कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
नवम लम्बक ६१
नवम लम्बक ६१ चित्रकार ने राजा के शरीर के अनुसार उसकी उठी हुई साफ बनाई लम्बी और साफ बाँहें ऊँचा और चौड़ा ललाट तथा घुँघराले कच बनाये। चौड़ी छाती बनाई जिसमें बाण आदि शस्त्रों के घाव स्पष्ट दीख रहे थे। दिग्गजों की सूँडों के समान उसने सुन्दर भुजाएँ बनाईं ॥४७-४८॥ कमर इस प्रकार पतली बनाई मानों सिंह-शावकों ने (राजा के पराक्रम से) पराजित होकर उपहार-स्वरूप भेंट कर दी हो। जवान हाथियों के बाँधने के निमित्त बने खम्भों की तरह पतली जांघें बनाई और अशोक के नये पत्तों के समान सुन्दर दोनों पैर बनाये ॥४९-५०॥ सामने ही राजा के सर्वथा अनुरूप चित्र को बने देखकर सभी लोग उस चित्रकार को धन्यवाद देने लगे ॥५१॥ और बोले—हम अकेले राजा का देखकर सन्तोष नहीं है। इसलिए दीवार में चित्रित इन रानियों में से किसी एक का चित्र राजा के साथ बनाओ। जिससे हमारी आँख को आनन्द मिले' ॥५२ ५३॥ यह सुनकर और दीवार पर चित्रित रानियों के चित्रों को देखकर चित्रकार ने कहा- इन रानियों में राजा के समान रूपवाली एक भी रानी नहीं है ॥५४॥ मैं समझता हूँ कि सारे भूमण्डल में राजा के समान रूपवाली सुन्दरी स्त्री है ही नहीं। हाँ एक राजकुमारी है सुनिए, मैं बताता हूँ —॥५५॥ विदर्भ देश में कुण्डिनपुर नाम का एक सम्पन्न नगर है वहाँ पर रुक्मरुचि नाम से प्रसिद्ध एक राजा है ॥५६॥ उसकी प्राणों से भी प्यारी अनंगमंजरी नाम की रानी है। उस रानी से राजा से उत्पन्न मदनसुन्दरी नाम की कन्या है। एक ही जिह्वा से उसके सौन्दर्य का वर्णन करने के लिए मेरे जैसा व्यक्ति समर्थ नहीं है। फिर भी मैं इतना ही कहता हूँ कि ब्रह्मा उसे बनाकर अब पुनः इच्छा होने पर भी यथा शक ऐसी सुन्दरी को नहीं बना सकता ॥५७—५८॥ सारी पृथ्वी में वही एक इस राजा के सदृश सुन्दरी कन्या है। रूप लावण्य अवस्था कुल आदि सभी में वह इस राजा के उपयुक्त है ॥५९॥ एक बार वहाँ रहते हुए मैं दाइयों द्वारा बुलाये जाने पर उनके रनिवास में गया था ॥६१॥ ७३
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तत्रापश्यमहं तां च चन्दनाद्र्रविलेपनाम्। मृणालहारां बिसिनीपत्रशय्याविवर्त्तिनीम् ॥६२॥ कदलीपत्रपवनैर्वीज्यमानां सखीजनैः। पाण्डक्षामामभिव्यक्तस्मरज्वरलक्षणाम् ॥६३॥ हे सख्यश्चन्दनालेपकदलीदलमारुतैः । कृतमभिः किमेतेन विफलेन श्रमेण वः॥६४॥ एते हि मन्दपुण्यां मां दहन्ति शिशिरा अपि। एवं निवारयन्तीं च सखीराश्वासनाकुलाः॥६५॥ विलोक्य तदवस्थां तां तद्वितर्कसमाकुलः। कृतप्रणामस्तस्याश्च पुरतोऽहमुपाविशम् ॥६६॥ उपाध्यायेतृगास्मिंश्च चित्रे मे देहि रूपकम्। इत्युक्त्वा वेपमानेन पाणिना धृतवर्त्तिका॥६७॥ शनैरालिख्य सा भूमौ दर्शयन्ती नृपात्मजा। अलेखयन् मया कश्चिद्युवानं रूपवत्तरम्॥६८॥ आलिख्य सुन्दरं तं च देवं चिन्तितवानहम्। काम एवानया साक्षादयमालिखितो मया॥६९॥ किन्तु पुष्पमयश्चापो हस्त यन्नास्य लेखितः। तेन जाने न कामोऽयं तद्रूपः कोऽप्यसौ युवा ॥७०॥ अय च नूनमनया दृष्टः क्वापि श्रुतोऽपि वा। एतन्निबन्धनं चेवमस्याः स्मरविजृम्भितम् ॥७१॥ तदितो मेऽप्रमातव्यमुग्रदण्डो ह्ययं नृपः। एतत्पिता देवशक्तिर्युयुच्छेदं न क्षमेत मे ॥७२॥ इत्यालोच्यैव नत्वा तामहं मदनसुन्दरीम्। राजकन्यां निरगमं तया सम्मानितस्ततः ॥७३॥ श्रुतं चात्र महाराज मया परिजनामिषः। स्वैरं कथयतो यत्सा सानुरागा श्रुते त्वयि॥७४॥ ततश्चित्रपटे गुप्तं लिखितां तां नृपात्मजाम्। आदायाहं भवत्पादमूलं त्वरितमागतः॥७५॥
१ मूर्च्छन्तीं स्मरसन्तापेन।
नवम लम्बक ६११
नवम लम्बक ६११ वहाँ उसे मैंने शरीर म चन्दन का लेप किये हुए मृणाल का हार पहने हुए, कमल के पत्तों की शय्या पर करवटें बदलते हुए और सखियों द्वारा केले के पत्ता से हवा की जाती हुई, पीली और दुर्बल शरीरवाली तथा प्रकट होते हुए कामज्वर के लक्षणावाली देखा। वह सखियों से कह रही थी--'सखियो 'चन्दन के लेप और कदलीदल की वायु आदि से किये गये सब उपचार ठंढे होने पर भी मुझे जलाते हैं। इन्हें बन्द करो। इन निष्फल प्रयत्नो से क्या लाभ ? धीरज देती हुई सखियों को वह इस प्रकार मना कर रही थी ।।६२-६५।। इस अवस्था मे पड़ी हुई उसे देखकर और उसी म सम्बद्ध विभिन्न तर्कों स व्याकुल मैं उस प्रणाम कर उसके सामने बैठ गया ।।६६।। 'उपाध्याय ऐसा चित्र बनाकर मुझे दो। इस प्रकार कहकर कांपते हुए हाथ म कूची लिये हुए उसने धीरे-धीरे पृथ्वी पर चित्र लिखकर दिखाते हुए मुझे किसी अनन्त रूपशाली युवा को लिखवाया ।।६७-६८।। महाराज उसके निर्देशानुसार चित्र बनाकर मैंने सोचा कि उसने मुझसे साक्षात् कामदेव का ही चित्र लिखवाया है। किन्तु, उसने चित्र के हाथ में काम का बाण नहीं लिखवाया इससे मैं समझता हूँ वह कामदेव नही किन्तु उसी के समान रूपवाला कोई युवा मनुष्य है।।६९-७० ॥ उसने इस युवक को अवश्य कही देखा या सुना है और इसी के सम्बन्ध से उस यह काम- ज्वर की व्यथा भी है ।।७१।। अब मुझ यहाँ से शीघ्र ही चला जाना चाहिए क्योकि यह राजा उग्र दण्ड देनेवाला है। यदि इसके पिता देवशक्ति को पता लगा तो वह कदापि क्षमा न करेगा ।।७२।। ऐसा सोचकर और उस मदनसुन्दरी का नमस्कार करके उससे सम्मानित मैं वहाँ से निकल गया ।।७३।। और महाराज मैंने उसके चरित्रता से यह भी समझा कि वह आपका जानकर आपके लिए प्रेम करती है ।।७४।। इसीलिए चित्रपट पर गुप्त रूप से उसे लिखकर और लेकर तुरन्त आपकी सेवा म आया हूँ ।।७५।।
६१२ कथासरित्सागर
६१२ कथासरित्सागर दृष्ट्वा च देवस्याकारं निवृत्तः संशयो मम। देव एव तया चित्रे मठस्तनामलिखितः ॥७६॥ सा पादसङ्गे सदृशी शक्या लिखितुमित्यहम्। चित्रं देवस्य पार्श्वे तां न लिखामि समामपि ॥७७॥ इत्युक्तवन्तं स रोल्देवं राजा जगाद सः। तर्हि त्वया सा तच्चित्रपटस्था दर्शयतामिति ॥७८॥ ततो वंशगुलिकातस्तं १ कृष्ट्वा पटमदर्शयत्। स चित्रकृतां चित्रस्यां राज्ञे मदनसुन्दरीम् ॥७९॥ राजा कनकवर्षोऽपि तां स चित्रगतामपि। विचित्ररूपामालोक्य सद्यः स्मरवशो ययौ ॥८०॥ पूरयित्वा च बहुना हेम्ना चित्रकरं स तम्। आप्तप्रियाचित्रपटो विवशाभ्यन्तरं नृपः ॥८१॥ तत्र तद्रूपलावण्यदर्शनातृप्तलोचनः। त्यक्तसर्वक्रियस्तस्थौ तदेकमयमानसः ॥८२॥ वबाधे धैर्यहारी च निर्मोत्सृष्टान्तरे शरैः। रूपस्पर्द्धासमुद्भूतमत्सर्य इव मन्मथः ॥८३॥ या वक्ता रूपलुब्धानां स्मरार्त्तिस्तन योषिताम्। फलितेव च साभास्य दातस्यान महीक्षितः ॥८४॥ ततो दिनैश्च विरहम्लानपाण्डुः शनैस्स सः। आप्तेभ्यः सचिवेभ्यस्तत्पृच्छद्भ्यः स्वं मनोगतम् ॥८५॥ मन्त्रयित्वा च तैः सार्द्धं कन्यां मदनसुन्दरीम्। याचितुं प्राहिणोद्दूतं स राज्ञे देवशक्तये ॥८६॥ सङ्गमस्वामिनामानं कार्यज्ञं कार्यवेदिनम्। विप्रमाप्तं कुलीनं च मधुरोदात्तभाषिणम् ॥८७॥ स गत्वा सुमहार्हेण विप्रः परिकरेण सान्। विद्रमन् सङ्गमस्वामी प्राविशत्कुण्डिनं पुरम् ॥८८॥ यथावत् तत्र राजानं देवशक्तिं ददर्श तम्। स स्वामिनोऽर्थे तस्माच्च प्रार्थयामास तत्सुताम् ॥८९॥ १ पुराकाले पुस्तकपत्रादिरक्षणार्थं वंशस्य लोहस्य वा गोलाकारं किमपि प्रवर्त्तन्ते स्म तदेव वंशगुलिका भवेत्। पटचित्राणां कृते वेष्टनदण्डोऽपि भवति। तदेव वा भवेत्।
नवम लम्बक ६१३
नवम लम्बक ६१३ ... रहूरहा गया है। उस राजकुमारी के घर होना न आपका ही लिखाया था ॥३६॥ उस में बार-बार नहीं लिख सकता इसलिये आपके सम्मुख आने पर भी निष्कपट वा आपके साथ छल नहीं किया जा सकता ॥३७॥ इस प्रकार कहते हुए तैलङ्ग से राजा ने कहा—'चित्रपट पर लिखी गई उस मुझे सुता दे डाला। तब चित्रकार ने आले(अङ्गूसा) से उस चित्र पट को सादर निकाला और मदनसुन्दरी का वह रूप राजा को दिखा दिया ॥३८-३९॥ राजा कनकवर्ष चित्र में लिखी रहने पर भी विचित्र लावण्यमयी उसे देखकर उसी क्षण काम के वशीभूत हो गया ॥४०॥ तब राजा ने उस चित्रकार का प्रचुर सुवर्ण-मुद्राओं से सम्मानित करके तुरन्त अपनी चित्रशाला का चित्र लाने का अपने विश्वस्त दूत को भेजा गया ॥४१॥ वह चित्रकार उस उत्सव और लावण्य का नेता तैलङ्गप्रभृत सेवावाला वह राजा राज्य व रानी के साथ हाथ जोड़कर चित्रपट पुत्री के सम्मुख होकर प्रणाम करने लगा ॥४२॥ उसी समय अवसर पाकर रूप का अपने को ईर्ष्या करनेवाला कामदेव ने भी बाणों का मार से राजा को अधीर बना दिया ॥४३॥ उस राजा ने अपने रूप पर आत्मश्लाघा का नैया। राजनीतिज्ञ उसका राज्य न देख परिणाम शून्य का भय स्थिर रहा था ॥४४॥ इस प्रकार कुछ ही दिनों में राजा विरह से दुर्बल होकर पीला पड़ गया और दुबला हो गया। यह देखकर मन्त्री ने गुप्त मन्त्रणा का निश्चय रूप शान्ति किया और चित्रकार को वहां से उसने अपने गृह पर का प्रस्थान कर दी ॥४५॥ या इस भांति न सम्मर्जित करके मदनमञ्जरी के पिता का पार्वणार्थिक विना राज्य दे देने पर के दाता रूप में उसका निष्कास दिया गया ॥४६॥ दृष्टान्त से डर कर राजा को एक दूत विशेष दूत रूप कनकप्रभा आवश्यक रूप में देकर मदनमञ्जरी के पास देने के लिए भिजवाया ॥४७॥ ... ...
६१४ कथासरित्सागर
६१४ कथासरित्सागर देया साऽयमयान्यस्मै दुहित्रेषा स चोचितः। भूपः कनकवर्षोऽस्मावृक्षोऽप्यतां च याचत ॥९१॥ तदेतस्मै ददाम्येनामिति सम्मन्त्र्य सोऽपि च। हृद्यं देवशक्तिस्तत्सङ्गमस्वामिनो वचः ॥९२॥ दर्शयामास तस्मै च तस्या रूपमिवाद्भुतम्। नृत्तं मदनसुन्दर्याः सुतायाः स महीपतिः ॥९२॥ स तस्तद्दर्शनप्रीतः सङ्गमस्वामिनं स तम्। प्रतिपन्नसुतादानं सम्मान्य प्राहिणोन्नृपः ॥९३॥ निश्चित्य लग्नमुद्वाहहेतोरागम्यतामिह। सन्दिशनिति मम तेन प्रतिदूतं ससर्ज च ॥९४॥ आगत्य सङ्गमस्वामी प्रतिदूतयुतोऽथ सः। राज्ञे कनकवर्णाय सिद्धं कार्यं न्यवेदयत् ॥९५॥ ततो लग्नं विनिश्चित्य प्रतिदूतं प्रपूज्य तम्। असकृत्सा च विज्ञाय रक्तां मदनसुन्दरीम् ॥९६॥ सद्दिवाहाय दुर्व्वारधैर्य्यो निश्शङ्कमानसः। राजा कनकवर्णोऽसौ प्रायातत्कुण्डिनं पुरम् ॥९७॥ अशोकल्नतयाच्छ- प्रत्यन्तारण्यवासिनः। प्राणिप्राणहरांस्तित्तम्निहादीम्श्शबरानिव ॥९८॥ विदर्भान् प्राप्य नगरं कुण्डिनं तद्विवेश सः। निर्गतेनाग्रतो राज्ञा सहितो देवशक्तिना ॥९९॥ तत्र पौरपुरन्ध्रीणां विलब्धनयनोत्सवः। मज्जितोद्वाहसम्भारं प्राविशद्राजमन्दिरम् ॥१००॥ विधापयति स्म तत्रतत् म् न्नि सपरिच्छदः। दशनशितनुपादाश्कृताषागनुगज्जितः ॥१०१॥ अथयद्यैवशक्तिस्तस्मै तदा मदनसुन्दरीम्। गता गज्यकणापणं सर्वस्वन गम ददौ ॥१ २॥ स्थित्वा च तत्र राजाहं ग राजा नगरे निजम्। आगात् कनकवर्णोऽथ नववध्वा समं तया ॥१०३॥ प्राप्य मान्याथ सम्भिन् जगदानन्दायिनि। गरोमुर्रे शनिमीयागीत्सणागपं पुर्म् ॥१ ०॥
नवम लम्बक ६१५
नवम लम्बक ६१५ यह कन्या किसी को तो देनी ही है, राजा कनकध्वज उसके लिए उपयुक्त वर है। फिर, वह हमारे ऐसों से कन्या की मांग करता है। अतः उसे ही कन्या देता हूँ—इस प्रकार, विचार कर राजा देवशक्ति ने संगमस्वामी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया ॥९०-९१॥ और राजा ने उस कन्या के रूप के समान उस कन्या का मूल्य भी संगमस्वामी को दिखाया ॥९२॥ तब हर्ष से प्रसन्न संगमस्वामी को कन्या देने की स्वीकृति प्रदान करके और उसका यथोचित सत्कार करके राजा ने उसे भेज दिया ॥ ९३॥ और, संगमस्वामी के साथ ही अपना सन्देश देकर अपने दूत को भी भेजा कि लग्न का निश्चय करके आप बारात के साथ विवाह के लिए आइए ॥९४॥ तब राजा के दूत के साथ आकर संगमस्वामी ने राजा कनकध्वज को कार्य-सिद्धि की बात उससे निवेदित की ॥९५॥ तदनन्तर, लग्न का निश्चय करके और राजा के दूत का सत्कार करके उस मदनसुन्दरी को अपने प्रति अनुरक्त जानकर वह प्रचण्ड बलशाली राजा कनकध्वज विवाह के लिए कुण्डिनपुर गया ॥९६-९७॥ राजा कनकध्वज ने सीमान्त के वनों में रहनेवाले सिंह, व्याघ्र आदि हिंसक पशुओं और भील आदि दस्युओं को मार्ग में मारते हुए विदर्भ देश में प्रवेश किया ॥ ९८॥ विदर्भ में आकर राजा देवशक्ति से अगवानी किये जाते हुए कनकध्वज ने कुण्डिनपुर नगर में प्रवेश किया ॥९९॥ उस नगर की नागरिक स्त्रियों के नेत्रों का आनन्द बना हुआ वह विवाह की सज्जाओं से सुसज्जित राजभवन में गया ॥१००॥ राजा देवशक्ति द्वारा किये गये उदारतापूर्ण आतिथ्य-सत्कार से प्रसन्न राजा कनकध्वज अपने बारातियों के साथ उस दिन आनन्दपूर्वक वहीं रहा ॥१०१॥ दूसरे दिन देवशक्ति ने उस मदनसुन्दरी कन्या को केवल एक राज्य को छोड़कर सर्वस्व के साथ उसे प्रदान किया ॥१०२॥ विवाह के उपरान्त राजा कनकध्वज उस विशाल गजबलों सैन्यदल को वधू मदनसुन्दरी के साथ अपने नगर को वापस आया ॥१०३॥ चन्द्रिका के साथ चन्द्रमा के समान मदनसुन्दरी के साथ अमृत का आह्लाद देनेवाला राजा कनकध्वज के अपने नगर में पहुँचने पर सारा नगर उत्सवमय हो रहा था ॥१०४॥
साद्य प्राणाधिका तस्य राज्ञो मदनसुन्दरी। आसीदग्रमहिष्यस्याप्यच्युतस्येव रुक्मिणी ॥१०५॥ अन्योन्यवदनासक्तलोचने स्मरसायकैः । पीडिताविव तौ चास्तां दम्पती चारुपक्ष्मभिः ॥१०६॥ एकदा चाजगामात्र विकसत्केसरावलीः। वलयन् मानिनीमानमातङ्गमधुकेसरी ॥१०७॥ लग्नालिमाला मौर्वीका पुष्पेषोः कुसुमाकरः। सञ्जीचकार चोत्फुल्लचूतवल्लीधनुर्लताः ॥१०८॥ वभौ घोपवनानीव चेतांस्यध्वगयोषिताम्। समुद्दीपिकामानि कम्पयन्मरुदानिलः ॥१०९॥ पूर्वा नवीनां पुष्पाणि तरूणां शशिनः कलाः। क्षीणानि पुनरायान्ति यौवनानि न देहिनाम् ॥११०॥ भो मुञ्चतमानकलहा रमध्वं दयितान्विताः। इतीव मधुरालापाः कोकिला जगदुर्जनान्' ॥१११॥ तत्कालं च मधूद्यानं विहर्तुं प्रविवेश सः। राजा कनकवर्षोऽत्र सर्वैरन्तःपुरैः सह ॥११२॥ मूर्च्छत्स्निग्धमणिकानां रक्तैः परिजनोज्ज्वलैः । गीतैर्वरवराङ्गानां च कोकिलभ्रमरध्वनिम् ॥११३॥ दय्या मदनसुन्दर्या समं तत्र स भूपतिः। चिक्रीड सावरोधोऽपि कुसुमावचयादिभिः ॥११४॥ विहृत्य चात्र सुचिरं स्नातुं गोदावरीं नृपः। अवतीर्य जलक्रीडां सान्तःपुरजनो व्यधात् ॥११५॥ मुखैः पद्मानि नयनैरुत्पलानि पयोधरैः। रथाङ्गनाम्नां युग्मानि नितम्बैः पुलिनस्थलीः ॥११६॥ विजित्य तस्याः सरितः शोभमामासुराशयम् । तरङ्गोच्छितामर्षभूम हायासावद्धनाः ॥११७॥ अम्भोविहारविगलद्वस्त्रव्यक्ताङ्गयष्टिषु । रेमे कनकवर्षस्य त्वाग तस्य सदा मनः ॥११८॥
१ माघेन तुलना कार्या—'उपजघ्रतु मानमलं शतः! विपदिनैः पुनरेति वयं वपुः पद। वामृताभिरितीव समीरिते स्मरकते रमते स्म वधूजनः॥'-माघ
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६१८ कथासरित्सागर
६१८ कथासरित्सागर एकां चाताडयद्राज्ञीं हेमकुम्भद्वयोपमे। कुचयुग्मे च विस्रस्तवसने करवारिणा ॥११९॥ तद्दृष्ट्वा सा चुकोपास्यै सेर्ष्या मदनसुन्दरी। कियत्क्षोभ्या नदीयेव सोद्वेगेव जगाद च ॥१२०॥ उत्तीर्य चाम्भसः प्रायादासन्नवस्त्रान्तरा रुषा। प्रियापराधं शंसन्ती तं सखीभ्यः स्वमन्दिरम् ॥१२१॥ ततो ज्ञाताक्षमस्तस्या जलक्रीडां विमुच्य सः। राजा कनकवर्षोऽपि तद्वासगृहमभ्ययौ ॥१२२॥ वार्यमाणो रुषा तत्र पञ्जरस्थैः शुकैरपि। प्रविश्य स ददर्शान्तर्देवीं तां मन्युपीडिताम् ॥१२३॥ वामहस्ततलन्यस्तविषण्णवदनाम्बुजाम् । स्वच्छमुक्ताफलनिभैः पतद्भिर्बाष्पबिन्दुभिः ॥१२४॥ 'जइ विरहो ण सहिज्जइ माणो (सुहा वि) परिवज्जणीओ से। विरहो हिअअ सहिज्जइ माणो (एव्व) परिवड्ढणीओ से ॥१२५॥ इअ आणिऊण णिउण चिट्ठसु ओलम्बिऊण इक्कवरम्। उहयतडदिण्णपाओ मज्झणिबिडिओ धुव विणिस्सिहिसि ॥१२६॥ इतीमं द्विपदीखण्डं पठन्तीं साश्रुगद्गदम्। निर्यद्दन्तांशुहारिण्या गिरापभ्रंशमुग्धया ॥१२७॥ विलोक्य च तथाभूतां तां कोपेऽपि मनोरमाम्। उपाययौ सलज्जश्च सभयश्च स भूपतिः ॥१२८॥ पराङ्मुखीमवाश्लिष्य वचोभिः प्रीतिपेशलैः। प्रवृत्तोऽभूत्सभिनयंस्तां प्रसादयितुं च सः ॥१२९॥ वक्रोक्तिसूचितार्थे परिहारे पपात च। तस्याश्चरणयोर्निन्दन्नात्मानमपराधिनम् ॥१३०॥ १ यदि विरहो न सह्यते मानः (सुखादपि) परिवर्जनीयस्ते। विरहो हृदय सह्यते मानः (एव) परिवर्धनीयस्ते॥ इति ज्ञात्वा निपुणं तिष्ठस्वावलम्ब्यैकतरम्। उभयतटदत्तपादो मध्यनिपतितो ध्रुवं विनंक्ष्यसि इति च्छाया।
नवम स्तम्बक ६१९ इसी समय वह राजा एक रानी के दो स्वर्ण-कलशों के समान वस्त्ररहित उत्तुंग कुचों को पानी के छींटा से मारने लगा ॥११९॥ यह देखकर मदनसुन्दरी के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई और वह कहने लगी 'तुम नदी का कितना क्षोभ करोगे' इतना कहकर और जल से बाहर निकलकर, क्रोध के साथ वस्त्र बदलकर अपनी सखियों से राजा की शिकायत करती हुई वह अपने भवन को चली गई॥ १२०-१२१॥ तब उसके भाव को समझकर राजा भी जलक्रीड़ा छोड़कर उसके (मदनसुन्दरी) निवास भवन को गया ॥१२२॥ वहाँ पर पिंजराँ में टँगे हुए शुकौँ से भी रोके जाते हुए राजा ने भीतर जाकर क्रोधातुर रानी को देखा ॥१२३॥ बायें हथेली पर खिन्न और म्लान मुख-कमल को रखी हुई, आँखों से बड़े-बड़े स्वच्छ मोतियों के समान आँसुओं की बूँदों को गिराती हुई, बँधे हुए कण्ठ से अस्पष्ट उच्चारण करती हुई और दाँतों की किरणों से मनोहर लगती हुई वह रानी अपभ्रंश भाषा में सुन्दर द्विपदी के इस टुकड़े को गा रही थी- यदि विरह नहीं सहा जाता तो तुम्हें मान छोड़ना चाहिए। हे हृदय ! यदि विरह सहा जाय तो मान को बढ़ाओ। ऐसा जानकर दोनों में से एक का निश्चय कर लो। अन्यथा दोनों किनारों पर पैर रखने से बीच में गिरकर अवश्य नष्ट हो जाओगे ॥१२४-१२७॥ इस प्रकार क्रोध में भी मनोहर लगती हुई मदनसुन्दरी के पास राजा कन्दर्प डरता और लजाता हुआ गया ॥१२८॥ मुँह फेरकर बैठी हुई उसे वह राजा अपने आभिधान और मधुर वचनों द्वारा नम्रता के साथ मनाने लगा ॥१२९॥ नवोत्कण्ठा से उसके अनुराग को बताती हुई सखियों के सामने ही मदनसुन्दरी के चरणों पर वह राजा अपने अपराधी आत्मा की निन्दा करता हुआ गिर पड़ा ॥१३०॥
५२ कथासरित्सागर
५२ कथासरित्सागर स्तनस्तमयुनेवाम्बुवारिणा गलितेन सा। सिञ्चन्ती कण्ठलग्नास्य प्रसाद्य महीपतिं ॥१३१॥ अथैष हृष्टो नीत्वा तद्दिनं कुपिततुष्टया' । राजा तया सहासेव्य रत निशामगाभिशि॥१३२॥ सुप्तो ददर्श चाकस्मात् स्वप्ने विकृतया स्त्रिया। हृतामेकावलीं कण्ठाच्चूडारत्नं च मूर्धतः ॥१३३॥ ततोऽप्यपश्यद्वेताल नानाप्राप्यङ्गविग्रहम्' । बाहुयुद्धे प्रवृत्तं च त स भूमावपातयत् ॥१३४॥ पृष्ठोपविष्टश्छोड्डीय पक्षिणेव विहायसा। नीत्वा तेन नृपोऽम्भोधी वेतालेन स विक्षिपे ॥१३५॥ तत्र कथञ्चिदुत्तीर्ण परमेकावलीं गले। चूडामणिं च तं मूर्ध्नि पूर्ववत्स्थितमैक्षत ॥१३६॥ एतद्दृष्ट्वा प्रबुद्धः स प्रातः परिचयागतम्। अस्य क्षपणकं राजा फलं स्वप्नस्य पृष्टवान् ॥१३७॥ । न वाच्यमप्रियं किं तु कथं पृष्टो न वच्मि य ॥१३८॥ या त्वयैकावली दृष्टा हृता चूडामणिस्तथा। सैष देव्या वियोगस्ते पुत्रेण च भविष्यति ॥१३९॥ प्राप्ते चैकावलीरत्नं यदुत्तीर्णाब्धिना त्वया। दुःखान्ते सोऽपि भावी ते देवीपुत्रसमागमः ॥१४०॥ इति क्षपणकेनोक्ते विमृश्य स नृपोऽब्रवीत्। पुत्रो मेऽद्यापि नास्त्येव स तावज्जायतामिति ॥१४१॥ अथोपयाताद्योपौरस रामायणपाठकात् । पुत्रार्थं विहितक्लेदं राजा ददर्श नृपम् ॥१४२॥ ततोऽमृतसुतप्राप्तिश्चिन्त क्षपणक गतः। राजा कनकवर्षस्तद्दिनाय विमना दिगम् ॥१४३॥ १ आदौ कुपिता पश्चात् तुष्टा तया । २ 'मोहम्-त्रो-बद्धो'स्थाने पुस्तरान्तरमवमितिः नानाप्राप्यङ्ग विग्रहा मूर्तकः समुत्पन्नतः तदि ३ मूलपुस्तके भ्रटितमिदं यथार्थम्।
प्रथम लम्बक १२१
प्रथम लम्बक १२१ तब उस क्रोधाग्नि से ही मानों पिघलकर गिरते हुए आँसुओं से राजा को भिगोती हुई रानी गले से लिपट गई ॥१३१॥ तदनन्तर, राजा क्रुद्ध होकर प्रसन्न हुई रानी के ही पास उस दिन को व्यतीत कर रात्रि में भी उसके साथ आनन्द विलास करके सो गया ॥१३२॥ सोये हुए उसने अकस्मात् एक स्वप्न देखा कि एक कुरूपा स्त्री ने उसके गले से मोतियों की एक बड़ी माला और मुकुट के रत्न निकाल लिये हैं। उसके पश्चात् विविध प्राणियों के अंग वाले उसने दो बेतालों को देखा। उनके साथ बाहुयुद्ध होने पर राजा ने उन्हें भूमि पर पटक दिया और उनकी पीठ पर वह चढ़ बैठा। बेतालों ने पीठ पर बैठे हुए राजा को पक्षी के समान उड़कर समुद्र में लेजाकर फेंक दिया तदनन्तर किसी प्रकार समुद्र से निकले हुए राजा ने गले में मोतियों की माला और मुकुट में चूडामणि आदि रत्नों को पहले के ही समान देखा ॥१३३-१३६॥ यह स्वप्न देखकर प्रातः काल जगे हुए राजा ने मिलने के लिए आए हुये बौद्ध भिक्षु को देखकर स्वप्न का फल पूछा ॥१३७॥ बौद्ध भिक्षु ने कहा-महाराज आपके सामने अप्रिय बात नहीं कहनी चाहिए किन्तु आपसे पूछे जाने पर कैसे न कहूँ ॥१३८॥ आपने जो मोतियों की माला और चूडामणि का अपहरण देखा वह आपके पुत्र और महारानी के साथ वियोग का सूचक है। समुद्र से निकलकर जो तुमने उन दोनों वस्तुओं को पा लिया यह दुःख के अन्त में फिर से उन दोनों के मिलने का सूचक हैं-॥१३९ १४०॥ क्षपणक के इस प्रकार कहने पर कुछ सोचकर राजा ने कहा-'मुझे अभी तक पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ अब पहले वह उत्पन्न तो हो' ॥१४१॥ इसके उपरान्त आये किसी हुए रामायण की कथा कहनेवाले से राजा ने सुना कि राजा दशरथ ने पुत्र के लिए बहुत कष्ट उठाया ॥१४२॥ क्षपणक के चले जाने पर, राजा के मन में पुत्रोत्पत्ति की चिन्ता बढ़ गई। और, उसने उस दिन को बड़े खिन्न मन से बिताया ॥१४३॥
६२२ कथासरित्सागर
६२२ कथासरित्सागर
रात्रावकस्माज्जैकाकी विनिद्रः शयनस्थितः । द्वारमुद्घाटितेऽप्यन्तः प्रविष्टां स्त्रियमैक्षत ॥१४४॥ विनीता सौम्यरूपा च सा तं साश्चर्यमुत्थितम् । कृतप्रणाम वक्ताशीः क्षितीश्वरमभाषत ॥१४५॥ पुत्र मां विद्धि तनयां नागराजस्य वासुकेः । त्वत्पितुर्भगिनीं ज्येष्ठां नाम्ना रत्नप्रभामिमाम् ॥१४६॥ रक्षार्थं तेऽन्तिके शश्वददृष्टा च वसाम्यहम् । अद्य दृष्ट्वा सचिन्तं त्वामात्मा ते बोधितो मया ॥१४७॥ न द्रष्टुमुत्सहे ग्लानिं तव तद्ब्रूहि कारणम् । इत्युक्तः स तया राजा पितृष्वस्रा जगाद ताम् ॥१४८॥ धन्योऽस्म्यम्ब यस्यैव त्वं प्रसादं करोषि मे । अनिवृत्तिं च मे विद्धि पुत्रासम्भवहेतुकाम् ॥१४९॥ अपि राजर्षयो यत्र पुरा दशरथादयः । स्वर्गार्थमेवेच्छंस्तत्राम्ब कथं नेच्छन्तु मादृशाः ॥१५०॥ एतत्कनकवर्षस्य नृपतेस्तस्य सा वचः । श्रुत्वा रत्नप्रभा नागी भ्रातुः पुत्रमुवाच तम् ॥१५१॥ तर्हि पुत्र वदाम्येकं यमुपायं कुरुष्व तम् । गत्वा स्वामिकुमारं त्वमतदर्थं प्रसादय ॥१५२॥ कुमारधारां विघ्नाय पतन्तीं मूर्ध्नि दुःसहाम् । शरीरान्तःप्रविष्टायाः प्रभावान्मम सहिष्यसे ॥१५३॥ विघ्नजातं विजित्या यदपि प्राप्स्यसि वाञ्छितम् । इत्युक्तान्तर्दधे नागी राजा हृष्टोऽक्षिपत्क्षपाम् ॥१५४॥ प्रातर्मन्त्रिषु विन्यस्य राज्यं पुत्राभिकाङ्क्षया । ययौ स्वामिकुमारस्य पादमूलं स भूपतिः ॥१५५॥ तत्र तीव्रं तपश्चक्रे तमाराधयितुं प्रभुम् । तयार्पितबलो नाग्या शरीरान्तःप्रविष्टया ॥१५६॥ ततोऽशनिनिभा राज्ञः पतितुं तस्य मूर्धनि । कुमारवारिधारा सा प्रवृत्ताभूदनारतम् ॥१५७॥ स च सहे शरीरान्तर्गतनागीबलेन ताम् । ततस्तस्याभिविप्सार्थं हेरम्बं प्रेरयद्गुहः ॥१५८॥
नवम लम्बक ६२३
नवम लम्बक ६२३ एक बार रात्रि में शयनागार में अकेले सोये हुए राजा ने पर्यंग पर पड़े-पड़े ही द्वार बन्द रहने पर भी सहसा अन्दर आई हुई एक स्त्री को देखा ॥१४४॥ वह स्त्री नम्र और शान्त-स्वरूप थी। उसने शय्या से उठे और प्रणाम करते हुए राजा को आशीर्वाद देकर कहा—॥१४५॥ 'बेटा मैं तुम्हारे पिता की बड़ी बहन और नागराज वासुकि की कन्या हूँ। मेरा नाम रत्नप्रभा है ॥१४६॥ मैं अदृश्य रूप से तेरी रक्षा के लिए सदा तेरे पास रहती हूँ। आज तुम्हें अधिक चिन्तित देखकर तेरे सामने प्रकट हुई हूँ। मैं तुझे खिन्न नहीं देख सकती। दुःखी होने का कारण क्या है बताओ। पिता की बहन (बुआ) के इस प्रकार कहने पर राजा ने उससे कहा—॥१४७-१४८॥ 'माता मैं धन्य हूँ कि तुम मेरी रक्षा का ध्यान रखती हो। किन्तु, पुत्र न होने का मुझे दुःख है। जब कि प्राचीन काल के राजर्षि दशरथ ऐसे महान् व्यक्तियों ने स्वर्ग के लिए पुत्र की इच्छा की तो मेरे ऐसे व्यक्ति क्यों न करें' ॥१४९ १५ ॥ राजा कनकवर्ष के यह वचन सुनकर वह रत्नप्रभा नागिन भाई के पुत्र (राजा) से बोली—॥१५१॥ यदि ऐसा है तो हे पुत्र मैं तुमसे कहती हूँ कि तू जाकर पुत्र के लिए स्वामी कार्तिक से प्रार्थना कर ॥१५२॥ उनकी आराधना में विघ्न करने के लिए सिर पर कुमार-धारा गिरती है तू मेरे शरीर में प्रविष्ट हो जाने के कारण उस धारा को सहन कर सका ॥१५३॥ और भी असाध्य विघ्नों को जीतकर तू अपना ईप्सित फल प्राप्त कर लेगा। इतना कहकर वह नागिन अन्तर्धान हो गई। और राजा ने वह रात्रि प्रसन्नतापूर्वक व्यतीत की ॥१५४॥ प्रातःकाल राजा ने राज्य का भार मन्त्रियों पर छोड़कर पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से स्वामी कार्तिक के चरणों में प्रस्थान किया ॥१५५॥ वहाँ जाकर उसने कार्तिक की आराधना के लिए कठोर तप प्रारम्भ किया क्योंकि शरीर में प्रविष्ट नागिन (बुआ) का बल उसे प्राप्त था ॥१५६॥ तब राजा के सिर पर वज्र के समान तीव्र कुमार-धारा निरन्तर गिरने लगी ॥१५७॥ शरीर के अन्दर प्रविष्ट नागिन के बल से राजा ने धारा के वेग को सहन कर लिया। तब उनकी तपस्या में विघ्न करने के लिए कार्त्तिकेय ने यमेश्वरों को प्रेरित किया ॥१५८॥
हेरम्बश्वाससूतत्र धागमध्यं महाविषम्। तस्याजगरमत्युग्रं न स तेनाप्यकम्पत ॥१५९॥ ततो विनायकः साक्षाद्धन्ताघातानुरस्य सः। एत्य वातुं प्रवृते तस्याजय्यः सुरैरपि ॥१६०॥ मत्वा तं दुर्जयं देवं सोऽथ स्तुतिमिरचितुम्। राजा कनकवर्षस्तद्विषयोपचक्रमे ॥१६१॥ नमः सर्वार्थसंसिद्धिनिधिकुम्भोपमात्मने। लम्बोदराय विघ्नेश व्याघ्रात्तङ्करुणाय ते॥१६२॥ लीलोत्क्षिप्तकराघातविभुतासनरेणुजम् । ब्रह्माणमपि सोत्कम्पं कुर्वन्नजय गजानन ॥१६३॥ सुरासुरमुनीन्द्राणामपि सन्ति न सिद्धयः। अतुष्टे त्वयि लोकैकधुरन्ध्य शङ्करप्रिय ॥१६४॥ घटोदरः शूर्पकर्णो गणाध्यक्षो मदोत्कटः। पाशहस्तोऽम्बरीषश्च जम्भकस्त्रिशिखायुधः ॥१६५॥ एवमाद्यैः स्तुवन्ति स्म पापघ्नैराष्टषष्टिभिः। तत्सख्यस्थाननियतैर्नामभिस्त्वां सुरोत्तम ॥१६६॥ स्मरतः स्तुवतश्च त्वां विनश्यन्ति भयं प्रभो। रणराजकुलद्यूतघोराग्निश्वपदादिजम् ॥१६७॥ इति स्तुतिपदैरेतैरन्यैर्वहुविधैश्च सः। नृपः कनकवर्षस्तं विघ्नेश्वरमपूजयत् ॥१६८॥ तुष्टोऽस्मि न करिष्यामि विघ्नं ते पुत्रमाप्नुहि। इत्युक्त्वाऽन्तर्दधे तत्र राज्ञस्तस्य स विघ्नजित् ॥१६९॥ ततः स्वामिकुमारस्तं तदाराधारिणं नृपम्। उवाच धीरं तुष्टोऽस्मि तव याचस्व तद्वरम् ॥१७०॥ तच्छ्रुत्वा स प्रहृष्टस्तं देवं राजा व्यजिज्ञपत्। त्वत्प्रसादेन मे नाथ सूनुरुत्पद्यतामिति ॥१७१॥ एवमस्तु सुतो भावी भवतो मद्गुणांशभाक्। नाम्ना हिरण्यवर्षश्च भविष्यति स भूपते ॥१७२॥ इत्युक्त्वा गर्भगेहान्तः प्रवेशाय तमाह्वयत्। सविशेषप्रसादाप्तुमुपेतं बर्हिवाहनः ॥१७३॥
नवम लम्बक ६२५
नवम लम्बक ६२५
गणप ने उस धारा में महाविष मिला दिया और एक भीषण अजगर को उत्पन्न किया। किन्तु, उससे राजा जरा भी विचलित न हुआ ॥१५९॥ तब विनायक ने स्वयं आकर राजा के पेट में दाँतों से प्रहार किया। जिस प्रहार का देवता भी सहन नहीं कर सकते थे राजा ने उसका भी सहन किया ॥१६०॥ तब राजा कनकवर्ष ने गणेशजी को दुर्जय जानकर उस दन्त-प्रहार का सहन करने के उपरान्त उनकी स्तुति प्रारम्भ की— ॥१६१॥ 'हे सभी इच्छित अर्थों की सिद्धि के कोष-स्वरूप कुम्भ के भगवान् गजपति तुम्हारे लिए नमस्कार है। हे लम्बोदर, हे विघ्नविनाशक, हे सर्प का यज्ञोपवीत धारण करनेवाले, तुम्हें प्रणाम करता हूँ ॥१६२॥ झींझा (क्रीडा) करते समय अपनी सूँड़ से ब्रह्मा के भी आसन-कमल को कँपानेवाले गजानन तुम्हारी जय हो ॥१६३॥ तुम्हारे अप्रसन्न होने पर देवता, दैत्य और मुनिजनों को भी सिद्धियाँ प्राप्त नहीं हो सकतीं। अतः हे समस्त लोकों के एकमात्र शरण देनेवाले शंकर के दुलारे, तुम्हें प्रणाम है ॥१६४॥ हे महोदर, हे शूर्पकर्ण, हे गणाध्यक्ष, हे महोत्कट, हे पाशहस्त, हे अम्बरीष, हे अम्बक और हे त्रिशिखायुध, इस प्रकार उन-उन स्थानों में प्रसिद्ध अड़सठ नामों से देवता और दैत्य तुम्हारा स्मरण और स्तुति करते हैं। इन नामों से तुम्हारी स्तुति करनेवाले को संग्राम, राजकुल, जूआ, चोर, अग्नि और हिंस्र जन्तुओं का भय नहीं रहता' ॥१६५—१६७॥ उस राजा कनकवर्ष ने इस प्रकार की बहुसंख्य स्तुतियों से विघ्नेश्वर गणेश की प्रार्थना की ॥१६८॥ 'मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ। अब विघ्न न करूँगा। तू पुत्र प्राप्त कर।' राजा से इस प्रकार कहकर गणेशजी अन्तर्धान हो गये ॥१६९॥ तब कुमार-धारा का सहन किये हुए उस राजा को दर्शन देकर स्वामी कार्तिकेय ने कहा—'हे वीर मैं तुझसे प्रसन्न हूँ, वर माँग' ॥१७०॥ यह सुनकर हर्षित राजा ने उनसे निवेदन किया—'हे प्रभो आपकी कृपा से मुझे पुत्र-प्राप्ति हो' ॥१७१॥ ऐसा ही हो। तुझे मेरे गण के मध्य से पुत्र-प्राप्ति होगी। वह संसार में हिरण्यवर्ष नाम से विख्यात होगा ॥१७२॥ ऐसा कहकर मयूरवाहन कार्तिकेय ने उस पर विशेष कृपा करने की इच्छा से राजा को मन्दिर के गर्भगृह में बुलाया ॥१७३॥ ७९
१२६ कथासरित्सागर
१२६ कथासरित्सागर सेनादृष्ट्यास्य निर्गान् नागी वहान्नृपस्य सा। विशन्ति शापभीता हि न कुमारगृहं स्त्रियः ॥१७४॥ ततः कनकवर्षोऽसौ स्वेन मानुषतेजसा। विवेश गर्भभवनं तस्य देवस्य पावकेः ॥१७५॥ स तं नाग्यनधिष्ठानात् पूर्वतेजोविनाकृतम्। दृष्ट्वा नृपं म्रियेतत् स्यादिति देवोऽप्यचिन्तयत् ॥१७६॥ ज्ञात्वा नागीबलव्याजनिर्व्यूढविषमद्रवम्। प्रणिधानाच्च तं क्रुद्धः शशाप स नृपं गुहः ॥१७७॥ व्याजस्त्वया कृतो यस्मादतो जातेन सूनुना। महादेव्यौ च दुर्दान्तो वियोगस्ते भविष्यति ॥१७८॥ निर्घासदारुणं श्रुत्वा शापमेतं स भूपतिः। सूक्तैस्तुष्टाव तं देवं मोहं मुक्त्वा महाकविः ॥१७९॥ स सुभाषिततुष्टोऽथ षण्मुखस्तमभाषत। राजंस्तुष्टोऽस्मि सूक्तैस्ते शापान्तं तव वच्मि तत् ॥१८०॥ भविष्यत्यब्दमेकं ते पत्नीपुत्रवियुक्तता। मुक्तोऽप्यमृत्युरित्यास्तौ च प्राप्स्यस्यत परम् ॥१८१॥ इत्युक्त्वा विरतालापं षण्मुखं स प्रणम्य तम्। तत्प्रसादसुधातृप्तो राजा स्वपुरमाययौ ॥१८२॥ तत्र तस्यामृतस्यन्दौ ज्योत्स्नायामिव शीतगोः। दम्यां मदनसुन्दर्यां क्रमात्सूनुरजायत ॥१८३॥ दृष्ट्वा सुतमुखं सोऽथ राजा राज्ञी च सा मुहुः। अत्यानन्दमयायुक्ते नामर्ततां सदारमनि ॥१८४॥ तत्कालं चोत्तरङ्गं चक्रं वसु वर्षम् स भूपतिः। निजां कनकवर्षाख्यां मयग्भुवि यथार्थनाम् ॥१८५॥ पञ्चरात्रे गते षष्ठ्यां रजनौ जातजन्मनि। कृत रक्षाविधौ तत्र मधोऽगङ्गितमागतः ॥१८६॥ ततः श्रुतिमवाप्तानां सत्राश्च नभः क्रमात्। शत्रुगोपेशितनेव राज्यं राज्ञः प्रमान्ति ॥१८७॥ मदन्यश्च क्षिपन्नाशं वर्षम्योग्भूसित्रदृम् । नतो पार्वितुमारभ वातमत्तमनेङ्कजः ॥१८८॥
नवम लम्बक १२७
नवम लम्बक १२७ यह जानकर वह अदृश्य भामिन उसके शरीर से बाहर निकल गई, क्योंकि शाप के भय से स्त्रियाँ कुमार के गर्भगृह में प्रवेश नहीं करतीं ॥१७४॥ तब वह राजा कनकप्रभ भामिन के तेज से रहित होकर केवल अपने मानव-तेज के साथ ही वह कार्तिकेय देवता के गर्भगृह में प्रविष्ट हुआ ॥१७५॥ कुमार ने भामिन के निकल जाने के कारण तेजोहीन राजा को देखकर सोचा कि यह क्या बात है ॥१७६॥ और ध्यान लगाकर भामिन के बल से कठोर तपस्या में उत्तीर्ण हुए उसे जानकर क्रोध में शाप दिया—॥१७७॥ 'राजा तूने मेरे साथ कपट व्यवहार किया है। इसलिए तुझे उत्पन्न हुए बालक और महारानी से भीषण वियोग होगा ॥१७८॥ वज्रपात के समान भयंकर शाप को सुनकर महाकवि राजा ने मोह त्याग कर सुन्दर- सुन्दर सूक्तियों से स्वामी कार्तिकेय की स्तुति प्रारम्भ की ॥१७९॥ उसकी सूक्तियों से सन्तुष्ट होकर षण्मुख ने उससे कहा—'राजन्, तेरी सूक्तियों से मैं प्रसन्न हुआ। अब तेरे उस शाप का अन्त करता हूँ ॥१८०॥ तुझ रानी और पुत्र का वियोग एक बार के लिए होगा। तू तीन बार अपमृत्यु से बचकर उन्हें प्राप्त करेगा ॥१८१॥ कार्तिकेय स्वामी के ऐसा कहकर चुप हो जाने पर राजा उन्हें प्रणाम करके उनकी कृपा से सन्तुष्ट होकर अपने नगर को गया ॥१८२॥ नगर में पहुँचने पर कुछ दिनों के उपरान्त चन्द्रमा की चाँदनी से अमृत-वर्षा के समान मदनसुन्दरी से रत्न उत्पन्न हुआ ॥१८३॥ राजा और रानी पुत्र के मुख को देखकर अपने आनन्द में अपने में ही फूल न समाये। उस राजा ने धन बरसाते हुए उसी समय महान् उत्सव किया और स्वर्ण की वर्षा करके उसका कनकप्रभ नाम सार्थक किया ॥१८४-१८५॥ पाँच रात्रियों के बीतने पर छठी रात्रि में प्रसूति-भवन में सर्वतो रक्षा का प्रबन्ध करने पर जो आयुष्मान् किया जाता है ही सब विध किया ॥१८६॥ धीरे-धीरे बढ़ते हुए बालक के कारण बाल्य योग्य विद्या जैसे प्रभावसे राजा के राज्य का यशो रूप पात्र भर गया है ॥१८७॥ बाल-लीला दिखलाता हाथी, मस्ताना पन और चाल के समान मूसलाधार वृष्टि से वंशी का उगाड़ना हुआ व न गया ।
१२८ कथासरित्सागर
१२८ कथासरित्सागर तत्क्षणं सार्गलमपि द्वारमुद्घाट्य भीषणा। स्त्री कापि क्षुरिकाहस्ता जातवेश्म विवेश तत् ॥१८९॥ सा त मदनसुन्दर्या स्तनासक्तमथ सुतम्। हृत्वा देव्या प्रदुद्राव समोह्वैव परिच्छदम् ॥१९०॥ हा हा हृतो मे राक्षस्या सुत इत्यथ विह्वला। क्रन्दन्ती भान्वधावत्तां राज्ञी सा स्त्री समभ्यधि ॥१९१॥ सा च गत्वा पपात स्त्री सरस्यन्त सराक्षसा। राज्ञी चान्वपतत्सापि तत्रैवाप्यमृतप्रिया ॥१९२॥ क्षणान्मेघो निवृते जगामास्त च यामिनी। जातवेश्मनि चाक्रन्दः परिवारस्य शुश्रुवे ॥१९३॥ राजा कनकवर्षोऽथ तच्छ्रुत्वा जातवासकम्। एत्य पुत्रप्रियाशून्यं दृष्ट्वा मोह जगाम स ॥१९४॥ समाश्वस्य च हा देवि हा पुत्रक शिखो इति। विलपन्नथ सस्मार शापं तं वत्सरावधिम् ॥१९५॥ भगवच्छापसम्पृक्ता मन्दपुण्यस्य मे यतः। कध स्कन्द त्वया बत सविषामृतसन्निभ ॥१९६॥ हा हा युगमसहस्राभं कथ नेष्यामि वत्सरम्। देव्या मदनसुन्दर्या जीविताधिकया विना ॥१९७॥ इत्याक्रन्दन् स ज्ञातवृत्तान्तैर्मन्त्रिभिर्नृपः। बोध्यमानोऽपि न प्राप देव्या सह गतां धृतिम् ॥१९८॥ क्रमाच्च मदनावशविवशो निर्गत पुरात्। विवेश विन्ध्यकान्तारमुन्मीमय स भ्रमन् ॥१९९॥ तत्र चारुमृगीनेत्रे प्रियाया लोचनश्रियम्। कबरीभारसोन्दर्य चमरीबालगुच्छ्रये ॥२ ०॥ दृष्टे करिकरेणता गतर्मन्यगतां गत । स्मरतस्तस्य जज्वाल सुतरां मदनानलः ॥२ १॥ भ्राम्यंस्तृष्णात्तपक्लान्तो विन्ध्यपादमवाप्य सः। पीतनिर्झरपानीयस्तदधस्त उपामिशन् ॥२ २॥ तावद् गुहामुखाद्भिंक्त्वाट्टहास इवाददन्। सिंह गजास्रो निर्गत्य हन्तुमभ्यत्पपात तम् ॥२०३॥