कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
द्वादश लम्बक ७२५
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'महाराज वेश्याओं में तो सच्चा प्रेम होता ही नहीं है फिर भी यह कुमुदिका तुम्हारे प्रति जो सद्भाव प्रकट कर रही है, पता नहीं इसमें क्या रहस्य है ? ॥२९॥ मन्त्री की बातें सुनकर राजा ने उससे कहा-'ऐसी बात नहीं है। कुमुदिका मेरे लिए प्राण भी दे सकती है। यदि तुम विश्वास नहीं करते तो मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ। मन्त्री को इस प्रकार कहकर राजा ने कपट-माया रची। राजा ने अपना भोजन-पान नियमित करके अपने को दुर्बल बना दिया और धीरे-धीरे अपने हाथ पैर ढीले करके अपने को मुर्दा बना लिया। तब दिखावटी दुःख प्रकट करते हुए मन्त्री अनन्तगुण की आज्ञा से सेवक राजा के शव को पालकी में डालकर, श्मशान ले गये ॥२७-१ ॥ और, राजा के शोक से बह कुमुदिका बन्धुओं से रोके जाने पर भी श्मशान में आकर राजा के साथ चिता पर चढ़ गई ॥३१॥ चिता फूंकने की तैयारी हो ही रही थी कि राजा कुमुदिका को सती होते जानकर जँभाई लेकर उठ गया ॥३२॥ तब ओह ! हमलोगों के भाग्य से यह (राजा) जी उठा इस प्रकार कहते हुए श्मशान में उपस्थित व्यक्ति कुमुदिका के साथ राजा को घर ले गये ॥३३॥ तदनन्तर, प्रसन्नता से उत्सव मनाये जाने पर राजा धीरे-धीरे स्वस्थ हो गया और उसने एकान्त में मन्त्री अनन्तगुण से कहा-'देखा तुमने कुमुदिका का प्रेम ! ॥३४॥ तब मन्त्री ने राजा से कहा-'राजन् मैं तो अब भी नहीं विश्वास करता। इसमें कुछ कारण अवश्य है। अब आगे और निश्चय करते हैं ॥३५॥ और जिसने इतना दिया उसके सामने अपने को प्रकट कर देना चाहिए, जिससे कि इसकी सेना और नगर मित्र की सेना लेकर युद्ध में शत्रुओं पर विजय की जाय ॥३६॥ मन्त्री अनन्तगुण ऐसा कह ही रहा था कि इतने में गुप्त रूप से भेजा हुआ एक गुप्तचर वहाँ आया। उससे पूछने पर उसने कहा-शत्रुओं ने देश को आक्रान्त कर लिया और रानी शशिप्रभा ने झूठे ही राजा के मरने का समाचार सुनकर अग्नि प्रवेश कर लिया। गुप्तचर के वे वचन सुनकर बाण से आहत के समान वह राजा विह्वल होकर 'हाय रानी! हाय रानी !'-इस प्रकार कहकर विलाप करने लगा ॥३७-१ ॥ तब वेश्या सब बात जानकर कुमुदिका राजा के पास आकर और उसे धीरज देकर बोली-॥४ ॥
७२६ कथासरित्सागर
७२६ कथासरित्सागर प्रागेव मम नादिष्टं किं दवेनाधुनापि यत्। धनेनेदीये सबलैः क्रियतामरि निग्रहः ॥४१॥ इत्युक्तः स तया कृत्वा तद्धनैरधिकं बलम्। ययौ राजा स्वमित्रस्य राज्ञो बन्धुतोऽन्तिकम् ॥४२॥ तद्वलैः स्वबलैस्तैश्च सह गत्वा निहत्य तान्। पञ्चाप्यरिनृपान् युद्धे तद्राज्यान्यप्यवाप सः ॥४३॥ ततस्तुष्टः कुमुदिकां सोऽब्रवीत्तां सह स्थिताम्। प्रीतोऽस्मि ते तवाभीष्टं किं करोम्युच्यतामिति ॥४४॥ अथावाचत्कुमुदिका सत्यं तुष्टोऽसि चेत्प्रभो। तदुद्धरेव हृच्छल्यमेकं मम चिरस्थितम् ॥४५॥ उज्जयिन्यां द्विजसुतं श्रीधरं नाम मे प्रियम्। राज्ञाल्पेनापराधेन बद्धं तस्माद्विमोचय ॥४६॥ दृष्ट्वा त्वां भाविकल्याणमुत्तमे राजलक्षणे। एतत्कार्यक्षमं वेद्य मक्त्या सेवितवत्यहम् ॥४७॥ अभीष्टसिद्धिनैराश्यादारोहे स्वचितामपि। विफलं जीवितं मत्वा विना तं विप्रपुत्रकम् ॥४८॥ एवमुक्तवतीं तां स राजावाचद्विलासिनीम्। साधयिष्याम्यहं तत्ते धीरा सुवदने भव ॥४९॥ इत्युक्त्वा मन्त्रिवचनं सस्मूर्याचिन्तयच्च सः। सत्यं वेश्यास्वसद्भावः प्रोक्तोऽनन्तगुणेन मे ॥५०॥ अतस्तु पूरणीयेषा वराक्या कामना मया। इति सङ्कल्प्य सबलः स तामुज्जयिनीमगात् ॥५१॥ श्रीधरं मोचयित्वा तं दत्त्वा च द्रविणं बहु। व्यधात् कुमुदिकां तत्र प्रियसङ्गमसुस्थिताम् ॥५२॥ आगत्य च स्वनगरं मन्त्रिमन्त्रसमृद्धयम्। प्रभादिश्रमसिंहोऽसौ बुभुजे सकलां महीम् ॥५३॥ एवं हृदयमज्ञेयमगाधं वशयोषिताम्। ॥५४॥¹ १ मूलपुस्तके पदार्धं मुद्रितमस्ति।
दशम लम्बक ७२७
दशम लम्बक ७२७ 'महाराज ! मुझे पहले ही आज्ञा क्यों नहीं दी। अब भी आप मेरी सेना और मेरे धन की सहायता से शत्रुओं का नाश करें' ॥४१॥ कुमुद्विका से इस प्रकार कहे गये राजा ने कुमुद्विका के धन से उसकी सेना को बढ़ाया और अपने एक बलवान् मित्र के पास वह गया। उससे भी सेना की सहायता ली ॥४२॥ इस प्रकार, उसकी सेना और अपनी सेना को साथ लेकर राजा ने उन पाँचों शत्रु-राजाओं को युद्ध में जीतकर अपना राज्य प्राप्त किया ॥४३॥ तब राजा ने साथ में बैठी हुई कुमुद्विका से कहा- यह सच है कि मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। बताओ कौन सा तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध करूँ ? ॥४४॥ यह सुनकर कुमुद्विक ने कहा- 'हे देव यदि सचमुच आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो चिरकाल से मेरे हृदय में बैठा हुआ एक काँटा निकाल दें ॥४५॥ उज्जैन में धीवर नाम का वणिक्-पुत्र मेरा प्रेमी है। उस राजा न एक छोटे-से अपराध के कारण कारागार का दंड दिया है। उसे छुड़ा दीजिए। मैंने आपके शुभ लक्षणों से पहले ही आपको असाधारण और इस काम के योग्य व्यक्ति समझकर ही अपने भविष्य की कल्याण-कामना की थी और इसीलिए आपकी सेवा भी की थी ॥४६-४७॥ अपनी इष्टसिद्धि के प्रति निराश होकर और उस युवक के बिना अपने जीवन को निष्फल समझकर ही मैं आपकी चिता पर चढ़ी थी ॥४८॥ इस प्रकार कहती हुई उस वेश्या से राजा ने कहा-'हे सुमुखि धैर्य रख। मैं तेरा कार्य सिद्ध करूँगा। इतना उससे कहकर और मन्त्री की बात का स्मरण करके राजा ने सोचा- कमलगुप्त ने वेश्याओं में सद्भावना न होने की जो बात कही थी वह सत्य थी ॥४९-५०। अब तो इस बेचारी की इच्छा पूरी करनी ही होगी। ऐसा सोचकर वह सेना के साथ उज्जयिनी पर चढ़ गया और वहाँ से धीवर को छुड़ाकर कुमुद्विका को बहुत-सा धन देकर उस प्रिय-समागम से सुखी बना दिया ॥५१ - ५२॥ तदनन्तर, अपने नगर में आकर मन्त्रियों की मन्त्रणा का उल्लङ्घन किए बिना पृथ्वी का उपभोग करने लगा ॥५३॥ इस प्रकार वेश्याओं का हृदय अगम और अथाह होता है ॥५४॥
७२८ कथासरित्सागर
७२८ कथासरित्सागर इत्याख्याय कथां तस्मिनिवरसे तत्र गोमुखे। नरवाहनदत्ताग्रे जगादाथ तपन्तकः ॥५५॥ देवि न प्रत्ययः स्त्रीषु चपलास्वनितास्वपि। चिरष्टीष्वपि¹ न ग्राह्यो वेशस्त्रीष्विव सर्वदा ॥५६॥ चन्द्रश्रीशीलहरयोः कथा इहैव यन्मया दृष्टमाश्चर्यं वच्मि तच्छृणु। बलवर्म्माभिधानो भूदस्यामेव वणिक्पुरि ॥५७॥ चन्द्रश्रीस्तस्य भार्याभूत्सा च वातायनाग्रतः ॥ भव्यं शीलहरं नाम ददर्शैकं वणिक्सुतम् ॥५८॥ सखिगृहं तमानीय समुल्लेखेन तत्क्षणम्। अरंस्त मदनाक्रान्ता तेन साकमलक्षिता ॥५९॥ प्रत्यहं च समं तेन यावत्सा रमत तथा। तावत्तत्सङ्गिनी ज्ञाता समग्रभृत्यबान्धवैः ॥६०॥ एकस्तु बलवर्म्मा तां नाज्ञासीदसतीं पतिः। प्रायेण भार्यादौःशील्यं स्नेहान्धो नेक्षते जनः ॥६१॥ अथ दाहज्वरस्तस्य समभूद्बलवर्म्मणः। तेन चान्त्यामवस्थां स क्रमात् सम्प्राप्तवान् वणिक् ॥६२॥ तदवस्थेऽपि तस्मिंश्च तद्भार्या सा दिने दिने। अगादुपपतेस्तस्य निकटं स्वसखीगृहे ॥६३॥ तत्रैव चास्यां तिष्ठन्त्यामन्येद्युस्तत्पतिर्मृतः। अगच्छत् सा च तद्बुद्ध्वा समापृच्छ्याशु कामुकम् ॥६४॥ आरोहच्च समं तेन पत्या सा तच्छुभा चिताम्। स्वजनैर्वार्यमाणापि शीलग्ने² कृतनिश्चया ॥६५॥ इत्थं दुरवधार्यैव स्त्रीचित्तस्य गतिः किल। अन्यासङ्गं च कुर्वन्ति म्रियन्ते च पतिं बिना ॥६६॥ एवं तपन्तकेनोक्तं श्रुत्वाऽरिशिखोऽभ्यधात्। मत्रापि देवदासस्य यद्वृत्तं तन्न किं श्रुतम् ॥६७॥ १ गृहपत्नीष्वपि। २ तस्या दुश्चरिताभिधैः।
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इस कथा के कह लेने के पश्चात् गोमुख के मौन हो जाने पर नरवाहनदत्त के सम्मुख तपनक बोला ॥५५॥
महाराज इन सुभी स्त्रियां का ही विश्वास नहीं प्रत्युत पतिवामी स्त्रियों का भी वेश्याओं के समान विश्वास नहीं करना चाहिए ॥५६॥
चन्द्रश्री और शोभङ्कर वैश्य की कथा
इस सम्बन्ध में मैंने इसी नगर में जो आश्चर्य देखा उसे सुनाता हूँ सुनो। इसी नगरी में बलवर्मा नाम का एक वैश्य था। उसकी भार्या का नाम चन्द्रश्री था। एकबार उस स्त्री ने अपने झरोखे (खिड़की) से शोभङ्कर नाम के एक सुन्दर वैश्यपुत्र को देखा ॥५७-५८॥
तब सहेली के द्वारा उसे सहेली के घर पर ही बुलवाकर कामोन्मत्त उस स्त्री ने छिपकर उसके साथ समागम किया ॥५९॥
जब वह प्रतिदिन उसके साथ चोरी चोरी रमण करने लगी तब घर के सेवकों और उसके भाई-बन्धुओं ने उसे जान लिया ॥६०॥
केवल उसका पति बलवर्मा ही उसके दुराचार को नहीं जान सका। सच है प्रेमान्ध व्यक्ति पत्नी के भी दुराचार को नहीं जान सकता ॥६१॥
कुछ दिनों के उपरान्त उस बलवर्मा को दाहज्वर हुआ और वह वैश्य धीरे-धीरे अन्तिम अवस्था में पहुँच गया ॥६२॥
उसकी उस अवस्था में भी उसकी पत्नी सहेली के घर पर उस प्रेमी के पास जाती रही ॥६३॥
एक दिन इसके वहीं रहते हुए उसका पति मर गया। यह जानकर उसकी स्त्री अपने प्रेमी (जार) से पूछकर तुरन्त आई और पति के शोक में उसकी चिता पर, उसके चरित्र को जानने वाले भाई-बन्धुओ द्वारा रोके जाने पर भी जलकर मर गई ॥६४-६५॥
इस प्रकार, स्त्रियों के चित्त की गति नहीं जानी जा सकती। वह दूसरो से व्यभिचार भी कराती हैं और पति के मरने पर उसके साथ सती भी हो जाती हैं ॥६६॥
तपनक के इस प्रकार कहने पर कमल हरिशिख बोला- 'इसी सम्बन्ध में देवदास का जो वृत्तान्त हुआ उसे सुनो- ॥६७॥ १२
३० कथासरित्सागर
३० कथासरित्सागर दुःशीलादेवदासयोः कथा कुटुम्बी देवदासाख्या ग्रामे स ह्यभवत् पुरा। दुःशीलेति च तस्यासीन्नाम्नान्वर्थेन गेहिनी ॥६८॥ सा चान्यपुरुषासक्तां विविदुः प्रातिवेशिकाः। एकदा देवदासोऽसौ कार्याद्राजकुलं ययौ ॥६९॥ आनीय सा च तत्काल, तद्भार्या तद्गृहेषिणी । गृहस्योपरिभूमौ तं निक्षिप परपूरुषम् ॥७०॥ आगतं च ततस्तं सा देवदास निजं पतिम्। निशीथे तेन जारेण मुक्तसुप्तमघातयत् ॥७१॥ विसृज्योपपतिं तं च स्थित्वा तूष्णीं निशार्धयम् । निर्गत्य चक्रन्द हतो भर्त्ता मे तस्करैरिति ॥७२॥ ततोऽत्र बान्धवोऽभ्येत्य दृष्ट्वावोधमयं यया। चौरैर्हंत कथं नीतं न कञ्चिदपि चेरिति ॥७३॥ इत्युक्त्वात्र स्थितं बाल पप्रच्छुस्ते तदात्मजम् । तातो हतस्त्व केनेति ततः स स्पष्टमब्रवीत् ॥७४॥ पृष्ठभूमाविहाद्यस्म कोऽप्यासीद्दिवसे युवा। रात्रौ तेनावतीर्यैव तातो मे पश्यतो हतः ॥७५॥ अम्बा तु मां गृहीत्वादौ तातपार्श्वादिवोत्थिता । इत्युक्ते शिशुना बुद्धवा भार्या जारेण स हतम् ॥७६॥ जघ्नुस्तं च गवेष्याशु तज्जारं च तदत्र ते । स्वीकृत्य सं शिशुं तां च दुःशीलां निरवासयत् ॥७७॥ इत्यन्यरक्तचित्ता स्त्री भुजङ्गी हन्त्यसंशयम्। एव हरिशिखनोक्ते चमाये गोमुखः पुनः ॥७८॥ किमन्येनेह मद्भुतं वज्रसारस्य सम्प्रति । वत्सेश सेवकस्येह हास्यं तच्छ्रूयतामिदम् ॥७९॥ वज्रसारस्य तत्प्रियस्यच कथा तस्य शूरस्य कान्तस्य सुरूपा मालवोद्भवा । वज्रसारस्य भार्याभूत् स्वशरीराधिकप्रिया ॥८०॥
दशम लम्बक ७२१
दशम लम्बक ७२१ सुशीला और देवदास की कथा प्राचीन समय में किसी गाँव में देवदास नाम का कुटुम्बवाला एक व्यक्ति था। सुशीला यथार्थ नामवाली उसकी स्त्री थी ॥६८॥ 'वह स्त्री दूसरे पुरुष के साथ फँसी थी' यह बात उसके सभी पड़ोसी जानते थे। एक बार देवदास किसी कार्यवश राजकुल में गया। उसी समय उसका वध चाहनेवाली स्त्री ने अपने जार को लाकर अपने घर की छत पर उसे छिपा दिया ॥६९-७०॥ तब वहाँ से आये हुए और भोजन करके सोये हुए अपने पति देवदास को आधी रात में उसने अपने जार से मरवा डाला ॥७१॥ और अपने जार को घर से निकालकर शान्त बैठी रही। प्रातःकाल होते ही घर से बाहर निकलकर चिल्लाने लगी कि मेरे पति को चोरों ने रात में मार डाला ॥७२॥ तब उसके सम्बन्धी बन्धु-बान्धव वहाँ आकर सारी स्थिति देखकर बोले— यदि तेरे पति को चोरों ने मारा तो वे यहाँ से तुम्हारी कुछ भी सम्पत्ति क्यों नहीं चुरा ले गये ? ॥७३॥ इस प्रकार कहकर उन्होंने वहाँ खड़े उसके बालक से पूछा कि तुम्हारे पिता को किसने मारा? तब वह स्पष्ट बोला—॥७४॥ 'घर की छत पर कोई जवान पुरुष पड़कर तिन से छिपा था। उसी ने रात में उतरकर मेरे देखते-देखते पिता को मार डाला ॥७५॥ मेरी माँ मुझे पिता के पास से पहले ही उठाकर ले गई। बालक के इस प्रकार कहने पर उनलोगों ने जान लिया कि इसी दुष्टा के जार ने यह हत्या की है ॥७६॥ तब उसके बन्धु-बान्धवों ने जार को ढूँढ़कर उसी समय मरवा डाला और उस बालक को अपने संरक्षण में लेकर सुशीला को गाँव से बाहर निकाल दिया ॥७७॥ इस प्रकार दूसरे पुरुष से प्रेम करनेवाली नारियाँ अपने पति का घात करती हैं। हरिदास के इस प्रकार कहने पर धीमन्त ने फिर कहा— ॥७८॥ दुष्टों की बात छोड़िए धर्म के प्रभाव से ही मनुष्य धन्यवाद को प्राप्त करता है। इसकी यह कहानी सुनिए—॥७९॥ वज्रसार और उसकी स्त्री की कथा उस सुन्दर और शूरवीर वज्रसार की स्त्री अत्यन्त रूपवती थी और वह कुलवती भी थी। वह वज्रसार को अपने शरीर से भी अधिक प्यार करती थी। ॥
७३२ कथासरित्सागर
७३२ कथासरित्सागर एकदा तस्य भार्यायास्तस्या पुत्रान्वितः पिता। निमन्त्रणाय माळव्य सोत्कण्ठोऽभ्याययौ स्वयम् ॥८१॥ वज्रसारोऽथ सत्कृत्य तं स राज्ञे निवेद्य च। निमन्त्रितस्तन समं सभार्यो मालवं ययौ ॥८२॥ मासमात्रं च विश्रम्य सोऽत्र श्वशुरवेश्मनि। इहागाद्राजसंवार्थं सद्भार्या त्वास्त तत्र सा ॥८३॥ ततो दिनेषु यातेषु वज्रसारमुपेत्य तम्। अकस्मात् क्रोधनो नाम सुहृदेवमभाषत ॥८४॥ भार्यां पितृगृहे त्यक्त्वा किं गृहं नाशितं त्वया। तत्रान्यपुरुषासङ्गा पापया हि कृतस्तया ॥८५॥ आगतेन ततोऽद्यैतदाप्तेन कथितं मम। मा मस्था विस्रभं तस्माद्भिगृहीतां जहापराम् ॥८६॥ इत्युक्त्वा क्रोधने याते स्थित्वा मूढ इव क्षणम्। अचिन्तयद्वज्रसारः शङ्के सत्यं भवदिदम् ॥८७॥ आह्वयायके विसृष्टेऽपि सान्यथा नागता कथम्। तदेतां स्वयमानेतुं यामि पश्यामि किं भवेत् ॥८८॥ इति सङ्कल्प्य गत्वैव मालवं श्वशुरौ स तौ। अनुज्ञाप्य गृहीत्वैतां भार्यां प्रस्थितवांस्ततः ॥८९॥ गत्वा च दूरमध्वानं स युक्त्या वञ्चितानुगः। उत्पथेनाविशद्वृभार्यामादाय गहनं वनम् ॥९०॥ तत्रोपवेश्य मध्ये तां विजने वदति स्म सः। त्वमन्यपुरुषासक्तेत्याप्तान्मित्रात्प्रिया श्रुतम् ॥९१॥ मया चात्र स्थितेनैव यदाहूतासि नागता। तत्सत्यं ब्रूहि नो चेद्वा करिष्ये निग्रहं तव ॥९२॥ तच्छ्रुत्वा तमवादीत् सा तच्चेद् यदि निश्चयः। र्तार्हक पृच्छसि मां यत्ते रोचते तत्कुरुष्व मे ॥९३॥ इति सावज्ञमाकर्ण्य वचस्तस्याः स कोपतः। वज्रसारस्तरी बद्ध्वा लताभिस्तामताडयत् ॥९४॥ वस्त्रं हरति यावच्च तस्यास्तावद्विलोक्य ताम्। मग्ना रिरंसा मूढस्य तस्याजायत रागिणः ॥९५॥
दशम लम्बक ७३३
यहाँ पृष्ठ पर दिए गए पाठ का लिप्यंतरण है:
दशम लम्बक ७३३ एक बार उसकी पत्नी का पिता (श्वशुर) अपने पुत्र (उसके साले) के साथ मालव देश से उसे निमन्त्रण देने के लिए बड़ी ही उत्सुकता के साथ आया ॥८१॥ तब वयस्यार ने उसका सत्कार करके और उसके द्वारा निमन्त्रित होकर राजा से प्रार्थना करके (अवकाश लेकर) उसके साथ मालव देश को प्रस्थान किया ॥८२॥ और, वह एक माह तक श्वशुरालय में विश्राम करके राजसेवा के लिए कौशाम्बी लौट आया किन्तु उसकी स्त्री वहीं रह गई ॥८३॥ कुछ दिन बीतने पर वयस्यार का मित्र क्रोथन अकस्मात् आकर उससे बोला—'तूने अपनी स्त्री को उसके बाप के घर पर छोड़कर अपने घर का नाश क्यों कर दिया ! वहीं उस पापिन ने दूसरे पुरुष का साथ कर लिया है ॥८४-८५॥ आज ही उधर से आये हुए एक विश्वस्त व्यक्ति ने मुझसे कहा है। इसे झूठ न समझना। इसलिए उसे दंड देकर दूसरी स्त्री से विवाह कर लो' ॥८६॥ इस प्रकार कहकर क्रोथन के चले जाने पर कुछ समय तक कर्त्तव्यविमूढ़ होकर वयस्यार सोचता रहा—'मैं समझता हूँ यह बात सत्य है ॥८७॥ नहीं तो बुलाने के लिए आदमी भेजने पर भी वह क्यों नहीं आई ? इसलिए, उसे लाने के लिए स्वयं जाता हूँ। देखता हूँ क्या होता है ॥८८॥ इस प्रकार निश्चय करके मालव देश को जाकर और सास-ससुर से आज्ञा लेकर अपनी स्त्री के साथ वह वहाँ से घर की ओर चला ॥८९॥ दूर मार्ग निकल जाने पर अपने साथी सेवक से बहाना करके विपरीत पथ से स्त्री को लेकर वह एक घने जंगल में पहुँचा ॥९० ॥ उस बियाबान (भीषण) सूने जंगल में स्त्री को बैठाकर उसने पूछा—'तू पर-पुरुष पर आसक्त है ऐसा मैंने किसी विश्वासी मित्र से सुना है ॥९१॥ मैंने कौशाम्बी में रहते हुए तुझे लाने के लिए वहाँ से एक दूत भेजा तो भी तू न आई। इसलिए सब सत्य बता। अन्यथा तेरा नाश कर दूँगा' ॥९२॥ यह सुनकर वह बोली—यदि तुम्हें मेरे चरित्र नष्ट होने का विश्वास ही है तो फिर मुझसे क्या पूछते हो जो तुम्हें उचित प्रतीत हो वह करो ॥९३॥ इस प्रकार उसके उपेक्षायुक्त वचन सुनकर वयस्यार ने उसे एक वृक्ष से बाँधकर लताओं से मारना आरम्भ किया ॥ ९४॥ क्रोध में आकर जब उसने उसकी साड़ी खींच ली तब उसे नंगी देखकर वयस्यार का मन विचलित हो उठा और उस मूर्ख कामी का उससे समागम करने की इच्छा जग उठी ॥ ९५ ॥
७३४ कथासरित्सागर
७३४ कथासरित्सागर ततो निवेश्य बद्धां तां रन्तुमाश्लिष्यति स्म सः। मज्जति स्म च सा तेन प्रार्थ्यमाना जगाद च ॥१९६॥ लताभिस्ताडिता बद्ध्वा यथाहं भवता तथा। यद्यहं ताडयेयं त्वां तत इच्छामि नान्यथा ॥१९७॥ तथेति प्रतिपेदे तच्च न व्यसनमोहितः। तृणसारीकृतश्चित्रं वध्यसारो मनोभुवा ॥१९८॥ तत संहस्तपादं तं सा बबन्ध दृढं तरौ। सच्छस्त्रेणैव बद्धस्य कर्णनासं चकर्त सा ॥१९९॥ गृहीत्वा तस्य शस्त्रं च वासांसि च विधाय च। पापा पुरुषवेषं सा यथाकाममगात्ततः ॥२००॥ वध्यसारस्तु तत्रासीच्छिन्नश्रवणनासिकः। गलत्क्षाणिताङ्गेन मानेन च नताननः ॥२०१॥ अथ तत्रागतः कश्चिदौषध्यर्थं वने भिषक्। दृष्ट्वा तं रूपमोन्मुच्य साधुः स्व नीतवान्गृहम् ॥२०२॥ तत्र पाश्वासितस्तेन शनैः स्वगृहमागमत्। स वध्यसारो न च तां विन्दप्राप कुगेहिनीम् ॥२०३॥ अवर्णयच्च स तस्मै वृत्तान्तं श्रेष्ठनाय सः। तेनापि वत्सराजाग्रे कथितं सर्वमेव तत् ॥२०४॥ अय निष्पौरुषामर्षः स्त्रीमूढ इति भार्यया। पुंवेषोऽस्य कृतो नूनं निग्रहश्चोचितः कृतः ॥१०५॥ इति राजकुले सर्वजनोपहसितोऽपि सः। वध्यसार इहास्ते वध्यसारेण चेतसा ॥१ ६॥ तदेवं कस्य विश्वासः स्त्रीषु दवेति गोमुखः। उक्तवानथ भूयोऽपि जगाद मरुभूतिकः ॥१ ७॥ राज्ञः सिंहबलस्य राज्ञ्याः कल्याणवत्याश्च कथा अप्रतिष्ठं मनः स्त्रीणामत्रापि श्रूयतां कथा। पूर्वं सिंहबलो नाम राजाभूद्दक्षिणापथे ॥१ ८॥ तस्य कल्याणवत्याख्या सर्वान्तःपुरयापिताम्। प्रिया माण्डलिकमन्तसुता भार्या बभूव च ॥१ ९॥
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ उल्टी (180 अंश घूमी हुई) दिशा में है तथा इसका अधिकांश भाग अत्यधिक धुंधला एवं क्षत-विक्षत है। सीधे विन्यास में पठनीय अंश का देवनागरी लिप्यंतरण नीचे दिया गया है:
... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... जब वह वंशी रव सुने तब अति व्याकुल होकर भागे उस दशा में उसके सब अंग शिथिल होगये हैं इस से वह गिर-गिर पडती है और फिर उठ कर वेग से दौडती लज्जा से संकोच बन जाती है और भय भी उस को रोक रहा है तब तेरी दशा पूरी सकेगी अथवा नहीं ॥ १- ॥
४३६ कथासरित्सागर
४३६ कथासरित्सागर
तया सह स राज्यं स्वं शासन्नृपतिरेकदा। निष्कासितोऽभूद्बलिविद्देशात् सम्भूय गोत्रजैः॥११०॥ देवीद्वितीयः प्रच्छन्नं सायुधोऽल्पपरिच्छदः। स प्रतस्थे ततो राजा मालवं श्वशुरास्पदम्॥१११॥ गच्छन् पथि च सोऽटव्यां सिंहमाधावितं पुरः। शरैः खड्गप्रहारेण द्विधा चक्रेऽवहेलया॥११२॥ वनद्विपं च गर्जन्तमायान्तं मण्डलाग्रभाक्। खड्गच्छिन्नकराङ्गुलिकं मुक्ताटटिमपातयत्॥११३॥ एकाकी तस्करचमूर्विदलयन्नवपङ्कजाः। गमाधारव्यविक्रान्तः करी कमलिनीमिव॥११४॥ एवं मार्गमतिव्रज्य दृष्टारब्धभूतविक्रमाम्। मालवं प्राप्य देवीं स्वां सोऽब्रवीत् सत्त्वसागरः॥११५॥ न मार्गवृत्तमेतन्मे वाच्यं पितृगृहे त्वया। लज्जया देवि का श्लाघा क्षत्रियस्य हि विक्रमे॥११६॥ इत्युक्त्वा च तया सार्धं प्राविशत्पितृगेहम् । सम्भ्रमात्तेन पृष्टश्च निजं वृत्तान्तमुक्तवान्॥११७॥ सम्भाव्य दत्तहस्त्यश्वस्तत्त्वेन श्वशुरेण सः। शतानीकाभिधस्यागाद्राज्ञोऽतियशिनोऽन्तिकम् ॥११८॥ देवीं तु कल्याणवतीं भार्यां तां पितृवेश्मनि। तत्रैव स्थापयामास विपक्षविजयोद्यतः॥११९॥ तस्मिन्प्रयाते मातुस्तु दिवसप्रकटात्र सा। देवी वातायनाधस्था कञ्चित्पुरुषमददात्॥१२०॥ स दृष्ट एव रूपेण तस्याश्चित्तमपाहरत्। स्मरणाङ्कुप्यमाणा च तत्क्षणं सा व्यचिन्तयत्॥१२१॥ जानेऽहं नार्यपुत्राद्यत्सुलक्ष्णाङ्गो न शोयपाम्। धावत्येव तथाप्यस्मिन् पुरुषे यत मे मनः॥१२२॥ तद्यथ भजाम्येनमिति सञ्चिन्त्य सा ततः। गय्र्यं रहस्यधारिण्यै स्वाभिप्रायं शशंस तम्॥१२३॥ शयनानाय्य भक्तं च बानायनरथेन सा। अन्त पुरं तं पुरुषं रञ्जलिखं न्यवेशयत्॥१२४॥
रानी के साथ राज्य के ग्राहक उस राजा को एकबार उसके प्रबल कुटुम्बी बन्धुओं ने मिलकर राज्य से निकाल दिया ॥११॥ तब वह राजा रानी और कुछ सेवकों के साथ गुप्त रूप से वहाँ से चला और अपनी ससुराल आ गया ॥१११॥ मार्ग में जाते हुए जंगल में उसने अपने ऊपर आक्रमण करते हुए एक सिंह को अनायास तलवार के प्रहार से दो टुकड़े करके मार डाला ॥११२॥ और, उन्नत पैंतर के साथ घूमते हुए तथा आक्रमण करते एवं चिल्लाड़ते हुए हाथी के पैर और सूँड़ काटकर उसे गिरा दिया ॥११३॥ आगे चलकर मिले हुए चोरों के दल को उसने इस प्रकार काटकर गिरा दिया जैसे जंगली हाथी कमल के जंगल को रौंद डालता है॥११४॥ इस प्रकार, रानी के द्वारा देखा गया पराक्रमवाला वह राजा मार्ग तय करके मालव देश पहुँचा। तब बल का समुद्र वह राजा रानी से कहने लगा—॥११५॥ मार्ग का यह समाचार तुम अपने पिता के घर मत कहना। यह तो एक लज्जा की बात है। पराक्रम करने में क्षत्रिय की क्या प्रशंसा ? ॥११६॥ ऐसा रानी से कहकर वह राजा उसके साथ उसके पिता के भवन में गया। और, घबराकर समाचार पूछने पर उसने अपना समाचार (बन्धुओं द्वारा राज्य छीने जाने का) सुना दिया ॥११७॥ तब श्वशुर द्वारा सत्कृत होकर और हाथी घोड़े आदि सेना की सहायता प्राप्त कर वह अत्यन्त बलवान् राजा यज्ञावलोक के समीप गया ॥११८॥ और, शत्रुओं को जीतने में प्रयत्नशील राजा ने रानी कल्याणवती को वही पिता के ही घर पर रख दिया ॥११९॥ उस राजा के चले जाने पर और कुछ दिन बीतने पर एक बार, भवन की खिड़की में बैठी हुई रानी ने किसी पुरुष को देखा ॥१२० ॥ उस पुरुष ने देखते ही रानी के मन को मोह लिया और काम-वासना से प्रेरित रानी उस समय सोचने लगी—॥१२१॥ मैं भली भाँति यह जानती हूँ कि मेरे पतिदेव के समान सुन्दर और पराक्रमी दूसरा पुरुष नहीं है। फिर भी इस पुरुष की ओर मेरा मन खिंच रहा है। यह खेद है ॥१२२॥ अब जो भी हो, मैं इसे भोगूंगी ही। इस प्रकार सोचकर उसने अपना गुप्त भेद जाननेवाली सहेली से अपने मन का भाव प्रकट किया ॥१२३॥ और उसी के द्वारा उस रात्रि के समय खिड़की के मार्ग से रस्से के सहारे ऊपर चढ़ा कर अपने घर में बुला लिया ॥१२४॥ १
१८ कथासरित्सागर
१८ कथासरित्सागर स प्रविष्टोऽत्र पुरुषो नैवाभ्यासितुमोजसा । शशाक तस्याः पर्यङ्के न्यषीदत् पुष्पासने ॥१२५॥ तद्दृष्ट्वा बत नीचोऽयमिति यावद्विषीदति । राज्ञी सा तावदत्रागादुपरिष्टाद् भ्रमन्नहिः ॥१२६॥ तं विलोक्य भयोत्थाय सहसा पुरुषोऽत्र सः । धनुरादाय भुजगं जघान विशिखेन तम् ॥१२७॥ विपन्नपतितं तं च गवाक्षात्क्षिप्तवान्बहिः । हर्षेण तन्मयोत्तीर्णो मनर्त स च कातरः ॥१२८॥ नृत्यन्तं वीक्ष्य तं खिन्ना सा कल्याणवती भृशम् । दध्यौ धिग्विधिमेतेन निःसत्त्वेनाधमेन मे ॥१२९॥ दृष्ट्वैव तद्विरक्तां तां चित्तज्ञा सा च तत्सखी । निर्गत्याशु प्रविश्यात्र जगाद कृतसम्भ्रमा ॥१३०॥ आगतस्ते पिता देवि तदयं यातु सम्प्रति । यथागतेनैव पथा स्वगृहं त्वरितं युवा ॥१३१॥ एव तयोक्ते निर्याते रज्ज्वा वातायनाद्बहिः । भयाकुलः स पतितो न दैवात् पञ्चतां गतः ॥१३२॥ गते तस्मिन्नुवाचैतां सा कल्याणवती सखीम् । सखि सुष्ठु कृतं नीचो यत्त्वयैष बहिष्कृतः ॥१३३॥ शान्तं त्वया मे हृदयं चेतो हि मम दूयते । भर्त्ता मे व्याघ्रसिंहादीन्विपाट्यापहृतो ह्रिया ॥१३४॥ अयं तु भुजगं हत्वा हीनसत्त्वः प्रनृत्यति । तत्तादृशं तं हित्वा किमस्मिन्मे प्राकृते रतिः ॥१३५॥ तदप्रतिष्ठितमतिं धिङ् मां धिगथवा स्त्रियः । या धावन्त्यगुणे हित्वा कर्पूरं मक्षिका इव ॥१३६॥ इति जातानुतापा सा राज्ञी नीत्वा निशां ततः । प्रतीक्षमाणा भर्त्तारमासीत्तत्र पितुर्गृहे ॥१३७॥ तावत्स दत्तान्यबलो गजानीकेन भूभुजा । गत्वा तान्प्राग्जयान्यस्य पापात्सिंहवतोऽब्रवीत् ॥१३८॥ ततः स सम्प्राप्य पुनः स्वराज्यमानीय भार्यां च पितुर्गृहात्ताम् । प्रपूज्य तं च श्वशुरं धनोपेतोऽनिष्कण्टकां क्ष्मां सुचिरं शशास ॥१३९॥
वह पुरुष उसके शयनागार में जाकर भी उसके तेज से प्रभावित होकर उसके पर्यंक पर न बैठकर भूमि पर बिछे हुए अलग आसन पर ही बैठ गया ॥१२५॥ यह देखकर, जब रानी यह सोच रही थी कि अरे, यह तो कायर है, तो मन में दुख करने लगी। इतने में ही छत के ऊपर से घूमता हुआ एक सर्प वहाँ आ निकला ॥१२६॥ उसे देखकर, भय से उठकर और धनुष लेकर उस पुरुष ने बाण से सर्प को मार डाला ॥१२७॥ मरने के बाद गिरे हुए उस सर्प को उसने झरोखे से बाहर फेंक दिया। फलतः उस भय से छूट जाने पर वह कायर प्रसन्न होकर नाचने लगा ॥१२८॥ उसे नाचते हुए देखकर व्याकुल वह कन्यावती गम्भीर चिन्ता करने लगी कि 'मुझे धिक्कार है! ऐसे बलहीन और नीच पुरुष से मैं क्या समागम करूँ? ॥१२९॥ उस पुरुष को देखते ही रानी को विरक्त जानकर, उसके मनोभाव को जाननेवाली सहेली ने उस कमरे में तुरन्त आकर घबराहट के साथ कहा—'हे देवि तुम्हारे पिता आये हैं इसलिए यह युवापुरुष जिस मार्ग से आया था उसी मार्ग से अपने घर चला जाय' ॥१३०-१३१॥ उस सहेली के ऐसा कहने पर खिड़की से बाहर लटकती हुई रस्सी के सहारे वह निकला किन्तु भय के कारण गिर पड़ा भाग्यवश मरा नहीं ॥१३२॥ उसके चले जाने पर कन्यावती अपनी सहेली से कहने लगी—'सखि अच्छा किया तुमने जो इस अधम और कायर को बाहर निकाला ॥१३३॥ तुमने मेरे हृदय को जान लिया। मेरा चित्त दुःखी हो रहा है। मेरा पति तो सिंह, जंगली हाथी और डाकुओं के दल का नाश करके भी लज्जा से उसे छिपाता है। और, यह कायर तो साँप को मारकर नाचता है। इसलिए, ऐसे शूर-वीर पति को छोड़कर ऐसे पामर व्यक्ति से मैं क्या प्रेम करूँ? ॥१३४-१३५॥ इस प्रकार चंचल बुद्धिवाली मुझे धिक्कार है। या उन सभी स्त्रियों को धिक्कार है, जो मक्खियों की भाँति सुगन्धित कपूर को छोड़कर गन्दगी की ओर दौड़ती हैं ॥१३६॥ इस प्रकार पश्चात्ताप करती हुई रानी उस रात्रि को व्यतीत करके पति की प्रतीक्षा करती हुई पिता के घर में रहने लगी ॥१३७॥ उधर, राजा विह्वल ने राजा गजानीक से और भी सेना की सहायता लेकर, चढ़ाई करके अपने महाबली पाँचों कुटुम्बियों को पराजित किया ॥१३८॥ तदनन्तर, राजा विह्वल ने पुनः अपने राज्य को पाकर अपनी रानी कन्यावती को पिता के घर से लाकर और श्वशुर को पर्याप्त धन देकर अपने निष्कंटक राज्य का चिरकाल तक शासन किया ॥१३९॥
कथासरित्सागर
कथासरित्सागर इति प्रवीरे सुभग च सल्पतौ विवेकिनीनामपि दैव योषिताम् । चलं मनो धावति यत्र कुत्रचिद्विदुश्चसत्त्वा विरला पुनः स्त्रियः ॥१४०॥ इति मरुभूतिनिगदितामाकर्ण्य कथां स वत्सराजसुतः । नरवाहनदत्तस्तां सुखसुप्तो नीतवान् रजनीम् ॥१४१॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे शक्तियशोलम्बके द्वितीयस्तरङ्गः । तृतीयस्तरङ्गः नरवाहनदत्तकथा (पूर्वानुवृत्ता) ततः प्रातः कृतावश्यकरायं स सचिवैः सह । नरवाहनदत्त स्वमुद्यानं विहरन्ययौ ॥१॥ तत्रस्थश्च प्रभापुञ्जमादौ व्योम्नोऽप्यनन्तरम् । ततो विद्याधरीवल्लीरवत्तीर्णा ददर्श सः ॥२॥ तासां मध्य च दीप्तानां ददर्शेकां स कन्यकाम् । ताराणामिव शीतांशुलेखां लोचनहारिणीम् ॥३॥ विकसत्पद्मवदनां लोललोचनषट्पदाम् । सलीरुहसगमनां बह्दुत्पलसौरभाम् ॥४॥ तरङ्गहारित्रिवलीस्त्रासन्नतमध्यमाम् । साक्षादिव स्मरोद्यानवापीशोभाभिदेवताम् ॥५॥ स्मरसञ्जीवनीं तां च दृष्ट्वा सोत्कलिकामतः । चान्द्रीं मूर्तिमिवाम्भोधिश्शुशुभे स नृपात्मजः ॥६॥ अहो सुन्दरनिर्माणवैचित्री वाप्यसौ विधेः । इति शंसन् स सचिवः सहितस्तामुपाययौ ॥७॥ तिर्यक्प्रमार्द्या दृष्ट्या पश्यन्ती सा च स क्रमात् । पप्रच्छ का त्वं कल्याणि किमिहागमनं च ते ॥८॥ तच्छ्रुत्वा साऽब्रवीत्कन्या शृणुतेतद्वदामि यः । अशितघनाख्यः कौशाम्ब्याभागमनम् अस्ति काञ्चनशृङ्गाख्यं पुरं हैमं हिमाचले ॥९॥ तत्रास्ति नाम्ना स्फटिकयशा विद्याधरेश्वरः । धार्मिक कृपनानाधशरण्यामृतबरसम् ॥१०॥
षष्ठम लम्बक ७५१
षष्ठम लम्बक ७५१ हे स्वामी इस प्रकार वीर, सदाचारी और सुन्दर पति के रहने पर भी विचारशील युवतियों का भी मन चंचल होकर यहाँ-वहाँ दौड़ता है। विशुद्ध मनवाली स्त्रियाँ विरल ही होती हैं ॥१४॥ मरुभूति द्वारा इस प्रकार कही गई कथा को सुनकर वत्सराज-पुत्र नरवाहनदत्त ने सुखपूर्वक सोकर रात बिताई ॥१४१॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट विरचित कथासरित्सागर के शक्तियश लम्बक का द्वितीय तरंग समाप्त
तृतीय तरंग नरवाहनदत्त की कथा (क्रमागत)
सुबह में सोकर उठने के बाद आवश्यक कर्मों से निवृत्त होकर नरवाहनदत्त अपने मन्त्रियों के साथ उद्यान में विहार करने के लिए गया ॥१॥ उद्यान में भ्रमण करते हुए उसने आकाश में पहले तेज का पुंज और उसके पश्चात् ही आकाश से उतरती हुई बहुत-सी विद्याधरियों को देखा ॥२॥ उन चमकती हुई विद्याधरियों के मध्य उसने एक कन्या को इस प्रकार देखा मानों तारिका-मंडल के मध्य चमकती हुई नयनहारिणी चन्द्रमा की रेखा हो ॥३॥ उसका मुख-कमल खिला हुआ था और उसके चंचल नयन भ्रमरों के समान घूम रहे थे। हंस के समान लीलायुक्त गमन करती हुई उसके शरीर से कमल के समान सुगन्धि निकल रही थी ॥४॥ तरंग युक्त त्रिवली-लता से उसकी कमर अलंकृत थी मानों काम-रूपी बावली की छाया की वह मूर्तिमती अधिदेवता थी ॥५॥ कामदेव की संजीवनी-विद्या के समान और उत्कंठित चन्द्रमा की मूर्ति के समान उसे देखकर समुद्र के समान वत्सराज का पुत्र वह नरवाहनदत्त क्षुब्ध हो उठा ॥६॥ 'अहो ! यह तो ब्रह्मा के सौन्दर्य-सृष्टि की विचित्र रचना है' इस प्रकार कहता हुआ वह युवराज मन्त्रियों के साथ उसके पास आ गया ॥७॥ वह भी स्नेह से स्निग्ध और तिरछी आँखों से उसे देखती थी। क्रमशः समीप जाकर उसने उस सुन्दरी से पूछा कि तू कौन है और यहाँ कैसे आई ? ॥८॥
शक्तियशा का कौशाम्बी में आगमन
यह सुनकर वह कन्या बोली 'सुनो मैं तुम्हें बताती हूँ। हिमाचल पर्वत पर कांचन शृंग नाम का सुवर्ण-निर्मित नगर है ॥९॥ वहाँ स्फटिकयश नाम का विद्याधरों का राजा है। वह बहुत धर्मात्मा है और दीन अनाथों एवं शरणागतों का पालन रक्षण करनेवाला है ॥१०॥
४४२ कथासरित्सागर
४४२ कथासरित्सागर तस्य हेमप्रभादेव्यां जातां गौरीवरोद्भवाम्। मां शक्तियशसं नाम जानीहि तनयामिमाम् ॥११॥ पितुः प्राणप्रिया साहं पञ्चभ्रातृकनीयसी। अतोषयं तवादेशाद् व्रतं स्तोत्रैश्च पार्वतीम् ॥१२॥ तुष्टा सा सकला विद्या दत्त्वा मामेवमादिशत्। पितुर्वंशगुणैः पुत्रि भावि विद्याबलं तव ॥१३॥ नरवाहनदत्तश्च भर्त्ता तव भविष्यति। वत्सराजसुतो भाविचक्रवर्ती द्युचारिणाम् ॥१४॥ इत्युक्त्वा शर्वपत्नी मे तिरोऽभूत्तत्प्रसादतः। सद्योविद्याबला साहं सम्प्राप्ता यौवनं क्रमात् ॥१५॥ अद्यादिशच्च सा रात्रौ देवी मां दत्तदर्शना। प्रातः पुत्रि त्वया गत्वा द्रष्टव्यः स निजः पतिः ॥१६॥ आगन्तव्यमिहैवाद्य मासेन हि पिता तव। चित्तस्थितैस्तत्सङ्कल्पो विवाहं संविधास्यति ॥१७॥ इत्यादिश्य तिरोऽभूत् सा देवी याता च यामिनी। ततोऽहमार्यपुत्रैषा त्वमिह द्रष्टुमागता ॥१८॥ तत्सम्प्रति व्रजामीति गदित्वा ससखीजना। उत्पत्य च शक्तियशाः सा जगाम पुरं पितुः ॥१९॥ नरवाहनदत्तश्च तद्विवाहोत्सुकस्ततः। दिवसाभ्यन्तरं खिन्नः पश्यन् मासं युगॊपमम् ॥२०॥ तत्र दृष्ट्वा विमनसं सोऽथ तं गोमुखोऽब्रवीत्। शृणु देव कथामेकां तवाख्यामि विनोदिनीम् ॥२१॥ विद्याधर्याः कथा बभूव काञ्चनपुरीत्याख्यया नगरी पुरा। तस्यां च सुमना नाम महानासीन्महीपतिः ॥२२॥ आक्रान्तदुर्गकान्तारभूमिना येन चक्रिरे। चित्रं विराजमानेन तादृशा अपि शत्रवः ॥२३॥ तमेकदास्थानगतं प्रतीहारो व्यजिज्ञपत्। देव मुक्ताक्षिता नाम निषादाधिपकन्यका ॥२४॥ पञ्जरस्थितमादाय शुकं द्वारि बहिः स्थिता। वीरसेनेनानुगता भ्रात्रा तव दिदृक्षते ॥२५॥ १ इयमेव कथा कादम्बरीमूलभूता।
षष्ठ लम्बक ७४३
षष्ठ लम्बक ७४३ उस राजा की हेमप्रभा नाम की रानी में पार्वती की कृपा से उत्पन्न हुई शक्तियशा नाम की कन्या मुझे जानो ॥११॥ पाँच भाइयों में सबसे छोटी और अपने पिता की प्राणों से भी प्यारी कन्या मैने अपने पिता की आज्ञा से व्रतों और स्तोत्रों से पार्वती को सन्तुष्ट किया ॥१२॥ उस प्रसन्न पार्वती ने मुझे सभी विद्याएँ देकर आज्ञा दी कि 'बेटी तुझे पिता से दसगुना विद्याओं का बल प्राप्त होगा और वत्सराज का पुत्र तथा विद्याधरों का भावी चक्रवर्ती नरवाहनदत्त तेरा पति होगा' ॥१३-१४॥ इस प्रकार कहकर पार्वती अन्तर्धान हो गई और विद्याबल को प्राप्त कर मैं समस्त गुणवती हो गई ॥१५॥ आज रात मुझे स्वप्न में दर्शन देकर पार्वती देवी ने आज्ञा दी कि 'बेटी प्रातःकाल ही तुम अपने पति को देखना ॥१६॥ और, एक मास के पश्चात् आज के ही दिन यहाँ फिर आना। तब चित्त में इस निश्चय को ठाने हुए तुम्हारा पिता तुम्हारा विवाह-संस्कार सम्पन्न करेगा' ॥१७॥ इस प्रकार की आज्ञा देकर देवी चली गईं और रात भी बीत गई। इसलिए, 'हे आर्यपुत्र मैं तुम्हें देखने के लिए यहाँ आई हूँ ॥१८॥ तुम्हारा दर्शन हुआ अतः अब मैं जाती हूँ।" यह कहकर शक्तियशा अपनी सहेलियों के साथ आकाश में उड़कर पिता के नगर को चली गई ॥१९॥ तब उसके विवाह के लिए व्याकुल नरवाहनदत्त एक मास को एक युग के समान समझता हुआ अपने भवन को गया ॥२०॥ घर आकर उसे उदास देखकर गोमुख ने कहा-हे स्वामी तुम्हारे मन को बहलाने के लिए मैं एक कथा कहता हूँ सुनो- ॥२१॥ दो विद्याधरियों की कथा प्राचीन समय में कांचनपुरी नाम की एक नगरी थी। उसमें सुशर्मा नाम का महान् राजा था ॥२२॥ दुर्गम भूमियों को आक्रान्त करके उस राजा ने शत्रुओं को भी ऐसा ही कर दिया (अर्थात्, उसके शत्रु भी दुर्गम भूमि की शरण में चले गए) ॥२३॥ एक बार सभा (आम दरबार) में बैठे हुए राजा से द्वारपाल ने आकर निवेदन किया- 'महाराज निषादों की राजकन्या मुक्ताफला पिंजरे में रखे हुए शुक (तोते) को लेकर बाहर द्वार पर खड़ी है। उसीके साथ उसका बड़ा भाई वीरध्वज है। वह आपको देखना चाहती है' ॥२४-२५॥
७४४ कथासरित्सागर
७४४ कथासरित्सागर प्रविशत्विति राज्ञोक्ते प्रतीहारनिवेशन । भिल्लकन्या नृपास्थानप्राङ्गणं प्रविवेश सा ॥२६॥ न मानुषीयं दिव्यस्त्री कापि नूनमसाविति । सर्वैरप्यचिन्त्यस्तत्र दृष्ट्वा तद्रूपमद्भुतम् ॥२७॥ सा च प्रणम्य राजानमेवं व्यज्ञापयत्तदा । देवाय सर्व्वशास्त्रज्ञोऽस्येनतुर्वेदघरः शुकः ॥२८॥ कविः कृत्स्नासु विद्यासु कलासु च विचक्षणः । भयैश्वरोपयोगित्वादहानीतोऽय गृह्यताम् ॥२९॥ इत्यर्पितस्तमादाय प्रतीहारेण कौतुकात् । नीतोऽग्रे नृपतेरेनं शुकः श्लोकं पपाठ सः ॥३०॥ राजन्युक्तमिदं सदैव यदयं दवस्य समुद्द्यते । धूमश्याममुखो द्विषद्विरहिणीनिःश्वासवातोद्गमैः । एतत्त्वद्भुतमेव यत्परिमषाद्वाष्पाम्बुपूरप्लवै- र्गाढं प्रज्वलतीह दिक्षु वणसु प्राप्य प्रतापानलः ॥३१॥ एवं पठित्वा व्याख्याय शुकोऽवादीत् पुनश्च सः । किं प्रमेयं कुत शास्त्राद्ब्रवीम्याविश्यतामिति ॥३२॥ ततोऽतिविस्मितं राज्ञि मन्त्री तस्याब्रवीन्निदम् । शङ्के शापाच्छुकीभूतः पूर्व्वर्षि कोऽप्ययं प्रभो ॥३३॥ जातिस्मरो धर्मवशात् पुरासीत स्मरत्यतः । इत्युक्ते मन्त्रिणा राजा स शुकं पृच्छति स्म तम् ॥३४॥ कौतुक भद्र मे ब्रूहि स्ववृत्तान्त क्व जन्म ते । शुकत्वे शास्त्रविज्ञानं कुत को वा भवानिति ॥३५॥ शुकस्यात्मकथा तत स बाष्पमुत्सृज्य ववति स्म शुकः शनै । अवाच्यमपि वैवंत्तच्छृणु वच्मि त्वाज्ञया ॥३६॥ हिमवन्निकटे राजंस्तस्येको रोहिणीतरुः । आम्नाय इव दिव्यापिभूरिशाखाश्रितद्विजः ॥३७॥ १ आम्नायपक्षे—भूरिशाखाश्रिता द्विजाः यस्य तरुपक्षे—भूरिशाखासु आश्रिता, द्विजाः=पक्षिणो यस्य ।