योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
६६० योगवाशिष्ठ
सब आकाशरूप है। जगत् कुछ बना नहीं-भ्रममात्र है। जैसे आकाश में नीलिमा भ्रममात्र है, और दूर नहीं होती, वैसे ही यह जगत् भ्रम से भासित होता है, परन्तु है नहीं। जैसे आकाश में नाना प्रकार के तरुवर दिखें, वैसे ही आत्मा में जगत् भासित होता है। जैसे काठ की पुतली काठरूप होती है, वैसे ही यह जगत् भ्रमरूप है। जो कुछ भ्रम में भिन्न भासता है, वह सब भविष्यन्नगर में असत्य है और जो कुछ तुम्हें देख पड़ता है, वह कुछ नहीं, केवल मन कल्पना से रहित, शुद्ध-संविद्, जड़ता बिना, मुक्तस्वभाव, एक, अद्वैत आत्मसत्ता स्थित है। वह केवल आकाशरूप है। उसमें जगत् भी वही रूप है। वह पाषाण की शिला सदृश ठोस और मौन है। तुम भी उसी रूप में स्थित हो जाओ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे जीवन्मुक्तलक्षणवर्णनन्नाम द्विशताधिकैकोनविंशतितमस्सर्गः ॥ २१६ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! उस राजा विपश्चित् ने फिर क्या किया ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो उनकी दशा हुई, सो सुनो। पश्चिम दिशा का विपश्चित् वन में विचरता फिरता था कि एक मत्त हाथी के आगे जा पड़ा और उसने उसे पहाड़ की कन्दरा में मार डाला। दूसरे विपश्चित् को राक्षस ले गया और बड़वाग्नि में डाल दिया। वहाँ अग्नि ने उसे भक्षण कर लिया। तीसरे विपश्चित् को एक विद्याधर स्वर्ग में ले गया। उसने वहाँ इन्द्र का मान न किया, इसलिए उसको इन्द्र ने शाप दिया और यह भस्म हो गया। इसी प्रकार चौथा भी मरा। उसके एक मच्छ ने आठ टुकड़े कर डाले। जैसे प्रलयकाल में लोक भस्म हो जाते हैं, वैसे ही चारों विपश्चित् मर गये। तब उनकी संविद् आकाशरूप हुई, परन्तु उनको जगत् देखने का संस्कार था, इससे उनकी आकाशरूप संवित् फिर जगी, उससे जाग्रत् भासित होने लगा। उसने पृथ्वी, द्वीप, समुद्र, स्थावर, जङ्गमरूप जगत् को देखा और अन्तवाहक शरीर से वे चेष्टा करने लगे। उनमें से एक पश्चिम दिशा का विपश्चित् विष्णु भगवान् के स्थान में मरकर निर्वाण हो
✻ निर्वाण प्रकरण ✻ ६६१
गया इससे उसकी संवित् में सब अर्थ शून्य हो गये और वह वहाँ मुक्त हुआ। एक मच्छ के उदर में सहस्र वर्ष पर्यन्त रहा। फिर एक देश का राजा हुआ और वहाँ राज्य करने लगा। एक चन्द्रमा के निकट गया, वहाँ मरकर चन्द्रमा के लोक को पहुँचा। और एक बहता हुआ समुद्र के पार हुआ और आगे चौरासी हजार योजन पृथ्वी को नाँघता गया। इसी प्रकार चारों फिर जिये और समुद्र, वन और पर्वतों को नाँघते गये।
सबको आगे दशसहस्र योजन सुवर्ण की पृथ्वी मिली, जहाँ देवताओं के विचरने के स्थान हैं। उसको भी वे नाँघते गये। आगे लोकालोक पर्वत आया, जिसने सब पृथ्वी को घेर लिया है। जैसे वृक्षों से वन का आवरण होता है, वैसे ही उस पर्वत ने पचास कोटि योजन पृथ्वी का आवरण किया है। वह पचास हजार योजन ऊँचा है—वे उस लोकालोक पर्वत में पहुँचे, जहाँ तारों का नक्षत्रचक्र घूमता है। उसको भी वे नाँघ गये। उसमें आगे एक शून्य नक्षत्र था। वह महाशून्य था। वहाँ पृथ्वी, जल आदि कोई तत्त्व न था। एक शून्य आकाश है, जहाँ न कोई स्थावर पदार्थ है, न कोई जङ्गम पदार्थ है, न कोई उपजता है न कभी मिटता है। उसको भी उन्होंने देखा। इसी प्रकार सम्पूर्ण भूगोल उन्होंने देखा। राम ने पूछा, हे भगवन् ! भूगोल क्या है? किसके आश्रय में है? उसके ऊपर क्या है? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे गेंद होता है, वैसे भूगोल है और वह संकल्प के आश्रय में है। उसके सब ओर आकाश है। सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र सहित यह चक्र फिरता है। हे राम ! यह कोई वस्तु बुद्धि से नहीं बनी, संकल्प से बनी है। जो वस्तु बुद्धि से बनी होती है, वह क्रम से स्थित होती है, पर यह तो विपर्यरूप से स्थित है। पृथ्वी के चहुँफेर दसगुना जल है। उसके बाद दसगुनी अग्नि है। उसके उपरान्त दसगुना वायु है और फिर ब्रह्माण्ड खप्पर है।
वह खप्पर एक नीचे और एक ऊपर को गया है उसके मध्य में जो पोल है, वह आकाश है, जो वज्रसार की नाईं है। इसका विस्तार
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अनन्तकोटि योजन है। उस ब्रह्माण्ड का उसमें भूगोल है। उसके उत्तर में सुमेरु पर्वत, पश्चिम में लोकालोक पर्वत है, और ऊपर नक्षत्रचक्र घूमता है। जहाँ वह जाता है, वहाँ प्रकाश होता है, और जहाँ वह नहीं होता, वहाँ तमरूप भासित होता है सो सब संकल्प की रचना है। जैसे बालक संकल्प से पत्थर का बट्टा रचे, वैसे ही चैतन्यरूपी बालक ने यह संकल्परूपी भूगोल रचा है। हे राम! जैसे-जैसे उस समय उसमें निश्चय हुआ है वैसे ही वैसे वह स्थित हुआ है। जहाँ पृथ्वी रची है, वहीं वह स्थित है। जहाँ खात रचा है, वहाँ खात ही है। परन्तु जैसे स्वप्न में अविद्यमान प्रतिभा होती है वैसे ही भूगोल है। हे राम! जिनको ऐसा ज्ञान है कि सुमेरु में देवता और पूर्वाद दिशाओं में मनुष्य आदि जीव रहते हैं, वे पण्डित होने पर भी मूर्ख हैं; क्योंकि ये देवता आदि तो भ्रममात्र हैं, कुछ बने नहीं। जो मुझ सरीखे तत्त्ववेत्ता हैं, उनको ज्ञाननेत्र से आत्मसत्ता ज्यों की त्यों दिखती है, और जो अज्ञानी मन सहित षट् इन्द्रियों से देखते हैं, उनको जगत् दिखता है; ज्ञानवानों को परब्रह्म सूक्ष्म ज्यों का त्यों भासता है। वे जगत् को असत् जानते हैं। जैसे आकाश में अनहोती नीलमा दिखती है, वैसे ही आत्मा में अनहोता जगत् दिखता है। जैसे नेत्र दोष से आकाश में तरुवर दिखते हैं, वैसे ही अज्ञान से आत्मा में जगत् भासित होता है। सो वह केवल आभासमात्र है।
हे राम! जगत् उपजा भी दिखता है। और नष्ट होता भी दिखता है, परन्तु बना कुछ नहीं। जैसे संकल्प का रचा नगर अपने मन में भासित होता है, वैसे ही यह जगत् मन में फुरता है। यह सम्पूर्ण भूगोल संकल्प में स्थित है। जैसे बालक संकल्प करके पत्थर का बट्टा रचे, वैसे ही भूगोल है। यह ब्रह्माण्ड सोकोटि योजन पर्यन्त विस्तृत है। उसका एक भाग नीचे गया है और एक ऊपर को। उसमें चैतन्य रूपी बालक ने यह भूगोल रचा है, सो संकल्प के आश्रय से खड़ा है। जैसे आदि नीति हुई है, वैसे ही भासता है। इस पृथ्वी के उत्तर में सुमेरु पर्वत है, पश्चिम और लोकालोक पर्वत है और ऊपर तारों और
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नक्षत्रों का चक्र घूमता है। लोकालोक के जिस ओर वह आता है, उस ओर प्रकाश होता है। भूगोल ऐसे है, जैसे गेंद होता है। उसके एक ओर पाताल, एक ओर स्वर्ग है और एक ओर मध्यमण्डल है। आकाश सब ओर है। पातालवासी जानते हैं कि हम ऊपर हैं, आकाशवासी जानते हैं कि हम ऊपर हैं और मध्यवासी जानते हैं कि हम ऊपर हैं। इस प्रकार भूगोल है। उसके ऊपर महातमरूप एक शून्य खात है। वहाँ न पृथ्वी है, न कोई पहाड़ है, न स्थावर है, न जङ्गम है और न कुछ उपजा है। उसके ऊपर एक सुवर्ण की दीवार है, जिसका विस्तार दस सहस्र योजन है। उसके ऊपर दसगुना जल है। वह पृथ्वी को चहुँफेर से घेरे है। उससे परे दसगुना अग्नि है। फिर दसगुना वायु है। उसके आगे आकाश है। फिर ब्रह्माकाश महाकाश है, जिसमें अनन्त ब्रह्माण्ड स्थित हैं। परन्तु ये तत्त्व जैसे तृण के आश्रय से कपूर ठहरता है, वैसे ही पृथ्वीभाग के आश्रय से ठहरे हैं। वास्तव में यह शुद्ध चैतन्य ब्रह्म का चमत्कार है, जो आकाशवत् निर्मल है। उसमें कोई क्षोभ नहीं है। वह परमशान्त, अनन्त और सबका अपना रूप है।
हे राम ! अब फिर विपश्चित् का वृत्तान्त सुनो। जब वे लोकालोक पर्वत पर पहुँचे, तब एक शून्य खात (खाई) उनको देख पड़ा। वह पर्वत से उतरकर खात में जा पड़े। वह खात भी पर्वत के शिखर पर था। वहाँ शिखर की नाईं बड़े-बड़े पक्षी भी रहते थे, इस कारण उन पक्षियों ने चोंचों से इनके शरीर चूर्ण किये। तब उन्होंने अपने स्थूल शरीर को त्यागकर अपना सूक्ष्म अन्तवाहक शरीर जाना। राम ने पूछा, हे भगवन् ! आधिभौतिकता कैसे होती है और अन्तवाहक क्या है ? फिर उन्होंने क्या किया ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे कोई संकल्प में दूर से दूर चला जाय तो जिस शरीर से जाय वह अन्तवाहक है; और जो पाञ्चभौतिक शरीर प्रत्यक्ष दिखता है वह आधिभौतिक है। जब मार्ग में कहीं जाने को चित्त में संकल्प उठता है, तब स्थूल शरीर गये बिना नहीं पहुँच सकता और जब मार्ग में
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चले तब पहुँचता है, वहाँ आधिभौतिक है और यह प्रमाद से होता है । जैसे रस्सी का भूलने से सर्प दिखता है, वैसे ही आत्मा के अज्ञान से आधिभौतिक शरीर भासित होता है, और जैसे कोई मनोराज्य का पुर बनाकर उसमें आप भी एक शरीर बनकर चेष्टा करता फिरे तो उसे जब तक पूर्व का शरीर नहीं भूलता, तब तक वह संकल्प शरीर से चेष्टा करता है । वहाँ आन्तवाहक है । उस शरीर को संकल्पमात्र जानना 'विशेष बुद्धि' कहलाता है, आत्मबोध हुए बिना जो उस संकल्पशरीर में दृढ़ भावना होती है, तो उसका नाम आधिभौतिक होता है—वह घट-पट कहलाता है । इसमें जबतक शरीर का स्मरण है, तब तक आधिभौतिकता नहीं निवृत्त होती । और जब शरीर का विस्मरण होता है, तब आधिभौतिकता मिट जाती है । विपश्चित् आत्मबोध से रहित थे और जहाँ चाहते थे वहाँ चले जाते थे, पर स्वरूप से न कुछ आन्तवाहक है और न कुछ आधिभौतिक है । प्रमाद से ये सब आकार भासित होते हैं । वास्तव में सब चिदाकाशरूप है, दूसरी वस्तु कुछ नहीं बनी, सब वही है, और उसी के प्रमाद से विपश्चित् अविद्याकृत जगत् को देखने चले थे । वह अविद्या भी कुछ दूसरी वस्तु नहीं—ब्रह्म ही है, तब ब्रह्म का अन्त कहाँ आवे ? वहाँ से वे चले, परन्तु जानते थे कि हमारा आन्तवाहक शरीर है ।
निदान वे सब पृथ्वी को नाँघ गये । फिर जल को भी नाँघ गये । उनके बाद जो सूर्य सा दाहक अग्नि का आवरण प्रकाशमान है, उसको भी नाँघकर मेघ और वायु के आवरण को भी नाँघ गए । फिर आकाश को भी नाँघ गये । उनके बाद ब्रह्माकाश था, जहाँ उनको संकल्प के अनुसार फिर जगत् भासित होने लगा, पर उनको भी वे नाँघ गये । फिर आगे ब्रह्माकाश मिला, फिर उनको पञ्चभूत भासित हुए । उनके आवरण को भी वे नाँघ गये । फिर उस ब्रह्माण्डकपाट के बाद तत्त्वों को नाँघकर ब्रह्माकाश मिला । उसमें एक और पाञ्चभौतिक ब्रह्माण्ड था । उसको भी नाँघ गये, पर अन्त न पाया । स्वरूप के प्रमाद से दृश्य का अन्त जानने को वे भटकते फिरे, पर अविद्यारूप संसार का अन्त कैसे
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ६६५
आवे ? यह जीव तब तक अन्त लेने को भटकता फिरता है, जब तक अविद्या नहीं नष्ट होती; जब अविद्या नष्ट होगी, तभी अविद्यारूप संसार का अन्त होगा । हे राम ! जगत् कुछ बना नहीं, वही ब्रह्माकाश ज्यों का त्यों स्थित है । उसका न जानना ही संसार है । जब तक उसका प्रमाद है, तब तक जगत् का अन्त न आवेगा । जब स्वरूप का ज्ञान होगा, तब अन्त आवेगा । सो वह जानना क्या है ? चित्त का निर्वाण करना ही जानना है । जब चित्त का निर्वाण होगा; तब जगत् का अन्त आवेगा । जब तक चित्त भटकता फिरता है, तब तक संसार का अन्त नहीं आता । इससे चित्त का नाम ही संसार है । जब चित्त आत्म-पद में स्थित होगा, तब जगत् का अन्त होगा । इस उपाय के बिना शान्ति नहीं प्राप्त होती ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विपश्चिदुपाख्यानवर्णनं नाम द्विशताधिकविंशतितमः सर्गः ॥ २२० ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! वे जो दो विपश्चित् थे, उनकी क्या दशा हुई, यह भी कहो । वे तो दोनों एक ही थे । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! एक का तो निर्वाण हुआ था, दूसरा ब्रह्माण्डों को नाँघता-नाँधता और एक ब्रह्माण्ड में गया । वहाँ उसको सन्तों का संग प्राप्त हुआ । उनकी संगति से उसको ज्ञान हुआ । ज्ञान को पाकर वह भी निर्वाण हो गया । बाकी एक अब तक दूर फिरता है और एक यहाँ पहाड़ की कन्दरा में मृग होकर विचरणता है । हे राम ! यह जगत् आत्मा का आभास है । जैसे सूर्य की किरणों में जल दिखता है और जब तक किरणें हैं, तब तक जलाभास निवृत्त नहीं होता, वैसे ही जबतक आत्म-सत्ता है, तब तक जगत् का चमत्कार निवृत्त नहीं होता और आत्मा के जानने से जगत्सत्ता नहीं रहती । जैसे किरणों के अदृश्य होने से जलाभास नहीं रहता और जो जल दिखता है तो भी किरणों ही की सत्ता भासित होती है, वैसे ही आत्मा के जाने से आत्मा की सत्ता ही भासती है—भिन्न जगत् की सत्ता नहीं भासित होती । राम ने पूछा, हे भगवन् ! विपश्चित् एक ही था तो एक ही संवित् में भिन्न-भिन्न
६६६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
वासना कैसे हुई ? एक मुक्त हो गया, एक मृग होकर फिरता रहा और एक आगे निर्वाण हो गया—वह भिन्नता कैसे हुई ? संवित् तो एक ही था, उसमें कम और अधिक फल कैसे प्राप्त हुए ! वशिष्ठजी बोले, हे राम ! वासना देश, काल और पदार्थों से होती है । उसमें जिसकी दृढ़ भावना होती है, उसकी जय होती है । जैसे एक पुरुष ने मनोराज्य में अपनी चार मूर्तियाँ कल्पित कीं और उनमें भिन्न-भिन्न वासना स्थापित कीं, पर संवित् तो एक है, यदि पहले का शरीर भूलकर उनमें दृढ़ हो गये तो जैसी-जैसी भावना उनके शरीर में दृढ़ होती है, वही प्राप्त होती है, वैसे ही संवित् में नाना प्रकार की वासनाएँ फुरती हैं । जैसे एक ही संवित् स्वप्न में नाना प्रकार रचती है और वासना भिन्न-भिन्न होती है, वैसे ही आकाशरूप संवित् में भिन्न-भिन्न वासना होती है ।
हे राम ! उनकी संवित् एक थी, परन्तु देश, काल और क्रिया से वासना भिन्न-भिन्न हो गई और पूर्व की संवित् स्मृति भूल गई, उससे उन्होंने न्यून और अधिक फल पाये । उस संवित् का क्या रूप है ? हे राम ! देश से देशान्तर को जो संवेदन जाता है, उसके बीच जो संवित्-सत्ता है, वह ब्रह्मसत्ता है । जाग्रत् के आकार को छोड़ने और स्वप्न में आने के मध्य जो ब्रह्मसत्ता है, वह किञ्चनरूप जगत् होकर भासित होती है, परन्तु किञ्चन भी कुछ भिन्न वस्तु नहीं । वह एक है, न दो है, एक कहना भी नहीं होता तो दो कहाँ हो और जगत् कहाँ हो ? यही अविद्या है कि न होने पर भी भासती है । जैसी-जैसी वासना फुरती है, उसमें जो दृढ़ होती है, उसकी जय होती है । इस कारण एक विपश्चित जनार्दन (विष्णु) के स्थान में निर्वाण को प्राप्त हो गया और दूसरा दूर से दूर ब्रह्माण्ड को नाँघता गया । उस मन्तों का संग प्राप्त हुआ, जिससे ज्ञान उदय होकर वासना मिट गई और उसका अज्ञान नष्ट हो गया । जैसे सूर्य का उदय होने पर अन्धकार नष्ट हो जाता है, वैसे ही जब उसका अज्ञान नष्ट हो गया, तब वह उस पद को प्राप्त हुआ जिसके अज्ञान में जीव दूर से दूर भटकता है । तीसरा दूर से दूर भटकता फिरता है और चौथा पहाड़ की कन्दरा में मृग होकर
८६८ श्री योगवाशिष्ठ
ब्रह्मरूपी आदर्श में प्रतिबिम्बित होते हैं। इस कारण यह मृग विपश्चित् है, उसी निश्चय को धारण किये हुए है। यह और वह जो पहाड़ की कन्दरा में है दोनों तुल्य हैं। राम ने पूछा, हे भगवन्! वह विपश्चित् अब कहाँ है और उसका क्या आचार है? अब मैं जानता हूँ कि उसका कार्य हुआ है। अब चलकर मुझको दिखाओ और इसके दर्शन देकर अज्ञान पाश से मुक्त करो।
इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले, हे अङ्ग! जब रामजी ने इस प्रकार कहा, तब मुनिशार्दूल वशिष्ठजी बोले, हे राम! जहाँ तुम्हारा न्हाना का स्थान है और तुम क्रीड़ा करते हो उस जगह वह मृग बँधा हुआ है। यह तुमको लिङ्गदेश के राजा ने दिया है और बहुत सुन्दर है, इस कारण तुमने उसे रक्खा है। उसको मँगाओ। तब रामजी ने अपने भृत्याओं मे, जो निकटवर्ती थे, कहा कि उस मृग को सभा में ले आओ। हे राजन्! जब इस प्रकार रामजी ने कहा, तब वे सभा में उस मृग को ले आये और जितने श्रोता सभा में बैठे थे वे बड़े आश्चर्य को प्राप्त हुए। वह मृग बड़ी गर्दन से बड़ा सुन्दर और कमल दल से विशाल नेत्रवाला था। कभी वह घास खाने लगता, कभी सभा में खेलता और कभी ठहर जाता। तब रामजी ने कहा, हे भगवन्! आप इसको कृपा करके मनुष्य बना दीजिये और उपदेश करके जगाइये, जिससे हमारे साथ प्रश्न-उत्तर करे। अभी तो यह प्रश्न-उत्तर नहीं करता। वशिष्ठजी बोले, हे राम! इस प्रकार इसको उपदेश न लगेगा, क्योंकि जिसका कोई इष्ट होता है, उसी से उसको सिद्धि होती है। इससे मैं इसके इष्ट को ध्यान करके बुलाता हूँ—इससे इसका कार्य सिद्ध होगा। वाल्मीकिजी बोले, हे राजन्! इस प्रकार कहकर वशिष्ठजी ने कमण्डलु हाथ में लेकर तीन बार आचमन किया और पद्मासन बाँध, नेत्र मूँद, ध्यान में स्थित होकर अग्नि का आवाहन किया। हे अग्नि देव! यह तुम्हारा भक्त है, इसकी सहायता और इस पर दया करो। तुम सन्तों का दयालु स्वभाव है! जब वशिष्ठजी ने ऐसे कहा, तब सभा में बड़े तेजस्वी अग्नि की ज्वाला काष्ठ-अङ्गार से रहित प्रकट हुई और जलने लगी। जब ऐसे
- निर्वाण प्रकरण * ६६६
अग्नि जागी, तब वह मृग उसे देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और उसके चित्त में बड़ी भक्ति उत्पन्न हुई ।
तब वशिष्ठजी ने नेत्र खोलकर अनुग्रह सहित मृग की ओर देखा । उससे उसके सम्पूर्ण पाप भस्म हो गये । वशिष्ठजी ने अग्नि से कहा, हे भगवन्, यह तुम्हारा भक्त है । अपना पहले की भक्ति स्मरण करके इस पर दया करो और इसके मृगशरीर को दूर करके इसको विपश्चित् शरीर दो, जिससे यह आधिव्याश्रम में मुक्त हो । हे राजन् ! इस प्रकार अग्नि से कहकर वशिष्ठजी राम से बोले, हे राम ! अब यह मृग अग्नि में प्रवेश करेगा, तब इसका मनुष्यशरीर हो जायगा । वशिष्ठजी ऐसे कहते ही थे कि वह मृग अग्नि को देखकर एक चरण पीछे को हटा और उछलकर अग्नि में प्रवेश कर गया । जैसे बाण निशाने में प्रवेश करते हैं, वैसे ही उसने प्रवेश किया । हे राजन् ! उस मृग को कुछ खेद न हुआ, बल्कि उसको अग्नि आनन्दरूप देख पड़ा । तब उसका मृगशरीर अन्तर्धान हो गया । वह महाप्रकाशरूप मनुष्यशरीर धारण किये अग्नि से निकला । जैसे कपड़े के ओढ़े से स्वाँगिया स्वाँग धरकर निकल आता है, वैसे ही वह निकल आया । वह अति सुन्दर वस्त्र पहने हुए, शीश पर मुकुट, कण्ठ में रुद्राक्ष की माला और यज्ञोपवीत धारण किये था । अग्नि सा वह तेजस्वी था । सभा में जो लोग बैठे थे, उनसे भी अधिक उसका तेज था—मानो अग्नि को भी लज्जित कर रहा हो । जैसे सूर्य के उदय होने पर चन्द्रमा का प्रकाश फीका हो जाता है, वैसे ही वह सबसे अधिक प्रकाश मान हो गया । फिर जैसे समुद्र से तरङ्ग निकलकर लीन हो जाता है, वैसे ही वह अग्नि अन्तर्धान हो गये । यह देखकर राम को आश्चर्य हुआ और सब सभा विस्मय को प्राप्त हुई ।
तब बड़े प्रकाश से युक्त विपश्चित् निकलकर ध्यान में लग गया । विपश्चित् से लेकर इस शरीर तक अपने सब शरीर स्मरण करके नेत्र खोल वशिष्ठजी के निकट आ साष्टाङ्ग प्रणाम कर बोला, हे ब्राह्मण ! ज्ञान के सूर्य और प्राण के दाता ! तुमको मेरा नमस्कार है ।
७०० ✵ योगवाशिष्ट ✵
हे राजन् ! जब इस प्रकार उसने कहा तब वशिष्ठजी ने उसके शिर पर हाथ रक्खा और कहा, हे राजन् ! तू उठ खड़ा हो। अब मैं तेरी अविद्या दूर करूँगा और तू अपने स्वरूप को प्राप्त होगा। तब राजा विपश्चित ने उठकर राजा दशरथ को प्रणाम किया और बोला, हे राजन् ! तुम्हारी जय हो। राजा दशरथ ने आसन से उठकर कहा, हे राजन् ! तुम बहुत दूर फिरते रहे हो, अब यहाँ मेरे पास बैठो। विश्वामित्र आदि जो ऋषि बैठे थे, उनको यथायोग्य प्रणाम करके राजा विपश्चित बैठ गया। राजा दशरथ ने विपश्चित को, जो बड़े प्रकाश को धारण किये था, भाम कहके बुलाया और कहा, हे भाम ! तुम संसारभ्रम के लिए चिरकाल फिरते रहे हो; थके होगे, अब विश्राम करो और जो-जो देश-काल-क्रिया की है और देखा है, सो कहो। यह आश्चर्य है कि अपने मन्दिर में सोये हो और निद्रादोष से गड्ढे में गिरते फिरे और देश-देशान्तर में भटकते फिरे। यही अविद्या है। हे भाम ! जैसे वन का विचरनेवाला हाथी जंजीर में बँधा हुआ दुःख पाता है वैसे ही तुम विपश्चित भी थे और अविद्या से जगत् के देखने के लिए भटकते रहे। हे राजन् ! जगत् कुछ वस्तु नहीं है, पर भासित होता है, यही माया है। जैसे भ्रम से आकाश में नाना प्रकार के रङ्ग दिखते हैं, वैसे ही अविद्या से ये जगत् भासित होने और सत्य प्रतीत होने हैं, पर सब आकाशरूप हैं और आकाश में स्थित हैं। उस आकाश में जो कुछ तुमने आत्मरूपी चिन्तामणि के चमत्कार में देखा है, वह कहो।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे विपश्चिद्दर्शनंनाम द्विशताधिकैकविंशतितमःसर्गः॥ २२१ ॥
दशरथजी बोले, हे भाम ! बड़ा आश्चर्य है कि तुम विपश्चित बुद्धिमान थे, और चेष्टा से तुमने अविपश्चित (मूर्ख) बुद्धि की है, जो अविद्या के देखने को समर्थ हुए थे। यह जगत्प्रतिभा तो मिथ्या है; असत्य के ग्रहण की इच्छा तुमने क्यों की ? वाल्मीकिजी बोले, हे राजन् ! जब इस प्रकार राजा दशरथ ने कहा, तब प्रसंग पाकर
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ७०१
विश्वामित्र बोले. हे राजन्, दशरथ ! यह चेष्टा वही करता है, जिसको परम बोध नहीं होता, पर केवल मूर्ख और अज्ञानी भी नहीं होता, क्योंकि जिसको परमबोध और आत्मा का अनुभव होता है, वह जगत् को अविद्याकृत जानता है और उस अविद्याकृत जगत् का अन्त जानने को इतना यत्न नहीं करता, क्योंकि वह तो उसे असत्य जानता है। और जो देहाभिमानी मूर्ख अज्ञ है, वह भी यह यत्न नहीं करता, क्योंकि उसको देखने की सामर्थ्य भी नहीं होती। इससे मध्य भावी है। जो आत्मबोध से रहित है और जिसने आधिभौतिक शरीर का त्याग किया है, वही संसार देखने का यत्न करता है। जिनको उत्तम बोध नहीं हुआ, वे इस प्रकार बहुत भटकते फिरते हैं। हे राजन् ! इसी प्रकार वटधामा भी इसी ब्रह्माण्ड में फिरते हैं। मन्तर लाख वर्ष इनको इसी ब्रह्माण्ड में फिरते व्यतीत हुए हैं। उन्होंने भी यही निश्चय धारण किया है कि पृथ्वी कहाँ तक चली जाती है। इस निश्चय से वे निवृत्त नहीं होते और इसी ब्रह्माण्ड में घूमते हैं। उनको अपनी वासना के अनुसार विपरीत और ही और स्थान भासित होते हैं।
हे राजन् ! जैसे किसी बालक का रचा संकल्प का वृक्ष आकाश में हो, वैसे ही यह भूगोल ब्रह्मा के संकल्प से स्थित है। संकल्प से गेंद के समान आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी इन पाँचों तत्त्वों का यह ब्रह्माण्ड रचा है। उसके चौफेर चींटियाँ फिरती हैं। जिस ओर से वे जाती हैं, वह ऊर्ध्व दिखता है सो ओर ही निश्चय होता है। वैसे ही इस संकल्प के रचे भूगोल के किसी कोण में वटधामा जीव हुआ है। हे राजन् ! उसके तीन पुत्र थे। उनके मन में यह संकल्प उदय हुआ कि हम जगत् का अन्त देखें। इसी संकल्प में फिरत-फिरते वे पृथ्वी नाँघते हैं। पृथ्वी और जल आता है। जल को नाँघते हैं। फिर आकाश आता है। फिर पृथ्वी, जल, वायु फिर उसी भूगोल के चौफेर फिरते हैं। जैसे आकाश में गेंद हो, वैसे ही यह पृथ्वी आकाश में है। इसका नीचे ऊपर कोई नहीं। चरण नीचे शिर ऊपर, इसी तरह वट-
७०२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
धाना जीव उर्मी के चौफेर घूमते रहे, परन्तु अपने निश्चय में और का और जानते रहे। जब तक स्वरूप का प्रमाद है, तब तक जगत् का अभाव नहीं होता और जब आत्मा का साक्षात्कार होता है, तब जगत् ब्रह्मरूप हो जाता है। जगत् कुछ बना नहीं, फुरने में भासित होता है। जैसे स्वप्न में अज्ञान में अनन्त जगत् दीखते हैं। यह फुरना परब्रह्म में हुआ है, जो फुरने में है, वह भी परब्रह्म है। कुछ बना नहीं—आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है। जैसे पत्थर की शिला ठोस होती है, वैसे ही आत्मतत्त्व चैतन्यघन है। जैसे आकाश और शून्यता में कुछ भेद नहीं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं। सब कल्पना परब्रह्मरूप है और ब्रह्म ही कल्पनारूप है। इस जड़ और चैतन्य में कुछ भेद नहीं। हे राजन् ! जिसको जगत् कहते हो, वह ब्रह्मसत्ता ही है। न कुछ उत्पन्न हुआ है और न प्रलय होता है-सब ब्रह्म ही है। जैसे पहाड़ में पत्थर के सिवा कुछ नहीं होता, वैसे ही यह जगत् ब्रह्मसत्ता के सिवा कुछ नहीं। जैसे पाषाण की पुतली पाषाणरूप ही है, वैसे ही यह जगत् ब्रह्मरूप ही है। एक सूक्ष्म अनुभवअणु में अनेक अणु होते हैं, जैसे एक पहाड़ में अनेक शिलाएँ होती हैं। हे राजन् ! जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, उनको जगत् ब्रह्मरूप भासित होता है और जो अज्ञानी हैं उनको नाना प्रकार भासित होता है। जगत् कुछ वस्तु नहीं है, परन्तु जब तक संकल्प है, तब तक जगत् फुरता है। जैसे रत्नों की चमक होती है, वैसे ही जगत् आत्मा का चमत्कार है। चैतन्य आत्मा के आश्रय में अनन्त सृष्टियाँ फुरती हैं, अतः सब सृष्टि आत्मरूप है। आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु नहीं। जो जाग्रत् पुरुष ज्ञानवान् हैं, उनको ब्रह्मरूप ही दिखता है और जो अज्ञानी हैं उनको नाना प्रकार का जगत् दिखता है।
हे राजन् ! कुछ लोग इसे शून्य कहते हैं कि अर्थात् यह शून्य ही है, और कुछ नहीं। कुछ इसको जगत् कहते हैं और कुछ ब्रह्म कहते हैं। जिस किसी को निश्चय होता है, उनको वैसा रूप दिखता है। आत्मरूपी चिन्तामणि है, जैसा-जैसा संकल्प उसमें फुरता है, वैसा-वैसा ही भासित होता है। सबका अधिष्ठान ब्रह्मसत्ता है। जैसा-जैसा उसमें
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ७०३
निश्चय होता है, वैसा ही वैसा होकर भासित होता है । द्रष्टा, दर्शन, दृश्य—त्रिपुटी जो दिखती है, वह भी ब्रह्म होकर भासित होती है, द्वितीय कुछ वस्तु नहीं और जो कुछ दिखता है, वही अज्ञान है । हे राजन् ! जब तक वासना नष्ट नहीं होती, तब तक दुःख भी नहीं मिटते, और जब वासना मिट जाती है, तब सब जगत् ब्रह्मरूप अपनारूप ही भासित हो और रागद्वेष किसी में न रहता । जैसे स्वप्न में नाना प्रकार की सृष्टि दिखती है, जब पूर्व का स्वरूप स्मरण होता है तो सब रूप आप ही हो जाता है और रागद्वेष मिट जाता है, वैसे ही ज्ञानवान् को यह जगत् ब्रह्मरूप अपनारूप भासित होता है और विकार से रहित होता है । पूर्व, अपूर्व और अपर को विचारना कि यह शुभ है और यह अशुभ है और अशुभ का त्याग करना, यह गौण विचार है । जब-तक पूर्वापर विचार मन में रहता है, तब तक जीव जगत् में भटकता है और बँधा रहता है, क्योंकि शुभ-अशुभ दोनों जगत् में हैं । जब इनका विस्मरण हो जाय और सम्पूर्ण जगत् को भ्रममात्र जानकर आत्मपद में सावधान हो, तब जीव मुक्त होता है । इस जीव के बन्धन का कारण अपनी वासना ही है । जब तक जगत् में वासना होती है तब तक राग-द्वेष उपजता है और जीव उससे बँधा रहता है । जिनको जगत् के सुख-दुःख में रागद्वेष की भावना नहीं उपजती, और वासना भी नष्ट हो जाती है, उनको यह जगत् ब्रह्मरूप अपनारूप ही दिखता है और जगत् में दुःखदायक कुछ नहीं रहता । उनको सब ब्रह्म ही दिखता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे वटधानोपाख्यानवर्णनन्नाम द्विशताधिकद्वाविंशतितमस्सर्गः ॥ २२२ ॥
दशरथजी ने विपश्चित् से पूछा, हे भास ! तुम चिरकाल पर्यन्त जगत् में फिरते रहे हो । जिस प्रकार तुमने चेष्टा की है और जो देश, काल, पदार्थ देखे हैं, सो सब कहो । भास बोले, हे राजन् ! मैं जगत् को देखता फिरा हूँ और फिरता-फिरता थक गया हूँ, परन्तु देखने की इच्छा होने के कारण मुझको दुःख नहीं हुआ । जो कुछ मैंने चेष्टा की है और जो देखा है, वह कहता हूँ । हे राजन् ! मैंने बहुत जन्म पाये हैं,
७०४ ❖ योगवाशिष्ठ ❖
और बहुत बार मृतक हुआ हूँ। बहुत बार शाप पाया है, ऊँच-नीच जन्म लिये हैं और मर-मर गया हूँ। बहुत ब्रह्माण्ड देखे हैं। परन्तु ये सब अग्नि-देवता के वर से देखे हैं। एक बार मैं वृक्ष हुआ और सहस्र वर्ष पर्यन्त फूल, फल, टाम से युक्त रहा। जब कोई काटता, तब मैं दुःखी होता और मेरे हृदय में पीड़ा होती। फिर वह शरीर छूटा तो मैं सुमेरु पर्वत पर सुवर्ण का कमल हुआ और वहाँ का जल पिया। फिर एक देश में पक्षी हुआ। सौ वर्ष पक्षी रहकर फिर सियाल हुआ। मुझे हाथी ने चूर्ण किया, उससे मृतक होकर फिर सुमेरु पर्वत पर सुन्दर मृग हुआ। देवता और विद्याधर मेरे साथ प्रीति करने लगे। कुछ काल में मरकर फिर देवताओं के वन में मातंग हुआ। वहाँ देवियाँ और विद्याधरियाँ मुझको स्पर्श करतीं और सुगन्ध लेती थीं। तब मैं देवताओं की स्त्री हुआ, फिर सिद्ध हुआ और मेरा वचन सत्य होने लगा। फिर मैंने और शरीर धरा और एक ब्रह्माण्ड नाँघ गया। इसी प्रकार कई ब्रह्माण्ड में नाँघ गया। तब एक ब्रह्माण्ड में जो आश्चर्य देखा, सो सुनो। वहाँ मैंने एक स्त्री देखी, जिसके शरीर में कई ब्रह्माण्ड थे। इससे मुझे आश्चर्य हुआ। फिर देश काल-क्रिया से पूर्ण कई त्रिलोकी देखीं। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब दिखता है, वैसे ही मुझको उसमें जगत् दिखे। तब मैंने उससे कहा, हे देवि ! तुम कौन हो और यह तुम्हारे शरीर में क्या है? देवी बोली, हे साधो ! मैं शुद्ध चितशक्ति हूँ और ये सब मेरे अङ्ग मेरे में स्थित हैं। मेरी क्या बात पूछनी है—यह सब जगत् जो तू देखता है चिद्रूप है। चैतन्य से भिन्न और कुछ नहीं। सबमें ब्रह्माण्ड (त्रिलोकी) स्थित है, सो अपना रूप ही है। जो अपने स्वभाव में स्थित हैं, उनको अपने ही में ये दिखते हैं और जो स्वरूप में स्थित नहीं हैं, उनको जगत् बाहर और अपने से भिन्न भासित होते हैं।
हे राजन् ! यह जगत् कुछ बना नहीं। जैसे स्वप्न की सृष्टि और गन्धर्व नगर दिखता है, वैसे ही आत्मा में जगत् दिखता है। जैसे जल में तरङ्ग दिखता है, सो जलरूप है—तरङ्ग कुछ भिन्न वस्तु नहीं होते, वैसे ही सब जगत् चिद्रूप में भासित होता है, सो चैतन्य से भिन्न
❁ निर्वाण प्रकरण ❁
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कुछ नहीं । परन्तु जब स्वभाव में स्थित होकर देखोगे, तब ऐसे ही दिखेगा । और जो अज्ञानदृष्टि से देखोगे तो नाना प्रकार का जगत् दिखेगा । हे राजन् ! जब इस प्रकार उस देवी ने मुझसे कहा, तब मैं वहाँ से चला और आगे दूसरी सृष्टि में गया । वहाँ देखा कि सब पुरुष ही रहते हैं, स्त्री कोई नहीं । पुरुष से पुरुष उत्पन्न होते हैं । उससे भी आगे और सृष्टि में गया तो वहाँ न सूर्य था, न चन्द्रमा न तारे थे, न अग्नि, न दिन था और न रात्रि । जैसे चन्द्रमा, सूर्य और तारों का प्रकाश होता है वैसे ही सब अपने प्रकाश में प्रकाशित थे । उनको देखकर मैं आगे और सृष्टि में गया । वहाँ देखा कि आकाश ही से जीव उत्पन्न होकर आकाश ही में लीन होते हैं । इकट्ठे ही सब उपजते और इकट्ठे ही लीन हो जाते हैं । न वहाँ मनुष्य हैं, न देवता हैं, न वेद हैं, न शास्त्र हैं, न जगत् है—इनसे विलक्षण ही प्रकार है ।
हे राजन् ! इस प्रकार मैंने कई सृष्टियाँ देखी हैं, जो मुझको स्मरण आती हैं । आगे और सृष्टि में गया तो वहाँ देखा कि सब जीव एक समान हैं । न किसी को रोग है, न किसी को दुःख है—सब एक से गंगा के तीर पर बैठे हैं । हे राजन् ! एक और आश्चर्य मैंने देखा है, वह भी सुनो । एक सृष्टि में मैं गया तो वहाँ क्षीरसमुद्र मन्दराचल से मथा जाता था । एक ओर विष्णु भगवान् और देवता थे । मन्दराचल पर्वत रत्नों से जड़ा हुआ था । शेषनाग रस्सी की नाईं लिपटा हुआ था । मथने के लिए दूसरी ओर दैत्य लगे थे । बड़ा शब्द होता था । वह यह कौतुक देखकर मैं आगे गया तो एक और सृष्टि देखी, जहाँ मनुष्य आकाश में उड़ते फिरते थे और देवता मनुष्य की नाईं पृथ्वी पर विचरते और वेदशास्त्र जानते थे । हे राजन् ! एक और आश्चर्य मैंने देखा, वह भी सुनो । एक सृष्टि में मैं जा निकला तो वहाँ मन्दराचल पर्वत पर कल्पवृक्ष का वन था और उसमें मदनिका नाम की एक अप्सरा रहती थी । वहाँ जाकर मैं सो रहा तो ज्यों ही रात्रि का समय आया कि वह अप्सरा मेरे कण्ठ में आ लगी । मैंने जागकर उसको देखा और कहा कि हे सुन्दरी ! तूने मुझको किस निमित्त
७०६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
जगाया ? में तो सुख से सो रहा था । उस अप्सरा ने कहा कि हे राजन! मैंने इसलिए तुमको जगाया है कि चन्द्रमा उदय हुआ है और चन्द्रकान्तमणि चन्द्रमा को देखकर बहेगी और नदी की नाईं प्रवाह चलेगा । ऐसा न हो कि उसमें तू बह जाय । हे दशरथ ! इस प्रकार उसने कहा ही था कि नदी का प्रवाह चलने लगा । तब वह अप्सरा उस प्रवाह को देखकर मुझे आकाश को ले उड़ी और पर्वत के ऊपर जहाँ गंगा का प्रवाह चलता था उसके तट पर मुझको बिठा-दिया । सात वर्ष पर्यन्त वहाँ रहकर में फिर एक और ब्रह्माण्ड में गया । देखा, वहाँ तारा, नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य कुछ भी न थे । उसको देखकर में और आगे गया । इसी प्रकार अनन्त ब्रह्माण्ड मैंने देखे ।
हे राजन ! ऐसा देश व ऐसी पृथ्वी, नदी और पहाड़ कोई न होगा, जिसको मैंने न देखा हो । ऐसी चेष्टा कोई न होगी, जो मैंने न की हो । कई शरीरों के सुख मैंने भोगे हैं; कितनों के दुःख भोगे हैं । वन, कन्दरा और गुप्त स्थानों में फिरकर सब देखा, परन्तु अग्निदेवता के वर को पाकर फिरता-फिरता में थक गया तो भी आगे ही चला गया । अनेक अविद्याकृत ब्रह्माण्ड भी देखे, परन्तु अब उनका अन्त यह पाया है कि यह जगत् भ्रममात्र है । मैंने शास्त्रों में सुना है कि यह जगत् है नहीं, तो भी दुःख देता है । जैसे बालक को अपनी परछाहीं में वेताल दिखता है, वैसे ही यह जगत् अविचार में दिखता और विचार में निवृत्त हो जाता है । एक आश्चर्य और सुनो । एक ब्रह्माण्ड में में गया तो वहाँ महाआकाश था । उस महाआकाश में गिरकर में पृथ्वी पर आ पड़ा और वहाँ सो गया । तब में महागाढ़ सुषुप्तिरूप हो गया । सब जगत् मुझे भूल गया । जब वह गाढ़ सुषुप्ति क्षीण हुई, तब एक स्वप्न देखा । उसमें तुम्हारा यह जगत् मुझको देख पड़ा । उसमें मुझको पहाड़, कन्दरा, देश और बहुत से गुप्त, प्रकट स्थान दिखे । जहाँ केवल सिद्धों की गति थी, वहाँ भी में गया और जहाँ सिद्धों की भी गति न थी, वहाँ भी में गया । इस प्रकार अनेक जगत् मैंने देखे, परन्तु आश्चर्य है कि स्वप्न की सृष्टि प्रत्यक्ष जाग्रत् की तरह दिखती थी और स्वप्न के
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ७०७
शरीर जाग्रत् में पड़े दिखते थे। इससे सब जगत् भ्रममात्र है और असत्य ही सत्य होकर दिखाई देता है। इस प्रकार देखकर मैं बड़े आश्चर्य में पड़ा हूँ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विपश्चित्कथावर्णनन्नाम द्विशताधिकत्रयोविंशतितमस्सर्गः॥ २२३ ॥
विपश्चित् बोले, हे राजन्! एक सृष्टि और भी मैंने देखी है, जो इसी महाआकाश में है—अर्थात् इस महाआकाश से भिन्न नहीं। जहाँ तुम्हारी भी गति नहीं। जैसे स्वप्न की सृष्टि कोई जाग्रत् में देखा चाहे तो नहीं दिखती, वैसे ही वह सृष्टि है। हे राजन्! पृथ्वी का एक स्थान मेरे देखते ही देखते परछाईं की नाईं फिरने लगा। फिर उस आकाश में वही पहाड़ की नाईं दिखने लगा। यहाँ तक कि मनुष्यों के शरीर और दशों दिशाओं को उसने ढक लिया और आकाश में भी बड़ा दिखने लगा। इससे आकाश में भी न समाता था। उसने सूर्य और चन्द्रमा को भी मेरे देखते ही देखते ढक लिया। फिर भूकम्प मा आया, मानो प्रलयकाल ही आ गया। तब मैंने अपने इष्ट अग्निदेवता की ओर देखकर प्रार्थना की कि हे भगवन्! तुम मेरी जन्म-जन्म रक्षा करते आये हो, इससे अब भी रक्षा करो; मैं नष्ट होता हूँ। तब अग्नि ने कहा, तू मत डर। फिर मैंने जब अग्नि में प्रवेश किया, तब अग्नि ने कहा कि मेरे वाहन पर सवार होकर मेरे स्थान को चल। फिर अग्निदेव मुझको अपने वाहन तोते पर चढ़ाकर आकाशमार्ग से तुरन्त ले उड़े। जब हम उड़े, तब पीछे से वह शव पृथ्वी पर गिरा। उसके गिरने से सुमेरु जैसे पर्वत भी पाताल को चले गये। वह महाशरीर सैकड़ों सुमेरु के समान गिरा। मन्दराचल, मलयाचल, अस्ताचल आदि जो बड़े-बड़े पर्वत थे, वे भी नीचे को धँस गये। पृथ्वी में गड्ढे पड़ गये। उसके शरीर के नीचे जो वृक्ष, मनुष्य, दैत्य, स्थावर, जङ्गम आये, वे सब नष्ट हो गये। बड़ा उपद्रव उदय हुआ। निदान उसके शरीर मे सब दिशा पूर्ण हो गई। उसके अङ्ग ब्रह्माण्ड के भी बाहर निकल गये। हे राजन्, दशरथ! इस प्रकार भयानक दशा देखकर मैं अपने इष्टदेव अग्नि से
७०८ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
बोला कि हे देव ! यह उपद्रव क्योंकर हुआ ? यह सब क्या है और ऐसा शरीर क्यों पड़ा है ? आगे तो कोई भी ऐसा शरीर नहीं देखा-सुना ? अग्नि ने कहा, तू अभी चुप रह। यह सब वृत्तान्त मैं तुझसे कहूँगा, पर प्रथम इसको शान्त होने दे। इस प्रकार अग्नि कहते ही थे कि देवता विद्याधर गन्धर्व और सिद्ध आदि जितने स्वर्गवासी थे, वे सब आकर स्थित हुए और विचार करने लगे कि यह उपद्रव प्रलयकाल के बिना ही हुआ है । इसका नाश करने को देवीजी की आराधना करनी चाहिए । हे राजन् ? यों विचारकर वे देवी की स्तुति करने लगे कि हे देवि, शववाहिनी, चण्डिके ! हम तेरी शरण आये हैं, इस उपद्रव से हमारी रक्षा करो।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे महाशववृत्तान्तवर्णनंनाम द्विशताधिकचतुर्विंशतितमस्सर्गः ॥ २२४ ॥
विपश्चित् बोले, हे दशरथ ! उन देवताओं ने स्तुति करके शव की ओर जो देखा तो क्या देखते हैं कि मानों द्वीप उसके उदर में समा गये हैं, भुजाओं में सुमेरु आदिक पर्वत ढक गये हैं। उसके दूसरे अङ्ग ब्रह्माण्ड को भी नाँघ गये हैं, नाथ ही पाताल को भी गये हैं। निदान उनकी मर्यादा कहीं पाई नहीं जाती थी। एक ही अंग में पृथ्वी छिप गई। यह देखकर विद्याधर, गन्धर्व और सिद्ध आदि सम्पूर्ण नम्रवत् स्तुति करने लगे--हे अम्बे, चण्डिके ! अपने गण को साथ लेकर इस उपद्रव में हमारी रक्षा करो--हम तेरी शरण आये हैं। हे राजन् ! जब इस प्रकार स्तुति करके देवता आराधना करने लगे, तब चण्डिका आकाशमार्ग से यक्ष, बेताल, भैरव आदि अपने गणों को लेकर आई और जैसे मेघ सब दिशाओं को ढक लेता है, वैसे ही सब ओर से उनके गणों ने आकर आकाश को ढक लिया। चण्डिका ऐसे तेजस्वीरूप को रखे हुए चली आती थीं, मानों अग्नि की नदी चली आती हो। उनके लाल नेत्र, शिर पर पके केश और श्वेत दाँत थे। वह बड़े शस्त्र धारण किये थीं। कई कोटि योजन तक उनका विस्तार था। वह सब दिशा और आकाश अपने शरीर से आच्छादित किये, कण्ठ में
✹ निर्वाण प्रकरण ✹
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मुण्डों की माला पहिने, मुरदे वाहन पर आरूढ़ थीं। परमात्मपद में उनकी स्थित थी। वह ऐसी महाप्रकाशमान थीं, मानो सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि आदि के प्रकाश को भी लज्जित कर रही थीं। वह हाथों में खड्ग, मूसल, ध्वजा, उखल आदि नाना प्रकार के शस्त्र धारण किये आकाश में तारागण की नाई गर्जती हुई गणों सहित इस प्रकार चली आती थीं, मानो समुद्र से निकली साक्षात् बड़वाग्नि चली आती हो।
जब वह निकट आईं, तब देवता फिर प्रार्थना करने लगे कि हे अम्बे! इसका नाश करो व अपने गणों को आज्ञा दीजिये कि इसका भक्षण करें। हम इसको देखकर बड़े शोक को प्राप्त हुए हैं और तेरी शरण हैं। इस उपद्रव से हमारी रक्षा करो। हे राजा दशरथ! जब इस प्रकार देवताओं ने कहा तब चण्डिका ने प्राणवायु को खींचा और शव में जितना रक्त था, वह सब पी गईं। जैसे समुद्र को अगस्त्यजी ने पी लिया था, वैसे ही उन्होंने रक्त पान किया। जब उससे देवी का उदर और अङ्ग सब पूर्ण हो गये और नेत्र लाल हो आये, तब देवी नृत्य करने लगीं। उनके सब गण उस शव को खाने लगे, कई मुख को खाने लगे, कई भुजा को, कई उदर को, कई वक्षःस्थल को, कई टाँगों को और कई चरणों को। इसी प्रकार उसके सब अंगों को गण खाने लगे। कई गण आँतें लेकर आकाश में सूर्य के मण्डल को गये। कई गण उस शव के अन्त पाने को उड़े, सो मार्ग ही में मर गये, परन्तु कहीं अन्त न पाया। देवी जो उस शव की ओर देखती थी इससे उसके नेत्रों से अग्नि निकलती थी। उस आग में मांस पकता था और गण भोजन करते थे। मांस पकने के समय जो शरीर से रक्त निकलता था, उससे मन्दराचल और हिमाचल पर्वत लाल हो गये—मानो पर्वतों ने भी लाल वस्त्र पहिने हों। रक्त की नदियाँ बहने लगीं। जो बड़े सुन्दर स्थान और दिशाएँ थीं, वे सब भयानक हो गईं। पृथ्वी के सब जीव नष्ट हो गये। पर जो पहाड़ की कन्दरा में जाकर छिप रहे थे, वे बच गये, शेष सब नष्ट हो गये। राम ने पूछा, हे भगवन्! तुम कहते हो कि उसके नीचे प्राणी आकर सब नष्ट हो
७१० ☸ योगवाशिष्ठ ☸
गये और अंग उसके ऐसे कहते हो कि ब्रह्माण्ड को भी लाँघ गये । फिर कहते हो कि देवता बच रहे, इसका क्या कारण है ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो उसके शरीर और अंग के नीचे आये वे तो नष्ट हो गये, पर मुख और ग्रीवा में कुछ भेद है । जिसमें जो पोल है उसमें और गोदी और टाँग के नीचे पोल में तथा सुमेरु, मन्दराचल, उदयाचल और अस्ताचल पर्वतों की कन्दराओं के पोल में बैठे हुए देवता बच गये और जो अङ्ग के छिद्रों में रहे, वे भी बच रहे और कहने लगे कि बड़ा कष्ट है जो हमारे बैठने के कई स्थान नष्ट हो गये । हाय ! वे वृक्ष कहाँ गये, हमारा बरफ का पर्वत कहाँ गया, उनकी सुन्दरता कहाँ गई, वन और बगीचे कहाँ गये, चन्दन के वृक्ष कहाँ गये और वे जनों के समूह कहाँ गये, जो हमको यज्ञ करके पूजते थे ? वे ऊँचे वृक्ष कहाँ गये, जिनके फूल और टहनी ब्रह्मलोक तक जाती थीं ? वह क्षीरसमुद्र कहाँ गया, जिसके मथने से बड़ा शब्द हुआ था ? उसके पुत्र, अर्थात् उससे उत्पन्न रत्न, कल्पवृक्ष और चन्द्रमा कहाँ गये ? जम्बूद्वीप कहाँ गया, जिसमें जम्बू के रस की नदी बहती थी और सुवर्णवत् जल के भँवर उठते थे ? ईख के रस का समुद्र कहाँ गया ? हा कष्ट ! हा कष्ट ! शक्कर और मिसरी के पर्वत और अप्सराओं के विचरने के स्थान कहाँ गये ? पृथ्वी कहाँ गई ? वे नन्दनवन के स्थान कहाँ गये, जहाँ हम अप्सराओं के साथ विहार करते थे ? उन सबका अभाव हमको शूल सा चुभता है । जैसे फल को कण्टक चुभते हैं; वैसे ही उन वस्तुओं के आभासरूपी कण्टक हमको चुभते हैं । इसी प्रकार वे अति शोकवान हुए और कहने लगे- हा कष्ट ! हा कष्ट !
इधर विषयों का स्मरण करके देवता शोक करते थे और उधर उस शव के जितने अंग थे, उनको गणों ने भोजन कर लिया और उसमे अघाये । कुछ मेदा का पिण्ड शेष रह गया था, उसमें बहुत दुर्गन्ध हुई । उस पिण्ड की पृथ्वी हो गई । जिसमें उसका नाम मेदिनी हो गया । मोटे हाड़ों के सुमेरु आदि पर्वत हुए । तब ब्रह्माजी ने देखा कि सब विश्व शून्य सा हो गया है, तब उन्होंने संकल्प किया कि अब