भारतकोश
संग्रह पर लौटें

विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

क्रोध। तिष्ठन्ति = रहते हैं। तत्रैव = वहीं। अज = ब्रह्मा। सर्व = शर्व, शिव। पय = दूध। उद्धृत्य = निकालकर। वैदर्भि = रुक्मिणी। भर्ता = पति। तर्पणन = वासनाएँ। चमू = सेना। भैषज्य = वैद्य। भावार्थ-हे देव श्रीरंगजी ! मुझ शरणागतको अपना अंग-स्वरूप सत्संग दीजिये, क्योंकि वह संसार-चक्रसे छुड़ानेवाला तथा शोकका हरनेवाला है। हे मुरारी ! जो लोग सदा आपके चरण-पल्लवके भरोसे रहते हैं और आपके चरणोंकी भक्तिमें रत रहते हैं, वे संशयमुक्त हो जाते हैं ॥१॥ दैत्य, देवता, नाग, मनुष्य, यक्ष, गन्धर्व, पक्षी, राक्षस, सिद्ध तथा और भी जितने दूसरे जीव हैं, वे सब सन्तोंके संसर्गसे अर्थ, धर्म, कामसे परे उस अप्राप्य परमपदको प्राप्त कर लेते हैं, जो केवल आपके ही प्रसन्न होनेपर मिलता है ॥२॥ वृत्रासुर, बलि, बाणासुर, प्रह्लाद, मय, धर्म नामक व्याध, गजेन्द्र, गिद्ध (जटायु) स्वधर्मत्यागी अजामिल, चांडाल, यवन आदि (पापी) सन्तोंके चरणोदकसे अपने सब पापों- को धोकर कैवल्य पदके अधिकारी हो गये ॥३॥ जो शान्त, निरपेक्ष (आकांक्षा- रहित), मोह-ममतारहित, काम-क्रोधरूपी रोगसे रहित, त्रिगुणरहित केवल शब्दब्रह्म अर्थात् वेदोंमें परायण और ब्रह्मज्ञानी हैं, जो (ज्ञान, भक्ति, वैराग्य आदिमें) कुशल समदर्शी, आत्मदर्शी या अपनी-परायी बुद्धिसे बिलकुल मुक्त हैं, हे चक्रपाणे ! जिनमें आपके प्रति परम भक्ति और संसारके प्रति विरक्तिका भाव है ॥४॥ जो संसारके उपकारार्थ सदा व्यग्र-चित्त हैं, मद और क्रोधको त्यागकर पुण्य-राशि हैं, ऐसे महात्मा जहाँ रहते हैं, वहीं ब्रह्मा और शिवके सहित क्षीर- सागरवासी भगवान् विष्णु पहुँच जाते हैं ॥५॥ चारों वेद दुग्ध-समुद्र हैं, उनका उत्तम विचार मन्दराचल पर्वत है और समस्त मुनियोंका समूह उसे मथनेवाला है। मथनेपर सत्संगरूपी सार (अमृत) निकला। यह सिद्धान्त रुक्मिणीपति भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं ॥६॥ साधुओंकी अच्छी युक्तियाँ शोक, सन्देह, भय- हर्ष, अज्ञान और वासनाओंको इस प्रकार विच्छिन्न कर देती हैं, जैसे रघुनाथजी- के बाण राक्षसोंकी सेनाके समूहको नष्ट करनेमें कुशल और महान् वेगवान हैं ॥७॥ हे देव श्रीरामजी ! अपने कर्मानुसार संसारकी अनेक संकटापन्न योनियोंमें घूमता हुआ जहाँ कहीं भी मेरा जन्म हो, वहाँ आपकी भक्ति और सन्तोंका समागम मुझे सदा प्राप्त हो; बस यही मेरा प्रधान विश्राम हो ॥८॥ घोर संसार

विनय-पत्रिका १२१ जन्म-रूपी त्रिविध रोगोंके लिए भक्ति ही दवा है और अद्वैतदर्शी अर्थात् परमेश्वर- के सिवा दूसरा कोई भी पदार्थ न देखनेवाला भक्त (साधु) ही वैद्य है । मलिनबुद्धि तुलसीदास कहता है कि सन्त और भगवान्‌में कभी किंचित् भी भेद नहीं है ॥९॥ विशेष १—'वृत्रासुर' नामक असुर बड़ा प्रतापी और परमभक्त था । इसका वध करनेके लिए देवता लोग दधीचिके पास उनकी हड्डी माँगने गये थे और उस परमदानी ऋषिने देवलोकके उपकारार्थ अपने शरीरका त्याग किया था । उनकी एक हड्डीसे इन्द्रका वज्र बना था और उसीसे इन्द्रने वृत्रासुरको मारा था । २—'बाणासुर'—राजा बलिका पुत्र था । इसके हजार भुजाएँ थीं । यह शिवभक्त था । इसकी पुत्री ऊषा स्वप्नमें भगवान् श्रीकृष्णके पौत्र अनिरुद्धका रूप देखकर मोहित हो गयी थी । उसने अपनी सखी चित्रलेखा द्वारा पता लगाकर अनिरुद्धको अन्तःपुरमें बुला लिया । यह बात मालूम होते ही बाणा- सुरने उन्हें कैद कर लिया । इसके लिए बाणासुर और श्रीकृष्णमें घोर संग्राम हुआ । इस युद्धमें बाणासुरकी ओरसे शिवजी भी लड़े थे । जब बाणासुरके सब हाथ कट गये, सिर्फ चार हाथ शेष रहे, तब वह ईश्वर-भक्त हो गया । शिवजीके अनुरोधसे भगवान्‌ने उसे अभय कर दिया । यह कथा श्रीमद्भागवतमें है । ३—'मय' नामक दैत्यके कला-कौशलकी प्रशंसा महाभारत, रामायण आदि ग्रंथोंमें मिलती है । लंकाका निर्माण इसीने किया था । महाभारतकालीन इन्द्र- प्रस्थके अपूर्व नगरका निर्माता भी यही था । यह ईश्वरका भक्त था । ४—'द्विजबन्धु' अजामिलके लिए आया है । यह बड़ा पापी ब्राह्मण था । इसके छोटे लड़के का नाम नारायण था । मरते समय इसने भयभीत होकर अपने पुत्रको 'नारायण' कहकर पुकारा था । इससे उसका उद्धार हो गया । ५—'जवनादि'—४६ पदके विशेषमें देखिये । ६—'संत भगवंत' सन्त-महिमापर सुन्दर कविने खूब कहा है:— साँचो उपदेश देत भली भली सीख देत समता सुबुद्धि देत कुमति हरतु हैं । मारग दिखाय देत भावहु भगति देत प्रेमकी प्रतीति देत अभरा भरतु हैं ॥

१२२ विनय-पत्रिका ज्ञान देत ध्यान देत आतम विचार देत ब्रह्मको बताइ देत ब्रह्म में चतुर हैं। सुन्दर कहत जग संत कछु देत नाहीं संतजन निसिदिन देवोई करतु हैं ॥ ( ५८ ) देव— देहि अवलंब करकमल, कमलारमन, दमन-दुख, समन-संतापभारी ! अज्ञान-राकेस-ग्रासन विधुंतुद गर्व- काम-करिमत्त-हरि, दूपनारी ॥१॥ वपुष ब्रह्मांड सुप्रवृत्ति लंका-दुर्ग, रचित मन दनुज मय-रूपधारी । विविध कोसौघ, अति रुचिर मंदिर-निकर, सत्वगुन प्रमुख त्रैकटककारी ॥२॥ कुनप-अभिमान सागर भयंकर घोर, विपुल अवगाह, दुस्तर अपारं । नक्र-रागादि-संकुल मनोरथ सकल, संग-संकल्प बीची-विकारं ॥३॥ मोह दसमौलि, तद्भ्रात अहँकार, पाकारिजित काम विश्रामहारी । लोभ अतिकाय, मत्सर महोदर दुष्ट, क्रोध पापिष्ट विबुधांतकारी ॥४॥ द्वेष दुर्मुख, दंभ खर, अकंपन कपट, दर्प-मनुजाद मद-सूलपानी । अमित बल परम दुर्जय निसाचर-निकर, सहित षड्वर्ग गो-जातुधानी ॥५॥ जीव भवदंघ्रि-सेवक विभाषन बसत, मध्य दुष्टाटवी ग्रसित चिंता । नियम-यम सकल सुरलोक-लोकेस, लंकेस-वस नाथ ! अत्यंत भीता ॥६॥

विनय-पत्रिका १२३ ज्ञान-अवधेस-गृह-गेहिनी भक्ति सुभ, तत्र अवतार भूभार-हर्ता। भक्त-संकष्ट अवलोकि पितु-वाक्य कृत गमन किय गहन वैदेहि-भर्ता ॥७॥ कैवल्य-साधन अखिल भालु मर्कट, विपुल ज्ञान-सुग्रीवकृत जलधिसेतू। प्रबल वैराग्य दारुन प्रभंजन-तनय, विषय वन भवनमिव धूमकेतू ॥८॥ दुष्ट दनुजेस निर्वंसकृत दासहित, विस्वदुख - हरन बोधैकरासी। अनुज निज जानकी सहित हरि सर्वदा, दास तुलसी - हृदय - कमलवासी ॥९॥ शब्दार्थ—विधुंतुद = राहु। हरि = सिंह। कोसौघ = (कोश + ओघ) कोश समूह। कुनप = शरीर। अवगाह = अथाह। नक्र = मगर। संग = आसक्ति। संकुल = समूह। बीची = लहर। दसमौलि = रावण। तद्भ्रात = उसका भ्राता, कुम्भकर्ण। पाकारिजित = इन्द्रको जीतनेवाला, मेघनाद। विबुधांतकारी = देवान्तक राक्षस। षड्वर्ग = काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर। जातुधानी = राक्षसी। दुष्टाटवी = दुष्टोंका वन, दुष्ट-समुदाय। गहन = वन। मर्कट = वानर। प्रभंजन = वायु। तनय = पुत्र। बोधैक = मुख्य ज्ञान। अनुज = भाई (लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न)। भावार्थ—हे देव लक्ष्मीपते ! आप दुःखोंका नाश करनेवाले तथा महान् सन्तापोंको दूर करनेवाले हैं। मुझे अपने हस्तकमलका सहारा दीजिये। आप अज्ञानरूपी चन्द्रमाको ग्रसनेके लिए राहु हैं, गर्व और कामरूपी मतवाले हाथियों- के लिए सिंह तथा दूषण नामक असुरके शत्रु हैं ॥१॥ शरीररूपी ब्रह्माण्डमें प्रवृत्ति ही (अनेक विषयोंका ग्रहण ही) लंकाका किला है। मनरूपी मय दैत्यने इस प्रवृत्तिरूपी किलेका निर्माण किया है। इसमें जो अनेक कोष हैं, वे ही अत्यन्त सुन्दर मकान हैं और सत्त्व, रज, तम, ये तीनों प्रमुख सेनापति हैं ॥२॥ देहाभिमान ही भयंकर, कठिन, विपुल (अत्यन्त), अथाह, दुस्तर और अपार समुद्र है। उसमें राग-द्वेषादिसे पूर्ण जो मनोरथ हैं, वे ही जल-जन्तु (मगर,

१२४ विनय-पत्रिका घड़ियाल आदि) हैं और आसक्तिके संकल्प-विकल्प ही विकार-(वायु) जन्य लहरें हैं ॥३॥ (इस भीषण लंकापुरीमें) मोह (अपने स्वरूपको भूल जाना) रूपी रावण है, अहंकार (आग्रह-बुद्धि) ही उसका भाई कुम्भकर्ण है और विश्रामको हरनेवाली काम-चेष्टा ही मेघनाद है। लोभ ही अतिकाय (राक्षस) है, मत्सर ही दुष्ट महोदर है, क्रोध ही महापापी देवान्तक है ॥४॥ द्वेष ही दुर्मुख है, दम्भ ही खर है, कपट ही अकम्पन है, दर्प ही मनुजाद है और मद ही शूलपाणि है। ये सब अमित बलशाली और कठिनतासे जीतने योग्य हैं। इस षड्वर्ग निशा- चरोंके समूहके साथ दस इन्द्रियरूपी राक्षसियाँ हैं। (अर्थात् लोभादिरूपी असुरोंका रमण इन्द्रियरूपी स्त्रियोंमें होता है; इसीसे इन्द्रियों को राक्षसी कहा गया है। क्योंकि इन्द्रियोंकी प्रवृत्तिमें ही लोभादिकका विलास हुआ करता है।) ॥५॥ हे नाथ ! यह जीव ही आपके चरणोंका सेवक विभीषण है। यह बेचारा दुष्टोंके जंगलमें चिन्ताग्रस्त भावसे निवास कर रहा है। यम-नियमरूपी समस्त देवलोक और दिग्पाल इस रावणके अधीन होकर अत्यन्त भयभीत हो रहे हैं ॥६॥ अतः जैसे आपने पृथिवीका भार उतारनेके लिए दशरथजीके यहाँ कौशल्या- के गर्भसे अवतार लिया था, वैसे ही हे जानकीवल्लभ ! ज्ञानरूपी दशरथके घरमें शुभ शक्तिरूपी कौशल्याके गर्भसे प्रकट होइये और जैसे भक्तोंका कष्ट देखकर पिताकी आज्ञासे आप उस समय वनमें पधारे थे वैसे ही इस बार मेरे हृदयरूपी वनमें पधारिये ॥७॥ मोक्षके साधनोंको ही सम्पूर्ण रीछ बन्दरोंके समूह बनाकर ज्ञान (शास्त्रजन्य साधन) रूपी सुग्रीवको संगमें लेकर इनकी सहायतासे (देहाभिमान-रूपी) समुद्रका पुल बाँध दीजिये। फिर तो प्रबल वैराग्यरूपी महापराक्रमी पवनकुमार हनुमान्‌जी विषय (रस-गन्धादि) रूपी वन और महलों- के लिए अग्निके समान हो जायेंगे ॥८॥ हे बोध-स्वरूप श्रीरामजी ! हे संसारका दुःख दूर करनेवाले ! दासके लिए दुष्ट दैत्योंका निर्वंश करके तुलसीदासके हृदय-कमलमें अपने छोटे भाइयों और जानकीजीके सहित सदैव निवास कीजिये प्रभो ! ॥९॥ विशेष १—'वपुष ब्रह्मांड'—जिन पचीस तत्त्वोंसे शरीरकी रचना हुई है, उन्हीं तत्त्वोंसे ब्रह्मांडकी भी; इसीसे 'वपुष' को ब्रह्मांड कहना सर्वथा सार्थक है।

विनय-पत्रिका १२५ २—'विविध कोसौघ'—कोश पाँच हैं:—अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय । ३—'संग संकल्प'—संग अर्थात् आसक्तिसे ही सब दोष उत्पन्न होते हैं। गीतामें भगवान्‌ने कहा है कि संगसे काम, कामसे क्रोध, क्रोधसे संमोह, संमोहसे स्मृतिभ्रंश, स्मृतिभ्रंशसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे विनाश होता है। ४—इस समस्त पदमें गुसाईंजीका रूपक अलंकार सर्वथा सांगोपांग है। ( ५९ ) देव— दीन-उद्धरन रघुवर्य करुना भवन, समन-संताप, पापौघहारी। विमल विज्ञान-विग्रह, अनुग्रहरूप, भूपवर, विबुध-नर्मद, खरारी ॥१॥ संसार-कांतार अति घोर, गंभीर, घन, गहन तरुकर्म-संकुल, मुरारी। वासना बल्लि खर-कंटकाकुल विपुल, निविड़ विटपाटवी कठिन भारी ॥२॥ विविध चितवृत्ति-खग-निकर श्येनोल्लूक, काक बक गृध्र आमिष-अहारी। अखिल खल, निपुन छल, छिद्र निरखत सदा, जीवजन पथिक मन-खेदकारी ॥३॥ क्रोध करिमत्त, मृगराज कंदर्प, मद- दर्प वृक-भालु अति उग्रकर्मा। महिष मत्सर क्रूर, लोभ सूकर रूप, फेरु छल, दंभ मार्जारधर्मा ॥४॥ कपट मर्कट विकट, व्याघ्र पाखण्ड मुख, दुखद मृगव्रात, उत्पातकर्ता। हृदय अवलोकि यहु सोक सरनागतं, पाहि मां पाहि, भो विश्वभर्ता ॥५॥

१२६ विनय-पत्रिका प्रबल अहँकार दुरघट महीधर, महा- मोह गिरि-गुहा निविड़ांधकारं । चित्त बेताल, मनुजाद मन, प्रेतगन, रोग भोगौध वृश्चिक-विकारं ॥६॥ विषय-सुख-लालसा दंस-मसकादि, खल झिल्लि रूपादि सब सर्प, स्वामी । तत्र आक्षिप्त तव विषम माया नाथ, अंध मैं मंद, व्यालादगामी ॥७॥ घोर, अवगाह भव आपगा पाप जल- पूर, दुष्प्रेक्ष्य, दुस्तर, अपारा । मकर षड्वर्ग, गोनक्र-चक्राकुला, कूल सुभ-असुभ, दुख तीव्र धारा ॥८॥ सकल संघट पोच सोचवस सर्वदा, दास तुलसी विषम गहन-ग्रस्तं । त्राहि रघुबंस-भूषन कृपाकर, कठिन काल बिकराल-कलित्रास-त्रस्तं ॥९॥ शब्दार्थ—नर्मद = सुख देनेवाले । कांतार = वन । खर = तीक्ष्ण, नुकीले । श्येनोलोक = (श्येन+उलूक) बाज और उल्लू । आमिष = मांस । छिद्र = दोष । खेद = दुःख । कंदर्प = कामदेव । वृक = भेड़िया, हुँडार । महिष = भैंसा । फेरु = सियार । मार्जार = बिल्ली, बिलाव । ब्रात = समूह । मनुजाद = नरभक्षक, मनुष्यको खानेवाला । वृश्चिक = बिच्छू । आक्षिप्त = फेंक दिया है । आपगा = नदी । कूल = किनारा । पोच = नीचा । संघट = एकत्र । त्रास = भय । भावार्थ—हे देव ! आप दीनोंका उद्धार करनेवाले, रघुकुलमें श्रेष्ठ, करुणा- निधान, सन्तापोंका शमन करनेवाले तथा पाप-समूहको हर लेनेवाले हैं । आप विमल विज्ञान-शरीरवाले, कृपाके रूप, राजाओंमें श्रेष्ठ, देवताओंको सुख देनेवाले तथा खर नामक दैत्यके शत्रु हैं ॥१॥ हे मुरारी ! यह संसाररूपी वन बड़ा ही घोर, गम्भीर और सघन है । यह वन गहन कर्मरूपी वृक्षोंसे व्याप्त है। वासनाएँ ही लताएँ हैं और (इच्छा पूर्ण न होनेके कारण उत्पन्न हुई) व्याकुलता ही तीक्ष्ण काँटा-रूप है । मह कर्मरूपी वृक्षोंका वन बहुत बड़ा, कठिन तथा सघन

है ॥२॥ इसमें जो नाना प्रकारकी चित्त-वृत्तियाँ हैं, वे ही बाज, उल्लू, कौए, बगुले, गीध आदि मांसाहारी पक्षियोंके समूह हैं । ये सब बड़े दुष्ट और छल करनेमें कुशल हैं । ये सदैव छिद्र देखा करते हैं और जीवरूपी बटोहियोंके मनमें खेद उत्पन्न करनेवाले हैं ॥३॥ (इस संसार-वनमें) क्रोधरूपी मतवाले हाथी, कामरूपी सिंह, मद्रूपी हुँड़ार और गर्वरूपी रीछ ये सब बड़े ही उग्र कर्मवाले हैं । यहाँ मत्सररूपी क्रूर भैंसा, लोभरूपी शूकर और दम्भरूपी बिल्ली है ॥४॥ कपटरूपी विकट बन्दर हैं, पाखंडरूपी बाघ है जो कि मृगसमूहको दुःख देने- वाला तथा उत्पात करनेवाला है । हे प्रभो ! हृदयमें यह कष्ट देखकर आपकी शरणमें आया हूँ, मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ॥५॥ इस संसार-वनमें प्रबल अहंकाररूपी दुर्घट पर्वत है और उसमें महामोहरूपी सघनान्धकार-पूर्ण पर्वत- गुफा है । यहाँ चित्तरूपी बेताल, मनरूपी नर-भक्षक दैत्य, रोग-स्वरूप प्रेतसमूह, भोग-समूहरूपी बिच्छू, विषय-सुखकी लालसारूपी मक्खियाँ और मच्छर हैं; दुष्ट ही झिल्ली हैं और पंचज्ञानेन्द्रियोंके पाँच विषय रूप-रसादि ही सर्प हैं । हे नाथ ! हे गरुडगामी ! तुम्हारी विषम मायाने वहाँ मुझ अन्धे और बुद्धिहीनको लाकर डाल दिया है ॥७॥ इस संसारमें पापरूपी जलसे परिपूर्ण (प्रवृत्तिरूपी) नदी है; यह घोर और अगाध नदी कठिनतासे देखने योग्य, मुश्किलसे पार करने योग्य तथा अपार (ओर-छोर-रहित) है। इसमें काम-क्रोधादिरूपी मगर, इन्द्रियरूपी घड़ियाल और भँवर भरे हुए हैं। इस नदीके शुभ और अशुभ कर्म- रूपी दोनों किनारे हैं तथा दुःखरूपी तीव्र धारा है ॥८॥ विषम-वन-ग्रस्त तुलसी- दास ऊपर कहे हुए नीचोंके जमघटसे सदैव चिन्तित रहता है । हे कृपाकी खानि रघुवंश-भूषण ! इस कठिन समयमें विकराल कलियुगके भयभीत मेरी रक्षा कीजिये ॥९॥

विशेष १—इसमें रूपक अलङ्कार है । गोस्वामीजी बहुत ही सुन्दर रूपक बाँधते थे । ऊपरके ही पदमें देखिये, संसारवनमें वृक्ष, लता, काँटे, अनेक प्रकारके पक्षी, अनेक तरहके दुष्ट तथा हिंस्र जीव इत्यादि सब-कुछ दिखलाया गया है । इतना ही नहीं, जिस वस्तुका जिस वस्तुसे रूपक बाँधा गया है, उसमें उसके लक्षण

१२८ विनय-पत्रिका भी खूब हैं। जैसे, कामको सिंह कहा गया है। आशय यह है कि जिस प्रकार सिंह सब पशुओंका नाश करता है, वैसे ही कामकी प्रबलतासे सब गुण नष्ट हो जाते हैं। कर्मोंकी उपमा वृक्षोंके साथ दी गयी है। जिस प्रकार वृक्ष अनेक प्रकारके होते हैं उसी प्रकार कर्मके भेद भी कई प्रकारके हैं, जैसे कर्म, अकर्म और विकर्म; अथवा संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण; अथवा सकामकर्म और निष्काम कर्म आदि। मत्सर को 'क्रूर महिष' कहा गया है। अर्थात् जिस प्रकार भैंसा किसीको व्यर्थ ही मारता है, पर मांस नहीं खाता, उसी प्रकार मत्सर- स्वभाव भी किसीका भला नहीं देखता। वह अपना कुछ भी लाभ न रहनेपर भी दूसरोंका अहित करता है। मनन करनेपर पाठकोंको प्रत्येक रूपकमें इसी प्रकारकी सार्थकता दिखलाई पड़ेगी। २—'रूपादि सब सर्प'—जिस प्रकार सर्प प्राणनाशक है, उसी प्रकार शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धादि विषय भी। जिन इन्द्रियोंके ये शब्दादि विषय हैं, उन इन्द्रियोंके सम्बन्धमें किसी विद्वान्ने क्या ही सुन्दर कहा है— पतंगमीनभृङ्गालयोलयं प्रयान्ति पंचेन्द्रियपंचगोचरैः। मयातु तत्पंचकमेव सेव्यते गतिर्न जाने मम का भविष्यति ॥ एते च जि क्षणनासिकादयश्चौरास्तु सश्रन् मम देहवासिनः । लुम्पन्ति सर्व्वात्मधनं प्रमाथिनो नाद्यप्यवेक्ष्ये मम पश्यताम्यताम् ॥ ३—'व्यालादगामी' कहनेका अभिप्राय यह है कि मैं रूप-रसादिरूपी सर्पोंके बीचमें पड़ा हुआ हूँ, अतः आप मेरी रक्षा कीजिये; क्योंकि आप सर्पको भक्षण करनेवाले गरुडपर चढ़कर चलनेवाले हैं। ( ६० ) देव— नौमि नारायनं, नरं करुनायनं, ध्यान-पारायनं, ज्ञान-मूलं। अखिल संसार-उपकार-कारन, सदय हृदय, तपनिरत, प्रनतानुकूलं ॥१॥

विनय-पत्रिका १२९ स्याम नव तामरस-दामद्युति वपुष, छवि- कोटि मदनार्क अगनित प्रकासं । तरुन रमनीय राजीव-लोचन ललित, वदन राकेस, कर-निकर हासं ॥२॥ सकल सौंदर्य-निधि, विपुल गुनधाम, विधि- वेद-बुध-संभु-सेवित, अमानं । अरुन पदकंज-मकरंद मंदाकिनी, मधुप-मुनिवृंद कुर्वन्ति पानं ॥३॥ सक्र-प्रेरित घोर मदन मद-भंगकृत क्रोधगत, बोधरत, ब्रह्मचारी । मारकंडेय मुनिवर्यहित कौतुकी, बिनहि कल्पांत प्रभु प्रलयकारी ॥४॥ पुन्य बन सैलसरि बदरिकाश्रम, सदा- सीन पद्मासनं, एक रूपं । सिद्ध-योगीन्द्र-वृन्दारकानन्दप्रद, भद्रदायक दरस अति अनूपं ॥५॥ मान मनभंग, चितभंग मद, क्रोध लोभादि पर्वत दुर्ग, भुवन-भर्त्ता । द्वेष-मत्सर-राग प्रबल प्रत्यूह प्रति, भूरि निर्दय, क्रूर-कर्म-कर्त्ता ॥६॥ विकटतर वक्र छुरधार प्रमदा, तीव्र दर्प कंदर्प खर खङ्गधारा । धीर-गंभीर-मन-पीर-कारक, तत्र के वराका वय विगत सारा ॥७॥ परम दुर्घट पंथ, खल-असंगत साथ, नाथ, नहिं हाथ वर विरति-यष्टी । दर्सनारत दास, त्रसित माया-पास, त्राहि हरि, त्राहि हरि, दास-कष्टी ॥८॥ ९

१३० विनय-पत्रिका दास तुलसी दीन धम-संबल हीन, श्रमित अति खेद, मति मोह नासी । देहि अवलंब न विलंब अंभोज-कर, चक्रधर तेजवल सर्मरासी ॥९॥

शब्दार्थ—पारायन = सम्पूर्णता, तत्पर । सदय = दयालु । माला = माला । मदन = कामदेव । अर्क = सूर्य । कुर्वन्ति = करते हैं । सक्र = इन्द्र । प्रत्यूह = विघ्न । प्रति = प्रत्येक । वक्र = टेढ़ । प्रमदा = स्त्री । तत्र = वहाँ । के = कौन, क्या । बराका = (वराक) गरीब । वय = हम । यष्टी = छड़ी, लाठी । पास = फन्दा । संबल = कलेवा, राह-खर्च । सर्म = (शर्म) कल्याण, सुख ।

भावार्थ—हे देव ! हे नर-नारायण ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ । आप ध्यान-परायण (अपने ही स्वरूपका ध्यान करते) हैं और ज्ञानके कारण हैं । आप समस्त संसारका हित करनेवाले, दयालु हृदयवाले, तपस्यामें लीन रहने- वाले और भक्तोंपर रहम करनेवाले हैं ॥१॥ आपके शरीरकी कान्ति नवीन नीले कमलके समान है, शोभा करोड़ों कामदेवके समान है और तेज अनन्त सूर्यके समान है । आपके नेत्र पूर्ण विकसित कमलके समान रमणीय हैं और सुन्दर मुखकी मुसकान चन्द्रमाकी किरणोंके सदृश है ॥२॥ आप सब प्रकारकी सुन्दरताके स्थान, अनन्त गुणनिधान और ब्रह्मा, वेद, पंडित तथा शिवजीके द्वारा सेवित होनेपर भी मान-रहित हैं । मुनि-वृन्दरूपी भौंरे आपके लाल कमलके समान चरणोंके मन्दाकिनीरूपी मकरन्दका पान करते हैं ॥३॥ आपने इन्द्रके भेजे हुए घोर कामदेवका मद चूर्ण किया है; आप क्रोध-रहित, ज्ञान-रत और ब्रह्मचारी हैं । हे प्रभो ! आपने बिना कल्पान्तके ही मार्कण्डेय मुनिको दिखानेके लिए प्रलयकरी लीला की थी ॥४॥ आप पवित्र वन, पर्वत और नदी-संयुक्त बदरिकाश्रममें सदैव पद्मासन लगाये एकरूपसे बैठे रहते हैं । आपका अत्यन्त अनुपम दर्शन सिद्ध, योगीन्द्र और देवताओंके लिए आनन्दप्रद और कल्याण- दायक है ॥५॥ हे भुवनेश्वर ! (आपके बदरिकाश्रमके मार्गमें 'मनभंग' और 'चित्तभंग' नामक पर्वत हैं जिन्हें देखकर बड़े-बड़े साहसी भी हिम्मत हारकर हिचकने लगते हैं) यहाँ अभिमान ही 'मनभंग' है, और मद, क्रोध, लोभादि, 'चित्तभंग' आदि दुर्गम पर्वत हैं । द्वेष, मत्सर और राग ही प्रबल विघ्न हैं और

सबके सब बड़े निर्दय एवं क्रूर कर्म करनेवाले हैं ॥६॥ यहाँ तीव्र-हृदया कामिनी ही अत्यन्त विकट और टेढ़ा क्षुरधार नामक पर्वत है, तथा कामका गर्व ही तीक्ष्ण 'खड्गधार' पर्वत है; जब कि ये सामग्रियाँ धीर और गम्भीर पुरुषोंके मनको पीड़ा पहुँचानेवाली हैं, तो फिर ब्रह्महीन और गरीब हम लोग वहाँ क्या चीज हैं ? ॥७॥ हे नाथ ! आपके दर्शनका मार्ग बहुत ही दुर्घट है, तिसपर खलोंका अनुचित साथ पड़ गया है, हाथमें (टेकने या सहारेके लिए वैराग्यरूपी छड़ी भी नहीं है। आपके दर्शनके लिए आर्त्त यह दास मायाके फन्देमें पड़ा दुःख पा रहा है। इस दुखी सेवककी रक्षा कीजिये प्रभो ! रक्षा कीजिये नाथ ! ॥८॥ दीन तुलसीदासके पास धर्मरूपी कलेवा भी नहीं है, वह बिलकुल थक गया है, दुःख भी बहुत है; मोहने उसकी बुद्धि भी हर ली है । हे चक्रपाणे ! हे तेज, बल और आनन्द-राशि ! देर न करके मुझे अपने कर-कमलोंका सहारा दीजिये ॥९॥ विशेष १—'नारायणं नरं'—नारायण नाम है विष्णुका । नार (जल) में जिसका घर हो उसे कहते हैं नारायण और 'नर' नाम है अर्जुनका । बदरिकाश्रममें ध्यानावस्थित नर नारायणकी प्रतिमा मौजूद है । २—'मार्कण्डेय' ऋषिकी उग्र तपस्या देखकर भगवान्ने प्रसन्न होकर उनसे वर माँगनेके लिए कहा । मार्कण्डेय मुनिने प्रलयका दृश्य देखनेकी इच्छा प्रकट की । परिणाम यह हुआ कि बिना कल्पान्तके ही भगवान्को प्रलय-लीला दिखानी पड़ी । ३—'मनभंग' या मानभंग, 'चित्तभंग', 'क्षुरधार' तथा 'खड्गधार' आदि पर्वत बदरिकाश्रमकी यात्राके मार्गमें पड़ते हैं । कई टीकाकारोंने इन शब्दोंका अर्थ करनेमें खूब अटकलसे काम लिया है । ( ६१ ) देव— सकल सुखकंद, आनंद वन पुन्यकृत, बिंदुमाधव द्वंद्व-विपतिहारी ।

१३२ विनय-पत्रिका यस्यांघ्रिपाथोज अज-संभु-सनकादि, सुक- सेप, मुनिवृंद अलि निलयकारी ॥१॥ अमल मरकत स्याम, काम सतकोटि छवि, पीत पट तड़ित इव जलद नीलं। अरुन सतपत्र लोचन, बिलोकनि चारु, प्रनत जन-सुखद, करुनार्द्रसीलं ॥२॥ काल-गजराज-मृगराज, दनुजेस-वन- दहन पावक, मोह-निसि-दिनेसं। चारि भुज चक्र-कौमोदकी-जलद-दर, सरसिजोपरि जथा राजहंसं ॥३॥ मुकुट, कुंडल, तिलक, अलक अलिब्रात इव, भ्रुकुटि, द्विज, अधर वर, चारु नासा। रुचिर सुकपोल, दर ग्रीव सुख-सीव, हरि, इंदुकर-कुंदमिव मधुर हासा ॥४॥ उरसि वनमाल सुविसाल नव-मंजरी, भ्राज श्रीवत्स-लांछन उदारं। परम ब्रह्मन्य, अति धन्य, गतमन्यु, अज, अमित बल, विपुल महिमा अपारं ॥५॥ हार केयूर, कर कनक कंकन रतन— जटिल मनि-मेखला कटि प्रदेसं। युगल पद नूपुरामुखर कलहंसवत् , सुभग सर्वांग सौंदर्य वेसं ॥६॥ सकल सौभाग्य-संयुक्त त्रैलोक्य, श्री दच्छि दिसि रुचिर वारीस-कन्या। वसत विवुधापगा निकट तट सदन वर, नयन निरखंति नर तेऽति धन्या ॥७॥ अखिल मंगल-भवन, निविड़संसय समन, दमन-वृजनाटवी, कष्टहर्त्ता।

विनय-पत्रिका १३३ विश्वधृत, विश्वहित, अजित, गोतीत, सिव, विश्वपालन-हरन, विश्वकर्त्ता ॥८॥ ज्ञान-विज्ञान वैराग्य-ऐश्वर्य-निधि, सिद्धि अणिमादि दे भूरि दानं । ग्रसित-भव व्याल अति त्रास तुलसीदास, त्राहि श्रीराम उरगारि-यानं ॥९॥ शब्दार्थ-यस्यांघ्रि = (यस्य + अंघ्रि) जिसके चरण । निलय = निवास । मरकत = नीलमणि । सतपत्र = शतदल कमल । आद्र = भीगे हुए। पावक = अग्नि । दिनेस = सूर्य । कौमोदकी = गदा । दरु = शंख । सरसिजोपरि = (सरसिज + उपरि) कमलके ऊपर । अलिब्रात = भ्रमर-समूह । द्विज = दाँत । लांछन = चिह्न । ग्रीव = गर्दन । ब्रह्मन्य = ब्राह्मणोंका सम्मान करनेवाले । मन्यु = क्रोध । केयूर = विजायठ । मेखला = करधनी । मुखर = शब्दायमान । कल = सुन्दर । सुभग = सुन्दर । दच्छि = दक्षिण । वारीस = कन्या लक्ष्मी । वृजनाटवी = (वृजन + अटवी) पापरूपी वन । भावार्थ-हे देव विन्दुमाधव, आप सब तरहका सुख बरसानेवाले मेघ हैं, आनन्दवन (काशी) को पवित्र करनेवाले तथा राग-द्वेषादि द्वन्द्वात्मक विपत्तियों- को हरनेवाले हैं। आपके चरण-कमलोंमें ब्रह्मा, शिव, सनकादि, शुकदेव, शेष और मुनिरूपी भौंरे निवास करते हैं ॥१॥ आप निर्मल नीलमणिके समान श्यामल हैं, आपकी छवि सैकड़ों करोड़ कामदेवके समान है; आपका पीताम्बर नीले बादलमें बिजलीके समान है। आपके नेत्र लाल रंगके शतदल कमलके समान हैं; उन नेत्रोंकी सुन्दर चितवन भक्तोंको सुखी करनेवाली और करुणाईशील है ॥२॥ आप कालरूपी हाथीके लिए सिंह हैं, राक्षसरूपी वनको जलानेके लिए अग्नि हैं, मोह-निशाको दूर करनेके लिए सूर्य हैं। आपके चारों हाथोंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म हैं। आपके हाथमें शंख तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे कमलके ऊपर राजहंस ॥३॥ मस्तकपर मुकुट, कानोंमें मकराकृत कुण्डल, माथेपर तिलक, भौंरोंके समूहके समान अलकें (लटें), बाँकी भौंहें, सुन्दर दाँत तथा ओठ, सुन्दर नासिका, मनोहर कपोल और शंखके समान ग्रीवा ये सब मानो सुखकी सीमा हैं। हे भगवन् ! आपका मधुर हास चन्द्रकिरण एवं कुन्द-पुष्पके समान है ॥४॥ आपके हृदयपर नव-मंजरी-सहित विशाल वनमाला है और श्रीवत्सका सुन्दर

१३४ विनय-पत्रिका चिह्न सुशोभित हो रहा है। आप परम ब्रह्मण्य हैं, अत्यन्त धन्य हैं, क्रोध-रहित हैं, अजन्मा हैं, अमित बलशाली और अपार महामहिम हैं ॥५॥ आपके हृदयपर हार, भुजाओंपर बिजायत, हाथोंमें रत्नजटित स्वर्ण-कंकण, कमरमें मणियोंकी करधनी और दोनों चरणोंमें कलहंसके समान शब्द करनेवाले नूपुर हैं। आपका प्रत्येक अंग सुन्दर है और सारा वेष सौन्दर्यमय है ॥६॥ सब प्रकारके सौभाग्यसे युक्त, तीनों लोककी शोभा लक्ष्मीजी आपकी दाहिनी ओर सुशोभित हैं ! आप गंगाजीके समीप उनके तटपर ही सुन्दर मन्दिरमें निवास करते हैं। जो लोग आपका दर्शन करते हैं, वे अत्यन्त धन्य हैं ॥७॥ आप समस्त मंगलोंके घर, घोर संशयोंका शमन करनेवाले, पाप-रूपी वनको भस्म करनेवाले और कष्टोंको हरनेवाले हैं। आप विश्वको धारण करनेवाले, विश्वके हितू, अजेय, इन्द्रियातीत, कल्याणमूर्ति और संसारका सृजन, पालन एवं संहार करनेवाले हैं ॥८॥ आप ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यके खजाना हैं, अणिमादि अष्ट-सिद्धियोंका महादान देनेवाले हैं। हे गरुडगामी श्रीरामजी ! संसाररूपी सर्पसे ग्रसित इस तुलसीदासको बड़ा भय है, रक्षा कीजिये ॥९॥ विशेष १—'दच्छिदिसि रुचिर वारीस कन्या'—परमात्माके प्रत्येक रूपके ध्यानमें शक्तिका ध्यान वाम भागमें किया जाता है; केवल विन्दुमाधवजीके ध्यानसे लक्ष्मीजीका वर्णन दाहिनी ओर किया गया है। आजकल काशीमें विन्दुमाधव- जीके मन्दिरमें लक्ष्मीजी बायीं ओर हैं; किन्तु यह प्रतिमा मस्जिद बननेके बादकी है। गोस्वामीजीके समयमें लक्ष्मीजी दाहिनी ओर थीं। वह मूर्त्ति पड़ोसके एक ब्राह्मणके यहाँ है। मन्दिरपर मुसलमानोंका आक्रमण होनेके पहले उसके पूर्वज उन मूर्त्तियोंको अपने घर उठा ले गये थे। गोस्वामीजीका देहा- वसान जहाँगीर बादशाहके समयमें हुआ था और मन्दिर तोड़े गये थे औरंगजेबके शासनकालमें। उसी मन्दिरके स्थानपर धवरहरा बना हुआ है जो माधवरावके धवरहराके नामसे विख्यात है। यह विन्दुमाधवका मन्दिर तोड़कर बनवाया गया है। अब विन्दुमाधवका मन्दिर इस मस्जिदके बगलमें है। २—'द्विज'—दाँत दो बार निकलते हैं, इसीसे उन्हें द्विज कहते हैं।

विनय-पत्रिका १३५ राग-असावरी ( ६२ ) इहै परम फलु, परम बड़ाई । नख-सिख रुचिर बिन्दुमाधव छवि निरखहिं नयन अघाई ॥१॥ विसद किसोर पीन सुंदर वपु, स्याम सुरुचि अधिकाई ॥ नील कंज, वारिद, तमाल, मनि, इन्ह तनुते दुति पाई ॥२॥ मृदुल चरन सुभ चिन्ह, पदज, नख, अति अभूत उपमाई । अरुन नील पाथोज प्रसव जनु, मनिजुत दल-समुदाई ॥३॥ जातरूप मनि-जटित मनोहर, नूपुर जन-सुखदाई । जनु हर-उर हरि विविध रूप धरि, रहे घर भवन बनाई ॥४॥ कटितट रटति चारु किंकिन-रव, अनुपम, बरनि न जाई । हेम जलज कल कलित मध्य जनु, मधुकर मुखर सुहाई ॥५॥ उर विसाल भृगुचरन चारु अति, सूचत कोमलताई । कंकन चारु विवध भूषन विधि, रचि निज कर मन लाई ॥६॥ गज-मनिमाल वीच भ्राजत कहि जाति न पदक निकाई । जनु उडुगन-मंडल वारिदपर, नवग्रह रची अयाई ॥७॥ भुजंगभोग-भुजदंड कंज, दर, चक्र, गदा वनि आई । सोभासीव ग्रीव, चिबुकाधर, वदन अमित छवि छाई ॥८॥ कुलिस, कुंद-कुडमल, दामिनि-दुति, दसनन देखि लजाई । नासा-नयन-कपोल, ललित श्रुति कुंडल भ्रू मोहिं भाई ॥९॥ कुंचित कच सिर मुकुट, भालपर, तिलक कहाँ समुझाई । अलप तड़ित जुग रेख इंदु महँ, रहि तजि चंचलताई ॥१०॥ निरमल पीत दुकूल अनूपम, उपमा हिय न समाई । बहु मनिजुत गिरि नील सिखरपर, कनक-बसन रुचिराई ॥१०॥ दच्छ भाग अनुराग-सहित इंदिरा अधिक ललिताई । हेमलता जनु तरु तमाल ढिग, नील निचोल ओढ़ाई ॥१२॥

१३६ विनय-पत्रिका सत सारदा सेष श्रुति मिलिकै, सोभा कहि न सिराई। तुलसिदास मतिमंद द्वंद्वरत कहै कौन विधि गाई ॥१३॥ शब्दार्थ—अधाई = अघाकर, तृप्त होकर। बिसद = निर्मल। पीन = पुष्ट। पदज = पैरकी अँगुलियाँ। जातरूप = सुवर्ण। हेम = सुवर्ण। कल = सुन्दर। कलित = कली। गजमनि- माल = गजमुक्ताकी माला। पदक = रत्न। उडुगन = तारागण। अथाई = सभा। भुजगभोग = सर्पका शरीर। कुलिस = हीरा। कुडमल = कली। भाई = प्यारी लगती है, भाती है। कुंचित = घुँघराले। अलप = अल्प। दुकूल = वस्त्र। इंदिरा = लक्ष्मी। हेमलता = सुवर्ण-लता। निचोल = वस्त्र। भावार्थ—इस शरीरका सबसे बड़ा फल और सबसे बढ़कर बड़प्पन यही है कि ये नेत्र तृप्त होकर भगवान् विन्दुमाधवकी नखसे शिखतक मनोहर छविको देखें ॥१॥ वह निर्मल, किशोर, पुष्ट और सुन्दर शरीरवाले हैं, श्यामलतासे उनकी सुन्दरता और भी बढ़ गयी है। जान पड़ता है कि नीले कमल, मेघ, तमाल और (नीलम) मणिने इन्हींके शरीरसे कान्ति पायी है ॥२॥ इनके कोमल चरणोंमें शुभ चिह्न हैं, अँगुलियों और नखोंकी ऐसी अभूतपूर्व उपमा है मानो लाल और नीले कमलोंसे रत्न-संयुक्त पत्तोंका समूह उत्पन्न हुआ हो (अर्थात् ऊपर श्याम और नीचे लाल; क्योंकि भगवान्‌के चरणोंका ऊपरी भाग श्यामल है और तलवा लाल। यहाँ कमलदल सदृश अँगुलियाँ हुईं और उस दलके ऊपर जटित मणिके समान नख हैं। किन्तु न तो दो रंगका कमल होता है और न उसके पत्ते मणि-जटित ही होते हैं; बस यही 'अति अभूत उपमा' है ॥३॥ रत्नोंसे जड़े हुए मनोहर सुवर्णके नूपुर भक्तोंको आनन्द देनेवाले हैं। वे ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो शिवजीके हृदयमें विष्णु भगवान् अनेक रूप धारण करके श्रेष्ठ मन्दिर बनाकर निवास कर रहे हों ॥४॥ कमरमें सुन्दर करधनी जो रट लगाये रहती है, उसका शब्द ही अनुपम और वर्णनातीत है। ऐसा भान होता है मानो सुवर्णकी कलियोंके बीच भौरोंका गुंजार हो रहा हो ॥५॥ विशाल वक्षः- स्थलपर जो भृगु ऋषिका अत्यन्त सुन्दर चरण-चिह्न अंकित है, वह वक्षःस्थलकी कोमलता सूचित कर रहा है। कंकण आदि अनेक तरहके सुन्दर आभूषणोंको मानो ब्रह्माने दिल लगाकर अपने हाथसे बनाया है ॥६॥ गजमुक्ताकी मालाके बीचमें नौंकी जो चौकी विराज रही है, उसकी अच्छाई नहीं कही जा सकती;

मानो मेघपर तारागणकी मंडलीके बीचमें नवग्रहोंकी सभा बैठी हो। (यहाँ नीले मेघके समान भगवान्‌का शरीर है, तारा-मंडल गजमुक्ताकी माला है और उसके बीचमें पिरोये हुए रंग-बिरंगे रत्न नवग्रह हैं) ॥७॥ सर्पके शरीर जैसे भुजदंडोंमें कमल, शंख, चक्र और गदा शोभित हो रहे हैं। ग्रीवाकी सुन्दरतामें सौन्दर्यकी हद है। चिबुक, अधर तथा मुखपर अमित छवि छायी हुई है ॥८॥ दाँतोंको देखकर हीरे, कुन्दकी कलियों और बिजलीकी चमकको लज्जित होना पड़ता है। नासिका, नेत्र, कपोल, ललित कर्ण-कुंडल तथा भौंहें मुझे बहुत भाती हैं ॥९॥ सिरपर घुँघराले बालोंके ऊपर मुकुट है; माथेपर जो तिलक है उसे समझकर कहता हूँ, मानो बिजलीकी दो छोटी रेखाएँ चन्द्र-मंडल (मुख) में अपनी चंचलता छोड़कर बस रही हों ॥१०॥ स्वच्छ और उपमा-रहित पीताम्बरकी उपमा हृदयमें समाती ही नहीं, (तथापि यथाशक्ति कल्पना की जाती है) मानो बहुत-से मणियोंसे संयुक्त नीले पर्वत-शिखरपर सुनहला वस्त्र सुशोभित हो रहा हो ॥११॥ दाहिनी ओर प्रेम-सहित बैठी हुई लक्ष्मीजीसे शोभा और भी बढ़ गयी है। ऐसा जान पड़ता है मानो तमाल वृक्षके पास नीला वस्त्र ओढ़े स्वर्ण- लता बैठी हो ॥ सैकड़ों सरस्वती, शेष और वेद मिलकर इस शोभाका वर्णन करके समाप्त नहीं कर सकते, फिर भला द्वन्द्वरत तथा मूढ़बुद्धि तुलसीदास इस दिव्य शोभाका वर्णन किस प्रकार कर सकता है ॥१२॥

विशेष १—‘किसोर’—छःअवस्थाओंके अन्तर्गत एक अवस्था। वे छ अवस्थाएँ हैं:—१ शिशु, २ कौमार, ३ पौगंड, ४ किशोर, ५ यौवन, ६ जरा। ग्यारहसे पन्द्रह वर्षके भीतरकी अवस्थाको किशोरावस्था कहते हैं। पर यहाँ किशोरसे पन्द्रह वर्षकी अवस्था ही समझनी चाहिये। २—‘नीलकंज······दुति पाई’—में प्रतीप अलंकार है। प्रतीपका अर्थ है उलटा (प्रतिलोम्यात् प्रतीपं)। प्रतीपालंकारका यह लक्षण है:— प्रसिद्धस्योपमानस्योपमेयत्वप्रकल्पनम्। निष्फलत्वाभिधानं वा प्रतीपमिति कथ्यते ।—साहित्यदर्पणे । अर्थात् प्रसिद्ध उपमानको उपमेय बनाना या उसको निष्फल बतलाना

१३८ विनय-पत्रिका प्रतीप अलंकार है। इसके पाँच भेद हैं। उनमें प्रथम प्रतीपका लक्षण काव्य- प्रभाकरमें इस प्रकार है:— सो प्रतीप उपमेय सम, जब कहिय उपमान। लोचनसे अम्बुज बने, मुखसों चन्द बखान ॥ अर्थात् जहाँ उपमानमें उपमेयकी कल्पना की जाय। जैसे 'नेत्रोंके समान कमल बने हैं और मुखके समान चन्द्रमा।' यहाँ नेत्र और मुख जो उपमेय हैं, वे उपमान हो गये हैं। प्रतीपके प्रथम भेदका एक उदाहरण और लीजिये :— “उतरि नहाये जमुन जल, जो सरीर-सम स्याम।” —रामचरितमानस । यहाँपर उक्त अलंकार ही है। ३—'अभूत उपमाई'—'अभूत उपमा' का लक्षण महाकवि केशवदासने इस प्रकार लिखा है:— उपमा जाय कही नहीं, जाको रूप निहारि। अस अभूत उपमा कही, केसवदास विचारि ॥ —कवि-प्रिया। वियोगि हरिजीने यहाँपर 'अद्भुत उपमाई' पाठ मानकर 'कुछ विचित्र ही उपमा' अर्थ किया है, पाठक ही विचार करें कि इन दोनोंमें कौन-सा पाठ और अर्थ ठीक है। ४—आगे 'अरुननील' आदि पंक्तियोंमें उत्प्रेक्षालंकार है। ५—'जनु हर-उर हरि' के स्थानपर कहीं-कहीं 'जनु हर-डर-हरि पाठ भी है। जहाँ ऐसा पाठ है वहाँ 'हरि' का अर्थ कामदेव होगा। मानो हरके डरसे कामदेवने नानारूप धारण करके श्रेष्ठ घर बना रखा है। अर्थात् कामदेवने अपनेको शिवजीका अपराधी समझकर यह स्थिर किया कि भगवान्के चरणोंकी शरणमें गये बिना और कहीं रक्षा नहीं हो सकती। इसीसे वह भगवान्के चरणोंके नूपुररूपी घरमें स्वरस्वरूप होकर घुस पड़ा है। ६—'उर बिसाल भृगुचरन'—एक बार भृगु ऋषिने क्रुद्ध होकर भगवान्के हृदयपर पदाघात किया था। अतः उनके पैरका चिह्न भगवान्के वक्षःस्थलपर अंकित हो गया।

विनय-पत्रिका १३९ ७—'नवग्रह'—सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र शनि, राहु और केतु ये नवग्रह हैं। प्रत्येक ग्रहका रंग भिन्न-भिन्न है; जैसे सूर्य और मंगलका रंग लाल, बृहस्पतिका पीला, शनि, राहु और केतुका काला, बुधका हरा तथा चन्द्रमा और शुक्रका श्वेत है। उसी प्रकार रत्न भी विभिन्न रंगके हैं। वियोगी हरिजीने अपनी टिप्पणीमें सूर्यका रंग श्वेत लिखा है। ऐसा उल्लेख उन्हें कहाँ मिला, कहा नहीं जा सकता। राग जयतिश्री ( ६३ ) मन इतनोई या तनुको परम फलु । 'सब अँग सुभग बिन्दुमाधव छबि, तजि सुभाव, अवलोकु एक फला॥१॥ तरुन अरुन अंबोज चरन मृदु, नख-द्युति हृदय-तिमिर-हारी । कुलिस-केतु-जव-जलज रेख वर, अंकुस मन-गज-बसकारी ॥२॥ कनक-जटित मनि नूपुर, मेखल, कटि-तट रटति मधुर बानी । त्रिवली उदर, गँभीर नाभि सर, जँह उपजे विरंचि ग्यानी ॥३॥ उर वनमाल, पदक अति सोभित, विप्र-चरन चित कहँ करषै । स्याम तामरस-दाम-वरन वपु, पीत बसन सोभा बरषै ॥४॥ कर कंकन केयूर मनोहर, देति मोद मुद्रिक न्यारी । गदा, कंज, दर, चारु चक्रधर, नाग-सुंड-सम भुज चारी ॥५॥ कंबु ग्रीव, छबिसीव चिवुक द्विज, अधर अरुन, उन्नत नासा । नव राजीव नयन ससि आनन, सेवक-सुखद बिसद हासा ॥६॥ रुचिर कपोल, श्रवन कुंडल, सिर मुकुट, सुतिलक भाल भ्राजै । ललित भृकुटि, सुंदर चितवनि, कच निरखि मधुप-अवली लाजै ॥७॥ रूप-सील-गुनखानि दच्छ दिसि, सिंधु सुता रत-पद सेवा । जाकी कृपा-कटाच्छ चहत सिव, बिधि, मुनि, मनुज, दनुज, देवा ॥८॥ १. 'सब अँग सुभग'के स्थानपर 'नख-सिख रुचिर' पाठ भी मिलता है।