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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ
२४२वेदान्तपरिभाषा[ वाक्यलक्षणोपपादनम्

समाधान—अर्थवाद-वाक्य के अन्तर्गत—पदों की ही प्राशस्त्यादि अर्थ में लक्षणा मान लेने पर उनमें से एक ही पद, प्राशस्त्य-द्योतक होगा और अन्य पद व्यर्थ होने लगेंगे। क्योंकि विधि-निषेधों के प्रतिपादक वचनों को ही स्वार्थ में प्रामाण्य होता है, और अर्थवाद उनके प्रत्यक्षरूप से बोधक नहीं होते। इस कारण 'अनार्थक्यमतदर्थानाम्' इस नियम से उस वेदभाग को अनार्थक्य प्राप्त होने लगेगा।

परन्तु 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इस अध्ययनविधि से प्रेरित होकर अक्षरशः ग्रहण किये जाने वाले वेदसमूह को अनार्थक्य प्राप्त होना इष्ट नहीं है। इसलिए अर्थवाद-वाक्यों की प्राशस्त्यादि अर्थ में लक्षणा स्वीकार करनी चाहिए। अतः सभी वाक्य, विधेय की स्तुति कर उसकी अवश्यकर्तव्यता का ज्ञान करा देने के कारण उन्हें अनर्थकत्व नहीं है—मानना पड़ता है।

$^१$अर्थवाद के चार प्रकार होते हैं। उनमें से 'पुराकल्प' और 'परकृति' इन दो प्रकारों का यथासंभव प्राशस्त्य अथवा निन्दा में ही अन्तर्भाव हो जाने से यहाँ स्तुति-निन्दापरक अर्थवाद से उनका भी ग्रहण कर लेना चाहिए।

शंका—लक्षणा के द्वारा अर्थवादवाक्यों को प्राशस्त्यबोधक मानने पर भी उनकी अनर्थकता (व्यर्थता) कैसे दूर होगी? क्योंकि 'जो वाक्य, विधिनिषेध का साक्षात् बोधक होता है वही सार्थक समझा जाता है', यह मीमांसा का नियम है। और अर्थवाद वाक्यों का साक्षात् विधि-निषेध बोधन न करना तो प्रसिद्ध ही है। ऐसी आशंकाके के समाधानार्थ ग्रन्थकार 'एवं च विध्यपेक्षित०' ग्रन्थ प्रारम्भ करते हैं।

स्तुतिपरक अर्थवाद, प्राशस्त्यबोधन के द्वारा विधि के साथ और निन्दापरक अर्थवाद, निषिद्ध पदार्थ के निन्दितत्व को बताते हुए निषेध के साथ एकवाक्यता को प्राप्त होते हैं। इस कारण अर्थवादों को परम्परा से विधिनिषेधबोधकत्व होता है। इसलिये उन्हें व्यर्थ नहीं कह सकते।

इस एकवाक्यता के 'पदैकवाक्यता' तथा 'वाक्यैकवाक्यता' नामक दो प्रकार हैं। इनमें से अर्थवादवाक्यों में पदैकवाक्यता ही होती है। क्योंकि विधि एवं निषेधों को प्रशस्तत्व तथा निन्दितत्व की अपेक्षा रहती है, और समग्र अर्थवादवाक्य, विहित का


१. अर्थवादश्चतुर्विधः—स्तुतिः, निन्दा, परकृतिः पुराकल्पश्चेति। (गो. सू. २।१।६४) तत्र परकृतिः एककर्तृकमुपाख्यानम्— (भाट्टदी० ६।७।२६), पुराकल्पः बहुकर्तृको विधिः— (जै. सू. वृ. अ. ६)। प्रकारान्तरेण स त्रिविधोऽर्थवादः—गुणवादः, अनुवादः, भूतार्थवादश्चेति। — (न्या. सि. मं. ४ पृ. २०) तदुक्तम्—विरोघे गुणवादः स्यादनुवादोऽवधारिते। भूतार्थवादस्तद्धानादर्थवादस्त्रिधामतः। — (न्या. सि. मं. ४ पृ. ६१) मीमांसकास्तु विधिशेषः निषेधशेषश्चेत्यर्थवादं द्वैविध्येन विभेजिरे।— (लौ. भा.)।

वाक्यैकवाक्यताविचारः ] आगमपरिच्छेदः २४३

प्राशस्त्य या निन्दित का निन्दितत्व अर्थ का ही बोधन करते हैं । इसलिए समस्त वाक्य से लक्षणा के द्वारा जितने अर्थ का ज्ञान होता है । उतने ही अर्थ का ज्ञान, प्रशस्त अथवा निन्द्य पदों से भी होता है । इस कारण प्राशस्त्यादि अर्थ, पदार्थरूप ही समझा जाता है । अतः अर्थवाद भी पदरूप है । और उसकी विधि के साथ एकवाक्यता होकर जो बोध होता है, वह पदैकवाक्यता से ही होता है । इसलिए अर्थवादों में पदैक-वाक्यता ही होती है । वाक्यैकवाक्यता नहीं होती ।

यदि अर्थवाद-वाक्यों में वाक्यैकवाक्यता नहीं होती, तो वह कहाँ होती है ? इस प्रकार अकांक्षा का उत्थापन कर उसका उत्तर ग्रन्थकार स्वयं देते हैं —

क्व तर्हि वाक्यैकवाक्यता ? । यत्र प्रत्येकं भिन्न-भिन्न-संसर्ग-प्रतिपादकयोर्वाक्ययोराकाङ्क्षावशेन महावाक्यार्थ-बोधकत्वम्¹ । यथा ‘दर्श²पूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत’ इत्यादि-वाक्यानां ‘समिधो यजति’ इत्यादि-वाक्यानां च परस्परापेक्षिताङ्गाङ्गि³-बोधक-⁴वाक्य-तयैकवाक्यता । तदुक्तं भट्टपादैः—

स्वार्थबोधे समाप्तानामङ्गाङ्गित्वाद्यपेक्षया । वाक्यानामेकवाक्यत्वं पुनः संहत्य जायते ॥ इति ।

**अर्थ—**अच्छा तो, वाक्यैकवाक्यता कहाँ होती है ? ( उत्तर— ) जहाँ भिन्न-भिन्न संसर्गप्रतिपादक ( अर्थप्रतिपादक ) दो वाक्यों को परस्पर आकांक्षा के कारण महा-वाक्यार्थ-बोधकत्व होता है वहाँ वाक्यैकवाक्यता होती है । जैसे—‘स्वर्गकाम व्यक्ति ( पुरुष ) दर्श-पूर्णमास याग करे’ इत्यादि वाक्य और ‘समिध नामक याग करे’ आदि दूसरे प्रयाजवाक्यों को परस्पर अपेक्षित अङ्गाङ्गिभावबोधकत्व होने से उनकी जो एक-वाक्यता सिद्ध होती है, वही वाक्यैकवाक्यता है । अतएव भट्टपाद ने ऐसा कहा है—प्रथमतः स्वार्थ का बोध कराकर चरितार्थ हुए वाक्यों की परस्पर अंगांगिभाव की अपेक्षा से पुनः समुदायरूप से एकवाक्यता होती है ।

**विवरण—**अर्थवादों के वाक्यरूप होने पर भी उनमें पदैकवाक्यता ही यदि संमत है तो वाक्यैकवाक्यता का उदाहरण कहाँ होगा ? इस आशंका के प्रसङ्गतः प्राप्त होने पर ग्रन्थकार वाक्यैकवाक्यता का उदाहरण बताते हैं । ‘दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत’ स्वर्गेच्छु पुरुष दर्श-पूर्णमास नामक याग करे—इस विधिवाक्य के सुनते ही ‘दर्शपूर्णमास-याग, स्वर्ग का साधन है’ यह अर्थ समझ में आता है । इसी प्रकार ‘समिधो यजति’—समिध्संज्ञक याग करे—इत्यादि विधिवाक्य से समिध् याग का विधान भी प्रतीत होता


१. 'म् तत्रवाक्यैकवाक्यता'—इति पाठान्तरम् । २. 'पोर्ण'—इति पाठान्तरम् । ३. 'ङ्गिभावबो'—इति पाठान्तरम् । ४. 'कतयैकवाक्यत्वम्'—इति पाठान्तरम् ।

२४४ | वेदान्तपरिभाषा | [ आसत्तिनिरूपणम्

है परन्तु दर्श-पूर्णमास याग से स्वर्ग कैसे संपादन किया जाय ? इस प्रकार अंगीभूत याग को अंगों की आकांक्षा होती है । उसी प्रकार 'समिधो यजति' इत्यादि प्रयाजरूप यागों का प्रत्यक्ष फल कुछ भी न बताने के कारण इस याग से क्या साध्य है ? ऐसी साध्य ( अंगी ) की आकांक्षा होती है । इस कारण प्रथमतः स्वार्थ में चारितार्थ हुए दोनों प्रकार के वाक्यों का परस्पर अन्वय होकर समिधादिरूप अंगों का अनुष्ठान कर 'दर्श-पूर्णमास याग से स्वर्ग को पाना चाहिये' इस प्रकार से जो अंगांगिभावरूप महावाक्यार्थ निष्पन्न होता है — उसी को वाक्यैकवाक्यता कहते हैं । यहाँ एक वाक्यार्थ का दूसरे वाक्यार्थ के साथ अन्वय होता है और उन दो वाक्यों से मिलकर एकरूप तात्पर्य निश्चित होता है, इसलिये इसे वाक्यैकवाक्यता कहते हैं। इसी न्याय के अनुसार अन्यत्र भी अंगबोधक एवं अंगिबोधक वाक्यों की एकवाक्यता समझ लेनी चाहिये ।

ग्रन्थकार ने अपने इस कथन में 'तदुक्तम् ०' इत्यादि ग्रन्थ से मीमांसकों की सम्मति प्रदर्शित की है । मीमांसकों का यह आशय है—प्रत्येक वाक्य की स्वसंनिहित-पदों से कर्मतादिसम्बन्ध से अन्वय होकर पदैकवाक्यता होती है, और प्रत्येक वाक्य का भिन्न-भिन्न शाब्दबोध होने पर वह वाक्य यदि अंगी याग का बोधक हो तो उसे अंग की और वह वाक्य अंग प्रतिपादक हो तो अंगी की—इस प्रकार वाक्यों में परस्पर आकांक्षा होती है । दर्श-पूर्णमास याग से स्वर्ग कैसे संपादन किया जाय—इस आकांक्षा की 'प्रयाजादि अंगों का अनुष्ठान कर दर्श-पूर्णमास याग करे' इस प्रकार निवृत्ति होने से दोनों वाक्यों का परस्पर अन्वय होकर जो एकवाक्यता ( एक तात्पर्य-प्रतिपादकत्व ) सिद्ध होता है—यही महावाक्यार्थ है और उसी को वाक्यैकवाक्यता कहते हैं ।

इसी प्रकार 'पदार्थश्च द्विविधः०' से पदार्थ के द्विविधत्व का आरम्भ किया हुआ निरूपण समाप्त कर उसका उपसंहार करते हैं और प्रकृतप्राप्त आसत्ति में शाब्दज्ञानहेतुत्व को बताते हैं ।

एवं द्विविधोऽपि पदार्थो निरूपितः ।
तदुपस्थितिश्चासत्तिः । सा च शाब्दबोधे हेतुः, तथैवान्वयव्यतिरेकदर्शनात् । एवं महावाक्यार्थ-बोधेऽवान्तरवाक्यार्थ-बोधो हेतुः, तथैवान्वयाद्यवधारणात् ।

अर्थ— इस प्रकार से शक्य और लक्ष्य दोनों पदार्थों का निरूपण कर दिया ।
पदजन्य पदार्थ की अव्यवधान से उपस्थिति को ही आसत्ति कहते हैं । वह शाब्दबोध में कारण होती है । क्योंकि आसत्ति रहने पर शाब्दबोध होता है और आसत्ति के न रहने पर शाब्दबोध नहीं होता—यह अन्वय-व्यतिरेक प्रत्यक्षतया सभी के अनुभव में आता है । इसी प्रकार महावाक्यार्थ का बोध होने में अवान्तर वाक्यों के प्रत्येक वाक्य का ज्ञान कारण होता है, क्योंकि उसके अन्वयादि का भी वैसा ही निश्चय होता है ।

तात्पर्य्यनिरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः २४५

विवरण—आसत्ति के लक्षण में 'पदजन्यपदार्थोपस्थितिः' कहा गया है। अब पदार्थ क्या है ? और वह कितने प्रकार का है ? यह आकांक्षा होने पर पदार्थ के शक्य तथा लक्ष्य भेद से दो प्रकार बताते हुए यहां तक उन्हीं का निरूपण किया गया है और अब प्रसंगप्राप्त पदार्थ-निरूपण को समाप्त कर प्रकृत आसत्ति से उसके सम्बन्ध को 'तदुपस्थितिश्च' इत्यादि वाक्यों से बताया गया और पदजन्य पदार्थ की जो अव्यवधान से उपस्थिति ( प्राप्ति ) है, उसी को आसत्ति कहते हैं। इस प्रकार पूर्व प्रकृत आसत्ति-लक्षण का उपसंहार किया है। उपर्युक्त स्वरूप की आसत्ति होने पर पदों से शाब्द-बोध होता है और वह न हो तो शाब्दबोध नहीं होता, इस अन्वय-व्यतिरेक को देखने से आसत्ति शाब्दबोध में कारण है, यह निश्चित होता है। और इसी प्रमाण के द्वारा आसत्ति और शाब्दबोध में कार्य्य-कारण भाव सिद्ध होता है।

इसी प्रकार आकांक्षा आदि के द्वारा अवान्तर वाक्यों का शाब्दबोध होने पर प्रक-रणगत समस्त वाक्यों का मिलकर एक महावाक्यार्थ-बोध होता है, और वह न हुआ हो तो महावाक्यार्थ ज्ञात नहीं होता, इस अन्वय-व्यतिरेक से उनमें भी परस्पर ऐसी ही कार्यकारणता सिद्ध होती है।

इस प्रकार शाब्दबोध में आकांक्षा, योग्यता, आसत्ति नामक तीन कारणों का प्रतिपादन कर अब क्रमप्राप्त तात्पर्यज्ञानरूप चतुर्थ अवशिष्ट कारण के निरूपण की प्रतिज्ञा करते हैं।

क्रमप्राप्तं तात्पर्यं निरूप्यते। तत्र तत्प्रतीतीच्छयोच्चरितत्वं न तात्पर्यम्। अर्थज्ञानशून्येन पुरुषेणोच्चारिताद्वेदार्थ¹प्रत्ययाभावप्रसङ्गात्। अयमध्यापको व्युत्पन्न इति विशेषदर्शनेन² तत्र तात्पर्य्यभ्रमस्याप्यभावात्। न चेश्व³रीयतात्पर्यज्ञानात् तत्र शब्दबोध इति वाच्यम्। ईश्वरानङ्गीकर्तुरपि तद्वाक्यार्थप्रतिपत्तिदर्शनात्।

अर्थ—अब क्रमप्राप्त तात्पर्य का निरूपण किया जाता है। तत्रेति। निरूपणीय तात्पर्य के लक्षण प्रमाण को बताते समय यदि 'तत्प्रतीतीच्छयोच्चरितत्वम्' विवक्षित अर्थ की ( तात्पर्य्यार्थ ) प्रतीति की इच्छा से उच्चरितत्व ( वाक्य का या शब्द का उच्चारण किया जाना )—यह तात्पर्य का लक्षण करें, तो वह ठीक नहीं होगा। क्योंकि जिस पुरुष को वाक्यार्थ ज्ञान नहीं है ऐसे के द्वारा उच्चारण किये जाने वाले वेदवाक्य से अर्थज्ञान न होने का प्रसंग आवेगा। ( अर्थज्ञानशून्य व्यक्ति के द्वारा कहे गये वेद-वाक्य से अर्थप्रतीति नहीं हो सकेगी। )


१. 'र्थभान-प्रसङ्गात्'—इति पाठान्तरम्। २. 'न तात्प'—इति पाठान्तरम्।
३. 'रतात्प'—इति पाठान्तरम्।

२४६वेदान्तपरिभाषा[ तात्पर्यंनिरूपणम्

इसके अतिरिक्त 'यह अध्यापक अव्युत्पन्न है' इस प्रकार के विशेष दर्शन ( ज्ञान ) से उसमें तात्पर्यभ्रम की अभाव रहता है, इस कारण उसे उसका ज्ञान है—यह भी नहीं कह सकते। अब यदि ऐसा कहें कि उन वाक्यों का अर्थज्ञान ईश्वर के तात्पर्य-ज्ञान से होता है वह भी ठीक नहीं क्योंकि ईश्वर का अस्तित्व न मानने वाले व्यक्ति को भी उन वाक्यों के अर्थ का ज्ञान होता देखने में आता है।

विवरण—इस परिच्छेद के आरम्भ में बताया गया है कि आकांक्षा, योग्यता, आसत्ति और तात्पर्यज्ञान--ये चार कारण, वाक्यजन्य ज्ञान में हुआ करते हैं। उनमें से आकांक्षा, योग्यता, आसत्ति—इन तीन कारणों को यहाँ तक बताया गया। अब क्रमप्राप्त तात्पर्यज्ञान नामक चौथे कारण का निरूपण करना है, इसलिये तात्पर्य किसे कहते हैं ? उसमें प्रमाण क्या है ? और वह शाब्दबोध में कैसे कारण बनता है ? इन सब बातों को बताना आवश्यक है। इस प्रकार तात्पर्य का लक्षण बताना आवश्यक होने पर प्रथमतः उसका स्वाभिमत लक्षण न बताकर, लोकप्रसिद्धि से प्रथमतः उपस्थित होने वाला नैयायिकाभिमत लक्षण बताते हैं—'वक्तुरिच्छा तु तात्पर्यम्' वक्ता की इच्छा को ही तात्पर्य कहते हैं। वक्ता के विवक्षित अर्थ की प्रतीति श्रोता को हो, इस इच्छा से उसके द्वारा उच्चारण किये हुए शब्द का तात्पर्य उसी अर्थ में होता है। इस प्रकार नैयायिकों का बताया हुआ तात्पर्य का लक्षण ठीक नहीं है। क्योंकि इस लक्षण को मानने पर, संस्कृतभाषानभिज्ञ ( पद-पदार्थ-व्युत्पत्तिहीन ) व्यक्ति के द्वारा कहे गये वेदवाक्य के अर्थ का ज्ञान ही नहीं हो सकेगा। क्योंकि वक्ता अव्युत्पन्न है। इस कारण 'मेरे द्वारा कहे गये इस वेदवाक्य से श्रोता को अमुक अर्थ की प्रतीति हो' ऐसी इच्छा से वह वेदवाक्य उसके द्वारा कहा जाना संभव ही नहीं।

इसके अतिरिक्त वक्ता को अर्थज्ञान हो, चाहे न हो किन्तु उसके द्वारा 'अग्निमीले' अक्षरों का उच्चारण होते ही सुनने वाले व्युत्पन्न व्यक्ति को तत्काल 'मैं अग्नि की स्तुति करता हूँ' इस अर्थ की प्रतीति होती दिखाई देती है।

शंका—शाब्दबोध में तात्पर्य, कारण न होकर उसका ज्ञान ही कारण होता है, इस कारण अव्युत्पन्न व्यक्ति को अपने द्वारा कहे गये वाक्य का ज्ञान न होने पर भी 'यह वक्ता अव्युत्पन्न है' यह श्रोता को ज्ञात न होने से 'इस व्यक्ति ने यह वाक्य अमुक अर्थ की प्रतीति की इच्छा से ही कहा है' ऐसा समझता है, इस प्रकार भ्रमरूप तात्पर्य-ज्ञान से उसे उस वाक्यार्थ की प्रतीति हो सकती है। तब यह कैसे कहा जा सकता है कि अव्युत्पन्न व्यक्ति के द्वारा कहे गये वाक्य से अर्थप्रतीति नहीं हो सकेगी।

समाधान—जबकि सुनने वाले को यह ज्ञात रहे कि 'यह व्यक्ति अव्युत्पन्न है', तब तो आपके कथनानुसार तात्पर्यभ्रम से ही शाब्दबोध हो सकेगा। परन्तु जब सुनने वाले को यह निश्चित रीति से ज्ञात रहे कि 'यह अध्यापक अव्युत्पन्न है' तब भी उसे वाक्यार्थबोध होता दिखाई देता है। किन्तु भ्रमरूप या प्रमारूप कोई भी तात्पर्य-

तात्पर्य्यनिरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः २४७

ज्ञान नहीं रहता, अतः नैयायिकों का यह तात्पर्य-लक्षण अव्याप्त रहता है। ऐसे अवसर पर श्रोता के अर्थज्ञान की उपपत्ति नहीं लग सकती।

**शंका—**काव्य का अध्ययन न किये हुए व्यक्ति के द्वारा भी किसी श्लोक के कहने पर उसे उसके अर्थ का ज्ञान होना संभव नहीं रहता तथापि उस श्लोक के मूलकर्ता कालिदास आदि कवि का तात्पर्यज्ञान, दूसरों को शाब्दबोध होने में कारण समझा जाता है, इसी रीति से वेदकर्ता परमेश्वर ने इस वाक्य का यही अर्थ किया है, इस इच्छा से ही वेदवाक्यों का उच्चारण किया होने से उससे तात्पर्यज्ञान से ही व्युत्पन्न श्रोताओं को उन वाक्यों के अर्थ का ज्ञान होना संभव है।

समाधान—'परमेश्वर के तात्पर्य ज्ञान से व्युत्पन्न श्रोताओं को वेदवाक्यों के अर्थ का ज्ञान हो जाता है' यह कहना ठीक नहीं है। क्योंकि 'परमेश्वर, वेदकर्ता हैं' यह सिद्धान्त जिन्हें मान्य हो उनके मत में ईश्वर के तात्पर्यज्ञान से शाब्दबोध होना मान लिया जा सकता है, किन्तु जिन्हें ईश्वर का अस्तित्व ही मान्य न हो उन चार्वाकादि नास्तिकों को वेदवाक्य से शाब्दबोध नहीं होता है, कहना पड़ेगा। परन्तु अनुभव तो विपरीत है। व्युत्पन्न व्यक्ति आस्तिक हो चाहे नास्तिक हो उसे वैदिक वाक्य के श्रवण होने पर अर्थज्ञान होता दिखाई देता है। इसलिये नैयायिकों का 'वक्तुरिच्छा तात्पर्यम्'— तात्पर्य का लक्षण निर्दोष नहीं है।

**प्रश्न—**तो आप अद्वैतवेदान्ती तात्पर्य का कौन-सा लक्षण करते हैं?

उच्यते। तत्प्रतीति-जनन-योग्यत्वं तात्पर्यम्। गेहे घट इति वाक्यं गेहे घटसंसर्ग-प्रतीति-जनन-योग्यं, न तु पटसंसर्गप्रतीति-जन-नयोग्यमिति तद्वाक्यं घटसंसर्गपरं, न तु पट-संसर्गपरं $^१$मित्युच्यते।

**अर्थ—**हमें तात्पर्य का कौन-सा लक्षण अभीष्ट है सो बताते हैं—'पदार्थों के संसर्ग का अनुभव उत्पन्न करने की वाक्य में योग्यता का होना' ही तात्पर्य है। 'घर में घट है' यह वाक्य, घर और घट के सम्बन्ध का अनुभव कराने में योग्य है। न कि गृह और पट के संसर्ग (सम्बन्ध) बोध कराने में। इसलिये 'गेहे घट:' यह वाक्य घटसंसर्गपरक (गृह और घट के संसर्ग का बोधक) है, न कि गृह और पट के संसर्ग का—ऐसा कहा जाता है।

**विवरण—**तात्पर्य का लक्षण 'तत्प्रतीतीच्छया उच्चरितत्वम्' करने पर उपर्युक्त दोष आते हैं, अतः वैसा लक्षण न कर 'तत्प्रतीतीजननयोग्यत्वम्' ही तात्पर्य का लक्षण करना उचित है। वाक्य में वक्ता के विवक्षित अर्थ का ज्ञान करा देने की योग्यता को ही तात्पर्य कहते हैं। जैसे—'घर में घट है' इस वाक्य के कहे जाने पर, वक्ता को उस


१. 'ति व्यपदिश्यते'—इति पाठान्तरम्।

२४८ वेदान्तपरिभाषा [ तात्पर्य्यनिरूपणम्

वाक्य के अर्थ का ज्ञान हो चाहे न हो, किन्तु उस वाक्य में गृह और घट के आधाराधेयभावरूप सम्बन्ध का ज्ञान करा देने की योग्यता रहती है । उस कारण श्रोता को विवक्षित अर्थ का बोध होता है । अर्थात् वाक्य में गृह और घट के आधाराधेयभावरूप सम्बन्ध के ज्ञान करा देने की जो योग्यता रहती है उसका ज्ञान ही तात्पर्यज्ञान है । इस तात्पर्यज्ञान से ही सर्वत्र शाब्दबोध होता है ।

यह तात्पर्य्यनिश्चय ( यह वाक्य इसी अर्थ का बोधक है—यह निश्चय ) उस वाक्यार्थप्रतीति के अन्वय-व्यतिरेक से ही होता है । 'गेहे घट:' वाक्य के उच्चारण करने पर गृह और घट के ही सम्बन्ध का ज्ञान होता है । गृह और पट के सम्बन्ध का ज्ञान उस वाक्य से नहीं होता । इस कारण इस वाक्य का इसी अर्थ में तात्पर्य्य है— यह निश्चित रूप से ज्ञात होता है ।

शंका—जब हमें वाक्यार्थ का बोध होगा तभी यह वाक्य एतत्परक है इस प्रकार उसका तात्पर्यबोध होगा, और तात्पर्यबोध हुए बिना वाक्यार्थज्ञान होना संभव नहीं । अर्थात् शाब्दज्ञान में तात्पर्यज्ञान की और तात्पर्यज्ञान में शाब्दबोध की अपेक्षा होती है, इसलिये आपके लक्षण पर अन्योन्याश्रय दोष आता है ।

समाधान—हमारे लक्षण पर अन्योन्याश्रय दोष नहीं आ पाता । क्योंकि 'तत्प्रतीतिजनकत्व'—विवक्षित अर्थ की प्रतीति उत्पन्न करने वाला—इतना ही यदि हमारा तात्पर्यलक्षण होता तो अन्योन्याश्रय दोष आ सकता था, किन्तु उस दोष के न आने देने के लिए ही हमने लक्षण में 'योग्यत्व' विशेषण दिया है । प्रकृत में अन्वय आदि की अनुपपत्ति न होना रूप ही योग्यता अभिप्रेत है । 'गेहे घट:' इस वाक्य के सुनने पर गेह और घट का आधाराधेयभाव संबंध से जो अन्वय होता है ( अर्थात् 'गेहे' इस सप्तम्यन्त पद का आधारता से निरूपित 'घट' इस प्रथमान्त पद के साथ जो गेहनिष्ठ आधेयता संबंध से अन्वयबोध होता है ) उसका अन्य किसी भी प्रमाण से बोध नहीं होता, इस कारण अन्वय आदि की भी अनुपपत्ति नहीं हो पाती । ऐसे पदों का वाक्य में होना ही तात्पर्य है और उसी से वाक्यार्थ का निश्चय होता है । जैसे—'गंगायां घोष:' इस वाक्य में गंगापदवाच्य प्रवाह—इस सप्तम्यन्त पद का घोषरूप प्रथमान्त पद के साथ आधेयता संबन्ध से होने वाला अन्वय अनुपपन्न होने से ही तीरूप अर्थ का ग्रहण कर उसके साथ अन्वय करना पड़ता है, जिससे अनुपपत्ति नहीं हो पाती । अर्थात् उपर्युक्त स्वरूप का तात्पर्यज्ञान ही शाब्दबोध में कारण होता है, और ऐसे तात्पर्यज्ञान में शाब्दबोध की अपेक्षा नहीं होती । इसलिये हमारे लक्षण पर अन्योन्याश्रय दोष के आने की शंका भी नहीं हो सकती । अन्वयानुपपत्ति, प्रयोजनासिद्धि और प्रकरणादि—तात्पर्य के निश्चायक होते हैं ।

इस प्रकार हमारे तात्पर्यलक्षण पर 'अव्युत्पन्न पुरुष के द्वारा उच्चारण किये हुए वेदवाक्य से अर्थबोध नहीं होगा' यह अनुपपत्ति नहीं आ सकती । क्योंकि अव्युत्पन्न के

तात्पर्यंनिरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः २४९

द्वारा कहे गये वेदवाक्य में भी 'विवक्षितअर्थ का ज्ञान करा देने की योग्यता' रूप हमारा तात्पर्यलक्षण होने से व्युत्पन्न पुरुष को वेदवाक्य का अर्थ ज्ञात हो सकता है। इसके अतिरिक्त हमारे मत में 'ईश्वर के तात्पर्यज्ञान को अर्थबोध में कारण मानना' यह कल्पनागौरव भी नहीं होता। तस्मात्—वाक्य में विवक्षित अर्थ की प्रतीति होने के योग्य (अनुकूल) पदों का होना ही तात्पर्य का लक्षण है।

शंका—आपके तात्पर्यलक्षण को मान लेने पर अनेक अर्थों में रूढ पदों से युक्त वाक्य के तत्तद् अर्थ के अनुरोध से अनेक तात्पर्य मानने होंगे। अर्थात् उक्त लक्षण की अनेकार्थक पदों से युक्त वाक्य में अतिव्याप्ति होगी। इसका समाधान स्वयं ग्रन्थकार करते हैं।

ननु 'सैन्धवमानय' इत्यादि वाक्यं यदा लवणानयन-प्रतीतीच्छया प्रयुक्तं तदा¹श्वसंसर्गे-प्रतीतिजनने स्वरूपयोग्यतासत्त्वाल्लवण-परत्व²-ज्ञानदशायामप्यश्वादि-संसर्गज्ञानापत्तिरिति चेत् । न । तदितर-प्रतीतीच्छया नुच्चरितत्वस्यापि तात्पर्यं प्रति विशेषणत्वात् । तथा च यद्वाक्यं यत्प्रतीति-जनन³-स्वरूपयोग्यत्वे सति ⁴यदन्यप्रतीतीच्छया ⁵नोच्चरितं तद्वाक्यं तत्संसर्गपरमित्युच्यते ।

अर्थ—(शंका) 'नमक लाओ' यह वाक्य श्रोता को नमक लाने का ज्ञान हो इस इच्छा से जब कहा जाय तब उस वाक्य में अश्वसंसर्ग का ज्ञान करा देने की स्वरूपयोग्यता भी रहती है इस कारण 'यह वाक्य लवणसंसर्गबोधक है' ऐसा ज्ञान होने के समय ही 'वह अश्वादिसंसर्गबोधक है' ऐसा ज्ञान भी होने लगेगा। ऐसी शंका करना ठीक नहीं है। क्योंकि तात्पर्य के लक्षण में 'विवक्षित अर्थ से भिन्न अर्थ की प्रतीति की इच्छा से उसका उच्चारण न होना' इस विशेषण का निवेश कर्तव्य है। अर्थात् जो वाक्य उस अर्थ की प्रतीति के उत्पन्न करने की स्वरूपयोग्यता से युक्त होकर भी जिस अन्य अर्थ की प्रतीति की इच्छा से उच्चरित नहीं होगा वह वाक्य उसी संसर्ग का बोधक (तत्संसर्गपरक) कहा जाता है।

**विवरण—**आपने तात्पर्य का लक्षण 'तत्प्रतीतिजनकत्व' न कर 'तत्प्रतीतिजननयोग्यत्व' किया है। अर्थात् वाक्य में विशिष्ट अर्थ की प्रतीति उत्पन्न करने की स्वरूप-


१. 'दाप्यश्व'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'त्वदशा'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'न योग्य'—इति पाठान्तरम् ।
४. 'तदन्य'—इति पाठान्तरम् ।
५. 'अनुच्चरितम्'—इति पाठान्तरम् ।

२५०वेदान्तपरिभाषा[ तात्पर्यंनिरूपणम्

योग्यता के रहने पर उसमें तात्पर्य का लक्षण घटित हो जाता है—यह आपके कहने का आशय है। परन्तु ऐसा लक्षण करने पर अनेक अर्थों में रूढ़ पदों से युक्त वाक्य में दोष आता है। जैसे कोई—व्यक्ति भोजन करते समय 'सैन्धव लाओ' यह आज्ञा सेवक को करे। उस समय सेवक 'नमक' लावें, यही उसकी विवक्षा होना उचित है। किन्तु 'सैन्धव' पद के 'नमक' और 'घोड़ा' दोनों अर्थ होते हैं। इस कारण उस पद में लवण का बोध करा देने की जैसी योग्यता है वैसी ही अश्व की प्रतीति करा देने की भी योग्यता है। इस कारण श्रोता को उस वाक्य के श्रवण करते ही 'नमक' लाने का जैसे ज्ञान होता है, वैसे ही 'घोड़ा' लाने का भी ज्ञान होता है। क्योंकि सैन्धव शब्द दोनों अर्थों का ज्ञान कराने की योग्यता रखता है। तथापि सेवक, स्वामी के उस वाक्य को सुनकर 'घोड़ा' एवं 'नमक' दोनों पदार्थों को नहीं लाता है। किन्तु उस वाक्य से उसे केवल 'लवण' लाने की ही प्रतीति होता है। अतः 'स्वरूपयोग्यत्व' को तात्पर्य-लक्षण मानकर अनेकार्थक पदवाले वाक्य में वक्ता की इच्छा का भी अन्तर्भाव न कर उसकी आप कैसी उपपत्ति लगावेंगे ? यह आशय 'ननु' इत्यादि शंका ग्रन्थ का है।

परन्तु ऐसी शंका करना उचित नहीं है। क्योंकि हमें 'तत्प्रतीतिजननयोग्यत्व' इतना ही तात्पर्यलक्षण अभिप्रेत न होकर उसमें 'तदन्यप्रतीतीच्छयाऽनुच्चरितत्व' यह तात्पर्य विशेषण भी विवक्षित है। इस विशेषण का निवेश करने पर तात्पर्यलक्षण का स्वरूप 'तथा च०' इत्यादि ग्रन्थ से बताया है।

वक्ता के विवक्षित अर्थ की प्रतीति करा देने की योग्यता (सामर्थ्य) जिस वाक्य में होती है एवं जो वाक्य विवक्षित अर्थ से भिन्न अर्थ को बताने की इच्छा से उच्चारण नहीं किया हुआ हो—वही उसका तात्पर्य है। ऐसा तात्पर्य का लक्षण करने पर 'एक ही वाक्य से दो अर्थों की प्रतीति होगी' यह शंका नहीं हो सकती। भोजन के समय वक्ता के द्वारा 'सैन्धव लाओ' वाक्य का उच्चारण, श्रोता को लवण से भिन्न अश्वादि पदार्थ के बोधन की इच्छा से नहीं किया जाता। उस वाक्य में 'लवणप्रतीतिजनन-योग्यता' होती है और लवणेतर पदार्थ की प्रतीति की इच्छा से उसका उच्चारण भी नहीं रहता। इसलिये सेवक को उस वाक्य के सुनते ही 'लवणकर्मक आनयन' = जिसमें लवण कर्म है ऐसी 'आनयन' क्रिया का बोध होता है। अश्वकर्मक आनयन रूप संसर्ग का उससे बोध नहीं होता।

शंका—वक्ता ने 'सैन्धवमानय' वाक्य, अश्वप्रतीति की इच्छा से नहीं कहा, अपितु लवणप्रतीति की इच्छा से ही कहा है—यह उस श्रोता को कैसे ज्ञात हो ? इस प्रश्न के उत्तर में 'प्रकरण आदि' अर्थ निश्चायक होते हैं, पहले कह चुके हैं—भोजनप्रसंग में उस वाक्य के कहे जाने से अश्वप्रतीति की इच्छा से वह कहा गया है—यह बोध होना तो सम्भव ही नहीं, अतः 'तदन्यप्रतीतीच्छयाऽनुच्चरितत्व' इस तात्पर्य-विशेषण का लक्षण में अन्तर्भाव करने से पूर्वोक्त दोष नहीं आता। और केवल लवणपरक अर्थ की

तात्पर्य्यनिरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः २५१

भी उपपत्ति लग जाती है—इस कारण तात्पर्य्यलक्षण में इच्छादि विशेषणों का निवेश नहीं करना पड़ता ।

इस प्रकार तात्पर्य्यलक्षण में इच्छादि विशेषणों का सन्निवेश न करने से ही 'शुकादि' वाक्यों की व्यवस्था लगती है तथा पूर्वोक्त अव्युत्पन्न व्यक्ति के द्वारा कहे गये वेदवाक्य में भी उसकी अव्याप्ति नहीं हो पाती—इत्यादि, ग्रन्थकार स्वयं कहते हैं—

शुकादिवाक्येऽव्युत्पन्नोच्चरित-वेदवाक्यादौ च तत्प्रतीतीच्छाया एवाभावेन¹ तदन्यप्रतीतीच्छयोच्चरितत्वाभावेन लक्षणसत्त्वान्नाव्याप्तिः । न चोभयप्रतीतीच्छयोच्चरितेऽव्याप्तिः । तदन्यमात्र-प्रतीतीच्छयाऽनुच्चरितत्वस्य विवक्षितत्वात् ।

अर्थ—शुक से कहे गये वाक्य में एवं अव्युत्पन्न व्यक्ति से बोले गये वेदवाक्य में वक्ता की विशेषार्थप्रतीतिविषयक इच्छा ही नहीं रहती । इस कारण अन्यार्थ प्रतीति की इच्छा से उस वाक्य को बोला गया है यह नहीं कहा जा सकता, इसलिये 'तदितरप्रतीतीच्छया अनुच्चरितत्व' लक्षण उन वाक्यों में घटित होने से अव्याप्ति नहीं हो पाती ।

शंका—जो वाक्य दोनों अर्थों की प्रतीति की इच्छा से कहा हो उसमें अव्याप्ति होगी क्योंकि उसमें तदितरप्रतीतीच्छया अनुच्चारितत्व नहीं रहता ।

परन्तु यह शंका ठीक नहीं, क्योंकि 'तदितरप्रतीतीच्छया अनुच्चरितत्व' विशेषण का 'तदन्यमात्रप्रतीतीच्छयाऽनुच्चरितत्व' रूप अर्थ हमें विवक्षित है । उभयप्रतीति की इच्छा से उच्चारण किया हुआ वाक्य, केवल तदन्य अर्थ की ही प्रतीति की इच्छा से नहीं कहा रहता, इसलिये वहाँ पर लक्षण की अव्याप्ति नहीं हो पाती ।

विवरण—'तत्प्रतीतिजननयोग्यत्व' होकर तदितरप्रतीतीच्छा से अनुच्चरितत्व' रूप तात्पर्य का लक्षण मानने पर अर्थात् इस प्रकार इच्छाघटित लक्षण के स्वीकार करने पर शुकोच्चारित वाक्य में अव्याप्ति होती है, क्योंकि उच्चारण करते समय 'अमुक अर्थ की प्रतीति हो' या तद्भिन्न अर्थ की प्रतीती न हो' इत्यादि किसी प्रकार की इच्छा शुक में नहीं होती । इस शंका का निराकरण इस प्रकार किया जाता है कि—तोता जब 'स्वतः प्रमाणं परतः प्रमाणम्' आदि पढ़ाए हुए वाक्यों को बोलता है तब उसके मन में 'इस वाक्य से श्रोता को अमुक अर्थ का बोध हो' इत्याकारक इच्छा जैसे नहीं रहती वैसी ही 'इससे भिन्न अर्थ की श्रोता को प्रतीति न हो' इत्याकारक इच्छा भी नहीं रहती । अर्थात् वह वाक्य उसने तदितरप्रतीत की इच्छा से उच्चारणकिया हुआ नहीं रहता, पर विशिष्ट अर्थ का ज्ञान करा देने की योग्यता तो उस वाक्य में होती है, अतः हमारा तात्पर्य्यलक्षण वहाँ घटित होने से लक्षण-समन्वय हो जाता है इस कारण अव्याप्ति


१. 'भावात्'—इति पाठान्तरम् ।

२५२वेदान्तपरिभाषा[ तात्पर्य्यनिरूपणम्

न होने से ही उस वाक्य से अर्थबोध होता है। इसी प्रकार अव्युत्पन्न व्यक्ति के द्वारा कहा गया वेदवाक्य भी विवक्षित अर्थ या तद्भिन्न अर्थ की इच्छा से उच्चारण किया नहीं रहता पर अर्थप्रतीतिजननयोग्यत्व उस वाक्य में होता है, इस कारण ऐसे वाक्य में तात्पर्य-लक्षण का समन्वय होता है और ऐसा तात्पर्यज्ञान होने से ही 'अर्थप्रत्ययाभाव-प्रसंग' नहीं होता।

शंका—तात्पर्य का उक्त लक्षण स्वीकार करने से अव्युत्पन्न व्यक्ति के उच्चरित वाक्य में दोष न आने पर भी अन्यत्र दोष आवेगा। जैसे कोई ज्ञानवान् वक्ता जब दोनों अर्थों की इच्छा से किसी वाक्य को बोलता हो उस समय उसका वह वाक्य तदितर प्रतीति की इच्छा से अनुच्चरित है, नहीं कह सकते। अतः उक्त लक्षण इस वाक्य में घटित न होने से दोनों अर्थों का बोध होता है—यह अनुपपत्ति दोष आपके मत में आता है अर्थात् तात्पर्यलक्षण की यहाँ अव्याप्ति है। जो विवक्षित अर्थ की इच्छा से वाक्य बोल सकता है वह उस वाक्य को भिन्नार्थप्रतीति की इच्छा से भी बोल सकता है। अर्थज्ञानरहित वक्ता में भिन्नार्थप्रतीति की इच्छा से उच्चारण करने की योग्यता ही नहीं होती।

'तदन्यमात्र०' इत्यादि वाक्य से इस शंका का निराकरण किया है। 'तदितर-प्रतीतीच्छयाऽनुच्चरितत्वम्' विशेषण के 'तदितर' पद का 'तदन्यमात्र' अर्थ विवक्षित है। अर्थात् वक्ता के द्वारा कहा हुआ वाक्य दोनों अर्थों की विवक्षा से उच्चारण करने पर भी कोई क्षति नहीं है, क्योंकि उन दोनों अर्थों में उस वाक्य का तात्पर्य है। हमारा कहना केवल इतना ही है कि वह वाक्य तदन्य अर्थ की प्रतीति की इच्छा से उच्चरित नहीं होना चाहिये—यही उस विशेषण का अर्थ है। जब कोई व्यक्ति 'सैन्धव लाओ' इस एक ही वाक्य को गमनोपयोगी अश्व एवं भोजनोपयोगी लवण—इन दोनों अर्थों की प्रतीति की इच्छा से बोलता है, तब लवणभिन्न जो अश्व अथवा अश्वभिन्न जो लवण—इनकी विवक्षा से वक्ता उस वाक्य को वैसा कहता है, केवल अश्व या केवल तदन्य लवण अर्थ से उस वाक्य का उच्चारण ही नहीं रहता। अतः उक्त तात्पर्यलक्षण की ऐसी स्थल में अव्याप्ति नहीं होती।

शंका—'सकृदुच्चरितः शब्दः सकृदेवार्थं गमयति' एक बार उच्चारण किया हुआ शब्द एक समय एक ही अर्थ का बोध कराता है। यह नियम होने से 'अन्यायश्चाने-कार्थत्वम्' को आप मानते हैं, और यहाँ 'सैन्धवमानय' यह एक ही वाक्य, अश्व-लवण-उभयप्रतीति की इच्छा से उच्चरित है—यह कैसे कहते हैं ?

समाधान—एक ही बार कहे हुए 'सैन्धवमानय' वाक्य से युगपत ( एक ही साथ ) अश्व एवं लवण दोनों अर्थों का ज्ञान होता है—ऐसा हम नहीं मानते। वक्ता के द्वारा वह वाक्य यद्यपि एक बार ही उच्चरित रहता है तथापि वक्ता के तात्पर्य को समझकर सुनने वाला व्यक्ति उस वाक्य की अपने मन में आवृत्ति करता है ( उस वाक्य को

तात्पर्य्यनिरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः २५३

दोहराता है ) और उसे प्रथम लवण की तदनन्तर अश्व की क्रमशः प्रतीति होती है। अतः उक्त नियम के साथ कोई विरोध नहीं है।

इस प्रकार 'तत्प्रतीतिजननयोग्यत्वे सति तदन्यमात्रप्रतीतीच्छयाऽनुच्चरितत्वम्' यह तात्पर्य का निष्कृष्ट लक्षण सिद्ध होता है। इसका आशय यह है कि 'विशिष्ट अर्थ का ज्ञान करा देने की स्वरूपयोग्यता होते हुए उस अर्थ से भिन्न अर्थ की प्रतीति की इच्छा से उस वाक्य का उच्चरित न होना' इस प्रकार तात्पर्य के ज्ञात होने पर शाब्दबोध होता है तब इस तात्पर्यलक्षण पर किसी प्रकार का दोष नहीं आने पाता।

शंका—तत्प्रतीतिजननयोग्यता का अवच्छेदक क्या है ? अर्थात् विशिष्ट अर्थ का ज्ञान करा देने की योग्यता, शब्द में किस कारण आती है ? क्योंकि 'तत्प्रतीतीच्छया उच्चरितत्वम्' को अवच्छेदक मानें तो अव्युत्पन्न व्यक्ति के द्वारा कहे हुए वेदवाक्य में अव्याप्ति होती है। अतः प्रकृत में 'योग्यतावच्छेदक' किसे मानते हैं ? इस शंका को शान्त करने के लिए ग्रन्थकार स्वयं योग्यता के अवच्छेदक को बताते हैं—

उक्त-प्रतीति¹-मात्रजनन-योग्यतायाश्चावच्छेदिका शक्तिः, अस्माकं तु मते सर्वत्र कारणतायाः शक्ते²रेवावच्छेदकत्वान्न² कोऽपि दोषः ।

अर्थ— उक्त यावत् शाब्दप्रतीतिजननयोग्यता की अवच्छेदक 'शक्ति' ही है। हमारे मत में सर्वत्र 'शक्ति' को ही कारणता का अवच्छेदक माना है। इस कारण किसी प्रकार का दोष नहीं है।

विवरण— 'तत्प्रतीतीच्छया उच्चरितत्वम्' को योग्यता का अवच्छेदक मानने में अव्युत्पन्नोच्चरित—वाक्य में दोष आता है, इसलिए वैसा अवच्छेदक स्वीकार न कर 'शक्ति' को ही यावत् ( समस्त ) शाब्दबोधों की कारणता का अवच्छेदक स्वीकार करते हैं। अर्थात् शब्द में विशिष्ट शक्ति होने पर विशिष्टार्थ—प्रतीति करा देने की योग्यता रहती है—समझना चाहिए। 'सैन्धवमानय' यही वाक्य केवल लवण-विवक्षा से जब कहा गया हो तब 'लवणप्रतीतीच्छया उच्चरितत्व' कारणतावच्छेदक होता है और वही वाक्य, उभय ( अश्व और लवण ) प्रतीति की इच्छा से कहा हो तब 'तदन्यमात्र-प्रतीतीच्छया अनुच्चरितत्व' आदि भिन्न-भिन्न अवच्छेदक स्वीकार करने की अपेक्षा समस्त शाब्द ( शब्दजन्य ) बोधों में 'शक्ति' को ही कारणतावच्छेदक मानने में लाघव है।

किं बहुना केवल शब्दजन्य ज्ञान की जो कारणता उसी का अवच्छेदक 'शक्ति' न होकर संसार की समस्त कार्यों की कारणता का भी 'कार्यानुकूलशक्ति' को ही हमने अवच्छेदक माना है। तब शाब्दज्ञान की कारणता में अवच्छेदक 'शक्ति' है—इसे पृथक्


१. 'तिजनन'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'त्वादिति न'-इति पाठान्तरम् ।

२५४ | वेदान्तपरिभाषा | [ तात्पर्यस्य शाब्दबोधहेतुत्वम्

बताने की आवश्यकता नहीं रहती। ऐसा मानने पर तृण, अरणि, मणि आदि में दाह-जनकत्व का भिन्न-भिन्न तृणत्वादि को अवच्छेदक मानने का गौरव भी नहीं हो पाता, या अननुगमदोष भी नहीं हो पाता।

यहाँ पर शाब्दबोध की अवच्छेदक शक्ति का अर्थ आलंकारिकों के मतानुसार 'सामान्यवृत्ति' समझना चाहिए। आलंकारिक जिस प्रकार शक्य और लक्ष्य अर्थों में पदों की शक्ति ही मानते हैं अर्थात् 'वृत्ति' शब्द के समान ही 'शक्ति' शब्द का अर्थ मानते हैं, उसी प्रकार प्रकृत में ग्रन्थकार ने 'वृत्ति' अर्थ में 'शक्ति' शब्द को मानकर विवेचन किया है। इस कारण 'गम्भीरायां नद्यां घोष:' आदि स्थलों में तीरादितात्पर्य की अनुपपत्ति होगी, क्योंकि यहाँ पर 'गंगा शब्द की तीर अर्थ में शक्ति नहीं है' इस शंका का निराकरण हो जाता है तस्मात् यह तात्पर्य का स्वरूप निर्दुष्ट है।

शंका—शाब्दज्ञान में तात्पर्य को कारण आप कैसे कहते हैं? क्योंकि विवरणाचार्य ने शाब्दबोध में तात्पर्यज्ञान की आवश्यकता का निषेध किया है। इस शंका का उत्तर ग्रन्थकार दे रहे हैं—

एवं तात्पर्यस्य तत्प्रतीतिजनकत्वरूपस्य शाब्दज्ञान-जनकत्वे सिद्धे चतुर्थवर्णके तात्पर्यस्य शाब्दज्ञान-हेतुत्व-निराकरण-वाक्यं तत्प्रतीतीच्छयोच्चरितत्वरूप-तात्पर्यनिराकरणपरम्, अन्यथा तात्पर्य-निश्चय-फलक-वेदान्तविचार-वैयर्थ्य-प्रसङ्गात् ।

अर्थ— इस प्रकार तत्प्रतीतिजनकत्वरूप तात्पर्यज्ञान, शाब्दज्ञान में कारण सिद्ध होने से चतुर्थवर्णक में विवरणाचार्य ने 'शाब्दबोध में तात्पर्यज्ञान कारण है' इस मत के निरसनार्थ जो वाक्य लिखा है वह 'तत्प्रतीतीच्छयोच्चरितत्व' नैयायिकोक्त लक्षण की अयुक्तता दर्शित करने के लिए है। अन्यथा उपनिषद्वाक्यों के तात्पर्य का निर्णय करने के लिए प्रवृत्त वेदान्तवाक्य-विचाररूप उत्तरमीमांसा व्यर्थ हो जायेगी।

विवरण— ब्रह्मसूत्र के प्रथम अध्याय के चतुःसूत्री (चार सूत्रों) पर भगवत्पूज्यपाद श्रीशंकराचार्य का भाष्य है। उस पर उन्हीं के शिष्य श्रीपद्मपादाचार्य की टीका है, जिसे 'पञ्चपादिका' कहते हैं। उस पञ्चपादिका पर श्रीप्रकाशत्ममुनि ने व्याख्या रची है, उसे विवरण कहते हैं। इसमें प्रथम सूत्र के चार वर्णक कर विवरण किया है, उनमें से चतुर्थ वर्णक में 'अत्रेदं विचार्यं, किं तात्पर्यमर्थप्रमितिहेतुः किंवा प्रतिबन्धनिरासहेतुरिति ?' यहाँ यह विचार करना है कि अर्थ यथार्थ ज्ञान होने में तात्पर्य कारण है या अर्थनिश्चय के प्रतिबन्ध की निवृत्ति के लिए उसकी आवश्यकता है?—ऐसा विकल्प कर 'अर्थज्ञान में तात्पर्यज्ञान कारण नहीं है' कहा है, और यहाँ पर तो आप तात्पर्यज्ञान को शाब्दबोध में कारण बता रहे हैं, यह कैसे हो सकता है? इस शंका का उद्भव होने पर श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्र कहते हैं—विवरणाचार्य के आशय को न समझने के कारण

विवरणस्याशयः ] आगमपरिच्छेदः २५५

उपर्युक्त शंका उत्पन्न हुई है। क्योंकि प्रमाणसिद्ध वस्तु का निषेध कोई भी नहीं कर सकता। उपर्युक्त तात्पर्यज्ञान से शाब्दबोध होता है —यह अनुभव सभी को होने के कारण अनुभवसिद्ध वस्तु का निषेध विवरणाचार्य भी कैसे करेंगे। तस्मात् उन्होंने जो तात्पर्य का निषेध किया है वह नैयायिकाभिमत 'तत्प्रतीतीच्छया उच्चरितत्व' रूप तात्पर्य का ही किया है, यह समझना चाहिए। क्योंकि वैसे तात्पर्यज्ञान को शाब्दबोध में कारण मानना सदोष है। हमारे उपर्युक्त लक्षण पर किसी प्रकार दोष न आने से उसका निषेध करने का उनका उद्देश्य नहीं है। क्योंकि तात्पर्यज्ञान शाब्दबोध की कारणता सर्वथैव नहीं होती—यह मत यदि उनका होता तो वे वेदान्तों (उपनिषदों) के तात्पर्य-निर्णयार्थ प्रवृत्त--शारीरिक भाष्य के आधार पर 'विवरण' टीका ही न करते। क्योंकि जिस तात्पर्यज्ञान का अर्थज्ञान में उपयोग नहीं है, उस तात्पर्य के निश्चयार्थ किया हुआ उपक्रमोपसंहारादि तात्पर्यनिर्णायक षड्विधलिंगों का विचार व्यर्थ होने लगेगा।

इसके अतिरिक्त 'तन्तु समन्वयात्' सूत्र के भाष्य में आचार्य ने 'सर्वेषु वेदान्तेषु वाक्यानि तात्पर्येणैतस्यैवार्थस्य प्रतिपादकत्वेन समनुगतानि' कहा है, उसके साथ भी विरोध होगा इसलिए ऐसी मूलोच्छेदक कल्पना न कर उक्तार्थ में ही विवरणाचार्य का तात्पर्य मानना योग्य होगा।

अत्र रत्नकार आदि के मत से उपर्युक्त तात्पर्य-निरसनपरक विवरण ग्रन्थ की उपपत्ति बताते हैं।

केचित्तु शाब्दज्ञानत्वावच्छेदेन न तात्पर्यज्ञानं हेतुरित्येवं परं चतुर्थवर्णकवाक्यम्। तात्पर्य-संशय-विपर्ययोत्तर शाब्दज्ञानविशेषे च तात्पर्यज्ञानं हेतुरेव। इदं वाक्यमेतत्परम्? उतान्यपरमिति¹ संशये तद्विपर्यये च तदुत्तर वाक्यार्थ²-विशेषनिश्चयस्य तात्पर्य्निश्चयं विनाऽनुपपत्तेरित्याहुः।

**अर्थ—**कुछ लोग 'शाब्दज्ञानत्व के अवच्छेद से (यावत्-शब्दज्ञान में) तात्पर्यज्ञान कारण नहीं है, एतत्परक वह चतुर्थ वर्णक में वाक्य है। तात्पर्य में संशय अथवा विपर्यय (भ्रम) होने पर जो विशेष शाब्दबोध होता है, उसमें तो तात्पर्यज्ञान, कारण होता ही है। यह वाक्य एतत्पर (इस अर्थ का बोधक) है, या अन्यपरक है? ऐसा संशय होने पर या अन्यपर ही है—यह भ्रम होने पर पश्चात् वाक्यार्थ का जो विशेष निर्णय होता है उसकी उपपत्ति तात्पर्यनिश्चय के बिना नहीं हो पाती' ऐसा कहते हैं।


१. 'तात्पर्य सं०'-इति पाठान्तरम्।
२. 'र्थनि०'-इति पाठान्तरम्।

२५६ | वेदान्तपरिभाषा | [ तात्पर्यग्रहोपायः

विवरण—रत्नकार आदि कहते हैं कि 'किसी विशेष स्थल पर यद्यपि शाब्दबोध को तात्पर्यज्ञान की अपेक्षा रहती है तथापि शाब्दबोध में सर्वत्र तात्पर्यज्ञान कारण नहीं होता' इस कथन में ही विवरण-वाक्य का तात्पर्य है। इस कारण उन्होंने तात्पर्यज्ञान का सर्वथा निषेध किया है, नहीं कहा जाता और स्वीकार किया है—यह भी नहीं कहा जा सकता। मूल में 'शाब्दज्ञानत्वावच्छेदेन' का यही अर्थ है--शाब्दज्ञानत्व के अवच्छेद से (व्याप्ति से) अर्थात् शाब्दज्ञान में तात्पर्यज्ञान कारण नहीं है (जहाँ शाब्दज्ञानत्व है वहाँ तात्पर्यज्ञान है), इस प्रकार उनकी (शाब्दज्ञानत्व और तात्पर्यज्ञान की) व्याप्ति नहीं है। किन्तु जहाँ वाक्यार्थज्ञान में--इस वाक्य का यही अर्थ है या अन्य अर्थ है—संशय हुआ हो वहाँ तात्पर्यज्ञान का वाक्यार्थज्ञान में उपयोग होता है। किंवा वक्ता के आशय को न समझ कर यदि विपरीत अर्थ किसी को भासित हुआ हो तो उसकी निवृत्ति के लिए वहाँ पर उतना तात्पर्यज्ञान उपयुक्त होता है। इतरत्र शाब्दज्ञान होते हुए भी तात्पर्यज्ञान वहाँ कारण नहीं रहता। अर्थात् स्थल विशेष पर तात्पर्यज्ञान की शाब्दबोध में अपेक्षा होती है। समस्त शाब्दबोध, तात्पर्यज्ञान के पश्चात् ही हों ऐसा नियम नहीं है। तात्पर्यज्ञान में शाब्दज्ञान की कारणता का निषेध करने में विवरणाचार्य का यही अभिप्राय है। इस रीति से रत्नकार आदिकों ने तात्पर्यज्ञान में कारणता की उपपत्ति को बताया है।

'आहुः' कहकर ग्रन्थकार ने उपर्युक्त समाधान पर अपनी अरुचि सूचित की है। उसका कारण भी यही है कि सामान्यतः समस्त शाब्दबोधों में तात्पर्यज्ञान को ही कारण माना जाय तो शाब्दज्ञाननिष्ठ कार्यता का अवच्छेदक, शाब्दज्ञानत्व ही होगा, परन्तु ऐसा न मानकर संशय—विपर्ययोत्तरशाब्दज्ञान में ही तात्पर्यज्ञान कारण होता है—यदि स्वीकार करें तो 'संशयविपर्ययोत्तरशाब्दज्ञानत्व' इतना गुरुभूत कार्यतावच्छेदक मानना पड़ता है, तथापि कार्यभेद से कारण का और कारणतावच्छेदक आदि का भेद यदि मानना हो तो इस मत को भी स्वीकार किया जाय। पूर्वाचार्यों के वचन से हमारे मत का विरोध नहीं हो पाता। यह दोनों समाधानों से सिद्ध है।

शंका—तात्पर्यज्ञान, शाब्दबोध में कारण है—यह सिद्ध होने पर भी वह तात्पर्य-ज्ञान किससे होता है ? तब मूलकार उत्तर देते हैं—

तच्च तात्पर्यं वेदे मीमांसा परिशोधित-न्यायादेवावधार्यते, लोके तु प्रकरणादिना। तत्र लौकिक-वाक्यानां मानान्तरावगतार्था¹-नुवादकत्वम्। वेदे तु वाक्यार्थस्यापूर्व्वतया नानुवादकत्वम्।

अर्थ—और वह तात्पर्य, वेदवाक्यों में मीमांसा के द्वारा परिशोधित न्यायों से ही निश्चित होता है। परन्तु लौकिकवाक्यों में प्रकरणादिकों से (तात्पर्य का निश्चय होता है)।


१. 'र्थतयानु०'-इति पाठान्तरम्।

विवरणवाक्याशयः ] आगमपरिच्छेदः २५७

**तत्र—**लौकिक-वैदिक वाक्यों में से लौकिक वाक्य तो प्रमाणान्तरों से ज्ञात हुए अर्थ का ही अनुवाद करते हैं। परन्तु वैदिक वाक्यों का अर्थ, प्रमाणान्तर से अज्ञात होने के कारण अनुवाद रूप नहीं होता।

**विवरण—**लौकिक और वैदिक भेद से शब्द के दो प्रकार हैं। वैदिक वाक्यों के तात्पर्य का निश्चय पूर्वोत्तर-मीमांसारूप पूजित-विचार से सिद्ध हुए निर्दुष्ट न्यायों के द्वारा ही होना चाहिये। बिना मीमांसा के वेदों का यथार्थ तात्पर्य ज्ञात होना संभव ही नहीं। वेदों के पूर्वोत्तर काण्डों के तात्पर्य-निर्णयार्थ ही पूर्वोत्तर मीमांसाएं प्रवृत्त हुई हैं। इस कारण वैदिक वाक्यों का तात्पर्यज्ञान, मीमांसा-न्यायों के अधीन होता है।

लौकिक वाक्यों का तात्पर्य प्रकरणादिकों से ज्ञात होता है। उदाहरण 'देवः प्रमाणम्' वाक्य है। यह राजप्रकरण में पठित होने से यहाँ देव शब्द का राजा अर्थ में तात्पर्य है—निश्चित होता है। प्रकरणादि के 'आदि' पद से लिंग, औचित्य आदि का ग्रहण करना चाहिये। इस विषय में अभियुक्तों का वचन है—

'अर्थात् प्रकरणाल्लिङ्गादौचित्याद्देशकालतः।
शब्दार्थास्तु विभिद्यन्ते न रूपादेव केवलात्॥'

अर्थ (प्रयोजन), प्रकरण, लिङ्ग (शब्दसामर्थ्य), औचित्य, देश और काल से शब्दार्थों का भेद होता है। केवल शब्दस्वरूप से शब्दार्थ में भेद नहीं होता।

लौकिक और वैदिक वाक्यों में एक विशेष यह भी है कि—लौकिक वाक्य जिस अर्थ को बताते हैं, वह प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाणों से अवगत (ज्ञात) ही रहता है, अपूर्व नहीं होता। इस कारण लौकिक वाक्यों में सिद्ध वस्तुओं का अनुवादकत्व ही रहता है। अपूर्वार्थप्रतिपादकत्वरूप स्वतः प्रामाण्य नहीं होता। किन्तु वेदमूलकत्वेन प्रामाण्य होता है। वैदिक वाक्यों की यह स्थिति नहीं है। वे जिस अर्थ को बताते हैं वह पहले किसी भी अन्य प्रमाण से ज्ञात नहीं रहता। इसलिये वैदिक वाक्य, अनुवादरूप न होकर अपूर्व (पुरुषबुद्धि से अगम्य) अर्थ का प्रतिपादन करते हैं। इसी कारण उन्हें (वैदिक वाक्यों को) अज्ञातार्थज्ञापकत्वरूप प्रामाण्य होता है।

पूर्व मीमांसक कार्यपरक (साक्षात् विधि-निषेधबोधक) शब्दों का ही स्वार्थ में प्रामाण्य मानते हैं। उनका कहना है कि—व्यवहार में दिखाई देता है कि उत्तमवृद्ध पुरुष (वृद्ध आदमी), मध्यमवृद्ध (तरुण पुरुष) को 'गाय लाओ' 'बछड़ा बांध' इत्यादि आज्ञा देता है। यह सब समीप बैठा बालक देखता रहता है और उससे उसे आनयनादि-क्रियान्वित ही 'गो' आदि पदों का अर्थबोध (शक्तिग्रह) होता है। इस कारण केवल सिद्धवस्तुप्रतिपादक शब्दों से शक्तिग्रह होना संभव ही नहीं। इसीकारण कार्य-बोधकत्वेन रूपेण ही शब्दों का प्रामाण्य सिद्ध होता है। सिद्धार्थप्रतिपादक वाक्यों में प्रामाण्य नहीं कह सकते। इसी अभिप्राय से उन्होंने 'आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्य-मतदर्थानाम्' कहा है।

२५८ | वेदान्तपरिभाषा | [ सिद्धार्थवाक्यानामपि प्रामाण्यम्

पूर्वमीमांसकों के इस मत का निरसन करने के लिये ग्रन्थकार कहते हैं—

तत्र लोके वेदे च कार्यपराणामिव सिद्धार्थानामपि ¹ प्रामाण्यम्, पुत्रस्ते जात ² ईत्यादिषु सिद्धार्थेष्व ³ पि पदानां सामर्थ्यावधारणात् । अत एव वेदान्तवाक्यानां ब्रह्मणि प्रामाण्यम् । यथा चैतत्तथा विषय-परिच्छेदे वक्ष्यते ।

अर्थ—'तत्र'—लोक और वेद में कार्यबोधक शब्दों के समान सिद्धार्थ-बोधक शब्दों में ही प्रामाण्य होता है। क्योंकि 'तुम्हें पुत्र हुआ है' इत्यादि वाक्यों में सिद्ध अर्थ का ही प्रतिपादन होने पर भी उनके पदों के सामर्थ्य (शक्ति) का निश्चय हम कर पाते हैं इसी कारण उपनिषद्-वाक्यों को ब्रह्म के विषय में प्रामाण्य माना जाता है, उसका प्रकार विषयपरिच्छेद में बतावेंगे ।

**विवरण—**कार्यपरक शब्दों के समान सिद्धार्थप्रतिपादक शब्दों का भी प्रामाण्य अवश्य स्वीकार करना चाहिये । क्योंकि कार्यपरक शब्दों से जिस प्रकार उन शब्दों का सामर्थ्य समझ में आता है उसी प्रकार 'तुम्हें पुत्र हुआ है' इत्यादि सिद्धार्थपरक शब्दों का भी शक्तिग्रह हमें होता है । 'पुत्रस्ते जातः' किसी को कहने पर सुनने वाले की मुद्रा प्रसन्न होती है, वैसे ही 'कन्या ते गर्भिणी जाता' = तेरी कन्या (अविवाहित पुत्र) गर्भिणी है—इस वाक्य के सुनते ही श्रोता की मुखमुद्रा अप्रसन्न दीखती है । इस मुखप्रसाद और मुखमालिन्य रूप लिंग से उसके हर्षविषाद का अनुमान होता है । उपर्युक्त वाक्य से उक्त अर्थ उस पुरुष को यदि ज्ञात न हुआ होता तो उसके मुख पर ऐसा परिणाम हुआ न दिखाई देता । इस अर्थापत्तिरूप प्रमाण से इस पुरुष को उक्त सिद्धार्थबोधक वाक्यों से भी शाब्दबोध (शक्तिग्रह) होता है । तस्मात् कार्यपरक शब्दों के शक्तिग्रह के समान सिद्धार्थक पदों का भी शक्तिग्रह स्वीकार करना चाहिये, जिससे सिद्धार्थक पदों में भी प्रामाण्य अर्थादेव सिद्ध हो जाता है । क्योंकि जैसे कार्यपरक वाक्य से प्रमात्मक—(यथार्थ) ज्ञान पैदा होता है वैसे ही सिद्धार्थबोधक वाक्य से भी प्रमात्मक ज्ञान पैदा होता है । अर्थात् उसके 'प्रमाकरणत्व' रूप प्रामाण्य का कोई निषेध नहीं कर सकता । 'आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्य०' इत्यादि सूत्र के द्वारा पूर्व काण्ड के मन्त्र तथा अर्थवादरूप वेदभाग में प्रामाण्य नहीं है, इस आशय से पूर्वपक्ष को उठाया गया है । इस कारण स्वतन्त्र-फल-रहित मन्त्रादि में विधिशेषत्वेन प्रामाण्य के प्राप्त न होने पर भी समस्त अनर्थनिवृत्तिरूप प्रयोजन (फल) से युक्त


१. 'व्युत्पत्तया प्रा०'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'तः, कन्या ते गर्भिणीत्या०'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'र्थेष्वपि'—इति पाठान्तरम् ।

वेदनित्यत्वादिविचारः ] आगमपरिच्छेदः २५९

ब्रह्मप्रतिपादक उपनिषद्वाक्यों में प्रामाण्य सिद्ध होता है। तस्मात् लौकिक एवं वैदिक दोनों शब्दों को कार्य और सिद्ध दोनों अर्थों में प्रामाण्य होता है। वेदान्तवाक्यों की केवल ( कार्यसंस्पर्शरहित ) ब्रह्मबोधकत्व कैसे होता है ? और उनका ब्रह्म रूप अर्थ में ही ही समन्वय किस प्रकार होता है ? यह सब विषयपरिच्छेद में ग्रन्थकार सविस्तर बतावेंगे अतः वेदान्त 'ब्रह्मज्ञान का विधान करने के लिए है' ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये।

स्वाभिमत वेद-प्रामाण्य की स्थापना करने के लिए प्रथम नैयायिक और पूर्वमीमांसकों के तद्विषयक मतों को बताते हैं।

तत्र वेदानां नित्यसर्वज्ञ-परमेश्वर-प्रणीतत्वेन प्रामाण्यमिति नैयायिकाः। वेदानां नित्यत्वेन निरस्त-समस्त-पुंदूषणतया प्रामाण्यमित्यध्वरमीमांसकाः। अस्माकं तु मते वेदो न नित्य उत्पत्तिमत्त्वात्। उत्पत्तिमत्त्वं च 'अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदः' १ ( बृ०-२-४-१० ) इत्यादि श्रुतेः।

अर्थ— 'तत्र'—लोक तथा वेद इन में से वेदों को नित्य, सर्वज्ञ ईश्वर के निर्मित होने से प्रामाण्य हैं—ऐसा नैयायिक कहते हैं। वेद, नित्य ( उत्पत्तिरहित ) होने से उनमें पुरुषसुलभ किसी प्रकार के दोष न होने से ही प्रामाण्य है—ऐसा अध्वरमीमांसक (यज्ञकाण्डरूपकर्मपरक वेदभाग का विचार करने वाले पूर्वमीमांसक) मानते हैं। किन्तु हमरे मत में वेद नित्य नहीं हैं क्योंकि वे उत्पत्तिमन् हैं। 'यह जो ऋग्वेदादि है वह इस महद्भूत का निःश्वसित हैं' इत्यादि श्रुति से उनका उत्पत्तिमत्त्व सिद्ध होता है।

विवरण— इनमें से प्रथम लक्षण नैयायिकों का है। 'वेद, नित्य एवं सर्वज्ञ परमेश्वर के प्रणीत होने से उन्हें प्रामाण्य है' यह उनका मत है। 'कर्ता के दोष से उनमें अप्रामाण्य की कोई शङ्का न करे, इसलिये वेदों के परमेश्वर-प्रणीत होने पर भी वह वेदकर्ता परमेश्वर सर्वज्ञ होने के कारण कर्तृदोषप्रयुक्त अप्रामाण्य उनमें प्राप्त नहीं होता यह बात 'सर्वज्ञ' विशेषण से सूचित की है। सर्वज्ञत्व, मन्वादि स्मृतिकारों में भी होने से तत्प्रणीत ग्रन्थों को भी प्रामाण्य प्राप्त हो सकता है, इसलिये परमेश्वर को 'नित्य' विशेषण दिया है। मन्वादिकों के सर्वज्ञ होने पर भी वे नित्य न होने से उपर्युक्त शङ्का ही नहीं उठ सकती। 'प्रणीतत्व' के कहने से वेदान्ती और नैयायिक के मतोंमें वैलक्षण्य सूचित कर दिया गया। वेदान्तमत से वेदों में उत्पत्तिमत्त्व के होने पर भी ( वेद, उत्पन्न हुए हैं—यह स्वीकार करने पर भी ) वे अन्य कल्प की आनुपूर्वी से विजातीय आनुपूर्वीयुक्त एवं ईश्वरप्रणीत हैं—यह नैयायिकों का कथन वेदान्तियों को मान्य नहीं है।


१. 'दो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इ०'—इति पाठान्तरम् ।

२६० | वेदान्तपरिभाषा | [ वेदनित्यत्वादिविचारः

(पूर्व कल्प के वेद का अनुक्रम भिन्न है और ईश्वर-निर्मित इस कल्प के वेद का अनुक्रम अत्यन्त विलक्षण है—ऐसा नैयायिक मानते हैं। यह अद्वैत वेदान्तियों को सम्मत नहीं है। वे आकाशादिकों के समान वेदों की उत्पत्ति मानते हैं। किन्तु उनकी आनुपूर्वी, पूर्वकल्प की आनुपूर्वी के समान ही होती है, यह सिद्ध करते हैं।)

अब मीमांसकों के मत को बताते हैं—हमने वेदों की नित्यता स्वीकार की होने से, उनमें पुरुषगत समस्त दोषों का अभाव है, इस कारण उन्हें प्रामाण्य है। वेदों को यदि अनित्य माना जाय तो उनमें पुरुष-प्रणीतत्व मानना होगा। वेदकर्ता पुरुष में ईश्वरत्व होने पर भी उसमें भक्तपक्षपात आदि दोष होना बहुत संभव है। इस कारण बौद्धप्रणीत आगम के समान वेदों में भी दोष हो सकते हैं। किन्तु वेदों के नित्य होने से उनमें से समस्त पुरुषदोषों का निरसन हो जाता है। उनमें भ्रम-प्रमादादि कोई दोष नहीं कहा जा सकता, इसी कारण वे प्रमाण कहे जाते हैं।

इस प्रकार नैयायिक एवं मीमांसकों के वेदप्रामाण्यविषयक मतों को बताकर अब ग्रन्थकार स्वयं अपना मत बताते हैं। वेद की उत्पत्ति होने से हमारे मत में वे नित्य नहीं है। यहाँ पर 'तु' शब्द उभयपक्षों से अपने मत की विलक्षणता प्रकट करने के लिये है। उत्पत्ति के कारण वेदों के अनित्य होने पर भी प्रलय-काल तक उनकी स्थिरता स्वरूपतः रहती है। इसलिये वे पुरुषदोषों से रहित रहते हैं। उनका पुरुषदोष-निर्मुक्तत्व श्रुतिसिद्ध होने से वेदों के अनित्यत्व में साधक 'उत्पत्तिमत्त्व' हेतु को स्वरूपा-सिद्ध नहीं कहा जा सकता। 'ऋग्वेदादि, इस महाभूत का निःस्वसित है' इत्यादि श्रुतियाँ वेदों की उत्पत्ति में प्रमाण हैं। यहाँ के 'आदि' शब्द से पुरुषसूक्त की 'ऋचः सामानि जज्ञिरे' इत्यादि श्रुति का ग्रहण करना चाहिये।

'वेद नित्य नहीं हैं' वेदान्तियों के इस कथन से यह प्रतीत होता है कि नैयायिका-भिमत त्रिक्षणावस्थायित्व भी उन्हें अनुमत होना चाहिये। इस शङ्का के निरसनार्थ 'नापि०' आदि ग्रन्थ से ग्रन्थकार बताते हैं कि 'मीमांसकों का अभिमत 'वेदनित्यत्व' जैसे हमें सम्मत नहीं वैसे ही नैयायिकसम्मत 'अनित्यत्व' भी हमें मान्य नहीं।

नापि वेदानां त्रिक्षणावस्थायित्वम् । य एव वेदो देवदत्तेनाधीतः; स एव¹ वेदो मयाऽधीत इत्यादिप्रत्यभिज्ञा-विरोधात् । अत एव गकारादि-वर्णानामपि न क्षणिकत्वं, सोऽयं गकार इति प्रत्यभिज्ञा-विरोधात् ।

अर्थ— वेदों में त्रिक्षणावस्थायित्व भी नहीं है। क्योंकि जिस वेद को देवदत्त ने पढा, उसको मैंने भी पढ़ा' इत्यादि प्रत्यभिज्ञा के साथ विरोध आता है। इसी कारण


१. 'मयापीत्या'—इति पाठान्तरम् ।

वेदनित्यतादिविचारः ] आगमपरिच्छेदः २६१

गकारादि-वर्णों को भी क्षणिकत्व नहीं है, क्योंकि 'वही यह गकार' इत्यादि प्रत्यभिज्ञा के साथ विरोध आता है ।

विवरण—वर्णों के समुदायरूप वेदों में त्रिक्षणावस्थायित्व ( क्षणिकत्व ) नहीं है । जो वस्तु क्षणिक होती है वह तीन क्षण ( उत्पत्ति का एक क्षण, स्थिति का दूसरा क्षण, नाश का तीसरा क्षण ) ही रहती है । नैयायिक लोग ऐसी वस्तु को क्षणिक, अनित्य आदि कहते हैं । वर्ण-समुदायरूप वेद में स्वरूपतः ऐसा क्षणिकत्व नहीं रहता, क्योंकि कल्प के आरंभ में जो वेद था वही मध्यकाल में एवं वर्तमान काल में भी है, ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है । नैयायिकों के मतानुसार उनमें त्रिक्षणावस्थायित्वरूप क्षणिकत्व रहता है, परन्तु ऐसा मानने पर उस प्रत्यभिज्ञा से विरोध आता है । इसलिये वर्णसमुदायगर्भ वेदों को स्वरूपतःक्षणिक स्वीकार नहीं किया जा सकता । 'अत एव' इत्यादि ग्रन्थ से वर्णों के द्वारा भी उनमें क्षणिकत्व नहीं है—बताया है । जब कि प्रत्यभिज्ञा के साथ विरोध होने के कारण पदादि समुदायगर्भ वेद में क्षणिकत्व नहीं होता । इसी कारण 'देवदत्त से उच्चारित जो गकार है वही यह है' इत्यादि प्रत्यभिज्ञा के साथ विरोध आने के कारण वर्णों में भी क्षणिकत्व नहीं होता । एवंच नैयायिकाभिमत-त्रिक्षणावस्थायित्वस्वरूप क्षणिकत्व नहीं है ।

शंका—वर्णसमुदाययुक्त वेदों में वर्णों में भी यदि क्षणिकत्व नहीं तो आपके मत में वेदों में उत्पत्तिमत्त्व और उस कारण अनित्यत्व किस प्रकार है ? उत्तर देते हैं—

तथा च वर्ण-पद-वाक्यसमुदाय^१स्य वेदस्य वियदादिवत् सृष्टिकालीनोत्पत्ति^२मत्त्वं प्रलयकालीनध्वंस-प्रतियोगित्वं च । न तु मध्ये वर्णानामुत्पत्ति-विनाशौ, अनन्तगकारकपने^३ गौरवात् । अनुच्चारण-दशायां वर्णानामनभिव्यक्तिस्तदुच्चारणरूप-व्यञ्जकाभावान्न विरुध्यते । अन्धकारस्थ^४ले घटानुपलम्भवत् । उत्पन्नो गकार^५ इत्यादिप्रत्ययः सोऽयं गकार^६ इति प्रत्यभिज्ञा-विरोधादप्रमाणम्, वर्णाभिव्य^७क्ति-जनकध्वनिगतोत्पत्ति-निरूपित-परम्परासम्बन्ध-विषयत्वेन प्रमाणं वा । तस्मान्न वेदानां क्षणिकत्वम् ।

अर्थ—वेदों में स्वरूपतः एवं वर्णद्वारा भी क्षणिकत्व नहीं है यह सिद्ध होने पर


१. 'रूपस्य'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'त्तिकत्वं'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'ल्पनायां-इति पाठान्तरम् ।
४. 'स्थघ'-इति पाठान्तरम् ।
५. 'इति प्रत्यक्षं तु'-इति पाठान्तरम् ।
६. 'इत्यादि'-इति पाठान्तरम् ।
७. 'व्यंजकध्व' इति पाठान्तरम् ।