कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
नवम लम्बक ५१५
नवम लम्बक ५१५ राजा हरिवर, अपने नाम से ही प्रसिद्ध हरिवर नगर, में उस परम सुन्दरी दिव्य रमणी अनंगप्रभा के साथ विषय सुख प्राप्त करता हुआ रहने लगा॥२१५॥ वह अनंगप्रभा भी राजा के प्रति अनुराग रखती हुई वहीं रहने लगी किन्तु वह अपने प्रभाव को भूलकर शाप से मोहित हो गई थी॥२१६॥ इसी बीच उस पर्वत पर सोकर उठे हुए जीवदत्त ने केवल अनंगप्रभा को ही नहीं देखा यह नहीं प्रत्युत अपनी तलवार को भी उसने नहीं देखा ॥२१७॥ वह अनंगप्रभा कहाँ है वह तलवार भी कहाँ गई ? क्या अनंगप्रभा तलवार लेकर चली गई या उन दोनों को ही कोई तीसरा ले गया ? ॥२१८॥ इस प्रकार, उन्मत्त के समान विविध प्रकार की शंकाएँ करता हुआ वह जीवदत्त कामाग्नि से जलता हुआ तीन दिनों तक सारे पर्वत पर उसे ढूँढ़ता रहा॥२१९॥ तब पर्वत से उतरकर दस दिनों तक उसके नीचे वन में उसे ढूंढते हुए वह घूमता रहा किन्तु कहीं उसने उसके चरण का चिह्न भी न पाया॥२२ ॥ 'हे दुष्ट दैव अत्यन्त कठिनाई से दी हुई तूने खड्गसिद्धि के साथ मेरी प्राणप्यारी अनंगप्रभा को भी हर लिया' ॥२२१॥ इस प्रकार, रोते-कलपते और निराहार भ्रमण करते हुए उसे एक ग्राम मिला जहाँ वह एक सम्पन्न ब्राह्मण के घर में प्रविष्ट किया ॥२२२॥ उस घर में सुन्दरी और अच्छे वस्त्र पहने हुए गृहिणी प्रियदत्ता ने उसे आसन देकर बैठाया और अपनी दासियों को आज्ञा दी कि शीघ्र ही इस जीवदत्त के चरण धुलाओ। स्त्री के वियोग से निराहार रहते हुए आज इसका तेरहवां दिन है॥२२३-२२४॥ यह सुनकर जीवदत्त मन में सोचने लगा कि क्या अनंगप्रभा यहाँ आई है या यह स्त्री ही कोई योगिनी है॥२२५॥ ऐसा सोचता हुआ धुले हुए पैरोंवाला और उसके दिये हुए भोजन से तृप्त जीवदत्त ने प्रणाम करते हुए बड़ी ही दीनतापूर्वक प्रियदत्ता से पूछा—॥२२६॥ 'हे सदाचारिणी एक तो यह बताओ कि तुम मेरा वृत्तान्त कैसे जानती हो ? और, दूसरा यह बताओ कि मेरी प्रियतमा और तलवार कहाँ है ? ॥२२७॥ यह सुनकर वह पतिव्रता प्रियदत्ता उससे बोली—'पति के सिवा दूसरा पुरुष स्वप्न में भी मेरे चित्त में स्थान नहीं पाता ॥२२८॥ दूसरे पुरुषों को मैं पुत्रों और भाइया के समान समझती हूँ। मेरे घर से कोई भी अतिथि बिना सत्कार प्राप्त किये हुए वापस नहीं जा सकता ॥२२९॥ ६५
५१२ कथासरित्सागर
५१२ कथासरित्सागर स्वनामलाञ्छने तस्मिन् सोऽनङ्गप्रमया तया। सह विषयसुखस्तस्थौ ततो हरिवरो नृप ॥२१५॥ साप्यनङ्गप्रभा तत्रैवासीत्तदनुरागिणी। विस्मृत्य स्व प्रभावं तं सर्वं शापविमोहिता ॥२१६॥ अत्रान्तरे स तत्राद्रौ जीवदत्तो न केवलम्। प्रबुद्धो नैक्षतानङ्गप्रभां यावत् स्वमप्यसिम् ॥२१७॥ क्व साऽनङ्गप्रभा कष्टं क्व स खड्गोऽपि किं नु सम्। ह्रुत्वा गता सा किं वा तौ नीतौ द्वावपि केनचित् ॥२१८॥ इत्युद्भ्रान्तो बहून् कुर्वन् वितर्कान् स दिनत्रयम्। गिरि तं विचिनोति स्म वह्यमानः स्मराग्निना ॥२१९॥ ततोऽवतीर्य चिन्वानो वनानि दिवसान् दश। स बभ्राम न चापश्यत् तस्या पादमपि क्वचित् ॥२२०॥ हा दुर्जनविषे कुब्धात् सा दत्तापि कथ त्वया। खड्गसिद्ध्या सह ह्रुता प्रियानङ्गप्रभा मम ॥२२१॥ इत्याक्रन्दन्निराहारो भ्रमन्नेकमवाप्तवान्। ग्रामं तत्र विवेशैक्रमाढ्य द्विजगृहं च सः ॥२२२॥ गृहिणी तत्र सुभगा सुवस्त्रा चोपवेश्य तम्। आसने प्रियदत्ताख्या स्वचटीं शीघ्रमाविशत् ॥२२३॥ त्वरितं जीवदत्तस्य पादौ क्षालयतास्य हि। निराहारस्य विरहाद्दिनमद्य त्रयोदशम् ॥२२४॥ तच्छ्रुत्वा विस्मितो जीवदत्तोऽन्तर्विममर्श सः। इहानङ्गप्रभा प्राप्ता किं किमेषाथ योगिनी ॥२२५॥ इति ध्यायन् धौतपादो भुक्ततद्दत्तभोजनः। प्रणतः प्रियदत्तां तामरयार्थ्या पृच्छति स्म सः ॥२२६॥ एकं ब्रूहि कथं वेत्सि मद्वृत्तान्तमनिन्दिते। द्वितीयं चापि कथय प्रियासङ्गो क्व मे गतो ॥२२७॥ तच्छ्रुत्वा तमबोधत् सा प्रियदत्ता पतिव्रता। भर्तुरन्यो न मे चित्ते स्वप्नेऽपि कुरुते पदम् ॥२२८॥ पुत्रभ्रातृसमान् यान् पश्यामि पुरुषानहम्। न च मेऽनर्चितो याति कदाचिदतिथिगृहात् ॥२२९॥
नवम लम्बक ५१५
नवम लम्बक ५१५ राजा हरिवर, अपने नाम से ही प्रसिद्ध हरिवर नगर, में उस परम सुन्दरी दिव्य रमणी अनंगप्रभा के साथ दिव्य सुख प्राप्त करता हुआ रहने लगा ॥२१५॥ वह अनंगप्रभा भी राजा के प्रति अनुराग रखती हुई वहीं रहने लगी किन्तु वह अपने प्रभाव को भूलकर आप से मोहित हो गई थी ॥२१६॥ इसी बीच उस पर्वत पर सोकर उठे हुए जीवदत्त ने केवल अनंगप्रभा को ही नहीं देखा यह नहीं प्रत्युत अपनी तलवार को भी उसने नहीं देखा ॥२१७॥ वह अनंगप्रभा कहाँ है वह तलवार भी कहाँ गई ? क्या अनंगप्रभा तलवार लेकर चली गई या उन दोनों को ही कोई तीसरा ले गया ? ॥२१८॥ इस प्रकार, उन्मत्त के समान विविध प्रकार की शंकाएं करता हुआ वह जीवदत्त कामाग्नि से जलता हुआ तीन दिनों तक सारे पर्वत पर उसे ढूंढता रहा ॥२१९॥ तब पर्वत से उतरकर दस दिनों तक उसके नीचे वन में उसे ढूंढते हुए वह घूमता रहा किन्तु कहीं उसने उसके चरण का चिह्न भी न पाया ॥२२ ०॥ 'हे दुष्ट दैव अत्यन्त कठिनाई से दी हुई तूने खड्गसिद्धि के साथ मेरी प्राणप्यारी अनंगप्रभा को भी हर लिया' ॥२२१॥ इस प्रकार, रोते-कलपते और निराहार भ्रमण करते हुए उसे एक ग्राम मिला जहाँ वह एक सम्पन्न ब्राह्मण के घर में प्रवेश किया ॥२२२॥ उस घर में सुन्दरी और अच्छे वस्त्र पहने हुए गृहिणी प्रियदत्ता ने उसे आसन देकर बैठाया और अपनी दासियों को आज्ञा दी कि शीघ्र ही इस जीवदत्त के चरण धुलाओ । स्त्री के वियोग से निराहार रहते हुए आज इसका तेरहवाँ दिन है ॥२२३-२२४॥ यह सुनकर जीवदत्त मन में सोचने लगा कि क्या अनंगप्रभा यहाँ आई है या यह स्त्री ही कोई योगिनी है ॥२२५॥ ऐसा सोचता हुआ धुले हुए पैरोंवाला और उसके दिये हुए भोजन से तृप्त जीवदत्त ने प्रणाम करते हुए बड़ी ही दीनतापूर्वक प्रियदत्ता से पूछा- ॥२२६॥ 'हे सदाचारिणी एक तो यह बताओ कि तुम मेरा वृत्तान्त कैसे जानती हो ? और दूसरा यह बताओ कि मेरी प्रियतमा और तलवार कहाँ है ? ॥२२७॥ यह सुनकर वह पतिव्रता प्रियदत्ता उससे बोली-'पति के सिवा दूसरा पुरुष स्वप्न में भी मेरे चित्त में स्थान नहीं पाता ॥२२८॥ दूसरे पुरुष को मैं पुत्रों और भाइयों के समान समझती हूँ। मेरे घर से कोई भी अतिथि बिना सत्कार प्राप्त किये हुए वापस नहीं जा सकता ॥२२९॥ ६५
५१४ कथासरित्सागर
५१४ कथासरित्सागर सत्प्रभावेण जानामि भूतं भव्यं च भावि च। सा चानङ्गप्रभा नीता राज्ञा हरिवरेण तु॥२३०॥ सुप्ते त्वयि विधियोगात् तन्मार्गगामिना तदा। गीताकृष्टोपयातेन स्वनामपुरवासिना॥२३१॥ सा न शक्या न ते प्राप्तुं स हि राजा महाबलः। सा पुनस्तमपि त्यक्त्वा कुलटान्यत्र यास्यति॥२३२॥ खड्गं च देवी प्रादात्ते सत्प्राप्त्यै तद्विधाय सः। तस्यां हृतायां दिव्यत्वाद्भ्रष्टया एवान्तिकं गतः॥२३३॥ किं न वेत्स्येव तेऽनङ्गप्रभाशापोपवर्णने। स्वप्ने भावि यदादिष्टं तत्कथं विस्मृतं तव॥२३४॥ तदेष भवितव्योऽयं व्यामोहोस्ते वृथैव कः। पापानुबन्धं मुञ्चैनं भूयो भूयोऽतिदुःखदम्॥२३५॥ किं चाधुना तव तया पापयान्यानुरक्तया। मानुषीभूतया ज्ञातस्वद्रोहाद्भ्रष्टविद्यया॥२३६॥ इत्युक्तः स तया साध्व्या त्यक्तानङ्गप्रभास्पृहः। तज्जातखेदविरक्तात्मा जीवदत्तो जगाद ताम्॥२३७॥ शान्तस्त्वद्वचसा मोहः सत्येनाम्बामुना मम। कामं न श्रेयसे कस्य सङ्गमः पुण्यकर्मभिः॥२३८॥ पूर्वपापवशादेतद् समापतितं मम। तत्क्षालनाय यास्यामि तीर्थान्युज्झितमत्सरः॥२३९॥ को मेऽनङ्गप्रभाहर्तोर्वैरेणार्थः परे सह। जितक्रोधेन सर्वं हि जगदेतद्विजीयते॥२४०॥ इति यावत् स वक्त्यत्र तावत्तस्याः पतिर्गृहे। आययो प्रियदत्ताया धार्मिकोऽतिथिवात्सलः॥२४१॥ कृतातिथ्येन तेनाऽपि त्याजितो दुःखमत्र सः। विश्रम्य तीर्थयात्राय प्रायादापृच्छय ताबुभौ॥२४२॥ ततः श्रमण सर्वाणि पृथ्व्यां तीर्थानि सोऽभ्रमत्। विमोढानेककान्तारस्पृष्टो मूलफलाशनः॥२४३॥ भ्राम्यन्तीर्थेष्व तामेव स ययौ विन्ध्यवासिनीम्। तत्र तप स्तपस्तीव्रं निराहारः कुशास्तरे॥२४४॥
नवम लम्बक ५१५
नवम लम्बक ५१५ इसके प्रभाव से ही भूत भविष्य और वर्तमान को मैं जानती हूँ। वही उस अनंगप्रभा को राजा हरिवर ले गया ॥२५०॥ तेरे सोये रहने पर वह राजा हरिवर उसके गान से आकृष्ट होकर उसी मार्ग से आ गया था किन्तु वह दुराचारिणी उसे भी छोड़कर फिर दूसरे के पास चली जायगी ॥२५१ २५२॥ उस खड्ग को देवी ने तुझे उसी की प्राप्ति के लिए दिया था। उसके हरण हो जाने पर वह दिव्य खड्ग फिर देवी के पास ही चला गया ॥२५३॥ और, देवी ने ही अनंगप्रभा के शाप का वर्णन करते हुए स्वप्न में तुझे जो उसका भविष्य बतलाया था वह तू क्यों भूल गया ? ॥२५४॥ तो इस असत्यंवादी बात में तुझे यह मिथ्या मोह क्यों हो रहा है ? तू बार-बार अति दुःख देनेवाले इस पाप के बन्धन को तोड़ दे ॥२५५॥ आर्त, दूसरे पुरुष से प्रेम करनेवाली और मनुष्य बनी हुई तथा तुम्हारे साथ धोखा करने के कारण भ्रष्ट विद्यावाली उस पापिन को पाकर भी तुम क्या करोगे ? ॥२५६॥ उस पतिव्रता द्वारा इस प्रकार समझाये गये जीवदत्त ने अनंगप्रभा की आशा छोड़ दी और उसकी चंचलता से विरक्त होकर वह प्रियव्रता से बोला—॥२५७॥ 'हे माता तेरे इन सत्य वाक्यों से मेरा मोह शान्त हो गया। पुण्यात्माओं का सम्पर्क किसके कल्याण के लिए नहीं होता ? ॥२५८॥ मेरे पूर्वजन्म के पापों के कारण मुझे यह दुःख प्राप्त हुआ। अब उन पापों को धोने के लिए राग-द्वेष हीन होकर मैं तीर्थों की यात्रा करूँगा ॥२५९॥ अनंगप्रभा के कारण दूसरों से विरोध करने में मुझे क्या लाभ है? जिसने क्रोध को जीत लिया उसने सारे संसार को जीत लिया' ॥२६०॥ जीवदत्त के इस प्रकार कहते ही प्रियव्रता का पति वहाँ आ गया जो परम धार्मिक और अतिथियों का प्रेमी था ॥२४१॥ उसने भी जीवदत्त का आतिथ्य करके उसके दुःख को दूर किया। तब जीवदत्त उनके घर में विश्राम करके और उनसे सम्मति लेकर तीर्थयात्रा को चला गया ॥२४२॥ तदनन्तर निर्जन वनों में अनेक कष्टों को सहन करता हुआ और कन्द-मूल फल खाता हुआ वह पृथ्वी के सभी तीर्थों का भ्रमण करने लगा ॥२४३॥ सभी तीर्थों का पर्यटन करने के उपरान्त अन्त में उसी विन्ध्यवासिनी की शरण में आकर निराहार रहकर उसने कुश के आस्तरण पर कठिन तपस्या आरम्भ की ॥२४४॥
तपस्तुष्टा च सा साक्षादुवाचैव तमम्बिका। उत्तिष्ठ तत्र यूयं हि चत्वारो मामका गणाः॥२४५॥ पञ्चचूलश्चतुर्वक्त्रमहोदरमुखास्तथा । त्वं चतुर्थश्च विकटवदनाख्यः क्रमोत्तमः ॥२४६॥ ते यूयं जातु गङ्गाया विहर्तुं पुलिनं गताः। तत्र स्नान्ती च युष्माभिर्दृष्टैका मुनिकन्यका ॥२४७॥ चापलेस्सि कपिञ्जटाख्यस्य मुनेः सुता। प्रार्थ्यते स्म च सर्वैः सा भवद्भिर्मदनातुरैः ॥२४८॥ कन्याहमनपेयातेति तयोक्ते ते त्रयोऽपरे। तूष्णीमासंस्त्वया सा तु हठाद्बाहावगृह्यत ॥२४९॥ क्रन्दति स्म च सा 'तात तात त्रायस्व मा' मिति। तच्छ्रुत्वा निकटस्थोऽत्र स क्रुद्धो मुनिरागमत् ॥२५ ॥ तं दृष्ट्वा सा त्वया मुक्ता ततो युष्मान् शशाप सः। मनुष्ययोनिं पापिष्ठाः सर्वे यातेति तत्क्षणात् ॥२५१॥ प्रार्थितः सोऽथ शापान्तमेव वो मुनिरभ्यधात्। यदानङ्गरतीराजसुता युष्माभिरर्चिता ॥२५२॥ गता विद्याधरं लोकं मोक्ष्याध्वामी तदा त्रयः। त्वं तु विद्याधरीभूतां प्राप्यैतां हारयिष्यसि ॥२५३॥ ततः प्राप्स्यसि विकटवदन व्यसनं महत्। चिराच्च देवीमाराध्य शापादस्माद्विमोक्ष्यसे ॥२५४॥ त्वयास्याश्चापलेखाया हस्तस्पर्शो यतः कृतः। परदारापहारोत्थं पापमस्ति च ते महत् ॥२५५॥ इति ये मद्गणा यूयं शप्तास्तेन महर्षिणा। तेऽद्य जाताः स्थ चत्वारः प्रवीरा दक्षिणापथे ॥२५६॥ पञ्चपट्टिचनामाऽसौ यो तौ खड्गधरश्च यः। सतायस्ते त्रयस्त्वं च चतुर्थो जीवदत्तकः ॥२५७॥ ते च त्रयोऽनङ्गरतौ प्रयातायां निजं पदम्। इहागत्यैव निम्मुक्ता मत्प्रभावेन शापतः ॥२५८॥ त्वया चाराधिताऽस्म्यद्य जातः शापक्षयश्च ते। तन्नानयीं गृहीत्वैनां धारणां स्वतनूं त्यज ॥२५९॥
नवम लम्बक ५१७
नवम लम्बक ५१७ उसके तप से सन्तुष्ट अम्बिका ने प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष रूप में उससे कहा—'उठो बेटा तुम चार मेरे गण हो। तीन तो पंचशूल, चतुर्वक्त्र और महावर हैं और चौथा तुम विकटवदन नाम का है ॥२४५ २४६॥ किसी समय तुम चारों गण विहार के लिए गंगा-तट पर गये। वहाँ कपिसजट नाम के मुनि की कन्या चापलता स्नान करती हुई तुम्हें दीख पड़ी और तुम लोग उसे देखकर काम से व्याकुल हो गये और उसकी इच्छा करने लगे ॥२४७-२४८॥ 'मैं ऋषी कन्या हूँ तुम लोग यहाँ से दूर हटो' उसके ऐसा कहने पर अन्य तीन गण तो चुप रहे किन्तु तुमने बलपूर्वक उसके हाथ पकड़ लिये ॥२४९॥ तब 'हे पिता हे पिता मुझे बचाओ'—इस प्रकार वह चिल्लाने लगी। उसका चिल्लाना सुनकर पास ही स्थित उसका पिता मुनि वहाँ आया। उसे देखकर तुमने उसे छोड़ दिया। तब मुनि ने तुम चारों को शाप दिया कि 'हे पापियो तुम मानव-लोक में जाओ' ॥२५० २५१॥ तब प्रार्थना करने पर मुनि ने इस प्रकार शाप का अन्त किया कि 'जब राजकुमारी अनंग प्रभा को तुम लोग सौंपोगे तब वह विद्याधर-लोक में चली जायगी। ये तीनों तो उसी समय शाप मुक्त हो जायेंगे किन्तु तुम विद्याधरी बनी हुई उसे पाकर भी गँवा दोगे ॥२५२ २५३॥ हे विकटवदन अब तुम महान् कष्ट प्राप्त करोगे और चिरकाल तक देवी की आराधना करके इस शाप से छूटोगे ॥२५४॥ तुमने उस चापलता कन्या के हाथ का स्पर्श किया है। इसलिए तुम्हे परदारापहरण का भारी पाप लगा है ॥२५५॥ इस प्रकार उस महर्षि ने मेरे गणों को जो शाप दिया, उसके परिणामस्वरूप तुम चारो दक्षिण दिशा में वीर रूप में उत्पन्न हुए थे। पंचशूष्टिक (जुलाहा) भाषाविज्ञानी (वैद्य) और गङ्गाधर (क्षत्रिय) ये तीनों और चौथा जीवदत्त चारो मित्र हुए ॥२५६ २५७॥ ये तीनों अनंगति के अपने पद को प्राप्त कर सम पर यहाँ आकर ही मेरी कृपा से शाप-मुक्त हुए ॥२५८॥ आज मेरी आराधना से तुम्हारा भी शाप नष्ट हो गया। इसलिए अब तुम मुझमें अग्नि सम्बन्धी धारणा रखकर अपना शरीर त्याग करो ॥२५९॥
५१८ कथासरित्सागर
५१८ कथासरित्सागर
अष्टजन्मोपभोग्यं च पातकं तत्सदुद्वह। इत्युक्त्वा धारणां दत्त्वा देवी तस्य तिरोदधे॥२६०॥ स मर्त्यदेहं पापं च दग्ध्वा धारणया तया। जीवद्वसश्चिराच्छापमुक्तो जज्ञे गणोत्तमः॥२६१॥ देवानामध्येहो येन पापेन क्लेश ईदृशः। परस्त्रीसङ्गमोत्थेन ह्यन्येषां तेन का गतिः॥२६२॥ सावञ्च तत्र सानङ्गप्रभा हरिवरे पुरे। राज्ञो हरिवरस्यान्तः पुराणां प्राप मुख्यताम्॥२६३॥ स च राजा तदेकाग्रमनास्तस्थौ दिवानिशम्। स्वमन्त्रिणि सुमन्त्राख्ये न्यस्तराज्यमहाभरः॥२६४॥ एकदा तस्य राज्ञश्च निकटं भव्यवंशजः। आगाल्लभधरो नाम नाट्याचार्योऽत्र नूतनः॥२६५॥ स दृष्टकौशलस्तेन भूभृता वाद्यनाट्ययोः। सम्भाव्यान्तःपुरस्त्रीणां नाट्याचार्यो व्यधीयत॥२६६॥ तेनानङ्गप्रभा नृत्ते प्रकर्षं प्रापिता तथा। नृत्यन्त्यपि सपत्नीनां स्पृहणीयाऽभवद्यथा॥२६७॥ सहवासाच्च तस्याथ नृत्तशिक्षारसावपि। नाट्याचार्यस्य सानङ्गप्रभाभूदनुरागिणी॥२६८॥ तस्याश्च रूपनृत्ताभ्यामाकृष्टः स शनैरहो। नाट्याचार्योऽपि कामेन किमप्यन्यदनृत्यत्॥२६९॥ विजने चैकदामङ्गप्रभा सा नाट्यवेश्मनि। प्रसाद्य नाट्याचार्यं समुपागाद्रतलालसा॥२७०॥ सुरतान्ते च सास्रमुत्सानुरागा जगाद तम्। 'त्वया विना कृता नाहं स्थातुं शक्ष्याम्यहं क्षणम्॥२७१॥ राजा हरिवरश्चैतद्बुद्ध्वा नैव क्षमिष्यते। तदह्य यत्र गच्छावो यत्र राजा न बुध्यते॥२७२॥ अस्ति हेमहयोष्ट्रादि धनं च तव भूभृता। नाट्यतुष्टेन यद्दत्तमस्ति चाभरणं मम॥२७३॥ तत्तत्र त्वरितं यामः स्थास्यामो यत्र निर्भयाः। एतत् स तद्वशो हृष्टो नाट्याचार्योऽन्वमन्यत॥२७४॥
नवम लम्बक ५१९
नवम लम्बक ५१९ और, साठ जन्मों तक भोगने योग्य पाप को एक ही बार में भस्म कर दो। ऐसा कहकर और अग्नि की धारणा देकर देवी अन्तर्धान हो गई ॥२६०॥ उस जीवदत्त ने उस अग्नि की धारणा से अपने पापों और मानव-शरीर को दग्ध करके पाप से मुक्ति प्राप्त की और फिर वह गणों में श्रेष्ठ हो गया ॥२६१॥ परस्त्री के संगम से होनेवाले पाप के कारण जब देवताओं की भी इतनी दुर्दशा होती है, तब दूसरों की बात ही क्या है ? ॥२६२॥ उधर, इतने दिनों तक वह अनंगप्रभा राजा हरिवर के रनिवास में प्रधान रानी बन कर रही ॥२६३॥ वह राजा रात-दिन उसी की ओर आकृष्ट रहता था और उसने अपने राज्य का कार्य भार सुमन्त्र नाम के मन्त्री पर डाल दिया ॥२६४॥ एक बार उस राजा के पास मध्यदेश से लब्धवर नाम का नया नाट्याचार्य आया ॥२६५॥ राजा ने वाद्य-नाट्य में उसकी अपूर्व कुशलता देखकर उसे सम्मानित किया और रनिवास का नाट्याचार्य बना दिया ॥२६६॥ उसने अनंगप्रभा को नाट्य-शिक्षा में इतना प्रवीण कर दिया कि वह नाचती हुई भी अपनी सौतों के लिए ईर्ष्या का कारण बनती थी ॥२६७॥ उस नाट्याचार्य के सम्पर्क से और नृत्य की शिक्षा के रस से वह अनंगप्रभा नाट्याचार्य के प्रति प्रेम से आसक्त हो गई ॥२६८॥ नाट्याचार्य भी उसके सौन्दर्य और नृत्य से आकृष्ट होकर कामदेव द्वारा कुछ और ही प्रकार से नचाया जाने लगा ॥२६९॥ एकबार एकान्त में वह अनंगप्रभा रति की लालसा से नाट्यशाला में ही नाट्याचार्य द्वारा भ्रष्ट हो गई ॥२७ ॥ और, काम क्रीडा के अन्त में अत्यन्त अनुरागवती होकर उससे बोली—'मैं तुम्हारे बिना अब एक क्षण भी नहीं रह सकती। राजा हरिवर यह सब जानकर हमें कदापि क्षमा न करेगा। तो आओ कहीं दूसरे स्थान पर चलें। जहाँ राजा को हमारा पता न चले ॥२७१-२७२॥ तुम्हारे पास राजा द्वारा प्रदत्त सोना घोड़े ऊँट आदि धन है। मेरे नाट्य से प्रसन्न होकर राजा के दिये हुए आभरण मेरे पास हैं ॥२७३॥ तो चलो वहाँ चलें जहाँ निर्भय होकर रह सकें। उसकी ये बातें सुनकर प्रसन्न नाट्या चार्य ने उसे मान लिया ॥२७४॥
५२ कथासरित्सागर
५२ कथासरित्सागर ततः पुरुषवेषं सा कृत्वाऽनङ्गप्रभा ययौ। नाट्याचार्यगृहं च्छेदया सह सुस्निग्धयैकया ॥२७५॥ ततस्तदैव तेनोष्ट्रपृष्ठार्पितधनद्विना। साकं सा तुरगारूढा प्रायान्नाट्योपदेशिना ॥२७६॥ साऽदौ विद्याधरीं लक्ष्मीं त्यक्त्वा राजश्रियं पुनः। शिश्रिये चारणत्वं सा धिक् स्त्रीणां चपलं मनः ॥२७७॥ गत्वा च नाट्याचार्येण तेनानङ्गप्रभा सह। दूरं सा नगरं प्राप वियोगपुरसञ्ज्ञकम् ॥२७८॥ तत्र तत्सहिता तस्थौ सुखं सा सोऽपि लब्धया। तया मन्मथराश्या स्वां सत्यां मेने नटाग्रणीः ॥२७९॥ तावच्च तां गतां क्वाऽपि मुद्यमानङ्गप्रभां प्रियाम्। राजा हरिवरः सोऽभूद्देहत्यागोन्मुखः शुचा ॥२८०॥ ततः सुमन्त्रो मन्त्री तमुवाचाश्वासयन् नृपम्। देव किं यन्न वेत्सि त्वं पर्यालोचय तत्स्वयम् ॥२८१॥ सङ्गविद्याधरं त्यक्त्वा पतिं त्वां दृष्टमेव या। उपाश्रिता कथं तस्याः स्थैर्यं स्यात् त्वय्यपि प्रभो ॥२८२॥ लघु कञ्चिद् गृहीत्वा सा गता सद्वस्तुनिःस्पृहा। तूर्णरत्नशलाकेव तृणवृष्ट्यनुरागतः ॥२८३॥ नाट्याचार्येण सा नूनं नीता स हि न दृश्यते। सङ्गीतगृहे प्रातस्तौ स्थिताविति च श्रुतम् ॥२८४॥ तदेवं वद कस्तस्यां जानतोऽपि वृथाग्रहः। विलासिनी हि सर्वस्य सन्ध्येव क्षणरागिणी १ ॥२८५॥ इत्युक्तो मन्त्रिणा सोऽथ विचारपतितो नृपः। अचिन्तयदहो सत्यमुक्तं मे सुधियामुना ॥२८६॥ पर्यन्तविरसा कष्टा प्रतिक्षणविवर्तिनी। भवस्थितिरिवानित्यसम्बन्धा हि विलासिनी ॥२८७॥ १ यथा सन्ध्या किञ्चित् कालमेव रक्ता भवति पुनः कृष्णा। तथा विलासिन्यपि किञ्चित् कालमेवानुरागवती भवतीति भावः।
नवम लम्बक ५२१
नवम लम्बक ५२१ तदनन्तर, अनंगप्रभा पुरुष का वेष धारण कर एक अत्यन्त अंतरंग दासी के साथ नाट्याचार्य के घर पर गई ॥२७५॥ तब उसी समय नाट्याचार्य ने सारी धन-सम्पत्ति ऊँट की पीठ पर लाद दी और अनंग- प्रभा पुरुष के वेष में घोड़े पर सवार होकर नाट्य-शिक्षक के साथ निकल गई ॥२७६॥ उसने पहले विद्याधर की लक्ष्मी का परित्याग करके राजलक्ष्मी को स्वीकार किया उसके उपरान्त गान-नाचनेवाले चारण का आश्रय लिया। स्त्रियों के इस प्रकार चंचल मन को धिक्कार है! ॥२७७॥ अनंगप्रभा नाट्याचार्य के साथ जाकर क्रमशः विशाखपुर नामक नगर में पहुँची और वहाँ नाट्याचार्य के साथ सुख और स्वतन्त्रतापूर्वक रहने लगी ॥२७८॥ उस नाट्याचार्य ने उस सुन्दरी स्त्री को प्राप्त कर अपने गन्धर्वजन्म को सार्थक समझा ॥२७९॥ उधर राजा हरिवर अनंगप्रभा को कहीं भागी हुई जानकर उसके शोक से अपना शरीर त्याग करने को तैयार हुआ ॥२८०॥ तब सुमन्त्र नाम के मन्त्री ने राजा को धीरज बँधाते हुए कहा-'महाराज आप क्या नहीं जानते स्वयं ही विचार कीजिए ॥२८१॥ जो सहस्रविद्याधर को छोड़कर तुम्हें देखते ही तुम्हारे साथ भाग आई, वह भला आपके साथ स्थिर होकर कैसे रह सकती है ? अच्छी और उत्तम वस्तु से निस्पृह यह स्त्री किसी क्षुद्र पुरुष के साथ वैसे ही चली गई, जैसे बांस की सलाई बांस की ओर ही जाती है।।।२८२-२८३।। उसे अवश्य ही नाट्याचार्य भगा ले गया है क्योंकि वह यहाँ नहीं है। वे दोनों नाट्यशाला में प्रातःकाल उपस्थित थे ऐसा सुना गया है ॥२८४॥ अतः हे स्वामिन् इस प्रकार उसकी चंचलता को जानते हुए भी तुम्हें उसके प्रति इतना आग्रह क्यों है ? क्योंकि विलासिनी स्त्री सन्ध्या के समान क्षण-भर के लिए ही अनुरागिनी होती है ॥२८५॥ मन्त्री द्वारा इस प्रकार कहा गया राजा हरिवर, विचार में पड़ गया और सोचने लगा कि इस बुद्धिमान् मन्त्री ने ठीक ही कहा है ॥२८६॥ विलासिनी स्त्री संसार की स्थिति के समान अन्त में नीरस दुःखदायिनी प्रत्येक क्षण में बदलनेवाली और अनित्य सम्बन्धवाली होती है ॥२८७॥ ६६
५३२ कथासरित्सागर
५३२ कथासरित्सागर पतित मज्जयन्तीषु दर्शितोत्कलिकासु च। प्राज्ञ पतरणगाधासु न स्त्रीषु च नदीषु च॥२८८॥ व्यसनपु निस्सङ्गा विभवेष्वप्यगर्विता । कार्येष्वकातरा ये च ते धीरास्तैर्जित जगत्॥२८९॥ इत्यालोच्य शुचं त्यक्त्वा मन्त्रिणो वचनेन सः। स्वदारेष्वेव सन्तोष राजा हरिवरो व्यधात्॥२९ ॥ साप्यनङ्गप्रभा तत्र वियोगपुरनामनि। नाट्याचार्यमुखा तावत् कञ्चित्काल स्थिता पुरे॥२९१॥ तावत्तत्रापि सजज्ञे नाट्याचार्यस्य दैवत्। यूना सुदर्शननाम्नेम द्यूतकारेण सङ्गतिः॥२९२॥ सेन द्यूतहताशेषधनोऽनङ्गप्रभाप्रत । कृत सुदर्शनेनात्र नाट्याचार्योऽचिरेण सः॥२९३॥ तद्रोषादिव निःश्रीक त्यक्त्वाऽनङ्गप्रभाञ्च तम्। सा सुदर्शनमेवैत प्रसन्नाऽशिश्रियत् पतिम्॥२९४॥ नष्टदारधन सोऽथ नाट्याचार्योऽप्रतिष्ठयः। वैराग्यात्तपसे बद्धजटो गङ्गातट ययौ॥२९५॥ सा स्वनङ्गप्रभा तेन द्यूतकारेण सङ्गता। सुदर्शनेन तत्रैव तस्थौ नवनवप्रिया॥२९६॥ एकदा च पतिस्तस्यास्तस्करैः स सुदर्शनः। मुषिताशेषसर्वस्व प्रविद्य रजनी कृतः॥२९७॥ सतस्तां द्रविणाभावादुःखितामनुतापिनीम्। दृष्ट्वा सुदर्शनोऽनङ्गप्रभामिदमुवाच सः॥२९८॥ हिरण्यगुप्तनामा यः सुहृन्मेऽस्ति महाधनः। तत्सकाशादृण किञ्चिदेहाद्य मृगयामहे॥२९९॥ इत्युक्त्वा दैवहतधी स गत्वैव तया सह। ऋण हिरण्यगुप्तं त वणिङ्मुख्यमयाचत॥३ ०॥ स धानङ्गप्रभां दृष्ट्वा वणिक साऽपि च स तदा। अन्योन्याभिलाषी तौ बभूवतुरुभावपि॥३ ०१॥ उवाच चैव स वणिक त सुदर्शनमावरात्। प्रातर्दास्ये हिरण्य वामद्यहैव सु मुच्यताम्॥३ ०२॥
नवम लम्बक ५२३
नवम लम्बक ५२३ गिरे हुए को डुबाती हुई और उत्कण्ठा को बढ़ाती हुई अथाह नदियों और स्त्रियों के चक्कर में बुद्धिमान् फँस जाते हैं और उनमें डूब जाते हैं॥२८८॥ जो विपत्ति में व्याकुल नहीं होते सम्पत्ति में घमण्ड नहीं करते और कार्य के समय भागते नहीं वे ही धीर पुरुष हैं। उन्होंने संसार को जीत लिया है॥२८९॥ राजा हरिवर ने ऐसा सोचकर और मन्त्री के कथन से शोच को त्याग कर अपनी अन्य स्त्रियों से ही सन्तोष किया ॥२९०॥ वह अनंगप्रभा भी उस वियोगपुर नगर में नाट्यवाचार्य के साथ कुछ समय तक रही॥२९१॥ उस नगर में दैवयोग से उस नाट्यवाचार्य की एक युवा जुआरी सुदर्शन से मित्रता हो गई ॥२९२॥ उस जुआरी सुदर्शन ने शीघ्र ही नाट्यवाचार्य का समस्त धन नष्ट कराकर उसे अनंगप्रभा के सामने दरिद्र बना दिया ॥२९३॥ इस क्षोभ से अनंगप्रभा ने उस दरिद्र नाट्यवाचार्य को त्याग कर सुदर्शन को ही अपना पति बना लिया ॥२९४॥ स्त्री और धन के नाश से निराश होकर नाट्यवाचार्य वैराग्य के कारण तपस्या करने के लिए जग छोड़कर गंगा के तट पर जा बैठा ॥२९५॥ नये-नये पुरुषों को चाहनेवाली वह अनंगप्रभा अब उस जुआरी सुदर्शन के साथ रहने लगी ॥२९६॥ एक बार रात्रि के समय चोरों ने उसके घर में घुसकर अनंगप्रभा के नये पति जुआरी सुदर्शन का सर्वस्व चुराकर उसे कंगाल बना दिया ॥२९७॥ उस धन के अपहरण से दुःख में डूबी हुई और पश्चात्ताप करती हुई अनंगप्रभा को देखकर सुदर्शन ने उससे कहा—॥२९८॥ 'हिरण्यगुप्त नाम का एक धनवान् मेरा मित्र है। चलो उससे कुछ धन उधार लें' ॥२९९॥ भाग्य से नष्टबुद्धि सुदर्शन ऐसा कहकर उसके साथ हिरण्यगुप्त के समीप गया और उससे कुछ धन माँगा ॥३००॥ वह बनिया और वह अनंगप्रभा दोनों परस्पर आँखें मिलने पर एक दूसरे के प्रति आसक्त हो गये ॥३०१॥ तब उस वैश्य ने सुदर्शन से आदर के साथ कहा—'प्रातःकाल तुम दोनों को धन दूँगा। आज यहीं रहो और यहाँ भोजन करो' ॥३०२॥
५२४ कथासरित्सागर
५२४ कथासरित्सागर
तच्छ्रुत्वान्यादृशं भावमुपलब्ध्य तयोर्द्वयोः। सुदर्शनोऽब्रवीन्नाहं भोजनेऽद्य पटुः¹ स्थितः ॥३०३॥ वणिक्पतिस्ततोऽवादीत्तर्हि त्वद्वनिता सखे। भुङ्क्तां प्रथममस्माकमेषा हि गृहमागता ॥३०४॥ इत्युक्तस्तेन तूष्णीं स बभूव कितवोऽपि सन्। स चानङ्गप्रभायुक्तो ययावभ्यन्तरं वणिक् ॥३०५॥ तत्र चक्रे तया साकं पानाहारादिभिर्धृतिम्। अतर्कितोपनतया लसद्भावविलासया ॥३०६॥ सुदर्शनः स तस्याश्च निर्गमं प्रतिपालयन्। बहिः स्थितः सतद्भूत्यैरुक्ते सत्तत्प्रेरितैस्ततः ॥३०७॥ मुक्त्वा गृहं गता सा ते निर्यान्ती न त्वयेक्षिता। सत्त्वया किमिहाद्यापि क्रियते गम्यतामिति ॥३०८॥ सान्तःस्थिता न निर्याता न यास्यामीति स ब्रुवन्। दत्त्वा पादप्रहारांस्तस्तद्भूत्यैर्निस्कास्यत ॥३०९॥ ततः सुदर्शनो गत्वा दुःखितः स व्यचिन्तयत्। कथं मे वणिजा दारा मित्रेणाप्यमुना हृताः ॥३१०॥ इहैवोपनतं वा मे स्वपापफलमीदृशम्। यन्मया कृतमन्यस्य तदन्येन कृतं मम ॥३११॥ कुप्यामि किं तदन्यस्मै कोपार्हं तत्स्वकर्म मे। तच्छिन्दधि न येन स्यात्पुनर्मम पराभवः ॥३१२॥ इत्यालोच्य क्रोधं त्यक्त्वा गत्वा बदरिकाश्रमम्। धूतशारस्तदा तत्र भवच्छेदि व्यतातपः ॥३१३॥ सा च रूपाधिकं प्राप्य प्रियं तं वणिजं पतिम्। रमेऽनङ्गप्रभा मुग्धी पुण्यात्पुण्यमिवायता ॥३१४॥ क्रमेण तस्य साऽभूद्वणिजो विपुलश्रियः। स्वामिनी सानुरागस्य प्राणेष्वपि धनेष्वपि ॥३१५॥ राजात्र वीरबाहुश्च तत्रस्थामेकसुन्दरीम्। श्रुत्वापि धर्ममर्यादां रक्षन्नेव जहार ताम् ॥३१६॥
१ स्वस्थ इत्यर्थः।
नवम लम्बक ५२५
नवम लम्बक ५२५ यह सुनकर और उन दोनों का परस्पर दूसरा ही भाव समझकर सुदर्शन ने कहा—'आज मैं भोजन के लिए तैयार नहीं हूँ' ॥३ ३॥ यह सुनकर बनिये ने कहा—'मित्र यदि ऐसा है तो तुम नहीं तो तुम्हारी स्त्री आज मेरे घर पर भोजन करे। क्योंकि यह पहले-पहल मेरे घर पर आई है॥३ ४॥ बनिया के ऐसा कहने पर सुदर्शन धूर्त होते हुए भी चुप रहा और बनिया उसकी स्त्री को लेकर घर के अन्दर चला गया ॥३ ५॥ घर में जाकर उसने एकाएक मिली हुई यौवन-मद से मत्त उस अनंगप्रभा के साथ भोजन मद्यपान आदि का सुख लिया। उधर सुदर्शन स्त्री की प्रतीक्षा में बाहर बैठा रहा। कुछ समय बाहर प्रतीक्षा में बैठे हुए सुदर्शन से बनिया के भेजे हुए उसके नौकरों ने आकर कहा—'तुम्हारी स्त्री भोजन करके घर चली गई, तुमने उसे जाते हुए नहीं देखा। इसलिए तुम यहाँ बैठे हुए क्या कर रहे हो जाओ अपने घर' ॥३ ६---३ ८॥ सुदर्शन ने उनसे कहा— अभी वह अन्दर है। गई नहीं इसलिए मैं नहीं जाऊँगा' ऐसा कहता हुआ सुदर्शन बनिया के नौकरों द्वारा लाठ-घूसों से मारकर बाहर निकाल दिया गया ॥३ ९॥ लात खाकर सुदर्शन अपने घर चला गया और सोचने लगा कि इस बनिये ने मित्र होकर भी मेरी स्त्री का अपहरण कर लिया ॥४१ ॥ मुझे इसी लोक में अपने किये का फल मिल गया जो दुष्कर्म मैंने दूसरे के लिए किया वही दूसरे ने मेरे साथ किया ॥३११॥ अतः दूसरे पर मैं क्रोध क्या करूँ? मेरा कर्म ही क्रोध करने योग्य है इसलिए अपने कर्मों का छेदन करता हूँ जिससे मेरा पुनर्जन्म और पुनः अपमान न हो ॥३१२॥ ऐसा सोचकर और क्रोध को छोड़कर वह जुआरी बदरिकाश्रम चला गया और वहाँ उसने संसार-बन्धन से मुक्त होने के लिए तपस्या की ॥३१३॥ इधर वह अनंगप्रभा अति सुन्दर और प्यारा वैश्य पति प्राप्त कर एक पुष्प से दूसरे पुष्प पर फिरती हुई भ्रमरी के समान आनन्द लेन लगी ॥३१४॥ धीरे धीरे अनंगप्रभा ने विपुल सम्पत्तिशाली उस प्रणयी वैश्य के प्राणों पर और उसकी सम्पत्ति पर पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लिया ॥३१५॥ उस देश के राजा वीरबाहु ने एकमात्र सुन्दरी उस अनंगप्रभा को वहाँ रहती हुई जानकर भी धर्म की मर्यादा रखते हुए उसका हरण नहीं किया ॥३१६॥
५२१ | कथासरित्सागर
५२१ | कथासरित्सागर दिनदत्तं तद्द्रव्यं सोऽभूद्वणिगलमीभवदन् । म्लायति श्रीः कुलस्त्रीव गृहं यद्धन्यधिष्ठिते ॥३१८॥ ततः सुवर्णभूम्यास्यं द्वीप सम्भृतभाण्डकः । हिरण्यगुप्तः स वणिकप्रस्थितोऽभूद्वणिज्यया ॥३१९॥ वियोगभीत्या चादाय तामनङ्गप्रभां सह । व्रजन् पथि क्रमात्प्राप स सागरपुरं पुरम् ॥३२०॥ तत्र सागरवीराख्यो वास्तव्यो धीवराधिपः । नगरेऽम्भोघिनिकटे तस्यको मिलितोऽभवत् ॥३२१॥ तेनाब्धिजीविना साकं सोऽथ गत्वाम्बुधेस्तटम् । सहढौकितं यानपात्रमारुरोह प्रियसखः ॥३२२॥ तत्राऽऽधौ यानपात्रेण तेन यावत्प्रयाति सः । व्ययं सागरवीरण दिनानि कतिचिद्वणिक् ॥३२३॥ एवस्मिन्दिवसे तावज्ज्वलद्विद्युद्विलोचनः । उग्रः सहारम्भदः कालमेघः समागमत् ॥३२४॥ स्वरधूलचयपारेण वायुना बलिना हवम् । ततो भङ्गिरुमारभे यानपात्रं तदूर्मिषु ॥३२५॥ मुक्ताक्रन्दे परिजने मनोरथ इव स्वकं । मग्नमानं प्रवहणं कड्यायढोप्तरीयकः ॥३२६॥ वणिगिप रक्ष्णगुप्त माऽऽश्लिष्टवानङ्गप्रभामुगम् । हा प्रिय क्व त्वमित्युक्त्वा निक्षपारमानमम्बुधौ ॥३२७॥ गत्वा च धातुविशनात् काञ्चित्प्राप स द्वीपप । वणिक्प्रवहणीमग्नो नां कासमभ्यागाद् स ॥३२७॥ गाप्यनङ्गप्रभा गञ्जवा बद पश्चादावरः । गनः सागरवारेण मणिवद्याध्यरायन ॥३२८॥ ग्वयं पाप्त्य तत्र भीतामाश्वासयन् स ताम् । ण्डयमाना मयाऽल्पो बाहुभ्यां वारि निर्गताम् ॥३२९॥ शशाङ्क प्रहणं भग्नं मग्नामभ्ररसाम् । तापां प्रान्तावतोरस्य गुप्तान्भूत्तमितोऽम्बुधिः ॥३३०॥ स पाण्डु प्रहणं दन्त्वाऽनान्तिक्षिप्तः । हिरण्यगुप्तः प्राणांश्च कश्च देवात्सिरिक्षत ॥३३१॥
नवम लम्बक ५२७
नवम लम्बक ५२७ कुछ दिनों में अनंगप्रभा के व्यय से बनिए का धन घट गया। क्योंकि दुराचारिणी स्त्री के घर में रहने पर, लक्ष्मी सदाचारिणी स्त्री के समान मुरझाने लगती है ॥३१७॥ धन का ह्रास देखकर वह वैश्य कुछ सामान एकत्र करके व्यापार के लिए सुवर्ण-द्वीप में जाने के लिए उद्यत हुआ ॥३१८॥ वियोग के भय से वह अनंगप्रभा को भी साथ लेकर चलता हुआ क्रमशः सागरपुर नाम के नगर में पहुँचा ॥३१९॥ र वहाँ समुद्र-तट पर बसे हुए उस नगर में रहनेवाला धीवरों का सरदार सागरवीर उस वैश्य से मिला ॥३२० ॥ उस समुद्रजीवी सागरवीर के साथ वह वैश्य समुद्र-तट पर आकर उससे लाये हुए जहाज पर अपनी पत्नी अनंगप्रभा के साथ सवार हो गया ॥३२१॥ वह वैश्य जब उस सागरवीर के साथ जहाज से जा रहा था तब एक दिन जलती हुई बिजली-रूपी आँखोंवाला प्रचंड त्रास तथा भय देनेवाला काला मेघ आकाश में दीख पड़ा ॥३२२-३२३॥ प्रचंड वायु के कारण मूसलाधार वृष्टि प्रारम्भ हुई। समुद्र में भयंकर तूफान उठा और जहाज समुद्र की लहरों में डूबने लगा ॥३२४॥ इस स्थिति में वैश्य हिरण्यगुप्त के सभी सेवक चिल्लाने लगे मानों उस जहाज के साथ उनका मनोरथ ही डूब रहा हो। तब हिरण्यगुप्त अपने दुपट्टे को कमर में बाँधकर अनंगप्रभा के मुंह की ओर देखकर 'हा प्रिये तू कहाँ' ऐसा कहकर डूबते हुए जहाज से समुद्र में कूद पड़ा ॥३२५-३२६॥ कूदकर हाथ फेंकते हुए उसे दैवयोग से बहती हुई एक लकड़ी की पट्टी हाथ लगी। उसे पकड़कर वह उसपर चढ़ गया ॥३२७॥ इधर अनंगप्रभा को भी उस सागरवीर ने बहुत तख्तों को रस्सी से बाँधकर बनाये हुए एक लम्बे चौड़े काष्ट-मञ्च पर शीघ्र ही चढ़ा दिया ॥३२८॥ और, स्वयं भी अनंगप्रभा को धीरज देता हुआ उसी पर चढ़ गया तथा हाथों से डाँड़ों का काम लेता हुआ वह समुद्र में तैरने लगा ॥३२९॥ जहाज के टूट जाने और डूब जाने पर पल-भर में आकाश मेघ-रहित तथा निर्मल हो गया। और, समुद्र क्षोभ के शान्त होने पर सज्जन हृदय के समान निश्चल हो गया ॥३३० ॥ एक तख्ते पर चढ़ा हुआ हिरण्यगुप्त अनुकूल वायु के चलने पर बहता हुआ पाँच दिनों में दैवयोग से समुद्र के तट पर आ गया ॥३३१॥
५२८ कथासरित्सागर
५२८ कथासरित्सागर अवतीर्य तटे सोऽथ प्रियाविरहदुःखितः। अशक्यप्रतिकारं च मत्वा विधिविचेष्टितम् ॥१३२॥ गत्वा शनैः स्वनगरं बद्ध्वा धीराशयो धृतिम्। हिरण्यगुप्तो भूयोऽप्य॑नुपार्ग्यास्ति सुनिर्वृतः ॥१३३॥ सा त्वनङ्गप्रभैकाह्नाच्चित्रं फलकस्थिता ॥ तेन सागरवीरेण प्रापिताम्भोनिधस्तटम् ॥१३४॥ तत्राश्वास्य च नीताभूद्धीवरेन्द्रेण तन सा। तरत्सागरपुरं नाम नगरं भवनं निजम् ॥१३५॥ तत्र राजसमधीकं वीरं प्राणप्रदायिनम्। सुयौवनं सुरूपं च विचिन्त्याज्ञाविधायिनम् ॥१३६॥ तमेव चक्रे सानङ्गप्रभा दाशपतिं पतिम्। न स्त्री चलितचारित्रा निम्नोन्नतमवेक्षते ॥१३७॥ ततः कैवर्तपतिना तेन साकमुवास सा। तद्वेश्मन्युपभुञ्जाना तत्समृद्धिं समर्पिताम् ॥१३८॥ अनङ्गप्रभामदनप्रभयोः कथा एकदा साग्र हर्म्याग्रादपश्यद्रथ्यया तया। यान्तं विजयवर्माख्यं भव्यं क्षत्रियपुत्रकम् ॥१३९॥ रूपलुब्धावतीर्यैव समुपैत्य जगाद सा। दर्शनाकृष्टचित्तां मां भज प्रणयिनीमिति ॥१४०॥ स चाभिनन्द्य हृष्टस्तामाकाशपतितामिव। गृहीत्वा च जगाम स्वं गृहं त्रैलोक्यसुन्दरीम् ॥१४१॥ सोऽथ सागरवीरस्तां बुद्ध्वा क्वापि गतां प्रियाम्। त्यक्त्वा सर्वं तम त्यक्ष्यंस्तपसा सुरनिम्नगाम् ॥१४२॥ यदगात्सत्कथं मा भूद्दुःखं तस्य तथाविधम्। क्व वादासः क्व तादृश्या विद्याधर्या हि सङ्गमः ॥१४३॥ सा चानङ्गप्रभा तेन समं विजयवर्मणा। तस्थौ तत्रैव नगरे यथासुखमनर्गला ॥१४४॥ ततः कदाचित् समरयं समारूढकरेणुकः। राजा सागरवर्माख्यो निरगाद्भ्रमितुं पुरम् ॥१४५॥
नवम लम्बक ५२१
नवम लम्बक ५२१ तट पर तख्ते से उतरा हुआ हिरण्यगुप्त अपनी प्रेयसी अनंगप्रभा के दुःख से दुखित होकर इस घटना को अवश्यम्भावी दैवयोग समझने लगा ॥१३२॥ इस प्रकार धीरे-धीरे चलकर वह धैर्यशाली वैश्य अपने नगर को जाकर धीरज बाँधकर निश्चिन्तता पूर्वक व्यापार से धन कमाने लगा ॥१३३॥ आश्चर्य यह है कि तख्तों पर बैठी हुई उस अनंगप्रभा को सागरवीर ने एक ही दिन में समुद्र के तट पर पहुँचा दिया ॥१३४॥ तट पर पहुँचकर सागरवीर द्वारा धीरज बँधाई गई अनंगप्रभा को उसने सागरपुर में अपने घर पहुँचा दिया ॥१३५॥ वहाँ पर राजा के समान सम्पत्तिवाले वीर, प्राण देनेवाले युवक और सुन्दर सागरवीर को अपना आज्ञाकारी समझकर दासों (धीवरों) के सरदार को ही उस अनंगप्रभा ने अपना पति बना लिया। सच है चरित्रहीन स्त्री नीच-ऊँच का विचार नहीं करती ॥१३६-१३७॥ तब वह अनंगप्रभा उसी दासों के राजा के साथ उसके ही घर में उसकी धन-सम्पत्ति का उपभोग करती हुई रहने लगी ॥१३८॥ एक बार उस अनंगप्रभा ने अपने ऊँचे महल की छत से किसी गली से जाते हुए विजयवर्मा नामक सुन्दर राजपूत को देखा ॥१३९॥ उसके सुन्दर रूप के लोभ से वह अनंगप्रभा छत से उतरकर और उसके पास जाकर उससे कहने लगी कि तुम्हारे रूप को देखते ही मेरा चित्त तुम्हारी ओर खिंच गया है। इसलिए, तुम मेरा उपभोग करो ॥१४०॥ उसने उसका प्रस्ताव स्वीकार किया और आकाश से गिरी हुई उस त्रैलोक्यसुन्दरी को लेकर वह अपने घर चला गया ॥१४१॥ उसके भाग जाने पर वह सागरवीर उसे भागी हुई समझकर और सब कुछ त्याग कर तपस्या द्वारा शरीर छोड़ने के लिए गंगा के तट पर चला गया। भला यह दुःख उसे क्यों नहीं होता क्योंकि कहाँ वह बेचारा धीवर और कहाँ दिव्य रूपवाली उस विद्याधरी का समागम ॥१४२-१४३॥ वह अनंगप्रभा भी उस विजयवर्मा के साथ स्वच्छन्द रूप से उसी नगर में रहने लगी ॥१४४॥ किसी समय हस्तिनी पर चढ़ा हुआ उस नगर का राजा मलयवर्मा नगर में घूमने के लिए निकला ॥१४५॥ ६७
५४ कथासरित्सागर
५४ कथासरित्सागर स्वनामसम स्वकृत स पश्यंस्तत्पुर नृपः। तेनाययौ पथा यत्र गृहं विजयवर्मणः॥३४६॥ बुद्ध्वा च नृपमायान्तं तद्दर्शनकुतूहलात्। आरुरोहाथ सानङ्गप्रभा हर्म्यतलं सती॥३४७॥ अनंगप्रभावलप्रभयोः कथा दृष्ट्वैव सा त राजानं तथाभूतद्वया यथा। हठाद्राजकरेणुस्थं हस्त्यारोहमभाषत॥३४८॥ भो हस्त्यारूढ नैवाहमारूढा जातु हस्तिनम्। तदारोहय मामत्र वीक्षे तावत् कियत्सुखम्॥३४९॥ तच्छ्रुत्वाभोरणे तस्मिन् राजाननविलोकिनि। राजा ददर्श तामिन्दोर्दिवः कान्तिमिव च्युताम्॥३५०॥ पिबंश्च तामतृप्तेन चकोर इव चक्षुषा। नृपस्तत्राप्तिबद्धाशो हस्त्यारोहमुवाच सः॥३५१॥ नीत्वा करेणु निकटं पूरयास्या मनोरथम्। आरोपयेन्दुवदनाम ताममत्राविलम्बितम् ॥३५२॥ इति राज्ञोदिते तेन हस्त्यारोहेण ढौकिता। अधस्तात्तस्य हर्म्यस्य तत्क्षणं सा करेणुका॥३५३॥ दृष्ट्वा तां निकटप्राप्तां राज्ञः सागरवर्मणः। उत्सङ्गे तस्य सानङ्गप्रभात्मानमपातयत्॥३५४॥ क्वापि न भर्तृविद्वेषः क्वैषा भर्तृव्यतृप्तता। हा तस्याः पितृशापेन दर्शितोऽतिविपर्ययः॥३५५॥ निपातभीतेव च सा कण्ठे तं नृपमग्रहीत्। तत्स्पर्शामृतसिक्ताङ्गः सोऽपि प्राप परां मुदम्॥३५६॥ युक्त्या समर्पितात्मानं परिचुम्बन्महारुहाम्। तां स राजा गृहीत्वैव जगामाशु स्वमन्दिरम्॥३५७॥ तत्र सामुक्तवृत्तान्तां तदैव युवराङ्गनाम्। स चकार महादेवीं प्रवेश्यान्तःपुरे नृपः॥३५८॥ बुद्ध्वा राजहृतामेतामय क्षत्रमिवाथ सः। बहिर्विजयवर्मात्र राजभृत्यानयोधयत्॥३५९॥ युद्धे च तत्र तत्याज शरीरमपराङ्मुखः। न शूरा विषहन्ते हि स्त्रीनिमित्तं पराभवम्॥३६०॥