योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
१४ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
वैसे ही ये भी जड़ हैं। यदि कहिये कि इनमें तो प्राण है तो जैसे लुहार की धौकनी श्वास को लेती और छोड़ती है, वैसे ही ये जीव भी चेष्टा करते हैं।
हे राम ! अपना वास्तव स्वरूप जो है सो ब्रह्म है। उसके प्रमाद से जीव मोह और कृपणता को प्राप्त होते हैं। जैसे लुहार की खाल वृथा श्वास लेती है, वैसे ही इनकी चेष्टा व्यर्थ है। इनकी चेष्टा और बोलना अनर्थ के निमित्त है। जैसे धनुष से जो बाण निकलता है, वह हिंसा के निमित्त है उससे और कुछ कार्य सिद्ध नहीं होता, वैसे ही अज्ञानी की चेष्टा और बोलना अनर्थ और दुःख के निमित्त है, सुख के निमित्त नहीं और उसकी संगति भी कल्याण के निमित्त नहीं। जैसे जङ्गल के ठूँठ वृक्ष से छाया और फल की इच्छा करनी व्यर्थ है, उससे कुछ फल नहीं होता और न विश्राम के निमित्त छाया ही प्राप्त होती है; वैसे ही अज्ञानी जीव की संगति से सुख नहीं होता। उनको दान देना व्यर्थ है। जैसे कीचड़ में घृत डालना व्यर्थ होता है, वैसे ही मूर्खों को दिया दान व्यर्थ होता है। उनसे बोलना भी व्यर्थ है। जैसे यज्ञ में कुत्ते को बुलाना निष्फल है, वैसे ही उनसे बोलना निष्फल है। हे राम ! जो अज्ञानी जीव हैं, वे संसार में आते-जाते और जन्मते-मरते हैं और शरीर में आस्था करते हैं, वे पुत्र, दारा, बान्धव, धनादिक से ममत्व बुद्धि करते हैं। पर इस मिथ्यादृष्टि से वे दुःख पाते हैं और मुक्ति कदाचित् नहीं होती; क्योंकि वे अनात्मा में आत्मबुद्धि को त्याग नहीं करते और ममताबुद्धि में दृढ़ रहते हैं।
हे राम ! जो अज्ञानी हैं वे असत् पदार्थ को देखते हैं और वस्तुरूप की ओर से अन्धे हैं, इससे वे परमार्थ धन से विमुख रहते हैं। नरक का सार जो स्त्री आदि हैं, उनमें वे प्रीति करते हैं और उनको देखकर प्रसन्न होते हैं। जैसे मेघ को देखकर मोर प्रसन्न होता है, वैसे ही स्त्री आदि को देखकर मूर्ख प्रसन्न होते हैं। हे राम ! मूर्ख को मारने के निमित्त स्त्री विष की बेलि है। नेत्र उसके फूल हैं, होंठ पत्ते हैं, स्तन गुच्छे हैं और अज्ञानरूपी भँवरे वहाँ विराजमान होते हैं और उसका नाश करते
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १५
हैं। मतिरूपी तालाब में हर्षरूपी कमल और चित्तरूपी भँवरे सदा रहते हैं और अज्ञानरूपी नदी में दुःखरूपी लहरें और तृष्णारूपी बुलबुले उठते हैं। यह नदी मरणरूपी बड़वाग्नि में जा पड़ेगी।
हे राम ! जब जन्म होता है, तब जीव महागर्भ अग्नि से जलता हुआ निकलता है और महामूर्ख अवस्था में निकलकर दुखी होता है। वह जब यौवन अवस्था को प्राप्त होता है तब विषयों का सेवन करता है। वे भी दुःख के कारण होते हैं। फिर वृद्धावस्था को प्राप्त होता है। तब शरीर अशक्त होता है और हृदय को तृष्णा जलाती है। इस प्रकार जन्म-मरण अवस्था में जीव भटकते हैं। हे राम ! संसाररूपी कूप में मोहरूपी घटों की माला है और तृष्णा और वासनारूपी रस्सी से बँधे हुए जीव भ्रमते हैं। ज्ञानवान् को संसार कोई दुःख नहीं देता, गोपद की नाईं तुच्छ हो जाता है। पर अज्ञानी को समुद्र की तरह उससे उबरना कठिन होता है। वह अपने भीतर ही भ्रम देखता है और निकल नहीं सकता-थोड़ा भी उसको बहुत हो जाता है। जैसे पक्षी को पिंजड़े में और कोल्हू के बैल को घर ही में मार्ग दुस्तर हो जाता है, वैसे ही अज्ञानी को तुच्छ संसार बड़ा दुस्तर भासता है। हे राम ! जगत् को रमणीय जानकर जीव उसके जिन पदार्थों की इच्छा करता है, वे सब पञ्चभौतिक पदार्थ हैं। पर वह मोह से उनको सुन्दर जानता है, उनमें प्रीति करता है और उन्हें स्थिर जानता है। वे सब अनर्थ के निमित्त होते हैं।
हे राम ! अज्ञानरूपी चन्द्रमा के उदय से भोगरूपी वृक्ष पुष्ट होते हैं। वे जन्मों की परंपरारूपी रस को पाते हैं, कर्मरूपी जल से सिंचते हैं और पुण्य और पापरूपी मञ्जरी उनमें होती है। अज्ञानरूपी चन्द्रमा का अमृतवासना है और आशारूपी चकोर उसको देखकर प्रसन्न होता है। आशारूपी कमलिनी पर अज्ञानरूपी भँवरा बैठकर प्रसन्न होता है, इसलिए सब जगत् अज्ञान के कारण रमणीय भासता है। हे राम ! जिस ज्ञान से यह जगत् स्थित है, उसका प्रवाह सुनो । जब अज्ञानरूपी चन्द्रमा पूर्ण होकर स्थित होता है तब कामनारूपी क्षीरसमुद्र उमड़ता
१६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
है और उसमें अनेक तरंगे उठती हैं। उसके रस से तृष्णारूपी मञ्जरी पुष्ट होती है और काम, क्रोध, लोभ और मोहरूपी चकोर उसको देखकर प्रसन्न होते हैं। देहाभिमानरूपी रात्रि के निवृत्त होने पर विवेकरूपी सूर्य का उदय होता है । तब अज्ञानरूपी चन्द्रमा का प्रकाश निवृत्त हो जाता है । हे राम ! अज्ञान से जीव भ्रमते हैं और उनकी चेष्टा उल्टी हो जाती है । जो तुच्छ और नीच दुःखरूप पदार्थ है, उसको देखकर वे उनको सुखदायक और रमणीय जानते हैं और स्त्री को देख प्रसन्न होते हैं ।
कवीश्वर कहते हैं कि उसके कपोल कमल से, नेत्र भँवरे से, होठ हँसते हुए और भुजा बेलि की नाईं हैं। कञ्चन के कलश से स्तन हैं। उदर और वक्षःस्थल बहुत सुन्दर हैं। जंघाएँ केले के खंभे सी हैं। कवि जिम स्त्री की स्तुति करते हैं, वह रक्तमांस की पुतली है। कपोल भी रक्तमांस है। होठ भी रक्तमांस हैं। भुजा विष के वृक्ष की शाखा-सी हैं। स्तन भी रक्तमांस हैं और संपूर्ण शरीर भी रक्तमांस अस्थि से पूर्ण एक मूर्ति है । उसको जो रमणीय जानते हैं वे मूर्ख मोह से मोहित हुए हैं और अपने नाश की इच्छा करते हैं। जैसे सर्पिणी से जो कोई हित करेगा वह नष्ट होगा, वैसे ही इस स्त्री से प्रेम करने से नाश होगा । जैसे कदलीवन का महाबली हाथी काम से नीच गति पाता और संकट में पड़ता है और अंकुश सहकर अपमान को प्राप्त होता है। वह एक स्त्री की चाह से ही ऐसी गति को प्राप्त होता है । वैसे ही यह जीव स्त्री की इच्छा करके अनेक दुःख पाता है। जैसे दीपक को रमणीय जानकर पतङ्ग उस पर गिरता और नष्ट होता है, वैसे ही यह जीव स्त्री की इच्छा करता है और उसके संग से नाश को प्राप्त होता है । लक्ष्मी का आश्रय करके जो सुख की इच्छा करता है वह भी सुखी न होगा । जैसे पहाड़ दूर से देखने पर सुन्दर लगता है, वैसे ही यह भी देखने में सुन्दर लगती है । पर स्त्री का आश्रय करके जो सुख की इच्छा करे तो सुख न मिलेगा, अन्त में दुःख ही प्राप्त होगा । लक्ष्मी का भी यही हाल है । जब लक्ष्मी प्राप्त होती है, तब मनुष्य अनर्थ और
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पाप करने लगता है और दुःख का पात्र होता है। और जब वह जाती है तब दुःख दे जाती है और वह उससे जलता रहता है। हे राम! जगत् में सुख की इच्छा करना व्यर्थ है। जीव जब पहले जन्म लेता है, तब भी दुःख सहता है। फिर जन्म लेकर जब मूर्ख और नीच बाल अवस्था को प्राप्त होता है तब कुछ विचार नहीं होता। उसमें दुःख पाता है। और कुछ शक्ति नहीं होती, उससे भी दुःख पाता है। जब यौवन अवस्थारूपी रात्रि आती है तब उसमें काम, क्रोध, लोभ और मोहरूपी निशाचर विचरते हैं और तृष्णारूपी पिशाचिनी घेरती है; क्योंकि उस अवस्था में विवेकरूपी चन्द्रमा नहीं उदय होता। इससे अन्धकार में वे सब क्रीड़ा करते हैं।
हे राम! यौवन अवस्थारूपी वर्षाकाल में बुद्धि आदि नदियाँ मलिनभाव को प्राप्त होती हैं। कामरूपी मेघ गर्जता है और तृष्णारूपी मोरनी उसको देख प्रसन्न होकर नृत्य करती है। फिर यौवन अवस्थारूपी चूहे को बुढ़ापारूपी बिल्ली खा लेती है और शरीर महाजर्जरीभूत हो निर्बल हो जाता है। तृष्णा बढ़ती जाती है और हृदय जलता है। निदान फिर मृत्युरूपी सिंह जरारूपी हरिणी को भक्षण कर लेता है। इस प्रकार मनुष्य उपजता और मरता है और आशारूपी रस्सी से बँधा हुआ घड़ी के लटकन की तरह भटकता है-शान्ति कदापि नहीं पाता। हे राम! यह ब्रह्माण्ड एक वृक्ष है। उसमें जीवरूपी पत्ते लगे हैं। वे कर्मरूपी वायु से हिलते हैं। उसमें अज्ञानरूपी जड़ता है। चित्तरूपी ऊँचा वृक्ष है, उस पर लोभादिक उलूक बैठते हैं। जगतरूपी सरोवर में शरीररूपी कमल है; उस पर जीवरूपी भँवरे आ बैठते हैं और कालरूपी हाथी आकर उनको चट कर जाता है।
हे राम! जनतारूपी जीर्ण पक्षी आशारूपी फंदे से बँधे हुए वासना-रूपी पिंजड़े में पड़े हैं। वे रागद्वेषरूपी अग्नि में जल-भुनकर काल-रूपी पुरुष के मुख में पड़े प्रवेश करते हैं। जनरूपी पक्षी उड़ते फिरते हैं। किसी दिन जब कालरूपी व्याध जाल फैलावेगा तब उनको फँसा लेगा। हे राम! संसाररूपी तालाब में जीवरूपी मछलियाँ हैं, और
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कालरूपी बगुला उनको भोजन करता है । कालरूपी कुम्हार जन-रूपी मृत्तिका के बर्तन बनता है और वे शीघ्र ही फूट जाते हैं । जीवरूपी नदी कर्मरूपी तरङ्गों को फैलाती है और कालरूपी बड़वाग्नि में जा पड़ती है । जगतरूपी हाथी के मस्तक में जीवरूपी मोती है । उस हाथी को कालरूपी सिंह भोजन कर जाता है । वह कालरूपी भक्षक ऐसा है कि उसमें ब्रह्मा को भी नहीं छोड़ा । इस तरह सबको खाकर भी वह तृप्त नहीं होता । जैसे घृत की आहुति से अग्नि तृप्त नहीं होता वैसे ही काल जीवों के भोजन से तृप्त नहीं होता । हे राम ! एक निमेष में अनेक जगत् उपजते हैं और निमेष में लीन हो जाते हैं । सबके अभाव में जो शेष रहता है वह रुद्र है । फिर वह भी निवृत्त होता है और सबके पीछे एक परमतत्त्व ब्रह्मसत्ता रहती है । हे राम ! जो कुछ जगत् है वह अज्ञान से भासता है जन्म, मरण, बाल अवस्था, यौवन और वृद्धादिक विकार अज्ञान से भासते हैं और अज्ञान के नष्ट होने पर सब नष्ट हो जाते हैं । जब तक आत्मविचार नहीं उपजता तब तक अज्ञान रहता है और जब आत्मविचार उपजता है तब अज्ञानरूपी रात्रि निवृत्त हो जाती है, केवल ब्रह्मपद भासता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अज्ञानमाहात्म्य- वर्णनन्नाम षष्ठसर्गः ॥ ६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह संसाररूपी यौवन चेतनरूपी पर्वत के शृङ्ग पर स्थित है और अविद्यारूपी बेलि उसमें बढ़कर विकास को प्राप्त हुई है । सुख, दुःख, भाव, अभाव और अज्ञान उसके पत्र, फूल और फल हैं । जहाँ अविद्या सुखरूप होकर स्थित होती है वहाँ ऊँचे सुख का भोग कराती है और सत्य प्रतीत होती है, और जहाँ दुःखरूप होकर स्थित होती है वहाँ दुःखरूप भासती है । वे ही सुख व दुःख इसके फल हैं । दिन फूल हैं और रात्रि भँवरे हैं । जन्म अंकुर है और यह भोगरूपी रस से पूर्ण है । जब विचार का घुन अविद्यारूपी वृक्ष को खाने लगता है, तब नष्ट हो जाती है । जब तक विचाररूपी घुन नहीं लगा तब तक वह दिन-दिन बढ़ती और दृढ होती जाती है ।
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १८
हे राम ! अविद्यारूपी बेलि का मूल संवित् का फुरना है। उससे यह फैली है। तारागण उसके फूल हैं, चन्द्रमा और सूर्य उसका प्रकाश और दुष्कृत कर्मरूपी नरकस्थान कण्टक हैं। शुभ कर्मरूपी स्वर्ग उसके फूल हैं और सुख-दुःखरूपी फल इसमें लगते हैं । जीव उसके पत्ते हैं जो कालरूपी वायु से हिलते और जीर्ण होकर गिर पड़ते हैं। पृथ्वी उसकी त्वचा है, पर्वत पीड़ है। उसमें मरणरूपी छिद्र, जन्मरूपी अंकुर और मोहरूपी कलियाँ हैं, जिनके महासुन्दर गोरे अंग हैं। उनसे जीव मोहित होते हैं—जैसे स्त्री को देखकर पुरुष मोहित होते हैं। यह सात समुद्रों के जल से सींची जाती है और उससे पुष्ट होती है । उस बेलि में एक विषधर सर्पिणी रहती है । जो कोई उसके निकट जाता है, उसको काटती है और वह मूर्च्छित हो गिर पड़ता है। संसाररूपी मूर्च्छा की देनेवाली तृष्णारूपी सर्पिणी है । वह बेलि अन्यथा नष्ट नहीं होती; जब विचाररूपी घुन उसको लगे तो नष्ट हो जाती है। हे राम ! जो कुछ प्रपञ्च तुमको भासता है सो सब अविद्यारूप है, कहीं अविद्या जलरूप हुई है, कहीं पहाड़, कहीं नाग, कहीं देवता, कहीं दैत्य, कहीं पृथ्वी, कहीं चन्द्रमा, कहीं सूर्य, कहीं तारे, कहीं तम, कहीं प्रकाश, कहीं तेज, कहीं पाप, कहीं पुण्य, कहीं स्थावर, कहीं मूढ़रूप । कहीं अज्ञान से दीन और कहीं ज्ञान से आप ही क्षीण हो जाती है । कहीं तप-दान आदि से क्षीण होती है, कहीं पापादि से बढ़ती है, कहीं सूर्यरूप होकर प्रकाश करती है, कहीं स्थानरूप होती है, कहीं नरक में लीन है, कहीं स्वर्गनिवासी है, कहीं देवता होती है, कहीं क्रिमि होती है, कहीं विष्णु-रूप होकर स्थित हुई है, कहीं ब्रह्मा होकर स्थित है, कहीं रुद्र है, कहीं अग्निरूप है, कहीं पृथ्वीरूप हुई है और कहीं आकाश व कहीं भूत, भविष्यत् और वर्तमान हुई है। हे राम ! जो कुछ देखने में आता है वह सब महिमा इसी की है । ईश्वर से तृणपर्यन्त सब अविद्यारूप है । जो इस दृश्यजाल से अतीत है, उसको आत्मलाभ जानो ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अविद्यालता- वर्णनन्नाम सप्तमस्सर्गः ॥ ७ ॥
२० * योगवासिष्ठ *
राम ने पूछा, हे ब्रह्मन् ! विष्णु और हर आदिक तो शुद्ध आकार आकाश जाति है, इनको अविद्या तुम कहते हो ! यह सुनकर मुझको संशय उत्पन्न हुआ है। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! प्रथम यह सुनो कि अविद्या और तत्त्व किसको कहते हैं। जो अविद्यमान हो और विद्यमान भासे वह अविद्या है और जो सदा विद्यमान है उसको तत्त्व कहते हैं। हे राम ! शुद्ध संवित् और कल्पना से रहित जो चिन्मात्र आत्मसत्ता है वही तत्त्व है। उसमें जो अहं उल्लेख से संवेदनकल्पना पूर्णरूप से फुरी है वही चिन्मात्र संवित् का आभास है। वही संवेदन फुरकर स्थानभेद से सूक्ष्म, स्थूल और मध्यमभाव को प्राप्त हुआ है और फिर वही दृढ़ स्पन्द से मनन भाव को प्राप्त हुआ है। सात्त्विक, राजस और तामस, तीनों उसी के आकार हैं। वह अविद्या त्रिगुण प्राकृतधर्मिणी हुई है। और तीन गुण जो तुमसे कहे हैं, वे भी एक एक गुण तीन तीन प्रकार के हैं, जिससे अविद्या के गुण नव प्रकार के भेद को प्राप्त हुए हैं। जो कुछ तुमको दृश्य भासता है, वह अविद्या के नव गुणों में है। ऋषीश्वर, मुनीश्वर सिद्ध, नाग, विद्याधर और देवता अविद्या के सात्त्विकभाग हैं और उस सात्त्विक के विभाग में नाग सात्त्विक-तामस हैं, विद्याधर, सिद्ध, देवता और मुनीश्वर, अविद्या के सात्त्विक भाग में सात्त्विक-राजस हैं और हरिहरादिक केवल सात्त्विक हैं।
हे रामजी ! सात्त्विक जो प्रकृतभाग है उसमें जो तत्त्वज्ञ हुए हैं वे मोह को नहीं प्राप्त होते, क्योंकि वे मुक्तिरूप होते हैं। हरिहरादिक शुद्ध सात्त्विक हैं और सदा मुक्तिरूप होकर जगत् में स्थित हैं। वे जब तक जगत् में हैं, तब तक जीवन्मुक्त हैं और जब देहमुक्त हुए, तब परमेश्वर को प्राप्त होते हैं। हे राम ! अविद्या के दो रूप हैं। एक अविद्या विद्यारूप होती है—जैसे बीज फल होता है और फल बीज होता है। जैसे जल में बुलबुला उठता है वैसे ही अविद्या से विद्या उपजती है। और विद्या में अविद्या लीन होती है। जैसे काष्ठ में अग्नि उपजकर काष्ठ को जलाती है, वैसे ही विद्या अविद्या से उपजकर अविद्या का नाश करती है। वास्तव में सब चिदाकाश है। जैसे जल में तरङ्ग
- निर्वाण प्रकरण * २१
कल्पनामात्र है, वैसे ही विद्या अविद्या की भावनामात्र है। इसको त्याग कर शेष आत्मसत्ता ही रहती है।
अविद्या और विद्या आपस में प्रतियोगी हैं—जैसे तम और प्रकाश। इससे इन दोनों को त्यागकर आत्मसत्ता में स्थित हो। विद्या और अविद्या कल्पनामात्र हैं। विद्या के अभाव का नाम अविद्या है और अविद्या के अभाव का नाम विद्या है। यह प्रतियोगी कल्पना मिथ्या है। जब विद्या उपजती है, तब अविद्या को नष्ट करती है और फिर आप भी लीन हो जाती है—जैसे काष्ठ से उपजी अग्नि काष्ठ को जलाकर आप भी शान्त हो जाती है। उससे जो शेष रहता है, वह अनिर्वचनीय पद सर्वव्यापी है। जैसे वटबीज में पत्र, शाखा, फूल, फल और पत्ते होते हैं, वैसे ही सबमें एक अनुस्यूत सत्ता व्याप्त है। वही ब्रह्मतत्त्व सर्वशक्तिमान् है। उसी में सब शक्तियों का स्पन्दन है। वह आकाश में भी शून्य है। जैसे सूर्यकान्तमणि में अग्नि होती है और दूध में घृत है, वैसे ही सब जगत् में ब्रह्म व्याप्त हो रहा है। जैसे दधि के मथे बिना घृत नहीं निकलता, वैसे ही विचार बिना आत्मा नहीं भासता। जैसे अग्नि से चिनगारी और सूर्य से किरणें निकलती हैं, वैसे ही यह जगत् आत्मा का किञ्चनरूप है। जैसे घट का नाश होने पर भी घटाकाश अविनाशी है, वैसे ही जगत् के अभाव में भी आत्मा अविनाशी है।
हे राम ! जैसे चुम्बक पत्थर की सत्ता से जड़ लोहा चेष्टा करता है परन्तु चुम्बक सदा अकर्ता ही रहता है, वैसे ही आत्मा की सत्ता से जगत् देहादिक चेष्टा करते हैं और चेतन होते हैं, परन्तु आत्मा सदा अकर्ता है। इस जगत् का बीज चैतन्य आत्मसत्ता है और उसमें संवित्, संवेदन आदि शब्द भी कल्पनामात्र हैं। जैसे जल को कहते हैं कि बहुत सुन्दर और चञ्चल है और जल ही जल है, वैसे ही संवेदन आदि सब चैतन्यरूप हैं। जहाँ न किञ्चन है, न अकिञ्चन है, वही तुम्हारा स्वरूप है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अविद्यानिराकरणं नामाष्टमसर्गः ॥ ८ ॥
२२ * योगवाशिष्ठ *
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! स्थावर-जङ्गम जो कुछ जगत् तुमको भासता है, वह आधिभौतिकता को नहीं प्राप्त हुआ । वह सब चिदाकाशरूप है । उसमें कुछ भाव-अभाव की कल्पना नहीं और जीवादिक भेद भी नहीं । हमको तो भेदकल्पना कुछ नहीं भासती । जैसे रस्सी में सर्प का अभाव है, वैसे ही ब्रह्म में भेदकल्पना का अभाव है । हे राम ! आत्मा के अज्ञान से भेदकल्पना भासती है और आत्मा के जाने से भेदकल्पना मिट जाती है । वही सर्वसंपदा का अन्त है । शुद्ध चैतन्य में चित्त का सम्बन्ध होने का नाम अविद्या है । जो पुरुष चित्त की उपाधि से रहित चिन्मात्र है, वह शरीर का नाश होने पर नष्ट नहीं होता और शरीर के उपजे में नहीं उपजता । शरीर के उपजने और नष्ट होने में वह सदा एकरस ज्यों का त्यों स्थित है । जैसे घट के उपजने और मिटने में घटाकार ज्यों का त्यों रहता है वैसे ही शरीर के भाव-अभाव में आत्मा ज्यों का त्यों है । जैसे बालक दौड़ता है तो उसको सूर्य भी दौड़ता जान पड़ता है और स्थित होने में स्थित लगता है, परन्तु सूर्य ज्यों का त्यों है, वैसे ही चित्त की चञ्चलता से मूर्ख जन आत्मा को व्याकुल देखते हैं, चित्त की अचलता में अचल देखते हैं और चित्त के उपजने में उपजता देखते हैं, परन्तु आत्मा सदा ज्यों का त्यों है । जैसे मकड़ी अपने जाले से आप ही घिरती है और निकल नहीं सकती, वैसे ही जीव अपनी वासना से ही बँधते हैं ।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! अत्यन्त मूर्खता के अधिष्ठान जो स्थावर आदिक हैं उनकी वासना कैसी होती है, सो कृपा करके कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो स्थावर जीव हैं, वे अमनसत्ता को नहीं प्राप्त हुए । वे केवल मन अवस्था में भी प्रतिष्ठित नहीं, पर मध्य अवस्था में हैं । उनकी पुर्यष्टका सुषुप्तिरूप है । वह केवल दुःख का कारण है । उनका मन नहीं नष्ट हुआ, वे सुषुप्ति अवस्था में जडरूप स्थित हैं । वे काल पाकर जागेंगे अभी उनकी सत्ता मूकजड़ होकर स्थित है । राम ने पूछा, हे देवताओं में श्रेष्ठ ! यदि उनकी सत्ता अद्वैतरूप होकर स्थावर
निर्वाण प्रकरण
२३
शरीर में स्थित है तो मुक्त अवस्था उनके निकट है, यह सिद्ध हुआ । वशिष्ठजी बोले हे राम! मुक्ति कैसे निकट होती है ? मुक्ति तब होती है, जब बुद्धिपूर्वक वस्तु को विचारे और यथाभूत अर्थ देख पड़े । जब सत्ता समान का बोध हो तब केवल आत्मपद प्राप्त होता है । हे राम ! जब ज्यों का त्यों पदार्थ जानकर वासना को त्याग करे, तब सत्ता समान पद प्राप्त होता है ।
प्रथम अध्यात्मशास्त्र को विचारे और उसमें जो सार है उसकी बारम्बार भावना करे, तब उससे जो प्राप्त हो वही सत्ता समान परब्रह्म कहलाता है । स्थावर के भीतर वासना है; परन्तु बाहर नहीं दिखती; क्योंकि उनकी सुषुप्ति वासना है । जैसे बीज में अंकुर होता है और फिर उगता है, वैसे ही उनके जन्म होंगे और वासना जगेगी । उनके भीतर जगत् की सत्ता है, पर बाहर नजर नहीं आती । वे सुषुप्ति के समान जड़धर्मा हैं । वे अनन्त जन्मों में दुःख पावेंगे । हे राम ! स्थावर जो अब जड़धर्मी सुषुप्तिपद में स्थित हैं, वे बारम्बार जन्म पावेंगे । जैसे बीज में पत्र, टाल, फूल और फल अवस्थित होते हैं और मृत्तिका में घट बनने की शक्ति है, वैसे ही स्थावर में वासना स्थित है । जिसमें वासनारूपी बीज है, वह सुषुप्तिरूप कहलाता है और वह सिद्धता, जो मुक्ति है, उसे नहीं प्राप्त होती । जहाँ निर्जीव वासना है, व तुरीय पद है और वह सिद्धता को प्राप्त करती है ।
हे राम ! जब चित्तशक्ति दृढ़ वासना से मिली होती है, तब स्थावर होती है और वह फिर जगती है । जैसे कोई कर्म करता हुआ सो जाता है तो सुषुप्ति से उठकर फिर वही कर्म करने लगता है, क्योंकि कर्मरूपी वासना उसके भीतर रहती है, वैसे ही स्थावर वासना से फिर जन्म पावेंगे । जब वह वासना हृदय से दग्ध हो, तब जन्म का कारण नहीं होती । आत्मसत्ता समानभाव से घट पट आदि सब पदार्थों में स्थित है । जैसे वर्षाकाल का एक ही मेघ नानारूप होकर स्थित होता है, वैसे एक ही आत्मसत्ता सब पदार्थों में स्थित है । सबमें आत्मा ही व्याप रहा है । ऐसी दृष्टि से जो रहित है, उसको विपर्यय उल्टी दृष्टि
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<div align="center">❊ योगवाशिष्ठ ❊</div>भ्रमदायक होती है। जब आत्मदृष्टि प्राप्त होती है, तब सब दुःख नष्ट हो जाते हैं। हे राम ! असम्यकदृष्टि को ही बुद्धिमान् लोग अविद्या कहते हैं। वह अविद्या जगत् का कारण है और उससे सब प्रपंच का पसारा होता है। जब उससे रहित अपना स्वरूप भासित हो, तब अविद्या नष्ट होती है। जैसे बर्फ की कणिका धूप से नष्ट हो जाती है वैसे ही शुद्ध स्वरूप के अभ्यास से अविद्या नष्ट हो जाती है। जैसे स्वप्न में उठकर जीव जब अपना स्वरूप देखता है, तब फिर स्वप्न की ओर नहीं जाता वैसे ही शुद्ध स्वरूप के अभ्यास से सम्पूर्ण भ्रम निवृत्त हो जाते हैं।
हे राम ! जब जीव वस्तु को वस्तु जानता है, तब अविद्या नष्ट हो जाती है। जैसे प्रकाश में अन्धकार नष्ट हो जाता है। पर दीपक को हाथ में लेकर देखिये तो अन्धकार की कोई मूर्ति नजर नहीं आती, और जैसे उष्णता से घृत का पिंड गल जाता है, वैसे ही आत्मा के दर्शन होने पर अविद्या नहीं रहती। वास्तव में अविद्या कोई वस्तु नहीं। वह अविचार से सिद्ध है और विचार करने से लीन हो जाती है। जैसे प्रकाश में तम लीन हो जाता है, वैसे ही विचार से अविद्या लीन हो जाती है। अज्ञान में अविद्या की प्रतीति होती है। जब तक आत्मतत्त्व को नहीं देखता, तब तक अविद्या की प्रतीति होती है और जब आत्मा को देखता है, तब अविद्या का अभाव हो जाता है। प्रथम यह विचार करे कि रक्त, मांस और अस्थि का बना जो शरीर है, उसमें "मैं क्या वस्तु हूँ? सत्य क्या है? और असत्य क्या है?" इस विचार से जिसका अभाव होता है, वह असत्य है और जिसका अभाव नहीं होता, वह सत्य है। फिर अन्वय व्यतिरेक से विचारे। कार्यकल्पित के होने पर भी हो और उसके अभाव में भी जो हो सो अन्वय सत्य है। देहादि के भाव में भी जो आत्मा का अधिष्ठान है और इनके अभाव में भी निरुपाधि सिद्ध है, वह सत्य है और देहादिक व्यतिरेक असत्य है।
ऐसे विचार कर आत्मतत्त्व का अभ्यास करे और असत् देहादिक से वैराग्य करे, तब निश्चय ही अविद्या लीन हो जाती है, क्योंकि वह वास्तव नहीं है, असतरूप है। उसके नष्ट होने पर जो शेष रहे, वह
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २५
निष्किञ्चन है, सत्य है, ब्रह्म निरन्तर है। वह तत्त्ववस्तु ग्रहण करने योग्य है। हे राम! ऐसे विचार करने से अविद्या नष्ट हो जाती है। जैसे ऊख का रस जब जिह्वा से लगता है, तब अवश्य स्वाद आता है, वैसे ही आत्मविचार से अविद्या अवश्य नष्ट हो जाती है। यदि वास्तव में कहिये तो अविद्या भी कुछ भिन्न वस्तु नहीं, एक अखंड ब्रह्मतत्त्व है। जिससे घट, पट, रथ आदिक पदार्थ भिन्न भिन्न भासते हैं, उसको अविद्या जानो और जिससे सबमें एक ब्रह्मभावना होती है उसको विद्या जानो। इस विद्या से अविद्या नष्ट हो जायगी।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अविद्याचिकित्सावर्णनं नाम नवमस्सर्गः॥ ९ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! बोध के निमित्त मैं तुमसे बारम्बार सत्य का सार कहता हूँ। वह यही है कि भावना के अभ्यास बिना आत्मा का साक्षात्कार न होगा। यह जो अज्ञान अविद्या है, वह अनन्त जन्म से दृढ़ हुआ भीतर बाहर दिखाई देता है। आत्मा सब इन्द्रियों से अगोचर है। जब मन सहित षट् इन्द्रियों का अभाव हो, तब केवल शान्ति प्राप्त होती है। हे राम! जो कुछ वृत्ति बहिर्मुख फुरती है, वह अविद्या है; क्योंकि वह वृत्ति प्रपंच को आत्मतत्त्व से भिन्न जानकर फुरती है और जो अन्तर्मुख आत्मा की ओर फुरती है, वह विद्या है। वही अविद्या का नाश करेगी। अविद्या के दो रूप हैं—एक प्रधान रूप और दूसरा निकृष्ट रूप। उस अविद्या से विद्या उपजकर अविद्या का नाश करती है और फिर आप भी नष्ट हो जाती है, जैसे बाँस से अग्नि उपजती और बाँस को जलाकर आप भी शान्त हो आती है, वैसे ही जो अन्तर्मुख है, वह प्रधान रूप विद्या है और जो बहिर्मुख है, वह निकृष्ट रूप अविद्या है। इससे अविद्याभाव का नाश करे।
हे राम! अभ्यास के बिना कुछ सिद्ध नहीं होता। जो कुछ किसी को प्राप्त होता है वह अभ्यासरूपी वृक्ष का ही फल है। चिरकाल अविद्या का दृढ़ अभ्यास होने से अविद्या दृढ़ हुई है। जब आत्मज्ञान के निमित्त यत्न करके दृढ़ अभ्यास करोगे, तब अविद्या नष्ट हो जायगी।
२६ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
हे राम ! हृदयरूपी वृक्ष में जो अविद्यारूपी विषबेलि फैल रही है उसको ज्ञानरूपी खङ्ग से काटो और जो कुछ अपना प्रकृत आचार है, उसको करो, तब तुमको दुःख कोई न होगा। जैसे जनक राजा ज्ञेय को ज्ञात होकर व्यवहार को करते थे, वैसे ही आत्मज्ञान का दृढ़ अभ्यास कर तुम भी बिचरो। हे राम ! जैसा निश्चय पवन, विष्णु, सदाशिव, ब्रह्मा, बृहस्पति, चन्द्रमा, अग्नि, नारद, पुलह, पुलस्त्य, अङ्गिरा, भृगु, शुकदेव और ज्ञात-ज्ञेय ब्राह्मणों का है, वही तुमको भी प्राप्त हो।
राम ने पूछा, हे ब्राह्मण ! जिस निश्चय से बुद्धिमान् विशोक हुए हैं, वह मुझसे कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे सम्पूर्ण ज्ञानवानों का निश्चय है और जैसे वे व्यवहार में सम रहे हैं, वह सुनो। विस्तार-रूप जो कुछ जगज्जाल तुमको भासित होता है, वह निर्मल ब्रह्मसत्ता अपनी महिमा में स्थित है। जैसे समुद्र में तरङ्ग स्थित होते हैं और नाना प्रकार के उत्पन्न होते हैं, वे एक जलरूप हैं, जल से भिन्न नहीं, वैसे ही जो ग्रहण करनेवाला है वह भी ब्रह्म है और जिसको भोजन करता है, वह भी ब्रह्म है। मित्र भी ब्रह्म है, शत्रु भी ब्रह्म है। ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है। ज्ञानवान् को सदा यह निश्चय रहता है। ब्रह्म को ब्रह्म स्पर्श करता है, तब किसको स्पर्श किया ? हे रामजी ! जिनको सदा यही निश्चय रहता है, उनको रागद्वेष कुछ दुःख नहीं दे सकते। ब्रह्म ही ब्रह्म में फुरता है, भावरूप भी ब्रह्म है, अभावरूप भी ब्रह्म है, कुछ भिन्न नहीं, तब फिर रागद्वेष की कल्पना कैसे हो ? ब्रह्म ही ब्रह्म का चिन्तन करता है, ब्रह्म ही ब्रह्म में स्थित है, ब्रह्म ही अहं अस्मि है, ब्रह्म ही सग है, ब्रह्म ही आत्मा है और घट भी ब्रह्म है, पट भी ब्रह्म है, ब्रह्म ही से सारा जगत् विस्तार को प्राप्त हुआ है।
हे राम ! जब सर्वत्र ब्रह्म ही है, तब राग-विराग की कल्पना कैसे हो ? मृत्यु भी ब्रह्म है, शरीर भी ब्रह्म है; मरता भी ब्रह्म है और मारता भी ब्रह्म है। जैसे भ्रम से रस्सी में सर्प भासित होता है, वैसे ही आत्मा में सुख-दुःख मिथ्या है। भोग भी ब्रह्म है, भोगनेवाला भी ब्रह्म है और
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २७
भोक्ता देह भी ब्रह्म है, निदान सर्वत्र ब्रह्म ही है। जैसे समुद्र में जो तरङ्ग उपजते और मिट जाते हैं, वे जल से भिन्न नहीं, वैसे ही शरीर उपजते और मिट जाते हैं। ब्रह्म ही ब्रह्म में स्थित है। हे राम! जल के तरङ्ग जो मृत्यु को प्राप्त होते हैं तो क्या हुआ, वे तो जल ही हैं; वैसे ही मृतक ब्रह्म ने जो मृतक देह ब्रह्म को मारा, तब कौन मुआ और किसने मारा? जैसे एक तरङ्ग जल से उपजा और दूसरे तरङ्ग से मिल दोनों इकट्ठे होकर मिट गये सो सब जल ही जल है—वहाँ मैं, तू इत्यादि दूसरा कुछ नहीं—वैसे ही आत्मा में जो जगत् है सो आत्मा ही अपने आपमें स्थित है, तेरा, मेरा भिन्न कुछ नहीं। जैसे सुवर्ण में भूषण और जल में तरङ्ग अभिन्नरूप हैं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं।
हे राम! जो पुरुष यथार्थदर्शी है, उसको सदा यही निश्चय रहता है। और जिनको सम्यक्ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ, उनको विपर्ययरूप, और का और, भासित होता है पर वास्तव में ब्रह्म सदा एक रूप है; ज्ञान और अज्ञान का भेद है। जैसे रस्सी एक होती है; परन्तु जिसको सम्यक्ज्ञान होता है उसको रस्सी प्रतीति होती है और जिसको सम्यक्ज्ञान नहीं होता, उसको सर्प जान पड़ती है, वैसे ही जो ज्ञानवान् पुरुष है, उसको सब ब्रह्मसत्ता ही भासती है, और जो अज्ञानी है, उसको जगत् नानारूप भासित होता है और दुःखदायक होता है, पर ज्ञानवान् को सुखरूप है। जैसे अन्धे को सब ओर अन्धकार और नेत्रवान् को प्रकाश प्रतीत होता है, वैसे ही सब जगत् आत्मरूप होने पर भी ज्ञानी को आत्मसत्ता सुखरूप भासती है और अज्ञानी को दुःखदायक है। जैसे बालक को अपनी परछाहीं में वेतालबुद्धि होती है और उससे वह भय पाता है, पर बुद्धिमान् निर्भय होता है, वैसे ही अज्ञानी को यह जगत् दुःखदायक और ज्ञानी को सुखरूप है। यदि मेरा निश्चय पूछो तो योँ है कि मैं सर्वमय ब्रह्म, नित्य, शुद्ध, सर्वव्यापी हूँ। न कोई मरता है, न उपजता है। जैसे जल में तरङ्ग न उपजते हैं और न मिटते हैं, सब जल ही जल है, वैसे ही पंचभूत भी आत्मा में हैं और जगत् भी आत्मरूप है। आत्मब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है।
२८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
शरीर का नाश होने पर आत्मा का नाश नहीं होता । मृतकरूप भी ब्रह्म है, शरीर भी ब्रह्म है । ब्रह्म ही अनेकरूप होकर भासता है । ब्रह्म भिन्न शरीर आदिक कुछ सिद्ध नहीं होते । जैसे तरङ्ग, फेन और बुलबुले जलरूप हैं, वैसे ही देह, कलना, इन्द्रियाँ, इच्छा, देवतादिक सब ब्रह्मरूप हैं। जैसे भूषण सुवर्ण से भिन्न नहीं होता—सुवर्ण ही भूषणरूप होता है—वैसे ही ब्रह्म से अलग जगत् नहीं होता, ब्रह्म ही जगत्रूप है । जो मूढ़ हैं उनको द्वैतकलना भासित होती है ।
हे राम ! मन, बुद्धि, अहंकार, तन्मात्रा और इन्द्रियाँ, सब ब्रह्म ही के नाम हैं। और सुख-दुःख कुछ नहीं । अहं आदि जो शब्द हैं, उनमें भिन्न भिन्न भावना करना व्यर्थ है, अपना अनुभव ही अन्य की नाईं प्रतीत होता है—जैसे पहाड़ में शब्द करने से प्रतिध्वनि जो सुन पड़ती है, वह अपना ही शब्द है उसमें और की कल्पना मिथ्या है। जैसे स्वप्न में कोई अपना सिर कटा देखता है, वह व्यर्थ होने पर भी उस समय सत्य जान पड़ता है । जिसको असम्यक्ज्ञान होता है, उसको ऐसे ही भ्रम होता है । हे राम ! ब्रह्म सर्वशक्तिमान् है, उसमें जैसी भावना होती है, वही भासित होता है । जिसको सम्यक्ज्ञान होता है, वह उसे निरहंकार, सुप्रकाश और सर्वशक्तिमान् देखता है । कर्त्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, अधिकरण, यह जो षट्कारक बुद्धि है सो सब सर्वत्र ब्रह्म ही है । ब्रह्म ही अर्पण, ब्रह्म ही हवि, ब्रह्म ही अग्नि, ब्रह्म ही होत्र, ब्रह्म ही होमनेवाला और ब्रह्म ही फलदाता है । ऐसा जाननेवाले का नाम ज्ञानी है और ऐसा न जानना अज्ञान है । जाननेवाले का नाम ब्रह्मवेत्ता है । हे राम ! यदि चिरकाल का बान्धव हो और उसको देखिये तो जानिये कि बान्धव है और जो देखने में न आये और उसका अभ्यास दूर हो गया हो तो बान्धव भी अबान्धव की नाईं हो जाता है, वैसे ही अपने ब्रह्मस्वरूप को जानो । जब भावना होती है, तब ऐसा ही भासित होता है कि मैं ब्रह्म हूँ, और द्वैत कल्पना लीन हो जाती है—सर्वत्र ब्रह्म ही भासता है । जैसे जिसने अमृत पान किया है, वह अमृतमय हो जाता है और जिसने नहीं पान किया,
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २६
वह अमृतमय नहीं होता, वैसे ही जिसने जाना है कि मैं ब्रह्म हूँ, वह ब्रह्म ही होता है और जिसने नहीं जाना, उसको नानात्व-कल्पना-रूप जन्म-मरण भासित होता है और ब्रह्म अभास सा प्रतीति होता है ।
हे राम ! जिसको ब्रह्मभावना का अभ्यास है, वह अभ्यास के बल से शीघ्र ही ब्रह्म हो जाता है । ब्रह्मरूपी बड़े दर्पण में जैसी कोई भावना करता है, वैसा ही रूप देख पड़ता है । मन भावनामात्र है । दुर्वासना से स्वरूप का आवरण हुआ है । जब वासना नष्ट होती है, तब निष्कलङ्क आत्मतत्त्व ही भासित होता है । जैसे शुद्ध वस्त्र पर केसर का रङ्ग शीघ्र ही चढ़ जाता है, वैसे ही वासना से रहित चित्त में ब्रह्म का निश्चय होता है । हे राम ! आत्मा सब प्रकार की कलना से रहित है और तीनों काल में नित्य, शुद्ध, सम और शान्तरूप है । जिसको ज्ञान होता है, वह जानता है कि मैं ब्रह्म हूँ और सर्वदा सबमें सब प्रकार सब घट-पटादिक जो जगज्जाल है, उसमें मैं ही ब्रह्म आकाशवत् व्याप रहा हूँ । न कोई मुझको दुःख है, न कर्म है, न किसी का त्याग करता हूँ और न वाञ्छा करता हूँ और सर्वकलना से रहित निरामय हूँ । मैं ही रक्त, पीत, श्वेत और श्याम हूँ और रक्त, मांस, अस्थि का शरीर भी मैं ही हूँ । घट-पटादिक जगत् भी मैं ही हूँ और तृण, बेलि, फूल, गुच्छे, टाल, बन, पर्वत, समुद्र, नदियाँ, ग्रहण, त्याग, संकोच, भूत आदि शक्ति सब मैं ही हूँ । मैं ही विस्तार को प्राप्त हुआ हूँ, वृक्ष बेलि, फल, गुच्छे जिसके आश्रय से फुरते हैं, वह चिदात्मा मैं ही हूँ और सबमें रसरूप मैं ही हूँ । जिसमें यह सब है और जिससे यह सब है; जो सर्वरूप है और जिसके लिए सब है, ऐसा चिदात्मा ब्रह्म मैं ही हूँ । जिसके चैतन्य, आत्मा, ब्रह्म, सत्य, अमृत, ज्ञानरूप इत्यादिक नाम हैं, ऐसा सर्वशक्तिमान्, चिन्मात्र, चैत्य से रहित प्रकाशमात्र, निर्मल, सब भूतों का प्रकाशक और मन, बुद्धि, इन्द्रियों का स्वामी मैं हूँ । जो कुछ भेद कलना है, सो मन आदि ही की थी और अब इनकी कलना को त्यागकर मैं अपने प्रकाश में स्थित हूँ । शब्द, स्पर्श, रूप, गन्ध आदिक जो सब जगत् का कारण हैं, उन सबका चैतन्य आत्मरूप ब्रह्म, निरामय, अविनाशी,
३० ❊ योगवाशिष्ठ ❊
निरन्तर स्वच्छ आत्मा, प्रकाशरूप, मन के उत्थान से रहित, मौनरूप में ही हूँ और परम अमृत, निरन्तर सब भूतों में सत्तारूप से मैं ही स्थित हूँ । सदा निर्लेप, साक्षी, सुषुप्ति की नाईं और द्वेतकला से रहित अक्षोभरूप अनुभव में ही हूँ। शान्तरूप जगत् में मैं ही फैल रहा हूँ और सब वासना से रहित अक्षोभरूपी अनुभव में ही हूँ।
जिससे सब स्वादों का अनुभव होता है, वह चैतन्य ब्रह्म आत्मा मैं ही हूँ। जिसका चित्त स्त्री में आसक्त है, जिसको चन्द्रमा की कान्ति से अधिक मुदिता है और जिससे स्त्री का स्पर्श और मुदिता का अनुभव होता है, ऐसा चैतन्य ब्रह्म में ही हूँ। सुख-दुःख की कल्पना से रहित मनहीन सत्ता और अनुभवरूप जो आत्मा है, वह चैतन्यरूप आत्मा ब्रह्म में ही हूँ। मधुर और नीम आदिक में स्वादरूप में ही हूँ। खेद और आनन्द, लाभ और हानि मुझको तुल्य है। मैं जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और साक्षी तुरीयरूप आदि, अन्त से रहित चैतन्य ब्रह्म निरामय हूँ। जैसे एक खेत की ईखों में एक ही सा रस होता है, वैसे ही अनेक मूर्तियों में एक ब्रह्मसत्ता ही स्थित है। वह सत्य, शुद्ध, सम शान्तरूप और सर्वज्ञ है। जो प्रकाशक और सूर्य की भाँति है, वह प्रकाशरूप ब्रह्म में ही हूँ और सब शरीरों में व्याप्त रहा हूँ। जैसे मोती की माला में तागा गुप्त होता है, जिसमें मोती पिरोये हैं, वैसे ही मोतीरूप शरीर में तन्तु-रूप गुप्त में ही हूँ। जगतरूपी दूध में ब्रह्मरूपी घृत में ही व्याप्त रहा हूँ।
हे राम ! जैसे सुवर्ण में जो नाना प्रकार के भूषण बनते हैं, सो सुवर्ण से भिन्न नहीं होते, वैसे ही सब पदार्थ आत्मा में स्थित हैं-आत्मा से भिन्न नहीं । पर्वत, समुद्र और नदियों में सत्तारूप आत्मा ही है। सब संकल्पों का फलदाता और सब पदार्थों का प्रकाशक आत्मा ही है। वही सब पाने योग्य पदार्थों की परम सीमा है। उस आत्मा की उपासना हम करते हैं, जो घट, पट, तट और कम्ब में स्थित है। जाग्रत जो सुषुप्तिरूप स्थित है और जिसमें कोई फुरना नहीं, ऐसे चैतन्यरू-आत्मा की उपासना हम करते हैं। मधुर में जो मधुरता और तीक्ष्ण में तीक्ष्णता और जाग्रत में चलना शक्ति है; उस चैतन-
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३१
आत्मा की हम उपासना करते हैं। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय और तुरीयातीत में जो समतत्त्व है, उसकी हम उपासना करते हैं। त्रिलोकी के देहरूपी मोतियों में जो तन्तु की नाईं अनुस्यूत है और फैलने और सिकुड़ने का कारण है, उस चैतन्यरूप आत्मा की हम उपासना करते हैं। जो षोडश कलासंयुक्त और षोडश कला से रहित और अकिंचन तथा किंचनरूप है, उस चैतन्य आत्मा की हम उपासना करते हैं। चैतन्यरूप अमृत जो क्षीरसमुद्र से निकला है और चन्द्रमा के मण्डल में रहता है, ऐसा जो स्वतः सिद्ध अमृत है, जिसको पाकर कदापि मृत्यु नहीं होती, उस चैतन्य अमृत की हम उपासना करते हैं। जो अखण्ड प्रकाश है और सब भूतों को सुन्दर करता है, उस चिदात्मा की हम उपासना करते हैं, जिससे शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, प्रगटते हैं, और जो आप इससे रहित है, उस चैतन्य आत्मा की हम उपासना करते हैं। सब में हूँ और सब में नहीं, और भी कोई नहीं, इस प्रकार विदित वेद अपने अद्वैतरूप में विगतज्वर होकर स्थित होते हैं। यही निश्चय ज्ञानवानों का है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवन्मुक्तनिश्चयोपदेशो नाम दशमसर्गः ॥ १० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो निष्पाप पुरुष है, उसको यही निश्चय रहता है कि सत्यरूप आत्मतत्त्व है। यह पूर्ण बोधवान् का निश्चय है। उसको न किसी में राग होता है और न किसी में द्वेष। उसको जीना और मरना सुख-दुःख नहीं देते। वह एक समान रहता है। वह विष्णु-नारायण का अङ्ग है, अर्थात् अभिन्न और सदा अचल है। जैसे सुमेरु पर्वत वायु से चलायमान नहीं होता, वैसे ही वह दुःख से चलायमान नहीं होता। ऐसे जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, वे वन में विचरते हैं और नगर द्वीप आदिक नाना प्रकार के स्थानों में भी फिरते हैं; परन्तु दुःख नहीं पाते। कोई स्वर्ग में फूलों के वन और बगीचों में फिरते हैं, कोई पर्वत की कन्दराओं में रहते हैं, कोई राज्य करते हैं और शत्रुओं को मारकर शासन करते हैं। कितने ही श्रुति-स्मृति के अनुसार कर्म करते
३२ योगवाशिष्ठ
है । कोई भोग भोगते हैं; कोई विरक्त होकर स्थित हैं । कोई दान, यज्ञादिक कर्म करते हैं । कोई स्त्रियों के साथ लीला करते, कहीं गीत सुनते और कहीं नन्दनवन में गन्धर्व गायन करते हैं । कोई गृह में स्थित हैं । कोई तीर्थ और यज्ञ करते हैं । कोई नौवत, नगाड़े और तुरही इत्यादि बाजे सुनते और नाना प्रकार के स्थानों में रहते हैं, परन्तु आसक्त नहीं होते । जैसे सुमेरु पर्वत तालाब में नहीं डूबता, वैसे ही ज्ञानवान् किसी पदार्थ में लिप्त नहीं होते । वे इष्ट को पाकर हर्षित नहीं होते और अनिष्ट को पाकर दुःखी नहीं होते । वे आपदा और सम्पदा में तुल्य रहते हैं और प्रकृत आचार (कर्म) करते हैं, परन्तु उनका हृदय सब आरम्भों से रहित है ।
हे राघव ! इसी दृष्टि का आश्रय करके तुम भी विचरो । यह दृष्टि सब पापों का नाश करती है । अहंकार से रहित होकर जो इच्छा हो सो करो । जब यथार्थदर्शी हुए, तब निर्बन्ध हुए, फिर जो कुछ प्रवाह में प्राप्त होगा, उसमें सुमेरु की नाईं तुम अटल रहोगे । हे राम ! यह सब जगत् चिन्मात्र है । न कुछ सत्य है, न असत्य है । वही इस प्रकार होकर भासता है । इस दृष्टि को आश्रय करके अन्य तुच्छ दृष्टि को त्यागो । हे राम ! असंसक्तबुद्धि होकर, सब भाव-अभाव में स्थित होकर, रागद्वेष से चलायमान न हो । अब सावधान हो ।
राम बोले, हे भगवन्! बड़े हर्ष की बात है । कि मैंने आपके प्रसाद से जानने योग्य पद जाना और प्रबुद्ध हुआ हूँ । जैसे सूर्य की किरणों से कमल प्रफुल्लित होते हैं, वैसे ही मैं प्रफुल्लित हुआ हूँ और जैसे शरत्काल में कुहरा नष्ट हो जाता है, वैसे ही आपके वचनों से मेरा संदेह और मान-मोह-मद-मत्सर सब नष्ट हो गये हैं । मैं अब सब क्षोभ से रहित शान्त को प्राप्त हुआ हूँ ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवन्मुक्तनिश्चयवर्णनं नामैकादशस्सर्गः ॥ ११ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! सम्यक्ज्ञान के पश्चात् जीवन्मुक्त पद में किस प्रकार विश्राम पाते हैं, सो कहो । वशिष्ठजी बोले, हे राम !
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३३
संसार तरने की युक्ति को योग कहते हैं । वह युक्ति दो प्रकार की है— एक सम्यक्ज्ञान और दूसरी प्राणायाम । फिर राम ने पूछा, हे भगवन् ! इन दोनों में सुगम कौन है, जिसमें दुःख भी न हो और फिर क्षोभ भी न हो ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यद्यपि दोनों अर्थ योग शब्द के हैं, तथापि योग प्राणवायु के रोकने का ही नाम है । योग और ज्ञान, दोनों संसार से तरने के उपाय हैं । इन दोनों का फल एक ही सदाशिव ने कहा है । हे राम ! किसी को योग करना कठिन होता है और ज्ञान का निश्चय सुगम होता है, और किसी को ज्ञान का निश्चय कठिन होता है और योग करना सुगम है । यदि मुझसे पूछो तो दोनों में ज्ञान सुगम है; क्योंकि इसमें यत्न और कष्ट थोड़ा है । जानने योग्य पदार्थ के जाने से फिर सपने में भी भ्रम नहीं होता; क्योंकि वह साक्षीभूत होकर देखता है । जो बुद्धिमान योगेश्वर हैं, उनको भी कुछ यत्न नहीं करना पड़ता, वे स्वाभाविक ही चले जाते हैं और गुरु की युक्ति समझकर उनका चित्त शान्त हो जाता है । हे राम ! दोनों की सिद्धि अभ्यासरूप यत्न से होती है । अभ्यास के बिना कुछ नहीं प्राप्त होता । वह ज्ञान तो मैंने तुमसे कहा है । जो हृदय में विराजमान ज्ञेय है, उसका जानना ही ज्ञान है । वह प्राण अपान के रथ पर आरूढ़ है और हृदयरूपी गुहा में स्थित है । हे राम ! उस योग का भी क्रम सुनो । वह भी परम सिद्धि के निमित्त है । प्राणवायु जो नासिका और मुख के मार्ग में आती जाती है, उसको रोकने का क्रम कहता हूँ । उससे चित्त का उपशम हो जाता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ज्ञानज्ञेयविचारो नाम द्वादशसर्गः ॥ १२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ब्रह्मरूपी आकाश के किसी अणु में यह जगतरूपी स्पन्दन आभास फुरा है—जैसे मरुस्थल में सूर्य की किरणों में मृगतृष्णा का जल फुरा आता है । वह जगत् के कारणभाव को प्राप्त हुआ है, जो ब्रह्म के नाभिकमल से उत्पन्न हुआ है । वही पितामह