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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

३. श्री हनुमान जी की स्तुति व पद

१०० विनय-पत्रिका "बिसद किसोर, पीन, सुन्दर वपु, स्याम सुरुचि अधिकाई।" २—'वनमाल'—कमल, कुंद, पारिजात, मंदार और तुलसीकी पैरोंतक लटकती हुई मालाका नाम वनमाला है। ३—'चिह्न कुलिसादि'—भगवान्‌के दाहिने चरणमें २४ और वाम चरणमें २४, कुल ४८ चिह्न हैं। भारतेन्दु हरिश्चन्द्रजीने इन चिह्नोंका वर्णन इस प्रकार किया हैः— स्वस्तिक ऊरध रेख कोन अठ श्रीहल-मूसल। अहि वाणाम्बर वज्र सु-रथ यव कंज अष्टदल ॥ कल्पवृक्ष ध्वज चक्र मुकुट अंकुश सिंहासन। छत्र चँवर यम-दंड माल यवकी नरको तन ॥ चौबीस चिह्न ये रामपद प्रथम सुलच्छन जानिये। 'हरिश्चंद' सोई वामपद जानि ध्यान उर आनिये ॥ सरयू गोपद महि जम्बू घट जय पताक दर। गदा अर्ध ससि तिल त्रिकोन षटकोन जीव वर ॥ शक्ति सुधा सर त्रिबलि मीन पूरन ससि वीना। वंशी धनु पुनि हंस तून चन्द्रिका नवीना ॥ श्रीराम-वाम पद चिह्न सुभ ए चौबिस शिव-उक्त सब। सोइ जनकनन्दिनी दक्ष पद भजु सब तजु 'हरिचंद' अब ॥

( ५२ )

देव— कोसलाधीस, जगदीस, जगदेक हित, अमित गुन विपुल विस्तार लीला। गायन्ति तव चरित सुपवित्र स्रुति-सेष-सुक- संभु-सनकादि मुनि मननसीला ॥ १ ॥ वारिचर-वपुष धरि भक्त-निस्तारपर, धरिनिकृत नाव महिमाति गुर्वी।

विनय-पत्रिका १०१ सकल यज्ञांसमय उग्र विग्रह क्रोड़, मर्दि दनुजेस उद्धरन उर्वी ॥२॥ कमठ अति विकट तनु कठिन पृष्ठोपरी, भ्रमत मंदर कंडु-सुख मुरारी। प्रगटकृत अमृत, गो, इंदिरा, इंदु, वृंदारकवृंद-आनंदकारी ॥३॥ मनुज-मुनि-सिद्ध-सुर-नाग-त्रासक, दुष्ट दनुज द्विज-धर्म मरजाद-हर्ता। अतुल मृगराज-वपुध्रित, विदरित अरि, भक्त प्रहलाद-अहलाद-कर्ता ॥४॥ छलन बलि कपट-वटुरूप वामन ब्रह्म, भुवन परजंत पद तीन करनं। चरन-नख-नीर त्रैलोक-पावन परम, विबुध-जननी दुसह-सोक हरनं ॥५॥ छत्रियाधीस-करि निकर-नर-केसरी, परसुधर विप्र-ससि-जलद रूपं। बीस भुजदंड दससीस खंडन चंड, वेग सायक नौमि राम भूपं ॥६॥ भूमिभर-भार-हर, प्रगट परमात्मा, ब्रह्म नर-रूपधर भक्त-हेतू। वृष्णि-कुल-कुमुद-राकेस राधारमन, कंस-वंसाटवी-धूमकेतू ॥७॥ प्रबल पाखंड महि-मंडलाकुल देखि, निंदकृत अखिल मख कर्म-जालं। सुद्ध वोधैक घन, ज्ञान-गुन-धाम, अज, बौद्ध अवतार वंदे कृपालं ॥८॥

१०२ विनय-पत्रिका कालकलिजनित मलमलिन मन सर्वनर मोह-निसि निविड़ जमनांधकारं । विष्णुजस पुत्र कलकी दिवाकर उदित दास तुलसी हरन विपति भारं ॥९॥ शब्दार्थ - गायंति = गाते हैं । वारिचर = मत्स्य । वपुष = शरीर । गुर्वी = श्रेष्ठ । क्रोड़ = शूकर । उर्वी = पृथिवी । कमठ = कच्छप । कंडु = खुजलाहट । इंदिरा = लक्ष्मी । वृंदारका- वृंद = देव-गण । मृगराज = नृसिंह । वटु = ब्रह्मचारी । ससि = शस्य, धान, धान्य । भूमि- भर = पृथिवीभर, समूची पृथ्वी । राकेस = चन्द्रमा । वंसाटवी = वंश-वन । धूमकेतू = अग्नि । कलकी = कल्कि । भावार्थ—हे देव ! हे कोशलपति ! हे जगदीश ! आप संसार के एकमात्र हितकारी हैं और अपने अमित गुणोंकी अपार लीलाका विस्तार करनेवाले हैं । आपके सुन्दर और पवित्र चरित्रको वेद, शेष, शुकदेव, शिव, सनकादि तथा मननशील मुनि गाते हैं ॥१॥ आपने अपने भक्तोंके उद्धारके लिए मत्स्यरूप धारण करके पृथिवीकी नौका बनायी; आपकी महिमा अपार है । आप समस्त यज्ञोंके अंशरूप हैं, और उग्र शरीरवाले शूकर रूपमें हिरण्याक्ष नामक दैत्यराजका मर्दन करके पृथिवीका उद्धार करनेवाले हैं ॥२॥ हे मुरारे ! आप अत्यन्त विक- राल कछुएगा शरीर धारण करके अपनी कठिन पीठपर घूमते हुए मन्दराचल पर्वतसे खुजलाहट का सुख प्राप्त करनेवाले तथा (समुद्रमंथन करके) अमृत, कामधेनु, लक्ष्मी और चन्द्रमाको उत्पन्न करके देवताओंको आनन्दित करनेवाले हैं ॥३॥ आप नृसिंहरूप धारण करके मनुष्य, मुनि, सिद्ध, देवता और नागोंको दुःख देनेवाले तथा ब्राह्मण-धर्मकी मर्यादा हरण करनेवाले महान् शत्रु दुष्ट दैत्य हिरण्यकशिपुको फाड़कर उसके पुत्र भक्त प्रह्लादको आह्लादित करनेवाले हैं ॥४॥ आपने बलिको छलनेके लिए वामन ब्रह्मचारीका कपटरूप धारण करके तीन पैरमें तीनों लोकोंको नाप लिया । नापते समय आपके चरण-नखसे तीनों लोकोंको परम पवित्र करनेवाला जल निकला जोकि गंगाके नामसे प्रसिद्ध हुआ । आपने छलसे बलिका राज्य ले लिया और उसे इन्द्रको देकर देवताओंकी माता अदितिका दुःसह शोक हर लिया॥५॥ आप क्षत्रिय राजारूपी हाथियोंके समूहको विदीर्ण करने- के लिए पुरुष-सिंहरूप तथा ब्राह्मणरूपी धान्यके लिए मेघरूप परशुरामका अवतार

विनय-पत्रिका १०३ धारण करनेवाले हैं। आप बीस भुजा और दस शिरवाले रावणको अपने प्रचंड और वेगवान बाणोंसे खंड-खंड करनेके लिए महाराज रामचन्द्रका अवतार धारण करनेवाले हैं; आपको मैं प्रणाम करता हूँ ॥६॥ समूची पृथिवीका भार उतारने तथा भक्तोंकी रक्षाके लिए आप परब्रह्म परमात्मा होकर भी नर-रूप धारण करने- वाले हैं। आप वृष्णि-कुल-कुमुदको विकसित करनेवाले चन्द्रमा-स्वरूप, राधा- रमण, तथा कंसके वंशरूपी वनको जलानेके लिए अग्निरूप हैं ॥७॥ पृथिवी मंडलको प्रबल पाखंडोंसे व्याकुल देखकर आपने यज्ञादि कर्मोंकी निन्दा की; ऐसे शुद्ध बोध-स्वरूप, विज्ञानघन, सकल-गुण-निधान, अजन्मा, कृपालु आपके बौद्धा- वतारकी मैं वन्दना करता हूँ ॥८॥ कलिकाल-जनित पापोंसे सब मनुष्योंके मन मलिन हो रहे हैं; आप इस महानिशाके म्लेच्छरूपी सघनान्धकारका नाश करनेके लिए उदय हुए सूर्यकी भाँति विष्णुयश नामक ब्राह्मणके यहाँ पुत्ररूपसे कल्कि अवतार धारण करनेवाले हैं। आप इस तुलसीदासको विपत्तियोंके भारको दूर कर दीजिये ॥९॥ विशेष १—इस पदमें दशावतारकी चर्चा है। भगवान्‌के मुख्य दसों अवतार ये हैं:—(१) मत्स्य, (२) वाराह, (३) कूर्म, (४) नृसिंह, (५) वामन, (६) परशुराम, (७) राम, (८) कृष्ण, (९) बुद्ध, (१०) कल्कि। इनमें प्रथम चार अवतार सत्ययुगमें, उसके बादके तीन अवतार (वामन, परशुराम और राम) त्रेतामें, उसके बादके दो अवतार (कृष्ण, बुद्ध) द्वापरके अन्तमें हुए हैं और अन्तिम कल्कि अवतार कलियुगके अन्तमें होगा। यह दशावतारी पद महाकवि जयदेवकृत ‘गीतगोविन्द’ नामक काव्य-ग्रंथकी एक अष्टपदीसे मिलता-जुलता है। उस अष्टपदीका प्रारम्भ इस प्रकार है:— "प्रलयपयोधि जले धृतवानसि वेदम्। विहित वहित्र चरित्रमखेदम् ॥ केशवधृत मीन शरीर, जय जगदीश हरे ॥१॥ क्षितिरति विपुलतरे तवतिष्ठति पृष्ठे । धरणि धरण किणचक्र गरिष्ठे ॥ केशवधृत कच्छप रूप, जय जगदीश हरे ॥२॥

१०४ विनय-पत्रिका वसति दशन-शिखरे धरणी तव लग्ना । शशिनि कलंक कलेव निमग्ना ॥ केशवधृत शूकर रूप, जय जगदीश हरे ॥३॥ तव कर कमलवरे नखमद्भुत श्रृंगम् । दलित हिरण्यकशिपु-तनु भृङ्गम् ॥ केशवधृत नरहरि रूप, जय जगदीश हरे ॥४॥ छलयसि विक्रमणे कलिमद्भुत वामन । पदनख नीर जनित-जन पावन ॥ केशवधृत वामन रूप, जय जगदीश हरे ॥५॥ क्षत्रिय रुधिर मये जगदपगत पापम् । स्नपयसि पयसि शमित भवतापम् ॥ केशवधृत भृगुपति रूप, जय जगदीश हरे ॥६॥ वितरसि दिक्शुरणे दिग्पति कमनीयम् । दशमुख मौलिबलिं रमणीयम् ॥ केशवधृत राम शरीर, जय जगदीश हरे ॥७॥ वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम् । हलहति भीति मिलित यमुनाभम्॥ केशवधृत हलधर रूप, जय जगदीश हरे ॥८॥ निन्दसि यज्ञविधे रहहश्रुति जातम् । सदय हृदय दर्शित पशु घातम् ॥ केशवधृत बुद्ध शरीर, जय जगदीश हरे ॥९॥ म्लेच्छ निवह निधने कलयसि करवालम् । धूमकेतुमिव किमपि करालम् ॥ केशवधृत कल्कि शरीर, जय जगदीश हरे ॥१०॥ २—'जगदेकहित'—परमात्माका अवतार केवल संसारका कल्याण करनेके लिए ही हुआ करता है। गीतामें भगवान्ने स्वयं कहा है:— यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ × . × परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ३—'अतुल मृगराज'—का अर्थ है, 'तुलना-रहित सिंह' अर्थात् 'नृसिंह' । ४—'प्रबल पाखंड...कर्मजाल'—बौद्धावतारके पहले यज्ञोंमें पशुबलि इत्यादि की जाती थी, इसीसे भगवान् बुद्धने उसे पाखंड समझकर उसका खंडन किया था । इस रचनासे स्पष्ट ज्ञात होता है कि गोस्वामीजो धर्मके नाम- पर पशुबलि आदिको केवल ढोंग समझते थे ।

विनय-पत्रिका १०५ ( ५३ ) देव— सकल सौभाग्यप्रद सर्वतोभद्र-निधि सर्व, सर्वेश, सर्वाभिरामं। सर्व-हृदि-कंज-मकरंद-मधुकर रुचिर, रूप, भूपालमनि नौमि रामं ॥१॥ सर्वसुख-धाम गुनग्राम, विश्रामप्रद, नाम सर्वास्पदं अति पुनीतं । निर्मलं, सांत, सुविसुद्ध, बोधायतन, क्रोध-मद-हरनं, करुना-निकेतं ॥२॥ अजित, निरुपाधि, गोतीतमव्यक्त, विभु- मेकमनवद्यमजमद्वितीयं । प्राकृतं, प्रगट परमातमा, परमहित, प्रेरकानंत वंदे तुरीयं ॥३॥ भूधरं, सुन्दरं, श्रीवरं, मदन-मद- मथन सौन्दर्य-सीमातिरम्यं । दुष्प्राप्य, दुष्प्रेक्ष्य, दुस्तर्क्य, दुष्पार, संसारहर, सुलभ, मृदुभाव-गम्यं ॥४॥ सत्यकृत, सत्यरत, सत्यव्रत, सर्वदा, पुष्ट, संतुष्ट, संकष्टहारी । धर्म वर्मनि ब्रह्मकर्मबोधैक, विप्र पूज्य, ब्रह्मण्यजनप्रिय, मुरारी ॥५॥ नित्य, निर्मम, नित्यमुक्त, निर्मान, हरि, ज्ञानघन, सच्चिदानंद मूलं । सर्वरक्षक सर्वभक्षकाध्यक्ष, कूटस्थ, गूढ़ार्चि भक्तानुकूलं ॥६॥

१०६ विनय-पत्रिका सिद्ध-साधक-साध्य, वाच्य-वाचकरूप, मन्त्र-जापक-जाप्य, सृष्टि-स्रष्टा। परम कारन, कंजनाभ, जलदाभतनु, सगुन, निर्गुन, सकल दृश्य-द्रष्टा ॥७॥ व्योम व्यापक, विरज, ब्रह्म, वरदेस, वैकुण्ठ, वामन, विमल ब्रह्मचारी। सिद्ध-वृंदारकावृंदवंदित सदा, खंडि पाखंड-निर्मूलकारी ॥८॥ पूरनानंद संदोह, अपहरन संमोह-अज्ञान, गुन-सन्निपातं। वचन-मन-कर्म-गत सरन तुलसीदास त्रास पाथोधि इव कुंभजातं ॥९॥ शब्दार्थ—सर्व = सम्पूर्ण । सर्व (शर्व) = शिवजी । प्राकृतं = मनुष्य शरीर। प्रेरक = प्रेरणा करनेवाले। दुष्प्रेक्ष्य = कठिनतासे दर्शन देनेवाले । दुस्तर्क्य = तर्क द्वारा नहीं जाने जा सकनेवाले । निर्मम = मोह-ममता रहित । कूटस्थ = लोहारकी निहाईके समान अचल, विकाररहित जो सदा एक रूपमें स्थित रहे। जापक = जप करनेवाला । जाप्य = जिसके लिए जप किया जाय । व्योम = आकाश । सन्निपातं = मिश्रित त्रिदोष, विकारोत्पादक । भावार्थ—हे देव ! आप सब प्रकारके सौभाग्यको देनेवाले, सब प्रकारके कल्याणके समुद्र, सम्पूर्ण या विश्वरूप, अखिलेश्वर, सबको आनन्द देनेवाले और शिवजीके हृदय-कमलके परागको पान करनेके लिए भ्रमररूप हैं; राजाओंमें मणि-स्वरूप तथा मनको हरनेवाले श्रीरामको मैं प्रणाम करता हूँ ॥१॥ हे देव ! आप सब प्रकारके सुखोंके स्थान, गुणोंके समूह और विश्रामप्रद हैं, आपका नाम प्रभुत्त्वसे परिपूर्ण तथा अत्यन्त पवित्र है। आप निर्मल, शान्त, विशुद्ध, ज्ञान-निधान, क्रोध-मदादिका हरण करनेवाले तथा करुणाके धाम हैं ॥२॥ आप अजेय, उपाधिरहित, इन्द्रिय-ज्ञानसे परे, अव्यक्त, विभु, एक, दूषण-रहित, अजन्मा और अद्वितीय हैं। आप मनुष्य-शरीरमें प्रकट हुए, परमात्मा हैं, परम हितू हैं, सबके प्रेरक और अनन्त हैं; ऐसे तुरीय (ब्रह्म) रूप रामकी मैं वन्दना करता हूँ ॥३॥ आप (शेषरूपसे) पृथिवीको धारण करनेवाले, मनोहर, लक्ष्मीपति,

विनय-पत्रिका १०७ कामदेवकी सुन्दरताके अभिमानको चूर करनेवाले, सौन्दर्यकी सीमा और अत्यन्त रमणीय हैं। आप दुष्प्राप्य, बड़ी कठिनाईसे दर्शन देनेवाले, दुस्तर्क्य, दुष्पार, जन्म-मरणरूप संसारके हरनेवाले तथा कोमल भाव द्वारा सुलभतासे प्राप्त होने- वाले हैं ॥४॥ आप सत्यको उत्पन्न करनेवाले, सदैव सत्यमें रत रहनेवाले, सत्यव्रती, पुष्ट (दिव्य सामर्थ्यवान्), सन्तुष्ट और कष्टोंको हरनेवाले हैं। आप धर्मरूपी कवच धारण करनेवाले, ब्रह्मस्वरूप, कर्मज्ञानमें अद्वितीय, ब्राह्मणोंके पूज्य, ब्राह्मणोंकी रक्षा करनेवाले, भक्तोंके प्रिय तथा मुर नामक दानवके शत्रु हैं ॥५॥ आप नित्य, मोहममता-रहित, नित्यमुक्त, मान-रहित, विष्णु, ज्ञानघन, सच्चिदानन्द और सबके मूल कारण हैं। आप सबके रक्षक, सबको भक्षण करनेवाले (यमराज) के स्वामी, कूटस्थ, गूढ़ तेजवाले तथा भक्तोंपर कृपा करनेवाले हैं ॥६॥ आप ही सिद्ध, साधक और साध्य हैं, वाच्य और वाचक हैं, आप ही मंत्र, जापक और जाप्य हैं तथा आप ही सृष्टि और स्रष्टा हैं। आप परम कारण, पद्मनाभ, मेघकी आभाके समान शरीरवाले, सगुण और निर्गुण हैं। सब दृश्य भी आप ही हैं और उसके द्रष्टा भी आप ही हैं ॥७॥ आप आकाशकी तरह व्यापक, रजोगुण आदिसे रहित, साक्षात् ब्रह्म, वर देनेवालोंके स्वामी, बैकुंठ एवं निर्मल वामन ब्रह्मचारी हैं। आप सिद्ध और देव-समूह द्वारा सदैव वन्दित तथा पाखण्डका खंडन करके उसे निर्मूल करनेवाले (बुद्ध अवतार) हैं ॥८॥ आप पूर्ण आनन्दके समूह, मोह और अज्ञान-जनित तीनों गुणोंके या त्रिदोषके नाशक हैं। आप वचन, मन और कर्मसे शरणमें आये हुए इस तुलसीदासके भव-भयरूपी समुद्रको सोखनेके लिए अगस्त्य ऋषिके समान हैं ॥९॥ विशेष १—'कर्मबोधैक'—कर्मकी गति ऐसी गहन है कि उसका पूर्ण ज्ञान केवल परमात्माको ही है। कर्मकी गहनताके विषयमें गीतामें भगवान्‌ने कहा है:— कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः । अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥

१०८ विनय-पत्रिका अथवा 'ब्रह्मकर्मबोधैक' का अर्थ 'वेदविहित कर्मके ज्ञानमें अद्वितीय' भी किया जा सकता है। क्योंकि 'ब्रह्म' शब्द कई जगह 'वेद' के लिए व्यवहृत हुआ है। २—'निर्मान'—ईश्वर मानरहित हैं। यदि ऐसा न होता तो वह मत्स्य, शूकरादिका रूप न धारण करते। ३—'गूढार्चि'—परमात्माने अवतार लेकर अपने ईश्वरत्वके तेजको छिपा रखा है, इसीसे उन्हें गूढार्चि कहा गया है। ४—"सिद्ध साधक...द्रष्टा"—यहाँ गोस्वामीजीने अद्वैत वेदान्तानुसार ब्रह्मका निरूपण किया है। इसी प्रकार रामचरितमानसमैं भी ग्रन्थकारने सृष्टि- को ईश्वरके रूपमें देखा है:— सीयराममय सब जग जानी। करौं प्रनाम जोरि जुग पानी ॥ वास्तवमें ब्रह्मके सिवा विश्व-ब्रह्माण्डमें दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं। इसीसे कहा भी है कि— सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन । ( ५४ ) देव— विस्व-विख्यात, विस्वेस, विस्वायतन, विस्वमरजाद, व्यालारिगामी। ब्रह्म, वरदेस, वागीस, व्यापक, विमल, विपुल बलवान, निर्वानस्वामी ॥१॥ प्रकृति, महतत्व, शब्दादि गुन, देवता व्योम, मरुदग्नि, अमलांबु, उर्वी। बुद्धि, मन, इन्द्रिय, प्रान, चित्तातमा, काल, परमानु, चिच्छक्ति गुर्वी ॥२॥

विनय-पत्रिका १०१ सर्वमेवात्र त्वद्रूप भूपालमनि ! व्यक्तमव्यक्त, गतभेद, विष्णो । भुवन भवदंग, कामारि-वंदित, पद- द्वंद्व मंदाकिनी-जनक, जिष्णो ॥३॥ आदिमध्यांत, भगवंत ! त्वं सर्वगत- मीस, पश्यन्ति ये ब्रह्मवादी । जथा पट-तंतु, घट-मृत्तिका, सर्प स्रग, दारुकरि, कनक-कटकांगदादी ॥४॥ गूढ़, गंभीर, गर्वघ्न, गूढ़ार्थवित्, गुप्त, गोतीत, गुरु, ग्यान-ग्याता । ग्येय, ग्यानप्रिय, प्रचुर गरिमागार, घोर-संसार-पर, पार-दाता ॥५॥ सत्य संकल्प, अतिकल्प, कल्पांतकृत, कल्पनातीत, अहि-तल्पवासी । वनज-लोचन, वनज-नाभ, वनदाभ-वपु, वनचरध्वज-कोटि लावन्यरासी ॥६॥ सुकर, दुष्कर, दुराराध्य, दुर्व्यसनहर, दुर्ग, दुर्धर्ष, दुर्गात्तिहर्त्ता । वेदगर्भार्भकादक्ष-गुन गर्व, अर्वागपर-गर्व-निर्वाप-कर्त्ता ॥७॥ भक्त अनुकूल, भवसूल-निर्मूलकर, तूलअघ - नाम पावक-समानं । तरल तृष्णातमी-तरनि, धरनी धरन, सरन-भयहरन, करुनानिधानं ॥८॥ बहुल बृंदारकावृंद - वंदारु-पद- द्वंद्व, मंदार-मालोर-धारी । पाहि मामीस संताप-संकुल सदा दास तुलसी प्रनत रावनारी ॥९॥

११० विनय-पत्रिका शब्दार्थ—व्यालारि = गरुड़ । वागीस = सरस्वतीके ईश, वाणीके अधिष्ठाता । निर्वाण = मुक्ति । उर्वी = पृथिवी । गुर्वी = बहुत बड़ी । जिष्णो = सर्वजित् । त्वं = तुम्हें । पश्यन्ति = देखते हैं । स्रग = माला । कटकांगदादी = (कटक+अंगद+आदि) कड़े, बाजूबन्द आदि गहने । तल्प = शय्या, सेज । वनज = कमल । वनदाम = (वनद+आभ) मेघकी आभा । वपु = शरीर । वनचर-ध्वज = मकरकेतु, कामदेव । सुकर = सुलभ । दुर्गति = कठिन दुःख । वेदगर्भार्भकादभ्र = (वेदगर्भ = ब्रह्मा + अर्भक = बालक + अदभ्र = बहुत) । निर्वाप = नाश । तरल = चंचल । तमी = रात्रि । वंदारु = वन्दनीय । माम् = मुझे । भावार्थ—हे देव ! आप संसार-प्रसिद्ध, जगत्के स्वामी, विश्वके गृह (विराट्रूप), जगत्की मर्यादा, और गरुड़पर चढ़कर चलनेवाले हैं। आप ब्रह्म हैं, वर देनेवाले देवताओंके स्वामी, सरस्वतीके ईश, व्यापक, निर्मल, अत्यन्त बलवान् और मुक्तिके स्वामी हैं ॥१॥ प्र कृति, महत्तत्त्व, शब्दादि, गुण, देवता, आकाश, वायु, अग्नि, निर्मल जल और पृथिवी, बुद्धि, मन, दसो इन्द्रियाँ, पंच- प्राण, चित्त, आत्मा, काल, परमाणु, श्रेष्ठ चित्-शक्ति आदि प्रत्यक्ष और अप्र- त्यक्ष (प्रकृतिसे लेकर चित्-शक्तितक) सब आपके ही रूप हैं ॥२॥ हे राज- राजेश्वर ! हे विष्णो ! आप भेद (सजातीय, विजातीय और स्वगत इन तीनों भेदोंसे) रहित हैं। यह विश्व-ब्रह्माण्ड आपका अंग है। हे सर्वजित् ! आपके युगल-चरण शिवजी द्वारा वन्दित हैं, और ये ही चरण गंगाजीको उत्पन्न करने वाले हैं ॥३॥ हे भगवन् ! आप ही आदि, मध्य और अन्त हैं तथा सर्वगत ईश्वर हैं। जो ब्रह्मवादी हैं वे आपको वैसा ही देखते हैं जैसे वस्त्रमें तन्तु (सूत), घड़ेमें मिट्टी, सर्पमें माला, लकड़ीके बने हुए हाथीमें लकड़ी तथा कड़े, बाजू आदि गहनोंमें सुवर्ण ॥ ४ ॥ आप गूढ़, गम्भीर, गर्व-हन्ता, गूढ़ अर्थके जाननेवाले, गुप्त, इन्द्रियातीत, गुरु, ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय स्वरूप, ज्ञानप्रिय, अगाध गरिमाके घर और घोर संसारसे परे एवं उससे पार कर देनेवाले हैं ॥५॥ आप सत्य- संकल्प और कल्पसे परे हैं। आप महाप्रलय करनेवाले, कल्पनातीत तथा शेष शय्यापर निवास करनेवाले हैं। आप कमल-नेत्र, पद्मनाभ, मेघकी आभाके समान शरीरवाले और कामदेवोंके समान सौन्दर्यकी राशि हैं ॥६॥ आप (भक्तोंके लिए) सुलभ तथा (दुष्टोंके लिए) दुर्लभ हैं। आपकी आराधना बड़ी कठिनतासे होती है। आप बुरे व्यसनोंको नष्ट करनेवाले, दुर्गम (कठिनतासे

विनय-पत्रिका १११ मिलनेवाले), दुर्द्धर्ष और कठिन दुःखोंको हरनेवाले हैं। ब्रह्माके पुत्र सनकादिकको अपनी परा और अपरा विद्याका बहुत गर्व था, उस गर्वका खर्व करनेवाले भी आप ही हैं ॥७॥ आप भक्तोंपर प्रसन्न रहनेवाले तथा सांसारिक दुःखोंको जड़से उखाड़ देनेवाले हैं। आपका नाम पापरूपी रूईको भस्म करनेके लिए अग्निके समान है। आप चंचल तृष्णारूपी अन्धकारको दूर करनेके लिए सूर्यरूप हैं, पृथिवीको धारण करनेवाले हैं, शरणागत जनोंका भय दूर करनेवाले तथा करुणा-निधान हैं ॥८॥ देव-समूह आपके दोनों चरणोंकी बहुत वन्दना किया करता है। आप मन्दारकी माला पहने रहते हैं। हे रावणके शत्रु श्रीरामजी ! सदैव सन्तापोंसे परिपूर्ण तुलसीदास आपको प्रणाम करता है। हे प्रभो ! मेरी रक्षा कीजिये ॥९॥ विशेष १—'शब्दादि'—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पाँचों पंच ज्ञाने- न्द्रियोंके विषय हैं। २—'गुण'—सत्त्व, रज और तम ये तीन गुण हैं। ३—'व्योम...उर्वी'—आकाश, वायु, तेज (अग्नि), जल और पृथिवी ये पाँच महाभूत हैं। इन्हीं पंचभूतोंसे सृष्टिकी उत्पत्ति हुई है। ४—'इन्द्रिय'—पंच ज्ञानेन्द्रिय और पंच कर्मेन्द्रियका उल्लेख पीछे किया जा चुका है। ५—'प्राण'—पाँच हैं; प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान। ६—'गतभेदं'—परमात्मा सजातीय, विजातीय और स्वगत इन तीनों भेदोंसे रहित है। (१) अपनी जातिवालोंसे जो सम्बन्ध है, उसे सजातीय सम्बन्ध कहते हैं; जैसे एक मनुष्यका दूसरे मनुष्यसे सम्बन्ध। नित्य शुद्ध- बुद्ध चेतन और असंग परमात्माकी कोई जाति नहीं है, इसलिए वह सजातीय भेदसे रहित है। (२) अन्य-जातिवालोंसे जो सम्बन्ध है, उसे विजातीय सम्बन्ध कहते हैं; जैसे मनुष्यका पशुसे। (३) अपने अवयवों (अंगों) से जो सम्बन्ध है उसे स्वगत सम्बन्ध कहते हैं। जैसे हाथका सम्बन्ध पैरसे। गुसाईंजीने यही बात रामायणमें भी कही है :— सकल विकार रहित गतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा ॥

११२ विनय-पत्रिका

७—‘सर्प-स्रग’—ज्ञान-चक्षु खुल जानेपर मनुष्यकी प्राणिमात्रपर अभेद- दृष्टि हो जाती है और उसे ऐसा भान होने लगता है कि संसारकी प्रत्येक वस्तु- का कारण ईश्वर है। देखिये, भक्त मीराबाईके ज्ञान-चक्षु खुल गये थे। एक बार महाराणाने मीराका प्राण लेनेके लिए पिटारीमें बन्द कराकर एक विषधर सर्प भेजा। दासीने मीराके हाथमें सर्पकी पिटारी देते हुए कहा कि महाराणाने आपके लिए उपहार भेजा है। मीराने प्रसन्न होकर उस पिटारीको ले लिया और बड़े प्रेमसे उसे खोलकर सर्पको उठाते हुए कहा,—बड़ी सुन्दर माला है। इसे मैं अपने गिरिधरलालको चढ़ाऊँगी। भक्त-मीराके लिए वह सर्प मालाके रूपमें परिणत हो गया। जब यह समाचार महाराणाको मालूम हुआ तो वह बहुत क्रुद्ध हुए। सोचा, मीरा जादूगरनी है। इससे पहले भी वह मीराका प्राण लेनेके लिए कई उपाय कर चुके थे। यह निशाना चूक जानेपर उनके क्रोधकी सीमा न रही। वास्तवमें भावना बड़ी बलवान् वस्तु है। देखिये न, दृढ़ भावना और अभेददृष्टि ने सर्पको मालाके रूपमें परिणत कर दिया।

८—‘वनचर-ध्वज’—‘वन’ नाम ‘जल’ का है। जलमें चलनेवाला अर्थात् मकर है ध्वजपर जिसके; अर्थात् कामदेव।

९—‘वेदगर्भार्भकादभ्र...कर्ता’—एकबार सनकादिने अपने पिता ब्रह्मासे वेदान्तविषयक कुछ प्रश्न किया। सृष्टिके कार्यमें व्यस्त रहनेके कारण ब्रह्माजी शीघ्र उनके प्रश्नका उत्तर न दे सके। इससे सनकादिको अपने गुणका गर्व हुआ। ब्रह्माके स्मरण करते ही भगवान् विष्णु हंसका रूप धारण करके वहाँ प्रकट हो गये। उन्होंने तुरन्त ही सनकादिकका अभिमान चूर कर दिया। यही हंस भगवान् निम्बार्क सम्प्रदायके आदि आचार्य माने जाते हैं।

( ५५ )

देव— संत-संताप हर, विश्व विश्रामकर, राम कामारि, अभिरामकारी। सुद्ध बोधायतन, सच्चिदानन्दघन, सज्जनानंद-वर्धन, खरारी ॥१॥

विनय-पत्रिका ११३ सील-समता-भवन, विषमता-मति-समन, राम रामारमन, रावनारी। खङ्गकर, चर्मवर-वर्मधर, रुचिर कटि तून सर-सक्ति सारंगधारी ॥२॥ सत्यसंधान, निर्वानप्रद, सर्वहित, सर्वगुन-ज्ञान-विज्ञानसाली। सघन-तम-घोर-संसार-भर-सर्वरी- नाम दिवसेस खर-किरनमाली ॥३॥ तपन तीच्छन तरुन तीव्र तापघ्न, तप- रूप, तनभूप, तमपर, तपस्वी। मान-मद-मदन-मत्सर-मनोरथ-मथन, मोह-अंभोधि-मंदर, मनस्वी ॥४॥ वेद-विख्यात, वरदेस, वामन, विरज, विमल, वागीस, वैकुंठस्वामी। काम-क्रोधादिमर्दन, विवर्धन, छमा, सान्ति विग्रह, विहँगराज-गामी ॥५॥ परम पावन, पाप-पुंज-मुंजाटवी- अनल इव निमिष निर्मूलकर्त्ता। भुवन-भूषन, दूषनारि, भुवनेस, भू- नाथ, स्रुतिमाथ जय भुवन-भर्त्ता ॥६॥ अमल, अविचल, अकल, सकल, संतप्त-कलि- विकलता-भंजनानंदरासी। उरग-नायक-सयन, तरुन पङ्कज-नयन, छीरसागर-अयन, सर्ववासी ॥७॥ सिद्ध-कवि-कोविदानंद-दायक पद- द्वंद्व मंदात्ममनुजैर्दुरापं। यत्र संभूत अतिपूत जल सुरसरी दर्शनादेव अपहरति पापं ॥८॥ ८

११४ विनय-पत्रिका नित्य, निर्मुक्त, संयुक्त-गुन, निर्गुना- नंद, भगवंत, न्यामक, नियंता। विश्व-पोशन-भरन, विस्व-कारन-करन, सरन, तुलसीदास त्रास-हंता ॥९॥ शब्दार्थ—खङ्गकर = हाथमें तलवार। चर्मवर = श्रेष्ठ ढाल। वर्मधर = कवच धारण किये हुए। भर = अतिशय, सम्पूर्ण। सर्वरी = रात। तपन = तेज। तपरूप = तपोमय। तमपर = अविद्यासे परे। विवर्धन = विशेष वृद्धि करनेवाले। कोविद = विद्वान्। मंदात्म = पापी। दुराप = कठिनतासे प्राप्य। यत्र = जहाँसे। संभूत = उत्पन्न। दर्शनादेव = (दर्शनात् +एव) दर्शनसे अवश्यमेव। न्यामक = नियामक, कर्णधार, नियमोंके विधायक। नियंता = शासन करनेवाले। भावार्थ—हे देव श्रीराम! आप सन्तोंका सन्ताप हरनेवाले, विश्वको विश्राम देनेवाले तथा शिवजीको आनन्द देनेवाले हैं। आप शुद्ध-बुद्ध, सच्चिदा- नन्द घन हैं और साधुजनोंका आनन्द बढ़ानेके लिए खर नामक दैत्यके शत्रु हैं ॥१॥ हे राम, आप शील और समताके घर, वैषम्य बुद्धिके नाशक, लक्ष्मीके पति तथा रावणके शत्रु हैं। आप अपने हाथोंमें तलवार और सुन्दर ढाल लिये रहते हैं; आप कवच धारण किये हुए हैं तथा सुन्दर कमरमें तरकस कसे हुए हैं। आप बाण, शक्ति और धनुष धारण करनेवाले हैं ॥२॥ आप सत्य-संकल्प, मोक्षदाता, सबके हितकारी, सर्व-गुण-सम्पन्न तथा ज्ञान-विज्ञानशाली हैं। आपका नाम अज्ञानरूपी सघन अन्धकारसे पूर्ण घोर संसाररूपी रात्रिका नाश करनेके लिए प्रचण्ड किरणोंसे युक्त सूर्यके समान है ॥३॥ आप तीक्ष्ण तेजवाले, प्रबल एवं तीव्र दुःखोंके नाशक, राजाका शरीर धारण करनेपर भी तपस्याकी मूर्त्ति, अविद्यासे परे और तपस्वी हैं। आप मान, मद, काम, मत्सर, कामना और मोहरूपी समुद्रको मथनेके लिए मन्दराचल पर्वत हैं; आप मनस्वी भी हैं ॥४॥ आप वेदोंमें विख्यात, वरदायी देवताओंके स्वामी, वामन, विरक्त, निर्मल, सरस्वतीके अधी- श्वर, वैकुंठनाथ, काम-क्रोधादिके नाशक, क्षमाकी वृद्धि करनेवाले, शान्ति-मूर्त्ति और गरुडगामी हैं ॥५॥ आप परम पवित्र और पाप-पुंजरूपी मूँजके वनको अग्निके समान पलभरमें निर्मूल करनेवाले हैं। आप विश्व-ब्रह्माण्डके आभूषण, दूषण दैत्यके शत्रु, संसारके स्वामी, पृथिवीनाथ और वेदोंके मस्तक हैं। हे

विश्व-ब्रह्माण्डके अधीश्वर ! आपकी जय हो ॥६॥ आप मल-रहित, अविचल, कला-रहित, कलापूर्ण, कलिकालके तापसे तपे हुए प्राणियोंकी व्याकुलताका नाश करनेवाले तथा आनन्दकी राशि हैं। आप शेषनागके ऊपर सोते हैं, पूर्ण विक- सित कमलके समान नेत्रवाले हैं, क्षीरसागरमें रहते हैं तथा सबमें निवास करते हैं ॥७॥ सिद्धों, कवियों, और विद्वानोंको आनन्द देनेवाले आपके जो दोनों चरण हैं, वे पापी मनुष्योंके लिए अत्यन्त दुर्लभ हैं। जहाँसे (आपके जिन चरणोंसे) उत्पन्न होकर अत्यन्त पवित्र जलवती गंगाजी अपने दर्शनमात्रसे मनुष्यके सब पापोंको हर लेती हैं ॥८॥ आप नित्य, मुक्त, दिव्य गुण-युक्त, तीनों गुणोंसे रहित आनन्द-स्वरूप, षडैश्वर्यवान्, नियामक और सबपर शासन करनेवाले हैं। आप संसारका भरण-पोषण करनेवाले, विश्वके आदि कारण और आधार तथा शरणा- गत तुलसीदासके भयको हरनेवाले हैं ॥९॥

विशेष १—'अकल'—कला-रहित कहनेका यह अभिप्राय है कि परमात्मा (चन्द्रमा आदिकी तरह) घटते बढ़ते नहीं। २—'सकल'—कला-सहित कहनेका यह आशय है कि परमात्मा सोलहो कला युक्त अर्थात् पूर्ण तेज-स्वरूप हैं।

५६ ) देव— दनुजसूदन, दयासिन्धु, दम्भापहन, दहन, दुर्द्दोष, दुष्पापहर्त्ता । दुष्टतादमन, दमभवन, दुःखौघहर, दुर्ग दुर्वासना नासकर्त्ता ॥१॥ भूरिभूषन, भानुमंत, भगवंत, भव- भंजनाभयद, भुवनेसभारी। भावनातीत, भववंद्य, भवभक्तहित, भूमिउद्धरन, भूधरन-धारी ॥२॥

११६ विनय-पत्रिका वरद, वनदाम, वागीस, विस्वात्मा, विरज, वैकुंठ-मन्दिर-बिहारी । व्यापकं व्योम, वंदारु, वामन, विभो, ब्रह्मविद् , ब्रह्म, चिंतापहारी ॥३॥ सहज सुंदर, सुमुख, सुमन, सुभ सर्वदा, सुद्ध सर्वज्ञ, स्वच्छंदचारी । सर्वकृत, सर्वभृत, सर्वजित, सर्वहित, सत्य-संकल्प, कल्पांतकारी ॥४॥ नित्य, निर्मोह, निर्गुन, निरंजन, निजानंद निर्वान, निर्वानदाता । निर्भरानंद, निःकंप, निःसीम, निर्मुक्त, निरुपाधि, निर्मम, विधाता ॥५॥ महामंगलमूल, मोद-महिमायतन, मुग्ध-मधु-मथन, मानद, अमानी । मदनमर्दन, मदातीत, मायारहित, मंजु मानाथ, पाथोज-पानी ॥६॥ कमल-लोचन, कलाकोस, कोदंडधर, कोसलाधीस, कल्यानरासी । जातुधान-प्रचुर मत्तकरि-केसरी, भक्तमन-पुन्य-आरन्यवासी ॥७॥ अनघ, अद्वैत, अनवद्य, अव्यक्त, अज, अमित, अविकार आनंदसिंधो । अचल, अनिकेत, अविरल, अनामय, अनारंभ, अंभोदनादहन-बंधो ॥८॥ दास तुलसी खेद खिन्न, आपन्न इह, सोक-संपन्न, अतिसय सभीतं । प्रनत पालक राम, परम करुनाधाम, पाहि मामुर्विपति, दुर्विनीतं ॥९॥

विनय-पत्रिका ११७ शब्दार्थ - दुर्देोष = बुरे ऐव, बड़े दुर्गुण। दमभवन = बाह्येन्द्रिय निग्रह। दुःखौघहर = दुःख-समूहको हरनेवाले। भूरि = बहुत । भुवनेस = ब्रह्मा आदि। भव = शिवजी । मुग्ध = मूढ़। मानाथ = (मा+नाथ) लक्ष्मीके पति । पानी = पाणि, हाथ । अनिकेत = गृहरहित । अनामय = रोगादि रहित । अंभोदनाद = मेघनाद । मामुर्विपति = (माम् + उर्वि + पति) पृथिवीपति मुझे । भावार्थ - हे देव ! आप दैत्योंके नाशकर्ता, दयाके समुद्र, दम्भ-विनाशक, महान्-दोषोंको भस्म करनेवाले तथा महान्-पापोंको हरनेवाले हैं। आप दुष्टताका दमन करनेवाले, इन्द्रिय-निग्रहके स्थान (जितेन्द्रियोंमें श्रेष्ठ); दुःखसमूहको हरने- वाले और कठिन दुर्वासनाओंके नाशकर्ता हैं ॥१॥ आप बहुत-से आभूषणोंको धारण करनेवाले, सूर्यके समान प्रभावान्, ऐश्वर्यवाले, संसारके जन्म-मरणका भंजन करके अभयवर देनेवाले तथा ब्रह्मा आदिसे भी बड़े हैं। आप भावनाओं- से परे, शिवजी द्वारा वन्दनीय, शिवभक्तोंके हितकारी, पृथिवीका उद्धार करनेवाले तथा गिरिवर-(गोवर्द्धन) धारी हैं ॥२॥ हे विभो ! आप वरदाता, मेघकी आभा- वाले, वाणीसे परे, विश्वकी आत्मा, विरक्त, वैकुण्ठ-मन्दिर-विहारी, आकाशकी तरह घट-घटमें व्यापक, वन्दनीय, वामन, ब्रह्म (वेद) वेत्ता, साक्षात् ब्रह्म, और चिन्ताओंको दूर करनेवाले हैं ॥३॥ आप सहज (स्वाभाविक ही) सुन्दर हैं, आपका सुन्दर मुख है और मन भी सुन्दर है। आप सदैव मंगळरूप, शुद्ध, और सर्वज्ञ तथा स्वच्छन्द विचरण करनेवाले हैं। आप सब कुछ करनेवाले, सबका भरण-पोषण करनेवाले, सर्वजित्, सबके हितू, सत्य-संकल्प तथा प्रलय करनेवाले हैं ॥४॥ आप नित्य हैं, मोह-रहित हैं, निर्गुण हैं, निरंजन हैं, अपनेमें ही आनन्द करनेवाले हैं, मोक्ष-स्वरूप हैं और मुक्तिदाता हैं। आप पूर्ण आनन्दरूप, अचल, मर्यादा-रहित, सर्वदा मुक्त, उपाधि-रहित तथा सबके विधानकर्ता या उत्पादक हैं ॥५॥ आप बड़े-बड़े कल्याणोंके आदिकारण, आनन्द और महिमाके घर, मूढ़ मधु दैत्यको मारनेवाले, सम्मानदाता तथा स्वयं मान-रहित हैं। आप कामदेवके नाशक, मदसे परे, माया-रहित, मनोहारिणी लक्ष्मीजीके स्वामी तथा हाथमें कमल लिये रहनेवाले हैं ॥६॥ आप कमलनेत्र हैं, कलाओंके भाण्डार हैं, धनुषधारी कोशलाधीश हैं, कल्याण-राशि हैं, अगणित राक्षसरूपी मतवाले हाथियोंके लिए सिंह हैं तथा भक्तोंके मनरूपी पवित्र वनमें निवास करनेवाले

११८ विनय-पत्रिका हैं ॥७॥ हे आनन्दसिन्धो ! आप पाप-रहित, अद्वैत, दूषण-रहित, अव्यक्त, अजन्मा, अमित तथा षट्विकार-रहित हैं। हे मेघनादको मारनेवाले लक्ष्मणजीके भ्राता ! आप अचल, गृह-रहित, अविरल, रोगादि-रहित तथा अनादि हैं ॥८॥ सांसारिक दुःखोंसे खिन्न हुआ यह तुलसीदास शोकसे परिपूर्ण तथा अत्यन्त भयभीत हो रहा है। हे प्रणत-पालक श्रीरामजी ! आप परम कारुणिक हैं। हे पृथिवीनाथ ! मुझ दुर्विनीतकी रक्षा कीजिये ॥९॥ विशेष १—'भूधरनधारी'—जिस समय देवराज इन्द्रने कुपित होकर ब्रजपर मूसलधार वृष्टि की थी, उस समय भगवान् श्रीकृष्णने गो-गोपोंकी रक्षा करनेके लिए गोवर्धन पर्वतको छत्रकी भाँति अँगुलीपर उठाकर उनकी रक्षा की थी। तभीसे श्रीकृष्णका नाम गिरिधारी पड़ गया। गोस्वामीजीने श्रीरामको भूधरन- धारी कहकर रामावतार और कृष्णावतारमें अभेद सिद्ध किया है। ( ५७ ) देव— देहि सतसंग निज अंग श्रीरंग ! भव भंग कारन सरन-सोकहारी । ये तु भवदंघ्रिपल्लव-समाश्रित सदा, भक्तिरत, विगतसंसय, मुरारी ॥१॥ असुर-सुर, नाग-नर, जच्छ-गन्धर्व खग, रजनिचर, सिद्ध, ये चापि अन्ने । संत-संसर्ग त्रैवर्गपर परमपद, प्राप्य निःप्राप्यगति त्वयि प्रसन्ने ॥२॥ वृत्र, बलि, बान, प्रह्लाद, मय, व्याध, गज, गृद्ध, द्विजबन्धु, निजधर्म-त्यागी । साधुपद-सलिल निर्धूत-कलमष सकल, श्वपच-जवनादि कैवल्य-भागी ॥३॥

विनय-पत्रिका १११ संत निरपेच्छ, निर्मम, निरामय, अगुन, सब्द ब्रह्मौकपर, ब्रह्मज्ञानी । दच्छ, समदृक, स्वदृक, विगत अति खपर मति, परमरति विरति तव चक्रपानी ॥४॥ विश्व उपकारहित व्यग्र चित सर्वदा, त्यक्त मदमन्यु, कृत पुन्यरासी । यत्र तिष्ठन्ति तत्रैव अज सर्व हरि सहित गच्छन्ति छीराब्धिवासी ॥५॥ वेद-पयसिंधु, सुविचार मंदर महा, अखिल-मुनिवृंद निर्मथनकर्ता । सार सतसंगमुद्धृत्य इति निश्चितं वदति श्रीकृष्ण वैदर्भि भर्ता ॥६॥ सोक-संदेह, भय-हर्ष, तम-तर्षगन साधु-सद्युक्ति विच्छेदकारी । जथा रघुनाथ-सायक निसाचर-चमू- निचय-निर्दलन-पटु वेग भारी ॥७॥ यत्र कुत्रापि मम जन्म निज कर्मबस, भ्रमत जगजोनि संकट अनेकम् । तत्र त्वद्भक्ति-सज्जन, समागम, सदा भवतु मे राम विश्राममेकम् ॥८॥ प्रबल भव-जनित त्रैव्याधि-भैषज भगति, भक्त भैषज्यमद्वैत दरसी । संत-भगवंत अंतर निरंतर नहीं, किमपि मति मलिन कह दासतुलसी ॥९॥ शब्दार्थ—श्रीरंग = भगवान्‌का नाम है, वृन्दावनमें श्रीरंगजीका मन्दिर बहुत प्रसिद्ध है। भवदंघ्रि = (भवत्+अंघ्रि) आपके चरण। चापि = (च+अपि) और भी। अन्ने = दूसरे। त्रैवर्गपर = त्रिवर्ग यानी अर्थ, धर्म, कामसे परे। द्विज = अजामिल। निर्धूत = स्वच्छ, धुला हुआ। समदृक = समभावसे देखनेवाला। स्वदृक = आत्मदर्शी। मदमन्यु = अहंकार और