श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
यथार्थ स्वरूपका वर्णन करनेमें अन्य कौन दूसरा समर्थ
क्री०ख०-अ०१७] * काशिराज तथा भृशुण्डीको विनायकके यथार्थ स्वरूपका दर्शन * ३०९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] यथार्थ स्वरूपका वर्णन करनेमें अन्य कौन दूसरा समर्थ हो सकता है? हे मुने! इस समय वे महर्षि कश्यपजीके घरमें अवतीर्ण हुए हैं॥ ३७-३८॥ वे ‘विनायक’ इस नामसे तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध हैं। उन सात वर्षके अद्भुत स्वरूपवाले बालक विनायकने महान् अद्भुत कर्म किये हैं। जिन कर्मोंको करनेमें साक्षात् जगदीश्वर भी समर्थ नहीं हैं, उन कर्मोंको उन्होंने किया है॥ ३९-४०॥ मेरे घरमें वे जिस स्वरूपसे निवास कर रहे हैं, उस स्वरूपको मैं आपको बताऊँगा। वे देवाधिदेव इस समय मेरे यहाँ ब्रह्मचारीके रूपमें स्थित हैं॥ ४१॥ जिस समय उन्होंने महर्षि कश्यपके घरमें अवतार धारण किया था, उस समय उनकी कान्ति अत्यन्त दिव्य थी। वे चार भुजाओंवाले थे, दिव्य माला तथा वस्त्रोंको उन्होंने धारण कर रखा था, दिव्य अलंकारोंसे विभूषित थे। उन्होंने दिव्य आयुध धारण कर रखा था, वे अत्यन्त बुद्धिमान् थे, दिव्य सुगन्धित द्रव्योंका अनुलेपन उनके अंगोंमें अनुलेपित था। तदनन्तर महर्षि कश्यपके द्वारा प्रार्थना किये जानेपर उन्होंने तत्क्षण ही सामान्य शिशुका रूप धारण कर लिया था॥ ४२-४३॥ मुनि भृशुण्डी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! जिन परमेश्वरका मैं ध्यान करता हूँ और जिनकी कृपासे देवताओं तथा ऋषियोंके लिये भी दुर्लभ ये मेरी सूँड निकली है, वे आपके द्वारा बताये गये स्वरूपवाले नहीं हैं, वे मेरे देव
[दायाँ स्तम्भ] यदि मुझे बुलायेंगे तो मैं जहाँ-कहीं भी चला जाऊँगा॥ ४४ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—मुनि भृशुण्डीके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर राजा अत्यन्त चिन्ताग्रस्त हो गये और बोले—इस समय मेरे सौभाग्यके साथ ही महान् दुर्भाग्यका भी उदय हो गया है। आपसे आशा लगाकर मैं महाभयंकर पर्वतों और वनोंको पार करके यहाँ आया हूँ और आपका दुर्लभ दर्शन मैंने प्राप्त किया है। हे विभो! मैं आपको अपने भवनमें ले जानेके लिये जबरदस्ती नहीं करूँगा॥ ४५-४७॥ यह सुनकर मुनि दयार्द्र हो उठे, उन्होंने राजाके सिरपर हाथ रखा और कहा—'हे राजन्! आप अपनी आँखें बन्द करें।' इस प्रकारसे कहे गये उन काशिराजने मुनिके कथनानुसार अपनी आँखें बन्द कर लीं॥ ४८॥ क्षणभर बाद जब राजाने अपनी आँखोंको खोला तो उन्होंने देखा कि वे मुनिकी कृपासे अपने घरमें स्थित हैं। तदनन्तर काशिराजने विनायकदेवको वह सारा समाचार बतलाया। राजा मुनि भृशुण्डीके दर्शनसे अत्यन्त आनन्दित थे, लेकिन उनके न आनेसे वे बहुत दुखी भी थे॥ ४९-५०॥ राजाने कहा—'वे मुनि भृशुण्डी आपके कथनको सुनानेपर और मेरे प्रयत्न करनेपर भी नहीं आये। ब्राह्मणोंके साथ बलका प्रयोग करनेपर वे सब भस्म कर देते हैं, इसी कारण मैंने कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की'॥ ५१॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'काशिराजके प्रत्यागमनका वर्णन' नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १६॥
सत्रहवाँ अध्याय काशिराज तथा गजाननभक्त मुनि भृशुण्डीको विनायकद्वारा अपने यथार्थ स्वरूपका दर्शन कराना, विनायकके 'आशापूरक' नामकी प्रसिद्धि
[बायाँ स्तम्भ] ब्रह्माजी बोले—सर्वज्ञ होनेपर भी विनायकदेवने मुनि भृशुण्डीके आश्रमसे वापस आये हुए नृपश्रेष्ठ काशिराजसे मेघके समान गम्भीर वाणीमें बड़े ही आदरपूर्वक पूछा—॥ १ ॥ वहाँ जाकर आपने क्या कहा और उन्होंने क्या
[दायाँ स्तम्भ] उत्तर दिया? हे राजन्! मुझे वह सब विस्तारसे बताइये। वह सब सुनकर मैं आपको युक्ति प्रदान करूँगा॥ २॥ राजा बोले—उन भृशुण्डीजीको मैंने आपकी कही हुई बात बतायी और स्वयं भी मैंने उनसे यहाँ आनेके लिये बहुत प्रार्थना की। इसपर वे मुनि बोले—
३१० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
[बायाँ स्तम्भ]
‘आप कौन हैं, तथा वे विनायक कौन हैं ?॥ ३॥ यदि वे विनायक मेरे उपास्यदेवके अनुरूप स्वरूपवाले होंगे तो मैं अवश्य उनके दर्शनके लिये जाऊँगा।' इस प्रकार उनके द्वारा मना कर दिये जानेपर जब मैं किस प्रकार लम्बे मार्गको तय करूँगा, इस प्रकारकी चिन्ता कर ही रहा था तो उन्होंने मेरे सिरपर हाथ रखकर आँखें बन्द करनेको कहा और फिर मुझे मेरे घर प्रेषित कर दिया। क्षणभरके बाद जब मैंने आँखें खोलीं तो हे देव! मैंने अपनेको आपके समक्ष अपने घरमें स्थित पाया। उन मुनि भृशुण्डीजीके आश्रम-मण्डलका स्मरणकर मेरे चित्तमें महान् हर्ष हो रहा है। राजाके इस प्रकारके वचनको सुनकर विनायकदेव हँस पड़े॥ ४-६$^{१}/_{२}$॥ विनायक बोले—हे नृपश्रेष्ठ! इस समय आप थक गये हैं, फिर भी पुनः उन भृशुण्डीके आश्रममें जाइये। मेरा 'गजानन' यह नाम सुनते ही वे मुनि यहाँ अवश्य आ जायँगे। उन सर्वस्वरूप धारण करनेवाले विनायकदेवके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर उन काशिराजने [फिरसे] अपनेको महर्षि भृशुण्डीके आश्रममें स्थित देखा। काशिराजको पुनः आया हुआ देखकर महर्षि भृशुण्डी अपने मनमें यह तर्क-वितर्क करने लगे कि ये राजा पुनः यहाँ क्यों आये हैं अथवा ये अब क्या कहेंगे? तदनन्तर राजा उन मुनिश्रेष्ठ भृशुण्डीजीको प्रणामकर बोले—॥ ७-१०॥ हे विप्र! आपके स्वामी 'गजानन' ने आपको बुलाया है। 'गजानन' यह नाम सुनते ही वे अत्यन्त प्रफुल्लित हो उठे और मूर्च्छित-से हो गये॥ ११॥ उनके शरीरमें रोमांच हो आया और आनन्दमें निमग्न होनेके कारण उनके नेत्रोंसे आनन्दाश्रु बहने लगे। 'यदि मेरे पंख होते तो मैं उड़कर वहाँ चला जाता'॥ १२॥ इस प्रकारकी उत्कण्ठावाले वे विप्र भृशुण्डी राजाके साथ चल पड़े। कभी भी इधर-उधर नहीं चलनेवाले वे भृशुण्डीमुनि जब चलने लगे तो अचल पृथ्वी भी चलायमान हो उठी। वे पृथ्वीदेवी काँपते हुए उनके पास आकर उन मुनिसे कहने लगीं—'हे मुनिश्रेष्ठ! आप मेरी रक्षा करें।' तब मुनि बोले—'हे धरे! तुम्हें
[दायाँ स्तम्भ]
मुझसे कोई भय नहीं है'॥ १३-१४॥ अपने स्वामी गजाननका दर्शन करनेके लिये मैं शीघ्रतासे जा रहा हूँ, उन पृथ्वीदेवीसे ऐसा कहकर वे श्रेष्ठ द्विज आगे जानेके लिये चल दिये॥ १५॥ तीसरा पग आगे बढ़ानेके बाद उन्होंने [राजाको] वह काशीपुरी दिखलायी, अपनी नगरी काशीको देखकर राजा हर्षित होकर उन मुनिश्रेष्ठसे बोले—॥ १६॥ आपकी कृपासे अत्यन्त वेगपूर्वक चलनेसे हम शीघ्र ही काशीनगरीमें पहुँच गये हैं। हे मुने! आप-जैसे तपस्वी तथा जपपरायण जनोंकी महिमा अत्यन्त दुर्ज्ञेय है॥ १७॥ ऐसा कहनेके अनन्तर वे नृपश्रेष्ठ काशिराज शीघ्र ही उन मुनिको अपने भवनमें ले गये। राजाने उन्हें सुवर्णके आसनपर विराजमानकर पाद्य, अर्घ्य तथा विष्टर आदिद्वारा महान् भक्तिसे उनकी पूजा की॥ १८$^{१}/{२}$॥ ऋषि बोले—हे राजन्! आपने मेरे साथ छल किया है, मैं यहाँ गजाननको कहीं नहीं देख रहा हूँ। शीघ्र ही उन्हें दिखाओ, नहीं तो मैं आपको शाप देकर अपने आश्रम चला जाऊँगा॥ १९$^{१}/{२}$॥ राजा बोले—वे गजानन बालरूप होकर बालकोंके साथ खेल खेल रहे हैं, जैसे कोई वीर धूलसे धूसरित होकर सुशोभित होता है, वैसे ही विनायक भी सुशोभित हो रहे हैं। तब उन भृशुण्डीमुनिने विनायकदेवको देखा, वे अपनी सूँड़से सुशोभित हो रहे थे। करोड़ों सूर्योंके समान उनकी आभा थी, वे दो भुजाओं और दो दाँतोंवाले थे। तदनन्तर मुनि कुपित होकर राजासे बोले—'मैं इन्हें कैसे नमस्कार कर सकता हूँ?॥ २०-२२॥ हे राजन्! उस महान् पुरुषको धिक्कार है, जो कि अपनेसे छोटेको नमस्कार करता है। हाथीके गण्डस्थलको विदीर्ण करनेवाला सिंह क्या कभी घासको खाता है?'॥ २३॥ ब्रह्माजी बोले—उन बालक विनायकने जब मुनि भृशुण्डीके वचनोंको सुना तो लीलाके लिये शरीर धारण किये हुए प्रभु कौतूहलसे समन्वित हो गये और मुनिसे बोले—॥ २४॥ विनायक बोले—हे मुनि भृशुण्डी! आपके वे स्वामी किस स्वरूपके हैं, इस समय आप मुझे बतायें॥ २४$^{१}/_{२}$॥
क्री०ख०-अ०१७] * काशिराज तथा भृशुण्डीको विनायकके यथार्थ स्वरूपका दर्शन * ३११ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मुनि बोले—मेरे वे स्वामी दिव्य वस्त्र धारण करनेवाले हैं, उनकी दस भुजाएँ हैं, उनके कण्ठदेशमें मोतियोंकी माला सुशोभित रहती है। वे अपनी सिद्धि तथा बुद्धि नामक पत्नियोंसे समन्वित रहते हैं। उनके कानोंमें कुण्डल सुशोभित रहते हैं। उनका मुख सूँड़से युक्त है, उनके कान लम्बे हैं। वे सिन्दूरसे अनुलेपित रहते हैं। उनकी विशाल नाभि शेषनागसे सुशोभित रहती है, उनके चरणोंसे नूपुरोंकी ध्वनि होती रहती है। वे महान् मुकुटसे शोभाको प्राप्त होते हैं, उनके दस हाथोंमें दस आयुध विद्यमान रहते हैं। उनके एक दाँत है, उनके मस्तकपर चन्द्रमा विराजमान हैं। उनके कटिदेशमें छोटी-छोटी घण्टियाँ विराजित रहती हैं, उनका वाहन मयूर है और देवतागण उनकी चरणपादुकाओंकी वन्दना करते रहते हैं॥ २५-२८॥ ब्रह्माजी बोले—उनका इस प्रकारका वचन सुनकर बालक विनायकने उसी प्रकारका स्वरूप धारण कर लिया, वे कमलके आसनपर विराजमान थे और सृष्टि, रक्षा तथा संहार करनेवाले थे॥ २९॥ मुनि भृशुण्डी अपने उपास्यदेव उन गजाननका दर्शनकर अत्यधिक प्रेमके वशीभूत हो गये, उन्हें प्रणाम करनेकी भी सुध-बुध नहीं रही, वे जमीनपर लोट गये। उनके शरीरमें रोमांच हो आया, परमानन्दमें निमग्न हो वे नाचने लगे। जब उन्हें शरीरका भान हुआ, तब उन्होंने यथाविधि उन्हें प्रणाम किया॥ ३०-३१॥ पृथक्-पृथक् उपचार-द्रव्योंसे उन्होंने पूजा की। [आराध्य और आराधकका दर्शनकर] राजा बोले— आज मेरे पूर्वजन्ममें किये गये महान् पुण्यफलका उदय हो गया। आज मैंने देव विनायकके भक्त होनेके अद्भुत सुखका अनुभव किया है। तदनन्तर काशिराजने उन विनायकदेव तथा मुनिवर भृशुण्डीजीका यथाविधि अभिवन्दन-पूजन किया॥ ३२-३३॥ ऊँचे आसनोंपर विराजमान वे दोनों परस्परमें वार्तालाप करने लगे। परमात्मा देव विनायकने अपनी दसों भुजाओंसे मुनि भृशुण्डीका आलिंगन किया और अत्यन्त हर्ष प्रकट किया। उन दोनोंको इस प्रकारसे प्रेमवश गद्गद देखकर काशिराजकी भी आँखोंसे आँसू निकल पड़े॥ ३४ १/२ ॥ गजानन बोले—आपकी श्रद्धा-निष्ठा मुझे ज्ञात है, इस विषयमें काशिराजने भी मुझे बता दिया था। आपकी भावनाके अनुसार ही मैंने यह दस भुजाओंसे मण्डित विग्रह धारण किया। हे मुने! अन्य दूसरे लोग भी जिस-जिस भावसे मेरा ध्यानकर मेरा भजन करते हैं, मैं उनकी भावनाके अनुसार वैसा ही रूप धारण करता हूँ और जो अनन्य भावसे विश्वासपूर्वक मेरी भक्ति करते हैं, उन्हें मैं उनका मनोभिलषित फल प्रदान करता हूँ॥ ३५-३७॥ दुराचारी राक्षसोंके भयसे भयभीत देवी पृथ्वी सत्यलोकमें ब्रह्माजीकी शरणमें गयी थीं, तब ब्रह्माजीने मुझे दुष्टोंके वधके लिये प्रेरित किया था। देवमाता अदितिको दिये गये वरदानके कारण मैं महर्षि कश्यपके पुत्रके रूपमें 'कश्यपनन्दन' नामसे अवतरित हुआ। मैं पृथ्वीके भारको दूर करूँगा और इन्द्र आदि देवताओंको उनका अपना पूर्व स्थान प्रदान करूँगा और दैत्योंका अनेक बार विनाश करूँगा। [हे मुने!] आपकी अत्यन्त उत्कट साधनाको देखकर ही मैंने इस प्रकारका स्वरूप धारण किया है। मैं देवान्तक राक्षसको उसके भाईसहित मारकर अपने धामको चला जाऊँगा॥ ३८-४० १/२ ॥ ऋषि बोले—हे प्रभो! आपके सभी लोगोंको सुख प्रदान करनेवाले; सभी प्रकारके क्लेशोंका हरण करनेवाले, सभी देवताओंद्वारा वन्द्य तथा मनोकामनाओंको पूर्ण करनेवाले युगल चरणोंका दर्शनकर और आपको साक्षात् अपने समक्ष पाकर आज मैं कृतकृत्य हो गया हूँ, पवित्र हो गया हूँ॥ ४१-४२॥ हे विश्वात्मन्! मुझे वर प्रदान करें, जिससे कि मैं तृप्त हो जाऊँ। हे विघ्नरक्षक! जब-जब भी मैं आपके इस स्वरूपका ध्यान करूँगा, तब-तब हे करुणानिधान! आप मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दीजियेगा तथा आपका 'आशापूरक' अर्थात् आशाको पूर्ण करनेवाला यह नाम प्रसिद्धिको प्राप्त हो जाय॥ ४३-४४॥ गजानन बोले—जब-जब आप मेरे दर्शनोंकी
३१२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अभिलाषा रखेंगे, तब-तब मैं आपके पास उपस्थित हो | मुनि भृशुण्डी भी पद्मासन लगाकर उनके ध्यानमें स्थित जाऊँगा और आपने बड़े ही भक्तिभावपूर्वक जो मेरा | हो गये। उस समय वहाँ लोग विनायककी वैसी अद्भुत ‘आशापूरक’ नाम रखा है, यह भी प्रसिद्धिको प्राप्त हो | लीला देखकर परम आश्चर्यमें पड़ गये ॥ ४८-४९ ॥ जायगा ॥ ४५ ॥ | परमात्मा विनायकके बालरूपमें किये गये चरित्रको ब्रह्माजी बोले—इन वरोंको प्राप्तकर मुनि भृशुण्डीने | देखकर काशिराज बोल उठे—‘इस संसारमें मेरा जन्म अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्हें प्रणाम किया। उन मुनिके | लेना धन्य हो गया; क्योंकि मैंने ब्रह्मा आदि देवोंके लिये द्वारा प्रणाम करनेपर गजाननने उन द्विजके मस्तकपर | भी अत्यन्त दुर्लभ गजाननके इस स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन धीरेसे हाथ रखा और पुनः उनसे कहा—‘हे ब्रह्मन्! | किया है’॥ ५०१/२ ॥ जो-जो भी आपका अभीष्ट होगा, वह सब निश्चित | तदनन्तर अत्यन्त प्रसन्न मनवाले काशिराज उन रूपसे पूर्ण होगा। हे मुने! आपको कभी भी मेरा | बालक विनायकका हाथ पकड़कर उन्हें भवनके अन्दर विस्मरण नहीं होगा’॥ ४६-४७१/२ ॥ | ले गये। उन्हें स्वादिष्ट अन्नका भोजन कराया और ब्रह्माजी बोले—इतना कहनेके अनन्तर वे विनायक | पूर्वकी भाँति शयन कराया। हे मुने! उनसे अनुमति लेकर बालकका रूप धारणकर पुनः बालक्रीडा करने लगे। वे | स्वयं राजा भी सो गये ॥ ५१-५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत ‘मुनि (भृशुण्डी)-को वर प्रदान करनेका वर्णन’ नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥ अठारहवाँ अध्याय बालक विनायकके बालचरितके वर्णन-प्रसंगमें एक दैत्यका ज्योतिषी बनकर काशिराजके दरबारमें आना और विनायकद्वारा उसका वध व्यासजी बोले—हे लोकेश्वर! दूसरा दिन हो | सिरपर बहुत बड़ी पगड़ी पहने हुए था। वह अपने जानेपर कौन-सी बात हुई, उसे मुझे बताइये, सुनते हुए | शरीरके बारह अंगोंमें गोपीचन्दनका तिलक लगाये हुए भी मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ ॥ १ ॥ | था। उसकी दाढ़ी बहुत विशाल थी। वह ज्योतिषी ब्रह्माजी बोले—हे ब्रह्मन्! मैं विनायकदेवद्वारा | काशिराजके समीपमें आया, जबतक वह पासमें पहुँचता, किये गये दिव्य चरित्रको संक्षेपमें बताता हूँ, उसे आप | उससे पूर्व ही राजाने उसे प्रणाम किया ॥ ५-६ ॥ सावधान होकर सुनें, वह कथा सभी प्रकारके पापोंका | राजा अपने आसनसे उठ खड़े हुए और अपने विनाश करनेवाली है ॥ २ ॥ | आसनके समीप ही उसको आदरपूर्वक बिठाया। उससे भगवान् सूर्यके उदय हो जानेपर काशिराज तथा | कुशल पूछी, आगमनका कारण पूछा और यह भी पूछा बालक विनायकने अपना नित्य कर्म सम्पन्न किया। | कि किस स्थानसे आना हुआ है ॥ ७ ॥ तदनन्तर बालक विनायक तो खेल करनेके लिये चले | हे विप्रेन्द्र! आपका क्या नाम है, आप किस गये और राजा राजसभामें भद्रासनपर विराजमान हुए ॥ ३ ॥ | विद्याके ज्ञाता हैं और आपने कौन-सी साधना की है? उसी समय एक दैत्य ब्राह्मणका वेष धारण करके | हे मुने! हे कृपानिधे! ये सारी बातें मुझपर कृपाकर वहाँ आया। वह ज्योतिःशास्त्रमें पारंगत था, उसने अपने | सत्य-सत्य बतलायें ॥ ८ ॥ बायें हाथमें ताड़पत्रसे बनी पुस्तक और दाहिने हाथमें | ब्रह्माजी बोले—हे महामुनि व्यासजी! इस प्रकारसे जपमाला धारण कर रखी थी ॥ ४ ॥ | पूछे गये उस छद्मरूपधारीने शीघ्र ही आशीर्वाद प्रदान वह गुलाबी रंगके वस्त्र धारण किये हुए था तथा | किया और क्रमशः उन सभी प्रश्नोंका उत्तर दिया, जो
क्री०ख०-अ०१८] * बालक विनायकका ज्योतिषी बनकर आये दैत्यका वध करना * ३१३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
राजाने पूछे थे। [वह बोला-] हे राजकुँअर! मेरा 'हेमज्योतिर्विद्' यह नाम है। मैं गन्धर्वलोकसे आया हूँ और निवासके लिये आपका आश्रय चाहता हूँ॥९-१०॥ मैं भूत, भविष्य तथा वर्तमानकालकी सभी घटनाओं तथा अरिष्ट-निवारण-सम्बन्धी शान्तिकर्मोंको जानता हूँ। हे निष्पाप! आप जिन-जिन प्रश्नोंको पूछेंगे, मैं उन सभीका उत्तर प्रदान करूँगा ॥ ११ ॥ हे राजन्! आपके यहाँ जो अरिष्ट आये हैं, उन सबका मुझे ज्ञान है, आपके लिये भविष्यमें आनेवाले अरिष्टोंके लक्षणोंको जानकर ही मैं यहाँ आया हूँ। हे नृपश्रेष्ठ! इसीलिये मुझे आपके राज्याश्रयमें रहनेकी इच्छा है॥ १२१/२ ॥ राजा बोले- हे महामुने! किस कारणसे यहाँ अरिष्ट उत्पन्न हो रहे हैं तथा आगे भी कौन-कौन अरिष्ट होंगे? आप उन्हें सत्य-सत्य मुझे बतायें। आपमें विश्वास हो जानेपर ही मैं आपको अपने भवनमें निवास प्रदान करूँगा। इतना ही नहीं, मैं आपको योग-क्षेम करनेवाली आजीविका भी प्रदान करूँगा ॥ १३-१४१/२ ॥ ज्योतिषी बोला- हे राजपुत्र! कश्यपका पुत्र विनायक जबतक आपके घरमें रहेगा, तबतक निश्चित ही अनेक विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न होंगी; क्योंकि वह विघ्नोंका स्वामी है, अतः उसे आप किसी निर्जन वनमें छोड़ आइये ॥ १५-१६ ॥ ऐसा होनेपर आपके घरमें तथा नगरमें कहीं कोई विघ्न नहीं होंगे, इसके यहाँ स्थित रहनेपर जल सारे नगरको डुबो डालेगा ॥ १७॥ यदि वह जल किसी प्रकार नष्ट भी हो जायगा तो वायुद्वारा प्रेरित पर्वत नगरको निश्चित ही चूर-चूर कर डालेंगे। हे राजन्! इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ १८॥ आप यह क्यों नहीं जान रहे हैं कि इसके आनेसे पूर्व कोई उपद्रव नहीं होते थे। अपने पतनकी सम्भावनाको देखनेवाले राजाको चाहिये कि वह कपट करनेवाले, लोभी, अपवित्र, अत्यन्त शूरवीर तथा अत्यधिक अभिलाषा रखनेवाले व्यक्तिपर कभी भी विश्वास नहीं करे; क्योंकि राज्यकी प्राप्तिकी अत्यधिक इच्छा रखनेवाले ये लोग
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
राजाकी हत्यातक कर देते हैं ॥ १९-२० ॥ आपका राज्य आपके हाथसे छिन जायगा, इसे जानकर ही मैं आपको यह सब बतानेके लिये यहाँ आया हूँ। जानकार व्यक्तिको यह चाहिये कि वह राजाको उसके हितकी तथा उसके अहितकी बात अवश्य बतलाये। हे राजन्! मेरी बातपर विचार करके जैसी आपकी इच्छा हो, वैसा करें ॥ २११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- उस छद्म ज्योतिषीकी बात सुनकर राजाने उससे कहा- ॥ २२ ॥ राजा बोले- हे मुने! आपने अपने भूत और भविष्यके ज्ञानके बलपर जो सब कुछ मुझसे कहा है, वह मुझे उसी प्रकार मिथ्या प्रतीत हो रहा है, जैसे कि तत्त्वज्ञान हो जानेपर यह जगत्-प्रपंच मिथ्या भासित होता है। आपकी कही हुई बातोंपर विश्वास होनेपर मैं आपको आजीविका प्रदान करूँगा। हे गणकश्रेष्ठ! आपने अभी इस बालकको ठीकसे जाना नहीं है ॥ २३-२४॥ यदि यह बालक चाहे तो दूसरे ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकरसहित बहुत-से ब्रह्माण्डोंकी रचना कर सकता है। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! यदि आपको अपने कथनपर पक्का विश्वास है तो इसे आप स्वयं गहन घनघोर वनमें छोड़कर पुनः यहाँ वापस आ जायें ॥ २५-२६ ॥ लोगोंसे द्वेष रखनेवाले अनेक बलवान्से भी बलवान् [राक्षसों]-को इसने मार गिराया है, फिर स्वयंसे ही द्वेष रखनेवालेको यह कैसे जीवित रखेगा ? ॥ २७ ॥ इस बालकके मनमें किसीके प्रति अनिष्टकी भावना हो, ऐसा हम सोच भी नहीं सकते। इसने काशी नगरी तथा सम्पूर्ण राज्यकी अनेक उत्पातोंसे अनेक बार रक्षा की है। जो इन्द्र नहीं है, उसे यह इन्द्र बनानेकी क्षमता रखता है। यह शक्तिरहितको शक्तिसम्पन्न, लघुको गुरु, उच्चको नीच, नीचको उच्च तथा समर्थको असमर्थ बना सकता है ॥ २८-२९ ॥ राजाकी बात सुनकर वह ज्योतिषी क्रोधसे लाल हो गया। अपना मुख नीचे करके उसने पुनः कुछ कहना प्रारम्भ किया ॥ ३० ॥ मैंने तो आपके हितकी ही बात कही थी, किंतु
३१४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
इसमें भी आपको अनिष्ट प्रतीत हो रहा है। विधाताके द्वारा रची घटनाका कोई भी उल्लंघन नहीं कर सकता और न उससे कुछ अन्यथा ही कर सकता है ॥ ३१ ॥ हे राजन्! उस बालकको आप मुझे दिखलायें, मैं उसके लक्षण बताऊँगा। तब राजाने सभी बालकोंको बुलवाया। सबसे पहले विनायक पहुँचे, उनके पीछे अन्य सभी बालक भी दौड़ते हुए आ पहुँचे। बालक विनायकने उस ज्योतिषीको प्रणाम किया और पूछा आप कहाँसे आये हैं? ॥ ३२-३३ ॥ आप सामुद्रिकशास्त्रके अनुसार शरीरके लक्षणोंको जानते हैं, ज्योतिःशास्त्रमें पारंगत हैं तथा भूत, भविष्य एवं वर्तमानकी सभी बातोंके जाननेवाले हैं, आप मेरे भाग्यका फल बताइये ॥ ३४ ॥ ब्रह्माजी बोले— तदनन्तर उस कपटी ब्राह्मणने बालक विनायककी बातोंको धैर्यपूर्वक सुनकर मनमें यह विचार किया कि मेरे कल्याणका रास्ता कौन-सा है? इसने तो अनेक रूप धारण करनेवाले बहुत-से बलवान् दुष्टोंको मार डाला है। तब उस ज्योतिषीने बालक विनायकका हाथ पकड़कर शुभ तथा अशुभ फल बताना प्रारम्भ किया ॥ ३५-३६ ॥ आजसे चार दिनके बाद तुम कुएँमें गिर पड़ोगे, कदाचित् वहाँसे बचकर निकल आओगे, तो तुम समुद्रमें डूब जाओगे। वहाँसे भी अगर बच निकलोगे तो अन्धकारपूर्ण किसी गहन गड्ढेमें गिर पड़ोगे। अगर वहाँसे बच गये तो तुम्हारे ऊपर कोई पर्वत गिर पड़ेगा ॥ ३७-३८ ॥ फिर भी अगर तुम बच जाओगे तो दो बहुत विशाल कालपुरुष तुम्हें खा जायेंगे। इस प्रकारके अरिष्ट तुम्हारे लिये होनेवाले हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। अब मैं तुम्हें इन अरिष्टोंके निवारणका उपाय भी बताता हूँ। निर्भय रहनेके लिये इस उपायको करो। यहाँसे कहीं अन्यत्र चलकर मेरे साथ चार दिन रहो ॥ ३९-४० ॥ मैं तुम्हारे चरणकमलोंकी शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हें पुनः यहाँ ले आऊँगा। बालक विनायक ज्योतिषीकी बात सुनकर धीरे-से घरके अन्दर प्रविष्ट हो गये। तदुपरान्त बालक विनायकने शीघ्र ही राजाके हाथसे रत्ननिर्मित अँगूठी लेकर उसे अपने हाथमें छिपाकर उस द्विजसे कहा— ॥ ४१-४२ ॥ अरे ज्योतिषी ! शीघ्र आप बतायें कि हमारी कौन- सी वस्तु खो गयी है, किसने उसे लिया है और वह पुनः कब प्राप्त होगी? आपके सत्य-सत्य बतानेपर ही आपकी बातोंपर विश्वास होगा ॥ ४३ ॥ बालक विनायकद्वारा इस प्रकार कहा गया वह ज्योतिषी विचार करके लोगोंकी सभामें मुसकराकर इस प्रकार बोला— 'यदि वह अँगूठी मिल जाती है तो मुझे ही देनी होगी, तभी मैं उसके विषयमें बता सकता हूँ।' बालक विनायकके द्वारा 'ठीक है, ऐसा ही होगा' कहनेपर वह बोला— 'वह अँगूठी तुम्हारे ही हाथके अन्दर है'। उस छद्मवेषधारी ज्योतिषीके द्वारा ऐसा कहे जानेपर बालक विनायकने उस अभिमन्त्रित अँगूठीसे तत्काल ही उसके हृदयमें आघात किया ॥ ४४-४६ ॥ उस अँगूठीके प्रहारसे वह गणक उसी प्रकार छिन्न-भिन्न हृदयवाला हो गया, जैसे कि वज्रके प्रहारसे पर्वत विदीर्ण हो जाता है। वह गणक पृथ्वीको अत्यन्त कँपाते हुए भूतलपर गिर पड़ा ॥ ४७ ॥ गिरते हुए उसके शरीरसे नगरका कुछ हिस्सा भी चूर-चूर हो गया। उस समय काशिराजके साथ ही सभी लोग भी अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गये ॥ ४८ ॥ सभी देवता अत्यन्त हर्षित हो उठे और फूलोंकी वर्षा करने लगे। उस समय स्वर्गलोक तथा भूलोकमें बजाये जानेवाले वाद्योंके निर्घोषसे आकाश तथा पृथ्वीमण्डल प्रतिध्वनित हो उठा ॥ ४९ ॥ लोग कहने लगे— इस बालक विनायकने यह कैसे जान लिया कि यह तो अत्यन्त दुष्ट दैत्य है, जो ब्राह्मणका वेष धारणकर आया है, दैवयोगसे यह अच्छा हुआ कि राजाने भी उस दुरात्माकी बात नहीं मानी ॥ ५० ॥ इसे सामान्य बालक नहीं समझना चाहिये। पृथ्वीके भारको हलका करनेके लिये कोई करुणासागर देवता ही महर्षि कश्यपके घरमें अवतीर्ण हुआ है ॥ ५१ ॥ केवल अँगूठीके प्रहारसे इसने इस बलवान्के प्राण
क्री०ख०-अ०१९ ] * विनायककी बाललीलाके प्रसंग * ३१५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 किस प्रकार हरण कर लिये ? ऐसा कहकर उन सभीने | अनेक वस्तुएँ समर्पित कीं ॥ ५३॥ बालक विनायकका पूजन किया, उन्हें प्रणाम किया, | तदनन्तर राजाने नागरिकोंका सम्मानकर उन्हें विदाकर उनकी स्तुति की और वे उनकी प्रशंसा करने लगे ॥ ५२॥ | सभाका विसर्जन किया। बालक विनायक भी पहलेके कमललोचन काशिराजने ब्राह्मणोंको विविध दान | समान ही सामान्य बालक बनकर अन्य बालकोंके साथ दिये और अन्य द्विजों, चारणों, बन्दीजनों तथा दीनोंको | खेलने चले गये ॥ ५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'कपटी दैत्यके वधका वर्णन' नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १८॥ उन्नीसवाँ अध्याय विनायककी बाललीलाके प्रसंगमें दैत्य नरान्तकद्वारा दो दैत्यों कूप तथा कन्दरको काशीनगरीमें भेजना, कूपका कुआँ और मेढक बनकर तथा कन्दरका बालक बनकर विनायकको मारनेका प्रयत्न करना, विनायकद्वारा लीलापूर्वक दोनोंका परस्पर वध कराना ब्रह्माजी बोले-महादैत्य नरान्तकने बालक | कूप नामक असुरने काशिराजके आँगनमें एक विशाल विनायकके द्वारा ब्राह्मणका वेष धारण किये हुए | कुएँका रूप धारण कर लिया और कन्दर नामक असुर ज्योतिषी असुरके वधका समाचार सुनकर कूपक नामक | छोटा बालक बन गया और बालकोंके साथ खेलनेकी असुर तथा ब्रह्माके द्वारा वर प्राप्त किये हुए पराक्रमी | इच्छा करने लगा ॥ ७-८॥ कन्दरासुरको बहुत-से वस्त्र तथा विविध प्रकारके | काशिराजने जब अत्यन्त निर्मल जलवाले उस रत्नोंकी भेंट देकर काशिराजके नगरमें भेजा ॥ १-२॥ | कुएँको देखा तो वे बड़े प्रसन्न हो गये। फिर उन्होंने दैत्य नरान्तक बोला-तुम दोनों शीघ्र ही शुभ | कुएँके अन्दर झाँका तो उन्हें वहाँ एक मेढक दिखायी मुहूर्तमें उस बालक विनायकके वधके लिये जाओ। | दिया। वह मेढक सुन्दर वाणीमें ध्वनि कर रहा था। उसके द्वारा विविध उपायोंसे मारे गये असुरोंका तुम लोग | उसका वर्ण पीला था और वह देखनेमें अत्यन्त भयानक बलपूर्वक बदला लो ॥ ३॥ | था। इधर बालकोंके बीचमें स्थित, बालक बने कन्दर ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार उससे आज्ञाप्राप्त वे | नामक असुरने उन विनायकसे कहा- ॥ ९-१०॥ दोनों कूप और कन्दर नामक असुर चतुरंगिणी सेना | हे महाबाहो ! बाहर चलो, और उस सुन्दर कुएँको लेकर दो कोशकी दूरीपर चले गये ॥ ४ ॥ | देखो। तब उसी समय उन्होंने बालकोंके साथ बाहर पुनः वहाँसे सेनाको लौटाकर बड़ी प्रसन्नताके साथ | आकर उस कुएँको देखा। उस अत्यन्त रमणीय कुएँको वे आगे बढ़े। दोनों मार्गमें विचार करने लगे, तदनन्तर | देखकर बालक विनायक अन्य बालकोंके साथ विविध कूपने कन्दरसे कहा- 'मैं कुआँ बन जाऊँगा और तुम | भावोंके प्रदर्शनका खेल तथा छुपने और पकड़नेका खेल बालक बन जाना, तब तुम खेलते-खेलते उस विनायकको | खेलने लगे ॥ ११-१२ ॥ प्रयत्न करके मेरे अन्दर अर्थात् कुएँमें ढकेल देना। मैं | मध्याह्नकालमें वे सभी बालक जलके अन्दर मेढक बनकर तत्क्षण ही उसे खा जाऊँगा ॥ ५-६॥ | उतरकर आपसमें जल-फेंकनेकी क्रीडा करने लगे, फिर इस बहुत बड़े कार्यको करके हम दोनों अन्तर्धान | वे जलमें डुबकी लगाने, फिर बाहर निकलने तथा हो जायँगे।' इस प्रकारका मनमें निश्चय करके वे | दूसरेको डुबकी लगवाने और बाहर निकालनेका खेल काशिराजके महान् नगर काशीमें पहुँचे। वहाँ पहुँचकर | खेलने लगे ॥ १३ ॥
३१६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 वे दूरसे दौड़ते हुए आकर छलाँग लगाते हुए | सकता है', इसपर राजा बोले कि 'निश्चित ही जो कोई जलमें कूदने लगे, वहाँपर इस प्रकारके खेल खेलकर वे | जो कुछ भी माँगेगा, उसे वह अवश्य ही दिया जायगा, सभी बालक अपने-अपने घर जानेके लिये तैयार | इतना ही नहीं मैं अपना जीवन भी दे दूँगा ॥ २४-२५ ॥ हुए ॥ १४ ॥ | आप लोग इस बालकको पूरा बल लगाकर उसी समय बालक विनायकने जलके अन्दर अपनी | वेगपूर्वक बाहर निकालिये।' राजाके द्वारा कहे गये इस परछायीं देखी। वे तैरना जानते हुए भी जलमें तैरते हुए | प्रकारके वचनोंको सुनकर तीन व्यक्ति कुएँके अन्दर सभी बालकोंको देखते हुए बाहर ही खड़े रहे। इसी | प्रविष्ट हो गये। वे तीनों दैत्यद्वारा की गयी मायाके बीच दुष्ट असुर कन्दरने उन्हें जलके अन्दर ढकेल | प्रभावसे जलमें डूब गये। यह देखकर अन्य किसीने उस दिया। उस जलको अगाध जानकर वे लीलापूर्वक | कुएँमें जानेका मन नहीं बनाया। तब राजा बालक जलका आलोडन करने लगे। वे आधे मुहूर्ततक जलके | विनायकके लिये शोक करने लगे ॥ २६-२७ ॥ अन्दर रहते और फिर आधे मुहूर्ततक जलके बाहर | राजा बोले—मैंने ऐसा कौन-सा दुष्कर्म किया रहते ॥ १५-१७ ॥ | था, जिससे कि मुझे इस प्रकारका दुःख भोगना पड़ रहा तदनन्तर वे जलमें डूबनेकी लीला करने लगे और | है। इस बालकको मैं अपने सुखके लिये क्यों लाया, यह एक सामान्य शिशुकी भाँति डूबनेसे बचनेके लिये पैरों | तो दुःखदायी हो गया है ॥ २८ ॥ तथा करकमलोंको बार-बार इधर-उधर फेंकने लगे ॥ १८ ॥ | मैं उसके माता-पिताको तथा लोगोंको अब अपना यह देखकर सभी बालक इधर-उधर भाग-दौड़ | मुख कैसे दिखलाऊँगा, इस (कलंक)-का परिमार्जन करने लगे। तभी बालक विनायकने उस असुर कन्दरके | कैसे हो सकता है? इस बालकने तो अभीतकके आये पैरोंको दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और वे प्रयत्नपूर्वक उसे | हुए अतिप्रबल अरिष्टोंको दूर कर दिया था, फिर आज उस कुएँके अन्दरतक खींच ले गये। बालक विनायकने | यह किस प्रकार इस अरिष्टके वशीभूत हो गया ! उस असुर कन्दरको बलपूर्वक पानीके अन्दर डुबोया तो | विधाताकी चेष्टाको जाना नहीं जा सकता ॥ २९-३० ॥ वह 'छोड़ो-छोड़ो' ऐसा कहने लगा। विनायकने भी | सभी स्त्री, बाल, वृद्ध जब इस प्रकार शोक कर उससे कहा- 'तुम भी मुझे छोड़ो-छोड़ो' ॥ १९-२० ॥ | ही रहे थे कि उसी बीच कुएँके अन्दर स्थित मेढकका वे दोनों समान बलवाले थे, कभी डूबते थे तो कभी | रूप धारण किया हुआ वह दैत्य अपना मुख खोलकर ऊपर आ जाते थे। हिरण्यकशिपु तथा भगवान् लक्ष्मीनृसिंहके | वहीं स्थित हो गया। उसी समय जब वे बालक विनायक समान ही दोनों अपराजेय थे। बहुत समयतक असुर तथा | ऊपर आये तो दैत्य कन्दरने उन्हें धक्का देकर फिर कुएँमें बालक विनायक दोनों उस कुएँके अन्दर ही रह गये तो | गिरा दिया, बालक विनायकने भी कन्दरको धक्का देकर यह देखकर सभी बालक आर्त स्वरमें रोने लगे और | कुएँमें गिरा दिया, वह दुष्ट कन्दर सीधे जाकर उस कूप कहने लगे कि बालक विनायककी मृत्यु हो गयी है। उस | नामक दैत्यके मुखके अन्दर गिरा ॥ ३१-३२ ॥ प्रकारके अपशकुनके शब्दको सुनकर नगरकी स्त्रियाँ, वृद्ध | कूप नामक दैत्यने उस कन्दरको उसी प्रकार निगल तथा बालक वहाँ आ पहुँचे। काशिराज भी विलाप करने | लिया, जैसे एक बड़ा मत्स्य छोटे मत्स्यको निगल जाता लगे और बोले- 'अब क्या किया जाय?' ॥ २१-२३ ॥ | है। मैंने बालक विनायकको निगल लिया है, ऐसा कोई कहने लगा- 'अगाध जलवाले कुएँमें वह | समझकर उस कुएँका रूप धारण किये कूप नामक बालक विनायक जीवित कैसे रहेगा? दूसरा कहने लगा | असुरने अपना वास्तविक रूप प्रकट कर लिया ॥ ३३ ॥ कि यदि इसे शीघ्र ही जलसे बाहर निकाल लिया जाय | तदनन्तर वह कूप नामक असुर अपने यशसे अर्जित तो, इसके बचनेका निश्चित ही कोई उपाय किया जा | गगनचुम्बी आत्मप्रशंसाका स्वयं गान करने लगा कि
क्री०ख०-अ०२० ] * बालक विनायककी बाललीलाके सन्दर्भमें दैत्योंके वधका वर्णन * ३१७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
आज मैं सभी दैत्योंके ऋणसे उऋण हो गया हूँ ॥ ३४ ॥ इसके साथ ही बालक विनायकको बलहीन भी मानकर वह मन-ही-मन प्रसन्नतासे भर उठा। उसी समय कन्दर नामक असुर अत्यन्त क्रुद्ध होकर उस कूपके विशाल उदरको चीरकर बाहर निकल आया। यह देखकर बालक विनायक शीघ्र ही क्षणभरमें अन्तर्हित हो गये। मेरा उदर इसने फाड़ डाला, यह समझकर कूपने भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर उसके गलेमें तबतक काटा, जबतक उसके प्राण नहीं निकल गये, इस प्रकार आपसमें ही अत्यन्त व्याकुल होकर एक-दूसरेका वध कर देनेसे वे दोनों दैत्य भूमिपर गिर पड़े ॥ ३५-३७ ॥ उन दोनोंके परस्पर हाथ तथा पैरोंके मसलनेसे काशी नगरीका कितना ही हिस्सा चूर-चूर हो गया। जिस प्रकार सुन्द और उपसुन्द दोनों दैत्य आपसमें ही युद्ध करते हुए मर गये थे, वैसे ही वे कूप तथा कन्दर नामक असुर भी परस्पर युद्ध करते हुए मृत्युको प्राप्त हुए, राजसेवकोंने मरे हुए उन दोनों असुरोंको खींचकर नगरसे बाहर फेंक दिया ॥ ३८-३९ ॥ उसी क्षण राजाके प्रांगणमें स्थित वह कुआँ विलीन हो गया और लोगोंने देखा कि बालक विनायक सभी बालकोंके साथ पूर्ववत् क्रीडा कर रहे हैं ॥ ४० ॥ उस समय सभी बालक, राजा तथा अन्य सभी लोग आश्चर्यान्वित हो गये। कुछ लोग आपसमें कहने लगे कि जो कपटपूर्ण व्यवहार करता है, वह निःसन्देह स्वयं भी उसी प्रकार समूल विनष्ट हो जाता है, जैसे दीपक बुझानेके लिये आया हुआ पतिंगा स्वयं भस्म हो जाता है ॥ ४१-४२ ॥ साक्षात् काल भी इस बालक विनायकके एक रोमको भी हिलानेमें समर्थ नहीं है, इस अवतारी पुरुषके सामर्थ्यको हम लोगोंने भलीभाँति परख लिया है। कामदेव भगवान् शंकरपर विजय प्राप्त करने गया, लेकिन स्वयं ही भस्म हो गया। ये सब बातें सुनकर काशिराज भी कहने लगे कि यह सत्य है, सत्य है ॥ ४३-४४ ॥ तदनन्तर काशिराजने ब्राह्मणोंको दान दिया और उनकी पूजाकर उन्हें विदा किया। बालक विनायकको प्रणाम करके सभी लोग अपने-अपने घरोंको गये ॥ ४५ ॥ कुछ लोग काशिराजद्वारा भलीभाँति पूजित उस बालक विनायकका आलिंगनकर अपने घरोंको गये। उस समय देवता पुष्प बरसाने लगे तथा लोग विनायककी स्तुति करने लगे ॥ ४६ ॥ ब्रह्माजी बोले-हे ब्रह्मन् व्यासजी ! हे मुने ! इस प्रकार यह निश्चित होता है कि कर्तव्य और अकर्तव्य, वायुका वेग, मायाका स्वरूप, पुरुषका भाग्य तथा राक्षसका आचरण-ठीकसे जाना नहीं जा सकता है, ऐसे ही परमात्माके अवतारके गुणोंको भी जाना नहीं जा सकता है ॥ ४७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'कूप और कन्दरके वधका वर्णन' नामक उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १९ ॥
बीसवाँ अध्याय बालक विनायककी बाललीलाके सन्दर्भमें विनायकद्वारा अम्भासुर आदि तीन दैत्योंके वधका वर्णन
व्यासजी बोले-हे चतुर्मुख ब्रह्माजी ! हे ब्रह्मन् ! हे भगवन् ! काशिराजके घरमें उनके पुत्रका विवाह कब सम्पन्न हुआ, उसे आप मुझे विस्तारसे बतलाइये ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले-एक अरिष्ट जबतक विनष्ट होता, तबतक दूसरा अरिष्ट पुनः आ पहुँचता, काशिराज जबतक यह सोचते कि इस अरिष्टके दूर होनेपर पुत्रका विवाह करूँगा, तबतक दूसरा अरिष्ट आ उपस्थित होता। कूप तथा कन्दर नामक असुरोंका वध हो जानेपर तीन अन्य राक्षस आ उपस्थित हुए, जिनके नाम थे—अन्धक, अम्भासुर और तुंग। ये तीनों ही देखनेमें अत्यन्त क्रूर थे। ये तीनों
३१८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] बालक विनायकके वधकी इच्छासे आये थे। तब [विनायकके साथ उनका] युद्ध हुआ। उनके युद्धका समाचार सुनकर ब्रह्मा आदि देवता भी भाग गये थे॥ २-४॥ उन राक्षसोंने दिशाओंके हाथियोंका भी मर्दन कर दिया था, फिर देवताओंकी क्या बात! कश्यपका वह पुत्र कब हमें दिखायी देगा, उसे हम अनेक प्रकारसे मार डालेंगे। ऐसा निश्चितकर वे राक्षस आये थे। अभीतक जितने भी वीर उसके वधके लिये भेजे गये, सभी मृत्युको प्राप्त हुए हैं, लेकिन हम इसे मार डालेंगे, उसे जीते बिना हम अपने घर वापस नहीं लौटेंगे। हम लोग अग्निका स्वरूप धारणकर कश्यपमुनिके इस पुत्रको मार डालेंगे ॥ ५-७॥ उस समय अन्धक बोला—'मैं सम्पूर्ण दिशाओं तथा आकाशको अन्धकारसे व्याप्तकर पृथ्वीमें भी सर्वत्र अन्धकार-ही-अन्धकार कर दूँगा। तब लोगोंको परस्परमें एक-दूसरा कोई भी दिखायी नहीं देगा' ॥ ८ १/२ ॥ तदनन्तर अम्भासुर बोला—'मैं उस काशिराजकी नगरीसहित सम्पूर्ण पृथ्वीको जलसे आप्लावित कर दूँगा। तब कोई भी इधर-से-उधर नहीं जा सकेगा' ॥ ९ १/२ ॥ तुंग बोला—'मैं बहुत ऊँचा पर्वत बनकर उस काशीनगरीको पीसकर उसी प्रकार चूर्ण-चूर्ण कर डालूँगा जैसे कि पूर्वकालमें पंखयुक्त पर्वत [ग्राम- नगरादिको] चूर-चूर कर डालते थे ॥ १० १/२ ॥ सर्वत्र अन्धकार हो जाने, जल भर जाने, अग्निके व्याप्त हो जाने तथा पर्वतोंके छा जानेसे कोई भी बाहर जानेमें समर्थ नहीं हो सकेगा, तो फिर वह बालक कैसे बाहर चला जायगा ?' इस प्रकारका विचार निश्चित करके वे तीनों अत्यन्त जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ११-१२॥ उनकी गर्जनाकी ध्वनिसे तीनों लोक काँप उठे। क्षुब्ध हो उठे जलवाले समुद्रोंने अपने तटका अतिक्रमण प्रारम्भ कर दिया। तदनन्तर सूर्यको आच्छादित करके असुर अन्धक वहाँ स्थित हो गया। महान् घोर अन्धकारके छा जानेसे कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था ॥ १३-१४॥ अकस्मात् असमयमें रात हो गयी। जो लोग व्यापार आदि कर्मोंमें लगे थे, स्नान कर रहे थे, जपमें संलग्न थे, हवन कर रहे थे, तपस्या कर रहे
[दायाँ स्तम्भ] थे, वेदोंका स्वाध्याय कर रहे थे, विवाह, उपनयन आदि संस्कारोंको सम्पन्न कर रहे थे, भगवन्नामसंकीर्तनमें तल्लीन थे, पुराणोंका पाठ कर रहे थे, ब्राह्मणों तथा देवोंका पूजन आदि कर्म सम्पन्न कर रहे थे और नाना प्रकारके कर्मोंको कर रहे थे तथा व्रत आदिके अनुष्ठानमें लगे थे, उन्होंने यह देखा कि रात हो गयी है, वे लोग कहने लगे कि क्या विन्ध्यपर्वतने सूर्यमण्डलको रोक दिया है ? अथवा प्रलय होनेवाला है या सूर्यग्रहण लग गया है? ऐसी ही बातें सभामें विराजमान राजासे पण्डितोंने भी कहीं ॥ १५-१८॥ जबतक वे लोग इस प्रकारका विचार कर ही रहे थे कि गायें अपने-अपने घरोंको लौट आयीं। अकल्पित समयमें ही लोगोंने अपने-अपने घरोंमें (सान्ध्य) दीप जला दिये ॥ १९ ॥ अभी सूर्यास्त कैसे हो गया, न तो भोजन बना है और न किसीने भोजन ही किया है। ऐसा कहते हुए स्त्रियाँ अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गयीं, कुछ स्त्रियाँ दूध दुहने लगीं। उस समय लोग दीपक तथा लकड़ीके दीपक (मशाल) जलाकर अपना कार्य कर रहे थे। व्यापारीजन तथा ब्राह्मण आदि बड़े कष्टपूर्वक कार्योंको पूरा कर रहे थे ॥ २०-२१ ॥ उस समय सेवकों, कामीजनों, आलसियों, सोये हुओं तथा निद्रालुजनोंको बड़ा ही आनन्द प्रतीत हुआ ॥ २२ ॥ इस प्रकार अन्धकासुरके द्वारा सर्वत्र अन्धकार कर दिये जानेपर अम्भासुर नामक दैत्यने मेघ बनकर हाथीकी सूँड़के समान मोटी वर्षाकी धारा प्रारम्भ कर दी ॥ २३ ॥ उस समय क्षणमात्रके लिये बिजलीके चमकनेपर ही लोग अपनी वस्तुओंको देख पा रहे थे। वर्षाकी मोटी धारासे भयभीत होकर लोग अपने घरके अन्दर ही बैठे रह गये ॥ २४ ॥ उस भारी पानीकी धारासे बड़े-बड़े कई भवन गिर गये, घरोंकी दीवारें टूट गयीं, जनसमूहमेंसे कुछ लोग घरोंके अन्दर तो कुछ बाहर रहकर मर गये ॥ २५ ॥ झंझावातसे आहत वृक्ष भूमिपर गिर पड़े। कड़कती बिजलीने बहुतसे घरों तथा वृक्षोंको जला डाला ॥ २६ ॥
क्री०ख०-अ०२० ] * बालक विनायककी बाललीलाके सन्दर्भमें दैत्योंके वधका वर्णन * ३१९ लोगोंसे परिव्याप्त तथा सभी प्राणियोंसे भरी हुई वह काशीनगरी उफान मारती हुई नदियोंके कारण समुद्रोंद्वारा डुबायी जाती हुई-सी लग रही थी॥ २७॥ ब्रह्माजी बोले—उस प्रलयको दैत्योंद्वारा उत्पन्न माया जानकर करुणासागर उन विनायकने अपनी योगमायाके बलसे तत्क्षण ही एक बहुत ऊँचे वटवृक्षको उत्पन्न किया। जो अनेक प्रकारकी लताओं तथा गुल्मोंसे सुशोभित था। वह सौ योजन विस्तारवाला था और जटाओं तथा शाखाओंसे समन्वित था॥ २८-२९॥ तदनन्तर वे विनायक एक बहुत बड़े पक्षीके रूपमें वहाँ स्थित हो गये। उस पक्षीने अपने गगनचुम्बी पंखोंको भूमिमें लगा लिया और सिरसे आकाशको छू लिया। और काशीनगरीको प्रकाशयुक्त बना दिया। उस विशाल जलराशिको अपनी चोंचसे पक्षीरूपी विनायकने उसी प्रकार पी डाला, जैसे कि कोई जंगली हाथी छोटे-से गड्ढेके जलको अपनी सूँड़से पी डालता है॥ ३०-३१॥ उस समय लोग प्रसन्न होकर कहने लगे—'विघ्न दूर हो गया है और जल भी समाप्त हो गया है।' अन्धकारके दूर हो जानेपर उन्होंने उस गहन वटवृक्षको देखा। साथ ही उन्होंने एक अद्भुत स्वरूपवाले पक्षीको भी देखा, जैसा कि न तो देखा गया था और न सुना ही गया था। सभी लोग उसकी शरण लेनेकी दृष्टिसे उस वटवृक्षके समीपमें गये॥ ३२-३३॥ अश्वों, हाथियों, रथों, ऊँटों, पालकियों, स्त्रियों तथा दासोंसहित काशिराज भी उस वटवृक्षके नीचे चले आये। दूसरे पशु, कुत्ते, बिल्लियाँ तथा वन्य पशु भी वहाँ आ गये। बालक विनायकके प्रभावसे न तो वृष्टि ही हो रही थी और न वहाँ अन्धकार ही था॥ ३४-३५॥ सभी वर्णोंके लोग पूर्ववत् अपने-अपने कर्मोंको यथाविधि करने लगे। नगरनिवासी पूर्वकी भाँति अपने- अपने व्यवसायोंमें लग गये॥ ३६॥ [वे लोग सोचने लगे कि] क्या जगदीश्वर गणेशने ही सभीकी रक्षा करनेके लिये पक्षीका रूप धारण किया है? इस विषयमें हम लोग कुछ भी नहीं जान पा रहे हैं। [अवश्य ही] उन्होंने दैत्यद्वारा उत्पन्न वृष्टिको अपने पंखोंको फैलाकर रोक लिया और उल्कापात तथा ओला- वृष्टिको स्वयं सुखपूर्वक सहन किया है॥ ३७-३८॥ इस प्रकारसे विचार करके लो ! वहाँपर सुखपूर्वक रहे। उन्हें वहाँ रहते हुए ग्यारह दिन व्यतीत हो गये। हे द्विज व्यासजी! बालक विनायकको बालकोंके समूहके साथ खेलते हुए देखकर उन्हीं विनायकद्वारा की गयी इस लीलाको कोई भी नहीं जान सका॥ ३९-४०॥ तदनन्तर अन्धकासुर तथा अम्भासुर नामक उन दोनों दैत्योंकी शक्ति क्षीण हो गयी और वे निश्चेष्ट हो गये। तब तुंग नामक दैत्य दिशाओं तथा विदिशाओंको निनादित करते हुए बहुत जोरसे गरजा॥ ४१॥ मैं पर्वतका रूप धारणकर इस पक्षीको क्षणभरमें ही मार डालूँगा—ऐसा कहता हुआ वह तुंग नामक दैत्य उसी क्षण एक विशाल पर्वत बन गया। पाँच योजन विस्तारवाला वह पर्वत अनेक सरोवरों तथा नदियोंसे समन्वित था, वह पर्वत अपनी दिव्य औषधियोंके द्वारा आकाश तथा दिशाओंको प्रकाशित कर रहा था॥ ४२-४३॥ उस पर्वतमें विविध प्रकारके पक्षी थे तथा वह ब्राह्मणोंके आश्रमोंसे सुशोभित था। तब वह पक्षिराज भी पंखयुक्त उस पर्वतको गिरता हुआ देखकर स्वयं भी उड़ते हुए घूमने लगा और उसने उस जलको रोक लिया तथा वह अपने पंखोंकी हवासे चराचर जगत्को घुमाने लगा॥ ४४-४५॥ उस समय पर्वतोंकी चोटियाँ इधर-उधर भूमिमें गिरने लगीं। पक्षीरूपी विनायकने अपनी चोंचके द्वारा उस तुंग पर्वतको उसी प्रकार पकड़ लिया, जैसे कश्यप- पुत्र गरुड़ सर्पको पकड़ लेते हैं। उस पर्वतको पकड़े हुए पक्षीरूपी विनायक आकाशमें घूम रहे थे। उन्होंने अपने एक पैर (पंजे)-से अन्धकासुरको तथा दूसरे पैर (पंजे)-से अम्भासुरको पकड़ रखा था॥ ४६-४७॥ महान् पक्षीरूप वे विनायक उसी रूपमें घूमते हुए भुवर्लोकको भी पार कर गये। वे दैत्य बहुत अधिक भ्रमण करा देनेसे अत्यन्त खिन्न हो गये और सूर्यकी तेज किरणोंद्वारा संतप्त हो गये॥ ४८॥ पर्वतके समान विशाल वे तीनों असुर प्राणोंसे रहित हो जानेपर भूमिपर गिर पड़े। गिरते हुए उन्होंने अनेक
३२० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- वनों तथा उपवनोंको चूर-चूर कर डाला ॥ ४९ ॥ उन दैत्योंके शरीरोंको देखनेके लिये स्त्रियों तथा बच्चोंके साथ वहाँके लोग नगरीके समीपमें गये और उन्हें देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हुए ॥ ५० ॥ उन दैत्योंके शरीरोंके टुकड़े चट्टानोंके समान लग रहे थे। इस प्रकार दैत्योंकी माया को देखकर सभी लोग अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये ॥ ५१ ॥ वहाँसे लौटनेपर लोगोंने देवरूपी उस वटवृक्षको नहीं देखा। वटवृक्षके अन्तर्धान हो जानेपर बालक विनायकने वह पक्षीका रूप भी त्याग दिया। तब काशिराजने बालक विनायकका आलिंगन किया। नगरके निवासियों तथा स्वयं काशिराजने उनसे कुशल-समाचार पूछा और परम प्रसन्नतापूर्वक उन विघ्ननाशक विनायकका पूजन किया। लोगोंने महर्षि कश्यपजीके पुत्र उन विनायककी बड़ी ही प्रसन्नतासे प्रशंसा की ॥ ५२-५४ ॥ हे देव! हम लोग उन दैत्योंद्वारा उत्पन्न की गयी उस महान् मायाको नहीं जानते हैं और आपके सामर्थ्य तथा गुणोंको भी हम नहीं जानते हैं, जिनका वर्णन करनेमें वेद भी कुण्ठित हो जाते हैं। आपने लीलापूर्वक हम सबकी रक्षा की है और महान् संकटसे मुक्त कराया है। आँधी- तूफान समाप्त हो गया है, अनेक प्रकारके उत्पात दूर हो गये हैं तथा वृष्टि भी रुक गयी है। अन्धकारके विनष्ट हो जानेपर सूर्यका बिम्ब दिखायी दे रहा है। उस समय सभी लोगोंके मन प्रसन्नतासे खिल उठे ॥ ५५-५७ ॥ नदियाँ पहलेकी भाँति निर्मल जलवाली हो गयीं, जैसा पहले था, वैसा ही सब कुछ हो गया। देवताओंने देवाधिदेव उन विनायकके ऊपर फूलोंकी वर्षा की ॥ ५८ ॥ विविध प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिके साथ सभी लोगोंने उस सुसज्जित काशीनगरीमें प्रवेश किया। उन्होंने ब्राह्मणोंको बहुत-सा दान यह कहते हुए दिया कि इस दानसे विनायकदेव हमपर प्रसन्न हों ॥ ५९ ॥ काशिराजने शान्तिहोम सम्पन्न करके बहुत-सा गोधन दानमें दिया। तदनन्तर सभीको विसर्जित करके काशिराजने विनायकके साथ स्वयं भी भोजन किया ॥ ६० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत '[अम्भासुर, अन्धकासुर तथा तुंगासुर नामक] तीन दैत्योंके वधका वर्णन' नामक बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २० ॥ इक्कीसवाँ अध्याय भ्रमरा राक्षसीका अदितिका रूप धारणकर बालक विनायकके पास आना, बालक विनायकद्वारा उसका वध, देवताओं आदिके द्वारा विनायककी स्तुति ब्रह्माजी बोले- हे द्विज व्यासजी! मेरे द्वारा कहे जानेवाले बालक विनायकके महान् आश्चर्यजनक चरित्रका आप श्रवण करें, वह मनुष्योंके सभी पापोंको दूर करनेवाला है। अम्भासुरका जो सिर कटकर उसके घरमें जाकर गिरा था, उसे उसकी माता भ्रमराकी सखीने देखा और भ्रमराको बतलाया ॥ १-२ ॥ उस समय भ्रमरा सोनेसे बने पलंगपर सोयी थी, वह झटसे उठकर आँगनमें आयी और अपने पुत्रके सिरको देखकर मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ी ॥ ३ ॥ शोकमें निमग्न होकर वह अपने दोनों हाथोंसे अपनी छाती पीटने लगी। उसके आभूषण गिरने लगे, वह हाथीके द्वारा कुचली हुई कमलिनीके समान खिन्न हो गयी। उसके हाथोंके कंगन बिखर गये। उसकी चोली फट गयी, वह अत्यन्त दुर्बल-सी हो उठी। कपड़ोंके बिखर जानेसे उसका विशाल शरीर कुछ-कुछ नग्न-सा दिखलायी पड़ने लगा। वह विह्वल होकर भूमिपर लोट-पोट करने लगी ॥ ४-५ ॥ सखियों, भाइयों तथा स्वजनोंके द्वारा वैसा करनेसे रोकी जाती हुई उसे तीन मुहूर्त बीत जानेपर होश आया और वह कुछ बोलने लगी। वह उठ पड़ी और अपने दोनों हाथोंसे पुनः अपना सिर पीटने लगी ॥ ६ १/२ ॥ भ्रमरा बोली- जिसने अमरावतीसहित सम्पूर्ण
क्री०ख०-अ०२१] * भ्रमरा राक्षसीका अदितिका रूप धारणकर बालक विनायकके पास आना * ३२१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
यहाँ पृष्ठ पर दी गई सामग्री का अक्षरशः लिप्यंतरण (Transcription) प्रस्तुत है:
[पृष्ठ शीर्ष] ३२२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
उसके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर उसके प्रति सम्मानका भाव दिखलाती हुई रानीने बड़ी शीघ्रतासे उस बालकको खोजनेके लिये दूतोंको प्रेषित किया। कुछ दूसरे लोगोंने काशिराजको बतलाया कि महर्षि कश्यपजीकी भार्या यहाँ आयी हुई हैं। वे स्नान करके घरमें आये और उसे देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ २८-२९॥ अत्यन्त श्रद्धाभक्तिके साथ हाथ जोड़कर प्रणामकर राजा बोले—'आज मेरा जन्म लेना धन्य हो गया, मेरी विद्या धन्य हो गयी, मेरी दृष्टि, मेरा राज्य, मेरे माता- पिता और मेरा तप धन्य हो गया। मैंने आज देवताओंकी माता, संसारको उत्पन्न करनेवाली शक्तिस्वरूपाका दर्शन किया है। आपके गुणोंका सम्यक् रूपसे वर्णन करनेकी मेरी शक्ति नहीं है॥ ३०-३१॥ आपका यह बालक विनायक इन्द्रसे भी अधिक बलशाली है। उसने अनेक प्रकारके प्रशस्त कर्म किये हैं और अनेकों राक्षसोंका वध किया है। उस बालक विनायकके गुणोंका वर्णन करनेमें मेरी अल्प सामर्थ्य अवश्य ही समर्थ नहीं है॥ ३२-३३॥ हे माता! आप क्षणभर यहाँ विश्राम करें। आज मेरे महान्से भी महान् भाग्यका उदय हुआ है। इसने योगमायाके प्रभावसे अनेकों दानवोंका वध किया है, किंतु इसके शरीरमें बिलकुल भी चोट नहीं लगी। आपका यह बालक यहाँ सुखपूर्वक रह रहा है। किस कारणसे आपका यहाँ आगमन हुआ है, आप यहाँ आ ही गयी हैं तो अब क्षणभरके लिये यहाँ रुकें। पुत्रका विवाह सम्पन्न हो जानेपर मैं आप दोनोंको आपके घर पहुँचा दूँगा'॥ ३४-३५१/२॥ **वह बोली—**हे राजन्! आप यह क्या बोल रहे हैं, इसके वियोगसे मुझे महान् दुःख हुआ है, मुझे कहीं भी कुछ भी सुख नहीं मिला है॥ ३६१/२॥ **ब्रह्माजी बोले—**जब वह ऐसा कह ही रही थी कि उसी समय वे बालक विनायक वहाँ आ पहुँचे॥ ३७॥ सभी बालकोंने विनायकको यह कहकर भेजा कि तुम्हारी माता आयी हुई हैं। तदनन्तर आँखोंमें आँसू भरी हुई उस भ्रमराने बालक विनायकका आलिंगन किया और प्रसन्नतापूर्वक बोली-॥ ३८॥
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
हे अतिनिष्ठुर बालक! तुम मुझे छोड़कर चिरकालसे यहाँ रह रहे हो, तुम्हारे वियोगसे मैं अत्यन्त कष्टमें हूँ और सब कुछ छोड़कर यहाँ आयी हूँ॥ ३९॥ मैंने अपने जीनेकी आशा छोड़कर तुम्हें प्राप्त करनेके लिये तपस्या की थी। मैंने बड़े ही कष्टसे तुम्हें प्राप्त किया है, मेरे उन कष्टोंको भगवान् ही जानता है। तुम्हारे बिना मेरे लिये एक क्षणका समय भी युगके समान हो गया था, इस प्रकारसे उस भामिनीने अत्यन्त दुष्ट भावसे बड़े ही मधुर शब्दोंमें उनसे कहा॥ ४०-४१॥ तदनन्तर अत्यन्त स्नेहके वशीभूत हो उसने बालक विनायकको अपने कटिदेशमें बैठाया, बालक विनायकने भी उसके प्रयत्नोंको जानकर उसके अपराधको समझते हुए अपने गूढ़ अभिप्रायसे उससे पहले यह कहा कि तुम मेरे लिये क्या लायी हो? उसके इस प्रकार कहते ही उसने बालक विनायकको एक लड्डू प्रदान किया॥ ४२-४३॥ उस लड्डूके खा जानेपर उसने महान् विष मिला हुआ दूसरा लड्डू बालकको खानेके लिये दिया। उस लड्डूको भी खा जानेपर बालक विनायकने बलपूर्वक उससे एक और लड्डू माँगा॥ ४४॥ तदनन्तर काशिराज और उनकी भार्याने उनसे प्रार्थना करते हुए कहा—'हे मातः! उठिये-उठिये, इस बालकके साथ आप भोजन कीजिये।' जब वह उठनेको हुई तो बालक विनायकने पर्वतराज हिमालयके समान भारी शरीरवाला बनकर उसे जोरसे दबा दिया, इससे वह अत्यन्त व्याकुल हो उठी॥ ४५-४६॥ वह कहने लगी 'अरे बालक! मुझे छोड़ो-छोड़ो, मैं तो तुम्हारी माता हूँ। मैं स्नेहके पाशमें बँधी हुई बहुत समयके बाद तुम्हें देखने तुम्हारे पास आयी हूँ॥ ४७॥ तुम मुझे एक पर्वतके समान दबाकर क्यों चूर-चूर करनेमें लगे हो?' वह अपने हाथोंसे बालकको हटाने लगी, किंतु वह बालक विनायक उस समय सो गया और अपने हाथों तथा पैरोंको फैलाकर जोर-जोरसे श्वास लेने तथा छोड़ने लगा। तदनन्तर काशिराजने भारसे दबी हुई उस व्याकुल स्त्रीको उठनेसे रोका॥ ४८-४९॥ इस बालककी निद्रा इतनी जल्दी भंग मत करो, आप तो इसकी स्नेहमयी माता हैं, उस समय कुछ दूसरे
क्री०ख०-अ०२१] * भ्रमरा राक्षसीका अदितिका रूप धारणकर बालक विनायकके पास आना * ३२३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 लोगोंने दया करके उस बालकको अन्यत्र सुलानेके लिये उठानेका निश्चय किया। उस समय कोई भी उस बालकको न उठानेमें समर्थ हुआ, न हिलाने-डुलानेमें ही। कुछ दूसरे लोग उस कमललोचन बालक विनायककी प्रार्थना करने लगे ॥ ५०-५१ ॥ 'अरे बालक! दया करो, तुम्हारी ये माता मर जायगी।' वह स्त्री अपने पैरों, हाथों तथा गर्दनको हिलाने लगी। लोग बोल उठे—'अरे बालक! यह तुम क्या कर रहे हो, अपने पितासे तुम क्या कहोगे?' लोग ऐसा कह ही रहे थे कि वह निशाचरी मृत्युको प्राप्त हो गयी ॥ ५२-५३ ॥ उसकी देहने दस योजनकी भूमिको आच्छादित कर लिया। उस अत्यन्त भयानक निशाचरीको देखकर कुछ लोग भाग उठे। कौतूहलभरे कुछ लोग उसे देखनेके लिये दौड़ पड़े। उस निशाचरीको देखकर सभी लोग तथा काशिराज भी आश्चर्यचकित हो गये ॥ ५४-५५ ॥ बालकोंकी हत्या कर डालनेवाली यह निशाचरी कपटवेष धारणकर कैसे यहाँ आ पहुँची ? हम लोग तो इसे महर्षि कश्यपकी पत्नी ही समझ रहे थे, न कि राक्षसी! इस बालकके अद्भुत ज्ञान तथा सामर्थ्यको हमने देख लिया-ऐसा कहते हुए वे सभी लोग प्रसन्नतापूर्वक उन (विनायक)-के समीपमें गये ॥ ५६-५७ ॥ उस निशाचरीके ऊपर बैठे बालक विनायकको उठाकर वे कहने लगे, 'यह तो फूलके समान भारवाला है', साथ ही वे यह भी बोले कि 'इस दुष्ट स्वरूपवाली दुष्ट निशाचरीको यहाँसे दूर हटाओ ॥ ५८ ॥ जो दूसरेके अनिष्टकी कामना करता है, वह स्वयं मृत्युको प्राप्त होता है।' तदनन्तर काशिराज एवं अन्य जनोंने तथा ऋषियों एवं लोकपालोंने भी विनायकदेवकी भक्तिपूर्वक स्तुति की ॥ ५९ ॥ सभी बोले- हे देव विनायक ! आप देवताओं, मनुष्यों, नागों, राक्षसों, यक्षों, गन्धर्वों, ब्राह्मणों, हाथियों, घोड़ों, रथों तथा पक्षियोंके एकमात्र स्वामी हैं। भूतकाल, भविष्यत् तथा वर्तमान-तीनों कालों, बुद्धि, समस्त इन्द्रियों, हर्ष, शोक, दुःख, सुख, ज्ञान, मोह, अर्थ, समस्त कार्यों और हानि तथा लाभके आप ही स्वामी हैं। स्वर्ग, पाताल आदि लोकों, पृथ्वी, समुद्र, नक्षत्रों, ग्रहों, पिशाचों, लताओं, वृक्षों, नदियों, समस्त पुरुषों एवं स्त्रियों और बालकोंके स्वामी आप ही हैं। सृष्टि, स्थिति तथा संहार करनेवाले आपको बार-बार नमस्कार है ॥ ६०-६४ ॥ पशुओंके पति आपको नमस्कार है, तत्त्वका ज्ञान प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है। विष्णुस्वरूप आपको नमस्कार है, रुद्ररूप आपको नमस्कार है ॥ ६५ ॥ ब्रह्मारूप आपको नमस्कार है। अनन्त स्वरूपवाले आपको नमस्कार है। मोक्षके कारणरूप आपको नमस्कार है। विघ्नोंका हरण करनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ६६ ॥ अभक्तोंका विनाश करनेवाले आपको नमस्कार है। भक्तोंको प्रिय लगनेवाले अथवा भक्तोंको प्रिय माननेवाले आपको नमस्कार है। हे अधिदैव ! हे अधिभूतात्मन् ! आप तीन प्रकारके तापोंका हरण करनेवालेको नमस्कार है। सभी प्रकारके उपद्रवोंको विनष्ट करनेवाले तथा लीलास्वरूप धारण करनेवालेको नमस्कार है। आप सर्वान्तर्यामीको नमस्कार है। आप सर्वाध्यक्षको नमस्कार है ॥ ६७-६८ ॥ देवी अदितिके गर्भसे उत्पन्न हे देव विनायक ! आपको नमस्कार है। परब्रह्मस्वरूप महर्षि कश्यपके पुत्रको नमस्कार है। अप्रमेय मायासे समन्वित पराक्रमवाले, मायास्वरूपी, मायायुक्त जनोंको मुग्ध करनेवाले, अपरिमित मायाका विनाश करनेवाले और मायाके महान् आश्रयस्वरूप आपको बार-बार नमस्कार है ॥ ६९-७० ॥ ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारसे स्तुति करनेके अनन्तर उस राक्षसीको काटकर टुकड़े-टुकड़े करके नगरसे दूर ले जाकर फेंककर वे सभी प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घरोंको गये। हे अनघ ! तीनों प्रकारके उपद्रवोंको नष्ट करनेवाले इस स्तोत्रका जो पाठ करता है, उसको महान् उत्पात, विघ्नबाधा तथा भूतोंसे भय नहीं होता। जो तीनों सन्ध्याओंमें इस स्तोत्रको पढ़ता है, वह सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और देव विनायक सदा उसकी रक्षा करते हैं ॥ ७१-७३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'अदितिरूपा राक्षसीके वधका वर्णन' नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २१ ॥
बाईसवाँ अध्याय
३२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
बाईसवाँ अध्याय
काशीनगरीके निवासियों तथा शुक्ल नामक ब्राह्मणद्वारा विनायकको अपने-अपने घर ले जानेके लिये राजासे प्रार्थना करना और स्वीकृति प्राप्तकर विनायकके स्वागतकी तैयारी करना
ब्रह्माजी बोले—दूसरे दिनकी बात है, जब | है, वह इन्हें अपने घर ले जाकर इनकी पूजा करे और काशीनरेश प्रातःकालीन स्नान-सन्ध्या आदि नित्यकर्मोंमें | इन्हें भोजन भी कराये ॥ ८-९१/२ ॥ लगे हुए थे, उस समय सभी नगरवासी आपसमें यह | हे नागरिको ! सत्त्व, रज तथा तम—इन तीनों तर्क-वितर्क करने लगे कि ये विनायक न तो देवता हैं | गुणोंके आधारपर लोग सात्त्विक, राजस तथा तामस तीन और न मनुष्य ही हैं अथवा यदि ये देवता न होते तो | प्रकारके होते हैं। जो दुष्ट लोग हैं, वे देवताओंकी परीक्षा इन्होंने इन्द्र तथा विष्णुके द्वारा भी अजेय तथा अन्य | लेते हैं और जो पुण्यात्मा होते हैं, वे उनकी पूजा करते देवताओंके लिये भी सर्वथा अपराजेय पाँच महान् बल- | हैं। कुछ लोग इन विनायककी निन्दा करते हैं और कुछ शाली एवं पराक्रमी दैत्योंका वध कैसे किया ? ॥ १-२ ॥ | इनकी प्रशंसा करते हैं ॥ १०-११ ॥ यदि ये देवता ही हैं, तो [बालक बनकर] | जिस व्यक्तिका जैसा स्वभाव होता है, वह वैसा बालकोंके मध्य क्रीडा कैसे कर रहे हैं? इस प्रकार तर्क- | ही व्यवहार करता है। जैसे घिसे जानेपर भी चन्दन वितर्क करके वे सभी पुरवासी राजाके दर्शनके लिये | अपने सुगन्धरूपी स्वभावको नहीं छोड़ता है और आये। राजाने भी भद्रासनमें विराजमान होकर उन सभीसे | कस्तूरीपंकसे सना होनेपर भी प्याज अपने स्वाभाविक कहा—'आप लोगोंका जो कार्य हो, उसे बतायें, वह | गुण दुर्गन्धको नहीं छोड़ता। इन मुनिपुत्रपर यदि आपकी निश्चित ही पूर्ण होगा ॥ ३-४ ॥ | अनन्य भक्ति हो तो अपनी प्रसन्नताके लिये तथा इन्हें हे नगरनिवासियो ! आप लोग प्रातःकाल ही किस | भोजन करानेके लिये शीघ्र ही अपने घर ले जायें और प्रयोजनसे यहाँ आये हैं?' इसपर वे बोले—'हमारे | इनकी पूजा करें। इन्हें शक्ति-परीक्षणके लिये अपने घर निवेदनयोग्य अभीष्टके अतिरिक्त और अन्य कारण | न ले जायें, ये मेरे माता-पिताके समान हैं ॥ १२-१४ ॥ आनेका नहीं है। आप जिन मुनिपुत्र विनायकको यहाँ | मैं लोगोंसे कैसे कहूँ कि वे इन्हें अपने घर ले जाकर लाये हैं, हमारे द्वारा कहीं भी, कभी भी कुछ भी उनकी | इनकी पूजा करें। इनकी दृढ़ शक्ति देखकर मेरी इनपर सेवा-शुश्रूषा नहीं हो सकी है ॥ ५-६ ॥ | विशेष भक्ति हो गयी है। यदि इन्होंने मेरे नगरकी रक्षा न आपने तो अपने घरमें स्थित उनकी अनेक बार | की होती तो कहाँ आप होते और कहाँ मैं ? ॥ १५१/२ ॥ पूजा की है, आपके घरमें जो कुछ भी आता है, उसे | राजाके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर नगरके आप हमारे घर [भी] भेज देते हैं, किंतु बड़े आश्चर्यकी | लोग पुनः बोले—हे कल्याणकर्ता राजन् ! आप जैसा बात है कि हे राजन् ! फिर आपने इन विनायकको क्यों | कह रहे हैं, वह ठीक ही है, अनुचित नहीं है। हे नहीं हमारे पास भेजा ?' ॥ ७१/२ ॥ | राजन् ! हमारी कार्यसिद्धि जिस प्रकार हो, आप वैसा राजा बोले—हे नागरिको ! आप लोगोंने ठीक ही | ही करें ॥ १६-१७ ॥ कहा है कि जो वस्तु आपसमें बाँटकर खायी जाती है, | हम लोग इस बालकको अपने घर ले जाकर वह यदि विष भी हो तो अमृतके समान हो जाती है। | इसकी यथायोग्य पूजा करेंगे। इसी बीच संसारके इसके विपरीत अकेले खानेपर अमृत भी विष हो जाता | गुरुरूप सबके साक्षीस्वरूप वे बालक विनायक उन है। ये चाहे देवता हों या मनुष्य, इनपर जिसकी भक्ति | सबके अन्तर्भावको जानते हुए सभामें स्थित उन
क्री०ख०-अ०२२ ] * काशीवासियोंकी विनायकको अपने-अपने घर ले जानेकी राजासे प्रार्थना * ३२५ लोगोंसे बोले - ॥ १८ ॥ विनायक बोले- आप-जैसे महान् लोग मुझे ले जानेके लिये क्यों प्रार्थना कर रहे हैं ? मैं मुनिका पुत्र एक सामान्य बालक हूँ। मेरी पूजाके लिये बहुत-सा धन व्यय करनेवाले आप लोगोंको मेरी पूजासे क्या फल मिलेगा, इसे मैं नहीं जान पा रहा हूँ ॥ १९-२० ॥ जब कभी विवाह, यज्ञोपवीत, यज्ञ अथवा कोई महोत्सव होगा या देवकार्य अथवा पितृकार्य होगा, तब मैं आप लोगोंके घर चलूँगा ॥ २१ ॥ आप लोग असंख्य हैं और मैं अकेला हूँ, फिर मैं आप सबके घर कैसे जा सकता हूँ? आप-जैसे लोग दूध देनेवाली गायको छोड़कर जिस गौने दूध देना बन्द कर दिया है, ऐसी वकेशिनी गौको क्यों दुहना चाहते हैं ? जिस प्रकार माँगनेवाला कोई व्यक्ति कल्पवृक्षको छोड़कर सामान्य वृक्षसे अपनी मनोभिलषित वस्तुको माँगे अथवा कोई तुच्छ वस्तु माँगे, उसी प्रकार आपलोग भी उत्सुक हो रहे हैं ॥ २२-२३॥ ब्रह्माजी बोले- विनायकके वचनोंको सुनकर प्रधान-प्रधान नागरिक पुनः कहने लगे। राजाके पुत्रके इस विवाहके सम्पन्न हो जानेपर आप एक क्षण भी यहाँ नहीं रुकेंगे। राजाकी कृपासे हमें आपका दर्शन हुआ है, अब आप हमारी भक्तिको सफल बनायें। आप सर्वथा पूर्णकाम हैं, सृष्टि, स्थिति तथा संहार करनेवाले हैं, सर्वान्तर्यामी हैं, सबकी मनोवृत्तिको जाननेवाले हैं, कर्तुं (करनेमें) अकर्तुं (न करनेमें) एवं सर्वथा अन्यथाकर्तुं (विपरीत करनेमें) समर्थ हैं, फिर आप चिदानन्दको हमारे द्वारा की गयी पूजासे कोई प्रयोजन नहीं है। 'देव विनायक' भक्तिप्रिय हैं, वेदोंके इस वचनको आप मिथ्या न करें ॥ २४-२७ ॥ उन नागरिक जनोंके वचनोंको सुनकर विनायक उनसे बोले- 'आप लोगोंकी यदि ऐसी भक्ति है, तो मैं राजाकी आज्ञा मिलनेपर आप लोगोंके घर चलूँगा' ॥ २८ ॥ विनायककी यह बात सुनकर वे सभी नगरवासी अपने-अपने घरको चले गये। घर पहुँचकर किसीने विनायकके स्वागतके लिये मण्डपोंका निर्माण किया, किसीने वस्त्रोंसे आच्छादितकर [विशेष प्रकारके] मण्डप बनाये। उन्होंने श्रद्धा-भक्तिसे तोरणद्वार बनाये, जो दर्पणोंसे सुशोभित तथा अद्भुत थे। अत्यन्त मूल्यवान् पात्र, सुगन्धित द्रव्य, चन्दन-कस्तूरीसे युक्त सुगन्धित द्रव्य, फल तथा विभिन्न प्रकारके वस्त्र एवं आभूषण और पंचामृतसे समन्वित विविध पक्वान्न वहाँ स्थापित किये। साथ ही विविध प्रकारकी मुक्ताकी मालाओंसे विभूषित मूर्तियोंको भी वहाँ स्थापित किया। इस प्रकार सभी लोग इन सामग्रियोंको अपने घरोंमें सुसज्जितकर अत्यन्त प्रफुल्लित थे ॥ २९-३२१/२ ॥ काशीनगरीकी सीमाके पास वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता एक ब्राह्मण निवास करते थे। उनका नाम शुक्ल था। उनकी वृत्ति - आजीविका अत्यन्त पवित्र थी। वे शान्त प्रकृतिके, इन्द्रियोंपर संयम रखनेवाले, क्षमाशील, श्रौत तथा स्मार्तकर्मोंमें परायण और ब्रह्मनिष्ठ थे, अतिथियोंका सत्कार करना उन्हें अत्यन्त प्रिय था ॥ ३३-३४ ॥ उनकी पत्नीका नाम विद्रुमा था, जो महाभाग्यशालिनी थीं, वे सब प्रकारकी इच्छाओंसे रहित और ज्ञानसे सम्पन्न थीं। उनके शरीरके सभी अंग बहुत ही सुन्दर थे ॥ ३५ ॥ धनसे हीन होनेपर भी वे ज्ञाननिष्ठ थीं। पतिव्रता थीं और पतिको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय माननेवाली थीं। उनके घरसे ऊपरकी ओर देखनेपर ताराओंसे सुशोभित आकाशमण्डल स्पष्ट दिखलायी पड़ता था ॥ ३६ ॥ उनके गृहमें सोने, चाँदी, ताँबे तथा पीतलके पात्र नहीं थे। विद्रुमा गौरवर्णकी थीं, वे वल्कल वस्त्रोंको धारण करनेवाली तथा तेजकी दीप्तिसे अत्यन्त सुशोभित रहती थीं। उनकी देहकान्तिसे व्याप्त रहनेके कारण दृश्यमान वस्तु भी दिखलायी नहीं पड़ती थी। अपने पतिकी सामान्य-सी आजीविकासे सन्तुष्ट वे विद्रुमा घरकी शोभाको बढ़ानेवाली थीं ॥ ३७-३८ ॥ शुक्ल नामके वे ब्राह्मण अपनी पत्नीकी सन्तोषकी प्रवृत्ति तथा उसके विनयी स्वभाव और सेवासे बहुत प्रसन्न रहते थे। वे भोजनसे रहित होनेपर भी अपनी आत्मामें स्थित तथा ज्ञाननिष्ठ रहते थे ॥ ३९ ॥ एक बार जब वे भिक्षाके लिये निकले तो
३२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- विनायकके निमित्त महोत्सवमें संलग्न रहनेके कारण लोगोंने उन्हें अपने-अपने घरसे वापस लौटा दिया ॥ ४० ॥ उन्हें भिक्षामें जो कुछ भी मिला, उसीसे सन्तुष्ट हुए उन्होंने अपनी भार्यासे आकर कहा—'हे धर्मपत्नी ! सुनो, आज नगरीके प्रत्येक घरमें मैं भिक्षा दिये बिना ही लौटा दिया गया ॥ ४१ ॥ पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये उद्यत जो विनायक मुनि कश्यपके घरमें अवतरित हुए हैं, वे ही आज पूजा ग्रहण करनेके लिये प्रत्येक घरमें आयेंगे ॥ ४२ ॥ यदि वे पूजा ग्रहण करनेके लिये हमारे घर भी आयेंगे तो तुम उनकी पूजाकी व्यवस्था करो।' इसपर विद्रुमा बोली—'दूसरे घरोंमें महान् पूजाको छोड़कर वे आपके घरमें अन्न ग्रहण करने कैसे आयेंगे ? ॥ ४३ ॥ अथवा आप-जैसे नितान्त निर्धनोंके घरमें वे कैसे आयेंगे, हे मुने ! गन्ध, पुष्प, बासी पक्वान्न, कन्दमूल, फल आदि जो कुछ भी अल्प मात्रामें उचित-अनुचित होगा, उसीसे उनका सत्कार किया जायगा अथवा हे प्रभो ! उनका आपके घरमें आनेका क्या प्रयोजन हो सकता है ?' ॥ ४४-४५ ॥ अपनी प्रिय पत्नी विद्रुमाके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर वे मुनि पुनः अपनी पत्नीसे बोले—'दीनों तथा अनाथोंके स्वामी वे प्रभु विनायक मुझे अपना भक्त समझते हैं। वे देव विनायक भक्तिप्रिय हैं, वे प्रभु तनिक भी लोभके वशीभूत नहीं होते। वे जल, पत्र-पुष्पसे ही प्रसन्न हो जाते हैं ॥ ४६-४७ ॥ दम्भपूर्वक समर्पित की गयी सुवर्णकी अकूत धनराशिसे भी वे प्रसन्न नहीं होते।' पतिके ऐसे वचन सुनकर विद्रुमाने पुनः कहा— ॥ ४८ ॥ यदि ऐसी बात है तो जो कुछ पकाया गया अन्न है, वही उन्हें निवेदित करें। तब विद्रुमाने अठारह प्रकारके धान्योंको पीसकर उसे पकाया ॥ ४९ ॥ पुराने चावलोंका अधिक जलवाला भात बनाया। वे प्रतिदिन एक मुट्ठीभर आटेको दोनेमें रखकर शेषका भोजन बनाकर उसे ग्रहण करती थीं ॥ ५० ॥ प्रतिदिन मुट्ठीभर बचाये गये उस आटेको बेचकर प्राप्त धनसे वे वस्त्र खरीदकर लायीं। गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, महाआरती, वन्य फल तथा वल्कल वस्त्रोंको उन्होंने एक स्थानपर स्थापित किया। भोजनके अनन्तर मुखको सुगन्धित करनेके लिये उन्होंने सूखे आँवलेके टुकड़ोंको भी रखा ॥ ५१-५२ ॥ जलसे अच्छी प्रकार सींचे गये अपने आँगनमें उन्होंने कुशोंको फैलाकर ध्वजकी स्थापना की और आसनको बिछाया। तदनन्तर वे मुनि सर्वप्रथम नैवेद्यको स्थापित करके बलिवैश्वदेव करनेके अनन्तर ध्याननिष्ठ हो गये ॥ ५३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २२ ॥ तेईसवाँ अध्याय कुमार सनक तथा सनन्दनका बालक विनायकके दर्शनके लिये काशीनरेशकी सभामें आना, बालक विनायकका शुक्ल नामक ब्राह्मणके घरमें उसका आतिथ्य स्वीकार करने जाना तथा शुक्ल-दम्पतीको विविध वरोंकी प्राप्ति ब्रह्माजी बोले—वे बालक विनायक बालकोंके साथ बड़े ही कौतूहलके साथ खेल खेलने लगे। राजा भद्रासनपर आसीन होकर सभी जनोंके साथ वारांगनाओंका नृत्य देखने लगे। उसी समय देवलोकसे सनक तथा सनन्दन दो कुमार राजाकी उस रमणीय सभामें आये ॥ १-२ ॥ उन दोनोंकी सूर्य एवं अग्निके समान दीप्तिसे वह सम्पूर्ण सभा दीप्तिमान् हो उठी। अकस्मात् उन दोनों कुमारोंको आया हुआ देखकर वे राजा अपने आसनसे उठ खड़े हुए ॥ ३ ॥ उन दोनोंके चरणकमलोंमें अपना सिर रखकर राजाने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और वे दोनों हाथ जोड़कर कहने लगे—आज मेरा कुल धन्य हो गया।
क्री०ख०-अ०२३ ] * कुमार सनक तथा सनन्दनका विनायक-दर्शनहेतु काशीनरेशके पास आना * ३२७ मेरा राज्य, ज्ञान, देह, पत्नी तथा पुत्र आदि जो कुछ भी है, वह सब धन्य हो गया। ऐसा कहकर राजाने हाथ पकड़कर उन दोनोंको अपने आसनपर बैठाया ॥ ४-५ ॥ तदनन्तर राजाने सोलह उपचारोंके द्वारा भक्तिपूर्वक उनका पूजन किया और उनके चरणोंको दबाना आदि सेवाओंके द्वारा उन्हें विश्राम कराया। वे बार-बार उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार कहने लगे ॥ ६ १/२ ॥ राजा बोले—दण्डका त्याग किये हुए तथा नित्य निष्काम मुनियोंको कभी भी कोई कामना नहीं होती, तथापि मैं अपने तप, राज्य, कुल तथा शीलको सार्थक बनानेके लिये आप लोगोंकी सेवाकी इच्छा करता हूँ ॥ ७-८ ॥ वे दोनों बोले—महर्षि कश्यपके पुत्र विनायक जो आप्तकाम, परब्रह्मस्वरूप, लीलावतारी भगवान् आपके घरमें स्थित हैं, वे अद्भुत पराक्रमशाली हैं और नाना प्रकारके कौतुक करनेवाले हैं। उनके अद्भुत कर्मोंके विषयमें सुनकर हम दोनों उनका दर्शन करनेके लिये यहाँ आये हैं ॥ ९-१० ॥ इसके अतिरिक्त इन्द्रभवनसे यहाँ आनेका हमारा दूसरा कोई प्रयोजन नहीं है। जिसके घरमें ही कल्पवृक्ष है, वह दूसरोंसे क्या याचना करेगा ? ॥ ११ ॥ हे राजन् ! उनके चरणकमलोंमें प्रणाम करके हम अपने स्थानको चले जायँगे। उनके वहाँ आकर इस प्रकारके कहे गये वचनोंको सुनकर बालक विनायक खेल छोड़कर हाथमें मोदक लेकर वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने अपने हाथमें पाँच खाद्य पदार्थोंसे बना हुआ भक्षणीय मोदक लीलापूर्वक धारण किया हुआ था ॥ १२-१३ ॥ राजाने उन दोनोंको मधुर हास्य करते हुए बालक विनायकको दिखाया और कहा—वे ये देव विनायक आ गये हैं, जिनके दर्शनोंके लिये आप लोग उत्सुक हैं। वे आ गये हैं, अब आप लोगोंका जो अभीष्ट करणीय है, उसे सम्पन्न करें। उनका दर्शन करके वे दोनों मुनि सनक तथा सनन्दन आपसमें कहने लगे ॥ १४-१५ ॥ इसने निश्चित ही मुनिश्रेष्ठ कश्यपजीको भी दूषित कर डाला है; क्योंकि उनका पुत्र होते हुए भी इसने अपने सदाचारका परित्याग कर दिया है ॥ १६ ॥ स्पृश्य तथा अस्पृश्यके विषयमें इसका कोई विचार नहीं है और न इसे भक्ष्याभक्ष्यकी विधि ही ज्ञात है। इसके दर्शन करने तथा इसका स्पर्श करनेमें भी निश्चित ही महान् दोष है ॥ १७ ॥ यह अपने ब्राह्मणवर्णोचित नियमोंका परित्यागकर क्षत्रियके घरमें किसलिये रह रहा है ? स्वधर्ममें स्थित हम लोगोंका इसके दर्शनसे क्या फल है ? ॥ १८ ॥ उस समय राजाके समीप स्थित उन विनायकदेवने उन दोनोंके वचनोंको सुना। तब वाक्यार्थको जाननेवाले साक्षात् दूसरे बृहस्पतिके समान वे विनायक बोल पड़े। हे मुनियो ! व्यर्थ ही श्रम करनेवाले आप लोगोंका ज्ञान कहाँ चला गया ? आप लोग स्वर्गलोकका परित्यागकर एक सामान्य व्यक्तिकी भाँति यहाँ कैसे आये हैं ? ॥ १९-२० ॥ तदनन्तर मायामय देव विनायककी मायासे अत्यन्त मोहित वे दोनों कुमार विनायकका इस प्रकारका वचन सुनकर राजासे कहने लगे— ॥ २१ ॥ हमें अनुज्ञा प्रदान कीजिये, हम अपने आश्रम- मण्डलको जाते हैं। तब नृपश्रेष्ठ काशीनरेश उन दोनोंके प्रति दृढ़ भक्तिसे प्रेरित होकर उन दोनोंसे बोले—आप मेरी बात सुनें और कुछ देरके लिये ठहर जायँ। पुनः उन्होंने भक्तिपूर्वक प्रार्थना की कि आपलोग स्नान करके भोजन करें, तदनन्तर ही जायँ ॥ २२-२३ ॥ राजाकी प्रार्थना सुनकर वे दोनों मुनिश्रेष्ठ बोले— राजाका अन्न भक्षण करना वर्जित है, अतः हम दोनों यहाँसे जा रहे हैं ॥ २४ ॥ तदनन्तर राजाकी अनुमति प्राप्तकर वे दोनों मणिकर्णिकातीर्थमें गये। इधर बालक विनायक अपने साथ आ रहे सभी बालकोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक क्रीडा करते हुए स्नान करनेके अनन्तर उन शुक्ल नामक ब्राह्मणकी भक्तिका आदर करके उनके घरमें उसी प्रकार प्रविष्ट हुए, जैसे कि कोई गौ अपने बछड़ेके पीछे दौड़ती है, जैसे माता रोते हुए शिशुके समीप जाती है और जैसे कौरवोंकी सभाके मध्यमें स्थित शरणागत द्रौपदीके पास भगवान् कृष्ण गये थे ॥ २५-२६ १/२ ॥ उन विनायकदेवका दर्शन करके वे दम्पती उनके
३२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 चरणोंपर गिर पड़े। आनन्दके कारण अपने नेत्रोंसे आँसू गिराते हुए उन दोनोंने गद्गद वाणीमें बोलते हुए बड़ी ही प्रसन्नताके साथ उनका आलिंगन किया और हर्षनिर्भर होकर वे दोनों नाचने लगे ॥ २७-२८ ॥ उन्हें अपनी देहकी सुध-बुध नहीं रही, इस समय क्या करना चाहिये—इसे वे जान न सके। उन दोनोंके शरीरमें रोमांच हो आया और वे अपने नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाने लगे ॥ २९ ॥ मुहूर्तमात्र बीत जानेपर जब उन्हें होश आया तो उन्होंने उन जगदीश्वरको प्रणाम किया। तदनन्तर मुनि शुक्ल उन देव विनायकसे कहने लगे—आपका 'दीनानाथ' यह जो अत्यन्त कल्याणकारी तथा पापोंका हरण करनेवाला नाम तीनों लोकोंमें विख्यात है, उसे आज आपने सार्थक कर दिया है और अपने चरणोंका दर्शन कराकर हमारा जन्म लेना भी सार्थक कर दिया है ॥ ३०-३१ ॥ आप बड़े-बड़े गगनचुम्बी भवनोंको छोड़कर हमारी इस पर्णकुटीमें आये हैं। आज मेरा वंश धन्य हो गया। मेरा जीवन धन्य हो गया। मेरा ज्ञान धन्य हो गया। मेरी तपस्या धन्य हो गयी और मेरी आयु धन्य हो गयी। तदनन्तर उन मुनिने उन विनायकदेवको कुशासनमें विराजमान कराकर उनकी पूजा की। उनके युगलचरणोंका प्रक्षालन करके उस जलको अपने सिरमें धारण किया ॥ ३२-३३ ॥ तदनन्तर गन्ध, अक्षत, पुष्पमाला, धूप, दीप, दूर्वांकुर, शमीपत्र, सुगन्धित तेल तथा शुभ केतकी पुष्प अर्पित किया। इसके अनन्तर उनके सामने अल्पमात्रामें खाद्य नैवेद्य तथा वन्य फलोंको निवेदित किया। तदनन्तर मन्त्रोंसे पवित्र की गयी पुष्पांजलि देकर और उन्हें प्रणाम करके वे मुनि लज्जित हो उठे। यह सोचकर कि किस प्रकार इन्हें हम निकृष्ट अन्न भोजनके लिये प्रदान करें! ॥ ३४-३५१/२ ॥ उनके अभिप्रायको जानकर देवाधिदेव विनायकने उन ब्राह्मणकी पत्नीसे भोजनकी याचना करते हुए कहा—हे मातः! आपके घरमें कौन-सा भोजन बना है। उसे मुझे प्रदान करें। भक्तिपूर्वक दिया गया क्षुद्र अन्न भी मुझे अमृतसे बढ़कर प्रिय लगता है और जो भोजन श्रद्धारहित होकर दम्भपूर्वक दिया जाता है, वह विषके समान हो जाता है ॥ ३६-३७१/२ ॥ तदनन्तर मुनिपत्नीने अत्यन्त लज्जाके साथ पात्रमें फैला हुआ भात और बहुतसे अन्नोंके मिश्रणसे बनायी गयी सूखी पीठीको विनायकके आगे स्थापित किया। भोजनके लिये उपस्थित उस तेल (-के समान तरल पदार्थ)-को देखकर अन्य सभी बालक विनायकपर हँस पड़े ॥ ३८-३९ ॥ विनायकदेवने वह निवेदित भोजन स्वादिष्ट पक्वान्नकी भाँति बड़े ही आदरभावसे ग्रहण किया। वे प्रत्येक ग्रासके अनन्तर जल पीकर बलपूर्वक उसे निगल रहे थे। तदनन्तर मुनिने सारा गीला भात उनके भोजनपात्रमें डाल दिया। तब वह गीला भात पात्रकी चारों दिशाओंमें फैलकर बहने लगा और वे बालक विनायक उसे रोकनेमें असमर्थ हो गये ॥ ४०-४१ ॥ तब बालक विनायकने दस भुजाओंवाला बनकर उन हाथोंसे वह सारा भात ग्रहण किया। लोगोंने आश्चर्यपूर्वक उन्हें देखा और वे हँसते हुए हाथसे ताली पीटने लगे ॥ ४२ ॥ घुटनेतक पानीमें पकाया गया यह अभूतपूर्व