प्रभो! हम दोनोंका यह पुत्र आपका हो। ब्रह्मन्! आजसे यह पुत्र आपका होगा। इतना कहकर वे शीघ्र ही जिस मार्गसे आये थे उसीसे फिर चले गये। पितामहने भी उस विनयी पुत्र सनत्कुमारको द्वादशपत्रयोगका उपदेश किया (जो आगे वर्णित है—)॥ ५०-५३॥ | | शिखासंस्थं तु ओङ्कारं मेषोऽस्य शिरसि स्थितः।<br>मासो वैशाखनामा च प्रथमं पत्रकं स्मृतम्॥ ५४<br>नकारो मुखसंस्थो हि वृषस्तत्र प्रकीर्तितः।<br>ज्येष्ठमासश्च तत्पत्रं द्वितीयं परिकीर्तितम्॥ ५५<br>मोकारो भुजयोर्युग्मं मिथुनस्तत्र संस्थितः।<br>मासो आषाढनामा च तृतीयं पत्रकं स्मृतम्॥ ५६<br>भकारं नेत्रयुगलं तत्र कर्कटकः स्थितः।<br>मासः श्रावण इत्युक्तश्चतुर्थं पत्रकं स्मृतम्॥ ५७ | इन (भगवान् वासुदेव)-की शिखामें स्थित 'ओङ्कार', सिरपर स्थित मेष राशि और वैशाखमास—ये इनके प्रथम पत्रक हैं। मुखमें स्थित 'न' अक्षर और वहींपर विद्यमान वृषराशि तथा ज्येष्ठमास—ये उनके द्वितीय पत्रक कहे गये हैं। दोनों भुजाओंमें स्थित 'मो' अक्षर, मिथुनराशि एवं आषाढ़मास—ये उनके तृतीय पत्रक हैं। उनके नेत्रद्वयमें विद्यमान 'भ' अक्षर कर्कराशि और श्रावणमास—ये चतुर्थ पत्रक हैं॥ ५४-५७॥ | | गकारं हृदयं प्रोक्तं सिंहो वसति तत्र च।<br>मासो भाद्रस्तथा प्रोक्तः पञ्चमं पत्रकं स्मृतम्॥ ५८<br>वकारं कवचं विद्यात् कन्या तत्र प्रतिष्ठिता।<br>मासश्चाश्वयुजो नाम षष्ठं तत् पत्रकं स्मृतम्॥ ५९<br>तेकारमस्त्रग्रामं च तुलाराशिः कृताश्रयः।<br>मासश्च कार्तिको नाम सप्तमं पत्रकं स्मृतम्॥ ६०<br>वाकारं नाभिसंयुक्तं स्थितस्तत्र तु वृश्चिकः।<br>मासो मार्गशिरो नाम त्वष्टमं पत्रकं स्मृतम्॥ ६१ | (उनके) हृदयके रूपमें विद्यमान 'ग'अक्षर, सिंहराशि और भाद्रपदमास—ये पञ्चम पत्रक हैं। (उनके) कवचके रूपमें विद्यमान 'व'अक्षर, कन्याराशि और आश्विनमास—ये षष्ठ पत्रक हैं। (उनके) अस्त्र-समूहके रूपमें विद्यमान 'ते'अक्षर, तुलाराशि और कार्तिकमास—ये सप्तम पत्रक हैं। मुने! (उनके) नाभिरूपसे विद्यमान 'वा'अक्षर वृश्चिकराशि और मार्गशीर्षमास—ये अष्टम पत्रक हैं॥ ५८-६१॥ | | सुकारं जघनं प्रोक्तं तत्रस्थश्च धनुर्धरः।<br>पौषेति गदितो मासो नवमं परिकीर्तितम्॥ ६२<br>देकारश्चोरुयुगलं मकरोऽप्यत्र संस्थितः।<br>माघो निगदितो मासः पत्रकं दशमं स्मृतम्॥ ६३<br>वाकारो जानुयुग्मं च कुम्भस्तत्रादिसंस्थितः।<br>पत्रकं फाल्गुनं प्रोक्तं तदेकादशमुत्तमम्॥ ६४<br>पादौ यकारो मीनोऽपि स चैत्रे वसते मुने।<br>इदं द्वादशमं प्रोक्तं पत्रं वै केशवस्य हि॥ ६५ | (उनके) जघनरूपमें विद्यमान 'सु'अक्षर, धनुराशि और पौषमास—ये नवम पत्रक हैं। (उनके) ऊरु-युगलरूपमें विद्यमान 'दे'अक्षर, मकरराशि और माघमास—ये दशम पत्रक हैं। (उनके) दोनों घुटनोंके रूपमें विद्यमान 'वा'अक्षर, कुम्भराशि और फाल्गुनमास—ये एकादश पत्रक हैं। (उनके) चरणद्वयरूपमें विद्यमान 'य'अक्षर, मीनराशि और चैत्रमास—ये द्वादश पत्रक हैं। ये ही केशवके द्वादश पत्र हैं॥ ६२-६५॥ | | द्वादशारं तथा चक्रं षण्णाभि द्वियुतं तथा।<br>त्रिव्यूहमेकमूर्तिश्च तथोक्तः परमेश्वरः॥ ६६ | उनका चक्र बारह अरों, बारह नाभियों और तीन व्यूहोंसे युक्त है। इस प्रकारकी उन परमेश्वरकी एक |

अध्याय ६१ ] पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र-शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन २८७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एतत् तवोक्तं देवस्य रूपं द्वादशपत्रकम्।<br>यस्मिञ्ज्ञाते मुनिश्रेष्ठ न भूयो मरणं भवेत्॥ ६७<br><br>द्वितीयमुक्तं सत्त्वाढ्यं चतुर्वर्णं चतुर्मुखम्।<br>चतुर्बाहुमुदाराङ्गं श्रीवत्सधरमव्ययम्॥ ६८<br><br>तृतीयस्तामसो नाम शेषमूर्तिः सहस्रपात्।<br>सहस्रवदनः श्रीमान् प्रजाप्रलयकारकः॥ ६९मूर्ति है। मुनिश्रेष्ठ! मैंने तुमसे भगवान्‌के इस द्वादश-पत्रक (‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’—इस) स्वरूपका वर्णन किया, जिसके जाननेसे पुनः (जन्म-) मरण नहीं होता। उनका द्वितीय सत्त्वमय, श्रीवत्सधारी, अविनाशीस्वरूप चतुर्वर्ण, चतुर्मुख, चतुर्बाहु एवं उदार अङ्गोंसे युक्त है। हजारों पैरों एवं हजारों मुखोंसे सम्पन्न श्रीसंयुक्त तमोगुणमयी उनकी तृतीय शेषमूर्ति प्रजाओंका प्रलय करती है॥ ६६—६९॥
चतुर्थो राजसो नाम रक्तवर्णश्चतुर्मुखः।<br>द्विभुजो धारयन् मालां सृष्टिकृच्चादिपूरुषः॥ ७०<br><br>अव्यक्तात् सम्भवन्त्येते त्रयो व्यक्ता महामुने।<br>अतो मरीचिप्रमुखास्तथान्येऽपि सहस्रशः॥ ७१<br><br>एतत् तवोक्तं मुनिवर्य रूपं<br>विभोः पुराणं मतिपुष्टिवर्धनम्।<br>चतुर्भुजं तं स मुरुर्दुरात्मा<br>कृतान्तवाक्यात् पुनराससाद॥ ७२<br><br>तमागतं प्राह मुने मधुघ्नः<br>प्राप्तोऽसि केनासुर कारणेन।<br>स प्राह योद्धुं सह वै त्वयाद्य<br>तं प्राह भूयः सुरशत्रुहन्ता॥ ७३उनका चतुर्थ रूप राजस है। वह रक्तवर्ण, चार मुख एवं दो भुजाओंवाला एवं माला धारण किये हुए है। यही सृष्टि करनेवाला आदिपुरुष रूप है। महामुने! ये तीन व्यक्त मूर्तियाँ अव्यक्त (अदृश्य तत्त्व)-से उत्पन्न होती हैं। इनसे ही मरीचि आदि ऋषि तथा अन्यान्य हजारों पुरुष उत्पन्न हुए हैं। मुनिवर! तुम्हारे सामने मैंने विष्णुके अत्यन्त प्राचीन और मति-पुष्टिवर्द्धक रूपका वर्णन किया है। [अब आगेकी कथा सुनिये—] दुरात्मा मुरु यमराजके कहनेसे पुनः उन चतुर्भुज (विष्णु)-के पास गया। मुने! मधुसूदनने आये हुए उससे पूछा—असुर! तुम किसलिये आये हो? उसने कहा—मैं तुम्हारे साथ आज युद्ध करने आया हूँ। असुरारि (विष्णु)-ने फिर उससे कहा॥ ७०—७३॥
यदीह मां योद्धुमुपागतोऽसि<br>तत् कम्पते ते हृदयं किमर्थम्।<br>ज्वरातुरस्येव मुहुर्मुहुर्वै<br>तन्नास्मि योत्स्ये सह कातरेण॥ ७४<br><br>इत्येवमुक्तो मधुसूदनेन<br>मुरुस्तदा स्वे हृदये स्वहस्तम्।<br>कथं क्व कस्येति मुहुस्तथोक्त्वा<br>निपातयामास विपन्नबुद्धिः॥ ७५<br><br>हरिश्च चक्रं मृदुलाघवेन<br>मुमोच तद्धृत्कमलस्य शत्रोः।<br>चिच्छेद देवास्तु गतव्यथाभवन्<br>देवं प्रशंसन्ति च पद्मनाभम्॥ ७६<br><br>एतत् तवोक्तं मुरदैत्यनाशनं<br>कृतं हि युक्त्या शितचक्रपाणिना।<br>अतः प्रसिद्धं समुपाजगाम<br>मुरारिरित्येव विभुर्नृसिंहः॥ ७७यदि तुम मेरे साथ युद्ध करनेके लिये आये हो तो ज्वरसे पीड़ितके सदृश तुम्हारा हृदय बारंबार क्यों काँप रहा है? मैं तो कातरके साथ युद्ध नहीं करूँगा। मधुसूदनके इस प्रकार कहनेपर ‘कैसे, कहाँ? किसका?’ इस प्रकार बार-बार कहते हुए बुद्धिहीन मुरुने अपने हृदयपर हाथ रखा। इसे देखकर हरिने आसानीसे (अत्यन्त लाघवतासे) चक्र निकाला और उस शत्रुके हृदय-कमलपर उसे छोड़ दिया (जिससे उसका हृदय विदीर्ण हो गया)। उसके बाद सभी देवता सन्तापरहित होकर भगवान् पद्मनाभ विष्णुकी स्तुति करने लगे। मैंने (ब्रह्माने) तुमसे तीक्ष्ण चक्र धारण करनेवाले विष्णुद्वारा (कौशलसे) किये गये दैत्यके विनाशका वर्णन किया। इसीसे विभु नृसिंह ‘मुरारि’ नामसे प्रसिद्ध हुए॥ ७४—७७॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इकसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६१॥

२८८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६२

बासठवाँ अध्याय

शिवके अभिषेक और तप्त-कृच्छ्र-व्रतका उपदेश, हरि-हरके संयोगसे विष्णुके हृदयमें शिवकी संस्थिति, शुक्रको संजीवनी विद्याकी शिक्षा, मङ्कणकी कथा और सप्त सारस्वततीर्थका माहात्म्य

पुलस्त्य उवाच
ततो मुरारिभवनं समभ्येत्य सुरास्ततः।<br>ऊचुर्देवं नमस्कृत्य जगत्संक्षुब्धिकारणम्॥ १<br><br>तच्छ्रुत्वा भगवान् प्राह गच्छामो हरमन्दिरम्।<br>स वेत्स्यति महाज्ञानी जगत्क्षुब्धं चराचरम्॥ २<br><br>तथोक्ता वासुदेवेन देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>जनार्दनं पुरस्कृत्य प्रजग्मुर्मन्दरं गिरिम्।<br>न तत्र देवं न वृषं न देवीं न च नन्दिनम्॥ ३<br><br>शून्यं गिरिमपश्यन्त अज्ञानतिमिरावृताः।<br>तान् मूढदृष्टीन् संप्रेक्ष्य देवान् विष्णुर्महाद्युतिः॥ ४<br><br>प्रोवाच किं न पश्यध्वं महेशं पुरतः स्थितम्।<br>तमूचुर्नैव देवेशं पश्यामो गिरिजापतिम्॥ ५**पुलस्त्यजी (पुनः) बोले—**उन देवोंने विष्णुभवनमें पहुँचकर उन्हें नमस्कार करनेके बाद जगत्‌के अशान्त होनेका कारण पूछा। भगवान् विष्णुने उनके प्रश्नको सुनकर कहा—हम सभी लोग शिवजीके पास चलें। वे महान् ज्ञानी हैं। इस चराचर जगत्‌के व्याकुल होनेका कारण वे जानते होंगे। वासुदेवके ऐसा कहनेपर इन्द्र आदि देवगण जनार्दन भगवान्‌को आगे कर मन्दरपर्वतपर गये। (किंतु) वहाँ उन्होंने न तो महादेवको देखा, न वृषको, न देवी पार्वती और न नन्दीको ही। अज्ञानके अन्धकारमें पड़े हुए उन लोगोंने पर्वतको देवशून्य देखा। (फिर तो) महातेजस्वी विष्णुने दर्शन प्राप्त न होनेके कारण चकपकाये हुए देवोंको देखकर कहा—क्या आपलोग सामने स्थित महादेवको नहीं देख रहे हैं? उन्होंने उत्तर दिया—हाँ, हमलोग गिरिजापति देवेशको नहीं देख रहे हैं॥ १–५॥
न विद्मः कारणं तच्च येन दृष्टिर्हता हि नः।<br>तानुवाच जगन्मूर्तिर्यूयं देवस्य सागसः॥ ६<br><br>पापिष्ठा गर्भहन्तारो मृडान्यः स्वार्थतत्पराः।<br>तेन ज्ञानविवेको वै हतो देवेन शूलिना॥ ७<br><br>येनाग्रतः स्थितमपि पश्यन्तोऽपि न पश्यथ।<br>तस्मात् कायविशुद्ध्यर्थं देवदृष्ट्यर्थमादरात्॥ ८<br><br>तप्तकृच्छ्रेण संशुद्धाः कुरुध्वं स्नानमीश्वरे।<br>क्षीरस्नाने प्रयुञ्जीत सार्द्धं कुम्भशतं सुराः॥ ९हमलोग उस कारणको नहीं जानते, जिससे हमारी देखनेकी शक्ति नष्ट हो गयी है। जगन्मूर्ति (विष्णु)-ने उनसे कहा—आपलोगोंनें देवताओंके साथ अपराध किया है। आपलोग स्वार्थी हैं। आपलोग मृडानीका गर्भ नष्ट करनेके कारण महापापसे ग्रस्त हो गये हैं, इसलिये शूलपाणि महादेवने आपलोगोंके सम्यक् अवबोधको और विचारशक्तिको अपहृत कर लिया है। इस कारण आप सब सामने स्थित (शङ्कर)-को देखकर भी नहीं देख रहे हैं। अतः सब लोग विश्वासके साथ शरीरकी पवित्रता और देवका दर्शन प्राप्त करनेके लिये तप्त-कृच्छ्र-व्रतद्वारा पावन होकर स्नान करें। और, हे देवताओ! महादेवको दूधसे स्नान करानेके लिये डेढ़ सौ घड़ोंका प्रयोग करें॥ ६–९॥
दधिस्नाने चतुःषष्टिर्द्वात्रिंशद्धविषोऽर्हणे।<br>पञ्चगव्यस्य शुद्धस्य कुम्भाः षोडश कीर्तिताः॥ १०उनके अभिषेकके लिये दहीके चौंसठ, घीके बत्तीस पञ्चगव्यके शुद्ध सोलह घड़ोंका विधान कहा गया है।

६४- चित्राङ्गदा-सन्दर्भ, विश्वकर्माका बन्दर होना, वेदवती आदिका उपाख्यान, जाबालिका बन्धन-मोचन

अध्याय ६२ ] शिवके अभिषेक और तप्त-कृच्छ्र-व्रतका उपदेश, शुक्रको संजीवनी विद्याकी शिक्षा २८९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मधुंनोऽष्टौ जलस्योक्ताः सर्वे ते द्विगुणाः सुराः।<br>ततो रोचनया देवमष्टोत्तरशतेन हि॥ ११<br><br>अनुलिम्पेत् कुङ्कुमेन चन्दनेन च भक्तितः।<br>बिल्वपत्रैः सकमलैः धत्तूरसुरचन्दनैः ॥ १२<br><br>मन्दारैः पारिजातैश्च अतिमुक्तैस्तथाऽर्चयेत् ।<br>अगुरुं सह कालेयं चन्दनेनापि धूपयेत्॥ १३<br><br>जप्तव्यं शतरुद्रीयं ऋग्वेदोक्तैः पदक्रमैः।<br>एवं कृते तु देवेशं पश्यध्वं नेतरेण च॥ १४<br><br>इत्युक्ता वासुदेवेन देवाः केशवमब्रुवन् ।<br>विधानं तप्तकृच्छ्रस्य कथ्यतां मधुसूदन।<br>यस्मिंश्चीर्णे कायशुद्धिर्भवते सार्वकालिकी ॥ १५देवताओ ! मधुका स्नान आठ घड़ोंसे तथा जलका स्नान इन सभीके दुगुने (२४०) घड़ोंसे कहा गया है। उसके बाद भक्तिपूर्वक देवको एक सौ आठ बार गोरोचन, कुङ्कुम और चन्दनका लेपन करनेका विधान है। फिर उन्हें भक्तिसे मलयचन्दन लगाना चाहिये। पूरे खिले हुए कमलोंके सहित बिल्वपत्र, धतूर एवं हरिचन्दनसे उनकी अर्चा होनी चाहिये। पूर्ण खिले हुए मन्दार और हरशृङ्गार चढ़ाकर पूजा करनी चाहिये। फिर अगुरु, केशर या काले चन्दन एवं चन्दनसे धूप दे। उसके बाद ऋग्वेदमें कथित 'पद' और 'क्रम' शैलियोंसे शतरुद्रीका जप करना चाहिये। ऐसा करनेसे आपलोग देवेश्वरका दर्शन कर सकेंगे; अन्य किसी उपायसे नहीं। वासुदेवके ऐसा कहनेपर देवताओंने केशवसे कहा—मधुसूदन ! आप हमें तप्त-कृच्छ्र (-व्रत)-का विधान (भी) बतलाइये, जिसके करनेसे सदाके लिये कायशुद्धि हो जाती है ॥ १०—१५ ॥
वासुदेव उवाच<br>त्र्यहमुष्णं पिबेदापः त्र्यहमुष्णं पयः पिबेत् ।<br>त्र्यहमुष्णं पिबेत्सर्पिर्वायुभक्षो दिनत्रयम्॥ १६<br>पला द्वादश तोयस्य पलावष्टौ पयसः सुराः।<br>षट्पलं सर्पिषः प्रोक्तं दिवसे दिवसे पिबेत् ॥ १७वासुदेवने कहा—देवताओ ! (तप्त-कृच्छ्र-व्रतका विधान इस प्रकार है—) तीन दिन बारह पल गरम जल पिये, तीन दिन आठ पल गरम दूध पिये, तीन दिन छः पल गरम घी पिये एवं तीन दिन केवल वायु पीकर रहे ॥ १६-१७ ॥
पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ते वचने सुराः कायविशुद्धये ।<br>तप्तकृच्छ्ररहस्यं वै चक्रुः शक्रपुरोगमाः ॥ १८<br>ततो व्रते सुराश्चीर्णे विमुक्ताः पापतोऽभवन्।<br>विमुक्तपापा देवेशं वासुदेवमथाब्रुवन् ॥ १९<br>क्वासौ वद जगन्नाथ शंभुस्तिष्ठति केशव।<br>यं क्षीराद्यभिषेकेण स्नापयामो विधानतः ॥ २०<br>अथोवाच सुरान्विष्णुरेष तिष्ठति शङ्करः ।<br>मद्देहे किं न पश्यध्वं योगश्रयं प्रतिष्ठितः ॥ २१पुलस्त्यजी बोले—इस प्रकार कहनेपर इन्द्र आदि देवताओंने शरीरकी शुद्धिके लिये तप्त-कृच्छ्र-व्रतका एकान्त अनुष्ठान किया। उसके बाद उस व्रतका पालन हो जानेपर देवता पापसे छूट गये। पापसे छूटकर देवताओंने देवोंके स्वामी वासुदेवसे कहा—जगन्नाथ ! केशव ! आप कृपया यह बतलाइये कि शम्भु किस स्थानपर अवस्थित हैं? जिन्हें हमलोग दूध आदिके अभिषेकसे विधिपूर्वक स्नान करायें। उसके बाद विष्णुने देवताओंसे कहा—देवताओ ! मेरे शरीरमें ये शङ्कर संयुक्त होकर स्थित हैं। क्या आपलोग नहीं देख रहे हैं? ॥ १८—२१ ॥
तमूचुर्नैव पश्यामस्त्वत्तो वै त्रिपुरान्तकम् ।<br>सत्यं वद सुरेशान महेशानः क्व तिष्ठति ॥ २२<br>ततोऽव्ययात्मा स हरिः स्वहृत्पङ्कजशायिनम्।<br>दर्शयामास देवानां मुरारिर्लिङ्गमैश्र्वरम्॥ २३<br>ततः सुराः क्रमेणैव क्षीरादिभिरनन्तरम् ।<br>स्त्रापयाञ्चक्रिरे लिङ्गं शाश्वतं ध्रुवमव्ययम् ॥ २४उन लोगोंने विष्णुसे कहा कि हमलोग तो आपमें त्रिपुरनाशक शङ्करको नहीं देख रहे हैं। सुरेशान ! आप सच बतलाइये कि महेश किस स्थानपर स्थित हैं। उसके बाद अव्ययात्मा मुरारि विष्णुने देवताओंको अपने हृदयकमलमें विश्राम करनेवाले शङ्करके लिङ्गका दर्शन करा दिया। उसके बाद देवताओंने क्रमशः दूध आदिसे उस नित्य, स्थिर एवं अक्षय लिङ्गको स्नान कराया।
२९०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६२
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गोरोचनया त्वालिप्य चन्दनेन सुगन्धिना।<br>बिल्वपत्राम्बुजैर्देवं पूजयामासुरञ्जसा ॥ २५फिर उन लोगोंने गोरोचन और सुगन्धित चन्दनका लेपन कर बिल्वपत्रों और कमलोंसे भक्तिपूर्वक (यथाविधि उन) देवकी पूजा की॥ २२—२५॥
प्रधूप्यागुरुणा भक्त्या निवेद्य परमौषधीः।<br>जप्त्वाऽष्टशतनामानं प्रणामं चक्रिरे ततः ॥ २६<br>इत्येवं चिन्तयन्तश्च देवावेतौ हरीश्वरौ।<br>कथं योगत्वमापन्नौ सत्त्वान्धतमसोद्भवौ ॥ २७<br>सुराणां चिन्तितं ज्ञात्वा विश्वमूर्तिर्बभूविभुः।<br>सर्वलक्षणसंयुक्तः सर्वायुधधरोऽव्ययः ॥ २८<br>सार्द्धं त्रिनेत्रं कमलाइकुण्डलं<br>जटागुडाकेशखगर्भभव्ध्वजम् ।<br>समाधवं हारभुजङ्गवक्षसं<br>पीताजिनाच्छन्नकटिप्रदेशम् ॥ २९<br>चक्रासिहस्तं हलशार्ङ्गपाणिं<br>पिनाकशूलाजगवान्वितं च।<br>कपर्दखट्वाङ्गकपालघण्टा-<br>सशङ्खटङ्काररवं महर्षे ॥ ३०<br>दृष्ट्वैव देवा हरिशङ्करं तं<br>नमोऽस्तु ते सर्वगताव्ययेति।<br>प्रोक्त्वा प्रणामं कमलासनाद्या-<br>श्चकुर्मतिं चैकतरां नियुज्य ॥ ३१उसके बाद देवोंने प्रेमपूर्वक धूप-दानकर परमौषधियों (भङ्ग आदि)-को समर्पित किया। फिर (शङ्करके) एक सौ आठ नामोंका जप करनेके बाद उन्हें प्रणाम किया। सभी देवता यह विचारने लगे कि सत्त्वगुणकी प्रधानतासे विष्णु एवं तमोगुणकी अधिकतासे आविर्भूत शिवमें एकता किस प्रकार हुई? देवताओंके विचारको जानकर अविनाशी व्यापक भगवान् सभी (शुभ) लक्षणोंसे युक्त एवं सब प्रकारके आयुधोंको धारण करनेवाले विश्वमूर्ति हो गये। महर्षे! फिर तो देवताओंने एक ही शरीरमें कानमें सर्पके कुण्डल पहने, सिरपर आपसमें चिपके लंबे बालके जटाजूट बाँधे, गलेमें सर्पके हार लटकाये, हाथमें पिनाक, शूल, आजगव धनुष, खट्वाङ्ग धारण किये तथा घण्टासे युक्त वाघाम्बर धारण करनेवाले त्रिनेत्रधारी वृषभध्वज महादेव और साथ ही कमलके कुण्डलधारी, गरुड़ध्वज, हार और पीताम्बर पहने, हाथोंमें चक्र, असि, हल, शार्ङ्गधनुष, टंकार-सी ध्वनि करनेवाले शङ्खको लिये गुडाकेश विष्णुको देखा। उसके बाद 'सर्वव्यापी अविनाशी प्रभुको नमस्कार है'—इस प्रकार कहकर ब्रह्मा आदि देवताओंने उन हरि एवं शङ्करको एक रूप (अभिन्न) समझा॥ २६—३१॥
तानेकचित्तान् विज्ञाय देवान् देवपतिर्हरिः।<br>प्रगृह्याभ्यद्रवत्तूर्णं कुरुक्षेत्रं स्वमाश्रमम् ॥ ३२<br>ततोऽपश्यन्त देवेशं स्थाणुभूतं जले शुचिम्।<br>दृष्ट्वा नमः स्थाणवेति प्रोक्त्वा सर्वे ह्युपाविशन् ॥ ३३<br>ततोऽब्रवीत् सुरपतिरेहोहि दीयतां वरः।<br>क्षुब्धं जगज्जगन्नाथ उन्मज्जस्व प्रियातिथे ॥ ३४<br>ततस्तां मधुरां वाणीं शुश्राव वृषभध्वजः।<br>श्रुत्वोत्तस्थौ च वेगेन सर्वव्यापी निरञ्जनः ॥ ३५<br>नमोऽस्तु सर्वदेवेभ्यः प्रोवाच प्रहसन् हरः।<br>स चागतः सुरैः सेन्द्रैः प्रणतौ विनयान्वितैः ॥ ३६देवोंके स्वामी भगवान् विष्णु उन देवताओंको समान हृदयवाला समझ उन्हें साथ लेकर शीघ्र अपने आश्रम कुरुक्षेत्रमें चले गये। उसके बाद उन लोगोंने जलके भीतर पवित्र स्थाणुभूत उन देवेश (महादेव)-को देखा। उन्हें देखकर 'स्थाणवे नमः' (स्थाणुको नमस्कार है)—यह कहकर वे सभी (वहीं) बैठ गये। उसके बाद इन्द्रने कहा—जगन्नाथ! अतिथप्रिय! संसार अशान्त हो उठा है। आप (कृपया) बाहर निकलकर यहाँ आइये, यहाँ आइये (और आकर) हमें वर दीजिये। उसके बाद वृषकेतु महादेवने वह मधुर वाणी सुनी। फिर उसे सुनकर वे सर्वव्यापी परमविशुद्ध शङ्कर वेगसे उठ खड़े हुए। उन्होंने हँसते हुए 'सभी देवताओंको नमस्कार है' ऐसा कहा। इन्द्र आदि देवताओंने जलसे ऊपर आये हुए उन शङ्करको और अधिक विनयभावसे प्रणाम किया॥ ३२—३६॥

अध्याय ६२ ] शिवके अभिषेक और तप्त-कृच्छ्र-व्रतका उपदेश, शुक्रको संजीवनी विद्याकी शिक्षा २९१

तमूचुर्देवताः सर्वास्त्यज्यतां शङ्कर द्रुतम्।<br>महाव्रतं त्रयो लोकाः क्षुब्धास्त्वत्तेजसावृताः॥ ३७<br><br>अथोवाच महादेवो मया त्यक्तो महाव्रतः।<br>ततः सुरा दिवं जग्मुर्हृष्टाः प्रयतमानसाः॥ ३८<br><br>ततोऽपि कम्पते पृथ्वी साब्धिद्वीपाचला मुने।<br>ततोऽभिचिन्तयद्रुद्रः किमर्थं क्षुभिता मही॥ ३९<br><br>ततः पर्यचरच्छूली कुरुक्षेत्रं समन्ततः।<br>ददर्शौघवतीतीरे उशनसं तपोनिधिम्॥ ४०<br><br>ततोऽब्रवीत्सुरपतिः किमर्थं तप्यते तपः।<br>जगत्क्षोभकरं विप्र तच्छीघ्रं कथ्यतां मम॥ ४१सभी देवताओेंने उनसे कहा कि शंकर! कृपया महाव्रतको शीघ्र छोड़ दीजिये। आपके तेजसे व्याप्त होकर तीनों लोक क्षुब्ध हो गये हैं। उसके बाद महादेवने कहा कि (लीजिये), मैंने महाव्रतका त्याग कर दिया। तत्पश्चात् देवता प्रसन्न हो गये और शान्तचित्त होकर स्वर्ग चले गये। मुने! तो भी समुद्र, द्वीप और पर्वतोंसहित पृथ्वी काँप रही थी। तब (स्वयं) रुद्रने सोचा कि (अब) पृथ्वी क्यों क्षुब्ध हो रही है? फिर त्रिशूल धारण करनेवाले (शङ्कर) कुरुक्षेत्रके चारों ओर विचरण करने लगे। उन्होंने ओघवतीके किनारे (तपस्या करते) तपोनिधि उशनाको देखा। उसके बाद देवाधिदेव शंकरने उनसे कहा—विप्र! आप जगत्को क्षुब्ध करनेवाला तप क्यों कर रहे हैं? उसे मुझे शीघ्र बतलाइये॥ ३७—४१॥
उशना उवाच<br>तवाराधनकामार्थं तप्यते हि महत्तपः।<br>संजीवनीं शुभां विद्यां ज्ञातुमिच्छे त्रिलोचन॥ ४२उशनाने कहा— आपकी आराधना (प्रसन्नता-प्राप्ति)-की इच्छासे मैं महान् तप कर रहा हूँ। त्रिनयन! मैं मङ्गलमयी संजीवनी विद्याको जानना चाहता हूँ॥ ४२॥
हर उवाच<br>तपसा परितुष्टोऽस्मि सुतप्तेन तपोधन।<br>तस्मात् संजीवनीं विद्यां भवाञ्ज्ञास्यति तत्त्वतः॥ ४३<br><br>वरं लब्ध्वा ततः शुक्रस्तपसः संन्यवर्त्तत।<br>तथापि चलते पृथ्वी साब्धिभूभृन्नगावृता॥ ४४<br><br>ततोऽगमन्महादेवः सप्तसारस्वतं शुचिः।<br>ददर्श नृत्यमानं च ऋषिं मङ्कणसंज्ञितम्॥ ४५<br><br>भावेन पोप्लूयति बालवत् स<br>भुजौ प्रसार्यैव ननर्त्त वेगात्।<br>तस्यैव वेगेन समाहता तु<br>चचाल भूभूमिधरैः सहैव॥ ४६महादेवने कहा— तपोधन! मैं भलीभाँति की गयी आपकी तपस्यासे प्रसन्न हूँ। इसलिये आप संजीवनी विद्याको यथार्थरूपमें जान जायेंगे। शुक्र (शुक्राचार्य) वर पाकर तपस्यासे विरत हो गये। फिर भी सागर, पर्वत, वृक्ष आदिके साथ सारी पृथ्वी काँप रही थी। उसके बाद परमपावन महादेव सप्तसारस्वतमें गये। वहाँ उन्होंने मङ्कण नामके महर्षिको नाचते हुए देखा। वे बालकके समान भाव-विभोर होकर दोनों हाथ फैलाकर वेगसे (उछल-उछलकर) नाच रहे थे। उसके (उछलनेके) वेगसे आहत हो पृथ्वी पर्वतोंसहित बड़े जोरसे काँप रही थी—हिल रही थी॥ ४३—४६॥
तं शङ्करोऽभ्येत्य करे निगृह्य<br>प्रोवाच वाक्यं प्रहसन् महर्षे।<br>किं भावितो नृत्यसि केन हेतुना<br>वदस्व मामेत्य किमत्र तुष्टिः॥ ४७<br><br>स ब्राह्मणः प्राह ममाद्य तुष्टि-<br>र्यैनेह जाता शृणु तद् द्विजेन्द्र।<br>बहून् गणान् वै मम तप्यतस्तपः<br>संवत्सरान् कायविशोषणार्थम्॥ ४८<br><br>ततोऽनुपश्यामि करात् क्षतोत्थं<br>निर्गच्छते शाकरसं ममेह।शंकरने उनके पास जाकर एवं उनका हाथ पकड़कर हँसते हुए कहा—महर्षे! किस भावनासे प्रभावित होकर एवं किस कारणसे आप नाच रहे हैं? आप (मेरे पास) आकर मुझसे यह बतलाइये कि आपको इस विषयमें क्यों संतुष्टि है? उस ब्राह्मणने कहा—द्विजेन्द्र! आज मुझे जिस कारणसे प्रसन्नता हो रही है, उसे सुनिये। शरीरको दुर्बल करनेके लिये तपस्या करते हुए मेरे अनेक वर्ष बीत गये हैं। अब मैं देखता हूँ कि मेरे हाथके घावसे शाकरस निकल रहा है।