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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

नवम लम्बक ४५९

नवम लम्बक ४५९ इसी विद्या के द्वारा यह भी जाना कि तुम भी यहाँ आये हो। अतः देवता के आदेश से प्राप्त इस कन्या को ग्रहण करो ॥५२॥ इसके पिता का बताया हुआ विवाह-लग्न कल प्रातःकाल है। अतः आज तुम अपनी कौशाम्बी नगरी को जाओ और हम दोनों भी यहाँ से जाती हैं। प्रातःकाल इसके पिता धर्मकार धौत तपोवन से आकर, इस कन्या को स्वयं तुम्हें देंगे ॥५३-५४॥ कांचनप्रभा के इस प्रकार कहने पर, उस अलंकारवती और नरवाहनदत्त-दोनों की अवस्था अवर्णनीय हो गई ॥५५॥ वे दोनों चकवा-चकवी के समान परस्पर एक रात्रि का वियोग-दुःख भी सहन करने में असमर्थ हो रहे थे। अतः सायंकाल के समय उन दोनों की आँखों में आँसू थे ॥५६॥ उन दोनों को इस प्रकार आतुर देखकर कांचनप्रभा ने कहा—'एक रात्रि के ही वियोग में तुम दोनों को इतना अधैर्य क्यों हो रहा है ? ॥५७॥ धैर्यशाली व्यक्ति अनिश्चित अवधि तक चिरकालीन विरह का सहन करते हैं। इस सम्बन्ध में रामचन्द्र और सीतादेवी की कथा सुनो ॥५८॥ राम और सीता की कथा प्राचीन समय में अयोध्या-नरेश दशरथ के पुत्र राम भरत लक्ष्मण और शत्रुघ्न— इन चारों भाइयो में राम सबसे बड़ा था। वह रावण का विनाश करने के लिए विष्णु के अंश से उत्पन्न हुआ था। जनक राजा की सीता नाम की पुत्री उसकी प्राणप्यारी पत्नी थी ॥५९-६०॥ दैवयोग से भरत को राज्य देकर पिता ने राम को सीता और लक्ष्मण के साथ वन भेज दिया ॥६१॥ वहाँ वन में रावण ने कपट करके उसकी प्राणप्यारी सीता का हरण कर लिया और मार्ग में जटायु का वध करके वह उसे लंका को ले गया ॥६२॥ तब वियोगी राम ने बाली को मारकर और सुग्रीव से मित्रता की और हनुमान् को लंका भेजकर उसका समाचार प्राप्त किया ॥६३॥ तदनन्तर, राम ने समुद्र-तट पर जाकर उसमें पुल बाँधकर रावण को मारा और लंका का राज्य विभीषण को देकर सीता को प्राप्त किया ॥६४॥

कथासरित्सागर

कथासरित्सागर अथावृत्तस्य वनात् शासतो भरतार्पितम् । तस्य राज्यमयोध्यायां सीता गर्भमधत्त सा ॥६५॥ तावच्चात्र प्रजाचेष्टां ज्ञातुमल्पपरिच्छदः । स्वैरं परिभ्रमन्नेकं सोऽपश्यत्पुरुषं प्रभुः ॥६६॥ हस्ते गृहीत्वा गृहिणीं निरस्यन्तं निशासु गृहात् । परस्येयं गृहमगादिति दोषानुकीर्तनात् ॥६७॥ रक्षोगृहोषिता सीता राघवेन नोज्झिता । अयमभ्यधिको भो मामुज्झति ज्ञातिवेश्मगाम् ॥६८॥ इति तद् गृहिणीं तां च ब्रुवतीं स्वं निज पतिम्। रामो राजा स शुश्राव क्षिप्रञ्चाभ्यन्तरं ययौ ॥६९॥ लोकापवादभीतश्च सीतां तत्याज तां वने। सहते विरहक्लेशं यशस्वी नायशः पुनः ॥७०॥ सा च गर्भालसा दैवाद्वाल्मीकेः प्रापदाश्रमम् । तेनर्षिणा समाश्वास्य तत्रैव ग्राहिता स्थितिम् ॥७१॥ नूनं सीता सदोषाऽयं त्यक्ता भर्त्राऽन्यथा कथम् । तदेतद्दर्शनाश्रित्य पापं संक्रामतीह नः ॥७२॥ वाल्मीकिः कृपया चैनां निर्वासयति नाश्रमात् । एतद्दर्शनजं पापं तपसा च व्यपोहति ॥७३॥ तदेत यावद् गच्छामो द्वितीयं कञ्चिदाश्रमम् । इति सम्मन्त्रयामासुस्तमभ्येत्य मुनयस्तदा ॥७४॥ तद् बुद्ध्वा तान्स वाल्मीकिरब्रवीत्तान् सदयः । शुद्धा प्रणिधानेन मया दृष्टा द्विजा इति ॥७५॥ तथाप्यप्रत्ययस्तेषां यदा सीता तदाभ्यधात् । भगवन्तो यथा विद्म तथा घोषयतेह माम् ॥७६॥ अशुद्धायाः शिरश्छेदनिग्रहः क्रियतां मम। तच्छ्रुत्वा जातकरुणा जगदुर्मुनयोऽथ ते ॥७७॥ अस्त्यत्र टीटिभरावा नाम तीर्थं महत्नु । टीटिभी हि पुरा कापि भर्तृत्यागद्रुतद्रुता ॥७८॥ मिथ्यैव दूषिता साध्वी चतन्दारणा भुषम् ।

नवम लम्बक ४६१

नवम लम्बक ४६१ लंका से लौटने के पश्चात् भरत द्वारा सौंपे गये राज्य का पालन करते हुए राम की पत्नी सीता ने गर्भ धारण किया ॥६५॥ उस अवसर पर प्रजा का समाचार जानने के लिए गुप्त रूप से अयोध्या में भ्रमण करते हुए राम ने एक पुरुष को देखा ॥६६॥ जो अपनी पत्नी को हाथ से खींचकर बाहर निकाल रहा था और वह उसका यह दोष घोषित कर रहा था कि उसकी स्त्री दूसरे व्यक्ति के घर पर जाकर रही ॥६७॥ राजा राम ने उस स्त्री को यह कहते हुए सुनकर अत्यन्त खेद और लज्जा का अनुभव किया कि 'राक्षस के घर में रही हुई सीता को रामचन्द्र ने नहीं छोड़ा। यह मेरा पति उससे भी बड़ा है, जो अपने ही बन्धु के घर में रही हुई मुझे त्याग रहा है, ॥६८ ६९॥ इस प्रकार, लोक-निन्दा के भय से राम ने सीता को वन में छोड़ दिया। सच है, यशस्वी व्यक्ति विरह-क्लेश का सहन करते हैं किन्तु निन्दा का सहन नहीं करते ॥७०॥ भय के कारण खिन्न सीता वन से वाल्मीकि के आश्रम में पहुँची और उस ऋषि ने उसे आश्वासन देकर वहीं ठहराया ॥७१॥ 'सीता अवश्य दुष्टा है अन्यथा उसका पति उसे क्यों छोड़ देता ? तो प्रतिदिन उसका दर्शन करने से लोगों को पाप चढ़ता है। वाल्मीकि तो दया के कारण उसे आश्रम से नहीं निकालते और उसके दर्शन से होनेवाले पाप को तप से नष्ट करते हैं। तो चलो किसी दूसरे आश्रम को चलें'-वाल्मीकि के आश्रम में रहनेवाले दूसरे मुनि इस प्रकार चर्चा करने लगे ॥७२-७४॥ दूसरे मुनियों के इन विचारों को सुनकर वाल्मीकि ने उनसे कहा-'इसमें सन्देह नहीं कि यह सीता चरित्र से शुद्ध है। हे मुनियों मैंने ध्यान से इसे देख लिया है। फिर भी जब उन मुनियों को अविश्वास रहा तब सीता ने कहा- 'आप लोग जैसा समझें उस प्रकार मेरी शुद्धि की जाँच करें। यदि मैं अशुद्ध होऊँ तो मेरा शिर काटकर मुझे दंड दें। यह सुनकर सभी दयाल मुनि कहने लगे। यहाँ घोर वन में टीटिभ सर नाम का तीर्थ है। प्राचीन समय में किसी टिट्टिहरी को उसके (नर) टिट्टिहरे ने दूसरे टिट्टिहरे के संगम का मिथ्या दोष लगाया था ॥७५-७८॥ इस कलंक के कारण दुःखित शरणहीन एवं अनाथा टिट्टिहरी पृथ्वी और लोकपालों का दुहाई देकर विलाप करने लगी। तब उन्होंने उसकी शुद्धि के लिए उस सरोवर की रचना की ॥७९॥

कथासरित्सागर

४६२ कथासरित्सागर

तत्रैषा राघववधूः परिशुद्धिं करोतु नः । इत्युक्तवद्भिस्तैः साकं जानकी तत्सरो ययौ ॥८०॥ यद्यार्यपुत्रादन्यत्र न स्वप्नेऽपि मनो मम। तदुत्तरेयं सरसः पारमम्ब वसुन्धरे ॥८१॥ इत्युक्त्वैव प्रविष्टा च तस्मिन्सरसि सा सती। नीता च पारमुत्सङ्गं कृत्वाविर्भूतया भुवा ॥८२॥ ततस्तां ते महासाध्वीं प्रणेमुर्मुनयोऽखिलाः। राघवं शप्तुमैच्छंश्च तत्परित्यागमन्युना ॥८३॥ युष्माभिरार्यपुत्रस्य न ध्यातव्यममङ्गलम्। शप्तुमर्हथ मामेव पापामभ्यञ्जलिरेष वः ॥८४॥ इति यद्वारयामास सीता तान्सा पतिव्रता। तेन ते मुनयस्तुष्टास्तस्याः पुत्राशिषं ददुः ॥८५॥ ततः सा तत्र तिष्ठन्ती समये सुषुवे सुतम्। तं च नाम्ना लवं चक्रे स वाल्मीकिमुनिः धियुम् ॥८६॥ बालमादाय तं तस्यां गतायां स्नातुमेकदा। तेन शून्यं तदुटजं दृष्ट्वा सोऽचिन्तयन्मुनिः ॥८७॥ स्थापयित्वार्भकं याति स्नातुं सा तत् क्व सोऽर्भकः । नीतः स श्वापदेनेह नूनमन्यं सृजामि तत् ॥८८॥ स्नात्वागतान्यथा सीता न प्राणान्धारयेदिह। इति ध्यात्वा कुशैः कृत्वा पवित्रं निर्ममेऽर्भकम् ॥८९॥ लवस्य सदृशं स च स तमास्थापयन्मुनिः। आगता तं च सा दृष्ट्वा मुनिं सीता व्यजिज्ञपत् ॥९०॥ स्वकोऽयं मे स्थितो बालस्तदेषोऽन्यः कुतो मुने। तच्छ्रुत्वा स यथावृत्तमुक्त्वा मुनिरुवाच ताम् ॥९१॥ भवितव्यं गृहाण त्वं द्वितीयमममे सुतम्। कुशसंज्ञं मयायं यत्स्वप्रभावात्कुशैः कृतः ॥९२॥ इत्युक्ता तन मुनिना सीता सबबुचो सुतौ। तेनैव कृतसंस्कारौ वर्धयामास तत्र तौ ॥९३॥ बालावेव च तौ दिव्यमस्त्रग्राममवापतुः। विद्याश्च सर्वाः वाल्मीकिमुनेः क्षत्रकुमारकौ ॥९४॥

नवम काण्डक ४६३ उसी सरोवर में राम की यह पत्नी अपनी निष्कलंकता का हमें प्रमाण दें।—इस प्रकार कहते हुए उन मुनियों के साथ सीता टीटिम-सर में गईं ॥८०॥ 'यदि आर्यपुत्र राम के सिवा स्वप्न में भी मेरा मन पर-पुरुष की ओर न गया हो तो हे वसुन्धरे ! मैं इस तालाब के पार हो जाऊँ ॥८१॥ ऐसा कहकर उस सरोवर में प्रविष्ट उस सती सीता को माता पृथ्वी ने गोद में उठाकर उस पार कर दिया ॥८२॥ इस घटना से विश्वस्त समस्त महामुनियों ने उस महापतिव्रता को प्रणाम किया और वे उसका त्याग करने के कारण क्रोध से राम को शाप देने के लिए तैयार हो गये ॥८३॥ तब सती सीता ने कहा—'आप लोगों को मेरे पति रामचन्द्र का अशुभ न सोचना चाहिए। आप लोग मुझे ही शाप दे सकते हैं। मैं आप लोगों को हाथ जोड़ती हूँ' ॥८४॥ इस प्रकार, जब सीता ने उन मुनियों को शाप देने से रोका तब उन्होंने सन्तुष्ट होकर उसे पुत्र होने का आशीर्वाद दिया ॥८५॥ तदनन्तर, आश्रम में रहती हुई सीता ने वहाँ पुत्र प्रसव किया। मुनि वाल्मीकि ने उसका नाम लव रखा ॥८६॥ एक बार बालक को साथ लेकर वह सीता स्नान करने चली गई। इस कारण उसकी पर्णकुटी को खाली देखकर मुनि वाल्मीकि ने सोचा कि वह (सीता) बालक को सदा यहीं रखकर ही स्नान करने जाती थी तो अवश्य ही किसी हिंसक जन्तु ने बालक को मार खाया होगा। अतः मैं दूसरे बालक का निर्माण करता हूँ ॥८७-८८॥ नहीं तो नहाकर आई सीता अवश्य ही प्राण-त्याग कर देगी। यह सोचकर मुनि ने कुश की पवित्री बनाकर बालक की रचना कर दी ॥८९॥ और लव के समान ही उसे बनाकर उसके स्थान पर रख दिया। तदनन्तर, स्नान से लौट कर आई हुई सीता ने उस बालक को देखकर मुनि से कहा—॥९०॥ 'हे मुने मेरा बालक तो यह है फिर यह दूसरा बालक कैसा है? यह सुनकर मुनि ने सारा वृत्तान्त उसे सुना दिया और कहा—'हे पवित्र सीते यह भवितव्य की बात है। अब इस दूसरे बालक को भी ग्रहण कर लो। इसका नाम कुश है क्योंकि मैंने अपने प्रभाव से इसे कुशों द्वारा निर्मित किया है ॥९१—९२॥ मुनि द्वारा इस प्रकार कही गई सीता ने मुनि द्वारा ही संस्कार किये गये उन दोनों बालकों का पालन-पोषण किया ॥९३॥ उन दोनों क्षत्रियकुमारों ने बालकपन में ही मुनि वाल्मीकि की कृपा से सभी दिव्य शस्त्रास्त्रों और विद्याओं को भली भाँति सीख लिया ॥९४॥

२६४ कुशाचरितसार एकदा आश्रममृगं हत्वा तन्मांसमादतुः । अर्धास्थिभिश्च वाल्मीकेरचक्रतुः क्रीडनीयकम् ॥९५॥ तत क्षिप्तो मुनिः सोऽथ सीतादेव्यानुनाधितः । प्रायश्चित्तं तयोरेवमादिक्षेत् कुमारयोः ॥९६॥ गत्वा कुबेरसरसः स्वर्णपद्मान्यथ लवः । तदुद्यानाच्च मन्दारपुष्प्याण्यानयतु द्रुतम् ॥९७॥ तैरेतौ भ्रातरावत्संल्लिङ्गमर्चयतामुभौ । तेनैतयोरिदं पापमुपशान्तिं गमिष्यति ॥९८॥ एतच्छ्रुत्वैव कैलासं स बालोऽपि लवो ययौ । आधस्कन्द कुबेरस्य सरस्तच्चोपवनं च तत् ॥९९॥ निहत्य यक्षानादाय पद्मानि कुसुमानि च । आगच्छन्नपि स श्रान्तो विशश्राम तरोस्तले ॥१००॥ अत्रान्तरं च रामस्य हयमेधे सुलक्षणम् । चिन्वन्मुख्यमागच्छत्तेन मार्गेण लक्ष्मणः ॥१०१॥ स लवं समराहूतं मोहनास्त्रेण मोहितम् । क्षत्रधर्मेण बद्ध्वा तमयोध्यामनयत्पुरीम् ॥१०२॥ तावच्च सीतामाश्वास्य लवागमनदुःखिताम् । वाल्मीकिः स्वाश्रमे तत्र ज्ञानी कुशमभाषत ॥१०३॥ भीतोऽयोध्यांमवष्टभ्य लक्ष्मणेन सुतो लवः । गच्छ मोधय तं तस्मादभिरस्त्रैर्विनिर्जितात् ॥१०४॥ इत्युक्त्वा दत्तदिव्यास्त्रस्तेन गत्वा कुशस्ततः । रोध्यमानामयोध्यायां यज्ञभूमिं सरोष सः ॥१०५॥ जिगाय लक्ष्मणं चात्र तन्निमित्तं प्रभाषितम् । युद्धे दिव्यैर्महास्त्रैस्तैस्ततो रामस्तमभ्यगात् ॥१०६॥ सोऽपि प्रभावाद्वाल्मीकेर्जेतुं नास्त्रं क्षमाक तम् । कुशं यत्नेन पप्रच्छ कोऽर्षस्ते को भवानिति ॥१०७॥ कुशस्ततोऽब्रवीद् बद्ध्वा लक्ष्मणेनाग्रजो मम । आनीतः इह तस्याहं मोचनार्थमिहागतः ॥१०८॥ आवां लवकुशौ रामतनयाविति जानकी । माता नौ वक्ति चेत्युक्त्वा तद्वृत्तान्तं शशंस सः ॥१०९॥

नवम लम्बक ४६५

नवम लम्बक ४६५

एक बार उन दोनों बालकों ने आश्रम के एक मृग को मारकर उसका मांस खा डाला और मुनि वाल्मीकि के पूजन करने के शिवलिङ्ग को बिछौना बनाकर खेल डाला ॥९५॥ इस कारण मुनि खिन्न हुए, तो सीतादेवी ने उनसे क्षमा-प्रार्थना की। तब मुनि ने उन दोनों के लिए इस प्रकार प्रायश्चित्त की आज्ञा दी ॥९६॥ 'यह लव कुबेर के सरोवर में जाकर सोने के कमल ले आवे और उसके उद्यान से मंदार के पुष्प। उनसे ये दोनों भाई इस शिवलिङ्ग की पूजा करें तो इस पाप की शान्ति होगी' ॥९७-९८॥ यह सुनते ही उस बालक लव ने कुबेर के सरोवर और उद्यान पर धावा बोल दिया और उसके रक्षक यक्षों को मारकर कमल और मन्दार-पुष्प प्राप्त किये। उन्हें लेकर लौटते समय मार्ग में श्रान्त होने के कारण उसने एक वृक्ष के नीचे विश्राम किया ॥९९-१००॥ इसी बीच राम के नरमेध यज्ञ में किसी अच्छे लक्षणोंवाले पुरुष को ढूँढ़ता हुआ लक्ष्मण उधर आ निकला ॥१०१॥ वह (लक्ष्मण) युद्ध के लिए ललकारे हुए लव को सम्मोहनास्त्र से मोहित करके क्षात्र धर्म के अनुसार उसे बाँधकर अयोध्या नगरी को ले गया ॥१०२॥ उधर लव के आने में विलम्ब होने पर दुःखित सीता को धैर्य देकर ज्ञानी वाल्मीकि ने अपने आश्रम में कुश से कहा—॥१०३॥ 'पुत्र! लव को लक्ष्मण पकड़कर अयोध्या ले गया है। तू जा और इन दिव्य अस्त्रों से उसको जीतकर और लव को छुड़ाकर ले आ' ॥१०४॥ मुनि के ऐसा कहने पर दिव्य अस्त्रों से युक्त कुश अयोध्या गया और युद्ध करते हुए उसने यज्ञभूमि को घेर लिया ॥१०५॥ और युद्ध करने के लिए आये हुए लक्ष्मण को उसने दिव्य महान् अस्त्रों से जीत लिया। तब राम ने उस पर आक्रमण किया किन्तु वाल्मीकि मुनि के प्रभाव से राम भी उसे अपने अस्त्रों से जीत न सके। तब राम ने कुश से पूछा-'तुम कौन हो ? ॥१०६-१०७॥ तब कुश ने कहा-'लक्ष्मण ने मेरे बड़े भाई लव को बाँध लिया है उसे यहाँ लाओ। मैं उसे छुड़ाने के लिए ही यहाँ आया हूँ ॥१०८॥ हम लव और कुश दोनों राम के पुत्र हैं। ऐसा माता जानकी कहती हैं। इतना कहकर फिर उसने अपना समाचार कहा ॥१०९॥ ५९

४६६ कथासरित्सागर

४६६ कथासरित्सागर ततः सवाष्पो रामस्त मवमानाय्य तावुभौ । कण्ठे जग्राह सैषोऽहं पापो राम इति ब्रुवन् ॥११०॥ अथ सीतां प्रशंसत्सु वीरो पश्यत्सु तौ शिशू । पौरेषु मिलितञ्चक्र स तौ रामोऽग्रहीत्सुतौ ॥१११॥ आनाम्य सीतादेवीं च वाल्मीकेराश्रमात्ततः । तया सह सुखं तस्थौ पुत्रन्यस्तभरोऽथ सः ॥११२॥ एवं सहन्ते विरहं धीराश्चिरमपीदृशम् । न सहषे मुग्धां पुत्रीं कथमेकामपि क्षपाम् ॥११३॥ इत्यात्मजामलङ्कारवतीं परिणयोत्सुकाम् । नरवाहनदत्तं च तमुक्त्वा काञ्चनप्रभा ॥११४॥ नभसा प्रातरागन्तुमगादादाय तां सुताम् । नरवाहनदत्तोऽपि कौशाम्बीं विमना ययौ ॥११५॥ तत्रानिद्रं निशि स्माह गोमुखस्तं विनोदयन । पृथ्वीरूपकथां देव शृण्विमां कथयामि ते ॥११६॥ पृथ्वीरूपवरनृपतेः रूपलतायाश्च कथा अस्ति नाम्ना प्रतिष्ठानं नगरं दक्षिणापथे । पृथ्वीरूपाभिधानोऽभूद्राजा तत्रातिरूपवान् ॥११७॥ तं परिक्षितिनौ जातु श्रमणौ द्वावुपेयतुः । विलोक्याद्भुतरूपं च तावेव नृपमूचतुः ॥११८॥ द्वावावां पृथिवीं भ्रान्तौ न च रूपेण ते समम् । अन्यं पुमांस नारीं वा दृष्टवन्तौ क्वचित्प्रभो ॥११९॥ किं तु मुक्तिपुरद्वीपे राज्ञो रूपधरस्य या । अस्ति हेमप्रभादभ्यां जाता रूपलता सुता ॥१२ ०॥ सैका ते सदृशी कन्या तस्याश्चैको भवानपि । युवयोर्यदि संयोगो भवेत्स्यात्सुकृतं ततः ॥१२१॥ इति श्रमणवाक्येन समं मदनसायकाः । प्रविश्य श्रुतिमार्गेण रागस्तस्यांससञ्ज हृदि ॥१२२॥ ततः समुत्सुको राजा निजं चित्रकरोत्तमम् । कुमारदत्तनामानं पृथ्वीरूपः समादिशत् ॥१२३॥

नवम लम्बक ४१७

[Header] नवम लम्बक ४१७

तब रोते हुए राम ने सब को वहीं बैठाकर उन दोनों को गले लगाया और कहा कि वह पापी राम मैं ही हूँ। (तुम दोनों जिसके पुत्र हो) ॥११० ॥ तदनन्तर एकत्र नगर-निवासियों के सीता की प्रशंसा करने पर राम ने उन दोनों पुत्रों को स्वीकार किया ॥१११॥ तब सीतादेवी को बाल्मीकि के आश्रम से बुलाकर और पुत्रों को राज्य का भार सौंप कर राम सुखपूर्वक रहने लगे ॥११२॥ इस प्रकार, धैर्यशाली महापुरुष इतने भीषण विरहों का भी सहन करते हैं। पुत्रो तुम दोनों एक रात्रि का विरह भी सहन नहीं कर पा रहे हो ॥ ११३॥ इस प्रकार, विवाह के लिए उत्सुक पुत्री अलङ्कारवती और नरवाहनदत्त से कांचन- प्रभा ने कहा ॥११४॥ ऐसा कहकर और कन्या को साथ लेकर कांचनप्रभा प्रातःकाल आने के लिए आकाश मार्ग से उड़कर चली गई और दुखी चित्त नरवाहनदत्त भी कौशाम्बी लौट आया ॥११५॥ कौशाम्बी में रात्रि को निद्राहीन नरवाहनदत्त का मनोरंजन करते हुए गोमुख ने कहा- 'महाराज मैं तुम्हें पृथ्वीरूप राजा की कथा सुनाता हूँ सुनो'—॥११६॥

राजा पृथ्वीरूप और रानी रूपलता की कथा

दक्षिण दिशा में प्रतिष्ठान नाम का एक नगर है। वहाँ पृथ्वीरूप नाम का अत्यन्त रूपवान् राजा था ॥११७॥ किसी समय उसके समीप दो ज्ञानी श्रमण (बौद्ध भिक्षु) आये और राजा के आश्चर्यकारी सुन्दर रूप को देखकर बोले-॥११८॥ 'राजन्, हम दोनो सारे भू-मण्डल में घूमे किन्तु हे प्रभु, तुम्हारे जैसा रूपवान् पुरुष या स्त्री कहीं भी हमने नहीं देखा ॥११९॥ किन्तु, मुक्तिपुर द्वीप में राजा रूपधर की पत्नी हेमलता देवी से उत्पन्न रूपलता नाम की कन्या है ॥१२० ॥ वही एक तुम्हारे योग्य है और तुम्हीं एक उसके योग्य हो। यदि तुम दोनों का विवाह हो जाय तो बहुत अच्छा हो ॥१२१॥ इस प्रकार श्रमणों की बातों को सुनकर कामदेव के बाण राजा के कानों द्वारा घुसकर उसके हृदय में जा लगे ॥१२२॥ तब उत्कण्ठित राजा पृथ्वीरूप ने कुमारदत्त नामक अपने कुशल चित्रकार को आज्ञा दी ॥१२३॥

४६८ कथासरित्सागर

४६८ कथासरित्सागर

पटे यथावल्लिखितां समादाय मदाकृतिम्। एताभ्यां सह भिक्षुभ्यां द्वीप मुक्तिपुरं व्रज॥१२४॥ तत्र रूपधराख्यस्य राज्ञस्तद्दुहितुस्तथा। युक्त्या रूपलतायाश्च मदाकारं प्रवर्धय॥१२५॥ पश्य किं स नृपस्तो मे ददाति तनयां न वा। तां च रूपलतां चित्रे लिखिला त्वमिहानय॥१२६॥ एवमुक्त्वाभिलेक्ष्य स्वं रूपं चित्रपटे स तम्। सभिक्षुकं चित्रकरं द्वीप सं प्राहिणोन्नृपः॥१२७॥ ते च क्रमान्चित्रकरश्रमणाः प्रस्थितास्ततः। प्रापुः पत्नपुरं नाम नगरं वारिधेस्तटे॥१२८॥ ततः प्रवहणारूढा गत्वैवाम्बुधिवर्त्मना। ते तं मुक्तिपुरद्वीपमवापुः पञ्चमेऽहनि॥१२९॥ तत्र चित्रकरो गत्वा राजद्वारि स चीरिकाम्। मम चित्रकरस्तुल्यो नान्योऽस्तीत्युदसम्भयत्॥१३०॥ तद् बुद्ध्वैव समाहूतो राज्ञा रूपधरेण सः। प्रविश्य राजभवनं तं प्रणम्य व्यजिज्ञपत्॥१३१॥ पृथ्वीं भ्रान्त्वा मया देव न दृष्टश्चित्रकृत्समः। तद्देवासुरमर्त्यानामालिखामि क्रमादिश॥१३२॥ तच्छ्रुत्वानाय्य नृपतिः स तां रूपलतां पुरः। इमामालिख्य मत्पुत्रीं वद्येत्येत्याविशत् तम्॥१३३॥ ततः कुमारिकत्त स चित्रकृद्राजकन्यकाम्। आलिख्य वर्धयामास तद्रूपामेव तां पटे॥१३४॥ अथ रूपधरो राजा तुष्टो मत्वा विचक्षणम्। पृच्छति स्म स तं चित्रकरं जामातृलिप्सया॥१३५॥ भद्र पृथ्वी त्वया भ्रान्ता तद् ब्रूहि यदि कुत्रचित्। रूपे मद्दुहितुस्तुल्या दृष्टा स्त्री पुरुषोऽपि वा॥१३६॥ इत्युक्तस्तन राज्ञा स चित्रकृत्प्रत्युवाच तम्। नैतत्तुल्या मया दृष्टा नारी नाप्यथवा पुमान्॥१३७॥ एकस्तु पृथ्वीरूपाख्यः प्रतिष्ठाने महीपतिः। दृष्टः समोऽस्यास्तेनेपा युज्यते यदि साधु तत्॥१३८॥

प्रथम काण्ड ४१९ (नोट: इस पृष्ठ का मूल पाठ अत्यधिक धुंधला/खंडित (heavily degraded/pixelated) होने के कारण केवल शीर्ष भाग “प्रथम काण्ड ४१९” के अतिरिक्त शेष पंक्तियों के अक्षर स्पष्ट रूप से पठनीय नहीं हैं।)

४७० कथासरित्सागर

४७० कथासरित्सागर तुल्यरूपा यदा तेन न प्राप्ता राजकन्यका। तदा नवेऽपि तारुण्ये स तिष्ठत्यपरिग्रहः ॥१३९॥ मया च देव दृष्ट्वैव स राजा लोचनप्रियः। अभिलिख्य पटे सम्यग्गृहीतो रूपकौतुकात् ॥१४०॥ सच्छ्रुत्वा किं पटः सोऽस्तीत्युक्तस्तेन स भूभृता। अस्तीत्युक्त्वा च तं चित्रकरः पटमदर्शयत् ॥१४१॥ तत्र दृष्ट्वा स तद्रूपं पृथ्वीरूपस्य भूपतेः। राजा रूपधरो दध्रे विस्मयाघूर्णितं शिरः ॥१४२॥ जगाद च वयं धन्या यैरत्र लिखितोऽप्ययम्। दृष्टो राजा नमस्तेभ्यः साक्षात्पश्यन्ति ये त्वमुम् ॥१४३॥ एतत्पितृवचः श्रुत्वा दृष्ट्वा चित्रे च तं नृपम्। सोत्का स्मरलता भाम्यञ्चुक्षोभ न ददर्श च ॥१४४॥ तां मारमोहितां दृष्ट्वा सुतां स नृपतिस्तदा। कुमारदत्तं तं चित्रकरं रूपधरोऽभ्यधात् ॥१४५॥ नास्त्यालेख्यविसंवादस्तव तद्दुहितुर्मम। एतस्याः प्रतिरूपः स पृथ्वीरूपनृपः पतिः ॥१४६॥ तदेतं मत्सुताचित्रपटं नीत्वाद्य सत्वरम्। पृथ्वीरूपनृपायेतां मत्सुतां गच्छ दर्शय ॥१४७॥ आख्याय च यथावृत्तं सतस्मै यदि रोचते। यदिह द्रुतमायातु परिणेतुं मदात्मजाम् ॥१४८॥ इत्युक्त्वा पूजयित्वार्थैः स सहस्थितभिक्षुकम्। राजा चित्रकरं तं च स्वदूतं च विसृष्टवान् ॥१४९॥ ते गत्वाम्बुधिमुत्तीर्य चित्रकृद्दूतभिक्षुकाः। सर्वे प्रापुः प्रतिष्ठानं पृथ्वीरूपनृपान्तिकम् ॥१५०॥ तत्र प्राभृतकं दत्त्वा कार्यं शंसे यथाकृतम्। स रूपधरसंदेशं राज्ञे तस्मै न्यवेदयत् ॥१५१॥ स च चित्रकृदेतस्मै भूभृते तामदर्शयत्। कुमारदत्तश्चित्रस्थां प्रियां दम्पततां गतः ॥१५२॥ राज्ञस्तस्य वपुष्यस्या लावण्यसरसीकृतः। मग्ना दृष्टिस्तथा नैतामुद्धर्तुमशकत्तथा ॥१५३॥

नवम लम्बक ४०१

नवम लम्बक ४०१

उस राजा को अपने समान सुन्दरी कन्या नहीं मिली इसीलिए उसने अभी तक विवाह ही नहीं किया ॥१३९॥ महाराज मैंने तो नयनों के प्यारे उस राजा को देखकर ही उसके सौन्दर्य के कौतूहल से पत्र पर उसका चित्र भी बना दिया है, ॥१४०॥ उसके इस प्रकार कहने पर राजा ने पूछा कि 'क्या उसका चित्रपट तुम्हारे पास है ?' उत्तर में चित्रकार ने 'हैं'—ऐसा कहकर राजा को वह चित्र दिखा दिया ॥१४१॥ उस चित्रपट पर राजा पृथ्वीरूप का रूप देखकर राजा रूपधर ने आश्चर्य के साथ अपना सिर हिलाया ॥१४२॥ और प्रसन्न होकर वह बोला—'हम धन्य हैं। जिन्होंने वस्त्र पर लिखे राजा के इस रूप को देखा और जो लोग इसे प्रत्यक्ष देखते हैं, उन्हें हम प्रणाम करते हैं ॥१४३॥ पिता के ऐसे वचन सुनकर और चित्र में राजा को देखकर उत्कण्ठित रूपलता ने और कुछ देखा न सुना ॥१४४॥ तदनन्तर, अपनी कन्या को काम-मोहित देखकर राजा रूपधर ने उस चित्रकार से कहा—॥१४५॥ यदि तुम्हारे चित्रपट में किसी प्रकार का सन्देह नहीं है तो राजा पृथ्वीरूप इस कन्या के अनुकूल पति है। इसलिए मेरी इस कन्या के चित्रपट को ले जाकर उन्हें दिखा दो ॥१४६-१४७॥ और, यह सब समाचार सुनकर यदि उचित समझें तो मेरी कन्या का वरण करने के लिए शीघ्र ही यहाँ आवें ॥१४८॥ इतना कहकर और चित्रकार का धन से सत्कार करके राजा रूपधर ने विदूषक के साथ उसे विदा किया और अपने एक दूत को भी उनके साथ भेजा ॥१४९॥ कुछ ही दिनों में वे चित्रकार, विदूषक और दूत समुद्र को पारकर प्रतिष्ठान नगर में राजा पृथ्वीरूप के पास पहुँचे ॥१५०॥ वहाँ पहुँचकर उन्होंने राजा पृथ्वीरूप को राजा रूपधर के भेजे हुए उपहार आदि देकर मुक्त्तिपुर का सब समाचार और राजा रूपधर का सन्देश सुनाया ॥१५१॥ और, उस चित्रकार कुमारदत्त ने चित्रपट पर लिखा रूपलता का चित्र भी राजा पृथ्वीरूप को, दिखा दिया ॥१५२॥ लावण्य की विलासस्थली उस रूपलता के शरीर का चित्र में देखता हुआ राजा इस प्रकार मग्न हो गया कि वह वहाँ से अपनी दृष्टि हटा नहीं सका ॥१५३॥

४७२ कथासरित्सागर ।

४७२ कथासरित्सागर ।

स हि कान्तिसुधास्यन्दमयीं तां वर्णयन्नृपः। नातृप्यदधिकोत्कण्ठश्चकोरश्चन्द्रिकामिव ॥१५४॥ प्राह चित्रकर स च वन्द्यो वश्याः कराश्च ते। येनेदं निर्मितं रूपं येन चालिखितं सखे ॥१५५॥ तद्रूपधरभूपस्य प्रतिपन्नं वचो मया। यामि मुक्तिपुरीमुपयच्छे च तत्सुताम् ॥१५६॥ इत्युक्त्वा चित्रकृद्वृत्तभिक्षून्सम्मान्य तान्धनैः। आसीच्चित्रपटं पश्यन्पृथ्वीरूपनृपोऽत्र सः ॥१५७॥ उद्यानादिषु नीत्वा च तद्दिनं विरहातुरः। लग्नं निश्चित्य सोऽन्येद्युश्चक्रे राजा प्रयाणकम् ॥१५८॥ युक्तो विविधहस्त्यश्वैः सामन्तै राजसूनुभिः। सरूपधरदूतैस्तैश्चित्रकृच्छ्रमणैश्च सः ॥१५९॥ गजेन्द्रं मङ्गलभटं राजारुह्य व्रजन्दिने। प्राप्य विन्ध्याटवीद्वारं सायं तत्र स्थितोऽभवत् ॥१६०॥ द्वितीयेऽह्नि समारुह्य शत्रुमर्दैनसंज्ञकम्। गजं तामटवीं राजा पृथ्वीरूपो विवेश सः ॥१६१॥ यावद्याति पुरस्तावदप्रयायि निजं बलम्। पलायमानमावृत्तमकस्मात्स व्यलोकयत् ॥१६२॥ किमेतदिति सम्भ्रान्तं स चाभ्येत्यैव तत्क्षणम्। राजपुत्रो गजारूढो निर्भयाख्यो व्यजिज्ञपत् ॥१६३॥ देवाग्रतोऽतिमहती भिल्लसेनाभिधाविता। तैर्वारणा नः पञ्चाशन्मात्रा भिल्लैः रणे हताः ॥१६४॥ सहस्रं च पदातीनामश्वानां च शतत्रयम्। अस्मदीयैश्च भिल्लानां द्वे सहस्रे निपातिते ॥१६५॥ एकोऽस्त्यस्मद्दले दुष्टः कञ्चभो द्वौ च तद्बले। ततोऽस्मत्सैनिका भग्नास्तद्बाणौघनिपीडिताः ॥१६६॥ तच्छ्रुत्वा कुपितो राजा पृथ्वीरूपः प्रमाथ्य सः। जघान सेनां भिल्लानां कौरवाणामिवार्जुनः ॥१६७॥ निर्भयादिभिरन्यैश्च निहतेष्वथ दस्युषु। प्रविष्टो देवकूलेन भिल्लः सेनापतिर्गिरौ ॥१६८॥

नवम लम्बक ४०१

नवम लम्बक ४०१ सौन्दर्य-सुधामयी उस रूपलता को नेत्रों से पान करता हुआ राजा पृथ्वीरूप उसी प्रकार अतृप्त रहा जैसे अधिकाधिक चन्द्रिका का पान कर लेने पर भी चकोर अतृप्त ही रह जाता है ॥१५४॥ और वह चित्रकार से बोला-'मित्र इसे बनानेवाले ब्रह्मा और इसे चित्र में उल्लेख करनेवाले तुम दोनों के हाथ वन्दनीय हैं जिसने इस रूप का निर्माण किया और जिसने इसे चित्रपट पर चित्रित किया ॥१५५॥ अतः मैं रूपधर राजा की बात को स्वीकार करता हूँ। मुक्तिपुर द्वीप को जाकर उसकी कन्या को विवाहित करता हूँ ॥१५६॥ इतना कहकर भिक्षु तथा दूत को धन आदि से पुरस्कृत करके वह चित्रपट में रूपलता को देखता हुआ बैठा रहा ॥१५७॥ और, अपने उद्यानों में भ्रमण करके उस विरही राजा ने उस दिन को किसी प्रकार व्यतीत किया। तदनन्तर, लग्न आदि का निश्चय कराकर दूसरे ही दिन राजा ने बरात-सहित मुक्ति पुर द्वीप की ओर प्रस्थान किया ॥१५८॥ राजा की बरात में हाथी घोड़े सामन्त राजा राजकुमार, राजा रूपधर का चित्रकार और वे दोनों भिक्षु आदि सभी सम्मिलित थे ॥१५९॥ राजा स्वयं मंगलघट नामक हाथी पर चढ़कर क्रमशः जाता हुआ कुछ दिनों में विन्ध्या- टवी के द्वार पर आकर ठहर गया ॥१६०॥ दूसरे दिन वह राजा पृथ्वीरूप शत्रुमर्दत नामक हाथी पर सवार होकर विन्ध्य के घोर जंगलों में प्रविष्ट हुआ ॥१६१॥ जब वह कुछ ही दूर गया था तब उसने अपनी सेना को सहसा वापस भागते हुए देखा ॥१६२॥ 'यह क्या है'-ऐसा घबड़ाकर सोचते हुए राजा पृथ्वीरूप के समीप आकर हाथी पर चढ़े हुए निर्भय नामक राजपुत्र ने कहा-'महाराज आगे भीलों की बड़ी सेना है। उन भीलों ने हमारे पचास हाथी मार डाले और एक हजार पैदल सिपाही और तीन सौ घोड़े भी उन्होंने मार डाले। इसी प्रकार, हमारे सैनिकों ने भी दो हजार भील मार दिये ॥१६३-१६५॥ यदि हमारी सेना में एक शव देखा जाता था तो उनकी सेना में दो। तब उनके बाण-वृष्टी से मारे जाते हुए हमारे सैनिक वहाँ से भाग आये ॥१६६॥ यह सुनकर वह राजा पृथ्वीरूप तुरन्त दौड़ पड़ा और भीलों की सेना का इस प्रकार नाश करने लगा जिस प्रकार कौरवों की सेना का संहार, अर्जुन ने किया था ॥१६७॥ निर्भय आदि राजकुमारों द्वारा अनेक भीलों के काट दिये जाने पर राजा पृथ्वीरूप ने एक बाण से भीलों के सरदार का सिर काट दिया ॥१६८॥ ६

४७४ कथासरित्सागर

४७४ कथासरित्सागर बाणव्रणगलद्रक्तस्तस्तस्येभं शुशुभेर्दन्। सधातुनिर्झरोद्गारमञ्जनाद्रि म्व्यडम्बयत् ॥१६९॥ ततो लब्धजयावृत्ते तत्सैन्ये मिलितेऽखिले। पराभ्य हतशेषास्ते भित्वा दक्ष दिशो ययुः ॥१७०॥ ततो निवृत्तसंग्रामः पृथ्वीरूपो महीपतिः। स रूपभरदूतेन स्तूयमानपराक्रमः ॥१७१॥ व्रणितानीकविश्राम्य तस्यामेवाटवीभुवि। विजयी सरसीतीरे दिवसं वसति स्म सम् ॥१७२॥ प्रातस्तत प्रयातम्च स राजा क्रमशो व्रजन्। तत्राप नगरं वज्रपुरं तीरस्थमम्बुधेः ॥१७३॥ तत्रैकाहं विशश्राम तम्रत्येन महीभुता। उदारचरिताख्येन रचितोचितसत्क्रियः ॥१७४॥ तेनैवोपहृतैर्यानपात्रैस्तीर्त्वा च सागरम्। अष्टभिर्दिवसैः प्राप द्वीप मुत्तिपुर स तत् ॥१७५॥ बुद्ध्वा रूपभरस्तच्च राजा हृष्टस्तमभ्यगात्। मिलन्त स्म च तौ भूपौ कृतकण्ठग्रहौ मिथः ॥१७६॥ ततस्तेन समं पृथ्वीरूपो राजा स तत्पुरम्। विवेश पौरनारीणां पीयमान इवेक्षणैः ॥१७७॥ तत्र हेमलता राज्ञी स च रूपधरो नृपः। दृष्ट्वानुहपं दुहितुर्भर्तारं सं ननन्दतुः ॥१७८॥ अथ स्वसम्पदुचितं राज्ञा रूपधरेण सः। आचाररचितस्वस्तौ पृथ्वीरूपोऽत्र पार्थिवः ॥१७९॥ अम्युद्यतशिरोकाया वेदीमारुह्य शोभनः। लग्ने रूपलतायाः स सोत्सवः पाणिमग्रहीत् ॥१८०॥ सत्यं श्रुतं त्वया पूर्वमिति वक्तुमिव श्रुतिम्। प्रापोत्फुल्ला तयोर्दृष्टिरन्योन्यरूपवर्धिनोः ॥१८१॥ रत्नानि छात्रमोशेषु द्वयो रूपधरस्तयोः। ददौ तथा यथा सैष मन रत्नाकरो जनैः ॥१८२॥ निर्वृत्ते च सुतोद्वाह् पित्रङ्गच्छमणाना तान्। सम्पूज्य वस्त्राभरणैः सर्वानन्यानपूजयत् ॥१८३॥

नवम लम्बक — ४०५

नवम लम्बक — ४०५ बाणों के घावों से गिरते हुए रक्त की धारा से रंजित राजा का हाथी शत्रुमादन गेरू व सरजोंवाले अंजन पर्वत का अनुकरण कर रहा था ॥१६९॥ विजयी होकर राजा के लौटने पर उसकी समस्त सेना आकर वहाँ एकत्र हुई और मरने से बची हुई भीलों की सेना के सिपाही इधर-उधर भाग गये ॥१७०॥ तदनन्तर, युद्ध समाप्त करके लौटे हुए राजा पृथ्वीरूप के पराक्रम की प्रशंसा रूपधर के दूत ने की। विजयी राजा ने थकित सेना की विश्रान्ति के लिए, उसी वनभूमि में एक तालाब के किनारे अपना शिविर लगा दिया ॥१७१-१७२॥ इस प्रकार, क्रमशः यात्रा करता हुआ राजा समुद्र-तट पर पद्मपुर नगर में जा पहुँचा ॥१७३॥ पद्मपुर के राजा उदारचरित द्वारा समुचित सत्कार किये जाने पर राजा पृथ्वीरूप ने एक रात उसी नगर में विश्राम किया ॥१७४॥ और प्रातःकाल उसी राजा द्वारा मंगाये गये जहाजों और नावों पर सवार होकर आठ दिनों में समुद्र के मार्ग से मुक्तिपुर द्वीप में बरात के साथ राजा पृथ्वीरूप जा पहुँचा ॥१७५॥ उसके आगमन की सूचना पाकर प्रमप्रदित राजा रूपधर बरात की अगवानी के लिए आया और वे दोनों राजा परस्पर गले मिले ॥१७६॥ तब राजा रूपधर के साथ राजा पृथ्वीरूप उस द्वीप की राजधानी में जाकर उसके अनुरूप स्वागत-सत्कार करती हुई नागरिक स्त्रियों के मानो वह नेत्रों द्वारा पिया जा रहा था। राजभवन में पहुँचने पर राजा रूपधर और रानी हेमलता ने अपनी कन्या के अनुरूप जामाता को देखकर अत्यन्त आनन्द का अनुभव किया ॥१७७-१७८॥ तदनन्तर, राजा रूपधर ने अपनी सम्पत्ति के अनुसार समुचित आतिथ्य-सत्कार द्वारा ससैन्य राजा पृथ्वीरूप को वहीं ठहराया ॥१७९॥ दूसरे दिन, वेदी में बैठकर, शुभ लग्न में राजा पृथ्वीरूप ने विधिवत् गो उपांगिया रूपलता का पाणिग्रहण किया ॥१८० ॥ परस्पर सौन्दर्य-साम्य देखने के कौतूहल से उन दोनों की ओर जाती आँखों का मान यह कहने के लिए उनके पास तक चली गई थी कि जैसा ही सुनने लगा था वैसा ही हमने देखा ॥१८१॥ राजा रूपधर ने लाख हवन के प्रचुर अवभृथ पर इतने रत्न उस वर-वधू को दिए कि लोगों ने उसे सचमुच रत्नाकर समझा ॥१८२ ॥ कन्या का विवाह सम्पन्न होने पर उस राजा रूपधर ने चित्रकार कुमारदत्त वैश्य जितुंघा तथा अन्यान्य सम्मानित व्यक्तियों का धन आदि से यथोचित सत्कार किया ॥१८३॥

४७६ - कथासरित्सागर

४७६ - कथासरित्सागर तत पुरे स्थितस्तस्मिन्पृथ्वीरूपनृपोऽथ सः। तद्दीपोचितमाहारं भेजे पानं च सानुगः ॥१८४॥ नृत्तगीतादिविधिभिर्गते दिने नक्तं विवेश च। शूल्को रूपलतावासभवनं सोऽवनीपतिः ॥१८५॥ आस्तीर्णरत्नपर्यङ्कं रत्नकुट्टिमशोभितम्। रत्नस्तम्भोम्भिताबोगं रत्नदीपैः प्रकाशितम् ॥१८६॥ तत्र भेजे तया सार्कं स रूपलतया युवा। धिरसङ्कल्पगुणितं यथेच्छं सुरतोत्सवम् ॥१८७॥ सुरतश्रमसुप्तश्च पठद्भिर्वन्दिमागधैः। बोधितः प्रातरुत्थाय तस्थाविन्द्रो यथा दिवि ॥१८८॥ एवं दश दिनान्यत्र पृथ्वीरूपनृपो वसन्। द्वीपे नवनवैर्भोगैर्विलसन् श्वशुराहृतैः ॥१८९॥ एकादशे दिने युक्तः स रूपलतया ततः। गणकानुगतो राजा प्रतस्थे कृतमङ्गलः ॥१९०॥ कृतानुयामः श्वशुरेणासमुद्रतटं च सः। वध्वा सह प्रवहणान्यारुरोहानुगायितः ॥१९१॥ दिनाष्टकेन तीर्त्वाब्धिं तीरस्थे मिलिते बले। उदारचरिते चाप्तप्राप्ते पत्रपुरं ययौ ॥१९२॥ तत्रोपचरितस्तेन राज्ञा विश्रम्य कानिचित्। दिनानि स ततः प्रायात् पृथ्वीरूपो नरेश्वरः ॥१९३॥ प्रियां रूपलतां हस्तिन्यारोप्य जयमङ्गले। रूक्ष्यांगगिरिनामानमात्मनारुह्य च द्विपम् ॥१९४॥ गच्छन् क्रमादविरतैः सोऽथ राजा प्रयाणकैः। उत्पलाकम्वजं प्राप प्रतिष्ठानं निजं पुरम् ॥१९५॥ तत्र रूपलतां दृष्ट्वा रूपदर्पं पुराङ्गनाः। जहुस्तत्कालमाश्चर्येनिर्निमेषविलोचनाः ॥१९६॥ राजधानीं प्रविश्याथ पृथ्वीरूपः कृतोत्सवः। ददौ चित्रकृते तस्मै ग्रामाम् राजा धनं च सः ॥१९७॥ श्रमणों पूजयित्वा च वसुभिस्तो यथोचितम्। सामन्तान् सचिबान् राजपुत्रांश्च सममानयत् ॥१९८॥

नवम लम्बक ४७७

[header] नवम लम्बक ४७७ [/header]

तदनन्तर उस नगर में रहते हुए राजा पृथ्वीरूप ने अपने साथियों के साथ उस द्वीप के अनुसार भोजन-पान आदि स्वीकार किया ॥१८४॥ नाच-गान में दिन व्यतीत करके राजा पृथ्वीरूप रात को उत्कण्ठा के साथ रूपलता के शयन-भवन में गया ॥१८५॥ उस शयनागार में रत्नों से जड़ा हुआ पलंग बिछा था। शयनागार की भूमि भी रत्नों से जड़ी हुई थी। भवन के मध्य में रत्नों से जड़े हुए खम्भे चमक रहे थे और भवन रत्नों के दीपों से जगमगा रहा था ॥१८६॥ उस शयनागार में वह युवा राजा पृथ्वीरूप उस रूपलता के साथ चिरकाल की उत्कण्ठा के कारण दूने और चौगुने उत्साह तथा प्रेम से आनन्द-मग्न हो गया ॥१८७॥ आनन्द-विलास से थककर सोया हुआ राजा पृथ्वीरूप प्रातःकाल गाते हुए बन्दियों द्वारा जगाया गया ऐसा शोभित हो रहा था जैसा कि स्वर्ग में इन्द्र ॥१८८॥ इस प्रकार, श्वशुर रूपधर द्वारा प्रस्तुत किये गये नाना प्रकार के भोगों का आनन्द लेता हुआ पृथ्वीरूप दस दिनों तक उस द्वीप में रहा ॥१८९॥ ग्यारहवें दिन ज्योतिषियों के कथनानुसार रूपलता के साथ राजा पृथ्वीरूप मंगला- चरण करके वहाँ से चला ॥१९०॥ समुद्र के तट तक श्वशुर राजा रूपधर द्वारा पहुँचाया गया राजा पृथ्वीरूप जलयान पर सवार हुआ और उसके साथी भी यथायोग्य जलयानों पर उसके साथ सवार हुए। आठ दिनों तक निरन्तर समुद्र-यात्रा करने के पश्चात् उनके जलयान समुद्र के तीर पर पहुँचे जहाँ राजा की सेना अगवानी के लिए उसकी प्रतीक्षा में खड़ी थी। पद्मपुर का राजा उदारचरित भी वहाँ स्वागत के लिए खड़ा था॥१९१-१९२॥ पद्मपुर के राजा द्वारा कुछ दिनों तक आतिथ्य प्राप्त कर विश्राम कर लेने के पश्चात् राजा पृथ्वीरूप वहाँ से चला ॥१९३॥ वह जयमंगल नामक हाथी पर रूपलता को बैठाकर और कल्याणगिरि नामक हाथी पर स्वयं बैठकर वहाँ से चला ॥१९४॥ इस प्रकार, निरन्तर यात्रा करता हुआ राजा क्रमशः तोरणों और ध्वजाओं से सजाये हुए अपने प्रतिष्ठान नगर में पहुँचा ॥१९५॥ उस नगर में रूपलता के सौन्दर्य को देखती हुई नागरिक रमणियों ने अपने रूप का गर्व त्याग दिया ॥१९६॥ तदनन्तर, राजा पृथ्वीरूप ने राजधानी में प्रवेश करके अपने विवाह का उत्सव किया और चित्रकार को गाँव और जागीरें पुरस्कार में देकर तथा धन आदि से उसे सन्तुष्ट किया ॥१९७॥ उन दोनों मित्रों को भी समुचित रूप से धन देकर उसने सन्तुष्ट किया। इसी प्रकार सामन्तों मन्त्रियों तथा यथायोग्य सम्बन्धित राजवंशों का भी उसने यथोचित सत्कार किया ॥१९८॥

कथासरित्सागर

कथासरित्सागर ... = ... ... दृन्त्या प्रियया सहितस्त्वया। शेषांश्च तव भजे पृथ्वीपतिः कृती ॥१९९॥ इत्युक्तः स्मरदो मन्त्री गोमुखस्तत्सुखोन्मुखः। नरवाहनदत्तं तमुवाचोत्सुकः पुनः ॥२००॥ एष विरहो वीरं सत्त्वेशो विरहद्विषम्। न तु सोढुं सहते नैकामपि देव निशां कथम् ॥२०१॥ भवन्तमलंकारवती हि परिणेष्यति। श्वेतेतिविदुषो न तत्र तत्समागतः ॥२०२॥ तच्छ्रुत्वाऽथायमुचिवान् मरुभूतिरभाषत। उत्सन्नरससन्ताप स्वस्थस्त्वं किं न जल्पसि ॥२०३॥ कुरुते पुमान् धैर्यं विवेकं धीरुमेव च। यावन्नापतति कामस्य सायकानां न गोचरे ॥२०४॥ इक्ष्वाकुः सरस्वती स्कन्दो जिनश्च जगति त्रयः। एवन्तमतीत्यवाक्षिप्ता व्याभूय यैः स्मरः ॥२०५॥ मरुभूतो वदत्येवमुद्विग्नं वीक्ष्य गोमुखम्। नरवाहनदत्तस्तं समर्थयितुमभ्यधात् ॥२०६॥ विभोऽभ्यर्धमेतन्मे गोमुखो युक्तमुक्तवान्। स्निग्धो हि विरहायासे सानुवादं वदति किम् ॥२०७॥ समाश्वास्यो यथाशक्ति स्वजनैर्विरहातुरः। अतः परं स जानाति देवश्चासमसायकः ॥२०८॥ इत्यादि जल्पन्नुत्सृज्य तास्ताः परिजनाःकथाः। नरवाहनदत्तस्तां त्रियामामप्यवाहयत् ॥२०९॥ अलंकारवतीनरवाहनदत्तयोर्विवाहः अथ स प्रातरुत्थाय विहितावश्यकक्रियः। गगनाववरोहन्तीमपश्यत्काञ्चनप्रभाम् ॥२१०॥ भर्त्रालंकारशीलेन धर्मशीलेन सूनुना। तयालंकारवत्या च स्वदुहित्रा समन्विताम् ॥२११॥ ते चावतीर्य सर्वेऽपि तत्समीपमुपागमन्। अभ्यनन्दच्च तान्सोऽपि सं च तेऽपि यथोचितम् ॥२१२॥