कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
[Page Header] ५२ कथासरित्सागर
तच्छ्रुत्वा पृष्टनक्षत्रस्तेषां स गणकोत्तमः । गणयित्वा चिरं कालं राजानं तमभाषत ॥१४२॥ न चेत् कुप्यसि मे देव स्फुटं विज्ञापयामि तत् । अस्ति त्वद्दुहितुर्नेषामेकेनाप्यनुकूलता ॥१४३॥ न चेहास्ति विवाहोऽस्या एषा शापच्युतात्र यत् । विद्याधरी स शापोऽस्यास्त्रिभिर्मासैर्निवर्त्स्यति ॥१४४॥ तस्मान् मासत्रयं तावत् प्रतीक्षन्ताममी इह । नैषां स्वलोकं याता चेत्तत एतद् भविष्यति ॥१४५॥ एतन्मौहूर्तिकस्यास्य वचः सर्वेऽपि तत्र ते । श्रद्दधुस्तत्र चैवासन् वीरा मासत्रयावधि ॥१४६॥ गते मासत्रये राजा तान् वीरान् गणकं च सम् । स्वाग्रमानाययामास तामनङ्गरतिं च सः ॥१४७॥ दृष्ट्वा चाधिकसौन्दर्याम कस्मात् तां सुतां नृपः । बह्वर्षं गणकस्तां तु प्राप्तकालममन्यत ॥१४८॥ इदानीं ब्रूहि यद्युक्तं त हि मासास्त्रयो गताः । इति यावच्च तं राजा गणकं पृच्छति स्म सः ॥१४९॥ तावज्जातिं निजां स्मृत्वा सानङ्गरतिराननम् । आच्छाद्य स्वोत्तरीयेश मानुषीं तां तनुं जहाौ ॥१५०॥ एवमेषा स्थिता किंस्विदिति राजा स्वयं मुखम् । यावदुद्घाटयते तस्यास्तावत् सा ददृशे मृता ॥१५१॥ व्यामुक्त्तनेत्रभ्रमरा विवर्णवदनाम्बुजा । हप्तमञ्जुस्वना मुक्ता पद्मिनीव हिमाहता ॥१५२॥ ततः स सद्यस्तच्छोकवज्रपाताहतो भुवि । भूभृत् पपात निर्घोषः स्वपक्षच्छेदमुच्छ्रितः ॥१५३॥ राज्ञी पद्मवती सापि व्यामोहपतिता ययौ । भ्रष्टामरणपुष्पा क्ष्मामिभमग्नेव मञ्जरी ॥१५४॥ मुक्ताक्रन्दे परिजने तेषु वीरेषु दुःखिषु । सम्भ्रमांत क्षणाद्राजा जीववत्तमुवाच तम् ॥१५५॥
[Footnote] १ भू भृतः । राज्ञः पर्वतस्य च श्लेषेण वर्णनम् ।
नवम लम्बक ५१
नवम लम्बक ५१ यह सुनकर और गणक ने उन चारों के नक्षत्र पूछकर और कुछ समय तक विचार कर लेने के उपरान्त राजा से कहा—॥१४२॥ महाराज यदि आप क्रोध न करें तो स्पष्ट ही कहता हूँ कि इन चारों में एक के साथ भी तुम्हारी कन्या की कुंडली नहीं मिलती। और, इस कन्या का विवाह भी इस लोक में न होगा। क्योंकि यह शाप के कारण मनुष्य-जन्म में उत्पन्न हुई विद्याधरी है। आगामी तीन महीनों में इसका वह शाप दूर होगा ॥१४३—१४४॥ इसलिए, ये लोग तीन मास तक यहाँ रहकर प्रतीक्षा करें तदनन्तर यह कन्या यदि अपने विद्याधर-लोक में न गई, तो इसका इस लोक में विवाह हो सकेगा' ॥१४५॥ इस प्रकार, वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने ज्योतिषी की बातों में विश्वास प्रकट किया और वे चारों वीर तीन मास तक वहीं रहे ॥१४६॥ तीन महीने बीतने पर राजा ने उन चारों वीरों ज्योतिषी और अनंगरति को फिर बुलवाया। ज्योतिषी ने उस समय कन्या को अधिक सुन्दर देखकर उसका अन्तिम समय निकट आया जान लिया ॥१४७-१४८॥ अब कहो तीन मास बीत गये। इस प्रकार जैसे ही राजा ने ज्योतिषी से पूछा तबतक अनंगरति ने अपनी साड़ी के आंचल से अपना मुंह ढक लिया और उस मानव शरीर का परित्याग कर दिया ॥१४९-१५०॥ यह इस प्रकार मुँह ढककर क्यों बैठी है? ऐसा सोचकर राजा ने जब उसका मुंह स्वयं खोलकर देखा तब उसे मरी हुई पाया ॥१५१॥ वह हिम से मारी हुई कमलिनी के समान हो गई थी उसके नेत्र-रूपी भ्रमर उड़ते हुए थे मुख-कमल तेजोहीन था और अब उसके मुख में हंस के समान मधुर वाणी न थी ॥१५२॥ उसे मृत देखकर शोक-रूपी वज्र से मारा हुआ-सा और अपने पक्ष (पक्ष) के कटने से मूर्च्छित वह राजा (पर्वत) भूमि पर गिर पड़ा ॥१५३॥ उसकी माता पद्ममति भी हाथी से उखाड़ फेंकी गई लता के समान और अपने आभूषण रूपी पुष्पों के गिर जाने पर शून्य-सी होकर मूर्च्छित हो गई ॥१५४॥ अन्य भी परिजन सब लोग और वे चारों वीर भी अत्यन्त दुःखी हो गये। इतने में ही राजा ने स्वस्थ होश में आकर जीवदत्त से कहा ॥१५५॥
मात्रैषां शक्तिरन्येषामधुनावसरोऽस्ति ते। प्रतिज्ञातं त्वया नारीं जीवयामि मृतामिति॥१५६॥ यदि विद्याबलं तद्स्ति तज्जीवय सुतां मम। दास्यामि तुभ्यमेवैतां विप्राय प्राप्तजीविताम्॥१५७॥ इति राज्ञो वचः श्रुत्वा जीवदत्तोऽभिमन्त्रितैः। अभ्युक्ष्य तोयैस्तां राजपुत्रीमार्यामिमां जगौ॥१५८॥ 'अट्टाट्टहासहसिते करङ्कमालाकुले दुरालोके। चामुण्डे विकराले साहाय्यं मे कुरु त्वरितम्'॥१५९॥ एव तेन कृते यत्ने जीवदत्तेन सा यदा। धान्ना न जीवितं प्राप विषण्णः सोऽवदत्तदा॥१६०॥ यत्सापि विन्ध्यवासिन्या विद्या मे निष्फला गता। तदेतेनोपहास्येन किं कार्यं जीवितेन मे॥१६१॥ इत्युक्त्वा जीवदत्तः स्वं शिरश्छेत्तुं महासिना। यावत् प्रवर्त्तते तावदुद्गाद् भारती दिवः॥१६२॥ भो जीवदत्त मा कार्षीः साहसं शृणु सम्प्रति। एषानङ्गरतिर्नाम सा विद्याधरकन्यका॥१६३॥ पित्रोः शापेन मानुष्यमियन्तं कालमागता। त्यक्त्वाद्यैतां तनुं याता स्वलोकं स्वतनौ स्थिता॥१६४॥ तद्विन्ध्यवासिनीमद्य गत्वाराधय तां पुनः। तत्प्रसादादिमां प्राप्स्यस्यपि विद्याधरीं सतीम्॥१६५॥ न चैषा दिव्यभोगस्था शोच्या राज्ञो न चापि ते। इत्युदीर्य यथातत्त्वं दिव्या वाग्विरराम सा॥१६६॥ ततः सुतायाः सस्कारं कृत्वा राजा जहौ शुचम्। सदारोऽपि ययुस्तज्ज्ये ष्ठयो भीरा यथागतम्॥१६७॥ जीवदत्तस्तु जातास्थो गत्वा तां विन्ध्यवासिनीम्। तपसाराधयामास स्वप्ने साप्यादिदेश तम्॥१६८॥ अनङ्गप्रभायाः कथा सुप्ता तवाहमूत्तिष्ठ शृणु चेदं ब्रवीमि ते। अस्ति वीरपुरं नाम नगरं तुहिमाचले॥१६९॥ विद्याधराधिराजोऽस्ति समरो नाम तत्र च। तस्यानङ्गवतीदेव्यां सुतानङ्गप्रभाजनि॥१७०॥
नवम लम्बक ५०५
नवम लम्बक ५०५ इस विषय में तुम्हारे इन साथियों की अब शक्ति नहीं है। यह तुम्हारा अवसर है। तुमने पहले ही प्रतिज्ञा की थी कि मैं मरी हुई को जिला देता हूँ ॥१५६॥ ता यदि तुममें विद्या का बल है तो इस मरी हुई मेरी कन्या को जिलाओ। जीवित हो जाने पर इस कन्या को तुम्हें दे दूंगा' ॥१५७॥ राजा की यह बात सुनकर जीवदत्त ने राजकन्या के मुंह पर जल का छींटा देकर इस आर्या को पढ़ा—॥१५८॥ अट्टात्टहासहसिते करङ्कमालाङ्कके दुरालोके। चामुण्डे विकराले साहाय्यं मे कुरु त्वरितम् ॥१५९॥ इस प्रकार, विद्या का प्रयोग करने पर भी जब वह कन्या जीवित न हुई, तब जीवदत्त ने दुःखी होकर कहा—॥१६०॥ विन्ध्यवासिनी द्वारा दी गई भी मेरी विद्या निष्फल हो गई। इसलिए, हँसने के योग्य मेरे इस जीवन से अब क्या लाभ है? ॥१६१॥ ऐसा कहकर जैसे ही जीवदत्त तलवार से अपना सिर काटने को उद्यत हुआ वैसे ही इस प्रकार की आकाशवाणी हुई—॥१६२॥ हे जीवदत्त साहस मत करो। सुनो यह अनंगरति विद्याधरकुमारी है॥१६३॥ माता-पिता के शाप से यह इतने दिनों तक मनुष्य-जीवन में रही। आज वह मनुष्य-देह छोड़कर अपने विद्याधर-देह में चली गई ॥१६४॥ अतः तुम जाकर फिर उसी विन्ध्यवासिनी देवी की आराधना करो। उसी की कृपा से तुम इस विद्याधरी को प्राप्त करोगे ॥ १६५॥ अब वह दिव्य भोगों को भोग रही है। अतः राजा और रानी को भी उसके लिए शोक न करना चाहिए। इतना कहकर दिव्य वाणी शान्त हो गई ॥१६६॥ तदनन्तर, रानी-सहित राजा ने कन्या का दाह आदि संस्कार करके उसका शोक त्याग दिया और वे तीनो वीर जहाँ से आये थे वहीं लौट गये ॥१६७॥ और जीवदत्त उस विद्याधरी की प्राप्ति में विश्वास करके विन्ध्यवासिनी की शरण में जाकर तपस्या करने लगा। विन्ध्यवासिनी ने स्वप्न में उसे आदेश दिया—॥१६८॥ अनंगप्रभा की कथा 'मैं तुमसे प्रसन्न हूँ उठो और सुनो मैं तुमसे यह कहती हूँ। हिमालय में वीरपुर नाम का का नगर है। वहाँ समर नाम का विद्याधरों का राजा है। उसकी रानी अनंगवती में अनंगप्रभा नाम की कन्या उत्पन्न हुई ।१६९ १० ॥ ६४
५६ कथासरित्सागर
५६ कथासरित्सागर सा रूपयौवनोत्सेका नैच्छत् कञ्चित् पतिं यदा। तदासिद्दुग्रहक्रुद्धौ पितरौ शपतः स्म ताम् ॥१७१॥ मानुष्यं व्रज तत्रापि न भर्तृसुखमाप्स्यसि। कन्यैव षोडशाब्दा तां त्यक्त्वा तनुमिहैष्यसि ॥१७२॥ मर्त्यो विप्रो भावी च खड्गसिद्धोऽप्य ते पतिः। मुनिकन्याभिलाषेण शापान्मर्त्यत्वमागतः ॥१७३॥ अनिच्छन्तीमपि त्वां च मर्त्यलोकं स नेष्यति। त्वया तस्य वियोगोऽत्र भविष्यत्यन्यनीतया ॥१७४॥ पूर्वजन्मनि तन्नाष्टौ हृता हि परयोषितः। तेनाष्टजन्मभोग्याहं दुःखं सोऽनुभविष्यति ॥१७५॥ त्वं चात्र जन्मन्येकस्मिन्नष्टानाभिव जन्मनाम्। दुःखं प्राप्स्यसि विधानां ह्यंशेन मनुषीकृता ॥१७६॥ सर्वस्यैव हि पापिष्ठसम्पर्कः पापभागदः। समपापः पुन स्त्रीणां भर्त्रा पापेन सङ्गमः ॥१७७॥ नष्टस्मृतिः पतींश्च त्वं बहून् प्राप्स्यसि मानुषान्। स्वयोचितवरद्वेषदुग्रहो विहितो यतः ॥१७८॥ योऽयाचत समानस्त्वां शुचरो मद्यमप्रभः। भूत्वा स मानुषोऽभूभूवन्ते भावी पतिस्तव ॥१७९॥ ततस्त्वं शापनिर्मुक्ता स्वलोकं पुनरागता। तमेव शुचरीभूतं सम्प्राप्स्यस्युचितं पतिम् ॥१८०॥ तदेष पितृशप्ता सा मूर्त्तानङ्गरतिः क्षितौ। प्राप्ताथ पित्रोनिकटं जातानङ्गप्रभा पुनः ॥१८१॥ अतो वीरपुरं गत्वा जित्वा तत्पितरं रणे। जानन्तमपि कौलीनरक्षितं तामवाप्नुहि ॥१८२॥ इमं गृहाण खड्गं च येन हस्तगतेन ते। गतिर्भविष्यत्याकाशे किं चाजयो भविष्यसि ॥१८३॥ इत्युक्त्वाऽर्पितखड्गा सा तस्य देवी तिरोदधे। स च प्रबुबुधे दिव्यं खड्गं हस्ते ददर्श च ॥१८४॥ अघोरपाय प्रहृष्टात्मा जीवदत्तो नताम्बिकः। तत्प्रसादामृताप्यायच्छान्ताघायतपः क्लमः ॥१८५॥
नवम लम्बक ५०७
नवम लम्बक ५०७ अपने रूप और यौवन के घमंड से उसने किसी भी पति को पसन्द नहीं किया तो उसके दुराग्रह से क्रुद्ध होकर उसके माता-पिता ने शाप दिया कि वह मनुष्य-योनि में उत्पन्न होगी और उस योनि में भी उसे पति-सुख न मिलेगा और सोलह वर्ष की अवस्था में ही वह मनुष्य- देह का त्याग कर यहाँ आ जायगी ॥१७१-१७२॥ मुनि-कन्या की अभिलाषा से शाप के कारण मानव-देह को प्राप्त कुरूप मानव खड्गधर तेरा पति होगा। तेरे न चाहने पर भी तुझे वह मर्त्यलोक में ले जायगा। तब दूसरे के द्वारा तुझे ले जाने पर उसके साथ तेरा वियोग होगा ॥१७३-१७४॥ क्योंकि उस खड्गधर ने पूर्वजन्म में दूसरों की आठ स्त्रियों का अपहरण किया है इसलिए वह आठ जन्मों तक भोगने के योग्य दुःखों को प्राप्त करेगा ॥१७५॥ तू भी मानव बन जाने से विद्याओं के नष्ट हो जाने के कारण एक ही जन्म में आठ जन्मों का दुःख भोगेगी ॥१७६॥ पापी व्यक्ति का सम्पर्क सभी को उसके पाप का भागी बना देता है। और, स्त्रियों को तो पापी पति के समान ही पाप का भागी होना ही पड़ता है ॥१७७॥ तूने योग्य वर मिलने पर भी उसका दुराग्रहपूर्ण द्वेष किया है। अतः तू पूर्वजन्मों का स्मरण न करते हुए अनेक मानव-पतियों को प्राप्त करेगी ॥१७८॥ जिस आकाशचारी और समान कुल के मदनप्रभ ने विवाह के लिए तुझे माँगा था वह मनुष्य-राजा होकर अन्त में तेरा पति बनेगा ॥१७९॥ तदनन्तर, शाप से मुक्त होकर फिर अपने लोक में आई हुई और उसी विद्याधर बने हुए मदनप्रभ को पति-रूप में प्राप्त करेगी ॥१८०॥ इस प्रकार माता-पिता द्वारा शाप दी गई अनंगरति पृथ्वी में उत्पन्न होकर और अब (मरकर) माता-पिता के पास पहुँचकर पुनः अनंगप्रभा हो गई है ॥१८१॥ अतः अब तुम वीरपुर जाकर और युद्ध में उसके पिता को जीतकर कुलीनता में सदृश जानते हुए उसे प्राप्त करो। और, इस तलवार को ले लो जिसके हाथ में रहने पर तेरी आकाश में गति हो जायगी और तू अजेय हो जायगा' ॥१८२-१८३॥ ऐसा कहकर और खड्ग देकर वह देवी अन्तर्हित हो गई। तदनन्तर वह जीवदत्त जाग उठा और उसने अपने हाथ में तलवार देखी ॥१८४॥ तदनन्तर, प्रसन्नचित्त जीवदत्त ने उठकर माता को प्रणाम किया और माता की कृपा से उसकी तपस्या का सारा क्लेश दूर होगया ॥१८५॥
५८ कथासरित्सागर
५८ कथासरित्सागर खड्गहस्त समुत्पत्य परिभ्रम्य हिमालयम्। प्राप वीरपुरस्य त समरं खचरेश्वरम् ॥१८६॥ तेन युद्धजितेनात्र प्रदत्तां परिणीय सः। तामनङ्गप्रभां भेजे दिव्यां सम्भोगसम्पदम् ॥१८७॥ कञ्चित्काल स्थितश्चात्र श्वशुर समरं च सम्। जीवदत्तो जगादैव तां चानङ्गप्रभां प्रियाम् ॥१८८॥ मनुष्यलोकं गच्छावस्त प्रत्युत्कण्ठितोऽस्मि यत्। प्राणिनां हि निकृष्टापि जन्मभूमिः परा प्रिया ॥१८९॥ एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य श्वशुरः सोऽन्वमन्यत। सा स्वनङ्गप्रभा इच्छादनुमेने विजानती ॥१९०॥ अथाङ्गोपात्तया साकमनङ्गप्रभया तया। जीवदत्त स नभसा मर्त्यलोकमवातरत् ॥१९१॥ दृष्ट्वात्र रम्यमेकं च पर्वतं सा जगाद तम्। श्रान्तानङ्गप्रभा क्षिप्रमिह विश्राम्यतामिति ॥१९२॥ ततस्तथेति तत्रैव सोऽवतीर्य तया सह। चकाराहारपानादि तत्तद्विद्याप्रभावतः ॥१९३॥ ततोऽनङ्गप्रभां जीवदत्तोऽसौ विधिचोदितः। सामुवाच प्रिये किञ्चिन्मधुरं गीयतां त्वया ॥१९४॥ तच्छ्रुत्वा गातुमारभे सा भक्त्या धूर्जटे स्तुतिम्। तेन तद्गीतशब्देन सोऽथ निद्रामगावृक्षिजः ॥१९५॥ साश्वदाखेटकभ्रान्तो निर्झराम्भोऽभिलाषुकः। राजा हरिवरो नाम पथा तेन किलाययौ ॥१९६॥ स तेन गीतशब्देन श्रुतेन हरिणो यथा। आकृष्टोऽभ्यापतत्तत्र रथमुत्सृज्य केवलः ॥१९७॥ शकुने पूर्वमाख्यातलक्ष्मोऽपश्यत् स भूपतिः। तामनङ्गप्रभां सत्यामनङ्गस्य प्रभामिव ॥१९८॥ यदा तद्गीतरूपाभ्यां नीत तस्य विहस्तताम्¹। निर्बिभेद यथाकामं हृदय मदनः शरैः ॥१९९॥ १ विहस्ततां = विवशतां नीतं = प्राप्तम्।
नवम लम्बक ५९
नवम लम्बक ५९ वह हाथ में खड्ग लेकर आकाश में उड़ा और समस्त हिमालय में घूमकर वीरपुर में रहनेवाले विद्याधरों के राजा समर को प्राप्त किया ॥१८६॥ युद्ध में जीते हुए समर द्वारा प्रदत्त अनंगप्रभा को प्राप्त कर जीवदत्त दिव्य सम्पत्ति का उपभोग करने लगा ॥१८७॥ तदनन्तर, कुछ दिनों तक वहीं रहने के पश्चात् उसने एक दिन अपने श्वशुर समर और पत्नी अनंगप्रभा से कहा- 'हम दोनों (जीवदत्त और अनंगप्रभा) मनुष्य-लोक जाते। वहाँ जाने के लिए मैं उत्सुक हो रहा हूँ। प्राणियों को अपनी जन्म-भूमि निकृष्ट होने पर भी बहुत प्यारी लगती है ॥१८८-१८९॥ उसकी यह बात श्वशुर ने मान ली लेकिन भविष्य को समझती हुई अनंगप्रभा ने कठिनाई से इसे माना ॥१९०॥ तदनन्तर जीवदत्त अनंगप्रभा को गोद में लिये हुए मर्त्यलोक में उतरा। मार्ग में एक रमणीय पर्वत को देखकर अनंगप्रभा ने उससे कहा- 'मैं श्रान्त हो गई हूँ अतः इस पर्वत पर विश्राम करो' ॥१९१-१९२॥ 'ऐसा ही हो' इस प्रकार कहकर जीवदत्त उसके साथ उस पर्वत पर उतर गया और अनंगप्रभा की विद्याओं के प्रभाव से भोजन-पान आदि किया ॥१९३॥ तब दैव से प्रेरित जीवदत्त अनंगप्रभा से बोला--'प्यारी कुछ मधुर संगीत सुनाओ' ॥१९४॥ यह सुनकर अनंगप्रभा भक्ति से शिव की स्तुति गाने लगी। तब उसके गान के मधुर शब्द से वह जीवदत्त ब्राह्मण धीरे-धीरे निद्रामग्न हो गया ॥१९५॥ तबतक हरिवर नाम का राजा शिकार खेलता हुआ और झरने का जल ढूँढ़ता हुआ उस मार्ग से जा निकला ॥१९६॥ वह राजा हिरण के समान अनंगप्रभा के गीत से खिंचा हुआ रथ को छोड़कर वहाँ आ गया ॥१९७॥ अच्छे शकुनों से पहले ही शुभ सूचना प्राप्त राजा ने वहाँ कामदेव की शान्ति के समान सुन्दरी अनंगप्रभा को देखा ॥१९८॥ उसे देखते ही उसके गान और रूप से विवश राजा के हृदय को कामदेव ने बाणों से बींध दिया ॥१९९॥
५१२ कथासरित्सागर
५१२ कथासरित्सागर स्वनामख्याञ्जने तस्मिन् सोऽनङ्गप्रभया तया। सह दिव्यसुखस्तस्थौ ततो हरिवरो नृपः ॥२१५॥ साप्यनङ्गप्रभा तमेवासीत्तदनुरागिणी। विस्मृत्य स्वं प्रभावं स सर्वं शापविमोहिता ॥२१६॥ अत्रान्तरे स सप्ताद्रौ जीवदत्तो न केवलम्। प्रबुद्धो नैक्षतानङ्गप्रभां यावत् स्वमप्यसिम् ॥२१७॥ क्व साऽनङ्गप्रभा कष्टं क्व स खड्गोऽपि किं नु तम्। हृत्वा गता सा किं वा तौ नीतौ द्वावपि केनचित् ॥२१८॥ इत्युद्भ्रान्तो बहून् कुर्वन् वितर्कान् स दिनत्रयम्। गिरिं तं विचिनोति स्म दह्यमानः स्मराग्निना ॥२१९॥ ततोऽवतीर्य चिन्वानो वनानि दिवसान् दश। स बभ्राम न चापश्यत् तस्याः पदमपि क्वचित् ॥२२०॥ हा दुर्जनविधे कृच्छ्रात् सा दत्तापि कथं त्वया। खड्गसिद्ध्या सह हृता प्रियानङ्गप्रभा मम ॥२२१॥ इत्याक्रन्दन्निराहारो भ्रमन्नेकमवाप्तवान्। ग्रामं तत्र विवेशैकमार्तं द्विजगृहं च सः ॥२२२॥ गृहिणी तत्र सुभगा सुवस्त्रा चोपवेश्य तम्। आसने प्रियदत्ताख्यां स्वचेटीं शीघ्रमार्दिशत् ॥२२३॥ त्वरितं जीवदत्तस्य पादौ क्षाल्यतामस्य हि। निराहारस्य विरहाद्दिनमद्य त्रयोदशम् ॥२२४॥ तच्छ्रुत्वा विस्मितो जीवदत्तोऽन्तर्विममर्श सः। इहानङ्गप्रभा प्राप्ता किं किमेषाथ योगिनी ॥२२५॥ इति ध्यायन् धौतपादो भुक्तसद्दत्तभोजनः। प्रणतां प्रियदत्तां तामत्याश्चर्यात् पृच्छति स्म सः ॥२२६॥ एकं ब्रूहि कथं वेत्सि मद्वृत्तान्तमनिन्दिते। द्वितीयं चापि कथय प्रियाखड्गौ क्व मे गतौ ॥२२७॥ तच्छ्रुत्वा तमवोचत् सा प्रियदत्ता पतिव्रता। भर्तुरन्यो न मे चित्ते स्वप्नेऽपि कुरुते पदम् ॥२२८॥ पुत्रभ्रातृसमानन्यान् पश्यामि पुरुषानहम्। न च मेऽनर्चितो याति कदाचिदतिथिर्गृहात् ॥२२९॥
नवम लम्बक ५१५
नवम लम्बक ५१५ राजा हरिवर, अपने नाम से ही प्रसिद्ध हरिवर नगर, में उस परम सुन्दरी दिव्य रमणी अनंगप्रभा के साथ दिव्य सुख प्राप्त करता हुआ रहने लगा॥२१५॥ वह अनंगप्रभा भी राजा के प्रति अनुराग रखती हुई वहीं रहने लगी किन्तु वह अपने प्रभाव को भूलकर शाप से मोहित हो गई थी॥२१६॥ इसी बीच उस पर्वत पर सोकर उठे हुए जीवदत्त ने केवल अनंगप्रभा को ही नहीं देखा यह नहीं प्रत्युत अपनी तलवार को भी उसने नहीं देखा॥२१७॥ वह अनंगप्रभा कहाँ है वह तलवार भी कहाँ गई ? क्या अनंगप्रभा तलवार लेकर चली गई या उन दोनों को ही कोई तीसरा ले गया ? ॥२१८॥ इस प्रकार, उन्मत्त के समान विविध प्रकार की शंकाएं करता हुआ वह जीवदत्त कामाग्नि से जलता हुआ तीन दिनों तक सारे पर्वत पर उसे ढूँढता रहा॥२१९॥ तब पर्वत से उतरकर दस दिनों तक उसके नीचे वन में उसे ढूँढते हुए वह घूमता रहा किन्तु कहीं उसने उसके चरण का चिह्न भी न पाया॥२२०॥ 'हे दुष्ट दैव अत्यन्त कठिनाई से दी हुई तून खड्गसिद्धि के साथ मेरी प्राणप्यारी अनंगप्रभा को भी हर लिया' ॥२२१॥ इस प्रकार, रोते-कलपते और निराहार भ्रमण करते हुए उसे एक ग्राम मिला वहाँ वह एक सम्पन्न ब्राह्मण के घर में प्रवेश किया ॥२२२॥ उस घर में सुन्दरी और अच्छे वस्त्र पहने हुए गृहिणी प्रियव्रता ने उसे आसन देकर बैठाया और अपनी दासियों को आज्ञा दी कि शीघ्र ही इस जीवदत्त के चरण धुलाओ। स्त्री के वियोग से निराहार रहते हुए आज इसका तेरहवाँ दिन है॥२२३-२२४॥ यह सुनकर जीवदत्त मन में सोचने लगा कि क्या अनंगप्रभा यहाँ आई है या यह स्त्री ही कोई योगिनी है॥२२५॥ ऐसा सोचता हुआ धुले हुए पैरोंवाला और उसके दिये हुए भोजन से तृप्त जीवदत्त ने प्रणाम करते हुए बड़ी ही दीनतापूर्वक प्रियव्रता से पूछा-॥२२६॥ 'हे सदाचारिणी एक तो यह बताओ कि तुम मेरा वृत्तान्त कैसे जानती हो ? और, दूसरा यह बताओ कि मेरी प्रियतमा और तलवार कहाँ है ? ॥२२७॥ यह सुनकर वह पतिव्रता प्रियव्रता उससे बोली—'पति के सिवा दूसरा पुरुष स्वप्न में भी मेरे चित्त में स्थान नहीं पाता ॥२२८॥ दूसरे पुरुषों को मैं पुत्र और भ्राता के समान समझती हूँ। मेरे घर से कोई भी अतिथि बिना सत्कार प्राप्त किये हुए वापस नहीं जा सकता ॥२२९॥ ६५
सापि तं वीक्ष्य सहसा सुभगं पुष्पधन्वनः। पतिता गोधरेऽनङ्गप्रभा क्षणमचिन्तयत् ॥२००॥ कोऽयं किमयममुक्तपुष्पचापॊ मनोभवः। किं मूर्तो गीततुष्टस्य शर्वस्यानुग्रहो मयि ॥२०१॥ इति सञ्चिन्त्य पप्रच्छ सा तं मदनमोहिता। कस्त्वं कथं वनं खेदमागतोऽस्युच्यतामिति ॥२०२॥ ततो यथागतो यः स सर्वं तस्यै शशंस तत्। स राजा तामथापृच्छत् का त्वं सुन्दरि शंस मे ॥२०३॥ यश्च सुप्तस्थितोऽत्रायमेष कः कमलानने। इति तं पृच्छन्तं च सङ्क्षेपेण जगाद सा ॥२०४॥ अहं विद्याधरी खड्गसिद्धश्चैष पतिर्मम। दृष्टमात्रे च जातास्मि सानुरागाधुना त्वयि ॥२०५॥ तदेहि तावद् गच्छावस्त्वदीयं नगरं द्रुतम्। यावत् प्रबुध्यते नायं तत्र वक्ष्यामि विस्तरात् ॥२०६॥ श्रुत्वैतत्तद्वचो राजा प्रतिपद्य तथेति सः। त्रैलोक्यराज्यसम्प्राप्तिहर्षं हरिवरो दधे ॥२०७॥ नृपमङ्के गृहीत्वैमं गन्त्वाभ्युत्पत्य खं जवात्। इत्यनङ्गप्रभा सान्तः सत्वरा समचिन्तयत् ॥२०८॥ तावच्च भ्रष्टविद्याभूवद्भर्तृद्रोहेण तेन सा। स्मरन्ती पितृशापं च विषादं सहसा ययौ ॥२०९॥ तद्दृष्ट्वा कारणं पृष्ट्वा स राजा तामभाषत। न विषादस्य कालोऽयं प्रबुध्येतैष ते पतिः ॥२१०॥ दैवायत्तं च यत्सर्वं तच्छोचितुं नार्हसि प्रिये। को हि स्वशिरसश्छायां विभेद्योत्सृजयेद् गतिम् ॥२११॥ तदेहि याम इत्युक्त्वा तां स त्वरितद्विगरम्। अङ्के हरिवरश्चक्रे राजानङ्गप्रभां द्रुतम् ॥२१२॥ ततो निधानलब्ध्येव तुष्टो गत्वा यथागतं। राजारुरोह स्वरथं स भृत्यैरभिनन्दितः ॥२१३॥ तेन स्वनगरं प्राप स नभश्शीघ्रगामिना। रथेन रमणीयुक्तः प्रजानां दत्तकौतुकः ॥२१४॥
अष्टम लम्बक ५११
[Page Header] अष्टम लम्बक ५११
[Page Body] वह अनंगप्रभा भी सुन्दर राजा को देखकर, कामदेव के बाणों का लक्ष्य बन गई और अपने मन में सोचने लगी— ॥२ ०॥ यह कौन है? क्या यह धनुषहीन कामदेव है अथवा मेरे गात्र या स्तुति से सन्तुष्ट शिव का मुझपर मूर्त्तिमान् अनुग्रह है ॥२ १॥ ऐसा सोचकर काम-मोहिता अनंगप्रभा ने उससे पूछा—'तुम कौन हो और इस वन में कैसे आये हो बताओ' ॥२ २॥ तब राजा जहाँ जैसे आया था वह सब उसे उसने बताया और राजा ने भी उससे पूछा—'सुन्दरि, तू कौन है? मुझे बता ॥२ ३॥ हे कमलनयनी यहाँ यह जो सो रहा है, यह कौन है। ऐसा पूछते हुए राजा को अनंग प्रभा ने संक्षेप में सब वृत्तान्त सुना दिया ॥२ ४॥ मैं विद्याधरी हूँ और यह खड्गसिद्ध मानव मेरा पति है। किन्तु, मैं तुम्हें देखते ही तुम्हारे प्रति अनुरागिणी हो गई हूँ। तो आओ। शीघ्र ही तुम्हारे नगर को चलें। जबतक यह जागता नहीं तबतक तुम्हें विस्तार से सब समाचार सुनाती हूँ' ॥२ ५–२ ६॥ राजा ने उसका प्रस्ताव सुनकर और उसे स्वीकार करके माना तीनों लोकों का राज्य पा लिया ॥२ ७॥ अनंगप्रभा ने राजा को गोद में रखकर, क्या वेग से आकाश में उड़ जाऊँ—ऐसा शीघ्र ही मन में सोचा ॥२ ८॥ इतने में ही वह पति-विद्रोह के कारण भ्रष्ट विद्यावाली हो गई, अर्थात् अपनी विद्याओं को भूल गई। तब पिता के शाप का स्मरण करती हुई वह अत्यन्त दुःखी हो गई ॥२ ९॥ उसे दुःखी देखकर और उसका कारण पूछकर राजा ने उससे कहा—यह शोक करने का समय नहीं है, तेरा पति जग जायगा ॥२१०॥ प्रिये यह बात तो दैवाधीन है। इस पर सोच न करो। अपने सिर की छाया और दैव की गति का कौन उल्लंघन कर सकता है? ॥२११॥ तो आओ अब चलें'—ऐसा कहकर उस पर विश्वास करती हुई अनंगप्रभा को राजा ने शीघ्रता से गोद में उठा लिया ॥२१२॥ तब माना गड़ा हुआ खजाना प्राप्त किया हुआ-सा वह राजा शीघ्र ही जाकर अपने रथ पर चढ़ गया और सेवकों ने उसका अभिनन्दन किया ॥२१३॥ वह राजा मन के समान शीघ्रगामी उस रथ से उस रमणी के साथ प्रजाओं को कौतुक देता हुआ अपनी राजधानी में जा पहुँचा ॥२१४॥
५१२ कथासरित्सागर
५१२ कथासरित्सागर स्वनामलाञ्छने तस्मिन् सोऽनङ्गप्रमया तया। सह दिव्यसुरस्तस्थौ ततो हरिवरो नृपः॥२१५॥ साप्यनङ्गप्रभा तत्रवासीत्तदनुरागिणी। विस्मृत्य स्वं प्रभावं तं सर्वं पापेविमोहिता॥२१६॥ अत्रान्तरे स तत्राद्रौ जीवदत्तो न केवलम्। प्रबुद्धो नैक्षतानङ्गप्रभां यावत् स्वमप्यसिम्॥२१७॥ क्व साऽनङ्गप्रभा कष्टं क्व स खड्गोऽपि किं नु तम्। हृत्वा गता सा किं वा तौ नीतौ द्वावपि केनचित्॥२१८॥ इत्युद्विभ्रान्तो बहून् कुर्वन् वितर्कांन् स दिनत्रयम्। गिरिं तं विचिनोति स्म दह्यमानः स्मराग्निना॥२१९॥ ततोऽश्वतीर्थं चिन्वानो वनानि दिवसान् दश। स बभ्राम न चापश्यत् तस्याः पदमपि क्वचित्॥२२०॥ हा दुर्जनविधे दुःखात् सा दत्तापि कथं त्वया। खड्गसिद्ध्या सह हृता प्रयानङ्गप्रभा मम॥२२१॥ इत्याक्रन्दन्निराहारो भ्रमन्नेकमवाप्तवान्। ग्रामं तत्र विवेशैक्रमाढ्यं द्विजगृहं च सः॥२२२॥ गृहिणी तत्र सुभगा सुवस्त्रा चोपवेश्य तम्। आसने प्रियदत्ताख्या स्वचेटीं शीघ्रमादिशत्॥२२३॥ त्वरितं जीवदत्तस्य पादौ क्षालयतास्य हि। निराहारस्य विरहाद्दिनमद्य त्रयोदशम्॥२२४॥ तच्छ्रुत्वा विस्मितो जीवदत्तोऽन्तर्विममर्श सः। इहानङ्गप्रभा प्राप्ता किं किमेषाथ योगिनी॥२२५॥ इति ध्यायन् धौतपादो भुक्तसद्दत्तभोजनः। प्रणतः प्रियदत्तां तामत्याश्चर्यां पृच्छति स्म सः॥२२६॥ एकं ब्रूहि कथं वेत्सि मद्द्वृत्तान्तमनिन्दिते। द्वितीयं चापि कथय प्रियासङ्गो क्व मे गतो॥२२७॥ तच्छ्रुत्वा तमवोचत् सा प्रियदत्ता पतिव्रता। भर्तुरन्यो न मे चित्ते स्वप्नेऽपि कुरुते पदम्॥२२८॥ पुत्रभ्रातृसमान् यान् पश्यामि पुरुषानहम्। न च मेऽनर्चितो याति क्वाप्यतिथिर्गृहात्॥२२९॥
नवम लम्बक ५१५
नवम लम्बक ५१५ राजा हरिवर, अपने नाम से ही प्रसिद्ध हरिवर नगर, में उस परम सुन्दरी दिव्य रमणी अनंगप्रभा के साथ विषय सुख प्राप्त करता हुआ रहने लगा॥२१५॥ वह अनंगप्रभा भी राजा के प्रति अनुराग रखती हुई वहीं रहने लगी किन्तु वह अपने प्रभाव को भूलकर शाप से मोहित हो गई थी॥२१६॥ इसी बीच उस पर्वत पर सोकर उठे हुए जीवदत्त ने केवल अनंगप्रभा को ही नहीं देखा यह नहीं प्रत्युत अपनी तलवार को भी उसने नहीं देखा ॥२१७॥ वह अनंगप्रभा कहाँ है वह तलवार भी कहाँ गई ? क्या अनंगप्रभा तलवार लेकर चली गई या उन दोनों को ही कोई तीसरा ले गया ? ॥२१८॥ इस प्रकार, उन्मत्त के समान विविध प्रकार की शंकाएँ करता हुआ वह जीवदत्त कामाग्नि से जलता हुआ तीन दिनों तक सारे पर्वत पर उसे ढूँढ़ता रहा॥२१९॥ तब पर्वत से उतरकर दस दिनों तक उसके नीचे वन में उसे ढूंढते हुए वह घूमता रहा किन्तु कहीं उसने उसके चरण का चिह्न भी न पाया॥२२ ॥ 'हे दुष्ट दैव अत्यन्त कठिनाई से दी हुई तूने खड्गसिद्धि के साथ मेरी प्राणप्यारी अनंगप्रभा को भी हर लिया' ॥२२१॥ इस प्रकार, रोते-कलपते और निराहार भ्रमण करते हुए उसे एक ग्राम मिला जहाँ वह एक सम्पन्न ब्राह्मण के घर में प्रविष्ट किया ॥२२२॥ उस घर में सुन्दरी और अच्छे वस्त्र पहने हुए गृहिणी प्रियदत्ता ने उसे आसन देकर बैठाया और अपनी दासियों को आज्ञा दी कि शीघ्र ही इस जीवदत्त के चरण धुलाओ। स्त्री के वियोग से निराहार रहते हुए आज इसका तेरहवां दिन है॥२२३-२२४॥ यह सुनकर जीवदत्त मन में सोचने लगा कि क्या अनंगप्रभा यहाँ आई है या यह स्त्री ही कोई योगिनी है॥२२५॥ ऐसा सोचता हुआ धुले हुए पैरोंवाला और उसके दिये हुए भोजन से तृप्त जीवदत्त ने प्रणाम करते हुए बड़ी ही दीनतापूर्वक प्रियदत्ता से पूछा—॥२२६॥ 'हे सदाचारिणी एक तो यह बताओ कि तुम मेरा वृत्तान्त कैसे जानती हो ? और, दूसरा यह बताओ कि मेरी प्रियतमा और तलवार कहाँ है ? ॥२२७॥ यह सुनकर वह पतिव्रता प्रियदत्ता उससे बोली—'पति के सिवा दूसरा पुरुष स्वप्न में भी मेरे चित्त में स्थान नहीं पाता ॥२२८॥ दूसरे पुरुषों को मैं पुत्रों और भाइया के समान समझती हूँ। मेरे घर से कोई भी अतिथि बिना सत्कार प्राप्त किये हुए वापस नहीं जा सकता ॥२२९॥ ६५
५१२ कथासरित्सागर
५१२ कथासरित्सागर स्वनामलाञ्छने तस्मिन् सोऽनङ्गप्रमया तया। सह विषयसुखस्तस्थौ ततो हरिवरो नृप ॥२१५॥ साप्यनङ्गप्रभा तत्रैवासीत्तदनुरागिणी। विस्मृत्य स्व प्रभावं तं सर्वं शापविमोहिता ॥२१६॥ अत्रान्तरे स तत्राद्रौ जीवदत्तो न केवलम्। प्रबुद्धो नैक्षतानङ्गप्रभां यावत् स्वमप्यसिम् ॥२१७॥ क्व साऽनङ्गप्रभा कष्टं क्व स खड्गोऽपि किं नु सम्। ह्रुत्वा गता सा किं वा तौ नीतौ द्वावपि केनचित् ॥२१८॥ इत्युद्भ्रान्तो बहून् कुर्वन् वितर्कान् स दिनत्रयम्। गिरि तं विचिनोति स्म वह्यमानः स्मराग्निना ॥२१९॥ ततोऽवतीर्य चिन्वानो वनानि दिवसान् दश। स बभ्राम न चापश्यत् तस्या पादमपि क्वचित् ॥२२०॥ हा दुर्जनविषे कुब्धात् सा दत्तापि कथ त्वया। खड्गसिद्ध्या सह ह्रुता प्रियानङ्गप्रभा मम ॥२२१॥ इत्याक्रन्दन्निराहारो भ्रमन्नेकमवाप्तवान्। ग्रामं तत्र विवेशैक्रमाढ्य द्विजगृहं च सः ॥२२२॥ गृहिणी तत्र सुभगा सुवस्त्रा चोपवेश्य तम्। आसने प्रियदत्ताख्या स्वचटीं शीघ्रमाविशत् ॥२२३॥ त्वरितं जीवदत्तस्य पादौ क्षालयतास्य हि। निराहारस्य विरहाद्दिनमद्य त्रयोदशम् ॥२२४॥ तच्छ्रुत्वा विस्मितो जीवदत्तोऽन्तर्विममर्श सः। इहानङ्गप्रभा प्राप्ता किं किमेषाथ योगिनी ॥२२५॥ इति ध्यायन् धौतपादो भुक्ततद्दत्तभोजनः। प्रणतः प्रियदत्तां तामरयार्थ्या पृच्छति स्म सः ॥२२६॥ एकं ब्रूहि कथं वेत्सि मद्वृत्तान्तमनिन्दिते। द्वितीयं चापि कथय प्रियासङ्गो क्व मे गतो ॥२२७॥ तच्छ्रुत्वा तमबोधत् सा प्रियदत्ता पतिव्रता। भर्तुरन्यो न मे चित्ते स्वप्नेऽपि कुरुते पदम् ॥२२८॥ पुत्रभ्रातृसमान् यान् पश्यामि पुरुषानहम्। न च मेऽनर्चितो याति कदाचिदतिथिगृहात् ॥२२९॥
नवम लम्बक ५१५
नवम लम्बक ५१५ राजा हरिवर, अपने नाम से ही प्रसिद्ध हरिवर नगर, में उस परम सुन्दरी दिव्य रमणी अनंगप्रभा के साथ दिव्य सुख प्राप्त करता हुआ रहने लगा ॥२१५॥ वह अनंगप्रभा भी राजा के प्रति अनुराग रखती हुई वहीं रहने लगी किन्तु वह अपने प्रभाव को भूलकर आप से मोहित हो गई थी ॥२१६॥ इसी बीच उस पर्वत पर सोकर उठे हुए जीवदत्त ने केवल अनंगप्रभा को ही नहीं देखा यह नहीं प्रत्युत अपनी तलवार को भी उसने नहीं देखा ॥२१७॥ वह अनंगप्रभा कहाँ है वह तलवार भी कहाँ गई ? क्या अनंगप्रभा तलवार लेकर चली गई या उन दोनों को ही कोई तीसरा ले गया ? ॥२१८॥ इस प्रकार, उन्मत्त के समान विविध प्रकार की शंकाएं करता हुआ वह जीवदत्त कामाग्नि से जलता हुआ तीन दिनों तक सारे पर्वत पर उसे ढूंढता रहा ॥२१९॥ तब पर्वत से उतरकर दस दिनों तक उसके नीचे वन में उसे ढूंढते हुए वह घूमता रहा किन्तु कहीं उसने उसके चरण का चिह्न भी न पाया ॥२२ ०॥ 'हे दुष्ट दैव अत्यन्त कठिनाई से दी हुई तूने खड्गसिद्धि के साथ मेरी प्राणप्यारी अनंगप्रभा को भी हर लिया' ॥२२१॥ इस प्रकार, रोते-कलपते और निराहार भ्रमण करते हुए उसे एक ग्राम मिला जहाँ वह एक सम्पन्न ब्राह्मण के घर में प्रवेश किया ॥२२२॥ उस घर में सुन्दरी और अच्छे वस्त्र पहने हुए गृहिणी प्रियदत्ता ने उसे आसन देकर बैठाया और अपनी दासियों को आज्ञा दी कि शीघ्र ही इस जीवदत्त के चरण धुलाओ । स्त्री के वियोग से निराहार रहते हुए आज इसका तेरहवाँ दिन है ॥२२३-२२४॥ यह सुनकर जीवदत्त मन में सोचने लगा कि क्या अनंगप्रभा यहाँ आई है या यह स्त्री ही कोई योगिनी है ॥२२५॥ ऐसा सोचता हुआ धुले हुए पैरोंवाला और उसके दिये हुए भोजन से तृप्त जीवदत्त ने प्रणाम करते हुए बड़ी ही दीनतापूर्वक प्रियदत्ता से पूछा- ॥२२६॥ 'हे सदाचारिणी एक तो यह बताओ कि तुम मेरा वृत्तान्त कैसे जानती हो ? और दूसरा यह बताओ कि मेरी प्रियतमा और तलवार कहाँ है ? ॥२२७॥ यह सुनकर वह पतिव्रता प्रियदत्ता उससे बोली-'पति के सिवा दूसरा पुरुष स्वप्न में भी मेरे चित्त में स्थान नहीं पाता ॥२२८॥ दूसरे पुरुष को मैं पुत्रों और भाइयों के समान समझती हूँ। मेरे घर से कोई भी अतिथि बिना सत्कार प्राप्त किये हुए वापस नहीं जा सकता ॥२२९॥ ६५
५१४ कथासरित्सागर
५१४ कथासरित्सागर सत्प्रभावेण जानामि भूतं भव्यं च भावि च। सा चानङ्गप्रभा नीता राज्ञा हरिवरेण तु॥२३०॥ सुप्ते त्वयि विधियोगात् तन्मार्गगामिना तदा। गीताकृष्टोपयातेन स्वनामपुरवासिना॥२३१॥ सा न शक्या न ते प्राप्तुं स हि राजा महाबलः। सा पुनस्तमपि त्यक्त्वा कुलटान्यत्र यास्यति॥२३२॥ खड्गं च देवी प्रादात्ते सत्प्राप्त्यै तद्विधाय सः। तस्यां हृतायां दिव्यत्वाद्भ्रष्टया एवान्तिकं गतः॥२३३॥ किं न वेत्स्येव तेऽनङ्गप्रभाशापोपवर्णने। स्वप्ने भावि यदादिष्टं तत्कथं विस्मृतं तव॥२३४॥ तदेष भवितव्योऽयं व्यामोहोस्ते वृथैव कः। पापानुबन्धं मुञ्चैनं भूयो भूयोऽतिदुःखदम्॥२३५॥ किं चाधुना तव तया पापयान्यानुरक्तया। मानुषीभूतया ज्ञातस्वद्रोहाद्भ्रष्टविद्यया॥२३६॥ इत्युक्तः स तया साध्व्या त्यक्तानङ्गप्रभास्पृहः। तज्जातखेदविरक्तात्मा जीवदत्तो जगाद ताम्॥२३७॥ शान्तस्त्वद्वचसा मोहः सत्येनाम्बामुना मम। कामं न श्रेयसे कस्य सङ्गमः पुण्यकर्मभिः॥२३८॥ पूर्वपापवशादेतद् समापतितं मम। तत्क्षालनाय यास्यामि तीर्थान्युज्झितमत्सरः॥२३९॥ को मेऽनङ्गप्रभाहर्तोर्वैरेणार्थः परे सह। जितक्रोधेन सर्वं हि जगदेतद्विजीयते॥२४०॥ इति यावत् स वक्त्यत्र तावत्तस्याः पतिर्गृहे। आययो प्रियदत्ताया धार्मिकोऽतिथिवात्सलः॥२४१॥ कृतातिथ्येन तेनाऽपि त्याजितो दुःखमत्र सः। विश्रम्य तीर्थयात्राय प्रायादापृच्छय ताबुभौ॥२४२॥ ततः श्रमण सर्वाणि पृथ्व्यां तीर्थानि सोऽभ्रमत्। विमोढानेककान्तारस्पृष्टो मूलफलाशनः॥२४३॥ भ्राम्यन्तीर्थेष्व तामेव स ययौ विन्ध्यवासिनीम्। तत्र तप स्तपस्तीव्रं निराहारः कुशास्तरे॥२४४॥
नवम लम्बक ५१५
नवम लम्बक ५१५ इसके प्रभाव से ही भूत भविष्य और वर्तमान को मैं जानती हूँ। वही उस अनंगप्रभा को राजा हरिवर ले गया ॥२५०॥ तेरे सोये रहने पर वह राजा हरिवर उसके गान से आकृष्ट होकर उसी मार्ग से आ गया था किन्तु वह दुराचारिणी उसे भी छोड़कर फिर दूसरे के पास चली जायगी ॥२५१ २५२॥ उस खड्ग को देवी ने तुझे उसी की प्राप्ति के लिए दिया था। उसके हरण हो जाने पर वह दिव्य खड्ग फिर देवी के पास ही चला गया ॥२५३॥ और, देवी ने ही अनंगप्रभा के शाप का वर्णन करते हुए स्वप्न में तुझे जो उसका भविष्य बतलाया था वह तू क्यों भूल गया ? ॥२५४॥ तो इस असत्यंवादी बात में तुझे यह मिथ्या मोह क्यों हो रहा है ? तू बार-बार अति दुःख देनेवाले इस पाप के बन्धन को तोड़ दे ॥२५५॥ आर्त, दूसरे पुरुष से प्रेम करनेवाली और मनुष्य बनी हुई तथा तुम्हारे साथ धोखा करने के कारण भ्रष्ट विद्यावाली उस पापिन को पाकर भी तुम क्या करोगे ? ॥२५६॥ उस पतिव्रता द्वारा इस प्रकार समझाये गये जीवदत्त ने अनंगप्रभा की आशा छोड़ दी और उसकी चंचलता से विरक्त होकर वह प्रियव्रता से बोला—॥२५७॥ 'हे माता तेरे इन सत्य वाक्यों से मेरा मोह शान्त हो गया। पुण्यात्माओं का सम्पर्क किसके कल्याण के लिए नहीं होता ? ॥२५८॥ मेरे पूर्वजन्म के पापों के कारण मुझे यह दुःख प्राप्त हुआ। अब उन पापों को धोने के लिए राग-द्वेष हीन होकर मैं तीर्थों की यात्रा करूँगा ॥२५९॥ अनंगप्रभा के कारण दूसरों से विरोध करने में मुझे क्या लाभ है? जिसने क्रोध को जीत लिया उसने सारे संसार को जीत लिया' ॥२६०॥ जीवदत्त के इस प्रकार कहते ही प्रियव्रता का पति वहाँ आ गया जो परम धार्मिक और अतिथियों का प्रेमी था ॥२४१॥ उसने भी जीवदत्त का आतिथ्य करके उसके दुःख को दूर किया। तब जीवदत्त उनके घर में विश्राम करके और उनसे सम्मति लेकर तीर्थयात्रा को चला गया ॥२४२॥ तदनन्तर निर्जन वनों में अनेक कष्टों को सहन करता हुआ और कन्द-मूल फल खाता हुआ वह पृथ्वी के सभी तीर्थों का भ्रमण करने लगा ॥२४३॥ सभी तीर्थों का पर्यटन करने के उपरान्त अन्त में उसी विन्ध्यवासिनी की शरण में आकर निराहार रहकर उसने कुश के आस्तरण पर कठिन तपस्या आरम्भ की ॥२४४॥
तपस्तुष्टा च सा साक्षादुवाचैव तमम्बिका। उत्तिष्ठ तत्र यूयं हि चत्वारो मामका गणाः॥२४५॥ पञ्चचूलश्चतुर्वक्त्रमहोदरमुखास्तथा । त्वं चतुर्थश्च विकटवदनाख्यः क्रमोत्तमः ॥२४६॥ ते यूयं जातु गङ्गाया विहर्तुं पुलिनं गताः। तत्र स्नान्ती च युष्माभिर्दृष्टैका मुनिकन्यका ॥२४७॥ चापलेस्सि कपिञ्जटाख्यस्य मुनेः सुता। प्रार्थ्यते स्म च सर्वैः सा भवद्भिर्मदनातुरैः ॥२४८॥ कन्याहमनपेयातेति तयोक्ते ते त्रयोऽपरे। तूष्णीमासंस्त्वया सा तु हठाद्बाहावगृह्यत ॥२४९॥ क्रन्दति स्म च सा 'तात तात त्रायस्व मा' मिति। तच्छ्रुत्वा निकटस्थोऽत्र स क्रुद्धो मुनिरागमत् ॥२५ ॥ तं दृष्ट्वा सा त्वया मुक्ता ततो युष्मान् शशाप सः। मनुष्ययोनिं पापिष्ठाः सर्वे यातेति तत्क्षणात् ॥२५१॥ प्रार्थितः सोऽथ शापान्तमेव वो मुनिरभ्यधात्। यदानङ्गरतीराजसुता युष्माभिरर्चिता ॥२५२॥ गता विद्याधरं लोकं मोक्ष्याध्वामी तदा त्रयः। त्वं तु विद्याधरीभूतां प्राप्यैतां हारयिष्यसि ॥२५३॥ ततः प्राप्स्यसि विकटवदन व्यसनं महत्। चिराच्च देवीमाराध्य शापादस्माद्विमोक्ष्यसे ॥२५४॥ त्वयास्याश्चापलेखाया हस्तस्पर्शो यतः कृतः। परदारापहारोत्थं पापमस्ति च ते महत् ॥२५५॥ इति ये मद्गणा यूयं शप्तास्तेन महर्षिणा। तेऽद्य जाताः स्थ चत्वारः प्रवीरा दक्षिणापथे ॥२५६॥ पञ्चपट्टिचनामाऽसौ यो तौ खड्गधरश्च यः। सतायस्ते त्रयस्त्वं च चतुर्थो जीवदत्तकः ॥२५७॥ ते च त्रयोऽनङ्गरतौ प्रयातायां निजं पदम्। इहागत्यैव निम्मुक्ता मत्प्रभावेन शापतः ॥२५८॥ त्वया चाराधिताऽस्म्यद्य जातः शापक्षयश्च ते। तन्नानयीं गृहीत्वैनां धारणां स्वतनूं त्यज ॥२५९॥
नवम लम्बक ५१७
नवम लम्बक ५१७ उसके तप से सन्तुष्ट अम्बिका ने प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष रूप में उससे कहा—'उठो बेटा तुम चार मेरे गण हो। तीन तो पंचशूल, चतुर्वक्त्र और महावर हैं और चौथा तुम विकटवदन नाम का है ॥२४५ २४६॥ किसी समय तुम चारों गण विहार के लिए गंगा-तट पर गये। वहाँ कपिसजट नाम के मुनि की कन्या चापलता स्नान करती हुई तुम्हें दीख पड़ी और तुम लोग उसे देखकर काम से व्याकुल हो गये और उसकी इच्छा करने लगे ॥२४७-२४८॥ 'मैं ऋषी कन्या हूँ तुम लोग यहाँ से दूर हटो' उसके ऐसा कहने पर अन्य तीन गण तो चुप रहे किन्तु तुमने बलपूर्वक उसके हाथ पकड़ लिये ॥२४९॥ तब 'हे पिता हे पिता मुझे बचाओ'—इस प्रकार वह चिल्लाने लगी। उसका चिल्लाना सुनकर पास ही स्थित उसका पिता मुनि वहाँ आया। उसे देखकर तुमने उसे छोड़ दिया। तब मुनि ने तुम चारों को शाप दिया कि 'हे पापियो तुम मानव-लोक में जाओ' ॥२५० २५१॥ तब प्रार्थना करने पर मुनि ने इस प्रकार शाप का अन्त किया कि 'जब राजकुमारी अनंग प्रभा को तुम लोग सौंपोगे तब वह विद्याधर-लोक में चली जायगी। ये तीनों तो उसी समय शाप मुक्त हो जायेंगे किन्तु तुम विद्याधरी बनी हुई उसे पाकर भी गँवा दोगे ॥२५२ २५३॥ हे विकटवदन अब तुम महान् कष्ट प्राप्त करोगे और चिरकाल तक देवी की आराधना करके इस शाप से छूटोगे ॥२५४॥ तुमने उस चापलता कन्या के हाथ का स्पर्श किया है। इसलिए तुम्हे परदारापहरण का भारी पाप लगा है ॥२५५॥ इस प्रकार उस महर्षि ने मेरे गणों को जो शाप दिया, उसके परिणामस्वरूप तुम चारो दक्षिण दिशा में वीर रूप में उत्पन्न हुए थे। पंचशूष्टिक (जुलाहा) भाषाविज्ञानी (वैद्य) और गङ्गाधर (क्षत्रिय) ये तीनों और चौथा जीवदत्त चारो मित्र हुए ॥२५६ २५७॥ ये तीनों अनंगति के अपने पद को प्राप्त कर सम पर यहाँ आकर ही मेरी कृपा से शाप-मुक्त हुए ॥२५८॥ आज मेरी आराधना से तुम्हारा भी शाप नष्ट हो गया। इसलिए अब तुम मुझमें अग्नि सम्बन्धी धारणा रखकर अपना शरीर त्याग करो ॥२५९॥