भारतकोश
संग्रह पर लौटें

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

( १२६ ) २०. यदि सूर्य रेखा हाथ में नहीं हो तो उस व्यक्ति का जीवन लगभग बेकार रहता है । २१. यदि सूर्य रेखा पर वर्ग का चिह्न हो तो उसे जीवन में कई बार अपमान सहन करना पडता है । २२. यदि दोनों ही हाथों में यह रेखा जीवन रेखा से प्रारम्भ होती हो तो वह कला के माध्यम से सफलता प्राप्त करता है । २३. यदि सूर्य रेखा का अन्त दो धाराओं से होता हो या अन्त में यह रेखाएं दो भागों में बंट जाती हो तो समाज में उसे सम्मान नहीं मिलता । २४. यदि सूर्य रेखा के साथ-साथ कई ओर सहायक रेखाएं दिखाई दें तो वह जीवन में आश्चर्यजनक प्रगति प्राप्त करता है । २५. यदि विवाह रेखा के द्वारा सूर्य रेखा कटी हुई हो तो उसका गृहस्थ- जीवन पूर्णतः दुखदायी होता है । २६. यदि सूर्य रेखा से कोई एक रेखा मस्तिष्क रेखा की ओर जाती हो तो उसे जीवन में पूर्ण धन-लाभ रहता है । २७. यदि इस रेखा पर चतुर्भुज का चिह्न हो तो उसे प्रारम्भ में बहुत ज्यादा असफलताएं मिलती हैं परन्तु अन्त में पूर्ण सफलता मिल जाती है । २८. यदि इस रेखा को तीन-चार रेखाएं काटती हों तो वह जीवन में किसी भी कार्य में सफल नहीं होता । २६. यदि शनि पर्वत से कोई रेखा निकलकर सूर्य रेखा को काटती हो तो आर्थिक कमी की वजह से वह जीवन में सफल नहीं हो पाता । ३०. यदि यह रेखा स्पष्ट हो पर साथ में कुछ लहरदार रेखाएं दिखाई दें तो उस व्यक्ति की प्रतिभा का कोई उपयोग नहीं होता । ३१. यदि सूर्य रेखा गहरी हो और इसके दोनों ओर जो सहायक रेखाएं चल रही हो तो उस व्यक्ति को उच्चस्तरीय सम्मान मिलता है । ३२. यदि सूर्य रेखा से कोई शाखा निकलकर शनि पर्वत की ओर जाती है तो उस पर्वत के विशेष गुण व्यक्ति को प्राप्त होते हैं । ३३. यदि सूर्य रेखा से कोई शाखा निकलकर गुरु पर्वत पर पहुंचे तो उस व्यक्ति को जीवन में श्रेष्ठ राज्य पद प्राप्त होते है । ३४. यदि इस रेखा के आस-पास बहुत सी छोटी-छोटी रेखाएं दिखाई दें तो उसके जीवन में आर्थिक बाधा रहती है । ३५. यदि हृदय रेखा से निकलकर कोई शाखा त्रिशूल वत बन कर सूर्य रेखा को स्पर्श करे, तो ऐसा व्यक्ति अपने जीवन में स्वयं के प्रयत्नों से ही सफलता प्राप्त करता है ।

( १३० ) ३६. यदि अनामिका उंगली टेढ़ी-मेढ़ी हो पर सूर्य रेखा स्पष्ट हो तो उसे अपराध पूर्ण कार्यों से यश मिलता है । ३७. यदि सूर्य रेखा के अन्त में तीन रेखाएं दिखाई दें तो उसके जीवन में आर्थिक दृष्टि से कोई कमी नहीं रहती । ३८. यदि यह रेखा बार-बार टूट कर बढ़ रही हो तो वह अपने आलस्य के कारण ही सफलता प्राप्त नहीं कर पाता है । ३६. यदि यह रेखा जंजीरदार हो तो उस व्यक्ति के जीवन में काफी बाधाएं रहती हैं। ४०. यदि यह रेखा टेढ़ी-मेढ़ी हो तो उस व्यक्ति के कार्य ही उसके जीवन में बाधाएं उत्पन्न करते हैं । ४१. यदि हथेली में भाग्य रेखा तथा सूर्य रेखा दोनों ही श्रेष्ठ हों तो उसका जीवन सभी दृष्टियों से श्रेष्ठ होता है । ४२. यदि रेखा के अन्त में द्वीप हो तो वह जीवन-भर बीमार बना रहता है वस्तुतः सूर्य रेखा व्यक्ति के जीवन को और उसके भाग्य को समझने के लिए बहुत अधिक उपयोगी है । अतः हस्तरेखा विशेषज्ञ को सूर्य रेखा का अत्यन्त सूक्ष्मता से और गहराई से अध्ययन करना चाहिए ।

भाग्य रेखा यदि मानव के जीवन में सब कुछ होता है पर यदि उसका भाग्य साथ नहीं देता है तो एक प्रकार से उसका पूरा जीवन व्यर्थ कहा जाता है। चाहे व्यक्ति के पास भव्य व्यक्तित्व, हो चाहे हृदय से वह कितना ही उदार हो, चाहे स्वास्थ्य की दृष्टि से उसमें सभी प्रकार की श्रेष्ठता हो, परन्तु यदि उसका भाग्य उसे साथ नहीं देता है तो उसका जीवन एक प्रकार से निष्क्रिय हो जाता है। कहा जाता है कि यदि व्यक्ति का भाग्य साथ देता हो और यदि वह मिट्टी भी छू ले तो वह सोना बन जाती है। इसके विपरीत यदि भाग्य साथ नहीं देता तो सोने को भी स्पर्श करने पर वह मिट्टी के समान हो जाता है। वस्तुतः जीवन में भाग्य का महत्त्व सबसे अधिक माना गया है। इसीलिए हाथ में भी भाग्य रेखा या प्रारब्ध रेखा को महत्त्व दिया जाता है। अंग्रेजी में इसे 'फेट लाइन' कहते हैं। यह रेखा जितनी अधिक गहरी, स्पष्ट और निर्दोष होती है उसका भाग्य उतना ही ज्यादा श्रेष्ठ कहा जाता है। यदि व्यक्ति के हाथ में सभी रेखाएं दूषित एवं कमजोर हो परन्तु यदि उसकी भाग्य रेखा अपने आप में अत्यन्त श्रेष्ठ हो तो यह बात निश्चित है कि उसकी ये सारे दुर्गुण छिप जाते हैं और वह जीवन में पूर्ण प्रगति करने में समर्थ हो पाता है। अतः हस्त रेखा विशेषज्ञ को चाहिए कि वह हथेली का अध्ययन करते समय भाग्य रेखा का सावधानी से अध्ययन करे। सभी हाथों में यह भाग्य रेखा नहीं पाई जाती है और मेरा तो यह अनुभव है कि लगभग ५० प्रतिशत हाथों में भाग्य रेखा का अभाव ही होता है। परन्तु मेरे कथन का यह अभिप्राय नहीं लिया जाना चाहिए कि जिसके हाथ में भाग्य रेखा नहीं होती वह व्यक्ति भाग्यहीन होता है। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि भाग्य रेखा के अभाव में प्रयत्न करने पर भी व्यक्ति को पूर्ण सफलता नहीं मिल पाती। भाग्य रेखा होने से व्यक्ति थोड़ी-सी प्रतिभा और परिश्रम से ही कार्य को अपने मनोनुकूल बना लेता है। इस रेखा को शनि रेखा भी कहा जाता है क्योंकि इस रेखा की समाप्ति शनि पर्वत पर होती है। यद्यपि यह रेखा व्यक्ति के हाथों में अलग-अलग स्थानों से प्रारम्भ होती है परन्तु इस रेखा की समाप्ति शनि पर्वत पर ही होती देखी गई है। इसलिए भी इसको शनि रेखा के नाम से पुकारते हैं।

( १३२ ) जिन हाथों में यह रेखा कमजोर होती है या नहीं होती है उन व्यक्तियों की उन्नति तो होती है परन्तु उनकी उन्नति में भाइयों, सम्बन्धियों या रिश्तेदारों का किसी प्रकार का कोई सहयोग उसे उसके जीवन में नहीं मिलता । इस प्रकार से वह जो भी प्रगति करता है स्वयं के प्रयत्नों से ही कर पाता है। ऐसे लोगों को न तो समाज से किसी प्रकार का कोई सहयोग मिलता है और न परिवार से ही सहायता मिलती है । जिन लोगों के हाथों में शनि रेखा का अभाव हो तो यह समझ लेना चाहिए कि इसके जीवन में जो भी दिखाई दे रहा है वह सब इसके प्रयत्नों से ही संभव हुआ है । यह रेखा नीचे से ऊपर की ओर बढ़ती है जैसा कि मैंने स्पष्ट किया है कि हथेली में इस रेखा के उद्गम स्थान अलग-अलग होते हैं परन्तु इस रेखा की समाप्ति शनि पर्वत पर ही जाकर होती है। इस रेखा के माध्यम से मानव की इच्छाएं, भावनाएं उसका बौद्धिक एवं मानसिक स्तर तथा उसकी क्षमताओं का अनुमान हो जाता है । भाग्य रेखा के माध्यम से यह जाना जा सकता है कि यह व्यक्ति जीवन में कितनी प्रगति करेगा। इसके जीवन में आर्थिक दृष्टि से क्या स्थिति होगी ? क्या इसको जीवन, में धन, मान, पद प्रतिष्ठा आदि मिल सकेंगे ? क्या इसका जीवन परेशानियों से भरा हुआ है ? क्या यह व्यक्ति अपने जीवन में इन बाधाओं को पार कर सफलता प्राप्त कर सकता है ? ये सारे तथ्य भाग्य रेखा के माध्यम से ही जाने जा सकते हैं । मध्यमा उंगली के मूल में शनि पर्वत होता है । हथेली के किसी भी स्थान से कोई भी रेखा प्रारम्भ होकर शनि पर्वत को स्पर्श कर लेती है तो वह भाग्य रेखा कहलाने लगती है । हथेली के भिन्न-भिन्न स्थानों से प्रारंभ होने के कारण भाग्य रेखा का महत्त्व भी भिन्न-भिन्न हो जाता । इसलिये भाग्य रेखा का उद्गम तथा उसकी समाप्ति दोनों ही बिन्दुओं का भलीभांति सूक्ष्मता से अध्ययन करना चाहिये । यदि यह रेखा कहीं से भी प्रारम्भ होकर बिना किसी अन्य रेखा का सहारा लिये शनि पर्वत पर पहुंच जाती है तो निःसन्देह ऐसी रेखा प्रबल भाग्य वर्द्धक एवं श्रेष्ठ मानी जाती है परन्तु यदि भाग्य रेखा शनि पर्वत को पार कर मध्यमा उंगली के पौर तक पहुंचने की कोशिश करती है तो ऐसी रेखा दूषित कहलाती है । ऊपर मैने भाग्य रेखा के बारे में कुछ तथ्य स्पष्ट किये हैं । मेरे अनुभव के आधार पर भाग्य रेखा का उद्गम निम्न प्रकार से हो सकते हैं : १. हथेली में भाग्य रेखा मणिबन्ध के ऊपर से निकल कर अन्य रेखाओं का सहारा लेती हुई शनि पर्वत तक पहुंचती है । २. कई बार यह रेखा जीवन रेखा के पास में से निकल कर शनि क्षेत्र पर पहुंच जाती है । ३. भाग्य रेखा शुक्र पर्वत से भी निकल कर शनि पर्वत तक पहुंचती है । ४. कभी-कभी यह रेखा मंगल पर्वत से भी निकलती हुई दिखाई दी है ।

( १३३ ) ५. यह रेखा जीवन रेखा को काटती हुई शनि पर्वत तक पहुंचने का प्रयास भी करती है। ६. कुछ हाथों में मैंने भाग्य रेखा राहू क्षेत्र से भी निकलती हुई देखी है। ७. भाग्य रेखा हृदय रेखा से निकलकर शनि पर्वत को स्पर्श करती हुई अनुभव की है। ८. कई बार यह रेखा नेपच्यून क्षेत्र तक शनि पर्वत तक जाती है। ६. कुछ हाथों में यह रेखा चन्द्र पर्वत से भी निकलती है। १०. हर्षल क्षेत्र से भी इस रेखा का प्रारम्भ देखा जा सकता है। ११. कई बार यह रेखा मस्तिष्क रेखा से प्रारम्भ होकर शनि पर्वत की ओर जाती है। ऊपर मैंने भाग्य रेखा के ग्यारह उद्गम स्थान बताये हैं। अधिकतर हाथों में उद्गम स्थल इसी प्रकार के दिखाई देते हैं। परन्तु इसके अलावा भी उद्गम स्थल हो सकते हैं। आगे के पृष्ठों में मैं इन उद्गम स्थलों से संबंधित भविष्यफल स्पष्ट कर रहा हूं : १. प्रथमा अवस्था :— इस प्रकार की भाग्य रेखा सर्वात्मक कहलाती है। यह रेखा जितनी अधिक स्पष्ट गहरी और निर्दोष होगी उतनी ही अच्छी कही जायेगी और उतना ही श्रेष्ठ मिल सकेगा। इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि भाग्य रेखा शनि पर्वत तक पहुंचती है तो वह शुभ कहलाती है। परन्तु यदि शनि पर्वत को पार कर मध्यमा उंगली पर चढ़ने लग जाती है तो वह विपरीत फल देने लग जाती है कुछ हाथों में मैंने यह भाग्य रेखा मध्यमा रेखा के दूसरे पौर तक पहुंचते हुए देखा है परन्तु इस प्रकार की रेखा बनने का यह तात्पर्य यह है कि ऐसे व्यक्ति में महत्त्वा- कांक्षाएं तथा इच्छाएं जरूरत से ज्यादा होंगी परन्तु वह अपने जीवन में अपनी इच्छाओं को पूरी होते हुए नहीं देख पाता। यह बढ़ी हुई भाग्य रेखा व्यक्ति बने बनाये कार्य को बिगाड़ देती है। परन्तु इस प्रकार की यह रेखा मध्यमा उंगली पर न चढ़े अपितु शनि क्षेत्र तक ही जाकर रुक जाय तो ऐसी रेखा शुभ फलदायक कही जाती है। यदि भाग्य रेखा शनि क्षेत्र तक जाते-जाते दुमुंही हो जाती है तो यह विशेष सफलता का सूचक है। यदि भाग्य रेखा के अन्तिम बिन्दु पर दो सिराएं फटकर एक सिरा शनि पर्वत पर रुकता है और दूसरा सिरा गुरु पर्वत तक पहुंच जाय तो वह व्यक्ति अपने जीवन में बहुत अधिक ऊंचे पद पर पहुंचता है। ऐसे व्यक्ति सामान्य घराने में जन्म लेकर भी उच्चपद प्राप्त होते देखा गया है।

( १३४ ) यदि भाग्य रेखा को शनि पर्वत पर तिरछी रेखाएं काटती हों तो उसे अपने जीवन में बाधाएं देखने को मिलती हैं । बहुत अधिक बाधाओं के बाद भी वह अपने जीवन में सफल हो पाता है । ये बाधक रेखाएं जितनी ही कम होती हैं उतनी ही ज्यादा अच्छी मानी जाती हैं । यदि भाग्य रेखा का उद्गम मणिबन्ध के नीचे से हो तो ऐसी रेखा भी दोष- पूर्ण मानी जाती है । ऐसे व्यक्ति दरिद्र तथा भाग्यहीन जीवन व्यतीत करते हैं । २. द्वितीयावस्था :—सामुद्रिक शास्त्र के अनुसार इस प्रकार की रेखा भी श्रेष्ठ मानी गई हैं । परन्तु यदि इस प्रकार की रेखा मध्यम उंगली पर चढ़ने का प्रयत्न करे तो यह बाधाओं को पैदा करने वाली मानी गई है । ऐसे व्यक्ति साहसी होते हुए भी परेशानियों से घिरे रहते हैं । ऐसे व्यक्तियों को जीवन में सफलता बहुत मुश्किल से मिलती है । जिसके हाथ में इस प्रकार की रेखा शनि पर्वत पर पहुंच जाती है तो यद्यपि वह व्यक्ति बचपन में परेशानियां उठाता है परन्तु आगे चलकर वह अपने प्रयत्नों से उन्नति करता है । और २८वें वर्ष में उसका पूर्ण भाग्योदय होता है । ऐसे व्यक्ति संकोची स्वभाव के होते हैं तथा तुरन्त निर्णय लेने में समर्थ नहीं हो पाते । यदि इस प्रकार की भाग्य रेखा पर आड़ी-तिरछी रेखाएं हों तो उस व्यक्ति के जीवन में कई बार बाधाएं आती हैं । और अत्यन्त परिश्रम के बाद भी वह जीवन में सफल हो पाता है । यदि भाग्य रेखा के साथ-साथ जीवन रेखा भी बढ़ रही हो तो ऐसी रेखा शुभ नहीं मानी जाती । जीवन रेखा और भाग्य रेखा का परस्पर मिलना या आपस में लिपटना ही अनुकूल नहीं कहा जाता । ३. तृतीयावस्था :—यह रेखा जितनी स्पष्ट होती है उतना ही ज्यादा शुभ माना जाता है । ऐसी भाग्य रेखा जीवन रेखा को काट कर ही आगे बढ़ती है परन्तु जिस जगह वह जीवन रेखा को काटती है । जीवन की उस अवधि में उसे बहुत अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है । ऐसी स्थिति होने पर वह व्यक्ति भयंकर दुर्घटना में घायल हो सकता है । दिवालिया हो सकता है, अथवा आत्महत्या कर सकता है । यह रेखा शुक्र पर्वत से निकलती है अतः यह बात सही समझनी चाहिए कि उस व्यक्ति का भाग्योदय विवाह के बाद ही होता है । ऐसा व्यक्ति प्रेम के क्षेत्र में बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ा होता है । तथा ससुराल से बहुत अधिक धन मिलता है । ऐसे व्यक्ति की स्त्री सुन्दर, आकर्षक तथा तड़क-भड़क से रहने वाली होती है । परन्तु ऐसे व्यक्तियों का बुढ़ापा बहुत कष्ट का होता है । उनका वैवाहिक जीवन भी सुखमय नहीं माना जाता । इस प्रकार की भाग्य रेखा के बीच में यदि द्वीप का चिह्न दिखाई दे तो पति पत्नी मतभेद की वजह से एक साथ नहीं रह पाते ।

( १३५ ) ४. चतुर्थावस्था :—यह भाग्य रेखा भी शुभ मानी गई है, परन्तु इसका भाग्योदय यौवनावस्था के बाद ही होता है। शिक्षा के क्षेत्र में इसको बार-बार बाधाएं देखनी पड़ती है तथा उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाता। यदि इस प्रकार की भाग्य रेखा के साथ कोई सहायक रेखा न हो तो व्यक्ति जीवन में अपनी ही की हुई गलतियों पर पछताता रहता है। मित्रों का सहयोग उसे नहीं मिल पाता जीवन में उन्नति के लिए उसे कठोर परिश्रम करना पड़ता है। उसका भाग्योदय अत्यधिक विलम्ब से होता है और किसी के सहयोग से ही यह उन्नति कर पाता है ऐसा व्यक्ति पुलिस या मिलिट्री विभाग में विशेष उन्नति कर सकता है। यदि यह रेखा मार्ग में टूट गई हो तो व्यक्ति को अपने जीवन में बार-बार बाधाओं का सामना करना पड़ता है यदि इस रेखा पर द्वीप हो तो ऐसा व्यक्ति भाग्य- हीन होता है। ५. पंचमावस्था :—यह रेखा हथेली में अनुकूल कही जाती है, परन्तु यह यदि मध्यमा उंगली के छोर पर पहुंचने का प्रयत्न करती है तो वह व्यक्ति जीवन में सफलता नहीं प्राप्त कर पाता। यद्यपि यह आगे बढ़ने के लिए बराबर प्रयत्न करता रहेगा परन्तु उसे जीवन में बार-बार असफलता का सामना करना पड़ता है किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के सहयोग से ही यह उन्नति कर सकता है। जीवन के मध्य काल में ये व्यक्ति विकास करते हैं, ऐसे व्यक्ति सफल चित्र- कार अथवा साहित्यकार होते हैं, मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसे व्यक्ति किसी एक क्षेत्र में पारंगत होते हैं। यदि ऐसी रेखा जीवन रेखा के आगे बढ़ने पर टूटी हुई हो या लहरदार बन गई हो तो उस व्यक्ति की उन्नति नहीं हो पाती, और निरन्तर अपने भाग्य को कोसता रहता है। यदि ऐसी रेखा को आड़ी या तिरछी रेखाएं काटे तो उस जीवन में बाधाओं का सामना करना पड़ता है, ऐसे व्यक्ति सफल देश भक्त होते हैं तथा इनकी वृद्धावस्था अत्यन्त सुखमय होता है। ६. षष्ठावस्था:—जिसके हाथ में इस प्रकार की भाग्य रेखा होती है वह अत्यन्त सौभाग्यशाली माना जाता है, इस प्रकार के व्यक्ति का भाग्योदय ३६वें वर्ष के बाद से ही होता है जीवन के ३६ से ४२वें वर्ष के बीच आश्चर्यजनक रूप से उन्नति करता है। ऐसे व्यक्ति का प्रारम्भिक जीवन अत्यन्त कष्टदायक होता है, परन्तु उसका यौवनकाल और उसकी वृद्धावस्था अत्यन्त सुखकर मानी जाती है, और अपने जीवन के उत्तरकाल में उसे धन, मान, यश, प्रतिष्ठा, आदि प्राप्त होती हैं। यदि ऐसी रेखा बीच बीच में टूटी हुई हो तो उसके भाग्य में बाधाएं आती हैं और यदि उस रेखा पर वृत्त का चिह्न हो तो ऐसा व्यक्ति भाग्य हीन कहा जाता है यदि भाग्य रेखा से कोई सहायक रेखा निकल कर गुरू पर्वत की ओर जाती हो तो वह

( ११६ ) व्यक्ति अपने जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है । ७. सप्तमावस्था :—हृदय रेखा से निकलने वाली यह भाग्य रेखा सीधी शनि पर्वत तक पहुंच जाती है पर कुछ लोगों के हाथों में यह रेखा आगे चलकर त्रिशूल की तरह बन जाती है जिसका एक सिरा सूर्य पर्वत की ओर दूसरा हिस्सा गुरु पर्वत की ओर जाता है । ऐसी भाग्य रेखा अत्यन्त शुभ मानी गई हैं । यदि इस प्रकार की भाग्य रेखा अन्त मे जाकर दो टुकड़ों में बंट जाय तो वह व्यक्ति अपने जीवन में अपूर्व धन मान, यश, पद, प्रतिष्ठा प्राप्त करता है । ऐसा व्यक्ति सहृदय होता है अपने जीवन में वह निरन्तर दूसरों की सहायता करता रहता है । वह अपने प्रयत्नों से लाखो करोड़ों रुपये कमाता है और धार्मिक कार्यों में खर्च भी करता है । यदि इस रेखा के प्रारम्भ में द्वीप का चिह्न हो तो उसे अपने जीवन में बहुत बड़ी बदनामी उठानी पड़ती, है यदि यह रेखा बीच में टूटी हुई हो तो आयु के उस भाग में उसे विशेष आर्थिक हानी सहन करनी पड़ती है, यदि इस रेखा पर आड़ी-तिरछी रेखाएं हों तो उस व्यक्ति को जीवन में कई बार संघर्षों का सामना करना पड़ता है और अत्यन्त कठिनाई के बाद ही वह सफलता प्राप्त कर पाता है । यदि इस रेखा के अन्तिम स्थान पर तारे का चिह्न हो तो उसकी अकाल मृत्यु होती है । यदि यह रेखा मध्यमा उंगुली पर चढ़ने का प्रयत्न करें तो वह जीवन में बराबर असफलता का सामना करता है । ८. अष्टमावस्था : यदि यह रेखा निर्दोष स्पष्ट और गहरी हो तो उस व्यक्ति का बचपन अत्यन्त सुखमय व्यतीत होता है । विद्या की दृष्टि से वह श्रेष्ठ विद्या प्राप्त करता है । इस प्रकार के बालक की बुद्धि तेज होती है और वे अपने स्वतंत्र विचारों के कारण पहिचाने जाते हैं । यद्यपि परिवार से इनको किसी प्रकार का कोई विशेष सहयोग नहीं मिलता । फिर भी ये प्रयत्न करके सफलता की ओर बढ़ जाते हैं। ऐसे व्यक्ति सफल साहित्यकार न्यायाधीश अथवा दार्शनिक होते हैं। ऐसे व्यक्तियों का गृहस्थ जीवन पूर्णतः सुखमय कहा जा सकता है । विदेश यात्रा का योग इनके जीवन में कई बार होता है परन्तु इस प्रकार की भाग्य रेखा टूटी हुई या लहरदार हो तो उस व्यक्ति के जीवन में सफलता के अवसर कम रहते हैं । उसे जीवन में बार बार संघर्ष करना पड़ता है बहुत अधिक प्रयत्न के बाद ही सफलता मिल पाती है । यदि इस प्रकार की भाग्य रेखा अन्त में जाकर दो मुही बन जाती है तो यह श्रेष्ठ संकेत है, और ऐसा व्यक्ति निश्चय ही अपने उद्देश्यों में सफल होता है । ६. नवमावस्था : इस प्रकार की भाग्य रेखा को अत्यन्त शुभ माना गया है । यदि यह रेखा शनि पर्वत पर जाकर दो भागों में या तीन भागो में बंट जाती है तो वह व्यक्ति अतुलनीय धन का स्वामी होता है तथा जीवन में पूर्ण प्रगति करता है ।

( १३७ ) ऐसे व्यक्ति के जीवन में आय के स्रोत एक से अधिक होते हैं। यदि इस प्रकार की भाग्य रेखा का अन्तिम सिरा गुरु पर्वत की ओर जा रहा हो तो वह व्यक्ति साहित्य के माध्यम से श्रेष्ठ फल प्राप्त करता है। यदि इस प्रकार का सिरा सूर्य पर्वत की ओर जाता हो तो वह विदेश में व्यापार कर पूर्ण सफलता प्राप्त करता है। धार्मिक कार्यों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेता है तथा समाज में उसे सम्माननीय स्थान मिलता है। यदि इस प्रकार की रेखा टूटी हुई या जंजीरदार हो तो उसे जीवन में बहुत अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यदि यह रेखा मध्यमा उंगली की पोर पर चढ़ रही हो तो उसे जीवन में जरूरत से ज्यादा हानि सहन करनी पड़ती है। जिस व्यक्ति के हाथ में ऐसी भाग्य रेखा होती है उनका भाग्योदय विवाह के बाद ही होता है। उनका मन अस्थिर तथा वृत्ति चंचल होती है। जीवन में एक से अधिक स्त्रियों से वह सम्पर्क रखता है। इनके जीवन में जलयात्रा के योग बहुत अधिक होते हैं। ऐसे व्यक्ति एकान्त प्रेमी सहृदय एवं मधुर स्वभाव के होते हैं। १०. दशमावस्था : जिस व्यक्ति के हाथ में इस प्रकार की भाग्य रेखा होती है वह निश्चय ही उच्च पद प्राप्त करता है। ऐसा व्यक्ति जीवन में कई बार विदेश यात्राएं करता है अथवा वह वायु सेना में उच्च पद प्राप्त अधिकारी होता है। जीवन में ऐसा व्यक्ति राष्ट्र-स्तरीय सम्मान प्राप्त करता है। इनके जीवन में साहस तथा धैर्य की किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती। यदि ऐसी भाग्य रेखा जंजीरदार टूटी हुई या लहरियादार हो तो उसे जीवन में बहुत अधिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। यदि इस प्रकार की भाग्य रेखा अन्त में जाकर दो भागों में बंट जाय और उसका एक सिरा गुरु पर्वत तथा दूसरा सिरा सूर्य पर्वत की ओर जाता हो तो वह व्यक्ति प्रबल भाग्यशाली होता है। ११. एकादशावस्था : ऐसी भाग्य रेखा बहुत ही कम लोगों के हाथ में देखने को मिलती है। इन व्यक्तियों का व्यक्तित्व अपने आप में भव्य होता है। ये शुक्र की तरह जीवन में चमकते हैं। इनके कार्यों से समाज प्रभावित होता है। देश के दिशा- निर्देश में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इनके विचार इनके कार्य सभी कुछ योजना बद्ध होते हैं। एक साधारण कुल में जन्म लेकर भी ऐसा व्यक्ति सभी दृष्टियों से योग्य सम्पन्न और सुखी होता है। यदि ऐसी रेखा अन्त में जाकर दो भागों में बंट जाय तो वह उच्च स्तर का अधिकारी होता है तथा उसके जीवन में भौतिक दृष्टि से किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती। ऊपर मैंने ग्यारह प्रकार के भाग्य रेखा के उद्गम स्थल बतलाये हैं। परन्तु इसके अलावा भी उद्गम स्थल हो सकते हैं। पाठकों को एक बात ध्यान में रखनी

( १३८ ) चाहिए कि जो भी रेखा शनि पर्वत को स्पर्श करती है वास्तव में वही रेखा भाग्य रेखा कहलाने की अधिकारी होती है । यदि किसी के हाथ में एक से अधिक भाग्य रेखाएं हों और दोनों की समाप्ति शनि पर्वत पर होती हो तो उन दोनों रेखाओं का मिला-जुला फल उस व्यक्ति को जीवन में देखने को मिलेगा । शनि रेखा या भाग्य रेखा की समाप्ति पर यदि कई छोटी-छोटी रेखाएं निकलती हों तो ये रेखाएं व्यक्ति की महत्त्वाकांक्षाओं को सूचित करती हैं । यदि इस प्रकार की रेखाएं नीचे की तरफ गिरती हुई दिखाई दें तो वह व्यक्ति जीवन में बहुत अधिक परेशानियों का सामना करता है । आगे के पृष्ठों में भाग्य रेखा से सम्बन्धित कुछ नए तथ्य स्पष्ट कर रहा हूं । १. यदि भाग्य रेखा सीधी तथा स्पष्ट हो और शनि पर्वत से होती हुई सूर्य पर्वत की ओर जा रही हो तो वह व्यक्ति कला के क्षेत्र में विशेष सफलता प्राप्त करता है । २. यदि यह रेखा लाल रंग की हो तथा मध्यमा उंगली के प्रथम पोर तक पहुंच जाय तो उस व्यक्ति की दुर्घटना में मृत्यु होती है । ३. यदि यह रेखा हृदय रेखा को काटते समय जंजीर के समान बन जाय तो उसे प्रेम के क्षेत्र में बदनामी का सामना करना पड़ता है । ४. यदि हृदय रेखा हथेली के मध्य में फीकी या पतली अथवा अस्पष्ट हो तो व्यक्ति का यौवनकाल दुखमय होता है । ५. यदि व्यक्ति के हाथ में भाग्य रेखा के साथ-साथ सहायक रेखाएं भी हों तो उसका जीवन अत्यन्त सम्मानित होता है । ६. यदि भाग्य रेखा जंजीरदार अथवा लहरदार हो तो जीवन में उसे बहुत अधिक दुख भोगना पड़ता है । ७. जिस व्यक्ति के हाथ में भाग्य रेखा नहीं होती उसका जीवन अत्यन्त साधारण और नगण्य सा होता है । ८. यदि भाग्य रेखा प्रारंभ से ही टेढ़ी-मेढ़ी हो तो उसका बचपन अत्यन्त कष्टदायक होता है । ६. भाग्य रेखा अपने उद्गम स्थल से प्रारंभ होकर जिस पर्वत की ओर भी मुड़ती है या शनि पर्वत से उसमें से कोई शाखा निकलकर जिस पर्वत की ओर जाती है उस पर्वत से सम्बन्धित गुणों का विकास उस व्यक्ति को जीवन में मिलता है । १०. यदि भाग्य रेखा चलते-चलते रुक जाय तो वह व्यक्ति जीवन में बहुत अधिक तकलीफ उठाता है । ११. हथेली में भाग्य रेखा जिस स्थान में भी गहरी, निर्दोष, और स्पष्ट होती है जीवन के उस भाग में उसे विशेष लाभ या सुख मिलता है ।

( १३६ ) १२. भाग्य रेखा हथेली में जितनी बार भी टूटती है जीवन में उतनी ही बार महत्वपूर्ण मोड़ आते हैं या कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। १३. यदि भाग्य रेखा मणिबन्ध से प्रारम्भ होकर मध्यमा के ऊपर चढ़े तो वह दुर्भाग्यशाली होता है। जो भाग्य रेखा ऐसी होगी उसे जीवन में किसी प्रकार का कोई सुख या आनन्द नहीं मिलेगा । १४. यदि भाग्य रेखा प्रथम मणिबन्ध से भी नीचे हो अर्थात् प्रथम मणिबन्ध से नीचे उसका उद्गम स्थल हो तो उसे जीवन में जरूरत से ज्यादा कष्ट उठाना पड़ता है। १५. यदि भाग्य रेखा के साथ में कोई सहायक रेखा हो तो यह शुभ कहा जाता है। यदि उंगलियां लम्बी हों और भाग्य रेखा का प्रारंभ चन्द्र पर्वत से हो तो ऐसा व्यक्ति प्रसिद्ध तांत्रिक होता है। १६. यदि चन्द्र पर्वत को काटकर भाग्य रेखा आगे बढ़ती हो तो वह जीवन में कई बार विदेश यात्रा करता है। १७. यदि भाग्य रेखा के उद्गम स्थान पर त्रिकोण का चिह्न हो तो वह व्यक्ति अपनी ही प्रतिभा से उन्नति करता है। १८. यदि भाग्य रेखा से कुछ शाखाएं निकल कर ऊपर की ओर जा रही हों तो उसे अतुलनीय धन लाभ होता है। १६. यदि भाग्य रेखा मस्तिष्क रेखा से प्रारंभ हो और मार्ग में कई जगह आड़ी तिरछी रेखाएं हों तो उस व्यक्ति को बुढ़ापे में सफलता मिलती है। २०. यदि भाग्य रेखा शनि पर्वत पर वृत्ताकार बन जाय तो उसके जीवन में अत्यधिक परिश्रम के बाद सफलता आती है। २१. यदि भाग्य रेखा मस्तिष्क रेखा से प्रारंभ हो और उसकी शाखाएं गुरु सूर्य तथा बुध पर्वत पर जाती हों तो वह व्यक्ति विश्वविख्यात होता है। २२. यदि भाग्य रेखा के उद्गम स्थान पर तीन या चार रेखाएं निकली हुई हों तो ऐसे व्यक्ति का भाग्योदय विदेश में होता है। २३. यदि भाग्य रेखा के उद्गम स्थान से एक सहायक रेखा शुक्र पर्वत की ओर जाती हो तो किसी स्त्री के माध्यम से उसका भाग्योदय होता है। २४. यदि भाग्य रेखा मस्तिष्क रेखा के पास समाप्त हो जाती हो तो उसे जीवन में बार बार निराशा का सामना करना पडता है। २५. भाग्य रेखा पर जितनी ही आड़ी तिरछी रेखाएं होती हैं वे उसकी प्रगति में बाधक कहलाती हैं। २६. यदि भाग्य रेखा की समाप्ति पर तारे का चिह्न हो तो उसकी वृद्धावस्था अत्यन्त कष्टमय होती है।

( १४० ) २७. यदि भाग्य रेखा और विवाह रेखा परस्पर मिल जाय तो उसका गृहस्थ जीवन दुखमय रहता है । २८. यदि भाग्य रेखा से कोई सहायक रेखा निकलती हो तो वह भाग्य को प्रबल बनाने में सहायक होती है । २६. यदि इस रेखा के ऊपर या नीचे शाखाएं हों तो उसे आर्थिक कष्ट उठाना पड़ता है । ३०. भाग्य रेखा के अन्त में क्रॉस या जाली हो तो उसकी क्रूर हत्या होती है । ३१. यदि रेखा के अन्त में चतुर्भुज हो तो उस व्यक्ति की धर्म में विशेष आस्था होती है । ३२. भाग्य रेखा पर धन का चिन्ह शुभ माना गया है । ३३. भाग्य रेखा गहरी स्पष्ट और लालिमा लिये हुए होती है तो व्यक्ति जीवन में शीघ्र ही प्रगति करता है । वस्तुतः भाग्य में ही जीवन का सब कुछ सार संगृहीत होता है । अतः जिसकी हथेली में भाग्य रेखा प्रबल, स्पष्ट, और सुन्दर होती है वह व्यक्ति अपने भाग्य से शीघ्र उन्नति करता है और समाज में सम्माननीय स्थान प्राप्त करता हुआ पूर्ण भौतिक सुखों का भोग करता है ।

स्वास्थ्य-रेखा मानव के जीवन में स्वास्थ्य का महत्व सबसे अधिक माना है। व्यक्ति के पास यश, मान, पद, प्रतिष्ठा, तथा ऐश्वर्य हो परन्तु यदि उसके पास स्वास्थ्य की कमी हो तो उसका यह सारा वैभव एक प्रकार से व्यर्थ है। इसलिये शास्त्रों में स्वास्थ्य को सबसे उत्तम धन माना है। हस्तरेखा विशेषज्ञ को चाहिए कि वह जीवन रेखा का अध्ययन करने के बाद सबसे पहले स्वास्थ्य रेखा का ही अध्ययन करे। उत्तम स्वास्थ्य का उसके पूरे जीवन और उसके कार्य-कलापों पर प्रभाव पड़ता है। यदि स्वास्थ्य उत्तम होता है तो वह सब कुछ कार्य कर सकता है, प्रत्येक कार्य में मानसिक और शारीरिक शक्ति लगा सकता है। परन्तु यदि स्वास्थ्य उसका साथ नहीं दे तो उसका जीवन एक प्रकार से व्यर्थ सा हो जाता है। हथेली में स्वास्थ्य-रेखा का उद्गम किसी भी स्थान से हो सकता है परन्तु यह बात निश्चित है कि इसकी समाप्ति बुध पर्वत पर ही होती है। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि कोई एक रेखा प्रारंभ होकर बुध पर्वत की ओर आने का प्रयत्न करती है परन्तु बुध पर्वत तक नहीं पहुंच पाती। ऐसी स्थिति में वह रेखा स्वास्थ्य रेखा नहीं कहला सकती। स्वास्थ्य रेखा वह तभी कहला सकती है जबकि वह बुध पर्वत को स्पर्श करे या बुध पर्वत पर पहुंचे। कुछ रेखाएं बुध पर्वत को मात्र स्पर्श करके ही रह जाती हैं ऐसी रेखा को भी बुध रेखा या स्वास्थ्य रेखा मान लेना चाहिए। यह रेखा हथेली के किसी भी भाग से प्रारंभ हो सकती है। मुख्य रूप से इसका प्रारंभ निम्न स्थानों से होता है; १. शुक्र पर्वत से। २. जीवन रेखा के पास से। ३. हृदय रेखा से। ४. चन्द्र पर्वत से। ५. मणिबन्ध से। ६. भाग्य रेखा से। ७. मंगल पर्वत से। जैसा कि मैं ऊपर बता चुका हूं कि स्वास्थ्य रेखा का प्रारंभ कहीं से भी हो सकता है परन्तु उस रेखा की समाप्ति बुध पर्वत पर ही होती है।

( १४२ ) इस रेखा का भली भांति अध्ययन करना चाहिए। हथेली में यह रेखा जितनी अधिक स्पष्ट, निर्दोष व गहरी होती है संबंधित व्यक्ति का स्वास्थ्य उतना ही ज्यादा श्रेष्ठ एवं उन्नत होता है। उसका शरीर सुगठित और व्यक्तित्व, प्रभावशाली होता है। यदि हथेली में स्वास्थ्य रेखा टूटी हुई हो या कटी-फटी, छिन्न-भिन्न, लहरदार, या जंजीर के समान हो तो उस व्यक्ति का स्वास्थ्य अपने आप में कमजोर होगा। जीवन में उसे किसी भी प्रकार का कोई आनन्द नहीं रह पायेगा। व्यक्ति की हथेली में स्वास्थ्य रेखा का स्पष्ट होना बहुत अधिक जरूरी है। कुछ हथेलियों में स्वास्थ्य रेखा का अभाव भी देखने को मिलता है। इस सम्बन्ध में मेरा यह अनुभव है कि स्वास्थ्य रेखा का न होना भी अपने-आप में एक शुभ संकेत है। जिन व्यक्तियों के हाथों में स्वास्थ्य रेखा नहीं होती। वे स्वस्थ आकर्षक और आनन्ददायक जीवन व्यतीत करने वाले होते हैं। ऐसे व्यक्ति किसी भी प्रकार के रोग से दूर रहते हैं तथा अपने पुरुषार्थ के बल पर सब कुछ करने के लिए तैयार रहते हैं। जिस हथेली में यह रेखा चौड़ी होती है उसका स्वास्थ्य जीवन भर कमजोर रहता है। यदि यह रेखा कड़ी के समान जुड़ी हुई हो तो उसे जीवन भर पेट की बीमारी रहती है। यदि लहर के समान यह रेखा ऊपर की ओर बढ़ रही हो तो उसे जिगर की बीमारी अवश्य ही होती है। इस रेखा का पीलापन इस बात को स्पष्ट करता है कि ऐसा व्यक्ति पीलिया या रक्त से संबंधित बीमारी से पीड़ित रहेगा। स्वास्थ्य रेखा पर जितने अधिक बिन्दु होते हैं उसका स्वास्थ्य उतना ही ज्यादा खराब रहता है। यदि किसी की हथेली में स्वास्थ्य रेखा कई जगह से कटी हुई हो तो वह व्यक्ति जीवन भर बीमार बना रहता है। आगे के पृष्ठों में मैं स्वास्थ्य रेखा से संबंधित कुछ विशेष तथ्य स्पष्ट कर रहा हूं। १. यदि स्वास्थ्य रेखा जीवन रेखा से मिली हुई न हो तो ऐसा व्यक्ति दीर्घायु होता है। २. स्वास्थ्य रेखा जितनी अधिक लम्बी, स्वस्थ और पुष्ट होती है उस व्यक्ति का स्वास्थ्य उतना ही अधिक श्रेष्ठ कहा जाता है। ३. यदि स्वास्थ्य रेखा का प्रारंभ लाल हो तो उसे जीवन में हार्ट की बीमारी होती है। ४. यदि यह रेखा मध्य में लाल हो तो उसका स्वास्थ्य जीवन भर कमजोर बना रहता है। ५. यदि यह रेखा अन्तिम स्थल पर लाल रंग की हो तो उसे सिर दर्द की बीमारी बनी रहती है।

( १४३ ) ६. यदि यह रेखा कई रंगों की हो तो उसे जीवन में पक्षाघात का सामना करना पड़ता है । ७. यदि यह रेखा पीले रंग की हो तो उसे गुप्त रोग होते हैं । ८. यदि स्वास्थ्य रेखा चन्द्र पर्वत से होती हुई हथेली के किनारे किनारे चल- कर बुध पर्वत तक पहुंचती हो तो वह जीवन में कई बार विदेश यात्राएं करता है । ६. यदि यह रेखा पतली तथा स्पष्ट हो एवं मस्तिष्क रेखा भी पुष्ट हो तो उस व्यक्ति की स्मरण-शक्ति अत्यन्त तीव्र होती है । १०. यदि इस रेखा पर तथा मस्तिष्क रेखा पर धब्बे हों तो व्यक्ति जीवन भर बीमार बना रहता है । ११. यदि हथेली में स्वास्थ्य रेखा सुर्ख रंग की हो तो ऐसा व्यक्ति जरूरत से ज्यादा भोगी तथा कामी होता है । १२. यदि मस्तिष्क रेखा कमजोर हो या स्वास्थ्य रेखा लहरदार हो तो उसे पेट की बीमारी बनी रहती है । १३. यदि बुध पर्वत पर यह रेखा आकर कट जाती हो तो ऐसे व्यक्ति को पित्त दोष होता है । १४. यदि यह रेखा लाल रंग की होकर हृदय रेखा से बढ़ती हो तो उसका हृदय अत्यन्त कमजोर समझना चाहिए । १५. यदि कोई स्वास्थ्य रेखा हृदय रेखा पर क्रास का चिह्न बनाती हो तो उसे मन्दाग्नि रोग रहता है । १६. यदि स्वास्थ्य रेखा से कई सहायक रेखाएं निकलकर ऊपर की ओर बढ़ रही हों तो ऐसे व्यक्ति का स्वास्थ्य अत्यन्त श्रेष्ठ माना जाता है । १७. यदि स्वास्थ्य रेखा लम्बी तथा लहरदार हो पर भाग्य रेखा कमजोर हो तो उसे जीवन में दांतों की बीमारी होती है । १८. यदि स्वास्थ्य रेखा कमजोर हो एवं हृदय रेखा भी कमजोर हो तो व्यक्ति दुर्बल मनोवृत्ति का होता है । १६. यदि स्वास्थ्य रेखा के अन्तिम स्थल पर चतुर्भुज हो तो व्यक्ति दमे के रोग से पीड़ित होता है । २०. यदि उंगलियां कोषदार हों तथा स्वास्थ्य रेखा कमजोर हो तो व्यक्ति -लकवे के रोग से पीड़ित रहता है । २१. यदि स्वास्थ्य रेखा से कई छोटी-छोटी शाखाएं नीचे की ओर जा रही हों तो उसका स्वास्थ्य जीवन भर कमजोर बना रहता है । २२. यदि स्वास्थ्य रेखा से कोई प्रशाखा सूर्य पर्वत की ओर जा रही हो तो उस व्यक्ति के पास अतुलनीय धन होता है ।

( १४४ ) २३. यदि स्वास्थ्य रेखा की कोई प्रशाखा शनि पर्वत की ओर जा रही हो तो वह व्यक्ति स्वास्थ्य से गंभीर मननशील तथा दीर्घायु होता है । २४. यदि स्वास्थ्य रेखा में चन्द्र रेखा आकर मिल रही हो तो वह व्यक्ति सफल कवि होता है तथा कई बार विदेश यात्राएं करता है । २५. यदि स्वास्थ्य रेखा से कोई प्रशाखा अर्द्धवृत्त सा बनाती हुई मंगल पर्वत की ओर जा रही हो तो वह व्यक्ति सफल भविष्यवक्ता होता है । २६. यदि मनुष्य की हथेली में स्वास्थ्य रेखा चलकर हृदय रेखा को काट रही हो तो उस व्यक्ति को मिर्गी का रोग होता है । २७. यदि लहरदार स्वास्थ्य रेखा भाग्य रेखा को स्पर्श कर लेती है तो उस व्यक्ति का भाग्य जीवन भर कमजोर बना रहता है । २८. यदि ऐसी रेखा मस्तिष्क रेखा को छूती हो तो उस व्यक्ति का दिमाग अत्यन्त कमजोर रहता है । २६. यदि लहरदार स्वास्थ्य रेखा सूर्य पर्वत को स्पर्श करती हो तो वह जीवन में कई बार बदनामी उठाता है । ३०. यदि स्वास्थ्य रेखा लहरदार हो तथा बुध पर्वत को पार करती हो तो उसे व्यापार में जबरदस्त हानि सहन करनी पड़ती है । ३१. यदि उंगलियां नोकीली हों और हथेली में स्वास्थ्य रेखा का अभाव हो तो वह व्यक्ति क्रियाशील होता है । ३२. यदि बुध पर्वत अत्यन्त विक्षिप्त हो और स्वास्थ्य रेखा का अभाव हो तो वह व्यक्ति खुश मिजाज होता है । ३३. यदि लहरदार बुध रेखा मुडकर शुक्र पर्वत की ओर जा रही हो तो उसे प्रेम के क्षेत्र में जबरदस्त धक्का लगता है । ३४. यदि स्वास्थ्य रेखा पर द्वीप का चिह्न हो तो उसे रक्त संबंधी बीमारियां होती हैं तथा उसके फेफड़े कमजोर होते हैं । ३५. यदि स्वास्थ्य रेखा के आस-पास कई छोटी छोटी रेखाएं हों तो उस व्यक्ति का स्वास्थ्य हमेशा कमजोर रहता है । ३६. यदि स्वास्थ्य रेखा जीवन रेखा से बढ़कर मस्तिष्क रेखा तथा हृदय रेखा को स्पर्श करती हुई आगे बढ़ती है तो उसे जीवन में कमजोरी रहती है । ३७. यदि जीवन रेखा के साथ यह रेखा जुड़ी हुई हो परन्तु इस रेखा पर नीले धब्बे हों तो उसे हृदय रोग की शिकायत बनी रहती है । ३८. यदि मस्तिष्क रेखा के अन्त में तथा स्वास्थ्य रेखा के अन्त में क्रॉस हो तो वह व्यक्ति सफल होता है ।

( १४५ ) ३६. यदि स्वास्थ्य रेखा कहीं पर चमकदार तथा कहीं पर फीकी हो अथवा टुकड़ों में बंटी हो तो उसका स्वास्थ्य जीवन भर कमजोर रहता है। ४०. यदि स्वास्थ्य रेखा कमजोर और अत्यन्त पतली हो तो उसके चेहरे पर सुस्ती बनी रहती है। ४१. यदि स्वास्थ्य रेखा और सूर्य रेखा का परस्पर सम्बन्ध बन गया हो तो उस व्यक्ति का मस्तिष्क अत्यन्त उर्वर होता है। ४२. यदि इस रेखा के अन्त में क्रॉस हो तथा मस्तिष्क रेखा पर भी क्रॉस का चिह्न हो तो व्यक्ति जीवन में अन्धा होता है। ४३. यदि स्वास्थ्य रेखा के मार्ग में कहीं पर तिरछी रेखा कटती हो तो आयु के उस भाग में जबरदस्त एक्सीडेंट (दुर्घटना) होता है। ४४. यदि रेखा पर तारे का चिह्न हो तो उसे जीवन में परिवार का सहयोग नहीं मिलता। ४५. यदि स्वास्थ्य रेखा के आस-पास क्रॉस का चिह्न हो तो उसके जीवन में कई बार दुर्घटनाएं घटित होती हैं। ४६. यदि राहू क्षेत्र पर गुजरते समय स्वास्थ्य रेखा पर द्वीप का चिह्न हो तो ऐसा व्यक्ति टी० बी० के रोग से पीड़ित रहता है। ४७. यदि मस्तिष्क रेखा पर द्वीप का चिह्न हो और उस द्वीप के ऊपर से होकर स्वास्थ्य रेखा गुजर रही हो तो व्यक्ति का स्वास्थ्य जीवन में अत्यन्त कमजोर रहेगा। ४८ यदि भाग्य रेखा कटी हुई हो तथा स्वास्थ्य रेखा पर द्वीप का चिह्न हो तो व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से पीड़ित रहता है। ४६. यदि स्वास्थ्य रेखा हथेली के अन्दर धंसी हुई सी हो तो उसे गुप्त रोग रहते हैं। ५०. स्वास्थ्य रेखा पर क्रॉस स्वास्थ्य की हानि की ओर ही संकेत करते हैं। ५१. यदि स्वास्थ्य रेखा पर नक्षत्र हों तो व्यक्ति को पारिवारिक सुख नहीं मिलता। ५२. यदि बुध रेखा तथा प्रणय रेखा आपस में मिली हुई हों तो उस व्यक्ति की पत्नी का स्वास्थ्य जीवन भर कमजोर रहता है । ५३. यदि दोनों हाथों में स्वास्थ्य रेखा स्पष्ट हो तो वह व्यक्ति कामुक और भोगी होता है। ५४. यदि स्वास्थ्य रेखा दुहरी हो तो व्यक्ति श्रेष्ठ भाग्य का स्वामी होता है। ५५. यदि दुहरी स्वास्थ्य रेखा सूर्य पर्वत को भी स्पर्श करती हो तो वह व्यक्ति राजनीति में अत्यन्त श्रेष्ठ पद प्राप्त करता है।

( १४६ ) ५६. यदि स्वास्थ्य रेखा तथा हृदय रेखा का मिलन बुध पर्वत के नीचे हो तो उस व्यक्ति की मृत्यु हार्ट-अटैक से होती है । ५७. यदि स्वास्थ्य रेखा के साथ में कोई सहायक रेखा भी चल रही हो तो उस व्यक्ति का स्वास्थ्य अत्यन्त श्रेष्ठ समझना चाहिए । ५८. यदि स्वास्थ्य रेखा ठीक हो परन्तु नाखूनों पर पीली धारियां हों तो उस व्यक्ति की असमयिक मृत्यु होती है। ५९. यदि स्वास्थ्य रेखा नीचे से पुष्ट परन्तु ऊपर चलते-चलते क्षीण होती जाती हो तो व्यक्ति की यौवनकाल में ही मृत्यु हो जाती है । ६०. यदि स्वास्थ्य रेखा मणिबन्ध से निकल रही हो पर टूटी हुई हो तो उस व्यक्ति की मृत्यु शीघ्र ही समझनी चाहिए । ६१. यदि स्वास्थ्य रेखा पर जाली का चिह्न हो तो व्यक्ति पूर्ण आयु नहीं भोगता । ६२. यदि जीवन रेखा तथा स्वास्थ्य रेखा का आपस में संबंध हो जाय और ऊपर तारे का चिह्न हो तो व्यक्ति की मृत्यु यात्रा में होती है । ६३. यदि जरूरत से ज्यादा लम्बे नाखून हों तो व्यक्ति को स्नायु संबंधी बीमारी होती है । ६४. यदि नाखूनों का रंग नीला हो तो व्यक्ति पक्षाघात से पीड़ित रहता है। यदि नाखून छोटे-छोटे हों और स्वास्थ्य रेखा कटी हुई हो तो व्यक्ति को मिर्गी का रोग होता है । ६५. यदि जीवन रेखा कमजोर हो तथा बुध रेखा लहरदार हो तो उसे गठिया की बीमारी होती है। ६६. उत्तम स्वास्थ्य रेखा ही व्यक्ति के लिये सभी दृष्टियों से सुखदायक कही जाती है। हस्तरेखा विशेषज्ञ को स्वास्थ्य रेखा का सावधानी के साथ अध्ययन करना चाहिए । इस रेखा से भविष्य में हम होने वाली बीमारियों तथा दुर्घटनाओं की जानकारी पहले से ही कर सकते हैं और इस प्रकार की चेतावनी देकर उसे सावधान कर सकते हैं। वस्तुतः स्वास्थ्य रेखा का महत्त्व हथेली में अन्यतम है इसमें कोई दो राय नहीं।

विवाह-रेखा हमारे शरीर में सबसे कोमल और विचित्र-सा जो अवयव है उसका नाम 'दिल' है। एक प्रकार से इसका शरीर में सबसे अधिक महत्व है । एक तरफ यह पूरे शरीर में खून पहुंचाने का कार्य करता है तो दूसरी तरफ यह अपने आप में इतना अधिक कोमल होता है कि कई भावनाओं को मन में संजोकर रखता है। कोमल विचार, विपरीत योनि के प्रति भावनाएं आदि कार्य इसी के माध्यम से सम्पन्न होते हैं। यह इतना अधिक कोमल होता है कि जरा-सी विपरीत बात से इसको ठेस पहुंच जाती है और टूट जाता है। मानवीय कल्पनाओं का यह एक सुन्दर प्रतीक है। करुणा, दया, ममता, स्नेह, और प्रेम आदि भावनाएं इसी के द्वारा संचालित होती हैं। एक हृदय चाहता है कि वह दूसरे हृदय से सम्पर्क स्थापित करे, आपस में दोनों का प्यार हो। दोनों हृदय एक मधुर कल्पना से ओत-प्रोत हों और जब दोनों हृदय एक सूत्र में बंध जाते हैं तब उसे समाज विवाह का नाम देता है। वस्तुतः मानव जीवन की पूर्णता तभी कही जाती है कि जब उसका अर्द्धाङ्ग भी सुन्दर हो, समझदार हो, प्रेम की भावना से भरा हुआ हो तथा दोनों के हृदय एक दूसरे से मिल जाने की क्षमता रखते हों। जिस व्यक्ति के घर में सुशील, सुन्दर, स्वस्थ और शिक्षित पत्नी होती है वह घर निश्चय ही इन्द्र भवन से ज्यादा सुखकर माना जाता है। इसलिए हस्तरेखा विशेषज्ञ को चाहिए कि वह जीवन रेखा को जितना महत्व दे लगभग उतना ही महत्व विवाह रेखा को भी दे, क्योंकि इस रेखा के अध्ययन से ही मानव जीवन की पूर्णता का ज्ञान हो सकता है। मानव जीवन की यात्रा अत्यन्त कंटकमय होती है। इस पथ को भली प्रकार से पार करने के लिये एक ऐसे सहयोगी की जरूरत होती है जो दुख में सहायक हो परेशानियों में हिम्मत बंधाने वाला हो तथा जीवन में कंधे से कंधा मिलाकर चलने की क्षमता रखता हो। हथेली में विवाह रेखा या वासना रेखा अथवा प्रणय रेखा दिखने में छोटी होती है पर इसका महत्व सबसे अधिक होता है। यह रेखा कनिष्ठिका उंगली के नीचे, हृदय रेखा के ऊपर, बुध पर्वत के बगल में हथेली के बाहर निकलते समय जो आड़ी रेखाएं दिखाई देती हैं वे रेखाएं ही विवाह रेखाएं कहलाती हैं। हथेली में ऐसी रेखाएं दो-तीन या चार हो सकती हैं पर उन सभी रेखाओं में एक रेखा मुख्य होती है। यदि ये रेखाएं हृदय रेखा से ऊपर हों तो वे विवाह रेखाएं

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कहलाती हैं और ऐसे व्यक्ति का विवाह निश्चय ही होता है। परन्तु ये रेखाएं हृदय रेखा से नीचे हों तो ऐसे व्यक्ति का विवाह जीवन में नहीं होता । यदि हथेली में दो या तीन विवाह रेखाएं हों तो जो रेखा सबसे अधिक लम्बी पुष्ट और स्वस्थ हो उसे विवाह रेखा मानना चाहिए। बाकी की रेखाएं इस बात की सूचक होती हैं कि या तो विवाह से पूर्व उतने संबंध होकर छूट जायेंगे अथवा विवाह के बाद उतने अन्य स्त्रियों से सम्पर्क रहेंगे। पर इसके साथ ही साथ जो छोटी-छोटी रेखाएं होती हैं वे रेखाएं प्रणय रेखाएं कहलाती हैं। ये जितनी रेखाएं होंगी व्यक्ति के जीवन में उतनी ही पर स्त्रियों का सम्पर्क रहेगा । यही बात स्त्रियों के हाथ में भी लागू होती है । पर केवल ये रेखाएं देखकर ही अपना मत स्थिर नहीं कर लेना चाहिए, पर्वतों का अध्ययन भी इसके साथ-साथ आवश्यक है । यदि इस प्रकार की रेखाएं हों और गुरु पर्वत ज्यादा पुष्ट हो तो निश्चय ही ऐसा व्यक्ति प्रेम संबंध स्थापित करता है पर उसका प्रेम सात्विक और निर्दोष होता है। यदि शनि पर्वत विशेष उभरा हुआ हो और ऐसी रेखाएं हों तो व्यक्ति अपनी आयु से बड़ी आयु की स्त्रियों से प्रेम संबंध स्थापित करता है। यदि हथेली में सूर्य पर्वत पुष्ट हो और ऐसी रेखाएं हों तो व्यक्ति बहुत अधिक सोच विचार कर अन्य स्त्रियों से प्रेम सम्पर्क स्थापित करता है । यदि बुध पर्वत विकसित हो तथा प्रणय रेखाएं हाथ में दिखाई दें तो ऐसे व्यक्ति को भी प्रेमिकाओं से धन लाभ होता है। यदि हथेली में प्रणय रेखाएं हों और चन्द्र पर्वत विकसित हो तो व्यक्ति काम लोलुप तथा सुन्दर स्त्रियों के पीछे फिरने वाला होता है। यदि शुक्र पर्वत बहुत अधिक विकसित हो तथा प्रणय रेखाएं हों तो वह अपने जीवन में कई स्त्रियों से सम्बन्ध स्थापित करता है तथा उसमें पूर्ण सफलता प्राप्त करता है । प्रणय रेखा का हृदय रेखा से गहरा सम्बन्ध होता है । ये प्रणय रेखाएं हृदय रेखा से जितनी अधिक नजदीक होंगी व्यक्ति उतनी ही कम उम्र में प्रेम सम्बन्ध स्थापित करेगा । और ये प्रणय रेखाएं हृदय रेखा से जितनी अधिक दूर होंगी जीवन में प्रेम सम्बन्ध उतना ही अधिक विलम्ब से होगा । यदि हथेली में प्रणय रेखा न हो तो व्यक्ति अपने जीवन में संयमित रहते हैं तथा वे काम लोलुप नहीं होते । यदि प्रणय रेखा गहरी तथा स्पष्ट हो तो उस व्यक्ति के प्रणय संबंध भी गहरे बनेंगे । परन्तु यदि ये प्रणय रेखाएं छोटी तथा कमजोर हों तो उस व्यक्ति के प्रणय संबंध भी बहुत कम समय तक चल सकेंगे । यदि दो प्रणय रेखाएं साथ-साथ आगे बढ़ रही हों तो उसके जीवन में एक साथ दो स्त्रियों से प्रेम सम्बन्ध चलेंगे ऐसा समझना चाहिए । यदि प्रणय रेखा पर क्रॉस