छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
द्वादश खण्ड
— : o : —
न्यग्रोधफलके दृष्टान्तद्वारा उपदेश
| यद्येतत्प्रत्यक्षीकर्तुमिच्छसि— | यदि तू इस बातको प्रत्यक्ष करना चाहता है तो— |
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न्यग्रोधफलमत आहरेतीदं भगव इति भिन्द्धीति भिन्नं भगव इति किमत्र पश्यसीत्यण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्द्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किञ्चन भगव इति ॥ १ ॥
इस (सामनेवाले वटवृक्ष) से एक बड़का फल ले आ। [श्वेतकेतु—] 'भगवन् ! यह ले आया।' [ आरुणि— ] 'इसे फोड़' [ श्वेत०— ] 'भगवन् ! फोड़ दिया।' [ आरुणि— ] 'इसमें क्या देखता है ?' [श्वेत०—] 'भगवन् ! इसमें ये अणुके समान दाने हैं।' [आरुणि—] 'अच्छा वत्स ! इनमेंसे एकको फोड़।' [श्वेत०—] 'फोड़ दिया भगवन् !' [ आरुणि— ] 'इसमें क्या देखता है ?' [ श्वेत०— ] 'कुछ नहीं भगवन् !' ॥ १ ॥
| अतोऽस्मान्महतो न्यग्रोधात् फलमेकमाहरेत्युक्तस्तथा चकार स इदं भगव उपहृतं फलमिति दर्शितवन्तं प्रत्याह फलं भिन्द्धीति भिन्नमित्याहेतरः । तमाह पिता किमत्र पश्यसीत्युक्त आ- | इस महान् वटवृक्षसे एक फल ले आ। ऐसा कहे जानेपर उसने वैसा ही किया [ और बोला— ] 'भगवन् ! मैं यह फल ले आया' इस प्रकार फल दिखलानेवाले उससे [ आरुणिने ] कहा—'इस फलको फोड़ !' इसपर श्वेतकेतु बोला—'फोड़ दिया।' उससे पिताने कहा—'इसमें तू क्या देखता है ?' इस प्रकार कहे जानेपर श्वेतकेतु बोला— |
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खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७७
| हाण्व्याऽणुतरा इवेमा धाना बीजानि पश्यामि भगव इति । आसां धानानामेकां धानामङ्ग हे वत्स भिन्द्धीत्युक्त आह भिन्ना भगव इति । यदि भिन्ना धाना तस्यां भिन्नायां किं पश्यसीत्युक्त आह न किञ्चन पश्यामि भगव इति ॥ १ ॥ | ‘भगवन् ! मैं इसमें ये अणु-अणुतर अत्यन्त छोटे दाने—बीज देखता हूँ।’ [ आरुणि— ] ‘हे वत्स ! इन धानोंमेंसे तू एक धानेको फोड़।’ इस प्रकार कहे जानेपर वह बोला—‘भगवन् ! फोड़ दिया।’ [ आरुणि— ] ‘अच्छा, यदि तूने धाना फोड़ दिया तो उस फूटे हुए धानेमें तू क्या देखता है ?’ ऐसा कहे जानेपर वह बोला—‘भगवन् ! मैं कुछ नहीं देखता’ ॥१॥ |
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तं होवाच यं वै सोम्यैतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्न एवं महान्न्यग्रोधस्तिष्ठति श्रद्धत्स्व सोम्येति ॥ २ ॥
तब उससे ( आरुणिने ) कहा—‘हे सोम्य ! इस वटबीजकी जिस अणिमाको तू नहीं देखता हे सोम्य ! उस अणिमाका ही यह इतना बड़ा वटवृक्ष खड़ा हुआ है । हे सोम्य ! तू [इस कथनमें] श्रद्धा कर’ ॥२॥
| तं पुत्रं होवाच वटधानायां भिन्नायां यं वटबीजाणिमानं हे सोम्यैतं न निभालयसे न पश्यसि । तथाप्येतस्य वै किल सोम्यैष महान्न्यग्रोधो बीजस्या- | उस पुत्रसे ( आरुणिने ) कहा— ‘हे सोम्य ! वटके दानेके टूटनेपर जिस वटबीजकी अणिमाको तू नहीं देखता, तथापि हे सोम्य ! देख, निश्चय उसी बीजकी दिखायी न देनेवाली सूक्ष्म अणिमाका कार्यभूत |
६७८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
६७८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
| णिम्नः सूक्ष्मस्यादृश्यमानस्य कार्यभूतः स्थूलशाखास्कन्धफलपलाशवांस्तिष्ठत्युत्पन्नः सन्नुत्तिष्ठतीति वोच्छब्दोऽध्याहार्यः । अतः श्रद्धत्स्व सोम्य सत् एवाणिम्नः स्थूलं नामरूपादिमत्कार्यं जगदुत्पन्नमिति । <br><br> यद्यपि न्यायागमाभ्यां निर्धारितोऽर्थस्तथैवेत्यवगम्यते तथाप्यत्यन्तसूक्ष्मेष्वर्थेषु बाह्यविषयासक्तमनसः स्वभावप्रवृत्तस्यासत्यां गुरुतरायां श्रद्धायां दुरवगमत्वं स्यादित्याह—श्रद्धत्स्वेति । श्रद्धायां तु सत्यां मनसः समाधानं बुभुत्सतेऽर्थे भवेत्ततश्च तदर्थावगतिः “अन्यत्रमना अभूवम्” (बृ० उ० १।५।३) इत्यादिश्रुतेः॥२॥ | यह मोटी-मोटी शाखा, स्कन्ध, फल और पत्तोंवाला महान् वटवृक्ष स्थित है—उत्पन्न होकर खड़ा हुआ है इस प्रकार यहाँ 'तिष्ठति' क्रियाके पूर्व 'उत्' शब्दका अध्याहार करना चाहिये। इसलिये हे सोम्य! विश्वास कर कि नाम-रूपादिमान् स्थूल जगत् अत्यन्त सूक्ष्म सत्से ही उत्पन्न हुआ है।' <br><br> यद्यपि युक्ति और शास्त्र—इन दोनोंसे निश्चित हुआ अर्थ ऐसा ही है; तथापि गुरुतर श्रद्धाके न होने-पर बाह्य विषयोंमें आसक्तचित्त स्वभावसे ही प्रवृत्तिशील पुरुषका [ ऐसे ] अत्यन्त सूक्ष्म विषयोंमें प्रवेश होना बड़ा ही कठिन है—ऐसा समझकर आरुणिने कहा—'श्रद्धा कर।' क्योंकि श्रद्धाके होने-पर ही जिज्ञासित विषयमें मनका समाधान हो सकता है और तभी उस विषयका ज्ञान होना सम्भव है; जैसा कि 'मेरा मन दूसरी ओर था [ इसलिये मैं नहीं देख सका ]' इत्यादि श्रुतिसे प्रमाणित होता है॥२॥ |
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खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७९
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [ आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ३ ॥
| स य इत्याद्युक्तार्थम् । यदि तत्सज्जगतो मूलं कस्मान्नोपलभ्यत इत्येतद्दृष्टान्तेन मा भगवान्भूय एव विज्ञापयत्विति । तथा सोम्येति होवाच पिता ॥ ३ ॥ | 'स यः' इत्यादि श्रुतिका अर्थ पहले कहा जा चुका है। 'यदि वह सत् जगत्का कारण है तो उपलब्ध क्यों नहीं होता ? हे भगवन् ! इस बातको आप दृष्टान्तद्वारा मुझे फिर समझाइये' ऐसा [श्वेतकेतुने कहा] । तब पिताने 'सोम्य ! अच्छा' ऐसा उत्तर दिया ॥ ३ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥
त्रयोदश खण्ड
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लवणके दृष्टान्तद्वारा उपदेश
| विद्यमानमपि वस्तु नोपलभ्यते प्रकारान्तरेण तूपलभ्यत इति शृण्वत्र दृष्टान्तम् । यदि चेममर्थं प्रत्यक्षीकर्तुमिच्छसि— | विद्यमान होनेपर भी [ कोई-कोई ] वस्तु उपलब्ध नहीं होती । हाँ, प्रकारान्तरसे उसकी उपलब्धि हो सकती है । इस विषयमें दृष्टान्त श्रवण कर, यदि तू इस बातको प्रत्यक्ष करना चाहता हो तो— |
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लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति सह तथा चकार तँहोवाच यद्दोषा लवणमुदकेऽवाधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद ॥ १ ॥
इस नमकको जलमें डालकर कल प्रातःकाल मेरे पास आना । आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतुने वैसा ही किया । तब आरुणिने उससे कहा—'वत्स ! रात तुमने जो नमक जलमें डाला था उसे ले आओ।' किंतु उसने ढूँढ़नेपर उसे उसमें न पाया ॥ १ ॥
| पिण्डरूपं लवणमेतद्घटादावुदकेऽवधाय प्रक्षिप्याथ मा मां श्वः प्रातरुपसीदथा उपगच्छेथा इति । स ह पित्रोक्तमर्थं प्रत्यक्षीकर्तुमिच्छंस्तथा चकार । तं होवाच परेद्युः प्रातर्यल्लवणं दोषा रात्रावुदकेऽवाधा निक्षिप्तवानस्यङ्ग हे वत्स तदाहरेत्युक्तस्त- | इस पिण्डरूप नमकको घड़े आदिमें जलमें डालकर कल प्रातःकाल मेरे पास आना । श्वेतकेतुने पिताकी कही हुई बातको प्रत्यक्ष करनेकी इच्छासे वैसा ही किया । दूसरे दिन सबेरे ही आरुणिने उससे कहा—'हे वत्स ! रात तुमने जो नमक पानीमें डाला था उसे ले आओ।' इस प्रकार कहे जानेपर |
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| खण्ड १३ ] | शाङ्करभाष्यार्थं | ६८१ |
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| ल्लवणमाजिहीर्षुर्ह किलावमृश्यो-<br>दके न विवेद न विज्ञातवान्; यथा<br>तल्लवणं विद्यमानमेव सदप्सु<br>लीनं संश्लिष्टमभूत् ॥ १ ॥ | उसने उस नमकको ले आनेकी इच्छा-<br>से जलमें टटोला, किंतु उसे न पाया,<br>क्योंकि वह नमक वहाँ मौजूद होने-<br>पर भी जलमें लीन हो गया था<br>अर्थात् जलमें ही मिल गया था ॥ १ ॥ |
<div align="center">—:००:—</div>यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति मध्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यन्तादाचामेति कथमिति लवणमित्यभिप्रायैतदथ मोपसीदथा इति तद्ध तथा चकार तच्छश्वत्संवर्तते तꣳहोवाचात्र वाव किल सत्सोम्य न निभालयसेऽत्रैव किलेति ॥ २ ॥
[ आरुणि—] ‘जिस प्रकार वह नमक इसीमें विलीन हो गया है [ इसलिये तू उसे नेत्रसे नहीं देख सकता, उसे यदि जानना चाहता है तो ] इस जलको ऊपरसे आचमन कर।’ [ उसके आचमन करनेपर आरुणिने पूछा— ] ‘कैसा है ?’ [ श्वेत०— ] ‘नमकीन है।’ [ आरुणि— ] ‘बीचमेंसे आचमन कर’ ‘अब कैसा है ?’ [ श्वेत०— ] ‘नमकीन है।’ [ आरुणि— ] ‘नीचेसे आचमन कर’ ‘अब कैसा है ?’ [ श्वेत०— ] ‘नमकीन है।’ [ आरुणि— ] ‘अच्छा, अब इस जलको फेंककर मेरे पास आ।’ उसने वैसा ही किया, [ और बोला— ] ‘उस जलमें नमक सदा ही विद्यमान था।’ तब उससे पिताने कहा—‘हे सोम्य ! [ इसी प्रकार ] वह सत् भी निश्चय यहीं विद्यमान है, तू उसे देखता नहीं है; परंतु वह निश्चय यहीं विद्यमान है’ ॥ २ ॥
| यथा विलीनं लवणं न वेत्थ तथापि तच्चक्षुषा स्पर्शनेन च पिण्डरूपं लवणमगृह्यमाणं विद्यत | जिस प्रकार वह नमक विलीन हो गया है इसलिये तू उसे नहीं जान सकता । तथापि वह पिण्डरूप लवण दिखायी न देनेपर भी है जलमें ही, |
३८२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ३८२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| एवाप्सु, उपलभ्यते चोपायान्तरेण—इत्येतत्पुत्रं प्रत्याययितुमिच्छन्नाहाङ्गास्योदकस्यान्तादुपरि गृहीत्वाचामेत्युक्त्वा पुत्रं तथा कृतवन्तमुवाच—कथमिति; इतर आह लवणं स्वादत इति । तथा मध्यादुदकस्य गृहीत्वाचामेति, कथमिति, लवणमिति । तथान्तादधोदेशाद्गृहीत्वाचामेति, कथमिति, लवणमिति । <br><br> यद्येवम्, अभिप्रास्य परित्यज्यैतदुदकमाचम्याथ मोपसीदथा इति । तद्ध तथा चकार । लवणं परित्यज्य पितृसमीपमाजगामेत्यर्थः, इदं वचनं ब्रुवन्—तल्लवणं तस्मिन्नेवोदकेयन्मया रात्रौ क्षिप्तं शश्वन्नित्यं संवर्तते विद्यमानमेव सत्सम्यग्वर्तते । <br><br> इत्येवमुक्तवन्तं तं होवाच | और एक दूसरे उपायसे उसकी उपलब्धि भी हो सकती है—इस बातकी पुत्रको प्रतीति करानेकी इच्छासे आरुणिने कहा—'हे वत्स ! इस जलके अन्त—ऊपरी भागसे लेकर आचमन कर।' ऐसा कहकर पुत्रके उसी प्रकार करनेपर वह बोला—'कैसा है ?' [ पुत्र— ] 'स्वादमें नमकीन है।' [ पिता-- 'और जलके मध्यभागसे भी लेकर आचमन कर' 'कैसा है ?' [पुत्र-] 'नमकीन है।' [पिता--] 'अच्छा, अन्त—नीचेके भागसे भी लेकर आचमन कर कैसा है ?' [ पुत्र-- ] 'नमकीन है।' <br><br> [ पिता--] 'यदि ऐसा है तो इस जलको फेंककर आचमन करनेके अनन्तर मेरे पास आ।' उसने वैसा ही किया, अर्थात् उस नमकीन जलको फेंककर वह इस प्रकार कहता हुआ पिताके पास आया कि रात मैंने जो नमक उस जलमें डाला था वह उसमें शश्वत्—नित्य वर्तमान है अर्थात् उसमें विद्यमान हुआ ही सम्यक्प्रकारसे वर्तमान है। <br><br> इस प्रकार कहते हुए उस पुत्रसे |
खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६८३
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| पिता--यथेदं लवणं दर्शनस्पर्शनाभ्यां पूर्वं गृहीतं पुनरुदके विलीनं ताभ्यामगृह्यमाणमपि विद्यत एवोपायान्तरेण जिह्वयोपलभ्यमानत्वात् । एवमेवात्रैवास्मिन्नेव तेजोऽबन्नादिकार्ये शुङ्गे देहे, वाव किलेत्याचार्योपदेशस्मरणप्रदर्शनार्थौ, सत्तेजोऽबन्नादिशुङ्गकारणं वटबीजाणिमवद्विद्यमानमेवेन्द्रियैर्नोपलभसे न निभालयसे यथात्रैवोदके दर्शनस्पर्शनाभ्यामनुपलभ्यमानं लवणं विद्यमानमेव जिह्वयोपलब्धवानसि, एवमेवात्रैव किल विद्यमानं सज्जगन्मूलमुपायान्तरेण लवणाणिमवदुपलप्स्यस इति वाक्यशेषः ॥ २ ॥ | पिताने कहा--'जिस प्रकार यह नमक पहले दर्शन और स्पर्शनसे गृहीत होता हुआ भी फिर जलमें विलीन होनेपर उनसे गृहीत न होनेपर भी उसमें विद्यमान है ही, क्योंकि उपायान्तरसे अर्थात् जिह्वाद्वारा उसकी उपलब्धि होती है; इसी प्रकार यहाँ—तेज, अप् और अन्नके कार्यभूत इस शरीररूप शुङ्गमें—यहाँ 'वाव' और 'किल' ये दो निपात आचार्योपदेशका स्मरण प्रदर्शित करनेके लिये हैं— तेज, जल और अन्नादि शुङ्गके कारणभूत सत्को तू वटबीजकी अणिमाके समान विद्यमान रहते हुए भी इन्द्रियोंसे उपलब्ध नहीं करता—तुझे वह दिखायी नहीं देता। जिस प्रकार कि यहाँ जलमें दर्शन और स्पर्शनसे उपलब्ध न होनेवाले विद्यमान नमकको तूने जिह्वासे उपलब्ध किया है उसी प्रकार निश्चय यहीं विद्यमान जगत्के मूलभूत सत्को तू लवणकी अणिमाके समान अन्य उपायसे उपलब्ध कर सकता है—यह वाक्यशेष है ॥ २ ॥ |
३८४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
३८४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदँ सर्वं तत्सत्यँस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [ आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ३ ॥
| स य इत्यादि समानम्। यद्येवं लवणाणिमवदिन्द्रियैरनुपलभ्यमानमपि जगन्मूलं सदुपायान्तरेणोपलब्धुं शक्यते यदुपलम्भात्कृतार्थः स्यामनुपलम्भाच्चाकृतार्थः स्यामहम्, तस्यैवोपलब्धौ क उपाय इत्येतद्भूय एव मा भगवान्विज्ञापयतु दृष्टान्तेन तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ | 'स यः' इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्ववत् है। 'यदि इस प्रकार लवणकी अणिमाके समान इन्द्रियोंसे उपलब्ध होनेवाला न होनेपर भी वह जगत्का मूलभूत सत् किसी दूसरे उपायसे उपलब्ध हो सकता है, जिसकी उपलब्धिसे कि मैं कृतार्थ हो सकता हूँ और जिसे उपलब्ध न करनेसे अकृतार्थ ही रहूँगा, तो उसकी उपलब्धिके लिये क्या उपाय है—इस बातको हे भगवन् ! आप दृष्टान्तद्वारा मुझे फिर भी समझाइये।' [ तब आरुणिने ] 'सोम्य ! अच्छा' ऐसा कहा ॥३॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये त्रयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १३ ॥
चतुर्दश खण्ड
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अन्यत्रसे लाये हुए पुरुषके दृष्टान्तद्वारा उपदेश
यथा सोम्य पुरुषं गन्धारेभ्योऽभिनद्धाक्षानीय तं ततोऽतिजने विसृजेत्स यथा तत्र प्राङ् वोदङ् वाधराङ् वा प्रत्यङ् वा प्रध्मायीताभिनद्धाक्ष आनीतोऽभिनद्धाक्षो विसृष्टः ॥ १ ॥
हे सोम्य ! जिस प्रकार [ कोई चोर ] जिसकी आँखें बँधी हुई हों ऐसे किसी पुरुषको गान्धार देशसे लाकर जनशून्य स्थानमें छोड़ दे । उस जगह जिस प्रकार वह पूर्व, उत्तर, दक्षिण अथवा पश्चिमकी ओर मुख करके चिल्लावे कि 'मुझे आँखें बाँधकर यहाँ लाया गया है और आँखें बँधे हुए ही छोड़ दिया गया है' ॥ १ ॥
| यथा लोके हे सोम्य पुरुषं यं कश्चिद्गन्धारेभ्यो जनपदेभ्योऽभिनद्धाक्षं बद्धचक्षुषमानीय द्रव्यहर्ता तस्करस्तमभिनद्धाक्षमेव बद्धहस्तमरण्ये ततोऽप्यतिजनेऽतिगतजनेऽत्यन्तविगतजने देशे विसृजेत्स तत्र दिग्भ्रमोपेतो यथा प्राङ्वा प्राग्गमनः प्राङ्मुखो वेत्यर्थः । तथोदङ्वाधराङ्वा प्रत्यङ्वा प्रध्मायीत शब्दं कुर्या- | हे सोम्य ! लोकमें जिस प्रकार कोई द्रव्य हरण करनेवाला चोर किसी पुरुषको जो अभिनद्धाक्ष हो अर्थात् जिसकी आँखें बाँध दी गयी हों, गान्धार देशसे लाकर वनमें और उसमें भी जो अतिजन—अतिगतजन अर्थात् अत्यन्त जन-शून्य हो ऐसे देशमें आँखें और हाथ बँधे हुए ही छोड़ दे तो उस जगह वह दिग्भ्रमसे युक्त हुआ 'प्राङ् वा'—पूर्वकी ओर जाता हुआ अर्थात् पूर्वाभिमुख हुआ तथा उत्तर, दक्षिण अथवा पश्चिमकी ओर मुख |
६८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| द्विक्रोशेत्, अभिनद्धाक्षोऽहं गन्धारेभ्यस्तस्करेणानीतोऽभिनद्धाक्ष एव विसृष्ट इति ॥ १ ॥ | करके इस प्रकार शब्द कहे अर्थात् चिल्लावे कि मुझे गान्धार देशसे आँखें बाँधकर यहाँ चोर ले आया है और आँखें बँधे हुए ही छोड़ दिया है' ॥ १ ॥ |
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| एवं विक्रोशतः— | इस प्रकार चिल्लानेवाले— |
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तस्य यथाभिनहनं प्रमुच्य प्रब्रूयादेतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति स ग्रामाद्ग्रामं पृच्छन्पण्डितो मेधावी गन्धारानेवोपसम्पद्येतैवमेवेहाचार्यवान्पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ सम्पत्स्य इति ॥ २ ॥
उस पुरुषके बन्धनको खोलकर जैसे कोई कहे कि 'गान्धार देश इस दिशामें है, अतः इसी दिशाको जा,' तो वह बुद्धिमान् और समझदार पुरुष एक ग्रामसे दूसरा ग्राम पूछता हुआ गान्धारमें ही पहुँच जाता है, इसी प्रकार इस लोकमें आचार्यवान् पुरुष ही [सत्को] जानता है; उसके लिये [ मोक्ष होनेमें ] उतना ही विलम्ब है जबतक कि वह [ देहबन्धनसे ] मुक्त नहीं होता । उसके पश्चात् तो वह सत्सम्पन्न (ब्रह्मको प्राप्त ) हो जाता है ॥ २ ॥
| तस्य यथाभिनहनं यथा बन्धनं प्रमुच्य मुक्त्वा कारुणिकः कश्चिदेतां दिशमुत्तरतो गन्धारा | उस पुरुषके अभिनहन—बन्धनको खोलकर जिस प्रकार कोई कृपालु पुरुष कहे कि इस दिशामें उत्तरकी ओर गान्धार | | एतां दिशं व्रजेति प्रब्रूयात्स एवं कारुणिकेन बन्धनान्मोक्षितो | देश है; अतः इस दिशाकी ओर जा तो इस प्रकार उस कृपालु | | ग्रामाद्ग्रामान्तरं पृच्छन्पण्डित | पुरुषद्वारा बन्धनसे छुड़ाया हुआ |
| खण्ड १४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६८७ |
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| उपदेशवान्मेधावी परोपदिष्टग्रामप्रवेश मार्गाविधारणसमर्थः सन्गन्धारानेवोपसम्पद्येत, नेतरो मूढमतिर्देशान्तरदर्शनतृड्वा । | वह पण्डित—उपदेशवान् और मेधावी—दूसरोंके बतलाये हुए ग्राममें प्रवेश करनेके मार्गको ठीक-ठीक समझनेमें समर्थ पुरुष एक गाँवसे दूसरे गाँवको पूछता हुआ गान्धार देशमें ही पहुँच जाता है—दूसरा मूढमति अथवा देशान्तर देखनेको तृष्णावाला नहीं पहुँच पाता । | | यथायं दृष्टान्तो वर्णितः, स्वविषयेभ्यो गन्धारेभ्यः पुरुषस्तस्करैरभिनद्धाक्षोऽविवेको दिङ्मूढोऽशनायापिपासादिमान्व्याघ्रतस्कराद्यनेकभयानर्थव्रातयुतमरण्यं प्रवेशितो दुःखार्तो विक्रोशन्बन्धनेभ्यो मुमुक्षुस्तिष्ठति स कथञ्चिदेव कारुणिकेन केनचिन्मोक्षितः स्वदेशान्गन्धारानेवापन्नो निर्वृतः सुखीभूत्— | जिस प्रकार यह दृष्टान्त वर्णन किया गया है अर्थात् अपने देश गान्धारसे चोरोंद्वारा आँखें बाँधकर लाया जानेके कारण विवेकशून्य दिङ्मूढ तथा भूख-प्याससे युक्त होकर व्याघ्र-तस्कर आदि अनेकों भय और अनर्थसमूहसे सम्पन्न वनमें प्रवेशित किया हुआ पुरुष दुःखार्त होकर चिल्लाता हुआ बन्धनोंसे मुक्त होनेके लिये उत्सुक था और वह किसी कृपालुद्वारा उन बन्धनोंसे छुड़ा दिये जानेपर किसी प्रकार अपने देश गान्धारमें पहुँचकर ही कृतार्थ यानी सुखी हुआ । | | एवमेव सतो जगदात्मस्वरूपात्तेजोऽबन्नादिमयं देहारण्यं वातपित्तकफरुधिरमेदोमांसास्थि- | ठीक इसी प्रकार संसारके आत्मस्वरूप सत्से तेज, जल और अन्नादिमय देहरूप वनमें जो कि वात, पित्त, कफ, रुधिर, मेद, मांस, अस्थि, मज्जा, शुक्र, कृमि |
६८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| मज्जाशुक्रकृमिमूत्रपुरीषवच्छीतो- | और मल-मूत्रसे पूर्ण तथा शीतोष्णादि | | ष्णाद्यनेकद्वन्द्वसुखदुःखवच्चेदंमो- | अनेकों द्वन्द्व और सुख-दुःखसे युक्त | | हपटाभिनद्धाक्षो भार्यापुत्रमित्र- | है, यह जीव मोहरूप वस्त्रसे बँधे हुए | | पशुबन्ध्वादिदृष्टानेकविषयतृष्णा- | नेत्रवाला होकर तथा स्त्री, पुत्र, मित्र, | | पाशितः पुण्यापुण्यादितस्करैः | पशु और बन्धु आदि दृष्ट तथा अदृष्ट | | प्रवेशितः 'अहममुष्य पुत्रो ममैते | अनेकों विषयतृष्णाओंसे जकड़ा जाकर | | बान्धवाः सुख्यहं दुःखी मूढः | पुण्य-पापरूप चोरोंद्वारा प्रवेशित | | पण्डितो धार्मिको बन्धुमाञ्जातो | कर दिये जानेपर 'मैं इसका पुत्र हूँ, | | मृतो जीर्णः पापी पुत्रो मे मृतो | ये मेरे बान्धव हैं, मैं सुखी, दुखी, | | धनं मे नष्टं हा हतोऽस्मि कथं | मूढ़, पण्डित, धार्मिक अथवा बन्धु- | | जीविष्यामि का मे गतिः किं मे | मान् हूँ, मैं उत्पन्न हुआ हूँ, मरता | | त्राणम् ?' इत्येवमनेकशतसहस्रा- | हूँ, जरामस्त हूँ, पापी हूँ, मेरा पुत्र | | नर्थजालवान्विक्रोशन्कथञ्चिद्देव | मर गया है, धन नष्ट हो गया है, | | पुण्यातिशयात्परमकारुणिकं क- | हा ! मैं मारा गया, अब कैसे जीवित | | ञ्चित्सद्ब्रह्मात्मविदं विमुक्तबन्धनं | रहूँगा ? मेरी क्या गति होगी ? | | ब्रह्मनिष्ठं यदासादयति । तेन च | अब मेरा रक्षक कौन है ?' इसी | | ब्रह्मविदा कारुण्याद्दर्शितसंसार- | प्रकारके अनेकों सैकड़ों अनर्थजालोंसे | | विषयदोषदर्शनमार्गो विरक्तः | युक्त होकर रोता हुआ जब पुण्यकी | | संसारविषयेभ्यः 'नासि त्वं | अधिकता होनेसे किसी प्रकार किसी | | संसार्यमुष्य पुत्रत्वादिधर्म- | परम कृपालु सद्ब्रह्मात्मज्ञ बन्ध- | | वान्' किं तर्हि ? 'सद् | नमुक्त ब्रह्मनिष्ठ महापुरुषको प्राप्त | | यत्तत्त्वमसि' इत्यविद्यामोहप- | होता है और उस ब्रह्मवेत्ताद्वारा | | टामिनद्धनान्मोक्षितो गन्धारपुरुष- | दयावश सांसारिक विषयोंके दोष- | | | दर्शनका मार्ग दिखाये जानेपर | | | सांसारिक विषयोंसे विरक्त हो जाता | | | है तथा 'तू संसारी नहीं है और न | | | इसके पुत्रत्वादि धर्मवाला ही है;' | | | तो कौन है ?—'जो सत् तत्त्व है | | | वही तू है' इस प्रकारके उपदेशसे | | | अविद्यामय मोहरूप वस्त्रके बन्धनसे | | | छुड़ाया जाकर गान्धारदेशीय पुरुष |
खण्ड १४] शाङ्करभाष्यार्थ ६८९
| संस्कृत-भाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| वच्च स्वं सदात्मानमुपसंपद्य सुखी निर्वृतः स्यादित्येतमेवार्थमाहाचार्यवान् पुरुषो वेदेति । | के समान अपने सदात्माको प्राप्त होकर सुखी और शान्त हो जाता है—इसी बातको [ आरुणिने ] ‘आचार्यवान्पुरुषो वेद’ इस वाक्यसे कहा है । |
| तस्यास्यैवमाचार्यवतो मुक्ताविद्याभिनहनस्य तावदेव तावानेव कालश्चिरं क्षेपः सदात्मस्वरूपसम्पत्तेरिति वाक्यशेषः । कियान्कालश्चिरम् ? इत्युच्यते— | इस प्रकार आचार्यवान् तथा अविद्यारूप बन्धनसे मुक्त हुए उस पुरुषके लिये सदात्मस्वरूपकी प्राप्तिमें—इतना वाक्यशेष जोड़ना चाहिये—उतने ही समयतक देर अर्थात् कालक्षेप करना है—कितने समयतक देर है ? सो बतलाया जाता है— |
| यावन्न विमोक्ष्ये न विमोक्ष्यत इत्येतत् पुरुषव्यत्ययेन, सामर्थ्यात्; येन कर्मणा शरीरमारब्धं तस्योपभोगेन क्षयाद्देहपातो यावदित्यर्थः । अथ तदैव सत्सम्पत्स्ये सम्पत्स्यत इति पूर्ववत् । न हि देहमोक्षस्य सत्सम्पत्तेश्च कालभेदोऽस्ति, येनाथशब्द आनन्तर्यार्थः स्यात् । | जबतक कि वह [ देहबन्धनसे ] मुक्त न हो जाय । यहाँ प्रसंगके सामर्थ्यसे ‘विमोक्ष्ये’ को ‘विमोक्ष्यते’ इस प्रकार प्रथम पुरुषमें बदलकर अर्थ करना चाहिये । तात्पर्य यह है कि जिस कर्मसे उसके देहका आरम्भ हुआ था उसका उपभोगद्वारा क्षय होकर जबतक देहपात होगा [ तभीतक देर है ] । देहपात होनेपर तो वह उसी समय सत्को प्राप्त हो जायगा । ‘सम्पत्स्ये’ के स्थानमें ‘सम्पत्स्यते’ ऐसा पूर्ववत् पुरुषपरिवर्तन कर लेना चाहिये । देहपात और सत्की प्राप्तिमें कालका अन्तर नहीं है, जिससे कि ‘अथ’ शब्द आनन्तर्य अर्थवाची हो* । |
* अथ शब्दका मुख्य अर्थ 'अनन्तर' है, इसलिये 'अथ सम्पत्स्ये' का यह अर्थ हो सकता है कि देहपात होनेके अनन्तर ( बाद ) वह 'सत्' को प्राप्त होगा । परंतु भाष्यकार यह कहते हैं कि यहाँ 'अथ' शब्दका अर्थ 'उसी समय'
६९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६
| ६९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| [ज्ञानानर्थक्योद्भावनम्]<br>ननु यथा सद्विज्ञानानन्तरमेव देहपातः सत्सम्पत्तिश्च न भवति कर्मशेषवशात्, यथाप्रवृत्तफलानि प्राग्ज्ञानोत्पत्तेर्जन्मान्तरसञ्चितान्यपि कर्माणि सन्तीति तत्फलोपभोगार्थं पतितेऽस्मिञ्छरीरान्तरमारब्धव्यम् । उत्पन्ने च ज्ञाने यावज्जीवं विहितानि प्रतिषिद्धानि वा कर्माणि करोत्येवेति तत्फलोपभोगार्थं चावश्यं शरीरान्तरमारब्धव्यम्; ततश्च कर्माणि ततः शरीरान्तरमिति ज्ञानानर्थक्यं कर्मणां फलवत्त्वात् ।<br><br>[ज्ञानात्कर्मक्षयाङ्गीकारेऽनुपपत्तिप्रदर्शनम्]<br>अथ ज्ञानवतः क्षीयन्ते कर्माणीति तदा ज्ञानप्राप्तिसमकालमेव ज्ञानस्य सत्सम्पत्तिहेतुत्वान्मोक्षः स्यादिति शरीरपातः स्यात् । तथा चाचार्याभाव इत्याचार्यवान्पुरुषो | पूर्व०—किंतु जिस प्रकार प्रारब्धकर्म अवशिष्ट रहनेके कारण सत्का ज्ञान होनेके बाद ही देहपात और सत्की प्राप्ति नहीं होती उसी प्रकार ज्ञानोत्पत्तिसे पूर्व तथा जन्मान्तरोंमें किये हुए और भी ऐसे संचित कर्म हैं ही जो अभी फल देनेमें प्रवृत्त नहीं हुए । अतः उनका फल भोगनेके लिये इस शरीरका पतन होनेपर दूसरे शरीरका प्राप्त होना आवश्यक है । ज्ञान उत्पन्न हो जानेपर भी पुरुष जीवनपर्यन्त विहित अथवा प्रतिषिद्ध कर्म करता ही है, अतः उनका फल भोगनेके लिये भी देहान्तरकी प्राप्ति अवश्य होनी चाहिये, उस समय फिर कर्म होंगे और उनसे फिर देहान्तरकी प्राप्ति होगी । इस प्रकार कर्मोंके फलयुक्त होनेके कारण ज्ञानकी व्यर्थता सिद्ध होती है ।<br><br>और यदि यह मानो कि ज्ञानीके कर्म क्षीण हो जाते हैं तो ज्ञान सत्सम्पत्तिका हेतु होनेके कारण ज्ञानप्राप्तिके समय ही मोक्ष हो जायगा, अतः उसी समय देहपात हो जाना चाहिये । ऐसा होनेपर आचार्यका अभाव हो जायगा; अतः 'आचार्यवान् पुरुषको ज्ञान होता है' यह वाक्य अनुपपन्न होगा तथा |
है अर्थात् देहपात होनेके ही समय वह सत्को प्राप्त हो जायगा । यदि देहपात और सत्की प्राप्तिमें कुछ कालका अन्तर होता तो 'अथ' का अनन्तर अर्थ किया जाता, पर ऐसा है नहीं अतः यहाँ 'अनन्तर' अर्थ ठीक नहीं है ।
खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९१
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| वेदेत्यनुपपत्तिर्ज्ञानान्मोक्षाभावप्रसङ्गश्च। देशान्तरप्राप्त्युपायज्ञानवदनैकान्तिकफलत्वं वा ज्ञानस्य। | ज्ञानसे मोक्षप्राप्तिके अभावका प्रसङ्ग उपस्थित होगा। अथवा देशान्तरकी प्राप्तिके साधनोंके ज्ञानके समान ज्ञानका व्यभिचारिफलयुक्त होना सिद्ध होगा। ⁕ |
| (पूर्वोक्तदोष-परिहारः)<br>न; कर्मणां प्रवृत्ताप्रवृत्तफलत्वविशेषोपपत्तेः। यदुक्तमप्रवृत्तफलानां कर्मणां ध्रुवफलत्वाद्ब्रह्मविदः शरीरे पतिते शरीरान्तरमारब्धव्यमप्रवृत्तकर्मफलोपभोगार्थमिति, एतदसत्; विदुषः "तस्य तावदेव चिरम्" इति श्रुतेः प्रामाण्यात्। | सिद्धान्ती— ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि कर्मोंमें प्रवृत्तफलत्व और अप्रवृत्तफलत्व यह विशेषता होनी सम्भव है। अतः तुमने जो कहा कि अप्रवृत्तफल कर्म भी निश्चय फल देनेवाले हैं, इसलिये देहपात होनेके पश्चात् उन अप्रवृत्तफल कर्मोंका फल भोगनेके लिये देहान्तरका प्राप्त होना अवश्यम्भावी है—सो ठीक नहीं; क्योंकि "उस विद्वानके मोक्षमें तो उतना (देहपात होनेतकका) ही विलम्ब है"—यह श्रुति प्रमाण है। |
| ननु "पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति" (बृ० उ० ३।२।१३) इत्यादिश्रुतेरपि प्रामाण्यमेव। | पूर्व०— किंतु "पुण्यकर्मसे पुरुष पुण्यवान् होता है" यह श्रुति भी तो प्रामाणिक ही है। |
| सत्यमेवम्, तथापि प्रवृत्तफलानामप्रवृत्तफलानां च कर्मणां | सिद्धान्ती— सचमुच ऐसा ही है। तो भी प्रवृत्तफल और अप्रवृत्त- |
⁕ अर्थात् जिस प्रकार देशान्तरकी प्राप्तिके साधन घोड़े आदि कोई विशेष विघ्न न होनेपर ही अपने गन्तव्य स्थानपर पहुँचते हैं उसी प्रकार जिनके कर्म क्षीण हो गये हैं उन्हीं ज्ञानियोंका मोक्ष हो सकेगा—सबका नहीं।
| ६९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
| ६९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| विशेषोऽस्ति । कथम् ? यानि प्रवृत्तफलानि कर्माणि यैर्विद्वच्छरीरमारब्धम्, तेषामुपभोगेनैव क्षयः । यथारब्धवेगस्य लक्ष्यमुक्तेष्वादेर्वेगक्षयादेव स्थितिर्न तु लक्ष्यवेधसमकालमेव प्रयोजनं नास्तीति तद्वत् । अन्यानि त्वप्रवृत्तफलानीह प्राग्ज्ञानोत्पत्तेरूर्ध्वं च कृतानि वा क्रियमाणानि वातीतजन्मान्तरकृतानि वाप्रवृत्तफलानि ज्ञानेन दह्यन्ते प्रायश्चित्तेनेव । "ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा" (गीता ४।३७) इति स्मृतेश्च । "क्षीयन्ते चास्य कर्माणि" इति चाथर्वणे ।<br><br>अतो ब्रह्मविदो जीवनादिप्रयोजनाभावेऽपि प्रवृत्तफलानां | फलकर्मोंमें कुछ विशेषता है । किस प्रकार ?—जो प्रवृत्तफलकर्म हैं; जिनसे कि विद्वान्के शरीरका आरम्भ हुआ है उनका क्षय फलोपभोगके द्वारा ही हो सकता है; जिस प्रकार जिसका वेग आरम्भ हो गया है उस लक्ष्यकी ओर छोड़े हुए बाणकी स्थिति उसके वेगका क्षय होनेपर ही हो सकती है, लक्ष्यवेध करते ही उसे [ आगे जानेका ] कोई प्रयोजन नहीं रहता—ऐसी बात नहीं है; उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये । ज्ञानीके जो अन्य अप्रवृत्तफलकर्म ज्ञानोत्पत्तिसे पूर्व किये हुए अथवा उसके पश्चात् किये जानेवाले होते हैं अथवा जो पूर्व जन्मोंमें किये हुए अप्रवृत्तफलकर्म होते हैं वे प्रायश्चित्तसे पापोंके समान ज्ञानसे दग्ध हो जाते हैं । "तथा ज्ञानाग्नि सम्पूर्ण कर्मोंको भस्मीभूत कर देता है" इस स्मृतिसे यही प्रमाणित होता है, और "इसके कर्म क्षीण हो जाते हैं" ऐसा अथर्वण-श्रुतिमें भी कहा है ।<br><br>अतः ब्रह्मवेत्ताको जीवनादिका प्रयोजन न होनेपर भी प्रवृत्तफल- |
खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६९३
| कर्मणामवश्यमेव फलोपभोगः स्यादिति मुक्तेषुवत् 'तस्य तावदेव चिरम्' इति युक्तमेवोक्तमिति यथोक्तदोषचोदनानुपपत्तिः । ज्ञानोत्पत्तेरूर्ध्वं च ब्रह्मविदः कर्माभावमवोचाम 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इत्यत्र तच्च स्मर्तुमर्हसि ॥ २ ॥ | कर्मोंका फलोपभोग अवश्य होना है इसलिये छोड़े हुए बाणके समान 'उसे [ सत्की प्राप्तिमें ] तभीतक विलम्ब है जबतक कि वह देहबन्धनसे नहीं छूटता' ऐसा ठीक ही कहा है, अतः उपर्युक्त दोषकी शङ्का करना ठीक नहीं। 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इस वाक्यकी व्याख्याके समय ज्ञानोत्पत्तिके पश्चात् तो हमने ब्रह्मवेत्ताके कर्मका अभाव प्रतिपादन किया है, उसे इस समय स्मरण करना चाहिये ॥ २ ॥ |
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥
वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [ आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ३ ॥
| स य इत्याद्युक्तार्थम् । आचार्यवान्विद्वान्येन क्रमेण सत्सम्पद्यते तं क्रमं दृष्टान्तेन भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति । तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ | 'स यः' इत्यादि मन्त्रका अर्थ पहले कहा जा चुका है। 'हे भगवन् ! आचार्यवान् विद्वान् जिस क्रमसे सत्को प्राप्त होता है वह क्रम मुझे दृष्टान्तद्वारा फिर समझाइये' ऐसा श्वेतकेतुने कहा। तब आरुणिने कहा 'सोम्य ! अच्छा' ॥ ३ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये चतुर्दशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१४॥
पञ्चदश खण्ड
मुमूर्षु पुरुषके दृष्टान्तद्वारा उपदेश
पुरुषᳪसोम्योतोपतापिनं ज्ञातयः पर्युपासते जानासि मां जानासि मामिति। तस्य यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायां तावज्जानाति ॥ १ ॥
हे सोम्य ! [ ज्वरादिसे ] संतप्त [ मुमूर्षु ] पुरुषको चारों ओरसे घेरकर उसके बान्धवगण पूछा करते हैं—'क्या तू मुझे जानता है ? क्या तू मुझे पहचानता है ?' जबतक उसकी वाणी मनमें लीन नहीं होती तथा मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन नहीं होता तबतक वह पहचान लेता है ॥ १ ॥
| पुरुषं हे सोम्योतोपतापिनं ज्वराद्युपतापवन्तं ज्ञातयो बान्धवाः परिवार्योपासते मुमूर्षुम्— जानासि मां तव पितरं पुत्रं भ्रातरं वा—इति पृच्छन्तः। तस्य मुमूर्षोर्यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामित्येतदुक्तार्थम् ॥ १ ॥ | हे सोम्य ! उपतापी—ज्वरादिसे अत्यन्त संतप्त हुए पुरुषको ज्ञातिजन-बान्धवगण घेरकर उस मुमूर्षु पुरुषसे 'क्या तू मुझ अपने पिता, पुत्र अथवा भाईको पहचानता है ?' इस प्रकार पूछते हुए उसके चारों ओर बैठ जाते हैं । उस मुमूर्षु की जबतक वाणी मनमें लीन नहीं होती तथा मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन नहीं होता इत्यादि वाक्यका अर्थ पहले कहा जा चुका है ॥ १ ॥ |
खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९५
| संसारिणो यो मरणक्रमः स एवायं विदुषोऽपि सत्सम्पत्तिक्रम इत्येतदाह-- | संसारी जीवका जो मरणक्रम है वही विद्वान्की सत्सम्पत्तिका क्रम है--इसी बातको आरुणि बतलाता है-- |
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अथ यदास्य वाङ् मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामथ न जानाति ॥ २ ॥
फिर जिस समय उसकी वाणी मनमें लीन हो जाती है तथा मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन हो जाता है तब वह नहीं पहचानता ॥ २ ॥
| परस्यां देवतायां तेजसि सम्पन्नेऽथ न जानाति ।<br><br>सत्सम्पत्तिक्रमः<br>अविद्वांस्तु सत उत्थाय प्राग्भावितं व्याघ्रादिभावं देवमनुष्यादिभावं वा विशति । विद्वांस्तु शास्त्राचार्योपदेशजनितज्ञानदीपप्रकाशितं सद्ब्रह्मात्मानं प्रविश्य नावर्तत इत्येष सत्सम्पत्तिक्रमः ।<br><br>अन्ये तु मूर्धन्यया नाड्योत्क्रम्यादित्यादि-<br>मतान्तरनिरासः<br>द्वारेण सद्गच्छन्तीत्याहुः, तदसत्; देशकाल- | परदेवतामें तेजके लीन हो जानेपर फिर यह नहीं पहचानता। किंतु जो अविद्वान् होता है वह तो सत्से उत्थित होकर पहले भावना किये हुए व्याघ्रादि भाव और देव-मनुष्यादि भावमें प्रवेश करता है; किंतु विद्वान् शास्त्र और आचार्यके उपदेशजनित ज्ञानदीपकसे प्रकाशित सद्ब्रह्मरूप आत्मामें प्रवेशकर फिर नहीं लौटता—यही सत्प्राप्तिका क्रम है।<br><br>कुछ अन्य मतावलम्बियोंने जो कहा है कि मूर्धन्य नाडीसे उत्क्रमण कर आदित्यादिद्वारा सत्को प्राप्त होता है, वह ठीक नहीं है, क्योंकि इस प्रकारका गमन तो देश, काल, निमित्त और फलके अभिनिवेश- |
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