संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
१०२—**श्रीवसिष्ठजीके द्वारा समता एवं समदर्शिताकी भूरि-भूरि प्रशंसा
६६२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]
समष्टि मनोरूप होकर जगत्के आकारमें बारंबार स्फुरित हो रहा है । विचारदृष्टिसे देखनेपर यह जगत्का स्फुरण भी कुछ नहीं है । केवल सच्चिदानन्दघन ही स्वयं अपने स्वरूपमें भासित हो रहा है । जहाँसे वाणीं लौट आती है, उस निरतिशयानन्दमय परमपदकी प्राप्तिसे तूष्णीम्भाव—स्वरूपभूत निश्चञ्चता ही शेष रहती है ( वह निश्चञ्चता व्यवहारकालमे भी नहीं हटती है ) । जीवन्मुक्त पुरुष संसारके व्यवहारमे तत्पर रहता हुआ भी शुद्ध चिदाकाशरूप ही होता है और उसी रूपमें वह मुक्तवत् स्थित रहता है । ज्ञानवानोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन ! चिदाकाश, ब्रह्म, चिन्मात्र, आत्मा, चिति, महान् और परमात्मा—इन सब शब्दोंको पर्यायवाची ( समानार्थक ) ही समझना चाहिये । ब्रह्म नेत्रकी भाँति उन्मेष और निमेषरूप है अथवा वायुके समान स्पन्द और अस्पन्दरूप है । उसका जैसा प्रलयरूप निमेष है, वैसा ही सृष्टिरूप उन्मेष भी है । इन्हींका नाम जगत् है । उसने आँखें खोलीं तो संसारकी सृष्टि हो गयी और आँखें बंद कीं तो जगत्का प्रलय हो गया । परंतु वह परब्रह्म परमात्मा निमेष और उन्मेष—दोनों अवस्थाओमें एकरूप ही रहता है । सौम्य रघुनन्दन ! इस कारण यह सम्पूर्ण जगत् जिस रूपमें स्थित है, इसी रूपमें इसे शान्त, अजन्मा, अजर, सभी अवस्थाओंमें सत् और चिदाकाशरूप ही समझना चाहिये ।
जिसका चित्त जिस वस्तुमें रस लेता है, उसका वह चित्त वैसा ही हो जाता है । अतः एकमात्र परब्रह्म परमात्माका रसिक हुआ जो ज्ञानीका मन है, वह ब्रह्मभाव को ही प्राप्त हो जाता है और जिसका मन जिसमें रस पाता है, उसने उसीको सत् समझा है । जिसकी ज्ञानदृष्टिमें दृश्य-अदृश्य, सत्-असत् तथा मूर्त-अमूर्त सब कुछ ब्रह्म ही है, उसकी दृष्टिमें यहाँ अथवा और कहीं भी न तो कर्त्ता-भोक्ता जीवकी सत्ता है और न उसका अभाव ही ( क्योंकि एकमात्र वही ब्रह्मरूपसे शेष रह जाता है ) ।
सहस्रों वादी मिलकर भी सत्से अतिरिक्त वस्तुकी सत्ताका उपपादन नहीं कर सकते तथा उससे भिन्न जगत्का कोई यथार्थ कारण नहीं उपलब्ध होता । इसलिये स्वतः यह बात सिद्ध हो गयी कि आदिकालसे ही चिदाकाश अपने आपको ही दृश्यरूपसे देखता है ।
जैसे स्वप्नमें स्वयं चिन्मय जीवात्मा ही स्वप्न-जगत् के रूपसे भासित होता है, वैसे ही यहाँ सृष्टिके आरम्भ में चिदाकाशके सिवा इस दृश्यका अन्य कोई कारण नहीं पाया जाता । ( सर्ग १७४-१७६ )
सृष्टिकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! तत्त्वज्ञानीकी दृष्टिमें कोई अज्ञानी है ही नहीं ( वह एकमात्र ब्रह्मके सिवा दूसरी किसी वस्तुको देखता ही नहीं है ) । अतः जिसका अस्तित्व ही नहीं है, ऐसे आकाश-वृक्षके सदृश अज्ञानीके विषयमें विचार करना कैसा होगा ? अज्ञानका बोधस्वरूप आत्माके ही भीतर भान होता है; अतः वही उसका अधिष्ठान है । जगत् अज्ञानका अङ्ग है, अतः अज्ञानरूप ही है । जैसे स्वप्न और सुषुप्ति—दोनों निद्राके अन्तर्गत होनेसे निद्राके ही अङ्ग हैं; इसलिये उन्हें केवल निद्रारूप ही कहा जा सकता है, वैसे ही जगत्का स्वरूप भी अपने अधिष्ठानभूत चिन्मय परमात्मासे भिन्न नहीं है । जैसे शुद्ध जलराशिमें लहर, भँवर और द्रवता आदिके रूपमें जल ही प्रतीत होता है, वैसे ही ब्रह्ममें सर्ग नामक ब्रह्म ही भासित होता है । जैसे निर्मल वायुमें स्पन्दन, आवर्त्त और विवर्त्त आदिकी प्रतीति होती है, वैसे ही ब्रह्मरूप वायुमें सृष्टिरूपी स्पन्दन भासित होता है । जैसे महाकाशमें अनन्तता, छिद्रता और शून्यता आदि
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीरामका कुन्ददन्त नामक ब्राह्मणके आगमनका प्रसंग उपस्थित करना * ६६३
आकाशरूप ही हैं, उससे भिन्न नहीं है, उसी प्रकार सृष्टि भी परात्पर ब्रह्मरूप ही है। जैसे निद्रा आदिमे स्पष्टरूपसे उपलब्ध होनेपर भी ये सारे स्वप्नगत पदार्थ असन्मय ही हैं, उसी प्रकार ये सृष्टिके पदार्थ भी हैं, अतः इनकी सत्ता नहीं है। परंतु सत्स्वरूप परमात्मामें उपलब्ध होनेके कारण उससे अभिन्न ही हैं। जैसे निद्राकालमें मनुष्य एक स्वप्नसे दूसरे स्वप्नमें स्थित होता है, वैसे ही अजन्मा परमात्मा अपनी सत्तामें ही एक सर्गसे दूसरे सर्गके रूपमें स्थित होते हैं। जैसे साम्प्रतिक सर्वदर्शनरूप परमात्मामें वर्तमान घट, पट आदि शब्द और उनके अर्थ स्थित हैं, उसी प्रकार अद्वितीय महाचैतन्यरूप परमात्मामें भूत और भविष्य कालकी सारी सृष्टियाँ स्थित हैं। जैसे परमात्मामें ही सृष्टिरूप परमात्माका भान होता है, वैसे ही चितिमें ही चिन्मय शब्द और उनके अर्थभूत सर्गोंका चितिके द्वारा ही भान होता है।
इस जगत्में न कोई आकृति है, न संसार है, न संसारका अभावरूप मोक्ष है, न जन्म है, न नाश है, न सत्ता ( भावविकार ) है और न असत्ता ही है। केवल परम शान्त ब्रह्मका ही अपने आपमें स्फुरण होता है अथवा यहाँ ब्रह्मसे भिन्न किसी प्रकारका स्फुरण भी नहीं है। यद्यपि ब्रह्म अनेकानेक सृष्टिरूपी पुतलियोंके समुदायसे भरा हुआ है, तथापि वस्तुतः उसमें जगतरूपी लताएँ, उनकी चोटियाँ, जड़ें, उनकी रचनाएँ और उनकी जड़ोंका भूमिमें प्रवेश—ये सब अलभ्य हैं। वह आदि-अन्तसे रहित है, कालके द्वारा भी उसके जन्म और नाश नहीं होते तथा वह पूर्णरूपसे विशुद्ध एवं सच्चिदानन्दघन है।
चिन्मय प्रकाशरूप परमार्थकाश ही, जो सब पदार्थोंसे रहित है, स्वप्नकी भाँति द्रष्टा, दृश्य और दर्शन रूपसे प्रतीत हो रहा है। इसलिये यह जगत् एकमात्र चेतनाकाश ही है। आकाशमें भ्रमवश होनेवाली वृक्षसमूहोंकी स्फुरणाके समान ब्रह्मरूपी समुद्रमें जो नाम-रूपात्मक जलकणोंका स्फुरण हो रहा है, वही यह सृष्टि है। आकाशमें जो वृक्षसमूहकी प्रतीति होती है, वह तो आकाशसे भिन्न-सी लगती है; क्योंकि उसमें आकाशकी शून्यता नहीं दिखायी देती। परंतु परमब्रह्मरूपी महासागरमें जो सृष्टिरूपी जलबिन्दु विद्यमान हैं, वे उससे किंचिन्मात्र भी भिन्न नहीं हैं।
( सर्ग १७७-१७९ )
श्रीरामका कुन्ददन्त नामक ब्राह्मणके आगमनका प्रसंग उपस्थित करना और वसिष्ठजीके पूछनेपर कुन्ददन्तका अपने संशयकी निवृत्ति तथा तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिको स्वीकार करते हुए अपना अनुभव बताना
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—भगवन् ! मेरे मनमें एक संदेह है, आप उसका निवारण कीजिये। एक दिनकी बात है, मैं विद्यामन्दिरके भीतर विद्वानोंकी सभामें बैठा था। उसी समय विदेह जनपदसे वहाँ एक श्रेष्ठ तपस्वी श्रीसम्पन्न विद्वान् ब्राह्मण आया। आकर उसने उस ब्राह्मणसभाको प्रणाम किया। फिर जब वह एक आसनपर बैठा, तब मैने भी उठकर उसे प्रणाम किया और पूछा—'ब्रह्मन् ! आप लंबा रास्ता तय करके आये हैं; इसलिये थक गये होगे। किसी विशेष उद्देश्यकी सिद्धिके लिये यत्नशील-से दिखायी देते हैं। बताइये, आज कहाँसे आपका शुभागमन हुआ है?'
ब्राह्मणने कहा—महाभाग ! आपका कहना ठीक है। मैं अपने उद्देश्यकी सिद्धिके लिये विशेष प्रयत्नशील हूँ। यहाँ जिस प्रयोजनसे आया हूँ, उसे भी सुन लीजिये। मैं विदेह देशका ब्राह्मण हूँ और विद्याध्ययन कर चुका हूँ। मेरे दाँत कुन्दके फूलकी भाँति उज्ज्वल
६६४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
हैं; इसलिये मुझे लोग 'कुन्ददन्त' कहते हैं। एक दिन मेरे मनमें संसारसे वैराग्य हुआ और मैं भ्रमजनित क्लेशकी शान्तिके लिये देवताओ, ब्राह्मणो तथा मुनीश्वरोंके स्थानोंमें भ्रमण करने लगा। तब श्रीपर्वतपर एक तपस्वीसे भेंट होनेपर वे मुझे गौरी-आश्रममें स्थित वृद्ध तपस्वीके पास ले गये। वृद्ध तपस्वीने श्रीपर्वतवासी तपस्वीकी, उनके सात भाइयोकी, उन सबके तपकी, वरदान और शापकी एवं घरके अंदर ही उन सातोंके सप्तद्वीपाधिपति होकर अन्तमें प्रलय-कालमें विलीन होनेकी बाते बतायीं। तदनन्तर उन आठवें अपने मित्र तपस्वीकी मृत्युसे दुखी हुआ मै उन कदम्ब वृक्षके नीचे रहनेवाले तपस्वीके पास गया। वे तीन मास प्रतीक्षा करनेके बाद समाधिसे विरत हुए। तब मैने नम्रतापूर्वक उनके सामने अपना प्रश्न उपस्थित किया। इसपर वे इस प्रकार बोले।
कदम्ब वृक्षके नीचे रहनेवाले तपस्वीने कहा—निष्पाप ब्राह्मण ! मैं समाधिसे विरत होकर एक क्षण भी नहीं रह सकता; अतः शीघ्र ही बड़ी उतावलीके साथ मैं फिर समाधिमें ही प्रवेश करूँगा। इस समय मेरा वास्तविक उपदेश भी अभ्यासके बिना तुम्हें नहीं लगेगा। इसलिये दूसरी युक्ति सुनो और वैसा ही करो। अयोध्या नामसे प्रसिद्ध जो पुरी है, वहाँ दशरथ नामक राजा राज्य करते हैं। उनके पुत्र श्रीराम नामसे विख्यात हैं। तुम उन्हींके पास चले जाओ। उनके कुलगुरु मुनिवर वसिष्ठ सभामें मोक्षके उपायकी दिव्य कथा कहेंगे। ब्रह्मन् ! चिरकालतक उस कथाको सुनकर तुम भी मेरी ही भाँति पावन परमपदमें विश्राम प्राप्त करोगे।
ऐसा कहकर वे तापस मुनि समाधिरूपी अमृतके महासागरमें निमग्न हो गये और मै इस देशमें आपके पास आया हूँ।
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—गुरुदेव ! वही यह कुन्ददन्त नामक द्विज है, जिसने मेरे पास बैठकर यहाँ मोक्षोपाय नामक इस सम्पूर्ण संहिताको सुना है। आप इससे पूछिये। इसका संशय निवृत्त हुआ या नहीं।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुनिवर वसिष्ठने कुन्ददन्तकी ओर देखकर पूछा—'निष्पाप विप्रवर कुन्ददन्त ! कहो, क्या तुमने मेरे इस उत्तम मोक्षदायक उपदेशको सुनकर ज्ञेय तत्त्वको जाना?'
कुन्ददन्त बोला—भगवन् ! समस्त संशयोंका विनाश करनेवाला मेरा चित्त ही इस समय मेरी विजयका सूचक है। मेरे सारे संदेहोंकी निवृत्ति हो गयी और मैने अवश्य जाननेके योग्य अखण्ड ब्रह्मतत्त्वको जान लिया। विशुद्ध ज्ञेय तत्त्वका मुझे ज्ञान हो गया। मैने क्षयरहित द्रष्टव्य वस्तुका दर्शन कर लिया और पाने योग्य सब कुछ मैं पा गया। इस समय ब्रह्मरूप परमपदमें विश्राम कर रहा हूँ। मैने आपके मुखसे सुनकर चिन्मय परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लिया। यह जो कुछ दिखायी देता है, सब परमार्थ सच्चिदानन्दघनरूपी मेघ है, जो चिन्मय आकाशमें अपनेसे अभिन्न जगत्के रूपमें छाया है। सर्वात्मक होनेके कारण सर्वरूपी सर्वव्यापी परमात्माका सर्वत्र, सदा सबके द्वारा और सब कुछ होना पूर्णरूपसे सम्भव है। सरसोंके एक दानेके छिद्रके भीतर असंख्य ब्रह्माण्डोंका किस प्रकार होना सम्भव है और किस प्रकार उनका होना कदापि सम्भव नहीं है, यह सब मैने पूर्णरूपसे समझ लिया। जो-जो वस्तु जब जिस रूपमें यहाँ भासित होती है और सम्पूर्ण प्राणियोंके अनुभवमें आती है, वह-वह उस समय उस रूपमें केवल सर्वघन परमात्मा ही है। इस तरह विचार करनेसे सिद्ध हो जाता है कि सब कुछ आदि-अन्तसे रहित एक नित्य विज्ञानानन्दघन परब्रह्म परमात्मा ही है।
(सर्ग १८०—१८४)
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * सब कुछ ब्रह्म है, जगत् वस्तुतः असत् है * ६६५
सब कुछ ब्रह्म है, जगत् वस्तुतः असत् है, वह ब्रह्मका संकल्प होनेसे उससे भिन्न नहीं है; जीवात्माको अज्ञानके कारण ही जगत्की प्रतीति होती है—इसका प्रतिपादन
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! कुन्ददन्तके इस प्रकार कहनेपर प्रशंसनीय महात्मा भगवान् वसिष्ठ मुनिने यह परमार्थोचित वचन कहा ।
श्रीवसिष्ठजी बोले—हर्षकी बात है कि महात्मा कुन्ददन्तको शास्त्रश्रवणसे विज्ञानानन्दघन परमात्मामें विश्राम प्राप्त हो चुका है। सम्पूर्ण विश्व ब्रह्म ही है—इस तत्त्वको ये हाथपर रखे हुए आँवलेकी तरह देख रहे हैं। निश्चय ही भ्रममात्र जिसका स्वरूप है, ऐसा यह विश्व इन्हें अजन्मा ब्रह्म ज्ञात होने लगा है। भ्रान्ति इनके लिये ब्रह्मरूप ही हो गयी है। वही ब्रह्म जो शान्त, एक और निर्विकार है। जो जैसे, जिसके द्वारा, जहाँ, जिस प्रकारका, जितना, जब और जिस हेतुसे है, वह वैसे, उसके द्वारा, वहाँ, उस प्रकारका, उतना, उस कालमें और उसी हेतुसे कल्याणमय, शान्त, जन्मादिरहित, मौन, अमौन, अजर, सर्वव्यापी, सुशून्य, अशून्य, आदि-अन्तसे रहित एवं अक्षय ब्रह्म ही है। व्यवहारमें ब्रह्म स्वयं दृश्य, स्वयं द्रष्टा, स्वयं चेतन, स्वयं जड़, स्वयं सब कुछ और स्वयं कुछ भी नहीं है। वास्तवमें वह सच्चिदानन्द परमात्मा अपने आपमें ही स्थित है। दृश्यजगत् ही परब्रह्म है और परब्रह्म ही दृश्यजगत् है। यह न तो शान्त है, न अशान्त है; न निराकार है और न साकार ही है ।
जैसे जागनेपर स्वप्न आदि निराकार भासित होते हैं, वैसे ही ब्रह्म-साक्षात्कार हो जानेपर यह शरीर भी निराकार ही प्रतीत होता है। चैतन्यमात्र ही इसका स्वरूप है। यह स्वप्नकी भाँति अनुभवमें आनेपर भी असत् ही है। ये भ्रमवश दिखायी देनेवाले सृष्टि, स्थिति और प्रलय आदि भाव वास्तवमें नहीं हैं। जैसे चित्रलिखित चित्रवधू चित्रसे अतिरिक्त नहीं है, वैसे ही यह दृश्यमान जगत् परमात्मासे भिन्न नहीं है। जैसे चित्रकारद्वारा बनायी जानेवाली चित्रगत सेना बुद्धिस्थ चित्रसे भिन्न नहीं है, वैसे ही ब्रह्मकी चित्ता-दशामें मूर्त सृष्टि नाना रूपोंमें प्रतीत होती हुई भी उससे भिन्न न होनेके कारण नानात्वसे रहित है।
रघुनन्दन ! जैसे समुद्रमें जलराशिका स्फुरण होनेपर ही उसमें भँवर उठते हैं, उसी प्रकार विशुद्ध चिदाकाशका अपने सत्यसंकल्पके अनुसार जो स्फुरण है, उसीको जगत् कहते हैं । परमात्मचैतन्यमें समुद्रमें जलराशिकी भाँति वस्तुतः चिदात्मक जगद्भावोंका जो अकस्मात् भान होता है, उसे मनीषी पुरुष संकल्प आदि नाम देते हैं। कालसे, अभ्यासयोगसे, विचारसे, समभावसे, जातिकी सात्त्विकतासे और अन्तःकरणके सात्त्विक एवं निर्मल होनेसे सम्यग्ज्ञानसम्पन्न यथार्थदर्शी तत्त्वज्ञ पुरुषकी बुद्धि द्वैत और अद्वैतसे रहित चिन्मात्रस्वरूप हो जाती है । चिदाकाशरूप परमात्मा चिदाकाशमें ही स्फुरित होनेवाले अपने इस रूपको—द्रष्टा-दृश्यरूप जगत्को देखता हुआ सदा साक्षीरूपसे प्रकाशित होता है। वह उससे भिन्न नहीं है। एक चेतनसत्ताके उपजीवी होनेसे द्रष्टा और दृश्य दोनों एक हैं; क्योंकि चिदाकाश सर्वव्यापी है। जैसे शून्यत्व और आकाशमें कोई भेद नहीं है, उसी तरह जगत् और ब्रह्ममें भी भेद नहीं है ।
श्रीराम ! सृष्टिके आरम्भकालमें परमात्माके मनमें अपने प्रकृतिसहित विलीन हुए प्राणियोंके पूर्वकृत कर्मवासनानुसार जो कुछ नियत रूपसे भान हुआ, वह जैसा था और जिस प्रकारके कार्य-कारणभावसे स्थित था, वह आज भी उसी रूपमें स्थित है और वही जगत् कहलाता है । सर्वशक्तिमान् परमात्माको जिस-जिसका जैसे संकल्प होता है, वह-वह उसी रूपमें हो जाता
६६६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
है। सत्यसंकल्प परमात्माकी संवित् (अनुभूति) मात्ररूप है। अतः उसे जिस वस्तुका भान हुआ, वह अभानरूप कैसे हो सकता है ?
रघुनन्दन ! चेतन जीवकी जो उत्पत्ति बतायी गयी है, उसका अभिप्राय इतना ही है कि जीव ब्रह्मसे भिन्न नहीं है, यह बात समझमें आ जाय। जीवकी उत्पत्ति वास्तविक है, यह बताना अभीष्ट नहीं है। वस्तुतः चेतनस्वरूप जीव चिन्मय परब्रह्म परमात्माका अंश है; इसलिये कृत्रिम नहीं है। किंतु अज्ञानसे चेत्य अर्थात् दृश्य जगत्की ओर उन्मुख हो जानेके कारण ही वह जीव शब्दसे कहा जाता है। जीवनसे अर्थात् प्राण और कर्मेन्द्रियोंको धारण करनेसे तथा चेतनसे अर्थात् ज्ञानेन्द्रियोंको धारण करनेसे वह जीव कहलाता है। 'मैं ब्रह्म हूँ' इस यथार्थ आत्मस्वरूपको भूलकर चिन्मय जीवात्मा जब यह देखने लगता है कि मैं यह मनुष्य आदि शरीर हूँ और यह पृथ्वी आदि मेरा आधार है, तब वह उसीमें दृढ़ आस्था बाँध लेता है। असत्यमें सत्यबुद्धि करके ही जीव भावनावश बँध जाता है और अपने भीतर बारंबार भावना एवं नानात्व-का अनुसरण करने लगता है। जो जिसमें अत्यन्त आसक्त होगा, वह उसे क्यों न देखेगा ? जगत्की जो भ्रान्ति हो रही है, वह असत्य ही है, तो भी भावनाके कारण इस प्रकार प्रौढ़ताको प्राप्त हो गयी है। सबके कारणभूत सनातन ब्रह्मसे भिन्न दूसरा कोई जगत्का कारण नहीं है। वह कारण भी कार्यताके बिना सम्भव नहीं है और निर्विकार कूटस्थ सच्चिदानन्दघन अद्वितीय ब्रह्ममें कार्यता और कारणता आदिका होना कदापि सम्भव नहीं है। इसलिये इस जगत्की प्रतीति अज्ञानके कारण ही हो रही है।
(सर्ग १८६–१८९)
श्रीरामजीके विविध प्रश्न और श्रीवसिष्ठजीके द्वारा उनके उत्तर
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ज्ञानकी ज्ञेयता-पत्ति अर्थात् जो ज्ञानस्वरूप है, उसे ज्ञेय—जड दृश्य समझ लेना ही बन्धन है और उस ज्ञेयता—जड दृश्यबुद्धिका सर्वथा निवारण ही मोक्ष कहलाता है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! ज्ञानकी ज्ञेयता-बुद्धिका निवारण कैसे होता है ? उस ज्ञेयता-बुद्धिका सर्वथा निवारण हो जानेपर यहाँ बन्धताबुद्धि कैसे निवृत्त होती है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—शम, दम आदि साधनोंसे युक्त सच्चिदानन्द परमात्माका सम्यग्ज्ञानरूप प्रबोध प्राप्त होनेसे भ्रान्ति-बुद्धि दूर हो जाती है। उस भ्रान्ति-बुद्धिके दूर हो जानेपर इस प्रकार ज्ञेयता—जड दृश्यबुद्धिकी अत्यन्ता-भावरूपा परम शान्तिमयी स्वरूपभूता निराकार मुक्ति प्राप्त होती है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! कैवल्य बोधरूप सम्यग्ज्ञान क्या कहलाता है, जिसकी पूर्णरूपसे प्राप्ति हो जानेपर यह जीव बन्धनसे छुटकारा पा जाता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! सबका अधिष्ठानभूत जो चिन्मात्र ज्ञान है, वह त्रिकालमें भी ज्ञेयरूप नहीं हो सकता। वह केवल अन्वय ज्ञान अवर्णनीय है। इस प्रकार जो आन्तरिक बोध है, उसे सम्यग्ज्ञान कहा गया है।
श्रीरामजीने पूछा—ज्ञानस्वरूप चिन्मय परमात्माके अंदर उससे भिन्न ज्ञेयता क्या है ? यह बताइये, साथ ही इस बातपर भी प्रकाश डालिये कि 'ज्ञान' शब्दकी व्युत्पत्ति कैसे करनी चाहिये। अवबोधनार्थक 'ज्ञा' धातुसे भावमें ल्युट् प्रत्यय होनेपर ज्ञान शब्द बनता है या करणमें प्रत्यय होनेपर ?*
* 'ल्युट् च' (पा० सू० ३।३।११५) इस सूत्रसे भावमें ल्युट् प्रत्यय होता है तथा 'करणाधिकरणयोश्च' (पा० सू० ३।३।११७) इस सूत्रसे करण और अधिकरण अर्थमें ल्युट् प्रत्यय होता है। 'भावमें' प्रत्यय होनेपर ज्ञान शब्दका अर्थ होगा—जानना, समझना, बोध होना। करणमें प्रत्यय होनेपर ज्ञानका अर्थ होगा—ज्ञानका साधन, जिससे जाना जाय वह करण।
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीरामजीके विविध प्रश्न और श्रीवसिष्ठजीके द्वारा उनके उत्तर * ६६७
श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! बोधमात्र ही ज्ञान है। अतः यहाँ भावसाधनमात्र ज्ञानको ही ग्रहण किया गया है अर्थात् भावमें प्रत्यय करनेसे जो ज्ञान शब्द बनता है, वही यहाँ अभीष्ट है। ज्ञान और ज्ञेयमें कोई भेद नहीं है, जैसे पवन और स्पन्दनमें (वायु और उसकी गतिशीलतामें) भेद नहीं होता है।
श्रीरामजीने पूछा— यदि ऐसी बात है तो यह ज्ञान, ज्ञेय आदिका भ्रम, जो खरगोशके सींगकी भाँति मिथ्या ही है, तीनों कालोंमें व्यवहारके योग्य कैसे सिद्ध होता है !
श्रीवसिष्ठजीने कहा— बाह्य पदार्थोंके भ्रमसे ही यहाँ भ्रमबुद्धि उत्पन्न हुई है, ऐसा जानना चाहिये। वास्तवमें किसी ही बाह्य अथवा आभ्यन्तरिक पदार्थका अस्तित्व सम्भव नहीं है। इसलिये ज्ञान और ज्ञेय आदिका भेद-भ्रम मिथ्या ही है। (स्वप्नकालमें अथवा भ्रान्तिज्ञानमें सहस्रों असत् पदार्थ व्यवहारमें आते हैं। अतः यह ज्ञान और ज्ञेय आदिका भ्रम असत्य होनेपर भी इसका अज्ञानियोंके व्यवहारमें आना असम्भव नहीं है।)
श्रीरामजीने पूछा— मुने ! तुम, मैं आदि जो यह प्रत्यक्ष दृश्यपदार्थ हैं, जो भूत आदिरूपसे अनुभवमें आता है, वह है ही नहीं, यह कैसे समझा जाय ? कृपया मुझे बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा— निष्पाप रघुनन्दन ! सृष्टिके आरम्भकालमें विराट् पुरुष ब्रह्मा आदिके रूपमें कोई भी पदार्थ उत्पन्न ही नहीं हुआ। इसलिये किसी ज्ञेय अथवा दृश्य वस्तुकी सत्ता सम्भव ही नहीं है।
श्रीरामजीने पूछा— मुने ! भूत, भविष्य और वर्तमान कालमें होनेवाला जो यह जगत्का दर्शन है, जिसका प्रतिदिन सबको अनुभव हो रहा है, इसके होते हुए आप यह कैसे कह रहे हैं कि यह जगत् कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ; इसलिये कभी किसीको इसका दर्शन भी नहीं हुआ।
सं० यो० व० अं० २३—
श्रीवसिष्ठजीने कहा— श्रीराम ! स्वप्नके पदार्थ, मृगतृष्णाका जल तथा संकल्पित पदार्थ— ये सब न तो कभी उत्पन्न हुए और न वास्तवमें कभी देखे गये। फिर भी, भ्रमवश इनकी प्रतीति हो जाती है। इसी तरह मैं, तुम आदि रूप जो जगत् है, यह न कभी उत्पन्न हुआ और न तत्त्वदृष्टिसे देखनेपर कभी उपलब्ध ही हुआ। इसलिये सर्वथा मिथ्या है, तथापि भ्रमवश इसकी प्रतीति होती है।
श्रीरामजीने पूछा— भगवन् ! मैं, तुम, यह इत्यादि रूपसे पूर्णतः अनुभवमें आनेवाला यह जगत् सृष्टिके आदिमें उत्पन्न ही नहीं हुआ, यह कैसे समझा जाय ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! कारणसे ही कार्य उत्पन्न होता है, अन्यथा नहीं। यह एक निश्चित सिद्धान्त है। प्रलयकालमें तीनों लोकोंका जो पूर्णतः लय हो गया, तब पुनः इसकी उत्पत्तिके लिये कोई कारण ही नहीं रह गया था (कारण न होनेसे सृष्टि हुई ही नहीं, इसलिये जो कुछ दीखता है, सब मिथ्या प्रतीति मात्र है)।
श्रीरामजीने पूछा— मुने ! महाप्रलय हो जानेपर जो अजन्मा, अविनाशी परब्रह्म अवशिष्ट रह गया, वही नूतन सृष्टिकी उत्पत्तिका कारण कैसे नहीं हो सकता ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा— श्रीराम ! कारणमें जो कार्य सद्रूपसे विद्यमान है, वही उससे प्रकट होता है, जो उसमें है ही नहीं, वह कैसे प्रकट हो सकता है। क्या कभी घटसे पटकी उत्पत्ति होती है ? कभी नहीं।
श्रीरामजीने कहा— महाप्रलय आनेपर जगत् सूक्ष्मरूपसे ब्रह्ममें रहता है। वही सृष्टिके समय पुनः उससे प्रकट हो जाता है।
श्रीवसिष्ठजी बोले— परम बुद्धिमान् निष्पाप रघुनन्दन ! महाप्रलयके अन्ततक उस ब्रह्ममें जगत्की सत्ताका
६६८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमांनस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
किसने अनुभव किया है तथा उसकी वह सत्ता वहाँ किस रूपमें रहती है !
श्रीरामजीने कहा—ब्रह्ममें जगत्की सत्ता उस समय ज्ञानस्वरूपा ही होती है और ज्ञानियोंके अनुभवमें भी आती है। अतः वह प्राकृत आकाशके समान शून्य-रूप तो नहीं होती। इसलिये उस सत्ताको असत् नहीं कहा जा सकता।
श्रीवसिष्ठजी बोले—महाबाहो ! यदि ऐसी बात है तो वह ज्ञान ही तीनों लोकोंका स्वरूप है। किंतु जो विशुद्ध ज्ञानस्वरूप है, उसके जन्म और मरण कैसे हो सकते हैं ?
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! यदि इस प्रकार सृष्टि उस ब्रह्ममें स्थित नहीं है तो यह भ्रान्ति कहाँसे और कैसे आ गयी ! यह मुझे बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! कार्य-कारणताका अभाव होनेसे ही ब्रह्ममें न सृष्टि है न प्रलय। यह जो जगत् भासित होता है, वह जिसको और जिस रूपमें भास रहा है। वह सब ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेयरूपी त्रिपुटी केवल आत्मा ही है।
श्रीरामजीने पूछा—यह बात तो असंगत-सी लगती है। जो यन्त्रका चालक चेतन है, वह जड यन्त्र-रूप कैसे हो सकता है ? द्रष्टा ईश्वर स्वयं ही दृश्य कैसे बन सकता है ! काठ दाहक बनकर अग्निको जला दे, क्या यह कभी सम्भव है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! द्रष्टा दृश्यभावको नहीं प्राप्त होता; क्योंकि दृश्यकी सत्ता सम्भव ही नहीं है। केवल द्रष्टा ही प्रकाशित होता है, जो एकमात्र सच्चिदानन्दघनस्वरूप एवं सर्वात्मा है।
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! तब सृष्टिके आदिमें अनादि, अनन्त, शुद्ध चिन्मय ब्रह्म ही जगत्का संकल्प करता है। इसीसे इस जगत्का भान होता है। यदि ऐसा न होता तो चेत्य जगत्का प्राकट्य कैसे हो सकता था ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—किसी भी चेत्यकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है; क्योंकि उसका कोई कारण ही नहीं है। चेत्यके अत्यन्त अभावके ही कारण चेतनकी नित्यमुक्तता और अवर्णनीयता सिद्ध होती है।
श्रीरामजीने पूछा—यदि ऐसी बात है तो ये अहंता आदि चेत्य कैसे और कहाँसे उत्पन्न हुए हैं, जगत्का भान कैसे होता है और स्पन्दन आदिका अनुभव क्यों होता है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! मैं पहले ही बता चुका हूँ कि कारणकी सत्ता न होनेसे आदिकालमें ही किसी वस्तुकी उत्पत्ति नहीं हुई थी। ऐसी दशामें चेत्य कहाँसे होगा ? इसलिये सब कुछ शान्तस्वरूप परब्रह्म ही है। सृष्टिकी प्रतीति केवल भ्रममात्र है।
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! जो वाणीकी पहुँचसे बाहर है, चेत्य और चलन आदिसे रहित है, सदा स्वप्रकाश और निर्मक है, उस नित्यमुक्त परब्रह्ममें किसको किस निमित्तसे और कैसा भ्रम हो सकता है ( जब ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई है ही नहीं और वह नित्यमुक्त ज्ञानस्वरूप है तो उसमें किसको और कैसे भ्रम हो सकता है ! फिर यह जगत् नामक भ्रम क्या बला है ! ) इसका उत्तर मुझे दीजिये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! सृष्टिरूप भ्रमका कोई कारण नहीं है; इसलिये यह निश्चितरूपसे कहा जा सकता है कि उसकी सत्ता त्रिकालमें भी नहीं है। तुम, मैं आदि सब कुछ एकमात्र शान्तस्वरूप निर्विकार ब्रह्म ही है।
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! फिर तो देश, काल, क्रिया, द्रव्य, भेद, संकल्प और चित्त सभी वस्तुओंकी उत्पत्ति
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीरामजीके विविध प्रश्न और श्रीवसिष्ठजीके द्वारा उनके उत्तर * ६६९
| असम्भव ही है, फिर इन सबकी सत्ता कैसे उपस्थित हो गयी ?<br><br>श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! देश, काल, क्रिया, द्रव्य, भेद, संकल्प और चित्त इन सबकी सत्ता अज्ञानमात्र ही है। अज्ञानसे भिन्न इनकी सत्ता न है, न पहले कभी थी।<br><br>श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! तत्त्वदृष्टिसे कारणके अभावमें द्वैत और एकत्वकी सम्भावना ही नहीं रह जाती। फिर न कोई बोध्य रह जाता है न बोधक। बोध्य-बोधकके अभावमें बोधका होना भी कैसे सम्भव होगा ? ( जिसका बोध होता है वह कर्म कारक तो होना ही चाहिये। कर्म माननेपर द्वैतकी आपत्ति होती है और कर्म न माननेपर बोध किस वस्तुका हो, यह प्रश्न खड़ा हो जाता है।)<br><br>श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! अज्ञानी जीव ही बोधके द्वारा अपने अज्ञानविनाशरूप फलका आश्रय होकर आत्मबोधता (बोधकर्मता) को प्राप्त होता है। इसीसे बोध शब्द भी बोध्यता (बोधरूप फलवाली सकर्मकता) को प्राप्त होता है। ये सब बातें अज्ञानियोंको समझानेके लिये ही कहने योग्य हैं। हम-जैसे जीवन्मुक्तोंके लिये नहीं (जीवन्मुक्त पुरुष तो ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेयरूपी त्रिपुटीसे रहित हो शुद्ध ज्ञानस्वरूप हो जाता है। उसके लिये बोधकी सकर्मकताका निरूपण अनावश्यक हो जाता है)।<br><br>श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! 'मैं जीवन्मुक्त हूँ' ऐसा अनुभव होनेसे यह सिद्ध है कि बोध ही अहंकाररूप परिणामको प्राप्त होता है। यह बोध अहंभावको प्राप्त हुआ तो यथार्थ बोध नहीं रह गया। उसमें भिन्नता आ गयी। अनन्त, जलसे भी बढ़कर निर्मल, चिन्मय, परमात्मस्वरूप आप-जैसे जीवन्मुक्त पुरुषोंमें यह बोधभिन्न अहंता कैसे सम्भव होती है ? | श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! बोधस्वरूप जीवन्मुक्तकी स्वरूपभूता जो बोधता है, वही उसमें विशुद्ध अहंता कहलाती है। तत्त्वज्ञानीका मैं और तुम भी उसके स्वरूपभूत ज्ञानसे भिन्न नहीं हैं। उसमें जो द्वैतरूप व्यवहार देखा जाता है, वह वायु और उसके स्पन्दनकी भाँति अद्वैतरूप ही है।<br><br>श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! संसारको स्वप्नकी भाँति मिथ्या समझ लेनेमात्रसे कौन-सा अभीष्ट फल सिद्ध होता है ? स्वप्न आदिमें पदार्थोंकी साकारता कैसे शान्त होती है ?<br><br>श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! अध्यात्मशास्त्रके पूर्वापरके विवेकपूर्वक विचारसे ज्ञानोदय होनेपर पदार्थोंमें साकारता या स्थूलताकी भावना शान्त हो जाती है। वे सब-के-सब चिन्मय ब्रह्मरूप ही हैं, ऐसा अटल निश्चय हो जाता है। इसी तरह स्वप्नके पदार्थोंमें भी (जागनेपर) स्थूलताकी भावना निवृत्त हो जाती है।<br><br>श्रीरामजीने पूछा—जिसकी भावना स्थूलताको छोड़कर अत्यन्त सूक्ष्मताको प्राप्त हो गयी है, वह जगत्को कैसा देखता है ? उसका यह संसारभ्रम कैसे शान्त होता है ?<br><br>श्रीवसिष्ठजीने कहा—वासनाके क्षीण हो जानेपर पुरुष जगत्को उजड़ा हुआ, असत्के सदृश, आकाशमें दीखनेवाले गन्धर्वनगरके समान और वर्षाद्वारा मिटाये गये चित्रके तुल्य देखता है।<br><br>श्रीरामजीने पूछा—मुने ! वासनाके क्षीण हो जानेपर जिसके लिये जगत्की स्थिति स्वप्नके तुल्य हो जाती है, उस पुरुषकी जागतिक पदार्थोंके विषयमें जब स्थूलताकी भावना मिट जाती है, तब फिर क्या होता है ?<br><br>श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जिसकी दृष्टिमें जगत् केवल संकल्परूप है, उस पुरुषकी वह अति सूक्ष्म वासना भी उत्तरोत्तर क्रमसे विलीन हो जाती है। |
६७० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
इस तरह सर्वथा वासनाशून्य होकर वह शीघ्र ही निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जो अनेक जन्मोंसे बद्धमूल अनेक शाखा-प्रशाखाओंसे सुशोभित तथा जन्म-मरणरूपी बन्धनमें डालनेवाली है, वह घोर वासना किस उपायसे पूर्णतः शान्त हो जाती है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! यथार्थ तत्त्वज्ञानसे जब यह भ्रममात्र दृश्यचक्र स्थूलरूपतासे रहित अनुभूत हो जाता है, तब क्रमशः उसकी वासनाका क्षय होने लगता है।
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! जब दृश्यचक्र स्थूलाकारतासे रहित अनुभूत हो जाता है, तब और क्या होता है ? पूर्ण शान्ति कैसे होती है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! स्थूलाकारताका भ्रम मिट जानेपर जब जगत्की केवल चित्तमात्ररूपता अवगत हो जाती है और चित्तवृत्तियोंके निरोधसे जगत्में गौरवबुद्धि नहीं रहती है, तब जगत्के प्रति होनेवाली आस्था शान्त हो जाती है।
श्रीरामजीने पूछा—भगवन् ! चित्त कैसा है ? उसका विचार कैसे किया जाता है ? और उसके स्वरूपका भलीभाँति विचार कर लेनेपर क्या होता है ? यह बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! चेतनका चेतनीय विषयोंकी ओर उन्मुख होना ही चित्त कहलाता है। इस समय जो चर्चा चल रही है। यही इसका विचार है। इससे इसकी वासना शान्त हो जाती है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! चित्तके रहते हुए चेतनका अचेत्य परमात्माकी ओर उन्मुख होना कितनी देरके लिये सम्भव हो सकेगा ? (क्योंकि चित्तवृत्तियोंका निरोध होनेपर ही परमात्मामें अटल स्थिति हो पाती है) अतः यह बताइये कि निर्वाण-पद प्रदान करनेवाली जो चित्तकी अचित्तता है, उसका उदय कैसे हो सकता है ? (दूसरे शब्दोंमें चित्तके नाशका ही उपाय बतानेकी कृपा करें।)
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जब चेत्य जगत्की उत्पत्ति सम्भव ही नहीं है, तब चितिशक्ति जीवात्मा कैसे और कहाँसे उसका चिन्तन या अनुभव करेगा ? चेत्यकी सत्ता न होनेसे चित्तकी सत्ता भी चिरकालसे ही नहीं है। फिर किसके नाशका उपाय बताया जाय ?
श्रीरामजीने पूछा—जिस चेत्यका सबको अनुभव होता है, उसका होना कैसे सम्भव नहीं है ? जिसका अनुभव हो रहा है, उसका इस तरह अपलाप, उसकी सत्ताको अस्वीकार कैसे किया जा रहा है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—अज्ञानीकी दृष्टिमें जो जगत्का स्वरूप है, वह सत्य नहीं है और ज्ञानीकी दृष्टिमें उसका जैसा स्वरूप है, वह अद्वितीय ब्रह्ममय होनेके कारण वाणीका विषय नहीं है। (अतः यहाँ अज्ञानियोंके ही जगत्की सत्ताका निराकरण किया गया है।)
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! अज्ञानियोंका त्रैलोक्य कैसा है और वह सत्य कैसे नहीं है तथा तत्त्वज्ञानियोंका जगत् जैसा है, वह वाणीका विषय कैसे नहीं हो सकता ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—अज्ञानियोंका जो जगत् है, वह आदि-अन्तसे युक्त तथा द्वैतरूप है। परंतु तत्त्वज्ञानियोंकी दृष्टिमें वह नहीं है। उनकी दृष्टिमें जगत्की सत्ता सम्भव ही नहीं है; क्योंकि आदिकालसे ही कभी उसकी उत्पत्ति नहीं हुई।
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! जो आदिकालसे ही उत्पन्न नहीं हुआ, उसकी सत्ता कभी सम्भव नहीं है। वह असद्रूप और आभासशून्य है। यदि जगत्का भी यही स्वरूप है तो उसका अनुभव कैसे हो रहा है ?
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीरामजीके विविध प्रश्न और श्रीवसिष्ठजीके द्वारा उनके उत्तर * ६७१
श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! जाग्रत्-जगत् स्वप्न जगत्के समान असत् होता हुआ ही सत्केतुल्य प्रतीत हो रहा है। इसकी कभी उत्पत्ति नहीं हुई; क्योंकि उत्पत्तिका कोई कारण नहीं है। यह स्वप्नके तुल्य प्रकट होकर अर्थ-क्रियाकारी भी प्रतीत होता है।
श्रीरामजीने पूछा— भगवन् ! स्वप्न आदिमें और संकल्प एवं मनोरथ आदिमें जो दृश्यका अनुभव होता है, वह जाग्रत् व्यवहारके अनुभवसे उत्पन्न जाग्रत्-रूप संस्कारसे होता है। किंतु यह जाग्रत् किससे अनुभवमें आता है?
श्रीवसिष्ठजीने कहा— श्रीराम ! यदि जाग्रतके संस्कारसे ही स्वप्नका भान होता है तो सपनेमें गिरा हुआ अपना घर कैसे प्रातःकाल जागनेपर सुरक्षितरूपसे उपलब्ध होता है।
श्रीरामजी बोले— भगवन् ! जाग्रत्-पदार्थका स्वप्नमें भान नहीं होता; किंतु अन्य पदार्थ ही स्वप्नमें भासित होता है। वह अन्य पदार्थ ब्रह्म ही है, यह बात मेरी समझमें आ गयी। अब इतना ही पूछना शेष है कि वह अन्य पदार्थरूप ब्रह्म अपूर्व जगत्के रूपमें कैसे भासित होता है?
श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! सब कुछ अपूर्व-सा ही भासित होता हो, ऐसा नियम नहीं है। कोई पदार्थ जिसका पहले अनुभव नहीं हुआ है, चित्तमें अपूर्व प्रतीत होता है और कोई जिसका पहले अनुभव हो चुका है, अपूर्व नहीं प्रतीत होता। वह अनुभव सृष्टिके आदि, अन्त और मध्यमें किये हुए अभ्यासके अनुसार ही भासित होता है।
श्रीरामजीने पूछा— ब्रह्मन् ! इस तरह आपके उपदेश-से यह बात तो समझमें आ गयी कि जाग्रत्-जगत् भी स्वप्नके समान ही है। किंतु यह स्वप्न-तुल्य प्रतीत होनेवाला जगद्रूपी यक्ष भी क्रूर ग्रहकी भाँति कष्ट देता है। अतः किस प्रकार इस रोगकी चिकित्सा की जाय?
श्रीवसिष्ठजीने कहा— रघुनन्दन ! यह जो संसार-
रूपी स्वप्न है, इसका क्या कारण हो सकता है? कार्य-से कारण भिन्न नहीं है, यह बात सर्वत्र देखी गयी है। इस प्रकार इस विषयमें विचार करो।
श्रीरामजी बोले— स्वप्नकी उपलब्धिक कारण है चित्त। इसलिये स्वप्न-जगत् चित्तरूप ही है। इसी प्रकार आपके विचारसे यह जाग्रत्-जगत् भी जो आदि-अन्तसे रहित और असार है, चित्तरूप ही है। इस निश्चयसे जगत्-रूपी रोगकी चिकित्सा स्वतः सिद्ध है।
श्रीवसिष्ठजीने कहा— महामते ! मैं कह चुका हूँ कि चेतनका चेत्यकी ओर उन्मुख होना ही चित्त है। इस दृष्टिसे चित्त महान् चैतन्यघन ही है। वही जगत्के आकारमें स्थित है। अतः सिद्ध हुआ कि स्वप्न, जाग्रत् आदि कुछ भी चिन्मय ब्रह्मसे भिन्न नहीं है; क्योंकि आदिकालसे ही यह जगत् कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ है। इसलिये यह सारा दृश्यमान प्रपञ्च अजर-अमर, शान्त, अजन्मा एवं अखण्ड सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही है।
श्रीरामचन्द्रजी बोले— भगवन् ! आपके सदुपदेशसे मैं यह मानता हूँ कि जीवात्माको भ्रान्तिके कारण द्रष्टापन और भोक्तापनके साथ सृष्टिके जन्म नाश आदि सारे भ्रम परमपद-स्वरूप परब्रह्ममें प्रतीत हो रहे हैं।
श्रीवसिष्ठजीने कहा— राघवेन्द्र ! जो रससे भी रस-तत्त्वके ज्ञाता हैं— सारसे भी सार वस्तुको मथकर निकालने और जाननेमें समर्थ हैं, ऐसे विद्वानोंकी विचार-व्यापारसे युक्त जो कोई नवीन दृष्टि है, वह पहली है तथा समस्त विचारों और शास्त्रके श्रवण, मनन, निदिध्यासनके परिपाकसे परिनिष्ठित जो परम तत्त्वरूप अर्थ है, उसका अपरोक्ष अनुभव करानेवाली जो तत्त्वज्ञानी जीवन्मुक्त महात्माओंकी दृष्टि है, वह दूसरी है। उन्हीं दो दृष्टियोंका अवलम्बन करके मैंने सम्पूर्ण विश्वके स्वरूपपर तबतकके लिये इस प्रकार विचार किया और विचार करना आवश्यक समझा है, जबतक कि यह बोध न हो जाय
सं० यो० व० उ० २४-
६७२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]
कि जितनी भी दृष्टियाँ और उनके द्रष्टाके द्रष्टापन हैं, वे सब त्रिकालमें भी नहीं हैं। सारा जगत्-असत् है—शून्य है। उसकी प्रतीति भ्रममात्र है। वस्तुतः तो न
कोई शून्यता है और न भ्रम ही है। नित्य-निरन्तर, सर्वत्र एकमात्र अपरोक्ष परमानन्दस्वरूप परब्रह्म ही विराजमान है। (सर्ग १९०)
अज्ञानसे ब्रह्मका ही जगतरूपसे भान होता है। वास्तवमें जगत्का अत्यन्ताभाव है और एकमात्र ब्रह्म ही विराजमान है, इस तत्त्वका प्रतिपादन
श्रीरामजी बोले—मुनिश्रेष्ठ! यदि ऐसी बात है तब तो यह सारा जगत् सदा सर्वपदार्थरूप परमार्थमय ब्रह्म ही है, जो न कभी उत्पन्न होता है और न कभी नष्ट ही होता है। जगत्की प्रतीतिका रूपमें यह भ्रान्ति ही भासित हो रही है। तात्त्विक दृष्टिसे तो वह भ्रान्ति भी नहीं है, केवल परब्रह्मकी ही सत्ता है।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन! दृश्यकी उत्पत्ति सम्भव न होनेके कारण न द्रष्टा है और न दृश्य ही है। द्रष्टा, दृश्य और दर्शन आदिकी त्रिपुटी कुछ नहीं है। केवल निर्विकार चिदाकाश ही है। जैसे स्वप्न आदिमें एक ही पुरुष द्रष्टा, दृश्य और दर्शनकी त्रिपुटीरूप होता है, वैसे ही जाग्रत्में भी एकमात्र वह जीवात्मा ही स्वयं द्रष्टा, दृश्य और दर्शनकी त्रिपुटीको धारण करके विराजमान होता है। अतः भासने योग्य पदार्थ, भान तथा भासक स्वयंप्रकाश चेतन ही है, सर्ग आदिमें सृष्टिके तुल्य स्फुरित होता हुआ वह स्वयं ही प्रकाशित होता है। अज्ञानी लोगोंको यह सृष्टि भले ही आश्चर्यके तुल्य प्रतीत
हो। परंतु ज्ञानी महात्माओंकी दृष्टिमें तो यह स्वभावभूत ब्रह्मरूप ही है। सृष्टिके आदिमें जब कि एक विशुद्ध चेतन ही विद्यमान है, तब उसमें संसारकी उत्पत्तिका क्या कारण हो सकता है? दृश्यकी सत्ता किसी तरह भी सम्भव न हो सकनेके कारण केवल ब्रह्म ही जगतरूपसे भासित हो रहा है। इस तरह चिदाकाशस्वरूप परमात्मा ही सृष्टिके आरम्भमें सृष्टिरूपसे स्फुरित होता है। अतः यह जो जगत् है, परमात्मा ही है। शून्यता और आकाशके भेदकी कल्पनाके समान जगत् और ब्रह्मके भेदकी कल्पना भी अज्ञानमात्र ही है। श्रीराम! इस तत्त्वको समझ लेनेपर भी जबतक यह सुन्दर अनुभवसे युक्त एवं दृढ़ न हो जाय, तबतक साधकको पाषाणकी भाँति मौन एवं निर्विकल्प होकर एकमात्र परमात्मामें ही स्थित रहना चाहिये। जिन विषयभोगोंको बार-बार भोगकर परम वैराग्यके कारण त्याग दिया गया है, उन्हें अज्ञानी पुरुषोंके कहनेपर भी ग्रहण नहीं करना चाहिये। (सर्ग १९१)
श्रीरामचन्द्रजीके मुखसे ज्ञानी महात्माकी स्थितिका एवं अपने परब्रह्मस्वरूपका वर्णन
श्रीरामचन्द्रजी बोले—मुने! यहाँ सब कुछ शान्त, आलम्बनरहित, विज्ञानस्वरूप, अनन्त, रागशून्य, कल्पना-रहित एवं विशुद्ध अद्वितीय सच्चिदानन्दघन परब्रह्म ही है। उसके अतिरिक्त न यह दृश्य है न द्रष्टा है न सृष्टि है, न जगत् है, और न जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति आदि ही है। यह जो कुछ दीखता है वह सब असत् ही
है। मुने! इस भ्रान्तिकी उत्पत्ति कहाँसे होती है? इस बातका विचार करना भी उचित नहीं है; क्योंकि भ्रान्तिके अभावका अनुभव हो जानेपर भ्रान्ति रहती ही नहीं, तब उसके कारणका विचार करना कहाँतक संगत हो सकता है? निर्विकार एवं ज्ञानस्वरूप परब्रह्ममें भ्रान्ति हो ही नहीं सकती। यह जो भ्रान्तिरूपताका ज्ञान है वह
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा बोधके पश्चात् होनेवाली शान्त स्थितिका वर्णन * ६७३
भी ब्रह्मरूप ही है। ब्रह्मसे भिन्न नहीं है। जैसे मृगतृष्णामें जलका, गन्धर्वनगरका और नेत्रदोषके कारण उत्पन्न दो चन्द्रमाका भ्रम विचारसे उपलब्ध नहीं होता, उसी प्रकार अविद्या नामक भ्रमकी भी विचारसे उपलब्धि नहीं होती। मुने ! वह भ्रान्ति कहाँसे आयी और क्यों आयी, यह प्रश्न भी यहाँ शोभा नहीं पाता है; क्योंकि जो वस्तु है, उसीपर विचार करनेसे लाभ होता है। जो है ही नहीं, उसपर विचार करनेसे क्या लाभ होगा ? इसलिये कभी कोई भ्रान्ति सम्भव नहीं है। यह आवरणरहित नित्य विज्ञानानन्दघन ब्रह्म ही सब ओर व्याप्त है। आज यहाँ जो कुछ भी जगत् भासित होता है, यह परब्रह्म ही है। निरतिशय आनन्दसे परिपूर्ण परब्रह्ममें यह पूर्ण परब्रह्म ही विराज रहा है। जन्मरहित, अमर, इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण करनेके अयोग्य, श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा सेवित, निर्विकार तथा सब ओरसे निर्दोष परमपदरूप परमात्मा ही सब ओर परिपूर्ण हो रहा है। वही 'अहम्' (मै) पदसे कहा गया है। फिर भी वह अहंकारसे सर्वथा रहित है। अनेक रूपसे प्रतीत होनेपर भी वह एक है तथा विशुद्ध एवं सदा प्रकाशमान है।
आदि, मध्य और अन्तसे रहित जिस परमपदको देवता तथा ऋषि भी नहीं जानते हैं, वही यह सर्वत्र प्रकाशित हो रहा है। कहाँ है जगत् और कहाँ उसकी दृश्यता ! द्वैत और अद्वैतकी भावनाको उभारने-वाले जो वाक्य संदेह और भ्रम हैं, उनसे हमारा क्या प्रयोजन है ? वास्तवमें सबका आदि, अनामयस्वरूप एक परम शान्त ब्रह्म ही परिपूर्ण है। अपरिच्छिन्न उदयवाले—सर्वव्यापी इस परब्रह्मका साक्षात्कार हो जानेपर अज्ञानीकी दृष्टिमें स्फुरित होनेवाला संसाररूपी पिशाच तत्त्वज्ञकी दृष्टिमें नष्ट हो जाता है। वह जडकी भाँति व्यवहारमें लगा हो तो भी उस ज्ञानीकी पूर्वकी भेदबुद्धि उसी तरह गल जाती है, जैसे जलके भीतर कङ्कर नष्ट हो जाती है। यहाँ वास्तवमें न तो अज्ञान है, न भ्रम है, न दुःख है और न सुखका उदय ही है। विद्या-अविद्या, सुख-दुःख—सब कुछ निर्मल ब्रह्म ही है। जितना और जो भी यहाँ है, वह सब विशुद्ध सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही है। ब्रह्मन् ! वह ब्रह्म मैं ही हूँ। सदा ही सब कुछ एकमात्र मैं ही हूँ। मेरा कहीं अन्त नहीं है। मैं परम शान्त हूँ, सब कुछ हूँ, अथवा कुछ नहीं हूँ। एकमात्र सत्-स्वरूप ही हूँ अथवा वह भी नहीं हूँ, मैं ही परम आश्चर्यरूप निर्वाण नामक परमशान्ति-स्वरूप हूँ।
(सर्ग १९२-१९३)
श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा बोधके पश्चात् होनेवाली शान्त एवं संकल्पशून्य स्थितिका वर्णन
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुने ! जिसको बोध प्राप्त हो गया है, वह ध्यानस्थ महात्मा केवल अपने चिल्लक्षभाव-में स्थित रहता है। वह न कुछ ग्रहण करता है और न कुछ त्याग ही करता है। समाधि या ध्यानसे उठनेपर भी वह सदा जैसे-का-तैसा अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता है, जैसे दीपक प्रकाश फैलाता हुआ भी कुछ करता नहीं है, वैसे ही ज्ञानी सब कुछ देखता हुआ भी निष्क्रिय बना रहता है। वह मनके मननसे युक्त होनेपर भी कही आसक्त न होने-के कारण बाह्यरूपमें मन, अभिमान और मननसे रहित ही है। उस योगीको समाधिसे उठनेपर विश्वरूप नामक और समाधिकालमें ब्रह्म नामक चिन्मात्रस्वरूप परमार्थ सत्यका ही सर्वत्र दर्शन होता है। उसे सृष्टि और संहार सब चिन्मात्र ही प्रतीत होते हैं। संसार त्रिविध तापोंसे अत्यन्त संतप्त है और निर्वाण अत्यन्त शीतल है (क्योंकि उसमें समस्त तापोंकी शान्ति हो जाती है)। वास्तवमें अत्यन्त शीतल निर्वाण ही शाश्वत है। यह तप्त संसार तो तीनों कालोंमें है ही नहीं। जैसे स्वप्नमें अपने भाई-बन्धुके मरने या जीनेपर भी स्वप्नसे जागे हुए पुरुषकी उस स्वप्नगत
यो० वा० सं० ८५—
६७४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त-योगवासिष्ठ
वृत्तान्तमें सत्यता-बुद्धि नहीं होती (अतएव उसे वहाँकी घटनासे हर्ष और शोक नहीं होते हैं)। वैसे ही तत्त्वज्ञानी पुरुषको दृश्य पदार्थोंमें सत्यता-बुद्धि नहीं होती (इसलिये अनुकूल-प्रतिकूल घटनाओंसे उसे हर्ष-शोकका अनुभव नहीं होता।)। भगवन् ! सम्यक् ज्ञान होनेपर देहसे सम्बन्ध रखनेवाले भोगपदार्थों और उनकी प्राप्तिके उपायोंसे ज्ञानीको उसी तरह सर्वथा विरक्ति रहती है, जैसे स्वप्नसे जगे हुए पुरुषकी स्वप्नगत पदार्थोंमें ममता और आसक्ति नहीं रहती। वैराग्यसे बोधकी और बोधसे वैराग्यकी वृद्धि होती है। वे दीवाल और प्रकाशके समान एक-दूसरेसे अभिव्यक्त होते हैं। अन्धकारमें दीपक जलानेसे दीवाल अभिव्यक्त होती है और दीवालपर पड़नेसे प्रकाशकी विशेष अभिव्यक्ति होती है। जिस बोधसे वैराग्य सम्पन्न होता है, वस्तुतः उसीका नाम बोध है। जिससे धन, स्त्री, पुत्र आदिकी सुख-सुविधा-वृद्धि पहलेसे भी बढ़ जाती हो, वह बोध या बुद्धिमानीके रूपमें जड़ता ही स्थित है। बोधका बोधत्व इतना ही है कि उससे वैराग्यकी वृद्धि हुई अर्थात् वैराग्य होनेसे ही बोध सार्थक समझा जाता है। जिस पुरुषमें वैराग्य नहीं है, उसकी विद्वत्ता भी मूर्खता ही है। बोध और वैराग्यरूपी उत्कृष्ट सम्पत्ति ही मोक्ष कहलाती है। उस मोक्षरूप अनन्त शान्तपदमें स्थित हुए पुरुषको कभी शोक नहीं करना पड़ता। जो सदा अपने आत्मामें ही रम रहा है, शान्त, विरक्त एवं अहंकाररहित हो गया है, उस ज्ञानी पुरुषकी आकाशके समान संकल्प-रहित एवं निर्मल स्थिति हो जाती है। सहस्र-सहस्र प्रयत्न-शील पुरुषोंमेंसे कोई बिरला ही ऐसा बलवान् और उत्साही होता है, जो उठकर वासनाजालको उसी तरह छिन्न-भिन्न कर देता है, जैसे कोई-कोई सिंह पिंजड़ेको तोड़ डालता है। जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, उस पुरुषके भीतर वासनाशून्य भाव प्रकट होनेपर उसे यह सुदृढ़ बोध प्राप्त हो जाता है कि सारा दृश्य ब्रह्म ही है। इससे उसकी बुद्धि एकमात्र निर्वाणरूप परब्रह्ममें ही सुस्थिर हो जाती है। तत्पश्चात् उसमें मोक्ष नामक अनन्त शान्तिका उदय होता है।
(सर्ग १९४)
श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा जगत्की असत्ता एवं 'सर्वं ब्रह्म' के सिद्धान्तका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ज्ञानवान् पुरुषकी समाधि-अवस्थामें अथवा व्यवहारकालमें जो शिलाके समान घनीभूत निश्चल स्थिति है, वह निर्मल मुक्ति कहलाती है। राघव ! पाप और दुःखका निवारण करनेवाले उस मोक्षपदमें स्थित होकर हमलोग समाधि और व्यवहारमें भी इसी तरह समभावसे रहते हैं।
श्रीराम बोले—ब्रह्मन् ! जैसे मृगतृष्णामें जल, समुद्र आदिके जलमें तरङ्ग और भँवर, सुवर्णमें कटक-कुण्डल आदि आभूषण तथा स्वप्न और संकल्पमें पर्वत—ये सब बिना हुए ही प्रतीत होते हैं, वैसे ब्रह्ममें यह जगत् कभी उत्पन्न नहीं हुआ, कभी प्रकाशमें नहीं आया। उसका आरम्भ भी नहीं हुआ और उसमें कोई आकार भी नहीं है। इस प्रकार सर्वथा असत् होकर भी वह अज्ञानियोंको भासित होता है। पहले ही यह कुछ भी कभी उत्पन्न नहीं हुआ; क्योंकि इसकी उत्पत्तिका कोई कारण नहीं है। इसलिये वन्ध्यापुत्रके समान इस जगत्की सत्ता केवल काल्पनिक है। कल्पनाके सिवा और किसी रूपमें इसकी सत्ता नहीं है। इस जगत्-भ्रान्तिका कारण ही क्या है, जिससे यह प्रकट होती ? कारणके बिना किसी भी कार्यका होना कहीं भी सम्भव नहीं है। वस्तुतः निर्विकार, अजर, अमर ब्रह्म भी इसका कारण नहीं हो सकता; क्योंकि पूर्वावस्थाका क्षय हुए बिना कोई भी वस्तु यहाँ कहीं भी सविकार नहीं हो सकती। यदि वाणीका अविषय ब्रह्म ही कारणरूपसे विद्यमान है तो कहाँ, किसको और किस प्रकार जगत् शब्दके अर्थकी प्रतीतियाँ होंगी। वास्तवमें यह जगत् आकाशके समान निर्मल, शिलाके समान घनीभूत
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा जगत्की असत्ताका प्रतिपादन * ६७५
और पाषाणके समान मौन, शान्त, अक्षय ब्रह्म ही है। यह परम समस्वरूप, एक, अनादि, अनन्त, शान्त ब्रह्म, महाकाश ही है। इसमें जगत्की बात ही कहाँ है ? जैसे जलमें लहरोंके उठने और शान्त होनेसे जलमें भिन्नता नहीं आती, उसी प्रकार ब्रह्ममें सृष्टि और प्रलयसे भी कोई भिन्नता नहीं आती। सारासार-तत्त्वके ज्ञाता कोई महात्मा पुरुष इस विशुद्ध परमपदमें उसी तरह एकताको प्राप्त हो जाते हैं, जैसे जलकी बूँद जलराशिमें मिलकर एक हो जाती है। परब्रह्म परमात्मामें परब्रह्मस्वरूप ही जो अपर जगत्—भासित होता है, वह विचार करनेसे परब्रह्म ही सिद्ध होता है; क्योंकि निर्मल, शान्त, परब्रह्ममें जगत् और उनके व्यवहारोंका होना सम्भव नहीं है।
श्रीवसिष्ठजीने पूछा—रघुनन्दन ! यदि ऐसा मान लें कि यह दृश्य जगत् कारणभूत ब्रह्ममें उसी प्रकार स्थित है, जैसे बीजमें अङ्कुर तो यहाँ सृष्टि आदिकी सत्ता कैसे नहीं सिद्ध हो सकती ?
श्रीरामने कहा—मुने ! बीजमें अङ्कुर यदि अङ्कुररूपसे ही रहता तो उसमें ढूँढ़नेपर मिलता। किन्तु बीजको फोड़कर देखनेपर वह दिखायी नहीं देता है। यदि कहीं बीजके भीतर अवयवोंकी सूक्ष्म सत्ता है तो वह तो बीज ही है, अङ्कुर नहीं है। ब्रह्मके भीतर भी जगत्की सत्ता इसी तरह सिद्ध नहीं होती है। जो जगत्-सत्ता उपलब्ध होती है, वह यदि सूक्ष्मरूपसे ब्रह्ममें हो तो वह तो नित्य ब्रह्म ही है; क्योंकि ब्रह्म अविकारी है। अतः ब्रह्मसे भिन्न जगत्की सत्ता कदापि सिद्ध नहीं होती है। यह जो कोई अनिर्वचनीय जगत् दीखता है, तत्त्वज्ञान हो जानेपर अनुभवमें ही नहीं आता है। अज्ञानावस्थामें भी प्रतीत होनेके कारण सत्, और वस्तुतः असत्तासे परिपुष्ट यह जगत् स्वानुभवैकगम्य होनेसे अनिर्वचनीय ही है। सारा प्रपञ्च परम शान्त, निष्क्रिय, अखण्ड, आभासशून्य, अनादि, अनन्त एवं स्वयंप्रकाश ब्रह्म ही है। मुझे अपने उस परमात्मस्वरूपका यथार्थ अनुभव है, जो जन्म और मृत्युसे रहित, शान्त, अनादि, अनन्त, महान्, उपाधिशून्य और निराकार है। जो संवित् (चित्तवृत्ति) भीतर स्फुरित होती है, वही वाक्यरूपमें बाहर प्रकट होती है। जैसे जो बीज भूमिमें बोया गया है, वही अङ्कुररूपसे प्रकट होता है। यह जगत् अज्ञानीकी दृष्टिमें सत्य है और ज्ञानवान्की दृष्टिमें मिथ्या। जो इसे ब्रह्म-रूपमें देखता है, उसके लिये ब्रह्म है तथा जो शान्त महात्मा पुरुष हैं, उनके लिये यह शान्त होकर अन्तमें शून्यरूप ही रह जाता है। ब्रह्मन् ! मैं चिदाकाश हूँ। आप चिदाकाश हैं। चित् चिदाकाश है। जगत् चिदाकाश है और चिदाकाश स्वयं चिदाकाश है। आप एकमात्र चिदाकाश-भावको प्राप्त हो एकाकाशरूपतामें ही स्थित हैं। गुरुदेव ! आप मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं और ब्रह्माकाशभावमें ही स्थित हैं। मैं अपने आकाशतुल्य विशुद्ध स्वरूपानुभवके द्वारा सर्वात्मक चिदाकाश-सदृश आपको ज्ञेय, पूर्णानन्द ब्रह्मसे अभिन्न जानकर प्रणाम करता हूँ। वास्तवमें चित्-स्वरूप होनेके कारण ही यह जगत् बिना किसी कारणके ही उसमें उत्पन्न और विलीन होता-सा भासित होता है। अतः यह निर्मल परमाकाशरूप ही है। सम्पूर्ण शास्त्रीय युक्तियों तथा समस्त पदोंसे अतीत जो निर्द्वन्द्व ब्रह्मपद है, उसीको पाकर आप ब्रह्माकाशस्वरूप हो गये हैं। समस्त शास्त्रोंके अर्थोंसे परे, चिह्न अथवा आकारसे रहित, नामरूपसे हीन, अनुभव-स्वरूप, शुद्ध, चिन्मय, एक, अजन्मा एवं सबका आदि निर्मल चिदाकाश ही यहाँ विराजमान है। उसमें किसी प्रकारके नामकी कल्पनाके लिये स्थान नहीं है। उस ब्रह्ममें मलकी आशङ्का ही व्यर्थ है—वह नित्य निर्मल सच्चिदानन्दघन है।
(सर्ग १९५)
६७६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
श्रीरामचन्द्रजीके प्रश्नके अनुसार उत्तम बोधकी प्राप्तिमें शास्त्र आदि कैसे कारण बनते हैं, यह बतानेके लिये श्रीवसिष्ठजीका उन्हें कीरकोपाख्यान सुनाना—लकड़ीके लिये किये गये उद्योगसे कीरोंका सुखी होना
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—दूसरोंको मान देनेवाले गुरुदेव ! जो यह सत्स्वरूप ब्रह्म केवल अपने अनुभवसे ही जानने योग्य है, बड़े-बड़े महापुरुषोंकी वाणी भी इसका यथार्थ निरूपण नहीं कर सकती। ऐसी अवस्थामें समस्त संकल्प-विकल्पोंसे रहित जो परम ज्ञेय ब्रह्म स्वयं प्रकाशरूप है तथा जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओंसे अतीत तुरीयरूपसे उपलब्ध होता है, वह अत्यन्त दुर्गम (दुर्बोध) हो गया है (क्योंकि गुरु और शास्त्र आदि जाग्रत् अवस्थाके ही अन्तर्गत हैं। उनसे) उस तुरीय पदका ज्ञान होना कठिन है। विकल्परूपी सारवाले शब्द-अर्थरूप शास्त्रोंसे ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति नहीं हो सकती। फिर भ्रान्तिरूप अनर्थपरम्पराकी प्राप्तिके लिये गुरु, शास्त्र आदिकी कल्पना क्यों की गयी है ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—राघवेन्द्र ! गुरु और शास्त्र आदि जिस प्रकार उत्तम बोधके प्रति कारण होते हैं, वह संक्षेपसे बताता हूँ, सुनो—कभीकी बात है, कीरक देशमें कुछ ऐसे लोग थे, जो बहँगी ढोकर जीवन-निर्वाह करते थे। वे चिरकालसे दरिद्रता एवं दुर्भाग्यका सामना करते थे। दुःखसे वे इस तरह सूख गये थे, जैसे ग्रीष्मकी प्रचण्ड धूपसे पुराने पेड़ सूख जाते हैं। वे चिथड़ोंकी गुदड़ी सीकर उसे ओढ़ते थे। दुरन्त दरिद्रताके कारण उनका मुँह उदास और हृदय दुखी रहता था। जैसे तालाबका पानी निकल जानेसे कमल सूखने लगते हैं, उसी तरह वे भी क्षीण हो रहे थे। अपनी दुर्गतिसे संतप्त होकर उन लोगोंने आजीविकाके लिये विचार किया कि हम लोग किस युक्तिसे अपना पेट भर सकते हैं। इस विषयपर विधिपूर्वक सोच-विचारकर वे इस निश्चयपर पहुँचे कि हमलोग दिनभर सुबहसे शामतक लकड़ीका बोझ ढोयेंगे और उसीको बेचकर जीविका चलायेंगे। ऐसा निश्चय करके वे लकड़ी लानेके लिये वनके भीतर गये। वे जिस किसी युक्तिसे जीविका चलाते थे, वही आपत्तिमें पड़ जाती थी। वे जिस दिन जो कमाते, उसी दिन वह खा जाते थे। इस तरह प्रतिदिन जंगलमें जाकर वहाँसे लकड़ी लाने और उसे बेचकर किसी तरह जीवन-निर्वाह करने लगे। जिस वनके भीतर वे जाते थे, उसमें गुप्त और प्रकटरूपसे सब प्रकारके रत्न, उत्तमोत्तम काष्ठ और सुवर्ण भी थे। उन बोझ ढोनेवाले लकड़हारोंमेंसे कुछ लोग कुछ ही दिनोंमें उन सुवर्णों और रत्नोंको भी पा गये। मानद ! कुछ कीरकनिवासी चन्दनकी लकड़ियाँ, कुछ अच्छे-अच्छे फूल और फल ला-लाकर बेचते और चिरकालतक उनसे जीविका चलाते रहे। कुछ खोटी बुद्धिवाले भाग्यहीन लोग, जो वनकी गलियोंमें घूम-घूमकर जीविका चलानेवाले थे, कभी अच्छी चीजोंको न पाकर खराब लकड़ियाँ ही लाते और उन्हें बेचकर जीवन-निर्वाह करते थे। लकड़ी लानेके लिये उद्यत रहनेवाले वे सब लोग एक बार एक महान् जंगलमें पहुँच गये। वहाँ कुछ लोग उत्तमोत्तम रत्न आदि पाकर दरिद्रतारूपी ज्वरसे शीघ्र ही मुक्त हो गये। एक दिन उस वनके एक प्रदेशसे एक लकड़हारेको चिन्तामणि नामक मणि प्राप्त हो गयी। उस चिन्तामणिसे उन्हें सारे धन-वैभव मिल गये। और वे सभी वहाँ परम सुखी हो बड़े आनन्दसे रहने लगे। लकड़ी लानेके लिये उद्यत होकर वे वनमें जाते थे किन्तु सौभाग्यवश उन्हें सम्पूर्ण मनोवाञ्छित पदार्थोंको देनेवाली मणि मिल गयी और वे स्वर्गके देवताओंकी भाँति निर्द्वन्द्व हो सुखसे रहने लगे। लकड़ीके लिये किये गये उद्योगसे ही बहुमूल्य चिन्तामणि पाकर वे उसके द्वारा समस्त धन-वैभवके सार-सर्वस्वसे सम्पन्न हो महान्
निर्वाण प्रकरण उ०] * कीरकोपाख्यानके स्पष्टीकरणपूर्वक आत्मज्ञानकी प्राप्तिमें शास्त्र-गुरुको कारण बताना * ६७७
बन गये। उनके दरिद्रताजनित भय, मोह, विषाद और दुःख सदाके लिये मिट गये और वे मन-ही-मन आनन्दमें मग्न रहकर दूसरी लाभ-हानिके विषयमें समताको प्राप्त हो गये। (सर्ग १९६)
कीरकोपाख्यानके स्पष्टीकरणपूर्वक आत्मज्ञानकी प्राप्तिमें शास्त्र एवं गुरुपदेश आदिको कारण बताना
श्रीरामचन्द्रजी बोले—दूसरोंको मान देनेवाले मुनिश्रेष्ठ ! ऐसी कृपा कीजिये जिससे बहँगी ढोनेवाले उन कीरकोंके इस प्रसंगका तात्पर्य भलीभाँति समझमें आ जाय और कोई संदेह न रह जाये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—महातपस्वी श्रीराम ! ये जो भूमण्डलके मनुष्य हैं, ये ही वे बहँगी ढोनेवाले कीरक हैं और उनका जो दारिद्र्यजनित दुःख था, वह इन मनुष्योंका महान् अज्ञान है। जो महान् वन बताया गया है, वह सद्गुरु, सत्-शास्त्र आदिका क्रम है। वे जो आहार जुटानेके लिये उद्योगशील थे, उसके द्वारा इन भोगार्थी मनुष्योंकी ओर संकेत किया गया है। अत्यन्त कृपण मनुष्य अन्य सब कार्योंकी उपेक्षा करके मुझे भोगराशियाँ प्राप्त हों, इस उद्देश्यसे शास्त्र आदिमें—उनके बताये हुए उपायोंमें प्रवृत्त होता है। भोगपरवश होकर भोग-सामग्रीके लिये ही शास्त्रोंमें प्रवृत्त होनेपर भी जीव क्रमशः अभ्यास करके अपने लिये परम अभीष्ट आदिपद (परब्रह्म परमात्मा) को प्राप्त कर लेता है। जैसे लकड़ीके लिये उद्यत हुए भारवाहकको मणि प्राप्त हो गय, वैसे ही भोग-संग्रहके लिये शास्त्रमें प्रवृत्त हुए मनुष्य भी निष्काम भावसे शास्त्रोक्त साधनोंका अनुष्ठान करके परमपदको प्राप्त कर लेते हैं। कोई-कोई यह सोचकर कि 'देखूँ तो शास्त्र और विवेक-विचारसे क्या लाभ होता है' यों सन्देहयुक्त कौतूहलवश शास्त्रोंमें प्रवृत्त होता है। फिर तदनुकूल साधन करके उत्तम पदको प्राप्त कर लेता है। जिसे परब्रह्मरूप उत्तम तत्त्वका साक्षात्कार नहीं हुआ, वह पुरुष धन और भोगके लिये सन्देहपूर्वक शास्त्र आदिमें प्रवृत्त होता है (जब उसे अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति होनेसे शास्त्र आदिपर पूरा विश्वास हो जाता है, तब तदनुकूल पारमार्थिक साधनोंका आश्रय लेकर) वह उस परमपदको प्राप्त कर लेता है। लोग अपनी वासनाके अनुसार किसी और ही प्रकारके फलकी आशासे शास्त्रोक्त साधनोंमें प्रवृत्त होते हैं, परन्तु बहँगी ढोनेवाले कीरकोंको जैसे मणि मिल गयी, वैसे ही उन्हें भी और ही उत्कृष्ट-फल (मोक्ष) की प्राप्ति हो जाती है।
जो स्वभावसे ही निरन्तर परोपकारमें लगा होता है, वह साधु कहा गया है। उसकी चेष्टा, उसका आचार-व्यवहार सबके लिये प्रमाण होता है। साधु पुरुषोंके सदाचारसे प्रेरित होकर ही अज्ञानी लोग शास्त्रोक्त फलमें संदेह रहते हुए भी भोगप्राप्तिकी आशासे शास्त्र आदिमें प्रवृत्त होते हैं। भोगके लिये शास्त्रोक्त कर्ममें प्रवृत्त हुआ पुरुष उससे भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त कर लेता है, जैसे लकड़ीकी इच्छा रखनेवाले कीरकको वनसे चिन्तामणि प्राप्त हो गयी थी। जिस प्रकार वनसे किसीको चन्दन काष्ठ, किसीको साधारण रत्न और किसीको चिन्तामणि मिल जाती है, उसी प्रकार शास्त्रसे कोई काम, कोई अर्थ, कोई धर्म, कोई धर्म-अर्थ-काम तीनों और कोई सम्पूर्ण मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। रघुनन्दन ! शास्त्र आदिमें त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ और काम) का ही मुख्यरूपसे उपदेश है। ब्रह्मकी प्राप्ति तो वाणीका विषय ही नहीं है। इसलिये ब्रह्मका प्रतिपादन करने-वाले शास्त्रोंमें भी पद और वाक्योंकी मुख्य वृत्तिसे उसका निरूपण सम्भव नहीं हो सका है। जैसे वसन्त आदि ऋतुओंकी शोभा उनके लाये हुए फूल, फल और पल्लव आदिकी उत्पत्तिसे सूचित होती हुई स्वयं अपने अनुभवसे ही प्रतीत होती है, उसी प्रकार ब्रह्मकी प्राप्ति
६७८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
शास्त्रके सम्पूर्ण वाक्यार्थोंसे व्यञ्जनावृत्तिद्वारा ध्वनित होती हुई केवल अपने अनुभवसे ही जानी जाती है। जैसे सुन्दरी युवतीमें मणि, दर्पण और चन्द्रमा आदि सबसे बढ़कर लब्ध लावण्य उपलब्ध होता है, वैसे ही यद्यपि शास्त्रमें धर्म आदि तीनों वर्गोंसे उत्कृष्ट ब्रह्मज्ञान विद्यमान है, तथापि समस्त पदोंसे परे जो परम बोध है, यह अश्रद्धालु मनुष्यको न तो शास्त्रसे, न गुरुके उपदेश-वाक्यसे, न दानसे और न ईश्वरके पूजनसे ही प्राप्त होता है। रघुनन्दन ! ये शास्त्र आदि यद्यपि अश्रद्धालुको ब्रह्म-प्राप्ति करानेमें कारण नहीं हैं, तथापि श्रद्धालुको एकमात्र परमात्मामें विश्राम प्राप्त करानेके पूर्णतः कारण बन जाते हैं; कैसे ? सो बताया जाता है, सुनो। शास्त्रका बारंबार अभ्यास करनेसे श्रद्धालुका चित्त विशुद्ध हो जाता है, तब वह अनायास शीघ्र ही उस पावन परमपदका साक्षात्कार कर लेता है। सत्-शास्त्रसे अविद्याका सात्त्विक भाग उन्नत बनाया जाता है और उस सात्त्विक भागसे इसका तामसिक भाग क्षीण हो जाता है। सत्-शास्त्ररूपी उत्कृष्ट जलसे अविद्याजनित मलको धोनेवाला पुरुष अचिन्त्य वस्तु-शक्तिके प्रभावसे परम शुद्धिको प्राप्त कर लेता है। जैसे ईखके रससे अपने ही अनुभवसे स्वादिष्ट माधुर्यकी उपलब्धि होती है, उसी प्रकार सत्-शास्त्र और सद्गुरुके उपदेशरूप उपायसे 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यार्थका साररूप आत्मज्ञान प्राप्त होता है। जैसे आकाशमें आलोकके सब ओर फैले रहनेपर भी प्रभा और दीवालके संगसे ही वह सुस्पष्टरूपसे अनुभवमें आता है, उसी प्रकार महावाक्यके श्रवण और उसके अधिकारी पुरुषके योगसे ही आत्मज्ञानका अपरोक्ष अनुभव होता है। वही शास्त्रश्रवण सफल है, जिससे ज्ञान प्राप्त होता है, वही ज्ञान सफल है, जिससे समता प्राप्त होती है और वही समता सफल है, जिसके जाग्रत् होनेपर जाग्रत्में भी सुषुप्तिकी भाँति परमात्माके स्वरूपमें निर्विकल्प स्थिति हो जाती है। इस प्रकार यह सब कुछ सत्-शास्त्र एवं सद्गुरुके उपदेश आदिसे प्राप्त हो जाता है। इसलिये पूरा प्रयत्न करके सत्-शास्त्र आदिका अभ्यास करना चाहिये। श्रीराम ! शास्त्रोंके अर्थका विचार करनेसे, गुरुजनोंके उपदेश-वाक्यसे, सत्संगसे, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-शरण—इन नियमोंके पालनसे और मन एवं इन्द्रियोंको वशमें करनेसे वह सम्पूर्ण विश्वपदसे अतीत, सर्वेश्वर, सबका आदि, अनादि एवं सच्चिदानन्दमय परमपद प्राप्त होता है।*
(सर्ग १९७)
श्रीवसिष्ठजीके द्वारा समता एवं समदर्शिताकी भूरि-भूरि प्रशंसा
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुकुलतिलक राम ! बोधकी दृढ़ताके लिये मैं पुनः कुछ बातें बता रहा हूँ, सुनो। जो बात बार-बार कही जाती है, वह अज्ञानीके हृदयमें निश्चय ही बैठ जाती है। रघुनन्दन ! पहले मैंने स्थिति-प्रकरणका वर्णन किया था, जिससे यह बात भलीभाँति समझमें आ जाती है कि इस प्रकार उत्पन्न हुआ जगत् केवल भ्रममात्र है। तत्पश्चात् उपशमकी युक्तियोंद्वारा यह बात बतायी गयी थी कि इस जगत्में उत्पन्न हुए प्रत्येक पुरुषको उत्कृष्ट उपशमके गुणसे गौरवशाली होना चाहिये। उपशम प्रकरणमें कहे गये उपशमके क्रमिक साधनोंद्वारा मनुष्यका अत्यन्त उपशान्त होकर यहाँ संतापरहित हो जाना चाहिये। जिसने प्राप्तव्य वस्तुको प्राप्त कर लिया है, उस तत्त्वज्ञानी-को सांसारिक व्यवहारोंमें कैसे रहना चाहिये, यह थोड़ी-सी बात मेरे मुँहसे तुम्हें और सुननी है। जगत्में जन्म पाकर
* शास्त्रार्थभावनवशेन गिरा गुरूणां सत्सङ्गमेन नियमेन शमेन राम ।
तद्व्याप्यते सकलविश्वपदादतीतं सर्वेश्वरं परममाद्यमनादिधर्म ॥
(नि० उ० १९७। ३४)
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * श्रीवसिष्ठजीके द्वारा समता एवं समदर्शिताकी भूरि-भूरि प्रशंसा * ६७९
मनुष्यको बाल्यावस्थामें ही जगत्की इस वास्तविक स्थिति- का ज्ञान प्राप्त करके यहाँ चिन्तारहित होकर रहना चाहिये। निष्पाप श्रीराम ! जो सबके साथ सौहार्द ( मैत्री ) को जन्म देनेवाली है और सबको आश्वासन प्रदान करती है, उस समताका पूर्णरूपसे आश्रय लेकर संसारमें विचरण करना चाहिये। समतारूपिणी सुन्दर लताका फल परम पवित्र होता है, जो सम्पूर्ण साधन-सम्पत्तियोंसे युक्त होनेके कारण सुन्दर तथा समग्र सौभाग्यकी वृद्धि करने- वाला है। रघुनन्दन ! जिनकी समग्र चेष्टाएँ समताके कारण सुन्दर होती हैं तथा जो न्यायसे प्राप्त वर्णाश्रम व्यवहारमें लगे रहते हैं, उन महापुरुषोंकी सेवामें यह सारी सांसारिक विभूति सेविकाकी भाँति उपस्थित हो जाती है। समतासे जो सारभूत अक्षय सुख प्राप्त होता है, वह न तो राज्यसे मिल सकता है और न प्रेयसी जनोंके समागमसे ही सुलभ हो सकता है। राघवेन्द्र ! तुम समताको सम्पूर्ण द्वन्द्वोंकी शान्तिकी चरम सीमा, रोषावेश तथा संशयरूपी रोगका नाश करनेवाली और सम्पूर्ण दुःखरूपी आतप ( धूप ) के तापसे बचानेके लिये मेघ समझो। जो समतारूपी अमृतसे ओतप्रोत है, उसके लिये सारे शत्रु मित्र बन जाते हैं। वह यथार्थदर्शी होता है ऐसा मनुष्य तीनों लोकोंमें दुर्लभ है। प्रबुद्ध हुए अपने चित्तरूपी चन्द्रमाके सारभूत अमृतसे भी बढ़े-चढ़े साम्यका अनुभव करते हुए ही जनक आदि समस्त तत्त्वज्ञ जीवन निर्वाह करते हैं। समताका अभ्यास करनेवाले जीवका क्रोध, लोभ आदि अपना दोष भी शान्ति एवं उदारताके रूपमें परिणत होकर गुण बन जाता है, दुःख भी नित्य- सुख हो जाता है और मृत्यु जीवन बन जाती है।
समतारूपी सौन्दर्यसे सुन्दर लगनेवाले महात्मा- पुरुषको योगशास्त्रवर्णित सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा और पापात्माके प्रति क्रमसे मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षारूपिणी महिलाएँ सदा गले लगाती हैं। उसके प्रति वे आसक्त-सी रहती हैं। समतासे युक्त पुरुष सदा अभ्युदयशील होता है। समतायुक्त पुरुषके चित्तमें कभी चिन्ताका उदय नहीं होता तथा इस जगत्में ऐसी कोई सम्पत्तियाँ नहीं हैं, जो समतासम्पन्न पुरुषको प्राप्त न हुई हों। जो अपने और पराये सभीके कार्योंमें समभाव रखने- वाला है, साधुस्वभाव (अपराधियोंको भी क्षमा करनेवाला) है, जिसका सबके प्रति उत्तम व्यवहार है तथा जो चिन्तामणिके समान उदार है, ऐसे पुरुषको मनुष्य और देवता सभी चाहते हैं। श्रीराम ! जो सदाचारसम्पन्न और सबका हित करनेवाला है, अत्यन्त प्रसन्न रहता है तथा जिसका चित्त सबके प्रति समान है, ऐसे मनुष्यको न तो आग जलाती है और न जल ही डुबाता या गलाता है। जो पुरुष आनन्द और उद्वेगसे रहित होकर जो कार्य जैसे होना चाहिये, उसे उसी तरह करता है तथा सबको समान दृष्टिसे देखता है, उसकी तुलना करनेमें कौन समर्थ हो सकता है? सदाचारसम्पन्न और सबका हित करनेवाले तत्त्वज्ञ पुरुषपर मित्र, बन्धु, शत्रु, राजा, व्यवहारपरायण मनुष्य तथा बड़े-बड़े बुद्धिमान् लोग भी विश्वास करते हैं। तत्त्वज्ञानसम्पन्न समदर्शी पुरुष अपने न्यायप्राप्त स्वाभाविक कर्मकी परम्पराओंमें लगे हुए न तो अनिष्टकी प्राप्तिसे भागते हैं और न इष्टकी प्राप्तिसे सन्तुष्ट होते हैं। समतासे प्रसन्नचित्तवाले महात्मा पुरुष समस्त देवताओं- द्वारा पूजे जाते हैं। समदर्शी पुरुष जो कुछ करता है, जो भोजन करता है, न्यायप्राप्त होनेसे जिसपर आक्रमण करता है और अनुचित जानकर जिसकी निन्दा करता है, उसके उन सब कार्योंकी सारी जनता सदा प्रशंसा करती है। समदर्शी पुरुषद्वारा किया गया कार्य शुभ दिखायी दे या अशुभ, देरसे पूरा हुआ हो या आज ही तत्काल हो गया हो, उसे सब लोग उत्तम मानकर उसका अभिनन्दन करते हैं।
लगातार बड़े भयानक सुख-दुःख उपस्थित होनेपर भी समदर्शी पुरुष उनसे थोड़ा-सा भी उद्विग्न नहीं होते हैं। राजा शिबिने अपनी इस समदर्शिताके ही कारण शरणमें
६८० * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
आये हुए कबूतरकी रक्षाके लिये प्रसन्नचित्तसे अपना शरीर काटकर निकाला हुआ मांस दे दिया था। प्रिय रघुनन्दन ! समतायुक्त हृदयवाले एक भूपाल (शिखिध्वज) प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतमा भार्याको अपने सामने ही परपुरुषके द्वारा आक्रान्त हुई देख क्षुब्ध नहीं हुए थे। त्रिगर्त देशके राजाने सैकड़ों मनोरथोंसे प्राप्त हुए इकलौते पुत्रको, जो दावमें हारा गया था, अपनी समबुद्धिके ही कारण बिना किसी घबराहटके राक्षसके हाथमें सौंप दिया। राजाओंमें श्रेष्ठ भूपाल जनक उत्सवके लिये सजायी गयी अपनी मिथिलानगरीमें आग लग जानेपर समभावसे ही उसे देखते रहे (उनके मनमें विषाद नहीं हुआ)। समदर्शी शाल्वराजाने न्यायतः बेचे गये अपने ही मस्तकको कमलदलकी भाँति तत्काल काट डाला था। सौवीरनरेशने कुन्दपुष्पोंकी राशिके समान कान्तिमान् तथा श्वेतपर्वतके समान सुशोभित ऐरावत हाथीको, जो उन्होंने इन्द्रसे जीता था, यज्ञमें ऋत्विजोंके कहनेसे सूखे तिनकेकी भाँति त्याग दिया—इन्द्रको वापस लौटा दिया। ऐसा उन्होंने अपनी समतायुक्त बुद्धिसे ही प्रेरित होकर किया था। समबुद्धिसे ही अपनी जीविकाके लिये काम-धंधा करनेवाले कुण्डप नामक एक चाण्डालने एक गौको मजदूरीमें लेनेकी शर्त ठहराकर एक ब्राह्मणकी पाँच गौओंको, जो कीचड़में फँस गयी थीं, निकाला और मजदूरीमें मिली हुई उस एक गायको पुष्करतीर्थमें उसी ब्राह्मणके हाथोंमें दान कर दिया था। इससे तत्काल आये हुए विमानपर चढ़कर वह देवलोकको चला गया। समताका भरपूर अभ्यास करनेवाले कदम्बवनवासी एक राक्षसने समस्त प्राणियोंका विनाश करनेवाली अपनी राक्षसी वृत्तिका त्याग कर दिया। बालचन्द्रमाके समान सुन्दर जडभरतने अपनी समबुद्धिताके कारण ही भिक्षामें मिले हुए आगके अङ्गारोंको गुड़के लड्डुकी भाँति खा लिया था। ऋषि-मुनि और सिद्ध, जो देवताओंद्वारा सम्मानित हुए हैं, वे व्रत एवं तपस्याकी समृद्धिका संचय करते समय समदर्शिताके ही कारण उद्विग्न नहीं हुए थे। रन्तिदेव आदि राजा तथा धर्मव्याध आदि दूसरे साधारण मनुष्य भी समदर्शिताका दृढ़ अभ्यास करनेसे महापुरुषोंके भी पूजनीय हो गये थे। इहलोक और परलोकमें सुखकी सिद्धिके लिये और मोक्षरूप पुरुषार्थमें प्रवृत्तिके लिये भी उत्तम बुद्धिवाले पुरुष सदा समदर्शितासे ही व्यवहार करते हैं। किसीको भी किसी तरहकी पीड़ा न देता हुआ पुरुष न मरणकी इच्छा करे न जीवनकी। न्यायसे जो कर्तव्य प्राप्त हो जाय, उसका समतापूर्वक आचरण करता हुआ विचरे। जो समतावश गुण और दोषोंको एक-सा जानता है, जिसकी दृष्टिमें सुख-दुःख और छोटे-बड़े समान हैं, जो मान और अपमानको एक-सा समझता है और प्राप्त व्यवहारोंका भी सुचारुरूपसे सम्पादन करके पवित्र हो गया है। समतासे सुशोभित होनेवाला वह पुरुष सर्वत्र निर्द्वन्द्वभावसे विचरण करता है। (सर्ग १९८)
कर्मोंके त्याग और ग्रहणसे कोई प्रयोजन न रखते हुए भी जीवन्मुक्त पुरुषोंकी स्वभावतः सत्कर्मोंमें ही प्रवृत्तिका प्रतिपादन
श्रीरामने पूछा—मुने ! जीवन्मुक्त पुरुष सदा एकमात्र ज्ञानमें ही स्थित रहते और आत्मामें ही रमते हैं। ऐसी दशामें वे कर्मोंका परित्याग क्यों नहीं कर देते हैं? क्योंकि उन्हें कर्मसे कोई प्रयोजन नहीं है।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जिसकी हेय दृष्टि और उपादेय दृष्टि अर्थात् अमुक कर्म त्याज्य है और अमुक ग्राह्य है—ये दोनों दृष्टियाँ क्षीण हो गयी हैं, उसे कर्मका त्याग करनेसे क्या प्रयोजन है? अथवा कर्मका आश्रय लेनेकी भी क्या आवश्यकता है? ज्ञानीके लिये इस जगत्में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो उद्वेगकारक होनेके कारण त्याज्य हो अथवा ऐसा कर्म भी नहीं है, जो तत्त्वज्ञानके लिये अवश्य करने योग्य होनेसे उपादेय हो। तत्त्वज्ञ
निर्वाण-प्रकरण उ०] * कर्मोंके त्याग और ग्रहणसे कोई प्रयोजन न रखते हुए जीवन्मुक्तकी सत्कर्मोंमें प्रवृत्ति * ६८१
पुरुषको न तो कर्मोंके त्यागसे कोई प्रयोजन है और न कर्मों-का आश्रय लेनेसे । इसलिये वर्ण और आश्रमके अनुसार जो कर्म जैसे होता आ रहा है, उसे वह उसी प्रकार करता रहता है । श्रीराम ! जबतक आयु है, तबतक यह शरीर निश्चितरूपसे चेष्टा करता रहता है, अतः वह शान्तभावसे यथाप्राप्त चेष्टा करे । उसका त्याग करनेकी क्या आवश्यकता है ? श्रीराम ! सदा निर्विकार रहनेवाली समतायुक्त निर्मल बुद्धिसे जो कर्म जैसे किया जाता है, वह सदा निर्दोष ही होता है ।
इस भूतलपर कितने ही गृहस्थ जीवन्मुक्त हैं, जो असङ्ग बुद्धिसे यथाप्राप्त वर्णाश्रम-धर्मका अनुसरण करते हैं । उनके सिवा दूसरे राजा जनक-जैसे तत्त्वज्ञ राजर्षि तथा अन्य वीतराग पुरुष भी हैं, जो अनासक्तचित्त एवं चिन्तारहित होकर तुम्हारे सदृश राज्य करते हैं। कुछ लोग वर्ण और आश्रमके अनुसार प्राप्त वेदोक्त व्यवहारका अनुसरण करते हुए सदा अग्निहोत्रमें लगे रहते हैं और पञ्च-महायज्ञों-से अवशिष्ट अमृतमय अन्नका भोजन करते हैं । चारों वर्णोंमेंसे कुछ लोग सदा ध्यान और देव-पूजन आदि स्वकर्मका अनुष्ठान करते हुए नाना प्रकारकी चेष्टाओं एवं प्रयत्नोंमें लगे रहते हैं । कुछ महान् आशयवाले महापुरुष अपने अन्तःकरणमें सम्पूर्ण फलोंकी आसक्तियोंका त्यागकर सब प्रकारके नित्य-नैमित्तिक कर्म करते हुए तत्त्वज्ञानी होकर भी अज्ञानीकी भाँति स्थित रहते हैं । कुछ लोग उन सूनी वनस्थलियोँमें ध्यान लगाते हैं, जहाँ सपनेमें भी मनुष्योंके दर्शन नहीं होते और भोले-भाले मृगछौने भरे रहते हैं । कुछ लोग उन पुण्यतीर्थों, आश्रमों या देवालयोंमें रहते हैं, जो पुण्यकी वृद्धि करनेवाले हैं, जहाँ सदा पुण्यात्मा पुरुष निवास करते हैं तथा जहाँका सदाचार मन और इन्द्रियोंके निग्रहसे सुशोभित होता है । कुछ समता-पूर्ण हृदयवाले पुरुष राग-द्वेषका परित्याग करनेके लिये शत्रु-मित्रोंसे भरे हुए अपने देशको छोड़कर अन्य देशमें चले जाते और वहाँ आश्रम बनाकर रहने लगते हैं ।
कितने ही विद्वान् संसार-बन्धनका उच्छेद करनेके लिये एक वनसे दूसरे वनमें, एक गाँवसे दूसरे गाँवमें, एक स्थानसे दूसरे स्थानमें तथा एक पर्वतसे दूसरे पर्वतपर घूमते फिरते हैं । महापुरी वाराणसीमें, परम पावन तीर्थराज प्रयागमें, श्रीपर्वतपर, सिद्धपुरमें, बदरिकाश्रममें, परम-पुण्यमय शालग्राम तीर्थमें, कल्पोपग्रामकी गुफामें, पुण्यमयी मथुरापुरीमें, कालञ्जर पर्वतपर, महेन्द्र वनकी झाड़ियोंमें, गन्धमादन पर्वतके शिखरोंपर, दर्दर पर्वतकी चोटियोंपर, सह्य गिरिके भूभागोंमें, विन्ध्यगिरिके कछारोंमें, मलय पर्वतके मध्यभागमें, कैलासके वनसमूहोंमें तथा ऋक्षवान् पर्वतकी गुफाओंमें —इन सबमें, अन्य पर्वतोंपर एवं अन्यान्य वनों और आश्रमोंमें अनेक बहुदर्शी तपस्वी रहते हैं । इनमेंसे कुछ लोगोंने विधिपूर्वक संन्यास लेकर अपने पूर्व-आश्रमके कर्मोंका त्याग कर दिया है । कोई क्रमशः ब्रह्मचर्य आदि आश्रमोंमें स्थित हैं । किन्हींकी बुद्धि तत्त्व-ज्ञानसे प्रबुद्ध है और कितने ही नित्य उन्मत्तों-सी चेष्टा करते हैं । कोई स्वदेशसे दूर चले गये हैं । कितने ही अपना घर-द्वार छोड़ चुके हैं । कुछ लोग एक ही स्थानपर प्रसन्नतापूर्वक रहते हैं और कुछ लोग रमते राम होकर भ्रमण करते है । महामते ! आकाश और पातालमें निवास करनेवाले इन देवता, दैत्य आदि महापुरुषोंमेंसे किन्हींकी बुद्धि प्रबुद्ध होती है, वे लोक-रहस्यके ज्ञाता, सम्यग् ज्ञानसे निर्मल तथा निर्गुण-सगुण तत्त्वका साक्षात्कार किये होते हैं । कुछ लोगोंकी बुद्धि सर्वथा प्रबुद्ध नहीं होती है, इसलिये उनका चित्त संशयके झूलेमें झूलता रहता है । वे पापाचारसे निवृत्त होकर सत्पुरुषोंका अनुसरण करते हैं । कुछ लोगोंकी बुद्धि आधी प्रबुद्ध होती है, वे ज्ञानके अभिमानमें आकर शास्त्रोक्त कर्म और आचारको त्याग देते हैं और लोक-परलोक दोनोंसे भ्रष्ट हो जाते हैं ।
श्रीराम ! इस प्रकार इस जनसमुदायमें जन्म-मरणरूप संसारसे छुटकारा पानेकी इच्छावाले बहुत-से लोग नाना