झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
१०० झाँसी की रानी
उपस्थित स्त्रियाँ हर्ष के मारे उन्मत्त हो उठीं। नाचने लगीं, गाने लगीं। झलकारी ने तो अपने 'बुन्देलखण्डी नृत्य में अपने को विसरा सा दिया। रानी उस प्रमोद में गौर की प्रतिमा की ओर विनीत कृतज्ञता की दृष्टि से देखने लगीं। आमोद की उस थिरकन का वातावरण जब कुछ स्थिर हुआ, रानी ने आनन्द विभोर बख्शिन का हाथ पकडा। कहा, 'बख्शिनजू सावधान हो जाओ। अब तुम्हारी बारी आई।' बख्शिन के मुँह पर गुलाल सा बिखर गया। नत मस्तक होकर बोली, 'सरकार अभी यहाँ वडे वडे मन्त्रियो और दीवानो की स्त्रिया और वहुएँ हैं। हम लोग तो सरकार की सेना के केवल वख्शी ही है।' रानी ने मुस्कराते मुस्कराते दात् पीस कर विशाल नेत्रो को तरेर कर जिनमें होकर मुस्कराहट विवश भरी पड़ रही थी,—कहा, 'वख्शी सेना का आधार, तोपो का मालिक, प्रधान सेनापति के सिवाय और किसी से नीचे नही। राजा के दाहिने हाथ की पहली उङ्गली, और तुम यहा उपस्थित स्त्रियो में सबसे अधिक शरारतिन ! मेरे सवालो का जवाब दो।' बख्शिन ने अपनी मुख मुद्रा पर गम्भीरता क्षोभ और अनमनेपन की छाप विठलानी चाही। परन्तु लाज से बिखेरी हुई चेहरे की गुलाली में से हँसी वरवस फूटी पड रही थी। बख्शिन बोली, 'सरकार की कलाई इतनी प्रवल है कि मेरा हाथ टूटा जा रहा है।' रानी ने कहा, 'तुम्हारी कलाई भी इतनी ही मजबूत बनवाऊँगी, वात न बनाओ। मेरे सवाल का जवाब दो। बोलो मेरे पुरखो के नाम याद हैं ?' बख्शिन सम्भल गई। उसने सोचा मारके का प्रश्न अभी दूर है।' बोली, 'हाँ सरकार। जिनकी सेवा में युग बीत गये उनके नाम हम लोग कैसे भूल सकते हैं ?' 'बतलाओ मेरे ससुर का नाम।' रानी ने मुस्कराते हुये दृढ़तापूर्वक कहा।
लक्ष्मीबाई १०१ चतुर बख्शिन गडबडा गई । उसके मुँह से निकल गया—'भाऊ साहब ।' बख्शिन के पति का नाम लाला भाऊ था । रानी ने हँसकर बख्शिन का हाथ छोड़ दिया । उपस्थित स्त्रिया खिल खिला कर हँस पडी । बख्शिन को अपने पति का नाम बतलाना तो ज़रूर था, परन्तु वह रानी को थोड़ा परेशान करके ही बतलाना चाहती थी, लेकिन रानी ने अनायास ही बख्शिन को परास्त कर दिया । इसके उपरान्त रानी ने चुलबुली झलकारी को बुलाया । उसके पति का वहा किसी को नाम नही मालूम था । इसलिये बहानो की गुन्जाइश न थी । रानी ने सीधे ही पूछा, 'तुम्हारे पति का नाम ?' झलकारी के पति का नाम पूरन था । पति का नाम बतलाने के लिये व्यग्र थी, परन्तु उत्सव की रगत बढाने के लिए उसने जरा सोच विचार कर एक ढग निकाला । बोली, 'सरकार, चन्दा पूरनमासी को ही पूरो पूरी दिखात है न ?' रानी ने हँसकर कहा, 'ओ हो ? पहले ही अरसट्टे मे फिसल गई ! पूरन नाम है ?' झलकारी झेंप गई । चतुराई विफल हुई । हँस पडी । इसी प्रकार हँसते खेलते और नाचते गाते स्त्रियो का वह उत्सव अपने समय पर समाप्त हुआ । अन्त में रानी ने स्त्रियो से एक भीख सी मागी, 'तुममें से कोई बहिनो के बराबर हो, कोई काकी हो, कोई माई, कोई फूफी । फूल सदा नही खिलते । उनमें सुगन्धि भी सदा नही रहती । उनकी स्मृति ही मन में बसती है । नृत्य गान की भी स्मृति ही सुख दायक होती है । परन्तु इन *शिवराव भाऊ गङ्गाधरराव के पिता थे ।
१०२ झांसी की रानी सब स्मृतियो का पोषक यह शरीर और इसके भीतर आत्मा है । उनको पुष्ट करो और प्रवल वनाओ ! क्या मुझे ऐसा करने का वचन दोगी ?' उन स्त्रियो ने इस वात को समझा हो, या न समझा हो, परन्तु उन्होने हा-हा की । उन लोगो को डर लगा कि वही और तत्काल, कही मल- खव और कुश्ती न शुरू कर देनी पडे । इत्र पान के उपरान्त चली गई । एक बात लेकिन स्पष्ट थी-जब वे गईं तब वे किसी एक अदृष्ट, अवर्ण्य तेज से ओतप्रोत थी । उसके उपरान्त फिर झाँसी नगर की स्त्रिया संध्या समय थालो में दीपक सजा-सजा कर और गले में बेला, मोतिया, जाही, जुही इत्यादि की फूल-मालाए डाल डाल कर मन्दिरो में जाने लगी । स्त्रियो को ऐसा भान होने लगा जैसे उनका कोई सतत सरक्षण कर रहा हो, जैसे कोई संरक्षक सदा साथ ही रहता हो, जैसे वे अत्याचार का मुकाबला करने की शक्ति का अपने रक्त में सचार पा रही हों।
लक्ष्मीबाई १०३ [ २१ ] नाटकशाला की ओर से गङ्गाधरराव की रुचि कम हो गई । वे महलो में अधिक रहने लगे । परन्तु कचहरी दरबार करना बन्द नही किया । न्याय वे तत्काल करते थे-उल्टा सीधा जैसा समझ में आया, मनमाना । दण्ड उनके कठोर और अत्याचार पूर्ण होते थे, लेकिन स्त्रियो को कभी नही सताते थे । और न किसी की धन सम्पत्ति लूटते थे । झाँसी की जनता उनसे भयभीत थी, परन्तु अपनी रानी पर मुग्ध थी । रानी शासन में कोई प्रत्यक्ष भाग नही लेती थी, किन्तु राजा के कठोर शासन में जहाँ कही दया दिखलाई पडती थी, उसमे जनता रानी के प्रभाव के आभास की कल्पना करती थी । कम्पनी का झाँसी प्रवासी असिस्टेन्ट पोलिटिकल एजेन्ट राजा के कठोर शासन, अत्याचार इत्यादि के समाचार गवर्नर जनरल के पास बराबर भेजता रहता था । उनके किसी भी सत्कार्य का समावेश उन समाचारो में न किया जाता था । और राज्यो के साथ-साथ, कलकत्ते में झाँसी राज्य की भी मिसिल तैयार होती चली जा रही थी । अङ्गरेजो का चौरस करने वाला बेलन बेतहाशा, लगातार और जोर के साथ चल रहा था । अङ्गरेज लोग अपनी दूकान में हिन्दुस्थान को अधूरी या अधकचरी सौदा का रूप लिये नही देख सकते थे । एक कानून, एक जाब्ता, एक मालिक, एक नजर, इसमें अनैक्य को तिल भर भी स्थान देने की गुञ्जायश न थी । मौका मिलते ही छोटे मोटे रजवाड़े साफ हजम ! भारतीय जनता के सुख के लिये !! ऊँचे पदो पर भारतीय पहुँच नही पावे । भारतीय सस्कृति हेच और नाचीज है इसलिये पनपने न पावे । भारत में बहुत फालतू सोना-चाँदी है । इसलिये अङ्गरेजी दूकान की रोकड बढती चली जावे । जनता स्वाधीनता का नाम ले तो उसको बड़ी रियासतो के अन्धेरो का संकेत करके चुप कर दिया जावे । बडी रियासत वाले जरा भी सिर उठावे तो
१०४ झांसी की रानी छोटी रियासतो को किसी न किसी बहाने घोट-घाटकर बडी रियासतों को चुप रहने का सबक सिखाया जावे । सबसे बडा काम जो अङ्गरेज़ो ने हिन्दुस्थानी जनता की भलाई (!) के लिये किया, वह था पञ्चायतो का सर्वनाश । अङ्गरेजो को इस बात के परखने में बिलकुल विलम्ब नही हुआ कि उनके कानून के सामने हिन्दुस्थान की आत्मा का सिर तभी झुकेगा जब यहाँ की पञ्चायते विलीन हो जायेंगी, और हिन्दुस्थानी, अर्जियाँ लिये उनकी बनाई हुई साहबी अदालतो के सामने मुह बाये भटकते फिरेंगे । यह सब उन्नीसवी शताब्दि के वैज्ञानिक ढङ्ग से हुआ । जो परिस्थिति कठोर से कठोर पठान या मुगल नरेश अपने प्रकट अत्याचारो से उत्पन्न नही कर पाये थे, वह अङ्गरेजो ने अपनी वैज्ञानिक हिकमत से उत्पन्न कर दी । बडे-बड़े राजा-महाराजा और नवाब अपनी जनता का दामन छोड कर अङ्गरेजो का मुँह ताकने लगे । पुरुषार्थ की जरूरत न थी, इसलिये सिर डुबोकर विलासिता के पोखरो में घुस पडे । अङ्गरेजी बन्दूक और सङ्गीन उनकी पीठ पर थी, जनता की परवाह ही क्या की जाती ? अङ्गरेजो को केवल एक बात का खटका था—उनके इलाको के हिन्दू और मुसलमान धर्म के इतने ढकोसले क्यो मानते हैं ? किसी दिन इन ढकोसलो की श्रद्धा में होकर हमें नफरत की निगाह से न देखने लगें ? इस धर्म से लिपटी हुई आत्मा का कैसे उद्धार कर के अपना भक्त बनाया जावे ? बस इनकी रूहानी भक्ति मिली कि हिन्दुस्थान मे अपना राज्य अमर और अक्षय हो गया । इसलिये सरकारी पाठशालाओ में बाइबिल की शिक्षा अनिवार्य कर दी गई। एमेरिका हाथ से निकल गया तो क्या हुआ ? सोने की चिडिया, सोने के अण्डे देने वाली मुर्गी—भारतभूमि—तो हाथ में आई ! यह न जाने पावे किसी तरह भी हाथ से ! मदिरो की मूर्तियां मत तोड़ो, मसजिदों को अपवित्र मत करो—परन्तु धर्म पर से श्रद्धा को हटा दो, फल उससे भी कही बढ़कर होगा । और कोने कोने में ढोंढी पीट दो कि हम धर्मों के
लक्ष्मीबाई १०५ विषय में बिलकुल तटस्थ हैं—हमारा एकमात्र आदर्श हिन्दुस्थान के लुटेरो और डाकुओ का दमन करके शान्ति स्थापित करने का है, जिससे खेती—किसानी आबाद हो सके और व्यापार बेरोकटोक चल सके। किसका व्यापार ? किसके लिये खेती—किसानी ? उसी अङ्गरेज दूकानदार के लिये । गंगाधरराव यह सब अच्छी तरह नही समझते थे, परन्तु उनके पहले पूना में एक दुबला-पतला व्यक्ति नाना फडनवीस हुआ था। वह खूब समझता था, एक एक नस, एक एक रग, राई-रत्ती ! उसने हिन्दुस्थान के तत्कालीन नेताओ को बहुत समझाया, बहुत सावधान किया, परन्तु वे मूर्ख कुछ न समझे । अपनी महत्वकांक्षाओ की प्रेरणा मे परस्पर कट मरे । अङ्गरेजो ने पञ्जाब को परास्त करके हाल ही में अपने हाथ में किया था। विहार और वगाल में राज्य था ही। मध्य देश बपौती का रूप धारण करता चला जाता था। इनके सबके बीच में दो बडे-बडे रोडे थे—एक अवध की मुसलमानी नवाबी और दूसरी झाँसी की बडी हिन्दू रियासत। ये दोनो किसी प्रकार खतम हो जायें तो पाँचो घी में और फिर हो चौरस करने वाले अङ्गरेजी बेलन की जय ! गंगाधरराव के पास गार्डन और कुछ अन्य अङ्गरेज आया करते थे, परन्तु गार्डन और वे, केवल दोस्ती निभाने नही आया करते थे। गज्य की भीतरी बातो का पता लगाकर गवर्नर जनरल को सूचना देना उनका प्रधान कर्तव्य था। गंगाधरराव के कोई सन्तान उस समय तक नही हुई थी। दूसरा विवाह सन्तान की आकाक्षा से किया था। रानी गर्भवती भी थी, परन्तु यह अनिवार्य नही था कि उनके पुत्र ही उत्पन्न हो। यदि वह निस्सन्तान मर गये तो झासी को तुरन्त अङ्गरेजी राज्य में मिला लिया जावेगा। अङ्गरेजो के अन्तर्मन में यह निहित था। इसीलिये गार्डन इत्यादि गंगाधरराव की खरी-खोटी भी सुन लेते थे। एक दिन शायद आवे जब
१०६ झाँसी की रानी झांसी-निवासी हमारी खरी-खोटी चक्रवृद्धि ब्याज के साथ सुनेंगे। भीतर-भीतर यह लालसा घर किये बैठी थी। ठण्ड पडने लगी थी। तारे अधिक चमक-दमक के साथ चन्द्रिका को अपनी विस्तृत झीनी चादर उढाकर आकाश में उपस्थित हुये। गार्डेन और राजा गगाधरराव महल के दीवानखाने में बातचीत कर रहे थे। गगाधरराव—'बाजीराव पन्तप्रधान के देहान्त का समाचार मुझको मिल गया था, परन्तु यह हाल में मालूम हुआ कि उनकी पेंशन जब्त कर ली गई है। यह अच्छा नही किया गया।' गार्डेन—'सोचिये सरकार, आठ लाख रुपया साल कितना होता हे और फिर बिठूर जागीर मुफ्त मे ! उस पर खर्च कुछ नही।' गगाधरराव—'मुझको याद है—मुझको विश्वसनीय लोगो ने बतलाया है कि कम्पनी ने सन् १८०२ मे❊ उक्त पन्तप्रधान के साथ जो सन्धि की थी, उसमें गवर्नर जनरल ने अपने हाथ से लिखा था 'यावच्चन्द्रदिवाकरौ' कायम रहेगी। परन्तु चन्द्रमा और सूर्य सब जहा के तहा हैं। सन्धिपत्र पर दस्तखत किये अभी ५० वर्ष भी नही हुये और सारा मैदान सफाचट कर दिया !' गार्डेन—'सरकार, सन्धिपत्र मेरे सामने नही है, इसलिये ठीक-ठीक नही कह सकता कि उसमें क्या लिखा है, परन्तु सुनता हूँ उनको जब १५, १६ वर्ष पीछे पेंशन दी गई तब यह लिखा था कि पेंशन को वह और उनका कुटुम्ब ही भोग सकेगा।' गंगाधरराव—'नाना धोंडूपन्त जो अब जवान है, पन्तप्रधान का दत्तक पुत्र है। क्या वह उनका कुटुम्बी न माना जावेगा ?' गार्डेन— हमारे देश के कानून में गोद नही मानी जाती।' गगाधरराव—'पर हिन्दुस्थान तो आपका देश नहीं है।' ❊ सन् १८०२ ई० की सन्धि। परिशिष्ठ मे देखिये।
लक्ष्मीबाई १०७
गार्डन—'अङ्गरेज कम्पनी का राज्य तो है। राजा अपना कानून बर्तता है न कि प्रजा का। सरकार अपने राज्य में अपना ही कानून तो बर्तते हैं न ?' गंगाधरराव—'हमारा और हमारी प्रजा का कानून तो एक ही है।' गार्डन—'यह बिलकुल ठीक है सरकार। और दीवानी मामलो में हमारे इलाको में भी प्रजा का ही कानून माना और चलाया जाता है, परन्तु रियासतो के सम्बन्ध मे यह बात लागू नही की जाती।' गंगाधरराव—'क्यो, रियासते और उनके रईस क्या साधारण प्रजा से भी गये-बीते है ?' गार्डन—'सो सरकार मै नही जानता। कम्पनी सरकार इङ्गलैंड में कानून बना देती है। कुछ कानून गवर्नर जनरल भी बनाते हैं। हमको उन्ही के अनुसार चलना पडता है।' गंगाधरराव— हमारे धर्म में विधान है कि यदि औरस पुत्र पिडदान देने के लिये न हो तो दत्तक पुत्र ठीक औरस पुत्र की तरह पिंडदान दे सकता है। आप लोग क्या राजाओ को इससे वचित करना चाहते हैं ?' गाडन—'नही सरकार। बडी रियासतो को यह अधिकार दे दिया गया है। परन्तु जो रियासते कम्पनी सरकार की आश्रित है, उनमें गोदी गवर्नर जनरल की स्वीकृति के बिना नही ली जा सकती। यदि ली जावे, तो गोद लिया लडका राज्य की गद्दी का अधिकारी नही माना जा सकता। वह राजा की निजी सम्पत्ति अवश्य पा सकता है और पिंडदान मजे में दे सकता है। सरकार ने हमारे धर्म की पुस्तक पढी। उसका हिन्दी में अनुवाद हो गया है। छप गई है।' गंगाधरराव—'छप गई है अर्थात् ?' गार्डन—'छापाखाना में छपती हैं। उसमे यन्त्र होते हैं। वर्णमाला के अक्षर ढले हुये होते हैं। उनको मिला-मिलाकर स्याही मे कागज पर छाप लेते हैं। हजारो की संख्या में पुस्तके छप जाती हैं।'
१०८ झांसी की रानी गंगाधरराव — ऐ ! यह तो विलक्षण यन्त्र है। मैं ग्रंथों की नकल करवा-करवा कर हैरानी में पडा रहता हू और न जाने कितना रुपया व्यय किया करता हू। एक यन्त्र हमारे लिये भी मँगवा दीजिये।' गार्डन को डर लगा। ऐसा भयंकर विषधर झांसी मे दाखिल किया जावे ! पुस्तके छपेगी, समाचार पत्र निकलेगे। जनता सजग हो जावेगी। अङ्गरेजो का रोब धूल मे मिल जावेगा। जिस आतंक के बल-भरोसे कम्पनी-सरकार राज्य चला रही है, वह हवा मे मिल जावेगा। गार्डन ने सोचा था कि राजा को एक कडवे प्रसग से हटाकर किसी मनोरञ्जक प्रसग में ले जाऊँ, परन्तु यह प्रसग तो और भी अधिक कटु निकला। लेकिन गार्डन ने चतुराई से अपने को बचा लेने का प्रयत्न किया। बोला, 'सरकार, गवर्नर-जनरल की आज्ञा बिना कोई भी उस यन्त्र को नही रख सकता।' गंगाधरराव को रोष हुआ। आश्चर्य भी। बोले, 'इसमें भी गवर्नर जनरल की आज्ञा, अनुमति। आप लोग थोडे दिन मे शायद यह भी कहने लगे कि हमारी आज्ञा बिना पानी भी मत पियो।' गार्डन हँसने लगा। राजा भी हँसे। बात टालने की नियत से उसने कहा, 'सरकार बडी देर से हुक्का नही मिला। आज क्या पान भी न मिलेगा?' राजा ने हुक्का दिया। उसी समय एक हरकारे ने आकर खुगी खुशी कहा, 'महाराज की जय हो ! झांसी राज्य की जय हो। राजा को मालूम था कि रानी प्रसव गृह मे हैं। जय का शब्द सुनते ही समझ गये। भीतर का हर्ष भीतर ही दबाकर गम्भीरता के साथ पूछा, 'क्या बात है?' हरकारा हर्ष के मारे उछला पडता था। उसने हर्षोन्मत्त होकर उत्तर दिया, 'श्रीमन्त सरकार, झांसी को राजकुमार मिले हैं।'
लक्ष्मीबाई १०६ और उसने नीचा सिर करके अपनी कलाहियो पर उँगलियो से कडो के वृत्त बनाये । राजा ने हँसकर कहा, 'सोने के कडे मिलेगे और सिरोपाव भी । जा तोपो की सलामी छुटवा । पर देख, बडी तोपें न छूटे । हल्ला बहुत करती हैं । और बस्ती के पञ्चो और भले आदमियो को सूचना दे ।' गार्डन भी बहस से छुटकारा पाकर अपने घर चला गया । गवर्नर जनरल को सूचना दे दी गई । झासी राज्य को अङ्गरेजी इलाके में मिला लेने की घडी टल गई ।
११० झांसी की रानी [ २२ ] जिस दिन गङ्गाधरराव के पुत्र हुआ उस दिन सम्वत् १९०८ ( सन् १८५१ ) की अगहन सुदी एकादशी थी । यो ही एकादशी के रोज मन्दिरो में काफी चहल पहल रहती थी, उस एकादशी को तो आमोद प्रमोद ने उन्माद का रूप धारण कर लिया । अपनी प्यारी रानी के गर्भ से पुत्र की उत्पत्ति का समाचार सुनकर झासी थोडे समय के लिये इन्द्रपुरी बन गई । राजा ने बहुत खर्च किया, इतना-कि खजाना करीब करीब खाली कर दिया । दरिद्रो को जितना सम्मान उस अवसर पर झासी मे मिला, उतना शायद ही कभी मिला हो । दरबार हुआ । गवैये आये । मुगलखाँ का ध्रुपद सिरे का रहा । उसको हाथी बख्शा गया । नर्तकियो में दुर्गाबाई खूब पुरस्कृत हुई । नाटक हुआ । परन्तु उसमे मोतीबाई न थी । राजा के मन मे आया कि उसको फिर से रगशाला में बुलवा लिया जावे, परन्तु न किसी ने सिफारिश की और न राजा अपने हठ को छोडकर स्वय प्रवृत्त हुये । दरबार मे सभी जागीरदारो को कुछ न कुछ मिला । उस दरबार में केवल एक व्यक्ति अपनी इच्छा की पूर्ति न करा सका । वे थे नवाब अलीबहादुर-राजा रघुनाथराव के पुत्र । जब अङ्गरेजो ने रघुनाथराव के कुशासन काल मे झासी का प्रबन्ध अपने हाथ में ले लिया था, तभी उनकी जागीर जब्त कर ली गई थी । और उनको पाच सौ रुपया मासिक पेंशन दी जाने लगी थी । जब गङ्गाधरराव को राज्याधिकार मिला तब उन्होने यह पैन्शन जारी रक्खी । अलीबहादुर चाहते थे कि यथा संभव उनको वही जागीर फिर मिल जावे । जागीर न मिल सके तो पेंशन में काफी वृद्धि कर दी जावे । जागीर मिलती न देखकर अलीबहादुर ने पेंशन बढाने के लिये विनय की । राजा ने पोलिटिकल एजेण्ट से सलाह करने की बात कहकर नवाब को उस समय टाला । नवाब का मन मसोस खा गया । परन्तु उन्होने आशा नही
लक्ष्मीबाई १११
छोडी । अनेक अङ्ग्रेज अफ़सरों से उनका मेलजोल था, परस्पर आना जाना था। इसलिये उस आश्रय को दृढ़तापूर्वक पकड़ने की उन्होंने अपने जी मे ठानी। दरबार में पगड़ी बंधवाने की प्रथा बहुत समय से चली आ रही थी। श्याम चौधरी नाम के एक सेठ के घराने वाले ही ऐसे मौको पर पगड़ी बाँधते थे। श्याम चौधरी लखपती था। कहते हैं कि उस समय झाँसी में ५२ लखपती थे। ये ५२ घर बावन बसने कहलाते थे। श्याम चौधरी पाग बाँधने के पहले अपना नेग दस्तूर लेने के लिये बहुत मचला। राजा ने जब मोती जड़े सोने के कड़े देने का वचन दिया तब उसने राजा को पगड़ी बाँधी ! नवाब अलीबहादुर का जी इससे और भी अधिक जल गया। वह किसी भी तरह इस भावना को नही दबा पा रहे थे—मै राजा का लड़का हू, मैं ही झाँसी का राजा होता, मेरे पास जागीर तक नहीं ! छोटे-छोटे से लोगो का इतना आदर सत्कार और मेरी पेंशन बढ़ाने तक के लिये पोलिटिकल एजेन्ट की सलाह की जरूरत ! नवाब साहब ऊपर से प्रसन्न और भीतर से बहुत उदास अपनी हवेली को लौट आये। वे रघुनाथराव के नईबस्ती वाले महल मे रहते थे। महल में तीन चौक थे। एक रङ्गमहल, दूसरा सैनिको, हाथियो इत्यादि के लिये तीसरा घोडो और गायो के लिये। महल का सदर दरवाजा चाँद दरवाजा कहलाता था। इस पर चढ़कर वे और उनके मुसलमान अफसर ईद के चाँद को देखते थे, इसलिये दरवाजे का नाम चाँद दरवाजा पड़ गया था। बिलकुल अगले सहन के आगे एक और विस्तृत सहन था। जिसके एक ओर इनका प्रिय हाथी मोती गज बंधता था, और दूसरी ओर राजा रघुनाथराव के जीवनकाल में इनकी माता लच्छोबाई के रहने के लिये हवेली थी। इस समय नवाब अलीबहादुर के अधिकार मे यह हवेली और सारा महल था। बाहर वाली हवेली मे उनके मेहमान या आश्रित ठहराये जाते थे। दरबार से लौटकर अलीबहादुर पहले इसी हवेली में गये।
हवेली बडी थी । उसमे कई कक्ष थे । परन्तु उजाला केवल दो कक्षो में था । बाकी सूनी और अँधेरी थी । बाहर पहरेदार थे । उजाला दीपको का था । शमादानो में जल रहे थे । दो कमरो मे अलग अलग् । दोनो कमरे एक दूसरे से काफी दूर । जिस पहले कमरे में नवाब अलीबहादुर गये उसमें सिवाय खुदाबख्श के और कोई न था । अभिवादन के बाद उनमें बातचीत होने लगी । खुदाबख्श ने आशामयी आँखो से कहा, 'हुजूर ने मेरी विनती तो पेश की ही होगी ?' अलीबहादुर ने उत्तर दिया, 'नही भाई मौका नही आया । जानते हो महाराज अब्बल दर्जे के जिद्दी हैं । एकाध दिन मौका हाथ आने दो, तब कहूँगा ।' खुदाबख्श—'उस कमरे में बिचारी मोतीबाई उम्मेदे बाधे बैठी है । उसका तो कोई कसूर ही नही है । उसके लिये आप कुछ कह सके ?' अलीबहादुर—'क्या कहता ? वहा तो बनियो और छोटे-छोटे लोगो की बन पडी । मेरे लिये ही कुछ नही हुआ ।' खुदाबख्श—'ऐ !' अलीबहादुर—'जी हा । जागीर चूल्हे में गई—पैन्शन बढाने के लिये अर्ज की तो कह दिया कि बडे साहब से सलाह करेगे । मै सोचता हूँ कि हमी लोग बडे साहब से क्यो न मिले ? आपके साथ काफी जुल्म हुआ है । आप मुद्दत से छिपे-छिपे फिर रहे है । जिस मीतीबाई के लिये राजा पलक-पाँवडे बिछाते थे, वह बिचारी दर-दर फिर रही है । एक दिन मुझको यह और राजा के अनेक अत्याचार बडे साहब के सामने साफ बयान करने हैं । आप भी चलना ।' खुदाबख्श—'मैं तो आज तक किसी गोरे से नही मिला । आपकी उनसे दोस्ती है । आप जैसा ठीक समझे करे ।' अलीबहादुर—'मोतीबाई से अर्जी न दिलाई जावे ? आपसे कुछ बातचीत हुई ?'
लक्ष्मीबाई ११३ खुदाबख्श—'क्या कहूँ, वे तो मुझ से पर्दा करती हैं। आप ही पूछियेगा।' अलीबहादुर—'नाटकशाला वाली भी पर्दा करती है। रङ्गमञ्च पर तो पर्दे का नाम-निशान नही रहता, बल्कि उससे बिलकुल उलटा व्योहार नजर आता है।' अलीबहादुर की अवस्था ४२, ४३ वर्ष की थी। स्वस्थ थे। रङ्गीन तबियत के। उन्होने बातचीत का सिलसिला जारी रक्खा— रङ्गमञ्च पर उनका नाचना, गाना, हावभाव सभी पहले सिरे के देखे। यहाँ पर्दा कैसा वे पीरअली के सामने तो निकलती हैं।' पीरअली अलीबहादुर का खास नौकर और सिपाही था। वनवि एकान्त में मित्रो सदृश। उसको बुलवाया गया। पीरअली की मारफत मोतीबाई से बातचीत होने लगी। 'बडे साहब' को अर्जी देने के प्रस्ताव पर मोतीबाई ने कहलवाया, 'मैं अर्जी नही देना चाहती हूँ। किसी अङ्गरेज के सामने नही जाऊँगी। आप लोग बडे आदमी हैं। आप लोगो के रहते में अङ्गरेजो के बंगलो पर नही भटकना चाहती।' अलीबहादुर ने कहा, 'आपको कही जाना नही पडेगा। आपकी अर्जी मै पेश कर आऊँगा।' मोतीबाई ने उत्तर दिलवाया, 'साहब से सब कुछ जबानी कह दीजिये लिखी अर्जी नही दूँगी।' खुदाबख्श ने समर्थन किया। बोला, 'लिखा हुआ कुछ नही देना चाहिये। यदि कही अर्जी को साहब ने महाराज के पास फैसले के लिये भेज दिया तो हम सब विपद में पड जावेंगे।' अलीबहादुर दूसरे के हाथ से अङ्गारे डलवाना चाहते थे इसलिये उन्होने खुदाबख्श को समझाया, 'आपका इससे बढकर तो अब और
११४ झांसी की रानी
कुछ नुकसान हो नही सकता। बिना किसी अपराध के देश-निकाला दे दिया गया। घर-द्वार छूटा। जागीर गई। परदेश की खाक छानते फिर रहे हो। मेरी राय में आपको लिखी अर्जी जरूर देनी चाहिये। मैं साहब से सिफारिश करूँगा। वे राजा के पास न भेजकर सीधी लाट साहव गवर्नर-जनरल बहादुर के पास भेज देगे। कम्पनी सरकार रियासतो के नुक्स तलाश करने में दिन-रात व्यस्त रहती है।' खुदाबख्श ने कहा, 'जरा सोच लूँ। फिर किसी दिन अर्ज करूँगा। आप तो मेरे शुभचिन्तक हैं। आप अकेले का तो मुझको आधार ही है। अहसानो के बोझ से दबा हूँ।' अलीबहादुर ने सोचा जल्दी न करनी चाहिये। पीरअली ने छिपे सकेत में हामी भरी। खुदाबख्श के खाने-पीने की व्यवस्था करके अलीबहादुर चले गये। अकेले रह जाने पर मोतीबाई भी अपने घर गई। जाते समय उसने एक बार खुदाबख्श की ओर देखा। खुदाबख्श को ऐसा जान पडा जैसे कमलो का परिमल छुटकाती गई हो।
लक्ष्मीबाई ११५ [ २३ ] लक्ष्मीबाई का बच्चा लगभग दो महीने का हो गया। परन्तु वे सिवाय किले के उद्यान में टहलने के और कोई व्यायाम नही कर पाती थी। शरीर अभी पूरी तौर पर स्वस्थ नही हुआ था। मन उनका सुखी था। लगभग सारा समय बच्चे के प्यार में जाता था। राजा भी उस बच्चे पर प्यार बरसाने में काफी समय उनके पास विताते थे। राजा की प्रकृति में अद्भुत अन्तर आगया था। शासन की कठोरता में उन्होने कमी करदी। जनता उनको प्रजावत्सल कहने लगी। उन्हीं दिनो तात्या टोपे झाँसी आया। राजा का एक फौजी अफसर कर्नल मुहम्मद जमाखाँ था। उसी की हवेली के एक हिस्से मे तात्या को डेरा मिला। पास ही जूही रहती थी। तात्या को रानी से एकान्त में बात चीत करने का अवसर मिला। उसने रानी से कहा, 'आपको दादा के देहान्त का हाल तो मालूम हो गया था, परन्तु पेन्शन छीने जाने की बात किसी ने नही बतलाई ! आश्चर्य है। लक्ष्मीबाई दुखी स्वर में बोली, 'मै अस्वस्थ थी, इसलिये यह समाचार मुझ तक नही आने दिया गया। अङ्गरेजो ने बडी बेईमानी की।' तात्या—'यह उन लोगो की न तो पहली बेईमानी है और न आखरी। उन लोगो की नीति सारे देश को डसती चली जा रही है। गायकवाड, होलकर, सिंधिया, अवध के नवाब ये सब अफीम ही खाये बैठे हैं।' रानी—'पैन्शन छीनने के विरुद्ध क्या उपाय किया ?' तात्या—'अर्ज़ी फरियाद की। वडे लाट ने कोई सुनाई नही की। विलायत को भी लिखा पढा, एक होशियार आदमी भेजा, परन्तु सबने कानो में तेल डाल लिया है।' रानी—'फिर क्या सोचा है ?' तात्या—'कुछ नही। नाना साहब और रावसाहब ने आपके पास मुझको भेजा है। उनको आपके विवेक और तेज का भरोसा है।'
११६ झाँसी की रानी रानी — 'नवाब साहब के पास लखनऊ गये ?' तात्या—'गया था। परन्तु नवाब साहब के चारो तरफ गायिकाओ नर्तकियो और भाडो का पहरा लगा रहता है। उन लोगो ने कहा कि अगले साल मुलाकात का मुहूर्त निकलेगा।' रानी हँस पडी। जैसे सन्ध्या के पीछे बादलो मे दामिनी दमक गई हो। रानी ने अभी अपनी स्वाभाविक अरुणता पुन प्राप्त न कर पाई थी। तात्या ने कहा, 'मै नवाब के प्रधान मन्त्री से मिला वह हिन्दू है। परन्तु विचारा क्या करता। उसने अपनी असमर्थता प्रकट की। फिर कई बडे जिमीदारो से मिला। उन्होने कहा, कि कुछ पुरुषार्थ करो हम साथ देगे। रानी कुछ सोचने लगी। सोचती रही। तात्या बोला, 'आप बिठूर में छत्रपति और बाजीराव और छत्रसाल, न जाने कितने नाम लिया करती थी।' रानी ने कहा, ये नाम मै कभी नही भूलूगी। छत्रसाल का नाम इधर के लोगो में अब भी मन्त्र का सा काम करता है।' तात्या—'यह और वे सब मन्त्र कब काम आवेगे ?' रानी जरा मुस्कराई। तात्या उस मुस्कराहट को पहचानता था। उसके परिवेष्ठन में छुटपन की मनू के छोटे छोटे निश्चय बडी दृढता के साथ निकला करते थे। तात्या ने आशा से कान लगाये। रानी ने कहा, 'टोपे अभी समय नही आया है। घडा अपूर्ण है— अभी भरा नही है। हम लोगो के आपसी उपद्रवो ने जनता को त्रस्त कर दिया है। उसको थोडा सांस लेने योग्य बन जाने दो। समर्थ रामदास का दिया हुआ स्वराज्य संदेश, छत्रपति शिवाजी का पाला हुआ वह आदर्श, छत्रसाल का वह अनुशीलन अमर और अक्षय है। तात्या जरा अधीर होकर बोला, 'महारानी साहब, ये बाते कान और हृदय को अच्छी मालूम होती हैं, पर हिन्दू और मुसलमान जनता तो अचेत सी जान पडती है...'
लक्ष्मीबाई ११७ रानी ने टोककर दृढ़ स्वर में कहा, 'तात्या भाई, जनता कभी अचेत नही होती, उसके नायक अचेत या भ्रम मय हो जाते हैं।' तात्या—'तब नाना साहब से क्या जाकर कहूँ?' रानी—'यही कि कान और आँख खोलकर समय की प्रतीक्षा करे। मुझे अभी तो पूर्ण स्वस्थ होने में ही कुछ समय लगेगा, स्वस्थ होते ही अपने आदर्श के पालन में सचेष्ट होऊँगी। अपने आदर्श को कभी न भूलना—प्रयत्न की पहली और पक्की सीढ़ी है। तात्या चलने को हुआ। रानी ने प्रश्न किया, 'दिल्ली का क्या हाल है?' तात्या ने उत्तर दिया, 'बादशाह का? उन बिचारो को नब्बे हज़ार रुपया साल पेन्शन मिलती है। कविता करते हैं और कवि सम्मेलनो में उलझे रहते हैं। कम्पनी ने उनकी नजर भेट बन्द करदी है और उनसे कह रही है कि अपने को बादशाह कहना छोड़ो नही तो पेन्शन बन्द कर देगे।' रानी ने कहा, 'मुसलमान नवाब और जन क्या इस चुनौती को यो ही पी जायेगे?' 'कह नही सकता' तात्या ने कहा। कुछ समय बाद तात्या चला गया। तात्या झांसी में और ठहरना चाहता था, परन्तु बिठूर जल्दी जाना था और गङ्गाधरराव की नाटकशाला बन्द थी। यद्यपि अभिनय करने वालो का वेतन बन्द नही किया गया था।
११८ झांसी की रानी [ २४ ] । गङ्गाधरराव का यह बच्चा तीन महीने की आयु पाकर मर गया । इसका सभी के लिये दुःखद परिणाम हुआ । राजा के मन और तन पर इस दुर्घटना का स्थाई कुप्रभाव पड़ा । वे बराबर अस्वस्थ रहने लगे । लगभग दो वर्ष राजा और रानी के काफी कष्ट मे बीते । राजा की खीझ बढ़ गई । उन्होने सनको में काम करना शुरू कर दिया । एक दिन उनको मालूम हुआ कि खुदाबख्श नवाब अलीबहादुर के यहा कभी कभी आता है इस जरा से अपराध पर उन्होने नवाब साहब का महल जब्त कर लिया । केवल बाहर वाली हवेली उनके रहने के लिये छोडी । सन् १८४३ के शारदीय नवरात्र का महोत्सव हुआ । उस दिन उनका स्वास्थ्य अच्छा जान पडता था, केवल कुछ कमजोरी थी । राजवैद्य प्रतापशाह मिश्र का उपचार था । राजा वैद्य पर बहुत खुश थे । वैद्य उद्दण्ड प्रकृति का था, परन्तु राजा उसको बहुत निभाते थे । दशहरे के भरे दरबार में वैद्य ने अपने एक पडोसी का उलाहना दिया, 'सरकार मै हवेली बनाना चाहता हू । मेरे मकान मे जगह थोडी है । पडोसी को मुँहमागा दाम देने को तैयार हू । वह पाजी है । बिल्कुल नठ गया है । मकान नही छोडता । मेरी हवेली नही बन पा रही है । वह मकान मुझको दिलवा दिया जाय ।' राजा ने इस प्रार्थना को स्वीकृत करने से इनकार कर दिया । वैद्य ने हठपूर्वक कहा, 'तब मै कोट बाहर एक अलग छोटी सी झाँसी बसाऊँगा । सरकार की अनुमति भर चाहिये । या तो नगर में हवेली बनाकर रहूगा या कोट बाहर एक बस्ती बसाऊगा और एक दृढ़ कोट उसके चारो ओर खिचवा दूँगा । तीन साल पहले के गङ्गाधरराव होते तो वह इस प्रस्ताव पर वैद्य- राज की खाल खिचवा डालते । परन्तु उनका स्वभाव सनको से भर गया था । बल के साथ तेज भी उनका ठंडा पड गया था ।
लक्ष्मीबाई ११६ राजा ने वैद्य को अनुमति दे दी। वैद्य का ध्यान उपचार से हटकर नया नगर बसाने और कोट खिचवाने की विशाल मूर्खता पर दृढ़ता के साथ जा अटका। नईबस्ती तो वैद्य ने नही बसा पाई, परन्तु उसने कोट खिचवा लिया, जो अपने अखण्ड रूप में अब भी प्रतापसाह मिश्र के हठ का स्मारक बडेगाँव फाटक बाहर खडा है। विजयादशमी के उपरान्त गगाधरराव को सग्रहणी रोग ने ग्रस लिया। बहुत दवा-दारू की गई कुछ न हुआ। मर्ज बढता ही चला गया। उस समय झाँसी का असिस्टेट पोलिटिकल एजेंट मेजर मालक्रम था। उसको सूचना दी गई। उसने डाक्टरी उपचार का अनुरोध किया परन्तु वैद्यो और हकीमो ने प्रयत्न को अभी आशा रहित नही समझा था, इसलिये उस अनुरोध पर विचार करने की भी नौबत नही आई। महालक्ष्मी के मन्दिर में जो लक्ष्मी फाटक बाहर है और जहा सदा ही धूमधाम रहती थी, पाठ बिठलाया गया। झाँसी का कोई भी मन्दिर न था जहा राजा के रोग निवारण के लिये पूजा-अर्चा न कराई गई हो और जनता ने अपनी प्रार्थनाये भेट न की हो। नवम्बर के तीसरे सप्ताह में राजा का स्वास्थ्य और भी बहुत बिगड गया। प्रतापसाह मिश्र ने बडे दम्भ के साथ 'प्रतापलकेश्वर रस' बनाया, परन्तु किसी भी रस का कोई प्रभाव न पडा। राजा ने क्षीण मुस्कराहट के साथ इतना जरूर कहा, 'कोट खिचवाने से कैसे अवकाश मिल गया ?' उसके बाद राजा यकायक बेहोश हो गये। रानी के पिता मोरोपन्त और दीवान नरसिंहराव घबराये हुये आये। राजा को पुन चेत हो आया था। नरसिंहराव ने कहा, 'सरकार स्वस्थ हो जावेगे। कोई चिन्ता की बात नही है। हम लोगो को आज्ञा दी जावे।'