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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

१९० कथासरित्सागर

१९० कथासरित्सागर दृष्ट्वैव तद्गतमनास्तथाभूदचलप्रभा । आङ्गिकोऽभिनयोऽप्यस्या दृष्ट्वैवाविनयरथा ॥२३८॥ समाप्याथ तयोर्भावं तं द्वयोरप्यसक्यन् । प्रेक्षणं चोपसंजह्रुः श्रान्ता राजसुतेति ते ॥२३९॥ सठं सूर्यप्रभं तिर्यक् पश्यन्ती सा महल्लिका । पित्रा विसृष्टा वन्दित्वा दानवेन्द्रानगाद्गृहम् ॥२४०॥ दानवेन्द्राश्च ते सर्वे यथास्वमगमन् गृहान् । सूर्यप्रभोऽपि स्वावासमाजगाम दिनक्षये ॥२४१॥ प्रदोषे च कलावत्या पुनरागतया सह । सुष्वापाम्यन्तरे गुप्तं बहिः सुप्ताखिलानुगः ॥२४२॥ ताव महल्लिका सार्धं वत्सन्दर्शनसोत्सुका । तत्राययौ सविस्रम्भमवयस्याद्वयसङ्गता ॥२४३॥ अन्तत्प्रवेष्टुमिच्छन्तीं प्रज्ञाढ्याख्यो ददर्श ताम् । सूर्यप्रभस्य सचिवो निद्रया तत्क्षणोज्झितः ॥२४४॥ देवि तिष्ठ क्षण यावत् प्रविश्याभ्यन्तरादहम् । निर्गच्छामीति स च तां परिज्ञायोत्थितोऽभ्यधात् ॥२४५॥ रुद्धाः स्म किं बहिः कस्मादद्य चेति सशङ्कया । तया पृष्टः स मूढोऽपि प्रज्ञाढ्यो निजगाद ताम् ॥२४६॥ स्वैरं सुप्तस्य सहसैकान्तिकं किं प्रविश्यते । सुप्तश्चास्मतप्रभुरसावेको व्रतबशादिति ॥२४७॥ तत्तस्तथा विधत्स्व त्वमित्युक्तः सविलक्षया । प्रह्लादवैद्यसुतया प्रज्ञाढ्योऽन्तर्विवेश सः ॥२४८॥ सुप्तां कलावतीं दृष्ट्वा तस्मै सूर्यप्रभाय सः । प्रबोध्य स्वैरमाचख्यावागतां तां महल्लिकाम् ॥२४९॥ सूर्यप्रभश्च श्रुत्वा तच्छय्योत्थाय निर्गतः । दृष्ट्वा महल्लिकामात्मवृत्तीयामप्यभाषत ॥२५०॥ प्रीता कृतार्थता तामद्ययमभ्यागतो जनः । नीयतां स्थानमप्येतदासनं परिगृह्यताम् ॥२५१॥ तत्तस्तरोपविशदाथ सहास्याभ्यां महल्लिका । सूर्यप्रभोऽप्युपाविशत्स प्रज्ञाढ्ययुतस्ततः ॥२५२॥

उसे देखते ही महल्लिका का मन ऐसा विचलित हुआ कि मानों उसके इस अभिनय को देखकर क्रोध से आंगिक अभिनय भ्रष्ट-सा हो गया ॥२३८॥ सभा में बैठे हुए सभी सदस्यों ने उन दोनों को समझ लिया और 'राजकुमारी थक गई है' ऐसा कहकर उस दृश्य को स्थगित कर दिया ॥२३९॥ वह महल्लिका भी सूर्यप्रभ को तिरछी दृष्टि से देखती हुई पिता से जाने की आज्ञा पाकर, सभी सदस्यों को प्रणाम करके घर चली गई ॥२४ ॥ सभी दानवराज भी नृत्य के उपरान्त अपने-अपने घरों को चले गये। सायंकाल होने पर सूर्यप्रभ भी अपने निवास-स्थान पर लौट आया ॥२४१॥ रात होने पर पुनः शयन-गृह में आई हुई कलावती के साथ वह सो गया और उसके साथी मन्त्री भवन के बाहर अन्यत्र सो गये ॥२४२॥ इसी बीच सूर्यप्रभ से मिलने की लालसा से महल्लिका भी घबराती हुई दो सखियों को साथ लेकर वहाँ आई ॥२४३॥ कमरे के अन्दर जाती हुई उसे देखकर अकस्मात् जाग पड़े सूर्यप्रभ के मन्त्री प्रज्ञाढ्य ने उसे देखा ॥२४४॥ और उसे पहचानकर कहा-'रुको रुको। मैं अन्दर जाकर और लौटकर आता हूँ' ॥२४५॥ 'हम क्यों रोका गया और आप सब लोग बाहर क्यों हैं'—महल्लिका के इस प्रकार प्रश्न करने पर प्रज्ञाढ्य ने कहा—'क्या स्वतन्त्रता से सोए हुए किसी व्यक्ति के पास एकाएक चला जाना उचित है ? हमारे स्वामी किसी व्रत (नियम) के कारण अकेले सो रहे हैं ॥२४६-२४७॥ 'अच्छा भीतर जाओ'—लज्जिता महल्लिका के इस प्रकार कहने पर प्रज्ञाढ्य अन्दर गया ॥२४८॥ वहाँ कलावती को सोती देखकर उसने सूर्यप्रभ को जगाकर अपनी इच्छा से आई हुई महल्लिका का समाचार दिया ॥२४९॥ यह सुनकर सूर्यप्रभ धीरे से उठकर बाहर निकल आया और दो सखियों के साथ आई हुई महल्लिका से बोला—॥२५ ॥ 'आपने इस अभ्यागत अतिथि को अपने शुभागमन से कृतार्थ किया अब आप इस स्थान को भी कृतार्थ करें, यह आसन स्वीकार कीजिए' ॥२५१॥ यह सुनकर महल्लिका दोनों सखियों के साथ बैठ गई। सूर्यप्रभ भी प्रज्ञाढ्य के साथ सामने बैठ गया ॥२५२॥

२१२ कथासरित्सागर

[Page Header] २१२ कथासरित्सागर

[Main Text] उपविश्य स चोवाच, 'तन्वि यद्यपि मे कृता। त्वयावज्ञा सदस्यथा प्रेक्ष्यान्ते वर्धमानया ॥२५३॥ तथापि तावल्लोलाक्षि दृष्टमात्रेण मे त्वया। सौन्दर्येणेव नूनेन लोचने सफलीकृते ॥२५४॥ इति सूर्यप्रभेणोक्ता सा प्रह्लादसुताऽब्रवीत्। 'नार्यपुत्रापराधोऽस्तो मम सोऽत्रापराध्यति ॥२५५॥ यनाहं संसदि कृता भग्नाभिनमसञ्चिता'। एतच्छ्रुत्वा जितोऽस्मीति' हृष्टम् सूर्यप्रभोऽब्रवीत् ॥२५६॥ जग्राह च करेणास्याः करं राजसुतोऽथ सः। बलात्कारग्रहाद् भीतमिव सस्वेदवेपथुम् ॥२५७॥ मुञ्चार्यपुत्र कत्याह पितृवश्येति भाविनम्। ततो सुरेन्द्रतनयो प्रज्ञाड्यस्तामुवाच सः ॥२५८॥ कन्यानां किं न गान्धर्वो विवाहो देवि विद्यते। न च प्रदास्यत्यन्यस्मै पिता त्वां रूक्षिताशयः ॥२५९॥ एतस्य चात्र सम्मानं निश्चितं स करिष्यति। तदलं साध्वसेनेन्दुमुखा मा भूत् समागमः ॥२६०॥ एवं महल्लिकां यावत् प्रज्ञाढ्यस्तां ब्रवीति सः। तावत्सभाम्यन्तर तत्र प्रबुद्धामूत् कलावती ॥२६१॥ अपश्यन्ती च तं सूर्यप्रभं सा शयनीयके। प्रतीक्ष्य किञ्चिदुद्विग्नशङ्किता निरगाद् बहिः ॥२६२॥ दृष्ट्वा महल्लिकोपेतं तं चात्र निजवल्लभम्। सरोषा च सलज्जा च सभया च बभूव सा ॥२६३॥ महल्लिकाऽपि दृष्ट्वैव तामासीद् भीतसज्जिता। सूर्यप्रभश्च निस्पन्दस्तस्थावाक्षिप्तितो यथा ॥२६४॥ दृष्ट्वा वाथ पलायञ्चे जिह्रेमीर्ष्यामि वा यदि। इति सपादमेवागात् कलावत्यपि सा ततः ॥२६५॥ कुशलं शशि शुभं त्वमागतैर्बमितो निशि। एवं महल्लिकां सां च साभ्यसूयमुवाच सा ॥२६६॥ हता महल्लिकायाचमर्थतद्गृहमेव तु। त्वमग्यास्ताङ्गूढात् प्राप्ता प्रापुणिकाय मे ॥२६७॥

अष्टम लम्बक २५३

अष्टम लम्बक २५३

बैठकर उसने कहा—'हे सुन्दरी तुमने सभा में अन्तिम समय सभासदों को सम्मान-सहित देखती हुई यद्यपि मेरा अपमान किया है, तथापि पंचमलयने तुम्हारे सौन्दर्य के समान ही तुम्हारे नृत्य से मेरी आँखें सफल हो गई हैं॥२५३-२५४॥

सूर्यप्रभ द्वारा इस प्रकार कही गई वह प्रह्लाद की कन्या बोली—'इसमें मेरा अपराध नहीं है, इसमें तो उसी का अपराध है, जिसने मेरे अभिनय को विकृत करके मुझे लज्जित किया है। यह सुनकर सूर्यप्रभ ने हर्ष से कहा—मेरी विजय हुई ॥२५५-२५६॥

और उसका हाथ अपने हाथ से पकड़ लिया जो मानों बलात्कार के भय से पसीने- पसीने होकर काँप रहा था ॥२५७॥

'आर्यपुत्र छोड़ो अभी मैं कुमारी हूँ और पिता के वश में हूँ। ऐसा कहती हुई राजपुत्री को प्रज्ञाढ्य ने कहा—'देवि क्या कन्याओं का गान्धर्व विवाह नहीं होता ? पिता तुम्हारे हार्दिक भाव को जानकर अब दूसरे को प्रदान नहीं करेंगे ॥२५८-२५९॥

वे इस सूर्यप्रभ का सम्मान अवश्य करेंगे। इसलिए घबराओ नहीं तुम्हारा विभ्रम व्यर्थ न हो ॥२६०॥

उधर बाहर जब प्रज्ञाढ्य इस प्रकार महस्तित्त्वा से कह रहा था इसी बीच अन्दर सोई हुई कलावती जाग उठी। उसने शय्या पर सूर्यप्रभ को न देखकर कुछ समय प्रतीक्षा की और फिर घबराकर वह बाहर निकल आई ॥२६१-२६२॥

बाहर आकर अपने पति को महस्तित्त्वा के साथ देखकर उसे कुछ क्रोध कुछ लज्जा और कुछ भय हो आया ॥२६३॥

महस्तित्त्वा भी उसे देखकर कुछ डरी तथा कुछ लज्जित हुई और सूर्यप्रभ तो चित्र में लिखा- सा निश्चल हो गया ॥२६४॥

'मुझे सबने देख लिया है, अब मैं यहाँ से भागूँ तो कैसे ? कैसे लज्जा करूँ और कैसे ईर्ष्या प्रकट करूँ—ऐसा सोचकर कलावती महस्तित्त्वा के पास ही जा बैठी ॥२६५॥

और उससे बोली—सखि कुशल तो है ? तुम इस रात में इस प्रकार यहाँ कैसे आई हो ? तब महस्तित्त्वा ईर्ष्या के साथ उससे बोली—'यह लोक तो मेरा है और मेरा घर भी यहीं है। तू दूसरे पाताल-गृह से यहाँ आई है। इसलिए तू मेरी अतिथि है' ॥२६६-२६७॥

९९४ कथासरित्सागर

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तच्छ्रुत्वा सा विहस्यैतां कलावत्येवमब्रवीत्। सत्यं वृथैत एवेह यस्य सर्वस्य कस्यचित् ॥२६८॥ करोषीहागतस्यैव प्राघुणातिथ्यसत्क्रियाम्। एवमुक्ते कलावत्या सा जगाद महल्लिका ॥२६९॥ यदि प्रीत्या मयोक्ता त्वं तत्किं सद्वेषनिष्ठुरम्। एवं वदसि निर्लज्जे किमहं सदृशी तव ॥२७०॥ किमहं बान्धवादत्ता दूरावेत्य परस्थले। परस्य शयने सुप्ता रहस्येकाकिनी निशि ॥२७१॥ अहं पितुः प्राघुणिकं स्वस्थाने द्रष्टुमागता। आतिथ्येनाधुनेवैषा सखीद्वितयसङ्गता ॥२७२॥ यदास्माभिःप्रसक्त्यावाबसौ मन्त्री प्रविष्टवान्। तदैवैतन्मया ज्ञातं त्वया व्यक्तीकृतं स्वतः ॥२७३॥ एव महल्लिकोक्ता सा कलावत्यगमत्ततः। तिर्यक्कोपकषायेण पश्यन्ती चक्षुषा प्रियम् ॥२७४॥ ततो महल्लिका साऽपि बहुवल्लभ याम्यहम्। सम्प्रतीति रुषा सूर्यप्रभमुक्त्वा ततो ययौ ॥२७५॥ सूर्यप्रभश्च विमना मुक्तं यदभवत्तयोः। कान्ताभ्यां हि समं तस्य तदासक्तं मनो गतम् ॥२७६॥ अथ ज्ञातुं कलावत्याः कलहान्तरचेष्टितम्। प्राहिणोद्द्रुतमुत्थाय प्रभासं स स्वमन्त्रिणम् ॥२७७॥ महल्लिकायास्तच्चञ्च प्रहस्तं स विसृष्टवान्। स्वयं च तद्व्यपेक्षः सन्नासीत् प्रज्ञाढ्यसंयुतः ॥२७८॥ अथान्विष्य कलावत्याश्चेष्टितं स समाययौ। प्रभासो निकटं तस्य पृष्टश्चैवमुवाच तम् ॥२७९॥ इतो द्वितीयं पातालमवति तद्गतवानहम्। वासवेश्म कलावत्याः स्वविद्याच्छादितात्मकः ॥२८०॥ बह्रिस्तत्र द्वयोश्चेट्योरालापश्च श्रुतो मया। एकाब्रवीत् सखि किमसोद्विग्नास्ते कलावती ॥२८१॥ ततो द्वितीयाप्यवदत् सखि गुह्यत्र कारणम्। सुमुण्डीकावतारो हि चतुर्थेऽन्य रसातले ॥२८२॥

अष्टम लम्बक २९५

अष्टम लम्बक २९५ यह सुनकर कलावती हँसकर बोली— यह तो सत्य ही दीख रहा है कि तू यहाँ आये हुए सबका या किसी विशेष अतिथि का आतिथ्य-सत्कार करती है' ॥२६८॥ कलावती द्वारा इस प्रकार कही गई महल्लिका बोली—'यदि मैंने प्रेम से तुम्हें कुछ कह दिया तो तुम द्वेष से कठोर बातें क्यों कर रही हो ? हे निर्लज्जे क्या मैं तेरी तरह निर्लज्ज हूँ? ॥२६९-२७० ॥ कि माता-पिता द्वारा बिना दिये हुए ही दूर से दूसरे के घर में आकर रात के समय एकान्त में दूसरे की शय्या पर अकेली सोई हूँ ? ॥२७१॥ मैं तो अपने पिता के अतिथि से अपनी दो सखियों के साथ आतिथ्य-सत्कार के रूप में मिलने आई हूँ। जब हम लोगों को रोककर यह मन्त्री अन्दर गया तभी मैंने जान लिया था फिर तुमने उसे स्वयं ही स्पष्ट कर दिया ॥२७२-२७३॥ महल्लिका द्वारा इस प्रकार फटकारी गई कलावती तिरछी और क्रोध से रक्त दृष्टि से सूर्यप्रभ को देखती हुई वहाँ से चली गई ॥२७४॥ तब महल्लिका ने सूर्यप्रभ से कहा—'हे बहुला के प्यारे, अब मैं भी जाती हूँ' और इस प्रकार कहकर वह चली गई ॥२७५॥ उस समय मन से हीन सूर्यप्रभ भी खिन्न हो गया यह उचित ही था; क्योंकि दोनों प्रेयसियों पर आसक्त उसका मन भी उन्हीं के साथ चला गया था ॥२७६॥ इसके पश्चात् कलावती के कलह करके चले जाने पर उसकी चेष्टा जानने के लिए सूर्यप्रभ ने शीघ्र ही उठकर प्रभास नामक अपने मन्त्री को भेजा ॥२७७॥ उधर महल्लिका का समाचार जानने के लिए प्रहस्त मन्त्री को भेजा और स्वयं प्रज्ञाढ्य के साथ उनके आने की प्रतीक्षा करने लगा ॥२७८॥ तदनन्तर, कलावती का समाचार लेकर प्रभास उसके पास आया और पूछने पर बोला— 'मैं अपनी विद्या के प्रभाव से अदृश्य होकर कलावती के वासस्थान—दूसरे पाताल—में उसके घर पर गया ॥२७९-२८० ॥ वहाँ मैंने बाहर बैठी हुई दो देवियों की बातचीत सुनी। उनमें एक कहने लगी—'अरी आज कलावती घबराई हुई-सी क्यों है? तब दूसरी ने कहा—'सखि इसका कारण सुनो। सुपुण्डरीक का अवतार आज चौथे पाताल में हैं ॥२८१-२८२॥

२१६ कथासरित्सागर

२१६ कथासरित्सागर

स्थितः सूर्यप्रभो नाम रूपेण जितमन्मथः । तस्मै गत्वा स्वयं गुप्तमात्मा दत्तः किलैतया ॥२८३॥ गतायामथ चेट्यां तत्सकाशं निशागमे । प्रह्लाददुहिताऽयागात् स्वयं तत्र महल्लिका ॥२८४॥ तया सहेर्ष्याकलहं कृत्वा सत्यारम्भात्तनो । उद्यतैषा सुखावत्या स्वस्रा दृष्ट्वैव रक्षिता ॥२८५॥ ततश्चान्तः प्रविश्यैव निपत्य शयनीयके । स्थिता तया सह स्वस्रा पृष्टवृत्तान्तविग्नया ॥२८६॥ एवं चेट्योः कथां श्रुत्वा प्रविश्यात्र तथैव तौ । कलावतीसुखावत्यौ दृष्टे सुप्त्याकृती मया ॥२८७॥ इति प्रभासो यावत्तं वक्ति सूर्यप्रभं रहः । तावत्प्रहस्तोऽप्यागात् पृष्टः सोऽप्यब्रवीदिदम् ॥२८८॥ इतो महल्लिकावासगृहं यावदहं गतः । तावत्तत्र प्रविष्टा सा सखीभ्यां सह दुर्मनाः ॥२८९॥ अहं तत्रैव चादृश्यो विद्यायुक्तो प्रविष्टवान् । दृष्टा मयात्र तस्याश्च सख्यो द्वादश तत्समाः ॥२९०॥ ताश्च सञ्चलपर्यङ्कनिषण्णां परिवृत्य ताम् । महल्लिकामुपाविशन्नेका चोवाच तां ततः ॥२९१॥ सखि कस्मादकस्मात्त्वमुद्विग्नेवाद्य दृश्यसे । विवाहे प्रस्तुतेऽप्येषा बत का ते विषादिता ॥२९२॥ तच्छ्रुत्वा सविमर्शा सा तां प्रह्लादसुताब्रवीत् । को मे विवाहो दत्तास्मि कस्मै केनोदितं तव ॥२९३॥ एवं तयोक्ते सर्वास्ता जगदुर्मिथ्यैतत् त्वम् । प्रातर्विवाहो दत्तासि सखि सूर्यप्रभाय च ॥२९४॥ स्वजनन्यै च देव्यैतदद्योक्तं स्वदसन्निधौ । अस्माभियोजयन्त्या ते कौतुकप्रतिबन्धनि ॥२९५॥ तद्धन्यासि च यस्यास्त भावी सूर्यप्रभः पतिः । यद्रूपसम्पदो निन्द्राति निधिं नष्टाङ्गनाजनः ॥२९६॥ अस्मारं तु विगाताश्चे श्चन्तनी यं वयं परम् । तस्मिन् हि भर्त्तरि प्राप्ते त्वमस्मान् विस्मरिष्यसि ॥२९७॥

अष्टम लम्बक २१७

अष्टम लम्बक २१७ उसका नाम सूर्यप्रभ है और अपने सौन्दर्य से वह कामदेव-विजयी है। कलावती ने गुप्त रूप से जाकर उसे आत्मसमर्पण कर दिया है। आज रात में इसके पास जाने पर राजा प्रह्लाद की कन्या महस्तिका भी स्वयं वहाँ आ गई ॥२८३-२८४॥ तब उसके साथ सपत्नी-भाव से कलह करके आई हुई कलावती आत्मघात के लिए तैयार हुई, यह देखते ही उसकी बहन सुकलावती ने उसे बचाया ॥२८५॥ तब कमरे में जाकर, खाट पर पड़कर और समाचार सुनकर त्रस्त हुई बहन के साथ अब वह पड़ी है ॥२८६॥ सखिकाओं की ये बात सुनकर और उसी अदृश्य रूप से भीतर आकर समान रूपवाली उन दोनों बहनों को मैंने देखा ॥२८७॥ जबतक प्रभास सूर्यप्रभ को एकान्त में यह समाचार कह ही रहा था कि इतने में ही प्रहस्त भी वहाँ आ गया ॥२८८॥ सूर्यप्रभ के पूछने पर प्रहस्त ने कहा— जब मैं यहाँ से महस्तिका के निवास-गृह में पहुँचा तब वह भी दो सखियों के साथ निमन्त्रित होकर वहीं पहुँची। मैं अपनी विद्या के प्रभाव से अदृश्य होकर उसके भवन में गया। वहाँ मैंने उसी के समान रूपवाली उसकी बारह सखियों को देखा ॥२८९-२९०॥ वे सभी सखियाँ रत्नों के सुन्दर पलंग पर बैठी हुई उसे घेरकर बैठ गईं। उनमें एक उससे कहने लगी—॥२९१॥ 'सखि ! तू सहसा दुःखी क्यों हो रही है विवाह के प्रस्तुत होने पर भी तुझे यह खिन्नता क्यों हो रही है' ॥२९२॥ यह सुनकर कुछ सोचती हुई प्रह्लाद-पुत्री बोली—'मेरा विवाह कहाँ हो रहा है। मुझे किसे दिया गया और तुझसे किसने कहा' ॥२९३॥ उसके ऐसा प्रश्न करने पर सभी सखियाँ बोलीं—'प्रातःकाल तुम्हारा विवाह है और तुम्हें सूर्यप्रभ को दिया गया है। तुम्हारे पीछे यह तुम्हारी माता महारानी ने यह कहा है और विवाह मण्डप के कार्यों में हम लोगों की नियुक्ति कर दी गई है ॥२९४-२९५॥ इसलिए तू धन्य है जिसका पति सूर्यप्रभ है। जिसके रूप के ध्यान में सुरङ्गनाओं को रात में नींद नहीं आती ॥२९६॥ हम लोगों को तो यह दुःख हो रहा है कि जब तू वहाँ होगी और हम यहाँ ? उस सुन्दर पति को पाकर तू हमें भूल जायगी' ॥२९७॥ २८

२९८ कथासरित्सागर

२९८ कथासरित्सागर एतन्महल्लिका तासां मुखाच्छ्रुत्वा जगाद सा। क्वचित् स दृष्टो युष्माभिर्मनस्तस्मिन् गतं न वः ॥२९८॥ तच्छ्रुत्वा तामवोचँस्ता हर्म्यात् सोऽस्माभिरीक्षितः। का न सा स्त्री मनो यस्या न स दृष्टो हरेदिति ॥२९९॥ ततः साप्यवदत्तर्हि सातं वक्ष्याम्यहं सखीः। युष्मानप्यभिशस्तस्मै दापयिष्याम्यमूर्यथा ॥३००॥ इत्यमन्योऽन्यविरहो न स्यान्नः सहवासतः। इति ब्रुवाणां कन्यास्ताः सम्भ्रान्ताः समभाषिरन् ॥३०१॥ सखि मैवं कृथा नैतद्युक्तमेषा त्रपा हि नः। एवमुक्तवतीरेका सा जगादासुरेन्द्रजा ॥३०२॥ किमयुक्तं न तेनैका परिणेयाहमेव हि। तस्मै सर्वेऽपि दास्यन्ति दुहितॄर्दैत्यदानवाः ॥३०३॥ अष्टाश्च राजतनयास्तस्योदूढा भुवि स्थिताः। परिणेष्यति चत्वारिंशत्स विद्याधरकन्यकाः ॥३०४॥ तन्मध्ये परिणीतासु युष्मासु मम का क्षतिः। सुखं प्रत्युत वत्स्यामो वयं सख्यः परस्परम् ॥३०५॥ अन्याभिस्तु विरुद्धाभिः कस्ताभिः संस्तवो मम। युष्माकं च त्रपा कात्र सर्वमेतत् करोम्यहम् ॥३०६॥ इति तासां कथा यावद्वर्त्तते त्वद्गतात्मनाम्। तावत्ततोऽहं निर्गत्य स्मर तत्पार्श्वमागतः ॥३०७॥ एतत् प्रहस्तस्य मुखाच्छ्रुत्वा सूर्यप्रभोऽत्र सः। अनिद्र एव शयनं तां निशामनयन्मुदा ॥३०८॥ प्रातः सह सुनीथेन मयेन सचिवैश्च सः। असुराधिपतिं द्रष्टुं प्रह्लादं तत्सभां ययौ ॥३०९॥ सुनीथं तत्र स प्राह प्रह्लादो दर्शितानरः। सुतां सूर्यप्रभायाहं ददाम्यस्मै महल्लिकाम् ॥३१०॥ अस्य हि प्राघुणातिथ्यं कार्यं मे तच्च च प्रियम्। एतत्प्रह्लादवचनं सुनीथोऽभिननन्द सः ॥३११॥ ततो वेदीं समारोप्य मध्यज्वलितपावकाम्। रत्नमालाभ्राजितोदग्ररत्नस्तम्भावभासिताम् ॥३१२॥

अष्टम लम्बक २९९

अष्टम लम्बक २९९ सखियों की बातें सुनकर महल्लिका बोली—'क्या तुमलोगों ने उसे देखा है और क्या तुम्हारा मन उस पर आया है ? यह सुनकर वे सब बोलीं—'हाँ उस नयन से हम लोगों ने देखा है। कौन ऐसी स्त्री है जिसका मन उसे देखकर हाथ से न निकल जाता हो ॥२९८ २९९॥ तब महल्लिका उनसे कहने लगी— यदि ऐसी बात है, तो मैं पिता से कहूँगी कि वह तुम लोगों को भी उसके लिए दे दे। इससे तुम लोगों के साथ मेरा वियोग भी न होगा और हम लोगों का सहवास भी बना रहेगा। ऐसा कहती हुई महल्लिका से घबराई हुई सखियां बोलीं—'नहीं सखि ऐसा न करना। यह ठीक नहीं। इससे हम लोगों को लज्जा है। ऐसा कहती हुई सखियों से असुरराज की कन्या फिर बोली—॥३०-३२॥ 'इसमें अनुचित क्या है? क्या उसे एकमात्र मुझसे ही विवाह करना है ? उसे सभी दैत्यों और दानवों के राजा अपनी अपनी कन्याएँ देंगे और भी अनेक राजाओं की विवाहित कन्याएँ मर्त्यलोक में हैं तथा बहुत-सी विद्याधर-कन्याओं से भी वह दग्गी विवाह करेगा ॥३ ३ ३ ४॥ उनके बीच तुम भी यदि उससे विवाहित हो जाओगी तो मेरी क्या हानि है, बल्कि हम सब सखियाँ मिलकर आनन्द के साथ रहेंगी। तुम लोगों को लज्जा क्यों है यह सब तो मैं कहूँगी ॥३ ५ ३ ६॥ तुम पर आसक्त चित्तवाली उसकी जब यह स्वतन्त्र बातचीत हो रही थी तब मैं उसी अदृश्य रूप में तुम्हारे पास चला आया ॥३७॥ प्रहस्त के मुख से यह सब समाचार सुनकर सूर्यप्रभ ने शय्या पर जागते-जागते ही रात बिताई ॥३८॥ प्रातः काल ही सुनीथ मय और सब मन्त्रियों के साथ सूर्यप्रभ असुरराज प्रह्लाद से मिलने के लिए उसकी सभा में गया ॥३९॥ तब दैत्यराज प्रह्लाद ने आदर के साथ सुनीथ से कहा—'मैं अपनी कन्या महल्लिका को इस सूर्यप्रभ के लिए देता हूँ ॥४१ ॥ क्योंकि इसका भी आतिथ्य-सत्कार और तुम्हारा भी प्रिय मुझे करना है।' यह सुनकर सुनीथ ने प्रह्लाद की बात का सादर समर्थन किया ॥४११॥ तदनन्तर, अपने प्रकाश से रत्न-स्तम्भो की कान्ति बढ़ाती हुई मध्य में जलती हुई विवाह- वेदी पर सूर्यप्रभ को बैठाकर प्रह्लाद ने उसे अपनी कन्या महल्लिका दे दी ॥४१२ ४१३॥

महल्लिकां तां स्वसुतां प्रादात् सूर्यप्रभाय सः। प्रह्लादात्सुरसाम्राज्यसमृद्धिमिवविभूतिभिः ॥३१३॥ ददौ सप्तलराधीशः स दुहित्रे वराय च। त्रिदशावजयानीतान् सुमेरुशिखरोपमान् ॥३१४॥ तात ता अपि दत्स्वस्मै सखीर्मे द्वादश प्रियाः। एव महल्लिका स्वैरं प्रह्लादं सा तदाब्रवीत् ॥३१५॥ पुत्रि मद्भ्रातृषीमास्तास्तेन बन्दीकृता यतः। मम दातुं न युज्यन्ते इति सोऽपि जगाद ताम् ॥३१६॥ कृतोद्वाहोत्सवश्चास्मिन् याते सूर्यप्रभो दिने। विवेश वासकं नक्तं स महल्लिकया सह ॥३१७॥ सर्वकामोपचाराढ्यं तत्र च सुरतोत्सवम्। अनया समन.प्रीतिसौख्यं सोऽनुबभूव च ॥३१८॥ प्रातर्गतं च प्रह्लादं सभां तस्मिन् सहानुगे। अभीलो दानवाधीशः प्रह्लादादीनभाषत ॥३१९॥ अद्य युष्माभिरखिलैरागन्तव्यं गृहे मम। तत्रातिथ्यं यतः सूर्यप्रभस्यास्य करोम्यहम् ॥३२०॥ सुतां कसावतीं तस्मै ददामि यदि वा हितम्। एतत्तद्वचनं सर्वे तथेति प्रतिपेदिरे ॥३२१॥ ततो द्वितीयं पातालमेतस्मिन्नेव क्षणे च ते। सर्वे जग्मुः समं सूर्यप्रभेण समयादिना ॥३२२॥ तत्राभीलो ददौ तस्मै सुतां सूर्यप्रभाय ताम्। कसावतीं प्रप्रियया दत्तारमानमपि स्वयम् ॥३२३॥ कृत्वा विवाहं प्रह्लादगृहे भुक्त्वासुरान्वितः। निन्ये भोगापचारेण दिनं सूर्यप्रभाय तत् ॥३२४॥ द्वितीयेऽह्नि तथैवैतान् कुराहाख्योऽसुरेश्वरः। निमन्त्र्य सर्वाननयत् पञ्चमं स्वरसातलम् ॥३२५॥ तत्र सूर्यप्रभाय स्वां नाम्ना च कुमुदावलीम्। प्रादादुपगतातिथ्यहृतार्विधियदारमजाम् ॥३२६॥ तत्र सर्वे गमनरतभोगैर्नीत्वा दिनं च तत्। यागतं कुमुदावत्या भेव सूर्यप्रभा निशि ॥३२७॥

अष्टम लम्बक १०१

अष्टम लम्बक १०१ और, देवताओं से जीतकर लाए हुए रत्न और महामूल्य मणियों के शिखरों के ढेर उस कन्या और जामाता को दहेज में प्रदान किये ॥११३-११४॥ तब महस्त्विका ने पिता से स्वतन्त्रतापूर्वक कहा— 'पिताजी मेरी उन बारह सखियों को भी इन्हें दे दो' ॥११५॥ तब प्रह्लाद ने कहा— 'बेटी वे कन्याएँ मेरे भाई के द्वारा अपहरण करके बन्दिनी बनाई गई हैं, इसलिए वे उसी के आधीन हैं। अतः, उनमें से किसी का मेरा दान करना उचित नहीं है ॥११६॥ विवाहोत्सव सम्पन्न होने के पश्चात् दिन व्यतीत होने पर (रात्रि में) सूर्यप्रभ महस्त्विका के साथ शयनागार में गया और विविध हास-विलास तथा काम-भोग के साथ रात्रि व्यतीत की ॥११७-११८॥ दूसरे दिन प्रातःकाल अपने सभा के साथ प्रह्लाद के सभा में पधारने पर अभीक नामक दानवराज ने उनसे कहा—॥११९॥ 'आज आप सब लोगों को मेरे घर पर पधारना चाहिए क्योंकि मैं वहाँ राजा सूर्यप्रभ का आतिथ्य-सत्कार करूँगा ॥१२०॥ यदि आप लोग उचित समझें तो मैं अपनी कन्या कलावती को भी उसे दूँ'। उसके इस प्रस्ताव को सभी ने 'ठीक है, कहकर स्वीकार कर लिया और सभी उठकर मय-सुनीथ और सूर्यप्रभ के साथ दूसरे पाताल में गये ॥१२१-१२२॥ वहाँ पर राजा अभीक ने अपनी कन्या कलावती का सूर्यप्रभ के साथ विधिपूर्वक पाणिग्रहण करा दिया ॥१२३॥ तदनन्तर, सभी असुरों के सहित सूर्यप्रभ ने प्रह्लाद के घर में भोजन करके विविध भोगों के साथ दिन व्यतीत किया ॥१२४॥ तीसरे दिन इसी प्रकार दुष्टारोह नामक असुरराज ने अपने पाँचवें रसातल में सभी लोगों को निमंत्रित किया ॥१२५॥ और उसने अपनी कुमुद्वती नाम की कन्या को औरों के समान विधिपूर्वक सूर्यप्रभ को दान कर दिया ॥१२६॥ तदनन्तर सूर्यप्रभ मित्र-मंडल के साथ विविध सुखों के भोग में दिन बिताकर रात को कुमुद्वती के शयन-गृह में गया ॥१२७॥

६२ कथासरित्सागर

६२ कथासरित्सागर तत्र त्रिलोकसुन्दर्या नवसङ्गमसोत्कया। स स्निग्धमुग्धया साक तया रात्रिमुवास ताम् ॥१२८॥ प्रातश्च सन्तुष्टच्छेन प्रह्लादप्रमुखैर्वृतः । निमन्त्र्य सप्तमं निन्ये पाताल स स्वमन्दिरम् ॥१२९॥ तत्रासुरपति सोऽस्मै सुतां नाम्ना मनोवतीम् । ददौ सरत्नाभरणां तप्तजाम्बूनदद्युतिम् ॥१३०॥ तत सूर्यप्रभ सोऽत्र नीत्वाधिकसुख दिनम् । मनोवतीनवाश्लेषसुखिनीमनयन्निशाम् ॥१३१॥ अपरेद्युश्च स सर्वयुक्त कृतनिमन्त्रणः । पातालमनयत् षष्ठ स्व सुमायो सुराधिपः ॥१३२॥ तत्र सोऽपि ददौ तस्मै सुभद्रां नाम कन्यकाम् । दूर्वास्तश्यामलाङ्गीं मूर्ति पाञ्चशरीमिव ॥१३३॥ तया सुरतसंभोगयोग्या श्यामयात्र सः। सहासीत्तदह सूर्यप्रभ पूर्णन्दुवक्त्रया ॥१३४॥ अन्येद्युश्च बली राजा तद्वदेव निनाय तम्। सूर्यप्रभ स्वपाताल तृतीय सोऽसुरानुग ॥१३५॥ सोऽपि तत्र सुतां तस्मै सुन्दरी नाम दत्तवान् । बालप्रवालसच्छायां माधवीमिव मञ्जरीम् ॥१३६॥ स्त्रीरत्नेन समं तेन रेमे सूर्यप्रभोऽत्र सः। सुरञ्जितसतद्दिवस दिव्यभोगविभूषितम् ॥१३७॥ अपरेऽह्नि मय सोऽपि राजपुत्रं तथैव तम्। चतुर्थपातालगतं भूयोऽनैषीत् स्वमन्दिरम् ॥१३८॥ विचित्ररत्नप्रासाद निजमायाविनिर्मितम् । नव नवमिवाभासमानं लक्ष्म्या प्रतिदणम् ॥१३९॥ तत्र सोऽपि ददौ तस्मै सुमायाख्यां निजां सुताम्। जगदाश्चर्यरूपां स्वां शक्तिं मूर्त्तिमतीमिव ॥१४०॥ मानुषत्वाच्च तस्मै तां मैवादेयाममन्यत । सोऽपि रेमे तया साकमत्र सूर्यप्रभ कृती ॥१४१॥ विद्याविभक्तदेहोऽथ सर्वाभिर्युगपत् सह। अरंस्तासुरकन्याभिस्ताभि रह नृपात्मज ॥१४२॥

अष्टम लम्बक ३३

अष्टम लम्बक ३३ वहाँ उसने नव संगम में उत्कंठित स्निग्ध और मुग्ध उस त्रैलोक्यसुन्दरी कुमुद्वती के साथ विनोद-वार्ता में रात बिताई ॥१२८॥ प्रातःकाल ही तन्तुच्छ नामक सातवें पाताल के राजा ने प्रह्लाद आदि को सादर निमन्त्रित किया और वह निमन्त्रण देकर सबको अपने घर ले गया ॥१२९॥ वहाँ पर तन्तुच्छ ने कुन्दन-सी गौरवर्ण रत्नालंकारों से अलंकृत अपनी सुन्दरी कन्या मनोवती सूर्यप्रभ को प्रदान की ॥१३० ॥ सूर्यप्रभ ने अत्यन्त सुखद उस दिन को बिता कर मनोवती के साथ नवीन आलिंगन से मधुर रात्रि भी व्यतीत की ॥१३१॥ दूसरे दिन उसी प्रकार सबको निमन्त्रण देकर सुमाय नामक असुरराज सबको अपने छठे पाताल में ले गया ॥१३२॥ वहाँ पर उसने भी धूप के समान श्याम रंगवाली काम की सजीव मूर्ति-सी सुभद्रा नाम की कन्या सूर्यप्रभ को प्रदान की ॥१३३॥ और सूर्यप्रभ भी उस दिन उसी चन्द्रवदनी षोडशी श्यामा के साथ रहा ॥१३४॥ उसके दूसरे दिन राजा बली सूर्यप्रभ को अपने तीसरे पाताल में ले गया और नये मूंगे के समान रंगवाली वासन्ती लता के समान यौवन से भरी सुन्दरी नाम की कन्या उसे प्रदान की। सूर्यप्रभ ने दिव्य भोगों से भरे हुए उस लोक में सुन्दरी के विनोद में दिन व्यतीत किया ॥१३५-१३७॥ दूसरे दिन चौथे पाताल में गये हुए राजकुमार सूर्यप्रभ को मयासुर फिर अपने घर ले गया ॥१३८॥ उसके लोक में उसकी माया से रत्नों के विचित्र महल बने हुए थे और प्रतिक्षण उनकी नई-नई झिलमिल झलक दीख रही थी ॥१३९॥ मय ने भी वहाँ पर जगत् के लिए आश्चर्यजनक रूपवाली और मूर्तिमयी शक्ति के समान अपनी सुमाया नाम की कन्या उसे प्रदान की ॥१४० ॥ सूर्यप्रभ के मनुष्य होने के कारण उसे कन्या देना मय ने अनुचित नहीं समझा। वह तरुण सूर्यप्रभ उसके (सुमाया के) साथ सुख-विलास करने लगा ॥१४१॥ वह राजा अपनी विद्या के प्रभाव से अनेक देह धारण करके सभी असुर-कन्याओं के साथ एक ही समय में पृथक्-पृथक् रहने लगा ॥१४२॥

३४ कथासरित्सागर

३४ कथासरित्सागर तात्त्विकेन च देहेन भजते स्म स भूयसा। महल्लिकां प्रियतमां प्रह्लादासुरकन्यकाम् ॥३४३॥ एकदा च निशि स्वैरं स्थितस्तां स महल्लिकाम्। एवं सूर्यप्रभोऽपृच्छदभिजातां कथान्तरे ॥३४४॥ प्रिये रात्रौ सहायाते ये द्वे सख्यौ तदा तव। ते कुतस्त्ये न पश्यामि किं च ते क्व गते इति ॥३४५॥ ततो महल्लिकाऽवादीत् सुष्ट्वहं स्मारिता त्वया। ते न द्वे एव ताः सन्ति वयस्या द्वादशेह मे ॥३४६॥ मषितुम्बेण च स्वर्गान्नीत्वा अपहृत्य ताः। एकाऽमृतप्रभा नाम द्वितीया केशिनी तथा ॥३४७॥ पर्वतस्य मुनेरेते तनये शुभलक्षणे। कालिन्दीति तृतीया च चतुर्थी मद्रिकेति च ॥३४८॥ तथा दर्पक्रमालेति पञ्चमी चारुलोचना। एता महामुनेस्तिस्रो देवलस्यात्मसम्भवाः ॥३४९॥ षष्ठी सौदामनी नाम सप्तमी चोज्ज्वलाभिधा। एत हाहाभिधानस्य गन्धर्वस्य सुते उभे ॥३५०॥ अष्टमी पीवरा नाम गन्धर्वस्य हुहोः सुता। नवम्यब्जमिका नाम भासस्य दुहिता विभोः ॥३५१॥ पिक्कसाच्च गणाज्जाता दशमी स्रंसरावली। एकादशी मालिनीति नाम्ना कम्बलनन्दिनी ॥३५२॥ नाम्ना मन्दारमालेति द्वादशी वसुकन्यका। अप्सरःसु समुत्पन्ना सर्वा दिव्यस्त्रियस्तु ताः ॥३५३॥ पातालं प्रथमं नीतास्ताञ्चोद्वाहे कृते मम। तुभ्यं मया च देयास्तास्तद्युक्ता स्यां सदा यथा ॥३५४॥ प्रतिज्ञातं मया चैतत्तासां स्नेहो हि तासु मे। तातोऽप्युक्तो मया तन न दत्ता द्वावपेक्षया ॥३५५॥ एतच्छ्रुत्वा गर्वैदक्षस्तां स सूर्यप्रभोऽब्रवीत्। प्रिय महानुभावा त्वमहं पुर्यां पश्च त्विदम् ॥३५६॥ १ ततस्ताः।

अष्टम लम्बक ॥ ५

अष्टम लम्बक ॥ ५ किन्तु अगली दरीचे में तो वह अमृतप्रभ प्रह्लाद की कन्या मदिरावती के साथ रहता था ॥३४३॥ एक बार रात्रि के समय बातचीत के प्रसंग में सूर्यप्रभ ने सुशीला मदिरावती से पूछा— प्रिय उस दिन रात में तेरे साथ जो सहेलियाँ आई थीं वे कौन और कहाँ की थीं अब उन्हें मैं नहीं देख रहा हूँ। वे कहाँ गईं ॥३४४-३४५॥ यह सुनकर मदिरावती ने कहा—अच्छा किया मुझे स्मरण करा दिया। वे दो ही नहीं अपितु वे मेरी बारह रूपवाली सहेलियाँ हैं ॥३४६॥ उन्हें मेरे चाचा स्वयं में आहरण करके लाये थे। उनमें एक अमृतप्रभा और दूसरी यशिनी ये दोनों पर्वत मुनि की कन्याएँ हैं। तीसरी कान्ति और चौथी मूर्ति या तथा पाँचवीं गन्धर्व मलयना- वानी सत्यभामा ये तीनों महामुनि देवल की कन्याएँ हैं। छठी सौदामिनी नाम्नी उग्रतपस् व पांता हाहा नाम के गन्धर्व की कन्याएँ हैं। आठवीं पीवरा हूहू नाम के गन्धर्व की कन्या है। नवीं पान्त की मंजिष्ठा नाम की कन्या है ॥३४७-३५१॥ इनमें से उन्मत्त पतङ्गी ये दो रूपवती हैं। ग्यारहवीं कम्बल की कन्या भामिनी है और महोरगा नाम की बारहवीं कन्या चक्षु की है जो नागराज से उत्पन्न हुई है। ये सभी मेरे विवाह के समय मेरे रथागार में ले आई गईं। उन्हें मैं तुम्हारे लिए दूँगी जिससे मैं उनके साथ रहकर सदा सुखी रह सकूँ ॥३५२ -३५४॥ दैव उन सबों सदृश स्त्री की है और पुरुष रूप भी इसी प्रकार का है। यह आनन्द दे के लिये त्रिलोकी में भी कहा था किन्तु उन्होंने भाई की उपेक्षा करके अपना इस प्रकार [L20: तिरस्कार किया ॥ यह सुनकर सूर्यप्रभ ने कहा—प्रिये वे सब कहाँ हैं? मुझे तुम दिखलाओ। मदिरावती ने वैसा ही किया ॥

६६ कथासरित्सागर

६६ कथासरित्सागर एवं सूर्यप्रभेणोक्ता रुषाऽवोचन्महल्लिका। मत्सपक्षं बहस्त्वन्या मद्व्यवस्थास्तु नेच्छसि ॥३५७॥ यामिवियुक्ता रज्येयं नाहमेकमपि क्षणम्। इत्युक्तस्तु तया सूर्यप्रभस्तुष्ट्यानमस्त तत्॥३५८॥ ततस्तत्रैव पाताल नीत्वैव प्रथमं स्वया। प्रह्लादसुतया तस्मै प्रदत्ता द्वादशापि ताः॥३५९॥ अथामृतप्रभामुख्यास्ताः स सूर्यप्रभ क्रमात्। परिणीयोपभुङ्क्ते स्म तस्या दिव्याङ्गना निशि॥३६०॥ प्रातश्च ताः प्रभासेन नाययित्वा रसातलम्। चतुर्थं स्थापयामास प्रच्छन्नाः पृष्ट्वा महल्लिकाम् ॥३६१॥ स्वयं चालक्षितः साकं तया तत्रैव सोऽगमत्। सभाजनाय च प्राग्बत् प्रह्लादस्य सभां मयौ ॥३६२॥ तत्रासुरेन्द्रो वक्ति स्म तं सुनीथ मयं च सः। यात सर्वे दितिदन् द्रष्टुं वेम्बायुभे इति॥३६३॥ तथेत्यथ रसातलात् सपदि निर्गतास्ते ततो। यथास्वमसुरैः समं मयसुनीथसूर्यप्रभाः॥ विमानमनुचिन्तितं तदधिरुह्य भूतासनं। सुमेरुगिरिसानुगं प्रययुरश्रमं काश्यपम् ॥३६४॥ तत्र ते दितिवनू सह स्थिते सावरैर्मुनिजनैरनिवेदिताः। अभ्युपेत्य ववृधुः क्रमण ते पादयोश्च शिरसा ववन्दिरे॥३६५॥ ते च तानसुरमातरावुभे सानुगान् समवलोक्य सादरे। साधु मूर्द्धिन परिचुम्ब्य संमदावाशिषोऽनुपदमूचतुर्मयम् ॥३६६॥ प्राप्तजीवितममुं तवात्मजं वीक्ष्य पुत्रक सुनीथमावयोः। अद्युरद्य सफलत्वमागतं त्वां च पुण्यकृतमेव मन्महे ॥३६७॥ सुमुण्डीकं धत्त कृतिनमिह सूर्यप्रभतया पुनर्जातं विख्यातुं स्थिरमसाधारणगुणम्। चितं भाविध्येयः प्रथमपिपुनैर्लक्षणगुणै- र्विलोक्यान्वस्तोपात् स्फुटमिह नमावः स्ववपुषि॥३६८॥ गच्छीदामुत्तिष्ठत यात वत्साः प्रजापतिं द्रष्टुमिहार्यपुत्रम्। तद्दर्शनाद्धो भविताऽर्थसिद्धिः कामं च वस्तद्वचनं शिवाय ॥३६९॥

सैंथम लम्बक १०७

सैंथम लम्बक १०७ इस प्रकार सूर्यप्रभ के कहने पर महस्तिका क्रोध से बोली—'मेरे ही सामने प्रतिदिन नई-नई स्त्रियों से विवाह कर रहे हो और मेरी सहेलियों को नहीं चाहते ? ॥३५७॥ मैं उनके वियोग में एक क्षण भी मनोरंजन नहीं कर सकती ।—महस्तिका के ऐसा कहने पर सूर्यप्रभ ने उसकी बात मान ली ॥३५८॥ तब प्रह्लाद की पुत्री ने उसे पहले पाताल में से लाकर उन सब कन्याओं को क्रमशः सौंप दे दिया। सूर्यप्रभ ने भी उन विद्याधराओं का रात्रियों में क्रमशः उपभोग करना प्रारम्भ किया ॥३५९-३६०॥ प्रातः काल ही सूर्यप्रभ ने महस्तिका से पूछकर प्रभास द्वारा उन कन्याओं को रसातल में पहुँचाकर छिपा दिया ॥३६१॥ वह स्वयं भी अदृश्य होकर महस्तिका के साथ वहाँ जाता था। एक बार सभा में प्रह्लाद ने मय एवं सुनीथ से कहा कि तुम सब दिति और दनु माताओं का दर्शन करने के लिए जाओ ॥३६२-३६३॥ 'जो आज्ञा' कहकर मय सुनीथ और सूर्यप्रभ तीनों रसातल से निकलकर यथासम्भव असुरों के साथ ध्यान करते ही उपस्थित भूतासन विमान पर बैठकर, सुमेरु शिखर पर स्थित कश्यप के आश्रम को गये ॥३६४॥ वहाँ पर आदर के साथ ऋषियों द्वारा सूचित करने पर वे लोग एक साथ बैठी हुई दिति और दनु को देखकर प्रसन्न हुए और क्रमशः वे लोग उनके चरणों पर मस्तक रखकर प्रणाम करने लगे ॥३६५॥ उन दोनों असुरों और दानवों की माताओं ने अपने साथियों के साथ आये हुए पुत्र मय को देखकर आदर प्रकट किया और प्रसन्नतापूर्वक आँसू बहाते हुए आशीर्वाद दिया ॥३६६॥ और कहा—पुत्र पुनर्जीवित सुनीथ के साथ तुम्हें देखकर हम दोनों को अपार आनन्द हुआ। हमारे नेत्र सफल हुए और हम तुम्हें पुण्यवान् (धन्य) समझती हैं और सूर्यप्रभ के रूप में दिव्य तेज धारी असाधारण गुणों से युक्त और भावी कल्याण से पूर्ण सुमुण्डीक को देखकर सन्तोष के कारण हम लोगों का आनन्द शरीर में नहीं समा रहा है ॥३६७-३६८॥ हे पुत्रो, अब तुम शीघ्र उठो और आर्यपुत्र कश्यप प्रजापति का दर्शन करने जाओ। उनके दर्शन से तुम्हारी कार्यसिद्धि होगी और उनकी बातों का मानना तुम्हारे कल्याण के लिए होगा' ॥३६९॥

इति ताभ्यामादिष्टा देवीभ्यां ते हर्षेण गत्वा तम्। कश्यपमुनिं मयाद्या ददृशुर्दिव्याश्रमे तत्र॥३७०॥ द्रुतशुद्धहाटकाभं तेजोमयमाधमे च देवानाम्। ज्वालाकपिशजटाधरमनलसमानं दुराधर्षम्॥३७१॥ उपगम्य च तस्य पादयोस्ते निपतन्ति स्म सहानुगाः क्रमेण। अथ सोऽपि मुहुः कृतोचिताशीः परितोषादुपवेश्य तानुवाच॥३७२॥ आनन्दः परमो ममैष यदमी दृष्टाः स्थ सर्वे सुताः। श्लाघ्यस्त्वं मय सत्पथादप्रसितो यः सर्वविद्यास्पदम्। धन्यस्त्वं च सुनीथ येन गतमप्याप्तं पुनर्जीवितं। त्वं सूर्यप्रभ पुण्यवांश्च भविता यः खचराणां पतिः॥३७३॥ तदयं पथि वर्तितव्यमधुना योऽक्ष्यमस्मद्गुरोः। भोक्ष्यध्ये सततं सुखानि परमामासाद्य येन धियम्। नैव स्याच्च पुरा यथा परिभवो भूयः परभ्योऽत्र वो। धर्मातिक्रमिणो सुरा हि मुरजिच्चक्रस्य याता वधम्॥३७४॥ ये चासुरा देवहताः सुनीथ मर्त्यप्रवीरास्त इहावतीर्णाः। योऽभूत्सुमुण्डीक इहानुजस्ते सूर्यप्रभः सैष किसाद्य जातः॥३७५॥ अन्येऽपि तेऽमी असुरा वयस्या अस्यैव जाताः खलु बान्धवाश्च। यः शम्बराख्यश्च महासुरोऽभूत्सोऽस्य जातः सचिवः प्रहस्तः॥३७६॥ यश्चासुरोऽभूत्त्रिशिराः स जातः सिद्धार्थनामा सचिवो मयस्य। वातापिरित्यास च दानवो यः प्रज्ञाढ्यनामास्य स एव मन्त्री॥३७७॥ उलूकनामा दनुजश्च योऽभूत्सोऽस्य वयस्योऽस्य धूम्रकेतूरास्य। योऽन्य वयस्योऽस्य च वीतभीतिः स कालनामाप्यभवत्सुरातिः॥३७८॥ यश्चैष भासः सचिवोऽस्य सोऽस्य दैत्योऽवतीर्णो द्युपबर्हनामा। योऽस्य प्रभासश्च स एष दैत्यो वत्सावतीर्णः प्रबलप्रभिधानः॥३७९॥ महात्मना रत्नमयेन येन देवेर्विपक्षैरपि याचितेन। कृत्वा शरीरं यखद्योऽवतीर्णं रत्नानि जातान्यस्थीनि यस्मात्॥३८०॥ ततोपतच्चण्डिकयास्य देव्या वरोऽप्यवेहानुगतः स दत्तः। यन प्रभासोऽद्य स एष जातो महाबलो दुःसहहो रिपूणाम्॥३८१॥ यौ दानवाभूतां पूर्वं सुन्दोपसुन्दनामानौ। तावेतो सर्वदमनमयस्कूरावस्य मन्त्रिणौ जातौ॥३८२॥

अष्टम लम्बक १०९

अष्टम लम्बक १०९ इस प्रकार, माताओं के आदेश को पाकर मय आदि सभी ने उसी प्रकार दिव्य आश्रम में जाकर कश्यप प्रजापति के दर्शन किये ॥१७० ॥ मुनि का रंग पिघले हुए विशुद्ध सोने के समान था उनका मुख दिव्य दीप्ति से चमकता था। अग्नि-ज्वाला के समान पीत वर्ण की उनकी जटाएँ थीं और वे स्वयं भी अग्नि के समान दुर्धर्ष थे ॥१७१॥ वे सब उनके समीप जाकर क्रमशः उनके चरणों में गिर पड़े। तदनन्तर मुनि भी उन्हें बार-बार आशीर्वाद देते हुए सन्तोष और प्रसन्नता से बोले- ॥१७२॥ 'मुझे अत्यन्त आनन्द हो रहा है कि मैंने तुम सब सन्तानों को आज देखा। हे मय तू प्रशंसनीय है। तू सभी विद्याओं का जानकार है और सत्पथ से विचलित नहीं हुआ है। सुनीथ तू भी धन्य है कि तूने गये हुए जीवन को पुनः प्राप्त किया। हे सूर्यप्रभ तू भी धन्य है कि आकाशचारी विद्याधरों का चक्रवर्ती बनेगा ॥१७३॥ तुम लोगों को धार्मिक मार्ग का अनुसरण करना चाहिए और हमारी बातों को समझना चाहिए। इससे तुम अनुपम ऐश्वर्य प्राप्त करके शाश्वत सुख प्राप्त करोगे और शत्रुओं से पहले के समान पराजय भी तुम्हारा न होगा। धर्म का उल्लंघन करनेवाले असुर विष्णु के चक्र के वशीभूत हुए थे ॥१७४॥ हे सुनीथ वे देवताओं से मारे गये असुर ही मानव-शरीर लेकर पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए हैं। जो तुम्हारा छोटा भाई सुमुण्डीक था वह अब सूर्यप्रभ के रूप में अवतीर्ण हुआ है ॥१७५॥ और भी इसके मित्र असुर इस जन्म में इसके बन्धु-बान्धव हुए हैं जो शम्बर नाम का महाअसुर था वह प्रहस्त नाम से सूर्यप्रभ का मन्त्री हुआ है ॥१७६॥ त्रिशिरा नाम का जो असुर था वह संवेका सिद्धार्थ नाम का मन्त्री हुआ है। वातापि नाम का जो असुर था वह प्रकृष्टय नाम से इसका मन्त्री हुआ है ॥१७७॥ उलूक नाम का दानव ही इसका धुर्मन्दर नाम का मित्र हुआ है। वीतिभीति नाम का इसका मित्र पहले काल नामक दानव था और यह भास नाम का इसका मन्त्री भी वृषपर्वा नाम का दानव था और प्रभास नाम का मित्र पहले प्रबल नामक दैत्य था। इस रत्नमय महासत्त्वशाली ने देवताओं की प्रार्थना की उपेक्षा कर अपने शरीर को खण्ड-खण्ड कर अवतार लिया जिससे समस्त प्रकार के रत्न पैदा हुए। इससे संतुष्ट चण्डिका ने इसे दूसरे शरीर के अनुकूल कर दिया जिससे यह अपने शत्रुओं के लिए महा दुःसह हो गया ॥१७८-१८१॥ पूर्वजन्म में सुन्द और उपसुन्द नाम के जो दानव थे वे अब सर्वदमन और भयंकर नाम से उसके मन्त्री और मित्र हुए हैं ॥१८२॥