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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

२२० विनय-पत्रिका केवल शास्त्रीय ज्ञानसे कुछ नहीं होता, उद्धार तो तब होता है जब उसके अनुसार आचरण करे। [ १२४ ] जौ निज मन परिहरै विकारा । तौ कत द्वैत-जनित संसृति-दुख, संसय, सोक अपारा ॥१॥ सत्रु, मित्र, मध्यस्थ, तीनि ये, मन कीन्हें बरिआईं । त्यागन, गहन, उपेच्छनीय, अहि, हाटक, तृन की नाईं ॥२॥ असन, बसन, पसु, वस्तु विविध विधि, सब मनि महँ रह जैसे । सरग, नरक, चर-अचर लोक बहु, बसत मध्य मन तैसे ॥३॥ बिटप-मध्य पुतरिका, सूत महँ कंचुकि बिनहिं बनाये। मन महँ तथा लीन नाना तनु, प्रगटत अवसर पाये ॥४॥ रघुपति-भगति-बारि-छालित चित, बिनु प्रयास ही सूझै। तुलसिदास कह चिद्-बिलास जग बूझत बूझत बूझै ॥५॥ शब्दार्थ—मध्यस्थ = बीचका, न शत्रु ही, न मित्र ही, यानी उदासीन। बरिआईं = जबर्दस्ती। हाटक = सोना। पुतरिका = पुतली। कंचुकि = वस्त्र। छालित = प्रक्षालित, धुलकर। भावार्थ—यदि अपना मन विकारों-(संकल्प-विकल्परूप चाञ्चल्य) को छोड़ दे, तो द्वैतभावसे उत्पन्न सांसारिक दुःख, संशय और अपार शोक, क्यों हो ? ॥१॥ मनने ही अपनी जबर्दस्तीसे किसीको शत्रु, किसीको मित्र और किसीको उदासीन इन तीनोंको मान रखा है (पर वास्तवमें न कोई शत्रु है, न मित्र और न उदासीन)। शत्रु सर्पके समान त्याग देने योग्य हैं, मित्र सुवर्णकी तरह ग्रहण करने योग्य हैं और उदासीन तृणकी भाँति उपेक्षा करने योग्य हैं ॥२॥ जैसे भोजन, वस्त्र, पशु और नाना प्रकारकी वस्तुएँ ये सब मणिके अन्तर्गत हैं (अर्थात् यदि मणि हो, तो उसे बेचकर उक्त वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं), वैसे ही स्वर्ग, नरक, जड़, चैतन्य तथा बहुत-से लोक मनमें रहते हैं (तात्पर्य, मनके प्रतापसे वह जीव हर जगह जा सकता है) ॥३॥ जैसे वृक्षके बीचमें कठपुतली तथा सूतमें वस्त्र बिना बनाये ही मौजूद रहते हैं, उसी प्रकार मनके भीतर अनेक

शरीर लीन रहते हैं और अवसर पाकर प्रकट होते हैं ॥४॥ श्रीरामजीको भक्तिरूपी जलसे चित्तके धुल जानेपर अनायास ही दृष्टि खुल जाती है (यानी ऊपर कही हुई बात दृष्टिगोचर होने लगती है)। तुलसीदास कहते हैं कि तभी (रामभक्तिरूपी जलसे चित्तके धुल जानेपर ही) चैतन्यका विलासरूप जगत् समझते समझते समझमें आता है ॥५॥ विशेष १—'मन'—शत्रु और मित्र मानना मनका ही धर्म है, और मन ही स्वर्ग तथा नरकमें ले जानेवाला है। अन्यत्र भी लिखा है:— 'मन एव मनुष्याणाम् कारणं बन्धमोक्षयोः ।' २—'सत्रु, मित्र···नाईं' इसमें क्रम अलंकार है। जहाँ क्रमसे दो या इससे अधिक वस्तुओंका वर्णन अर्थका मिलान करते हुए किया जाय वहाँ क्रमालंकार होता है। [ १२५ ] मैं केहि कहौं बिपति अति भारी। श्रीरघुवीर धीर हित कारी ॥१॥ मम हृदय भवन प्रभु तोरा। तहँ बसे आइ बहु चोरा ॥२॥ अति कठिन करहिं बरजोरा। मानहिं नहिं विनय निहोरा ॥३॥ तम, मोह, लोभ, अहँकारा। मद, क्रोध, बोध-रिपु मारा ॥४॥ अति करहिं उपद्रव नाथा। मरदहिं मोहिं जानि अनाथा ॥५॥ मैं एक, अमित बटपारा। कोउ सुनै न मोर पुकारा ॥६॥ भागेहु नहिं नाथ ! उबारा। रघुनायक, करहु सँभारा ॥७॥ कह तुलसिदास सुनु रामा। लूटहिं तसकर तव धामा ॥८॥ चिंता यह मोहिं अपारा। अपजस नहिं होइ तुम्हारा ॥९॥ शब्दार्थ—बरजोरा = जबर्दस्ती। बोधरिपु = ज्ञानका शत्रु। मार = कामदेव। बटपारा = डाकू। धामा = घर। भावार्थ—हे धीरतापूर्वक हित करनेवाले रघुनाथजी ! मैं अपनी महान् विपत्ति किससे कहूँ ? ॥१॥ हे प्रभो ! मेरा हृदय आपका घर है, किन्तु उसमें अब बहुत-से चोर आ बसे हैं ॥२॥ (ये चोर) बड़े कठिन हैं, और विनती निहोरा

२२२ विनय-पत्रिका न मानकर जबर्दस्ती करते हैं ॥३॥ अज्ञान, मोह, लोभ, अहंकार, मद, क्रोध, और ज्ञानका शत्रु काम, ॥४॥ यही सब चोर हैं जोकि हे नाथ ! बड़ा उपद्रव कर रहे हैं, और मुझे अनाथ जानकर कुचल रहे हैं ॥५॥ मैं अकेला हूँ और डाकू बहुत-से हैं, मेरा चिल्लाना भी कोई नहीं सुन रहा है॥६॥ हे नाथ ! भागने- पर भी मैं नहीं बच सकता । अतः हे रघुनाथजी ! मेरा सम्भार कीजिये ॥७॥ तुलसीदास कहते हैं कि हे रामजी ! सुनो, (ऊपर कहे हुए) चोर आपका घर लूट रहे हैं ॥८॥ इसीलिए मुझे इस बातकी बड़ी चिन्ता हो रही है कि इससे कहीं आपकी बदनामी न हो ॥९॥ [ १२६ ] मन मेरे, मानहि सिख मेरी। जो निजु भगति चहै हरि केरी ॥१॥ उर आनहि प्रभु-कृत हित जेते। सेवहि तजे अपनपौ चेते ॥२॥ दुख-सुख अरु अपमान बड़ाई। सब सम लेखहि बिपति विहाई ॥३॥ सुनु सठ काल-ग्रसित यह देही। जनि तेहि लागि विदूषहि केही॥४॥ तुलसिदास बिनु असि मति आये। मिलहिं न राम कपट-लौ लाये ॥५॥ शब्दार्थ - अपनपौ = अहंकार। विदूषहि = दोष दे। भावार्थ-रे मेरे मन ! यदि तू अपनेमें भगवान्‌की भक्ति चाहता है तो मेरी शिक्षा मान ले ॥१॥ (सबसे पहले तू) परमात्माने जितने उपकार किये हों, उनका हृदयमें स्मरण कर और अहंकार छोड़कर चेत करके उनकी सेवा कर ॥२॥ सुख-दुःख और मान-अपमान सबको बराबर समझ, तभी तेरी विपत्ति दूर होगी ॥३॥ रे दुष्ट मन ! सुन, यह शरीर काल-ग्रसित है, इसके लिए तू किसीको दोष न दे ॥४॥ तुलसीदास कहते हैं कि ऐसी बुद्धि हुए बिना, केवल कपट-प्रेम करनेसे, रामजी नहीं मिल सकते ॥५॥ विशेष (१) 'दुख' 'बिहाई' - भगवान्‌ने भी गीतामें यही कहा है:- समः शत्रौ च मित्रे च, तथा मानापमानयोः । शीतोष्णसुखदुःखेषु समः संगविवर्जितः ॥

विनय-पत्रिका २२३ तुल्य निन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् । अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ —श्रीमद्भगवद्गीता, अ० १२, श्लो० १८-१९ (१) 'देही' वास्तवमें देहका अर्थ शरीर और देहीका अर्थ जीव है। यद्यपि जीवका नाश नहीं होता, फिर भी जबतक शरीरमें अहंबुद्धि रहती है, तबतक जीवका आवागमनरूप जन्म-मरण लगा रहता है। इसीसे साधारण रीतिसे जीवको कालग्रसित कह दिया गया है। किन्तु ऐसा अर्थ करनेमें खींचातानी करनी पड़ती है, अतः यहाँ देही शब्दका 'शरीर' अर्थ ही लिया गया है—और भाषाके काव्यमें शरीरके लिए देहके स्थानपर देही लिखा भी जा सकता है। ( १२७ ) मैं जानी, हरिपद-रति नाहीं। सपनेहुँ नहिं विराग मन माहीं ॥१॥ जे रघुबीर-चरन अनुरागे । तिन्ह सब भोग रोग सम त्यागे ॥२॥ काम-भुजंग डसत जब जाही। विषय नींव कटु लगत न ताही ॥३॥ असमंजस अस हृदय बिचारी। बढ़त सोच नित नूतन भारी ॥४॥ जब कब राम-कृपा दुख जाई। तुलसिदास नहिं आन उपाई ॥५॥ भावार्थ—मैं समझ गया कि भगवान्‌के चरणोंमें मेरा प्रेम नहीं है; क्योंकि मेरे मनमें स्वप्नमें भी वैराग्य नहीं है ॥१॥ जो लोग श्रीरामजीके चरणोंके प्रेममें पगे हैं, वे समस्त भोगोंको रोगके समान त्याग चुके हैं ॥२॥ जब भी जिसे काम- सर्प डँस लेता है, तब उसे विषयरूपी नीम कड़वी नहीं लगती ॥३॥ ऐसा हृदयमें विचारकर असमंजसमें पड़ गया हूँ और (मेरे मनमें) नित नया और महान् सोच बढ़ता जा रहा है ॥४॥ तुलसीदास कहते हैं कि जब कभी भी हो, श्रीराम- जीकी कृपासे ही दुःख दूर होगा, दूसरा कोई उपाय नहीं है ॥५॥ ( १२८ ) सुमिरु सनेह-सहित सीतापत्ति । रामचरन तजि नहिंन आनि गति १ जप, तप, तीरथ, जोग, समाधी । कलिमत्ति-विकल, न कछु निरुपाधी २ करतहुँ सुकृत न पाप सिराहीं । रकतबीज जिमि बाढ़त जाहीं ३ हरति एक अघ-असुर-जालिका । तुलसिदास प्रभु-कृपा—कालिका ४

२२४ विनय-पत्रिका भावार्थ—स्नेह-पूर्वक श्रीरामजीका स्मरण कर; क्योंकि रामजीके चरणोंको छोड़कर दूसरी गति नहीं है ॥१॥ जप, तप, तीर्थ, योगाभ्यास, समाधि आदि कोई भी उपाधिरहित नहीं है, —सब कलियुगी बुद्धिसे व्याकुल हो रहे हैं ॥२॥ पुण्य करते हुए भी पापोंका अन्त नहीं होता । रक्तबीजके समान (पाप) बढ़ता ही जा रहा है ॥३॥ तुलसीदास कहते हैं कि पाप-रूपी राक्षस-समूहको नाश करने- वाली केवल श्रीरामजीकी कृपारूपी काली है ॥४॥ विशेष १--'रक्तबीज' नामका महाप्रतापी दैत्य था । उसने तप करके भगवान् शिवजीसे यह वर प्राप्त किया था कि 'यदि मेरे शरीरसे एक बूँद रक्त गिरे तो उससे सैकड़ों रक्तबीज पैदा हो जायें।' यह वर प्राप्त करके उसने तीनों लोकको कँपा दिया। अन्तमें देवताओंकी प्रार्थनापर ध्यान देकर महाकाली प्रकट हुईं और उससे युद्ध करने लगीं । जब देखा कि उसके रक्तसे अगणित रक्तबीज पैदा होते जा रहे हैं, तब उन्होंने अपनी जीभ इतनी लम्बी बढ़ायी कि जितना रक्त गिरता, सब वह ऊपर ही ऊपर चाट-चाट जाती थीं, —जमीनपर रक्त गिरने ही नहीं पाता था । इस प्रकार उन्होंने रक्तबीजका वध किया । यह कथा दुर्गासप्तशतीमें विस्तारपूर्वक लिखी है । ( १२९ ) रुचिर रसना तू राम राम¹ क्यों न रटत । सुमिरत सुख-सुकृत बढ़त, अघ अमंगल घटत ॥१॥ बिनु श्रम कलि-कलुष-जाल कटु कराल कटत । दिनकर के उदय जैसे तिमिर-तोम फटत ॥२॥ जोग, जाग, तप, विराग, जप, सुतीरथ-अटत । बाँधिबे को भव-गयंद रेनुकी रजु बँटत ॥३॥ परिहरि सुर-मनि सुनाम, गुंजा लखि लटत । लालच लघु तेरो लखि, तुलसि तोहिं हटत ॥४॥ १. पाठान्तर—'राम राम राम' ।

विनय-पत्रिका २२५ शब्दार्थ—तिमिर = अन्धकार। तोम = समूह। अटत = पहुँचाता है। गुंजा = घुँघची। लटत = लोभ। हटत = हटता जा रहा है, अलग या दूर होता जा रहा है। भावार्थ—ऐ सुन्दर जिह्ने ! तू राम नाम क्यों नहीं रट रही है ? उनका स्मरण करनेसे सुख और आनन्द बढ़ते हैं तथा पाप और अनिष्ट घटते हैं ॥१॥ राम-नाम रटनेसे बिना परिश्रमके ही कलियुगके कटु और विकराल पापोंका जाल उसी प्रकार कट जाता है, जैसे सूर्यके उदय होते ही सघनान्धकार फट जाता है ॥२॥ तू योग, यज्ञ, जप, वैराग्य, तप और तीर्थमें पहुँचती है (वह सब करती है); किन्तु ऐसा करके तू संसाररूपी हाथीको बाँधनेके लिए धूलकी रस्सी बँट रही है ॥३॥ तू राम-नामरूपी चिन्तामणिको छोड़, घुँघची देखकर उसपर लट्टू हो रही है। तेरा यह तुच्छ लोभ देखकर तुलसीदास तुझसे हटता जा रहा है॥४॥ विशेष १—'अटत'का अर्थ टीकाकारोंने 'फिरता है' लिखा है। किन्तु हमारी समझसे इसका अर्थ है 'पहुँचता है'। भाषामें इसका प्रयोग इसी अर्थमें किया भी जाता है। [ १३० ] राम राम, राम राम, राम राम, जपत। मंगल-मुद उदित होत, कलि-मल छल छपत ॥१॥ कहु के लहे फल रसाल, बबुर बीज वपत। हारहि जनि जनम जाय गाल गूल गपत ॥२॥ काल, करम, गुन, सुभाउ सबके सीस तपत। राम-नाम-महिमा की चरचा चले चपत ॥३॥ साधन बिनु सिद्धि सकल विकल लोग लपत। कलिजुग वर वनिज विपुल नाम नगर खपत ॥४॥ नाम सों प्रतीति-प्रीति हृदय सुथिर थपत। पावन किये रावन-रिपु तुलसिहुँ-से अपत ॥५॥ शब्दार्थ—वपत = बोनेसे ! गाल = गाल बजाना, अनर्गल बात करना । गूल = शोर करना । गपत = गप्पें हाँककर । चपत = दब जाते हैं । खपत = खप जाता है। रिपु = रावणके शत्रु श्रीरामजी । अपत = पतित, पापी । १५

२२६ विनय-पत्रिका भावार्थ—राम-राम जपते ही कल्याण और आनन्दका उदय होता है और कलिके पाप एवं छल-प्रपंच छिप जाते हैं ॥१॥ कहो तो सही, बबूरका बीज बोकर किसे आमका फल मिला है ? गाल बजाकर तथा गप्पें हाँककर हल्ला करनेमें जीवन बीता जा रहा है, पर उसे इस प्रकार न खो दे । सारांश, गल्लगुह्ल या गुल्गापाड़ा छोड़कर ईश्वर भजन कर ॥२॥ काल, कर्म, गुण और स्वभाव ये सबके सिरपर तप रहे हैं; किन्तु राम-नामकी महिमाकी चर्चा चलनेपर ये सब दब जाते हैं ॥३॥ व्याकुल प्राणी बिना साधनके ही सब सिद्धियाँ लपक लेना चाहता है । इस कलियुगका श्रेष्ठ वाणिज्य व्यापार (नाना प्रकारका निषेध कर्म रूप सौदा) बहुत है, और वह नाम-नगरमें ही खपता है; अर्थात् जिस प्रकार बड़े शहरमें अच्छा-बुरा सब माल बिक जाता है, उसी तरह नाम-रूपी नगरमें पापरूपी सौदा बिक जाता है या नष्ट हो जाता है ॥४॥ राम-नाममें विश्वास और प्रेम करनेसे हृदय स्थिर होकर भगवान्‌में स्थित हो जाता है । श्रीरामजीके नामने तुलसी-सरीखे पापियोंको भी पवित्र कर दिया है ॥५॥ [ १३१ ] पावन प्रेम राम-चरन-कमल जनम लाहु परम । रामनाम लेत होत, सुलभ सकल धरम ॥१॥ जोग, मख, बिबेक, बिरति, बेद-बिदित करम । करिबे कहँ कटु कठोर, सुनत मधुर, नरम ॥२॥ तुलसी सुनि, जानि-बूझि, भूलहि जनि भरम । तेहि प्रभुको होहि, जाहि सब ही की सरम ॥३॥१ भावार्थ—श्रीरामजीके चरण-कमलोंमें पवित्र प्रेम होना परम लाभकी वस्तु है । रामका नाम लेते ही सब धर्म सुलभ हो जाते हैं ॥१॥ योगाभ्यास, यज्ञ, विवेक, वैराग्य आदि कर्म वेदोंमें प्रकट हैं, पर वे सब सुननेमें ही मधुर और कोमल हैं, करनेमें बड़े ही कटु और कठोर हैं । अर्थात्, योग-यज्ञादि कर्मोंके स्वर्ग ऐश्वर्यादि फल सुननेमें मधुर या मीठे हैं, नाम भी उनके कोमल हैं; किन्तु १. पाठान्तर 'तेहि प्रभु की तू सरन होहि जेहि सब की सरम' । तथा 'तेहि प्रभुको तू होहि जाहि सबहीकी सरम ।'

विनय-पत्रिका २२७ करनेमें पहाड़के समान भारी और कठिन हैं॥२॥ अतः हे तुलसीदास ! तू सुन और जान-बूझकर भ्रममें पड़कर भूल न जा। तू श्रीरामजीका हो जा, जिसे सबकी लाज है ॥३॥ [ १३२ ] राम-से प्रीतम की प्रीति-रहित जीव जाय जियत । जेहि सुख सुख मानि लेत, सुख सो समुझ कियत ॥१॥ जहँ-जहँ जेहि जोनि जनम महि, पताल, वियत । तहँ-तहँ तू विषय-सुखहिं, चहत लहत नियत ॥२॥ कत विमोह लट्यो, फट्यो गगन मगन सियत । तुलसी प्रभु-सुजस गाइ, क्यों न सुधा पियत ॥३॥ शब्दार्थ—कियत = कितना। महि = पृथिवी। वियत = आकाश । नियत = प्रारब्ध । विमोह = अज्ञान । भावार्थ—राम सरीखे प्रीतमके प्रेमसे रहित होकर यह जीव व्यर्थ जीता है। जिस सुखको तू सुख मान लेता है, जरा समझ तो सही कि वह सुख कितना है ? अर्थात् सांसारिक सुख क्षणिक हैं, बड़े दुःखदायी हैं ॥१॥ आकाश, पाताल और पृथिवीमें जहाँ-जहाँ और जिस-जिस योनिमें तूने जन्म लिया, वहाँ-वहाँ तूने विषय-सुखकी ही कामना की और प्रारब्धवश वही तुझे मिला भी ॥२॥ क्यों तू अज्ञानमें लुब्ध होकर फटे आकाश (जो कि फटा हुआ नहीं है) की सिलाई करनेमें मग्न है ? (यदि तुझे सुखकी ही इच्छा है, तो) तुलसीदास कहते हैं कि तू श्रीरामजीका सुयश गाकर अमृत पान क्यों नहीं करता ? ॥३॥ विशेष १— 'सुख'—सांसारिक सुख क्या है और कितना है, इसपर भिन्न-भिन्न आचार्योंका मत देखिये :— 'प्रतीकारो व्याधेः सुखमिति विपर्यस्यति मनः । —भर्तृहरि अर्थात्, किसी व्याधि अथवा दुःखके होनेपर उसका जो निवारण किया जाता है, उसीको लोग भ्रमवश 'सुख' कहा करते हैं ।

२२८ विनय-पत्रिका ययातिने अपने पुत्र पुरुकी तरुणावस्था माँगकर एक हजार वर्षतक खूब सुखोपभोग किया। अन्तमें उन्हें जो अनुभव हुआ, वह यह है:— न जातु कामः कामानां उपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मव भूय एवाभिवर्धते ॥ —महाभारत, आदिपर्व अर्थात् 'सुखोंके उपभोगसे विषय-वासनाकी तृप्ति नहीं होती; उससे तो विषय-वासना उसी प्रकार बढ़ती है जैसे हवनके पदार्थोंसे अग्निकी ज्वाला।' [ १३३ ] तोसों हौं फिरि फिरि हित, प्रिय पुनीत सत्य वचन कहत । सुनि मन, गुनि, समुझि, क्यों न सुगम सुमग गहत ॥१॥ छोटो बड़ो, खोटो खरो, जग जो जहँ रहत । अपने अपने को भलो कहहु, को न चहत ॥२॥ बिधि लगि लघु कीट अवधि सुख सुखी, दुख दहत । पसु लौं पसुपाल ईस बाँधत छोरत नहत ॥३॥ विषय मुद निहारु भार सिर काँधे ज्यों बहत । यों ही जिय जानि, मानि सठ ! तू साँसति सहत ॥४॥ पायो केहि घृत बिचारु, हरिन—वारि महुत । तुलसी तकु ताहि सरन, जाते सब लहत ॥५॥ शब्दार्थ—लगि = से । अवधि = तक । लौं = समान । पसुपाल = अहीर, ग्वाला । नहत = नाथता है, जोतता है। निहारु = देख। महुत = मथकर । तकु = देख । लहत = प्राप्त होता है। भावार्थ—रे जीव ! मैं तुझसे फिर-फिर हितकारी, प्रिय, पवित्र और सत्य- वचन कहता हूँ। उसे तू सुनकर मनमें गौर करके (गुनकर) और समझकर सीधा रास्ता क्यों नहीं पकड़ता ॥१॥ संसारमें छोटा-बड़ा, खरा-खोटा जो जहाँ रहता है, कहो तो, उनमें ऐसा कौन है जो अपना और अपने परिवारका भला नहीं चाहता ? ॥२॥ ब्रह्मासे लेकर छोटे कीड़ेतक सुखसे सुखी और दुःखसे

विनय-पत्रिका २२९ जलते हैं, अर्थात् सुख-दुःखका प्रभाव सबपर पड़ता है। परमात्मा ग्वालेकी तरह जीवरूपी पशुओंको बाँधता है, खोलता है और जोतता है। अर्थात्, कोई भी प्राणी स्वतन्त्र नहीं है। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त जीवोंको ईश्वर जगतरूप क्रीड़ाके निमित्त उनके योग्यतानुसार भिन्न-भिन्न व्यापारमें लगाता है, विमुख रहनेवाले जीवोंको बाँधता है, सम्मुख हुए जीवोंको छोड़ता है ॥३॥ विषयोंके आनन्दको देख, वह मानों सिरके ऊपरके बोझको कन्धेपर रखता है। रे शठ ! यों ही तू हृदयमें जान और मानकर कष्ट सह रहा है। तात्पर्य, जैसे कोई सिरके ऊपरके बोझको कन्धेपर रखकर क्षणभरके लिए सुखका अनुभव करता है, और फिर जब कन्धा दुखने लगता है, तब वह उसे सिरपर रख लेता है, उसी तरह तू एक विषयसे हटकर दूसरे विषयमें फँसता, और क्षणिक सुखको आनन्द मानता है ॥४॥ सोच तो सही, मृगजल मथकर किसने घी पाया ? ऐ तुलसी ! तू उसी प्रभुकी शरण देख (शरणमें जा) जिस (प्रभु) से सब-कुछ प्राप्त होता है ॥५॥ विशेष १—'विधि लगि...बहत'—यहाँ गोस्वामीजीने यह दिखाया है कि ब्रह्मासे लेकर छोटे कीड़ेतक सुखसे सुखी और दुःखसे दुखी होते हैं, पर वे मूर्ख हैं; बुद्धिमान् तो वे हैं जो दोनों अवस्थाओंमें समान भावसे धैर्य धारण किये रहें। देखिये न, लिखा भी है:— सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं ॥ —रामचरितमानस यथार्थतः सब प्राणी ईश्वराधीन हैं—कोई भी जीव स्वतन्त्र नहीं है। ऐसी दशामें सुखसे सुखी और दुःखसे दुखी होनेकी क्या जरूरत ? “नट मरकट इव सबहिं नचावत। राम खगेस बेद अस गावत ।” —रामचरितमानस न तो अपनी इच्छासे सुख ही मिलता है और न वह स्थायी रूपसे रहता ही है। सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुखका आना अनिवार्य है।

२३० विनय-पत्रिका [ १३४ ] ताते हौं बार बार देव ! द्वार परि पुकार करत । आरति, नति, दीनता कहे प्रभु संकट हरत ॥१॥ लोकपाल सोक-बिकल रावन-डर डरत । का सुनि सकुचे कृपालु नर-सरीर धरत ॥२॥ कौसिक, मुनि-तीय, जनक सोच-अनल जरत । साधन केहि सीतल भये, सो न समुझि परत ॥३॥ केवट, खग, सबरि सहज चरन-कमल न रत । सनमुख तोहिं होत नाथ ! कुतरु सुफरु परत ॥४॥ बंधु-बैर कपि-बिभीषन गुरु गलानि गरत । सेवा केहि रीझि राम, किये सरिस भरत ॥५॥ सेवक भयो पवनपूत साहिब अनुहरत । ताको लिये नाम राम सब को सुढर ढरत ॥६॥ जाने बिनु राम-रीति पचि पचि जग मरत । परिहरि छल सरन गये तुलसिहुँ-से तरत ॥७॥ शब्दार्थ—नति = नम्रता । कुतरु = बुरे वृक्ष । सुफरु = सुन्दर फल । कपि = सुग्रीव गुरु = भारी । पवन-पूत = वायुके पुत्र हनुमान्‌जी । अनुहरत = अनुहारि करने लगे । भावार्थ—हे देवाधिदेव ! मैं आपके द्वारपर पड़ा हुआ इसलिए बार-बार पुकार कर रहा हूँ कि आप नम्रतापूर्वक दुःख, और दीनता कहनेपर संकट हर लेते हैं ॥१॥ जब कुबेर, इन्द्र आदि लोकपाल रावणके डरसे डरकर शोक-व्याकुल हो गये थे, तब हे कृपालु ! आपने कौन-सी बात सुनकर संकोच किया था और मनुष्यशरीर धारण किया था ? ॥२॥ यह बात मेरी समझमें नहीं आती कि शोकाग्निसे जलते हुए विश्वामित्र, अहिल्या और जनक किस साधनसे शीतल हुए थे ॥३॥ आपके चरण-कमलोंमें गुह, निषाद, जटायु पक्षी, शबरी आदिका सहज-प्रेम नहीं था । किन्तु हे नाथ ! आपके सम्मुख आते ही बुरे वृक्ष भी उत्तम फल फलने लगते हैं ॥४॥ भाई-(बालि और रावण) के बैरसे सुग्रीव और विभीषण भारी ग्लानिसे गले जा रहे थे । हे रामजी ! आपने उन्हें किस सेवापर

रीझकर भरतके समान मान लिया ? अर्थात् सुग्रीव और विभीषणने सेवा तो पीछे की; जब उन लोगोंने कुछ भी सेवा नहीं की थी, तभी आपने उनसे मिलकर कहा था कि 'तुम मुझे भरतके समान प्रिय हो' ॥५॥ सेवक हनुमान्‌जी (सेवा करते-करते) आपकी अनुहारि करने लगे या आपहीके समान हो गये। हे रामजी ! अब उनका नाम लेनेसे आप सबपर पूर्ण रीतिसे ढल (प्रसन्न हो) जाते हैं ॥६॥ हे नाथ ! आपकी रीति जाने बिना संसार पच-पचकर मर रहा है। किन्तु छलभाव त्यागकर आपकी शरणमें जानेपर तुलसी-जैसे जीव भी तर जाते हैं ॥७॥

विशेष (१) 'साहब अनुहरत'—यों तो हनुमान्‌जी शिवजीके अवतार हैं और शिवजी तथा रामजीमें कोई अन्तर ही नहीं है, तिसपर वह परमात्माका तात्त्विक स्वरूप भी पहचान चुके थे।

राग सूहो बिलावल [ १३५ ] राम सनेही सों तैं न सनेहु कियो। अगम जो अमरनिहूँ सो तनु तोहिं दियो ॥ दियो सुकुल जनम, सरीर सुंदर, हेतु जो फल चारिको । जो पाइ पंडित परम पद, पावत पुरारि-मुरारि को ॥ यह भरत खंड, समीप सुरसरि, थल भलो, संगति भली । तेरी कुमति कायर ! कल्प-वल्ली चहति¹ विष फलफली ॥१॥ ❊ ❊ ❊ अजहूँ समुझि चित दै सुनु परमारथ । है हित सो जगहूँ जाहिते स्वारथ ॥ स्वारथहि प्रिय, स्वारथ सो काते कौन वेद बखानई । देखु खल, अहि-खेल परिहरि, सो प्रभुहिं पहिचानई ॥ १. पाठान्तर 'चहति हैं'।

२३२ विनय-पत्रिका पितु-मातु, गुरु, स्वामी, अपनपौ, तिय, तनय, सेवक, सखा। प्रिय लगत जाके प्रेमसों, बिनु हेतु हित तैं नहिं लखा ॥२॥


दूरि न सो हितू हेरु हिये ही है। छलहिं छोड़ि सुमिरे छोहु किये ही है॥ किये छोहु छाया कमल कर की भगत पर भजतहि भजै। जगदीस, जीवन जीव को, जो साज सब सबको सजै ॥ हरिहि हरिता, बिधिहिं बिधिता, सिवहिं सिवता जो दई। सोइ जानकी-पति मधुर मूरति, मोदमय मंगलमई ॥३॥


ठाकुर अतिहि बड़ो, सील, सरल, सुठि। ध्यान अगम सिवहूँ, भेंट्यो केवट उठि ॥ भरि अंक भेंट्यो सजल नयन, सनेह सिथिल सरीर सो। सुर, सिद्ध, मुनि, कवि कहत कोउ न प्रेम-प्रिय रघुवीर सो ॥ खग, सबारि, निसिचर, भालु, कपि किये आपु ते बंदित बड़े। तापर तिन्हकि सेवा सुमिरि जिय जात जनुसकुचनि गड़े॥४॥


स्वामी को सुभाउ कह्यो सो जब उर आनिहैं। सोच सकल मिटिहैं, राम भलो मन मानिहैं॥ भलो मानिहैं रघुनाथ जोरि जो हाथ माथो नाइहै ततकाल तुलसीदास जीवन-जनम को फल पाइहै॥ जपि नाम करहि प्रनाम, कहि गुन-ग्राम, रामहि धरि हिये। बिचरहिं अवनि अवनीस-चरन सरोज मन-मधुकर किये ॥५॥ शब्दार्थ—अमरनिहूँ = देवताओंको भी। सुकुल = उत्तम कुल। तनय = पुत्र। सुठि = सुन्दर। उर = हृदय। आनिहैं = लावेंगे। भावार्थ—तूने स्नेही रामसे प्रेम नहीं किया। उन्होंने तुझे वह (मनुष्य) शरीर दिया है, जो देवताओंके लिए भी दुर्लभ है। उन्होंने तुझे सुन्दर कुलमें

विनय-पत्रिका २३३ जन्म दिया है। ऐसा सुन्दर शरीर दिया है जो चारो फलों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) का कारण है। जिस शरीरको पाकर पंडित (ज्ञानी) लोग शिव और कृष्णके परमपदको प्राप्त करते हैं। स्थल उत्तम है, क्योंकि यह देश भारतवर्ष है; और संगति भी अच्छी है, क्योंकि समीपमें ही देवनदी गंगाजी हैं। किन्तु रे कायर ! तेरी कुबुद्धिरूपी कल्पबेलि विषैले फल फला चाहती है ॥१॥ अब भी सोच-समझ ले और मन लगाकर परमार्थकी बात सुन। वह भलाईकी बात है अर्थात् परमार्थ सिद्ध करनेवाली है और उससे इस संसारमें भी स्वार्थ सिद्ध होता है। यदि तुझे (परमार्थ प्रिय न हो, केवल) स्वार्थ ही प्रिय है, तो वह स्वार्थ किससे प्राप्त होगा, कौन है, जिसकी वेद बड़ाई करते हैं (यह तो समझ)। रे खल ! देख, (विषयरूपी) सर्पके साथ खेलना छोड़कर उस प्रभु (श्रीरामजी) को पहचान, जिसके प्रेमके कारण पिता, माता, गुरु, स्वामी, अपना हृदय, स्त्री, पुत्र, सेवक, मित्र आदि प्रिय लगते हैं। उस अकारण हित करनेवाले (श्रीरामजी) को तूने नहीं देखा ॥२॥ तेरे वह हितू दूर नहीं हैं। वह तेरे हृदयमें ही हैं—ढूँढ़ या देख। छल छोड़कर स्मरण करनेपर वह कृपा किये बैठे हैं। अर्थात् ज्यों ही तू छल छोड़कर उनका स्मरण करेगा—तुरन्त वह तुझपर कृपा करेंगे। वह कृपा करके भक्तोंके ऊपर अपने हस्त-कमलकी छाया किये रहते हैं। वह भजते ही भजने लगते हैं; तात्पर्य, जो उन्हें भजता है, वह भी उसे भजने लगते हैं। वह जगत्के स्वामी हैं, जीवके जीवन हैं। जो सबके लिए सब साज-सामान प्रस्तुत करता है, जिसने विष्णुको विष्णुत्व (विष्णुपना), ब्रह्माको ब्रह्मापन और शिवको शिवपन प्रदान किया है, अर्थात् विष्णुको जगत्-पालनकी शक्ति, ब्रह्माको सृजनकी शक्ति और शिवको संहार-शक्ति जिसने दी है, वह जानकीनाथ श्रीरामजी ही हैं; उनकी मधुरमूर्त्ति आनन्दमयी और कल्याणमयी है ॥३॥ वह शीलमूर्त्ति, सरलमूर्त्ति और सुन्दरताकी मूर्त्ति श्रीरामजी बहुत बड़े ठाकुर (स्वामी) हैं। उनका ध्यान शिवजीको भी दुर्लभ है, (किन्तु वह इतने सरल हैं कि) उन्होंने उठकर निषाद- को हृदयसे लगा लिया। स्नेह-शिथिल शरीरसे ज्यों ही वह केवटको छातीसे लगाकर मिले, त्यों ही उनकी आँखें भर आयीं। देवता, सिद्ध, मुनि और कवि कहते हैं कि श्रीरघुनाथजीके समान प्रेमप्रिय कोई भी नहीं है। (प्रेमप्रियताका ही प्रभाव है कि) उन्होंने जटायु, शबरी, राक्षस (विभीषण), रीछ (जाम्ब-

२३४ विनय-पत्रिका वान) और बन्दरों-(सुग्रीव आदि) को अपनेसे भी अधिक वन्दनीय बना दिया। इसपर भी जब वह उन लोगोंकी सेवाओंका स्मरण करते हैं, तब मन-ही- मन मानों संकोचसे गड़-से जाते हैं ॥४॥ स्वामी श्रीरामजीका जो स्वभाव मैंने अभी कहा है उसे जब तू अपने हृदयमें लावेगा, तब तेरी सब चिन्ताएँ मिट जायँगी, और रामजी भी मनमें भला मानेंगे, तुझपर प्रसन्न होंगे। रघुनाथजी तो तभी प्रसन्न हो जायेंगे, जब तू हाथ जोड़कर मस्तक नवा देगा अर्थात् प्रणाम करेगा। ऐ तुलसीदास ! (उस समय) तू तत्काल ही जन्म लेनेका फल पा जायगा। तू राम-नामका जप कर, उन्हें प्रणाम कर और श्रीरामजीके स्वरूपको हृदयमें धारण करके उनकी गुणावलीका कीर्त्तन कर। तू जगदीश भगवान् रामजीके चरण-कमलोंमें अपने मन-मधुकर-(भ्रमर) को लगाकर पृथिवीपर विचरण कर ॥५॥ विशेष १—'हरिहिं...जो दई'—इसमें यह सन्देह हो सकता है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेशमें तो कोई भेद ही नहीं है, तो फिर गोस्वामीजीने ऐसा क्यों लिखा। इसका समाधान कई तरहसे किया जा सकता है। यहाँ इतना लिखना पर्याप्त है कि यह अनन्य भक्तिका लक्षण है। अनन्य भक्त चाहे वह शिवजीका उपासक हो अथवा और किसी देवताका—अपने आराध्य देवको सर्वश्रेष्ठ देखता ही है। २—'ध्यान अगम सिव हूँ'—एक बार भगवान्‌के स्वरूपको हृदयमें स्थित करनेके लिए भगवान् शंकरने सत्तासी हजार वर्षकी एक समाधि लगायी थी। ३—'केवट'—गुह निषाद; १०६ठे पदके 'विशेष'में देखिये। ४—'रावण'—जटायु; इसने सीताको छुड़ानेके लिए रावणसे युद्ध करके देह-त्याग किया था। रामजीने अपने पिताके समान इसका दाह-संस्कार किया था। ५—'सबरि'—१०६ ठे पदके 'विशेष'में देखिये। [ १३६ ] १ जिय जबतें हरितें बिलगान्यो । तबतें देह गेह निज जान्यो ॥ मायाबस स्वरूप बिसरायो । तेहि भ्रम ते दारुन दुख पायो ॥

पायो जो दारुन दुसह दुख, सुख लेस सपनेहुँ नहिं मिल्यो। भव-सूल, सोक अनेक जेहि, तेहि पंथ तू हठि हठि चल्यो॥ बहु जोनि जनम, जरा-बिपत्ति, मतिमन्द ! हरि जान्यो नहीं। श्री राम बिनु विश्राम मूढ़ ! विचारु, लखि पायो कहीं ॥ २ आनंद-सिंधु-मध्य तव वासा। बिनु जाने कस मरसि पियासा ॥ मृग-भ्रम वारि सत्य जिय जानी। तहँ तू मगन भयो सुख मानी ॥ तहँ मगन मज्जसि, पान करि, त्रयकाल जल नाहीं जहाँ। निज सहज अनुभव रूप तव खल ! भूलि अब आयो तहाँ ॥ निरमल निरञ्जन, निर्विकार, उदार सुख तैं परिहरयो। निःकाज राज बिहाय नृप इव सपन कारागृह परयो ॥ ३ तैं निज करम-डोरि दृढ़ कीन्हीं। अपने करनि गाँठि गँहि दीन्हीं ॥ ताते परबस परयो अभागे। ता फल गरभ-बास-दुख आगे ॥ आगे अनेक समूह संसृति उदरगत जान्यो सोऊ। सिर हेठ, ऊपर चरन, संकट बात नहिं पूछै कोऊ ॥ सोनित-पुरीष, जो मूत्र-मल कृमि-कर्द्दमावृत सोवई। कोमल सरीर, गंभीर वेदन, सीस धुनि-धुनि रोवई ॥ ४ तू निज करम-जाल जहँ घेरो। श्री हरि संग तज्यो नहिं तेरो ॥ बहु बिधि प्रतिपालन प्रभु कीन्हों। परम कृपालु ग्यान तोहि दीन्हों॥ तोहि दियो ज्ञान-विवेक, जनम अनेक की तव सुधि भई। तेहि ईस की हौं सरन, जाकी विषम माया गुनमई ॥ जेहि किये जीव-निकाय बस रस-हीन, दिन-दिन अति नई। सो करौ बेगि सँभार श्रीपति, विपति महँ जेहि मति दई ॥ ५ धुनि बहु विधि गलानि जिय मानी। अब जग जाइ भजौं चक्रपानी ॥ ऐसेहि करि विचारि चुप साधी। प्रसव-पवन प्रेरेउ अपराधी ॥

२३६ विनय-पत्रिका प्रेरथो जो परम प्रचण्ड मारुत, कष्ट नाना तैं सह्यो । सो ग्यान, ध्यान, विराग अनुभव जातना पावक दह्यो ॥ अति खेद ब्याकुल, अल्प बल, छिन एक बोलि न आवई । तव तीव्र कष्ट न जान कोउ, सब लोग हरषित गावई ॥ ६ बाल-दसा जेते दुख पाये । अति असीम, नहिं जाहिं गनाये ॥ छुधा-व्याधि-बाधा भइ भारी । वेदन नहिं जानै महतारी ॥ जननी न जानै पीर सो, केहि हेतु सिसु रोदन करै । सोइ करै विविध उपाय, जातें अधिक तुव छाती जरै ॥ कौमार, सैसव अरु किशोर अपार अघ को कहि सकै । व्यतिरेक तोहि निर्दय ! महाखल ! आन कहु को सहि सकै॥ ७ जोबन जुवती सँग रँग रात्यो । तब तू महा मोह-मद मात्यो ॥ ताते तजी धरम-मरजादा । बिसरे तब सब प्रथम विषादा ॥ बिसरे विषाद, निकाय-संकट समुझि नहिं फाटत हियो । फिरि गर्भगत-आवर्त्त संसृति चक्र जेहि होइ सोइ कियो ॥ कृमि-भस्म-बिट-परिनाम तनु, तेहि लागि जग बैरी भयो । परदार, परधन, द्रोह पर, संसार बाढ़ै नित नयो ॥ ८ देखत ही आई विरुधाई । जो तैं सपनेहुँ नाहिं बुलाई ॥ ताके गुन कछु कहे न जाहीं । सो अब प्रगट देखु तन माहीं ॥ सो प्रगट तनु जरजर जरावस, व्याधि, सूल सतावई । सिर-कंप, इंद्रिय-सक्ति प्रतिहत, वचन काहु न भावई ॥ गृहपालहूतें अति निरादर, खान-पान न पावई । ऐसिहु दसा न विराग तहँ, तृष्णा-तरंग बढ़ावई ॥ ९ कहि को सकै महाभव तेरे । जनम एक के कछुक गनेरे ॥ चारि खानि संतत अवगाहीं । अजहुँ न करु विचार मन माहीं ॥

विनय-पत्रिका २३७ अजहूँ विंचारु, विकार तजि, भजु राम जन-सुखदायकं । भवसिंधु दुस्तर जलरथं, भजु चक्रधर सुर-नायकं ॥ बिनु हेतु करुनाकर, उदार, अपार-माया-तारनं। कैवल्य-पति, जगपति, रमापति, प्रानपति, गतिकारनं ॥ १० रघुपति-भगति सुलभ, सुखकारी। सो त्रयताप-सोक-भय-हारी बिनु सतसंग भगति नहिं होई। ते तब मिलैं द्रवै जब सोई ॥ जब द्रवैं दीनदयालु राघव, साधु-संगति पाइये। जेहि दरस-परस-समागमादिक पापरासि नसाइये ॥ जिनके मिले दुख-सुख समान, अमानतादिक गुन भये। मद-मोह-लोभ-विषाद-क्रोध सुबोध तें सहजहिं गये ॥ ११ सेवत साधु द्वैत-भय भागै । श्री रघुवीर-चरन लौ लागै ॥ देह-जनित विकार सब त्यागै। तब फिरि निज स्वरूप अनुरागै ॥ अनुराग सो निज रूप जो जगतें बिलच्छन देखिये। संतोष, सम, सीतल सदा दम, देहवंत न लेखिये ॥ निरमल, निरामय, एक रस, तेहि हरष-सोक न व्यापई। त्रैलोक-पावन सो सदा जाकी दसा ऐसी भई ॥ १२ जो तेहि पंथ चलै मन लाई। तौ हरि काहे न होहिं सहाई ॥ जो मारग श्रुति-साधु दिखावैं। तेहि पथ चलत सबै सुख पावैं ॥ पावै सदा सुख हरि-कृपा, संसार आसा तजि रहै। सपनेहुँ नहीं दुख द्वैत-दरसन, बात कोटिक को कहै ॥ द्विज, देव, गुरु, हरि संत बिनु संसार-पार न पाइये। यह जानि तुलसीदास त्रास हरन रमापति गाइये ॥ शब्दार्थ—विलगान्यो = अलग हुआ। जरा = बुढ़ापा। मज्जसि = स्नान कर रहा है। संसृति = संसार। हेठ = नीचे। शोनित = रक्त। पुरीष = मल, विष्ठा। कर्दमावृत = कीचसे ढँका हुआ। निकाय = समूह। सिसु = बालक। व्यतिरेक = अतिरिक्त, सिवा। रात्यो = फँस

२३८ विनय-पत्रिका गया । आवर्त्त = गढ़ा, जन्म-मरणके चक्करमें घूमना । विट = मल । प्रतिहत = नष्ट । गृहपाल = कुत्ता । महाभव = महाजन्म । १ भावार्थ—हे जीव ! जबसे तू परमात्मासे अलग हुआ (अर्थात्, जबतक तू परमात्माके स्वरूपमें स्थित था, तबतक तेरा जीव नाम नहीं पड़ा था; किन्तु जब- से अविद्याके आवरण द्वारा तू भगवान्‌से पृथक् हुआ), तबसे तेरा जीव नाम पड़ गया और तभीसे तूने इस शरीरको ही अपना घर समझ लिया । तूने मायाके वश होकर अपने असली सत्-चित्-आनन्दस्वरूपको भुला दिया, और उसी भ्रमके कारण तुझे (जन्म-मरणरूप) भयंकर दुःख हुआ । जो भयंकर और असह्य दुःख तुझे भोगना पड़ा, उसमें स्वप्नमें भी सुखका लेशमात्र न रहा । तू हठपूर्वक उस मार्गसे चलता रहा, जिसमें संसारके शूल (गर्भवास) और अनेक शोक भरे पड़े हैं । रे मन्दबुद्धि ! बहुत-सी योनियोंके जन्म और बुढ़ापेकी विपत्तियाँ तुझे झेलनी पड़ीं, फिर भी तूने श्रीरामजीको न पहचाना । रे मूढ़ ! विचारकर देख, श्रीरामजीके बिना तुझे और कहीं शान्ति मिली ? २ रे जीव ! तेरा निवास आनन्दके समुद्रमें है, अर्थात् तू आनन्दस्वरूप परब्रह्मसे भिन्न नहीं है । तू बिना जाने (अज्ञानवश) क्यों प्यासा मर रहा है ? तूने मृग-तृष्णाके जल-(इन्द्रिय-विषयों) को सत्य मान लिया, और उसीमें सुख मानकर मग्न हो गया । वहीं तू डूबकर (विषयोंका ध्यान कर) नहा रहा है, और उसीको पी रहा है, जहाँ तीनों कालमें जल (सुख) नहीं अर्थात् विषयोंमें न तो कभी सुख था, न है, और न रहेगा । रे खल ! अब तू अपने सहज अनुभव-रूपको भूलकर वहीं (जहाँ त्रिकालमें जल नहीं) आ पड़ा है । अर्थात् अपने सच्चिदानन्दरूपको भूलकर अब तू अपनेको शरीररूप मान रहा है । तूने विशुद्ध, अविनाशी, षट्-विकार-(जन्म, अस्ति, वृद्धि, विपरिणाम, अपक्षय, नाश) रहित परम सुखको त्याग दिया । तेरी वही दशा है जैसे कोई राजा व्यर्थ ही स्वप्नमें राज छोड़कर कारागृहमें पड़ा हो । ३ तूने अपनी कर्मरूपी डोरीको मजबूत कर ली और अपने हाथोंसे (अज्ञानसे)

विनय-पत्रिका २३९ कसकर गाँठ लगा दी। अभागे ! इसीसे तू परतंत्र पड़ा हुआ है। उसका फल गर्भवासका दुःख है जोकि तेरे आगे है। आगे (गर्भवासमें) जो अनेक दुःखोंके समूह हैं, वे माताके पेटमें पड़े हुए प्राणीको ज्ञात हैं, (गर्भमें) सिर तो नीचे रहता है और पैर ऊपर। इस संकटकालमें कोई बात भी नहीं पूछता। रक्त, विष्ठा, मूत्र, मल, कृमि और कीचसे ढँका हुआ (गर्भमें) सोता है। उस समय तेरा शरीर तो कोमल रहता है, पर वेदना (पीड़ा) अत्यधिक सहनी पड़ती है। इससे तू सिर धुन-धुनकर रोता है। ४ जहाँ-जहाँ तू अपने कर्म-जालमें घिरा, वहाँ-तहाँ भगवान् तेरे साथ रहे। प्रभुने हर प्रकारसे तेरा पालन-पोषण किया, और उस परम कृपालुने तुझे ज्ञान भी दिया। जब परमात्माने ज्ञान और विवेक दिया, तब तुझे पिछले अनेक जन्मोंका स्मरण हुआ। फिर तो कहने लगा कि 'मैं उस ईश्वरकी शरणमें हूँ जिसकी यह त्रिगुणात्मिका माया अत्यन्त दुस्तर है। जिस (माया) ने जीव- समुदायको अपने वशमें कर रखा है, जिसने जीवोंको रसहीन (आनन्द-रहित) बना रखा है और जो दिनपर दिन अत्यन्त नयी दिखाई देती है, उस मायासे हे लक्ष्मीनारायण ! मेरी शीघ्र रक्षा कीजिये; क्योंकि आपनेही तो इस विपत्तिकालमें (गर्भमें) बुद्धि दी है।' ५ फिर तू अपने मनमें बहुत तरहकी ग्लानि मानकर कहने लगा कि अब मैं संसारमें जाकर या जन्म लेकर चक्रपाणि भगवान्‌का भजन करूँगा। ऐसा विचारकर ज्यों ही तूने चुप्पी साधी, त्यों ही प्रसवकालकी वायुने तुझ अपराधीको प्रेरित किया। उस परम प्रचंड वायुके प्रेरणा करनेपर तुझे अनेक तरहके कष्ट सहन करने पड़े। फिर क्या था, तेरा वह ज्ञान, ध्यान, वैराग्य और अनुभव (सब जन्मकालकी) यातनाकी आगमें जल-भुन गया, अर्थात् असह्य कष्टमें तू सब भूल गया। (जन्म होनेपर) अत्यन्त कष्टके कारण व्याकुल होने, तथा थोड़ा बल रहनेके कारण एक क्षणतक बोल नहीं आया। उस समयके तेरे तीव्र कष्टको किसीने न जाना, उलटा सब लोग हर्षित होकर गाने लगे।