कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
५२२ कथासरित्सागर
५२२ कथासरित्सागर निर्याति च कृतस्वस्तिकार तं च सविस्मयम् । युवानं वीक्ष्य पप्रच्छ दाशः सत्यव्रतस्ततः ॥५३॥ कस्त्वं कथं कुतश्चैषा शफरोदरशामिता । वृथास्त्वयाप्ता कोऽयं ते वृत्तान्तोऽप्यन्तमद्भुतः ॥५४॥ तच्छ्रुत्वा शक्तिदेवस्तं दाशेन्द्रं प्रत्यभाषत । ब्राह्मणः शक्तिदेवाख्यो वर्धमानपुरावहम् ॥५५॥ अवश्यगम्या कनकपुरी च नगरी मया । अजानानश्च तां दूराद् भ्रान्तोऽस्मि सुचिरं भुवम् ॥५६॥ ततो दीर्घतपोवाक्यात्सम्भाव्य द्वीपगां च ताम् । तज्जन्मज दाशपतेरस्यैतद्द्दीपवासिनः ॥५७॥ पार्श्वं सत्यव्रतस्याहं गच्छन्वहनभङ्गतः । मग्नोऽम्बुधौ निगीर्णोऽस्मि मत्स्येन प्रापितोऽधुना ॥५८॥ इत्युक्तवन्तं च शक्तिदेवं सत्यव्रतोऽब्रवीत् । सत्यव्रतोऽहमेवेन्द्रद्वीपे सम्मदमव ते ॥५९॥ किन्तु दृष्टा बहुद्वीपद्रुत्वेनापि१ न सा मया । नगरी त्वदभिप्रेता द्वीपान्तपु श्रुता पुन ॥६०॥ इत्युक्त्वा शक्तिदेवं च विषण्णं वीक्ष्य तत्क्षणम् । पुनरभ्यागतप्रीत्या तं स सत्यव्रतोऽभ्यधात् ॥६१॥ ब्रह्मन् ! मा गा विषादं त्वमिहैवाद्य निशां वस । प्रातः कश्चिन्दुपायं तं विधास्यामीप्सितद्धये ॥६२॥ इत्याश्वास्य स तेनैव दाशेन प्रहितोऽथ । मुख्यमातिथ्यसत्कारं द्विजो विप्रमठं ययौ ॥६३॥ तत्र मठासिनस्तेन कृताहारो द्विजन्मना । विष्णुदत्ताभिधानेन सह चक्रे कथाक्रमम् ॥६४॥ तत्प्रसङ्गाच्च तेनैव पृष्टस्तस्मै शशंस तत् । निजं दशं कृतं कृत्स्नं वृत्तान्तं च शनैः सः ॥६५॥ तद्बद्धया परिरभ्यमं विष्णुदत्तः स तत्क्षणम् । बभाषे हर्षवाष्पाम्बुधर्मराजशरर्जरम् ॥६६॥ शिष्या मातृष्वसुपुत्रस्त्वंमवत्त्वद्गमञ्च मे। १ दृष्टवत्तेत्यर्थः ।
पंचम लम्बक ५२१
पंचम लम्बक ५२१ मच्छ के पेट से निकले हुए और कल्याण-कामना करते हुए उस युवक को देखकर चकित सत्यव्रत ने पूछा—'हे ब्राह्मण ! तुम कौन हो ? कैसे हो ? इस मत्स्य के पेट में तुमने शयन कैसे किया ? तुम्हारा यह वृत्तान्त अत्यन्त अद्भुत है' ।।५३-५४।। यह सुनकर शक्तिदेव उस निषादराज से बोला—'मैं शक्तिदेव नामक ब्राह्मण वर्धमान नगर से आया हूँ। मुझे कनकपुरी अवश्य जाना है। उसका पता न जानने के कारण चिरकाल तक दूर-दूर घूमा हूँ। तत्पश्चात् दीर्घतपा मुनि के कथन से उसके किसी द्वीपान्तर में होने का अनुमान करके उत्पल द्वीप-निवासी निषादराज सत्यव्रत के पास जाने के लिए जहाज पर आया और जहाज के टूट जाने पर मुझे मत्स्य ने निगल लिया और उसीने मुझे यहाँ पहुँचा दिया' ।।५५- ५८।। इस प्रकार कहते हुए शक्तिदेव को सत्यव्रत ने पुनः कहा—'मैं ही सत्यव्रत हूँ और यही उत्पलक द्वीप है। किन्तु अनेक द्वीपों को देखनेवाले मैंने तुम्हारी ईप्सित कनकपुरी नहीं देखी है। हाँ द्वीपों के अन्त में है ऐसा सुना गया है' ।।५९-६०॥ उसके ऐसा कहने पर शक्तिदेव को निराश और खिन्न देखकर अतिथि-प्रेम से सत्यव्रत बोला—॥६१॥ 'हे ब्राह्मणदेवता खेद न करो। आज रात को यहीं निवास करो। प्रातःकाल तुम्हारी सफलता के लिए कोई उपाय करूँगा' ।।६२।। ऐसा आश्वासन देकर निषाद के द्वारा भेजा गया वह शक्तिदेव एक ब्राह्मण-मठ में गया जहाँ अतिथियों का सत्कार सुलभ था। उस मठ में रहनेवाले विष्णुदत्त नामक एक ब्राह्मण द्वारा भोजन कराने पर शक्तिदेव ने उसके साथ अपनी जीवन-चर्चा प्रारम्भ की ।।६३-६४।। उसका परिचय सुनकर तुरन्त ही विष्णुदत्त ने उसका आलिङ्गन करके हर्ष के आँसुओं के कारण रुँधे हुए कण्ठ से गद्गद होकर कहा—'भाग्य से तू मेरे मामा का लड़का (ममेरा भाई) है और हम दोनों एक ही देश में उत्पन्न हुए हैं ।।६५-६७।।
५२४ कथासरित्सागर
५२४ कथासरित्सागर अहं च बाल्य एव प्राक्तस्माद्देशादिहागतः ॥६७॥ तदिहस्वास्व न चिरात् साधयिष्यसि चात्र ते । इष्टं द्वीपान्तरगच्छद्वणिक्कणपरम्परा ॥६८॥ इत्युक्त्वानयमावेशं विष्णुदत्तो यथोचितम् । तं शक्तिदेवं तत्कारमुपचारमथाचरत् ॥६९॥ शक्तिदेवोऽपि सम्प्राप्य विस्मृताध्वक्लमो मुदम् । विदधे वायुलाभो हि मराब्मुसनिर्मंरः ॥७०॥ अमन्यत च निजाभीष्टसिद्धिमप्यनवर्तिनीम् । अन्तरापाति हि श्रेयः कार्यसम्पत्तिसूचकम् ॥७१॥ ततो रात्रावनिद्रस्य शयनीयं निपेयुषः । अभिवाञ्छितसम्प्राप्तिगतचित्तस्य तस्य सः ॥७२॥ शक्तिदेवस्य पार्श्वस्थो विष्णुदत्तः समथनम् । विनोदपूर्वकं कुर्वन्कथां कथितवानिमाम् ॥७३॥ अशोकदत्तस्य कपालस्फोटराक्षसाधिपतेश्च कथा पुरामूत् सुमहाविप्रो गोविन्दस्वामिसंज्ञकः । महाप्रहारे कालिन्द्या उपकण्ठनिवेशिनि ॥७४॥ जायेते स्म च तस्य द्वौ सदृशौ गुणशालिनः । अशोकदत्तो विजयदत्तश्चेति सुतौ क्रमात् ॥७५॥ कालेन तत्र वसतां तेषामजनि दारुणम् । दुर्भिक्षं तत्र गोविन्दस्वामी भार्यामुवाच सः ॥७६॥ अयं दुर्भिक्षदोषेण देशस्तावद् विनाशितः । तन्न शक्नोम्यहं द्रष्टुं सुहृद्बान्धवदुर्गतिम् ॥७७॥ दीयतां च कियत् कस्य तस्मादन्नं यदस्ति नः । तद्गृह्या मित्रबन्धुभ्यां व्रजामो विषयादितः ॥७८॥ वाराणसीं च मासाय सकुडुम्बा धयामहे । इत्युक्तया सोऽनुमतो भार्ययाऽस्मदाशिजम् ॥७९॥ सदारसुतभृत्यश्च स देशात्प्रययौ ततः । उत्सहन्ते न हि । द्रष्टमुत्तमाः स्वजनापदम् ॥८०॥
पंचम लम्बक ५२५
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मैं बहुत पहले अपने देश से यहाँ आ गया था। अब तुम यहीं रहो। शीघ्र ही द्वीपान्तरों से आनेवाले व्यापारी बनियों के कानों-कान तुम्हारा कार्य सिद्ध होगा॥६७-६८॥ ऐसा कहकर अपने कुल का पता लगाकर विष्णुदत्त ने उस समय के योग्य उपचारों से शक्तिदेव की सेवा की॥६९॥ शक्तिदेव भी उसे पाकर मार्ग के दुःसह कष्टों को भूल गया। विदेश में अपने बन्धु जन का मिलना मरुभूमि में अमृत के झरने के समान सुखद होता है॥७०॥ उसने अपने अभीष्ट कार्य की सिद्धि को भी समीप आया हुआ समझा। किसी कार्य के प्रसंग के बीच में आनेवाला क्षेम कार्य की समृद्धि का सूचक होता है॥७१॥ तब रात्रि में शय्या पर लेटे हुए, अपनी कार्य-सिद्धि की चिन्ता में जागते हुए शक्तिदेव के पास सोया हुआ विष्णुदत्त उसकी कार्य-सिद्धि का समर्थन करता हुआ इस प्रकार की कथा उसको सुनाने लगा—॥७२-७३॥
अशोकदत्त और राक्षसराज कपालस्फोट की कथा
पुराने समय में यमुना नदी के तट पर एक विशाल गाँव में गोविन्दस्वामी नाम का एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहता था॥७४॥ उस गुणी ब्राह्मण के उसी के समान दो पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें बड़े का नाम अशोकदत्त और छोटे का नाम विजयदत्त था॥७५॥ उसके वहाँ रहते हुए दैवयोग से उस ग्राम में भीषण अकाल पड़ गया। तब गोविन्द स्वामी ने अपनी पत्नी से कहा—अकाल के कारण यह देश नष्ट हो रहा है। अतः मैं अपने सामने अपने मित्रों और बन्धु-बान्धवों की दुर्दशा नहीं देख सकता॥७६-७७॥ इसलिए हमारे घर में जितना अन्न है उसे 'किसे कितना देना है'—यह निश्चय करके मित्रों और बन्धुओं को दे डालो। तब यहाँ से किसी दूसरे देश को चलें॥७८॥ यहाँ से चलकर कुटुम्ब के साथ वाराणशी नगरी को चलें। इस प्रकार अपनी पत्नी से परामर्श करके उसने अपने घर का सारा अन्न बाँट दिया॥७९॥ तदनन्तर, अपनी स्त्री बालक और सेवक के साथ उस देश से चल पड़ा। उच्चकोटि के व्यक्ति अपने व्यक्तियों का कष्ट नहीं देखना चाहते॥८०॥
गच्छंश्च मार्गे जटिलं भस्मपाण्डुं कपालिनम्। सार्धचन्द्रमिवेशानं महाव्रतिनमक्षत॥८१॥ उपेत्य ज्ञानिनं तं च नत्वा स्नेहेन पुत्रयोः। शुभाशुभं स पप्रच्छ सोऽप्य योगी जगाद तम्॥८२॥ पुत्रौ त भाविकल्याणौ किं स्वनेन कनीयसा। ब्रह्मन्विजयदत्तेन वियोगस्ते भविष्यति॥८३॥ ततोऽन्याशोकदत्तस्य द्वितीयस्य प्रभावतः। एतेन सह युष्माकं भूयो भावी समागमः॥८४॥ इत्युक्तस्तेन गोविन्दस्वामी स ज्ञानिना सदा। मुमुचुः साद्भुताश्चान्तस्तमामन्त्र्य ततो ययौ॥८५॥ प्राप्य वाराणस्रीं तां च तद्वाह्ये चण्डिकागृहे। न्नि तत्प्रातिषेन्नाम देवीपूजादिकर्मणा॥८६॥ भाया च तत्रैव बहिः सकुडुम्बस्तरास्तलम्। समावसद कार्पटिकः सोऽन्यदेशागतैः सह॥८७॥ रात्रौ च तत्र सुप्तेषु सर्वेष्वधिगताध्वसु। श्रान्तेष्वास्तीर्णपर्णादिपान्थशय्यानिपातिषु ॥८८॥ तदीयस्य विबुद्धस्य तस्याकस्मात्कनीयसः। सूनोर्विजयदत्तस्य महान् शीतज्वरोऽजनि॥८९॥ स तमं सहसा भावि बन्धुविश्लेषहेतुना। भयेनेव ज्वरेणाभूदूर्ध्वरोमा सबाष्पयुः॥९०॥ शीतातंश्च प्रबोध्यैव पितरं स्वमवाच तम्। बाधत तात तीव्रो मामिह शीतज्वरोऽधुना॥९१॥ तन्मे समिधमानीय शीतघ्नं ज्वलयानलम्। नान्यथा मम शास्तिः स्यान्नयय न च यामिनीम्॥९२॥ तच्छ्रुत्वा तं स गोविन्दस्वामी तद्वेदनाकुलः। तावत्कुतोऽधुना वह्निर्वत्सेति च समन्यथात्॥९३॥ नन्वयं निकटे तात पश्यत्यग्निर्ज्वलन्नितः। भूमिष्ठेऽत्रव तद्गत्वा किं नाङ्गं तापयाम्यहम्॥९४॥ तस्मात् सकम्पं हस्ते मां गृहीत्वा प्रापय द्रुतम्। इत्युक्तस्तेन पुत्रेण पुनर्विप्रोऽपि सोऽब्रवीत्॥९५॥
पंचम लम्बक ५२७
पंचम लम्बक ५२७ गोविन्दस्वामी ने मार्ग में चलते हुए जटाधारी भस्म रमाये खप्पर लिये और अर्धचन्द्र धारण किय हुए शिव के समान एक तपस्वी को देखा ॥८१॥ उसने उस तपस्वी से अपना शुभ-अशुभ पूछा। तब वह योगी कहने लगा—'तुम्हारे तीनों बालकों का भविष्य कल्याणमय है किन्तु इनमें छोटे बालक विजयदत्त से तुम्हारा वियोग हो जायगा। तब बड़े पुत्र अशोकदत्त के प्रभाव से उसके साथ फिर तुम्हारा समागम होगा' ॥८२-८४॥ इस प्रकार उस ज्ञानी से कहा हुआ गोविन्दस्वामी सुख और दुःख दोनों से आक्रान्त होकर वहाँ से चला गया ॥८५॥ तदनन्तर वाराणसी पहुँचकर उसके बाहरी भाग में स्थित चंडिका के मन्दिर में ठहरा। यहाँ देवी की पूजा आदि कार्यों में उसका दिन बीत गया। रात में भी वह मन्दिर के बाहर, वृक्ष के नीचे अन्य देशों से आये हुए यात्रियों के साथ सपरिवार सो गया ॥८६-८७॥ यात्रा से होनेवाली थकावट के कारण अन्य सभी यात्रियों के पत्त आदि के बिछावनों पर सो जाने के पश्चात् जागते हुए उस ब्राह्मण के छोटे पुत्र को शीतज्वर का महान् प्रकोप हुआ। भविष्य में होनेवाले अपने परिवार के वियोग के कारण-स्वरूप उसके ज्वर का प्रकोप बढ़ गया। रौंगटे खड़े हो गये और शरीर कांपने लगा ॥८८-९०॥ ठंडक से काँपते हुए उसने पिता को जगाकर कहा—'पिता ! मुझे भीषण शीतज्वर कष्ट दे रहा है। इसलिए इस शीत को दूर करने के लिए लकड़ी लाकर आग जलाओ। इसके बिना न तो मुझे शान्ति मिलेगी और न रात ही बिता सकूँगा' ॥९१-९२॥ यह सुनकर उसके कष्ट से घबराया हुआ गोविन्दस्वामी बोला—'इस समय रात को आग कहाँ से लगाऊँ? तब विजयदत्त ने कहा—'पिताजी वह देखो पास ही कहीं आग जल रही है। इसलिए काँपते हुए मुझे हाथ पकड़कर वहाँ ले चलो' ॥९३-९५॥
५२८ कथासरित्सागर
५२८ कथासरित्सागर श्मशानमेतद्देषा च चिता ज्वलति तत्क्षणम्। गम्यतेऽत्र पिशाचादिभीषणं त्वं हि बालकः ॥१९६॥ एतच्छ्रुत्वा पितुर्वाक्यं त्रस्तस्य विहस्य सः। वीरो विजयदत्तस्तं सावष्टम्भमभाषत ॥१९७॥ किं पिशाचादिभिस्तात वराकं क्रियत मम। किमल्पसत्त्वः कोऽप्यस्मि तदशङ्क नयैष माम् ॥१९८॥ इत्याग्रहाद् ब्रुवन्तं तं स पिता तत्र नीतवान्। सोऽप्यङ्गं तापयन् बाण्च्छितामुपससर्प ताम् ॥१९९॥ ज्वलन्तीमनलज्वालाधूमव्याकुलमूर्धजाम् । नृमांसग्राहिणीं साक्षान्नि रक्षोधिदेवताम् ॥२००॥ क्षणात्तत्र समाश्वस्य सोऽर्भकः पितरं च तम्। चितान्तर्वृष्यते वृत्तं किमसदिति पृष्टवान् ॥२०१॥ कपालं मानुपम्यतन्चितायां पुत्र दह्यते। इति तं प्रत्यवादीत्तं सोऽपि पार्श्वस्थितः पिता ॥२०२॥ ततः स्वसाहसेनेव दीप्ताग्रेण निहत्य तम्। कपालं स्फोटयामास काष्ठेनैकेन सोऽर्भकः ॥२०३॥ ततोऽस्य प्रसुता तस्मान् मुखे तस्यापतद् वसा। श्मशानबलिभा नक्तञ्चरीसिद्धिरिवापिता ॥२०४॥ तदास्वादन बालश्च सम्पन्नाद्भूत्स राक्षसः । ऊर्ध्वकेशः शिखोल्लातसङ्गो दंष्ट्राविशङ्कटः ॥२०५॥ आकृष्य च कपालं तद् वसां पीत्वा लिलेह सः। अस्थिलग्नाननज्वालालोलया निजजिह्वया ॥२०६॥ ततस्त्यक्तकपालः सन्नितरं निजमेव तम्। गोविन्दस्वामिनं हन्तुमुद्यतासिरियद्य सः॥२०७॥ कपालस्फोट भो देव न हन्तव्यः पिता तव। इत एहीति तत्कालं श्मशानादुवभूव वचः ॥२०८॥ तच्छ्रुत्वा नाम लब्ध्वा च कपालस्फोट इत्यदः । स वटं पितरं मुक्त्वा रक्षामूखस्तिरोदधे ॥२०९॥ १ वृत्तम्—गोलाकारम्।
पंचम लम्बक ५२१
पंचम लम्बक ५२१ पुत्र के ऐसा कहने पर पिता गोविन्दस्वामी ने कहा—'बेटा ! वह तो श्मशान है और वह चिता जल रही है। पिशाच भूत प्रेत आदि से युक्त भीषण श्मशान में तुम्हें कैसे ले जाऊँ ? तुम अभी बच्चे हो।' इस प्रकार पिता के वचन सुनकर वीर बालक विजयदत्त पिता को फटकारते हुए बोला—'पिताजी ये बेचारे पिशाच आदि मेरा क्या कर लेंगे ? क्या मैं दुर्बल हूँ ? तुम बिना किसी शंका के मुझे वहीं ले चलो' ॥११९ १८॥ आग्रहपूर्वक इस प्रकार कहते हुए पुत्र को पिता वहाँ ले गया और वह बालक भी शरीर को तपाता हुआ चिता के पास जा पहुँचा ॥११९॥ जलती हुई आग की लपटों के केशोंवाली और नर-मांस को ग्रहण करनेवाली वह चिता मानों राक्षसों की गृहदेवी थी॥१२०॥ कुछ देर तक शरीर तपाने से सावधान होकर बालक ने पिता से पूछा—'चिता के अन्दर यह बोला-सा क्या बोलता है ? ॥१२१॥ पास बैठे हुए पिता ने कहा—'बेटा ! यह मनुष्य का कपाल (सिर) जल रहा है' ॥१२२॥ तब उस लड़के ने ग्राह के समान जलती हुई चिता की लकड़ी से उस सिर को फोड़ दिया॥१२३॥ सिर को फोड़ते ही उससे निकलती हुई चर्बी की धारा उस बालक के मुँह में आ गिरी। मानों श्मशान की आग ने उसे राक्षसी सिद्धि प्रदान की हो॥१२४॥ उस चर्बी के चखन से वह बालक राक्षस बन गया। उसके सिर के बाल खड़े हो गये। विकट दाँत निकल आये और उसने तलवार तान ली॥१२५॥ तदनन्तर लकड़ी से उस कपाल को खींचकर वह बालक उसकी सारी चर्बी को आग के समान लपलपाती जीभ से चटपट चाट गया ॥१२६॥ तब वह कपाल को फेंककर और तलवार खींचकर अपने पिता गोविन्दस्वामी को ही मारने के लिए उसके पीछे दौड़ा॥१२७॥ इतने में ही श्मशान से आवाज आयी कि 'हे करालास्फोट देव ! अपने पिता को मत मारो। इधर आओ' ॥१२८॥ यह सुनकर करालास्फोट भय प्राप्त करके वह बालक पिता को छोड़कर राक्षस बनकर अन्तर्धान हो गया ॥१२९॥ ६७
५३० | कथासरित्सागर
५३० | कथासरित्सागर
तत्पिता सोऽपि गोविन्दस्वामी हा पुत्र ! हा गुणिन् । हा हा विजयदत्तेति मुक्ताक्रन्दस्ततो ययौ ॥११०॥ एत्य चण्डीगृहं तच्च प्रातं पश्यन् मृताय च । श्यायसेऽशोकदत्ताय यथावृत्तं शशंस सः ॥१११॥ ततस्ताभ्यो सहान्विष्युदापात्तारणम् । तथा शोकान्नगवदामाजगाम न तापसः ॥११२॥ यथा वाराणसीसंस्थो देवीसन्दर्शनागतः । तत्रोपेत्य जनोऽप्यन्यो ययौ तत्समदुःखताम् ॥११३॥ तावच्च देवी पूजायामागत्यैको महावणिक् । अपश्यत्तं गोविन्दस्वामिनं तं तथाविधम् ॥११४॥ समुद्रदत्तनामासावुपेत्याश्वास्य च द्विजम् । तत्रैव स्वगृहं साधुर्निनाय सपरिच्छदम् ॥११५॥ स्नानादिनोपचारैण सत्र चैनमुपाचरत् । निसर्गो ह्येष महतां यदापन्नानुकम्पनम् ॥११६॥ सोऽपि जग्राह गोविन्दस्वामी पत्न्या समं धृतिम् । महाप्रतिश्रव श्रुत्वा जानानश्च सुतसङ्गमम् ॥११७॥ ततः प्रभृति चैतस्यां वाराणस्यामुवास सः । अभ्यर्चितो महाहृद्यस्य तस्यैव वणिजो गृहे ॥११८॥ तत्रैकाधीतविद्योऽस्य स सुतं प्राप्तयोवनः । द्वितीयोऽशोकदत्ताख्यो बाहुयुद्ध'मशिक्षत ॥११९॥ क्रमेण च ययौ तत्र प्रकर्षं स तथा यथा । अजीयत न केनापि प्रतिमल्लेन भूतले ॥१२०॥ एकदा देवयात्रायां तत्र मल्लसमागमे । जगामैको महामल्लः ख्यातिमान् दक्षिणापथात् ॥१२१॥ तेनात्र निखिला मल्ला राज्ञो वाराणसीपतेः । प्रतापमुकुटाख्यस्य पुरतोऽन्ये पराजिताः ॥१२२॥ ततः स राजा मल्लस्य युद्धं तस्य समादिशत् । आनाय्याशोकदत्तं च श्रुतं तस्माद् वणिग्वरात् ॥१२३॥
१ मल्लयुद्धम्; कुश्तीति भाषायाम् ।
पञ्चम लम्बक ५३१
पञ्चम लम्बक ५३१ तदनन्तर उसका पिता गोविन्दस्वामी 'हाय बेटा ! हाय मुनी विजयदत्त ! -इन शब्दों के साथ रोता-चिल्लाता हुआ वहाँ से चला गया ॥११०॥ वहाँ से चण्डी के मन्दिर में जाकर उसने प्रातःकाल अपनी पत्नी और ज्येष्ठ पुत्र अशोक- दत्त से रात की वह सारी घटना सुना दी ॥१११॥ देवी-दर्शन के लिए आया हुआ वाराणसी का रहनेवाला एक तपस्वी तथा अन्य एकत्र यात्री-गणों बिना मेघ के वज्रपात के समान इस घटना के संबंध में सुनकर गोविन्द स्वामी के दुःख में समवेदना प्रकट करने लगे ॥११२-११३॥ इतने में ही देवी-पूजन के लिए वहाँ समुद्रदत्त नाम का एक धनी वैश्य आया। उसने इस प्रकार दुःखी गोविन्दस्वामी के पास जाकर उसे धैर्य प्रदान किया ॥११४॥ तदनन्तर वह सज्जन बनिया गोविन्द स्वामी को सपरिवार अपने घर ले गया और स्नान भोजन आदि की आवश्यक व्यवस्था करा दी। विपद्ग्रस्त प्राणियां पर दया करना उच्च व्यक्तियों का स्वभाव होता है ॥११५-११६॥ महातपस्वी के बचन पर विश्वास करके पुत्र के पुनर्मिलन की आशा से गोविन्दस्वामी ने किसी प्रकार धैर्य धारण किया ॥११७॥ तब से लेकर उस महाधनी बनिये की प्रार्थना पर उसने वाराणसी में उस बनिये के घर ही रहना निश्चित किया ॥११८॥ वहाँ पर विद्या प्राप्त करके उसका पुत्र अशोकदत्त युवक हो गया और कुश्ती लड़ना सीखने लगा ॥११९॥ धीरे-धीरे वह मल्लविद्या (पहलवानी) में निपुण हो गया। संसार में किसी भी दूसरे पहलवान के लिए उसे जीतना कठिन था ॥१२० ॥ एक बार किसी देवयात्रा के मेले में दक्षिण-देश का एक विख्यात मल्ल (पहलवान) वाराणसी आया और उसने काशिराज प्रतापनुकुट के सभी पहलवानों को उनके सामने ही पछाड़ दिया ॥१२१-१२२॥ तब राजा ने उस बनिये से अशोकदत्त की प्रशंसा सुनकर, उसे बुलवाकर लड़ने की आज्ञा दी ॥१२३॥
५३२ कथासरित्सागर
५३२ कथासरित्सागर सोऽपि मल्लो भुजं हत्वा हस्तेनारभताहवम्। मल्लं चाशोकदत्तस्तु भुजं हत्वा ऽपातयत् ॥१२४॥ ततस्तत्र महामल्लनिपातोत्थितशब्द्यया। युद्धभूम्यापि सन्तुष्य साधुवाद इवोदितः ॥१२५॥ स राजाशोकदत्तं तं तुष्टो रत्नैःपूरयत्। चकार चात्मनः पार्श्ववर्तिनं दृष्टविक्रमम् ॥१२६॥ सोऽपि राज्ञः प्रियो भूत्वा दिनं प्राप परां श्रियम्। दधधि शूरविद्यस्य विक्षपक्षो विशाम्पतिः ॥१२७॥ सोऽथ जातु ययौ राजा चतुर्दश्यां बहिःपुरे। सुप्रतिष्ठापितं दूरे देवमर्चयितुं शिवम् ॥१२८॥ कृतार्चनस्ततो नक्तं श्मशानस्यान्तिमेन सः। आगच्छन्नशृणोदार्तां तन्मध्यादुद्गतां गिरम् ॥१२९॥ अह दण्डाधिपनेह मिथ्या बध्यानुकीर्तनात्। द्वेघेण विद्धः शूलायां तृतीय दिवस प्रभो ! ॥१३०॥ अद्यापि च न निर्यान्ति प्राणा म पापकर्मणः। तद्वद तृषितोऽस्त्यर्थमह दापय मे जलम् ॥१३१॥ तच्छ्रुत्वा कृपया राजा स पार्श्वस्थमुवाच तम्। अशोकदत्तमस्याम्भः प्रहिणोतु भवानिति ॥१३२॥ कोऽत्र रात्रौ प्रजह्वः सदगच्छाम्यहमात्मना। इत्युक्त्वाशोकदत्तः स गृहीत्वाम्भस्ततो ययौ ॥१३३॥ याते च स्वपुरीं राज्ञि स धीरो गहनान्तरम्। महत्तरण तमसा सर्वतोऽन्तरधिष्ठितम् ॥१३४॥ शिबावकीर्णपिशितप्रतप्त श्यामहावलि । क्वचिद् क्वचिच्चिताज्योतिर्र्दीप्रदीपप्रकाशितम् ॥१३५॥ रुसद्रुत्तालबेतालतालवाद्यं विवशं तम्। दमशानं कृष्णरजनीनिवासभवनोपमम् ॥१३६॥ केनाम्भो याचितं भूपावित्यपृच्छस्तत्र स ब्रुवन्। मया याचितमित्यवमशृणोत् बाचमेकतः ॥१३७॥ गत्वा तदनुसारण निकटस्थ चितामठम्। ददर्श तत्र शूलाग्रे विद्धं कञ्चिन्नरं पूयम् ॥१३८॥
पंचम लम्बक ५३३
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वह दक्षिणी मल्ल भी हाथ से भुजाओं पर ताल ठोंकता हुआ अखाड़े में आया। यशोवरदत्त ने उस मल्ल (पहलवान) का हाथ मरोड़कर उसे पटक दिया ॥ १२४॥ तब उस पहलवान के पटके जाने पर उठे हुए कलरव से मानों अखाड़े की भूमि उस यशोवरदत्त को धन्यवाद देने लगी॥ १२५॥ काशिराज प्रतापमुकुट ने प्रसन्न होकर पुरस्कार में यशोवरदत्त को रत्नों से भर दिया ॥ १२६॥ साथ ही उसके पराक्रम से प्रसन्न होकर उसे अपना अंग रक्षक नियुक्त कर लिया। फलतः वह यशोवरदत्त कुछ ही दिनों में राजा से बहुत सम्पत्ति प्राप्त कर धनी हो गया। राजा भी शस्त्रविद्या का विशेषज्ञ था ॥ १२७॥ एक बार वह राजा चतुर्दशी तिथि को नगर के बाहर स्थापित किये गये शिवजी के दर्शन के लिए गया। उनकी पूजा करके वह रात में श्मशान-मार्ग से ही लौटा। आते हुए उसने श्मशान से निकली हुई यह वाणी सुनी कि 'हे स्वामी! मुझे दण्डाधिकारी ने झूठ ही प्राणदण्ड की सजा देकर शूली पर चढ़वा दिया है। आज तीसरा दिन है। मुझे पापी के प्राण नहीं निकल रहे हैं। मैं अत्यन्त प्यासा हूँ। मुझे पानी पिलाओ' ॥ १२८-१३१॥ यह सुनकर राजा ने दया करके अपने साथ चल रहे यशोवरदत्त से कहा कि 'तुम इसे जल सेवो' ॥ १३२॥ उसने कहा—महाराज इस समय रात को श्मशान में कौन जायगा इसलिए मैं स्वयं ही जाता हूँ'— ऐसा कहकर यशोवरदत्त पानी लेकर स्वयं ही वहाँ गया ॥ १३३॥ राजा के अपनी नगरी में चले जाने पर वह वीर यशोवरदत्त चारों ओर घने अँधेरे से भरे हुए, शृगालों द्वारा इधर-उधर फेंके गये मांस के टुकड़ों से मानों बलि दिये गये चिताओं की चमक से कहीं-कहीं प्रकाशमान नाचते हुए वेतालों से शब्दायमान और काली रात के निवास-भवन के समान उस श्मशान में उसने प्रवेश किया॥ १३४-१३६॥ वहाँ जाकर उसने ऊँचे स्वर में कहा— 'राजा से किसने पानी माँगा है ?' तब उसने एक ओर से 'मैंने माँगा है' इस प्रकार का शब्द सुना ॥ १३७॥ उसी शब्द के अनुसार उसने चिता की आग देखी और वहीं शूली से बिंधे हुए किसी पुरुष को देखा ॥१३८॥
५३४ कथासरित्सागर
५३४ कथासरित्सागर अथैकां तस्य पृष्ठेऽथ सर्वालङ्कारभूषिताम्। अदृष्टपूर्वां सर्वाङ्गसुन्दरीं स्त्रियमैक्षत ॥१३९॥ कृष्णपक्षपरिक्षीणे गतप्रभे रजनीपतौ। चितारोहाय तद्रश्मिरम्यां रात्रिमिवागताम् ॥१४०॥ का त्वमम्ब कथं चेह कृत्येष्वहमवस्थिता। इति पृष्टा च सा तेन योषिदेवं समब्रवीत् ॥१४१॥ अस्याहं शूलविद्धस्य भार्या विगतलक्षणा। निश्चिताद्या स्थितास्मीह चितारोहे महामुना ॥१४२॥ कञ्चित्कालं प्रतीक्ष्यात्र प्राणानामस्य निष्क्रमम्। तृतीयेऽहनि गतेऽप्यद्य यान्त्यतस्य हि नासवः ॥१४३॥ याचते च मुहुस्तोयमानीतं च मयेह तत्। किं त्वहं नोन्नते शूले प्राप्नोम्यस्य मुखं सखे! ॥१४४॥ इति तस्या वचः श्रुत्वा स प्रवीरोऽप्युवाच ताम्। इव स्वस्य नृपेणाऽपि हस्ते म प्रेषितं जलम् ॥१४५॥ तम पृष्ठे पदं दत्त्वा वार्यतस्योत्तानने। न परस्पर्शमात्रं हि स्त्रीणामापदि दूषणम् ॥१४६॥ एतच्छ्रुत्वा तथैत्यात्तजला दत्त्वा पदद्वयम्। शूलमूलावभग्नस्य पृष्ठे सन्त्यारुरोह सा ॥१४७॥ क्षणाद् भुवि स्वपृष्ठे च रक्तबिन्दुव्यशङ्कितम्। पतत्सु मुखमुन्नम्य स वीरो यावदीक्षते ॥१४८॥ तावत्स्त्रियमपश्यत्सां छित्त्वा छुरिकया मुहुः। खादन्तीं तस्य मांसानि पुनः शूलाग्रवर्तिनः ॥१४९॥ ततस्तां विकृतिं मत्वा क्रोधादाकृष्य सा द्रुतौ। आस्फोटयिष्यन्प्रग्राह पादे रणितनूपुरे ॥१५०॥ सापि तं तरसा पादमाक्षिप्य स्वप्रभावया। क्षिप्रं गगनमुत्पत्य जगाम क्वाप्यदर्शनम् ॥१५१॥ तस्य चादोलदस्तस्य सत्पाशान्मणिनूपुरम्। तस्मादावर्षणभ्रष्टमेकतस्य करान्तरे ॥१५२॥ तत्तन्मां चेदमामादाश्चर्यकर्त्री च मन्यते। धन्ते विताम्फोरां च दुर्जनस्य सङ्गतिम् ॥१५३॥
उसने उस शूली के नीचे सुन्दर आभूषणों से सुशोभित एक रोती हुई स्त्री को देखा। वह अपूर्व रमणी सर्वांग सुन्दरी थी मानों कृष्णपक्ष के बीतने के कारण चन्द्रमा का अस्त हो जाने पर चाँदनी के समान रजनीचरणी चिता पर चढ़कर सती होने के लिए आई हो॥१३९-१४०॥ 'हे माता तू कौन है, यहाँ क्यों रो रही है और इस प्रकार क्या बैठी है?'—इस प्रकार अशोकदत्त के प्रश्न करने पर वह स्त्री बोली—'मैं शूली पर चढ़े हुए इस पुरुष की अभागिन स्त्री हूँ। इसके साथ सती होने का निश्चय करके यहाँ बैठी हूँ। कुछ समय तक इसके प्राणों के निकलने की प्रतीक्षा कर रही हूँ। तीन दिन बीत जाने पर भी इसके प्राण नहीं निकले हैं॥१४१-१४३॥ यह बार-बार पानी माँगता है। मैं पानी लाई भी किन्तु ऊँची शूली पर लटके हुए इसके मुँह तक नहीं पहुँच पा रही हूँ'॥१४४॥ स्त्री की बातें सुनकर वीर अशोकदत्त बोला—'राजा ने मेरे हाथों यह जल भेजा है। अब तू मेरी पीठ पर पैर रखकर इसके मुख में यह जल डाल दे। आपत्ति के समय पुरुष का स्पर्श स्त्री के लिए दूषित नहीं है ॥१४५-१४६॥ यह सुनकर और उसकी बात मानकर वह स्त्री पानी लेकर, शूली की जड़ में नीचे मुँह किये हुए अशोकदत्त की पीठ पर दोनों पैर से चढ़ गई॥१४७॥ कुछ ही समय पश्चात् उसने भूमि पर और अपनी पीठ पर रक्त की बूँदों के गिरने से शङ्कित हो मुँह उठाकर ऊपर देखा तो उसे मालूम हुआ कि वह स्त्री शूली पर चढ़े हुए उस पुरुष का मांस कटार से काटकर खा रही है॥१४८-१४९॥ उस स्त्री की इस प्रकार विकृति को देखकर उस वीर ने उसे पछाड़ने के लिए उसके पैर पकड़े जिनमें पैरों का आभूषण (पायजेब) बज रहा था॥१५०॥ वह स्त्री भी पैरों को छुड़ाकर और अपनी माया से आकाश में उड़कर अदृश्य हो गई॥१५१॥ पैरों को छुड़ाते समय अशोकदत्त के बलपूर्वक खींचने पर उसके एक पैर का पायजेब उसी अशोकदत्त के हाथ में ही रह गया॥१५२॥ और, दुर्जनों की संगति के समान प्रारम्भ में अच्छी मध्य में सन्तापकारिणी और अंत में घोर विकारवाली वह स्त्री हाथ से निकल गई॥१५३॥
५३६ कथासरित्सागर
५३६ कथासरित्सागर नष्टां विचिन्तयन्पश्यन्हस्ते दिव्यं च नूपुरम्। सविस्मयः साभितापः सहर्षश्च बभूव सः॥१५४॥ ततः श्मशानतस्तस्मात्स जगामात्तनूपुरः। निजगेहं प्रभाते च स्नातो राजकुलं ययौ॥१५५॥ किं तस्य शूलविद्धस्य वृत्तं वार्तेति पृच्छते। राज्ञे स च समेत्योक्त्वा तं नूपुरमुपानयत्॥१५६॥ एतत्कुत इति स्वैरं पृष्टस्तेन स भूभृता। तस्मै स्वरात्रिवृत्तान्तं शशंसामृतमीषजम्॥१५७॥ सतश्चानन्यसामान्यं सत्त्वं तस्यावधाय सः। तुष्टोऽप्यन्यगुणोत्कर्षात्सुतोष सुतरां नृपः॥१५८॥ गृहीत्वा नूपुरं स च गत्वा देव्यै ददौ स्वयम्। दृष्टस्तत्प्राप्तिवृत्तान्तं तस्यै च समवर्णयत्॥१५९॥ सा तद्बुद्ध्वा च दृष्ट्वा च तं दिव्यं मणिनूपुरम्। अशोकदत्तलाभैकतत्परा मुमुदे रहः॥१६०॥ ततो जगाद तां राजा देवी जात्यैव विद्यया। सत्त्वेन च रूपेण महतामप्ययं महान्॥१६१॥ अशोकदत्तो भव्याया भर्ता च दुहितुर्यदि। भवेन्मदनलेखायास्तद्भद्रमिति मे मतिः॥१६२॥ वरस्यामी गुणाः प्रेक्ष्या न लक्ष्मीः क्षणभङ्गिनी। तदेतस्मै प्रवीराय वदाम्येतां सुतामहम्॥१६३॥ इति भर्तुर्वचः श्रुत्वा देवी सा सादराऽब्रवीत्। युक्तमेतदसौ ह्यस्या युवा भर्तानुरूपतः॥१६४॥ सा च तेन मधुस्नानदृष्टेन हृतमानसा। शून्याशया दिनेष्वेषु न शृणोति न पश्यति॥१६५॥ रात्रौ सौधे च तद्बुद्ध्वा मञ्चिस्ताहं निशाक्षये। सुप्ता जागे स्त्रिया स्वप्ने कयाप्युक्तारिम दिव्यया॥१६६॥ वत्से मदनलेखेयं देयान्यस्मै न कस्यचित्। एषा ह्यशोकदत्तस्य भार्या जन्मान्तरार्जिता॥१६७॥ तच्च श्रुत्वा प्रबुध्यैव गत्वा प्रत्यूष एव च। स्वयं तत्प्रत्ययाद् वत्सां समादवामितस्त्यहम्॥१६८॥
पंचम लम्बक ५३७
पंचम लम्बक ५३७
देखकर वह अपारयुक्त आश्चर्य और सन्ताप करने लगा॥१५४॥ किन्तु अपने हाथ में उसके दिव्य पायजेब को देखकर प्रसन्न भी हुआ। तदनन्तर वह अशोकदत्त पायजेब हाथ में लेकर श्मशान से घर आया और प्रातःकाल स्नान करके राजभवन को गया॥१५५॥ 'क्या उस शूली पर चढ़े हुए को तुमने पानी दिया ?' —इस प्रकार पूछते हुए राजा को उसने 'हाँ' कहकर वह पायजेब भेंट किया॥१५६॥ 'यह कहाँ से मिला ?' —इस प्रकार प्रश्न करते हुए राजा को उसने रात की अद्भुत और भीषण घटना कह सुनाई॥१५७॥ इस प्रकार उसके असाधारण महाबल को जानकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उस दिव्य आभूषण को लेकर रनिवास में गया। उसे महारानी को देते हुए उसने रात का सारा वृत्तान्त रानी से कह सुनाया॥१५८-१५९॥ यह सब सुनकर और उस दिव्य आभूषण को देखकर रानी अशोकदत्त की प्रशंसा करती हुई मन में अत्यन्त प्रसन्न हुई॥१६०॥ तब राजा ने रानी से कहा—'देवि यह अशोकदत्त जाति से विद्या से और अपने सच्चे स्वरूप से बड़ों में बड़ा है। अतः यदि यह मेरी भव्य बेटी मदनलेखा का पति हो तो अच्छा हो। यह मेरा विचार है'॥१६१-१६२॥ वर के ये ही गुण देखे जाते हैं न कि क्षण में नष्ट होनेवाली चंचल लक्ष्मी। इसलिए उस उत्तम धीर पुरुष को मैं कन्या देता हूँ॥१६३॥ यह सुनकर आदर के साथ उसका समर्थन करती हुई रानी ने कहा—'यह उचित है। यह युवा अपनी कन्या के सर्वथा अनुरूप और योग्य है। वह कन्या भी मधु-उद्यान में उसे देखकर उसपर आसक्त हो चुकी है। इसके बिना वह शून्य-हृदय होकर न कुछ सुनती है और न कुछ देखती ही है॥१६४-१६५॥ उसकी सखी से यह जानकर चिन्ता करती हुई मैं सो गई और रात बीतने पर (उषःकाल में) स्वप्न में किसी दिव्य स्त्री द्वारा मानों इस प्रकार कही गई। 'बेटी इस मदनलेखा को दूसरे के लिए न देना यह अशोकदत्त की पूर्वजन्म की अर्जित पत्नी है'॥१६६-१६७॥ यह सुनकर जागकर और बहुत ही सबेरे के उस स्वप्न में विश्वास कर, मैं बेटी को धीरज भी दे आई हूँ॥१६८॥ ६८
५३८ कथासरित्सागर
५३८ कथासरित्सागर
इदानीं चायं पुत्रेण स्वयमेव ममोचितम्। तस्मात् समेतु तेनासौ वृक्षेणवातैव। लता ॥१६९॥ इत्युक्तः प्रियया प्रीतः स राजा रचितोत्सवः। आहूयाशोकदत्ताय तस्मै तां तनयां ददौ ॥१७०॥ तयोश्च सोऽभूद्राजन्द्रपुत्रीविप्रेन्द्रपुत्रयोः। सङ्गमोऽयोग्यशोभायै लक्ष्मीविनययोरिव ॥१७१॥ ततः कदाचिद्राजानं तं देवी ब्रवीति स्म सा। अशोकदत्तानीय समुद्दिश्य मणिनूपुरम् ॥१७२॥ आर्यपुत्रायमेकाकी नूपुरो न विराजते। अनुरूपस्तदेतस्य द्वितीयः परिकल्प्यताम् ॥१७३॥ तच्छ्रुत्वा हेमकारादीनादिदेश स भूपतिः। नूपुरस्यास्य सदृशो द्वितीयः क्रियतामिति ॥१७४॥ ते तन्निरूप्य जगदुर्नेदृशो देव शक्यते। अपरः कर्तुमेतद्धि दिव्यं शिल्प न मानुषम् ॥१७५॥ रत्नानीह हि भूयांसि न भवन्त्येव भूतले। तस्मादेष यतः प्राप्तस्तत्रैवान्यो गवेष्यताम् ॥१७६॥ एतच्छ्रुत्वा सदेवीके विषण्णे राज्ञि तत्क्षणम्। अशोकदत्तस्तत्सर्वस्तद्ववृच्छृण्वन् सहसाब्रवीत् ॥१७७॥ अहमेवानयाम्यस्य द्वितीयं नूपुरस्य ते। एवं कृतप्रतिज्ञश्च राज्ञा साहससङ्किना ॥१७८॥ स्नेहात्निवार्यमाणोऽपि निश्चयान्न चचाल सः। गृहीत्वा नूपुरं तच्च श्मशानं स पुनर्ययौ ॥१७९॥ निशि कृष्णचतुर्दश्यां यत्रैव तमवाप्तवान्। प्रविश्य तत्र च प्राप्यचिताधूममलीमस ॥१८०॥ पाशोद्वेष्टितगलस्कन्धोल्लम्बिसमानुष । पादपरिव रक्षोभिराकीर्णे पितृकानने ॥१८१॥ अपश्यन्पूर्वदृष्टां तां स्त्रियं तन्नूपुराप्तये। उपायमेकं बुबुधे स महामांसविक्रयम् ॥१८२॥ तरुशाखाद् गृहीत्वाथ शवं बभ्राम तत्र सः। विक्रीणानो महामांसं गृह्यतामिति घोषयन् ॥१८३॥
पंचम लम्बक ५११
पंचम लम्बक ५११ इस समय आपने स्वयं कह दिया तो ऋतु की लता जैसे वृक्ष का समागम करती है, उसी प्रकार इन दोनों का भी समागम हो जाय ॥१६९॥ पत्नी द्वारा इस प्रकार कहे गये प्रसन्न राजा ने विवाहोत्सव का आयोजन करके वह कन्या अशोकदत्त को दे दी ॥१७०॥ उन दोनों राजेन्द्र की कन्या और विप्रेन्द्र के पुत्र का समागम परस्पर शोभा बढ़ाने के लिए लक्ष्मी और विजय के संगम के समान हुआ ॥१७१॥ एक बार रानी ने राजा से उस दिव्य मणि के पायजेब के सम्बन्ध में कहा— 'आर्यपुत्र यह अकेला पायजेब अच्छा नहीं लगता इसलिए इसी के समान दूसरा भी बनवाओ' ॥१७२-१७३॥ यह सुनकर राजा ने सोनार, जड़िये आदि को आज्ञा दी कि 'इसी के समान दूसरी पायजेब बनाओ ॥१७४॥ वे उसे भली भाँति जाँचकर बोले—'महाराज इस प्रकार का दूसरा पायजेब नहीं बनाया जा सकता। यह तो देवताओं की कारीगरी है मनुष्यों की नहीं ॥१७५॥ इसमें के बहुत-से रत्न तो भूतल में मिलते ही नहीं इसलिए जहाँ से यह एक मिला है वहीं इसका जोड़ा भी ढूँढ़ो' ॥१७६॥ यह सुनकर राजा और रानी के निराश और खिन्न हो जाने पर वहाँ बैठा हुआ अशोकदत्त बोला—'मैं तुम्हारे पायजेब का जोड़ा लाता हूँ' ॥१७७॥ उसकी इस प्रकार की प्रतिज्ञा को राजा ने केवल साहस समझा। अतः स्नेह से बार-बार मना करने पर भी अशोकदत्त अपने निश्चय से विचलित न हुआ और उस पायजेब को लेकर फिर श्मशान में गया ॥१७८-१७९॥ कृष्णपक्ष की चतुर्दशी की रात में जहाँ उसने वह आभूषण पाया था वहीं पहुँचा। वहाँ जाकर धधकती हुई चिता के धुएँ से मलिन (काले) पाश में लपेटे हुए मनुष्यों के शवों को अपने कन्धों में लटकाये हुए, वृक्षों के समान दीर्घकाय राक्षसों से संकीर्ण उस श्मशान में उसने पहले देखी हुई उस स्त्री को देखा। उसका पायजेब लेने के लिए उसने नर मांस बेचने का उपाय सोचा ॥१८०-१८२॥ उसने एक वृक्ष में बँधी हुई मनुष्य की लाश को चीरकर और कन्धे पर लादकर घूमना आरम्भ दिया और चिल्लाने लगा कि 'मैं मानव-मांस बेच रहा हूँ जिसे लेना हो ले' ॥१८३॥
महासत्त्व ! गृहीत्वैतद्देहि तावन्मया सह । इति क्षणाच्च जगदे स दूरादेकया स्त्रिया ॥१८४॥ तच्छ्रुत्वा स तथैवैतामुपेत्यानुसरन् स्त्रियम् । आरात्तस्तल दिव्यरूपां वापिसमैक्षत ॥१८५॥ स्त्रीभिर्वृतामासनस्थां रत्नाभरणभासुराम् । असम्भाव्यम्पित स्म मरावम्भोजिनीमिव ॥१८६॥ स्त्रिया तयोपनीतश्च तामुपैत्य सभा स्थिताम् । नृमांसमस्मि विक्रीण गृह्यतामित्युवाच च ॥१८७॥ भो महासत्त्व ! मूल्येन केनैतद्दीयते त्वया । इति सापि तदाह स्म दिव्यरूपा विलासिनी ॥१८८॥ तत स वीरो हस्तस्थ तमेव मणिनूपुरम् । सन्धर्त्य मन्व्यपृच्छत्स्वन्नतकायो जगाद ताम् ॥१८९॥ यो वदास्यस्य सदृश द्वितीय नूपुरस्य मे । मांस तस्य ददाम्येतन्नस्यसो यदि गृह्यताम् ॥१९०॥ तच्छ्रुत्वा साप्यवादीत्तमस्त्यन्यो नूपुरो मम । असौ मदीय एवैको नूपुरो हि हृतस्त्वया ॥१९१॥ सर्वाहं या त्वया दृष्टा शूलविद्धस्य पार्श्वतः । वृत्तान्त्यस्या भवता परिज्ञातास्मि नाधुना ॥१९२॥ तर्हि मांसेम यदहं वच्मि ते तत्करोषि चेत् । एतद्द्वितीयं दास्याम्यस्य तुभ्यं स्वनूपुरम् ॥१९३॥ इत्युक्त स तदा वीर प्रतिपद्य तदब्रवीत् । यत्त्वं वदसि तत्सर्वं करोम्येव क्षणादिति ॥१९४॥ अशोकदत्तविद्युत्प्रभयोः परिचयकथा ततस्तस्मै जगादबभामूमात्सा भमीप्सितम् । अस्ति भद्र ! त्रिषष्टारय हिमवच्छिखरे पुरम् ॥१९५॥ तत्रासील्लम्बजिह्वास्य प्रवीरो राक्षसाधिपः । तस्य विद्युन्निभा नाम भार्याहं कामरूपिणी ॥१९६॥ स चकस्यां सुतायां मे जातार्या ददत पति । प्रभो कपालस्फोटस्य पुरतो निहतो रण ॥१९७॥
पंचम लम्बक ५४१
पंचम लम्बक ५४१ 'हे महामना ! इसे लेकर मेरे साथ आओ। इस प्रकार दूर बैठी हुई स्त्री बोली-॥१८४॥ यह सुनकर उसका पीछा करते हुए उसने समीप ही एक वृक्ष के नीचे बैठी हुई, दिव्य रूप- वाली और रत्नों के आभूषणों से चमकती हुई, अनेक स्त्रियों से घिरी हुई और आसन पर बैठी हुई एक स्त्री को देखा ॥१८५॥ मरुभूमि में कमलिनी के समान उस स्थान (श्मशान) पर ऐसी स्त्री का रहना सम्भव नहीं था। उस स्त्री के द्वारा ले जाया गया अशोकदत्त उस बैठी हुई सुन्दरी के पास जाकर बोला-'मैं मनुष्य-मांस बेचता हूँ ले लो' ॥१८६-१८७॥ तब वह दिव्य रमणी बोली कि 'हे महापुरुष ! इसे किस मूल्य पर बेचते हो' ? ॥१८८॥ तब वीर अशोकदत्त ने हाथ में लिये हुए एक पायजेब दिखाकर कहा-'जो इसके ही समान दूसरी पायजेब मुझे देगा उसे दूंगा। यदि वह है, तो ले लो' ॥१८९॥ यह सुनकर वह बोली-'हाँ इसी का जोड़ा दूसरा पायजेब मेरे पास है। यह मेरा ही पायजेब तूने छीना है॥१९०॥ मैं वही स्त्री हूँ जिसे तुमने शूली में बिंधे हुए उस मनुष्य के पास उस दिन देखा था। इस समय दूसरा रूप बदलने के कारण तूने मुझे नहीं पहिचाना ॥१९१-१९२॥ तो अब मांस लेकर क्या होगा मैं जो कहती हूँ वह करो तो इसी के समान दूसरा पायजेब तुम्हें दूँगी' ॥१९३॥ इस प्रकार कहे गये उस वीर ने उसकी बात स्वीकार करके कहा-'जो तू कहेगी वह उसी समय करूँगा' ॥१९४॥ अशोकदत्त और विद्युत्प्रभा की विवाह-कथा तब उस दिव्य स्त्री ने उससे अपने मन की बात इस प्रकार कही-'हे धर्म सारथी ! हिमालय के शिखर पर विचर नाम का एक नगर है। वहाँ पर स्तम्भजिह्व नाम का एक राक्षसराज है। मैं उसकी विद्युत्प्रभा नाम की पत्नी हूँ और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली हूँ॥१९५-१९६॥ वह मेरा पति एक कन्या के उत्पन्न होने पर संग्रामस्फोट नाम के राक्षसराज द्वारा युद्ध में मारा गया ॥१९७॥