योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
[ ४० ] त्रिविध प्रमाता (सकल, प्रलयाकल, विज्ञानाकल) १६२-१६६ गुरु पारम्पर्य क्रम १७२-१७३ निगर्भार्थ का निरूपण १७४-१७७ कौलिकार्थ का निरूपण (चक्र, देवता, विद्या, गुरु और शिष्य की एकता) १७८-१९८ वाक्चतुष्टय १९१-१९४ सर्वरहस्यार्थ का निरूपण (स्वात्मबुद्धि) १९८-२०९ महातत्त्वार्थ का निरूपण (विश्वोत्तीर्ण-विश्वमय तत्त्व में स्वात्मनियोजन) २०२-२१२ महातत्त्वार्थ के अधिकारी और अनधिकारी २१३-२१६ मन्त्रसंकेत की फलश्रुति २१७-२१८ ३. पूजासंकेत त्रिविध पूजा—नाम और लक्षण २१९-२२३ परा पूजा की श्रेष्ठता और उसका स्वरूप २२३-२३० षोढा न्यास (गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी, राशि, पीठ) २३०-२४२ श्रीचक्र न्यास (संहार क्रम) २४३-२५९ श्रीचक्र न्यास (सृष्टि क्रम) २५९-२६८ करशुद्ध्यादि न्यास २६८-२६९ विद्या न्यास २६९-२७१ तत्त्व न्यास २७१-२७३ परा न्यास २७१-२७४ चतुर्विध न्यास का कालविभाग २७४-२७५ आसन परिकल्पन और बलिदान २७५-२७७ विघ्नाप्रसारण और प्राकार-चिन्तन २७७-२८० सामान्यार्घ्य से सूर्य आदि नवग्रहों का पूजन २८०-२८२ बाह्य श्रीचक्र का उद्धार व पुष्पांजलि निवेदन २८२-२८५ सामान्यार्घ्य की विधि (वह्नि, सूर्य और इन्दु कलाओं का अर्चन) २८५-२९२ विशेषार्घ्य की विधि २९२ गुरुपादुका का पूजन २९३ प्रसादग्रहण, आन्तर होम और पूर्णाहुति २९४-२९९ श्रीचक्र की पूजा का क्रम ३००-३०१ गणेश, बटुकभैरव और गुरुपंक्ति का पूजन ३०१-३०२ बैन्दव चक्र में कामेश्वर-कामेश्वरी का अर्चन ३०२-३०७ नित्यक्लिन्ना आदि तिथिनित्याओं का पूजन ३०७-३०८, ३५७
[ ४८ ] प्रकटा आदि नौ योगिनियों का आवरण देवताओं के साथ त्रैलोक्यमोहन आदि नौ चक्रों में पूजन ३०८-३५६ भूतलिपि का विन्यास क्रम ३२५-३४५ चक्रपूजा के बाद कुलदीप निवेदन ३५७-३५८ पुष्पांजलि समर्पण के बाद जपविधान ३५८ कूटत्रय तथा कुण्डलीत्रय में नाद की भावना ३५८-३६२ जप के समय शून्यषट्क आदि की भावना ३६३ शून्यषट्क की भावना का प्रकार ३६३-३६४ अवस्थापंचक की भावना का प्रकार ३६५-३६८ विषुवसप्तक की भावना का प्रकार ३६९-३७६ चक्रदेवताओं का तर्पण ३७६-३७८ नैमित्तिक पूजन ३७८-३७९ श्रीचक्र में ६४ करोड़ योगिनियों का निवास ३७९-३८० अष्टाष्टक पूजा ३८०-३८१ गुरुपरम्परा से प्राप्त ज्ञान की फलवत्ता ३८१-३८२ नैवेद्य समर्पण एवं बलि निवेदन ३८२-३८७ शास्त्र की गोपनीयता ३८८ चुम्बक, ज्ञानलुब्ध और नास्तिकों की अनर्हता ३८८-३९० ग्रन्थ की फलश्रुति ३९०-३९४ परिशिष्ट परापञ्चाशिका आद्यनाथविरचिता ३९५-४०० योगिनीहृदय-श्लोकार्द्धानुक्रमणी ४०१-४१२ परापञ्चाशिका-श्लोकार्द्धानुक्रमणी ४१३-४१४ मूले दीपिकायां च स्मृता ग्रन्थ-ग्रन्थकाराः ४१५-४१६ संकेतपरिचयः ४१७-४१८ दीपिकोद्धृतवचनानुक्रमणी ४१९-४३४
योगिनीहृदयम् दी पि का भा षा नु वा द सं व लि त म् चक्रसंकेतः प्रथमः जगद्वन्द्यावेतौ गणपबटुकौ विश्वविनुतौ जगद्रक्षाशीलौ जपनिरतसामीप्यफलदौ¹। रथाङ्गे सन्नद्धौ रविशशिकृशानुज्ज्वलदृशो मयि स्यातां रक्षापरवशधियौ सद्गुणमयौ ॥१॥ ²तन्नित्यं ज्योतिषां ज्योतिर्जयत्येकमनुत्तरम्³। न यद्⁴ भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः⁵॥२॥ सारा संसार जिनकी वन्दना और स्तुति करता है, जो सदा जगत् की रक्षा करने में लगे रहते हैं, जप में लगे साधकों को जो ¹सामीप्य नामक मोक्ष प्रदान करते हैं, श्रीचक्र के साथ जो सदा संयुक्त हैं, सूर्य-चन्द्र और अग्निरूपी तीन उज्ज्वल नेत्रों को जो धारण करने वाले हैं, ऐसे सारे सद्गुणों के निधान गणेश और बटुक मेरी रक्षा करने में लग जांय ॥१॥ सभी प्रकाशात्मक वस्तुओं को प्रकाशित करने वाली वह एक और नित्य अनुत्तर शिवात्मक ज्योति ही सर्वश्रेष्ठ है। इसको सूर्य, चन्द्र और अग्नि भी प्रकाशित नहीं कर सकते। अभिप्राय यह है कि उस प्रकाशात्मक ज्योति से ही सब कुछ प्रकाशित होता है ॥२॥ १. साहित्यवरदौ-ख. ग. ज. झ. ने. उ. । २. य-क. । ३. त्तमम्-क. । ४. तद्-क. । ५. तारकाः-ग. झ. उ. । १. गणेश और बटुक भगवती महात्रिपुरसुन्दरी के निवासस्थान श्रीचक्र के द्वार- रक्षक हैं। श्रीचक्र के बाह्य द्वार पर इनकी पूजा का विधान है (यहीं पूजासंकेत का १०९ वां श्लोक देखिये)। दीपिका की प्रायः सभी मातृकाओं में 'सामीप्यफलदौ' के स्थान पर 'साहित्यवरदौ' पाठ मिलता है। मुद्रित पुस्तक के इस पाठ को केवल उ. मातृका का समर्थन मिलता है। इन दोनों पाठों के अर्थ में कोई विशेष अन्तर नहीं है, तो भी हमने यहाँ 'सामीप्यफलदौ' पाठ को ही मूल में इस लिये रखा है कि इससे सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य के नाम से पुराण, आगम आदि में चतुर्धा विभक्त मुक्ति का बोध सरलता से हो जाता है। जैसे राजदरबार में पहुँचा देता द्वार-
२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः विमर्शरूपिणी शक्तिरस्य विश्वगुरोः परा । परिस्फुरति सैकापि नानानामा¹र्थरूपिणी ॥३॥ पश्यन्त्यादिक्रमादेतौ जातौ प्रश्नोत्तरात्मना² । तन्त्रावतारं तन्वाते सर्वत्रानुजिघृक्षया ॥४॥ तद्वामकेश्वरे तन्त्रे सूचितार्थान् परापरान् । व्यक्तीकर्तुं प्रयतते योगिनीहृदयेऽधुना ॥५॥ मानुषीहृदयं मर्त्यो वेत्ति नैकोऽपि तत्त्वतः । योगिनीहृदयं ज्ञातुं कः समर्थः शिवं विना ॥६॥ इस विश्वगुरु शिव की विमर्शस्वरूपिणी परा शक्ति एक ही है, किन्तु इस जगत् में वह नाना प्रकार के नाम और रूपों में भासित होती रहती है ॥३॥ यह परम शिव और परा शक्ति परा अवस्था से उतर कर पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी के क्रम से गुरु और शिष्य के रूप में प्रकट होते हैं और प्रश्न-प्रतिवचन पद्धति से सब प्राणियों पर अनुग्रह करने की दृष्टि से तन्त्रशास्त्र की अवतारणा¹ करते हैं ॥४॥ इसी पद्धति से वामकेश्वर तन्त्र उपदिष्ट हुआ है। उसमें अनेक मुख्य और गौण विषयों की पूर्वापर क्रम से मात्र सूचना दी गई है। प्रस्तुत ग्रन्थ² योगिनीहृदय में उनके स्पष्टी- करण का प्रयत्न किया जा रहा है ॥५॥ कोई भी मनुष्य साधारण स्त्री के हृदय को भी ठीक तरह से नहीं जान पाता । ऐसी स्थिति में शिव के अनुग्रह के बिना योगिनी के हृदय को जानने में कौन व्यक्ति समर्थ हो सकता है ? ॥६॥ १. नामानु-ज. झ. उ. । २. दिना-ख. । पाल का कार्य है, उसी तरह भगवती महात्रिपुरसुन्दरी का सान्निध्य (सामीप्य अथवा साहित्य) गणेश और बटुक के प्रसाद से ही मिल सकता है । इसीलिये त्रिपुरा सम्प्रदाय के प्रायः सभी ग्रन्थों के प्रारम्भ में इनकी स्तुति मिलती है । १. इस विषय का विस्तार हमने विज्ञानभैरव के भाषानुवाद (पृ० ३-६) में 'प्रश्नोत्तरतत्त्वनिर्णय' शीर्षक से किया है । २. वामकेश्वरतन्त्र (नित्याषोडशिकार्णव) और योगिनीहृदय, दीपिकाकार ने दो अलग-अलग ग्रन्थ माने हैं। इस विषय पर हम तन्त्रयात्रा (पृ० ३५-३८) और नित्याषोडशिकार्णव के उपोद्घात (पृ० ११-१३) में विचार कर चुके हैं ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३ अनन्योद्घाटितं दिव्यागमकोषगृहान्तरम् । उद्घाट्यते मयेदानीं महार्थो गृह्यतां बुधैः ॥७॥ तदनेकार्थसन्दर्भनानासंकेतसंकुलम् । विवृणोम्यमृतानन्दः शिवयोरेव शासनात् ॥८॥ १अन्यथाऽनादिसंसारे किं नेदं व्याकृतं पुरा । तदा न सन्ति सन्तः किं किं वा नात्र प्रयोजनम् ॥९॥ शिवादिकुरुपर्यन्तं पारम्पर्यक्रमागतम् । एतज्ज्ञानं मया लब्धमक्रमाणांमगोचरम् ॥१०॥ घर के भीतर छिपे हुए खजाने के समान इस दिव्य आगम का रहस्य अभी तक किसी¹ ने उद्घाटित नहीं किया था। अब मैं उसको प्रकट कर रहा हूँ। विद्वानों को चाहिये कि वे इस महार्थ² से लाभ उठावें ॥७॥ यह योगिनीहृदय नामक ग्रन्थ अनेक विषयों, सन्दर्भों और संकेतों से भरा हुआ है। मैं अमृतानन्द भगवान् शिव और पराम्बा की आज्ञा से ही इन सब विषयों की व्याख्या कर रहा हूँ ॥८॥ अन्यथा इस अनादि संसार में अब तक इस ग्रन्थ की व्याख्या क्यों नहीं हुई ? क्या उस समय इस विषय को जानने वाले विद्वान् नहीं थे ? अथवा इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी ? ॥९॥ शिव से लेकर अपने गुरु तक चली आ रही परम्परा से क्रमशः यह ज्ञान मुझे प्राप्त हुआ है। इस ³क्रमपरम्परा से वंचित व्यक्तियों के लिये इस विषय को समझ पाना कठिन है ॥१०॥ १. नवमदशमश्लोकयोर्विपर्ययः-क. ।
- अमृतानन्द की इस उक्ति से भी दोनों ग्रन्थों की भिन्नता सिद्ध होती है, क्योंकि योगिनीहृदय की अब तक कोई प्राचीन व्याख्या उपलब्ध नहीं हुई है। इसके विपरीत नित्याषोडशिकार्णव की अनेक प्राचीन व्याख्याओं का उल्लेख मिलता है। उनमें से कुछ उपलब्ध भी हैं।
- महार्थ का तात्पर्य यहाँ 'बहुमूल्य अर्थ' तो है ही, साथ ही टीकाकार इस शब्द से यह भी दिखाना चाहते हैं कि यह व्याख्या त्रिपुरा सम्प्रदाय की क्रम परम्परा का अनुसरण करतो है। क्रम सम्प्रदाय के 'क्रमश्चतुष्टयार्थः' और 'क्रमः पञ्चार्थः' नामक दो विभाग हैं। संकेतपद्धति जैसे ग्रन्थों के प्रमाण पर अमृतानन्द ने अपनी व्याख्या में प्रथम पक्ष को अंगीकार किया है। द्वितीय पक्ष का परिचय महेश्वरानन्द की महार्थमञ्जरी और उसकी स्वोपज्ञ व्याख्या में मिलता है।
- यहाँ क्रम शब्द क्रम सम्प्रदाय का बोधक न होकर गुरु परम्परा के क्रम को सूचित करता है। ज्ञान की परम्परा, जो कि तन्त्रशास्त्र में ओघ या ओघवल्ली शब्द से
४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः इह खलु भगवान् प्रकाशमूर्तिः परमशिवः स्वात्मानं विमर्शांशेन विभज्य पश्यन्त्यादिक्रमात् पृच्छति— श्रीदेव्युवाच इति। शिव एवाहं वैखरीपर्यन्तं व्यापृत्य विमर्शांशेन पृष्टवानिति यावत्। उवाचेति लिडुत्तमपुरुषैकवचनम्। भूतत्वं च वक्तव्यस्य सदातनत्वात्। अनद्य- तनत्वमकालकलितत्वात्। परोक्षत्वमनिन्द्रियगोचरत्वात्। अनेन “श्रीभैरव उवाच” इत्येतदपि व्याख्यातम्। प्रकाशात्मकः परमशिवोऽहमेव विश्वानुग्रहपरः परा-पश्यन्ती-मध्यमा-वैखरीक्रमेण व्यापृत्य विमर्शांशेन प्रष्टा भूत्वा प्रकाशांशेन प्रतिवचनदाताऽपि सन् तन्त्रं समवतारयामीत्यर्थः। तदुक्तं श्रीमत्स्वच्छन्दे— गुरुशिष्यपदे स्थित्वा स्वयं देवः सदाशिवः। प्रश्नोत्तरपरैर्वाक्यैस्तन्त्रं समवतारयत्॥ (स्व० त० ८।३१) इति। ‘श्रीदेव्युवाच’ इस वाक्य का अभिप्राय यह कि प्रकाशमूर्ति परमशिव अपने को विमर्शरूप में विभक्त कर ^१पश्यन्ती, मध्यमा और अन्ततः वैखरी वाणी का सहारा लेकर प्रश्न पूछते हैं। मैं स्वयं शिव ही वैखरी पर्यन्त अपना विस्तार कर विमर्शरूप में प्रश्न करता हूँ। ‘उवाच’ यह लिट् लकार के उत्तम पुरुष का एक वचन है। वर्तमान काल के स्थान पर भूतकाल का प्रयोग यहाँ इस लिये किया है कि इस वक्तव्य का सार्वकालिक महत्त्व है। काल इसको निगल नहीं सकता, इसलिये अनद्यतन काल का और यह ज्ञान इन्द्रियों का विषय नहीं है, अतः परोक्ष भूतकाल का प्रयोग यहाँ किया गया है। ‘श्रीदेव्युवाच’ की इस व्याख्या से ‘श्रीभैरव उवाच’ इस वाक्य की भी व्याख्या हो जाती है। इससे तात्पर्य यह निकला कि गुरुस्थानीय मैं प्रकाशात्मक परमशिव ही विश्व पर अनुग्रह करने की इच्छा से परा-पश्यन्ती-मध्यमा और वैखरी पर्यन्त अपना विस्तार कर विमर्शमयी देवी का स्वरूप धारण कर लेता हूँ, शिष्य बन जाता हूँ। इस तरह से शिष्य के रूप में मैं स्वयं ही प्रश्न करता हूँ और स्वयं ही प्रकाशात्मक गुरु का स्वरूप धारण कर उन प्रश्नों का उत्तर देकर तन्त्रशास्त्र की अवतारणा करता हूँ। महास्वच्छन्द शास्त्र में इस विषय को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि स्वयं सदाशिव देव ही गुरु और शिष्य का स्वरूप धारण कर प्रश्न और प्रतिवचन की पद्धति से तन्त्रशास्त्र की लोक में अवतारणा करते हैं। जानी जाती है, त्रिपुरा सम्प्रदाय में हमें दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ गुरुओं की परम्परा के क्रम से प्राप्त हुई है। १. इस विषय की विस्तार से चर्चा हमने विज्ञानभैरव के भाषानुवाद (पृ० ५-६) में की है।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ५ देवदेव महादेव परिपूर्णप्रथामय । वामकेश्वरतन्त्रेऽस्मिन्नज्ञातार्थास्त्वनेकशः ॥१॥ तांस्तानर्थानशेषेण वक्तुमर्हसि भैरव । विश्वस्य भरणाद् रमणाद् वमनात् सृष्टिस्थितिसंहारकारी भैरवः परम- शिवः । देवदेव देवा द्योतनात्मानो रव्यादयस्तेषां देवः प्रकाशकः । महादेवो महाप्रकाशात्मा । अयमर्थः—तव महाप्रकाशोत्मकत्वात् त्वमेव विश्वं भासयसि, न त्वां कोऽपि भासयितुमलमिति । तत्र श्रुतिः— न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ इति । (क० उ० ५।१५) परिपूर्णप्रथामय प्रथा ज्ञानम्, परिपूर्णप्रथा विश्वविषयिणी ज्ञप्तिः, तन्मय तद्रूप । तत्र सर्वज्ञत्वात् त्वमेव सर्वान् बोधयितुमर्हसि, न त्वां कोऽपि बोधयितुमलमिति । अतो वामकेश्वरतन्त्रे चतुश्शतीशास्त्रे, अज्ञातार्था अविदितार्थाः, अनेकशो बहवः विमर्शस्वरूपा देवी प्रकाशस्वरूप भगवान् भैरव से पूछती है— हे देवदेव महादेव परिपूर्णप्रथामय भैरव ! इस पूर्वोपदिष्ट वामकेश्वर तन्त्र में अनेक विषय अज्ञात हैं। उन विषयों को आप पूरी तरह से मुझे समझाइये ॥१॥ विश्व का भरण, रमण और वमन करने से उसकी सृष्टि, स्थिति और संहार का कारणभूत भैरव¹ परमशिव ही है । इसको देवदेव इसलिये कहते हैं कि यह जगत् के प्रकाशक सूर्य प्रभृति देवों को भी प्रकाश देने वाला है। इस तरह से महाप्रकाश स्वरूप होने से यह महादेव है। देवी के प्रश्न का तात्पर्य यह है कि आप महाप्रकाश स्वरूप हैं, अतः आप ही सारे जगत् को भासित करते हैं, आपको प्रकाशित करने में कोई भी समर्थ नहीं है । कठोपनिषद् में बताया गया है कि वहाँ सूर्य प्रकाशित नहीं होता और न चाँद- तारे ही वहाँ प्रकाशित होते हैं। यह आकाशीय विद्युत् भी वहाँ नहीं चमकती, तब इस भौतिक अग्नि की बात ही क्या है ? उस ब्रह्म के प्रकाश के बाद ही यह सब प्रकाशित होते हैं, इस ब्रह्म से प्रकाश प्राप्त कर लेने के उपरान्त ही इनमें प्रकाश दिखाई पड़ता है ।। प्रथा ज्ञान को कहते हैं । परिपूर्णप्रथा का अर्थ हुआ सारे विश्व का ज्ञान । इस तरह से हे भगवन् भैरव ! आप परिपूर्णप्रथामय हैं । आप सर्वज्ञ हैं, अतः आप ही सबको ज्ञान प्रदान कर सकते हैं, आपको समझाने वाला दूसरा कोई नहीं है । अतः इस (पूर्वोपदिष्ट) १. शक्तत्वात्-ख. । १. भैरव शब्द के पारिभाषिक अर्थ को समझने के लिये विज्ञानभैरव का उपोद्घात (का० सं०) द्रष्टव्य है । आनन्दलहरी ग्रन्थ का भाषानुवाद (पृ० १४-१५ द्वितीय संस्करण) देखिये ।
६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः सन्ति । तांस्तानर्थानशेषेण साकल्येन, वक्तुं व्यक्तीकर्तुम्, अर्हसि मम विमर्शपदवीं प्रापयितुमर्हसीत्यर्थः ॥१॥ प्रकाशांशेन प्रतिवदति— श्रीभैरव उवाच शृणु देवि महागुह्यं योगिनीहृदयं परम् ॥२॥ त्वत्प्रीतया कथयाम्यद्य गोपितव्यं विशेषतः । १हे देवि ! विश्वसर्जनादि२व्यवहारक्रीडापरे विमर्शविग्रहे। महागुह्यं लोके गोप- नीयम्। यद्वस्तु ३यावत् तत्र न मनः प्रवर्तते तत् तावत्कालमतीन्द्रियगोचरं भवति, अस्य तु सर्वदा मनोवागिन्द्रियातीतत्वान्महागुह्यत्वम् । योगिनीहृदयं योगिन्याः वामकेश्वर तन्त्र में, १चतुःशती (चार सौ श्लोकों वाले) शास्त्र में जो अनेक अविदित अर्थ हैं, उन सबको आप पूरी तरह से मुझे बताइये, जिससे कि वे सारी बातें मेरी समझ में आ जाँय ॥१॥ २प्रकाशस्वरूप भगवान् भैरव इसका उत्तर देते हैं— हे देवि ! इस महागुह्य उत्कृष्ट योगिनीहृदय शास्त्र को तुम सुनो । तुम्हारी प्रसन्नता के लिये ही इसे मैं सुना रहा हूँ । इसे विशेष रूप से गुप्त ही रखना चाहिये ॥२॥ जगत् के सृष्टि-संहार आदि का खेल करने वाले विमर्शस्वरूपिणी हे देवि ! लोक में छिपाने लायक वस्तु को गुह्य कहा जाता है । कोई भी वस्तु जब तक उसको जानने के लिये मन प्रवृत्त नहीं होता, तब तक अज्ञात ही रहती है । योगिनीहृदय में प्रतिपादित किये जाने वाले विषय में तो मन और वाणी की प्रवृत्ति ही नहीं हो पाती, अतः इसको महागुह्य कहा गया है। योगिनीहृदय का अभिप्राय है कि इस ग्रन्थ में योगिनी (स्वसंवित् स्वरूपा भगवती त्रिपुरा) का हृदय (स्वरूप) उसी प्रकार प्रकट हुआ है, जैसे कि १. 'हे' नास्ति-ज. झ. । २. 'व्यवहार' नास्ति-क. ख. । ३. 'यावत्''''प्रवर्तते' नास्ति-ने. ज. झ. उ. । १. अमृतानन्द ने दीपिका में चार सौ श्लोकों वाले नित्याषोडशिकार्णव को चतुःशती- शास्त्र के नाम से अनेक स्थलों पर उद्धृत किया है। अमृतानन्द की इस उक्ति से भी चतुःशती-शास्त्र से योगिनीहृदय की भिन्नता सिद्ध होती है। २. प्रकाश और विमर्श शब्दों की विभिन्न आचार्यों द्वारा की गई व्याख्या के लिये नित्याषोडशिकार्णव का उपोद्घात (पृ० ८३-८४ टि०) तथा लुप्तागमसंग्रह द्वितीय भाग का उपोद्घात (पृ० ४०) देखिये।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ७ स्वसंविदो हृदयमिवाविर्भावभूमित्वाद् हृदयम्। अत्र तु योगो नाम 'समस्तवस्तु- समवायसम्बन्धः, तेन भासत इति योगिनी। तदुक्तमभियुक्तैः— देशकालपदार्थात्म यद्यद् वस्तु यथा तथा²। तत्तद्रूपेण या भाति तां श्रये ³सांविदीं कलाम् ॥ इति। (सौ० हृ० ४) परम् उत्कृष्टम्, सर्वज्ञानोत्तरत्वात्। अत एव वक्ष्यति—"एतज्ज्ञात्वा वरारोहे सद्यः खेचरतां व्रजेत्" (१।५) इति। एतत् शृणु विमर्शपदवीं प्रापय ॥२॥ त्वत्प्रीत्या ⁴त्वदेकसामरस्यहेतोः कथयामि। अद्य पुरा न कस्यचिदाख्यात- मतिरहस्यत्वात्, अतो ⁵हेतोर्विशेषतो गोपितव्यम्। आत्माहंभावभावनया भाव- यितव्यमित्यर्थः। अत्यन्तगोपनीयतामेव द्रढयितुमाह— कर्णात् कर्णोपदेशेन सम्प्राप्तमवनीतलम् ॥३॥ सामान्य जन के हृदय में अपना ज्ञान उन्मिषित होता है। यहाँ योग का अर्थ है जगत् की सारी वस्तुओं के साथ ज्ञान का समवाय सम्बन्ध। इससे भासित होने वाली है योगिनी। शिवानन्द महायोगी ¹सौभाग्यहृदयस्तोत्र में कहते हैं कि देश, काल अथवा पदार्थ के रूप में जो भी वस्तु जिस-किसी भी रूप में भासित होती है, उन सभी रूपों में जो भासित होती रहती है, उस सांविदी (ज्ञानमयी) कला की मैं शरण लेता हूँ ॥ यह अनुत्तर ज्ञान सभी लौकिक ज्ञानों से श्रेष्ठ है। इसी लिये आगे (१।५) कहा जायगा कि इस ज्ञान को प्राप्त कर लेने पर व्यक्ति तत्काल परम पद में लीन हो जाता है। इस ज्ञान को तुम अपने मन में बैठाने का प्रयत्न करो ॥२॥ तुम्हारी प्रसन्नता के लिये, शिव और शक्ति के सामरस्य-लाभ के लिये ही इसे मैं सुना रहा हूँ। इससे पहले मैंने इसे किसी को भी नहीं सुनाया है, क्योंकि इसमें गहरा रहस्य छिपा हुआ है। इसी लिये इस ज्ञान को बहुत छिपा कर रखना चाहिये, अपने मन में ही इसकी भावना करनी चाहिये। ज्ञान की अत्यन्त गोपनीयता को ही भगवान् पुनः पुष्ट करते हैं— यह ज्ञान एक कान से दूसरे कान तक उपदेश के क्रम से ही पृथिवी तल पर अवतरित हुआ है ॥३॥ १. सर्व-ने. ज. झ. उ. । २. यथा-घ. ज. झ. उ. । ३. संविदं-ख. ग. घ. ने. ज. झ. उ. । ४. त्वदैकस्थ्य-उ., त्वदेकरहस्य-ने. ज. झ. । ५. 'हेतोः' नास्ति-ने. ज. झ. उ. ।
- यह स्तोत्र नित्याषोडशिकार्णव के वाराणसी संस्करण के परिशिष्ट (पृ० ३०४- ३०७) में प्रकाशित हो चुका है।
८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः कर्णात्, कर्मणि ल्यब्लोपे पञ्चमी, कर्णं प्राप्य पुनः कर्ण एवोपदेशक्रमेणैव पारम्पर्यक्रमेण सम्प्राप्तम् । आदिकर्मणि क्तः । अवनीतलाशब्देन तत्रस्था मनुष्या लक्ष्यन्ते, यथा मञ्चाः क्रोशन्तीति । तेनायमर्थः सम्पद्यते—दिव्यसिद्धमानव- क्रमेणातिरहस्यत्वात् कर्णपरम्परामात्रगम्यमेवेदमिति । अत्र मानवग्रहणं १दिव्य- सिद्धयोरुपलक्षणार्थम् ॥३॥ अनर्हेभ्यो न देयमित्याह— न देयं परशिष्येभ्यो नास्तिकेभ्यो न चेश्वरि । २न शुश्रूषालसानां च नैवानर्थप्रदायिनाम् ॥४॥ परशिष्या एव के येभ्यो न देयम्३ ? ये विद्यान्तरेषु पारम्प४र्यक्रमेणाधिगता- शेषरहस्यपरमार्थाः ५प्राप्तपूर्णाभिषेकाश्च ते परशिष्याः । तेभ्यो न देयम् । “लब्ध्वा 'कर्णात्' इस पद में कर्म में ल्यप् का लोप होकर पञ्चमी हुई है । इस ज्ञान को गुरु शिष्य के कान तक पहुँचाता है । इसी तरह यह ज्ञान एक कान से दूसरे कान तक गुरु- शिष्यपरम्परा से पहुँचता रहता है । 'सम्प्राप्त' पद में आदि कर्म में क्त प्रत्यय हुआ है । अवनीतल शब्द से अवनी (पृथिवी) तल पर रहने वाले मनुष्यों का ग्रहण होता है, जैसे 'मञ्चाः क्रोशन्ति' इस वाक्य में मंच स्थित पुरुषों का ग्रहण किया जाता है । इससे श्लोक का यह अभिप्राय निकलता है कि १दिव्य, सिद्ध और मानव गुरुओं की परम्परा में ही यह अत्यन्त रहस्यभूत ज्ञान मात्र कर्ण-परम्परा से प्राप्त हो सकता है । अवनीतल पद में लक्षणा से प्राप्त मानव शब्द दिव्य और सिद्ध गुरुओं की परम्परा का भी द्योतक है ॥३॥ अयोग्य व्यक्तियों को यह ज्ञान नहीं दिया जाना चाहिये— हे ईश्वरि ! परशिष्य को, नास्तिक को, गुरु की सेवा में आलस्य करने वाले को और गुरु को धन न देने वाले को यह ज्ञान नहीं देना चाहिये ॥४॥ वे परशिष्य कौन हैं, जिनको यह ज्ञान नहीं दिया जायगा ? जो अन्य सम्प्रदायों में गुरु-परम्परा के क्रम से दीक्षित होकर उस सम्प्रदाय के रहस्यों से पूरी तरह परिचित हो चुके हैं और जिनका उस सम्प्रदाय में अभिषेक भी हो चुका है, वे व्यक्ति परशिष्य कहे १. सिद्धदिव्यानामुप-ने. ज. झ. उ. । २. नाशुश्रूषारतानां-ख. ज. झ. उ. । ३. इतः परम् 'इत्यत आह' इत्यधिकम्-ग. घ. ने. ज. झ. उ. ब. । ४. म्पर्येणा-ने. ज. झ. उ. । ५. अप्राप्त-ज. झ. । १. दिव्य, सिद्ध और मानवौघ क्रम की गुरु-परम्परा की चर्चा हम ऊपर पृ० ३ की टिप्पणी में कर चुके हैं ।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ९ कुलगुरुं सम्यङ् न गुर्वन्तरमाश्रयेत्'' (कुला० १३।१३०) इत्यादिवचनात् तैरपि¹ न ग्राह्यम् । ये विद्यान्तरेषु पारम्पर्यक्रमेणानधिगताशेषरहस्य²परमार्था अप्राप्त- पूर्णाभिषेकाश्च तेभ्यो देयम्, तैरपि ग्राह्यम् । ³मधुलुब्धो यथा भृङ्गः पुष्पात् पुष्पान्तरं व्रजेत् । ज्ञानलुब्धस्तथा शिष्यो गुरोर्गुर्वन्तरं व्रजेत् ॥ (कुला० १३।१३२) इति वचनान्न ते परशिष्याः, “पूर्णाभिषेककर्ता यो गुरुस्तस्यैव पादुका⁴" (कुला० १३।१२९) इति वचनाच्च । नास्तिकेभ्यः । नास्ति परलोक इति ये ⁵मन्वते ते नास्तिकाः श्रद्धाविहीनाः । धनधान्याद्यपेक्षया तेषां रुचिमुत्पाद्य न देय- मित्यर्थः । तदुक्तं भगवद्गीतासु— जाते हैं। ऐसे परशिष्यों को यह ज्ञान न दिया जाय। "कुलगुरु की सम्यक् प्राप्ति हो जाने पर फिर दूसरा गुरु नहीं करना चाहिये" इस शास्त्रवचन के आधार पर उनको भी अन्य गुरु से ज्ञान की प्राप्ति के लिये प्रयत्न नहीं करना चाहिये। जो व्यक्ति अन्य सम्प्रदायों में गुरु-परम्परा के क्रम से दीक्षित नहीं हुए हैं, इसीलिये अन्य सम्प्रदायों के रहस्यों से जो परिचित नहीं हो सके हैं और जिनका उस उस सम्प्रदाय में अभिषेक भी नहीं हुआ है, उनको यह ज्ञान दिया जाय। वे इस ज्ञान के अधिकारी हैं। मधु (शहद) का लोभी भृंग (भँवरा) जैसे एक पुष्प को छोड़कर दूसरे पुष्प के पास पहुँच जाता है, उसी तरह से ज्ञान का लोभी शिष्य भी एक गुरु को छोड़कर दूसरे गुरु के पास पहुँच जाय¹ ॥ इस वचन के आधार पर ऐसा व्यक्ति परशिष्य नहीं कहा जायगा। फिर शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि "जो गुरु पूर्णाभिषेक करता है, शिष्य को उसी की पादुका की पूजा करनी चाहिये।" जो व्यक्ति परलोक को नहीं मानते, वे नास्तिक कहलाते हैं। ऐसे व्यक्तियों में श्रद्धा का अभाव रहता है। ऐसे व्यक्तियों में धन-धान्य आदि का प्रलो- भन देकर रुचि नहीं जगानी चाहिये। भगवद्गीता में कहा भी गया है— १. 'तैरपि न ग्राह्यम्' इति पाठो लब्ध्वेत्युद्धरणात् पूर्वं स्थापितः-ख. घ. ज. झ. । २. 'रहस्य' नास्ति-क. ग. घ. । ३. गन्ध-घ. ने. ज. झ. उ. । ४. काम्-ग. घ. ने. ज. झ. उ. । ५. मन्यन्ते-क. उ. ।
- यह श्लोक कुलार्णव तन्त्र में मिलता है और तन्त्रालोक (२२।४५-४६) में भी उपलब्ध है। कुलार्णव तन्त्र के एक (घृणा शङ्का०) श्लोक को अमृतानन्द (१।७२) अभि- युक्तवचन कह कर उद्धृत करते हैं। क्षेमराज द्वारा नेत्रोद्योत (पृ० ११४-११५, १५८ दिल्ली संस्करण) में उल्लिखित कुलार्णव के वचन प्रकाशित ग्रन्थ में नहीं मिलते। अतः निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता है कि अमृतानन्द ने ये वचन कहाँ से लिये हैं।
१० योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेत न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् । जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन् ॥ (३।२६) इति । न १ शुश्रूषालसानां च । ये शुश्रूषालसास्तेभ्यो न देयम्, येऽनर्थप्रदायिनस्तेभ्यो- ऽपि । शुश्रूषालसा अपि ये २ धनं वितरन्ति तेभ्यो देयम्, ये च शुश्रूषालसाश्च धनमपि न वितरन्ति तेभ्यो न देयमित्यर्थः । तदुक्तम्— गुरुशुश्रूषया विद्या पुष्कलेन धनेन वा । अथवा विद्यया विद्या ३ चतुर्थो नैव विद्यते ॥४॥ परीक्ष्याऽर्हाय देयमित्याह— परीक्षिताय दातव्यं वत्सराधोषित्याय च । परशिष्यत्वादिदोषपरीक्षणं वत्सरार्धेन सहवासेन कर्तुं शक्यते, गुरोर्विवेकि- त्वात् । ज्ञानी पुरुष को चाहिये कि वह शास्त्रविहित कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम न उत्पन्न करे, किन्तु स्वयं शास्त्र-विहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ उनसे भी वैसा ही करने को कहे ॥ जो व्यक्ति गुरु की सेवा करने में आलस्य करते हों और जो धन भी न देते हों, ऐसे व्यक्तियों को भी यह ज्ञान नहीं देना चाहिये । सेवा करने में आलसी व्यक्ति यदि धन देते हों तो उनको यह ज्ञान दिया जा सकता है, किन्तु जो व्यक्ति सेवा करने में आलसी हैं ही, धन भी नहीं देते, उनको यह ज्ञान नहीं देना चाहिये । कहा भी गया है— गुरु की सेवा करने से विद्या प्राप्त होती है अथवा पर्याप्त धन देने से भी यह प्राप्त हो सकती है । अथवा एक विद्या के बदले में भी दूसरी विद्या प्राप्त हो सकती है । इन तीन उपायों को छोड़कर विद्या प्राप्ति का १ चौथा कोई उपाय नहीं है ॥४॥ परीक्षा कर लेने के उपरान्त योग्य शिष्य को ही यह ज्ञान देना चाहिये— छः मास तक अपने पास रह रहे शिष्य की पूरी तरह से परीक्षा कर लेने पर ही उसको यह ज्ञान देना चाहिये । छः मास तक शिष्य के अपने पास रहने पर उसमें ऊपर बताये गये परशिष्य आदि दोष हैं कि नहीं, इस बात की परीक्षा विवेकी गुरु भलीभाँति कर सकता है । १. नाशुश्रूषारतानां-ख. ज. झ. उ. । २. धनं चेत्-ख. ज. झ. ने. उ. । ३. चतुर्थं नैव दृश्यते-ग० घ० ने० उ० ।
- नित्याषोडशिकार्णव की ऋजुविमर्शिनी व्याख्या (पृ० ९७) में संहिताब्राह्मण का एक श्लोक उद्धृत किया गया है । वहाँ ब्रह्मचारी, धनदायी, मेधावी, श्रोत्रिय, प्रिय व्यक्ति और विद्या के बदले विद्या देने वाला व्यक्ति—ये छः विद्याप्राप्ति के अधिकारी माने गये हैं ।
प्रथमः ] Deepikaभाषानुवादसहितम् ११ उक्तार्थमेव द्रढयन् शिष्यप्रवृत्तये फलमाह— एतज्ज्ञात्वा वरारोहे सद्यः खेचरतां व्रजेत् ॥५॥ अस्य तु महार्थत्वात् परीक्षितायैव देयम्। एतस्य परिज्ञानेनैव शिष्यः खेच- रतां खे परमव्योम्नि चरतीति खेचरः शिवः। तदुक्तं चिद्गगनचन्द्रिकायाम्— दृक्क्रियात्मशशिभानुमध्यगं १ खे चरत्यनलदृष्टिधाम २ यत्। यत्तदूर्ध्वशिखरं परं नभस्तत्र दर्शय शिवं त्वमम्बिके ॥ (श्लो० ३२) इति। सद्यस्तत्त्वं व्रजेत्, जीवन्मुक्तो भवेदित्यर्थः। तदुक्तं वेदरहस्ये—"तस्यैवात्मा पदैवित्तं विदित्वा न कर्मणा लिप्यते पापकेन" (इ० उ० २०) इति ॥५॥ इसी विषय की पुष्टि करते हुए और शिष्य की जिज्ञासावृत्ति को जगाने के लिये इस ज्ञान की फलश्रुति आगे के श्लोकार्ध में दी गई है— हे वरारोहे, योगिनीहृदय में उपदिष्ट ज्ञान को प्राप्त कर व्यक्ति तत्काल खेचरता को प्राप्त कर लेता है ॥५॥ यह ज्ञान महार्थ (बहुमूल्य) हैं, अतः परीक्षित शिष्य को ही इसका उपदेश करना चाहिये। इसके जान लेने मात्र से शिष्य खेचर, अर्थात् परम व्योम में विचरण करने वाला परमशिव बन जाता है, जैसा कि १चिद्गगनचन्द्रिका में कहा गया है— ज्ञान और क्रियाशक्ति स्वरूप चन्द्र और सूर्य के बीच में, अर्थात् दक्षिण और वाम नेत्र के बीच में भ्रूमध्यस्थित शून्य बिन्दु में जो अग्निस্বরূপ तृतीय नेत्रधाम, अर्थात् ज्ञानचक्षु विराजमान है, उस तृतीय ज्ञाननेत्र के खुल जाने पर साधक के चित्त में नाद- रूपी ऊर्ध्व शिखर परमव्योम को देख पाने की सामर्थ्य आ जाती है। ओ माँ, तुम मुझे वहाँ भगवान् शिव का दर्शन कराओ॥ इस प्रकार परम व्योम में प्रवेश पा जाने पर साधक तत्काल शिव बन जाता है, अर्थात् जीवन्मुक्त हो जाता है। इस विषय में वेदरहस्य २ का भी कहना है कि पद-वाक्य १. मध्यगे-क., मध्यगः-ख. ग. घ. ने. झ. उ.। २. धाम्नि यः-क. ख. ब.। ३. पदवित् तं-ख. ग. घ. ने. ज., पर-क.। १. चिद्गगनचन्द्रिका (मूलमात्र) आगमानुसन्धान समिति, कलकत्ता से सन् १९३६ में छपी थी। यह क्रम-सम्प्रदाय का एक जटिल ग्रन्थ है। बाद में श्री कर्रा अग्निहोत्र शास्त्री की टीका के साथ सन् १९४३ में यह ग्रन्थ आन्ध्रप्रदेश के पूर्व गोदावरी जिले से प्रकाशित हुआ। अभी हाल में स्व० पण्डित रघुनाथ मिश्र की टीका के साथ यह ग्रन्थ सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से प्रकाशित हुआ है। २. वेदरहस्य नाम का कोई संहितातुल्य ग्रन्थ है। उसका एक इतिहासप्रसिद्ध...
१२ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः शास्त्रमारभते— चक्रसंकेतको मन्त्रपूजासंकेतकौ² तथा। त्रिविधस्त्रिपुरादेव्याः संकेततः परमेश्वरि ॥६॥ संकेतवत् संकेतकः। संकेत: समयः। यथा कृतसमयो कामिनीकामुकौ यत्र क्वापि निवसत:, एवमस्मिन् शिवाविति। चक्रसंकेतकः, मन्त्रसंकेतकः, पूजासंके- तकः—एवं त्रिविधः संकेत:। त्रिपुरादेव्या धाम-तत्त्व-पीठ-लिङ्ग-मातृकादिभ्य- स्त्रिभ्योऽपि पूरा या विद्यते सा त्रिपुरा³ देवी प्रकाशविमर्शसामरस्यरूपिणी परा। अस्यास्त्रिविधः संकेत:। परमेश्वरि परममुत्कृष्टमिन्द्रादिभिरपि परिपाल्यमान- मैश्वर्यमाज्ञा यस्याः। तदुक्तं वेदरहस्ये— भीषाऽस्माद् वातः पवते भीषोदेति सूर्यः। भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः॥ (तै० उ० २।८) इति ॥६॥ प्रवीण साधक की आत्मा उस आत्मतत्त्व को जान लेने के बाद फिर कभी पाप कर्म में लिप्त नहीं होती ॥५॥ इस संक्षिप्त विवेचन के साथ अब शास्त्र का प्रारम्भ होता है— हे परमेश्वरि ! चक्रसंकेत, मन्त्रसंकेत तथा पूजासंकेत—यह त्रिविध त्रिपुरा देवी का संकेत है ॥६॥ श्लोक में संकेत के ही अर्थ में संकेतक शब्द प्रयुक्त है। संकेत का अर्थ है समय। जैसे पहले से निश्चित स्थान और समय पर कामिनी और कामुक मिलते हैं, उसी तरह इस त्रिविध संकेत में भगवान् शिव और शक्ति समरस रूप में निवास करते हैं। चक्र- संकेत, मन्त्रसंकेत और पूजासंकेत—यह तीन प्रकार का संकेत है। धाम, तत्त्व, पीठ, लिङ्ग, मातृका आदि के शास्त्रों में तीन-तीन भेद बताये जाते हैं। इन तीनों भेदों से जो पहले विद्यमान है, उसे त्रिपुरा कहते हैं। यही प्रकाश और विमर्श स्वरूप को समरस रूप में रखने वाली परा देवी है। इसको प्राप्त करने के तीन प्रकार हैं। परमेश्वरी का अर्थ है परम ऐश्वर्य वाली। इन्द्र प्रभृति उत्कृष्ट देवगण भी इसकी आज्ञा का पालन करते हैं। जैसा कि तैत्तिरीयोपनिषद् में कहा गया है— इसी के भय से पवन बहता है, सूर्य उगता है और इसी के भय से अग्नि और इन्द्र अपना-अपना कार्य करते हैं तथा पाँचवाँ देव मृत्यु (यमराज) भी इसी के भय से इधर-उधर दौड़ता रहता है ॥६॥ १. मन्त्रः—ख. ने. उ.। २. कस्तथा—ख. ग. घ. ने. झ. उ.। ३. 'त्रिपुरा' नास्ति—ग. घ. ने. ज. झ.। मोतीलाल बनारसीदास के यहाँ से प्रकाशित उपनिषत्संग्रह के द्वितीय खण्ड में संगृहीत तैत्तिरीयोपनिषद्, भृगुवल्ली के आठवें अनुवाक में इस प्रकार पाठ है—
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १३ एतज्ज्ञानविहीनस्य फलवैपरीत्यमाह— यावदेतन्न जानाति संकेतत्रयमुत्तमम् । न तावत् त्रिपुराचक्रे परमाज्ञाधरो भवेत् ॥७॥ यावद् एतद् वक्ष्यमाणं संकेतत्रयं यो न जानाति स तावत् त्रिपुरायाः परायाः १ स्वसंविदश्चक्रे मातृमानमेयलक्षणे तत्त्वसमूहे परमाज्ञाधरो न भवेत् । आज्ञा नाम निग्रहानुग्रहसामर्थ्यम् । तदाज्ञामपि लोकेऽस्ति । तदुच्यते—परमेति । परमा सर्व- लोकेष्वप्रतिहता आज्ञा परमेश्वरस्यैव । २परमाज्ञाधरः परमेश्वरो भवेत् । य एतद् विजानाति स सद्यः खेचरतां व्रजेत्, यो नैतद् विजानाति स न ३तद्भावं व्रजेदित्यन्वयव्यतिरेक४सिद्धमित्यर्थः । अत्रैतत्प्रयोजनकीर्तनमधिकारिविषयसंबन्धा- नामप्युपलक्षणम् । मुमुक्षुरधिकारी, स्वसंविद्देवता विषयः, मोक्षः प्रयोजनम्, प्रतिपाद्यप्रतिपादकभावः संबन्धः ॥७॥ इन तीन संकेतों से अपरिचित व्यक्ति विपरीत फल का भागी होता है— जब तक व्यक्ति इन उत्तम कोटि के तीन संकेतों को नहीं जानता, तब तक त्रिपुराचक्र में उसकी आज्ञा अप्रतिहत रूप से नहीं चल पाती ॥७॥ आगे जिन तीन संकेतों का विस्तार से वर्णन किया जायगा, उनको व्यक्ति जबतक पूरी तरह से समझ नहीं लेता, तबतक वह स्वसंवित्स्वरूपा पराशक्ति त्रिपुरा के चक्र, अर्थात् माता, मान और मेय रूप तत्त्वसमूह में परमाज्ञाधर नहीं हो सकता । निग्रह (नाराजगी) और अनुग्रह (प्रसन्नता) की सामर्थ्य वाले व्यक्ति के वचन को आज्ञा कहा जाता है । लौकिक प्रभु में भी यह सामर्थ्य है, किन्तु वह परम सामर्थ्य नहीं है । यह सर्वत्र अप्रतिहत परम सामर्थ्य केवल परमेश्वर में ही है । जो व्यक्ति इन तीन संकेतों को जानता है, वह परमाज्ञाधर, अर्थात् परमेश्वर हो जाता है । जो इनको जानता है, वह तत्काल खेचर (शिवस्वरूप) बन जाता है; जो नहीं जानता, वह ऐसा नहीं बन सकता । यह बात न्यायदर्शन की अन्वय-व्यतिरेक पद्धति से सिद्ध हो जाती है । इस तरह से यहाँ इस शास्त्र के अध्ययन का प्रयोजन बताया गया है । इससे १अनुबन्धचतुष्टय के अन्य विषयों—अधिकारी, विषय और सम्बन्ध—की भी प्रतीति हो जाती है । मुक्ति की कामना वाला व्यक्ति इस शास्त्र के अध्ययन का अधिकारी है, इस शास्त्र का प्रतिपाद्य विषय स्वसंविद्देवता भगवती त्रिपुरा है, मोक्ष की प्राप्ति इसका प्रयोजन है और इनमें परस्पर प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव सम्बन्ध है ॥७॥ १. 'परायाः' नास्ति-क. ख. । २. यः परमाज्ञाधरः स एव परमेश्वरः-क. ने. । ३. खेचरतां-क. । ४. रेखाभ्यां-क. ग. । १. अनुबन्धचतुष्टय शब्द के अभिप्राय को विज्ञानभैरव के भाषानुवाद (पृ० १-३) में स्पष्ट कर दिया गया है ।
१४ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः तत्रादौ१ चक्रसंकेतं वक्तुमुपक्रमते— तच्छक्तिपञ्चकं सृष्ट्या लयेनाग्निचतुष्टयम् । पञ्चशक्तिचतुर्वह्निसंयोगाच्चक्रसंभवः ॥८॥ तच्चक्रं सृष्ट्या सृष्टिरूपेण शक्तिपञ्चकम्, स्वाभिमुखाग्रत्रिकोणं शक्तिरुच्यते, तादृशं शक्तिपञ्चकम् । लयेनाग्निचतुष्टयं लयेन संहाररूपेण अग्निः, पराङ्मुखा- ग्रत्रिकोणमग्निरुच्यते, तच्चतुष्टयम् । एवं पञ्चशक्तीनां चतुर्वह्नीनां च संयोगात्, सम्यग् योगः संयोगः, "शक्त्या शक्तिं विनिर्भिद्य" (१।२९) इत्यादिश्चतुश्शती- शास्त्रोक्तरीत्या ग्रन्थिभेदक्रमेण समत्रिकोणशक्त्यग्रं समरेखं यथा भवति तथा लेखनं संयोगः, तस्मात् । चक्रस्य संभवो भवति ॥८॥ सामान्यतश्चक्रसमुदायमुत्पाद्य इदानीमवयवशश्चक्रसंभवं प्रतिजानीते— एतच्चक्रावतारं तु कथयामि तवानघे । एतस्य श्रीमहात्रिपुरसुन्दर्याश्चक्रस्य पूजाचक्रस्यावतारम्, अवतारो नाम लोके सौधाद्युन्नतप्रदेशान्निम्नप्रदेशप्राप्तिः, अत्र तु विश्वोत्तरात्२ प्रकाशात्मनः अब पहले चक्रसंकेत का उपदेश किया जाता है— पांच शक्तियों और चार वह्नियों के संयोग से श्रीचक्र का स्वरूप बनता है। यह संयोग शक्तियों का सृष्टिक्रम से और वह्नियों का लयक्रम से होना चाहिये ॥८॥ इस श्रीचक्र में सृष्टिक्रम से पाँच शक्तियां रहती हैं। त्रिकोण का अग्रभाग यदि अपनी तरफ हो तो उसे शक्ति कहा जाता है। चक्र में ऐसी स्वाभिमुख त्रिकोण वालो पांच शक्तियाँ रहती हैं। यहाँ संहार क्रम से चार वह्नियां रहती हैं। त्रिकोण का अग्र- भाग यदि विपरीत दिशा में हो तो उसे वह्नि कहते हैं। चक्र में पराङ्मुख त्रिकोण वाली चार वह्नियां रहती हैं। इस तरह से पाँच शक्ति और चार वह्नि के सम्यक् योग से अर्थात् नित्याषोडशिकार्णव के "शक्त्या शक्तिम्" (१।२९) इत्यादि श्लोकों में बताई गई विधि से ग्रन्थिभेद के क्रम में समत्रिकोण शक्त्यग्र समरेख चक्र के लेखन से ही पाँच शक्तियों और चार वह्नियों का संयोग होता है और इससे चक्र का स्वरूप बनता है ॥८॥ इस तरह से मोटा-मोटी श्रीचक्र का स्वरूप बन जाता है। अब एक-एक कर अवान्तर चक्रों की निर्माण की प्रक्रिया बतायी जा रही है— हे अनघे ! इस श्रीचक्र की अवतार की पद्धति को अब मैं तुमको कह रहा हूँ ॥ इस तरह से भगवती श्रीमहात्रिपुरसुन्दरी के इस पूजाचक्र का अवतार होता है। लोक में प्रासाद आदि उन्नत स्थल से नीचे उतरने की क्रिया को अवतार कहा जाता है। १. अत्रादौ-ख. ने. ज. झ. उ. । २. तत्त्वात्-क. ग. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १५ परमशिवात् तत्त्वक्रमेण प्रसरः, तादृशं चक्रावतारम् । अनघे परशिष्यत्वादि- दोषरहिते । तव प्रकाशात्मनो ममांशभूताया विमर्शशक्तेः । कथयामि हृदयङ्गमंतां नयामीत्यर्थः । १'ननु कथमक्रियात् परमशिवात् तत्त्वमयं चक्रं संभवतीत्यत आह— यदा सा परमा शक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी ॥९॥ स्फुरत्तामात्मनः पश्येत् तदा चक्रस्य संभवः । यदा यस्मिन् काले प्राणिनामदृष्टवशात् स्वान्तःसंहृतविश्वसिसृक्षया सैव परा शक्तिर्विमर्शरूपिणी स्वेच्छया २विश्वरूपिणी३ विश्वं सृजति, शिवस्तटस्थ उदासीन इत्यर्थः । अत्र श्रुतिः— प्रस्तुत स्थल में विश्वोत्तीर्ण१ प्रकाशात्मक परमशिव से इस चक्र का ३६ तत्त्वों के क्रम से जो प्रसार होता है, उसी को यहाँ अवतार कहा गया है । 'अनघे' इस विशेषण से यह तात्पर्य निकलता है कि इस ज्ञान को सुनने वाली देवी पूर्वोक्त परशिष्य आदि दोषों से रहित है । हे देवि ! तुम मुझ प्रकाशात्मक शिव की अंशभूत विमर्श शक्ति हो, अतः तुम्हारे हृदय में मैं इस बात को पूरी तरह से बैठा देना चाहता हूँ ॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि क्रियाशून्य परमशिव से तत्त्वमय श्रीचक्र की उत्पत्ति कैसे हो सकती हैं ? भैरव इसका उत्तर देते हैं— यह विश्वरूपिणी परमा शक्ति अपनी इच्छा से जब स्फुरत्ता का दर्शन करती है, तो इस श्रीचक्र की निष्पत्ति होती है ॥९॥ जिस समय प्राणियों के अदृष्ट के कारण अपने भीतर समेटे हुए विश्व की यह विमर्श- रूपिणी परा शक्ति अपनी इच्छा से सृष्टि करना चाहती है, उस समय शिव तटस्थ, १. 'ननु' नास्ति-ख. झ. । २. 'विश्वरूपिणो' नास्ति-ख. ने. । ३. 'आत्मनः स्फुरणं पश्येत्' अधिकम्-ग. घ. उ. ।
- प्रत्यभिज्ञाहृदय के ८ वें सूत्र की व्याख्या करते समय क्षेमराज कहते हैं— “विश्वोत्तीर्णमात्मतत्त्वमिति तान्त्रिकाः, विश्वमयमिति कुलाद्याम्नायनिविष्टाः, विश्वोत्तीर्णं विश्वमयं चेति त्रिकादिदर्शनविदः” । अभिनवगुप्त, क्षेमराज आदि ने तान्त्रिक शब्द का प्रयोग सिद्धान्त, वाम, दक्ष, भूत और गरुड नामक पञ्चप्रवाह शास्त्र के अनुयायियों के लिये किया है । प्रधानतः द्वैतवादी सिद्धान्त शैव पञ्चकृत्यकारी पञ्चमन्त्रतनु भगवान् शिव को विश्वोत्तीर्ण, विश्व से ऊपर मानते हैं । कुल, कौल और मत दर्शन के अनुयायी स्वात्मदेवतावाद के पोषक हैं । अतः इनकी दृष्टि में परतत्त्व विश्वमय है । त्रिक और क्रम मत के अनुसार तत्त्वातीत परमशिव अथवा भगवती संवित् विश्वोत्तीर्ण है । ये ही जब विश्वरूप में भासित होते हैं, तो विश्वमय बन जाते हैं । त्रिपुरा सम्प्रदाय के आचार्यों ने अन्तिम मत का अनुसरण किया है । यहीं आगे (१।४९-५०) देखिये । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
१६ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।। इति। (श्वे० उ० ६।८) आज्ञावतारेऽप्युक्तम्—"स्वेच्छयैव जगत्सर्वं निगरत्युद्गिरत्यपि" इति। विश्वसर्जनमेव पराशक्तेः स्फुरत्ता, १तस्याः २सृष्टिरूपत्वात्। तदा षट्त्रिंशत्तत्त्वा- त्मकविश्वसृष्टिकाले चक्रस्य विश्वमयस्य परदेवताचक्रस्य संभवः। एतदेवाह— शून्याकाराद् विसर्गान्ताद् ३बिन्दोः प्रस्पन्दसंविदः ॥१०॥ शून्यश्चासावाकारश्चेति शून्याकारः। शून्यत्वं पुनरत्र निरस्तनिखिल- प्रपञ्चत्वात्। अत एव परमशिवः। तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्—"अकारः सर्व- उदासीन रहता है। यह शक्ति ही विश्व का रूप धारण करती है। इसीलिये यह विश्व- रूपिणी कहलाती है। श्वेताश्वतर श्रुति में कहा भी गया है— उस परमशिव स्वरूप ब्रह्म का न कोई कार्य है और न कारण ही। उसके समान और उससे अधिक भी कोई नहीं दिखाई पड़ता। इस ब्रह्म की स्वाभाविक परा शक्ति ही ज्ञान, बल, क्रिया आदि नाना स्वरूपों में सुनाई पड़ती है, भासित होती रहती है॥ आज्ञावतार शास्त्र में भी बताया गया है—"यह शक्ति अपनी इच्छा से ही इस जगत् को निगलती और उगलती रहती है"। विश्व का यह सृष्टि-व्यापार ही परा शक्ति की स्फुरत्ता है, क्योंकि शक्ति की स्फुरत्ता को ही सृष्टि कहा जाता है। जब शक्ति की स्फुरता से ३६ तत्त्वात्मक जगत् की सृष्टि होने लगती है, तभी इस विश्वमय पर- देवतात्मक श्रीचक्र की भी उत्पत्ति होता है ॥९॥ श्रीचक्र की यह निष्पत्ति इस क्रम से होती है— शून्यस्वरूप अकार और विसर्ग (हकार) के समष्टि बिन्दु में बैन्दव चक्र की प्रतीति होती है ॥१०॥ 'शून्याकार'१ शब्द में कर्मधारय समास है। इसका अर्थ होगा शून्यस्वरूप अकार। अकार को शून्य यहाँ इसलिये कहा गया है कि यह समस्त जागतिक प्रपंच से ऊपर है। १. 'तस्याः' नास्ति-ज.। २. विश्वसृष्टि-ख.। ३. बिन्दुप्रस्यन्द-ख. ग. घ. ने. ज. उ. । १. यहाँ दीपिका की सहायता से मूल ग्रन्थ का अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाता। भास्करराय ने 'शून्याकारात्' से लेकर 'बैन्दवं चक्रम्' पर्यन्त ग्रन्थ की एक साथ व्याख्या की है। यहाँ शून्याकारात्, विसर्गान्तात्, प्रस्पन्दसंविदः, प्रकाशपरमार्थत्वात् और स्फुरत्तालहरी- युतात्—ये पाँच पद विशेषण तथा 'बिन्दोः' पद विशेष्य है। सभी पद बहुव्रीहि समासान्त हैं। अतः शून्याकार शब्द में भी कर्मधारय समास की आवश्यकता नहीं है।
प्रथमः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् १७ वर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः” इति । अत्र श्रुतिः—‘‘अ इति ब्रह्म’’ (ऐ० आ० २।३।८) इति । विसर्गान्ताद् विसर्गोऽन्ते यस्य, १तस्माद् [विसर्गान्तात् । २बिन्दोः इसी लिये यह परमशिव का ही स्वरूप है। संकेतपद्धति में बताया गया है—“सभी वर्णों के आगे विद्यमान अकार प्रकाशात्मक परमशिव है”। ऐतरेयारण्यक में अकार को ब्रह्म कहा गया है। यह शून्याकार विसर्गान्त है, अर्थात् इस शून्यस्वरूप अकार के अन्त १. स विसर्गान्तस्तस्मात्–क. ग. । २. बिन्दुप्रस्यन्द–ख. ग. ने । हम सभी जानते हैं कि बिन्दु का आकार शून्य जैसा है। शून्य के आकार से ही बिन्दु की पहचान होती है। परा शक्ति के प्रतीक इस बिन्दु में अनुत्तर लिपि अकार और विसर्ग लिपि हकार (विसर्ग) अत्यन्त सूक्ष्म रूप में समरस अवस्था में स्थित हैं। यहाँ अनेक स्थलों पर उद्धृत संकेतपद्धति के एक वचन में बताया गया है कि अकार प्रकाशात्मक शिव और हकार विमर्शात्मक शक्ति का प्रतीक है। इन दोनों के मिलन से 'अहम्' की सृष्टि होती है। पाणिनि व्याकरण के अच् प्रत्याहार में जैसे अकार से लेकर चकार के मध्यवर्ती सभी वर्णों का ग्रहण होता है, उसी तरह से प्रत्याहारन्याय से 'अहम्' पद अकार से लेकर हकार पर्यन्त सभी वर्णों का द्योतक है। हकार को विसर्ग भी कहा जाता है और विसर्ग से ही समस्त विश्व की सृष्टि होती है। इसका अभिप्राय यह है कि बिन्दु की प्रकाश-विमर्शात्मक समरस अवस्था में यह सारा विश्व छिपा हुआ है। 'स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति' इस प्रत्यभिज्ञाहृदयसूत्र में तथा आगे (१।५०) दीपिका में उद्धृत वचन (जगच्चित्रं) में यह बताया गया है कि चितिशक्ति अथवा परमशिव स्वात्मभित्ति में स्वेच्छया विश्व का उन्मीलन करते हैं। सूर्य की तरफ दर्पण का मुंह करने पर सूर्य की किरणें स्वच्छ दर्पण पर पड़ कर जैसे दीवाल पर तेजोबिन्दु के रूप में भासित होने लगती हैं, उसी तरह से प्रकाशात्मक परमशिव की किरणें जब विमर्शरूपी स्वच्छ दर्पण पर पड़ती हैं, तो स्वात्मभित्ति में सबसे पहले महाबिन्दु भासित होता है। यही नवचक्रात्मक श्रीचक्र का बिन्दु नामक चक्र है। इसी को कामबिन्दु भी कहते हैं, क्योंकि कामेश्वर और कामेश्वरी यहाँ समरस अवस्था में स्थित हैं। इस कामबिन्दु में स्पन्दन या स्राव के उठने पर श्वेत और रक्त अग्नीषोमात्मक बिन्दुयुगल के रूप में विसर्ग की प्रतीति होती है। यह बिन्दुयुगल कामबिन्दु की कला है। इस तरह से बिन्दु और विसर्ग के मिलन से कामकला नामक बीजाक्षर की निष्पत्ति होती है। प्रकाशशक्ति की प्रधानता वाले विमर्शशक्ति की स्फुरत्ता (हार्धकला) से युक्त इस कामकला नामक बीजाक्षर से ही विश्वलहरीस्थान मातृत्रयात्मक बैन्दव (त्रिकोण) चक्र का प्रसार होता है। २
१८ योगिनीहृदयम् [ चक्रसंकेतः प्रस्पन्दसंविदः। बिन्दुरग्नीषोमात्मकः कामाख्यो रविः शिवशक्तिसामरस्यात्मा१ जातः। तदुक्तं चिद्गगनचन्द्रिकायाम्— २भोग्यभोक्तृमयभाविमर्शागा(गां) देवि मां ३चिदुदधेदृढां दशाम्। अर्पयन्ननलसोममिश्रणस्तद्विवक्ष४ इह भानुजृम्भणः ॥ (श्लो० २१२) इति। शिवशक्तिसामरस्यरूपकामाख्यस्य बिन्दोः संस्कारः प्रस्पन्दो५ दहनेन्दुरूप- सितशोणबिन्दुद्वयात्मकः। अकारहकारसामरस्यबिन्दोः ६प्रस्पन्दात् सितशोणबिन्दु- युगलात् संविच्चिन्मयी दहनेन्दुरूपा चित्कला जायत इत्यर्थः ॥१०॥ ७प्रकाशपरमार्थत्वात् स्फुरत्तालहरीयुतात् । प्रसृतं विश्वलहरीस्थानं मातृत्रयात्मकम् ॥११॥ बैन्दवं चक्रम् प्रकाशविमर्शवृत्तिसम्पर्काद् घृतस्येव धारा विमर्शशक्तेः स्रावो जायते, अत एव प्रकाशस्य परमार्थत्वम्। स्फुरत्तालहरीयुतात् स्फुरत्ताया विमर्शशक्तेर्लहरी में विसर्ग है। इस शून्य अकार और विसर्ग से शिवशक्तिसामरस्य स्वरूप अग्नीषोमात्मक काम (रवि) बिन्दु की उत्पत्ति होती है। चिद्गगनचन्द्रिका में भी ऐसा ही कहा गया है— हे देवि ! चिदात्मक सागर (परमशिव दशा) से भोक्ता (आत्मा) और भोग्य (विषय) के रूप में उठ रही प्रकाशविमर्शात्मक (द्वैतमयी चंचल) लहरियों की स्थिति में भी स्थिर दशा (शुद्ध स्वात्मस्वरूप) को निरन्तर भासित कराने वाला, अग्नीषोमात्मक जगत् की सृष्टि के लिये उद्यत भानुजृम्भण (कामबिन्दु) मुझे यहाँ कुछ कहना सा चाह रहा है ॥ शिवशक्तिसामरस्यमय काम नामक बिन्दु का संस्कार, अर्थात् स्पन्दन ही अग्नी- षोमात्मक श्वेत और रक्त बिन्दुओं का रूप धारण करता है। अकार और हकार (विसर्ग) स्वरूप समरस कामबिन्दु के स्पन्दन से उत्पन्न श्वेत और रक्त बिन्दुयुगल से संवित्स्वरूपा, अर्थात् चिन्मयी अग्नीषोमात्मिका चित्कला निकलती है ॥१०॥ स्फुरत्ता (विमर्श) की लहरी से युक्त प्रकाशरूपी परमार्थ से विश्व के प्रकाशक मातृत्रयात्मक बैन्दव चक्र का प्रसार होता है ॥११॥ अग्नि के संपर्क से जैसे घी पिघलने लगता है, उसी तरह से प्रकाश के संपर्क से विमर्श शक्ति में स्राव होने लगता है, अतः प्रकाशात्मक शिव को ही यहाँ परमार्थ कहा १. रस्यवाच्यात्मा-क. ख. ने. । २. 'भोक्तृभोग्यमयगोविसर्गो' इति सार्वत्रिको दीपिकापाठः । ३. चिदुदधो-क. ग. ने., चिदुदरे-चि. । ४. 'विमर्श' इति सार्वत्रिको दी. पाठः । ५. प्रस्पन्दो-ख. ग. ज. । ६. प्रस्य-ख. ग. ने. । ७. प्रसार-ख. च. झ. ।