वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
अथ विषयपरिच्छेदः ७
'ब्रह्म तज्ज्ञानं तत्प्रमाणं च सप्रपञ्चं निरूप्यते' ऐसी प्रतिज्ञा कर उनमें से प्रमाण का निरूपण यहाँ तक किया गया। अब ब्रह्मरूप प्रमेय (विषय) का निरूपण करने के लिये प्रारम्भ करते हैं—
'एवं निरूपितानां प्रमाणानां प्रामाण्यं द्विविधम्—व्यावहारिकतत्त्वावेदकत्वं पारमार्थिकतत्त्वावेदकत्वं चेति। तत्र ब्रह्मस्वरूपावगाहिप्रमाणव्यतिरिक्तानां सर्वप्रमाणानामाद्यं प्रामाण्यम्, तद्विषयाणां व्यवहारदशायां बाधाभावात् द्वितीयं तु जीवब्रह्मैक्य-पराणां 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' (छा० ६-२-१) इत्यादीनां 'तत्त्वमसि' (छा० ६-८-१) इत्यन्तानाम्। तद्विषयस्य जीवपरैक्यस्य कालत्रयाबाध्यत्वात्।
अर्थ— इस प्रकार निरूपित किये गये प्रमाणों का प्रामाण्य दो प्रकार का है १— व्यावहारिक तत्त्व का आवेदक (निवेदन करनेवाला) और २—पारमार्थिक वस्तु का आवेदन (ज्ञान) करानेवाला। उनमें से ब्रह्मस्वरूप के बोधक प्रमाण के अतिरिक्त (अन्य) प्रमाणों में प्रथम व्यावहारिक प्रामाण्य होता है। क्योंकि उनके विषय व्यवहार-काल में बाधित नहीं होते। परन्तु 'हे प्रियदर्शन श्वेतकेतो पहले यह सत् ही था।' इत्यादि 'वह ब्रह्म तू ही है' एतदन्त वाक्यों में द्वितीय (पारमार्थिक) प्रामाण्य होता है। क्योंकि जीवब्रह्मैक्य रूप विषय तीनों काल में अबाध्य रहता है।
विवरण— 'अबाधित-विषयत्व'—विषय का बाधित न होना, यह प्रामाण्य का लक्षण है। ब्रह्मबोधक प्रमाण से भिन्न प्रमाणों के विषय व्यवहारदशा में ही अबाधित होते हैं। ब्रह्म का अपरोक्ष ज्ञान होने पर जगन्मिथ्यात्वज्ञान होने से उनका बाध होता है। इसलिए उनका प्रामाण्य (व्यवहार में जिनका बाध नहीं होता ऐसी वस्तुओं का
१. 'ब्रह्म तज्ज्ञानं तत्प्रमाणं च निरूप्यते' इति पूर्वं प्रतिज्ञातमासीत्। तत्र त्रिषु विषयेषु प्रमाणविभागो निरूपितः। अत्र प्रमेयं निरूपयितुमुपक्रमते।
अबाधितार्थविषयकज्ञानत्वं प्रमात्वम्, इत्यत्र 'अबाधितपदेन' व्यवहारकालाबाधितत्वस्यैव ग्रहणात् सर्वेषामपि प्रमाणानां प्रामाण्यं समानम्। व्यावहारिकतत्त्वावेदकत्वम्—व्यवहारकालाबाध्यसत्त्वावगाहिज्ञानजनकत्वम्। परमार्थिकतत्त्वावेदकत्वम्—कालत्रयाबाध्यसत्त्वावगाहिज्ञानजनकत्वम्।
लक्षणविभागः ] विषयपरिच्छेदः ३२७
बोधन करना--इस स्वरूप का ) व्यवहारिक ही रहता है । किन्तु इसके विपरीत 'सदेव सोम्य' इत्यादि श्रुतियों से प्रतिपादन किया हुआ जीवब्रह्मैक्य कभी भी बाधित नहीं होता । इस कारण ब्रह्मबोधक प्रमाणों में ( पारमार्थिक अबाध्य वस्तु का बोधकत्वरूप ) प्रामाण्य होने से ब्रह्मात्मैक्य प्रतिपादक वाक्य ही तत्त्वतः प्रमाण होते हैं ।
अतः क्रम-प्राप्त प्रमेय का निरूपण कर्तव्य होने पर व्यावहारिक विषयों का निरूपण वेदान्तोपयोगी न होने से जीवब्रह्माभेद का ही निरूपण करना चाहिए और वह 'तत्' और 'त्वम्' पदों के ज्ञानाधीन है । इसलिये प्रथम 'तत्' पदार्थ निरूपण की प्रतिज्ञा करते हैं ।
तच्चैक्यं तत्त्वं-पदार्थ-ज्ञानाधीनज्ञानमिति प्रथमं तत्पदार्थो लक्षणप्रमाणाभ्यां निरूप्यते । ^१तत्र लक्षणं द्विविधम्—स्वरूपलक्षणं तटस्थलक्षणं चेति । तत्र स्वरूपमेव लक्षणं स्वरूपलक्षणम्, यथा सत्यादिकं ब्रह्मस्वरूपलक्षणम् । 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' ( तै० २-१-१ ) 'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्' ( तै० ३-६ ) इति श्रुतेः ।
अर्थ— और वह ऐक्य ज्ञान 'तत्' और 'त्वम्' पदों के ज्ञानाधीन होने से प्रथम 'तत्' पद के अर्थ का लक्षण एवं प्रमाणों से निरूपण किया जाता है । उनमें लक्षण, स्वरूप लक्षण और तटस्थ-लक्षण भेद से दो प्रकार का होता है । उन दोनों में से स्वरूपभूत लक्षण कहते हैं । जैसे—'सत्यादि' ब्रह्म का स्वरूप लक्षण है 'ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनन्त है' 'आनन्द ही ब्रह्म है, ऐसा उसने जाना' ये श्रुतियां इस विषय में प्रमाण हैं ।
विवरण— 'तत्' और 'त्वम्' पदार्थों के ज्ञान के बिना उनका अभेद भी ज्ञात नहीं होता । इन दो पदों में से 'तत्' प्रथम होने से उसका ( तत् पद का ) लक्षण प्रमाणादि प्रथम बताया है । ब्रह्म का लक्षण और प्रमाण भिन्न न होकर एक वाक्य ही है । इसलिये 'लक्षणप्रमाणाभ्यां' यहाँ द्विवचन से स्वरूप लक्षण और तटस्थ लक्षण बोधक दो वाक्यों का ग्रहण करना चाहिये । द्विविध लक्षणों में से स्वरूपभूत लक्षण और तटस्थ लक्षण बोधक दो वाक्यों का ग्रहण करना चाहिये । द्विविध लक्षणों में स्वरूपभूत लक्षण को स्वरूप लक्षण कहते हैं; जैसे— लौहित्य, उष्णता और प्रकाश दीपक का
^१. 'तत्र' इत्यत्र त्रल्प्रत्ययः अभेदार्थः । तद्रूपं लक्षणं द्विविधमित्यर्थः । यद्यपि तटस्थलक्षणं सामान्यलक्षणं, स्वरूपलक्षणं च विशेषलक्षणम् अतः पूर्वं तटस्थलक्षणं वक्तव्यम् अनन्तरं स्वरूपलक्षणं वक्तव्यम्, तथापि सामान्यस्य प्रथमतः, विशेषस्य च अनन्तरं निर्देशः इति सामान्यस्वरूपस्य विशेषस्वरूपस्य च अनुमानिकत्वे एव प्रवर्तते, न तु श्रौतत्वे । श्रौतत्वे तु सामान्य-विशेषयोः श्रुतिक्रमानुसारेणैव लक्षणनिर्देशोऽपि युक्त इति श्रुतौ सत्यादिवाक्यस्य प्राथम्यात् जन्मादिवाक्यस्य च उत्तरत्वात् सामान्यलक्षणस्य प्रथममत्र निर्देशः इति बोध्यम् ।
| ३२८ | वेदान्तपरिभाषा | [ तटस्थलक्षणम् |
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स्वरूप है। वैसे ही श्रुतिप्रतिपादित सत्, चित् और आनन्द, ब्रह्म का स्वरूप है और वही लक्षण होने से वह स्वरूप-लक्षण कहलाता है।
शंका--'असाधारणधर्मो लक्षणम्'--लक्ष्य पदार्थ में विद्यमान असाधारण-धर्म को ही लक्षण कहते हैं। सत्यादि धर्म वैसा न होने से उसे लक्षण कैसे कहा जाय ? इस आशय से वादी की शंका और उसका समाधान—
ननु १स्वस्य स्ववृत्तित्वाभावे कथं लक्षणत्वमिति चेत् । न । स्वस्यैव स्वापेक्षया धर्मिधर्मभाव-कल्पनया लक्ष्य-लक्षणत्व-सम्भवात् । तदुक्तम्—'आनन्दो विषयानुभवो नित्यत्वं चेति सन्ति धर्माः, अपृथ-क्त्वेऽपि चैतन्यात्पृथगिवावभासन्ते' इति ।
**अर्थ—**स्वयं में स्ववृत्तित्व का अभाव होने से स्वयं का ही वह लक्षण कैसे हो सकेगा ? ( उसमें लक्षणत्व कैसे सम्भव है ) यह शंका करना ठीक नहीं है। क्योंकि स्वयं में ही स्व की अपेक्षा से की हुई धर्म-धर्मिभाव की कल्पना से लक्ष्यत्व और लक्षणत्व बन सकता है। इस विषय में ( पद्मपादाचार्य की सम्मति दिखलाते हैं ) इसीलिए कहा है कि आनन्द, विषयानुभव और नित्यत्व--ये धर्म हैं, क्योंकि वे चैतन्य से पृथक् न होने पर भी पृथक् से भासित होते हैं।
**विवरण--शंका--**स्वरूप को ही लक्षण मानने से लक्ष्य में ही लक्षणत्व प्राप्त होगा ( लक्ष्य ही लक्षण हो जायगा )। लक्षणभूत धर्म लक्ष्य में रहना चाहिये। सत्यादि धर्म तो स्वरूप ही हैं। इसलिये उस स्वरूप में स्ववृत्तित्व का होना सम्भव नहीं। ऐसी स्थिति में सत्यादि, ब्रह्म के लक्षण कैसे हो सकेंगे ?
**समाधान—**यह कोई नियम नहीं है कि लक्षणभूत धर्म लक्ष्य से पृथक् हो, स्वयं में भी विशिष्ट अपेक्षा से धर्मत्व एवं धर्मित्व की कल्पना कर लक्षणत्व एवं लक्ष्यत्व का होना सम्भव हो सकता है। अर्थात् एक ही ब्रह्म, सत्यत्व रूप काल्पनिक धर्म से लक्षण होता है और वही ब्रह्मत्वरूप धर्म से लक्ष्य होता है। इसीलिये तो पंचपादिका में आनन्द, ज्ञान और सत्यत्व—ये चैतन्य से भिन्न नहीं हैं तथापि भिन्न से प्रतीत होते हैं, इस कारण उन्हें ब्रह्म के धर्म कहा गया है।
अब तटस्थ-लक्षण का स्वरूप बताकर ब्रह्म का तटस्थ-लक्षण करते हैं—
तटस्थलक्षणं २तु यावल्लक्ष्यकालमनवस्थितत्वे सति यद्व्यावर्तकं तदेव यथा गन्धवत्त्वं पृथिवीलक्षणम् । महाप्रलये परमाणुषु उत्पत्तिकाले घटादिषु३ गन्धाभावात् । प्रकृते ४ब्रह्मणि च जगज्जन्मादिकारणत्वम् ।
१. 'स्वरूपस्य'--इति पाठान्तरम् ।
२. 'नाम'--इति पाठान्तरम् ।
३. 'च' पाठान्तरम् ।
४. 'ते च ज' इति पाठान्तरम् ।
ब्रह्मणो जगत्कर्तृत्वम् ] विषयपरिच्छेदः ३२९
अत्र जगत्पदेन कार्यजातं विवक्षितम्, कारणत्वं च कर्तृत्व¹मतोऽविद्यादौ नातिव्याप्तिः ।
अर्थ— जो लक्षण लक्ष्य के यावत् काल पर्यन्त ( जब तक लक्ष्य रहे तब तक ) स्थिर न रहकर लक्ष्य का व्यावर्तक ( अन्य पदार्थ से भेदक ) हो उसे तटस्थ-लक्षण कहते हैं । जैसे—गन्धवत्त्व पृथ्वी का तटस्थ-लक्षण है । क्योंकि महाप्रलय के समय परमाणुओं में और उत्पत्तिकाल के घटादिकों में गन्ध नहीं होता । प्रकृत प्रसंग में जगज्जन्मादि-कारणत्व, ब्रह्म का तटस्थ लक्षण है । यहाँ 'जगत्' शब्द से यावत् कार्य विवक्षित हैं और 'कारणत्व' पद से कर्तृत्व अभिप्रेत है । इस कारण इस लक्षण की अविद्यादि में अतिव्याप्ति नहीं होती ।
विवरण— जबतक लक्ष्य स्थिर रहे तब तक उसमें न रहकर ( कुछ समय तक ही लक्ष्य में रहकर ) अन्य पदार्थों से लक्ष्य को भिन्न करनेवाले लक्षण को तटस्थ लक्षण कहते हैं । उदाहरण—पृथ्वी का तटस्थ-लक्षण 'गन्ध' है, क्योंकि वह महाप्रलय के समय पृथ्वीपरमाणुओं में नहीं रहता और न प्रथम ( उत्पत्तिक्षण में घटादिकार्यरूप ) पृथ्वी में ही—ऐसा नैयायिक मानते हैं । 'उत्पन्नं द्रव्यं क्षणमगुणं तिष्ठति' उत्पन्न हुआ द्रव्य क्षण-भर निर्गुण रहता है, यह उनका सिद्धान्त है । तथापि गन्धगुण के कारण पृथ्वी, जलादि अन्य द्रव्यों से भिन्न है—ऐसा ज्ञान होता है । इसलिये गन्ध में तटस्थ लक्षण का समन्वय हो जाता है । ऐसे ही प्रकृत ब्रह्म में जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय-हेतुत्व भी सृष्ट्युत्पत्त्यादि काल में ही रहता है । प्रलय के पश्चात् जगत् के ही न होने से उसका कारणत्व भी उसमें नहीं रहता । तथापि जगत् का कारणत्व, ब्रह्मव्यतिरिक्त अन्य पदार्थों में सम्भव न होने से, वह ब्रह्म को अन्यों से व्यावृत्त ( भिन्न ) करता है । इसलिए 'जगज्जन्मादिकारणत्व' ब्रह्म का तटस्थ-लक्षण है ।
शंका— जगत् के जन्मादिकों की कारणता, माया में भी होने से यह लक्षण वहाँ भी अतिव्याप्त है । इस शंका को दूर करने के लिये 'कारणत्व' शब्द से कर्तृत्वरूप निमित्त कारण, हमें विवक्षित है । जड-अविद्या ( माया ) में जगत् की उपादान-कारणता ही है कर्तृत्व नहीं है । इस कारण उसमें इस ब्रह्म-लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती । 'आदि' शब्द से अदृष्टादि का स्वीकार करना चाहिए ।
प्रश्न— कर्तृत्व से क्या तात्पर्य है ? और ब्रह्म में कर्तृत्व मानने पर उक्त अति-का निरास कैसे होता है ? ग्रन्थकार उत्तर देते हैं—
कर्तृत्वं च तत्तदुपादानगोचरापरोक्षज्ञानचिकीर्षा-कृतिमत्त्वम् । ईश्वरस्य तावदुपादानगोचरापरोक्षज्ञान-सद्भावे च 'यः सर्वज्ञः सर्व-
१. 'त्वं तेना'—इति पाठान्तरम् ।
३३० | वेदान्तपरिभाषा | [ ब्रह्मणो नवलक्षणानि
विद्यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद् ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते ( मुं० १-१-९ ) इत्यादिश्रुतिर्मानम् । तादृशचिकीर्षा-सद्भावे१ 'सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय' ( तै० २-६ ) इत्यादिश्रुतिर्मानम् । तादृशकृतौ च तन्मनोऽकुरुत' इत्यादि२वाक्यम् ।
अर्थ—उन-उन उपादान कारणों का अपरोक्षज्ञान, चिकीर्षा ( करने की इच्छा ) और कृति ( प्रयत्न ) का होना ही कर्तृत्व है । ईश्वर में उपादान-विषयक अपरोक्षज्ञान के होने में 'जो अक्षरसंज्ञक ईश्वर सामान्यतः और विशेषतः भी सर्वज्ञ है और जिसका तप ज्ञानमय ही है, उससे यह हिरण्यगर्भाख्य ब्रह्म, नाम, रूप और व्रीहियवादिरूप अन्न उत्पन्न होता है' ( मुं० १-१-९ ) श्रुति ही प्रमाण है । उसे वैसी ( जगद्विषयक ) चिकीर्षा के होने में 'मैं बहुत होऊँ एवं प्रजा उत्पन्न करूँ ऐसी इच्छा उसने ( आत्मा ने ) की' ( तै० २-६ ) इत्यादि श्रुतिप्रमाण हैं । और उसकी कृति के विषय में 'उस ब्रह्म ने मन को उत्पन्न किया' इत्यादि श्रुतिवाक्य ( बृ० १-२-१ ) आधार हैं ।
विवरण—जिसे कार्य के उपादान कारण का अपरोक्ष ( प्रत्यक्षात्मक ) ज्ञान हो और उस कार्य के करने की इच्छा तदनुकूल प्रयत्न भी जिसका हो उसे उस कार्य का कर्ता कहते हैं । जैसे—कुम्हार में घट की मृत्तिकारूप उपादान कारण का प्रत्यक्षज्ञान, घट उत्पन्न करने की इच्छा और दो कपालों का संयोग कराने वाला प्रयत्न भी रहता है, इसलिये वह घट का कर्ता है । उसी प्रकार प्रकृत ईश्वर में भी जगत् के उपादान कारण ( माया ) का ज्ञान आदि होने से वह जगत् का कर्ता है । माया जड होने से उसमें ज्ञान आदि का सम्भव नहीं । इस कारण माया जगत् की कर्त्री नहीं है । अतः ब्रह्म के जगत्कर्तृत्वरूप तटस्थलक्षण की उसमें अतिव्याप्ति नहीं होती ।
शंका—ब्रह्म में इस प्रकार के कर्तृत्व के होने में क्या प्रमाण है ?
उत्तर—इसीलिए तो ग्रन्थकार ने क्रमशः उपादानविषयक ज्ञान, चिकीर्षा और कृति को बताया है । इस विषय में तीन श्रुतिवाक्यों को भी उद्धृत किया है । 'आदि' शब्द से 'स प्राणमसृजत' ( प्र० ६-४ ) आदि श्रुतियों को भी समझ लेना चाहिये । ज्ञान, इच्छा और कृति ये तीनों मिलकर ब्रह्म का एक लक्षण नहीं हैं, अपितु वे तीन लक्षण हैं, ऐसा ग्रन्थकार कहते हैं ।
३ज्ञानेच्छाकृतीनां मध्येऽन्यतमगर्भलक्षणत्रितय४मिदं विवक्षितम्,
१. 'वे च-इति पाठान्तरम् ।
२. 'दिश्रुतिवा'—इति पाठान्तरम् ।
३. ज्ञानेच्छाद्यन्यतमगर्भ०'—इति पाठान्तरम् ।
४. 'यं विव०'—इति पाठान्तरम् ।
ब्रह्मणो नवलक्षणानि ] •विषयपरिच्छेदः ३३१
अन्यथा व्यर्थ-विशेषण¹त्वापत्तेः । अत एव जन्म-स्थिति-ध्वंसाना- मन्यतमस्यैव लक्षणे प्रवेशः । एवं च² प्रकृते लक्षणानि नव सम्पद्यन्ते । ब्रह्मणो जगज्जन्मादिकारणत्वे च—'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति' ( तै० ३–१ ) इत्यादिश्रुतिर्मानम् ।
अर्थ—ज्ञान, इच्छा और कृति--इनमें से कोई एक भी जिसके गर्भ में ( भीतर ) घटक हो, ऐसे तीन लक्षण ( यहाँ ) विवक्षित हैं। नहीं तो उन्हें व्यर्थ विशेषणत्व प्राप्त होगा ( उनका विशेषण रूप से रहना व्यर्थ होगा )। इसीलिये 'जन्म स्थिति और भङ्ग ( नाश )—इनमें से भी एक-एक का ही लक्षण में प्रवेश समझना चाहिये । इस प्रकार प्रकृत में ( ब्रह्म के ) नौ लक्षण होते हैं । ब्रह्म में जगत् के जन्मादिकों की कारणता के विषय में 'जिससे ये भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न हुए भूत जिसके कारण जीवित रहते हैं, और लय के समय जिसमें प्रवेश करते हैं ( वह ब्रह्म हैं )' इत्यादि श्रुतिप्रमाण है ( तै० ३-१ ) ।
विवरण—ऊपर बताये हुए ज्ञान, इच्छा, कृति में से प्रत्येक को लक्षण में निविष्ट कर 'जगदुपादानगोचरापरोक्षज्ञानत्व' 'जगच्चिकीर्षावत्व' और 'जगदुत्पादनानुकूलकृतिमत्त्व' इस प्रकार के तीन स्वतन्त्र लक्षण ही यहाँ विवक्षित हैं। अन्यथा ( समस्त विशेषण मिलकर ब्रह्म का यह एक ही लक्षण है—ऐसा मानने पर ) लक्षणगत दो विशेषण व्यर्थ होंगे। क्योंकि उनसे किसी की भी व्यावृत्ति नहीं होती। एक विशेषण से ही ब्रह्मेतर पदार्थों का निषेध सिद्ध हो जाने से उतना ही निर्दुष्ट लक्षण हो जाता है। इस प्रकार आरम्भ में बताये हुए जन्मादिकारणत्व रूप लक्षण में भी जन्म, स्थिति और नाश में से एकैक का समावेश कर तीन लक्षण समझ लेने चाहिये। इस रीति से १—जगज्जन्मोपादानगोचरापरोक्षज्ञान, २—तज्जन्मगोचरचिकीर्षा, ३—जगज्जन्मानुकूलकृति, ४—स्थित्युपादानविषयकज्ञान, ५—स्थितीच्छा, ६—स्थितिप्रयत्न, ७—प्रलयोपादान, ८—प्रलयेच्छा, और ९—प्रलयप्रयत्न ये ब्रह्म के नौ लक्षण सिद्ध होते हैं । ब्रह्म में जगत् के जन्मादि की कारणता के विषय में 'यतो वा' इत्यादि श्रुति-प्रमाण हैं। 'आदि' पद से 'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते' इत्यादि छान्दोग्य श्रुति का ग्रहण करना चाहिये।
'जन्म, स्थिति और नाश इन तीनों से उपादानकारणत्व की ही सिद्धि होती है । इस कारण उसमें निमित्तत्व तो नहीं बन पाता' इस अरुचि से लघुलक्षण बताते हैं ।
१. 'णताप०'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'च लक्ष०'—इति पाठान्तरम् ।
३३२ | वेदान्तपरिभाषा | [ ब्रह्मणो लघुलक्षणम्
यद्वा—निखिलजगदुपादानत्वं ब्रह्मणो लक्षणम्। उपादानत्वं च जगदध्यासाधिष्ठानत्वम् जगदाकारेण¹ विपरिणममान-मायाऽधिष्ठानत्वं वा। एतादृशमेवोपादानत्वमभिप्रेत्य 'इदं सर्वं यदयमात्मा' 'सच्च त्यच्चाभवत्' ( तै० २–६ ) 'बहु स्यां प्रजायेय' ( तै० २–६ ) इत्यादि-श्रुतिषु ब्रह्मप्रपञ्चयोस्तादात्म्य-व्यपदेशः। घटः सन् घटो भाति, घट इष्ट इत्यादि-लौकिकव्यपदेशोऽपि सच्चिदानन्दरूप-ब्रह्मैक्याध्यासात्।
अर्थ—अथवा 'समस्त जगत् का उपादानत्व' ही ब्रह्म का लक्षण है उपादानत्व का अर्थ है कि अध्यास ( भ्रम ) का अधिष्ठानत्व, अथवा जगत् के आकार में ( जगदाकारेण ) परिणत हुई माया का अधिष्ठानत्व। ब्रह्म में रहनेवाली इसी उपादानकारणता के अभिप्राय से 'जो यह सब है वह आत्मा ही है' ( नृसिंहोत्तरतापनीय ), 'वही मूर्त और अमूर्त हुआ' ( तै० २–६ ) 'मैं बहुत होऊँ' ( तै० २–६ ) इत्यादि श्रुतियों में ब्रह्म और प्रपञ्च के तादात्म्य का ( ऐक्य का ) उपदेश किया गया है। 'घट-भासित होता है' और 'घट इष्ट है' इत्यादि लौकिक व्यवहार भी सच्चिदानन्दरूप ब्रह्म के ऐक्याध्यास से ही होता है।
विवरण—समस्त जगत् का उपादानकारणत्व ( उपादान कारण होना ) ही ब्रह्म का लक्षण है, समझ लीजिये। किन्तु चेतन ब्रह्म में जडप्रपञ्च का उपादानकारणत्व कैसे सम्भव हो सकता है ? और यह उपादानकारणत्व माया में भी होने से उसमें लक्षण की अतिव्याप्ति होगी। ऐसी शंका करना ठीक नहीं, क्योंकि उपादान शब्द से हमें जगद्रूप अध्यास ( भ्रम ) का अधिष्ठान ( आधार ) ही विवक्षित है। मिथ्या रजत के भ्रम का अधिष्ठान जैसे शुक्ति होती है वैसे ही ब्रह्म में भासमान मायाकल्पित प्रपञ्च का अधिष्ठान ( विवर्तोपादान ) ब्रह्म ही है, माया नहीं। इस कारण उक्त दोष नहीं है।
इस पर भी 'जिसका परिणाम होता है वही उपादान होता है' ऐसा यदि आपका आग्रह ही हो तो दूसरा कल्प ( पक्ष ) बताते हैं--जगदाकारेण ( जगद्रूप से ) परिणाम को प्राप्त होनेवाली ( परिणत होनेवाली ) माया का अधिष्ठानत्व ब्रह्म में होना—यही उसका उपादानत्व है। माया में परिणामि-उपादानत्व होने पर भी स्वाधिष्ठान-ब्रह्म के बिना वह कुछ नहीं कर सकती। इस कारण ब्रह्म में ही ऐसा उपादानत्व सम्भव हो सकता है। अतः यह ब्रह्मलक्षण निर्दुष्ट है।
माया के जगदाकारपरिणामित्व के होने में 'मायां तु प्रकृतिं विद्यात्' इत्यादि श्रुति प्रमाण है। वैसे ही ब्रह्म और प्रपञ्च का ऐक्य प्रतिपादन करनेवाली उपर्युक्त
१. 'ण परिण०'–इति पाठान्तरम्।
दुःखस्येष्टत्वापत्ति-तत्परिहारौ ] विषयपरिच्छेदः ३३३
श्रुतियाँ भी ब्रह्म के इस उपादानकारणत्व को मानकर ही प्रवृत्त हुई हैं। अन्यथा चेतनब्रह्म और जडजगत् दोनों में ऐक्य का संभव नहीं। किन्तु भ्रमाधिष्ठानत्व मानने से जिस प्रकार सर्प तो केवल भासित होता है, वस्तुतः रज्जु ही है। उसी प्रकार भासमान जगत्, परमार्थतः ब्रह्म ही है—यह उनमें अभेद उपपन्न हो जाता है। 'आदि' शब्द से 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इत्यादि वचन विवक्षित हैं। इस प्रकार 'घट सत् है' इत्यादि लौकिक व्यवहार भी (लोगों का अभेद व्यवहार भी) सच्चिदानन्दरूप ब्रह्म में जगत् का अध्यास मानकर ही होता है। क्योंकि यहाँ पर भासमान घटसत्ता, वास्तव में ब्रह्मसत्ता ही है। इसी प्रकार 'घट भासित होता है' यहाँ जो भास होता है, वह चैतन्य का ही होता है, और 'घट इष्ट है' वाक्य से जो इष्टत्व प्रतीत होता है वह भी ब्रह्म के आनन्दरूप में अध्यास मानकर ही होता है।
इस पर शंका और उसका समाधान—
नन्वानन्दात्मक-चिदध्यासाद् घटादेरिष्टत्व-व्यवहारे दुःखस्यापि तत्राध्यासात्त^१त्रापि इष्टत्वव्यवहारापत्तिरिति चेत्। न। आरोपे सति निमित्तानुसरणं, न तु निमित्तमस्तीत्यारोप इत्यभ्युपगमेन दुःखादौ सच्चिदंशाध्यासेऽप्यानन्दांशाध्यासाभावात्। जगति नामरूपांश-द्वय-व्यवहारस्तु अविद्यापरिणामात्मक-नामरूप-सम्बन्धात्।
तदुक्तम्—
अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम्।
आद्यं त्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं ततो^२ द्वयम्॥ इति।
अर्थ—शंका—आनन्दात्मक चैतन्य में अध्यास के कारण घटादिकों का—'घट इष्ट है' ऐसा इष्टत्व-व्यवहार होता है। ऐसा कहने से दुःख का भी उस आनन्दात्मक ब्रह्म में ही अध्यास होने के कारण उस विषय में भी (दुःख इष्ट है) इत्याकारक इष्टत्व व्यवहार होने लगेगा।' ऐसी शंका करें—तो वह ठीक नहीं। क्योंकि 'आरोप हो तो उसके निमित्त की (कारण की) कल्पना करनी चाहिये। निमित्त है इसलिये आरोप की कल्पना नहीं करनी चाहिये' यह अभ्युपगम (नियम) होने से, दुःख में सत् और चित् दो अंशों का अध्यास होने पर भी आनन्दांश का अध्यास नहीं होता, संसार में 'नाम' और 'रूप' इन दो अंशों का जो व्यवहार होता है, वह अविद्या-परिणामात्मक
१. 'तस्यापि'-इति पाठान्तरम्।
२. 'पमतो' इति पाठान्तरम्।
३३४ | वेदान्तपरिभाषा | [ जगतो जन्मक्रमनिरूपणम्
नाम, रूप के सम्बन्ध से होता है। इसीलिए कहा है कि, 'है—सत्ता, भासता है—ज्ञान, प्रिय—आनन्द, तथा रूप और नाम—ये पाँच अंश, प्रत्येक पदार्थ में प्रतीत होते हैं। उनमें से प्रथम तीन—सत्, चित्, आनन्द ये 'ब्रह्मरूप' हैं, और शेष दो अंश—नाम, रूप, 'जगद्रूप' हैं।
**विवरण—**वादी कहता है कि आनन्दात्मक ब्रह्म में घटादि पदार्थों के अध्यस्त होने से उनकी 'घट मुझे इष्ट है' इत्याकारक इष्टत्वेन प्रतीति होना आप बताते हैं। तो इसी के अनुसार ब्रह्म में दुःख पदार्थ के भी अध्यस्त होने से वह भी 'दुःख मुझे इष्ट है' इस रूप से प्रतीत होना चाहिए। परन्तु ऐसा अनुभव तो किसी को नहीं है। इस कारण क्या ब्रह्म में दुःख का अध्यास न माना जाय ?
सिद्धान्ती उत्तर देता है—'यदि आरोप प्रत्यक्ष सिद्ध हो तो उसके निमित्त की चिकित्सा करनी चाहिये। आरोप का निमित्त होने मात्र से ही आरोप की कल्पना नहीं की जाती' यह नियम है। अतः हम यह कल्पना करते हैं कि यस्मात् 'दुःख इष्ट है' ऐसी दुःख में इष्टत्व की प्रतीति नहीं होती, तस्मात् दुःख में केवल 'सत्' और चित्' इन दो अंशों का अध्यास होता है, आनन्दांश का नहीं। इस कारण उक्त दोष नहीं है। 'अनुभूत्यनुसारेण कल्प्यते हि नियामकम्' यह विद्यारण्य ने भी कहा है।
**शंका—**ब्रह्म तो नाम रूप से रहित होने के कारण उस पर आरोपित घटादिकों के विषय में 'अयं घटः शुक्लः' ऐसा नाम-रूपात्मक व्यवहार कैसे होता है ? ग्रन्थकार समाधान करते हैं कि जगत् में नाम-रूपात्मक व्यवहार अविद्या ( माया ) के परिणामात्मक नाम-रूप के सम्बन्ध से होता है। इसी कारण प्रत्येक पदार्थ में 'अस्ति, भाति' इत्यादि रूप से प्रतीयमान पाँच अंशों में से पहिले तीन अंश ब्रह्मरूप हैं और शेष दो जगद्रूप ( माया परिणामरूप ) हैं—यह अभियुक्तों का कथन है।
इस रीति से तत् पदार्थ के स्वरूप एवं तटस्थ लक्षणों का निरूपण करने से अब उससे जगत् की उत्पत्ति किस प्रकार होती है, उसे प्रतिज्ञापूर्वक कहते हैं—
अथ जगतो जन्मक्रमो निरूप्यते—तत्र सर्गाद्यकाले परमेश्वरः सृज्यमान-प्रपञ्च-वैचित्र्य-हेतु-प्राणिकर्म-सहकृतोऽपरिमितानिरूपित-शक्ति-विशेषविशिष्ट-मायासहितः सन्नामरूपात्मक-निखिल-प्रपञ्चं प्रथमं बुद्ध्यावाकलय्येदं करिष्यामीति सङ्कल्पयति, 'तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय' ( छा० ६-२-३ ) इति 'सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय' ( तै० २-६ ) इत्यादिश्रुतेः। तत आकाशादीनि पञ्चभूतानि अपञ्चीकृतानि तन्मात्रपद¹प्रतिपाद्यानि उत्पद्यन्ते। तत्राकाशस्य शब्दो गुणः।
१. 'द वाच्यान्युत्प'-इति पाठान्तरम् ।
जगतो जन्मक्रमनिरूपणम् ] विषयपरिच्छेदः ३३५
वायोस्तु शब्दस्पर्शौ। तेजस्तु शब्द-स्पर्श-रूपाणि। अपां तु शब्द-स्पर्श-रूप-रसाः। पृथिव्यास्तु शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धाः।
अर्थ— अब जगत् की उत्पत्ति का क्रम निरूपण किया जाता है। घटादिप्रपञ्च की उत्पत्ति के समय परमेश्वर उत्पाद्य प्रपञ्च की विचित्रता में कारण बनानेवाले प्राणिकर्मों की सहायता से एवं अपरिमित, अनिर्वाच्य विशेषशक्तिरूप माया से युक्त होकर प्रथमतः नाम-रूपात्मक समस्त प्रपञ्च का बुद्धि से आकलन करता है और 'यह उत्पन्न करूँगा' ऐसा संकल्प करता है। वह (ब्रह्म) 'मैं बहुत होऊँ इस प्रकार ईक्षण करता हुआ' (छां० ६-२) 'मैं बहुत होऊँ और प्रजा उत्पन्न करूँ-ऐसी कामना उसने की' (तै० २-६) इत्यादि श्रुति इस विषय में प्रमाण है। तदनन्तर आकाशादि अपञ्चीकृत पाँच भूत उत्पन्न होते हैं। इन्हीं को (पञ्च) तन्मात्राएँ भी कहते हैं। उन भूतों में से आकाश का गुण शब्द है। किन्तु वायु के शब्द और स्पर्श दो गुण हैं। तेज के शब्द, स्पर्श, रूप तीन गुण हैं। जल के शब्द, स्पर्श, रूप और रस चार गुण हैं। पृथ्वी के शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध पाँच गुण हैं।
विवरण— सृष्टि करते समय प्रथमतः परमेश्वर समस्तप्रपञ्च के स्वरूप का 'यह ऐसा है' इस प्रकार से आकलन कर लेता है, उसके अनन्तर 'मैं यह उत्पन्न करूँगा' ऐसा संकल्प करता है। वह सत्यसंकल्प होने से उसके संकल्प के अनुसार क्रमशः आकाशादि पाँच सूक्ष्मभूत उत्पन्न होते हैं और वे क्रम से शब्दादि एक-एक गुणों से अधिक रहते हैं। इन अपञ्चीकृत आकाशादिभूतों को ही 'शब्दतन्मात्रस्पर्शतन्मात्र, रूपतन्मात्र, रसतन्मात्र और गन्धतन्मात्र' ऐसी पौराणिक संज्ञाएँ हैं। ईश्वर के संकल्पपूर्वक सृष्टि उत्पन्न करने के विषय में दो श्रुतियों का ऊपर उल्लेख कर ही चुके हैं। 'आदि' शब्द से 'आत्मा वा··· स ऐक्षत' आदि श्रुतियों का ग्रहण करना चाहिये। वैसे ही सृष्टि के आकाशादि क्रम से उत्पन्न होने के विषय में 'तस्माद्वा एतस्मादात्मनः आकाशः संभूत आकाशाद्वायुर्वायोरग्निरग्नेरापोऽद्भ्यः पृथिवी' (तै० ३-१) इत्यादि तैत्तिरीय श्रुति प्रसिद्ध ही है।
शंका— ईश्वर ही ब्रह्मादि स्थावरान्त जगत् का निर्माण करता है—यह माननेसे इस विषम उत्पत्ति के कारण ईश्वर का विषमता, निर्दयता आदि दोष प्राप्त होंगे—इस शंका का निरसन करने के लिये ईश्वर में, 'सृज्यमान०' विशेषण जोड़ा गया है। ईश्वर पर्जन्य के समान सर्वसाधारणतया ही उत्पादक है। उन-उन प्राणियों के विशेषगुण उनके पूर्व कर्मानुसार ही उत्पन्न होते हैं। अतः विषमता में कारण कर्म होते हैं। ईश्वर तो उनकी सहायता से उनके अनुसार केवल विभाग कर देता है, इस कारण उसमें उक्त दोष नहीं आ पाते।
यदि कोई कहे कि तुम्हारे मत में परमेश्वर कूटस्थ-निर्विकार है तब उसमें संकल्पादि कैसे हो सकेंगे?
३३६ वेदान्तपरिभाषा [ शब्दस्याकाशमात्रगुणत्वनिराकरणम्
'अपरिमित' इत्यादि विशेषण से उक्त शंका का निरसन किया है । निरुपाधिक ब्रह्म में जगत् का स्रष्टृत्व ( उत्पादकत्व ) यद्यपि संभव नहीं हो सकता, तथापि अनादि, अनिर्वचनीय, अपरिमित शक्तिरूप अपनी माया की उपाधि से जब ब्रह्म, युक्त हो जाता है तब उस सोपाधिक ब्रह्म ( ईश्वर ) में जगत्कर्तृत्व उत्पन्न होता है । अतः उक्त शंका युक्त नहीं है ।
अब नैयायिकों के 'शब्द आकाश का ही गुण है' मत का निरसन करते हैं ।
न¹ च ²शब्दस्याकाशमात्रगुणत्वम्, वाय्वादावपि तदुपलम्भात् । न चासौ भ्रमः, बाधकाभावात् ।
अर्थ— शब्द को केवल आकाश का ही गुण नहीं कहा जा सकता । क्योंकि वायु आदि में भी उसकी प्रतीति होती है । इसे भ्रम भी नहीं कह सकते क्योंकि उस प्रतीति में कोई बाधक नहीं है ।
विवरण— शब्द केवल आकाश का ही गुण है वायु आदि भूतों में 'शब्द' गुण नहीं होता—यह नैयायिक मानते हैं । परन्तु ग्रन्थकार कहते हैं कि यह उचित नहीं है । क्योंकि आकाश में प्रतिध्वनिरूप शब्द की जैसी प्रतीति होती है, वैसी वायु, तेज, जल और पृथिवी में भी क्रम से 'बिस्स्' 'भुग् भुग्' 'बुल बुल' और 'कड कड' आदि शब्द सुनाई पड़ते हैं । अतः इस प्रतीति के अनुसार पांचों भूतों में शब्द को मानना चाहिये ।
इस पर नैयायिक कहता है कि वायु आदि द्रव्यों में शब्द की प्रतीति भ्रम से होती है । जैसे—अग्नि की उष्णता जल में भासित होने से 'उष्णं जलम्' व्यवहार होता है,
१. 'न तु श०'—इति पाठान्तरम् । २. न च शब्दस्येति । शब्दः आकाशमात्रस्य गुणः इति नैयायिकाः कथयन्ति । किन्तु वाय्वादीनामपि शब्दो गुण इति वेदान्तिनः । नैयायिका हि न हि आकाशाद् वायोरुत्पत्ति मन्यन्ते, इति न आकाशगुणस्य शब्दस्य वाय्वादिक्रमेण तेज आदिषु तेषामंगीकारो युक्तः । वेदान्तिनां तु आकाशाद् वायुरिति श्रुतिप्रमाणपरतन्त्राणां न नैयायिकानां मतादरणमुचितम् । तदुक्तं पञ्चदश्याम्—
"शब्दस्पर्शो रूपरसो गन्धो भूतगुणा इमे । एकद्वित्रिचतुःपञ्चगुणा व्योमादिषु क्रमात् ॥ प्रतिध्वनिवियच्छब्दः वायौ बीसीति शब्दनम् । अनुष्णाशीतसंस्पर्शो वह्नौ भुगु भुगु ध्वनिः ॥ उष्णस्पर्शः प्रभारूपं जले बुलुबुलुध्वनिः । शीतस्पर्शः शुक्लरूपं रसो माधुर्यमीरितम् ॥ भूमौ कडकडाशब्दः काठिन्यं स्पर्श इष्यते । नीलादिकं चित्ररूपं मधुराम्लादिको रसः ॥"
अन्तःकरणोत्पत्तिः ] विषयपरिच्छेदः ३३७
उसी तरह आकाशनिष्ठ शब्द ही वायु आदि में भासित होता है, और उसी की 'यह वायु का शब्द है' ऐसी भ्रान्ति होती है।
सिद्धान्ती कहता है कि यह ठीक नहीं, क्योंकि बाधज्ञान होने पर ही पूर्वज्ञान भ्रम रूप सिद्ध होता है। परन्तु स्थूल वायु में प्रतीयमान शब्द-प्रतीति का कभी बाध नहीं होता। इस कारण उसे भ्रम मानना उचित नहीं। किन्तु पृथ्वी का एकमात्र गन्ध ही गुण मानना चाहिये, क्योंकि जल आदि में जो गन्ध की प्रतीति होती है, वह अन्वय-व्यतिरेक से पृथ्वी के सम्बन्ध से ही होती है—यह अनुभवसिद्ध है।
अब उपक्रमपूर्वक इन्द्रियादि-सृष्टि को बताते हैं—
इमानि भूतानि त्रिगुणमाया-कार्याणि त्रिगुणानि। गुणास्सत्त्व-रजस्तमांसि। एतैश्च सत्त्वगुणोपेतैः पञ्चभूतैर्व्यस्तैः$^१$ पृथक् पृथक् क्रमेण श्रोत्र-त्वक्चक्षू-रसन-घ्राणाख्यानि पञ्च$^२$ ज्ञानेन्द्रियाणि जायन्ते। $^३$एतेभ्यः पुनराकाशादिगतसात्त्विकांशेभ्यो मिलितेभ्यो मनोबुद्धयहङ्कार-चित्तानि जायन्ते। श्रोत्रादीनां पञ्चानां क्रमेण दिग्वातार्कवरुणाश्विनोऽ-धिष्ठातृदेवताः। मन आदीनां$^४$ चतुर्णां क्रमेण चन्द्रचतुर्मुखशङ्करा-च्युता अधिष्ठातृ-देवताः।
**अर्थ—**ये (अपञ्चीकृत) भूत, त्रिगुणात्मक माया के कार्य होने से त्रिगुणात्मक रहते हैं। उनमें सत्त्वगुण से युक्त हुए पाँच भूतों से व्यक्तिशः यथाक्रम श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा और नासिका—ये पाँच इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। परन्तु आकाशादिकों के एकत्र हुए सात्त्विक अंश से मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त उत्पन्न होते हैं। श्रोत्रादि पाँच इन्द्रियों की क्रमशः दिशा, वायु, सूर्य, वरुण और अश्विनीकुमार—ये अधिष्ठातृ-देवता हैं। मन आदि चारों के क्रम से चन्द्र, ब्रह्मदेव, शंकर और विष्णु—ये अधिष्ठातृ-देवता हैं।
**विवरण—**ये भूत, सत्त्वरजस्तमोगुणात्मिका माया से उत्पन्न होने के कारण त्रिगुणात्मक ही होते हैं। उनमें से प्रत्येक के सत्त्वांश से क्रमशः श्रोत्रादि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। जैसे—आकाश के सात्त्विक अंश से श्रोत्रेन्द्रिय उत्पन्न होता है इत्यादि। वैसे ही इन पाँच भूतों के एकत्रित हुए सात्त्विकांश से मन इत्यादि अन्तःकरण-चतुष्टय उत्पन्न होता है। उनकी अधिष्ठातृदेवता अर्थात् श्रवणादि इन्द्रियों में श्रवण
१. 'स्तैर्यथाक्रमं श्रो०'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'पञ्चेन्द्रियाणि'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'एतैरेव च सत्त्वगुणोपेतैः पञ्चभूतैर्मिलितैर्मनो०'-इति पाठान्तरम् ।
४. 'नां क्र०'-इति पाठान्तरम् ।
२२ वे० प०
३३८ | वेदान्तपरिभाषा | [ पञ्चप्राणोत्पत्तिः
आदि की शक्ति देकर उन पर अनुग्रह करने वाली दिशादि और चन्द्रादि देवताओं का मूल में ही निर्देश किया है ।
पंच कर्मेन्द्रियाँ और प्राणों की उत्पत्ति बताते हैं—
एतैरेव रजोगुणोपेतैः पञ्चभूतै^१र्व्यस्तैर्यथाक्रमं वाक्पाणिपादपायूपस्थान्यानि कर्मेन्द्रियाणि जायन्ते । तेषां च क्रमेण वह्नीन्द्रोपेन्द्रमृत्युप्रजापतयोऽधिष्ठातृ-देवताः । रजोगुणोपेतैः पञ्चभूतैरेव^२ मिलितैः पञ्च वायवः प्राणापान-व्यानोदान-समानाख्या जायन्ते । तत्र प्राग्गमनवान् वायुः प्राणो नासादिस्थानवर्ती । अर्वाग्गमनवानपानः पाय्वादिस्थानवर्ती । विष्वग्गतिमान् व्यानः अखिलशरीरवर्ती । ऊर्ध्वगमनवानुत्क्रमणवायुरुदानः कण्ठस्थानवर्ती । अशितपीतान्नादिसमीकरणकरः समानः नाभिस्थानवर्ती ।
अर्थ— रजोगुण से युक्त हुए उन्हीं पांच भूतों से व्यक्तिशः यथाक्रम वाणी, हस्त, पाद, गुदद्वार और मूत्रेन्द्रिय—ये कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं, और उनकी क्रमशः अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र, विष्णु, मृत्यु और प्रजापति—ये अधिष्ठातृदेवताएँ हैं । रजोगुण से युक्त हुए इन पांच भूतों से ही मिलकर प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान-संज्ञक पाँच वायु उत्पन्न होते हैं । उनमें सर्वदा ऊर्ध्वगतिमान् वायु को 'प्राण' कहते हैं । और वह नासिकादिस्थान में रहता है । वैसे ही अधस्ताद् गमन करने वाले वायु को 'अपान' कहते हैं, और वह गुदादिस्थान में रहता है । शरीर में सर्वतः गमन करने वाले वायु को 'व्यान' कहते हैं और वह समस्त शरीर में वास करता है । जो वायु ऊर्ध्वगामी होकर उत्क्रमण में (खाये हुए अन्न को उलट कर गिराने में और परलोक गमन में) कारण होता है, उसे उदान कहते हैं । वह कण्ठ में रहता है । खाये हुए अन्न का या पीये हुए रस का समीकरण (समविभाग पाचन करने वाला) करने वाले को 'समान' कहते हैं, वह (मुख्यतः) नाभिस्थानवृत्ति होता है ।
विवरण— आकाश के रजोगुणात्मक अंश से वागिन्द्रिय उत्पन्न होती है । इसी क्रम से वायु आदि चार भूतों के प्रत्येक के पृथक्-पृथक् रजोंश से हस्तादि चार कर्मेन्द्रियाँ होती हैं और उनकी अग्न्यादि, अधिष्ठातृ (अनुग्राहक) देवता होती हैं । इसी प्रकार पांच भूतों के एकत्रित रजोंश से प्राणादिसंज्ञक पाँच वायु होते हैं । उनके लक्षण ऊपर बता चुके हैं । इस विषय में—
१. 'तैर्यथा'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'भूतैर्मि०'—इति पाठान्तरम् ।
भूतानाम्पञ्चीकरणम् ] विषयपरिच्छेदः ३३९
'हृदि प्राणो गुदेऽपानः समानो नाभिमण्डले। उदानः कण्ठदेशे स्याद् व्यानः सर्वशरीरगः ॥' यह श्लोक प्रसिद्ध है। प्राण का स्थान बताते समय 'नासादि' यहाँ 'आदि' शब्द का प्रयोग इसीलिये किया है। तथापि प्राणादिकों के नासिकादिस्थान 'वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत्' (ऐत०) श्रुति से व्यक्त होते हैं।
अब स्थूल महाभूतों की उत्पत्ति और पञ्चीकरण प्रकार दिखलाते हैं।
'तैरेव तमोगुणोपेतैरपञ्चीकृतभूतैः पञ्चीकृतानि² जायन्ते। 'तासां³ त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणि' (छा० ६-३-३.) इति श्रुतेः पञ्चीकरणोपलक्षणार्थत्वात्।
पञ्चीकरणप्रकारश्चेत्थम्—आकाशमादौ द्विधा विभज्य तयोरेकं भागं पुनश्चतुर्द्धा विभज्य तेषां⁴ चतुर्णामंशानां वाय्वादिषु चतुर्षु भूतेषु⁵ संयोजनम्। एवं वायुं द्विधा विभज्य तयोरेकं भागं पुनः चतुर्द्धा विभज्य तेषां चतुर्णामंशानामाकाशादिषु⁶ संयोजनम्। एवं तेज आदीनामपि। तदेवमेकैकभूतस्यार्द्धं स्वांशात्मकमर्द्धान्तरं चतु-⁷र्विधभूतमयमिति पृथिव्यादिषु स्वांशाधिक्यात्पृथिव्यादिव्यवहारः। तदुक्तम्—
'वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वादः' (ब्र० सू० २-४-२३) इति।
**अर्थ—**तमोगुण से युक्त हुए उन्हीं अपञ्चीकृतभूतों से पञ्चीकृत भूत होते हैं। क्योंकि 'उन तीन देवताओं में से एक-एक देवता को मैं त्रिवृत् त्रिवृत् करती हूँ' (छां० ६-३-३) इत्यादि त्रिवृत्करण श्रुति ही पञ्चीकरण का उपलक्षण है पञ्चीकरण का यह प्रकार है—प्रथमतः आकाश के दो भाग करें, उनमें से एक भाग के पुनः चार भाग करें। तब इन चार अंशों को (भागों को) क्रम से वायु आदि चार भूतों में मिला दें। इसी प्रकार वायु के प्रथमतः दो भाग कर उनमें से एक भाग के पुनः चार भाग करें, और उन्हें आकाशादि चार भूतों में मिला दें। इसी प्रकार तेज आदि भूतों का पञ्चीकरण समझ लेना चाहिये। इस रीति से एक-एक भूत का अर्ध भाग स्वांशात्मक
१. 'तैश्च तमो०'-इति पाठान्तरम्।
२. 'तानि भूतानि'—इति पाठान्तरम्।
३. 'सां च त्रि'-इति पाठान्तरम्।
४. 'षां तु'-इति पाठान्तरम्।
५. 'षु योज०'-इति पाठान्तरम्।
६. 'षु योज०-इति पाठान्तरम्।
७. 'तुर्भुत'-इति पाठान्तरम्।
३४० | वेदान्तपरिभाषा | [ लिङ्गशरीरोत्पत्तिः
( उस भूत का अंशरूप ) होता है, और दूसरा अर्ध भाग चार भूतों का अष्टमांश रूप होता है । तथापि पृथिव्यादि चार भूतों में स्वयं के अंश का ही आधिक्य होने से उनमें 'यह पृथिवी' इत्यादि व्यवहार ( शब्द प्रयोग ) होता है । इसी कारण कहा गया है कि 'पृथिवी आदियों में उन्हीं के अंश का वैशेष्य ( आधिक्य ) होने से 'पृथिवी' आदि व्यवहार होता है ।
विवरण—अपञ्चीकृत भूतों के तमोगुणात्मक अंशों से पञ्चीकृत भूत ( स्थूलभूत ) होते हैं। छान्दोग्योपनिषद् में यद्यपि त्रिवृत्करण ही बताया है तथापि वह पञ्चीकरण का भी उपलक्षक ( संग्राहक ) है । वहाँ तेज, आप् और अन्न ( पृथिवी ) इन तीन भूतों की ही उत्पत्ति कही गई है। इस कारण त्रिवृत्करण ( तीनों का ही मेलन ) बताया है। उस पर से पाँच भूतों का ज्ञान होने के कारण उनके पञ्चीकरण करने में कोई विरोध नहीं है। मूल के उद्धृत ब्रह्मसूत्र में 'तद्वादः' पद की द्विरुक्ति अध्याय की समाप्ति दिखलाने के लिए है।
लिङ्ग-शरीर की उत्पत्ति दिखाते हैं—
'पूर्वोक्तै^२रपञ्चीकृतैर्लिङ्गशरीरं परलोकयात्रानिर्वाहकं मोक्षपर्यन्तं स्थायि मनोबुद्धिभ्यामुपेतं ज्ञानेन्द्रिय-पञ्चक-कर्मेन्द्रियपञ्चक-प्राणादि-पञ्चक-संयुक्तं जायते ।
तदुक्तम्—
पञ्च-प्राण-मनोबुद्धि-दशेन्द्रिय-समन्वितम् ।
अपञ्चीकृत-भूतोत्थं सूक्ष्माङ्गं ^३भोगसाधनम् ॥१॥ इति ।
तच्च द्विविधं—परमपरं च^४ । तत्र परं हिरण्यगर्भ-लिङ्गशरीरम्,
१. अवयवातिरिक्तोऽपि अवयवी न अवयवारब्धः, किन्तु अवयवसामग्र्यैवारभ्यः । नहि नैयायिकसम्मतमुपादानकारणत्वं समवायित्वनिबन्धनं वेदान्तिनां सम्मतम् । वेदान्तिनो हि अवयविनि अवयवा विद्यन्ते तादात्म्येन, न अवयवेषु अवयवी, वृक्षे शाखा इत्येव अनुभवस्य विद्यमानत्वात् इति मन्यन्ते । तथा च-अपञ्चीकृतभूतकार्यारब्धत्वमेव सूक्ष्म-शरीरस्येति वादो न युक्तः ।
२. तैश्चापञ्चीकृतैर्भूतैलिङ्ग०-इति पाठान्तरम् ।
३. भोगसाधनम् स्थूलशरीरं भोगावच्छेदकम्, सूक्ष्मशरीरं तु अनुभवविशेषात्मक-भोगसाधनम् इति वैषम्यम् । नहि स्थूलशरीरं विना सूक्ष्मशरीरमात्रेण भोगः संभवति ! तदुक्तं चित्रदीपे—"स्थूलदेहं विना लिङ्गदेहो न क्वापि दृश्यते ।"
४. 'चेति'-इति पाठान्तरम् ।
अपरमस्मदादिलिङ्गशरीरम् । तत्र हिरण्यगर्भलिङ्ग शरीरं महत्तत्त्वम्, अस्मदादि-लिङ्गशरीरमहङ्कार¹ इत्याख्यायते ।
**अर्थ—**पूर्वोक्त अपञ्चीकृत ( सूक्ष्म ) भूतों के योग से ही परलोकगमनादि समस्त कार्यों का निर्वाहक ( कर्तृ ), मोक्ष तक स्थायी, लिङ्गशरीर उत्पन्न होता है । वह, ( लिङ्गशरीर ) मन, बुद्धि, पञ्चज्ञानेन्द्रिय, पञ्चकर्मेन्द्रिय और पञ्चप्राणों से युक्त रहता है । ( उक्तार्थ में मैत्रेयोपनिषद् का प्रमाण देते हैं ) इसी कारण यह वचन है—पाँच-प्राण, मन, बुद्धि और दस इन्द्रियों से युक्त एवं अपञ्चीकृत भूतों से बना हुआ सूक्ष्म-शरीर, भोग का साधन है । वह लिङ्गशरीर पर-अपर भेद से द्विविध है । उनमें हिरण्य-गर्भ का लिङ्गशरीर 'पर' ( व्यापक ) होता है और हम लोगों का लिङ्गशरीर 'अपर' ( अव्यापक ) होता है । हिरण्यगर्भ के लिङ्ग-शरीर की 'महत्तत्त्व' संज्ञा है और हमारे लिङ्ग-शरीर को 'अहंकार' कहा जाता है ।
**विवरण—**शुद्ध आत्मा व्यापक एवं निष्क्रिय होने से उसका परलोक में गमन और वहाँ से पुनः आगमन होना सम्भव नहीं और स्थूल देह तो यहीं भस्म हो जाता है । इस कारण परलोकगमन आदि की उपपत्ति लगाने के लिए मोक्ष तक स्थिर रहने वाले सप्तदश-अवयवात्मक लिङ्ग-शरीर का अवश्य स्वीकार करना चाहिए । यहाँ जो पर एवं अपर संज्ञाएं बताई गई हैं उन्हें समष्टि एवं व्यष्टि भी कहते हैं ।
एवं तमोगुणयुक्तेभ्यः पञ्चीकृतभूतेभ्यो भूम्यन्तरिक्ष-स्वर्मह-र्जनस्तपः-सत्या²त्मकस्योर्ध्वलोकसप्तकस्य ³अतलवितलसुतलतलातल-रसातलमहातलपातालाख्याधोलोकसप्तकस्य ब्रह्माण्डस्य जरायुजाण्डज-स्वेदजोद्भिज्जाख्य⁴चतुर्विध-स्थूलशरीराणां⁵मुत्पत्तिः । तत्र जरायुजानि जरायुभ्यो जातानि मनुष्य-पश्वादिशरीराणि । अण्डजानि अण्डेभ्यो जातानि पक्षि-पन्नगादिशरीराणि । स्वेदजानि⁶ स्वेदाज्जातानि यूका⁷मशकादीनि । उद्भिज्जानि ⁸भूमिमुद्भिद्य जातानि वृक्षादीनि । वृक्षा-दीनामपि पापफल-भोगायतनत्वेन शरीरत्वम् ।
१. 'तत्त्वमित्या०'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'त्याख्यस्या०'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'अतल-पाताल-वितल-सुतल-तलातल-रसातल-महातलाख्यस्याधो'-इति पाठान्तरम् ।
४. 'रूपाणां'-इति पाठान्तरम् ।
५. 'णां चोत्प०'-इति पाठान्तरम् ।
६. 'नि तु'-इति पाठान्तरम् ।
७. 'क-मश'-इति पाठान्तरम् ।
८. 'तु'-इति पाठान्तरम् ।
३४२ | वेदान्तपरिभाषा | [ भौतिकसृष्टिः
अर्थ—इस प्रकार तमोगुणयुक्त पञ्चीकृत भूतों से भूमि, आकाश, स्वर्ग, महर्, जन, तपस् और सत्य—इन सात ऊर्ध्व लोकों की और अतल, वितल, भुतल, तलातल, रसातल, महातल, पाताल—इन सात अधोलोकों की ( ब्रह्माण्ड की ) एवं जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज—इन चतुर्विध स्थूल शरीरों की उत्पत्ति होती है। उनमे जरायु से उत्पन्न हुए मनुष्य एवं पशु आदि के शरीर 'जरायुज' कहलाते हैं। अण्ड से उत्पन्न होनेवाले पक्षी-सर्प आदि के शरीर 'अण्डज' कहलाते हैं। घर्म ( पसीना ) से उत्पन्न होनेवाले जू, मक्खी आदि कीटकों के शरीर 'स्वेदज' कहलाते हैं। भूमि को भेदकर ऊपर आनेवाले वृक्षादि के शरीर को 'उद्भिज्ज' कहते हैं। वृक्षादि भी पापफल के भोग के स्थान होने से उन्हें भी शरीरत्व है।
विवरण—पञ्चीकृत भूतों से चतुर्दश भुवन (ब्रह्माण्ड), एवं चतुर्विध प्राणिशरीरों की उत्पत्ति होती है। वृक्षादिकों के भी शरीर होते हैं—यह कैसे ज्ञात हुआ ? क्योंकि अन्य प्राणियों की तरह उनकी प्रवृत्ति या कहीं आना-जाना भी नहीं दीखता। इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि वृक्ष आदिकों के भी शरीर होते हैं। क्योंकि 'आत्मनो भोगायतनं शरीरम्'—आत्मा के भोग के स्थान को 'शरीर' कहते हैं—यह शरीर का लक्षण है। वृक्षादिक भी पूर्वकृत पापकर्म के उपभोग लेने के स्थान हैं। 'शरीरजैः कर्मदोषैर्याति स्थावरतां नरः'—मनुष्य, शरीरजन्य कर्मदोषों से स्थावरयोनि को पाते हैं—इत्यादि स्मृति इस विषय में प्रमाण हैं। वैसे ही उनमें किये घाव भी भर जाते हैं। इत्यादि अनुभव से उनकी विशिष्ट योनि होना सिद्ध होता है।
आधुनिक प्राणिशरीर एवं घट-पटादि कार्य मनुष्यजन्य होते दीखते हैं। तब 'ईश्वर, समस्त जगत् का कर्ता है' यह कथन कैसे सम्भव हो सकता है ?
उत्तर देते हैं—
'तत्र परमेश्वरस्य पञ्चतन्मात्रायुत्पत्तौ सप्तदशावयवोपेतलिङ्गशरीरोत्पत्तौ हिरण्यगर्भ-स्थूलशरीरोत्पत्तौ च साक्षात्कर्तृत्वम्। इतर निखिलप्रपञ्चोत्पत्तौ हिरण्यगर्भादि द्वारा,—'हन्ताहमिमास्तिस्रो देवताः अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि' ( छा० ६-३-२ ) इति श्रुतेः। हिरण्यगर्भो नाम मूर्तित्रयादन्यः प्रथमो जीवः।
स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते।
आदिकर्त्ता स भूतानां ब्रह्माऽग्रे समवर्तत ॥ १ ॥
१. 'अत्र'-इति पाठान्तरम्।
प्रलयविभागः ] विषयपरिच्छेदः ३४३
'हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य' ( यजु० १३-४, ऋ० सं० १०-१२०-१ ) इत्यादिश्रुतेः । एवं 'भूत-भौतिकसृष्टिर्निरूपिता ।
अर्थ--इन समस्त कार्यों में से पञ्चतन्मात्राओं की उत्पत्ति में एवं अवयवात्मक लिंग शरीर की उत्पत्ति में परमेश्वर को साक्षात् कर्तृत्व है इससे भिन्न समस्त प्रपञ्च की उत्पत्ति हिरण्यगर्भ के द्वारा होता है । '( वह सदाख्य देवता ) अब मैं इन तीन देवताओं में इस जीव से ( आत्मरूप से ) अनुप्रवेश कर नाम और रूप को व्यक्त करता हूँ—इस प्रकार ईक्षण करती हुई' यह श्रुति इस विषय में प्रमाण है ( छां० ६-३-२ ) । ब्रह्मा, विष्णु, महेश--इन तीन मूर्तियों से भिन्न हिरण्यगर्भसंज्ञक प्रथम जीव है । इस विषय में 'वही पहला शरीरी और वही पुरुष कहा जाता है । वह प्राणिमात्र का आदिकर्ता ब्रह्मा प्रथम उत्पन्न हुआ' हिरण्यगर्भ भूतों से पूर्व उत्पन्न हुआ' इत्यादि श्रुति प्रमाण है । इस रीति से भूत-भौतिक सृष्टि का निरूपण किया गया ।
विवरण—पांच सूक्ष्म भूत, लिंग शरीर और हिरण्यगर्भाख्य आदिजीव की उत्पत्ति का परमेश्वर साक्षात् कर्ता है । उसके पश्चात् होनेवाली समस्त सृष्टि को हिरण्यगर्भ के द्वारा वह उत्पन्न करता है । यह उक्त श्रुति से ज्ञात होने के कारण उक्त दोष नहीं हो पाता । क्योंकि आधुनिक कर्म भी ईश्वरानुग्रह के बिना नहीं होते, यह वेदान्त सिद्धान्त है । समस्त लिंग ( सूक्ष्म ) शरीरों के अभिमानी प्रथम जीव को 'हिरण्यगर्भ' कहते हैं । इस विषय में श्रुतियों के अनेक आधार दिये गये हैं । आदि शब्द से 'यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम्' ( श्वे० ६-१८ ) इत्यादि श्रुतियों को समझना चाहिए ।
इस प्रकार भूत एवं भूतकार्यों की उत्पत्ति बताकर ग्रन्थकार कहते हैं—
इदानीं प्रलयो निरूप्यते । प्रलयो नाम त्रैलोक्य-नाशः, स च ^२चतुर्विधः-नित्यः प्राकृतो नैमित्तिक आत्यन्तिकश्चेति । तत्र नित्यः प्रलयः-सुषुप्तिः, तस्याः सकलकार्य-प्रलयरूपत्वात् । धर्माधर्मपूर्वसंस्काराणां च तदा कारणात्मनाऽवस्थानम् । तेन ^३सुषुप्तोत्थितस्य न सुखदुःखाद्य^४नुभवानुपपत्तिः । न वा स्मरणानुपपत्तिः । न च
१. एतावता प्रपञ्चेन "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते" इति श्रुतिर्व्याख्याता । इतः परं 'यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति' इति श्रुतिर्व्याख्यास्यते ।
२. नैमित्तिकः प्राकृतिकस्तथैवात्यन्तिको द्विजाः ।
नित्यश्च सर्वभूतानां प्रलयोऽयं चतुर्विधः ॥"
३. 'सुप्तोत्थित'-इति पाठान्तरम् ।
४. 'नुप'-इति पाठान्तरम् ।
| ३४४ | वेदान्तपरिभाषा | [ नित्यप्रलयनिरूपणम् |
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सुषुप्तावन्तःकरणस्य विनाशे¹ तदधीनप्राणादिक्रियाऽनुपपत्तिः। वस्तुतः श्वासाद्यभावेऽपि तदुपलब्धेः पुरुषान्तरविभ्रममात्रत्वात् ²सुप्तशरीरोपलब्धिवत् ।
अर्थ—अब प्रलय का निरूपण किया जाता है। प्रलय का अर्थ है—त्रैलोक्य का नाश। वह नित्य, प्राकृत, नैमित्तिक और आत्यन्तिक भेद से चतुर्विध है। उनमें सुषुप्ति (निद्रा) नित्य प्रलय है क्योंकि वह समस्तकार्यप्रलयरूप होती है। और उस समय धर्म, अधर्म एवं पूर्वसंस्कार कारण रूप से रहते हैं। इस कारण निद्रा से उठे व्यक्ति के सुख-दुःखादिकों के अनुभव की अनुपपत्ति या स्मरण का असंभव नहीं हो पाता।
शंका—‘निद्रा में अन्तःकरण का नाश होता है’ यह माना जाय तो उसके (अन्तःकरण के) अधीन रहनेवाले प्राणादिकों के क्रिया की अनुपपत्ति होगी—ऐसी शंका करना ठीक नहीं। क्योंकि निद्रावस्था में वस्तुतः प्राण नहीं होते। किन्तु अन्य पुरुषों को जो उसकी प्रतीति होती है, वह निद्रित पुरुष के शरीर-प्रतीति के समान ही भ्रमरूप है।
विवरण—जगदुत्पत्ति का निरूपण करने के अनन्तर क्रमानुरूप जगत् की स्थिति का निरूपण करना था, परन्तु ‘स्थिति’ सर्वलोक प्रसिद्ध होने से ग्रन्थकार प्रलय का ही प्रारम्भ करते हैं। स्वर्ग, मृत्यु और पाताल—इन तीनों लोकों के लय को ही ‘प्रलय’ कहते हैं। प्राकृत और आत्यन्तिक प्रलय में सभी का नाश होता है, केवल त्रैलोक्य का ही नहीं होता। तथापि उसमें त्रैलोक्य का भी नाश हो ही जाने से प्राकृत-प्रलय के लक्षण पर अव्याप्ति दोष नहीं हो पाता। कूर्मपुराण में प्रलय के नित्यादि चार भेद कहे गये हैं। उनमें नित्यप्रलय का अर्थ है—निद्रा। क्योंकि निद्रा में समस्त कार्यों का लय होता है, यह अनुभवसिद्ध है। ‘सुषुप्तिकाले सकले विलीने’ इत्यादि श्रुति भी यही बता रही है।
शंका—‘निद्रावस्था में सबके साथ धर्म-अधर्म आदि का भी लय होता है’ तब जागृत हुए पुरुष को सुख-दुःखों का अनुभव कैसे हो सकेगा?’ इस शंका का ‘धर्माधर्म०’ आदि हेतु से समाधान किया गया है। निद्रा में धर्म, अधर्म और पूर्वानुभवों के संस्कार का आत्यन्तिक लय नहीं होता, किन्तु जैसे वृक्ष बीज में रहता है वैसे ही वे स्व-कारण में (अविद्या में) स्थित रहते हैं, इसी से निद्रित पुरुष जगता है। धर्माधर्मानुरूप क्रमशः सुख-दुःख को भोगता है, और पूर्वसंस्कारों के जागृत होने पर उसे पूर्वानुभूत विषयों का स्मरण भी होता है।
शंका—‘निद्रा में समस्त कार्यों के साथ अन्तःकरण का भी लय होता है’ यह मानने पर सुप्त पुरुष के श्वासोच्छ्वासादि क्रियाएं नहीं हो सकेंगी, क्योंकि समस्त व्यापार मन के अधीन होते हैं।
१. ‘शेन’–इति पाठान्तरम् ।
२. ‘सुषुप्तश’–इति पाठान्तरम् ।
नित्यप्रलयनिरूपणम् ] विषयपरिच्छेदः ३४५
समाधान— वस्तुतः सुप्त पुरुष के श्वासोच्छ्वास आदि का भी लय ही होता है। क्योंकि सुप्त पुरुष को किसी प्रकार की कोई प्रतीति नहीं हुआ करती। किन्तु अन्य जागृत पुरुषों को उसके प्राणादि क्रिया की जो प्रतीति होती है, वह उस पुरुष के शरीर प्रतीति के तुल्य ही भ्रमरूप है, अर्थात् जैसे निद्रा में पुरुष को 'यह मेरा शरीर' इत्याकारक शरीर का ज्ञान न होने से उसकी दृष्टि में शरीरादिकों का भी अभाव होने के कारण ही अन्य लोगों को उसका शरीर दिखलाई पड़ने पर भी वह भ्रम ही है। इसी प्रकार उसमें रहनेवाले श्वासोच्छ्वासादि का ज्ञान भी मिथ्याज्ञान ही है। निद्रा भी एक व्यक्ति का प्रलय होने से, एक पुरुष का प्रलय होने पर भी वह दूसरे को ज्ञात नहीं हो पाता। यह उत्तर ग्रन्थकार ने दृष्टिसृष्टिवाद को मानकर (दृष्टि = वस्तु का ज्ञान ही सृष्टि = उत्पत्ति) दिया है। इस कारण प्रत्यक्षादिविरोध नहीं होता।
इस पर वादी की शंका और उसका समाधान—
न चैवं ¹सुप्तस्य परेतादविशेषः। ²सुप्तस्य हि लिङ्गशरीरं संस्कारात्मनाऽत्रैव वर्तते, प्रेतस्य तु लोकान्तरे इति वैलक्षण्यात्। यद्वा, अन्तःकरणस्य द्वे शक्ती—ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिश्चेति। तत्र ज्ञानशक्तिविशिष्टान्तःकरणस्य सुषुप्तौ विनाशः, न क्रियाशक्ति-विशिष्टस्येति प्राणाद्यवस्थानमविरुद्धम्। 'यदा सुप्तः स्वप्नं न कञ्चन पश्यति, अथास्मिन् प्राण³ एवैकधा भवति, अथैनं वाक् सर्वैर्नामभिः सहाप्येति, (कौ० ३-२) 'सता ⁴सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति' (छां ६-८-१) इत्यादिश्रुतिरुक्तसुषुप्तौ मानम्।
अर्थ— यह मानने पर 'निद्रित मनुष्य में और मृत मनुष्य में कोई अन्तर नहीं रहता।' यह शंका नहीं की जा सकती क्योंकि सुप्त मनुष्य का लिंग-शरीर संस्काररूप से यहीं रहता है। परन्तु मृत मनुष्य का लिङ्ग शरीर अन्य लोक (लोकान्तर) में रहता है। यह दोनों में अन्तर है। अथवा क्रियाशक्ति एवं ज्ञानशक्ति के भेद से अन्तःकरण की दो शक्तियां होती हैं। उनमें से ज्ञानशक्ति विशिष्ट अन्तःकरण का ही निद्रावस्था में नाश होता है। क्रियाशक्तिविशिष्ट का नहीं। इस कारण निद्रा में प्राणादिकों का रहना विरुद्ध नहीं है। 'जिस अवस्था में पुरुष समस्त विशेष-ज्ञानरहित होकर निद्रित रहता है तब किसी भी जाग्रद्वासनारूप पदार्थ को नहीं देखता, उस समय इस प्राण में ही (क्रियाशक्ति में ही) एकत्व को पाता है, तब इस प्राणोपाधिक आत्मा में वाणी
१. 'सुषुप्तस्य'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'सुषुप्तस्य'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'प्राण एकधा'—इति पाठान्तरम् ।
४. 'सोम्य'—इति पाठान्तरम् ।