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विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)

Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariAwadhipublished475 पृष्ठ

३६० विनय-पत्रिका होता है। सोचिये न ! कृष्णजी पूर्णावतार माने जाते हैं। अवतार हुआ करता है, अधर्मका नाश करके धर्मकी स्थापना करनेके लिए। यह स्वयं सिद्ध है कि कृष्ण पूर्णावतार थे। उनके पूर्णत्वमें किसी तरहका सन्देह नहीं। जिस बातको वेद-शास्त्र एक स्वरसे कह रहे हैं, जिसकी पुष्टि बड़े-बड़े तत्त्ववेत्ता ऋषि-मुनिँ कर गये हैं, उस बातका खंडन कोई भी आस्तिक बुद्धि नहीं कर सकती। और फिर कृष्ण भगवान्‌के प्रत्येक कार्यपर सूक्ष्म बुद्धिसे विचार करनेपर भी यही प्रतीत होता है कि वह पूर्णावतार थे। इस बातको अच्छी तरह समझनेके लिए हमें श्रीमद्भागवतकी उत्पत्तिपर विचार करना होगा। देखिये, शापवश राजा परीक्षित्‌के जीवनकी अवधि केवल सात दिन रह गयी थी। उस समय उन्होंने अपने उद्धारके लिए श्रीमद्भागवतकी कथा सुनी थी। आचार्य चुने गये थे, बालब्रह्मचारी महामुनि शुकदेवजी। अब विचारणीय बात है कि क्या श्रृंगार- प्रधान केलि-कलहपूर्ण कथा सुनकर राजा परीक्षित् मुक्त हो सकते थे? कदापि नहीं। और फिर यदि श्रृंगार-रसकी ही कथा अभिप्रेत होती, तो उसके लिए बालब्रह्मचारी शुकदेवजी उपयुक्त आचार्य क्यों चुने जाते? एक बालब्रह्मचारी वैषयिक बातोंका वर्णन क्या करेगा? इन बातोंसे यह सिद्ध होता है कि श्रीमद्भागवतकी कथा केलि-कलहपूर्ण नहीं है। ब्रजांगनाओंके पवित्र भावका पता एक बातसे और चलता है; श्रीमद्भागवतमें राजा परीक्षित्‌ने ब्रह्मर्षि शुकदेवजीसे प्रश्न किया कि गोपियोंके काम-मोहित होनेपर भी उन्हें परम-पद कैसे मिला? इसके उत्तरमें महर्षिने कहा कि जिन गोपिकाओंने समस्त संसारको, यहाँतक कि अपने परम प्रिय जीवनको भी भगवान् श्रीकृष्ण- पर न्यौछावर कर दिया और उनसे निष्काम प्रीति की, वे काम-मोहित कैसे कही जा सकती हैं? स्थानाभावके कारण यहाँ उस विषयका विवेचन विस्तृत रूपसे नहीं किया जा सकता। यदि ईश्वरकी कृपा हुई तो मैं इस विषयपर एक स्वतन्त्र पुस्तक लिखूँगा। अब यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि गुसाईंजीने ब्रजांगनाओंको काम- मोहित क्यों कहा? बात यह है कि अन्य-अन्य अवतारोंमें (जैसे रामावतार आदिमें, सूपर्णखा आदि) स्त्रियाँ भगवान्‌के रूप-माधुर्यपर मुग्ध होकर उन्हें पतिरूपमें अथवा प्रेमीके रूपमें देखना चाहती थीं और भगवान्‌ने अपने

विनय-पत्रिका ३६१ कृष्णावतारमें उनकी अभिलाषा पूर्ण करनेका वचन दिया था। (जाकी रही भावना जैसी। प्रभु-मूरति देखी तिन तैसी) किन्तु परमात्माकी प्रेरणासे वे ही कामा- तुर स्त्रियाँ जब गोपियोंके रूपमें उत्पन्न हुईं, तब उनका वह भाव नहीं रह गया। उनमें शुद्ध प्रेम उत्पन्न हो गया। यह है ईश्वर-साक्षात्कारकी महिमा। इससे व्रजांगनाओंका प्रेम सखा-भावमय हो गया। जान पड़ता है कि उसी बातको लक्ष्य करके गुसाईंजीने, यहाँ 'काम-मोहित' लिखा है। अर्थात् गोपिकाएँ तो काम-मोहित होकर अवतरित हुई थीं, पर भगवान्‌ने कृपा करके उनका भाव ही पलट दिया। वास्तवमें व्रजांगनाएँ धन्य हो गयीं। उनके भाग्यकी जितनी प्रशंसा की जाय, थोड़ी है। कविवर रसखानने क्या खूब कहा है:— संकरसे मुनि जाहिं रटैं, चतुरानन आनन चार तें गावैं। सो हिय नैक हि आवत ही, मति-मूढ़ महा 'रसखानि' कहावैं। जापर देव अदेव भुजंगम, बारन प्रानन बार न लावैं। ताहि अहीरकी छोहरियाँ छछियाँ भरि छाँछको नाच नचावैं ॥ —रसखान । ४—'सिसुपाल'—यह चेदि देशका राजा था। आजकल चेदि नगरको चंदेरी कहते हैं जोकि ग्वालियर राज्यके अन्तर्गत है। यह कृष्ण भगवान्‌को प्रतिदिन सौ गालियाँ दिया करता था। यह कृष्णकी बुआका लड़का था। भगवान् अपनी बुआको वचन दे चुके थे कि शिशुपालकी सौ गालियाँतक मैं सह लूँगा। एक दिन पाण्डवोंकी राज्य-सभामें जब शिशुपाल सौसे अधिक गालियाँ देने लगा, तब भगवान्‌ने चक्रसुदर्शनसे उसका सिर काट लिया। देखते ही देखते उसकी आत्म-ज्योति भगवान्‌के श्रीमुखमें प्रवेश कर गयी। ५—'ब्याध'—'जरा' नामक ब्याधकी कथा पीछे लिखी जा चुकी है। इसने पूर्वजन्मका बदला चुकानेके लिए धोखेसे श्रीकृष्णके चरणमें बाण मार दिया था। ९४ पदके विशेषमें देखिये। [२१५] श्री रघुवीर की यह बानी । नीचहूँ सों करत नेह सुप्रीति मन अनुमानी ॥१॥

३६२ विनय-पत्रिका परम अधम निषाद पाँवर, कौन ताकी कानि ? लियो सो उर लाइ सुत ज्यों प्रेमको पहिचानि ॥२॥ गीध कौन दयालु, जो बिधि रच्यो हिंसा सानि ? जनक ज्यों रघुनाथ ता कहँ दियो जल निज पानि ॥३॥ प्रकृति-मलिन कुजाति सबरी सकल अवगुन-खानि । खात ताके दिये फल अति रुचि बखानि बखानि ॥४॥ रजनिचर अरु रिपु विभीषन सरन आयो जानि । भरत ज्यों उठि ताहि भेंटत देह-दसा भुलानि ॥५॥ कौन सुभग सुसील बानर, जिनहिं सुमिरत हानि । किये ते सब सखा पूजे भवन अपने आनि ॥६॥ राम सहज कृपालु कोमल दीनहित दिनदानि । भजहि ऐसे प्रभुहि तुलसी कुटिल कपट न ठानि ॥७॥ शब्दार्थ—पाँवर = नीच, पापी। कानि = प्रतिष्ठा। सानि = सानकर। जनक = पिता। आनि = लाकर। दिनदानि = सदैव दानी। भावार्थ—श्रीरघुनाथजीकी यह आदत है कि वह अपने मनमें सुन्दर प्रेमका अनुमान करके नीचसे भी प्रेम करते हैं ॥१॥ निषाद अत्यन्त अधम और पापी था। उसकी कौनसी प्रतिष्ठा थी ? किन्तु उसके प्रेमको पहचानकर रामजीने उसे पुत्रके समान हृदयसे लगा लिया ॥२॥ गीध कौनसा दयालु था जिसे ब्रह्मा- ने हिंसा में सानकर (हिंसामय) बनाया था ? किन्तु रामजीने पिताके समान उसे अपने हाथसे पानी दिया ॥३॥ स्वभावकी मलिन और नीच जातिकी शबरी सब अवगुणोंकी खान थी। किन्तु रामजीने उसके दिये हुए फलोंको बड़ी रुचिके साथ बखान-बखानकर खाया ॥४॥ राक्षस और शत्रु विभीषणको शरणमें आया जानकर आपने उठकर उसे भरतकी तरह हृदयसे लगा लिया और (प्रेमकी अधि- कताके कारण) अपने शरीरकी भी सुध भूल गये ॥५॥ बन्दर भला कौनसे सुन्दर और सुशील होते हैं जिनका स्मरण करनेसे भी हानि होती है। किन्तु रामजीने उन बन्दरोंको अपना सखा बनाया था और अपने घर लाकर उनकी पूजा भी की थी (आदर-सत्कार किया था) ॥६॥ रामजी सहज कृपाल,

कोमल, दीन-हितकारी और सदैव दान देनेवाले हैं। इसलिए हे तुलसीदास ! तू कुटिलता और कपट न रखकर ऐसे प्रभु (श्री रामजी) का भजन कर ॥७॥

विशेष

१—'निषाद'—१०६ पदके विशेषमें देखिये । २—'गीध'—जटायु; इसने सीताको छुड़ानेके लिए रावणसे युद्ध करके प्राण-त्याग किया था। रामजीने अपने पिताके समान, इसका दाह-संस्कार किया था। ३—'सबरी'—१०६ पदके विशेषमें देखिये ।

[ २१६ ]

हरि तजि और भजिये काहि ? नाहिनै कोउ राम सो ममता प्रनत पर जाहि ॥१॥ कनककसिपु बिरंचि को जन करम मन अरु बात । सुतहि दुखवत विधि न बरज्यो काल के घर जात ॥२॥ संभु-सेवक जान जग, बहु बार दिय दससीस । करत राम-विरोध सो सपनेहुँ न हरक्यो ईस ॥३॥ और देवन की कहा कहौं, स्वारथहि के मीत । कबहुँ काहु न राखि लियो कोउ सरन गयउ सभीत ॥४॥ को न सेवत देत संपति लोकहू यह रीति । दास तुलसी दीनपर एक राम ही की प्रीति ॥५॥ शब्दार्थ—कनककसिपु = हिरण्यकशिपु । हरक्यो = मना किया । ईस = शिवजी । भावार्थ—परमात्माको छोड़कर और किसका भजन किया जाय । रामजी- की तरह ऐसा कोई नहीं है, जिसकी भक्तोंपर ममता हो ॥१॥ हिरण्यकशिपु मन, वचन और कर्मसे ब्रह्माका भक्त था। वह अपने पुत्र (प्रह्लाद) को दुःख पहुँचाने- के कारण, कालके घर चला गया, पर ब्रह्मा उसे न रोक सके (मृत्युसे न बचा सके) ॥२॥ संसार जानता है कि रावण शिवजीका भक्त था और उसने कई बार अपने सिर काटकर शिवजीको चढ़ाये थे। किन्तु जब वह रामजीसे वैर करने

३६४ विनय-पत्रिका लगा, तब शिवजीने उसे स्वप्नमें भी मना नहीं किया (परिणाम यह हुआ कि रावण मारा गया और शिवजीने उसकी रक्षा नहीं की) ॥३॥ (जब ब्रह्मा और शिवका यह हाल है, तब) और देवताओंके लिए क्या कहूँ, सब अपने मतलबके यार हैं। कभी भी किसीके भयभीत होकर शरणमें आनेपर उसे किसीने शरण नहीं दी ॥४॥ सेवा करनेपर कौन धन नहीं देता ? (सब लोग देते हैं)। यही संसारकी रीति है। किन्तु हे तुलसीदास ! दीन भक्तोंपर एक रामजीका ही (सच्चा) प्रेम है (अर्थात् रामजी ही अपने भक्तोंकी हर हालतमें रक्षा करते हैं) ॥५॥ विशेष १—‘कनककसिपु’—९३ पदके विशेषमें देखिये। २—‘हरक्यो’—प्रायः सभी प्रतियोंमें ‘हटक्यो’ पाठ है। किन्तु एक हस्त- लिखित प्रतिमें मुझे ‘हरक्यो’ पाठ मिला है। यही पाठ शुद्ध भी जान पड़ता है। [ २१७ ] जो पै दूसरो कोउ होइ । तौ हौं बारहि बार प्रभु कत दुख सुनावौं रोइ ॥१॥ काहि ममता दीन पर, काको पतित-पावन नाम । पाप मूल अजामिलहि केहि दियो अपनो धाम ॥२॥ रहे संभु बिरंचि सुरपति लोकपाल अनेक । सोक-सरि बूड़त करीसहि दई काहु न टेक ॥३॥ बिपुल-भूपति-सदसि महँ नर-नारि कह्यो ‘प्रभु पाहि’ । सकल समरथ रहे, काहु न बसन दीन्हों ताहि ॥४॥ एक मुख क्यों कहौं करुनासिन्धु के गुन-गाथ ? । भक्तहित धरि देह काहू न कियो कोसलनाथ ! ॥५॥ आप से कहुँ सौंपिये मोहि जो पै अतिहि घिनात । दासतुलसी और बिधि क्यों चरन परिहरि जात ॥६॥ शब्दार्थ—करीसहि (करि+ईसहिं) = गजेन्द्रको । टेक = सहारा । सदसि = सभा । नर = अर्जुन । घिनात = घृणा करते हो ।

विनय-पत्रिका ३६५ भावार्थ—हे नाथ ! यदि दूसरा कोई (आपके समान) होता, तो मैं बार- बार रोकर अपना दुःख आपहीको क्यों सुनाता ? ॥१॥ (आपके सिवा) दीनों- पर किसकी स्नेह-ममता है, और पतित-पावन किसका नाम है ? महापापी अजा- मिलको किसने अपना धाम दिया ? ॥२॥ शिव, ब्रह्मा, इन्द्र और अनेक लोक- पाल थे, पर शोकरूपी नदीमें डूबते हुए गजेन्द्रको किसीने सहारा नहीं दिया॥३॥ सभामें बहुतसे रजवाड़े बैठे थे और सभी अपने-अपनेको समर्थ थे, किन्तु जब अर्जुनकी स्त्री द्रौपदीने कहा, 'प्रभो ! मेरी रक्षा करो'—तब किसीने उसे वस्त्र नहीं दिया (यदि उसकी साड़ी बढ़ायी, तो आपहीने ।) ॥४॥ मैं करुणा- निधान भगवान् रामजीकी गुग-गाथा एक मुखसे कैसे कहूँ ? हे कोशलनाथ ! आपने भक्तोंके लिए अवतार लेकर क्या-क्या नहीं किया ? ॥५॥ यदि आप मुझसे घृणा करते हों तो आप मुझे अपने ही समान किसी स्वामीको सौंप दीजिये । (यदि आप ऐसा न करेंगे तो) यह दास तुलसी आपके चरणोंको छोड़कर और किसी प्रकार भला अन्यत्र क्यों जाने लगा ? ॥६॥ विशेष १—'अजामिल'—५७ पदके विशेषमें देखिये । २—'करीस'—गजेन्द्र; ८३ पदके विशेषमें देखिये । ३—'नर-नारि'—द्रौपदी; ९३ पदके विशेषमें देखिये । २१८ ] कबहिं देखाइहौ हरि चरन । समन सकल कलेस कलि-मल, सकल मंगल-करन ॥१॥ सरद-भव सुंदर तरुनतर अरुन-बारिज बरन । लच्छि-लालित ललित करतल छवि अनूपम धरन ॥२॥ गंग-जनक अनंग-अरि-प्रिय कपट-बटु बलि-छरन । विप्रतिय नृग बधिक के दुख-दोस दारुन दरन ॥३॥ सिद्ध-सुर-मुनि-बृंद-बंदित सुखद सब कहँ सरन । सकृत उर आनत जिनहिं जन होत तारन तरन ॥४॥

कृपासिंधु सुजान रघुबर प्रनत-आरति हरन। दरस-आस-पियास तुलसीदास चाहत मरन ॥५॥ शब्दार्थ—तरुनतर = अत्यन्त युवक, ताजा खिला हुआ। ललित = दुलार किये गये। बटु = ब्रह्मचारी। बधिक = वाल्मीकि। भावार्थ—हे हरे! आप मुझे अपने उन चरणोंका दर्शन कब करायेंगे जो कलियुगके सब पापों और क्लेशोंका नाश करनेवाले तथा सब प्रकारसे कल्याणकारी हैं? ॥१॥ जो चरण शरद ऋतुमें उत्पन्न, सुन्दर और ताजा खिले हुए लाल कमलके रंगके हैं, जिनका लक्ष्मीजी अपनी ललित और अनुपम शोभा धारण करनेवाली हथेलियोंसे दुलार किया करती हैं ॥२॥ जो गंगाजीको उत्पन्न करनेवाले हैं, काम-रिपु शंकरजीके प्रिय हैं, तथा ब्रह्मचारीके कपट वेषमें राजा बलिको छलनेवाले हैं। जिन्होंने ब्राह्मण-पत्नी (अहिल्या), राजा नृग और बधिक-(वाल्मीकि) के दारुणदुःखों और दोषोंको दूर कर दिये ॥३॥ जो सिद्ध, देवता, मुनीन्द्र द्वारा वन्दित हैं तथा सबको सुख और शरण देनेवाले हैं; जिनका एक बार हृदयमें ध्यान करते ही मनुष्य स्वयं तरकर दूसरोंको तारनेवाला बन जाता है ॥४॥ हे रघुनाथजी! आप कृपाके समुद्र हैं और चतुर हैं। आप शरणागतोंका दुःख दूर करनेवाले हैं। यह तुलसीदास (आपके उन चरणोंके) दर्शनकी आशा-रूपी प्याससे मरना चाहता है! (यदि शीघ्रातिशीघ्र आपके चरणोंका दर्शन न मिलो, तो वह अवश्य मर जायगा) ॥५॥ विशेष १—'बिप्रतिय'—अहिल्या; ४३ पदके विशेषमें देखिये। २—'नृग'—२१३ पदके विशेषमें देखिये। ३—'बधिक'—इसका अर्थ वियोगी हरिजीने 'निषाद' लिखा है। किन्तु यहाँ एक तो यह अर्थ ठीक नहीं जँचता, दूसरे इसका सीधा-सादा अर्थ भी यह नहीं है। यों तो भक्तोंमें कुछ भी भेद नहीं है तथापि राजा नृग और अहिल्याकी श्रेणीमें बाल्मीकिका आना तथा शबरी, अजामिल एवं गणिकाकी श्रेणीमें निषादका आना अधिक उत्तम जँचता है। इसलिए यहाँ बधिकका अर्थ 'निषाद' नहीं बल्कि बाल्मीकि करना ही ठीक प्रतीत होता है।

विनय-पत्रिका ३६७ [ २१९ ] द्वार हौं भोर ही को आजु । रटत रिरिहा आरि और न, कौर ही तें काजु ॥१. कलि कराल दुकाल दारुन, सब कुभाँति कुसाजु । नीच जन, मन ऊँच, जैसी कोढ़ में की खाजु ॥२॥ हहरि हिय में सदय बूझ्यो जाइ साधु-समाजु । मोहूँ से कहूँ कतहूँ कोउ, तिन्ह कह्यो कोसलराजु ॥३॥ दीनता-दारिद दलै को कृपाबारिधि बाजु । दानि दसरथराय के, तू बानइत सिरताजु ॥४॥ जनम को भूखो भिखारी हौं गरीबनिवाजु । पेट भरि तुलसिहि जेंवाइय भगति-सुधा सुनाजु ॥५॥ शब्दार्थ—रिरिहा = रिरियाने या गिड़गिड़ानेवाला । आरि = किनारा, घाट । हहरि = हारकर । सदय = कृपालु । बाजु = बिना, छोड़कर । बानइत = बाणैत, बानावाला । सुनाजु = सुन्दर अनाज, अच्छा भोजन । भावार्थ—आज मैं भोरहीसे दरवाजेपर हूँ और गिड़गिड़ाकर रट लगा रहा हूँ कि मेरे लिए और कोई घाट या जगह नहीं है, मुझे केवल कौरसे ही (भोजनसे ही) काम है ॥१॥ यह विकराल कलियुग दारुण दुर्भिक्ष रूप है; इसमें सब उपाय अथवा साधन बुरे हो गये हैं और कुसंग अर्थात् मन, बुद्धि इन्द्रिय आदिका व्यापार भी बुरा हो गया है। नीच आदमी हूँ और ऊँचा मन है; यह ठीक वैसे ही है, जैसे कोढ़ रोगमें खुजली । (अर्थात् जिस प्रकार कुष्ठ रोगमें खाज होनेपर न तो बिना खुजलाये रहा जाता है और न खुजलानेसे ही काम चलता है; क्योंकि खुजलाते ही कोढ़के घाव भभाने लगते हैं; उसी प्रकार नीच मनुष्यका ऊँचा मन भी है) ॥२॥ हृदयमें हार मानकर मैंने कृपालु-समाजमें जाकर पूछा कि कहिये तो सही मुझ सरीखोंके लिए भी कहीं कोई है ? साधु- समाजने कहा, कोशलेन्द्र श्रीरामजी हैं ॥३॥ कृपासागर भगवान् रामजीको छोड़कर दूसरा कौन दीनता और दरिद्रताका नाश कर सकता है ? अतः हे गरीब-निवाज, दशरथलला ! आप बाणैत-शिरोमणि और दानी हैं ॥४॥ और मैं

३६८ विनय-पत्रिका जन्मका भूखा भिखारी हूँ। इस (जन्मके भूखे) तुलसीदासको भक्तिरूपी अमृतके समान सुन्दर भोजन पेटभर खिला दीजिये ॥५॥ विशेष १—'रटत······काजु'—इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि—यह गिड़गिड़ानेवाला रट रहा है, इसे कौर या भोजनसे ही काम है; और किसी बातके लिए आरि (हठ) नहीं है। २—'बानइत सिरताजु'—का अर्थ 'बाना रखनेवालोंमें श्रेष्ठ' भी हो सकता है। [ २२० ] करिय सँभार, कोसलराय ! और ठौर न और गति, अवलंब नाम विहाय ॥१॥ बूझि अपनी आपनो हित आप बाप न माय । राम ! राउर नाम गुरु, सुर, स्वामि, सखा, सहाय ॥२॥ रामराज न चले मानस-मलिन के छल-छाय । कोप तेहि कलिकाल कायर मुएहि घालत घाय ॥३॥ लेत केहरि को बयर ज्यों भेक हनि गोमाय । त्योंहि राम-गुलाम जानि निकाम देत कुदाय ॥४॥ अकनि याके कपट-करतब, अमित अनय-अपाय । सुखी हरिपुर बसत होत परीच्छितहिं पछिताय ॥५॥ कृपासिंधु ! विलोकिये, जन-मनकी साँसति साय । सरन आयो, देव ! दीनदयालु ! देखन पाय ॥६॥ निकट बोलि न बरजिये, बलि जाउँ, हनिय न हाय । देखिहैं हनुमान गोमुख नाहरनि के न्याय ॥७॥ अरुन मुख, भ्रू विकट, पिंगल नयन रोष-कषाय । बोर सुमिरि समीर को घटिहै चपल चित चाय ॥८॥ बिनय सुनि बिहँसे अनुज सों बचन के कहि भाय । 'भली कही' कह्यो लषन हूँ हँसि, बने सकल बनाय ॥९॥

विनय-पत्रिका ३६९ दई दीनहिं दादि, सो सुनि सुजन-सदन बधाय । मिटे संकट सोच, पोच-प्रपंच, पाप-निकाय ॥१०॥ पेखि प्रीति-प्रतीति जनपर अगुन अनघ अमाय । दास तुलसी कहत मुनिगन, जयति जय उरुगाय ॥११॥ शब्दार्थ—विहाय = छोड़कर । वयर = वैर । भेक = मेढ़क । गोमाय = सियार । निकाम = व्यर्थ, निष्प्रयोजन । कुदाय = कुघात । अकनि = सुनकर, जानकर । साय = शान्त हो । नाहरनि = शेरों । पिंगल = पीला । कपाय = लाल । दादि = इन्साफ । पेखि = देखकर । अनघ = निष्पाप, पवित्र । अमाय = मायारहित । उरुगाय = विष्णु भगवान्‌का एक नाम । भावार्थ—हे कोशलेन्द्र ! मेरा सम्भार कीजिये । आपके नामको छोड़कर न तो मुझे और कोई ठौर है, और न दूसरी कोई गति ही है ॥१॥ अपनी (करनी) और अपना हित समझकर मैंने आपकीही शरण ली है, (क्योंकि ऐसी जघन्य करनीवालेका हित या उद्धार करनेवाला) दूसरा कोई माँ-बाप नहीं है । इसलिए हे रामजी ! मेरे लिए आपका नाम ही गुरु, देवता, स्वामी, मित्र और बल है ॥२॥ हे रामजी ! आपके राज्यमें कलियुगके मलिन मानसके छलकी छाया नहीं पड़ती; किन्तु यह कायर कलिकाल उसी क्रोधके कारण मुझ मरे हुएको भी घावोंसे घायल कर रहा है ॥३॥ जैसे गीदड़ किसी मेढकको मारकर सिंहका वैर लेता है, उसी प्रकार यह (कलि) मुझे आपका दास जानकर व्यर्थ ही बुरी तरह मार रहा है ॥४॥ यद्यपि राजा परीक्षित सुखसे वैकुण्ठमें निवास कर रहे हैं, पर इसके कपटपूर्ण कर्तव्यों, अगणित अनीतियों और विघ्न-बाधाओंको सुनकर वह भी पछता रहे हैं ॥५॥ हे कृपासिन्धु ! जरा इस दासके मनके क्लेशोंको देखिये । हे दीनदयालु देव ! (यह सेवक) आपके चरणोंका दर्शन करनेके लिए शरणमें आया है ॥६॥ हाय मैं आपकी बलैया लेता हूँ, आप उसे निकट बुलाकर मना न करें, उसे मारें भी न, (इसकी जरूरत नहीं है; केवल) हनुमान्‌जीको ही सहेज दीजिये, वह इसकी ओर वैसे ही देखेंगे, जैसे गायके मुखकी ओर शेर देखता है ॥७॥ पवनकुमारके लाल मुख, विकट भौंहों, क्रोधके कारण लाल हुए पीले नेत्रोंका स्मरण करते ही चंचल चित्तवाले कलिका चाव कम हो जायगा ॥८॥ मेरी विनय सुनकर श्रीरामजी अपने छोटे भाई लक्ष्मणसे इन बातोंका असली भाव कहकर हँस पड़े । लक्ष्मणजीने भी हँसकर कहा कि खूब कहा है । २४

३७० विनय-पत्रिका बस, अब मेरी सब बात बन गयी ॥९॥ इस दीनको भगवान् रामचन्द्रजीने दाद दी है, यह सुनकर सन्तोंके घरमें बधाई बजने लगी । संकट, शोक, क्षुद्र प्रपंच और पाप-समूह ये सब मिट गये ॥१०॥ निर्गुण, पवित्र और माया-रहित रामजी- का इस दासपर प्रेम और विश्वास देखकर हे तुलसीदास ! मुनि कहने लगे कि महान् यशस्वी भगवान्‌की जय हो, जय हो ॥११॥ विशेष १—'परीछितहिं पछिताय'—एक बार महाराज परीक्षित्‌ने शिकार खेलनेके लिए वनमें जाकर देखा, एक काला पुरुष हाथमें मूसल लिये एक गाय और लँगड़े बैलको खदेड़ रहा था। पूछनेपर उन्हें मालूम हुआ कि काला पुरुष कलि- युग है, गाय पृथिवी है और बैल धर्म है। महाराजने क्रुद्ध होकर कलियुगको मारनेके लिए तलवार निकाल ली। काला पुरुष भयभीत होकर उनके पैरोंपर गिर पड़ा। महाराजने उसे शरणमें आया जानकर छोड़ दिया और चौदह स्थानोंमें रहनेके लिए आज्ञा दे दी। उनमें एक सुवर्ण भी था। महाराजके सिरपर सोनेका मुकुट था, अतः कलि उनके सिरपर भी सवार हो गया। परिणाम यह हुआ कि राजाने कलिके प्रभावसे एक ध्यानावस्थित ऋषिके गलेमें मरा हुआ सर्प डाल दिया। इसपर मुनिके पुत्रने राजाको शाप दिया कि मेरे पिताके गलेमें सर्प डालनेवाला मनुष्य आजसे सातवें दिन तक्षक सर्पके काटने- से मर जायगा। अस्तु, वही पश्चात्ताप राजाको बना रह गया कि मैंने कलिपर दया क्यों की ? यह कथा श्रीमद्भागवत पुराणमें है। २—'बिनय सुनि'—से लेकर इस पदके अन्ततक कविने अपने मनोराज्यमें विचरण किया है। काव्यकला और पाण्डित्यकी अपूर्व झलक है। ३—'बिहँसे'—गोस्वामीजीने हर जगह अत्यन्त रहस्यपूर्ण बातोंपर ही भगवान्‌का विहँसना या मुसकराना लिखा है। जैसे सुग्रीवकी उक्तिपर रामजीका हँसना गोस्वामीजीने लिखा है:— 'तब रघुपति बोले मुसुकाई।' [२२१] नाथ ! कृपा ही को पन्थ चितवत दीन हौं दिनराति। होइ धौं केहि काल दीनदयालु ! जानि न जाति ॥१॥

विनय-पत्रिका ३७१ सुगुन, ग्यान-विराग-भगति, सु-साधननि की पाँति। भजे विकल बिलोकि कलि अघ अवगुननि की थाति ॥२॥ अति अनीति-कुरीति भइ भुइँ तरनि हूँ ते ताति। जाउँ कहाँ ? बलि जाउँ, कहूँ न ठाउँ, मति अकुलाति ॥३॥ आप सहित न आपनो कोड, बाप ! कठिन कुभाँति। स्यामघन ! सींचिये तुलसी, सालि सफल सुखाति ॥४॥ शब्दार्थ—थाति = अमानत, धरोहर। ताति = तप्त। सालि = धान। सफल = फलके सहित, फूटा हुआ। भावार्थ—हे नाथ ! मैं दीन हूँ, दिन-रात आपकी ही कृपाकी बाट देखता रहता हूँ। हे दीनदयालु ! आपकी कृपा किस समय होगी, जाना नहीं जाता ॥१॥ सुन्दर गुण, ज्ञान, वैराग्य, भक्ति और सुन्दर साधनोंके समूह पापों और अवगुणोंकी थाती स्वरूप कलिको देखते ही व्याकुल होकर भाग गये ॥२॥ अत्यन्त अनीति और कुरीतियोंके कारण यह पृथिवी सूर्यसे भी अधिक तप्त हो गयी है। मैं आपकी बलि जाऊँ नाथ ! कहाँ जाऊँ ? कहीं भी ठिकाना नहीं है। बुद्धि घबरा रही है ॥३॥ हे पिताजी ! जो अपना है (जैसे शरीर), वह भी अपने साथ नहीं (अर्थात् वह भी साथ छोड़ देता है)। कठिन (बेढब) बुरी रीति है। हे घनश्याम ! तुलसीरूपी फूटे हुए धानकी खेती सूखी जा रही है, उसे सींचिये ॥४॥ [ २२२ ] बलि जाउँ, और कासों कहौं ? सद्गुनसिंधु स्वामि सेवक-हितु कहूँ न कृपानिधि-सो लहौं ॥१॥ जहँ जहँ लोभ-लोल लालचबस निजहित चित चाहनि चहौं। तहँ तहँ तरनि तकत उलूक ज्यों भटकि कुतरु-कोटर गहौं ॥२॥ काल-सुभाउ-करम बिचित्र फलदायक सुनि सिर धुनि रहौं। मोको तौ सकल सदा एकहि रस दुसह दाह दारुन दहौं ॥३॥ उचित अनाथ होइ दुख-भाजन भयो नाथ ! किंकर न हौं। अब रावरो कहाइ न बूझिये, सरनपाल ! साँसति सहौं ॥४॥

३७२ विनय-पत्रिका महाराज ! राजीवविलोचन ! मगन पाप-संताप हौं । तुलसी प्रभु ! जब तब जेहि तेहि बिधि राम निबाहे निरबहौं ॥५॥ शब्दार्थ—लोल = चंचल । तरनि = सूर्य । बूझिये = चाहिये । भावार्थ—बलिहारी ! (हे नाथ ! मैं अपना दुःख) और किससे कहूँ ? हे कृपानिधान ! आपके समान सद्गुणोंका समुद्र तथा सेवकोंका हितू स्वामी मुझे कहीं नहीं मिल सकता ॥१॥ जहाँ-जहाँ लोभसे चंचल और लालचवश चित्तमें अपने हितकी कामना करता हूँ, वहाँ वहाँसे मैं इस तरह निराश होकर लौट आता हूँ, जैसे सूर्यको देखते ही उल्लू भटकता हुआ आकर कुत्सित पेड़के कोटरका आश्रय लेता है (अर्थात् जैसे उल्लू भोजनके निमित्त जहाँ-तहाँ भटकता फिरता है, किन्तु सूर्यकी लालिमा दिखाई पड़ते ही उसका अनेक मनोरथ निवृत्त हो जाता है और वह वृक्षके कोटरमें घुस जाता है, उसी प्रकार मैं भी जीविकाके लोभसे ऐश्वर्यवानोंके पास जाता हूँ, पर सूर्यके समान उनके क्रूर स्वभावका परिचय पाते ही कोटरके समान अपने निवासस्थानपर लौट आता हूँ) ॥२॥ काल, स्वभाव और कर्म विचित्र फल देनेवाले हैं, यह सुनकर मैं सिर पटककर रह जाता हूँ; क्योंकि मेरे लिए तो ये तीनों सदैव एक रस हैं, मैं तो सदैव दुःसह और भयंकर ज्वालासे जला करता हूँ ॥३॥ हे नाथ ! अबतक मैं अनाथ था, आपका दास नहीं हुआ था, अतः दुःखोंका पात्र बन रहा था, यह उचित ही था; किन्तु हे शरणागतपालक ! अब मैं आपका कहाकर भी दुःख भोगूँ, ऐसा आपको नहीं चाहिये ॥४॥ हे महाराज ! हे कमलनेत्र ! मैं पाप- सन्तापमें डूबा हुआ हूँ । हे प्रभो ! हे रामजी ! तुलसीका निर्वाह तभी होगा, जब आप येनकेन प्रकारेण निर्वाह करेंगे ॥५॥ [ २२३ ] आपनो कबहुँ करि जानिहौ । राम गरीवनिवाज राज-मनि, बिरद-लाज उर आनिहौ ॥१॥ सील-सिन्धु, सुन्दर, सब लायक, समरथ, सदगुन-खानि हौ। पाल्यो है, पालत, पालहुगे प्रभु, प्रनत-प्रेम पहिचानि हौ ॥२॥

विनय-पत्रिका ३७३ बेद-पुरान कहत, जग जानत, दीनदयालु दिन-दानि हौ। कहि आवत, बलि जाउँ, मनहुँ मेरी बार बिसारे बानि हौ ॥३॥ आरत-दीन अनाथनि के हित मानत लौकिक कानि हौ। है परिनाम भलो तुलसी को सरनागत-भय भानिहौ ॥४॥ शब्दार्थ— बानि = आदत, स्वभाव। कानि = लज्जा, प्रतिष्ठा। भानिहौ = नष्ट करोगे। भावार्थ— हे नाथ ! क्या कभी आप मुझे अपना समझेंगे ? हे गरीबोंको निहाल करनेवाले राज-राजेश्वर श्रीरामजी ! क्या कभी आप अपने बानेकी लाज रखनेपर ध्यान देंगे ? ॥१॥ आप शीलके समुद्र, सुन्दर, सब-कुछ करने योग्य, समर्थ और सद्गुणोंकी खानि हैं। हे प्रभो ! आपने ही पालन किया है, पालन कर रहे हैं और पालन करेंगे; अतः क्या कभी आप इस शरणागतका प्रेम पह- चानेंगे ? वेद और पुराण कहते हैं, तथा संसार जानता है कि आप दीनोंपर दया करनेवाले और प्रतिदिन उन्हें कल्याणदान देनेवाले हैं। किन्तु (मुझे विवश होकर) कहना पड़ता है, बलैया लेता हूँ, आपने मानो मेरी बार अपनी आदतको भुला दिया है ॥३॥ अब आप आर्त, दीन और अनाथोंका हित करनेमें लौकिक लज्जा मान रहे हैं ! अर्थात् यह सोच रहे हैं कि तुलसी-सरीखे घोर पातकीका उद्धार करनेमें बड़ी बदनामी होगी ? कुछ भी हो, तुलसीदास- का तो परिणाम अच्छा ही है, क्योंकि अन्तमें तो आप इस शरणागतका संसार- भय नष्ट करेंगे ही ॥४॥ [ २२४ ] रघुबरहिं कबहुँ मन लागिहै ? कुपथ, कुचाल, कुमति, कुमनोरथ, कुटिल कपट कब त्यागिहै ॥१॥ जानत गरल अमिय विमोहबस, अमिय गनत करि आगिहै। उलटी रीति-प्रीति अपनेकी तजि प्रभुपद अनुरागिहै ॥२॥ आखर अरथ मंजु मृदु मोदक राम-प्रेम-पाग पागिहै। ऐसे गुन गाइ रिझाइ स्वामिसों पाइहै जो मुँह मागिहै ॥३॥ तू यहि विधि सुख-सयन सोइहै, जियकी जरनि भूरि भागिहै। राम-प्रसाद दासतुलसी उर राम-भगति-जो जागिहै ॥४॥

३७४ विनय-पत्रिका शब्दार्थ—गरल = विष। अमिय = अमृत। भूरि = बहुत। भावार्थ—क्या कभी मेरा मन श्रीरामजीमें लगेगा? वह कुमार्ग, कुचाल, कुबुद्धि, बुरी कामना और कुटिल कपट कब छोड़ेगा? ॥१॥ अज्ञानके कारण (मेरा मन) विष-(विषय-वासनाओं) को तो अमृत समझ रहा है और अमृत- (ईश्वर-भजन) को आग जान रहा है। क्या वह अपनी इस उलटी रीति और अपनोंकी (झूठी) प्रीति छोड़कर भगवान्‌के चरणोंमें अनुराग करेगा? ॥२॥ क्या वह (राम नामके) सुन्दर और कोमल अर्थरूपी मोदकको रामजीके प्रेम- रूपी चाशनीमें पागेगा? (अर्थात् क्या वह कभी प्रेमपूर्ण हृदयमें अर्थ-सहित राम-नामका जप करेगा?) इस प्रकार अपने स्वामीके गुण गा-गाकर रिझा लेनेपर रे मन! तू अपने मुँहसे जो कुछ भी माँगेगा, वही उनसे पा जायगा ॥३॥ ऐसा करनेसे तू सुखकी नींद सोयेगा (सद्गतिको प्राप्त हो जायगा), और तेरे हृदयकी गहरी जलन दूर हो जायेगी। हे तुलसीदास! श्रीरामजीके प्रसादसे तेरे हृदयमें रामजीका प्रेमरूप योग जागृत हो जायगा ॥४॥ विशेष १—'कुपथ'....'त्यागिहै'—यथार्थतः मानव-देहकी सार्थकता इन सबके छोड़नेमें ही है। दुर्लभ मनुष्य-शरीर व्यर्थ खोनेके लिए नहीं है। देखिये:— दुर्लभ या नर देह अमोलक पाइ अजान अकारथ खोवै। सो मति हीन बिबेक बिना नर साज मतंगहिं ईंधन ढोवै॥ कंचन-भाजन धूरि भरै सठ मूढ़ सुधारस सौं पग धोवै। बोहित काग उड़ावन कारन डारि महा मनि मूरख रोवै॥ —अलंकार-आशय। [ २२५ ] भरोसो और आइहै उर ताके। कै कहुँ लहै जो रामहि-सो साहिब, कै अपनो बल जाके ॥१॥ कै कलिकाल कराल न सूझत, मोह-मार-मद छाके। कै सुनि स्वामि-सुभाउ न रह्यो चित, जो हित सब अँग थाके ॥२॥

विनय-पत्रिका ३७५ हौं जानत भलिभाँति अपनपौ, प्रभु-सो सुन्यो न साके । उपल, भील, खग, मृग, रजनीचर, भले भये करतब काके ॥३॥ मोको भलो राम-नाम सुरतरु-सो, रामप्रसाद कृपालु कृपा के । तुलसी सुखी निसोच राज ज्यों बालक माय-बवाके ॥४॥ शब्दार्थ—छाके = छका हुआ । सब अंग = सब तरहसे । साके = कीर्ति । उपल = पत्थर । बबा = बाप । भावार्थ—उसी मनुष्यके हृदयमें और किसीका भरोसा होगा, जिसे या तो कहीं राम-सरीखा स्वामी मिल गया हो, अथवा जिसे अपना बल हो ॥१॥ अथवा मोह, काम और मदसे छका रहनेके कारण जिसे कराल कलिकाल न सूझ पड़ता हो या सब प्रकारसे थके हुए (सब साधनोंसे हीन) लोगोंके हितकारी स्वामी श्रीरामजीका स्वभाव सुनकर भी जिसे उसका स्मरण न हो ॥२॥ किन्तु मैं अपना पौरुष भली भाँति जानता हूँ, और मैंने श्रीरामजीके समान और किसीकी कीर्ति भी नहीं सुनी है। पाषाणी (अहिल्या), भील, पक्षी, मृग (मारीच) और राक्षस इनमें किसका कर्म उत्तम हुआ था ? ॥३॥ कृपालु रामजीकी कृपाके प्रसादसे मेरे लिए तो राम-नाम ही कल्पवृक्षके समान अच्छा है । अब यह तुलसी वैसे ही निश्चिन्त और सुखी है जैसे माँ-बापके राज्यमें बालक ॥४॥ विशेष १—'उपल'—अहिल्या; ४३ पदके विशेषमें देखिये । २—'भील'—निषाद; १०६ पदके विशेषमें देखिये । ३—'खग'—जटायु; २१५ पदके विशेषमें देखिये । ४—'मृग'—मारीच; यह रावणका मामा था । रावणके कहनेसे यह माया- मृग बनकर पंचवटीमें गया । इसका मनोहर रूप देखकर सीताजीने इसका चर्म लेनेकी इच्छा प्रकट की । जब भगवान् इसे मारनेको गये और पश्चात् इसकी मृत्युका आर्त्तनाद सुनकर जानकीजीने लक्ष्मणजीको वहाँ भेज दिया, तब अवसर पाकर रावण जानकीजीके पास आया और उन्हें लेकर लङ्कामें चला गया । मारीच स्वयं तो भगवद्भक्त था, किन्तु रावणकी आज्ञासे उसे ऐसा करना पड़ा था ।

३७६ विनय-पत्रिका [ २२६ ] भरोसो जाहि दूसरो सो करो । मोको तो राम को नाम कलपतरु कलि कल्यान फरो ॥१॥ करम उपासन, ग्यान, वेदमत, सो सब भाँति खरो । मोहि तो सावन के अंधहि, ज्यों सूझत रंग हरो ॥२॥ चाटत रह्यो स्वान पातरि ज्यों कवहूँ न पेट भरो । सो हौं सुमिरत नाम सुधारस पेखत परसि धरो ॥३॥ स्वारथ औ परमारथ हू को नहिं कुंजरो-नरो । सुनियत सेतु पयोधि पखाननि करि कपि-कटक तरो ॥४॥ प्रीति-प्रतीति जहाँ जाकी, तहँ ताको काज सरो । मेरे तो माय-बाप दोउ आखर, हौं सिसु-अरनि अरो ॥५॥ संकरु साखि जो राखि कहौं कछु तौ जरि जीह गरो । अपनो भलो राम-नामहिं तें तुलसिहि समुझि परो ॥६॥ शब्दार्थ—पेखत = देखता हूँ। परसि = स्पर्श करके । कटक = सेना । सरो = पूरा होता है । अरनि = हठ । भावार्थ—जिसे दूसरा कोई भरोसा हो, वह (और कुछ) करे । मेरे लिए तो इस कलिमें राम-नामरूपी कल्पवृक्ष ही कल्याणका फल फला हुआ है ॥१॥ कर्मकांड, उपासनाकांड, ज्ञानकांड ये त्रिकांड वेद सम्मत हैं और सब प्रकारसे खरे हैं; पर मुझे तो सावनके अन्धेकी भाँति हरियाली ही दिखाई पड़ रही है (अर्थात् चारों ओर राम-नाममें ही भलाई दिखाई पड़ रही है) ॥२॥ पहले मैं कुत्तेकी तरह पत्तल चाटता रहा, कभी पेट न भरा; किन्तु अब वही मैं रामनाम- का स्मरण करते ही अमृत-रस परोसकर रखा हुआ देखता हूँ। भाव यह कि पहले मैंने बहुतसे साधन किये, पर कामना न मिटी; किन्तु राम-नामके प्रभावसे मुझे अमृत-रस अर्थात् अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष परोसा हुआ दिखाई पड़ रहा है, और उसे लेनेकी इच्छा नहीं हो रही है ॥३॥ स्वार्थ और परमार्थ दोनोंकी प्राप्तिके लिए मैं 'नरो कुंजरो' कुछ नहीं कह सकता (अर्थात् दोनों ही मेरे सामने परोसे हुए रखे हैं, पर मैं 'नरो-कुंजरो' कुछ नहीं कहता यानी एकको

भी नहीं चाहता)। सुना है कि नामके ही प्रभावसे बानरी सेना पत्थरोंका पुल बनाकर समुद्र पार कर गयी थी। अर्थात् जिस नामकी इतनी बड़ी महिमा है, उसे छोड़कर मैं स्वार्थ और परमार्थके बखेड़ेमें क्यों पहूँ ? ॥४॥ जहाँ जिसका प्रेम और विश्वास है, वहीं उसका काम पूरा होता है। मेरे माँ-बाप तो राम-नामके दोनों अक्षर ही हैं—इन्हींके आगे मैं बाल-हठसे अड़ा हुआ हूँ ॥५॥ इसमें यदि मैं कुछ छिपाकर कहता होऊँ, तो शिवजी साक्षी हैं मेरी जीभ जल जाय या गल जाय। तुलसीको तो अपना भला राम-नामसे ही समझ पड़ा है ॥६॥

विशेष १—'नहि कुंजरो नरो'—भगवान्ने महाभारत युद्धमें द्रोणाचार्यका बध कराना आवश्यक समझा। अतः भीमसेनने अश्वत्थामा नामके हाथीको मार डाला। द्रोणाचार्यके प्रिय पुत्रका नाम भी अश्वत्थामा था। अश्वत्थामाके मारे जानेका हाल पाकर द्रोणने युधिष्ठिरसे पूछा कि कौन मारा गया है ? उन्होंने सोचा कि युधिष्ठिर झूठ न बोलेंगे। धर्मराजने कहा—'अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो वा।' अर्थात् अश्वत्थामा मारा गया, मनुष्य या हाथी। उन्होंने 'मनुष्य' तो जोरसे कहा, पर 'हाथी' धीरेसे कहा। प्रिय पुत्रके मरनेका समा- चार सुनकर ज्यों ही द्रोणाचार्य मूर्च्छित-से हुए, त्यों ही धृष्टद्युम्नने उनका मस्तक काट लिया। तभीसे 'नरो-कुंजरो' का प्रयोग बोल-चालमें होने लगा है।

[ २२७ ] नाम, राम रावरोई हित मेरे। स्वारथ परमारथ साथिन्ह सों भुज उठाइ कहौं टेरे ॥१॥ जननी-जनक तज्यो जनमि, करम बिनु बिधिहु सृज्यो अवडेरे। मोहुँसे कोउ कोउ कहत रामहि को, सो प्रसंग केहि केरे ॥२॥ फिऱ्यो ललात बिनु नाम उदर लगि, दुखउ दुखित मोहिं हेरे। नाम-प्रसाद लहत रसाल-फल अब हौं बबुर बहेरे ॥३॥ साधत साधु लोक परलोकहिं, सुनि गुनि जतन घनेरे। तुलसी के अवलम्ब नाम को, एक गाँठि कइ फेरे ॥४॥

३७८ विनय-पत्रिका शब्दार्थ—टेरे=पुकारकर। अवडेरे=बेढंगा। हेरे=देखकर । रसाल=आम। बहेरे=बहेड़ा । भावार्थ—हे रामजी ! मेरे लिए तो (बस) आपका नाम ही है। यह बात मैं स्वार्थ और परमार्थके साथियोंसे हाथ उठाकर तथा पुकारकर कहता हूँ ॥१॥ माता-पिताने तो मुझे उत्पन्न करते ही त्याग दिया, ब्रह्माने भी मुझे भाग्यहीन और बेढब-सा बनाया। इतनेपर भी मेरे जैसेको कोई-कोई रामजीका ही कहते हैं, सो किसके नातेसे ? ॥२॥ बिना रामनामके मैं पेटके लिए ललाता फिरा; मुझे देखकर दुःख भी दुःखित था। किन्तु अब नामके प्रसादसे मुझे बबूर और बहेड़ेके वृक्षसे आमके फल मिल रहे हैं। अर्थात् मेरे कर्म तो ऐसे हैं कि मैं बहुत कटु फल पाऊँ, पर राम-नामके प्रसादसे मुझे उन नीच कर्मोंका भी अच्छा फल मिल रहा है; या जो संसार पहले मुझे दुःखमय भास रहा था, वही अब सिया-राममय दिखनेके कारण आनन्दमय प्रतीत हो रहा है ॥३॥ साधु लोग सुन और समझकर नाना प्रकारके यत्नोंसे अपना लोक और परलोक साधते हैं; किन्तु तुलसीको तो एक रामनामका ही अवलम्ब है; जैसे एक गाँठ हो और फेरे बहुतसे हों (इसी प्रकार साधन चाहे जितने हों, पर सबका आधार केवल राम-नाम ही है) ॥४॥ विशेष १—'बबुर बहेरे'—श्री बैजनाथजीने इसका यह अर्थ लिखा है—'बबुर बहेराके वृक्ष तें रसाल फल पायो भाव पूर्व पिशाचै सिद्धि द्वारा भक्ति लाभ भई, यह भक्तमालमें प्रसिद्ध है।' [२२८] प्रिय राम-नाम तें जाहि न रामो। ताको भलो कठिन कलिकालहूँ आदि-मध्य-परिनामो ॥१॥ सकुचत समुझि नाम-महिमा मद-लोभ-मोह-कोह-कामो। राम-नाम-जप-निरत सुजन पर करत छाँह घोर घामो ॥२॥ नाम-प्रभाउ सही जो कहै कोउ सिला सरोरुह जामो। सो सुनि सुमिरि भाग-भाजन भइ सुकृतसील भील भामो ॥३॥

विनय-पत्रिका ३७९ बाल्मीकि-अजामिलके कछु हुतो न साधन सामो। उलटे-पलटे नाम-महातम गुंजनि जितो ललामो ॥४॥ राम तें अधिक नाम-करतब, जेहि किये नगर-गत गामो। भये बजाइ दाहिने जो जपि तुलसिदास से वामो ॥५॥ शब्दार्थ—परिनामो = अन्त। सरोरुह = कमल। जामो = जम उठा, उगा। भामो = स्त्री। सामो = सामान। गुंजनि = घुँघचियाँ। ललामो = रत्न, माणिक। भावार्थ—जिसे रामजी भी रामनामकी अपेक्षा अधिक प्रिय नहीं हैं, उसका इस कठिन कलिकालमें भी आदि, मध्य और अन्त अच्छा है ॥१॥ नामकी महिमा समझकर काम, क्रोध, लोभ, मोह और मद सकुच जाते हैं। राम-नामके जपमें रत रहनेवाले सज्जनोंपर कड़ी धूप भी छाया कर देती है ॥२॥ यदि कोई कहे कि राम-नामके प्रभावसे पत्थरपर कमल उगा है, तो वह भी ठीक है। क्योंकि उसी नामके सुनने और स्मरण करनेसे भीलनी शबरी सुकृतशीला और भाग्यवती हो गयी थी ॥३॥ वाल्मीकि और अजामिलके पास तो साधनका कोई भी सामान नहीं था। किन्तु नामके माहात्म्यसे उलट-पुलटमें ही घुँघचियोंने रत्नको जीत लिया ॥४॥ नामकी प्रभुता श्रीरामजीसे अधिक है, क्योंकि उसने गाँवको शहर बना दिया (अर्थात् मूर्खको चतुर बना दिया); या देहातमें रहनेवाले उजड़े हुएको शहरमें लाकर प्रतिष्ठित कर दिया और जिसे जपकर तुलसीदासके समान विमुख प्राणी भी डंकेकी चोट सम्मुख हो गये ॥५॥ विशेष १—'उलटे पलटे'—यहाँ 'उलटे' शब्द महर्षि वाल्मीकिके लिए और 'पलटे' शब्द अजामिलके लिए लिखा जान पड़ता है। यानी वाल्मीकि तो उलटा नाम जपकर तर गये और अजामिल पुत्रके बहाने 'नारायण' नाम उच्चारण करके मुक्त हो गया। किन्तु उलटे नामकी कथा प्राचीन ग्रन्थोंमें नहीं पायी जाती। संस्कृतके अनुसार 'मरा' शब्दका कुछ अर्थ भी नहीं होता। वैसे 'मरा' शब्द यदि वार-बार कहा जाय तो उसकी ध्वनि 'राम'में बदल जाती है। 'उलटा नाम जपत जग जाना। वाल्मीकि भे ब्रह्म समाना।' इसमें कविका यह आशय जान पड़ता है कि 'अहिंसा परमो धर्मः' या जीवोंकी रक्षा करना तो सीधा