श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
चौंसठवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ०६४ ] * देवान्तकसे युद्धमें सिद्धिसेनाकी पराजय * ४२५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 चौंसठवाँ अध्याय देवान्तकसे युद्धमें सिद्धिसेनाकी पराजय ब्रह्माजी कहते हैं— [हे मुने!] कालान्तक दैत्य | मुष्टिकाका कठोर प्रहार किया, जिससे वे भी भूमिपर और प्राकाम्यका परस्पर युद्ध हो रहा था और जब | गिर गये और सैकड़ों खण्डोंमें विभक्त होकर चूर-चूर कालान्तक प्राकाम्यपर विजय पाने ही वाला था, तभी | हो गये॥ १२-१३॥ वशित्वने वेगपूर्वक वहाँ पहुँचकर प्राकाम्यकी सहायता | तब वे सभी अपनी शक्तिसे विजय प्राप्त करके की और अपने हाथकी फुर्तीसे कालान्तकके मस्तकपर | गर्जना करने लगीं। 'विनायक विजयी हुए'—ऐसा वे एक पर्वत-शिखरसे प्रहार किया। उस [प्रहार]-से | सब कहने लगीं। अन्य अल्प बलवाले भी बहुतसे कालान्तक सहसा भूमिपर गिर पड़ा॥ १-२१/२॥ | दैत्य उनके द्वारा विनष्ट कर दिये गये, तब पुनः तब कालान्तकको रक्तसे लथपथ और दो भागोंमें | सभी श्रेष्ठ दैत्यवीर एकत्र होकर सिद्धिसेनाका विनाश विभाजित देखकर दैत्यसेनामें महान् हाहाकार फैल | करने लगे॥ १४-१५॥ गया। तदनन्तर मुसल नामक दैत्यपति और भल्ल नामका | उस समय दोनों सेनाओंमें मारो, मार डालो, बाँध एक अन्य असुर प्राकाम्य [नामक सिद्धि] एवं महिमा | लो, सावधान हो जाओ—इस प्रकारका महान् कोलाहल नामवाली सिद्धि—ये चारों उत्साहपूर्वक युद्धहेतु उद्यत | होने लगा। तदनन्तर शस्त्रोंके आपसमें टकरानेसे अग्नि हो गये। उस समय शस्त्रसे प्रहार करनेवाले अनेक दैत्य | उत्पन्न गयी। योद्धा शस्त्रोंके टूट जानेपर क्रोधित होकर प्राकाम्यसे युद्ध करने लगे॥ ३-५॥ | मल्लयुद्ध करने लगे॥ १६-१७॥ उस युद्धमें असंख्य देवता मरकर टूटे हुए वृक्षकी | पुनः एक-दूसरेका विनाश करनेवाला, अनियन्त्रित भाँति गिर पड़े। रक्तरूपी जलको प्रवाहित करनेवाली | और भयंकर युद्ध होने लगा। तभी सूर्य अस्त हो गये। वहाँ सहस्रों नदियाँ बहने लगीं॥ ६॥ | महान् अन्धकारसे चारों ओर सभी दिशाएँ व्याप्त हो तब ईशिता, वशिता और विभूति [नामक सिद्धियाँ] | गयीं, तब [अग्निगर्भा] दिव्य [प्रकाशमान] औषधियोंको वहाँ आ गयीं और युद्धमें उस प्राकाम्यकी सहायता करने | हाथमें ग्रहणकर वे परस्पर प्रहार करने लगे॥ १८-१९॥ लगीं। उन सिद्धियोंने उन चारों दैत्योंपर चार पर्वत | वह भयंकर युद्ध तीन दिन-रात लगातार चलता गिराये, जिससे वे चूर-चूर हो गये और उन्होंने अत्यन्त | रहा। उस समय दसों दिशाओंमें वीरोंको बहा ले दुर्लभ स्वर्गको प्राप्त किया॥ ७-८॥ | जानेवाली रक्तकी नदियाँ बहने लगीं॥ २०॥ युद्धमें अणिमाने बलपूर्वक कर्दमकी चोटी पकड़कर | वे नदियाँ ढालरूपी कछुओं, खड्गरूपी मछलियों, सहसा उसे पटक दिया, जिससे वह सौ टुकड़ोंमें विभक्त | हाथीरूपी मगरमच्छों, शवरूपी काष्ठों, शिररूपी कमलों होकर चूर-चूर हो गया। उसके मुखसे रक्तका स्राव होने | और केशरूपी शैवालोंसे सुशोभित हो रही थीं। वे लगा तथा उसने भूमिपर लुढ़कते हुए प्राण त्याग दिये। | कायरोंको भय देनेवाली और वीरोंके महान् हर्षको तदनन्तर महिमा, लघिमा और गरिमाने यक्षमासुर, तालजंघ | विशेषरूपसे बढ़ानेवाली थीं॥ २११/२॥ तथा दीर्घदन्तपर वृक्षसमूहोंसे प्रहार किया॥ ९-१०१/२॥ | तब बलवान् देवताओंके सदा विजयी होनेपर तब घण्टासुर, रक्तकेश और दुर्जय नामवाले | देवान्तक चिन्ता करते हुए अपने मनमें विचार करने लगा महाबलशाली दैत्य लम्बी साँस लेते हुए अपनी सम्पूर्ण | कि मैंने अपने पराक्रमसे समस्त देवसमूहोंपर विजय प्राप्त सेनाओंके साथ आये॥ १११/२॥ | की, फिर इस बालककी जन-सामान्यको मोहित करनेवाली उन [दैत्यों]-के द्वारा अपनी सेनाको मारा जाता | तुच्छ माया मेरे समक्ष क्या है? मैं अभी अष्टसिद्धियों देखकर वशिता आदि सिद्धियोंने उनके मस्तकपर अपनी | और उनकी सम्पूर्ण सेनाका नाश कर डालूँगा और इस
४२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- बालक विनायकको पकड़कर अपने भवन चला जाऊँगा ॥ २२-२४१/२ ॥ ऐसा कहकर हाथमें खड्ग लिये वह अपनी गर्जनासे दिशाओंको गुंजायमान करता हुआ तथा सम्पूर्ण शत्रुसेनाको खड्ग-प्रहारसे मारता हुआ वहाँ आया। [उस समय] देवता उसके भयसे मूर्च्छित होकर भूतलपर गिर पड़े ॥ २५-२६ ॥ उनमेंसे कुछ देवताओंने भगवान् विनायकका स्मरण करते हुए प्राण त्याग दिये। कुछ रक्तप्रवाहिनी नदियोंमें बह गये और कुछ देवता स्वर्गलोकमें चले गये ॥ २७ ॥ कुछ देवताओंने उस दैत्यको देखते ही अपने प्राण त्याग दिये। तब तितर-बितर हुई वह देवसेना दसों दिशाओंमें भाग गयी। उस दैत्यने भी हाथमें खड्ग लेकर [भागती हुई] देवसेनापर पीछेसे प्रहारकर उसे मार डाला। यह देखकर गरिमाने वृक्षोंसहित एक पर्वतको उस दैत्यके शरीरपर फेंका, [परंतु] उसने उसे अपनी तलवारसे सैकड़ों टुकड़ोंमें काट डाला ॥ २८-२९१/२ ॥ तब आठों सिद्धियोंने क्षुभित होकर उसपर बहुत-से पर्वतोंसे प्रहार किया, [परंतु] उसने अपने खड्ग-प्रहारसे कुशलतापूर्वक उन्हें शीघ्र ही टुकड़े-टुकड़े कर दिये। तत्पश्चात् महिमा [नामक सिद्धि] उछलकर उसके कन्धेपर सवार हो गयी और उस दैत्यके हाथसे शीघ्र ही खड्गको छीनकर अन्तर्धान हो गयी। तदनन्तर उसने बलपूर्वक उस दैत्यके मस्तकपर उसी खड्गसे प्रहार किया, परंतु यह आश्चर्यकी बात थी कि उस प्रहारसे मस्तक तो अप्रभावित रहा, जबकि खड्ग सैकड़ों टुकड़ोंमें विभक्त हो गया ! ॥ ३०-३२१/२ ॥ तब खड्गके भग्न हो जानेपर वह दैत्य (देवान्तक) बाणोंकी वर्षा करने लगा। उसने एक-एक सिद्धिको बत्तीस-बत्तीस बाणोंसे मारकर व्याकुल कर दिया। तदनन्तर वे भूमिपर गिर पड़ीं। आठों सिद्धियोंके [रणभूमिमें] गिर जानेपर देवता [देवान्तकसे] युद्ध करने लगे। उधर वे सिद्धियाँ भी एक मुहूर्तमें सावधान हो गयीं और भगवान् विनायकके पास गयीं ॥ ३३-३५ ॥ तब उस [युद्ध-सम्बन्धी] सम्पूर्ण वृत्तान्तको जानकर बुद्धिने [भगवान्] विनायकसे कहा- 'उसका विचार कैसे उचित हो सकता है, जिसके पास बुद्धि ही न हो। आपकी सिद्धियाँ पराजित हो चुकी हैं, इसलिये आप मुझे आज्ञा दीजिये। मैं उस दैत्यसे युद्ध करनेके लिये जाऊँगी और उसका पराक्रम देखूँगी' ॥ ३६-३७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'सिद्धिसेनाकी पराजयका वर्णन' नामक चौंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६४ ॥ पैंसठवाँ अध्याय विनायकका बुद्धिको युद्धके लिये भेजना, बुद्धिद्वारा एक भयंकर शक्तिका प्राकट्य और उस शक्तिद्वारा देवान्तककी सेनाका संहार ब्रह्माजी कहते हैं- बुद्धिद्वारा कहे गये वचनको सुनकर भगवान् विनायक हर्षित होकर उससे बोले- भगवान् [विनायक ] बोले- [हे बुद्धि!] तुम जाओ, उस दैत्यसे युद्ध करो और उसे मारकर यशकी प्राप्ति करो ॥ १ ॥ ऐसा कहकर विनायकने उसे सुन्दर वस्त्र प्रदान किये। तब उसने उन देवाधिदेवको सिर झुकाकर उस दैत्य देवान्तकसे युद्ध करनेके लिये प्रस्थान किया ॥ २ ॥ उस समय उसके द्वारा की गयी सिंहगर्जनासे तीनों लोक कम्पित हो उठे। उसके मुखसे एक श्रेष्ठ शक्ति निकली; जो जटाओंसे युक्त, विकृत मुखवाली और संसारका भक्षण करनेके लिये उद्यत थी। वह अपने दोनों विशाल नेत्रोंसे ज्वालासमूहोंका उत्सर्जन कर रही थी ॥ ३-४॥ वह (शक्ति) दैत्यसेनाका दहन करती जा रही थी, जिससे [भयभीत] वह (दैत्यसेना) पलायन कर गयी। उस (शक्ति)-के दर्शनमात्रसे कुछ दैत्य प्राणहीन होकर गिर गये और अन्य दैत्य यह विचार करने लगे कि आज हमें कहाँ जाना चाहिये, कहाँ हम सुखसे रह सकेंगे?
क्री०ख०-अ०६५ ] * विनायकका बुद्धिको युद्धके लिये भेजना * ४२७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उनमेंसे कुछ दैत्य कहने लगे—हे देवान्तक! दौड़ो- दौड़ो; हम मरे जा रहे हैं ॥ ५-६ ॥ इस प्रकारका कोलाहल सुनकर देवान्तक उस शक्तिके सम्मुख गया और शीघ्र ही अपने धनुषपर डोरी चढ़ाकर अपना हस्तलाघव दिखाते हुए उस शक्तिके अंगोंपर सर्पसदृश विषैले बाणोंसे प्रहार करने लगा। उसके द्वारा शक्तिकी ओर चलाये गये बाणसमूहोंसे सूर्य आच्छादित-से हो गये। तब उस शक्तिने अपने विशाल मुखको फैलाकर उन बाणोंको कमलनालकी भाँति निगल लिया ॥ ७-८ १/२ ॥ उस समय उस दैत्यके सारे तरकस खाली हो गये, परंतु उस शक्तिकी तृप्ति वैसे ही नहीं हुई, जैसे राक्षसोंकी मनुष्योंसे तृप्ति नहीं होती ॥ ९ १/२ ॥ देवान्तकको क्षीण शक्तिवाला देखकर वह शक्ति दैत्यसेनाके पास गयी। उसने उनमेंसे कुछ दैत्योंका भक्षण कर लिया और कुछ दैत्योंको अपने हाथके प्रहारसे नीचे गिरा दिया। कुछको अपने मुखमें डाल लिया और कुछको पटककर चूर्ण कर डाला ॥ १०-११ ॥ उसने असंख्य दैत्यसमूहोंका भक्षण कर लिया, उन्हें चूर-चूर कर डाला और उन्हें मार डाला। कुछ दैत्योंको अपने चरणोंके प्रहारसे चूर-चूर करती हुई वह देवान्तकके पास गयी और उससे कहा—'तुम मेरे गर्भाशयमें प्रविष्ट हो जाओ, जहाँ तुम्हारे दैत्य माताके गर्भमें स्थित [शिशु]-की भाँति शयन कर रहे हैं। जिन दैत्योंका मेरे द्वारा भक्षण कर लिया गया, वे मर गये और मेरे उदरमें जाकर पच गये हैं' ॥ १२-१३ १/२ ॥ तब मल-मूत्रकी गन्धसे व्याकुल वह देवान्तक उस शक्तिसे भयभीत होकर शीघ्र ही पलायन कर गया, [परंतु] जहाँ-जहाँ वह जाकर छिपता, वहाँ- वहाँ वह शक्ति पहुँच जाती थी। इस प्रकार वह स्वर्गादि ऊर्ध्वलोकों, पातालादि अधोलोकों और दसों दिशाओंमें भ्रमण करता रहा ॥ १४-१५ ॥ तभी उस शक्तिने उसकी शिखा पकड़कर उसे अपने गर्भाशयमें रख लिया। तदनन्तर उस शक्तिके साथ बुद्धि विनायकके पास गयी ॥ १६ ॥ स्तनोंके आघातसे दोनों ओरके वृक्षोंको गिराती हुई और मदके प्रभावसे घूमती हुई आँखोंवाली उस शक्तिको आगे करके बुद्धिने भगवान् विनायकको प्रणाम किया ॥ १७ ॥ जिस प्रकार बादल जलकी वर्षा करते हैं, उसी प्रकार स्वेदवर्षा करती हुई उस मन्दगामिनी विकराल शक्तिको देखकर भगवान् विनायकने उसे वहाँसे दूर हटाया। जब उसे वहाँसे हटाया गया तो वह दैत्य देवान्तक उसके गर्भाशयसे भूमिपर गिर पड़ा। उस समय वह अत्यधिक दुर्गन्धयुक्त हो गया था, अतः दूतोंने उसको बाहर निकाल दिया ॥ १८-१९ ॥ तदनन्तर चेतना प्राप्त करके देवान्तक स्नानकर, चुपचाप घर चला गया। उस समय वह लज्जाके कारण नीचे मुख किये, चिन्तित, उदास और अत्यन्त दुखी था। बुद्धिके द्वारा निवेदन किये जानेपर उस शक्तिने भगवान् विनायकको प्रणाम किया। उसे देखकर कुछ लोग हँसने लगे, कुछ भयभीत हो गये, कुछ कान्तिहीन हो गये और कुछ गिर पड़े ॥ २०-२१ ॥ तब उस (शक्ति)-ने उन (भगवान् विनायक)-से कहा—मैंने शीघ्रतापूर्वक दैत्यवाहिनीका भक्षण कर लिया और वह पापी देवान्तक भी मेरे द्वारा [गर्भाशयमें] स्थित कर लिया गया। हे देव ! हे दयानिधे ! अब आप मेरे निवासहेतु [कोई] स्थान प्रदान करें ॥ २२ १/२ ॥ भगवान् विनायकने कहा—हे दैत्यनाशिनि ! तुम्हें धोखा देकर वह दैत्य देवान्तक अपने घर चला गया है। मैंने यह जान लिया है कि तुम्हारा पराक्रम इन्द्रादि देवताओंसे भी बढ़कर है। तुम मेरे मुखमें प्रवेश कर जाओ और वहीं विश्राम करो। मैं उस (देवान्तक)- का नियमन करूँगा, तुम्हें इस विषयमें चिन्ता करना उचित नहीं है ॥ २३-२४ १/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—भगवान् विनायकके इस प्रकारके वचन सुनकर वह शक्ति उनके मुखको देखकर उसमें प्रवेश कर गयी और सभी लोकोंके निवास-स्थान देवाधिदेव विनायकके उदरमें जाकर अत्यन्त प्रसन्नताके साथ वैसे ही सो गयी, जैसे माताकी गोदमें शिशु सो जाता है ॥ २५-२६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'बुद्धिविजयवर्णन' नामक पैंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६५ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_15_1_Front
छाछठवाँ अध्याय
४२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
छाछठवाँ अध्याय देवान्तकका अघोरमन्त्रसे हवनकर दिव्य अश्व पाना और उसपर आरूढ़ हो रणक्षेत्रमें जाना तथा सिद्धियोंकी सम्पूर्ण सेनाका संहार कर डालना
ब्रह्माजी कहते हैं—शारदा और रौद्रकेतुने अपने पुत्र देवान्तकको रातमें अकेले [लौटा हुआ] देखकर उसका आलिंगनकर उससे बातें की ॥ १ ॥ उस समय वह अपना मुख ढक ले रहा था तथा लज्जासे युक्त एवं अत्यन्त विह्वल था। वह कुछ भी बोल नहीं रहा था और प्रबल वायुके झोंकेसे कम्पायमान वृक्षकी भाँति काँप रहा था ॥ २ ॥ [देवान्तकके] पिताने कहा—तुम अपने विषयमें क्यों नहीं बता रहे हो? मूककी भाँति क्यों चुप हो ? तुम्हारी अभिलषित वस्तु यदि तीनों लोकोंके लिये दुर्लभ हो, तो उसे भी मैं अपने प्रयत्नसे उपलब्ध करा दूँगा ॥ ३ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—पिताकी वाणीरूपा सुधाका पानकर पुत्र देवान्तकने सावधानचित्त होकर माताके निकट स्थित पितासे निःशंक होकर कहा ॥ ४ ॥ पुत्र (देवान्तक)-ने कहा—मैं आपकी आज्ञा लेकर ही विनायकसे युद्ध करने गया था। वहाँ मैंने अपने सर्पतुल्य असंख्य विषैले बाणोंसे बहुत-से देवताओंको नष्ट कर दिया और कश्यपपुत्र विनायककी सेनाको मारकर रक्तकी नदियाँ बहा दीं। तभी देवसेनाके रक्षणार्थ एक महान् कृत्या मेरे निकट आ गयी। उसका मुख गुफाके सदृश था और [ऊँचाईमें] वह आकाशका स्पर्श कर रही थी। उसके केश बड़े भयंकर थे और पातालतक व्याप्त चरणोंवाली उस कृत्याके स्तन पर्वतके समान [विशाल] थे ॥ ५-७॥ हे तात ! [मेरे द्वारा] खड्गका प्रहार किये जानेपर भी उसे तनिक भी व्यथा नहीं हुई और उसने मेरी सम्पूर्ण सेनाको अपने गुफासदृश गर्भाशयमें रख लिया ॥ ८॥ उसने मेरे सम्पूर्ण शस्त्रों और बाणसमूहोंका भक्षण कर लिया और मुझे [भी] अपने गर्भाशयमें रख विनायकदेवके पास चली गयी ॥ ९ ॥
उसके गर्भाशयकी स्निग्धताके कारण मैं वहाँसे स्खलित होकर भूमिपर गिर पड़ा। महान् अन्धकार होनेके कारण किसीको ज्ञात न हो सका और मैं वहाँसे भागकर नदीके जलमें स्नानकर घर आ गया। हे तात ! इसीलिये मैं लज्जित और नीचे मुख किये हुए हूँ ॥ १०१/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—तब पुत्रके इस प्रकारके वचन सुनकर रौद्रकेतुने उससे कहा—'तुम चिन्ता न करो, मैं तुमसे एक उपाय कहता हूँ' ॥ १११/२ ॥ तदनन्तर [शुभ] मुहूर्त देखकर उसने उसको बीजसहित अघोर महामन्त्र प्रदान किया। उसके बाद पिता रौद्रकेतुने उससे पुनः कहा—' [हे पुत्र!] शिवका ध्यानकर और उनका सम्यक् रूपसे पूजनकर उत्तम अनुष्ठान करो। जपका दशांश हवन, हवनका दशांश तर्पण और तर्पणका दशांश ब्राह्मण-भोजन कराओ। इससे शिवके प्रसन्न होनेसे हवनकुण्डसे एक अश्व निकलेगा। उस अश्वपर आरूढ़ होकर तुम युद्धके लिये जाओ तो तुम्हें निश्चय ही विजयकी प्राप्ति होगी' ॥ १२-१४१/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—तब पिताके इस प्रकारके वचनको सुनकर पुत्र देवान्तकने प्रसन्नतापूर्वक उससे कहा— [हे तात !] आपने [शिवजीके मन्त्रका] सम्यक् रूपसे उपदेश दिया, अब आप [उसको सिद्ध करनेकी] विधि भी मुझे बतलाइये ॥ १५१/२ ॥ तब लोगोंको हटाकर वे दोनों घरके मध्य भागमें चले गये। वहाँ उन दोनोंने लाल रंगके वस्त्र धारण किये और लाल चन्दन लगाया। तत्पश्चात् लाल रंगके पुष्प लाकर उनसे शिवकी पूजा की ॥ १६-१७॥ इस प्रकार उन दोनोंने बहुत दिनोंतक अत्यन्त आदरपूर्वक [मन्त्रका] अनुष्ठान किया। अनुष्ठान समाप्त हो जानेपर उन्होंने आदरपूर्वक कुण्डका निर्माण किया। वह कुण्ड सभी लक्षणोंसे युक्त, मेखला और योनिसे
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क्री०ख०-अ०६६ ] * देवान्तकका अघोरमन्त्रसे हवनकर दिव्य अश्व पाना * ४२९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
सड़सठवाँ अध्याय
४३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सड़सठवाँ अध्याय विनायक और देवान्तकका युद्ध
ब्रह्माजी कहते हैं—उस सम्पूर्ण वृत्तान्तको जानकर विनायक अपने मनमें महान् आश्चर्य करने लगे। तब वे क्रोधित तथा युद्धके लिये उद्यत होकर सिंहपर सवार हुए। तदनन्तर उन्होंने अपने गर्जनसे आकाश और दिशाओंको ध्वनित करते हुए सभी लोगोंके मनको और पर्वतोंको भी कम्पायमान कर दिया॥ १-२॥ वे बड़े वेगसे देवान्तकके समीप गये। तब वह दैत्य देवान्तक उनसे हँसकर कहने लगा—॥ ३॥ दैत्य बोला—शुष्क तालुवाले हे बालक ! तुम तो अभी मक्खन खानेमें ही समर्थ हो, कैसे तुम युद्धके लिये चले आये? तुम यहाँ मत रुको, जाओ और माताका स्तनपान करो। हे बालक ! तुम तो अदिति [-के गर्भ]- से कश्यपद्वारा उत्पन्न हो, फिर इस प्रकारकी मूर्खताको कैसे प्राप्त हो रहे हो, जो आज देवान्तकसे युद्ध करनेकी इच्छा कर रहे हो? मुझे देखकर तो काल भी भयभीत हो जाता है, तुम व्यर्थ ही मरनेकी इच्छा कर रहे हो। तुम्हारा शरीर अत्यन्त कोमल है, अतः तुम तो मेरे लिये एक ग्रासमात्र होओगे॥ ४-६॥ ब्रह्माजी कहते हैं—दैत्य [देवान्तक]-के इस प्रकारके वचन सुनकर क्रोधसे अरुण नेत्रोंवाले विनायकने मुखसे अग्निका-सा वमन करते हुए हँसकर कहा—॥ ७॥ भगवान् [विनायक] बोले—तुम मद्यपानके कारण उन्मत्त और सन्निपातसे ग्रस्त हो, इसीलिये मूर्खतावश असम्बद्ध, युक्तिहीन प्रलाप कर रहे हो ॥ ८॥ अग्निकी छोटी-सी चिनगारी भी वायुसे प्रेरित होकर सब कुछ जला डालती है। अरे दैत्याधम ! तुम्हारे वाक्यसे प्रेरित होकर ही मैं तुम्हें मार डालूँगा, तुम मुझे नहीं जानते हो। अब तुम ऐसी बुद्धिका त्याग कर दो कि मेरा अन्त करनेवाला कोई नहीं है। मैं सनातन ब्रह्म हूँ और तुम्हारे वधके लिये ही अवतीर्ण हुआ हूँ॥ ९-१०॥ शिवजीद्वारा प्राप्त वरदानके अहंकारसे तुमने सबको पीड़ित किया है। उस वरदानकी अवधि आ गयी है। बुद्धिहीन होनेके कारण तुम इसे समझ नहीं पा रहे हो। हे दुर्मते ! त्रैलोक्यको पीड़ा देनेसे तुम्हारे द्वारा जो पाप हुआ है, उसे कहना व्यर्थ है, अब तुम अपने पुरुषार्थका प्रदर्शन करो॥ ११-१२॥ शक्तिके गुह्यांगसे निकलनेवाला तुम्हारे अतिरिक्त कौन ऐसा होगा, जो अपना मुख दिखलायेगा ! यदि तुम युद्ध करनेकी इच्छा रखते हो तो मुझपर प्रहार करो और मेरे प्रहारको सहन करो। तुम अपनी मूर्खताके वशमें होकर कल होनेवाली अपनी मृत्युकी आज ही इच्छा कर रहे हो॥ १३ १/२॥ ब्रह्माजी कहते हैं—उस दैत्यसे इस प्रकार कहकर भगवान् विनायकने [अपने] धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ायी॥ १४॥ भगवान् विनायकने उस [देवान्तक]-को नरान्तककी गति अर्थात् मृत्यु देनेकी इच्छासे अपने धनुषकी टंकार की, जिससे तीनों लोक कम्पित हो उठे॥ १५॥ उन्होंने धनुषकी प्रत्यंचाको कानतक खींचकर उस दैत्यपर बाण छोड़ा, परंतु दैत्यद्वारा सैकड़ों टुकड़े कर दिये जानेपर वह बाण भूमिपर गिर पड़ा॥ १६॥ तदनन्तर दैत्यने धनुषको प्रत्यंचायुक्त करके बहुत- से बाणोंका प्रहार किया, उसके धनुषकी टंकारसे पर्वत और दिशाएँ गूँज उठीं। तब विघ्नराज विनायकने हुंकार- मात्रसे उन बाणोंको गिरा दिया और पुनः उस दैत्याधिपतिपर बहुत-से बाणोंसे प्रहार किया॥ १७-१८॥ उन देवाधिदेवने एक बाणसे उसका मुकुट और दो बाणोंसे दोनों कानोंके कुण्डल भूमिपर गिरा दिये तथा दो बाणोंसे उसकी दोनों भुजाएँ काट डालीं॥ १९॥ उन्होंने एक बाणसे उसके ललाटपर प्रहार किया, तब वह दैत्य क्रोधान्वित होकर दाँतोंको चबाने लगा। उसने अपनी आँखें फैलाकर विनायकपर और भी बहुत- से बाण छोड़े, जिनसे आकाश और दिशाएँ आच्छादित हो गयीं ॥ २० १/२ ॥ उन बाणोंको भगवान् विनायकने आकाशमें ही एक ही बाणसे काट डाला और क्षणमात्रमें स्वयं एक बाणमय मण्डपका निर्माण किया। उस समय घोर
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क्री०ख०-अ०६८ ] विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन ४३१
क्री०ख०-अ०६८ ] * विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन * ४३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अन्धकार छा जानेपर भी वे दोनों परस्पर युद्ध करते | गण्डस्थलको फाड़ डाला ॥ २९-३० ॥ रहे ॥ २१-२२ ॥ | सिंहोंके गर्जन, हाथियोंके चिंघाड़ और दैत्योंके क्रोधित होकर उन दोनोंने एक-दूसरेकी बाणवृष्टिको | अनेक प्रकारके शब्दोंसे तीनों लोक काँपने लगे तथा अपनी शरवर्षाद्वारा काट डाला। इस प्रकार उन दोनोंने | सभी देवता आश्चर्यचकित हो गये ॥ ३१ ॥ सैकड़ों बार एक-दूसरेकी बाणवृष्टिका निवारण किया। | वे सिंह उछल-उछलकर हाथियोंके कुम्भस्थलपर तदनन्तर उस दैत्य देवान्तकने एक सौ आठ बार | गिर रहे थे। इस प्रकार सिंहसमूहोंके द्वारा वे सभी हाथी महामन्त्र (अघोरमन्त्र)-का जप करके शीघ्र ही एक | मार डाले गये। [सिंहोंद्वारा मारे गये वे हाथी] इन्द्रद्वारा बाणको वारणास्त्रसे अभिमन्त्रित किया ॥ २३-२४ ॥ | वज्र-प्रहारसे गिराये गये पर्वतोंकी भाँति सुशोभित हो रहे उसे छोड़नेपर करोड़ोंकी संख्यामें हाथी उत्पन्न हो | थे। तदनन्तर वे सिंह दसों दिशाओंमें जाकर दैत्योंका गये, जो चार दाँतोंवाले, पर्वतके समान [विशाल] एवं | भक्षण करने लगे ॥ ३२-३३ ॥ मेरु और मन्दराचलको भी चूर्ण कर देनेवाले थे ॥ २५ ॥ | तब सम्पूर्ण सेनाके मारे जानेपर देवान्तक चिन्तित जिनके मदके प्रवाहसे चारों ओर नदियाँ प्रवाहित | हो उठा। 'यह कश्यपका पुत्र बालक होते हुए भी होने लगीं तथा जिनके चिंघाड़मात्रसे तीनों लोक वैसे | बलवान् दिखायी दे रहा है, अतः अब मैं इसे निश्चित ही निनादित हो रहे थे, जैसे कि वर्षाकालमें बादलोंके | ही यमलोकका दर्शन कराऊँगा'—ऐसा कहकर दैत्यराजने गरजनेसे ॥ २६१/२ ॥ | पुनः एक बाणको अभिमन्त्रित किया ॥ ३४-३५ ॥ हे महामुने ! वे हाथी देवताओंकी सेनाको निरन्तर | तदनन्तर शार्दूलोंको उत्पन्न करनेवाले उस बाणको नष्ट कर रहे थे। वे दसों दिशाओंमें भाग रहे देवसैनिकोंका | धनुषपर चढ़ाकर उसने कानतक धनुषको खींचकर उसे पीछा कर रहे थे। वे पैरोंसे कुचलकर, सूँडके द्वारा और | देवताओंकी सेनापर छोड़ दिया। आकाश और दिशाओंको दाँतोंके अग्रभागसे वीरोंको मार डाल रहे थे ॥ २७-२८ ॥ | निनादित करता हुआ वह बाण शीघ्र ही [देवसेनामें] सेनाको इस प्रकारसे नष्ट होता हुआ देखकर | गया। उसके पंखकी वायुसे टूटकर वृक्षसमूह गिर पड़े। भगवान् विनायकने सिंहास्त्रका प्रयोग किया, तब सैकड़ों- | तब [उस बाणसे] अनेक शार्दूलसमूह प्रकट हो गये। हजारोंकी संख्यामें सिंह उत्पन्न हो गये। उनके सिंहनादसे | उन शार्दूलोंने सिंहोंका भक्षण कर डाला। तदनन्तर वे हाथी पृथ्वीपर गिर पड़े। तब उन सिंहोंने हाथियोंके | सब शार्दूल अन्तर्हित हो गये ॥ ३६-३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'अस्त्रयुद्धका वर्णन' नामक सड़सठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६७ ॥ अड़सठवाँ अध्याय विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन ब्रह्माजी कहते हैं—तदनन्तर दैत्य देवान्तकने दो | तब भगवान् विनायकने अपने समक्ष ताल और बाणोंको आदरपूर्वक अभिमन्त्रित किया। उसने एक | मृदंग [बजाकर] गान करते हुए गन्धर्वों और अनेक बाणको निद्रास्त्रसे तथा दूसरेको गन्धर्वास्त्रसे अभिमन्त्रित | प्रकारके विचित्र नृत्य करती हुई अप्सराओंको देखा। किया ॥ १ ॥ | उस समय उनके हाथोंसे शस्त्र गिर गये और उन्हें इसका उसने बायें घुटनेको आगेकर और धनुषकी डोरीको | पता भी न चला ॥ ३-४ ॥ खींचकर उन दोनों बाणोंको छोड़ दिया। उनके शब्दसे | वे [गायन और वादनकी] मनोहर ध्वनिसे मोहित सहसा तीनों लोक काँपने लगे। उनमेंसे एक बाण सेनामें | हो गये थे और उन्हें अपने कर्तव्यका भी ज्ञान न रहा। और दूसरा देवाधिदेव विनायकके निकट गिरा ॥ २१/२ ॥ | निद्रास्त्रसे विमोहित होकर सभी सैनिक भी सो गये ॥ ५ ॥
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४३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 रात्रिका आरम्भ होते ही जैसे बालक अस्त-व्यस्त | षोडश उपचारोंद्वारा उसका पूजन किया और उसके रूपसे सो जाते हैं, वैसे ही वे सिद्धियाँ भी वहाँ | सम्मुख साष्टांग प्रणाम किया ॥ १५१/२ ॥ लज्जारहित होकर सो गयी थीं ॥ ६ ॥ | तदनन्तर दिव्य वस्त्र धारण किये हुए और अनेक देवान्तकने जब [विनायक और देवसेनाकी] यह | प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित देवान्तकने उस देवीकी स्थिति देखी तो उसने हर्ष प्रकट करते हुए गर्जना की। | गोदमें बैठकर भयंकर गर्जना की। वह देवी भी उसके तदनन्तर उस बलशालीने महान् देवसेनाके चारों ओर | साथ उड़कर आकाशमें स्थित हो गयी ॥ १६-१७ ॥ वीर सैनिकोंसे युक्त बहुत-से गुल्मों* (सैनिक टुकड़ियों)- | वह देवी (शक्ति) अनेक प्रकारके शस्त्र धारण की को स्थापित कर दिया ॥ ७१/२ ॥ | हुई थी और वह देवान्तक भी धनुष-बाण धारण किये [तदुपरान्त] उसने भूमिका संस्कार करके एक त्रिकोण | हुए था। उस समय उस रौद्रकेतुपुत्र देवान्तकने परम कुण्डका निर्माण किया। तत्पश्चात् रक्तसे भरे हुए सौ कलशोंको | प्रसन्न होकर उस शक्तिसे कहा—'यह कश्यपका पुत्र प्रयत्नपूर्वक मँगवाया और स्नानकर अनेक प्रेतोंसे युक्त | बालक होते हुए भी पहलेसे ही बहुत बलवान् है; अब आसनपर पद्मासन लगाकर आदरपूर्वक बैठ गया ॥ ८-९ ॥ | इस समय मेरा उस दुष्टके प्रति क्या कर्तव्य हो सकता उसने सैकड़ों दैत्योंको मारकर विशाल मांसराशि | है?' ॥ १८-१९ ॥ एकत्र की और विधिपूर्वक अग्निस्थापन करके उस दैत्य | [तब उस शक्तिने कहा—] 'मैं अभी तुम्हारे देवान्तकने अभिचार-कर्म करना प्रारम्भ किया ॥ १० ॥ | सामने ही [उसकी] सम्पूर्ण सेनाका नाश किये देती हूँ।' उसने दिगम्बर (वस्त्रहीन) होकर मन्त्र पढ़ते हुए | जब वह दैत्येन्द्रसे इस प्रकार कह रही थी, तभी मांसकी आहुतियाँ देना प्रारम्भ किया। एक हजार आहुतियाँ | काशिराजने उसके वचनोंको सुन लिया ॥ २० ॥ देनेके अनन्तर उसने बलिदान देकर पूर्णाहुति की। तब | तदनन्तर राजाने विनायकके पास जाकर उन्हें उसने कुण्डके मध्य भागमें एक शक्तिको देखा, जो क्षुधातुर | आदरपूर्वक बोधित करते हुए कहा— ॥ २०१/२ ॥ थी। उसने उसे खानेके लिये नरमांस और पीनेके लिये उन | काशिराज बोले—[हे प्रभो!] आप तो भूत, [रक्तसे भरे हुए सौ] कलशोंको दिया ॥ ११-१२ ॥ | वर्तमान और भविष्यके ज्ञाता हैं, फिर भी आप उस तब भी अतृप्त जानकर उसने उसे अन्य प्रेतोंको | दैत्यरचित गान्धर्वी मायाको क्यों नहीं जान पा रहे हैं? अर्पित किया, तब वह भयंकर शक्ति [उस कुण्डसे] | और आप उसमें आसक्त क्यों हो जा रहे हैं? देवान्तकने बाहर आयी। उसके बाल आकाशका स्पर्श कर रहे थे | अभिचार-कर्मके द्वारा राक्षसी-सदृश इस मायाका निर्माण और नेत्र विशाल गड्ढोंके समान थे। रक्तवर्ण और | किया है। वह आपकी सेनाका नाश कर डालेगी, अतः अतीव भयंकर मुखवाली उस शक्तिने दसों दिशाओंको | आप सावधानचित्त हो जाइये ॥ २१-२२१/२ ॥ प्रतिध्वनित करते हुए अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक कहा— | ब्रह्माजी कहते हैं—तब काशिराजके इस प्रकारके 'रक्त-मांससे मैं तृप्त हो गयी हूँ, अब तुम्हें कोई भय | वचन सुनकर सावधान हुए चित्तवाले सर्वव्यापक भगवान् नहीं है' ॥ १३-१४१/२ ॥ | विनायकने ज्ञानदृष्टिसे देखकर जान लिया कि यह सब तब उस दैत्यने भी उसे प्रणामकर भक्तिभावसे | मायाद्वारा रचित है। तब उन्होंने [अपने तरकससे] दो
- महाभारत (आदिपर्व २।१९-२०)-में गुल्मकी परिभाषा इस प्रकार दी गयी है— एको रथो गजश्चैको नरः पञ्च पदातयः। त्रयश्च तुरगास्तज्ज्ञैः पत्तिरित्याभिधीयते ॥ पत्तिं तु त्रिगुणामेतामाहुः सेनामुखं बुधाः। त्रीणि सेनामुखान्येको गुल्म इत्यभिधीयते ॥ अर्थात् एक रथ, एक हाथी, पाँच पैदल सैनिक और तीन घोड़े—इन्हींको सेनाके मर्मज्ञ विद्वानोंने 'पत्ति' कहा है। इसी पत्तिकी तिगुनी संख्याको विद्वान् पुरुष 'सेनामुख' कहते हैं और तीन सेनामुखोंको एक 'गुल्म' कहा जाता है। इस प्रकार एक गुल्ममें ९ हाथी, ९ रथ, २६ घुड़सवार और ४५ पैदल सैनिक होते हैं।
क्री०ख०-अ०६८ ] विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन ४३३
क्री०ख०-अ०६८ ] * विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन * ४३३ बाण निकालकर उन्हें घण्टास्त्र और खगास्त्रके मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके धनुषको कानतक खींचकर छोड़ दिया। अत्यन्त वेगवाले और सुनहरे पंखोंवाले वे दोनों बाण मेघके समान गर्जना करते हुए वायुवेगसे चले और उन्होंने सहसा सूर्यमण्डलको आच्छादित कर दिया ॥ २३-२६ ॥ [उस समय] घण्टास्त्रसे महान् घण्टानाद होने लगा, जो सबको विमोहित कर देनेवाला था। तब उस घण्टा- नादको सुनकर सभी सैनिक उठकर खड़े हो गये ॥ २७॥ तब [निद्रास्त्रके प्रभावसे मुक्त] सिद्धियाँ और सभी वीर हाथोंमें शस्त्र धारणकर युद्ध करने लगे। भगवान् विनायकने दूसरा बाण देवान्तककी सेनाको लक्ष्य करके छोड़ा। तब उस खगास्त्र [नामक बाण]-से महान् बलसम्पन्न अनेक प्रकारके रूपोंवाले पक्षी प्रकट हो गये। हे मुने ! उनके पंखोंकी वायुके वेगसे वह गन्धर्वास्त्र वैसे ही नष्ट हो गया, जैसे सूर्यके सारथी अरुणके उदय (अरुणोदय) होनेपर अन्धकार नष्ट हो जाता है। तदनन्तर उन पक्षियोंने सभी दैत्य सैनिकोंका भक्षण कर लिया ॥ २८-३०॥ कुछ दैत्य उन पक्षियोंके पंखोंके आघातसे मर गये, तो कुछ उनकी चोंचोंके अग्रभागसे क्षत-विक्षत हो गये तथा कुछ दैत्य भयसे प्राण त्यागकर गिर गये ॥ ३१ ॥ उस समय दैत्यसेनाओंमें सब ओर महान् हाहाकार होने लगा। तब देवान्तकने क्रोधित होकर खड्गास्त्रका प्रयोग किया ॥ ३२ ॥ उसकी ध्वनि सुनकर सागर-जैसी विशाल सेना और दिशाओंको धारण करनेवाले हाथी क्षुब्ध हो उठे। उस अस्त्रसे असंख्य खड्ग निकल आये ॥ ३३ ॥ उस समय दोनों सेनाओंके टकरानेसे वे खड्ग अग्निके समान दाहक हो उठे। तब उस अग्निसे जलकर देवता धरतीपर गिर पड़े ॥ ३४ ॥ [उस अस्त्रके प्रभावसे] कुछ पक्षी मारे गये और कुछ अग्निदग्ध हो गये तथा अन्य पक्षी अन्तर्धान हो गये। उस समय उन असंख्य खड्गोंकी प्रभासे दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं, और उस (प्रभा)-ने सैनिकोंके नेत्रोंकी ज्योतिका हरण कर लिया। [उस समय] खड्गोंकी वृष्टिसे मारे गये देवता पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३५-३६ ॥ उनमेंसे कुछ देवताओंकी भुजाएँ कट गयी थीं, तो कुछके मस्तक और कुछके हाथ कट गये थे। अन्य देवता पेट, घुटने और पीठपर खड्गके प्रहारसे आहत होकर मर गये और देवताओंके मृत शरीरोंपर गिर पड़े। इस प्रकार अष्टसिद्धियोंद्वारा निर्मित सम्पूर्ण सेना [उस अस्त्रद्वारा] विनष्ट हो गयी ॥ ३७-३८ ॥ उस समय दसों दिशाओंमें रक्तकी नदियाँ बहने लगीं और उनमें शव बहने लगे। तब विनायकने उस दैत्यके अद्भुत पराक्रमको देखकर [अपने तरकससे] एक सुदृढ़ बाणको निकालकर उसे वज्रास्त्रसे अभिमन्त्रित किया और महान् गर्जना करते हुए उसे दैत्यसेनामें छोड़ दिया ॥ ३९-४० ॥ उस बाणके शब्दसे पर्वत और वृक्ष [टूटकर] पृथ्वीपर गिर पड़े। उस अस्त्रसे निकली अग्निके संयोगसे दिशाएँ जलने लगीं। उस अस्त्रने अपने तेजसे सूर्यमण्डलको आच्छादित कर लिया। उसके तेजसे कुछ पक्षी दग्ध होकर मर गये ॥ ४१-४२ ॥ उस वज्रास्त्रसे खड्गास्त्र सहसा हजारों टुकड़ोंमें टूट गया। तदनन्तर उस वज्रास्त्रने अनेक वज्रोंके द्वारा दैत्यसेनाको जला डाला ॥ ४३ ॥ वज्रकी धार [-के स्पर्शमात्र]-से हजारों दैत्य मर जा रहे थे। दैत्यगण जहाँ-जहाँ [भागकर] जाते थे, वहाँ-वहाँ वह वज्रास्त्र जाकर उनपर गिरता था ॥ ४४ ॥ उसने दैत्योंके मस्तकों, पैरों, हाथों, कन्धों और जंघाओंको चूर-चूर कर डाला। पृथ्वीका भेदनकर जो दैत्य [पातालमें] चले गये थे, उनको भी उस वज्रास्त्रने मार डाला। इस प्रकार तीक्ष्ण [धारवाले] सहस्रों वज्रोंद्वारा सभी दैत्य मार डाले गये। तदनन्तर वे सभी वज्र सब ओरसे देवान्तककी ओर चले ॥ ४५-४६ ॥ तब उसने भी एक बाण लेकर उसे प्रयत्नपूर्वक रौद्रास्त्रसे अभिमन्त्रित किया और उसे धनुषपर चढ़ाकर तथा [कानतक] खींचकर शत्रुसेनापर छोड़ दिया। [भगवान्] शिवके मंगलमय नामसे अंकित उस बाणने आकाश और दिशाओं-विदिशाओंको भी निनादित कर दिया। प्रलयकालीन अग्निके सदृश वह बाण अग्निकणोंका
४३४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[पूर्वार्द्ध - बायाँ स्तम्भ] वमन कर रहा था। उसके भयसे भूलोक और देवलोकके प्राणी दसों दिशाओंमें पलायन कर गये ॥ ४७-४९ ॥ उस समय विनायककी सेनामें महान् कोलाहल होने लगा। उस बाणके गिरनेपर उसमेंसे एक पुरुष प्रकट हुआ, जो देखनेमें अत्यन्त भयंकर था। ऐसा लगता था, मानो वह अपने भयंकर मुखसे तीनों लोकोंको अपना ग्रास बना लेगा। वह [सिरपर] जटा धारण किये बड़े-बड़े हाथ-पैरोंवाला और विशाल पेटवाला था ॥ ५०-५१ ॥ उसका नीचेका ओष्ठ पृथ्वीको और ऊपरका ओष्ठ आकाशको स्पर्श कर रहा था, उसकी जिह्वा पर्वत-जैसी थी। उस भयंकर पुरुषने क्षणभरमें वज्रास्त्रका भक्षण कर लिया। तदनन्तर विशाल शरीरवाला वह पुरुष क्षणभरमें विनायकके वधकी इच्छासे उनके समीप पहुँच गया। तब [भगवान्] विनायकने तत्क्षण ही ब्रह्मास्त्रका
[पूर्वार्द्ध - दायाँ स्तम्भ] सन्धान किया ॥ ५२-५३ ॥ उन देवाधिदेव विनायकने शताक्षरी मन्त्रसे एक तीव्रगामी बाणको अभिमन्त्रितकर उसे [धनुषपर चढ़ाकर और] कानतक खींचकर सहसा छोड़ दिया ॥ ५४ ॥ उस बाणसे उत्पन्न कर्कश ध्वनिसे तीनों लोक काँप उठे। उससे निकले अग्निकणोंसे सभी दिशाएँ दग्ध हो उठीं। उस समय कुछ भी समझमें नहीं आ रहा था। उस ब्रह्मास्त्रसे भी वैसा ही एक पुरुष उत्पन्न हुआ, जो अत्यन्त भयंकर था। वे दोनों पुरुष एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे युद्ध करते हुए आकाशमें चले गये ॥ ५५-५६ ॥ उन दोनों महाबलशालियोंने [वहाँ] अनेक प्रकारसे मल्लयुद्ध किया, तदुपरान्त क्षणभरमें वे दोनों अन्तर्धान हो गये और फिर कहीं भी नहीं दिखायी दिये ॥ ५७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'अस्त्रयुद्ध' नामक अड़सठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६८ ॥
उनहत्तरवाँ अध्याय विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन
[उत्तरार्द्ध - बायाँ स्तम्भ] ब्रह्माजी कहते हैं—तब देवान्तक अत्यन्त विस्मित होकर अपने मनमें विचार करने लगा कि इस विनायकका निवारण करनेके लिये मैं जैसे-जैसे मायाका प्रयोग कर रहा हूँ, वैसे-वैसे ही यह बालक भी अपने पुरुषार्थका प्रदर्शन कर रहा है। कब यह मृत्युको प्राप्त होगा और कब मैं विगतश्रम होकर सो सकूँगा ? ॥ १-२ ॥ इस प्रकार चिन्तित उस देवान्तकने अपने धनुषको प्रत्यंचायुक्त किया और एक भयंकर बाणको अभिमन्त्रित करके विनायकपर छोड़ दिया ॥ ३ ॥ उस अभिमन्त्रित बाणने सर्वव्यापक [परमात्मा] विनायकपर असंख्य बाणोंकी वर्षा की। [तदनन्तर] देवान्तकने एक भयंकर शक्तिका निर्माण किया, जो त्रिलोकीको ग्रास बनानेके लिये उद्यत थी ॥ ४ ॥ विघ्नराज विनायकने उस शक्तिको और उसकी गोदमें बैठे दैत्यश्रेष्ठ देवान्तकको देखा, जो बहुत-से तीक्ष्ण बाणसमूहोंकी वर्षा कर रहा था ॥ ५ ॥ तब अष्ट सिद्धियाँ शीघ्र उड़कर गयीं और उस
[उत्तरार्द्ध - दायाँ स्तम्भ] शक्तिको बलपूर्वक पकड़कर उसे विनायकके पास लाने लगीं। जब वे उसे ला रही थीं, तभी वह उनके हाथसे निकलकर भाग गयी। तब वे सब क्रुद्ध होकर दैत्यपति देवान्तकको ही उसके सिरके बाल पकड़कर विनायकके पास ले आयीं ॥ ६-७ ॥ तब उस दैत्यने अणिमापर दृढ़तापूर्वक मुष्टिका- प्रहार किया, उस मुष्टिकाघातसे वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ी। तब लघिमा, गरिमा और वशिमाने उसपर तबतक लातोंसे प्रहार किया, जबतक कि उसने शीघ्रतापूर्वक उन सबके चरणोंको पृथक्-पृथक् पकड़ नहीं लिया। तदनन्तर वह दैत्य जबतक उन्हें पृथ्वीपर पटकता, उससे पहले ही वे निकल गयीं ॥ ८-१० ॥ तब प्राकाम्य और भूतिने उसे बलपूर्वक मारा तो वह दैत्य मुखसे अग्निवमन करता हुआ भूतलपर गिर पड़ा। तदनन्तर क्षणभरमें चेतना प्राप्त करके वह एक शक्तिशाली घोड़ेपर सवार हो गया। उसने शस्त्र हाथमें लेकर वायुवेगसे विनायकपर प्रहार किया ॥ ११-१२ ॥
क्री०ख०-अ०६९] विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन ४३५
क्री०ख०-अ०६९] * विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन * ४३५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] तलवारके दृढ़ आघातसे देव विनायक कुछ मूर्च्छित- से हो गये, परंतु पलक झपकनेमात्रमें सावधान होकर वे उस दैत्यराजके प्रति इस प्रकार दौड़े, जैसे हिरण्य- कशिपुका वध करनेके लिये विष्णु और वृत्रासुरका वध करनेके लिये शचीपति इन्द्र दौड़े थे ॥ १३ १/२ ॥ वे अपने चारों हाथोंमें बाण, कमल, पाश और अंकुश धारण किये थे और वीरोचित शोभासे अत्यन्त प्रकाशमान होकर सुशोभित हो रहे थे। उन्होंने मेघसदृश गर्जना करके अपने चारों आयुधोंसे उस दैत्यश्रेष्ठ देवान्तकपर वेगपूर्वक प्रहार किया, परंतु फिर भी वह विचलित नहीं हुआ। तब अपने शस्त्रोंको व्यर्थ हुआ देखकर विनायक अत्यन्त आश्चर्यको प्राप्त हुए और माना कि इस दैत्यका शरीर वज्रके सारभागसे बना हुआ है ॥ १४-१६ १/२ ॥ तदनन्तर देवाधिदेव विनायकने उस महान् अस्त्रको ग्रहण किया, जो वज्रको भी चूर्ण कर सकता था और जिसे [विनायकके द्वारा पूर्वमें मारे गये] धूम्राक्षने [सूर्योपासनाके फलस्वरूप] सूर्यमण्डलसे प्राप्त किया था। उन्होंने दैत्य देवान्तकपर उसी अस्त्रसे प्रहार किया, किंतु [देवान्तककी शारीरिक दृढ़ताके कारण] उसके सैकड़ों टुकड़े हो गये ॥ १७-१८ ॥ उससे उसका एक रोम भी विचलित नहीं हुआ— यह एक महान् आश्चर्यकी बात थी ! तदनन्तर उन दोनोंने अनेक शस्त्रोंसे एक-दूसरेके सिर, पीठ, हृदय और भुजाओंपर प्रहार किया। तब उन शस्त्रोंके प्रहारसे उत्पन्न अग्नि पृथ्वीको जलाने लगी, परंतु वे दोनों [उससे] भयभीत नहीं हुए और युद्ध करते रहे। आधी रात हो जाने और अँधेरा फैल जानेपर भी उन्होंने युद्ध बन्द नहीं किया ॥ १९-२१ ॥ तदनन्तर वे दोनों कृत्रिम प्रकाशमें परस्पर युद्ध करने लगे। तब रौद्रकेतुने देवताओंको विमोहित करनेवाली मायाका प्रयोग किया ॥ २२ ॥ उसने सुन्दर स्वरूपवाली अदितिकी रचनाकर उसे दैत्य देवान्तकके हाथमें दे दिया। वह कमलनयनी पीन पयोधरोंवाली और भालदेशपर रक्तवर्णके कुंकुमका आलेप किये हुए थी। उसके गलेमें मुक्ताहार, हाथोंमें सुन्दर
[दायाँ स्तम्भ] कंगन और शरीरपर दिव्य वस्त्र शोभायमान थे। स्वर्णाभूषणोंसे विभूषित और दिव्य कंचुकी धारण किये वह सौन्दर्यलहरीके समान थी ॥ २३-२४ ॥ दैत्यके हाथमें पड़ी वह विनायकको देखकर रुदन करने लगी और उनसे बोली—'दौड़ो-दौड़ो, मैं संकटमें हूँ, तुम देख क्या रहे हो?' ॥ २५ ॥ वह ऐसा कह ही रही थी कि उस दैत्यने बलात् उसकी कंचुकी फाड़ डाली तथा उस मदोन्मत्त चित्तवाले दैत्यने उसके वस्त्रोंको भी खींच लिया। तब उस [मायारचित] अदितिने उच्च स्वरमें विनायकदेवसे कहा— 'तुम्हारा पुरुषार्थ कहाँ चला गया? अरे निष्ठुर ! लोकलब्जाके भयसे तुम शीघ्र मुझे [इस दैत्यसे] छुड़ाओ' ॥ २६-२७ ॥ अदितिको ऐसी अवस्थामें देखकर आँसुओंसे विनायकका कण्ठ भर आया, वे क्रोधित हो उठे, उन्हें कुछ भी स्मरण नहीं रहा और न वे कुछ विचार ही कर सके, शस्त्र उनके हाथोंसे गिर गये ॥ २८ ॥ वे सोचने लगे कि यह मेरी माता इसके हाथमें कैसे आ गयी ? उस पुत्रके जन्मको धिक्कार है, जिसकी जननी इस प्रकारकी दुरावस्थाको प्राप्त हो ॥ २९ ॥ देवताओंकी जननी होते हुए भी वह कैसे इस दुष्टके चंगुलमें पड़ गयी ? गणनायकको इस प्रकार शोक करते देखकर स्वयं काशिराज भी अत्यन्त शोकाकुल हो उठे और साथ ही नगरमें स्थित लोग भी। तब उस देवान्तकने विनायकदेवकी बहुत प्रकारसे निन्दा की— 'अरे ! तेरे जन्मको धिक्कार है, आज तेरा पौरुष कहाँ गया ? तू प्राण क्यों नहीं त्याग देता ? तू तो निर्लज्ज है, जो इस समय भी संसारमें अपना मुख दिखा रहा है। अरे दुष्ट ! मैं तेरे समक्ष ही इसके शरीरसे इसका सिर काटकर इसे मार डालता हूँ' ॥ ३०-३२ १/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं— देवान्तकके इस प्रकारके निष्ठुर वचनोंको सुनकर [विनायकदेवने] मनमें विचार किया कि यह सत्य ही कह रहा है, अब मुझे प्राणत्यागके लिये क्या करना चाहिये—'विषपान या पाशबन्धन ? अथवा मृत्युकी प्राप्तिके लिये मुझे उदरमें शस्त्राघात कर लेना चाहिये ?' जब वे दुःख और
४३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 शोकसे समन्वित होकर इस प्रकार विचार कर ही रहे | विनायक प्रातःकाल होनेपर युद्धके लिये गये ॥ ३८-३९॥ थे, तभी विनायकने आकाशवाणी सुनी ॥ ३३-३५१/२ ॥ | उस दैत्यने भी [रात्रिकालीन] युद्धकी समाप्तिपर आकाशवाणीने कहा— हे देव! यह जान लो | [उषाकालमें] लाल-लाल आँखोंवाले, मुकुटसे सुशोभित कि यह [अदिति] दुष्टबुद्धि दैत्यद्वारा मायासे रची गयी | और उज्ज्वल कुण्डल धारण किये विनायकको अपने है। अतः संयतचित्त होकर अपने शत्रु का वध करो। तब | सम्मुख देखा ॥ ४० ॥ उस अदितिको मायामयी जानकर वे विनायक सावधान | दाँतोंकी कान्तिसे वे अत्यन्त सुन्दर लग रहे थे, हो गये ॥ ३६-३७ ॥ | मोतियोंकी मालासे विभूषित थे। वे दिव्य वस्त्र धारण किये महाबुद्धिमान् विनायक हर्षित हो गये और दैत्य | हुए थे और अत्यन्त कान्तिमान् थे। उन सर्वव्यापक प्रभुकी देवान्तकको मार डालनेके लिये उद्यत हो गये। उन्होंने | सूँड़ आकाशका स्पर्श कर रही थी। विनायकके [ऐसे] उस वरदानका स्मरण किया, जो भगवान् शंकरने उस | रूपको देखकर देवान्तक भयभीत और अत्यन्त विस्मित दुरात्माको दिया था कि उषाकालके बिना सभी शस्त्रास्त्र | होकर [बोल पड़ा] —अरे! यह आधा मनुष्यका और तुमपर व्यर्थ हो जायँगे। इस प्रकार उसको प्राप्त वरको जानकर | आधा हाथीके जैसे शरीरवाला कौन है? ॥ ४१-४२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'विनायक और देवान्तकके युद्धका वर्णन' नामक उनहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६९ ॥ सत्तरवाँ अध्याय देवान्तक-वध ब्रह्माजी बोले—भयसे भ्रमित बुद्धिवाला वह | लोगोंने इसे [दैवीय] उत्पात माना ॥ ६-७ ॥ देवान्तक जब ऐसा कह रहा था, तभी विनायकदेवने उसे | उस समय युद्ध देख रहे सभी देवताओंके देखते- छोटे बालकके समान उठाकर अपनी गोदमें ले लिया ॥ १ ॥ | देखते दैत्य [देवान्तक]-के शरीरसे निकलकर एक तदनन्तर गणोंके स्वामी विनायकने अपने प्रभावसे | ज्योति विनायकमें प्रवेश कर गयी ॥ ८ ॥ सुन्दर पद्मासनमें बैठकर दैत्यराजसे कहा—'अपने सुन्दर | उसका शरीर तीन योजनके वृक्षसमूहों, पर्वतों और वरदानका स्मरण करो' ॥ २॥ | पौधोंको चूर-चूर करता हुआ भूतलपर गिर पड़ा ॥ ९ ॥ तब वह दैत्य उनके दाँतको दोनों हाथोंसे पकड़कर | उसकी ऐसी गति देखकर उसके सैनिक दसों अपने शरीरको अन्तरिक्षमें बार-बार झुलाने लगा ॥ ३॥ | दिशाओंमें भाग गये। उसके शरीरके गिरनेसे कितने ही तब जैसे ही वह देवान्तक दाँतको तोड़कर भूतलपर | सैनिक मृत्युको प्राप्त हो गये ॥ १० ॥ गिरा, वैसे ही उन सर्वव्यापक देव विनायकने शीघ्रतासे | अपने-अपने स्थानसे आये हुए देवता [विनायकपर] अपने उस दाँतको पकड़ लिया ॥ ४ ॥ | पुष्पवर्षा करने लगे। राजा (काशिराज)-के नगाड़ोंकी उन्होंने उसी दाँतसे देवान्तकके मस्तकपर प्रहार | ध्वनिके साथ देव-दुन्दुभियोंकी भी ध्वनि होने लगी ॥ ११॥ किया और अत्यन्त उच्च स्वरसे गर्जना की, जिससे | दिशाएँ निर्मल हो गयीं और सुखदायक हवा चलने दिशाएँ-विदिशाएँ प्रतिध्वनित हो उठीं ॥ ५ ॥ | लगी, अग्नि तेजयुक्त हो गयी और लोग प्रसन्न हो गये। सम्पूर्ण पृथ्वी और सभी पाताल विचलित हो गये। | प्रतिकूल बह रही नदियाँ सन्मार्गगामिनी हो गयीं। तब इन्द्रादि उस दन्ताघातसे देवान्तकके शरीरके तत्क्षण सैकड़ों | देवताओं और मुनियोंने उनका पूजन किया ॥ १२-१३॥ टुकड़े हो गये। आकाशसे मेघवृष्टिकी भाँति शीघ्र ही | उन्होंने परम भक्तिभावसे देवाधिदेव विनायकका रक्तकी वर्षा होने लगी। पृथ्वीपर निवास करनेवाले सभी | स्तवन किया और कहा—'हे विभो! आपने हमें देवान्तकके
क्री०ख०-अ०७१ ] * काशिराजका अपने सभासदोंसे वार्तालाप * ४३७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 बन्धनसे मुक्त किया। हे देवेश ! आपने उपेन्द्र* (विष्णु)- के समान कार्य किया है, अतः लोकमें आपकी ख्याति 'उपेन्द्र' नामसे होगी' ॥ १४-१५॥ अब हम लोग अपने-अपने पदोंपर भयरहित होकर रहेंगे। स्वाहा, स्वधा और वषट्कार घर-घरमें होंगे ॥ १६॥ ऐसा कहकर उन सबने विनायकदेवको नमस्कारकर उनकी प्रदक्षिणा की और आज्ञा लेकर प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थानोंको वापस लौट आये ॥ १७॥ देवताओं और मुनियोंने उनका 'हृषीकेश' ऐसा नामकरण किया और उन्हें प्रणामकर हर्षित मनसे अपने-अपने आश्रमोंको चले गये ॥ १८ ॥ तदनन्तर सभी राजाओंने विनायकका सम्यक् रूपसे पूजनकर और प्रणामकर उनसे कहा- 'हे देव ! आपने दैत्योंके भारसे पीड़ित पृथ्वीका उद्धार किया, इसलिये आप 'धरणीधर' कहे जायँगे।' ऐसा कहकर वे सब उनकी आज्ञा लेकर अपने-अपने नगरोंको चले गये। तत्पश्चात् काशिराजने विनायकको देखा, वे बालरूप धारण किये थे और सिंहपर आरूढ़ होकर बालकोंके साथ खेल रहे थे ॥ १९-२१ ॥ बालक [-रूपधारी] विनायकने भी उन राजा (काशिराज)-को देखकर परम आदरसे उनका आलिंगन किया। वे दोनों आनन्दसे परिपूर्ण थे और आँखोंसे आँसुओंकी वर्षा कर रहे थे॥ २२॥ तदनन्तर राजाने विनायकदेवसे कहा- 'मेरा महान् भाग्योदय हुआ है, जो कि ब्रह्मादि देवताओंके लिये भी अगम्य सनातन परब्रह्म हैं, उनका मैं नित्य दर्शन कर रहा हूँ। यह मेरे पूर्वजन्मके पुण्योंके फलका उदय है कि जो विश्वके कारणोंके भी कारण हैं, और स्वयं कारणरहित हैं, जो वेदान्तवेद्य, नित्य, ग्रह-नक्षत्रोंके प्रकाशक और स्वयं प्रकाशरूप हैं, जो अनेक रूपवाले और निराकार हैं, पृथ्वीके भारका हरण करनेवाले और मनोहर स्वरूपवाले हैं, वे ही बालरूपसे मेरे घरमें स्वेच्छानुसार खेल रहे हैं'॥ २३-२५१/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं- काशिराजद्वारा की गयी इस प्रकारकी स्तुति सुनकर विघ्नराजने आँसुओंको पोंछकर कहा- 'मैं आपसे क्षणभरके लिये भी कभी दूर नहीं जाऊँगा।' ॥ २६१/२ ॥ तब देवान्तकके वधसे हर्षित राजाने उनका अनेक प्रकारसे उपचारोंसे पूजन किया और अनेक प्रकारके वाद्योंकी ध्वनि तथा वन्दिजनोंद्वारा गायी गयी स्तुतियोंके साथ सैनिकोंसहित बालरूप विनायककी स्तुति करते हुए अपने नगरको गये ॥ २७-२८१/२ ॥ वहाँ सभी लोगोंको अनेक प्रकारके वस्त्र देकर तथा कुछको पान देकर [राजाने] विदा किया। तत्पश्चात् विनायकको आगे करके हर्षित मनसे उन्होंने अपने रमणीय भवनमें प्रवेश किया ॥ २९-३० ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'पुरप्रवेश' नामक सत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७० ॥
इकहत्तरवाँ अध्याय काशिराजका अपने सभासदोंसे वार्तालाप, मगधराजकी कन्याके साथ काशिराजके पुत्रका विवाह, विनायकको साथ लेकर काशिराजका महर्षि कश्यपके आश्रममें गमन, पुरवासियोंका वियोगमें व्यथित होना तथा विनायकद्वारा उन्हें पुनः आनेका आश्वासन देना
ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मन् ! दूसरे दिन जब राजा काशिराज भद्रासनमें बैठे थे, तब उन्होंने अमात्यों, प्रधान वीरों, वृद्धजनों, मित्रों तथा ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हें नमस्कार करके अपने मनकी बात बतलायी ॥ १ १/२ ॥ राजा बोले- मैंने अपने पुत्रके विवाहको सम्पन्न करानेके लिये विनायकको बुलवाया था। उनके यहाँ आनेपर अनेक उत्पात भी उत्पन्न हो गये, जिनका निराकरण उन्होंने कर दिया। विनायककी माता अदितिसे
* भगवान् विष्णु वामनावतारमें इन्द्रके छोटे भाईके रूपमें अदितिसे प्रकट हुए थे, अतः उन्हें 'उपेन्द्र' कहा गया था; वैसे ही विनायक भी अदितिपुत्र और इन्द्रके अनुज हैं, अतः उन्हें भी उपेन्द्र कहते हैं।
४३८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मैंने कहा था कि शीघ्र ही मैं आपके पुत्रको वापस ले | आरूढ़ होकर वाद्योंकी ध्वनिके साथ महर्षि कश्यपजीके आऊँगा, किंतु बहुत-से दिन जल्दी ही बीत गये। अब | श्रेष्ठ आश्रमके लिये प्रस्थान किया ॥ १३-१४ १/२ ॥ सारा लोक स्वस्थ हो गया है, अतः पुत्रके विवाहके | उस समय नगरके सभी लोग अपने-अपने कार्योंको विषयमें आपको विचार करना चाहिये ॥ २-४ ॥ | छोड़कर बाहर निकल आये। उन्होंने भोजन करना, अमात्य बोले— हे महाराज ! आपने ठीक ही कहा | पढ़ना, निद्रा, व्यासंग (नानाविध कर्मोंमें आसक्ति) आदिका है, विघ्नोंके द्वारा विवाह-कार्यमें विलम्ब हो गया है, अब | परित्याग कर दिया और अपनी वेष-भूषाको पहने बिना सब विघ्न दूर हो गये हैं, अतः विवाह-कार्य प्रारम्भ करना | ही वे शीघ्रतासे पुरीसे बाहर निकल आये ॥ १५-१६ ॥ चाहिये। विनायकके कृपा-प्रसादसे सम्पूर्ण जगत् स्वस्थ | उस समय हजारों बालकोंने उन विनायकको जाकर एवं निर्भय हो गया है, अतः अब दूर देशोंमें स्थित | रोक दिया और वे कहने लगे—'आप हमको छोड़कर मित्रजनोंको विवाहकी लग्नपत्रिका भेजनी चाहिये और | क्यों जा रहे हैं, क्यों आप इतने निष्ठुर हो गये हैं ? आपने विवाहकी सभी सामग्री एकत्रित करनेके लिये दूतोंको | किसी बातचीतके प्रसंगमें पहले हमें कभी नहीं बताया था गाँव-गाँवमें नियुक्त कर देना चाहिये ॥ ५-६ १/२ ॥ | कि 'मैं वापस जाऊँगा', हमारे घरमें भोजन किये बिना ब्रह्माजी बोले— मन्त्रियोंद्वारा कही गयी इस | आप अपने आश्रमको क्यों जा रहे हैं?' ॥ १७-१८ ॥ प्रकारकी बातोंको सुनकर सभी लोग तथा सभामें बैठे | किसी बालकने रोते-रोते उनके चरणकमलको हुए सभासद् कहने लगे—आप लोगोंने बहुत अच्छी बात | पकड़ लिया तो किसीने प्रेमपूर्वक उनका आलिंगन करके कही है। यह सुनकर राजाको अत्यन्त हर्ष हुआ। उसी | उनके करकमलोंको पकड़ लिया ॥ १९ ॥ दिन उन्होंने ज्योतिषियोंसे विवाहका लग्न दिन निश्चित | नगरीकी स्त्रियाँ, बालिकाएँ तथा युवावस्थाको करवा लिया ॥ ७-८ ॥ | प्राप्त सभी मुग्धा युवतियाँ अस्त-व्यस्त वेषमें ही उन्हें तदनन्तर राजाने मित्रजनोंको बुलवानेके लिये | देखनेके लिये वैसे ही आ पड़ीं, जैसे कि वर्षार्ऋतुमें मांगलिक दूतोंको भेजा और उचित रीतिसे विश्वस्त | समुद्रकी ओर जानेवाली सभी नदियाँ समुद्रकी ओर दूतोंके द्वारा विवाह-सामग्रीको एकत्रित करवाया। तदनन्तर | प्रवाहित होने लगती हैं, जैसे हंस मोतियोंकी राशिकी मगध देशके राजा भी अपनी पुत्रीको लेकर उस नगरीमें | ओर दौड़ पड़ते हैं, और जैसे मरुद्गण देवराज इन्द्रकी आये और सभी मित्र तथा सम्बन्धी भी नाना दिशाओंसे | ओर चल पड़ते हैं ॥ २०-२१ ॥ वहाँ उपस्थित हुए ॥ ९-१० ॥ | वे स्त्रियाँ अत्यन्त प्रीतिसे समन्वित होकर कहने उन्होंने परस्पर एक-दूसरेको अनेकों उपहार प्रदान | लगीं—'हे विनायक ! आप अकस्मात् स्नेहका परित्यागकर किये। काशिराज तथा मगधके राजाने देवताओंकी स्थापना | क्यों जा रहे हैं? आज आप इतने निष्ठुर कैसे हो गये की और बड़े-बड़े महोत्संवोंका आयोजन किया। उन्होंने | हैं?' ॥ २२ ॥ बड़े ही प्रयत्नपूर्वक विवाहकी समस्त विधियोंका सांगोपांग | ब्रह्माजी बोले—थके हुए, दौड़ते हुए, फिसलते सम्पादन किया और धन आदिके प्रदानके द्वारा ब्राह्मणों | हुए तथा गिरते हुए उन सभी जनोंको देखकर राजासहित तथा अन्य लोगोंको सन्तुष्ट किया ॥ ११-१२ ॥ | विनायक रथसे उतर पड़े ॥ २३ ॥ तदनन्तर काशिराजने सभी मित्रगणोंको विदा करके | राजाके साथ नगरसे शीघ्र ही बाहर आये वे उबटनका अनुलेपन एवं स्नान कराकर विविध प्रकारके | विनायक एक मुहूर्त वहीं ठहरकर उन सभीसे बोले— श्रेष्ठ आभूषणों तथा वस्त्रोंसे विनायकको सुसज्जित किया | 'इस समय मैं आप सबसे प्रार्थना करता हूँ कि मेरे ऊपर और अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ उन्हें भोजन कराया। | कृपा करना न छोड़ें, आप लोगोंके घर आकर वहाँ जो इसके पश्चात् नृपश्रेष्ठ काशिराजने विनायकके साथ रथमें | अपराध मुझसे हुए हैं, उन्हें आप क्षमा कर दें। यदि आप
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क्री०ख०-अ०७२ ] * विनायकका पिता कश्यपके आश्रममें आगमन * ४३९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ - ऊपरी भाग] लोगोंका पुनः दर्शन होगा, तो आप मुझे पहचाननेमें भूल न करें।' उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर शोकमें निमग्न समस्त पुरवासियोंके शरीरमें रोमांच हो आया और वे गद्गद वाणीमें कहने लगे ॥ २४-२६१/२ ॥ लोग बोले—'आप समस्त जगत्के पिता हैं, सबपर दया दिखानेवाले हैं, किंतु हमपर आपकी कुछ भी ममता नहीं है। बालक कितने भी अपराध करनेवाले क्यों न हों, पिता कभी भी उनका परित्याग नहीं करते। चन्द्रमा कभी उष्ण नहीं होता और सुवर्ण कभी नीला नहीं हो जाता, फिर क्यों आप इतने निष्ठुर हो गये हैं और क्यों जानेके लिये इतनी उतावली कर रहे हैं? यदि पहले आप यहाँ आये ही नहीं होते तो आज हमें जो विरहजन्य शोक हो रहा है, वह नहीं होता ॥ २७-२९ ॥ हम सभीके मनको चुराकर आप चले क्यों जा रहे हैं, हमारे मनको [आपके द्वारा] ले लिये जानेपर हम सब मनके बिना कैसे कार्य करेंगे? जलके विनष्ट हो जानेपर जलचर जीव कैसे जीयेंगे, यह आप हमें बताइये, प्राण चले जानेपर हमारे शरीरका क्या प्रयोजन है? यदि ईखसे विष निकलने लगे तो फिर उसका क्या प्रतिकार है? इसलिये आप हम किंकरोंको भी अपने साथ वहीं ले चलें, जहाँ आप जा रहे हैं' ॥ ३०-३२ ॥ उनके वचनोंको सुनकर वे विनायक अपने नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाते हुए उन सभी स्त्रियों, वृद्धों एवं बालकोंसे गद्गद वाणीमें बोले— ॥ ३३ ॥
[दायाँ स्तम्भ - ऊपरी भाग] **विनायकदेव बोले—**आपको कभी भी दुखी नहीं होना चाहिये। आपलोगोंको मेरा वियोग कभी नहीं होगा; क्योंकि मैं सबकी अन्तर्आत्मामें निवास करनेवाला हूँ, विनाशरहित हूँ और आनन्दस्वरूप हूँ। मुझ निराकारका केवल चिन्तनमात्र करनेसे आपके मनका समाधान नहीं होगा, अतः आप लोग अपने-अपने घरमें मेरी मिट्टीकी मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करें। हे सज्जनो! आप लोग जब संकटमें पड़ें, तब आप मेरा स्मरण करें, मैं आप लोगोंको प्रत्यक्ष दर्शन दूँगा और आप लोगोंके संकटका विनाश करूँगा ॥ ३४-३६ ॥ **ब्रह्माजी बोले—**उनका वचन सुनकर सभी नगरनिवासी अत्यन्त आनन्दित हो गये। उन्होंने देव विनायकको प्रणाम किया, उनकी प्रदक्षिणा करके जय- जयकार करते हुए उनकी स्तुति करने लगे ॥ ३७ ॥ तदनन्तर उनकी आज्ञा प्राप्तकर सभी पुरवासी जन अपने-अपने घरोंको चले गये, देव विनायक भी माताके दर्शनकी लालसासे शीघ्र ही रथपर आरूढ़ होकर काशिराजके साथ आगे चल पड़े ॥ ३८१/२ ॥ विनायकने मुँह घुमाकर पीछे नगरनिवासी बालकोंकी ओर देखा, वे रो रहे थे। उनसे विनायकने कहा—'मैं पुनः आऊँगा, तुम लोग जाओ, तुम्हें कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिये। मैं सत्य बोल रहा हूँ, कभी भी मैं झूठ नहीं बोलता।' इस प्रकार समझा-बुझाकर उन्हें लौटाकर वे क्षणभरमें ही अपने आश्रममें जा पहुँचे ॥ ३९-४० ॥
[अध्याय समाप्ति पुष्पिका] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विनायकका आश्रमकी ओर प्रस्थान' नामक इकहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७१ ॥
बहत्तरवाँ अध्याय विनायकका पिता कश्यपके आश्रममें आगमन, काशिराजद्वारा विनायककी महिमाका कथन, काशिराजका काशीमें प्रत्यागमन तथा ढुण्ढिविनायककी स्थापना, माता अदिति तथा पिता कश्यपको आश्वासन देकर विनायकका निजलोकगमन
[बायाँ स्तम्भ - निचला भाग] **ब्रह्माजी बोले—**काशिराजके दूतने विनायककी माता देवी अदितिसे यह पहले ही बता दिया था कि वे विनायक काशिराजके साथ रथमें बैठकर यहाँ आ रहे हैं। तदनन्तर वियोगसे व्यथित हुई वे अदिति शीघ्र ही
[दायाँ स्तम्भ - निचला भाग] दौड़ती हुई आगेको गयीं। उत्सुकतावश शीघ्रतामें दौड़ते हुए वे यह भी नहीं जान पायीं कि उनका उत्तरीय वस्त्र गिर पड़ा है ॥ १-२ ॥ माताको देखकर मुनि कश्यपके पुत्र वे विनायक
४४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
शीघ्र ही रथसे उतर पड़े और माताके समीप चले आये, माताने अत्यन्त प्रसन्नताके साथ उनका आलिंगन किया॥ ३॥ देवी अदितिके आनन्दाश्रु निकल पड़े। बहुत समय बाद आनेके कारण विनायक भी आँसू बहाने लगे। मुहूर्तभरके लिये वे दोनों उसी प्रकार एकीभावको प्राप्त हो गये, जैसे जलमें जल मिलकर एक हो जाता है॥ ४॥ तदनन्तर स्नेहसे स्वच्छचित्त हुई माता अदितिने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें स्तनपान कराया। उनके आँसू पोंछकर वे बोलीं—'तुम बहुत दिनोंसे थके हुए हो।' तदनन्तर काशिराजने अदितिको प्रणाम किया और वे गद्गद वाणीमें कहने लगे॥ ५॥ राजा बोले—देव विनायकको [मेरे साथ] यहाँसे गये हुए बहुत दिन व्यतीत हो चुके हैं, इसके निमित्त हे मातः! आप मुझपर क्रोध न करें। हे कश्यपप्रिया! मैं इन विनायकका वियोग सहन करनेमें समर्थ नहीं हूँ॥ ६-७॥ अमृतसे कभी तृप्ति नहीं होती और खजानेके प्रति कोई उदासीन नहीं होता। ये विनायक हमारे घरमें दिन- प्रतिदिन नित्य नया-नया प्रेम बढ़ाते रहे हैं॥ ८॥ हमारे नगरमें होनेवाले बहुत-से उत्पातोंका इन्होंने निवारण कर दिया है। असंख्य दैत्योंका वध कर डाला है। इससे देवताओंको भी अत्यन्त प्रसन्नता प्राप्त हुई। इन्होंने महान् यश अर्जित किया है और धर्मसेतुकी स्थापना की है। इन्होंने इस प्रकारका पौरुष दिखलाया है, जैसा कि इन्द्र आदि देवता भी नहीं दिखला पाये॥ ९-१०॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार काशिराजने सारा वृत्तान्त उन्हें बतलाया। तदनन्तर माता अदितिने दुष्ट जनोंकी दृष्टि (नजर) लगनेसे होनेवाले उत्पातकी शान्तिके लिये बालक विनायकके सिरके ऊपर दही और अन्न (सरसों आदि)-को घुमाकर घरके बाहर फेंका। तदनन्तर वे बालक विनायकको काशिराजसहित अपने आश्रममण्डलमें ले गयीं॥ ११-१२॥ अपने पुत्र विनायकको काशिराजके साथ आया देखकर मुनि कश्यप बाहर चले आये, उन दोनोंने हाथ जोड़कर भक्तिपूर्वक मुनिको प्रणाम किया॥ १३॥ तदनन्तर मुनि कश्यपने उन दोनोंका आलिंगन किया
और पुत्र विनायकके सिरको सूँघकर तथा उसे गोदमें बैठाकर रुँधे हुए कण्ठसे वे कहने लगे—हे काशिराज! आपने बालकको ले जाकर वापस लानेमें विलम्ब किया, यह ठीक नहीं किया। आप 'शीघ्र ही वापस ले आऊँगा' कहकर, इसे क्यों ले गये थे? हे राजन्! इसके वियोगमें संतप्त मेरे अंगोंको बड़े ही पुण्यसे अभी इसका दर्शनकर शीतलता प्राप्त हो रही है॥ १४-१६॥ ब्रह्माजी बोले—तब काशिराजने मुनि कश्यपके वचनामृतका पान करके तथा उनकी आज्ञा प्राप्तकर सुन्दर आसनपर बैठकर कहना प्रारम्भ किया॥ १७॥ राजा बोले—हे मुनीश्वर! इन विनायककी ही माया अर्थात् सामर्थ्यके कारण मुझे [स्व-स्वरूपकी] सत्यताका बोध हुआ। इन देवदेवने मेरे घरको निश्चित रूपसे अपना घर बना लिया। हे मुने! ये विनायकदेव सम्पूर्ण कामनाओंसे परिपूर्ण हैं और ये अपनी इच्छाओंके वशीभूत हैं अर्थात् नित्य स्वतन्त्र हैं। मेरे पुत्रका विवाह सम्पादित कराकर ये यहाँ आये हैं॥ १८-१९॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर काशिराजने उन विनायकद्वारा किये गये दैत्योंके वध आदि समस्त कर्मोंको उन्हें बतलाया। यह सुनकर वे मुनि कश्यप तथा उनकी पत्नी देवी अदिति अपने पुत्र विनायकका पराक्रम तथा उनके बहुतसे गुणोंके विषयमें जानकर बहुत प्रसन्न हुए। इसके पश्चात् उन सभीने बड़े ही आदरपूर्वक छः रसोंसे सम्पन्न व्यंजनोंका भोजन किया॥ २०-२१॥ इसके बाद मुनि कश्यपने उन काशिराजको आशीर्वाद प्रदानकर उन्हें विदा किया। राजाने भी उन सभीको प्रणाम किया और उनकी प्रदक्षिणा करते हुए उनकी अनुमति प्राप्तकर दोनों नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए बड़े दुखी मनसे उन्होंने वहाँसे प्रस्थान किया॥ २२१/२॥ उन विनायकके गुणगणोंका स्मरण करते हुए स्नेहसे परिपूर्ण काशिराजने वाद्योंकी ध्वनिके साथ शीघ्र ही नगरमें प्रवेश किया। विनायकदेवको देखनेकी इच्छावाले नगरके सभी लोग तथा बालक वहाँ आये, किंतु उन्होंने वहाँ उन्हें नहीं देखा, तो वे अत्यन्त दुखी मनवाले हो गये। वे उन काशिराजको अकेला देखकर अपने-अपने
क्री०ख०-अ०७२ ]
* विनायकका पिता कश्यपके आश्रममें आगमन *
४४१
[बायाँ स्तम्भ]
घरोंको चले गये ॥ २३-२५ ॥ दूसरे दिन सभी नागरिकोंने राजासे अत्यन्त प्रीतिपूर्वक पूछा—'हे राजन्! उन विनायकदेवने 'पुनः आऊँगा'— ऐसा कहा था, तो फिर वे क्यों नहीं आये? आप भी बड़े ही निष्ठुर बनकर उन्हें छोड़कर यहाँ कैसे चले आये' ॥ २६१/२ ॥ राजा बोले—मेरे द्वारा बार-बार प्रार्थना किये जानेपर मुनि कश्यपके पुत्र वे विनायक मुझसे कहने लगे—'आप सभी लोग मेरी मूर्तिकी प्रतिष्ठापूर्वक स्थापना करके उसकी सेवा-पूजा करें। सबके हृदयमें स्थित रहनेवाले मुझे अन्तर्यामीका आप लोगोंसे वियोग किसी प्रकार भी नहीं हो सकता' ॥ २७-२८ ॥ तदनन्तर नगरवासियोंने विनायककी धातुनिर्मित अत्यन्त शुभ मूर्तिका निर्माण करवाया। वह प्रतिमा चार भुजावाली थी। उसके तीन नेत्र थे। वह सभी प्रकारके आभूषणोंसे सुसज्जित थी। उसके कान शूर्पके समान थे। मुख हाथीके समान था। उसके शरीरके सभी अंग अत्यन्त मनोहर थे। पुरवासियोंने उसका 'ढुण्डिराज' यह नाम रखा और बड़े ही आदरभावसे ऋत्विजों, ब्राह्मणों तथा अन्य वेदशास्त्रमें पारंगत विद्वानोंद्वारा उसकी स्थापना करवायी ॥ २९-३०१/२ ॥ उन्होंने एक उत्तम मन्दिर बनवाया और उसमें उन विनायककी प्रतिदिन वे पूजा करने लगे ॥ ३१ ॥ जिस-जिसके द्वारा भी जिस-जिस कामनासे विनायककी पूजा की जाती, भक्तिपूर्वक पूजित हुए वे प्रभु विनायक उस-उस व्यक्तिकी उन-उन कामनाओंको उन्हें प्रदान करते ॥ ३२ ॥ इस प्रकार विविध स्वरूपोंको धारण करनेवाले वे विनायक वहाँ सुशोभित हुए। जब सभी देवताओंके साथ भगवान् विश्वनाथ अपनी नगरी काशीपुरीमें चले आये और काशिराज दिवोदास अविमुक्तक्षेत्रमें सुखपूर्वक निवास करने लगे, तब वे विनायक अपने पिता मुनि कश्यप तथा माता अदितिसे कहने लगे ॥ ३३-३४ ॥
[दायाँ स्तम्भ]
प्राचीन कालमें तपस्याके द्वारा आराधित होनेपर मैं आपके पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुआ था। मैंने पृथ्वीके भारको भलीभाँति दूर कर दिया है तथा तीनों लोकोंको पीड़ित करनेवाले महाबली दुष्ट दैत्यों देवान्तक तथा नरान्तकका वध कर डाला है। मैंने देवताओं तथा साधु- सन्तोंकी रक्षा की है और देवताओंको उनके पदोंपर स्थापित कर दिया है, अब इस समय मैं अपने शाश्वत लोकको जाऊँगा ॥ ३५-३६१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—विनायकके ऐसे वचनोंको सुनकर अदिति तथा कश्यपको बड़ा दुःख हुआ। वे गद्गद कण्ठसे उनसे कहने लगे—'हे देव! हम दोनोंको पुनः आपका दर्शन कब प्राप्त होगा?' तब वे माता अदितिसे बोले—'हे मातः! भवानीके मन्दिरमें शीघ्र ही मेरा दर्शन आपको होगा। यह मेरा सत्य एवं प्रिय वचन है' ॥ ३७-३८१/२ ॥ विनायककी यह बात सुनकर जबतक वे कुछ बोलतीं, उससे पहले ही वे अन्तर्धान हो गये। तब वे दोनों खिन्न मनवाले हो गये। भक्तिपरायण उन्होंने एक अत्यन्त सुन्दर मन्दिर बनवाया और एक मूर्ति बनवायी। उस मूर्तिका 'विनायक' यह नाम रखा। उस मूर्तिका ध्यान करनेमात्रसे वे सर्वव्यापक एवं विविध रूपधारी विनायक प्रभु नित्य ही साक्षात् दर्शन देते हैं ॥ ३९-४११/२ ॥ इस प्रकारसे मैंने भगवान् विनायकका अत्यन्त मंगलकारी चरित्र आपको बतलाया। यह आख्यान सुननेमात्रसे सब प्रकारकी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला है। कृतार्थ करनेवाला है। यश प्रदान करनेवाला है। आयुष्य प्रदान करनेवाला और सभी प्रकारके उपद्रवोंको विनष्ट करनेवाला है। यह सभी प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला और सभी प्रकारके संचित पापोंका नाश करनेवाला है ॥ ४२-४३१/२ ॥ अब मैं आपको सिन्धु दैत्यके वधके लिये शिवके घरमें मयूरेश्वर नामसे अवतरित हुए देव विनायकके विषयमें बतलाऊँगा। जिन्होंने कि बाल्यकालसे ही अत्यन्त अद्भुत नाना कर्मोंको किया था ॥ ४४-४५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विनायकके चरित्रोंका वर्णन' नामक बहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७२ ॥
तिहत्तरवाँ अध्याय
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४४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तिहत्तरवाँ अध्याय गण्डकीनगराधिपति राजा चक्रपाणिका आख्यान, निःसंतान राजाको महर्षि शौनकद्वारा पुत्रप्राप्तिके लिये सौरव्रतके अनुष्ठानका उपदेश करना, राजा-रानीद्वारा सम्यग् रूपसे सौरव्रतके नियमोंका पालन, भगवान् सूर्यद्वारा स्वप्नमें रानीको पुत्रकी प्राप्ति, रानीद्वारा गर्भके तापको सहन न कर सकनेके कारण समुद्रमें उसका त्याग व्यासजी बोले- हे ब्रह्मन् ! हे पितः ! भगवान् शिवके घरमें विनायकदेव मयूरेश्वर नामसे कैसे अवतीर्ण हुए? उनके अवतीर्ण होनेका प्रयोजन क्या था और उन्होंने कौन-कौन-सी लीलाएँ कीं? उन विनायकका 'मयूरेश्वर' यह नाम क्यों पड़ा? यह सब आप मुझे बतलाइये। सुननेपर भी मुझे कभी तृप्ति प्राप्त नहीं हो रही है॥ १-२॥ ब्रह्माजी बोले- प्राचीन कालमें त्रेतायुगकी बात है, सिन्धु नामक एक महान् दैत्य उत्पन्न हुआ था। उसे भगवान् शिवके घरमें अवतरित हुए उन बलिष्ठ विनायकने मारा था। इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जो शौनक मुनि तथा राजा चक्रपाणिके मध्य हुए संवादके रूपमें है॥ ३-४॥ मैथिलदेशके गण्डकी नामक शुभ नगरमें एक राजा हुए थे, जो चक्रपाणि इस नामसे विख्यात थे और साक्षात् दूसरे विष्णुभगवान्के समान ही थे॥ ५॥ इनके सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन करनेमें शेषनाग भी समर्थ नहीं हैं। उन्होंने अपने तेजके द्वारा भगवान् सूर्यको भी निस्तेज बना दिया था तथा अपने लावण्यके द्वारा कामदेवको भी तुच्छ बना दिया था। अपनी बुद्धिके द्वारा बृहस्पतिको भी जीत लिया था और अपने बल एवं पराक्रमके द्वारा कार्तिकेयको भी पराजित कर दिया था। इन्होंने इस सम्पूर्ण पृथ्वीको क्षणभरमें अपने अधीन कर लिया था। सभी राजा इनकी सेवामें उपस्थित रहते थे॥ ६-७१/२॥ इस पृथ्वीमें विद्यमान, विजयकी इच्छा रखनेवाले उनके अश्वारोहियों, गजारोहियों, पैदल सैनिकों तथा रथारोही सैनिकोंकी गणना नहीं की जा सकती थी। उनके भवनमें साक्षात् लक्ष्मी स्थित होकर दर्शन देती थीं ॥ ८-९ ॥ उन नरेशका भद्र (राजसिंहासन) रत्न, सुवर्ण तथा मोतियोंके द्वारा दिशाओंको उद्भासित करनेवाला और लोकका कल्याण करनेवाला था एवं [उस राजसिंहासनसे समन्वित वहाँका सभाभवन] अलकापुरीके समान [शोभामय] था॥ १०॥ उन राजाके दो महाबुद्धिमान् अमात्य थे, एकका नाम था साम्ब तथा दूसरेका नाम था सुबोधन। वे अपने स्वामीकी सेवा किया करते थे और उनके कार्यकी सिद्धिके लिये अपने प्राणोंको तृणके समान समझते थे। उस राजाकी उग्रा नामवाली एक रानी थी, जो अत्यन्त रमणीय तथा सुन्दर मुसकानवाली थी। उसके मुखचन्द्रकी कान्तिसे दिनमें ही कुमुद खिल उठते थे ॥ ११-१२॥ वह धारण किये हुए अपने अनेक आभूषणोंकी दीप्तिसे समस्त तमोराशिको विनष्ट कर देती थी। उसके पातिव्रत्यके अनुकरणीय गुणोंको देखनेके लिये सभी पतिव्रता स्त्रियाँ उसके समीप आती थीं ॥ १३ ॥ इस प्रकारके अत्यन्त बुद्धिमान् वे राजा चक्रपाणि सबके लिये मान्य तथा सर्वदा भगवान् विष्णुकी भक्तिमें परायण रहते थे। पुराणोंके कथाश्रवणमें उनका अत्यन्त अनुराग था और वे धर्मशास्त्रपरायण थे ॥ १४ ॥ सन्तानसे रहित होनेके कारण वे रात-दिन अत्यन्त दुखी रहते थे। यद्यपि उन्होंने सन्तानकी प्राप्ति तथा उसके जीवित रहनेके लिये अनेक व्रतोंका पालन किया, विविध दान दिये और बहुतसे यज्ञोंका अनुष्ठान किया, किंतु उनके जो-जो सन्तति होती, वह तत्क्षण ही मृत्युको प्राप्त हो जाती थी ॥ १५१/२॥ तदुपरान्त एक दिनकी बात है, राजा अपनी राज्यसम्पदासे जब अत्यन्त विरक्त हो गये तो उन्होंने अपनी भार्यासहित दोनों साम्ब तथा सुबोधन नामक
क्री०ख०-अ०७३ ] * गण्डकीनगराधिपति राजा चक्रपाणिका आख्यान * ४४३
अमात्यों और पुरवासियोंको बुलाया तथा उन सबसे कहा—'इस समय मैं अब अपने दण्ड (सैन्यदल), राजकोश तथा राज्यका परित्याग कर रहा हूँ। पुत्रसे हीन होनेसे स्वर्गसे हीन हुए मेरा अब राज्यसे क्या प्रयोजन ? पुत्रप्राप्तिके लिये मैंने जो-जो भी कर्म किये थे, यदि वे कर्म ईश्वरार्पणबुद्धिसे किये होते, तो हम दोनोंको मोक्ष भी प्राप्त होता और पूर्वजन्मोंमें किये कर्मोंके बन्धन भी विनष्ट हो जाते ॥ १६—१९॥
हे जनो ! मेरा जीवन व्यर्थ ही चला गया। अब मैं इसी समय [राज्यसम्बन्धी] सभी दायित्व मन्त्रियोंको सौंपकर प्रसन्नतापूर्वक वन जाऊँगा। आप लोग भी उन मन्त्रियोंकी आज्ञाका पालन करें ॥ २० ॥
हे सज्जनो ! मैं अपने आत्मकल्याणकी दृष्टिसे तपस्या करनेके लिये वनमें जाऊँगा। यदि मुझे अपने अभीष्टकी प्राप्ति हो जाती है, तो पुनः मैं अपनी नगरीमें चला आऊँगा। हे लोगो ! इस समय अब आप लोग मुझे निश्चित ही आज्ञा प्रदान करें' ॥ २११/२ ॥
राजाके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर सभी दुखी मनवाले हो गये। आँसुओंकी धारा बहाते हुए वे लोग उन नृपश्रेष्ठसे बोले— ॥ २२१/२ ॥
पुरवासीजन बोले— हे प्रभो ! आप ही हमारी माता हैं और आप ही पिता भी हैं। फिर आज ऐसी निष्ठुरता क्यों दिखा रहे हैं ? बिना अपराधके आप हमारा परित्याग क्यों कर रहे हैं ? आपके बिना हमारा जीवन वैसे ही व्यर्थ है, जैसे कि माताके बिना शिशुका जन्म व्यर्थ होता है। हे प्रभो ! आप जहाँ जा रहे हैं, हम सब भी वहीं चलेंगे ॥ २३-२४॥
ब्रह्माजी बोले— इस प्रकारसे जब नगरनिवासी लोग राजासे वार्तालाप कर ही रहे थे कि उसी समय मुनिश्रेष्ठ शौनकजी वहाँ आ पहुँचे। वे साक्षात् दूसरी अग्निके समान थे ॥ २५ ॥
वे सभी वेदों, शिक्षा-कल्प आदि वेदांगों एवं सभी शास्त्रोंके प्रवक्ता, तीनों लोकोंमें विख्यात, देवराज इन्द्र आदि सभी देवताओंद्वारा वन्दनीय तथा भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंके ज्ञाता थे ॥ २६॥
उनको अपने समक्ष देखकर राजा अपने आसनसे उठ खड़े हुए और उन्होंने उन्हें प्रणाम किया। राजाने अपने राजसिंहासनपर उन्हें बैठाया और परम प्रसन्नताके साथ उनकी पूजा की ॥ २७ ॥
भोजन ग्रहण कर चुके हुए तथा संवाहन (दबाने) आदिके द्वारा पैरोंकी सेवा हो जानेपर विश्रामको प्राप्त हुए उन मुनिश्रेष्ठ शौनकजीसे राजा चक्रपाणिने कहा— 'मेरा कौन-सा पुण्य फलीभूत हुआ है, जो आज मुझे आपका वह दर्शन प्राप्त हुआ है, जो सभी पापोंका हरण करनेवाला, अत्यन्त मंगलदायक, मनुष्योंकी सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला तथा पापीजनोंके लिये सर्वथा दुर्लभ है ?' ॥ २८-२९ ॥
तदनन्तर मुनि शौनक नृपश्रेष्ठ चक्रपाणिसे बोले— मैं आपकी परम भक्ति, सेवा-शुश्रूषा तथा आत्मसंयमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ ॥ ३० ॥
शौनक बोले— हे राजेन्द्र ! आप कोई चिन्ता न करें और न राज्यका ही परित्याग करें। आपको मेरे वचनके अनुसार निश्चित ही पुत्रकी प्राप्ति होगी, इसमें कोई संशय नहीं है। मैंने आजतक कभी भी परिहासतकमें मिथ्या वाणी नहीं बोली ॥ ३११/२ ॥
ब्रह्माजी बोले— मुनिका यह वचन सुनकर राजश्रेष्ठ चक्रपाणि अत्यन्त प्रसन्न हो उठे। उन्होंने उन्हें रत्नों तथा सुवर्णसे बने हुए अनेकों आभूषण और अत्यन्त मूल्यवान् वस्त्रोंको समर्पित किया, किंतु मुनि शौनकने कुछ भी ग्रहण नहीं किया ॥ ३२-३३॥
तदनन्तर वे मुनि शौनक राजासे बोले— हम लोग वल्कल वस्त्रोंको धारण करनेवाले हैं। सभी प्रकारके सुख-भोगोंमें किसी भी प्रकारकी आसक्ति नहीं रखते। सभी प्राणियोंके कल्याणमें निरत रहते हैं। सृष्टि तथा संहार करनेमें समर्थ हैं। दयाके सागर हैं। साधुपुरुषोंके दर्शनकी अभिलाषा करते रहते हैं। मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा सुवर्णमें समान दृष्टि रखनेवाले हैं। विद्वानोंके पास लक्ष्मी कभी भी नहीं रहती। इसी कारण मैं आपके द्वारा प्रदत्त इस सुवर्ण तथा सुन्दर वस्त्रको ग्रहण नहीं करूँगा ॥ ३४-३६॥
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४४४ [थ्रीगणेशपुराण- [५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५५ तीर्थयात्राके प्रसंगमें मैं आपके पास आया था। आपके दर्शन किये हुए मेरे बहुत दिन व्यतीत हो गये थे ॥ ३७ ॥ ब्रह्माजी बोले-तदनन्तर पुनः उन दम्पती-राजा तथा रानीने भलीभाँति उन मुनि शौनकको प्रणाम किया और सन्तानकी प्राप्तिके विषयमें समर्थ उपाय पूछा ॥ ३८॥ तब शौनकमुनिने सभी प्रकारके व्रत, तप, यज्ञ तथा दानोंको वृथा जानकर उनसे उस सौर व्रतको करनेके लिये कहा, जो मनुष्योंको सब प्रकारके पदार्थोंको प्रदान करनेवाला, अनेकों जन्मोंके संचित पापोंका शमन करनेवाला तथा पुत्र एवं पौत्रको देनेवाला है ॥ ३९१/२॥ शौनकमुनि बोले-सूर्यसप्तमीसे आरम्भ करके एक मासतक यह व्रत करना चाहिये। [उसमें सर्वप्रथम] मातृकापूजन करके आभ्युदयिक श्राद्ध करना चाहिये। गणेशजीका पूजन करके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराना चाहिये ॥ ४०-४१ ॥ सुवर्णकलशके ऊपर सुवर्णका सूर्यमण्डल बनाकर स्थापित करे और भक्तिभावसे समन्वित होकर षोडश उपचारोंद्वारा उसका पूजन करे ॥ ४२ ॥ लाल चन्दनमिश्रित तण्डुलों, लाल रंगके फूलों, विविध प्रकारके रक्त वर्णके रत्नों तथा अनेक प्रकारके फलों, बारह अर्घों, नमस्कारों तथा प्रदक्षिणाओं, स्तुतियों एवं प्रार्थनाओंके द्वारा परमेश्वर सूर्यनारायणकी प्रार्थना करे॥ ४३-४४॥ तदनन्तर भगवान् सूर्यको स्वयं एक लाख बार प्रणाम करे अथवा [ब्राह्मणोंद्वारा] करवाये। परम प्रसन्नताके साथ प्रतिदिन एक लाखकी संख्यामें ब्राह्मणोंको भोजन कराये। वेदज्ञ कुटुम्बी ब्राह्मणको प्रतिदिन एक गौका दान करे। हे नृपश्रेष्ठ ! व्रतके समापनपर्यन्त सपत्नीक ब्रह्मचर्यका पालन करे ॥ ४५-४६॥ दयाभावसे युक्त होकर दीनों, अन्धों तथा निर्धनोंको अन्न प्रदान करे। मासके अन्तमें सभी सामग्रियोंको ब्राह्मणको निवेदित कर दे॥ ४७ ॥ हे राजन् ! इस प्रकार सौरव्रतका अनुष्ठान करनेसे मेरी कृपासे आपको पुत्रकी प्राप्ति होगी, वह महान् यशस्वी, सूर्यकी भक्तिसे समन्वित तथा पुण्यात्मा होगा ॥ ४८ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार सौर व्रतके विधि- विधानका उपदेश देकर मुनि शौनक अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर राजाने उस व्रतको उसी प्रकार किया, जिस प्रकारका कि उन्हें उपदेश प्राप्त हुआ था ॥ ४९ ॥ अपनी पत्नीके साथ विनीतात्मा राजाने सूर्यभक्तिपरायण होकर वह व्रत किया और प्रतिदिन एक लाख ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार भोजन कराया ॥ ५० ॥ इस प्रकार पत्नीके साथ उपवास करते हुए राजाको एक मासका समय व्यतीत हो गया। राजाने प्रतिदिन गोदान किया और भगवान् सूर्यको एक लाख नमस्कार किया तथा ब्राह्मणोंसे भी करवाया ॥ ५१ ॥ वे प्रतिदिन भगवान् सूर्यके मन्त्रका जप करते थे और सदा ही उनके नामका जप किया करते थे। तदनन्तर एक दिनकी बात है, उनकी रानीने रात्रिमें स्वप्नमें भगवान् सूर्यको अपने पतिके सुन्दर रूपमें देखा। कामदेवके समान उनका मनोरम रूप देखकर रानीने उनके साथ रमणकी अभिलाषा की ॥ ५२-५३॥ संतप्त अंगोंवाली वे उनसे बोलीं- 'इस समय काम मुझे अत्यन्त पीड़ित कर रहा है, मैं शरीरमें विद्यमान ऋतुकालीन अग्निसे दग्ध हो रही हूँ ॥ ५४ ॥ हे स्वामिन् ! अतः मुझे सहवास प्रदान करें, अन्यथा मेरी मृत्यु निश्चित है।' तब उसके पति राजा चक्रपाणिको सन्तानोत्पादनकी शक्तिसे विहीन और रानीको सकाम जानकर उसके पतिके स्वरूपको धारण किये हुए भगवान् सवितादेवने उसे ऋतुदान किया। इसके अनन्तर जब रानी निद्रासे जागी तो उसने अपने पतिको जगाया और उनसे बोली - ॥ ५५-५६ ॥ 'हे स्वामिन् ! आपने ब्रह्मचर्य नियम-पालनमें स्थित रहते हुए भी मेरे साथ सहवास क्यों किया ?' तब राजा उनसे बोले- 'हे शुभे ! मेरा मन तो व्रतके नियमोंमें लगा हुआ है, मैं निरन्तर उपवासमें रहनेके कारण क्षीण शक्तिवाला हो गया हूँ और मैं भगवान् सूर्यकी भक्तिमें परायण हूँ। मैंने तुम्हारे साथ रमण नहीं किया' ॥ ५७१/२ ॥ तदनन्तर पतिव्रता रानी पुनः उनसे बोली- मैं तो आपके अतिरिक्त और किसी पुरुषको किसी प्रकार भी नहीं जानती हूँ। मैं आपके ही स्वरूपमें भगवान्