भारतकोश
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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

३. तृतीय विश्राम: पूजा-संकेत (अन्तर्याग, बहिर्याग, महात्रिपुरसुन्दरी समरसता एवं उपसंहार)

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २८३ सौम्यं कर्पूरम्, सोमनामवाच्यत्वात् । आग्नेयं काश्मीरम्, १अग्निशिखासंज्ञक- त्वात् । “काश्मीरजन्माग्निशिखम्” (२।६।१२४) इत्यमरः । रोचना गोरोचना; अगुरुः कालागुरुः, कुङ्कुमं घसृणम्, एतैः २सुधया पङ्कीकृत्य, तेन स्वर्णादिमये पट्टे हेमसूच्या ३विलिख्य । मूलं सौभाग्यविद्याम् । उच्चारयन्, परेण चेच्चक्रं लेखयति । स्वयं चेल्लिखति तदोच्चरन् । चक्रराजं चतुराम्नायमयत्वात् ४सर्व- पूजाचक्रेभ्योऽप्युत्तमम् । सम्यक् “समत्रिकोणशक्त्यग्रं समरेखं मनोहरम्” इत्य- भियुक्तवचनोक्तरीत्या, भावयेत् लिखेत्, लेखयेद् ५वा । तदुक्तमभियुक्तैः– “कस्तूरी- घसृणेन्दुचन्दन ६सुधाभिश्चक्रराजं लिखेत्” इति ॥९५-९६॥ योगिनीमूलमन्त्रेण क्षिपेत् पुष्पाञ्जलिं ततः ॥९६॥ सौम्य कपूर को कहते हैं, क्योंकि इसका भी नाम सोम है। काश्मीरी केसर आग्नेय कहलाती है, क्योंकि इसका नाम अग्निशिखा है। अमरकोश में (२।६।१२४) में काश्मीर- जन्मा, अग्निशिख आदि नाम इसके बताये गये हैं। रोचना गोरोचना (गोलोचन), अगुरु कालागुरु (अगर) और कुंकुम घृसृण (रोरी) को कहते हैं। इन सबको सुधा में मिलाकर चन्दन बना ले । इस चन्दन से सोने की सुई के द्वारा सोने आदि के पत्तर पर लिखे । दूसरे से लिखाते समय मूल सौभाग्यविद्या का उच्चारण कराया जाता है। साधक यदि स्वयं श्रीचक्र का लेखन करता है, तो वह मन्त्र का उच्चारण भी स्वयं ही करता है। इसको चक्रराज इसलिये कहा जाता है कि इसकी उपासना चारों आम्नायों में की जाती है, अतः यह अन्य पूजा-चक्रों की अपेक्षा उत्तम है। किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने बताया है– “श्रीचक्र को लिखते समय इसके शिव और शक्ति त्रिकोण एक समान होने चाहिये, रेखाएँ भी समान होनी चाहिये, जिससे यह देखने में मनोहर हो” । सम्यक्- लेखन से इसी प्रकार का लेखन अभिप्रेत है । 'भावयेत्' क्रिया का प्रयोग यहाँ लिखने अथवा लिखाने के अर्थ में हुआ है । इस प्रसंग में– “कस्तूरी, कुंकुम, कपूर, चन्दन और सुधा को मिलाकर चक्रराज का लेखन करे” यह १प्रामाणिक वचन भी स्मरणीय है ॥९५-९६॥ तब योगिनी के मूलमन्त्र से पुष्पांजलि समर्पित करे ॥९६॥ १. 'अग्नि....कत्वात्' नास्ति–ख. ने. ज. झ. । २. सुरया–ने. झ. उ. । ३. यन्त्र- राजं वि–उ. । ४. तत् सर्वं–ख. ने. ज. झ. उ. । ५. येच्च–ख. ने. ज. झ. उ. । ६. सुरा–ने. उ. ।

  1. श्लोक का यह अंश लुप्तागमसंग्रह, द्वितीय भाग (पृ० १२) में संगृहीत उदयाकर- पद्धति के श्लोक का चतुर्थ पाद है । ज्ञानदीपविमर्शिनी में यह उद्धृत है ।

२८४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः योगिनीनां प्रकटादीनाम्, मूलमन्त्रेण “समस्तप्रकट०” इत्यादिना पूर्वोक्तेन, पुष्पाञ्जलिं ततः तत्र१ श्रीचक्रे निक्षिपेत् ॥९६॥ २पुष्पाणामभावेऽपि कार्यतामाह— मणिमुक्ताप्रवालैर्वा विलोमं मूलविद्यया । अशून्यं सर्वदा३ कुर्यात् विलोमं प्रतिलोमम् । उच्चरितया ४मूलविद्यया सौभाग्यविद्यया । वाशब्दः काकाक्षिवदुभयत्रापि५ संबद्धयते । अशून्यम् अविरहितम् । सर्वदा६ येन केन प्रकारेण कुर्यात् । पुष्पाणामभावे मण्यादिभिर्वा योगिनीमूलमन्त्रेण सौभाग्यविद्यया वा सर्वदा७ अशून्यं चक्रं कुर्यात्, पूजयेदित्यर्थः ॥९७॥ योगिनी शब्द यहाँ प्रकटा आदि योगिनियों का सूचक है। उन योगिनियों का मूल- मन्त्र “समस्तप्रकट०” यहाँ पहले (३।९०) बताया जा चुका है। श्रीचक्र के लेखन के बाद इसी मन्त्र से उस श्रीचक्र पर पुष्पांजलि समर्पित करे ॥९६॥ १पुष्प आदि के न मिलने पर यह करना चाहिये — मणि, मुक्ता, प्रवाल से अथवा विलोम उच्चरित मूलविद्या से उस श्रीचक्र को सदा अशून्य रखे ॥९७॥ विलोम का अर्थ है प्रतिलोम (उलटा)। मूलविद्या, सौभाग्यविद्या का उलटा उच्चा- रण करते हुए इस श्रीचक्र को कभी शून्य न करे। काक (कौआ) की आँख की तरह यहाँ ‘वा’ शब्द का संबन्ध मणि इत्यादि से अथवा मूलविद्या से भी हो जाता है। इनमें से किसी एक के बिना इस श्रीचक्र को नहीं रखना चाहिये। सदा किसी न किसी एक का संबन्ध उससे अवश्य रहना चाहिये। पुष्पों के अभाव में मणि इत्यादि से, योगिनी मूल- मन्त्र से अथवा विलोम उच्चरित सौभाग्यविद्या से सदा इस चक्र को अवश्य अशून्य रखकर पूजा करनी चाहिये ॥९७॥ १. ‘तत्र’ नास्ति-क. ख. ग. । २. पुष्पादीना-क. ग. । ३. सर्वथा-ख. च. छ. ज. झ. । ४. ‘मूलविद्यया’ नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. यत्र संयुज्यते-ख. ने. झ. उ. । ६. सर्वथा एकेनापि प्रकारेण-ख. ने. झ. उ. । ७. सर्वथा अशून्यं चक्रं पूज-ख. ने. ज. झ. उ. ।

  1. पुष्पों के अभाव में मणि, मुक्ता, प्रवाल आदि बहुमूल्य रत्नों की चर्चा अटपटी सी लगती है, किन्तु साथ ही यहाँ विकल्प के रूप में मूलविद्या की भी चर्चा है। इसका अभिप्राय यह है कि सम्पन्न व्यक्ति श्रीचक्र को मणि, मुक्ता, प्रवाल आदि से अशून्य रखे तथा साधनहीन व्यक्ति उस चक्र पर विलोम क्रम से मूलविद्या को ही लिख ले।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २८५ तथाऽकरणे निष्फलतामाह— शून्ये विघ्नास्त्वनेकंशः ॥९७॥ मण्यादिभिः शून्ये सति श्रीचक्रेऽनेकंशः १ बहुशः, विघ्नाः सपर्यान्तरायाः संभ- वेयुः ॥९७॥ सामान्यार्घ्यविधानमाह— श्रीचक्रस्यात्मनश्चैव मध्ये त्वर्घ्यं प्रतिष्ठयेत् । श्रीचक्रस्य पूर्वोक्तरीत्या उद्धृतस्य, साधकस्य च मध्ये, अर्घ्यं वक्ष्यमाणरीत्या २प्रतिष्ठयेत् ३प्रतिष्ठापयेत् ॥९७॥ अर्घ्यप्रतिष्ठा४प्रकारमाह— चतुरस्रान्तरालस्थकोणषट्के सुरेश्वरि ॥९८॥ षडासनानि सम्पूज्य त्रिकोणस्यान्तरे पुनः । पीठानि चतुरो देवि कामूजाओ इति क्रमात् ॥९९॥ अर्चयित्वाऽर्घ्यपादे तु वह्नेर्दश कला यजेत् । ऐसा न करने पर पूजा निष्फल हो जाती है— श्रीचक्र के शून्य रहने पर अनेक विघ्न आते हैं ॥९७॥ श्रीचक्र के मणि इत्यादि से शून्य रहने पर अनेक विघ्न पूजा के समय उपस्थित होने लगते हैं ॥ ९७॥ अब सामान्य अर्घ्य की विधि बताते हैं— श्रीचक्र के और अपने बीच में अर्घ्य की स्थापना करे ॥ पूर्वोक्त पद्धति से उद्धृत श्रीचक्र और साधक के बीच के स्थान में आगे बताई जा रही पद्धति से अर्घ्य की स्थापना करे ॥ ९८॥ अर्घ्य की स्थापना का प्रकार यह है— हे सुरेश्वरि ! चतुरस्र के अन्तराल में षट्कोण चक्र बनावे और उसमें छः आसनों की पूजा करे । इसके बाद हे देवि ! षट्कोण के अन्तराल में स्थित त्रिकोण में का पू जा ओ नामक चार पीठों की क्रम से पूजा करके तब अर्घ्य के आधार पात्र में वह्नि की दस कलाओं की पूजा करे ॥९८-१००॥ १. कशो विघ्ना बहवो विघ्नाः-ख. ने. झ. उ. । २. प्रतिक्षिपेत्-क. ग. । ३. 'प्रतिष्ठापयेत्' नास्ति-ख. ज. झ. व. उ. । ४. 'प्रकार' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ५. पीठांस्त्रिचतुरो-क. च. उ. । ६. पात्रे-उ. ।

२८६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः चतुरस्रान्तरालस्य कोणषट्के आदौ चतुरस्रं लिखित्वा तदन्तर्वृत्तं तदन्तः षट्- कोणं तन्मध्ये त्रिकोणमिति मण्डलं गोमयोपलिप्तभूतले मत्स्यमुद्रया विलिखेदिति सामर्थ्यलभ्यम्। तदुक्तं श्रीपराक्रमे— ततो गोमयसंलिप्ते चतुरस्रे भुवः स्थले। प्रवहच्छ्वासहस्तेन कृतया मत्स्यमुद्रया॥ दिव्यगन्धं तुल्ययुक्तं विलिखेदर्घ्यमण्डलम्। वेदास्रवृत्तषट्कोणत्रिकोणाभ्यन्तरेऽन्तरे ॥ इति। एवं चतुरस्रवृत्तान्तरालकोणषट्के षडासनानि सम्पूज्य अमृतार्णवपोताम्बुजा- त्मचक्रसर्वमन्त्रसाध्यसिद्धासनानि सम्पूज्य षट्कोणान्तरस्थत्रिकोणमध्ये का काम- गिरिपीठम्, पू पूर्णगिरिपीठम्, जा जालन्ध्रपीठम्, ओ ओड्याणपीठं च क्रमात्² त्रिकोणकोणेषु त्रयं मध्ये चैकमर्चयित्वा अर्घ्यपादे आधारे तत्र पात्रं प्रतिष्ठाप्याऽ- भ्यर्च्य तन्मध्ये वह्निबिम्बमभ्यर्च्य तत्परितः कलाश्चाभ्यर्चयेत्। तदुक्तं स्वच्छन्द- संग्रहे— 'चतुरस्रान्तरालस्थकोणषट्के' इस समस्त पद का यह अर्थ है कि पहले चतुरस्र को लिखकर उसके अन्दर वृत्त बनावे और उस वृत्त के अन्दर षट्कोण और उसके मध्य में त्रिकोण का लेखन करे। गोबर से लीप कर पवित्र की गई भूमि में मत्स्य मुद्रा से इस मण्डल का निर्माण करना चाहिये। इस विषय में श्रीपराक्रम का यह वचन प्रमाण है— तब गोबर से लीपी गई चतुरस्र भूमि पर, जिधर की श्वास चल रही है, उसी हाथ से बनाई गई मत्स्य मुद्रा से सभी सुगन्धि द्रव्यों को समान मात्रा में मिला कर अर्घ्य- मण्डल की रचना करे। चतुरस्र, वृत्त, षट्कोण और त्रिकोण की स्थिति एक दूसरे के अन्दर बनानी चाहिये॥ इस प्रकार अर्घ्यमण्डल का निर्माण करके चतुरस्र और वृत्त के बीच के छः कोनों में ¹अमृतार्णव, पोताम्बुज, आत्म, चक्र, सर्वमन्त्र, साध्यसिद्ध नामक छः आसनों की पूजा करे। तब षट्कोण के अन्तराल स्थित त्रिकोण के—का कामरूप पीठ, जा जालन्धर पीठ, पू पूर्णगिरि पीठ और ओ ओड्याण पीठ—इन चार पीठों में, अर्थात् त्रिकोण के तीन कोनों में और बीच में क्रमशः एक एक देवी की पूजा करे। इसके बाद उस पर अर्घ्यपात्र के आधार की स्थापना और पूजा करके उस आधार पात्र में अग्नि की और उसके चारों तरफ अग्नि की कलाओं की पूजा करे। स्वच्छन्दसंग्रह में इस विषय में कहा गया है — १. णिज्य—ब. विहाय सार्वत्रिकः पाठः। २. क्रमात् त्रिचतुरस्त्रीन् वा चतुरो वा त्रिकोणकोणेषु चतुरस्रे तन्मध्ये चार्चयित्वा, तत्राधारं प्रतिष्ठाप्य, अर्घ्यपादमाधारम्, तस्मिन् मध्ये वह्निबिम्ब-क. ग.। १. अमृतार्णवासन, पोताम्बुजासन, आत्मासन, चक्रासन, सर्वमन्त्रासन और साध्य- सिद्धासन नामक छः आसनों की चर्चा ज्ञानदीपविमर्शिनी की नामपद्धति में हुई है।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २८७ षट्कोणान्तस्त्रिकोणे तु वह्निबिम्बं कलायुतम् । आवाह्याधारतो देवि पूजयेन्मन्त्रवित्तमः ॥ इति । क्रमाद् यादिक्षान्तदशवर्णपूर्वास्तस्य१ वह्नेर्दशकला धूम्रार्चिराद्या यजेत् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— यादिक्षान्तानि२ वर्णानि कला वह्नेर्महेश्वरि । एताः कलाः समभ्यर्च्य स्वस्ववर्णैर्यथाविधि ॥ स्वबीजाद्याश्चतुर्थ्यन्तनाममध्या नमोऽन्तिमाः३ । प्रोक्ता वह्निकलामन्त्रा नामानि शृणु साम्प्रतम् ॥ धूम्रार्चिर्नीलरक्ता४ च कपिला विस्फुलिङ्गिनी । ज्वालामालिन्यर्चिष्मती तदूर्ध्वं हव्यवाहिनी ॥ अष्टमी कव्यवाहा च रौद्री संहारिणी५ ततः६ ॥ इति । [७धूम्रार्चिरू(ष्टा?ष्मा) ज्वलिनी ज्वालिनी विस्फुलिङ्गिनी । सुश्रीः सुरूपा कपिला हव्यकव्यवहेश्वरी ॥ (शा० ति० २।१५) इति तन्त्रान्तरे] ।।९८-११०।। हे देवि ! उत्तम मन्त्रवेत्ता साधक षट्कोण के अन्तराल में निर्मित त्रिकोण में अर्घ्य- पात्र की स्थापना कर उसमें अग्नि की कलाओं के साथ अग्निमण्डल की पूजा करे ।। यहाँ क्रमशः यकार से क्षकार पर्यन्त दस वर्णों के उच्चारण के साथ धूम्रार्चि आदि दस कलाओं की पूजा की जाती है। स्वच्छन्दसंग्रह में इसकी विधि वर्णित है— हे महेश्वरि ! यकार से क्षकार पर्यन्त दस वर्ण हैं। अग्नि की कलाएँ भी दस ही हैं। अपने अपने बीजवर्णों से इनकी पूजा करनी चाहिये। पहले अपना बीजाक्षर, तब चतुर्थी विभक्ति के साथ नाम तथा अन्त में नमः पद का संयोजन करना चाहिये। अग्नि की दस कलाओं के ये ही मन्त्र हैं। अब तुम इन कलाओं के नाम सुनो—धूम्रार्चि, नीलरक्ता, कपिला, विस्फुलिङ्गिनी, ज्वालामालिनी, अर्चिष्मती, हव्यवाहिनी, कव्यवाहा, रौद्री और संहारिणी ।। अन्य तन्त्र (शारदातिलक, २।१५) में इन दस कलाओं के नाम ये बताये गये हैं— धूम्रार्चि, ऊष्मा, ज्वलिनी, ज्वालिनी, विस्फुलिङ्गिनी, सुधी, सुरूपा, कपिला, हव्यकव्यवहा और ईश्वरी ।।९९-१००।। १. स्तस्यैव-ख. ने. ज. झ. उ. । २. न्तात्म-क. ग. । ३. न्तिकाः-क. ग. ज. । ४. लक्ता-क. ग., वक्त्रा-ज., वर्णा-उ. । ५. संवाहिनी-क. ग. । ६ तथा-क. ग. । ७. 'धूम्रा...न्तरे' नास्ति-ख. ने. झ. उ. ।

२८८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः अर्घ्यपात्रं प्रतिष्ठाप्य तत्र सूर्यकला यजेत् ॥ १००॥ पात्रे सूर्यकलाश्चैव कभादि द्वादशार्चयेत् । ¹पात्रे अर्घ्यपात्रमध्ये, सूर्यबिम्बमभ्यर्च्य । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— ²अस्त्रप्रक्षालितं शङ्खं स्थापयित्वा तथोपरि । हृदयात् सूर्यबिम्बं च समावाह्य स्वमन्त्रतः ॥ इति । अत्र सूर्यकलाः पूजयेत् । कादिठान्तं भादिडान्तं वर्णजातं ³क्रमोत्क्रमात् । द्वयं द्वयं ⁴प्रयोक्तव्यं कलाश्च तदनन्तरम् ॥ इत्यस्मदुक्तरीत्या कभादि ककारादिभकारादि वर्ण⁵युगलयुक्तद्वादशादित्यकलाः क्रमात् तपिन्याद्या द्वादश अर्चयेत् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— आधार पर अर्घ्यपात्र को स्थापना करके वहां सूर्य और उसकी कलाओं का पूजन करे । सूर्य को बारह कलाओं का पूजन ककार आदि तथा भकार आदि बारह-बारह वर्णों से किया जाता है ॥१००-१०१॥ आधार पर स्थापित उस पात्र में सूर्यमण्डल की पूजा करनी चाहिये । इस विषय में स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है— उस आधार पर अस्त्र मन्त्र से प्रक्षालित शंख की स्थापना करे और उस पात्र में अपने हृदय में से सूर्यमन्त्र के द्वारा सूर्य का आह्वान कर उस पात्र में स्थापित करे ॥ इसी पात्र के चारों तरफ सूर्य की कलाओं का पूजन करे । जैसा कि ¹हमने बताया है— ककार से ठकार पर्यन्त बारह वर्णों का उच्चारण क्रम से तथा भकार से डकार पर्यन्त बारह वर्णों का उच्चारण व्युत्क्रम (उलटा क्रम) से किया जाता है । इस तरह से दो-दो वर्णों का प्रयोग कर तब कलाओं का उच्चारण करे ॥ इस तरह से ककार आदि और भकार आदि दो-दो वर्णों का उच्चारण करते हुए सूर्य की तपिनो आदि बारह कलाओं का पूजन करे । स्वच्छन्दसंग्रह में इस विषय का वर्णन मिलता है— १. पात्रमभ्यर्च्य पात्रमध्ये–ख. ने. ज. झ. उ. । २. अथ प्र–ख. ज. उ. । ३. क्रमोऽक्रमात्–क. ग., क्रमात् क्रमात्–ने. झ. । ४. च वक्तव्यम्–ख. ने. झ. उ. । ५. युग्म–ख उ. ।

  1. अमृतानन्द के मुद्रित ग्रन्थों में यह वचन नहीं मिलता । उनके अप्रकाशित ग्रन्थ तत्त्वविमर्शिनी का यह हो सकता है ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २८९ कादिठान्ताक्षरा देवि मूर्तिनाम्ना समीरिताः । तपिनो तापिनी चैव शोधनी शोषणी तथा ॥ भ्रामणी क्लेदिनी चैव वरेण्याकर्षिणी तथा । सुषुम्ना ^१वृष्टिवाहा च ज्येष्ठा चैव हिरण्यदा ॥ एताः सौरकलाश्चैव व्युत्क्रमाद् ^२भादिडान्तिमाः । इति । ^३कभादिकथनाद् यकारादयो दश वह्निकलाः, अकारादयः षोडशः ^४स्वराः सोमकला इति गम्यते । तत्र पात्रे लवङ्गादिभिः सुगन्धिकुसुमैश्च^५ वासितं सलिलमापूर्य तस्मिन्निन्दुमण्डलमभ्यर्च्य । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— एलालवङ्गकङ्कोलान् जातीफलसुसंयुतान् । सुगन्धिकुसुमैर्द्रव्यैः^६ सह तस्मिन् जले क्षिपेत् ॥ इति । नवयोनिं समालिख्य पूर्ववज्जलमध्यतः । विशुद्धितः समावाह्य ^७चन्द्रमण्डलमर्चयेत् ॥ इति (च) ॥१००-१०१॥ हे देवि ! ककार से ठकार पर्यन्त अक्षरों वाली सूर्य की मूर्ति मानी जाती है। तपिनो तापिनी, शोधनी, शोषणी, भ्रामणी, क्लेदिनी, वरेण्या, आकर्षणी, सुषुम्ना, वृष्टिवाहा, ज्येष्ठा और हिरण्यदा—ये बारह सूर्यकलाएँ हैं। इनमें भकार से डकार पर्यन्त वर्णों का भी व्युत्क्रम से विन्यास किया जाता है ॥ कभादि को यहाँ सूर्य की कला बताया गया है। तदनुसार यकार आदि दस वर्ण वह्नि की कलाएं तथा अकार आदि सोलह स्वर सोम की कलाएं हैं, इसकी जानकारी हो जाती है। इस तरह से शंख पात्र में सूर्यमण्डल और उसकी कलाओं के पूजन के बाद उस पात्र में लवङ्ग आदि सुगन्धि द्रव्यों और पुष्पों से सुवासित जल भरे और तब उसमें चन्द्रमण्डल की पूजा करे, जैसा कि स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है— इलायची, लौंग, कक्कोल, जायफल आदि सुगन्धि द्रव्यों के साथ सुगन्धित पुष्पों से सुवासित जल उस पात्र में भरे। ^1पहले नवयोनि चक्र का निर्माण करे और तब जलीय धारणा के सहारे विशुद्धि चक्र से चन्द्रमण्डल का आह्वान कर वहाँ उसकी पूजा करे ॥१००-१०१॥ १. तुष्टि-ख. ने. । २. डादिभान्तिमाः-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. कठादि-झ. । ४. कलाः-ने. ज. झ. उ. । ५. मैर्वा वासितममृतसलिल-ख. ने. । ६. दिव्यैर्महत्तस्मिन् जलं किरेत्-ख. ने. झ. उ. । ७. चतुरस्रे सम-ख. ने. छ. ज. झ. उ. ।

  1. यहाँ के दोनों श्लोक स्वच्छन्दसंग्रह के ही लगते हैं। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

२९० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः विधृते तु पुनर्द्रव्ये षोडशेन्दुकला यजेत् ॥१०१॥ तस्मिन् विधृते द्रव्ये १ द्रव्ये । द्रवात्मकं द्रव्यं विशेषार्घ्यम् । मद्यं द्रवमयमेव हि । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— अतो हि विशेषार्घ्यस्य साधनं प्रोच्यतेऽधुना । आधारपात्रयोश्चैव तयोर्वह्न्यर्कपूजनम् ॥ सामान्यार्घ्योक्तमार्गेण २कृतपूजितपूज्यके । पात्रे त्वासवमापूर्य शिरोमन्त्रेण पूर्ववत् ॥ इति । षोडशेन्दुकलाः३ क्रमादकारादिषोडशस्वरादिका अमृताद्याः षोडश४ कलाः, यजेत्५ । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— आदिकान्तान्तगाः६ सौम्याः कला षोडश कीर्तिताः । तासां नामानि वक्ष्यामि शृणु सर्वाङ्गसुन्दरि ॥ उस शंख पात्र में भरे गये द्रव्य में चन्द्रमा की सोलह कलाओं का पूजन करे ॥१०१॥ उस शंख पात्र में भरे गये द्रवात्मक द्रव्य में, अर्थात् विशेषार्घ्य में १६ चन्द्रकलाओं का पूजन करे । द्रवमय द्रव्य से यहाँ मद्य का ग्रहण किया जाता है, जैसा कि स्वच्छन्द- संग्रह में कहा गया है— इसीलिये अब विशेषार्घ्य के साधन की पद्धति बताई जा रही है । आधार में और उस पर रखे शंखपात्र में वह्नि और सूर्य का पूजन सामान्य अर्घ्य की पद्धति से करके तब उस शंख पात्र में आसव भर कर पहले बताई गई पद्धति से शिरोमन्त्र, बीजमन्त्र और चतुर्थ्यन्त पद के साथ नमः पद जोड़ कर इन्दुकलाओं का पूजन करे ॥ चन्द्र की अमृता आदि सोलह कलाएँ क्रमशः अकार आदि सोलह स्वरों से संयुक्त की जाती हैं, जैसा कि स्वच्छन्दसंग्रह में कहा गया है— अकार से लेकर ककार के आदि में स्थित अःकार में जिनकी समाप्ति हो जाती है, ऐसे सोलह स्वर चन्द्र की जिन सोलह कलाओं से क्रमशः संयुक्त होते हैं, उनके नाम मैं १. द्रव्ये हव्ये । द्रव्यात्मकं मद्यं विशेषात्मकं मद्यं च । द्रव्यमयत्वमेव हि विशे- षार्घ्यस्य-ख. ने. ज्ञ. उ. । २. कृत्वा पूजेत सूर्यके-क. ग. । ३. ला यजेदिति-क. ग. ने. । ४. षोडशेन्दुकलाः-ज्ञ. । ५. यजेद् ध्यायेत्-उ. । ६. न्तिकाः-क. ख. ग. ने. ज्ञ. ।

तृतीयः] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २९१ अमृता मानदा १पूषा पुष्टिः प्रीतिर्महेश्वरि । रेवती ह्रीमती चैव२ श्रीः कान्तिश्च सुधा ततः ॥ ज्योत्स्ना हैमवती चैव छाया सम्पूरिणी३ तथा । वामा रामा४ कलानां च नामान्येतानि वल्लभे ॥ इति ॥१०१॥ अमृतेशीं च तन्मध्ये भावयेच्च नवात्मना । नवात्मना ततो देवि५ तर्पयेद्धातुदेवताः ॥१०२॥ आनन्दभैरवं चैव वौषडन्तेन तर्पयेत् । ८लकुलीशं समुद्धृत्य भृगुं९ संवर्तकं तथा । पिनाकिनं च खड्गीशं भुजङ्गं१० बालिनं तथा ॥ योजयित्वा क्रमेणैव कार्यकारणमस्तकम् । अर्धीशं योजयेदन्ते नवात्माऽयं समुद्धतः ॥ कहूँगा, हे सर्वाङ्गसुन्दरि ! तुम सुनो । हे महेश्वरि ! हे वल्लभे ! अमृता, मानदा, पूषा, पुष्टि, प्रीति, रेवती, ह्रीमती, श्री, कान्ति, सुधा, ज्योत्स्ना, हैमवती, छाया, संपूरिणी, वामा और रामा—ये नाम हैं चन्द्रमा की इन सोलह कलाओं के ॥१०१॥ उस पात्र में नवात्म मन्त्र से अमृतेशी की भावना करे । तब नवात्म मन्त्र से ही हे देवि ! डाकिनी आदि धातुदेवताओं को तृप्त करके वौषट् मन्त्र का उच्चा- रण करते हुए आनन्दभैरव को भी तृप्त करे ॥१०२॥ लकुलीश (हकार) का उद्धार करके भृगु (सकार), संवर्तक (षकार), पिनाकी (लकार), खड्गीश (वकार), भुजङ्ग (रकार) और बाली (यकार) का भी उद्धार कर उनको क्रमशः लिख ले । अन्त में बिन्दु और नाद जिसके मस्तक पर हैं, ऐसे अर्धीश (ऊकार) का संयोजन करे । इस प्रकार से १नवात्म-मन्त्र का उद्धार किया जाता है ॥ १. पुष्टिस्र्तुष्टि-ख. ज. झ. उ. । २. देवि-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. रिता-क. ग. । ४. रामा श्यामा-क. ग. । ५. गौरि-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ६. आनन्द- भैरवायेति-ख. झ. । ७. वं वौषडन्तेनैव-क. ग. । ८. अमृतेशीं-ख. ने. ज. झ. उ. । ९. भृगुः संवर्तकस्ततः-ख. ने. ज. उ. । १०. भुजगं यावनं-क. ग. ।

  1. स्वच्छन्दसंग्रह के प्रस्तुत उद्धरण में आठ ही वर्णों का उद्धार मिलता है । भास्कर- राय ने यहाँ ज्ञानार्णव (१४।१३-१४) के प्रमाण से नवात्म-मन्त्र का उद्धार इस तरह से किया है—शिव हकार, चन्द्र सकार, मातृकान्त क्षकार, काल मकार, शक्र लकार, अम्बु वकार, वह्नि रेफ, वायु यकार और वामकर्ण ऊकार का उद्धार कर उसको बिन्दु- नाद से संयोजित करना चाहिये । स्वच्छन्दसंग्रह के उक्त वचन में मकार का उद्धार नहीं हो पाया है ।

२९२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इति स्वच्छन्दसंग्रहोद्धृतं नवात्मानम् । तन्मध्ये१ तेन मन्त्रेण अमृतेशीम् प्रसृतामृतरश्म्योघसन्तर्पितचराचराम् । भवानि ! भवशान्त्यै त्वां भावयाम्यमृतेश्वरीम् ॥ (सौ० हृ० ७) इत्यभियुक्त२वचनोक्तरीत्याऽमृतस्राविणीं भावयेत् । नवात्मना ततो देवि३ धातुदेवता डाकिन्याद्याः । अत्रैवोक्तम्— विशुद्धौ हृदये नाभौ स्वाधिष्ठाने च मूलके । आज्ञायां धातुनाथाश्च न्यस्तव्या डादिदेवताः ॥ (३।३०) इति । नवात्मना पूर्वोक्तेन तर्पयेत् । आनन्दभैरवं चैवेत्येवकारेण नवात्मनैव४ आनन्दभैरवं तर्पयेदिति । नवात्मानमुच्चार्य "आनन्दभैरवाय वौषट्" इति तर्प- येदित्यर्थः ॥१०२-१०३॥ सामान्यार्घ्यप्रकारं विशेषार्घ्येऽप्यतिदिशति— तथैवार्घ्यं विशेषेण साधयेत् साधकोत्तमः ॥१०३॥ स्पष्टम्५ ॥१०३॥ स्वच्छन्दसंग्रह में ऊपर बताई गई पद्धति से नवात्म-मन्त्र का उद्धार बताया गया है । शंख के जल में इस नवात्म-मन्त्र से अमृत की वर्षा करने वाली अमृतेशी की भावना करे । इसकी भावना का प्रकार शिवानन्द मुनि ने अपने सौभाग्यहृदय नामक स्तोत्र में इस तरह से बताया है— हे भवानि ! अपनी अमृतमयी किरणों से समस्त चराचर जगत् को तृप्त करने वाली अमृतेश्वरी के रूप में मैं तुम्हारी भावना करता हूँ, जिससे कि सारे जगत् में शान्ति का साम्राज्य फैले ॥ डाकिनी आदि धातुदेवताओं का वर्णन पहले (३।३०) किया जा चुका है । वहाँ बताया गया है कि विशुद्धि आदि छः स्थानों में इन छः डाकिनी आदि देवताओं का न्यास करना चाहिये । नवात्म-मन्त्र से ही इनको भी यहाँ तृप्त करे । साथ ही नवात्म-मन्त्र से आनन्द- भैरव को भी तृप्त करे । यहाँ नवात्म-मन्त्र का उच्चारण करने के बाद "आनन्दभैरवाय वौषट्" इस वाक्य का भी उच्चारण करे ॥१०२-१०३॥ सामान्यार्घ्य की विधि से ही विशेषार्घ्य की भी शुद्धि करे, इसी विषय को अब बताया जा रहा है— साधकप्रवर को चाहिये कि वह इसी विधि से विशेषार्घ्य की भी शुद्धि कर ले ॥१०३॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥१०३॥ १. ध्येयेनेन-ख. झ. उ. । २. युक्तोक्त्या-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. गौरि-ख. ने. ४. तौवानन्तरमन्त्रै-ग. । ५. स्पष्टमेतत्-ज.।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २९३ एवमर्घ्यशुद्धिं कृत्वा तदनन्तरं गुरून् पूजयेदित्याह— गुरुपोदालिमापूज्य भैरवाय ददेत् पुनः । गुरूणां परमशिवादित्वगुरुपर्यन्तानाम्, २पादांलि ३पादुकापरम्परां ४दिव्य- सिद्धमानवौघत्रयवतीम्, आपूज्य स्वशिरस्यर्घ्योदकाक्षतकुसुमैरभ्यर्च्य । शोधित- मर्ध्यमाललाटं ५त्रिुरुद्धृत्य महापद्मवनान्तस्थशृङ्गाटोदरवासिने गुरुरूपिणे पूर्वोक्त- (१।१)निर्वचनाय ६भैरवाय, ददेत् निवेदयेत् ॥१०४॥ तत् पुनः— तदाज्ञाप्रेरितं तच्च गुरुपङ्क्तौ निवेदयेत् ॥१०४॥ तस्य गुरुरूपिणो भैरवस्य, आज्ञा७प्रेरितम् अनुज्ञातम्, ८तच्च द्रव्यं पुनश्च गुरुपङ्क्तौ निवेदयेत् ॥१०४॥ इस तरह से अर्घ्य की शुद्धि के बाद गुरुपंक्ति की आराधना करे, यह विषय अब बताया जा रहा है— गुरुओं की पादुका-परम्परा का पूजन करने के उपरान्त इस अर्घ्य को भैरव को निवेदित करे ॥ परशिव से लेकर अपने गुरु तक की पादुका-परम्परा की, दिव्य, सिद्ध और मान- वौघ क्रम से चली आ रही गुरु-परम्परा की पूजा करने के उपरान्त, अपने ही सिर पर अर्घ्योदक, अक्षत और पुष्प के द्वारा पूजन करके तब उस शोधित अर्घ्य को तीन बार उठाकर महापद्मवन में स्थित त्रिकोण के मध्य में विराजमान गुरुरूपी भैरव के प्रति निवे- दित करे । भैरव पद का निर्वचन पहले (१।१) बता दिया गया है ॥१०४॥ इसके बाद— उस गुरुरूपी भैरव की आज्ञा प्राप्त कर उस अर्घ्य को गुरुपंक्ति के लिये निवेदित करे ॥१०४॥ उस गुरुरूपी भैरव की आज्ञा के मिल जाने पर उस द्रव्य (अर्घ्य) को पुनः गुरुपंक्ति के लिये अर्पित करे ॥१०४॥ १. पादावलि पूज्य-क. उ. । २. पादावलिं-क. उ., वलीं-ख. ने. । ३. 'पादुका' नास्ति-ख. ने. झ. उ. । ४. दिव्यौघसिद्धौघ-क. ग. उ. । ५. त्रिः समु-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. 'भैरवाय' नास्ति-ने. ज. झ. उ. । ७. आज्ञया-ख. ने. झ. उ. । ८. 'तच्च द्रव्यं पुनः' नास्ति-ख. ने. ज. उ. ।

२९४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः प्रसादग्रहणमाह— तदीयं शेषमादाय कोमाग्नौ विश्वतस्त्विषि । पादुकां मूलविद्यां च जपन् होमं समाचरेत् ॥१०५॥ तदीयं शेषं गुरुदेवतयोर्निवेदितं³ शेषं द्रव्यमादाय तत्त्वचतुष्टयशोधनमन्त्रैः “कामो देवः स⁴ काम्यत्वात्” (सौ० सु० ४।३) इत्यस्मदुक्तरीत्या विश्वघस्मर- ⁵कलाजाले कामेश्वराख्ये सर्वप्राणिष्वात्मन्यग्नौ⁶ । विश्वतस्त्विषि⁷ “विश्वग्रसन- शीलं तद्रूपं तेजोमयं ततः” इत्याज्ञावतारोक्तरीत्या विश्वघस्मरकलाजाले⁸ । पादुकां स्वगुरुश्रीपादुकाम्, मूलविद्यां सौभाग्य⁹विद्यां च जपन् । होमं भेदेन्धन- प्रक्षेपलक्षणं समाचरेत् । तदुक्तं श्रीपराक्रमे— निवेद्य१० मस्तकस्थाय गुरवेऽर्घ्यं तदाज्ञया । कल्पान्तहुतभुकल्पचिदग्नौ विश्वघस्मरे ॥ ११मेयराशिमयं हव्यं वासनात्मोपदर्शकम् । १२व्यतिषङ्गेण स जुह्वन् जपेदात्मानमामृशन् ॥ इति ॥१०५॥ इसके बाद स्वयं प्रसाद ग्रहण करे— गुरु और देवता को अर्पण करने के बाद उनके प्रसाद के रूप में सारे विश्व का ग्रास करने वाली कामाग्नि में गुरुपादुका और मूलविद्या का जप करते हुए आहुति दे ॥१०५॥ गुरु और देवता को अर्पित करने के बाद बचे हुए द्रव्य (अर्घ्य) की चार तत्त्वों का शोधन करने वाले मन्त्रों से शुद्धि कर विश्व का ग्रास करने में समर्थ कलाओं से संपन्न सभी प्राणियों में स्वात्मस्वरूप में विराजमान कामेश्वर रूपी अग्नि में उसकी आहुति दे। इस कामेश्वर का वर्णन हमने सौभाग्यसुभगोदय (४।३) में किया है। आज्ञावतार नामक ग्रन्थ में भी विश्व के ग्रास में समर्थ इस तेजोमय स्वरूप का वर्णन मिलता है। चारों तरफ से प्रकाशमान इस कामाग्नि में अपने गुरु की पादुका का और मूलमन्त्र (सौभाग्यविद्या) का जप करते हुए हवन करे, अर्थात् अपनी भेददृष्टि रूपी इन्धन को उस कामाग्नि में डाल कर स्वयं अद्वयतत्त्व में प्रतिष्ठित हो जाय। श्रीपराक्रम में बताया गया है— मस्तक में विराजमान गुरु को निवेदित करने के उपरान्त उसकी आज्ञा से विश्व का ग्रास करने में समर्थ कल्पान्त-कालीन अग्नि के समान प्रभास्वर चिदग्नि में मेयराशि के रूप में स्थित इस सारे जगत् को हवि मान कर और अपनी वासनाओं को चबैना १. शिवाग्नौ-ख. ने. च. छ. ज. झ. । २. स्थुषी-क. ग. । ३. तायाः पीतशेषं- ख. ने. झ. उ. । ४. प्रकाम्यमानत्वात्-मु. । ५. कीलाले-क. ग. । ६. णिस्वा- त्माग्नौ-ख. । ७. स्युषि-क. ग. । ८. कीलालजाले-क. ग. । ९. ग्यमूलवि-ख. ने. ज. झ. उ. । १०. निवेद्यामस्तकं स्वीयगुरोरर्घ्यं-ख. ने. ज. झ. उ. । ११. ज्ञेय-ख. ज. झ. उ. । १२. एतेषां गणशो जुह्वन्-ख. ज. झ. उ. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २९५ ननु कः कामाग्निः ? स कुत्र¹ वा निवसति ? किं वा हविरित्यत आह— महाप्रकाशे विश्वस्य संहारवमनोद्यते । मरीचिवृत्तीर्जुहुयान्मनसा कुण्डलीमुखे ॥१०६॥ कुण्डलीमुखे, व्यवस्थिते इति शेषः । अत्र श्रुतिः—"तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थितः" (तै० आ० १०।११।१२) इति । महाप्रकाशे निरिन्धनदीप्ते निर्वाणरहिते प्रमातरि वह्नौ । विश्वस्य संहारवमनोद्यते । विश्वस्य शिवादि-² भूम्यन्तस्य, संहारे निजकारणतावन्मात्राऽवस्थितौ, वमने सर्जने चोद्यते । ³विश्वा- द्यैव शक्तिः । ⁴तदुक्तमाज्ञावतारे—"स्वेच्छयैव जगत्सर्वं निगिरत्युद्गिरत्यपि" इति । मनसा सार्धं मरीचिवृत्तीर्जुहुयात् । आन्तरस्य चिदनलस्य⁵ मरीचयोऽ- ⁶क्षाणि, ⁷बहिरर्थेषु तेषां ⁸सञ्चारा वृत्तयः । तदुक्तं विज्ञानभैरवभट्टारकैः—"यत्र⁹ यत्राक्षमार्गेण चैतन्यं व्यज्यते प्रभोः" (श्लो० ११४) इति । कोऽर्थः ? कुण्डलिन्याः मानकर उनकी बारी-बारी से आहुति देता हुआ अपने स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जप करे ॥१०५॥ प्रश्न होता है कि यह कामाग्नि क्या है ? वह कहाँ रहती है ? और वह हवि कौन सी है, जिसकी कि आहुति देने की बात है, इन्हीं का अब विवरण देते हैं— कुण्डलिनी के मुख में व्यवस्थित महाप्रकाशरूपी वह्नि में, जो कि स्वेच्छा से संसार के संहार और सर्जन में लगी हुई है, मन के साथ सभी इन्द्रियों की वृत्तियों की आहुति दे दे ॥१०६॥ यह कामाग्नि कुण्डलिनी के मुंह में विराजमान है । यह तैत्तिरीयारण्यक श्रुति इसमें प्रमाण है—"उस कुण्डलिनी रूप कामाग्नि के मध्य में परमात्मा विराजमान हैं" । यह कामाग्नि महाप्रकाशमय है, बिना ही इन्धन के निरन्तर बिना बुझे जलती रहती है । यह प्रमातृस्वरूपिणी महाप्रकाशमयी वह्नि शिव से भूमि पर्यन्त समस्त संसार को कारणता मात्र रूप में अपने में छिपा लेती है और फिर वही कार्य के रूप में इसको अपने से बाहर निकाल देती है । यह शक्ति सारे विश्व की जननी है । आज्ञावतार नामक ग्रन्थ में बताया गया है—"अपनी इच्छा से ही यह सारे जगत् को निगलती और उगलती रहती है" । इसमें मन के साथ इन्द्रियों की वृत्तियों की आहुति दे । आन्तर चिदग्नि की किरणें इन्द्रियां हैं। बाह्य अर्थों की तरफ इनका संचार ही वृत्तियां कहलाती हैं। विज्ञानभैरव भट्टारक ने कहा है—"जहाँ जहाँ इन्द्रियों के प्रसार के कारण प्रभु का चैतन्य अभिव्यक्त होता १. कुत्र निवसन्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. वादेर्भू-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. शिवस्या- शैवेच्छा-क. ग. । ४. 'तदुक्तमाज्ञावतारे' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ५. चित्कलस्य- क. ग. । ६. अक्षनिबहः-ख. ने. झ. उ. । ७. 'बहिः' नास्ति-ख. ने. झ. उ. । ८. संवाहिकाः-ख. ने. ज. झ. उ. । ९. तत्र तत्रा-सार्वत्रिको दी० पाठः ।

२९६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः शिखायां महाशून्ये व्यवस्थिते सर्वप्राणिष्वात्मनि प्रकाशलक्षणे कामाग्नौ "आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियमर्थेन" (न्या० भा० १।१।४) इति तन्त्रा- न्तरोक्तरीत्या बहिरर्थेषु प्रसृतचिन्मरीचिरूपाक्षवृत्तिलक्षणं हविस्तेनैव मार्गेणान्त- र्मुखतया मनसा सह^१ जुहुयादित्यर्थः । तदुक्तं विज्ञानभैरवभट्टारकैः- महाशून्यालये वह्नौ भूताक्षविषयादिकम् । ^२हूयते मनसा सार्धं स^३ होमश्चेतनास्त्रुचा ॥ इति । (श्लो० १४६) ^४अयमेवान्तरो होमः । तदुक्तं पद्धतिषु- धर्माधर्महविर्दीप्ते आत्माग्नौ मनसा स्रुचा । सुषुम्नावर्त्मना नित्यमक्षवृत्तोजुंहोम्यहम् ॥ इति ॥१०६॥ है"^1 । इसका अभिप्राय यह है कि कुण्डलिनी की शिखा में, महाशून्य में विराजमान सभी प्राणियों में स्वात्मस्वरूप महाप्रकाश (कामात्मक) वह्नि में बाह्य विषयों के रूप में प्रसृत समस्त इन्द्रियों की वृत्तियों की आहुति दे दी जाती है । "आत्मा मन से, मन इन्द्रियों से और इन्द्रियाँ अर्थ से संयुक्त होती हैं" न्यायभाष्य की इस पद्धति से बाह्य विषयों की तरफ आकृष्ट चिन्मरीचिस्वरूप इन्द्रियों की वृत्तियों को ही आहुति माना गया है । यहाँ आहुति का तात्पर्य जिस पद्धति से ये बाहर आईं, उसी पद्धति से इनको अन्तर्मुख बनाकर उनको मन के साथ अपनी आत्मा को समर्पित कर देना है। विज्ञानभैरव भट्टारक का इस विषय में कहना है- महाशून्य स्थान में विराजमान चित्स्वरूपिणी वह्नि में अपनी चेतना की स्रुचा बना- कर मन के साथ पाँच महाभूतों, बाह्य इन्द्रियों और उनके विषयों की जो आहुति दी जाती है, वही वास्तविक होम है ॥ इसी को आन्तर होम कहा जाता है, जैसा कि ^2पद्धतियों में बताया गया है- धर्म और अधर्म रूपी आहुति से प्रज्वलित आत्मचिदग्नि में मन रूपी स्रुचा की सहा- यता से मैं अपने सुषुम्ना मार्ग को खोल कर अपनी इन्द्रियों की वृत्तियों की नित्य आहुति देता हूँ ॥१०६॥ १. 'सह' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. वातेन-ख. ने. ज. उ. । ३. महामहिम- शालिनि-ख. ने. उ. । ४. महामहिमशाली चाय-झ. ।

  1. विज्ञानभैरव का पूरा श्लोक और उसको व्याख्या हमारे भाषानुवाद में देखी जा सकती है ।
  2. यह श्लोक अनेक पद्धति-ग्रन्थों तथा तन्त्र-ग्रन्थों में भी मिलता है ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २९७ आन्तरामेव पूर्णाहूतिमाह— अहन्तेदन्तयोरैक्यमुन्मन्यां१ स्रुचि कल्पितम् । मथनोद्रेकसम्भूतं वस्तुरूपं महाहविः ।।१०७।। हुत्वा हुत्वा स्वयं चैवं२ सहजानन्दविग्रहः । ३प्रदानैस्तर्पणैः सम्यग्वि शुद्धैरमृतात्मभिः । ४महाहन्तीकरोमीदं विश्वं हव्यवपुर्धरम्५ ।। (सु० वा० ३९) इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या अहन्तेदन्तयोरैक्यम्, अहन्ता प्रमाता, इदन्ता प्रमेयम्, तयोरैक्यं प्रमाणम्, तत्त्रितयसामरस्यात्मकम्६ । विश्वक्षिप्तपदं७प्रमेयसुभगां ब्राह्मीं महावाग्भवे८ विश्वोत्तीर्णमहा९प्रकाशवपुषं शक्तिं च१० नैसर्गिकीम् । अब आन्तर पूर्णाहूति का विवरण देते हैं— मन्त्ररूपी अरणि के मथन के उद्रेक से उत्पन्न प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण की सामरस्य वस्तुरूप महाहवि को उन्मनी नाम की स्रुचा में रखकर उसकी बार-बार आहुति दे और इस तरह से साधक सहजानन्द से परिपूर्ण हो जाय ।।१०७-१०८।। सुभगोदयवासना में शिवानन्द मुनि ने कहा है— भलीभांति शोधित होने से अमृतस्वरूप वस्तुओं के अर्पण और तर्पण से, हवि का स्वरूप धारण करने वाले इस सारे विश्व को मैं अपनी महाहन्ता में विलीन कर दे रहा हूँ ।। इसके अनुसार अहन्ता का अर्थ प्रमाता, इदन्ता का अर्थ प्रमेय और इनके ऐक्य का नाम प्रमाण होगा । इन तीनों की सामरस्य स्थिति का वर्णन किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने इस तरह से किया है— महावाग्भव त्रिकोण में सृष्टिकर्त्री ब्राह्मी शक्ति के रूप में इस विश्वरूपी प्रमेय पदवी में प्रविष्ट होने वाली, विश्वोत्तीर्ण अवस्था में महाप्रकाश और उसकी स्वाभाविक विमर्श शक्ति के रूप में प्रमाता पदवी में स्थित रहने वाली, प्रमाण पदवी की तरफ बढ़ने पर १. मनीस्रु-ख. ने. च. छ. ज. झ. । २. चैव-च. छ. ज. झ. उ. । ३. नैदानैरिति सार्वत्रिको दी० पाठः । ४. मदहन्तां-क. ग., समाहन्तां-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. पुरः- सरम्-क. ग. । ६. स्वरूपम्-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. वर-ज. झ., लसत्-ख., बसत्-ने. ब. उ. । ८. वैभवैः-ख. ब. उ., भूसरैः-ज., भूभवैः-झ. । ९. प्रमातृ- वपुषः-ख. ने. ज. झ. ब. उ. । १०. तु-ख. ने. ज. झ. ब. उ. ।

२९८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः प्रामाण्यं १प्रवणत्रिशक्तिखचिता २मध्युष्टचातुर्दशीं ३संवित्यर्कसमिद्धवस्तुभरितो मथ्नामि ४मन्त्रारणिम् ॥ इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या मन्त्रारणिमथनोद्रेकसम्भूतं तत्त्रितयसमष्टि- रूपम्५। वस्तुरूपम्, वस्तु ६द्रव्यम्, तद्रूपम् । तदुक्तं मुख्याम्नायक्रमे—“स्वीकुर्यात् सततं वस्तु यदानन्दसुखं भवेत्” इति । महाहविः। यस्मिन् हुते स्वप्रमेयक्षणे हविषि प्रमातृलक्षणं ज्योति७रनवरतं प्रज्वलति, तन्महाहविः। पूर्णाहूतिहोमे८ उन्मन्यां स्रुचि कल्पितम्। उन्मनी नाम९ पूर्वोक्त(१।३४)लक्षणा, सा स्रुगिच्युते, तस्यां स्रुचि, तन्मयेनामृतेनापूर्य पूर्णाहूतिं जुहुयात् । एवंग्रूपं हविर्हुत्वा । आनन्दं ब्रह्मणो रूपं तच्च देहे१० प्रतिष्ठितम् । तस्याभिव्यञ्जकं द्रव्यं११ योगिभिस्तेन पीयते ॥ तीन शक्तियों का स्वरूप धारण करने वाली और फिर इन सबकी सामरस्यमयी तुरीया स्थिति में रहने वाली मन्त्ररूपी अरणि को मैं ज्ञानरूपी सूर्य के प्रकाश से परिपूर्ण हो मथता हूँ ॥ इसके अनुसार मन्त्र रूपी अरणि के मथन की चरम स्थिति में प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण की समरस दशा का उन्मीलन होता है । मुख्याम्नायक्रम में इसी के लिये कहा गया है—“साधक उसी वस्तु का ग्रहण करे, जिससे ब्रह्मानन्द सहोदर सुख की उत्पत्ति हो”। इसी को महाहवि कहते हैं। प्रमेय स्वरूप हवि की आहुति दे देने पर प्रमातृ स्वरूप ज्योति ही निरन्तर जलती रहती है, अतः इसी को महाहवि कहा जाता है। यह पूर्णाहूति होम इसी आहुति से सम्पन्न होता है । इस आहुति को उन्मनी रूपी स्रुचा में रखकर दिया जाता है । उन्मनी का स्वरूप पहले (१।३४) बताया जा चुका है । इस उन्मनी रूप स्रुचा में ऊपर बताये गये सामरस्य समुद्भूत अमृत को भर कर पूर्णाहूति दे । इसकी आहुति देने के बाद— आनन्द ब्रह्म का ही स्वरूप है । यह आनन्द इसी शरीर में छिपा हुआ है । इसका अभिव्यंजक द्रव्य (मद्य) है । इसी लिये योगी इसका पान करते हैं ॥ १. प्रणयेन श-क. ने. ज. झ. ब. उ. । २. तां मध्ये तु-क. ग., मध्युष्टचान्तर्दिशो- ज. । ३. संवित्पाकसुसिद्ध-ब. उ. । ४. तन्त्रा-क. ग. झ. उ. । ५. 'रूपम्' नास्ति-ख. ज. । ६. मद्यम्-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. निरन्तरं-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. होमः-क. ग. ज. । ९. नाम समनोर्ध्वे निरस्तकालकलाक्रियादिका पू-क. ग. । १०. मोक्षे-ख. ने. ज. झ. उ. । ११. मद्यं-ने. ज. उ., हव्यं-ज. ।

तृतीयः ] दीपिकानुवादसहितम् २९९ इति प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या यावदानन्दाविर्भावो भवति ^१तावदिति वीप्सार्थः । स्वयं चैव सहजानन्दविग्रहः । मद्याद्यनुभवेन कृत्रिमानन्दजृम्भणान्महा- नन्दानुसन्धानात् तन्मयो भवेदिति । तदुक्तं विज्ञानभैरवभट्टारकैः— जग्धिपानकृतोल्लासरसानन्दविजृम्भणात् । भावयेद् भरितावस्थां महानन्दस्ततो भवेत् ॥ इति । (वि० भै०, श्लो ७१) कोऽर्थः ? मन्त्रारणिमथनसंभूतमिदन्ताहन्तासामरस्य^२मयवस्तुरूपघृतपूर्णाहुतिं बहुशो हुत्वा परिस्फुरत्परमानन्दो भवेदित्यान्तरपूर्णाहुतिः ॥१०७-१०८॥ अत एव— प्रविष्टेऽन्तः सीधुरसे भेदनिर्हरणात्मके । स्थैर्यमेति चमत्कारो विना विषयसंगतिम्^३ ॥ किसी ^१प्रामाणिक व्यक्ति के इस वचन के अनुसार जब तक आनन्द की अभिव्यक्ति न हो जाय, तब तक यह पूर्णाहुति बार-बार दी जाती है। ऐसा करने से साधक सहज आनन्द से परिपूर्ण हो जाता है। मद्य आदि के सेवन से कृत्रिम आनन्द अभिव्यक्त होता है। इसमें महानन्द का अनुसन्धान करने पर योगी महानन्द से परिपूर्ण हो जाता है। विज्ञानभैरव भट्टारक की यह उक्ति इसमें प्रमाण है— जग्धि और पान के कारण अभिव्यक्त उल्लास, रस और आनन्द की स्थिति से साधक अपनी आत्मा को परिपूर्ण समझे । इससे उसमें ब्रह्मानन्द सहोदर महानन्द अभि- व्यक्त हो उठता है ॥ इसका भाव यह है कि मन्त्रारणि का मथन करने से इदन्ता और अहन्ता के सामरस्य स्वरूप जिस द्रव्य की उत्पत्ति होती है, उसी से यह पूर्णाहुति बार-बार दी जाती है। योगी ऐसा करते समय जब परमानन्द से परिपूर्ण हो जाता है, तो समझना चाहिये कि यह आन्तर पूर्णाहुति परिपूर्ण हो गई ॥१०७-१०८॥ इसी लिये—"भेददृष्टि को दूर भगा देने वाले सीधुरस के भीतर प्रवेश करने के साथ ही विषयों का सम्पर्क हुए बिना ही चमत्कार, अर्थात् सहजानन्द स्थिर हो जाता १. 'तावदिति''''भवेदिति' एष पाठः केवलं झ. मातृकायां दृश्यते । २. रस्यरूपं मद्यरूपं घृत-क. ग. ने. । ३. संगमात्-ख. ने. ज. झ. उ. । १. यह श्लोक कुलार्णवतन्त्र (५।८०) में भी मिलता है, किन्तु दीपिकाकार इसको भी प्रामाणिक वचन मानते हैं। बौद्ध तान्त्रिक विद्वान् अद्वयवज्र इसके पूर्वार्ध को वेदान्त- वादी का वचन कह कर उद्धृत करते हैं। देखिये—अद्वयवज्रसंग्रह, पृ० २९, तत्त्वप्रकाश के टीकाकार कुमार (पृ० ९) भी इसको श्रुतिवचन मानते हैं।

३०० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इति क्रमोदयोक्तरीत्या 'मनसि स्थिरीभूते बाह्यचक्रार्चनं कुर्यादित्याह- स्वप्रथाप्रसराकारं श्रीचक्रं पूजयेत् सुधीः ॥१०८॥ सुधीः सीधुरसपानेनानन्यविषयासक्तः २स्वसंविन्मात्रस्थिरमनाः। मनसि स्थिरे सति धारणा स्थिरा, तस्यां स्थिरायां "तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्" (३।२) इति योगपातञ्जलशास्त्रोक्तरीत्या४ प्रत्ययैकतानतालक्षणं ध्यानं भवति। विना ध्यानं पूजा निष्फला भवति। अथादावमृतीकृतमासवं शिवादिभ्यो गुरुभ्यो५ निवेद्य स्वात्माग्नौ हुत्वा प्रज्वलत्परमानन्दस्थिरधीर्भूयादित्यर्थः। ६स्वप्रथाप्रसरा- कारः स्वप्रथा स्वसंवित् तस्या बहिरर्थेष्विन्द्रियद्वारा प्रसरो व्यापारः, ७तदात्मना स्फुरणम्। ततस्तदाकारं श्रीचक्रं पूजयेत्। श्रीचक्रं८ नाम नान्यत् किञ्चित्, अपि तु स्वसंविद्देवतायाः प्रसररूपाऽन्तःकरणचतुष्टयाव्यक्तमहदहङ्कृतितन्मात्रदशे- है" क्रमोदय के इस वचन के अनुसार मन के स्थिर हो जाने पर बाह्य चक्र की पूजा करे, इस विषय का अब यहाँ वर्णन किया जा रहा है— विद्वान् साधक मन के स्थिर हो जाने पर अपनी आन्तर संवित् के ही बाह्य आकार वाले श्रीचक्र की पूजा करे ॥१०८॥ सुधी शब्द का अर्थ यहाँ है—सीधु रस के पान से जिसका मन अन्य किसी बाहरी विषय में आसक्त नहीं है, अपने संवित्स्वरूप में जो प्रतिष्ठित हो गया है। मन के स्थिर होने से धारणा स्थिर हो जाती है और धारणा के स्थिर होने पर ध्यान भी स्थिर हो जाता है। पातंजल योगसूत्र में प्रत्यय की एकतानता का नाम ध्यान बताया गया है। बिना ध्यान के पूजा निष्फल होती है। इसी लिये पहले यहाँ अमृतीकृत आसव को शिव (भैरव), गुरु आदि को निवेदित कर अपनी कामाग्नि में भी उसकी आहुति दी जाती है। इससे परमानन्द की अभिव्यक्ति होती है और उसी में साधक का मन स्थिर हो जाता है। स्वप्रथा का अर्थ है अपनी संवित्, उसका इन्द्रिय मार्ग से जब बाहरी अर्थों में प्रसार होता है, व्यापार चलता है, तो विश्वाकार में यह संवित् बदल जाती है। श्रीचक्र इसी का परिणाम है। श्रीचक्र और कुछ नहीं है, किन्तु अपनी संविद् देवता ही बाहर फैलते समय अन्तःकरण-चतुष्टय, अव्यक्त, महत्, अहङ्कार, तन्मात्रा, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, इनकी वृत्तिय । १. मनःस्थैर्ये जायते चेच्चक्रा-ख. ने. ज. ड. । २. स्वप्रथा-क. ग. । ३. स्वयं चिन्मात्र-ख. ने. ज. ड. । ४. 'रीत्या' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. भ्यः शिवाभ्यां च-क. ख. ग. । ६. स्वप्रत्रा-क. ग. । ७. तत आत्मनः-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. 'श्रीचक्रं नाम' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३०१ न्द्रिय१तद्वृत्तितद्विषयतत्पुर्यष्टकषोडशविकारधातुप्रपञ्च एव२ श्रीचक्रात्मना स्फुर३त्येतावत् ॥१०८॥ श्रीचक्रपूजामाह "गणेशम्" इत्यादिना "चक्रपूजां विधाय" (३।१६८) इत्यन्तेन— गणेशं दूतरौं चैव क्षेत्रेशं दूतिकां तथा। बाह्यद्वारे यजेद् देवि देवीश्च स्वस्तिकादिकाः ॥१०९॥ श्रीचक्रद्वारशाखयोर्गणेशं तच्छक्तिं दूतरों क्षेत्रेशं बटुकाख्यं तच्छक्तिं दूतिकां च यजेत्। तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्— द्वैताद्वैतमहामोहशर्वरीक्षपणक्षमः। भास्वानिव जयत्येको गणेशो दूतरीयुतः॥ प्रतिभायाः परोल्लासो निशाकर इवापरः। दूतीयुक्तः स जयति बटुकस्ताण्डवान्वितः ॥ इति। बाह्यद्वारे श्रीचक्रद्वारबाह्यप्रदेशे, स्वस्तिकादिका४ देवीः सरस्वतीश्रीदुर्गाभद्र- काल्यश्चतस्रः। स्वस्तिका आदिर्यासामिति समासः। स्वाहाशुभङ्करीगौरोलोक- इनके विषय, पुर्यष्टक, सोलह विकार पर्यन्त इस समस्त विश्वप्रपंच का स्वरूप धारण कर कर लेती है और इसी का नाम श्रीचक्र है ॥१०८॥ अब यहाँ १०९ से १६८ पर्यन्त श्लोकों में श्रीचक्र की पूजाविधि बताई जा रही है— हे देवि ! श्रीचक्र के बाह्य द्वार पर गणेश, दूतरी, क्षेत्रेश तथा दूतिका और स्वस्तिका आदि देवियों की पूजा करें ॥१०९॥ श्रीचक्र के द्वार की दोनों तरफ गणेश और उसकी शक्ति दूतरी की तथा क्षेत्रेश (बटुक) और उसकी शक्ति दूतिका की पूजा करे। संकेतपद्धति में बताया गया है— द्वैत और अद्वैत की महामोह रूपी रात्रि के घने अन्धकार का, अज्ञान का नाश करने में एकमात्र गणेश ही अपनी शक्ति दूतरी के साथ सूर्य के समान समर्थ हैं। उनकी जय हो। प्रतिभा का जहाँ परम उत्कर्ष हुआ है, चन्द्रमा के समान जो आलोक से परि- पूर्ण हैं, ताण्डव नृत्य में रत, अपनी शक्ति दूती के साथ विराजमान बटुकभैरव की जय हो॥ श्रीचक्र के द्वार के बाहर स्वस्तिका, सरस्वती, श्री, दुर्गा और भद्रकाली तथा स्वाहा, शुभङ्करी, गौरी, लोकधात्री और वागीश्वरी इन पाँच पाँच देवियों की भगवती १. 'तद्वृत्ति' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.। २. 'एव' नास्ति-ख. ज. उ.। ३. रतीत्येव-ख. ज. उ., रतीति-झ.। ४. काद्या देव्यः-ख. ने. ज. झ. उ.।

७२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः धात्रीवागीश्वर्यश्च पञ्च। एतास्ताश्च देवीर्गायिका यजेत्। तत्प्रसिद्धं पद्धतिषु ॥१०९॥ ततश्चान्तस्त्रिकोणेऽपि गुरुपङ्क्तिं त्रिधा स्थिताम्। ततस्तस्य श्रीचक्रस्य अन्तस्त्रिकोणे त्रिधा स्थितां दिव्यसिद्धमानवौघत्रयवतीं गुरुपङ्क्तिं शिवादिस्वगुरुपर्यन्तानां गुरूणां पङ्क्तिः परम्परा ताम्। अपिशब्दाद् यजेदित्यनुषङ्गः। गुरुपरम्परा गुरुमुखादेव ज्ञातव्या, न लोकतः। न च पुस्तके१ लिखिता, अत्यन्तरहस्यत्वात् ॥ तदन्तश्च महादेवीं तामावाह्य यजेत् पुनः ॥११०॥ महापद्मवनान्तस्थां कारणानन्दविग्रहाम्। मदङ्कोपाश्रयां देवीमिच्छाकामफलप्रदाम् ॥१११॥ भवतीं तदन्तः श्रीचक्रस्य ३मध्ये बैन्दवाख्ये चक्रे। तां महापद्मवनान्तस्थाम् 'महा- पद्मवनान्तस्थे वाग्भवे गुरुपादुकाम्' (३।५) इत्यत्रोपपादितरूपाम्४। अकुला- त्रिपुरसुन्दरी की गायिकाओं के रूप में पूजा करे। यह सारा विषय पद्धति-ग्रन्थों में प्रसिद्ध है ॥१०९॥ तब श्रीचक्र के मध्यत्रिकोण में त्रिधा स्थित गुरुपंक्ति की पूजा करे ॥ इसके बाद श्रीचक्र के अन्दर बीच में विद्यमान त्रिकोण में दिव्य, सिद्ध और मान- वौघ के क्रम से तीन भागों में विभक्त गुरुपंक्ति की, शिव से लेकर अपने गुरु तक चली आई गुरुपरम्परा की भी पूजा करे। त्रिधा विभक्त इस गुरुपरम्परा का ज्ञान अपने गुरु के मुँह से ही प्राप्त करना चाहिये। लौकिक परम्परा से इसका ज्ञान नहीं हो सकता। यह परम्परा अत्यन्त गोपनीय होने से १पुस्तक में भी नहीं लिखी जाती ॥ उस त्रिकोण रूपी महापद्मवन में विराजमान, कारणानन्द शरीरवाली इच्छा- नुसार सभी कामनाओं को पूरा करने वाली, मेरे अंक में विराजमान महादेवी त्रिपुरसुन्दरी का आवाहन कर पूजन करे ॥११०-११२॥ 'महापद्मवनान्तस्थ' पद की व्याख्या पहले (३।५) की जा चुकी है। तदनुसार श्रीचक्र के मध्य में स्थित त्रिकोणान्तर्गत बैन्दव चक्र में विद्यमान अकुल नाम का अधोमुख १. केषु-झ.। २. श्रितां-क. ग.। ३. श्रीचक्रमध्यबैन्द-ख. ने. ज. झ. उ.। ४. रूपकुलाधोमुखसहस्रदलकमलमहापद्मवनमध्यस्थाम्-ख. ने. ज. झ उ.। १. हादि और कादि विद्या की दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ गुरुपरम्परा ऋजु- विमर्शिनी (पृ० २१८-२२४), अर्थरत्नावली (पृ० २१८-२२५), ज्ञानदीपविमर्शिनी (दीक्षा प्रकरण) और सौभाग्यसुभगोदय (पृ० ३१८-३२०) में देखी जा सकती है।