अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
१५८ अध्यात्मरामायण [सर्ग १
क्षणार्धमपि यच्चित्तं त्वयि तिष्ठत्यचञ्चलम् । तस्याज्ञानमनर्थानां मूलं नश्यति तत्क्षणात्॥८२॥ तत्तिष्ठतु मनो राम त्वयि नान्यत्र मे सदा ॥८३॥ रामरामेति यद्वाणी मधुरं गायति क्षणम् । स ब्रह्महा सुरापो वा मुच्यते सर्वपातकैः ॥८४॥ न काङ्क्षे विजयं राम न च दारसुखादिकम् । भक्तिमेव सदा काङ्क्षे त्वयि बन्धविमोचनीम्॥८५॥ त्वन्मायाकृतसंसारस्त्वदंशोऽहं रघूत्तम । स्वपादभक्तिमादिश्य त्राहि मां भवसङ्कटात्॥८६॥ पूर्वं मित्रार्युदासीनास्त्वन्मायाऽऽवृतचेतसः । आसन्मेऽद्य भवत्पाददर्शनादेव राघव ॥८७॥ सर्वं ब्रह्मैव मे भाति क्व मित्रं क्व च मे रिपुः । यावत्त्वन्मायया बद्धस्तावद्गुणविशेषता ॥८८॥ सा यावदस्ति नानात्वं तावद्भवति नान्यथा । यावन्नानात्वमज्ञानात्तावत्कालकृतं भयम् ॥८९॥ अतोऽविद्यामुपास्ते यः सोऽन्धे तमसि मज्जति । मायामूलमिदं सर्वं पुत्रदारादिबन्धनम् । तदुत्सारय मायां त्वं दासीं तव रघूत्तम ॥९०॥ त्वत्पादपद्मर्पितचित्तवृत्ति- स्त्वन्नामसङ्गीतकथासु वाणी । त्वद्भक्तसेवानिरतौ करौ मे त्वदङ्गसङ्गं लभतां मदङ्गम् ॥९१॥ त्वन्मूर्तिभक्तान् स्वगुरुं च चक्षुः पश्यत्वजस्रं स शृणोतु कर्णः ।
जिसका चित्त आपके स्वरूपमें आधे क्षणके लिये भी निश्चल होकर संलग्न हो जाता है उसका सम्पूर्ण अनर्थोंका मूलकारण अज्ञान तत्काल नष्ट हो जाता है, अतः हे राम ! मेरा मन सदा आपहीमें लगा रहे, वह आपको छोड़कर और कहीं भी न जाय ॥८२-८३॥ जिसकी वाणी एक क्षण भी 'राम-राम' ऐसा सुमधुर गान करती है, वह ब्रह्मघाती अथवा मद्यपी भी क्यों न हो, समस्त पापोंसे छूट जाता है ॥८४॥ हे राम! अब मुझे वालीको जीतने अथवा स्त्री आदिका सुख प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं है। मैं तो संसार-बन्धनको काटनेवाली आपकी भक्ति ही चाहता हूँ ॥८५॥ हे रघुश्रेष्ठ ! यह संसार आपकी मायाका विलास है और मैं भी आपहीका अंश हूँ। अतः अपने चरणकमलोंकी भक्ति देकर मुझे इस संसार-संकटसे बचाइये ॥८६॥ पहले, जब मेरा चित्त आपकी मायासे ढँका हुआ था, मुझे अपने शत्रु-मित्र और उदासीन दिखायी देते थे। किन्तु हे रघुनाथजी ! अब आपके चरणकमलोंका दर्शन पाते ही मुझे सब कुछ ब्रह्मरूप ही भासता है। प्रभो ! संसारमें मेरा कौन मित्र है और कौन शत्रु ? जबतक जीव आपकी मायासे बँधा रहता है तभीतक उसपर सत्त्वादि गुणोंका प्रभाव पड़ता रहता है ॥८७-८८॥ जबतक मायाका प्रभाव रहता है तभी-तक शत्रु-मित्रादि भेद-भाव रहता है। उसके दूर होते ही समस्त भेद-भाव दूर हो जाता है। और जबतक यह अज्ञानजन्य भेद-भाव रहता है तभीतक मृत्युका भय है ॥८९॥ इसलिये जो पुरुष अविद्याकी उपासना करता है (अर्थात् अविद्याजन्य पदार्थोंकी कामना करता है) वह घोर अन्धकारमें पड़ता है। ये पुत्र-स्त्री आदि सम्पूर्ण बन्धन मायामय ही हैं अतः हे रघुश्रेष्ठ ! अपनी दासीरूप इस मायाको हमसे दूर कीजिये ॥९०॥ प्रभो ! मेरी चित्तवृत्ति सदा आपके चरणकमलोंमें लगी रहे, वाणी आपके नामसंकीर्तन और कथा-वार्तामें लगी रहे, हाथ आपके भक्तोंकी सेवामें लगे रहें और मेरा शरीर (आपके पाद-स्पर्श आदिके मिससे) सदा आपका अङ्गसङ्ग करता रहे ॥९१॥ मेरे नेत्र सर्वदा आपकी मूर्ति, आपके भक्त और अपने गुरुका दर्शन करते रहें, कान निरन्तर आपके अवतारोंकी लीलाओंका श्रवण करें
किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग २: वालीका वध और भगवान्के साथ उसका सम्भाषण
| सर्ग २ ] | किष्किन्धाकाण्ड | १५९ |
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त्वज्जन्मकर्माणि च पादयुग्मं<br> व्रजत्वजस्रं तव मन्दिराणि ॥९२॥<br>अङ्गानि ते पादरजोविमिश्र-<br> तीर्थानि बिभ्रत्वहिशत्रुकेतो।<br>शिरस्त्वदीयं भवपद्मजाद्यै-<br> र्जुष्टं पदं राम नमत्वजस्रम् ॥९३॥ | और मेरे पैर सदा आपके मन्दिरोंकी यात्रा करते रहें ॥ ९२ ॥ हे गरुडध्वज ! मेरा शरीर आपकी चरण-रजसे युक्त तीर्थोदकको धारण करे और मेरा शिर निरन्तर आपके उन चरणोंमें प्रणाम किया करे जिनकी शिव और ब्रह्मा आदि देवगण भी सदैव सेवा करते हैं" ॥ ९३ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे किष्किन्धाकाण्डे<br>प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
द्वितीय सर्ग
वालीका वध और भगवान्के साथ उसका सम्भाषण।
श्रीमहादेव उवाच|श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! इस प्रकार अपने संसर्गसे जिसके सब पाप दूर हो गये हैं उस सुग्रीवकी ओर देखते हुए श्रीरघुनाथजी कार्य सिद्ध करनेके लिये उसपर अपनी मोह उत्पन्न करनेवाली मायाका विस्तार करते हुए मुसका कर बोले—"मित्र ! तुमने मुझसे जो कुछ कहा है वह निस्सन्देह सब ठीक है ॥१-२॥ तथापि (यदि तुम राज्यादिसे उपराम हो जाओगे तो) लोग मेरेलिये कहेंगे कि रघुनाथजीने वानरराज सुग्रीवसे अग्निको साक्षी बनाकर मित्रता की; किन्तु उन्होंने उसका कौन-सा काम सिद्ध किया ? ॥ ३ ॥ इस प्रकार लोगोंमें मेरी निन्दा होगी इसमें सन्देह नहीं। अतः तुम्हारा कल्याण हो, तुम अभी जाकर वालीको युद्धके लिये ललकारो ॥ ४ ॥ मैं उसे एक ही वाणसे मारकर तुम्हें राजपदपर अभिषिक्त कर दूँगा ।" तब सुग्रीव 'बहुत अच्छा' कह तुरन्त ही किष्किन्धापुरीके उपवनमें गया और अति घोर शब्दसे गरजकर वालीको युद्धके लिये पुकारा । इत्थं स्वात्मपरिष्वङ्गनिर्धूताशेषकल्मषम् ।| रामः सुग्रीवमालोक्य सस्मितं वाक्यमब्रवीत् ॥१॥| मायां मोहकरीं तस्मिन्वितन्वन् कार्यसिद्धये ।| सखे त्वदुक्तं यत्तन्मां सत्यमेव न संशयः ॥ २ ॥| किन्तु लोका वदिष्यन्ति मामेवं रघुनन्दनः ।| कृतवान्किं कपीन्द्राय सख्यं कृत्वाऽग्निसाक्षिकम् ३| इति लोकापवादो मे भविष्यति न संशयः ।| तस्मादाह्वय भद्रं ते गत्वा युद्धाय वालिनम्॥ ४॥| बाणेनैकेन तं हत्वा राज्ये त्वामभिषेचये ।| तथेति गत्वा सुग्रीवः किष्किन्धोपवनं द्रुतम् ॥५॥| कृत्वा शब्दं महानादं समाह्वयत वालिनम् ।| तच्छ्रुत्वा भ्रातृनिनदं रोषताम्रविलोचनः ॥ ६॥|भाईका सिंहनाद सुनते ही वालीके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वह तत्काल अपने घरसे निकलकर वानरराज सुग्रीवके पास आया। उसके आते ही सुग्रीवने तुरन्त उसके वक्षःस्थलमें प्रहार किया ॥५–७॥ इसपर वालीने भी क्रोधातुर होकर सुग्रीवपर अपने दोनों घूँसोंसे प्रहार किया और सुग्रीवने वालीपर आक्रमण किया । इस प्रकार वे दोनों ही अति क्रोध- निर्जगाम गृहाच्छीघ्रं सुग्रीवो यत्र वानरः ।| तमापतन्तं सुग्रीवः शीघ्रं वक्षस्यताडयत् ॥ ७॥| सुग्रीवमपि मुष्टिभ्यां जघान क्रोधमूर्च्छितः ।|
| १६० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग २ |
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वाली तमपि सुग्रीव एवं क्रुद्धौ परस्परम् ॥ ८ ॥
अयुद्धेतामेकरूपौ दृष्ट्वा रामोऽतिविस्मितः ।
न मुमोच तदा बाणं सुग्रीववधशङ्कया ॥ ९ ॥
ततो दुद्राव सुग्रीवो वमन् रक्तं भयाकुलः ।
वाली स्वभवनं यातः सुग्रीवो राममब्रवीत् ॥ १० ॥
किं मां घातयसे राम शत्रुगा भ्रातृरूपिणा ।
यदि मद्हनने वाञ्छा त्वमेव जहि मां विभो ॥ ११ ॥
एवं मे प्रत्ययं कृत्वा सत्यवादिन् रघूत्तम ।
उपेक्षसे किमर्थं मां शरणागतवत्सल ॥ १२ ॥
श्रुत्वा सुग्रीववचनं रामः साश्रुविलोचनः ।
आलिङ्ग्य मास्म भैषीस्त्वं दृष्ट्वा वामेकरूपिणौ ॥ १३ ॥
मित्रघातित्वमाशङ्क्य मुक्तवान्सायकं नहि ।
इदानीमेव ते चिह्नं करिष्ये भ्रमशान्तये ॥ १४ ॥
गत्वाऽऽह्वय पुनः शत्रुं हतं द्रक्ष्यसि वालिनम् ।
रामोऽहं त्वां शपे भ्रातर्हनिष्यामि रिपुं क्षणात् ॥ १५ ॥
इत्याश्वास्य स सुग्रीवं रामो लक्ष्मणमब्रवीत् ।
सुग्रीवस्य गले पुष्पमालामामुच्य पुष्पिताम् ॥ १६ ॥
प्रेषयस्व महाभाग सुग्रीवं वालिनं प्रति ।
लक्ष्मणस्तु तदा बद्ध्वा गच्छ गच्छेति सादरम् ॥ १७ ॥
प्रेषयामास सुग्रीवं सोऽपि गत्वा तथाऽकरोत् ।
पुनरप्यद्भुतं शब्दं कृत्वा वालिनमाह्वयत् ॥ १८ ॥
तच्छ्रुत्वा विस्मितो वाली क्रोधेन महता वृतः ।
बद्ध्वा परिकरं सम्यग्गमनायोपचक्रमे ॥ १९ ॥
गच्छन्तं वालिनं तारा गृहीत्वा निषिषेध तम् ।
पूर्वक एक-दूसरेसे लड़ने लगे। उन दोनोंका रूप ऐसा समान था कि श्रीरामचन्द्रजी उन्हें देखकर आश्चर्य-चकित हो गये (और उनमेंसे कौन वाली है तथा कौन सुग्रीव ? यह न पहचान सके)। अतः इस आशंकासे कि कहीं सुग्रीव न मारा जाय, बाण नहीं छोड़ा ॥ ८-९ ॥
अन्तमें सुग्रीव भयातुर होकर रक्त वमन करता हुआ दौड़ा और वाली अपने घर चला गया। तब सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— ॥ १० ॥ "हे राम ! क्या आप इस भ्रातारूपी शत्रुसे मुझे मरवाना चाहते हैं। हे प्रभो ! यदि आपकी इच्छा मुझे मरवानेकी ही है तो आप स्वयं ही मार डालिये ॥ ११ ॥ हे सत्यवादी शरणागतवत्सल रघुनाथजी ! मुझे इस प्रकार विश्वास दिलाकर अब आप मेरी उपेक्षा क्यों करते हैं?" ॥ १२ ॥
सुग्रीवके ये वचन सुनकर रामचन्द्रजीने उसे हृदयसे लगा लिया और नेत्रोंमें जल भरकर कहा—"भैया ! डरो मत, तुम दोनोंको एक रूप देखकर मैंने इस भयसे कि कहीं मित्रका वध न हो जाय, बाण नहीं छोड़ा। अब इस भ्रमको दूर करनेके लिये मैं तुम्हारे शरीरमें कोई चिह्न कर दूँगा ॥ १३-१४ ॥ एक बार तुम फिर जाकर अपने शत्रुको पुकारो। अबकी बार तुम वालीको अवश्य मरा हुआ देखोगे। भैया ! मैं राम तुम्हारी शपथ करके कहता हूँ कि इस बार मैं अवश्य एक क्षणमें ही तुम्हारे शत्रुको मार डालूँगा" ॥ १५ ॥
सुग्रीवको इस प्रकार ढाँढ़स बँधाकर श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! सुग्रीवके गलेमें एक फूले हुए पुष्पोंकी माला डाल दो ॥ १६ ॥ और हे महाभाग ! इसे वालीसे लड़नेके लिये भेज दो।" तब लक्ष्मणजीने सुग्रीवके गलेमें पुष्पमाला बाँधकर उससे आदरपूर्वक 'भाई जाओ, जाओ' ऐसा कहकर भेज दिया। सुग्रीवने भी वहाँ पहुँचकर पहलेकी भाँति ही फिर बड़ा विचित्र शब्द करते हुए वालीको पुकारा ॥ १७-१८ ॥
सुग्रीवका शब्द सुनकर वालीको बड़ा विस्मय और साथ ही अत्यन्त क्रोध हुआ और वह अपनी कमर कसकर चलनेके लिये तैयार हो गया ॥ १९ ॥ जाते समय
| सर्ग २ ] | ·किष्किन्धाकाण्ड | १६१ |
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| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| न गन्तव्यं त्वयेदानीं शङ्का मेऽतीव जायते ॥२०॥<br><br>इदानीमेव ते भग्नः पुनरायाति सत्वरः।<br>सहायो बलवांस्तस्य कश्चिन्नूनं समागतः ॥२१॥<br><br>वाली तामाह हे सुभ्रु शङ्का ते व्येतु तद्गता ।<br>प्रिये करं परित्यज्य गच्छ गच्छामि तं रिपुम् ॥२२॥<br><br>हत्वा शीघ्रं समायास्ये सहायस्तस्य को भवेत् ।<br>सहायो यदि सुग्रीवस्ततो हत्वोभयं क्षणात् ॥२३॥<br><br>आयास्ये मा शुचः शूरः कथं तिष्ठेद्गृहे रिपुम्।<br>ज्ञात्वाऽप्याह्वयमानं हि हत्वाऽऽयास्यामि सुन्दरि ॥<br><br>तारोवाच<br>मत्तोऽन्यच्छृणु राजेन्द्र श्रुत्वा कुरु यथोचितम् ।<br>आह मामङ्गदः पुत्रो मृगयायां श्रुतं वचः ॥२५॥<br><br>अयोध्याधिपतिः श्रीमान् रामो दाशरथिः किल<br>लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया भार्यया सह ॥२६॥<br><br>आगतो दण्डकारण्यं तत्र सीता हृता किल ।<br>रावणेन सह भ्रात्रा मार्गमाणोऽथ जानकीम् ॥२७॥<br><br>आगतो ऋष्यमूकाद्रिं सुग्रीवेण समागतः ।<br>चकार तेन सुग्रीवः सख्यं चानलसाक्षिकम् ॥२८॥<br><br>प्रतिज्ञां कृतवान् रामः सुग्रीवाय सलक्ष्मणः।<br>वालिनं समरे हत्वा राजानं त्वां करोम्यहम् ॥२९॥<br><br>इति निश्चित्य तौ यातौ निश्चितं शृणु मद्वचः।<br>इदानीमेव ते भग्नः कथं पुनरुपागतः ॥३०॥<br><br>अतस्त्वं सर्वथा वैरं त्यक्त्वा सुग्रीवमानय ।<br>यौवराज्येऽभिषिञ्चाशु रामं त्वं शरणं व्रज ॥३१॥<br>२१ | उसकी स्त्री ताराने उसका हाथ पकड़कर रोका और कहा—"देव ! इस समय आप न जाइये, मेरे हृदयमें बड़ी शंका हो रही है ॥२०॥ यह अभी-अभी आपसे मार खाकर भागा था, तो भी तुरन्त ही लौट आया ! इससे मालूम होता है कि अवश्य ही इसे कोई बलवान् सहायक मिल गया है" ॥२१॥<br><br>वालीने कहा—"हे सुन्दर भृकुटिवाली ! तुम इस विषयमें कोई शंका न करो। हे प्रिये ! मेरा हाथ छोड़कर तुम घर लौट जाओ, मैं भी अभी जाकर उस शत्रुको मारकर लौट आता हूँ। उस (अभागे) को भला कौन सहायक मिलेगा ? और यदि कोई होगा भी, तो मैं एक क्षणमें ही दोनोंको मारकर आ जाऊँगा । हे सुन्दरि ! तुम किसी प्रकारकी चिन्ता न करो। (मैं इस समय रुक नहीं सकता) शत्रुको बाहरसे युद्धके लिये ललकारता हुआ जानकर कोई शूरवीर अपने घरमें कैसे ठहर सकता है ? अतः अब मैं उसे मारकर ही लौटूंगा” ॥ २२—२४॥<br><br>तारा बोली—हे राजेन्द्र ! आप मुझसे कुछ और भी वृत्तान्त सुन लीजिये । उसे सुनकर जो उचित समझें करें। मुझसे आपके पुत्र अंगदने मृगयाके समय (वनमें) सुनी हुई यह बात कही थी ॥ २५ ॥ कि अयोध्याधिपति दशरथनन्दन भगवान् रामचन्द्रजी अपने भाई लक्ष्मण और भार्या सीताके सहित दण्डकारण्यमें आये थे। वहाँ उनकी प्रिया सीताको रावण हर ले गया। अब वे अपने भाईके सहित जानकी-जीको ढूँढ़ते हुए ऋष्यमूक-पर्वतपर आकर सुग्रीवसे मिले हैं। वहाँ सुग्रीवने उनसे अग्निको साक्षी कर मित्रता जोड़ी है ॥ २६-२८ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीके सहित सुग्रीवसे यह प्रतिज्ञा की है कि मैं युद्धमें वाली-को मारकर तुम्हें राजा बना दूँँगा ॥ २९ ॥ इसी निश्चयको लेकर वे दोनों भी (उसके साथ) आये हैं; मेरी यह बात सच मानिये, नहीं तो अभी-अभी आपसे मार खाकर भागा हुआ वह कैसे लौट आता ? ॥ ३० ॥ इसलिये अब आप सर्वथा सुग्रीवसे वैरभाव छोड़कर उसे ले आइये और उसे तुरन्त युवराजपदपर अभिषिक्त कर श्रीरामकी शरणमें जाइये ॥ ३१ ॥ और हे कपिश्रेष्ठ ! मेरी, अंगदकी तथा इस राज्य और कुलकी रक्षा कीजिये । ऐसा कह- |
| १६२ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग २ |
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पाहि मामङ्गदं राज्यं कुलं च हरिपुङ्गव ।
इत्युक्त्वाश्रुमुखी तारा पादयोः प्रणिपत्य तम् ॥३२॥
हस्ताभ्यां चरणौ धृत्वा रुरोद भयविह्वला ।
तामालिङ्ग्य तदा वाली सस्नेहमिदमब्रवीत् ॥३३॥
स्त्रीस्वभावाद्विभेषि त्वं प्रिये नास्ति भयं मम ।
रामो यदि समायातो लक्ष्मणेन समं प्रभुः ॥३४॥
तदा रामेण मे स्नेहो भविष्यति न संशयः ।
रामो नारायणः साक्षादवतीर्णोऽखिलप्रभुः ॥३५॥
भूभारहरणार्थाय श्रुतं पूर्वं मयाऽनघे ।
स्वपक्षः परपक्षो वा नास्ति तस्य परात्मनः ॥३६॥
आनेष्यामि गृहं साध्वि नत्वा तच्चरणाम्बुजम् ।
भजतोऽनुभजत्येष भक्तिगम्यः सुरेश्वरः ॥३७॥
यदि स्वयं समायाति सुग्रीवो हन्मि तं क्षणात् ।
यदुक्तं यौवराज्याय सुग्रीवस्याभिषेचनम् ॥३८॥
कथमाहूयमानोऽहं युद्धाय रिपुणा प्रिये ।
शूरोऽहं सर्वलोकानां सम्मतः शुभलक्षणे ॥३९॥
भीतभीतमिदं वाक्यं कथं वाली वदेत्प्रिये ।
तस्माच्छोकं परित्यज्य तिष्ठ सुन्दरि वेश्मनि॥४०॥
एवमाश्वास्य तारां तां शोचन्तीमश्रुलोचनाम् ।
गतो वाली समुद्युक्तः सुग्रीवस्य वधाय सः ॥४१॥
दृष्ट्वा वालिनमायान्तं सुग्रीवो भीमविक्रमः ।
उत्पपात गले बद्धपुष्पमालः मतङ्गजवत् ॥४२॥
मुष्टिभ्यां ताडयामास वालिनं सोऽपि तं तथा ।
अहन्वाली च सुग्रीवं सुग्रीवो वालिनं तथा ॥४३॥
रामं विलोकयन्नेव सुग्रीवो युयुधे युधि ।
इत्येवं युध्यमानौ तौ दृष्ट्वा रामः प्रतापवान्॥४४॥
बाणमादाय तूणीरादैन्द्रे धनुषि सन्दधे ।
आकृष्य कर्णपर्यन्तमदृश्यो वृक्षखण्डगः ॥४५॥
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कर तारा वालीके चरणोंमें गिर पड़ी। उस समय उसके मुखपर आँसुओंकी धाराएँ बह रही थीं ॥ ३२ ॥ वह भयसे अधीर होकर अपने हाथोंसे उसके दोनों चरण पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगी।
तब वालीने उसका प्रेमपूर्वक आलिंगन कर इस प्रकार कहा ॥ ३३ ॥ "प्रिये! तुम अपने स्त्री-स्वभावसे व्यर्थ डरती हो, मुझे तो भयका कोई भी कारण दिखलायी नहीं देता। यदि लक्ष्मणके सहित प्रभु राम यहाँ आये हैं तो इसमें कोई सन्देह नहीं, कि उनसे मेरा प्रेम हो जायगा। हे अनघे ! राम तो साक्षात् सर्वेश्वर श्रीनारायण हैं, उन्होंने पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही अवतार लिया है—यह बात मैंने पहलेसे ही सुन रखी है। वे तो प्रकृति आदिसे परे सबके आत्मारूप हैं उनका कोई अपना या पराया पक्ष नहीं है ॥ ३४-३६ ॥ हे साध्वि ! मैं उनके चरणकमलोंमें प्रणाम कर उन्हें घर ले आऊँगा। वे देव-देवेश्वर भक्तिसे प्राप्त होते हैं और जो कोई उनका भजन करता है उसीके अनुकूल हो जाते हैं ॥ ३७ ॥ और यदि अकेला सुग्रीव ही आया है तो उसे मैं एक क्षणमें मार डालूँगा। इसके सिवा, तुमने जो उसे युवराजपदपर अभिषिक्त करनेकी बात कही, सो हे शुभलक्षणे प्रिये ! मैं सम्पूर्ण लोकोंमें माननीय शूरवीर हूँ। भला शत्रुद्वारा युद्धके लिये पुकारे जानेपर वाली उससे ऐसा अत्यन्त भयपूर्ण वाक्य कैसे कह सकता है ? अतः हे सुन्दरि ! तुम निश्चिन्त होकर घर बैठो" ॥ ३८-४० ॥
इस प्रकार शोकसे आँसू बहाती हुई ताराको धीरज बँधा, वाली सुग्रीवको मारनेपर उतारू होकर चला ॥ ४१ ॥ वालीको आता देख प्रचण्ड पराक्रमी सुग्रीव गलेमें पुष्पमाला पहने हुए मत्त गजराजके समान उछलने लगा ॥ ४२ ॥ फिर सुग्रीवने अपने घूँसोंसे वालीपर और वालीने सुग्रीवपर प्रहार किया। इसी प्रकार परस्पर बारम्बार वाली सुग्रीवपर और सुग्रीव वालीपर मुष्टिकाघात करने लगे ॥ ४३ ॥ युद्ध करते समय सुग्रीवकी दृष्टि रामकी ओर ही लगी हुई थी।
परमप्रतापी श्रीरघुनाथजीने उन दोनोंको इस प्रकार लड़ते देख अपने तरकशसे एक बाण निकाल कर अपने ऐन्द्र धनुषपर चढ़ाया और एक वृक्षकी ओटमें छि-
सर्ग २ ] किष्किन्धाकाण्ड १६३
| निरीक्ष्य वालिनं सम्यग्लक्ष्यं तद्हृदयं हरिः ।<br>उत्ससर्जाशनिसमं महावेगं महाबलः ॥४६॥<br>बिभेद स शरो वक्षो वालिनः कम्पयन्महीम् ।<br>उत्पपात महाशब्दं मुञ्चन्स निपपात ह ॥४७॥<br>तदा मुहूर्त्तं निःसंज्ञो भूत्वा चेतनामपाप सः ।<br>ततो वाली ददर्शग्रे रामं राजीवलोचनम् ।<br>धनुरालम्ब्य वामेन हस्तेनान्येन सायकम् ॥४८॥<br>बिभ्राणं चीरवसनं जटामुकुटधारिणम् ।<br>विशालवक्षसं भ्राजद्वनमालाविभूषितम् ॥४९॥<br>पीनचार्व्वायतभुजं नवदूर्वादलच्छविम् ।<br>सुग्रीवलक्ष्मणाभ्यां च पार्श्वयोः परिसेवितम्॥५०॥ | छिपे धनुषको कर्णपर्यन्त तानकर महाबलवान् श्रीहरिने वालीको देख उसके हृदयको ठीक लक्ष्य करके वह वज्रके समान कठोर और महावेगशाली बाण छोड़ दिया ॥ ४४–४६ ॥ उस बाणने वालीके वक्षःस्थलको वेध डाला । बाणके लगते ही वाली बड़ा घोर शब्द करता हुआ उछलकर पृथिवीपर गिर पड़ा । उसके गिरते समय पृथिवी डगमगा उठी ॥ ४७ ॥ उस समय एक मुहूर्त्तके लिये वह संज्ञाशून्य हो गया; पीछे जब उसे चेत हुआ तो उसने अपने सामने कमलनयन श्रीरघुनाथजीको खड़े देखा । वे बायें हाथसे धनुषका सहारा लेकर दाहिनेमें बाण लिये हुए थे तथा शरीरमें चीरवस्त्र और शिरपर जटाओंका मुकुट धारण किये थे। उनका विशाल वक्षःस्थल मनोहर वनमालासे विभूषित था ॥ ४८-४९ ॥ भुजाएँ स्थूल, सुन्दर और लम्बी-लम्बी थीं, शरीरकी कान्ति नवीन दूर्वादलके समान श्यामवर्ण थी तथा उनके दोनों ओर सुग्रीव और लक्ष्मण उनकी सेवामें खड़े थे ॥ ५० ॥ |
| विलोक्य शनकैः प्राह वाली रामं विगर्हयन् ।<br>किं मयाऽपकृतं राम तव येन हतोऽस्म्यहम् ॥५१॥<br>राजधर्ममविज्ञाय गर्हितं कर्म ते कृतम् ।<br>वृक्षखण्डे तिरोभूत्वा त्यजता मयि सायकम्॥५२॥<br>यशः किं लप्स्यसे राम चोरवत्कृतसङ्गरः ।<br>यदि क्षत्रियदायादो मनोर्व्वंशसमुद्भवः ॥५३॥<br>युद्धं कृत्वा समक्षं मे प्राप्स्यसे तत्फलं तदा ।<br>सुग्रीवेण कृतं किं ते मया वा न कृतं किमु ॥५४॥<br>रावणेन हृता भार्या तव राम महावने ।<br>सुग्रीवं शरणं यातस्तदर्थमिति शुश्रुम ॥५५॥<br>बत राम न जानीषे मद्बलं लोकविश्रुतम् ।<br>रावणं संकुलं बद्ध्वा ससीतं लङ्कया सह ॥५६॥<br>आनयामि मुहूर्त्तार्द्धाद्यदि चेच्छामि राघव । | रामचन्द्रजीको देखकर वालीने कुछ तिरस्कार करते हुए मन्दस्वरमें कहा—“हे राम ! मैंने आपका क्या बिगाड़ा था, जो आपने मुझे मारा ॥ ५१ ॥ राजनीति को न जाननेके कारण ही आपने ऐसा निन्दनीय कार्य किया है। इस प्रकार वृक्षकी आड़में छिपकर मुझपर बाण छोड़ते हुए चोरके समान युद्ध करनेसे आपको क्या यश मिलेगा ? यदि आप क्षत्रियकुमार हैं और आपका जन्म मनुजीके पवित्र वंशमें हुआ है, तो मेरे सामने आकर युद्ध किया होता, तब आपको उसका (यश अथवा स्वर्गरूप) कोई फल भी मिलता । हे राम ! सुग्रीवने आपके साथ ऐसा कौन-सा उपकार किया था और मैंने क्या नहीं किया ? ॥ ५२-५४ ॥ मैंने तो यही सुना है कि दण्डकारण्यमें रावण आपकी भार्याको हर ले गया था; उसे पानेके लिये ही आपने सुग्रीवकी शरण ली है ॥ ५५ ॥ किन्तु खेद है कि आपने मेरा विश्वविख्यात बल नहीं सुना । हे राघव ! मैं यदि चाहूँ तो आधे मुहूर्त्तमें ही रावणको कुलसहित बाँधकर |
| १६४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ९ |
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धर्मिष्ठ इति लोकेऽस्मिन् कथ्यसे रघुनन्दन ॥५७॥
वानरं व्याधवद्धत्वा धर्मं कं लप्स्यसे वद ।
अभक्ष्यं वानरं मांसं हत्वा मां किं करिष्यसि ॥५८॥
इत्येवं बहु भाषन्तं वालिनं राघवोऽब्रवीत् ।
धर्मस्य गोप्ता लोकेऽस्मिंश्चरामि सशरासनः॥५९॥
अधर्मकारिणं हत्वा सद्धर्मं पालयाम्यहम् ।
दुहिता भगिनी भ्रातृभार्या चैव तथा स्नुषा ॥६०॥
समा यो रमते तासामेकामपि विमूढधीः ।
पातकी स तु विज्ञेयः स वध्यो राजभिः सदा॥६१॥
त्वं तु भ्रातुः कनिष्ठस्य भार्यायां रमसे बलात् ।
अतो मया धर्मविदा हतोऽसि वनगोचर ॥६२॥
त्वं कपित्वान्न जानीषे महान्तो विचरन्ति यत् ।
लोकं पुनानाः सञ्चारैस्तस्मान्नातिभाषयेत् ॥६३॥
तच्छ्रुत्वा भयसन्त्रस्तो ज्ञात्वा रामं रमापतिम् ।
वाली प्रणम्य रभसाद्रामं वचनमब्रवीत् ॥६४॥
राम राम महाभाग जाने त्वां परमेश्वरम् ।
अजानता मया किञ्चिदुक्तं तत्क्षन्तुमर्हसि ॥६५॥
साक्षात्त्वच्छरघातेन विशेषेण तवाग्रतः ।
त्यजाम्यसूनन्महायोगािदुर्लभं तव दर्शनम् ॥६६॥
यन्नाम विवशो गृह्णन् म्रियमाणः परं पदम् ।
याति साक्षात्स एवाद्य मुमूर्षोर्मे पुरः स्थितः ॥६७॥
देव जानामि पुरुषं त्वां श्रियं जानकीं शुभाम् ।
रावणस्य वधार्थाय जातं त्वां ब्रह्मणार्यितम् ॥६८॥
सीताजी और लंकाके सहित ले आऊँ। और हे रघुनन्दन ! आप तो संसारमें बड़े धर्मात्मा कहे जाते हैं॥ ५६-५७ ॥
बताइये, एक वानरको व्याधके समान मारकर आपको क्या पुण्य मिलेगा ? वानरका मांस तो अभक्ष्य है फिर मुझे मारकर आप क्या करेंगे ?' ॥ ५८ ॥
वालीके इस प्रकार बहुत कुछ कहनेपर रघुनाथजीने कहा—"मैं धर्मकी रक्षा करनेके लिये ही लोकमें धनुष धारण कर विचरता हूँ ॥ ५९ ॥ और अधर्म करनेवालोंको मारकर सद्धर्मका पालन करता हूँ। पुत्री, बहिन, (छोटे) भाईकी स्त्री और पुत्रवधू ये चारों समान हैं। जो मूढ़ इनमेंसे किसी एकके साथ भी रमण करता है उसे महापापी जानना चाहिये; राजाको उचित है कि उसे अवश्य मार डाले ॥ ६०-६१ ॥
अरे वनचर ! तू बलात्कारसे अपने छोटे भाईकी स्त्रीके साथ रमण करता था इसीलिये मुझ धर्मज्ञने तुझे मारा है ॥ ६२ ॥ तू वानर ही तो है; तुझे इस बातका पता नहीं है कि महापुरुष सदैव अपने आचरणोंसे लोकोंको पवित्र करते हुए विचरा करते हैं। इसलिये उनसे इस प्रकार बढ़-बढ़कर बातें न करनी चाहिये" ॥ ६३ ॥
भगवान्के ये वचन सुनकर वाली उन्हें साक्षात् लक्ष्मीपति श्रीनारायण जानकर भयभीत हो गया और उन्हें शीघ्रतासे प्रणाम करके बोला—॥ ६४ ॥ "हे राम ! हे राम ! हे महाभाग ! मैं जान गया, आप साक्षात् परमेश्वर हैं। अज्ञानवश मैं जो कुछ कह गया हूँ उसे आप क्षमा करें ॥ ६५ ॥
हे प्रभो ! आपका दर्शन तो बड़े-बड़े योगियोंको भी अत्यन्त दुर्लभ है; बड़े भाग्यकी बात है कि मैं आपहीके बाणसे विद्ध होकर फिर आपहीके सामने प्राण छोड़ रहा हूँ ॥ ६६ ॥
मरते समय विवश होकर भी जिनका नाम लेनेसे पुरुष परम-पद प्राप्त कर लेता है, वही आप आज इस अन्तिम घड़ीपर साक्षात् मेरे सामने विराजमान हैं ॥ ६७ ॥
हे देव ! मैं यह जानता हूँ कि आप साक्षात् परमपुरुष नारायण हैं और जानकीजी लक्ष्मी हैं। ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे रावणका वध करनेके लिये ही आपने अवतार लिया है ॥ ६८ ॥ हे राम ! अब मैं
किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग ३: ताराका विलाप, श्रीरामचन्द्रजीका उसे समझाना तथा सुग्रीवका राज्याभिषेक
सर्ग ३ ] किष्किन्धाकाण्ड : १६५
अनुजानीहि मां राम यान्तं त्वत्पदमुत्तमम् । मम तुल्यबले बाले अङ्गदे त्वं दयां कुरु ॥ ६९ ॥
विशल्यं कुरु मे राम हृदयं पाणिना स्पृशन् । तथेति बाणमुद्धृत्य रामः पस्पर्श पाणिना । त्यक्त्वा तद्वानरं देहममरेन्द्रोऽभवत्क्षणात् ॥ ७० ॥
वाली रघूत्तमशराभिहतो विमृष्टो रामेण शीतलकरेण सुखाकरेण । सद्यो विमुच्य कपिदेहमनन्यलभ्यं प्राप्तं परं परमहंसगणैर्दुरापम् ॥ ७१ ॥
आपके सर्वश्रेष्ठ परमधामको जा रहा हूँ, आप मुझे आज्ञा दीजिये । मेरा बालक अंगद मेरे ही समान बलशाली है, उसपर आप दयादृष्टि रखें ॥ ६९ ॥
हे राम ! मेरे हृदयको अपने कर-कमलोंसे स्पर्शकर इस बाणको निकाल दीजिये।" तब रामचन्द्रजीने 'अच्छा' कह उसे स्पर्श करते हुए वह बाण निकाल दिया । उसके निकलते ही वाली वानर-शरीर छोड़कर इन्द्र-रूप हो गया ॥ ७० ॥
हे पार्वति ! वाली रघुनाथजीके बाणसे मारा गया था और फिर उसे उनके सुखमय कर-कमलका शीतल स्पर्श भी मिला । अतः वह शीघ्र ही अपना वानर-देह छोड़कर उस परम श्रेष्ठ पदको प्राप्त हुआ जो और किसीके लिये बहुत ही दुर्लभ है। और तो क्या, महान् परमहंसोंको भी उसका मिलना अत्यन्त कठिन है ॥ ७१ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे किष्किन्धाकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
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तृतीय सर्ग
ताराका विलाप, श्रीरामचन्द्रजीका उसे समझाना तथा सुग्रीवका राजपद प्राप्त करना ।
श्रीमहादेव उवाच
निहते वालिनि रणे रामेण परमात्मना । दुद्रुवुर्वानराः सर्वे किष्किन्धां भयविह्वलाः ॥ १ ॥
तारामूचुर्महाभागे हतो वाली रणाजिरे । अङ्गदं परिरक्षाद्य मन्त्रिणः परिनोदय ॥ २ ॥
चतुर्द्वार कपातादीन् बद्ध्वा रक्षामहे पुरीम् । वानराणां तु राजानमङ्गदं कुरु भामिनि ॥ ३ ॥
निहतं वालिनं श्रुत्वा तारा शोकविमूर्च्छिता । अताडयत्स्वपाणिभ्यां शिरो वक्षश्च भूरिशः ॥ ४ ॥
किमङ्गदेन राज्येन नगरेण धनेन वा । इदानीमेव निधनं यास्यामि पतिना सह ॥ ५ ॥
श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! परमात्मा रामके द्वारा युद्धमें वालीके मारे जानेपर समस्त वानरगण भयसे व्याकुल होकर किष्किन्धापुरीमें दौड़े गये ॥ १ ॥
और तारासे बोले— "हे महाभागे ! वानरराज वाली युद्धक्षेत्रमें मारे गये । अब आप राजकुमार अंगदकी रक्षा कीजिये और मन्त्रियोंको सावधान कर दीजिये ॥ २ ॥
हे भामिनि ! हमलोग चारों द्वारोंके किवाड़ आदि लगाकर नगरकी रक्षा करते हैं, आप अंगदको वानरोंका राजा बनाइये" ॥ ३ ॥
वालीको मरा हुआ सुनकर तारा शोकसे मूर्च्छित हो गयी और अपने शिर और छातीको बारम्बार हाथोंसे पीटने लगी ॥ ४ ॥
और बोली, "मुझे अंगद, राज्य, नगर और धन आदिसे क्या काम है, मैं तो अभी अपने पतिदेवके साथ ही प्राण त्याग करूँगी" ॥ ५ ॥ ऐसा कह वह रोती हुई तुरन्त ही वहाँ
१६६ अध्यात्मरामायण [सर्ग ३
इत्युक्त्वा त्वरिता तत्र रुदती मुक्तमूर्धजा ।
ययौ ताराऽतिशोकार्ता यत्र भर्तृकलेवरम् ॥ ६ ॥
पतितं वालिनं दृष्ट्वा रक्तैः पांसुभिरावृतम् ।
रुदती नाथनाथेति पतिता तस्य पादयोः ॥ ७ ॥
करुणं विलपन्ती सा ददर्श रघुनन्दनम् ।
राम मां जहि बाणेन येन वाली हतस्त्वया ॥ ८ ॥
गच्छामि पतिसालोक्यं पतिर्मामभिकाङ्क्षते ।
स्वर्गेऽपि न सुखं तस्य मां विना रघुनन्दन ॥ ९ ॥
पत्नीवियोगजं दुःखमनुभूतं त्वयाऽनघ ।
वालिने मां प्रयच्छाशु पत्नीदानफलं भवेत् ॥ १० ॥
सुग्रीव त्वं सुखं राज्यं दापितं वालिघातिना ।
रामेण रुमया सार्धं भुङ्क्ष्व सापत्नवजितम् ॥ ११ ॥
इत्येवं विलपन्तीं तां तारां रामो महामनाः ।
सान्त्वयामास दयया तत्त्वज्ञानोपदेशतः ॥ १२ ॥
किं भीरु शोचसि व्यर्थं शोकस्याविषयं पतिम् ।
पतिस्तवायं देहो वा जीवो वा वद तत्त्वतः ॥ १३ ॥
पञ्चात्मको जडो देहस्त्वङ्मांसरुधिरास्थिमान् ।
कालकर्मगुणोत्पन्नः सोऽप्यास्तेऽद्यापि ते पुरः ॥ १४ ॥
मन्यसे जीवमात्मानं जीवस्तर्हि निरामयः ।
न जायते न म्रियते न तिष्ठति न गच्छति ॥ १५ ॥
न स्त्री पुमान्न षण्ढो वा जीवः सर्वगतोऽव्ययः ।
एक एवाद्वितीयोऽयमाकाशवदलेपकः ।
नित्यो ज्ञानमयः शुद्धः स कथं शोकमर्हति ॥ १६ ॥
गयी जहाँ उसके पतिका देह पड़ा हुआ था, उस समय वह अत्यन्त शोकाकुल थी और उसके बाल बिखरे हुए थे ॥ ६ ॥ वहाँ वालीको रक्त और धूलिसे लथपथ पड़ा देख वह 'हा नाथ ! हा नाथ !' कहकर रोती हुई उसके पैरोंपर गिर पड़ी ॥ ७ ॥
इस प्रकार करुणक्रन्दन करते हुए उसकी दृष्टि श्रीरघुनाथजीपर पड़ी । (उन्हें देखकर वह बोली—) "राम ! आपने जिस बाणसे वालीको मारा है उसीसे मुझे भी मार डालिये ॥ ८ ॥ जिससे मैं तुरन्त ही पति-लोकको चली जाऊँ; वे मेरी बाट देख रहे होंगे, क्योंकि हे रघुनन्दन ! मेरे विना उन्हें स्वर्गमें भी चैन नहीं होगा ॥ ९ ॥ हे अनघ ! पत्नीके वियोगका दुःख आपने अनुभव किया ही है (अतः आपको उसकी तीव्रताका अनुमान हो ही सकता है।) इसलिये अब आप मुझे वालीके पास पहुँचा दीजिये । इससे आपको स्त्री-दानका फल मिलेगा ॥ १० ॥ सुग्रीव ! तुम्हें वालीको मारनेवाले रामने राज्य दिला ही दिया है । अब उस निष्कण्टक राज्यको तुम रुमाके साथ सुखपूर्वक भोगो" ॥ ११ ॥
इस प्रकार विलाप करती हुई उस ताराको महामना रामने दयापूर्वक तत्त्वज्ञानका उपदेश देकर शान्त किया ॥ १२ ॥ वे बोले—"अयि भीरु ! तेरा पति शोक करनेयोग्य नहीं है, तू उसके लिये व्यर्थ क्यों शोक करती है ? तू विचारकर ठीक-ठीक बता वास्तवमें तेरा पति यह देह है या इसमें रहनेवाला जीव ? (यदि यह देह ही तेरा पति है तो) यह तो जड, पञ्चभूतजय एवं त्वचा, मांस, रुधिर और अस्थियोंसे बना हुआ है तथा काल, कर्म और गुणोंसे उत्पन्न हुआ है; और वह तो अब भी तेरे सामने पड़ा है । (फिर उसके लिये शोक क्यों करती है ?) ॥ १३-१४ ॥ और यदि तू जीवको अपना पति मानती है तो भी तुझे शोक न करना चाहिये क्योंकि वह निर्विकार है। वह न उत्पन्न होता है, न मरता है, न स्थिर रहता है और न आता-जाता है ॥ १५ ॥ जीव सर्वव्यापी और अव्यय है, वह स्त्री, पुरुष अथवा नपुंसक कुछ भी नहीं है बल्कि एक, अद्वितीय, आकाशके समान निर्लेप, नित्य, ज्ञानमय और शुद्ध है फिर वह शोचनीय कैसे हो सकता है ?" ॥ १६ ॥
सर्ग ३ ]
किष्किन्धाकाण्ड
१६७
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तारोवाच<br>देहोऽचित्काष्ठवद्राम जीवो नित्यश्चिदात्मकः ।<br>सुखदुःखादिसम्बन्धः कस्य स्याद्राम मे वद ॥१७॥ | तारा बोली- हे राम ! देह तो काष्ठके समान जड है और जीव नित्य तथा चैतन्यरूप है, (उसका नाश हो नहीं सकता) फिर सुख-दुःखादिका सम्बन्ध किससे होता है, यह मुझे बतलाइये ॥ १७ ॥ |
| श्रीराम उवाच<br>अहङ्कारादिसम्बन्धो यावद्देहेन्द्रियैः सह ।<br>संसारस्तावदेव स्यादात्मनस्त्वविवेकिनः ॥१८॥ | श्रीरामचन्द्रजी बोले- जबतक देह और इन्द्रियोंके साथ 'मैं' 'मेरापन' आदिका सम्बन्ध रहता है तबतक आत्मा और अनात्माके विवेकसे रहित जीवका सुख-दुःखादिके भोगरूप संसारसे सम्बन्ध रहता है ॥ १८ ॥ |
| मिथ्याऽऽरोपितसंसारो न स्वयं विनिवर्तते ।<br>विषयान्ध्यायमानस्य स्वप्ने मिथ्याऽऽगमो यथा ॥१९॥ | यह संसार आत्मामें मिथ्या ही आरोपित हुआ है तथापि ज्ञानोदयके बिना यह अपने-आप निवृत्त नहीं होता; जिस प्रकार विषयोंका निरन्तर ध्यान करनेवाले पुरुषको स्वप्नमें अनेक पदार्थ दीखते हैं, परन्तु वे होते मिथ्या ही हैं ॥१९॥ |
| अनाद्यविद्यासम्बन्धात्तत्कार्याहङ्कृतेस्तथा ।<br>संसारोऽपार्थकोऽपि स्याद्रागद्वेषादिसङ्कुलः ॥२०॥ | अनादि अविद्या और उसके कार्य अहंकारके सम्बन्धसे स्थित हुआ यह संसार निरर्थक (अत्यन्त मिथ्या) होते हुए भी राग-द्वेष आदिसे पूर्ण है ॥ २० ॥ |
| मन एव हि संसारो बन्धश्चैव मनः शुभे ।<br>आत्मा मनः समानत्वमेत्य तद्गतबन्धभाक् ॥२१॥ | हे शुभे ! मन ही संसार है और मन ही बन्धन है । उस अनात्म वस्तु मनके साथ (अन्योन्याध्याससे) एक हो जानेसे ही यह आत्मा तद्गत सुख-दुःखादिके बन्धनमें पड़ता है ॥ २१ ॥ |
| यथा विशुद्धः स्फटिकोऽलक्तकादिसमीपगः ।<br>तत्तद्वर्णयुगाभाति वस्तुतो नास्ति रञ्जनम् ॥२२॥ | जैसे स्फटिकमणि स्वभावसे शुक्लवर्ण होने पर भी लाख आदिके समीप होनेपर उसीके रंगकी मालूम होने लगती है, परन्तु वास्तवमें उसमें वह रंग नहीं होता ॥ २२ ॥ |
| बुद्धीन्द्रियादिसामीप्यादात्मनः संसृतिर्बलात् ।<br>आत्मा स्वलिङ्गं तु मनः परिगृह्य तदुद्भवन् ॥२३॥<br><br>कामान् जुषन् गुणैर्बद्धः संसारे वर्ततेऽवशः ।<br>आदौ मनोगुणान् सृष्ट्वा ततः कर्माण्यनेकधा ॥२४॥<br><br>शुक्ललोहितकृष्णानि गतयस्तत्समानतः ।<br>एवं कर्मवशाज्जीवो भ्रमत्याभूतसम्प्लवम् ॥२५॥ | वैसे ही बुद्धि और इन्द्रिय आदिकी सन्निधिसे आत्माको बलात्कारसे संसारकी प्रतीति होती है। आत्मा, अपने लिंग (पहचाननेके साधन) मनको स्वीकार कर उससे प्राप्त होनेवाले विषयोंका सेवन करता हुआ उसके राग-द्वेषादि गुणोंमें बँधकर विवश हो संसार-चक्रमें फँसा रहता है। पहले वह राग-द्वेषादि मनके गुणोंकी रचना करता है और फिर (उनके योगसे) नाना प्रकारके कर्म करता है । वे कर्म शुक्ल (जप, ध्यानादि) लोहित (हिंसामय यज्ञ-यागादि) और कृष्ण (मद्यपानादि पापकर्म) तीन प्रकारके होते हैं । उन कर्मोंके अनुसार ही उसकी गतियाँ होती हैं । इस प्रकार यह जीव कर्मोंके वशीभूत होकर प्रलय-पर्यन्त आवागमनके चक्रमें पड़ा रहता है ॥२३-२५॥ |
| सर्वोपसंहृतौ जीवो वासनाभिः स्वकर्मभिः ।<br>अनाद्यविद्यावशगास्तिष्ठत्यभिनिवेशतः ॥२६॥ | प्रलयकालमें सब भूतोंका लय हो जानेपर भी अपने कर्त्ता-भोक्तापनके अभिनिवेशसे यह अपनी... |
| १६८ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सृष्टिकाले पुनः पूर्ववासनामानसैः सह ।<br>जायते पुनरप्येवं घटीयन्त्रमिवावशः ॥२७॥ | वासनाओं और कर्मोंके साथ अनादि अविद्यासे आच्छादित हुआ रहता है ॥२६॥ जब नवीन सृष्टि आरम्भ होती है तो यह विवश होकर अपनी पूर्व वासनाओंसे युक्त मनके सहित घटीयन्त्रके समान फिर उत्पन्न हो जाता है ॥ २७ ॥ |
| यदा पुण्यविशेषेण लभते सङ्गतिं सताम् ।<br>मद्भक्तानां सुशान्तानां तदा मद्विषया मतिः ॥२८॥ | जिस समय किसी विशेष पुण्यपरिपाकसे इसे मेरे भक्त और शान्तचित्त महात्माओंकी संगति मिलती है उस समय इसका चित्त मेरी ओर लगता है ॥ २८ ॥ |
| मत्कथाश्रवणे श्रद्धा दुर्लभा जायते ततः ।<br>ततः स्वरूपविज्ञानमनायासेन जायते ॥२९॥ | उससे मेरी कथा सुननेमें इसकी श्रद्धा होती है, जो बहुत ही दुर्लभ है। मेरी कथा सुननेसे इसको अनायास ही मेरे स्वरूपका ज्ञान हो जाता है ॥ २९ ॥ |
| तदाचार्यप्रसादेन वाक्यार्थज्ञानतः क्षणात् ।<br>देहेन्द्रियमनःप्राणाहङ्कृतिभ्यः पृथक्स्थितम् ॥३०॥ | उस समय गुरु-कृपाद्वारा तत्त्वमसि आदि महावाक्योंके अर्थ-ज्ञानसे तथा स्वयं अपने अनुभवसे भी यह अपने सच्चिदानन्दस्वरूप अद्वितीय आत्माको देह, इन्द्रिय, मन, प्राण और अहंकारादिसे पृथक् जानकर एक क्षणमें ही तुरन्त मुक्त हो जाता है। हे तारे ! मैंने यह वास्तविक सत्य तुझसे कह दिया ॥ ३०-३१ ॥ |
| स्वात्मानुभवतः सत्यमानन्दात्मानमद्वयम् ।<br>ज्ञात्वा सद्यो भवेन्मुक्तः सत्यमेव मयोदितम् ॥३१॥ | |
| एवं मयोदितं सम्यगालोचयति योऽनिशम् ।<br>तस्य संसारदुःखानि न स्पृशन्ति कदाचन ॥३२॥ | मेरे कहे हुए इस परमार्थ-ज्ञानका जो अहर्निश मनन करता है उसे सांसारिक दुःख कभी स्पर्श नहीं करते ॥ ३२ ॥ |
| त्वमप्येतन्मया प्रोक्तमालोचय विशुद्धधीः ।<br>न स्पृश्यसे दुःखजालैः कर्मबन्धाद्विमोक्ष्यसे ॥३३॥ | तू भी शुद्ध-चित्त होकर मेरे इस उपदेशका मनन कर । ऐसा करनेसे क्लेश-कलाप तुझे छू भी न सकेंगे और तू कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जायगी ॥ ३३ ॥ |
| पूर्वजन्मनि ते सुभ्रु कृता मद्भक्तिरुत्तमा ।<br>अतस्तव विमोक्षाय रूपं मे दर्शितं शुभे ॥३४॥ | हे सुभ्रु ! अपने पूर्वजन्ममें तूने मेरी उत्कृष्ट भक्ति की थी, इसीलिये हे सुन्दरि ! तुझे मुक्त करनेके लिये मैंने अपना दर्शन दिया है ॥ ३४ ॥ |
| ध्यात्वा मद्रूपमनिशमालोचय मयोदितम् ।<br>प्रवाहपतितं कार्यं कुर्वन्त्यपि न लिप्यसे ॥३५॥ | तू रात-दिन मेरे रूपका ध्यान करती हुई मेरे उपदेशका मनन कर । ऐसा करनेसे प्रारब्ध-क्रमसे प्राप्त हुए कर्मोंको करती हुई भी तू उनसे लिप्त न होगी ॥ ३५ ॥ |
| श्रीरामेणोदितं सर्वं श्रुत्वा ताराऽतिविस्मिता ।<br>देहाभिमानजं शोकं त्यक्त्वा नत्वा रघूत्तमम् ॥३६॥ | भगवान् रामका यह अद्भुत उपदेश सुनकर ताराको बड़ा ही विस्मय हुआ और उसने देहाभिमानजनित शोक छोड़कर श्रीरघुनाथजीको प्रणाम किया, तथा आत्मानुभवसे सन्तुष्ट होकर वह तत्काल जीवन्मुक्त हो गयी । |
| आत्मानुभवसन्तुष्टा जीवन्मुक्ता बभूव ह ।<br>क्षणसङ्गममात्रेण रामेण परमात्मना ॥३७॥ | परमात्मा रामके क्षणमात्रके सत्संगसे वह अनादि अविद्याके बन्धनको काटकर निष्पाप और मुक्त हो गयी । |
| अनादिबन्धं निर्धूय मुक्ता साऽपि विकल्मषा ।<br>सुग्रीवोऽपि च तच्छ्रुत्वा रामवक्त्रात्समीरितम् ॥३८॥ | भगवान्के श्रीमुखका वक्तव्य सुनकर सुग्रीवका भी समस्त अज्ञान जाता रहा और वह शान्त- |
सर्ग ३] किष्किन्धाकाण्ड १६९
जहावज्ञानमखिलं स्वस्थचित्तोऽभवत्तदा । ततः सुग्रीवमाहेदं रामो वानरपुङ्गवम् ॥३९॥ भ्रातुर्ज्येष्ठस्य पुत्रेण यद्युक्तं साम्परायिकम् । कुरु सर्वं यथान्यायं संस्कारादि ममाज्ञया ॥४०॥ तथेति वलिभिर्मुख्यैर्वानरैः परिणीय तम् । वालिनं पुष्पके क्षिप्त्वा सर्वराजोपचारकैः ॥४१॥ भेरीदुन्दुभिनिर्घोषैर्ब्राह्मणैर्मन्त्रिभिः सह । यूथपैर्वानरैः पौरैस्तारया चाङ्गदेन च ॥४२॥ गत्वा चकार तत्सर्वं यथाशास्त्रं प्रयत्नतः । स्नात्वा जगाम रामस्य समीपं मन्त्रिभिः सह ॥४३॥ नत्वा रामस्य चरणौ सुग्रीवः प्राह हृष्टधीः । राज्यं प्रशाधि राजेन्द्र वानराणां समृद्धिमत् ॥४४॥ दासोऽहं ते पादपद्मं सेवे लक्ष्मणवच्चिरम् ।
इत्युक्तो राघवः प्राह सुग्रीवं सस्मितं वचः ॥४५॥ त्वमेवाहं न सन्देहः शीघ्रं गच्छ ममाज्ञया । पुरराज्याधिपत्ये त्वं स्वात्मानमभिषेचय ॥४६॥ नगरं न प्रवेक्ष्यामि चतुर्दश समाः सखे । आगमिष्यति मे भ्राता लक्ष्मणः पत्तनं तव ॥४७॥ अङ्गदं यौवराज्ये त्वमभिषेचय सादरम् । अहं समीपे शिखरे पर्वतस्य सहानुजः ॥४८॥ वत्स्यामि वर्षदिवसांस्ततस्त्वं यत्नवान् भव । किञ्चित्कालं पुरे स्थित्वा सीतायाः परिमार्गणे ॥४९॥ साष्टाङ्गं प्रणिपत्याह सुग्रीवो रामपादयोः । यदाऽऽज्ञापयसे देव तत्तथैव करोम्यहम् ॥५०॥ अनुज्ञातश्च रामेण सुग्रीवस्तु सलक्ष्मणः । गत्वा पुरं तथा चक्रे यथा रामेण चोदितः ॥५१॥
चित्त हो गया। तदनन्तर भगवान्ने वानरश्रेष्ठ सुग्रीवसे कहा-॥३६-३९॥ "हे सुग्रीव ! तुम मेरी आज्ञासे बेटा अंगदके द्वारा अपने बड़े भाईका जो कुछ शास्त्रोक्त और्ध्वदैहिक कर्म हो वह सब विधिपूर्वक करो" ॥४०॥ तब 'जो आज्ञा' कह मुख्य-मुख्य बलवान् वानरोंके साथ वालीके शवको फूलोंके विमानपर रखकर समस्त राजोचित उपचारोंके सहित भेरी और दुन्दुभि आदिका घोष करते हुए ब्राह्मण, मन्त्रिवर्ग, यूथपति वानरगण, पुरवासी, तारा और अंगदके साथ उसे ले जाकर सुग्रीवने बड़े प्रयत्नसे शास्त्रानुकूल सब संस्कार किये और फिर स्नानादि करके मन्त्रियोंके साथ रामके पास लौट आया ॥४१-४३॥
वहाँ आकर सुग्रीवने प्रसन्न चित्तसे श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें प्रणाम करके कहा-"हे राजराजेश्वर ! वानरोंके इस समृद्धिसम्पन्न राज्यका शासन कीजिये ॥४४॥ मैं तो आपका दास हूँ; लक्ष्मणके समान मैं भी सदा आपके चरणकमलोंकी सेवा करता रहूँगा।"
यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने सुग्रीवसे मुसकाते हुए कहा-॥४५॥ "सुग्रीव ! मैं और तू एक ही हैं-इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं। मेरी आज्ञासे तुम तुरन्त ही जाकर किष्किन्धाके राजपदपर अपना अभिषेक कराओ॥४६॥ हे सखे! मैं चौदह वर्षतक किसी भी नगरमें प्रवेश नहीं कर सकता इसलिये तुम्हारे राज्याभिषेकके समय भाई लक्ष्मण तुम्हारे नगरमें आयेगा ॥४७॥ अंगदको तुम आदरपूर्वक यौवराज्यपदपर अभिषिक्त करना। अब मैं वर्षाके दिनोंमें भाई लक्ष्मणके साथ यहाँ पास ही पर्वत-शिखरपर रहूँगा, सो तुम कुछ दिन नगरमें रहकर फिर सीताजीकी खोज करानेका प्रयत्न करना"॥४८-४९॥
तब सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें साष्टांग दण्डवत् करके कहा-"भगवन् ! आपकी जैसी आज्ञा होगी मैं वही करूँगा" ॥५०॥ फिर भगवान् रामकी आज्ञा पा सुग्रीव लक्ष्मणजीको साथ लेकर किष्किन्धापुरीमें गये और जैसे-जैसे श्रीरामचन्द्रजीने करनेको कहा था सब कार्य वैसे ही किया ॥५१॥ तदनन्तर सुग्रीवसे
२२
किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग ४: भगवान् रामका लक्ष्मणजीसे क्रिया-योगका वर्णन
| १७० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ४ |
|---|
सुग्रीवेण यथान्यायं पूजितो लक्ष्मणस्तदा ।
आगत्य राघवं शीघ्रं प्रणिपत्योपतस्थिवान् ॥५२॥
ततो रामो जगामाशु लक्ष्मणेन समन्वितः ।
प्रवर्षणगिरेरूर्ध्वं शिखरं भूरिविस्तरम् ॥५३॥
तत्रैकं गह्वरं दृष्ट्वा स्फाटिकं दीप्तिमच्छुभम् ।
वर्षवातातपसहं फलमूलसमीपगम् ।
वासाय रोचयामास तत्र रामः सलक्ष्मणः ॥५४॥
दिव्यमूलफलपुष्पसंयुते
मौक्तिकोपमजलौघपल्वले ।
चित्रवर्णमृगपक्षिशोभिते
पर्वते रघुकुलोत्तमोऽवसत् ॥५५॥
यथोचित आदर पा लक्ष्मणजी श्रीरघुनाथजीके पास चले आये और उनके चरणोंमें प्रणाम कर उनकी सेवामें उपस्थित हो गये ॥ ५२ ॥
तब श्रीरामचन्द्रजी तत्काल ही लक्ष्मणके साथ प्रवर्षण पर्वतके ऊपर अति विस्तीर्ण शिखरपर गये ॥ ५३ ॥ वहाँ उन्होंने स्फटिकमणिकी एक स्वच्छ और प्रकाशमान गुफा देखी। उसमें वर्षा, वायु और धूपसे बचनेका सुभीता था तथा पास ही कन्द, मूल और फल भी लगे हुए थे। उसे देखकर श्रीराम और लक्ष्मणने वहीं रहना पसन्द किया ॥ ५४ ॥ तब रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजी दिव्य मूल फल और फूलोंसे सम्पन्न, मोतीके समान स्वच्छ जलवाले सरोवरोंसे युक्त और चित्र-विचित्र मृग तथा पक्षियोंसे सुशोभित उस प्रवर्षण पर्वतपर रहने लगे ॥ ५५ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
किष्किन्धाकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥३॥
चतुर्थ सर्ग
भगवान् रामका लक्ष्मणजीसे क्रियायोगका वर्णन करना।
श्रीमहादेव उवाच
तत्र वार्षिकादिनानि राघवो
लीलया मणिगुहासु सञ्चरन् ।
पक्कमूलफलभोगतोषितो
लक्ष्मणेन सहितोऽवसत्सुखम् ॥ १ ॥
वातनुन्नजलपूरितमेघा-
नन्तरस्तनितविद्युतगर्भान् ।
वीक्ष्य विस्मयमगाद्गजयूथा-
न्यङ्गदाहितसुकाञ्चनकक्षान् ॥ २ ॥
नवघासं समास्वाद्य हृष्टपुष्टमृगद्विजाः ।
धावन्तः परितो रामं वीक्ष्य विस्फारितेक्षणाः ॥३॥
न चलन्ति सदाध्याननिष्ठा इव मुनीश्वराः ।
रामं मानुषरूपेण गिरिकाननभूमिषु ॥ ४ ॥
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति! वहाँ श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणजीके साथ लीलासे ही मणिमय गुफाओंमें विचरते और पके हुए फल-फूल खाकर निर्वाह करते हुए वर्षाके दिनोंमें आनन्दपूर्वक रहे ॥ १ ॥ वायुसे प्रेरित सजल मेघोंको देखकर, जो अपने भीतर कौंधती हुई बिजलीके कारण सुनहरी झूलोंसे युक्त हाथियोंके झुण्डके समान प्रतीत होते थे, उन्हें बड़ा ही विस्मय हुआ करता था ॥ २ ॥ नवीन घासके खानेसे हृष्ट-पुष्ट हुए मृग और पक्षिगण जब कभी इधर-उधर दौड़ते हुए श्रीरामचन्द्रजीको देख लेते तो उनकी ओर टकटकी लगाये रह जाते ॥ ३ ॥ और ध्याननिष्ठ मुनीश्वरोंके समान इधर-उधर जाना भूलकर जहाँ-के-तहाँ खड़े रह जाते। इस समय परमात्मा रामको मनुष्यरूपसे पर्वत और वनोंमें विचरते जानकर
सर्ग ४ ] किष्किन्धाकाण्ड १७१
| चरन्तं परमात्मानं ज्ञात्वा सिद्धगणा भुवि ।<br>मृगपक्षिगणा भूत्वा राममेवानुसेविरे ॥ ५॥ | बहुत-से सिद्धगण पृथिवीपर मृग और पक्षियोंके रूपसे सदा उन्हींकी सेवामें रहने लगे ॥ ४-५ ॥ |
| सौमित्रिरेकदा राममेकान्ते ध्यानतत्परम् ।<br>समाधिविरमे भक्त्या प्रणयाद्विनयान्वितः ॥ ६ ॥ | एक दिन एकान्तमें ध्यान करते हुए भगवान् रामसे उनकी समाधि खुलनेपर सुमित्रानन्दन श्रीलक्ष्मणजीने अति प्रेम और भक्तिसे नम्रतापूर्वक कहा— |
| अब्रवीद्देव ते वाक्यात्पूर्वोक्ताद्विगतो मम ।<br>अनाद्यविद्यासम्भूतः संशयो हृदि संस्थितः ॥ ७॥ | "भगवन् ! आपने मुझे जो उपदेश पहले दिया था उससे मेरे हृदयका अनादि अविद्या-जन्य सन्देह तो दूर हो गया है ॥ ६-७ ॥ |
| इदानीं श्रोतुमिच्छामि क्रियामार्गेण राघव ।<br>भवदाराधनं लोके यथा कुर्वन्ति योगिनः ॥ ८ ॥ | किन्तु हे राघव ! योगिजन क्रियामार्ग (पूजा-पद्धति) से जिस प्रकार संसारमें आपकी आराधना किया करते हैं, इस समय मैं उसे सुनना चाहता हूँ ॥ ८ ॥ |
| इदमेव सदा प्राहुर्योगिनो मुक्तिसाधनम् ।<br>नारदोऽपि तथा व्यासो ब्रह्मा कमलसम्भवः ॥ ९ ॥ | समस्त योगिजन एवं देवर्षि नारद, महर्षि व्यास और कमलयोनि श्रीब्रह्माजी भी इसीको मुक्तिका साधन बतलाते हैं ॥ ९ ॥ |
| ब्रह्मक्षत्रादिवर्णानामाश्रमाणां च मोक्षदम् ।<br>स्त्रीशूद्राणां च राजेन्द्र सुलभं मुक्तिसाधनम् ।<br>तव भक्ताय मे भ्रात्रे ब्रूहि लोकोपकारकम् ॥ १०॥ | हे राजराजेश्वर ! ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णों तथा ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य आदि आश्रमोंको मोक्ष देनेवाला यही साधन है और स्त्री तथा शूद्रोंकी भी इसी साधनसे सुगमतासे मुक्ति हो सकती है। हे प्रभो ! मैं आपका भक्त और भाई हूँ; अतः आप मुझसे इस लोकोपकारी साधनका वर्णन कीजिये" ॥ १० ॥ |
| श्रीराम उवाच | श्रीरामचन्द्रजी बोले- हे रघुकुलनन्दन लक्ष्मण ! |
| मम पूजा विधानस्य नान्तोऽस्ति रघुनन्दन ।<br>तथापि वक्ष्ये सङ्क्षेपाद्यथावदनुपूर्वशः ॥ ११॥ | मेरी पूजा-विधिका कोई अन्त नहीं है तथापि मैं क्रमशः उसका संक्षेपमें यथावत् वर्णन करता हूँ ॥ ११ ॥ |
| स्वगृह्योक्तप्रकारेण द्विजत्वं प्राप्य मानवः ।<br>सकाशात्सद्गुरोर्मन्त्रं लब्ध्वा मद्भक्तिसंयुक्तः ॥ १२॥ | मेरी भक्तिसे सम्पन्न मनुष्य अपनी शाखाके गृह्यसूत्रद्वारा बतलाये गये प्रकारसे (उपनयन-संस्कारके अनन्तर) द्विजत्व प्राप्त कर भक्तिपूर्वक सद्गुरुके पास जाय और उनसे मन्त्र ग्रहण करे ॥ १२ ॥ |
| तेन सन्दर्शितविधिर्मामेवाराधयेत्सुधीः ।<br>हृदये वाऽनले वाऽर्चेत्प्रतिमाऽऽदौ विभावसौ ॥ १३॥ | फिर बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि उन गुरुदेवकी बतायी हुई विधिसे अपने हृदयमें, अग्निमें, प्रतिमा आदिमें अथवा सूर्यमें केवल मेरी ही सेवा-पूजा करे ॥ १३ ॥ |
| शालग्रामशिलायां वा पूजयेन्मामतन्द्रितः ।<br>प्रातःस्नानं प्रकुर्वीत प्रथमं देहशुद्धये ॥ १४॥ | अथवा सावधान होकर शालग्राम-शिलामें ही मेरी उपासना करे । बुद्धिमान् उपासकको चाहिये कि सबसे पहले देहशुद्धिके लिये, प्रातःकाल ही |
| वेदतन्त्रोदितैर्मन्त्रैर्मृल्लेपनविधानतः ।<br>सन्ध्यादि कर्म यन्नित्यं तत्कुर्याद्विधिना बुधः ॥ १५॥ | वैदिक तथा तान्त्रिक मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए शरीरमें विधिवत् मृत्तिका आदि लगाकर स्नान करे और फिर नियमानुसार सन्ध्या आदि नित्यकर्म करे ॥ १४-१५ ॥ |
| सङ्कल्पमादौ कुर्वीत सिद्धयर्थं कर्मणां सुधीः । | मेरी पूजा करनेवाला मतिमान् पुरुष कर्मोंकी सिद्धिके लिये |
| १७२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ४ |
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स्वगुरुं पूजयेद्भक्त्या मद्बुद्ध्या पूजको मम ॥१६॥
शिलायां स्नपनं कुर्यात्प्रतिमासु प्रमार्जनम् ।
प्रसिद्धैर्गन्धपुष्पाद्यैर्मत्पूजा सिद्धिदायिका ॥१७॥
अमायिकोऽनुवृत्त्या मां पूजयेन्नियतव्रतः ।
प्रतिमादिष्वलङ्कारः प्रियो मे कुलन्दन ॥१८॥
अग्नौ यजेत हविषा भास्करे स्थण्डिले यजेत् ।
भक्तेनोपहृतं प्रीत्यै श्रद्धया मम वार्यपि ॥१९॥
किं पुनर्लक्ष्यभोज्यादि गन्धपुष्पाक्षतादिकम् ।
पूजाद्रव्याणि सर्वाणि सम्पाद्यैवं समारभेत् ॥२०॥
चैलाजिनकुशैः सम्यगासनं परिकल्पयेत् ।
तत्रोपविश्य देवस्य सम्मुखे शुद्धमानसः ॥२१॥
ततो न्यासं प्रकुर्वीत मातृकाबहिरान्तरम् ।
केशवादि ततः कुर्यात्तत्त्वन्यासं ततः परम् ॥२२॥
मन्मूर्तिपञ्जरन्यासं मन्त्रन्यासं ततो न्यसेत् ।
प्रतिमादावपि तथा कुर्यान्नित्यमतन्द्रितः ॥२३॥
कलशं स्वपुरो वामे क्षिपेत्पुष्पादि दक्षिणे ।
अर्घ्यपाद्यप्रदानार्थं मधुपर्कार्थमेव च ॥२४॥
तथैवाचमनार्थं तु न्यसेत्पात्रचतुष्टयम् ।
हृत्पद्मे भानुविमले मत्कलां जीवसंज्ञिताम् ॥२५॥
ध्यायेत्स्वदेहमखिलं तया व्याप्तमरिन्दम ।
तामेवावाहयेन्नित्यं प्रतिमादिषु मत्कलाम् ॥२६॥
पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यैः स्नानवस्त्रविभूषणैः ।
यावच्छक्योपचारैर्वा त्वर्चयेन्माममायया ॥२७॥
पहले संकल्प करे और फिर अपने गुरुदेवमें मेरी ही भावना रखकर उनकी पूजा करे ॥ १६ ॥ मेरी मूर्ति यदि शिलारूप हो तो स्नान करावे और यदि प्रतिमाकार हो तो केवल मार्जन ही करे । फिर प्रसिद्ध-प्रसिद्ध गन्ध और पुष्प आदिसे पूजा करे । इस प्रकार की हुई मेरी पूजा शीघ्र ही फल देनेवाली होती है ॥ १७ ॥ मनुष्यको सब प्रकारके छल-छिद्र छोड़कर गुरुकी बतायी विधिसे नियमबद्ध होकर मेरी पूजा करनी चाहिये । हे कुलन्दन ! प्रतिमा आदिका श्रृंगार करना मुझे अत्यन्त प्रिय है ॥ १८ ॥ यदि अग्निमें पूजा करनी हो तो आहुतिद्वारा करे और यदि सूर्यमें करनी हो तो वेदीमें सूर्यका आकार बनाकर करे । भक्तके द्वारा श्रद्धापूर्वक निवेदन किया हुआ जल भी मेरी प्रसन्नताका कारण होता है ॥ १९ ॥ फिर भक्ष्य, भोज्य आदि पदार्थ और गन्ध पुष्प अक्षत आदि पूजा-सामग्रीकी तो बात ही क्या है ? अतः पहले पूजाकी सब सामग्री इकट्ठी कर फिर मेरी पूजा आरम्भ करे ॥२०॥
( अब जिस प्रकार पूजा करनी चाहिये वह बतलाता हूँ— ) पहले क्रमशः कुशा, मृगचर्म और वस्त्र बिछा-कर आसन बनावे तथा उसपर शुद्धचित्तसे इष्टदेवके सम्मुख बैठे ॥ २१ ॥ तदनन्तर बहिर्मातृका और अन्तर्मातृका न्यास करे तथा केशव, नारायण आदि चौबीस नामोंका न्यास करके तत्त्वन्यास करे । उसके पश्चात् ( विष्णु पञ्जरोक्त विधिसे ) मेरी मूर्तिमें पञ्जर-न्यास तथा मन्त्रन्यास करे । मेरी प्रतिमा आदिमें भी निरालस्य-भावसे उसी प्रकार न्यास करना चाहिये ॥ २२-२३ ॥ तथा अपने सामने बायीं ओर कलश और दायीं ओर पुष्प आदि सामग्री रखे, उसी तरह अर्घ्य, पाद्य, मधुपर्क और आचमनके लिये चार पात्र रखे । तत्पश्चात् अपने सूर्यके समान तेजस्वी हृदय-कमलमें जीवनाम्नी मेरी कलाका ध्यान करे और हे शत्रुदमन ! अपने सम्पूर्ण शरीरको उससे व्याप्त देखे तथा प्रतिमा आदिका पूजन करते समय भी उन ( प्रतिमा आदि ) में उस जीवकलाका ही आवाहन करे ॥ २४-२६ ॥ पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, आभूषण आदिसे अथवा जो कुछ सामग्री मिल सके उसीसे, निष्कपट होकर मेरी पूजा करे ॥ २७ ॥
सर्ग ४ ] | किष्किन्धाकाण्ड | १७३
विभवे सति कर्पूरकुङ्कुमागुरुचन्दनैः ।
अर्चयेन्मन्त्रवन्नित्यं सुगन्धकुसुमैः शुभैः ॥२८॥
दशावरणपूजां वै ह्यागमोक्तां प्रकारयेत् ।
नीराजनैर्धूपदीपैर्नैवेद्यैर्बहुविस्तरैः ॥२९॥
श्रद्धयोपहरेन्नित्यं श्रद्धाभुगहमेश्वरः ।
होमं कुर्यात्प्रयत्नेन विधिना मन्त्रकोविदः ॥३०॥
अगस्त्येनोक्तमार्गेण कुण्डेनागमवित्तमः ।
जुहुयान्मूलमन्त्रेण पुंसूक्तेनाथवा बुधः ॥३१॥
अथचौपासनाग्नौ वा चरुणा हविषा तथा ।
तप्तजाम्बूनदप्रख्यं दिव्याभरणभूषितम् ॥३२॥
ध्यायेदनलमध्यस्थं होमकाले सदा बुधः ।
पार्षदेभ्यो बलिं दत्त्वा होमशेषं समापयेत् ॥३३॥
ततो जपं प्रकुर्वीत ध्यायेन्मां यतवाक् स्मरन् ।
मुखवासं च ताम्बूलं दत्त्वा प्रीतिसमन्वितः ॥३४॥
मदर्थे नृत्यगीतादि स्तुतिपाठादि कारयेत् ।
प्रणमेद्दण्डवद्भूमौ हृदये मां निधाय च ॥३५॥
शिरस्याधाय मदत्तं प्रसादं भावनामयम् ।
पाणिभ्यां मत्पदे मूर्ध्नि गृहीत्वा भक्तिसंयुतः ॥३६॥
रक्ष मां घोरसंसारादित्युक्त्वा प्रणमेत्सुधीः ।
उद्वासयेद्यथापूर्वं प्रत्यग्ज्योतिषि संस्मरन् ॥३७॥
एवमुक्तप्रकारेण पूजयेद्विधिवद्यदि ।
इहामुत्र च संसिद्धिं प्राप्नोति मदनुग्रहात् ॥३८॥
मद्भक्तो यदि मामेवं पूजां चैव दिने दिने ।
करोति मम सारूप्यं प्राप्नोत्येव न संशयः ॥३९॥
यदि धनवान् हो तो नित्यप्रति कर्पूर, कुंकुम, अगुरु, चन्दन और अत्युत्तम सुगन्धित पुष्पोंसे मन्त्रोच्चारण करता हुआ मेरी पूजा करे ॥ २८ ॥ तथा नीरांजन (पाँच बत्तियोंकी आरती), धूप, दीप और नाना प्रकारके नैवेद्योंद्वारा वेदोक्त दशावरण-पूजा-विधिसे मेरा अर्चन करे ॥ २९ ॥
नित्यप्रति अति श्रद्धाके साथ सब पदार्थ निवेदन करे क्योंकि मैं परमात्मा श्रद्धाका ही भूखा हूँ। मन्त्र-विधिको जाननेवाला उपासक पूजाके अनन्तर विधिपूर्वक हवन करे ॥ ३० ॥ शास्त्रविधिके जाननेवाले बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि अगस्त्य मुनिकी बतायी हुई विधिसे कुण्ड बनाकर उसमें गुरुके दिये हुए मूलमन्त्रसे अथवा पुरुषसूक्तके मन्त्रोंसे आहुति छोड़े ॥ ३१ ॥ अथवा अग्निहोत्रकी अग्निमें ही चरु तथा हविसे हवन करे। हवन करते समय बुद्धिमान् याजक होमाग्निमें 'तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाले सर्वालंकारविभूषित भगवान् यज्ञ-पुरुषके रूपमें' परमात्माका सदा ध्यान करे। और फिर मेरे पार्षदोंके लिये बलि देकर होम समाप्त कर दे ॥ ३२–३३ ॥
तदनन्तर मौन होकर मेरा ध्यान और स्मरण करता हुआ जप करे। फिर प्रीतिपूर्वक ताम्बूल और मुखवास देकर मेरे लिये नृत्य, गान और स्तुति-पाठ आदि करावे और हृदयमें मेरी मनोहर मूर्तिको धारण कर पृथिवी पर लोटकर साष्टांग दण्डवत् करे ॥ ३४–३५ ॥ मेरे दिये हुए भावनामय प्रसादको 'यह भगवत्प्रसाद है' ऐसी भावनासे शिरपर रखे और भक्तिभावसे विभोर हो मेरे चरणोंको अपने मस्तकपर रखकर और 'हे प्रभो! इस भयंकर संसारसे मुझे बचाओ' ऐसा कहकर मुझे प्रणाम करे, उसके बाद बुद्धिमान् उपासकको चाहिये कि प्रतिमामें आवाहन की हुई जीवकलाको 'वह मुझहीमें प्रवेश कर गयी है' ऐसी भावना करते हुए विसर्जन करे ॥ ३६–३७ ॥
जो पुरुष उपरोक्त प्रकारसे मेरी विधिपूर्वक पूजा करता है वह मेरी कृपासे इहलोक और परलोक दोनों जगह सिद्धि प्राप्त करता है ॥ ३८ ॥ यदि मेरा भक्त इस प्रकार नित्यप्रति पूजा करे तो वह मेरा सारूप्य प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ३९ ॥ यह अति
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| १७४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ४ |
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| इदं रहस्यं परमं च पावनं<br>मयैव साक्षात्कथितं सनातनम् ।<br>पठत्यजस्रं यदि वा शृणोति यः<br>स सर्वपूजाफलभाङ् न संशयः ॥४०॥ | गोपनीय पूजाविधि परम पवित्र और सनातन है । इसे साक्षात् मैंने ही अपने मुखसे कहा है । जो पुरुष इसे निरन्तर पढ़ता या सुनता है उसे निस्सन्देह सम्पूर्ण पूजाका फल मिलता है ॥ ४० ॥ |
| एवं परात्मा श्रीरामः क्रियायोगमनुत्तमम् ।<br>पृष्टः प्राह स्वभक्ताय शेषांशाय महात्मने ॥४१॥ | इस प्रकार अपने अनन्य भक्त शेषावतार महात्मा लक्ष्मणजीके पूछनेपर परमात्मा श्रीरामचन्द्रजीने इस अत्युत्तम क्रियायोगका उन्हें उपदेश किया ॥ ४१ ॥ फिर श्रीरामचन्द्रजी अपनी मायाका अवलम्बन कर साधारण पुरुषोंके समान दुःखित-से दिखायी देने लगे । वे 'हा सीते ! हा सीते !' कहते हुए सारी रात यों ही बिता देते, उन्हें किसी प्रकार नींद न आती ॥ ४२ ॥ |
| पुनः प्राकृतवद्रामो मायामालम्ब्य दुःखितः ।<br>हा सीतेति वदन्नैव निद्रां लेभे कथञ्चन ॥४२॥ | |
| एतस्मिन्नन्तरे तत्र किष्किन्धायां सुबुद्धिमान् ।<br>हनूमान्प्राह सुग्रीवमेकान्ते कपिनायकम् ॥४३॥ | इसी समय किष्किन्धापुरीमें परम बुद्धिमान् हनुमान्जीने वानरराज सुग्रीवसे एकान्तमें कहा—॥ ४३ ॥ "हे राजन् ! सुनिये, मैं आपके बड़े हितकी बात कहता हूँ । देखिये, श्रीरामचन्द्रजीने पहले आपका कितना बड़ा उपकार किया है ॥ ४४ ॥ किन्तु मुझे मालूम होता है आप कृतघ्नके समान उसे भूल गये हैं । अहो ! आपहीके लिये जिन्होंने त्रिलोकमान्य वीरवर वालीको मारा और आपको राजपद्पर बैठाया तथा ( जिनकी कृपासे ) आपको परम दुर्लभ तारा मिली वे ही बुद्धिमान् भगवान् राम अपने भाईके साथ पर्वत-शिखरपर रहते हुए अपने भारी कार्यके लिये एकाग्रचित्तसे आपके आनेकी बाट देख रहे हैं । किन्तु आप वानर-स्वभावके अनुसार स्त्री-लम्पट होकर सब कुछ भूल गये ॥ ४५–४७ ॥ आपने सीताजीकी खोजके विषयमें 'मैं अवश्य करूँगा' ऐसी प्रतिज्ञा करके भी अभीतक कुछ नहीं किया । आप बड़े ही कृतघ्न हैं । मालूम होता है वालीके समान आप भी शीघ्र ही कालके गालमें जायँगे" ॥ ४८ ॥ |
| शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि तवैव हितमुत्तमम् ।<br>रामेण ते कृतः पूर्वमुपकारो ह्यनुत्तमः ॥४४॥ | |
| कृतघ्नवच्चया नूनं विस्मृतः प्रतिभाति मे ।<br>त्वत्कृते निहतो वाली वीरस्त्रैलोक्यसम्मतः ॥४५॥ | |
| राज्ये प्रतिष्ठितोऽसि त्वं तारां प्राप्तोऽसि दुर्लभाम् ।<br>स रामः पर्वतस्याग्रे भ्रात्रा सह वसन्सुधीः ॥४६॥ | |
| त्वदागमनमेकाग्रभीक्षते कार्यगौरवात् ।<br>त्वं तु वानरभावेन स्त्रीसक्तो नावबुद्ध्यसे ॥४७॥ | |
| करोमीति प्रतिज्ञाय सीतायाः परिमार्गणम् ।<br>न करोषि कृतघ्नस्त्वं हन्यसे वालिवद्द्रुतम् ॥४८॥ | |
| हनूमद्वचनं श्रुत्वा सुग्रीवो भयविह्वलः ।<br>प्रत्युवाच हनूमन्तं सत्यमेव त्वयोदितम् ॥४९॥ | हनूमान्जीके वचन सुनकर सुग्रीव भयसे विह्वल हो गये और बोले—"हनूमन् ! तुम ठीक ही कहते हो ॥ ४९ ॥ अब तुम मेरी आज्ञासे शीघ्र ही दशों दिशाओंमें बड़े शीघ्रगामी दश सहस्र वानर भेजो ॥ ५०॥ वे सातों द्वीपोंमें रहनेवाले सम्पूर्ण वानरोंको यहाँ ले आवें और जितने मुख्य-मुख्य वानर हैं वे सब यहाँ एक पक्षके भीतर आ जायँ ॥ ५१ ॥ जो कोई एक |
| शीघ्रं कुरु ममाज्ञां त्वं वानराणां तरस्विनाम् ।<br>सहस्राणि दशेदानीं प्रेषयाशु दिशो दश ॥५०॥ | |
| सप्तद्वीपगतान्सर्वान्वानरानानानयन्तु ते ।<br>पक्षमध्ये समायान्तु सर्वे वानरपुङ्गवाः ॥५१॥ |
किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग ५: भगवान् रामका शोक और लक्ष्मणजीका किष्किन्धापुरीमें जाना
सर्ग ५ ]
किष्किन्धाकाण्ड
१७५
ये पक्षमतिवर्तन्ते ते वध्या मे न संशयः।
इत्याज्ञाप्य हनूमन्तं सुग्रीवो गृहमविशत् ॥५२॥
पक्षतक यहाँ न आयेगा वह निस्सन्देह मेरे हाथों मारा जायगा।” हनूमान्जीको इस प्रकार आज्ञा देकर सुग्रीव (फिर) अपने घरमें चले गये ॥ ५२ ॥
सुग्रीवाज्ञां पुरस्कृत्य हनूमान्मन्त्रिसत्तमः।
तत्क्षणे प्रेषयामास हरीन्दश दिशः सुधीः ॥५३॥
सुग्रीवकी आज्ञा पा परम बुद्धिमान् मन्त्रिप्रवर श्रीहनूमान्जीने तत्काल ही बहुत-से वानर दशों दिशाओंमें भेज दिये ॥ ५३ ॥
अगणितगुणसत्त्वान्वायुवेगप्रचारा-
न्वनचरगणमुख्यान् पर्वताकाररूपान्।
पवनहितकुमारः प्रेषयामास दूता-
नतिरभसतरात्मा दानमानादिवृत्तान् ॥५४॥
जो अगणित गुण और पराक्रमशाली थे तथा वायुके समान वेगवान् और पर्वतके समान स्थूलकाय थे, उन मुख्य-मुख्य वानर दूतोंको राम-कार्यके लिये अति उतावले पवननन्दन श्रीहनूमान्जीने दान-मानसे सन्तुष्ट कर सब ओर भेज दिया ॥५४॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
किष्किन्धाकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥४॥
पञ्चम सर्ग
भगवान् रामका शोक और लक्ष्मणजीका किष्किन्धापुरीमें जाना।
श्रीमहादेव उवाच
रामस्तु पर्वतस्याग्रे मणिसानौ निशामुखे।
सीताविरहजं शोकमसहन्निदमब्रवीत् ॥ १ ॥
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! एक दिन प्रदोषकाल (रात्रिके प्रथम भाग) में प्रवर्षंण पर्वतके मणिमय शिखरपर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजी सीताजीके विरह-जनित सन्तापको सहन न कर सकनेके कारण इस प्रकार बोले—॥ १ ॥
पश्य लक्ष्मण मे सीता राक्षसेन हृता बलात् ।
मृताऽमृता वा निश्चेतुं न जानेऽद्यापि भामिनीम् ॥२॥
“लक्ष्मण ! देखो, हमारी सीताको राक्षस बलात्कारसे हर ले गया; वह सुन्दरी जीवित है या मर गयी—इसका निश्चय करनेके लिये हमें अभीतक कुछ भी पता नहीं लगा ॥ २ ॥
जीवतीति मम ब्रूयात्कश्चिद्वा प्रियकृत्स मे।
यदि जानामि तां साध्वीं जीवन्तीं यत्र कुत्र वा ॥३॥
यदि कोई मुझे यह समाचार सुनावे कि ‘वह जीवित है’ तो वह मेरा बड़ा ही उपकार करेगा। यदि मुझे उस साध्वीके जीवित रहनेका पता लग जाय तो फिर वह कहीं
हठादेवाहरिष्यामि सुधामिव पयोनिधेः।
प्रतिज्ञां शृणु मे भ्रातर्येन मे जनकात्मजा ॥ ४ ॥
भी क्यों न हो, समुद्रमेंसे अमृतके समान मैं जैसे होगा वैसे उसे अवश्य ही तुरन्त ले आऊँगा। भाई ! मेरी प्रतिज्ञा सुनो—
नीता तं भस्मसात्कुर्यां सपुत्रबलवाहनम् ।
हे सीते चन्द्रवदने वसन्ती राक्षसालये ॥ ५ ॥
दुःखार्त्ता मामपश्यन्ती कथं प्राणान् धरिष्यसि ।
‘जो दुष्ट मेरी जानकीको ले गया है उसे पुत्र, सेना और वाहनोंके सहित मैं भस्म कर डालूँगा।’ हे चन्द्रवदने सीते ! मुझे न देखनेसे अत्यन्त दुःखातुर होकर राक्षसके घरमें रहती हुई तुम किस प्रकार प्राण धारण करोगी ? हा ! चन्द्रमुखी सीताके बिना तो
| १७६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ५ |
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चन्द्रोऽपि भानुवद्भाति मम चन्द्राननां विना ॥६॥
चन्द्र त्वं जानकीं स्पृष्ट्वा करैर्मां स्पृश शीतलैः । सुग्रीवोऽपि दयाहीनो दुःखितं मां न पश्यति ॥७॥
राज्यं निष्कण्टकं प्राप्य स्त्रीभिः परिवृतो रहः । कृतघ्नो दृश्यते व्यक्तं पानासक्तोऽतिकामुकः ॥८॥
नायाति शरदं पश्यन्नपि मार्गयितुं प्रियाम् । पूर्वोष्कारिणं दुष्टः कृतघ्नो विस्मृतो हि माम् ॥९॥
हन्मि सुग्रीवमप्येवं सपुरं सहबान्धवम् । वाली यथा हतो मेऽद्य सुग्रीवोऽपि तथा भवेत् ॥१०॥
इति रुष्टं समालोक्य राघवं लक्ष्मणोऽब्रवीत् । इदानीमेव गत्वाहं सुग्रीवं दुष्टमानसम् ॥११॥
मामाज्ञापय हत्वा तमायास्ये राम तेऽन्तिकम् । इत्युक्त्वा धनुरदाय स्वयं तूणीरमेव च ॥१२॥
गन्तुमभ्युद्यतं वीक्ष्य रामो लक्ष्मणमब्रवीत् । न हन्तव्यस्त्वया वत्स सुग्रीवो मे प्रियः सखा ॥१३॥
किन्तु भीषय सुग्रीवं वालिबत्त्वं हनिष्यसे । इत्युक्त्वा शीघ्रमादाय सुग्रीवप्रतिभाषितम् ॥१४॥
आगत्य पश्चाद्यत्कार्यं तत्करिष्याम्यसंशयम् । तथेति लक्ष्मणोऽगच्छत्त्वरितो भीमविक्रमः ॥१५॥
किष्किन्धां प्रति कोपेन निर्दहन्निव वानरान् । सर्वज्ञो नित्यलक्ष्मीको विज्ञानात्मापि राघवः ॥१६॥
सीतामनुशुशोचार्त्तः प्राकृतः प्राकृतामिव । बुद्ध्यादिसाक्षिणस्तस्य मायाकार्यातिवर्तिनः ॥१७॥
रागादिरहितस्यास्य तत्कार्यं कथमुद्भवेत् ।
मुझे चन्द्रमा भी सूर्यके समान (तापप्रद) जान पड़ता है ॥३-६॥ हे चन्द्र ! तुम अपनी किरणोंसे पहले जानकीको स्पर्श करो, (उनका स्पर्श करनेसे वे शीतल हो जायँगी) फिर उन शीतल किरणोंसे मुझे स्पर्श करना । हाय ! सुग्रीव भी कैसा निर्दयी हो गया है जो मुझ दुखियाकी ओर नहीं झाँकता ॥७॥ अहो ! निष्कण्टक राज्य पाकर मद्यपीनेमें आसक्त हुआ वह कामकिंकर स्त्रियोंसे घिरा एकान्तमें पड़ा रहता है। इससे वह स्पष्ट ही बड़ा कृतघ्न दीख पड़ता है ॥८॥ शरदऋतुका आगमन देखकर भी वह प्राणप्रिया सीताकी खोज करानेके लिये नहीं आया। मैंने उसका पहले उपकार किया है; तथापि वह दुष्ट कृतघ्न होकर मुझे भूल गया ॥९॥ (जिस प्रकार मुझे सीताको हर ले जानेवालेका नाश करना है) उसी प्रकार मैं सुग्रीवको भी उसके नगर और बन्धु-बान्धवोंके सहित मार डालूँगा । जैसे वाली मेरे हाथसे मारा गया वैसे ही आज सुग्रीव भी मारा जायगा” ॥१०॥
इस प्रकार रघुनाथजीको क्रुद्ध देखकर लक्ष्मणजी बोले— "हे राम ! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं अभी जाकर दुष्टचित्त सुग्रीवको मारकर आपके पास लौट आता हूँ।” ऐसा कह हाथमें धनुष और तरकश लेकर लक्ष्मणजीको अपने-आप ही जानेके लिये उद्यत देख श्रीरामचन्द्रजी बोले, "वत्स ! सुग्रीव मेरा प्यारा मित्र है, तुम उसे मारना मत ॥११-१३॥ केवल यह कहकर कि 'तू वालीके समान मारा जायगा' उसे डराना और फिर शीघ्र ही उसका उत्तर लेकर आ जाना । उस समय जो कुछ करना होगा मैं अवश्य वही करूँगा।”
तब महा पराक्रमी लक्ष्मणजी 'बहुत अच्छा' कह तुरन्त ही किष्किन्धापुरीमें आये । उस समय उन्होंने, क्रोधसे ऐसा उग्र रूप धारण किया था कि मानो सम्पूर्ण वानरोंको भस्म कर डालेंगे ।
श्रीरघुनाथजी सर्वज्ञ और ज्ञानस्वरूप हैं। श्रीलक्ष्मीजी सर्वदा उनकी सेवामें रहती हैं; तथापि साधारण स्त्रीके वियोगसे शोक करते हुए प्राकृत पुरुषके समान वे सीताजीके शोकसे विह्वल हो रहे हैं। वे प्रभु बुद्धि आदिके साक्षी, मायाके कार्योसे परे और राग-द्वेष आदि विकारोंसे रहित हैं फिर इन विकारोंका कार्य-रूप शोक उन्हें कैसे हो सकता है ? उन्होंने तो
सर्ग ५ ] किष्किन्धाकाण्ड १७७
ब्रह्मणोक्तमृतं कर्तुं राज्ञो दशरथस्य हि ॥१८॥
तपसः फलदानाय जातो मानुषवेषधृक् ।
मायया मोहिताः सर्वे जना अज्ञानसंयुताः ॥१९॥
कथमेषां भवेन्मोक्ष इति विष्णुर्विचिन्तयन् ।
कथां प्रथयितुं लोके सर्वलोकमलापहाम् ॥२०॥
रामायणाभिधां रामो भूत्वा मानुषचेष्टकः ।
क्रोधं मोहं च कामं च व्यवहारार्थसिद्धये ॥२१॥
तत्तत्कालोचितं गृह्णन् मोहयत्यवशाः प्रजाः ।
अनुरक्त इवाशेषगुणेषु गुणवर्जितः ॥२२॥
विज्ञानमूर्तिर्विज्ञानशक्तिः साक्ष्यगुणान्वितः ।
अतः कामादिभिर्नित्यमविलिप्तो यथा नभः ॥२३॥
विन्दन्ति मुनयः केचिञ्जानन्ति जनकादयः ।
तद्भक्ता निर्मलात्मानः सम्यग् जानन्ति नित्यदा ।
भक्तचित्तानुसारेण जायते भगवानजः ॥२४॥
लक्ष्मणोऽपि तदा गत्वा किष्किन्धानगरान्तिकम्।
ज्याघोषमकरोत्तीव्रं भीपयन् सर्ववानरान् ॥२५॥
तं दृष्ट्वा प्राकृतास्तत्र वानरा वप्रमूर्धनि ।
चक्रुः किलकिलाशब्दं धृतपाषाणपादपाः ॥२६॥
तान्दृष्ट्वा क्रोधताम्राक्षो वानरान् लक्ष्मणस्तदा।
निर्मूलान्कर्तुमुद्युक्तो धनुरानम्य वीर्यवान् ॥२७॥
ततः शीघ्रं समाप्लुत्य ज्ञात्वा लक्ष्मणमागतम्॥२८॥
निवार्य वानरान् सर्वानङ्गदो मन्त्रिसत्तमः ।
गत्वा लक्ष्मणसामीप्यं प्रणनाम स दण्डवत्॥२९॥
ततोऽङ्गदं परिष्वज्य लक्ष्मणः प्रियवर्धनः ।
२३
ब्रह्माजीकी वाणी सत्य करने और महाराज दशरथको उनकी तपस्याका फल देनेके लिये ही मनुष्यरूपसे अवतार लिया है। 'सब लोग मायासे मोहित होकर अज्ञानके वशीभूत हो गये हैं, उससे इनका किस प्रकार छुटकारा हो' यह सोचकर भगवान् विष्णु अपनी सकल-लोक-मलापहारिणी रामायण नामकी कथाका लोकमें विस्तार करनेके लिये रामरूप होकर मनुष्यके समान अनेकों लीलाएँ करते हुए व्यवहारकी सिद्धि-के लिये समयानुकूल क्रोध, मोह और काम आदि विकारोंको स्वीकार करके विकारोंके वशीभूत हुई प्रजाको अपनी लीलासे मोहित कर रहे हैं। किन्तु सम्पूर्ण गुणोंमें अनुरक्त-से दिखलायी देते हुए भी वे वास्तवमें उन सबसे रहित हैं ॥१४–२२॥ वे विज्ञानस्वरूप हैं, विज्ञान ही उनकी शक्ति है तथा एकमात्र साक्षी और गुणातीत हैं। इसलिये वे आकाशके समान काम आदि (मनोविकारों) से सर्वदा अलिप्त हैं ॥२३॥ उनके वास्तविक स्वरूपको कोई-कोई मुनिजन, जनकादि राजर्षिगण तथा उनके विशुद्ध-चित्त भक्तजन ही सदा ठीक-ठीक जान पाते हैं, वे अजन्मा भगवान् भक्तकी भावनाके अनुसार अवतार लेते हैं ॥२४॥
इधर, लक्ष्मणजीने किष्किन्धापुरीके पास पहुँचकर सम्पूर्ण वानरोंको भयभीत करते हुए अपने धनुषकी प्रत्यञ्चाका बड़ा भयंकर टंकार किया ॥२५॥ उस समय नगरके परकोटेपर चढ़े हुए कुछ साधारण वानर लक्ष्मणजीको देखकर अपने हाथोंमें पत्थर और वृक्षादि लेकर किलकारी मारने लगे। उन वानरोंको देखकर वीरवर लक्ष्मणजीके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वे धनुष चढ़ाकर उनका मूलोच्छेद करनेके लिये तत्पर हुए ॥२६-२७॥
तब लक्ष्मणजीको आये जान वहाँ मन्त्रिवर अंगदजी तुरन्त ही उछलकर आये और उन्होंने सब वानरोंको रोककर उनके पास जाकर दण्डवत् प्रणाम किया ॥२८-२९॥ तदनन्तर, प्रियवर्द्धन श्रीलक्ष्मणजीने अंगदको हृदयसे लगाकर कहा—"वत्स! तुम अभी जाकर अपने काका सुग्रीवको सूचना दो कि श्रीरघुनाथजी