भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

१११- राजाके अन्न-भक्षणका प्रायश्चित्त

अध्याय १२७] 'दीक्षासूत्र' का वर्णन २२१

'दीक्षासूत्र' का* वर्णन

सूतजी कहते हैं—इस प्रकार अनेक धर्मोंको सुनकर बहुतोंको मुक्ति सुलभ हो जाय, इस उद्देश्यसे पृथ्वीने भगवान् जनार्दनसे पूछा— भगवन् ! 'मायातीर्थ'की महिमा बड़ी अद्भुत है। इसके माहात्म्य-श्रवणसे मेरा अन्तःकरण शुद्ध हो गया। अब प्राणियोंके कल्याण तथा विश्वकी रक्षाके लिये आप कृपाकर मुझे अपनी दीक्षाविधिका उपदेश करें।

भगवान् वराह बोले—देवि! तुमने जो भागवती दीक्षाके विषयमें पूछा है, अब उसे बताता हूँ, सुनो। यह दीक्षा कर्ममय संसारसे मुक्त और सर्वसुख प्रदान करनेवाली है। इस दीक्षाका रहस्य योगव्रतमें स्थित रहनेवाले देवतातक भी नहीं जानते। इस मङ्गलमय धर्मका रहस्य केवल मैं ही जानता हूँ। देवि! उत्तम दीक्षा वह है, जिसके प्रभावसे मुझमें मन लगाकर मनुष्य सुखपूर्वक गर्भवासरूप संसार-समुद्रसे पार पा जाता है। इसके लिये साधकको चाहिये कि वह गुरुके समीप जाकर उनसे प्रार्थना करे कि 'गुरुदेव! मैं आपका शिष्य होना चाहता हूँ, आप मुझे दीक्षा देनेकी कृपा कीजिये।' फिर उनकी आज्ञासे दीक्षाके उपयोगी पदार्थों—धानका लावा, मधु, कुश, घृत, चन्दन, पुष्प, दीप-धूप-नैवेद्य, काला मृगचर्म, पलाशका दण्ड, कमण्डलु, कलश, वस्त्र, खड़ाऊँ, स्वच्छ यज्ञोपवीत, अर्घ्यपात्र, चरुस्थाली, दर्वी, तिल-यव, अनेक प्रकारके फल, दीक्षित पुरुषोंके खानेयोग्य अन्न, तथा पीनेयोग्य तीर्थोंके जल आदि वस्तुओंको लाकर एकत्र करे। साथ ही आवश्यक (उपयोगी) विविध प्रकारके बीज, रत्न, एवं काच आदि पदार्थोंको भी एकत्र कर ले।

तदनन्तर माङ्गलिक द्रव्य लगाकर स्नान करे और गुरुके चरणोंको पकड़कर उनसे आज्ञा लेकर एक बड़ी वेदीका निर्माण करे। यदि दीक्षा लेनेवाला व्यक्ति ब्राह्मण हो तो उसे चाहिये कि वह सोलह हाथ लम्बी-चौड़ी चौकोर वेदी बनाकर उसके ऊपर कलशकी स्थापना करे। धान्यके ऊपर नवीन एवं सुदृढ़ कलशकी विधिपूर्वक स्थापना कर वेदमन्त्रोंका उच्चारण करके उसमें जल भर दे और फिर पुष्पों तथा पल्लवोंसे उसे अलंकृत कर दे। तत्पश्चात् उसपर विधिपूर्वक तिलोंसे भरा हुआ एक पात्र स्थापित कर गुरुमें मेरी भावना करके पहलेसे एकत्र किये हुए द्रव्योंके द्वारा उनकी विधिपूर्वक पूजा करे। गुरुके प्रति निश्चितरूपसे धर्मको जानने तथा पालन करनेवाला शिष्य पुरुष उनकी सविधि पूजाकर पूर्वोक्त निर्दिष्ट द्रव्योंको उस वेदीपर स्थापित करे। सुन्दरि! फिर चारों भागोंमें जलसे भरे हुए चार कलशोंको आमके पल्लवोंसे पूर्णकर ब्राह्मणोंको दानार्थ संकल्प कर दे। इसके बाद वेदीको श्वेत सूतोंद्वारा सब ओरसे घेर दे और चारों पार्श्वभागोंमें चार पूर्णपात्र रखे। उस समय दीक्षा देनेवाले गुरुका कर्तव्य है कि उक्त कार्य सम्पन्न करके शिष्यको ऐसा मन्त्र दे, जो रुचि एवं वर्णादिके


* दीक्षाका परम श्रेष्ठ वर्णन 'कुलार्णवतन्त्र' उल्लास १४, 'शारदातिलक' पटल ४-५, 'शिवपुराण' वायवीयसंहिता, नारदपुराण अ० ९० तथा अग्निपुराण अध्याय ८१ से ९० में भी आया है। 'कल्याण' के अग्निपुराणाङ्क पृष्ठ १४३ से १५६ तककी टिप्पणियाँ पर्याप्त उपयोगी हैं।

११३- भगवान्‌की पूजा करते समय होनेवाले अपराधोंके प्रायश्चित्त

२२२संक्षिप्त श्रीवराहपुराण[ अध्याय १२७

न्यायके अनुसार हो अथवा जिससे उसकी हार्दिक तुष्टि हो। जिसके मनमें गुरुके प्रति पवित्र भक्ति-भावना हो तथा जिस दीक्षाकी विशेष अभिलाषा हो, वह भगवान् विष्णुके मन्दिरमें जाकर नियमका पालन करते हुए सभी कार्योंको सम्पन्न करे। फिर आचार्य पूर्वाभिमुख बैठकर दीक्षाकी इच्छा रखनेवाले सभी शिष्योंको निम्नलिखित उपदेश सुनाये।

जो व्यक्ति मेरा भक्त होकर भी किन्हीं अन्य भगवद्भक्त सत्पुरुषोंको देखकर उनके लिये आदरपूर्वक उठकर स्वागत-सत्कार आदि कर्म नहीं करता, वह मानो मेरी ही हिंसा करता है। जो कन्याका दान करके अपने कर्मसे उसका उपकार नहीं करता, उसने मानो अपने पूर्वके आठ पितरोंकी हत्या कर दी। जो निष्ठुर व्यक्ति अपनी साध्वी स्त्रीका भी, जो एक प्रिय मित्रका कार्य करती है, वध करता है—वह हिंसक व्यक्ति पुनः स्त्री-योनिमें जन्म पाता है और पूर्वोक्त कर्मके प्रभावसे उसे पुनः दाम्पत्यसुखकी प्राप्ति नहीं होती। ब्राह्मणका वध करनेवाला, कृतघ्न, गोघाती—ये पापी समझे जाते हैं तथा जो अन्य पापी कहे गये हैं, वे यदि शिष्य बनकर दीक्षा लेना चाहें तो उन्हें शिष्य न बनाकर उनका परित्याग ही कर देना चाहिये।

दीक्षित पुरुषको चाहिये कि वह यदि परमसिद्धि या मोक्ष पानेकी इच्छा रखता हो या सनातन धर्मका संग्रह करना चाहता हो तो बेल, गूलर तथा उपयोगी वृक्षोंको कभी न काटे। क्या खाना चाहिये, क्या नहीं खाना चाहिये, इसे आचार्यको भी अपने शिष्यको बता देना चाहिये। गूलरका ताजा फल भक्ष्य है, पर उसका बासी फल सर्वथा अभक्ष्य है। लहसुन, प्याज आदि वस्तुएँ जिनसे दुर्गन्ध निकलती हैं, वे सभी अभक्ष्य मानी जाती हैं।

दीक्षित व्यक्तिके लिये उचित है कि वह सभी प्रकारके मांस-मछलियोंका निश्चयपूर्वक सर्वथा त्याग कर दे। उसे दूसरोंकी निन्दा और प्राणीकी हिंसा भी कभी नहीं करनी चाहिये। वह किसीकी चुगली न करे और चोरी तो सर्वथा त्याग दे। दूरसे आये हुए अतिथिको आदर-सत्कारपूर्वक भोजनादि कराना चाहिये। वह गुरु, राजा तथा ब्राह्मणकी स्त्रीके प्रति मनमें कभी बुरी भावना न करे। सुवर्ण, रत्न और युवती स्त्री—इनकी ओर चित्त न लगाये। दूसरेके उत्तम भाग्य और अपनी विपत्तिको देखकर दुःख न करे, यह सनातन धर्म है।

वसुंधरे! दीक्षाके पहले मन्त्र लेनेवाले शिष्यके प्रति गुरु इन सब बातोंका उपदेश दें। सुन्दरि! साथ ही छुरा तथा जलसे भरा हुआ एक पात्र भी रखना चाहिये, फिर मन्त्रोच्चारणपूर्वक मेरा आवाहन एवं विधिके साथ मेरा पूजन करना चाहिये।

देवि! इस प्रकार अर्घ्य एवं पाद्य देनेके उपरान्त गुरु हाथमें अस्तूरा लेकर शुद्ध भावसे यह मन्त्र पढ़े। मन्त्रका भाव यह है—'शिष्य! विष्णुमय जलकी सहायतासे तुम्हारा क्षौरकर्म किया जा रहा है। इस अवसरपर वरुण देवता तुम्हारे सिरकी रक्षा करें। यह दीक्षा संसारसे उद्धार करनेवाली है।' फिर नाई क्षौरकर्म करे और यजमान उस कलशको उस नाईको ही दे दे। नाई ऐसी सावधानीसे (सिरका) क्षौरकर्म करे कि कहीं त्वचाके कटनेसे एक विन्दु भी रक्त न निकले। इस प्रकार सविधि कृत्य सम्पन्न कर लेना चाहिये। इसके उपरान्त यजमान भगवान्‌में श्रद्धा रखनेवाले पुरुषोंको प्रणाम करके अग्नि प्रज्वलित करे और फिर वह धानका लावा, काला तिल, घृत और मधु—इन वस्तुओंको मिलाकर उसमें सात आहुतियाँ प्रदान करे। फिर तिल और खीरसे बीस आहुतियाँ देनी

अध्याय १२८ ] क्षत्रियादि दीक्षा, गणान्तिकादीक्षा तथा दीक्षित पुरुषके कर्तव्य २२३


चाहिये। हवनके पश्चात् घुटनोंके बल जमीनपर झुककर इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये। मन्त्रका भाव यह है—'दोनों अश्विनीकुमार, दसों दिशाएँ, सूर्य और चन्द्रमा—ये सभी इस कार्यमें साक्षी हैं। सत्यके बलपर ही पृथ्वी तथा आकाश अवलम्बित हैं। सत्यके बलसे ही सूर्य गतिशील हैं तथा पवनदेव प्रवाहित होते हैं।' तदनन्तर मन्त्रपूर्वक विधिके साथ आचार्यकी पूजा कर उन्हें प्रसन्न करना चाहिये। गुरुको भगवान्‌में भक्ति रखनेवाला एवं दिव्य पुरुष होना चाहिये। फिर तीन बार गुरुकी प्रदक्षिणा कर उनके चरणोंको श्रद्धापूर्वक पकड़ ले और कहे—'गुरुदेव! मैं आपकी कृपा तथा इच्छाके अनुसार 'दीक्षा-ग्रहण-कर्म' में उद्यत हुआ हूँ। मुझसे कुछ अनुचित हुआ हो तो आप उसे क्षमा करनेकी कृपा करें। फिर स्वयं वह पूरब दिशाकी ओर मुख करके बैठ जाय। इस समय गुरुकी दृष्टि केवल शिष्यपर ही रहनी चाहिये। गुरुका कर्तव्य है कि हाथमें कमण्डलु एवं यज्ञोपवीत लेकर कहे—'शिष्य! भगवान् विष्णुकी कृपासे तुम्हें यह सुअवसर प्राप्त हुआ है। साथ ही सिद्धदीक्षा और कमण्डलु—ये वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं। कर्मके प्रभावसे दीक्षासम्बन्धी इस शुभ अवसरपर तुम अपने हाथोंमें कमण्डलु ले लो। इसके बाद गुरु उसे मन्त्रकी दीक्षा दें।

दीक्षाप्राप्त पुरुष गुरुके चरणोंपर मस्तक रखकर प्रणाम करे और उनकी प्रदक्षिणा कर इस प्रकार कहे—'गुरुदेव! मैंने अब आपकी शरण प्राप्त की है। आपके द्वारा मुझे 'वैष्णवी दीक्षा' सुलभ हो गयी, यह आपकी कृपाका फल है।' फिर गुरु उसे उठाकर शुद्ध जलसे भरा कमण्डलु तथा दिव्य तन्तुओंद्वारा निर्मित एक वस्त्र शिष्यको दें। उस समय गुरुको कहना चाहिये—'वत्स! तुम यह वस्त्र तथा पवित्र जल-भरा पवित्र कमण्डलु ग्रहण करो। पुनः शिष्य गुरुको चन्दन लगाकर हाथमें मधुपर्क लेकर कहे—'भगवन्! आप पार्थिव शरीरको शुद्ध करनेवाले इस मधुपर्कको ग्रहण कीजिये।'

तत्पश्चात् शिष्यको गुरुके चरणोंको पकड़कर उन्हें यत्नपूर्वक संतुष्ट करना चाहिये। फिर मनपर संयम रखते हुए अञ्जलिको मस्तकसे लगाकर गुरुप्रदत्त मन्त्रको हृदयमें धारण करे और कहे—'भगवान्‌में भक्ति रखनेवाले सभी पुरुष मेरी बात सुननेकी कृपा करें। गुरुदेवने मेरी सभी कामनाओंको पूर्ण कर दिया। मैं इनका सेवक और शिष्य हो गया और ये देवताके समान मेरे गुरु हो गये।'

वसुंधरे! आगम (वैष्णव) शास्त्रोंमें ब्राह्मणकी दीक्षाकी यही विधि कही गयी है। अब जो अन्य तीन वर्णोंके लिये दीक्षाकी विधि है, वह भी मुझसे सुनो। [अध्याय १२७]


क्षत्रियादि दीक्षा एवं गणान्तिकादीक्षाकी विधि तथा दीक्षित पुरुषके कर्तव्य

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! मैंने ब्राह्मण-दीक्षाके समय जिन वस्तुओंके संग्रहकी बात कही है, क्षत्रियको भी उन सबको एकत्र करना चाहिये। उसे केवल एक कृष्णसार मृगका चर्म नहीं लाना चाहिये। इसी प्रकार उसे पलाशके स्थानपर पीपल-वृक्षका दण्ड ग्रहण करना चाहिये और काले मृगके चर्मकी जगह काले बकरेका चर्म लेना चाहिये। उसकी दीक्षावेदी भी सोलह हाथकी जगह बारह हाथके प्रमाणकी हो। उसको गोबरसे लीप दे।

तदनन्तर गुरुके पैरोंको पकड़कर वह कहे—'विष्णो! मैंने सम्पूर्ण शस्त्रों एवं क्षत्रियके क्रूर कर्मोंका परित्याग कर दिया है और मैं अब आप विष्णुस्वरूप गुरुदेवकी शरणमें आ गया हूँ। आप जन्म-मरणरूपी संसार-सागरसे मेरा उद्धार कीजिये। इस प्रकार गुरुसे प्रार्थना कर उनमें मेरी भावना

२२४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १२८

करते हुए उनके दोनों चरणोंको पकड़कर कहे— 'देवदेव वराह! अब मैं शस्त्रका स्पर्श करना नहीं चाहता और न अब मैं किसीकी निन्दा ही करूँगा। आपने वराहरूप धारण कर संसार-सागरसे मुक्त होनेके लिये जिन कर्मोंको करनेका निर्देश किया है, अब मैं वही करनेके लिये तत्पर हूँ। तत्पश्चात् पूर्वनिर्दिष्ट विधिके अनुसार ही अनेक प्रकारके चन्दन, धूप एवं पत्र आदि उपकरणोंसे सबकी पूजा कर दीक्षा ग्रहण करे। दीक्षा लेनेके बाद, शुद्ध भगवद्भक्त पुरुषोंको भोजन कराना चाहिये। क्षत्रियकी दीक्षाके लिये यह निश्चित विधि है।

सुन्दरि! अब वैश्यकी दीक्षाकी विधि बतलाता हूँ, वैश्य (जाति)-का साधक जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त कर लेता है, उसे सुनो। वह भी पूर्ववत् सभी सामग्रियोंको एकत्र कर दस हाथकी चौकोर वेदी बनाये और पूर्वोक्त नियमानुसार उसे गायके गोबरसे लीप दे। फिर बकरेके चर्मसे अपने शरीरको वेष्टितकर दाहिने हाथमें गूलरका दातुन लेकर शुद्ध भगवद्भक्त पुरुषोंकी तीन बार प्रदक्षिणा करे। फिर गुरुके सम्मुख घुटनेके बल बैठकर कहे—'भगवन्! मैं वैश्य हूँ। मैं सम्पूर्ण सांसारिक प्रपञ्चोंका परित्याग कर आपकी शरणमें आया हूँ। आप प्रसन्न होकर मुझे संसार-बन्धनसे मुक्त करनेवाला मन्त्र देनेकी कृपा करें।' मेरा भक्तिरूप प्रसाद पानेकी इच्छावाला वह वैश्य इस प्रकार मेरी प्रार्थना कर गुरुके चरणोंका स्पर्श करे। साथ ही कहे—'गुरो! इस समय मैं आपकी कृपासे 'वैष्णवी दीक्षा' प्राप्त करनेके लिये प्रस्तुत हुआ हूँ।' इसके बाद भगवद्भक्त पुरुषोंके सामने उनमें देवताकी भावना करके अभिवादन करे। इसके पश्चात् जिसमें किसी प्रकारके अपराधका भागी न होना पड़े, ऐसा भोजन कराना उचित है।

पृथ्वि! अब द्विजेतरोंकी दीक्षाकी विधि बतलाता हूँ। जो यह दीक्षा लेता है, उसके फलस्वरूप सम्पूर्ण पापोंसे उसकी मुक्ति हो जाती है। दीक्षाकी इच्छा रखनेवालेको चाहिये कि सम्पूर्ण संसारके उपयोगी जिन द्रव्योंको मैं पहले कह चुका हूँ, वह भी उन्हीं सभीका सम्यक् प्रकारसे संग्रह करे और आठ हाथके प्रमाणकी चौकोर वेदी बनाकर उसे गोबरसे लीप दे। उसके लिये नीले बकरेका चर्म एवं बाँसका दण्ड तथा नीला वस्त्र ही उपयुक्त है। इस प्रकार इन वस्तुओंका संग्रह कर पूर्वोक्त विधिसे दीक्षाका कार्य सम्पन्न कर वह मेरी शरणमें आकर कहे—'भगवन्! मैंने अब अपने अपवित्र कर्म तथा अभक्ष्य-भक्षणका परित्याग कर दिया है।' फिर गुरुके चरणोंको पकड़कर कहे—'प्रभो! भगवान् श्रीहरिकी मुझपर कृपा हो गयी है। उनकी प्रसन्नतासे पहलेकी भाँति गोपनीय मन्त्र मुझे प्राप्त होनेका अवसर मिला है। आप मुझपर प्रसन्न हो जायँ।' पश्चात् चार बार गुरुकी प्रदक्षिणा कर उन्हें प्रणाम करे। फिर चन्दन एवं पुष्पसे गुरुकी पूजा कर भक्तोंको नियमके अनुसार भोजन कराये।'

वसुंधरे! दीक्षित हो जानेपर सभी वर्णोंको, जिस प्रकारके छत्र दिये जायें, यहाँ उसका स्पष्टीकरण किया जाता है। ब्राह्मणके लिये श्वेत, क्षत्रियके लिये लाल, वैश्यके लिये पीला तथा द्विजेतरके लिये नीला छत्र (छाता) देनेकी विधि है।

**पृथ्वी बोली—**केशव! सभी वर्णोंकी न्यायानुसार प्राप्त होनेवाली दीक्षा मैं सुन चुकी, अब मैं यह जानना चाहती हूँ कि आपके कर्ममें सदा संलग्न रहनेवाले दीक्षित पुरुषके कर्तव्य क्या हैं?

**भगवान् वराह बोले—**कल्याणि! तुम जो बात पूछती हो, उसका गूढ़तम सार तथा रहस्ययुक्त

११४- सेवापराध और प्रायश्चित्त-कर्मसूत्र

अध्याय १२८ ] क्षत्रियादि दीक्षा, गणान्तिकादीक्षा तथा दीक्षित पुरुषके कर्तव्य २२५


उत्तर तो यह है कि वस्तुतः दीक्षित व्यक्तिको निरन्तर एकमात्र मेरा ही चिन्तन करना चाहिये। महाभागे! 'गणान्तिकादीक्षा' का रहस्य अत्यन्त गोपनीय वस्तु है और इसे मेरा ही स्वरूप समझना चाहिये। विशालाक्षि! मेरी भक्तिमें लगे रहनेवाले दीक्षित पवित्रात्मा व्यक्तिको विधिपूर्वक मन्त्रके द्वारा इसे ग्रहण करना चाहिये। जो भगवद्भक्त होकर इस दृष्टिजनित या स्पर्शजनित* गणान्तिकादीक्षाको ग्रहण करता है, उसके लिये और कोई कर्तव्य कार्य शेष नहीं रह जाता। उसके लिये दीक्षा ही सर्वफलदायिका होती है। किंतु सुन्दरि! जो व्यक्ति केवल कानसे ही सुनकर मन्त्रोंकी दीक्षा ग्रहण करता है, उसे 'आसुरी-दीक्षा' कहते हैं। अतएव पवित्र मनवाले पुरुषको चाहिये कि मुझसे सम्बन्धित गुह्य दीक्षा ग्रहण करे। जो बुद्धिमान् पुरुष इस दीक्षाके सहारे मेरा ध्यान-स्मरण करता है, उसने मानो हजारों जन्मोंतक मेरा ध्यान-चिन्तन कर लिया—ऐसा समझना चाहिये।

वसुंधरे! इस 'गणान्तिकादीक्षा' के लिये कार्तिक, मार्गशीर्ष और वैशाख मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथियाँ प्रशस्त हैं। दीक्षाकी बात निश्चित हो जानेपर उसे तीन दिनोंतक शुद्ध आहारपर रहना चाहिये। फिर मेरे धर्मपर अटल विश्वास रखकर उचित समयमें दीक्षा लेनी चाहिये। सुशोभने! साधक पुरुष मेरे सामने अग्नि प्रज्वलित कर कुशका परिस्तरण करे। फिर भावनामयी 'दीक्षा' की स्थापना करे। तत्पश्चात् शिष्य देव-भावनासे परम पवित्र होकर दीक्षाके कार्यमें संलग्न हो जाय। उस समय 'ॐ नमो नारायणाय' कहकर यह मन्त्र पढ़े। मन्त्रका भाव है—'शिष्य! यह दीक्षा भगवान् नारायणके दाहिने अङ्गसे प्रकट हुई है। उनकी कृपासे ही पितामह ब्रह्माने इसे धारण किया है, वही दीक्षा तुम भी ग्रहण करो।' इसके बाद स्नानकर रेशमी वस्त्र धारणकर वह मेरे अङ्गोंका स्पर्श करे। फिर उसी समय कंघी और अञ्जन समर्पण कर मुझ भगवान् नारायणको मन्त्रसे स्नान कराये। मन्त्रका भाव यह है—'देवेश्वर! स्नान करनेके लिये यह जल सुवर्णके कलशमें रखकर आपकी सेवामें समर्पित है। मैं हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहा हूँ, आप इससे स्नान करनेकी कृपा करें। फिर 'ॐ नमो नारायणाय' का उच्चारण कर कहे—'माधव! आपकी कृपाके बलपर गुरुदेवकी दयासे यह मन्त्रमयी दीक्षा मुझे प्राप्त हुई है। यह दीक्षा मुझे इस योग्य बना दे कि कभी भी मेरा मन अधर्मकी ओर न जा सके।'

वसुंधरे! जो व्यक्ति इस विधिके अनुसार मेरे कर्ममें दीक्षित होता है, उसमें गुरुकी कृपासे महान् तेजका आधान हो जाता है। फलस्वरूप वह मेरे लोकको प्राप्त होता है। सुन्दरि! यह दीक्षा चुगलखोर, धूर्त एवं कुत्सित शिष्यको नहीं देनी चाहिये। इसे विधिपूर्वक ग्रहण कराकर योग्य एवं सज्जन शिष्यके हाथमें एक माला देनी चाहिये। देवि! १०८ दानोंकी जपमाला उत्तम, ५४ दानोंकी मध्यम तथा २७ दानोंकी गणान्तिका माला<sup></sup> कनिष्ठ कही गयी है। रुद्राक्षकी माला परमोत्तम


* 'कुलार्णव' (१४।५४, ५६) तथा 'श्रीविद्यार्णव' (१३।७।१—३)-में ये दीक्षाएँ इस प्रकार निर्दिष्ट हैं—

हस्ते शिवं परं ध्यात्वा जपन् मूलाङ्गमलिनीम्। गुरुः स्पृशेच्छिष्यतनुं स्पर्शदीक्षा भवेदियम् ॥
निमील्य नयने ध्यात्वा परतत्त्वं प्रसन्नधीः। सम्यक् पश्येद् गुरुः शिष्यं दृग्दीक्षा सा भवेत् प्रिये ॥

अर्थात् अपने हाथमें परम शिव एवं गुरुका ध्यान तथा 'मालिनीविद्या' का जप करते हुए जो आचार्य अपने शिष्यका स्पर्श करते हैं, वह 'स्पर्शदीक्षा' तथा नेत्रोंको बंदकर परतत्त्वका ध्यानकर शिष्यको भली प्रकार देखना 'दृग्दीक्षा' है। 'मालिनीविद्या'का वर्णन 'अग्निपुराण' के १४५वें अध्यायमें है।

<sup></sup> जैनधर्ममें इसका नाम 'गणितीया माला' है।

२२६संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १२१

है, पुत्रजीवककी माला मध्यम एवं कमलगट्टेकी माला कनिष्ठ समझनी चाहिये। देवि! यह दीक्षाप्रसङ्गका मैंने तुमसे वर्णन किया। यह ‘गणान्तिका’ नामकी प्रसिद्ध दीक्षा शुद्धस्वरूप, सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये हितकारी तथा मोक्ष चाहनेवालोंके लिये उत्तम साधन है। साधक जप करनेकी इस मालाको जूठे हाथ न छुए और न इसे स्त्रियोंके हाथमें ही दे, बायें हाथसे भी इसका स्पर्श न करे। इसे अन्तरिक्ष (दीवाल)-में किसी कीलके सहारे लटका देना चाहिये। जपके समय इसे किसीको दिखाना भी ठीक नहीं है। जपके पूर्व एवं उपरान्त इसकी भी पूजा-स्तुति करनी चाहिये।

देवि! यह मैंने तुमसे दीक्षाका गूढ़ रहस्य बतलाया। जो पुरुष मेरी उपासनामें परायण होकर इस विधिके अनुसार मेरे (भगवत्सम्बन्धी) इन कर्मोंको सम्पन्न करता है, वह अपने सात कुलोंको तार देता है। [अध्याय १२८]


पूजाविधि और ताम्रधातुकी महिमा

**पृथ्वी बोली—**भगवान्! अब आप मुझे यह बतानेकी कृपा करें कि आपके उपासक पुरुषको संध्या आदि कर्म तथा आपकी पूजा किस प्रकार करनी चाहिये?

**भगवान् वराह कहते हैं—**माधवि! संध्यामें संसारसे मुक्त करनेकी शक्ति है। अतः प्रातःकाल शौच-स्नानादिसे निवृत्त होकर विधिपूर्वक संध्याकी उपासना करनी चाहिये। पहले श्रद्धालु पुरुष हाथमें एक अञ्जलि जल लेकर कुछ क्षणतक मेरा ध्यान करे। फिर कहे—‘भगवान्! आदिकालमें आप ही व्यक्तरूपसे विराजमान थे। आपसे संसारकी सृष्टि हुई। ब्रह्मा, रुद्र तथा अन्य सभी देवता आपसे ही उत्पन्न होकर आपके ध्यानमें तत्पर हुए। वे संध्याके समयमें ध्यानद्वारा आपकी आराधना करते हैं। आप ही सातों दिन, पक्ष, मास, ऋतु आदि कालक्रमकी व्यवस्था करनेके लिये सूर्यरूपसे प्रकट हैं। अतः भगवान्! इस संध्याकालमें हम आपकी उपासना करते हैं। आपको हमारा नमस्कार है।’ उपासनाका यह विषय अत्यन्त गोपनीय, रहस्यमय तथा परम श्रेष्ठ है। जो इसका सदा पाठ करता है, वह पापसे लिप्त नहीं हो सकता। जिसने दीक्षा नहीं ली है एवं यज्ञोपवीत धारण नहीं किया है, उसे कभी भी इस मन्त्रको नहीं बताना चाहिये।

देवि! संध्याके बाद मेरी पूजाके लिये पहले ‘कर्माङ्गदीपक’ जलानेकी विधि है। इसके लिये साधक पुरुष यों प्रार्थना करे—‘भगवान्! मैं आपके धर्मोंका पालन करता हुआ यह उत्तम दीप अर्पण कर रहा हूँ, आप इसे कृपाकर स्वीकार कीजिये।’ फिर घुटनोंके बल बैठकर कहे—‘विष्णो! ‘ॐ’ आपका स्वरूप है। आप ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण, कृपामय एवं तेजस्वरूप हैं। आपको मेरा नमस्कार है। भगवान्! आपकी आज्ञासे समस्त देवता अग्निमें निवास करते हैं। अग्निमें जो दाहिका शक्ति है, वह आपका ही तेज है। मुझमें और मन्त्रमें भी आपका ही तेज काम कर रहा है। यह दीपक तथा सभी वैदिक-तान्त्रिक मन्त्र भी आपके ही स्वरूप हैं। आप ही समस्त कल्याणोंके स्रोत हैं। आप यह दीपक स्वीकार करें।’

तदनन्तर मेरा उपासक अर्घ्य, पाद्य, आचमन, स्नान, चन्दन, पुष्प आदिसे मेरा अर्चन कर, धूप दिखलाये। धूप उत्तम गन्धसे युक्त और मनको

अध्याय १२९ ] पूजाविधि और ताम्रधातुकी महिमा २२७

आकृष्ट करनेवाला हो। उसे हाथमें लेकर ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस मन्त्रका उच्चारण कर इस प्रकार कहे—'केशव! आपके अङ्ग तो स्वभावतः सुगन्धित हैं ही; फिर भी मैं इन्हें इस सुन्दर गन्धवाले धूपसे सुगन्धित करना चाहता हूँ। फलस्वरूप मेरे भी सभी अङ्गोंको गन्धयुक्त बनानेकी कृपा करें। प्रभो! आपको धूप अर्पण करना साधकके लिये सम्पूर्ण संसारसे मुक्त करनेका परम साधन है।'

इस प्रकार उत्तम दीपक हाथमें लेकर घुटनेके बल बैठ जाय और पूजाकर पुनः कहे—'विष्णो! आपके लिये नमस्कार है। आप परम तेजस्वी हैं। सम्पूर्ण देवता अग्निमें निवास करते हैं। और अग्नि आपके ही तेजसे प्रतिष्ठित है। तेज स्वयं आपका आत्मा है। भगवन्! प्रकाशमान यह दीप तेजोमय है। संसारसे मुक्त होनेके लिये मैं इसे आपको अर्पण करता हूँ। आप इसे स्वीकार करनेकी कृपा कीजिये। आप मूर्तिमान् होकर मेरे इस अर्पणको सफल बनाइये।' वसुंधरे! जो इस प्रकार मुझे दीपक अर्पण करता है, उसके समस्त पिता-पितामह आदि पितर तर जाते हैं।

भगवान् नारायणकी इस प्रकारकी बात सुनकर पृथ्वीका मन आश्चर्यसे भर गया। अतः उन्होंने पूछा—'भगवन्! मैं यह जानना चाहती हूँ कि आपके पूजाकी सामग्री कैसे पात्रोंमें रखी जानी चाहिये, जिससे आपको प्रसन्नता प्राप्त हो? भगवन्! इसे आप तत्त्वतः बतानेकी कृपा कीजिये।'

भगवान् वराह बोले—'देवि! मेरी पूजाके पात्र सोने, चाँदी और काँसे आदिके भी हो सकते हैं, किंतु उन सबको छोड़कर मुझे ताँबेका पात्र ही बहुत अच्छा लगता है।' भगवान् नारायणकी यह बात सुनकर धर्मकी इच्छा रखनेवाली पृथ्वी देवीने उन जगत्प्रभुके प्रति यह मधुर वचन कहा—'भगवन्! आपको ताँबेका पात्र ही अधिक रुचता है, इसका रहस्य क्या है, यह मुझे बतलानेकी कृपा करें।'

उस समय पृथ्वीका प्रश्न सुनकर अनादि, परम स्वतन्त्र भगवान् नारायण, जो विश्वमें सबसे बड़े देवता हैं, पृथ्वीसे इस प्रकार बोले—'माधवि! आजसे सात हजार युग पूर्व ताँबेकी उत्पत्ति हुई थी और वह मुझे देखनेमें अधिक प्रिय प्रतीत हुआ। कमलनयने! पूर्व समयमें 'गुडाकेश' नामका एक महान् असुर ताँबेका रूप बनाकर मेरी आराधना करने लगा। विशालाक्षि! उसने धर्मकी कामनासे चौदह हजार वर्षोंतक कठोर तप करते हुए मेरी आराधना की। उसके हार्दिक भाव एवं तीव्र तपसे मैं संतुष्ट हो गया, अतः ताँबेके समान चमकनेवाले उस दिव्य स्थानपर मैं गया, जहाँ ताँबेकी उत्पत्ति हुई थी। देवेश्वरि! उस आश्रमको देखकर मैंने उससे प्रसन्न होकर कुछ बातें कहीं। इतनेमें वह महान् असुर मुझे देखकर घुटनोंके बल बैठ गया और मेरी स्तुति करने लगा। फिर मेरी उपासनामें तत्पर रहनेवाले उस 'गुडाकेश' नामक असुरने मेरे चतुर्भुज रूपको देखा तो नम्रतापूर्वक हाथ जोड़ लिया और भूमिपर मस्तक झुकाकर मेरी प्रार्थनाके लिये उद्यत हो गया। उस असुरको देखकर मेरा अन्तःकरण प्रसन्न हो गया और मैंने उससे कहा—'गुडाकेश! तुम बड़े भाग्यशाली हो। कहो, मैं तुम्हारे लिये कौन-सा कार्य करूँ? सुव्रत! मेरी आराधना बड़ी कठिन वस्तु है, फिर भी तुम्हारी मन-क्रम-वचनोंद्वारा सम्पादित भक्तिसे मैं परम संतुष्ट हूँ। अनघ! अब तुम्हें जो रुचे, तुम वह वर माँग लो।'

वसुंधरे! मेरी इस प्रकारकी बात सुनकर गुडाकेशने हाथ जोड़कर शुद्ध हृदयसे कहा—'देव! यदि आप सचमुच मुझपर अन्तर्हृदय एवं मनसे प्रसन्न हैं तो मुझपर ऐसी कृपा करें कि हजारों जन्मोंतक मेरी आपमें दृढ़ भक्ति बनी रहे। केशव! साथ ही मेरी यह इच्छा है कि आपके हाथसे

२२८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १२९

छूटे हुए चक्रके द्वारा मेरी मृत्यु हो और इस प्रकार मेरे शरीरके गिरनेपर उससे जो कुछ भी वसा (चर्बी), मज्जा, मेदा और मांस आदि बिखरें, वे सब ताँबेके* रूपमें परिवर्तित हो जायँ तथा उसमें सबको पवित्र करनेकी शक्ति निहित हो। फिर मङ्गलमय धार्मिक कार्य करनेवाले पुरुष उस ताँबेसे आपके पात्रका निर्माण करायें। उस ताँबेके पात्रमें आपकी पूजनोपयोगी वस्तु रखकर साधक आपको निवेदित करे तथा उस अर्पित की हुई वस्तुसे आप पूर्ण प्रसन्न हों। भगवन्! यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे यही वर देनेकी कृपा करें।'

उस समय भगवान् नारायणने गुडाकेशसे कहा—'असुरराज! तुमने उग्र तपस्या करते समय जो कुछ भी सोचा है, वह सब वैसा ही होगा। जबतक मेरा बनाया हुआ संसार स्थित रहेगा, तबतक तुम ताम्रमय बनकर मुझमें स्थित रहोगे।' सुव्रते! उसी समयसे गुडाकेशका शरीर ताम्रमय बनकर जगत्में प्रतिष्ठित हुआ। इसीलिये ताँबेके पात्रमें रखकर जो वस्तु मुझ भगवान्‌को अर्पित की जाती है, उससे मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है। देवि! यही कारण है कि ताँबा मङ्गलस्वरूप, पवित्र एवं मुझे अत्यन्त प्रिय है। वसुंधरे! फिर मैंने उस असुरसे कहा कि देखो, मध्याह्नकालके सूर्यमें तुम्हें मेरे चक्रका दर्शन होगा। वैशाखमासके शुक्लपक्षकी द्वादशीके दिन मध्याह्नकालमें मेरा तेजोमय चक्र तुम्हारे शरीरका अन्त करेगा, जिससे तुम मेरे लोकको प्राप्त कर लोगे, इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है।

गुडाकेशसे यह कहकर मैं वहीं अन्तर्धान हो गया। उधर गुडाकेश भी मेरे चक्रद्वारा अपने वधकी प्रतीक्षा करते हुए तपस्यामें संलग्न रहा। उसके इसी प्रकार सोचते-सोचते वैशाखमासके शुक्लपक्षकी वह द्वादशी तिथि आ पहुँची। उस दिन उसने अपना धर्म निश्चय कर मेरी पूजा की और प्रार्थनामें संलग्न हो गया। फिर कहने लगा—'प्रभो! आप अग्निके समान अपने तेजोमय चक्रको छोड़िये, जिससे मेरे अङ्ग भलीभाँति छिन्न-भिन्न हो जायँ और मेरा आत्मा शीघ्र ही आपको प्राप्त कर ले।'

इस प्रकार वह गुडाकेश मेरे चक्रद्वारा विदीर्ण होकर मुझमें लीन हुआ और उसीके मांससे ताँबा उत्पन्न हुआ। उसका रक्त सुवर्ण हुआ और उसके शरीरकी हड्डियाँ चाँदी बनीं। उसकी अन्य धातु भी तैजस धातुओंके रूपमें परिवर्तित हो गयी और वे ही राँगा, सीसा, टीन, काँसा आदि बने तथा उसके मलसे अन्य प्राकृतिक खनिज—गंधक आदि द्रव्योंका प्रादुर्भाव हुआ। देवि! इसीलिये ताँबेके पात्रद्वारा मुझे चन्दन, अङ्गराग, जल, अर्घ्य, पाद्यादि अन्य वस्तुएँ अर्पण की जाती हैं। देवि! ताम्रके पात्रमें स्थित एक-एक पके चावलमें अनन्त फल भरा है। इससे श्रद्धालु पुरुषोंकी मेरी उपासनामें रुचि बढ़ती है। इस प्रकारसे उत्पन्न होनेके कारण ताम्र मुझे अधिक प्रिय है। दीक्षित पुरुष इस ताम्रपात्रसे ही पाद्य एवं अर्घ्य देते हैं। देवि! इस प्रकार मैंने दीक्षाकी विधि एवं ताँबेकी उत्पत्तिके प्रसङ्गका तत्त्वतः वर्णन किया। अब तुम दूसरी कौन-सी बात पूछना चाहती हो? वह बतलाओ।

[अध्याय १२९]


* ताँबेकी इस उत्पत्तिकी कथामें घृणाकी कोई बात नहीं है। भूमिमाता (मेदिनी)-की उत्पत्ति भी मधु-कैटभ दैत्यके मेदसे तथा सभी रत्नोंकी उत्पत्ति वलासुरकी अस्थि, वसा (चर्बी), मज्जा इत्यादिसे हुई है, यह कथा प्रायः गरुडादि सभी पुराणोंमें प्रसिद्ध है। 'द्रष्टव्य—गरुडपुराण अध्याय ६८—८०; पद्मपुराण भूमिखं० २३, उत्तर खं० ७; विष्णुधर्मोत्तरपुराण २। १५, अग्निपुराण अ० २४६ शुक्रनीति, 'बृहत्संहिता', 'शैव (शिवतत्त्व) रत्नाकर', 'युक्तिकल्पतरु', 'मानसोल्लास', (अभिलाषचिन्तामणि) आदि।

अध्याय १३१-१३२ ] दातुन न करने तथा मृतक एवं रजस्वलाके स्पर्शका प्रायश्चित्त २२९

राजाके अन्न-भक्षणका प्रायश्चित्त

पृथ्वी बोलीं— प्रभो! आपकी दीक्षाका माहात्म्य अत्यद्भुत है। महाभाग! इसे सुनकर मैं अत्यन्त निर्मल हो गयी। किंतु मेरे मनमें एक शङ्का रह गयी है। आपने इसके पूर्व बत्तीस प्रकारके अपराध कहे हैं। यदि अल्पबुद्धिवाले मनुष्यद्वारा इनमेंसे कोई अपराध बन जाता है तो उसकी शुद्धि किस प्रकार हो? माधव! आप मुझे इसे बतानेकी कृपा करें।

भगवान् वराह बोले— देवि! मेरी उपासनामें संलग्न रहनेवाले शुद्ध भागवत पुरुष यदि लोभ अथवा भयसे राजाका अन्न खाते हैं तो उन्हें दस हजार वर्षोंतक नरककी यातनाएँ सहनी पड़ती हैं।

भगवान्‌की यह बात सुनकर पृथिवीदेवी काँप उठीं। वे अत्यन्त दीन-मन होकर भगवान्‌से मधुर वचनोंमें फिर इस प्रकार कहने लगीं।

पृथ्वी बोलीं— भगवन्! राजाओंमें ऐसा कौन-सा दोष है, जिससे उनका अन्न खानेसे प्राणीको नरकमें जाना पड़ता है?

भगवान् वराह बोले— पृथ्वि! राजाका अन्न कभी खाने योग्य नहीं है। राजा यथासम्भव संसारमें यद्यपि सबसे समान भावसे ही व्यवहार करता है, फिर भी उससे दारुण राजस या तामस कर्म भी घटित हो जाते हैं, इसलिये पृथिवीदेवि! राजाका अन्न गर्हित—निन्द्य बतलाया गया है। अतएव जगत्‌में सम्यक् प्रकारसे धर्मका आचरण करनेवाले व्यक्तिको राजाका अन्न खाना उचित नहीं है। वसुंधरे! अब भक्तोंको जिस प्रकार राजाका अन्न खाना चाहिये, मैं उन-उन प्रक्रियाओंको बताता हूँ, उसे सुनो। पहले राजाको चाहिये कि वह शास्त्रीय विधिके अनुसार मन्दिर बनवाकर उसमें मेरी प्रतिष्ठा करे और फिर भक्त-भागवतोंको धन-धान्य-समृद्धि आदि प्रदानकर वैष्णवोंद्वारा मेरा नैवेद्य तैयार कराकर मुझे समर्पित करके भोजन करे-कराये। इस प्रकार राजाका अन्न खानेसे भागवतों (मेरे भक्तों)-को अन्नका दोष नहीं लगता।

पृथ्वी बोलीं— जनार्दन! यदि कोई मनुष्य आपका भक्त अनजानमें राजान्न-भक्षण कर लेता है तो वह कौन-सा कर्म करे; जिससे उसकी शुद्धि हो जाय?

भगवान् वराह बोले— देवि! एक बार चान्द्रायण या सांतपन-व्रत (छः रात्रियोंका उपवास)-के अनुष्ठान अथवा कई बार तप्तकृच्छ्र-व्रत (जल, दूध और घीको एक साथ गर्मकर एक दिन पीने तथा दूसरे दिन उपवास)-के आचरणद्वारा मनुष्य राजान्न-भक्षणके दोषसे छुटकारा प्राप्त कर लेता है और उसमें लेशमात्र भी दोष नहीं रह जाता। राजाका अन्न खाना उचित नहीं है। विशेषकर उसे जो मेरी पूजा-आराधना करता हुआ जीवन व्यतीत करना चाहता या उत्तम गति पानेकी चेष्टा करता है। [अध्याय १३०]


दातुन न करने तथा मृतक एवं रजस्वलाके स्पर्शका प्रायश्चित्त

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! जो मानव दातुनका प्रयोग न कर मेरी उपासनामें सम्मिलित होता है, उसके इस एक अपकर्मसे ही पूर्वके किये हुए सारे धर्म नष्ट हो जाते हैं। मनुष्यका शरीर नाना प्रकारके मल एवं गंदे द्रव्योंसे भरा है। यह देह कफ, पित्त, पीब, रक्त आदिसे युक्त है और मनुष्यका मुख दुर्गन्धपूर्ण रहता है। दातुन करनेसे मुँहकी दुर्गन्ध सर्वथा नष्ट हो जाती है। पवित्रता भगवान् तथा देवताओंको प्रिय है और सदाचारसे वह बढ़ती है।

११५- वराहक्षेत्रकी महिमाके प्रसङ्गमें गीध और शृंगालका वृत्तान्त तथा आदित्यको वरदान

२३० | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १३३-१३४

पृथ्‍वीने कहा—भगवन्! दातुनका उपयोग न कर जो आपके कर्मका सम्पादन करता है, उसके लिये क्या प्रायश्चित्त है ? यह मुझे बतानेकी कृपा कीजिये, जिससे उसका सारा पुण्य नष्ट न हो सके।

भगवान् वराह कहते हैं—महाभागे ! इसका प्रायश्चित्त यह है कि व्यक्ति सात दिनोंतक आकाशशयन—खुली हवामें—सर्वथा बाहर सोये, इससे उसके दातुन न करनेके दोष नष्ट हो जाते हैं। भद्रे ! दातुनसम्बन्धी प्रायश्चित्त तुम्हें बतला दिया। जो व्यक्ति इस विधानसे प्रायश्चित्त करता है, उसके अपराध नष्ट हो जाते हैं।

भगवान् वराह कहते हैं—इसी प्रकार जो मनुष्य अपवित्र अवस्थामें किसी मृतक (शव)-का स्पर्श करता है, उसे गर्हितरूपमें चौदह हजार वर्षोंतक नरक-वास करना पड़ता है और जो व्यक्ति मृतकका स्पर्शकर बिना प्रायश्चित्त किये हुए मेरे क्षेत्रमें चला जाता है, उसे हजारों वर्षोंतक विविध कष्टमय निकृष्ट (नीच) योनियोंमें जाना पड़ता है।

यह सुनकर पृथिवीको बड़ा क्लेश हुआ। उन्होंने सहानुभूतिसे पूछा—भगवन्! यह तो बड़े ही दुःखकी बात है। कृपया इसके लिये भी किसी प्रायश्चित्तका वर्णन करें, जिससे प्राणी उस विकट संकटसे बच सके।

भगवान् वराह बोले—देवि! शव-स्पर्श करनेवाला मानव तीन दिनोंतक जौ खाकर और पुनः एक दिन उपवास रहकर शुद्ध हो सकता है। उसे इसका इसी रूपमें प्रायश्चित्त करना चाहिये।

इसी प्रकार जो शास्त्रकी विधिके प्रतिकूल श्मशानमें जाता है, उसके पितर भी श्मशानमें रहकर अभक्ष्यभोजी बन जाते हैं। इसलिये उसका भी प्रायश्चित्त कर लेना चाहिये।

पृथ्‍वीने पूछा—भगवन्! आपके भजन-पूजनमें लगे रहनेवालोंको भी इस प्रकारका पाप लग जाता है ? यदि कर्मसिद्धान्तसे उनको पाप लगता है तो उसका भी प्रायश्चित्त बतानेकी कृपा करें।

भगवान् वराहने कहा—ऐसा व्यक्ति सात दिनोंतक एक समय भोजन करे और तीन राततक बिना भोजन किये रहे और फिर पञ्चगव्यका पान करे। इस प्रकार प्रायश्चित्त करनेसे उसका पाप दूर हो जाता है। इसी प्रकार रजस्वला-स्त्रीका संसर्गी मनुष्य यदि भगवान्‌की मूर्तिको स्पर्श कर लेता है तो उसे भी हजार वर्षोंतक नरकमें रहना पड़ता है। नरकसे निकलकर वह पुनः अन्धा, दरिद्र और मूर्ख होता है।

रजस्वला स्त्रीका संस्पर्शदोष तपस्यासे ही दूर होता है। उसे शीतकालमें तीन राततक खुले आकाशमें शयनकर भगवत्परायण होकर तपस्याका अनुष्ठान करना चाहिये। [अध्याय १३१-१३२]


भगवान्‌की पूजा करते समय होनेवाले अपराधोंके प्रायश्चित्त

भगवान् वराह कहते हैं—पृथ्वि ! इसी प्रकार पूजाके समय मुझे स्पर्श किये हुए रहनेपर यदि शरीरके दोष वायु या अजीर्णके कारण अधोवायु निकल गयी तो इस दोषसे वह पाँच वर्षोंतक मक्खी, तीन वर्षोंतक चूहा, तीन वर्षोंतक कुत्ता एवं फिर नौ वर्षोंतक कछुएका शरीर पाता है।

देवि! जो मेरे कर्ममें—पूजा-पाठ, जप-तपमें उद्यत रहनेवाला पुरुष शास्त्रका रहस्य जानता है, फिर भी यदि उसके द्वारा अपकर्म बन जाय तो इसमें उसका प्रारब्ध एवं मोह ही कारण है।

देवि! अब मैं इसका प्रायश्चित्त बतलाता हूँ, सुनो। अनघे ! जिस कर्मके प्रभावसे ऐसा अपराध

अध्याय १३३-१३४ ] भगवान्‌की पूजा करते समय होनेवाले अपराधोंके प्रायश्चित्त २३१

बन जानेपर भी उपासक पुरुषका उद्धार हो सकता है। ऐसे व्यक्तिको तीन दिन और तीन रातोंतक यवके आहारपर रहना चाहिये। इस प्रकार प्रायश्चित्त करनेके पश्चात् वह मेरी दृष्टिमें निरपराध है और सम्पूर्ण आसक्तियोंका त्यागकर वह मेरे लोकमें पहुँच जाता है। भद्रे! तुमने जो पूछा था कि — 'पूजाके समय बने हुए कलुषित (निन्दित) कर्म-अपराधोंसे पुरुषकी क्या गति होती है?' इसके विषयमें मैंने तुम्हें बता दिया। अब मेरे उपासना-कर्मके बीचमें ही जो मलत्याग करने जाता है, अनघे ! उसके विषयमें मैं अपना निर्णय कहता हूँ, सुनो। वह व्यक्ति भी बहुत वर्षोंतक नारकीय यातनाओंको भोगता है। उसका प्रायश्चित्त यह है कि वह व्यक्ति एक रात जलमें पड़ा रहे तथा एक रात खुले आकाशके नीचे शयन करे। इस प्रकार विधान करनेसे वह इस अपराधसे छूट जाता है। पृथ्वि ! पूजाके अवसरपर मेरे भक्तोंद्वारा होनेवाले अपराधोंके प्रायश्चित्त मैंने तुम्हें बतला दिये हैं। अब देवि! मेरी भक्तिमें रहनेवाला जो व्यक्ति मेरे कर्मोंका त्याग करके दूसरे कर्मोंमें लग जाता है, उसका फल बतलाता हूँ। वह व्यक्ति दूसरे जन्ममें मूर्ख होता है। अब उसके लिये प्रायश्चित्तकी विधि बतलाता हूँ। उसे पंद्रह दिनोंतक खुले आकाशमें सोना चाहिये। इससे वह पापसे निश्चय ही मुक्त हो जाता है।

भगवान् वराह कहते हैं— देवि! जो व्यक्ति नीला वस्त्र पहनकर मेरी उपासना करता है, वह पाँच सौ वर्षोंतक कीड़ा बनकर रहता है। अब उसके अपराधका प्रायश्चित्त बतलाता हूँ। उसे विधिपूर्वक 'चान्द्रायणव्रत' का अनुष्ठान करना चाहिये। इससे वह पापसे मुक्त हो जाता है। जो व्यक्ति अविधिपूर्वक मेरा स्पर्श करता है और मेरी उपासनामें लगता है, उसे भी दोष लगता है और वह मेरा प्रियपात्र नहीं बन सकता। उसके द्वारा दिये गये गन्ध, माल्य, सुगन्धित पदार्थ तथा मोदक आदिको मैं कभी ग्रहण नहीं करता।

पृथ्वी बोली— प्रभो! आप जो मुझे आचारके व्यतिक्रमकी बात सुना रहे हैं तो कृपाकर इनके प्रायश्चित्तोंको तथा सदाचारके नियमोंको भी बतानेकी कृपा कीजिये। भगवन्! किस कर्मके विधानसे सम्पन्न होकर आपके कर्म-परायण रहनेवाले भागवत-पुरुष आपके श्रीविग्रहके पास पहुँचकर स्पर्श तथा उपासना करनेके योग्य होते हैं? यह भी बतलानेकी कृपा करें।

भगवान् वराह कहते हैं— सुश्रोणि! जो सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करके मेरी शरणमें आकर उपासना करता है, उसका कर्तव्य सुनो। मेरे उपासकको चाहिये कि वह पूर्वमुख बैठकर जलसे अपने दोनों पैरोंको धोकर फिर तीन बार हाथसे पवित्र मृत्तिकाका स्पर्शकर जलसे हाथ धो डाले। इसके उपरान्त मुख, नासिकाके दोनों छिद्र, दोनों आँख और दोनों कानोंको भी धोये। दोनों पैरोंको पाँच-पाँच बार धोये। फिर दोनों हाथोंसे मुख पोंछकर सारे संसारको भूलकर एकमात्र मेरा स्मरण करते हुए प्राणायाम करे। उपासकको चाहिये कि वह परब्रह्मका ध्यान करते हुए, जलसिक्त अंगुलियोंसे तीन बार अपने सिरका, तीन बार दोनों कानोंका और तीन बार नासिकाके छिद्रोंका स्पर्श करे, फिर तीन बार जल ऊपर फेंकना चाहिये।

यदि उसे मुझे प्रसन्न करनेकी इच्छा है तो फिर मेरे श्रीविग्रहके वामभागका स्पर्श करे। मेरे कर्ममें स्थित पुरुष यदि इस प्रकारका कर्म करता है तो उसे कोई दोष स्पर्श नहीं कर सकता।

पृथ्वी बोली— भगवन्! जो दम्भी या व्यभिचारी पुरुष अविधिपूर्वक स्पर्शकर आपकी पूजा करने लगता है, उसके लिये तापन और शोधनकी

२३२संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १३३-१३४

भी क्रिया होती होगी? अतः उसे आप बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! मेरे कर्मका अनादर करनेवाले व्यक्तियोंको जो गति प्राप्त होती है, इस विषयमें मैं विचारपूर्वक कहता हूँ, सुनो। मुझसे सम्बन्धित नियमोंका ठीक रूपसे पालन न कर जो अपवित्र व्यक्ति मेरी उपासनामें लग जाता है, उसे नियमानुसार ग्यारह हजार वर्षोंतक कीड़ा होकर रहना पड़ता है, इसमें कोई संशय नहीं है। उसकी शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त यह है—उसे महासांतपन अथवा तप्तकृच्छ्रव्रत करना चाहिये। यशस्विनि! ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य—इनमें जो भी मेरे मतके समर्थक हैं, उन्हें इस विधिके अनुसार यह प्रायश्चित्त करना आवश्यक है। इसके फलस्वरूप पापसे छूटकर वे परम गति प्राप्त कर लेते हैं। मेरी भक्तिमें तत्पर रहनेवाला जो व्यक्ति क्रोधमें भरकर मेरे गात्रोंका स्पर्श करता है और जिसका चित्त एकाग्र नहीं रहता, उसपर मैं प्रसन्न नहीं होता, बल्कि उसपर मुझे क्रोध ही होता है। जो सदा इन्द्रियोंको वशमें रखता है, जिसके मनमें मेरे प्रति श्रद्धा है, पाँचों इन्द्रियाँ नियमानुसार कार्य करती हैं तथा जो लाभ और हानिसे कोई प्रयोजन नहीं रखता, ऐसा पवित्र व्यक्ति मुझे प्रिय है। जिसमें अहंकार लेशमात्र भी नहीं रहता तथा मेरी सेवामें जिसकी विशेष रुचि रहती है, वह मुझे प्रिय है। अब इनके अतिरिक्त दूसरे व्यक्तियोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। जो मुझमें श्रद्धा-भक्ति रखता है, जो शुद्ध एवं पवित्र भी है, फिर भी यदि क्रोधके आवेशमें मेरा स्पर्श करता या मेरी परिक्रमा करता है, वह उस क्रोधके फलस्वरूप सौ वर्षोंतक चील पक्षीकी योनिमें जन्म पाता है, फिर सौ वर्षोंतक उसे बाज बनकर रहना पड़ता है और तीन सौ वर्षोंतक वह मेढकका जीवन व्यतीतकर दस वर्षोंतक राक्षसका शरीर पाता है। फिर वह इक्कीस वर्षोंतक अंधा रहकर बत्तीस वर्षोंतक गीध तथा दस वर्षोंतक चक्रवाककी योनिमें रहता है। इसमें वह शैवाल भक्षण करता तथा आकाशमें उड़ता रहता है। इस प्रकार क्रोधी उपासकोंकी दुर्गति होती है और उन्हें संसारचक्रमें भटकना पड़ता है।

पृथ्वीने कहा— जगत्प्रभो! आपने जो बात बतलायी उसे सुनकर मेरा हृदय विषाद एवं आतङ्कसे भर गया है। देवेश्वर! मैं प्रार्थना करती हूँ कि मेरी प्रसन्नताके लिये आप अखिल जगत्को सुखी बनानेवाला ऐसा कोई प्रायश्चित्त बतानेकी कृपा करें, जिसका पालन करके कर्मशील विवेकी पुरुष इस पापसे मुक्त होकर शुद्ध हो सके? भगवन्! वह प्रायश्चित्त ऐसा होना चाहिये, जिसे थोड़ी शक्तिवाले तथा लोभ एवं मोहसे ग्रस्त व्यक्ति भी निर्भीकतापूर्वक सरलतासे सम्पादन कर सकें और कठिन यातनाओंसे उनका उद्धार हो जाय।

पृथ्वीके इस प्रकार प्रार्थना करनेके समय ही कमलनयन भगवान् वराहके सम्मुख योगीश्वर सनत्कुमार भी पहुँच गये। वे ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं। उन मुनिने पृथ्वीकी बात सुनकर भगवान् वराहकी प्रेरणासे पृथ्वीसे इस प्रकार कहना आरम्भ किया।

सनत्कुमारजी बोले— देवि! तुम धन्य हो जो भगवान्से इस प्रकार प्रश्न करती हो। इस समय साक्षात् भगवान् नारायण ही वराहका रूप धारणकर यहाँ विराजमान हैं। सम्पूर्ण मायाकी रचना इन्हींके द्वारा हुई है। इनसे तुम्हारा क्या वार्तालाप हुआ है, उसका सारांश बतलाओ। उस समय सनत्कुमारकी बात सुनकर पृथ्वीने उनसे कहा—'ब्रह्मन्! मैंने इनसे क्रियायोग एवं अध्यात्मका रहस्य पूछा था।

अध्याय १३५-१३६ ] सेवापराध और प्रायश्चित्त-कर्मसूत्र २३३

ब्रह्मन्! मेरे पूछनेपर इन भगवान् नारायणने मुझे ज्ञानयोगके साथ उपासनाकी बातें बतलायीं। साथ ही क्रोधके आवेशमें आकर उपासना करनेके दोषका भी वर्णन किया। फिर इसके प्रायश्चित्तमें उन्होंने बताया कि गृहस्थके घरसे शुद्ध भिक्षा माँगकर मनुष्य उस पापसे मुक्त हो जाता है। भगवान् जनार्दनका यह मेरे प्रति उपदेश था। फिर उन्होंने ऐसी विधि बतलायी, जिसे करनेसे भक्तको सभी प्रकारके सुख-सम्पत्तिकी प्राप्ति हो।' यह सुनकर सनत्कुमारजी भी पृथ्वीके साथ ही पुनः भगवान्के उपदेशोंको सुनने लगे।

भगवान् वराह बोले—जगत्में जो प्राणी पूजाके अयोग्य पुष्पसे मेरी अर्चना करता है, उसकी पूजाको न तो मैं स्वीकार करता हूँ और न वैसा व्यक्ति ही मुझे प्रिय है। देवि! जिनकी मुझमें तो भक्ति है, किंतु जो अज्ञानसे भरे हैं, वे मुझे प्रसन्न नहीं कर पाते, उन्हें तो रौरव नामक भयंकर नरकमें गिरना पड़ता है। अज्ञानके दोषके कारण वे अनेक दुःखोंका अनुभव करते हैं। ऐसा व्यक्ति दस वर्षोंतक वानर, तेरह वर्षोंतक बिल्ली, पाँच वर्षोंतक वक, बारह वर्षोंतक बैल, आठ वर्षोंतक बकरा, एक महीने ग्राममें रहनेवाला मुर्गा तथा तीन वर्षोंतक भैंसके रूपमें जीवन व्यतीत करता है, इसमें कोई संशय नहीं। भद्रे! जो पुष्प मुझे अप्रिय है, इसके प्रसङ्गमें मैं इतनी बातें बता चुका। साथ ही जो गन्धहीन, कुरूप पुष्प मुझे अर्पण करते हैं, उनकी दुर्गति भी बतला दी।

पृथ्विने पूछा—भगवन्! जिसका अन्तःकरण परम शुद्ध है, उसीके व्यवहारसे यदि आप प्रसन्न होते हैं तो कोई ऐसा साधन बतलाइये, जिसका प्रयोग करके आपके कर्ममें परायण रहनेवाले भक्त अन्तर्हृदयसे शुद्ध हो जायें।

भगवान् वराह कहते हैं—देवि! जिसके विषयमें तुम मुझसे पूछ रही हो, उसका विचार-पूर्वक वर्णन करता हूँ, सुनो। प्रायश्चित्तके सहारे मानव शुद्ध हो जाते हैं। ऐसे व्यक्तिको एक महीनेतक एक समय भोजन करना चाहिये। दिनमें वह सात बार वीरासनका अभ्यास करे, एक महीनेतक दिनके चौथे पहरमें (केवल) घृत अथवा पायस (खीर)-का आहार करे। तीन दिनोंतक यवान्न (जौ) खाकर रहे और तीन दिनोंतक वह केवल वायुके आधारपर ही रह जाय। जो व्यक्ति इस विधिका पालनकर मेरे कर्मोंमें उद्यत रहता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर मेरे लोकको प्राप्त होता है।

[ अध्याय १३३-१३४ ]

सेवापराध और प्रायश्चित्त-कर्मसूत्र

भगवान् वराह कहते हैं—पृथ्विदेवि! जो लाल वस्त्र पहनकर मेरी उपासना करता है, वह भी दोषी माना जाता है। अब उसके लिये दोषमुक्त करनेवाला प्रायश्चित्त बतलाता हूँ, सुनो। प्रायश्चित्तका प्रकार यह है—ऐसे पुरुषको चाहिये कि सतरह दिनोंतक वह एक समय भोजन करे, तीन दिनोंतक वायु पीकर रहे और एक दिन केवल जलके आहारपर बिताये। यह प्रायश्चित्त सम्पूर्ण संसारकी आसक्तियोंसे मुक्त करानेवाला है। जो पुरुष अँधेरी रातमें बिना दीपक जलाये मेरा स्पर्श करता है तथा जल्दीके कारण अथवा मूर्खतावश शास्त्रकी आज्ञाका पालन न कर मेरा स्पर्श करता है, उसका भी पतन होता है। वह अधम मानव उस दोषसे क्लेश भोगता है। वह एक जन्मतक अन्धा होकर अज्ञानमय जीवन बिताता है और अभक्ष्य-अपेय पदार्थोंको खाता-पीता रहता है।

२३४ संक्षिप्त श्रीवराहपुराण [ अध्याय १३५-१३६ ]

अब मैं रात्रिके अन्धकारमें दीपरहित स्थितिमें अपने स्पर्शदोषका प्रायश्चित्त बतलाता हूँ, जिससे दोष-मुक्त होकर वह मेरे लोकको प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति अनन्य भक्तिभावसे पंद्रह दिनोंतक आँखें ढककर रहे और बीस दिनोंतक सावधान होकर एक समय भोजन करे और फिर जिस किसी भी महीनेकी द्वादशी तिथिको एक समय भोजन करके और जल पीकर रह जाय। इसके पश्चात् गोमूत्रमें सिद्ध किया हुआ यवान्न भक्षण करे। इस प्रायश्चित्तके प्रभावसे वह इस दोषसे मुक्त हो जाता है।

देवि! जो व्यक्ति काला वस्त्र पहनकर मेरी उपासना करता है, उसका भी पतन होता है। वह अगले जन्ममें पाँच वर्षोंतक लाक्षा (लाह) आदि वस्तुओंमें रहनेवाला घुन होता है, फिर पाँच वर्षोंतक नेवला और दस वर्षोंतक कछुआ होकर रहता है। फिर कबूतरकी योनिमें जन्म लेकर वह चौदह वर्षोंतक मेरे मन्दिरके पार्श्वभागमें रहता है। अब उसका प्रायश्चित्त बतलाता हूँ। उसे चाहिये कि सात दिनोंतक यवके आटेकी लपसी और तीन दिनोंतक यवके सत्तूकी एक पिण्डी तथा तीन रातोंतक तीन-तीन पिण्डियाँ खाय। इससे वह पापसे मुक्त हो जाता है। जो बिना धोये वस्त्र पहनकर मेरी उपासनामें लग जाता है, वह भी इस अपराधसे संसारमें गिर जाता है। जिसके फलस्वरूप वह एक जन्मतक मतवाला हाथी, एक जन्मतक ऊँट, एक जन्ममें भेड़िया, एक जन्ममें सियार और फिर एक जन्ममें घोड़ा होता है। इसके बाद वह एक जन्ममें मोर और पुनः एक जन्ममें मृग भी होता है। इस प्रकार सात जन्म व्यतीत होनेपर उसे मनुष्यकी योनि मिलती है। उस जन्ममें वह मेरा भक्त, गुणज्ञ-पुरुष और कार्यकुशल होकर मेरी उपासनामें परायण होता है तथा निरपराधी और अहंकार-शून्य जीवन व्यतीत करता है। अब उसके शुद्ध होनेका उपाय बतलाता हूँ, उसे सुनो, जिससे उसे हीन योनियोंमें नहीं जाना पड़ता। वह क्रमशः तीन दिनोंतक यव, तीन दिन तिलकी खली और फिर तीन दिनोंतक वह पत्ते, जल, खीर एवं वायुके आहारपर रह जाय। इस प्रकारके नियमका पालन करनेसे अशुद्ध वस्त्र पहननेवाले उपासकका दोष मिट जाता है और उसे कई जन्मोंतक संसारमें भटकना नहीं पड़ता।

देवि! जो मानव बत्तख आदि पक्षियों या किसी भी प्रकारका मांस खाकर मेरी पूजामें लगता है, वह पंद्रह वर्षोंतक बत्तखकी योनिमें रहता है। फिर वह दस वर्षोंतक तेंदुआ नामक हिंसक वन्य जन्तु होता है और पाँच वर्षोंतक उसे सूअर बनना पड़ता है। मेरे प्रति किये गये उस अपराधसे उसे इतने वर्षोंतक संसारमें भटकना पड़ता है। इस प्रकारके मांस खानेवाले व्यक्तिके लिये प्रायश्चित्त यह है कि वह क्रमशः तीन-तीन दिनोंतक यव, वायु, फल, तिल, बिना नमकके अन्नके आहारपर रहे। इस प्रकारका पंद्रह दिनोंमें प्रायश्चित्त पूराकर एक बारके मांसभक्षणदोषसे शुद्ध होता है। बार-बारके ऐसे अपराधोंका कोई प्रायश्चित्त नहीं है।

भगवान् वराह कहते हैं—देवि! दीपकका स्पर्श करके हाथ धो लेना चाहिये, अन्यथा इससे भी दोषका भागी बनना पड़ता है। महाभागे! इसके प्रायश्चित्तका यह रूप है कि जिस किसी भी महीनेके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके शुभ अवसरपर दिनके चौथे भागमें भोजन करके ठंडी ऋतुमें रात्रिके अवसरपर खुले आकाशमें सोये, फिर दीपदानकर इस दोषसे वह मुक्त हो जाता है। भद्रे! न्यायके अनुसार इस कर्मके प्रभावसे पुरुषमें पवित्रता आ जाती है और वह मेरे कर्म-पथपर आरूढ़ हो जाता है। दीपक-स्पर्श करके बिना हाथ धोये हुए मेरे कर्ममें लगनेका यह प्रसङ्ग तुम्हें बतला दिया। यह प्रायश्चित्त संसारमें शुद्ध करनेके लिये परम

अध्याय १३५-१३६] सेवापराध और प्रायश्चित्त-कर्मसूत्र २३५

साधन है, जिसका पालन करके पुरुष कल्याण प्राप्त कर लेता है।

देवि! जो मनुष्य श्मशानभूमिमें जाकर बिना स्नान किये ही मुझे स्पर्श करता है, उसे भी सेवापराधका दोष लगता है, फलस्वरूप वह चौदह वर्षोंतक पृथ्वीपर शृगाल होकर रहता है। फिर सात वर्षोंतक आकाशमें उड़नेवाला गीध होता है। इसके पश्चात् चौदह वर्षोंतक उसे पिशाचयोनिमें जाना पड़ता है।

पृथ्वी बोली—जगत्प्रभो! भक्तोंकी याचना पूर्ण करना आपका स्वभाव है। आपने यह जो परम गोपनीय विषय कहा है, इससे मुझे अत्यन्त आश्चर्य हो रहा है, अतः प्रभो! आपसे मेरी प्रार्थना है कि वह सम्पूर्ण विषय मुझे स्पष्टरूपसे बतानेकी कृपा करें। कमललोचन भगवान् शंकरने तो श्मशानकी बड़ी प्रशंसा की है और उसे पवित्र बतलाया है, फिर वहाँ दोष क्या है? रुद्र तो परम बुद्धिमान् हैं, उनमें किसी ऐश्वर्यकी भी कमी नहीं है, तब भी वे दीप्तिमान् कपालको लिये सदा श्मशानभूमिमें विराजते हैं, फिर आप उसकी निन्दा कैसे करते हैं?

भगवान् वराह कहते हैं—देवि! पवित्र व्रत करनेवाले पुरुष भी आजतक इस रहस्यसे अनभिज्ञ हैं। अखिल भूतोंके अध्यक्ष भगवान् शंकरको कोई नहीं जानता। उन्होंने त्रिपुरवधके समय बहुतेरे बालक-वृद्धों तथा बहुत-सी स्त्रियोंको भी मार डाला था, अतएव उस पापसे वे बड़े दुःखी थे। उस समय मैंने उन नष्टैश्वर्य भगवान् शंकरका स्मरण किया और वे मेरे पास पहुँचे। उस समय ज्यों ही मैंने उनपर अपनी दिव्य दृष्टि डाली कि वे पुनः सम्पूर्ण भूतोंके शासक महान् रुद्र बन गये। उस समय उनकी इच्छा मेरे यजनकी हुई, पर सहसा उनका ज्ञान और योगका बल नष्ट-सा हो गया। तब मैंने उनसे कहा—'प्रभो! आप ऐसे मुग्ध-से क्यों बैठे हैं? (आप मोहसे कैसे घिरे हैं?) बनाना, बिगाड़ना और बिगड़े हुएको पुनः बनाना—यह सब तो आपके हाथकी बात है। मृत्यु आपके अधीन रहती है, आप सबके मूल कारण और परमाश्रय हैं, आपको देवताओंका भी देवता कहा जाता है, आप साम और ऋक्स्वरूप हैं। देवेश्वर! आपकी इस म्लानताका कारण क्या है? आप कृपया इन्हें स्पष्टरूपसे बतलाइये। आप अपने योग और मायाको भी सँभालें। देखें, यह परब्रह्म परमेश्वरकी लीला है। मेरे मनमें आपको प्रसन्न करनेकी इच्छा हुई है, अतएव मैं यहाँ आया हूँ।'

वसुंधरे! फिर तो मेरी बात सुनकर शंकरजीको पूर्ण ज्ञान हो गया। उन्होंने मधुर वाणीमें मुझसे कहा—'नारायण! आप ध्यान देकर मेरी वाणी सुननेकी कृपा कीजिये। आप सम्पूर्ण लोकोंके एकमात्र शासक हैं। विष्णो! अब आपकी कृपासे मुझमें पुनः देवत्व जाग्रत् हो गया। माधव! मुझे योगकी उपलब्धि हो गयी और सांख्यका ज्ञान भी सुलभ हो गया, मेरी चिन्ताएँ शान्त हो गयीं, यही नहीं, आपकी कृपासे पूर्णमासीके अवसरपर उमड़नेवाले समुद्रकी भाँति मैं आनन्दमय बन गया हूँ। भक्तोंकी इच्छा पूर्ण करनेवाले भगवन्! मैं आपको तत्त्वतः जानता हूँ और आप मुझे। हम दोनोंकी अभिन्नताको दूसरा कोई भी नहीं देख सकता है। आप महान् ऐश्वर्यसे सम्पन्न हैं। सम्पूर्ण मायाकी रचना आपके द्वारा हुई है।'

माधवि! भूतगणोंके महान् अधिष्ठाता रुद्रने इस प्रकार मुझसे कहा और एक मुहूर्त्ततक वे ध्यानमें बैठे रहे। इसके बाद पुनः मुझसे कहा—'विष्णो! आपकी कृपासे ही मैंने त्रिपुरासुरका वध किया था, उस समय मैंने बहुत-से दानवों और गर्भिणी स्त्रियोंका भी संहार कर दिया था। दसों दिशाओंमें भागते हुए बालक एवं वृद्धोंको भी मैंने मार डाला था। उस पापके कारण मैं योगमाया और ऐश्वर्योंसे शून्य हो गया हूँ। आपसे

२३६संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १३५-१३६

मेरी प्रार्थना है कि आप मुझे कोई ऐसा साधन बतलाइये, जिसके आचरणसे मेरे पाप नष्ट हो जायँ और मैं शुद्ध हो जाऊँ।

भगवान् रुद्रको इस प्रकार चिन्तित देखकर मैंने उनसे कहा—'शंकरजी! आप कपालकी माला धारण करें और 'समल'-स्थानमें चले जायँ।' उस समय मेरी ऐसी बात सुनकर उन भूतभावन भगवान् भवने मुझसे पुनः कहा—'जगत्प्रभो! वह 'समल'-स्थान कहाँ है? आप मुझे बोध देकर पूर्णरूपसे समझानेकी कृपा करें।' इसपर मैंने उनसे कहा—'शंकरजी! श्मशान ही रक्त-पीबके गन्धसे युक्त 'समल'-स्थान है, जहाँ कोई भी मनुष्य जाना नहीं चाहता। वहाँ मनुष्य जाकर स्पृहारहित हो जाता है। शिवजी! आप कपालोंको लेकर वहीं रमण करें। अपने व्रतमें अटल रहकर देवताओंके वर्षसे आप एक हजार वर्षतक वहाँ रहें और पापोंको नष्ट करनेके लिये आप वहाँ रहकर मौनव्रतका पालन करें। पूरे एक हजार वर्षतक उस श्मशान-भूमिमें रहनेके पश्चात् आप मुनिवर गौतम मुनिके आश्रमपर जायँ। वहाँ आपको पूर्ण आत्मज्ञानकी उपलब्धि हो जायगी और उस समय आप इस कपालसे भी मुक्त हो जायँगे।'

वसुंधरे! इस प्रकार रुद्रको वर देकर मैं वहीं अन्तर्धान हो गया और रुद्र भी गजचर्मसे आच्छन्न होकर श्मशान-भूमिमें भ्रमण करते हुए निवास करने लगे। इसीलिये श्मशान-भूमि मुझे पसंद नहीं है और मैंने श्मशान-भूमिको निन्दित बताया है। वहाँ जाकर बिना संस्कार किये हुए प्राणीको मेरी पूजा-अर्चामें उपस्थित नहीं होना चाहिये। अब वह प्रायश्चित्त बताता हूँ, जिसका पालन करनेसे साधक इस पापसे छूट जाता है। वह पंद्रह दिनोंतक दिनके चौथे भागमें एक बार भोजन करे। रातमें एक वस्त्र पहनकर कुशके बिस्तरपर आकाश-शयन करे, अर्थात् शीतकालकी रात्रिमें खुले आकाशके नीचे शयन करे और प्रातःकाल उठकर वह पञ्चगव्यका प्राशन करे। ऐसा करनेसे उसके पापकर्मका परिमार्जन हो जाता है और वह पुरुष सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर मेरे लोकको प्राप्त होता है।

सुश्रोणि! इसी प्रकार जो व्यक्ति हींग खाकर मेरी उपासना करता है, उसे भी दोष लगता है, अब उसके पापका परिणाम तथा शोधन करनेवाला प्रायश्चित्त सुनो। वह जन्मान्तरमें दस वर्षोंतक उल्लू और तीन वर्षोंतक कछुआ होकर निवास करता है। तदनन्तर उसे फिरसे मनुष्यकी योनि मिलती है और मेरी उपासनामें उसकी रुचि होती है। वसुंधरे! इन प्रमादियोंके लिये तथा जिन्हें इस संसारमें केवल दूसरोंके दोष ही दिखायी पड़ते हैं, उनके मुक्त होनेके लिये मैं एक महान् ओजस्वी प्रायश्चित्त बतलाता हूँ, जिसका पालन-कर वह पवित्र होकर संसार-सागरको पार कर जाता है। इस पापसे छूटनेके लिये मनुष्यको एक दिन यवकी लपसी खाकर तथा एक दिन गोमूत्रके आहारपर रहना चाहिये। रातमें वह वीरासनसे बैठकर तथा आकाश-शयनद्वारा कालक्षेप करे। इस विधिका पालन करनेसे वह पुरुष संसारमें न जाकर मेरे लोकमें पहुँच जाता है।

सुशोभने! जो दम्भी मनुष्य मदिरा-पानकर मेरी उपासनामें सम्मिलित होता है, उसका दोष बताता हूँ, तुम मनको एकाग्र करके सुनो। इस अपराधके कारण वह व्यक्ति दस हजार वर्षोंतक दरिद्र होता है। जो मेरा भक्त है और जिसने वैष्णव दीक्षा भी ग्रहण कर ली है, वह यदि कोई कार्य सिद्ध करनेके उद्देश्यसे मोहित होकर मद्य पी लेता है तो उसके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं

अध्याय १३५-१३६ ] सेवापराध और प्रायश्चित्त-कर्मसूत्र २३७


है। वसुंधरे! अब अदीक्षित उपासकके लिये प्रायश्चित्तके उपाय बतलाता हूँ, वह सुनो। यदि यह अग्निवर्ण-प्रतप्त सुराका पान करे तो उक्त पापसे छूट सकता है। जो पुरुष इस विधिके अनुसार प्रायश्चित्त करता है, वह न तो पापसे लिप्त होता है और न संसारमें उसकी उत्पत्ति ही होती है।

पृथ्वि! मेरी उपासना करनेवाला जो पुरुष वनकुसुमका, जिसे लोक-व्यवहारमें 'बरे' कहते हैं, शाक खाता है, वह पंद्रह वर्षोंतक घोर नरकमें पड़ता है। इसके बाद उसको भूलोकमें सूअरकी योनि प्राप्त होती है। फिर तीन वर्षोंतक वह कुत्ता और एक वर्षतक शृगाल होकर जीवन व्यतीत करता है।

भगवान् वराहकी बात सुनकर देवी पृथ्वीने श्रीहरिसे पुनः पूछा कि—'कुसुमके शाकका नैवेद्य अर्पण करनेसे जो पाप बन जाता है, प्रभो! उससे कैसे उद्धार हो सकता है—इसके लिये प्रायश्चित्त बतानेकी कृपा कीजिये।'

भगवान् वराह कहते हैं—देवि! जो मानव 'वन-कुसुम' के शाकको मुझे अर्पितकर स्वयं भी खा लेता है, वह दस हजार वर्षोंतक नरकमें क्लेश पाता है। उसका प्रायश्चित्त 'चान्द्रायण-व्रत' ही है। परंतु यदि वह केवल उसका प्रसाद भोग बनाकर ही रह जाता है, खाता नहीं है तो वह बारह दिनोंतक पयोव्रत करे। जो इस प्रकार प्रायश्चित्त कर लेता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता और मेरे लोकको ही प्राप्त होता है।

माधवि! मेरे कर्ममें परायण जो मन्द बुद्धिका व्यक्ति दूसरेके वस्त्रको बिना धोये ही पहन लेते हैं तथा मेरी उपासनामें लग जाते हैं तो उन्हें भी प्रायश्चित्ती बनना पड़ता है। देवि! यदि वह मेरा स्पर्श करता है तथा परिचर्या करता है तो वह दस वर्षोंतक हरिण बनकर रहता है, फिर एक जन्ममें वह लँगड़ा होता है और बादमें वह मूर्ख, क्रोधी और अन्तमें पुनः मेरा भक्त होता है। सुश्रोणि! अब मैं उसका प्रायश्चित्त बतलाता हूँ, जिससे पाप-मुक्त होकर उसकी मेरी भक्तिमें रुचि उत्पन्न होती है। वह मेरी भक्तिमें संलग्न होकर दिनके आठवें भागमें आहार ग्रहण करे। जिस दिन माघमासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथि हो, उस दिन जलाशयपर जाकर शान्त-दान्त और दृढ़व्रती होकर अनन्यभावसे मेरा चिन्तन करे। इस प्रकार जब दिन-रात समाप्त हो जायँ तो प्रातःकाल सूर्योदय हो जानेपर पञ्चगव्यका प्राशनकर मेरे कार्यमें उद्यत हो जाय। जो इस विधानसे प्रायश्चित्त करता है, वह अखिल पापोंसे मुक्त होकर मेरे लोकको प्राप्त होता है।

जो व्यक्ति नये अन्न उत्पन्न होनेपर नवान्नविधिका पालन न करके उसे अपने उपयोगमें लेता है, उसके पितरोंको पंद्रह वर्षोंतक कुछ भी प्राप्त नहीं होता। और जो मेरा भक्त होकर भी नये अन्नोंको दूसरोंको न देकर स्वयं अपने ही खा लेता है वह तो निश्चय ही धर्मसे च्युत हो जाता है। महाभागे! इसके लिये प्रायश्चित्त बतलाता हूँ, जो मेरे भक्तोंके लिये सुखदायी है। वह तीन रात उपवासकर चौथे दिन आकाश-शयनकर सूर्यके उदय होनेके पश्चात् पञ्चगव्यका प्राशनकर सद्यः पापसे मुक्त हो जाता है। जो व्यक्ति इस विधिके अनुसार प्रायश्चित्त कर लेता है, वह अखिल आसक्तियोंका भलीभाँति त्यागकर मेरे लोकमें चला जाता है।

इसी प्रकार भूमे! जो मानव मुझे बिना चन्दन और माला अर्पण किये ही धूप देता है, वह इस दोषके कारण दूसरे जन्ममें राक्षस होता है और उसके शरीरसे मुर्दे-सी दुर्गन्ध निकलती रहती है

२३८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १३७

और इक्कीस वर्षोंतक वह लौहशालामें निवास करता है। अब उसके लिये भी प्रायश्चित्त बताता हूँ, सुनो। उसकी विधि यह है—जिस-किसी मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके दिन वह व्रत करके दिनके आठवें भागमें सायंकाल यथालब्ध आहार ग्रहण करे। फिर प्रातःकाल जब सूर्यमण्डल दिखायी पड़ने लगे, उस समय वह पञ्चगव्यका प्राशन करे। इसके प्रभावसे वह पुरुष पापसे सद्यः छूट जाता है। इस विधिके अनुसार जो प्रायश्चित्तका पालन करता है, उसके पिता-पितामह आदि पितर भी तर जाते हैं।

भूमे! जो मनुष्य पहले भेरी आदिद्वारा शब्द किये बिना ही मुझे जगाता है, वह निश्चय ही एक जन्ममें बहरा होता है। अब! मैं उसका प्रायश्चित्त बतलाता हूँ, जिससे वह पापसे छूट जाता है। वह किसी शीत-ऋतुके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिकी रातमें आकाश-शयन करे। इस नियमका पालन करनेसे मानव पापसे शीघ्र छूट जाता है।

वसुंधरे! जो मानव बहुत अधिक भोजन करके अजीर्णयुक्त बिना स्नान किये ही मेरी उपासनामें आ जाता है, वह इस अपराधके कारण क्रमशः कुत्ता, वानर, बकरा और शृगालकी योनियोंमें एक-एक बार जन्म लेकर फिर अन्धा और बहरा होता है। बादमें इस क्लेशमय संसारको पारकर वह किसी अच्छे कुलमें उत्पन्न होता है। उस समय अपराधसे छूट जानेके कारण वह पुरुष परम शुद्ध और श्रेष्ठ भगवद्भक्त होता है। मैं अब उसके लिये प्रायश्चित्त बतलाता हूँ, जिसके पालन करनेसे वह पापसे छूट जाय। प्रायश्चित्तका स्वरूप यह है कि उसे क्रमशः तीन-तीन दिनोंतक यावक, मूलक, पायस (खीर), सत्तू तथा वायुके आहारके आधारपर रहकर फिर तीन रात आकाश-शयन करना चाहिये। फिर ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर दन्तधावनकर शरीरको परम शुद्ध करनेके लिये उसे पञ्चगव्यका प्राशन करना चाहिये। जो मानव इस विधानके अनुसार प्रायश्चित्त करता है, उसपर पापका प्रभाव नहीं पड़ सकता और वह मेरे लोकको प्राप्त होता है।

महेश्वरि! यह प्रसङ्ग आख्यानोंमें महाख्यान और तपस्याओंमें परम तप है। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करता है, वह व्यक्ति मेरे लोकको प्राप्त होता है। साथ ही वह अपने दस पूर्व और दस पीछेकी पीढ़ियोंको तार देता है। यह प्रसङ्ग परम मङ्गलकारी तथा सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला है। अपने व्रतमें अटल रहनेवाला जो भागवत पुरुष इसका सदा पाठ करता है, वह सम्पूर्ण अपराधोंका आचरण करके भी उससे लिप्त नहीं होता। यह जप करने योग्य तथा परम प्रमाणभूत शास्त्र है। इसे मूर्खोंके समाजमें अथवा निन्दित व्यक्तियोंके सामने नहीं पढ़ना चाहिये। देवि! तुमने मुझसे जो पूछा था, वह आचारका निर्णीत विषय मैंने तुम्हें बतला दिया, अब तुम दूसरा कौन-सा प्रसङ्ग सुनना चाहती हो, यह बतलाओ। [अध्याय १३५-१३६]

वराहक्षेत्रकी* महिमाके प्रसङ्गमें गीध और शृगालका वृत्तान्त तथा आदित्यको वरदान

पृथ्वी बोली— भगवन्! आपने मुझे तथा अपने भक्तोंको प्रिय लगनेवाली बड़ी सुन्दर बात सुनायी। महाबाहो! अब मैं यह जानना चाहती हूँ कि ‘कुब्जाम्रक’क्षेत्रमें सबसे श्रेष्ठ एवं पवित्र आचरणीय व्रत क्या है? तथा भक्तोंको सुख देनेवाला इसके अतिरिक्त अन्य तीर्थ कौन-सा है?


* नन्दलाल दे आदिके अनुसार यह एटाके पासका सोरोंनामक स्थान है और अन्योंके मतसे पटनाके पासका हरिहर क्षेत्र।

११६- वराहक्षेत्रान्तर्वर्ती 'आदित्यतीर्थ' का प्रभाव (खञ्जरीटकी कथा)

अध्याय १३७ ] वराहक्षेत्रकी महिमाके प्रसङ्गमें गीध और शृगालका वृत्तान्त २३९

भगवान् वराह बोले—देवि! ऐसे तो मेरे सभी क्षेत्र परम शुद्ध हैं; फिर भी 'कोकामुख', 'कुब्जाम्रक' तथा 'सौकरव'-स्थान (वराहक्षेत्र) क्रमशः उत्तरोत्तर उत्तम माने जाते हैं; क्योंकि इनमें सम्पूर्ण प्राणियोंको संसारसे मुक्त करनेके लिये अपार शक्ति है। देवि! भागीरथी गङ्गाके समीप यह वही स्थान है, जहाँ मैंने तुम्हें समुद्रसे निकालकर स्थापित किया है।

पृथ्वी बोली—प्रभो ! 'सौकरव'में मरनेवाले प्राणी किन लोकोंको प्राप्त होते हैं तथा वहाँ स्नान करने एवं उस तीर्थके जलके पान करनेवालेको कौन-सा पुण्य प्राप्त होता है? कमलनयन ! आपके उस वराहक्षेत्रमें कितने क्षेत्र हैं? आप यह सब मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् वराह कहते हैं—महाभागे ! वराहक्षेत्रके दर्शन-अभिगमन आदिसे श्रेष्ठ पुण्य तो प्राप्त ही होता है, साथ ही उस तीर्थमें जिनकी मृत्यु होती है, उनके पूर्वके दस तथा आगे आनेवाली पीढ़ीके दस तथा (मातुल आदि कुलके) अन्य बारह पुरुष स्वर्गमें चले जाते हैं। सुश्रोणि! वहाँ जाने तथा मेरे (श्रीविग्रहके) मुखका दर्शन करनेमात्रसे सात जन्मोंतक वह पुरुष विशाल धन-धान्यसे परिपूर्ण श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न होता है, साथ ही वह रूपवान्, गुणवान् तथा मेरा भक्त होता है। जो मनुष्य वराहक्षेत्रमें अपने प्राणोंका त्याग करते हैं वे उस तीर्थके प्रभावसे शरीर त्यागनेके पश्चात् शङ्ख, चक्र और गदा आदि आयुधोंसे विभूषित चतुर्भुजरूप धारणकर श्वेतद्वीपको प्राप्त होते हैं। वसुंधरे! इसके अन्तर्गत 'चक्रतीर्थ' नामका एक प्रतिष्ठित क्षेत्र है, जिसमें व्यक्ति इन्द्रियोंपर संयम रखते हुए नियमानुकूल भोजन और वैशाखमासकी द्वादशी तिथिको विधिपूर्वक स्नानकर ग्यारह हजार वर्षोंतक विख्यात कुलमें जन्म पाकर प्रभूत धन-धान्यसे सम्पन्न रहकर मेरी परिचर्यामें परायण रहता है।

पृथ्वी बोली—भगवन्! सुना जाता है कि इस वराहतीर्थमें चन्द्रमाने भी आपकी उपासना की थी, जो बड़े कौतूहलका विषय है। अतः आप इसे विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें।

भगवान् वराह बोले—देवि! चन्द्रमा मुझे स्वभावतया ही प्रिय हैं; अतः तप करनेके बाद मैंने उन्हें अपना देवदुर्लभ दर्शन दिया। पर मेरे उस स्वरूपको देखकर वे अपनेको सँभाल न सके और अचेत हो गये। मेरे तेजसे वे ऐसे मोहित हो गये कि मुझे देखनेकी भी उनमें शक्ति न रही। उन्होंने आँखें बंद कर लीं और घबराहटके कारण त्रस्त-नेत्र होकर कुछ भी बोल न पाये। इसपर मैंने उनसे धीरेसे कहा—'परम तपस्वी सोम! तुम किस उद्देश्यसे तप कर रहे हो? तुम्हारे मनमें जो बात हो, वह मुझसे बताओ। मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, अतः तुम्हें सब कुछ प्राप्त हो जायगा—इसमें कोई संशय नहीं।'

इसपर 'सोमतीर्थ' में स्थित होकर चन्द्रमाने कहा—'भगवन्! आप योगियोंके स्वामी हैं और संसारमें सबसे श्रेष्ठ हैं। आप यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो यहाँ निवास करनेकी कृपा कीजिये, साथ ही मैं यह भी चाहता हूँ कि जबतक ये लोक रहें, तबतक आपमें मेरी निश्चलरूपसे अतुल श्रद्धा और भक्ति सदा बनी रहे। मेरा जो रूप है, वह कभी आपसे रिक्त न हो और वह सातों द्वीपोंमें सर्वत्र दिखायी पड़े। यज्ञोंमें ब्राह्मण-समुदाय मेरे नामसे प्रसिद्ध सोमरसका पान करें। प्रभो! इसके प्रभावसे उन्हें परम एवं दिव्य गति प्राप्त हो जाय। अमावास्याको मुझमें क्षीणता आ जायगी, उसमें पितरोंके लिये पिण्डकी क्रियाएँ लाभकर होंगी, पर पूर्णिमाको मैं पुनः नियमानुसार सुन्दर दर्शनीय

२४०संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १३७

बन जाऊँ। अधर्ममें मेरी बुद्धि कभी न जाय और मैं ओषधियोंका भी स्वामी बन जाऊँ। महादेव! आप यदि मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे आनन्दित करनेके लिये यह वर देनेकी कृपा कीजिये।'

वसुंधरे! चन्द्रमाकी इन बातोंको सुनकर और उन्हें वैसा वरदान देकर मैं वहीं अन्तर्धान हो गया। महाभागे! चन्द्रमाने जहाँ एक पैरपर खड़े रहकर पाँच हजार वर्षोंतक महान् तपस्या की थी, वह 'सोमतीर्थ' नामसे विख्यात हुआ तथा उन्हें दुर्लभ सिद्धि एवं कान्ति प्राप्त हुई। जो मेरा भक्त इस सोमतीर्थमें श्रद्धासे स्नानकर प्रतिदिन दिनके आठवें भागमें भोजन करके मेरी उपासनामें लगा रहता है, अब उसके फलका वर्णन करता हूँ। वह पैंतीस हजार वर्षोंतक ब्राह्मणका शरीर पाता है और वेद-वेदाङ्गका पारगामी विद्वान्, धनवान्, गुणवान्, दानी एवं मेरा निर्दोष भक्त होता है और संसारसागरको पार कर जाता है। यशस्विनि! यह ऐसा महत्त्वपूर्ण तीर्थ है, जहाँ महात्मा चन्द्रमाने दीर्घकालतक तपस्या की थी।

अब उस 'सोमतीर्थ' का लक्षण बतलाता हूँ, सुनो। वैशाख शुक्ल द्वादशीको चन्द्रमाके अस्त होने एवं अन्धकारके प्रवृत्त होनेपर जहाँ बिना चन्द्रमाके ही पृथ्वीपर चन्द्रिका चमकती दीखे, उसे ही सोमतीर्थ समझना चाहिये। वास्तवमें यह महान् आश्चर्यका विषय है कि चन्द्रमाका आलोक (प्रकाश) तो दीखता है, पर स्वयं चन्द्रमा वहाँ नहीं दीखते। महाभागे! ये परम पवित्र सौकरवतीर्थ तथा सोमतीर्थ—मुझसे सम्बन्ध रखते हैं।

वसुंधरे! अब मैं एक दूसरी बात बतलाता हूँ, उसे सुनो; जिससे इस क्षेत्रकी अद्भुत महिमा प्रख्यायित होती है। यहाँ एक शृगाली रहती थी, जो बिना श्रद्धाके ही पूर्वकर्मवश दैवयोगसे मरकर इस क्षेत्रके प्रभावसे अगले जन्ममें गुणवती, रूपवती और चौंसठ कलाओंसे सम्पन्न श्यामा* सर्वाङ्गसुन्दरी राजाकी पुत्री हुई थी। उसी सोमतीर्थके पूर्वी भागमें 'गृध्रवट' नामका भी एक प्रसिद्ध तीर्थ है, जहाँ एक गीधकी अनायास मृत्यु हुई, जिसकी कोई कामना न थी, पर उसे मनुष्यकी योनि प्राप्त हुई थी।

पृथ्वी बोली— प्रभो! इस तीर्थके प्रभावसे तिर्यक्-योनिमें पड़े हुए गीध और शृगाली मनुष्य-शरीरको कैसे प्राप्त हुए? यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है! साथ ही उस तीर्थमें स्नान करनेसे अथवा प्राणत्याग करनेसे मनुष्य किस गतिको प्राप्त करते हैं तथा उनके शरीरपर कौनसे विशेष चिह्न होते हैं? केशव! आप मुझे यह भी बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् वराह बोले— देवि! धर्मप्रधान सत्ययुगके बाद त्रेतायुगका प्रवेश ही हुआ था। उस समय काम्पिल्य† नगरमें ब्रह्मदत्त‡ नामक एक धर्मनिष्ठ राजा रहते थे। उनका सभी लक्षणोंसे सम्पन्न एक सोमदत्त नामक पुत्र था। एक बार वह


* शास्त्रोंमें 'श्यामा' स्त्रीके अनेक रूप निर्दिष्ट हैं। (द्रष्टव्य—'वाचस्पत्य' एवं 'शब्दकल्पद्रुम' कोश अथवा 'मोनियर विलियम' का संस्कृत-अंग्रेजी कोश)। यह मुख्यतः सुवर्णके रंगकी अत्यन्त दीप्तिमती गौरवर्णकी स्त्री होती है। यथा—
श्यामा गुणवती गौरी दिव्यालंकारभूषिता। चतुरा शीलसम्पन्ना चित्तेनारुन्धती समा॥ (पुरुषोत्तममासमाहा० ३। ४५)
अथवा—'तप्तकाञ्चनवर्णाभा सा स्त्री श्यामेति कथ्यते।'
† काम्पिल्य-फर्रूखाबाद जिलेमें कायमगंजसे ६ मील, फतेहगढ़से २८ मील पूर्वोत्तर गङ्गानदीके तटपर है। यह राजा द्रुपदकी राजधानी थी। द्रौपदीका स्वयंवर यहीं हुआ था।
‡ ब्रह्मदत्तका यह चरित्र वाल्मी०रामा०बालकाण्ड, मत्स्यपुराण अध्याय १९—२१, हरिवंश १।२२—२५, शिवपुराण उमासंहिता ४१ तथा अन्यान्य पुराणोंमें भी प्राप्त होता है।