अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग ३: ताराका विलाप, श्रीरामचन्द्रजीका उसे समझाना तथा सुग्रीवका राज्याभिषेक
सर्ग ३ ] किष्किन्धाकाण्ड : १६५
अनुजानीहि मां राम यान्तं त्वत्पदमुत्तमम् । मम तुल्यबले बाले अङ्गदे त्वं दयां कुरु ॥ ६९ ॥
विशल्यं कुरु मे राम हृदयं पाणिना स्पृशन् । तथेति बाणमुद्धृत्य रामः पस्पर्श पाणिना । त्यक्त्वा तद्वानरं देहममरेन्द्रोऽभवत्क्षणात् ॥ ७० ॥
वाली रघूत्तमशराभिहतो विमृष्टो रामेण शीतलकरेण सुखाकरेण । सद्यो विमुच्य कपिदेहमनन्यलभ्यं प्राप्तं परं परमहंसगणैर्दुरापम् ॥ ७१ ॥
आपके सर्वश्रेष्ठ परमधामको जा रहा हूँ, आप मुझे आज्ञा दीजिये । मेरा बालक अंगद मेरे ही समान बलशाली है, उसपर आप दयादृष्टि रखें ॥ ६९ ॥
हे राम ! मेरे हृदयको अपने कर-कमलोंसे स्पर्शकर इस बाणको निकाल दीजिये।" तब रामचन्द्रजीने 'अच्छा' कह उसे स्पर्श करते हुए वह बाण निकाल दिया । उसके निकलते ही वाली वानर-शरीर छोड़कर इन्द्र-रूप हो गया ॥ ७० ॥
हे पार्वति ! वाली रघुनाथजीके बाणसे मारा गया था और फिर उसे उनके सुखमय कर-कमलका शीतल स्पर्श भी मिला । अतः वह शीघ्र ही अपना वानर-देह छोड़कर उस परम श्रेष्ठ पदको प्राप्त हुआ जो और किसीके लिये बहुत ही दुर्लभ है। और तो क्या, महान् परमहंसोंको भी उसका मिलना अत्यन्त कठिन है ॥ ७१ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे किष्किन्धाकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
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तृतीय सर्ग
ताराका विलाप, श्रीरामचन्द्रजीका उसे समझाना तथा सुग्रीवका राजपद प्राप्त करना ।
श्रीमहादेव उवाच
निहते वालिनि रणे रामेण परमात्मना । दुद्रुवुर्वानराः सर्वे किष्किन्धां भयविह्वलाः ॥ १ ॥
तारामूचुर्महाभागे हतो वाली रणाजिरे । अङ्गदं परिरक्षाद्य मन्त्रिणः परिनोदय ॥ २ ॥
चतुर्द्वार कपातादीन् बद्ध्वा रक्षामहे पुरीम् । वानराणां तु राजानमङ्गदं कुरु भामिनि ॥ ३ ॥
निहतं वालिनं श्रुत्वा तारा शोकविमूर्च्छिता । अताडयत्स्वपाणिभ्यां शिरो वक्षश्च भूरिशः ॥ ४ ॥
किमङ्गदेन राज्येन नगरेण धनेन वा । इदानीमेव निधनं यास्यामि पतिना सह ॥ ५ ॥
श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! परमात्मा रामके द्वारा युद्धमें वालीके मारे जानेपर समस्त वानरगण भयसे व्याकुल होकर किष्किन्धापुरीमें दौड़े गये ॥ १ ॥
और तारासे बोले— "हे महाभागे ! वानरराज वाली युद्धक्षेत्रमें मारे गये । अब आप राजकुमार अंगदकी रक्षा कीजिये और मन्त्रियोंको सावधान कर दीजिये ॥ २ ॥
हे भामिनि ! हमलोग चारों द्वारोंके किवाड़ आदि लगाकर नगरकी रक्षा करते हैं, आप अंगदको वानरोंका राजा बनाइये" ॥ ३ ॥
वालीको मरा हुआ सुनकर तारा शोकसे मूर्च्छित हो गयी और अपने शिर और छातीको बारम्बार हाथोंसे पीटने लगी ॥ ४ ॥
और बोली, "मुझे अंगद, राज्य, नगर और धन आदिसे क्या काम है, मैं तो अभी अपने पतिदेवके साथ ही प्राण त्याग करूँगी" ॥ ५ ॥ ऐसा कह वह रोती हुई तुरन्त ही वहाँ
१६६ अध्यात्मरामायण [सर्ग ३
इत्युक्त्वा त्वरिता तत्र रुदती मुक्तमूर्धजा ।
ययौ ताराऽतिशोकार्ता यत्र भर्तृकलेवरम् ॥ ६ ॥
पतितं वालिनं दृष्ट्वा रक्तैः पांसुभिरावृतम् ।
रुदती नाथनाथेति पतिता तस्य पादयोः ॥ ७ ॥
करुणं विलपन्ती सा ददर्श रघुनन्दनम् ।
राम मां जहि बाणेन येन वाली हतस्त्वया ॥ ८ ॥
गच्छामि पतिसालोक्यं पतिर्मामभिकाङ्क्षते ।
स्वर्गेऽपि न सुखं तस्य मां विना रघुनन्दन ॥ ९ ॥
पत्नीवियोगजं दुःखमनुभूतं त्वयाऽनघ ।
वालिने मां प्रयच्छाशु पत्नीदानफलं भवेत् ॥ १० ॥
सुग्रीव त्वं सुखं राज्यं दापितं वालिघातिना ।
रामेण रुमया सार्धं भुङ्क्ष्व सापत्नवजितम् ॥ ११ ॥
इत्येवं विलपन्तीं तां तारां रामो महामनाः ।
सान्त्वयामास दयया तत्त्वज्ञानोपदेशतः ॥ १२ ॥
किं भीरु शोचसि व्यर्थं शोकस्याविषयं पतिम् ।
पतिस्तवायं देहो वा जीवो वा वद तत्त्वतः ॥ १३ ॥
पञ्चात्मको जडो देहस्त्वङ्मांसरुधिरास्थिमान् ।
कालकर्मगुणोत्पन्नः सोऽप्यास्तेऽद्यापि ते पुरः ॥ १४ ॥
मन्यसे जीवमात्मानं जीवस्तर्हि निरामयः ।
न जायते न म्रियते न तिष्ठति न गच्छति ॥ १५ ॥
न स्त्री पुमान्न षण्ढो वा जीवः सर्वगतोऽव्ययः ।
एक एवाद्वितीयोऽयमाकाशवदलेपकः ।
नित्यो ज्ञानमयः शुद्धः स कथं शोकमर्हति ॥ १६ ॥
गयी जहाँ उसके पतिका देह पड़ा हुआ था, उस समय वह अत्यन्त शोकाकुल थी और उसके बाल बिखरे हुए थे ॥ ६ ॥ वहाँ वालीको रक्त और धूलिसे लथपथ पड़ा देख वह 'हा नाथ ! हा नाथ !' कहकर रोती हुई उसके पैरोंपर गिर पड़ी ॥ ७ ॥
इस प्रकार करुणक्रन्दन करते हुए उसकी दृष्टि श्रीरघुनाथजीपर पड़ी । (उन्हें देखकर वह बोली—) "राम ! आपने जिस बाणसे वालीको मारा है उसीसे मुझे भी मार डालिये ॥ ८ ॥ जिससे मैं तुरन्त ही पति-लोकको चली जाऊँ; वे मेरी बाट देख रहे होंगे, क्योंकि हे रघुनन्दन ! मेरे विना उन्हें स्वर्गमें भी चैन नहीं होगा ॥ ९ ॥ हे अनघ ! पत्नीके वियोगका दुःख आपने अनुभव किया ही है (अतः आपको उसकी तीव्रताका अनुमान हो ही सकता है।) इसलिये अब आप मुझे वालीके पास पहुँचा दीजिये । इससे आपको स्त्री-दानका फल मिलेगा ॥ १० ॥ सुग्रीव ! तुम्हें वालीको मारनेवाले रामने राज्य दिला ही दिया है । अब उस निष्कण्टक राज्यको तुम रुमाके साथ सुखपूर्वक भोगो" ॥ ११ ॥
इस प्रकार विलाप करती हुई उस ताराको महामना रामने दयापूर्वक तत्त्वज्ञानका उपदेश देकर शान्त किया ॥ १२ ॥ वे बोले—"अयि भीरु ! तेरा पति शोक करनेयोग्य नहीं है, तू उसके लिये व्यर्थ क्यों शोक करती है ? तू विचारकर ठीक-ठीक बता वास्तवमें तेरा पति यह देह है या इसमें रहनेवाला जीव ? (यदि यह देह ही तेरा पति है तो) यह तो जड, पञ्चभूतजय एवं त्वचा, मांस, रुधिर और अस्थियोंसे बना हुआ है तथा काल, कर्म और गुणोंसे उत्पन्न हुआ है; और वह तो अब भी तेरे सामने पड़ा है । (फिर उसके लिये शोक क्यों करती है ?) ॥ १३-१४ ॥ और यदि तू जीवको अपना पति मानती है तो भी तुझे शोक न करना चाहिये क्योंकि वह निर्विकार है। वह न उत्पन्न होता है, न मरता है, न स्थिर रहता है और न आता-जाता है ॥ १५ ॥ जीव सर्वव्यापी और अव्यय है, वह स्त्री, पुरुष अथवा नपुंसक कुछ भी नहीं है बल्कि एक, अद्वितीय, आकाशके समान निर्लेप, नित्य, ज्ञानमय और शुद्ध है फिर वह शोचनीय कैसे हो सकता है ?" ॥ १६ ॥
सर्ग ३ ]
किष्किन्धाकाण्ड
१६७
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तारोवाच<br>देहोऽचित्काष्ठवद्राम जीवो नित्यश्चिदात्मकः ।<br>सुखदुःखादिसम्बन्धः कस्य स्याद्राम मे वद ॥१७॥ | तारा बोली- हे राम ! देह तो काष्ठके समान जड है और जीव नित्य तथा चैतन्यरूप है, (उसका नाश हो नहीं सकता) फिर सुख-दुःखादिका सम्बन्ध किससे होता है, यह मुझे बतलाइये ॥ १७ ॥ |
| श्रीराम उवाच<br>अहङ्कारादिसम्बन्धो यावद्देहेन्द्रियैः सह ।<br>संसारस्तावदेव स्यादात्मनस्त्वविवेकिनः ॥१८॥ | श्रीरामचन्द्रजी बोले- जबतक देह और इन्द्रियोंके साथ 'मैं' 'मेरापन' आदिका सम्बन्ध रहता है तबतक आत्मा और अनात्माके विवेकसे रहित जीवका सुख-दुःखादिके भोगरूप संसारसे सम्बन्ध रहता है ॥ १८ ॥ |
| मिथ्याऽऽरोपितसंसारो न स्वयं विनिवर्तते ।<br>विषयान्ध्यायमानस्य स्वप्ने मिथ्याऽऽगमो यथा ॥१९॥ | यह संसार आत्मामें मिथ्या ही आरोपित हुआ है तथापि ज्ञानोदयके बिना यह अपने-आप निवृत्त नहीं होता; जिस प्रकार विषयोंका निरन्तर ध्यान करनेवाले पुरुषको स्वप्नमें अनेक पदार्थ दीखते हैं, परन्तु वे होते मिथ्या ही हैं ॥१९॥ |
| अनाद्यविद्यासम्बन्धात्तत्कार्याहङ्कृतेस्तथा ।<br>संसारोऽपार्थकोऽपि स्याद्रागद्वेषादिसङ्कुलः ॥२०॥ | अनादि अविद्या और उसके कार्य अहंकारके सम्बन्धसे स्थित हुआ यह संसार निरर्थक (अत्यन्त मिथ्या) होते हुए भी राग-द्वेष आदिसे पूर्ण है ॥ २० ॥ |
| मन एव हि संसारो बन्धश्चैव मनः शुभे ।<br>आत्मा मनः समानत्वमेत्य तद्गतबन्धभाक् ॥२१॥ | हे शुभे ! मन ही संसार है और मन ही बन्धन है । उस अनात्म वस्तु मनके साथ (अन्योन्याध्याससे) एक हो जानेसे ही यह आत्मा तद्गत सुख-दुःखादिके बन्धनमें पड़ता है ॥ २१ ॥ |
| यथा विशुद्धः स्फटिकोऽलक्तकादिसमीपगः ।<br>तत्तद्वर्णयुगाभाति वस्तुतो नास्ति रञ्जनम् ॥२२॥ | जैसे स्फटिकमणि स्वभावसे शुक्लवर्ण होने पर भी लाख आदिके समीप होनेपर उसीके रंगकी मालूम होने लगती है, परन्तु वास्तवमें उसमें वह रंग नहीं होता ॥ २२ ॥ |
| बुद्धीन्द्रियादिसामीप्यादात्मनः संसृतिर्बलात् ।<br>आत्मा स्वलिङ्गं तु मनः परिगृह्य तदुद्भवन् ॥२३॥<br><br>कामान् जुषन् गुणैर्बद्धः संसारे वर्ततेऽवशः ।<br>आदौ मनोगुणान् सृष्ट्वा ततः कर्माण्यनेकधा ॥२४॥<br><br>शुक्ललोहितकृष्णानि गतयस्तत्समानतः ।<br>एवं कर्मवशाज्जीवो भ्रमत्याभूतसम्प्लवम् ॥२५॥ | वैसे ही बुद्धि और इन्द्रिय आदिकी सन्निधिसे आत्माको बलात्कारसे संसारकी प्रतीति होती है। आत्मा, अपने लिंग (पहचाननेके साधन) मनको स्वीकार कर उससे प्राप्त होनेवाले विषयोंका सेवन करता हुआ उसके राग-द्वेषादि गुणोंमें बँधकर विवश हो संसार-चक्रमें फँसा रहता है। पहले वह राग-द्वेषादि मनके गुणोंकी रचना करता है और फिर (उनके योगसे) नाना प्रकारके कर्म करता है । वे कर्म शुक्ल (जप, ध्यानादि) लोहित (हिंसामय यज्ञ-यागादि) और कृष्ण (मद्यपानादि पापकर्म) तीन प्रकारके होते हैं । उन कर्मोंके अनुसार ही उसकी गतियाँ होती हैं । इस प्रकार यह जीव कर्मोंके वशीभूत होकर प्रलय-पर्यन्त आवागमनके चक्रमें पड़ा रहता है ॥२३-२५॥ |
| सर्वोपसंहृतौ जीवो वासनाभिः स्वकर्मभिः ।<br>अनाद्यविद्यावशगास्तिष्ठत्यभिनिवेशतः ॥२६॥ | प्रलयकालमें सब भूतोंका लय हो जानेपर भी अपने कर्त्ता-भोक्तापनके अभिनिवेशसे यह अपनी... |
| १६८ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सृष्टिकाले पुनः पूर्ववासनामानसैः सह ।<br>जायते पुनरप्येवं घटीयन्त्रमिवावशः ॥२७॥ | वासनाओं और कर्मोंके साथ अनादि अविद्यासे आच्छादित हुआ रहता है ॥२६॥ जब नवीन सृष्टि आरम्भ होती है तो यह विवश होकर अपनी पूर्व वासनाओंसे युक्त मनके सहित घटीयन्त्रके समान फिर उत्पन्न हो जाता है ॥ २७ ॥ |
| यदा पुण्यविशेषेण लभते सङ्गतिं सताम् ।<br>मद्भक्तानां सुशान्तानां तदा मद्विषया मतिः ॥२८॥ | जिस समय किसी विशेष पुण्यपरिपाकसे इसे मेरे भक्त और शान्तचित्त महात्माओंकी संगति मिलती है उस समय इसका चित्त मेरी ओर लगता है ॥ २८ ॥ |
| मत्कथाश्रवणे श्रद्धा दुर्लभा जायते ततः ।<br>ततः स्वरूपविज्ञानमनायासेन जायते ॥२९॥ | उससे मेरी कथा सुननेमें इसकी श्रद्धा होती है, जो बहुत ही दुर्लभ है। मेरी कथा सुननेसे इसको अनायास ही मेरे स्वरूपका ज्ञान हो जाता है ॥ २९ ॥ |
| तदाचार्यप्रसादेन वाक्यार्थज्ञानतः क्षणात् ।<br>देहेन्द्रियमनःप्राणाहङ्कृतिभ्यः पृथक्स्थितम् ॥३०॥ | उस समय गुरु-कृपाद्वारा तत्त्वमसि आदि महावाक्योंके अर्थ-ज्ञानसे तथा स्वयं अपने अनुभवसे भी यह अपने सच्चिदानन्दस्वरूप अद्वितीय आत्माको देह, इन्द्रिय, मन, प्राण और अहंकारादिसे पृथक् जानकर एक क्षणमें ही तुरन्त मुक्त हो जाता है। हे तारे ! मैंने यह वास्तविक सत्य तुझसे कह दिया ॥ ३०-३१ ॥ |
| स्वात्मानुभवतः सत्यमानन्दात्मानमद्वयम् ।<br>ज्ञात्वा सद्यो भवेन्मुक्तः सत्यमेव मयोदितम् ॥३१॥ | |
| एवं मयोदितं सम्यगालोचयति योऽनिशम् ।<br>तस्य संसारदुःखानि न स्पृशन्ति कदाचन ॥३२॥ | मेरे कहे हुए इस परमार्थ-ज्ञानका जो अहर्निश मनन करता है उसे सांसारिक दुःख कभी स्पर्श नहीं करते ॥ ३२ ॥ |
| त्वमप्येतन्मया प्रोक्तमालोचय विशुद्धधीः ।<br>न स्पृश्यसे दुःखजालैः कर्मबन्धाद्विमोक्ष्यसे ॥३३॥ | तू भी शुद्ध-चित्त होकर मेरे इस उपदेशका मनन कर । ऐसा करनेसे क्लेश-कलाप तुझे छू भी न सकेंगे और तू कर्म-बन्धनसे मुक्त हो जायगी ॥ ३३ ॥ |
| पूर्वजन्मनि ते सुभ्रु कृता मद्भक्तिरुत्तमा ।<br>अतस्तव विमोक्षाय रूपं मे दर्शितं शुभे ॥३४॥ | हे सुभ्रु ! अपने पूर्वजन्ममें तूने मेरी उत्कृष्ट भक्ति की थी, इसीलिये हे सुन्दरि ! तुझे मुक्त करनेके लिये मैंने अपना दर्शन दिया है ॥ ३४ ॥ |
| ध्यात्वा मद्रूपमनिशमालोचय मयोदितम् ।<br>प्रवाहपतितं कार्यं कुर्वन्त्यपि न लिप्यसे ॥३५॥ | तू रात-दिन मेरे रूपका ध्यान करती हुई मेरे उपदेशका मनन कर । ऐसा करनेसे प्रारब्ध-क्रमसे प्राप्त हुए कर्मोंको करती हुई भी तू उनसे लिप्त न होगी ॥ ३५ ॥ |
| श्रीरामेणोदितं सर्वं श्रुत्वा ताराऽतिविस्मिता ।<br>देहाभिमानजं शोकं त्यक्त्वा नत्वा रघूत्तमम् ॥३६॥ | भगवान् रामका यह अद्भुत उपदेश सुनकर ताराको बड़ा ही विस्मय हुआ और उसने देहाभिमानजनित शोक छोड़कर श्रीरघुनाथजीको प्रणाम किया, तथा आत्मानुभवसे सन्तुष्ट होकर वह तत्काल जीवन्मुक्त हो गयी । |
| आत्मानुभवसन्तुष्टा जीवन्मुक्ता बभूव ह ।<br>क्षणसङ्गममात्रेण रामेण परमात्मना ॥३७॥ | परमात्मा रामके क्षणमात्रके सत्संगसे वह अनादि अविद्याके बन्धनको काटकर निष्पाप और मुक्त हो गयी । |
| अनादिबन्धं निर्धूय मुक्ता साऽपि विकल्मषा ।<br>सुग्रीवोऽपि च तच्छ्रुत्वा रामवक्त्रात्समीरितम् ॥३८॥ | भगवान्के श्रीमुखका वक्तव्य सुनकर सुग्रीवका भी समस्त अज्ञान जाता रहा और वह शान्त- |
सर्ग ३] किष्किन्धाकाण्ड १६९
जहावज्ञानमखिलं स्वस्थचित्तोऽभवत्तदा । ततः सुग्रीवमाहेदं रामो वानरपुङ्गवम् ॥३९॥ भ्रातुर्ज्येष्ठस्य पुत्रेण यद्युक्तं साम्परायिकम् । कुरु सर्वं यथान्यायं संस्कारादि ममाज्ञया ॥४०॥ तथेति वलिभिर्मुख्यैर्वानरैः परिणीय तम् । वालिनं पुष्पके क्षिप्त्वा सर्वराजोपचारकैः ॥४१॥ भेरीदुन्दुभिनिर्घोषैर्ब्राह्मणैर्मन्त्रिभिः सह । यूथपैर्वानरैः पौरैस्तारया चाङ्गदेन च ॥४२॥ गत्वा चकार तत्सर्वं यथाशास्त्रं प्रयत्नतः । स्नात्वा जगाम रामस्य समीपं मन्त्रिभिः सह ॥४३॥ नत्वा रामस्य चरणौ सुग्रीवः प्राह हृष्टधीः । राज्यं प्रशाधि राजेन्द्र वानराणां समृद्धिमत् ॥४४॥ दासोऽहं ते पादपद्मं सेवे लक्ष्मणवच्चिरम् ।
इत्युक्तो राघवः प्राह सुग्रीवं सस्मितं वचः ॥४५॥ त्वमेवाहं न सन्देहः शीघ्रं गच्छ ममाज्ञया । पुरराज्याधिपत्ये त्वं स्वात्मानमभिषेचय ॥४६॥ नगरं न प्रवेक्ष्यामि चतुर्दश समाः सखे । आगमिष्यति मे भ्राता लक्ष्मणः पत्तनं तव ॥४७॥ अङ्गदं यौवराज्ये त्वमभिषेचय सादरम् । अहं समीपे शिखरे पर्वतस्य सहानुजः ॥४८॥ वत्स्यामि वर्षदिवसांस्ततस्त्वं यत्नवान् भव । किञ्चित्कालं पुरे स्थित्वा सीतायाः परिमार्गणे ॥४९॥ साष्टाङ्गं प्रणिपत्याह सुग्रीवो रामपादयोः । यदाऽऽज्ञापयसे देव तत्तथैव करोम्यहम् ॥५०॥ अनुज्ञातश्च रामेण सुग्रीवस्तु सलक्ष्मणः । गत्वा पुरं तथा चक्रे यथा रामेण चोदितः ॥५१॥
चित्त हो गया। तदनन्तर भगवान्ने वानरश्रेष्ठ सुग्रीवसे कहा-॥३६-३९॥ "हे सुग्रीव ! तुम मेरी आज्ञासे बेटा अंगदके द्वारा अपने बड़े भाईका जो कुछ शास्त्रोक्त और्ध्वदैहिक कर्म हो वह सब विधिपूर्वक करो" ॥४०॥ तब 'जो आज्ञा' कह मुख्य-मुख्य बलवान् वानरोंके साथ वालीके शवको फूलोंके विमानपर रखकर समस्त राजोचित उपचारोंके सहित भेरी और दुन्दुभि आदिका घोष करते हुए ब्राह्मण, मन्त्रिवर्ग, यूथपति वानरगण, पुरवासी, तारा और अंगदके साथ उसे ले जाकर सुग्रीवने बड़े प्रयत्नसे शास्त्रानुकूल सब संस्कार किये और फिर स्नानादि करके मन्त्रियोंके साथ रामके पास लौट आया ॥४१-४३॥
वहाँ आकर सुग्रीवने प्रसन्न चित्तसे श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें प्रणाम करके कहा-"हे राजराजेश्वर ! वानरोंके इस समृद्धिसम्पन्न राज्यका शासन कीजिये ॥४४॥ मैं तो आपका दास हूँ; लक्ष्मणके समान मैं भी सदा आपके चरणकमलोंकी सेवा करता रहूँगा।"
यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने सुग्रीवसे मुसकाते हुए कहा-॥४५॥ "सुग्रीव ! मैं और तू एक ही हैं-इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं। मेरी आज्ञासे तुम तुरन्त ही जाकर किष्किन्धाके राजपदपर अपना अभिषेक कराओ॥४६॥ हे सखे! मैं चौदह वर्षतक किसी भी नगरमें प्रवेश नहीं कर सकता इसलिये तुम्हारे राज्याभिषेकके समय भाई लक्ष्मण तुम्हारे नगरमें आयेगा ॥४७॥ अंगदको तुम आदरपूर्वक यौवराज्यपदपर अभिषिक्त करना। अब मैं वर्षाके दिनोंमें भाई लक्ष्मणके साथ यहाँ पास ही पर्वत-शिखरपर रहूँगा, सो तुम कुछ दिन नगरमें रहकर फिर सीताजीकी खोज करानेका प्रयत्न करना"॥४८-४९॥
तब सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें साष्टांग दण्डवत् करके कहा-"भगवन् ! आपकी जैसी आज्ञा होगी मैं वही करूँगा" ॥५०॥ फिर भगवान् रामकी आज्ञा पा सुग्रीव लक्ष्मणजीको साथ लेकर किष्किन्धापुरीमें गये और जैसे-जैसे श्रीरामचन्द्रजीने करनेको कहा था सब कार्य वैसे ही किया ॥५१॥ तदनन्तर सुग्रीवसे
२२
किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग ४: भगवान् रामका लक्ष्मणजीसे क्रिया-योगका वर्णन
| १७० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ४ |
|---|
सुग्रीवेण यथान्यायं पूजितो लक्ष्मणस्तदा ।
आगत्य राघवं शीघ्रं प्रणिपत्योपतस्थिवान् ॥५२॥
ततो रामो जगामाशु लक्ष्मणेन समन्वितः ।
प्रवर्षणगिरेरूर्ध्वं शिखरं भूरिविस्तरम् ॥५३॥
तत्रैकं गह्वरं दृष्ट्वा स्फाटिकं दीप्तिमच्छुभम् ।
वर्षवातातपसहं फलमूलसमीपगम् ।
वासाय रोचयामास तत्र रामः सलक्ष्मणः ॥५४॥
दिव्यमूलफलपुष्पसंयुते
मौक्तिकोपमजलौघपल्वले ।
चित्रवर्णमृगपक्षिशोभिते
पर्वते रघुकुलोत्तमोऽवसत् ॥५५॥
यथोचित आदर पा लक्ष्मणजी श्रीरघुनाथजीके पास चले आये और उनके चरणोंमें प्रणाम कर उनकी सेवामें उपस्थित हो गये ॥ ५२ ॥
तब श्रीरामचन्द्रजी तत्काल ही लक्ष्मणके साथ प्रवर्षण पर्वतके ऊपर अति विस्तीर्ण शिखरपर गये ॥ ५३ ॥ वहाँ उन्होंने स्फटिकमणिकी एक स्वच्छ और प्रकाशमान गुफा देखी। उसमें वर्षा, वायु और धूपसे बचनेका सुभीता था तथा पास ही कन्द, मूल और फल भी लगे हुए थे। उसे देखकर श्रीराम और लक्ष्मणने वहीं रहना पसन्द किया ॥ ५४ ॥ तब रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजी दिव्य मूल फल और फूलोंसे सम्पन्न, मोतीके समान स्वच्छ जलवाले सरोवरोंसे युक्त और चित्र-विचित्र मृग तथा पक्षियोंसे सुशोभित उस प्रवर्षण पर्वतपर रहने लगे ॥ ५५ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
किष्किन्धाकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥३॥
चतुर्थ सर्ग
भगवान् रामका लक्ष्मणजीसे क्रियायोगका वर्णन करना।
श्रीमहादेव उवाच
तत्र वार्षिकादिनानि राघवो
लीलया मणिगुहासु सञ्चरन् ।
पक्कमूलफलभोगतोषितो
लक्ष्मणेन सहितोऽवसत्सुखम् ॥ १ ॥
वातनुन्नजलपूरितमेघा-
नन्तरस्तनितविद्युतगर्भान् ।
वीक्ष्य विस्मयमगाद्गजयूथा-
न्यङ्गदाहितसुकाञ्चनकक्षान् ॥ २ ॥
नवघासं समास्वाद्य हृष्टपुष्टमृगद्विजाः ।
धावन्तः परितो रामं वीक्ष्य विस्फारितेक्षणाः ॥३॥
न चलन्ति सदाध्याननिष्ठा इव मुनीश्वराः ।
रामं मानुषरूपेण गिरिकाननभूमिषु ॥ ४ ॥
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति! वहाँ श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणजीके साथ लीलासे ही मणिमय गुफाओंमें विचरते और पके हुए फल-फूल खाकर निर्वाह करते हुए वर्षाके दिनोंमें आनन्दपूर्वक रहे ॥ १ ॥ वायुसे प्रेरित सजल मेघोंको देखकर, जो अपने भीतर कौंधती हुई बिजलीके कारण सुनहरी झूलोंसे युक्त हाथियोंके झुण्डके समान प्रतीत होते थे, उन्हें बड़ा ही विस्मय हुआ करता था ॥ २ ॥ नवीन घासके खानेसे हृष्ट-पुष्ट हुए मृग और पक्षिगण जब कभी इधर-उधर दौड़ते हुए श्रीरामचन्द्रजीको देख लेते तो उनकी ओर टकटकी लगाये रह जाते ॥ ३ ॥ और ध्याननिष्ठ मुनीश्वरोंके समान इधर-उधर जाना भूलकर जहाँ-के-तहाँ खड़े रह जाते। इस समय परमात्मा रामको मनुष्यरूपसे पर्वत और वनोंमें विचरते जानकर
सर्ग ४ ] किष्किन्धाकाण्ड १७१
| चरन्तं परमात्मानं ज्ञात्वा सिद्धगणा भुवि ।<br>मृगपक्षिगणा भूत्वा राममेवानुसेविरे ॥ ५॥ | बहुत-से सिद्धगण पृथिवीपर मृग और पक्षियोंके रूपसे सदा उन्हींकी सेवामें रहने लगे ॥ ४-५ ॥ |
| सौमित्रिरेकदा राममेकान्ते ध्यानतत्परम् ।<br>समाधिविरमे भक्त्या प्रणयाद्विनयान्वितः ॥ ६ ॥ | एक दिन एकान्तमें ध्यान करते हुए भगवान् रामसे उनकी समाधि खुलनेपर सुमित्रानन्दन श्रीलक्ष्मणजीने अति प्रेम और भक्तिसे नम्रतापूर्वक कहा— |
| अब्रवीद्देव ते वाक्यात्पूर्वोक्ताद्विगतो मम ।<br>अनाद्यविद्यासम्भूतः संशयो हृदि संस्थितः ॥ ७॥ | "भगवन् ! आपने मुझे जो उपदेश पहले दिया था उससे मेरे हृदयका अनादि अविद्या-जन्य सन्देह तो दूर हो गया है ॥ ६-७ ॥ |
| इदानीं श्रोतुमिच्छामि क्रियामार्गेण राघव ।<br>भवदाराधनं लोके यथा कुर्वन्ति योगिनः ॥ ८ ॥ | किन्तु हे राघव ! योगिजन क्रियामार्ग (पूजा-पद्धति) से जिस प्रकार संसारमें आपकी आराधना किया करते हैं, इस समय मैं उसे सुनना चाहता हूँ ॥ ८ ॥ |
| इदमेव सदा प्राहुर्योगिनो मुक्तिसाधनम् ।<br>नारदोऽपि तथा व्यासो ब्रह्मा कमलसम्भवः ॥ ९ ॥ | समस्त योगिजन एवं देवर्षि नारद, महर्षि व्यास और कमलयोनि श्रीब्रह्माजी भी इसीको मुक्तिका साधन बतलाते हैं ॥ ९ ॥ |
| ब्रह्मक्षत्रादिवर्णानामाश्रमाणां च मोक्षदम् ।<br>स्त्रीशूद्राणां च राजेन्द्र सुलभं मुक्तिसाधनम् ।<br>तव भक्ताय मे भ्रात्रे ब्रूहि लोकोपकारकम् ॥ १०॥ | हे राजराजेश्वर ! ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णों तथा ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य आदि आश्रमोंको मोक्ष देनेवाला यही साधन है और स्त्री तथा शूद्रोंकी भी इसी साधनसे सुगमतासे मुक्ति हो सकती है। हे प्रभो ! मैं आपका भक्त और भाई हूँ; अतः आप मुझसे इस लोकोपकारी साधनका वर्णन कीजिये" ॥ १० ॥ |
| श्रीराम उवाच | श्रीरामचन्द्रजी बोले- हे रघुकुलनन्दन लक्ष्मण ! |
| मम पूजा विधानस्य नान्तोऽस्ति रघुनन्दन ।<br>तथापि वक्ष्ये सङ्क्षेपाद्यथावदनुपूर्वशः ॥ ११॥ | मेरी पूजा-विधिका कोई अन्त नहीं है तथापि मैं क्रमशः उसका संक्षेपमें यथावत् वर्णन करता हूँ ॥ ११ ॥ |
| स्वगृह्योक्तप्रकारेण द्विजत्वं प्राप्य मानवः ।<br>सकाशात्सद्गुरोर्मन्त्रं लब्ध्वा मद्भक्तिसंयुक्तः ॥ १२॥ | मेरी भक्तिसे सम्पन्न मनुष्य अपनी शाखाके गृह्यसूत्रद्वारा बतलाये गये प्रकारसे (उपनयन-संस्कारके अनन्तर) द्विजत्व प्राप्त कर भक्तिपूर्वक सद्गुरुके पास जाय और उनसे मन्त्र ग्रहण करे ॥ १२ ॥ |
| तेन सन्दर्शितविधिर्मामेवाराधयेत्सुधीः ।<br>हृदये वाऽनले वाऽर्चेत्प्रतिमाऽऽदौ विभावसौ ॥ १३॥ | फिर बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि उन गुरुदेवकी बतायी हुई विधिसे अपने हृदयमें, अग्निमें, प्रतिमा आदिमें अथवा सूर्यमें केवल मेरी ही सेवा-पूजा करे ॥ १३ ॥ |
| शालग्रामशिलायां वा पूजयेन्मामतन्द्रितः ।<br>प्रातःस्नानं प्रकुर्वीत प्रथमं देहशुद्धये ॥ १४॥ | अथवा सावधान होकर शालग्राम-शिलामें ही मेरी उपासना करे । बुद्धिमान् उपासकको चाहिये कि सबसे पहले देहशुद्धिके लिये, प्रातःकाल ही |
| वेदतन्त्रोदितैर्मन्त्रैर्मृल्लेपनविधानतः ।<br>सन्ध्यादि कर्म यन्नित्यं तत्कुर्याद्विधिना बुधः ॥ १५॥ | वैदिक तथा तान्त्रिक मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए शरीरमें विधिवत् मृत्तिका आदि लगाकर स्नान करे और फिर नियमानुसार सन्ध्या आदि नित्यकर्म करे ॥ १४-१५ ॥ |
| सङ्कल्पमादौ कुर्वीत सिद्धयर्थं कर्मणां सुधीः । | मेरी पूजा करनेवाला मतिमान् पुरुष कर्मोंकी सिद्धिके लिये |
| १७२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ४ |
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स्वगुरुं पूजयेद्भक्त्या मद्बुद्ध्या पूजको मम ॥१६॥
शिलायां स्नपनं कुर्यात्प्रतिमासु प्रमार्जनम् ।
प्रसिद्धैर्गन्धपुष्पाद्यैर्मत्पूजा सिद्धिदायिका ॥१७॥
अमायिकोऽनुवृत्त्या मां पूजयेन्नियतव्रतः ।
प्रतिमादिष्वलङ्कारः प्रियो मे कुलन्दन ॥१८॥
अग्नौ यजेत हविषा भास्करे स्थण्डिले यजेत् ।
भक्तेनोपहृतं प्रीत्यै श्रद्धया मम वार्यपि ॥१९॥
किं पुनर्लक्ष्यभोज्यादि गन्धपुष्पाक्षतादिकम् ।
पूजाद्रव्याणि सर्वाणि सम्पाद्यैवं समारभेत् ॥२०॥
चैलाजिनकुशैः सम्यगासनं परिकल्पयेत् ।
तत्रोपविश्य देवस्य सम्मुखे शुद्धमानसः ॥२१॥
ततो न्यासं प्रकुर्वीत मातृकाबहिरान्तरम् ।
केशवादि ततः कुर्यात्तत्त्वन्यासं ततः परम् ॥२२॥
मन्मूर्तिपञ्जरन्यासं मन्त्रन्यासं ततो न्यसेत् ।
प्रतिमादावपि तथा कुर्यान्नित्यमतन्द्रितः ॥२३॥
कलशं स्वपुरो वामे क्षिपेत्पुष्पादि दक्षिणे ।
अर्घ्यपाद्यप्रदानार्थं मधुपर्कार्थमेव च ॥२४॥
तथैवाचमनार्थं तु न्यसेत्पात्रचतुष्टयम् ।
हृत्पद्मे भानुविमले मत्कलां जीवसंज्ञिताम् ॥२५॥
ध्यायेत्स्वदेहमखिलं तया व्याप्तमरिन्दम ।
तामेवावाहयेन्नित्यं प्रतिमादिषु मत्कलाम् ॥२६॥
पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यैः स्नानवस्त्रविभूषणैः ।
यावच्छक्योपचारैर्वा त्वर्चयेन्माममायया ॥२७॥
पहले संकल्प करे और फिर अपने गुरुदेवमें मेरी ही भावना रखकर उनकी पूजा करे ॥ १६ ॥ मेरी मूर्ति यदि शिलारूप हो तो स्नान करावे और यदि प्रतिमाकार हो तो केवल मार्जन ही करे । फिर प्रसिद्ध-प्रसिद्ध गन्ध और पुष्प आदिसे पूजा करे । इस प्रकार की हुई मेरी पूजा शीघ्र ही फल देनेवाली होती है ॥ १७ ॥ मनुष्यको सब प्रकारके छल-छिद्र छोड़कर गुरुकी बतायी विधिसे नियमबद्ध होकर मेरी पूजा करनी चाहिये । हे कुलन्दन ! प्रतिमा आदिका श्रृंगार करना मुझे अत्यन्त प्रिय है ॥ १८ ॥ यदि अग्निमें पूजा करनी हो तो आहुतिद्वारा करे और यदि सूर्यमें करनी हो तो वेदीमें सूर्यका आकार बनाकर करे । भक्तके द्वारा श्रद्धापूर्वक निवेदन किया हुआ जल भी मेरी प्रसन्नताका कारण होता है ॥ १९ ॥ फिर भक्ष्य, भोज्य आदि पदार्थ और गन्ध पुष्प अक्षत आदि पूजा-सामग्रीकी तो बात ही क्या है ? अतः पहले पूजाकी सब सामग्री इकट्ठी कर फिर मेरी पूजा आरम्भ करे ॥२०॥
( अब जिस प्रकार पूजा करनी चाहिये वह बतलाता हूँ— ) पहले क्रमशः कुशा, मृगचर्म और वस्त्र बिछा-कर आसन बनावे तथा उसपर शुद्धचित्तसे इष्टदेवके सम्मुख बैठे ॥ २१ ॥ तदनन्तर बहिर्मातृका और अन्तर्मातृका न्यास करे तथा केशव, नारायण आदि चौबीस नामोंका न्यास करके तत्त्वन्यास करे । उसके पश्चात् ( विष्णु पञ्जरोक्त विधिसे ) मेरी मूर्तिमें पञ्जर-न्यास तथा मन्त्रन्यास करे । मेरी प्रतिमा आदिमें भी निरालस्य-भावसे उसी प्रकार न्यास करना चाहिये ॥ २२-२३ ॥ तथा अपने सामने बायीं ओर कलश और दायीं ओर पुष्प आदि सामग्री रखे, उसी तरह अर्घ्य, पाद्य, मधुपर्क और आचमनके लिये चार पात्र रखे । तत्पश्चात् अपने सूर्यके समान तेजस्वी हृदय-कमलमें जीवनाम्नी मेरी कलाका ध्यान करे और हे शत्रुदमन ! अपने सम्पूर्ण शरीरको उससे व्याप्त देखे तथा प्रतिमा आदिका पूजन करते समय भी उन ( प्रतिमा आदि ) में उस जीवकलाका ही आवाहन करे ॥ २४-२६ ॥ पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, आभूषण आदिसे अथवा जो कुछ सामग्री मिल सके उसीसे, निष्कपट होकर मेरी पूजा करे ॥ २७ ॥
सर्ग ४ ] | किष्किन्धाकाण्ड | १७३
विभवे सति कर्पूरकुङ्कुमागुरुचन्दनैः ।
अर्चयेन्मन्त्रवन्नित्यं सुगन्धकुसुमैः शुभैः ॥२८॥
दशावरणपूजां वै ह्यागमोक्तां प्रकारयेत् ।
नीराजनैर्धूपदीपैर्नैवेद्यैर्बहुविस्तरैः ॥२९॥
श्रद्धयोपहरेन्नित्यं श्रद्धाभुगहमेश्वरः ।
होमं कुर्यात्प्रयत्नेन विधिना मन्त्रकोविदः ॥३०॥
अगस्त्येनोक्तमार्गेण कुण्डेनागमवित्तमः ।
जुहुयान्मूलमन्त्रेण पुंसूक्तेनाथवा बुधः ॥३१॥
अथचौपासनाग्नौ वा चरुणा हविषा तथा ।
तप्तजाम्बूनदप्रख्यं दिव्याभरणभूषितम् ॥३२॥
ध्यायेदनलमध्यस्थं होमकाले सदा बुधः ।
पार्षदेभ्यो बलिं दत्त्वा होमशेषं समापयेत् ॥३३॥
ततो जपं प्रकुर्वीत ध्यायेन्मां यतवाक् स्मरन् ।
मुखवासं च ताम्बूलं दत्त्वा प्रीतिसमन्वितः ॥३४॥
मदर्थे नृत्यगीतादि स्तुतिपाठादि कारयेत् ।
प्रणमेद्दण्डवद्भूमौ हृदये मां निधाय च ॥३५॥
शिरस्याधाय मदत्तं प्रसादं भावनामयम् ।
पाणिभ्यां मत्पदे मूर्ध्नि गृहीत्वा भक्तिसंयुतः ॥३६॥
रक्ष मां घोरसंसारादित्युक्त्वा प्रणमेत्सुधीः ।
उद्वासयेद्यथापूर्वं प्रत्यग्ज्योतिषि संस्मरन् ॥३७॥
एवमुक्तप्रकारेण पूजयेद्विधिवद्यदि ।
इहामुत्र च संसिद्धिं प्राप्नोति मदनुग्रहात् ॥३८॥
मद्भक्तो यदि मामेवं पूजां चैव दिने दिने ।
करोति मम सारूप्यं प्राप्नोत्येव न संशयः ॥३९॥
यदि धनवान् हो तो नित्यप्रति कर्पूर, कुंकुम, अगुरु, चन्दन और अत्युत्तम सुगन्धित पुष्पोंसे मन्त्रोच्चारण करता हुआ मेरी पूजा करे ॥ २८ ॥ तथा नीरांजन (पाँच बत्तियोंकी आरती), धूप, दीप और नाना प्रकारके नैवेद्योंद्वारा वेदोक्त दशावरण-पूजा-विधिसे मेरा अर्चन करे ॥ २९ ॥
नित्यप्रति अति श्रद्धाके साथ सब पदार्थ निवेदन करे क्योंकि मैं परमात्मा श्रद्धाका ही भूखा हूँ। मन्त्र-विधिको जाननेवाला उपासक पूजाके अनन्तर विधिपूर्वक हवन करे ॥ ३० ॥ शास्त्रविधिके जाननेवाले बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि अगस्त्य मुनिकी बतायी हुई विधिसे कुण्ड बनाकर उसमें गुरुके दिये हुए मूलमन्त्रसे अथवा पुरुषसूक्तके मन्त्रोंसे आहुति छोड़े ॥ ३१ ॥ अथवा अग्निहोत्रकी अग्निमें ही चरु तथा हविसे हवन करे। हवन करते समय बुद्धिमान् याजक होमाग्निमें 'तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाले सर्वालंकारविभूषित भगवान् यज्ञ-पुरुषके रूपमें' परमात्माका सदा ध्यान करे। और फिर मेरे पार्षदोंके लिये बलि देकर होम समाप्त कर दे ॥ ३२–३३ ॥
तदनन्तर मौन होकर मेरा ध्यान और स्मरण करता हुआ जप करे। फिर प्रीतिपूर्वक ताम्बूल और मुखवास देकर मेरे लिये नृत्य, गान और स्तुति-पाठ आदि करावे और हृदयमें मेरी मनोहर मूर्तिको धारण कर पृथिवी पर लोटकर साष्टांग दण्डवत् करे ॥ ३४–३५ ॥ मेरे दिये हुए भावनामय प्रसादको 'यह भगवत्प्रसाद है' ऐसी भावनासे शिरपर रखे और भक्तिभावसे विभोर हो मेरे चरणोंको अपने मस्तकपर रखकर और 'हे प्रभो! इस भयंकर संसारसे मुझे बचाओ' ऐसा कहकर मुझे प्रणाम करे, उसके बाद बुद्धिमान् उपासकको चाहिये कि प्रतिमामें आवाहन की हुई जीवकलाको 'वह मुझहीमें प्रवेश कर गयी है' ऐसी भावना करते हुए विसर्जन करे ॥ ३६–३७ ॥
जो पुरुष उपरोक्त प्रकारसे मेरी विधिपूर्वक पूजा करता है वह मेरी कृपासे इहलोक और परलोक दोनों जगह सिद्धि प्राप्त करता है ॥ ३८ ॥ यदि मेरा भक्त इस प्रकार नित्यप्रति पूजा करे तो वह मेरा सारूप्य प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ३९ ॥ यह अति
६६
| १७४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ४ |
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| इदं रहस्यं परमं च पावनं<br>मयैव साक्षात्कथितं सनातनम् ।<br>पठत्यजस्रं यदि वा शृणोति यः<br>स सर्वपूजाफलभाङ् न संशयः ॥४०॥ | गोपनीय पूजाविधि परम पवित्र और सनातन है । इसे साक्षात् मैंने ही अपने मुखसे कहा है । जो पुरुष इसे निरन्तर पढ़ता या सुनता है उसे निस्सन्देह सम्पूर्ण पूजाका फल मिलता है ॥ ४० ॥ |
| एवं परात्मा श्रीरामः क्रियायोगमनुत्तमम् ।<br>पृष्टः प्राह स्वभक्ताय शेषांशाय महात्मने ॥४१॥ | इस प्रकार अपने अनन्य भक्त शेषावतार महात्मा लक्ष्मणजीके पूछनेपर परमात्मा श्रीरामचन्द्रजीने इस अत्युत्तम क्रियायोगका उन्हें उपदेश किया ॥ ४१ ॥ फिर श्रीरामचन्द्रजी अपनी मायाका अवलम्बन कर साधारण पुरुषोंके समान दुःखित-से दिखायी देने लगे । वे 'हा सीते ! हा सीते !' कहते हुए सारी रात यों ही बिता देते, उन्हें किसी प्रकार नींद न आती ॥ ४२ ॥ |
| पुनः प्राकृतवद्रामो मायामालम्ब्य दुःखितः ।<br>हा सीतेति वदन्नैव निद्रां लेभे कथञ्चन ॥४२॥ | |
| एतस्मिन्नन्तरे तत्र किष्किन्धायां सुबुद्धिमान् ।<br>हनूमान्प्राह सुग्रीवमेकान्ते कपिनायकम् ॥४३॥ | इसी समय किष्किन्धापुरीमें परम बुद्धिमान् हनुमान्जीने वानरराज सुग्रीवसे एकान्तमें कहा—॥ ४३ ॥ "हे राजन् ! सुनिये, मैं आपके बड़े हितकी बात कहता हूँ । देखिये, श्रीरामचन्द्रजीने पहले आपका कितना बड़ा उपकार किया है ॥ ४४ ॥ किन्तु मुझे मालूम होता है आप कृतघ्नके समान उसे भूल गये हैं । अहो ! आपहीके लिये जिन्होंने त्रिलोकमान्य वीरवर वालीको मारा और आपको राजपद्पर बैठाया तथा ( जिनकी कृपासे ) आपको परम दुर्लभ तारा मिली वे ही बुद्धिमान् भगवान् राम अपने भाईके साथ पर्वत-शिखरपर रहते हुए अपने भारी कार्यके लिये एकाग्रचित्तसे आपके आनेकी बाट देख रहे हैं । किन्तु आप वानर-स्वभावके अनुसार स्त्री-लम्पट होकर सब कुछ भूल गये ॥ ४५–४७ ॥ आपने सीताजीकी खोजके विषयमें 'मैं अवश्य करूँगा' ऐसी प्रतिज्ञा करके भी अभीतक कुछ नहीं किया । आप बड़े ही कृतघ्न हैं । मालूम होता है वालीके समान आप भी शीघ्र ही कालके गालमें जायँगे" ॥ ४८ ॥ |
| शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि तवैव हितमुत्तमम् ।<br>रामेण ते कृतः पूर्वमुपकारो ह्यनुत्तमः ॥४४॥ | |
| कृतघ्नवच्चया नूनं विस्मृतः प्रतिभाति मे ।<br>त्वत्कृते निहतो वाली वीरस्त्रैलोक्यसम्मतः ॥४५॥ | |
| राज्ये प्रतिष्ठितोऽसि त्वं तारां प्राप्तोऽसि दुर्लभाम् ।<br>स रामः पर्वतस्याग्रे भ्रात्रा सह वसन्सुधीः ॥४६॥ | |
| त्वदागमनमेकाग्रभीक्षते कार्यगौरवात् ।<br>त्वं तु वानरभावेन स्त्रीसक्तो नावबुद्ध्यसे ॥४७॥ | |
| करोमीति प्रतिज्ञाय सीतायाः परिमार्गणम् ।<br>न करोषि कृतघ्नस्त्वं हन्यसे वालिवद्द्रुतम् ॥४८॥ | |
| हनूमद्वचनं श्रुत्वा सुग्रीवो भयविह्वलः ।<br>प्रत्युवाच हनूमन्तं सत्यमेव त्वयोदितम् ॥४९॥ | हनूमान्जीके वचन सुनकर सुग्रीव भयसे विह्वल हो गये और बोले—"हनूमन् ! तुम ठीक ही कहते हो ॥ ४९ ॥ अब तुम मेरी आज्ञासे शीघ्र ही दशों दिशाओंमें बड़े शीघ्रगामी दश सहस्र वानर भेजो ॥ ५०॥ वे सातों द्वीपोंमें रहनेवाले सम्पूर्ण वानरोंको यहाँ ले आवें और जितने मुख्य-मुख्य वानर हैं वे सब यहाँ एक पक्षके भीतर आ जायँ ॥ ५१ ॥ जो कोई एक |
| शीघ्रं कुरु ममाज्ञां त्वं वानराणां तरस्विनाम् ।<br>सहस्राणि दशेदानीं प्रेषयाशु दिशो दश ॥५०॥ | |
| सप्तद्वीपगतान्सर्वान्वानरानानानयन्तु ते ।<br>पक्षमध्ये समायान्तु सर्वे वानरपुङ्गवाः ॥५१॥ |
किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग ५: भगवान् रामका शोक और लक्ष्मणजीका किष्किन्धापुरीमें जाना
सर्ग ५ ]
किष्किन्धाकाण्ड
१७५
ये पक्षमतिवर्तन्ते ते वध्या मे न संशयः।
इत्याज्ञाप्य हनूमन्तं सुग्रीवो गृहमविशत् ॥५२॥
पक्षतक यहाँ न आयेगा वह निस्सन्देह मेरे हाथों मारा जायगा।” हनूमान्जीको इस प्रकार आज्ञा देकर सुग्रीव (फिर) अपने घरमें चले गये ॥ ५२ ॥
सुग्रीवाज्ञां पुरस्कृत्य हनूमान्मन्त्रिसत्तमः।
तत्क्षणे प्रेषयामास हरीन्दश दिशः सुधीः ॥५३॥
सुग्रीवकी आज्ञा पा परम बुद्धिमान् मन्त्रिप्रवर श्रीहनूमान्जीने तत्काल ही बहुत-से वानर दशों दिशाओंमें भेज दिये ॥ ५३ ॥
अगणितगुणसत्त्वान्वायुवेगप्रचारा-
न्वनचरगणमुख्यान् पर्वताकाररूपान्।
पवनहितकुमारः प्रेषयामास दूता-
नतिरभसतरात्मा दानमानादिवृत्तान् ॥५४॥
जो अगणित गुण और पराक्रमशाली थे तथा वायुके समान वेगवान् और पर्वतके समान स्थूलकाय थे, उन मुख्य-मुख्य वानर दूतोंको राम-कार्यके लिये अति उतावले पवननन्दन श्रीहनूमान्जीने दान-मानसे सन्तुष्ट कर सब ओर भेज दिया ॥५४॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
किष्किन्धाकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥४॥
पञ्चम सर्ग
भगवान् रामका शोक और लक्ष्मणजीका किष्किन्धापुरीमें जाना।
श्रीमहादेव उवाच
रामस्तु पर्वतस्याग्रे मणिसानौ निशामुखे।
सीताविरहजं शोकमसहन्निदमब्रवीत् ॥ १ ॥
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! एक दिन प्रदोषकाल (रात्रिके प्रथम भाग) में प्रवर्षंण पर्वतके मणिमय शिखरपर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजी सीताजीके विरह-जनित सन्तापको सहन न कर सकनेके कारण इस प्रकार बोले—॥ १ ॥
पश्य लक्ष्मण मे सीता राक्षसेन हृता बलात् ।
मृताऽमृता वा निश्चेतुं न जानेऽद्यापि भामिनीम् ॥२॥
“लक्ष्मण ! देखो, हमारी सीताको राक्षस बलात्कारसे हर ले गया; वह सुन्दरी जीवित है या मर गयी—इसका निश्चय करनेके लिये हमें अभीतक कुछ भी पता नहीं लगा ॥ २ ॥
जीवतीति मम ब्रूयात्कश्चिद्वा प्रियकृत्स मे।
यदि जानामि तां साध्वीं जीवन्तीं यत्र कुत्र वा ॥३॥
यदि कोई मुझे यह समाचार सुनावे कि ‘वह जीवित है’ तो वह मेरा बड़ा ही उपकार करेगा। यदि मुझे उस साध्वीके जीवित रहनेका पता लग जाय तो फिर वह कहीं
हठादेवाहरिष्यामि सुधामिव पयोनिधेः।
प्रतिज्ञां शृणु मे भ्रातर्येन मे जनकात्मजा ॥ ४ ॥
भी क्यों न हो, समुद्रमेंसे अमृतके समान मैं जैसे होगा वैसे उसे अवश्य ही तुरन्त ले आऊँगा। भाई ! मेरी प्रतिज्ञा सुनो—
नीता तं भस्मसात्कुर्यां सपुत्रबलवाहनम् ।
हे सीते चन्द्रवदने वसन्ती राक्षसालये ॥ ५ ॥
दुःखार्त्ता मामपश्यन्ती कथं प्राणान् धरिष्यसि ।
‘जो दुष्ट मेरी जानकीको ले गया है उसे पुत्र, सेना और वाहनोंके सहित मैं भस्म कर डालूँगा।’ हे चन्द्रवदने सीते ! मुझे न देखनेसे अत्यन्त दुःखातुर होकर राक्षसके घरमें रहती हुई तुम किस प्रकार प्राण धारण करोगी ? हा ! चन्द्रमुखी सीताके बिना तो
| १७६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ५ |
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चन्द्रोऽपि भानुवद्भाति मम चन्द्राननां विना ॥६॥
चन्द्र त्वं जानकीं स्पृष्ट्वा करैर्मां स्पृश शीतलैः । सुग्रीवोऽपि दयाहीनो दुःखितं मां न पश्यति ॥७॥
राज्यं निष्कण्टकं प्राप्य स्त्रीभिः परिवृतो रहः । कृतघ्नो दृश्यते व्यक्तं पानासक्तोऽतिकामुकः ॥८॥
नायाति शरदं पश्यन्नपि मार्गयितुं प्रियाम् । पूर्वोष्कारिणं दुष्टः कृतघ्नो विस्मृतो हि माम् ॥९॥
हन्मि सुग्रीवमप्येवं सपुरं सहबान्धवम् । वाली यथा हतो मेऽद्य सुग्रीवोऽपि तथा भवेत् ॥१०॥
इति रुष्टं समालोक्य राघवं लक्ष्मणोऽब्रवीत् । इदानीमेव गत्वाहं सुग्रीवं दुष्टमानसम् ॥११॥
मामाज्ञापय हत्वा तमायास्ये राम तेऽन्तिकम् । इत्युक्त्वा धनुरदाय स्वयं तूणीरमेव च ॥१२॥
गन्तुमभ्युद्यतं वीक्ष्य रामो लक्ष्मणमब्रवीत् । न हन्तव्यस्त्वया वत्स सुग्रीवो मे प्रियः सखा ॥१३॥
किन्तु भीषय सुग्रीवं वालिबत्त्वं हनिष्यसे । इत्युक्त्वा शीघ्रमादाय सुग्रीवप्रतिभाषितम् ॥१४॥
आगत्य पश्चाद्यत्कार्यं तत्करिष्याम्यसंशयम् । तथेति लक्ष्मणोऽगच्छत्त्वरितो भीमविक्रमः ॥१५॥
किष्किन्धां प्रति कोपेन निर्दहन्निव वानरान् । सर्वज्ञो नित्यलक्ष्मीको विज्ञानात्मापि राघवः ॥१६॥
सीतामनुशुशोचार्त्तः प्राकृतः प्राकृतामिव । बुद्ध्यादिसाक्षिणस्तस्य मायाकार्यातिवर्तिनः ॥१७॥
रागादिरहितस्यास्य तत्कार्यं कथमुद्भवेत् ।
मुझे चन्द्रमा भी सूर्यके समान (तापप्रद) जान पड़ता है ॥३-६॥ हे चन्द्र ! तुम अपनी किरणोंसे पहले जानकीको स्पर्श करो, (उनका स्पर्श करनेसे वे शीतल हो जायँगी) फिर उन शीतल किरणोंसे मुझे स्पर्श करना । हाय ! सुग्रीव भी कैसा निर्दयी हो गया है जो मुझ दुखियाकी ओर नहीं झाँकता ॥७॥ अहो ! निष्कण्टक राज्य पाकर मद्यपीनेमें आसक्त हुआ वह कामकिंकर स्त्रियोंसे घिरा एकान्तमें पड़ा रहता है। इससे वह स्पष्ट ही बड़ा कृतघ्न दीख पड़ता है ॥८॥ शरदऋतुका आगमन देखकर भी वह प्राणप्रिया सीताकी खोज करानेके लिये नहीं आया। मैंने उसका पहले उपकार किया है; तथापि वह दुष्ट कृतघ्न होकर मुझे भूल गया ॥९॥ (जिस प्रकार मुझे सीताको हर ले जानेवालेका नाश करना है) उसी प्रकार मैं सुग्रीवको भी उसके नगर और बन्धु-बान्धवोंके सहित मार डालूँगा । जैसे वाली मेरे हाथसे मारा गया वैसे ही आज सुग्रीव भी मारा जायगा” ॥१०॥
इस प्रकार रघुनाथजीको क्रुद्ध देखकर लक्ष्मणजी बोले— "हे राम ! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं अभी जाकर दुष्टचित्त सुग्रीवको मारकर आपके पास लौट आता हूँ।” ऐसा कह हाथमें धनुष और तरकश लेकर लक्ष्मणजीको अपने-आप ही जानेके लिये उद्यत देख श्रीरामचन्द्रजी बोले, "वत्स ! सुग्रीव मेरा प्यारा मित्र है, तुम उसे मारना मत ॥११-१३॥ केवल यह कहकर कि 'तू वालीके समान मारा जायगा' उसे डराना और फिर शीघ्र ही उसका उत्तर लेकर आ जाना । उस समय जो कुछ करना होगा मैं अवश्य वही करूँगा।”
तब महा पराक्रमी लक्ष्मणजी 'बहुत अच्छा' कह तुरन्त ही किष्किन्धापुरीमें आये । उस समय उन्होंने, क्रोधसे ऐसा उग्र रूप धारण किया था कि मानो सम्पूर्ण वानरोंको भस्म कर डालेंगे ।
श्रीरघुनाथजी सर्वज्ञ और ज्ञानस्वरूप हैं। श्रीलक्ष्मीजी सर्वदा उनकी सेवामें रहती हैं; तथापि साधारण स्त्रीके वियोगसे शोक करते हुए प्राकृत पुरुषके समान वे सीताजीके शोकसे विह्वल हो रहे हैं। वे प्रभु बुद्धि आदिके साक्षी, मायाके कार्योसे परे और राग-द्वेष आदि विकारोंसे रहित हैं फिर इन विकारोंका कार्य-रूप शोक उन्हें कैसे हो सकता है ? उन्होंने तो
सर्ग ५ ] किष्किन्धाकाण्ड १७७
ब्रह्मणोक्तमृतं कर्तुं राज्ञो दशरथस्य हि ॥१८॥
तपसः फलदानाय जातो मानुषवेषधृक् ।
मायया मोहिताः सर्वे जना अज्ञानसंयुताः ॥१९॥
कथमेषां भवेन्मोक्ष इति विष्णुर्विचिन्तयन् ।
कथां प्रथयितुं लोके सर्वलोकमलापहाम् ॥२०॥
रामायणाभिधां रामो भूत्वा मानुषचेष्टकः ।
क्रोधं मोहं च कामं च व्यवहारार्थसिद्धये ॥२१॥
तत्तत्कालोचितं गृह्णन् मोहयत्यवशाः प्रजाः ।
अनुरक्त इवाशेषगुणेषु गुणवर्जितः ॥२२॥
विज्ञानमूर्तिर्विज्ञानशक्तिः साक्ष्यगुणान्वितः ।
अतः कामादिभिर्नित्यमविलिप्तो यथा नभः ॥२३॥
विन्दन्ति मुनयः केचिञ्जानन्ति जनकादयः ।
तद्भक्ता निर्मलात्मानः सम्यग् जानन्ति नित्यदा ।
भक्तचित्तानुसारेण जायते भगवानजः ॥२४॥
लक्ष्मणोऽपि तदा गत्वा किष्किन्धानगरान्तिकम्।
ज्याघोषमकरोत्तीव्रं भीपयन् सर्ववानरान् ॥२५॥
तं दृष्ट्वा प्राकृतास्तत्र वानरा वप्रमूर्धनि ।
चक्रुः किलकिलाशब्दं धृतपाषाणपादपाः ॥२६॥
तान्दृष्ट्वा क्रोधताम्राक्षो वानरान् लक्ष्मणस्तदा।
निर्मूलान्कर्तुमुद्युक्तो धनुरानम्य वीर्यवान् ॥२७॥
ततः शीघ्रं समाप्लुत्य ज्ञात्वा लक्ष्मणमागतम्॥२८॥
निवार्य वानरान् सर्वानङ्गदो मन्त्रिसत्तमः ।
गत्वा लक्ष्मणसामीप्यं प्रणनाम स दण्डवत्॥२९॥
ततोऽङ्गदं परिष्वज्य लक्ष्मणः प्रियवर्धनः ।
२३
ब्रह्माजीकी वाणी सत्य करने और महाराज दशरथको उनकी तपस्याका फल देनेके लिये ही मनुष्यरूपसे अवतार लिया है। 'सब लोग मायासे मोहित होकर अज्ञानके वशीभूत हो गये हैं, उससे इनका किस प्रकार छुटकारा हो' यह सोचकर भगवान् विष्णु अपनी सकल-लोक-मलापहारिणी रामायण नामकी कथाका लोकमें विस्तार करनेके लिये रामरूप होकर मनुष्यके समान अनेकों लीलाएँ करते हुए व्यवहारकी सिद्धि-के लिये समयानुकूल क्रोध, मोह और काम आदि विकारोंको स्वीकार करके विकारोंके वशीभूत हुई प्रजाको अपनी लीलासे मोहित कर रहे हैं। किन्तु सम्पूर्ण गुणोंमें अनुरक्त-से दिखलायी देते हुए भी वे वास्तवमें उन सबसे रहित हैं ॥१४–२२॥ वे विज्ञानस्वरूप हैं, विज्ञान ही उनकी शक्ति है तथा एकमात्र साक्षी और गुणातीत हैं। इसलिये वे आकाशके समान काम आदि (मनोविकारों) से सर्वदा अलिप्त हैं ॥२३॥ उनके वास्तविक स्वरूपको कोई-कोई मुनिजन, जनकादि राजर्षिगण तथा उनके विशुद्ध-चित्त भक्तजन ही सदा ठीक-ठीक जान पाते हैं, वे अजन्मा भगवान् भक्तकी भावनाके अनुसार अवतार लेते हैं ॥२४॥
इधर, लक्ष्मणजीने किष्किन्धापुरीके पास पहुँचकर सम्पूर्ण वानरोंको भयभीत करते हुए अपने धनुषकी प्रत्यञ्चाका बड़ा भयंकर टंकार किया ॥२५॥ उस समय नगरके परकोटेपर चढ़े हुए कुछ साधारण वानर लक्ष्मणजीको देखकर अपने हाथोंमें पत्थर और वृक्षादि लेकर किलकारी मारने लगे। उन वानरोंको देखकर वीरवर लक्ष्मणजीके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वे धनुष चढ़ाकर उनका मूलोच्छेद करनेके लिये तत्पर हुए ॥२६-२७॥
तब लक्ष्मणजीको आये जान वहाँ मन्त्रिवर अंगदजी तुरन्त ही उछलकर आये और उन्होंने सब वानरोंको रोककर उनके पास जाकर दण्डवत् प्रणाम किया ॥२८-२९॥ तदनन्तर, प्रियवर्द्धन श्रीलक्ष्मणजीने अंगदको हृदयसे लगाकर कहा—"वत्स! तुम अभी जाकर अपने काका सुग्रीवको सूचना दो कि श्रीरघुनाथजी
१७८ \qquad\qquad\qquad\qquadअध्यात्मरामायण\qquad\qquad\qquad\qquad[सर्ग ५]
$उवाच वत्स गच्छ त्वं पितृव्याय निवेदय ॥३०॥ तुमसे अत्यन्त क्रुद्ध हैं और उनकी प्रेरणासे मैं यहाँ आया मामागतं राघवेण चोदितं रौद्रमूर्तिना । हूँ।” यह सुनकर अंगदने ‘बहुत अच्छा’ कह तुरन्त तथेति त्वरितं गत्वा सुग्रीवाय न्यवेदयत् ॥३१॥ ही सारा समाचार सुग्रीवको जा सुनाया ॥ ३०-३१ ॥ लक्ष्मणः क्रोधताम्राक्षः पुरद्वारि बहिःस्थितः । और बोला कि ‘लक्ष्मणजी क्रोधसे नेत्र लाल किये तच्छ्रुत्वाऽतीव सन्त्रस्तः सुग्रीवो वानरेश्वरः ॥३२॥ बाहर नगरके द्वारपर खड़े हैं।’ आहूय मन्त्रिणां श्रेष्ठं हनूमन्तमथाब्रवीत् । यह सुनकर वानरराज सुग्रीवको बड़ा ही भय गच्छ त्वमङ्गदेनाशु लक्ष्मणं विनयान्वितः ॥३३॥ हुआ ॥ ३२ ॥ उन्होंने मन्त्रिप्रवर हनूमान्जीको बुला- सान्त्वयन्कोपितं वीरं शनैरानय सादरम् । कर कहा—“तुम अंगदके साथ तुरन्त ही लक्ष्मणजीके प्रेषयित्वा हनूमन्तं तारामाह कपीश्वरः ॥३४॥ पास जाओ और उन क्रोधित हुए वीरवरको धीरे-धीरे त्वं गच्छ सान्त्वयन्ती तं लक्ष्मणं मृदुभाषितैः । अति विनयपूर्वक शान्त कर आदरपूर्वक अपने शान्तमन्तःपुरं नीत्वा पश्चाद्दर्शय मेऽनघे ॥३५॥ साथ यहाँ ले आओ।” इस प्रकार हनूमान्जीको भेज- भवत्विति ततस्तारा मध्यकक्षं समाविशत् । कर कपिराज सुग्रीवने तारासे कहा—॥ ३३-३४ ॥ हनूमानङ्गदेनैव सहितो लक्ष्मणान्तिकम् ॥३६॥ “हे अनघे ! तुम आगे जाकर अपनी मधुर गत्वा ननाम शिरसा भक्त्या स्वागतमब्रवीत् । वाणीसे वीरवर लक्ष्मणको शान्त करो और जब वे एहि वीर महाभाग भवद्गृहमशङ्कितम् ॥३७॥ शान्त हो जायँ तब उन्हें अन्तःपुरमें लाकर मुझसे प्रविश्य राजदारादीन् दृष्ट्वा सुग्रीवमेव च । मिलाओ” ॥ ३५ ॥ यदाज्ञापयसे पश्चात्तत्सर्वं करवाणि भोः ॥३८॥ यह सुनकर तारा ‘बहुत अच्छा’ कह बीचकी इत्युक्त्वा लक्ष्मणं भक्त्या करे गृह्य स मारुतिः । ड्योढ़ीमें आ गयी। इधर अंगदके सहित हनूमान्जी आनयामास नगरमध्याद्राजगृहं प्रति ॥३९॥ लक्ष्मणजीके पास आये और उन्हें शिर नवाकर भक्ति- पश्यंस्तत्र महासौधान् यूथपानां समन्ततः । पूर्वक स्वागत करते हुए बोले—“हे महाभाग वीरवर ! जगाम भवनं राज्ञः सुरेन्द्रभवनोपमम् ॥४०॥ निःशंकहोकर आइये, यह घर आपकाही है ॥३६-३७॥ मध्यकक्षे गता तत्र तारा ताराधिपानना । इसमें पधारकर राजमहिषियोंसे और महाराज सुग्रीवसे सर्वाभरणसम्पन्ना मदरक्तान्तलोचना ॥४१॥ मिलिये। फिर आपकी जो आज्ञा होगी हम वही उवाच लक्ष्मणं नत्वा स्मितपूर्वाभिभाषिणी । करेंगे” ॥ ३८ ॥ याहि देवर भद्रं ते साधुस्त्वं भक्तवत्सलः ॥४२॥ ऐसा कह पवननन्दन हनूमान्जी भक्तिपूर्वक किमर्थं कोपमाकार्षीर्भक्ते भृत्ये कपीश्वरे । लक्ष्मणजीका हाथ पकड़कर उन्हें नगरके बीचसे होकर राजमन्दिरको ले चले ॥ ३९ ॥ तब, लक्ष्मणजी मार्गमें जहाँ-तहाँ यूथपति वानरोंके महल देखते हुए इन्द्रभवनके समान अति शोभायमान राजभवनमें पहुँचे ॥ ४० ॥ वहाँ बीचकी ड्योढ़ीमें चन्द्रवदना तारा बैठी थी; वह सम्पूर्ण आभूषणोंसे विभूषिता थी तथा उसके नेत्र मदसे कुछ अरुणवर्ण हो रहे थे ॥ ४१ ॥ वह मधुरभाषिणी तारा लक्ष्मणजीको प्रणाम कर मुसकाती हुई बोली— “आइये देवर, आपका शुभ हो। आप बड़े ही साधुस्वभाव और भक्तवत्सल हैं ॥४२॥ आपने अपने भक्त और$
सर्ग ५] किष्किन्धाकाण्ड १७९
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| बहुकालमनाश्वासं दुःखमेवानुभूतवान् ॥४३॥<br>इदानीं बहुदुःखौघाद्भवद्भीरभिरक्षितः ।<br>भवत्प्रसादात्सुग्रीवः प्राप्तसौख्यो महामतिः॥४४॥<br>कामासक्तो रघुपतेः सेवार्थं नागतो हरिः ।<br>आगमिष्यन्ति हरयो नानादेशगताः प्रभो ॥४५॥<br>प्रेषिता दशसाहस्रा हरयो रघुसत्तम ।<br>आनेतुं वानरान् दिग्भ्यो महापर्वतसन्निभान्॥४६॥<br>सुग्रीवः स्वयमागत्य सर्ववानरयूथपैः ।<br>वधयिष्यति दैत्यौघान् रावणं च हनिष्यति ॥४७॥<br>त्वयैव सहितोऽद्यैव गन्ता वानरपुङ्गवः ।<br>पश्यान्तर्भवनं तत्र पुत्रदारसुहृद्वृतम् ॥४८॥<br>दृष्ट्वा सुग्रीवमभयं दत्त्वा नय सहैव ते । | अनुगत वानरराज सुग्रीवपर किस कारण इतना कोप किया? उसने तो बहुत दिनोंसे बिना किसी प्रकारका सहारा मिले दुःख ही दुःख भोगा है॥४३॥ अब आपलोगों-ने ही उसे बड़े दुःख-समूहसे निकाला है। आपहीकी कृपा-से महामति सुग्रीवको यह सुख देखनेमें आया है॥४४॥ वह जातिका वानर है, इसलिये कामासक्त होकर श्रीरघुनाथजीकी सेवामें उपस्थित नहीं हुआ । हे प्रभो ! अब शीघ्र ही विविध देशोंसे बहुत-से वानर आनेवाले हैं॥४५॥ हे रघुश्रेष्ठ ! अब दिशा-विदिशाओंसे महा-पर्वतके समान बड़े-बड़े डीलवाले असंख्य वानरोंको लानेके लिये दश सहस्र बन्दर भेजे गये हैं॥४६॥ सुग्रीव स्वयं जाकर उन सब वानर-यूथपतियोंके द्वारा दैत्यदलका संहार करावेगा और स्वयं रावणका वध करेगा ॥४७॥ वह कपिश्रेष्ठ आज ही आपके साथ श्रीरघुनाथजीकी सेवामें उपस्थित होगा । चलिये, अन्तःपुरमें पधारिये । वहाँ सुग्रीव अपने पुत्र, स्त्री और सुहृद्गणसे घिरा हुआ बैठा है । उससे मिलकर उसे अभयदान दीजिये और अपने साथ ही श्रीरामचन्द्रजीके पास ले जाइये ।” |
| ताराया वचनं श्रुत्वा कृशक्रोधोऽथ लक्ष्मणः॥४९॥<br>जगामान्तःपुरं यत्र सुग्रीवो वानरेश्वरः ।<br>रुमामालिङ्ग्य सुग्रीवः पर्यङ्के पर्यवस्थितः ॥५०॥<br>दृष्ट्वा लक्ष्मणमत्यर्थमुत्पपातातिभीतवत् ।<br>तं दृष्ट्वा लक्ष्मणः क्रुद्धो मदविह्वलितेक्षणम् ॥५१॥<br>सुग्रीवं प्राह दुर्वृत्त विस्मृतोऽसि रघूत्तमम् ।<br>वाली येन हतो वीरः स बाणोऽद्य प्रतीक्षते ॥५२॥<br>त्वमेव वालिनो मार्गं गमिष्यसि मया हतः । | ताराका कथन सुनकर लक्ष्मणजीका क्रोध ठण्डा पड़ गया और वे अन्तःपुरमें, जहाँ वानरराज सुग्रीव थे, गये। सुग्रीव अपनी भार्या रुमाको गले लगाये पलंगपर पड़े थे,॥४८-५०॥ लक्ष्मणजीको देखते ही वे अत्यन्त भयभीतके समान उछलकर खड़े हो गये । उनके नेत्र मदसे विह्वल हो रहे थे। उन्हें ऐसी दशामें देखकर श्रीलक्ष्मणजीने अति क्रोधित होकर कहा— “अरे दुःशील ! तू रघुनाथजीको भूल गया ? (तू नहीं जानता—) जिस बाणके द्वारा वीरवर वाली मारा गया था वही आज तेरी प्रतीक्षा कर रहा है ॥५१-५२॥ मालूम होता है, मेरे हाथसे मारा जाकर तू भी वालीके मार्गसे ही जाना चाहता है ।” |
| एवमत्यन्तपरुषं वदन्तं लक्ष्मणं तदा ॥५३॥<br>उवाच हनुमान् वीरः कथमेवं प्रभाषसे ।<br>त्वत्तोऽधिकतरो रामे भक्तोऽयं वानराधिपः ॥५४॥<br>रामकार्यार्थमनिशं जागर्ति न तु विस्मृतः ।<br>आगताः परितः पश्य वानराः कोटिशः प्रभो॥५५॥ | लक्ष्मणजीको इस प्रकार अति कठोर भाषण करते देख वीरवर हनुमान्जी बोले—“महाराज ! ऐसी बातें क्यों कहते हैं ? ये वानरराज श्रीरामचन्द्रजीके आप-से भी अधिक भक्त हैं ॥ ५३-५४ ॥ भगवान् रामके कार्यके लिये ये रात-दिन जागते रहते हैं, ये उसे भूल नहीं गये हैं । प्रभो ! देखिये ये करोड़ों वानर इसीलिये सब |
१८० अध्यात्मरामायण [ सर्ग ५
| Sanskrit Shloka | Hindi Translation |
|---|---|
| गमिष्यन्त्यचिरेणैव सीतायाः परिमार्गणम् ।<br>साधयिष्यति सुग्रीवो रामकार्यमशेषतः ॥५६॥ | ओरसे आ रहे हैं ॥ ५५ ॥ ये सब शीघ्र ही सीताजी-की खोजके लिये जायेंगे और महाराज सुग्रीव रामचन्द्रजीका सब कार्य भली प्रकार सिद्ध करेंगे” ॥५६॥ |
| श्रुत्वा हनुमतो वाक्यं सौमित्रिर्लज्जितोऽभवत् ।<br>सुग्रीवोऽप्यर्घ्यपाद्याद्यैर्लक्ष्मणं समपूजयत् ॥५७॥ | हनूमान्जीके ये वचन सुनकर लक्ष्मणजी लज्जित हो गये । तदनन्तर सुग्रीवने अर्घ्य और पाद्य आदिसे लक्ष्मणजीकी भली प्रकार पूजा की ॥५७॥ तथा उनसे गले |
| आलिङ्ग्य प्राह रामस्य दासोऽहं तेन रक्षितः ।<br>रामः स्वतेजसा लोकान् क्षणाद्धर्धैनैव जेष्यति ॥५८॥ | मिलकर कहा, “श्रीमन् ! मैं तो रामका दास हूँ, उन्होंने मेरी रक्षा की है; वे अपने तेजसे आधे क्षणमें ही सम्पूर्ण लोकोंको जीत सकते हैं ॥ ५८ ॥ हे प्रभो ! |
| सहायमात्रमेवाहं वानरैः सहितः प्रभो ।<br>सौमित्रिरपि सुग्रीवं प्राह किञ्चिन्मयोदितम्॥५९॥ | मैं तो अपनी वानर-सेनाके साथ केवल उनका सहायकमात्र हूँगा । (मुझसे भला उनका क्या कार्य सिद्ध होगा, वे तो स्वयं ही सर्व-समर्थ हैं) ।” तब लक्ष्मणजीने भी सुग्रीवसे कहा—“हे महाभाग ! मैंने |
| तत्क्षमस्व महाभाग प्रणयाद्भाषितं मया ।<br>गच्छामोऽद्यैव सुग्रीव रामस्तिष्ठति कानने ॥६०॥ | भी प्रणय-कोपवश आपसे जो कुछ अनुचित कहा है. वह क्षमा करें । भगवान् राम वनमें अकेले ही हैं और वे श्रीजानकीजीके विरहसे अति व्याकुल हैं, अतः हम आज ही वहाँ चलेंगे ।” |
| एक एवातिदुःखात्तो जानकीविरहातुरः ।<br>तथेति रथमारुह्य लक्ष्मणेन समन्वितः ॥६१॥ | |
| वानरैः सहितो राजा राममेवान्वपद्यत ॥६२॥ | तब वानरराज सुग्रीव 'हाँ ठीक है' ऐसा कहकर लक्ष्मणजीके सहित रथमें चढ़े और वानरोंके साथ श्रीरामचन्द्रजीके पास चले ॥ ५९–६२ ॥ |
| भेरीमृदङ्गैर्बहुभृक्षवानरैः<br>श्वेतातपत्रैर्व्यजनैश्च शोभितः ।<br>नीलाङ्गदाद्यैर्हनुमत्प्रधानैः<br>समावृतो राघवमभ्यगाद्धरिः ॥६३॥ | उस समय (उनकी सवारीकी अपूर्व शोभा थी—) भेरी और मृदंग आदि नाना प्रकारके बाजे बज रहे थे तथा बहुत-से रीछ, वानर श्वेत-छत्र और चँवर लिये उन्हें अत्यन्त सुशोभित कर रहे थे। इस प्रकार वानरराज सुग्रीव बड़े ठाट-बाटसे नील, अंगद और हनूमान् आदि मुख्य-मुख्य वानरोंके साथ श्रीरघुनाथजीके पास चले ॥ ६३ ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
किष्किन्धाकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥५॥
किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग ६: सीताजीकी खोज, वानरोंका गुहाप्रवेश और स्वयम्प्रभा-चरित्र
सर्ग ६ ] किष्किन्धाकाण्ड १८१
षष्ठ सर्ग
सीताजीकी खोज, वानरोंका गुहाप्रवेश और स्वयम्प्रभाचरित्र।
| श्रीमहादेव उवाच | **श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वती ! मृगेन्द्रचर्म और जटा-मुकुटसे सुशोभित, विशाल-नयन, सस्मित मनोहर-मुखारविन्द, शान्तमूर्ति, श्यामशरीर भगवान् रामको सीताजीकी विरह-व्यथासे सन्तप्त होकर मृग और पक्षियोंकी ओर निहारते हुए गुफाके द्वारपर एकं शिलाखण्डपर बैठे देख सुग्रीव और लक्ष्मण दूरसे ही तुरन्त रथसे उतर पड़े और अत्यन्त भक्ति-भावसे श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें जा गिरे ॥ १-३ ॥ धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजीने सुग्रीवको गले लगाकर उनकी कुशल पूछी तथा अपने पास बिठाकर उनका यथोचित सत्कार किया ॥ ४ ॥ |
|---|---|
| दृष्ट्वा रामं समासीनं गुहाद्वारि शिलातले ।<br>वैलाजिनधरं श्यामं जटामौलिविराजितम् ॥ १ ॥<br>विशालनयनं शान्तं स्मितचारुमुखाम्बुजम् ।<br>सीताविरहसन्तप्तं पश्यन्तं मृगपक्षिणः ॥ २ ॥<br>रथाद्दूरात्समुत्पत्य वेगात्सुग्रीवलक्ष्मणौ ।<br>रामस्य पादयोरग्रे पेततुर्भक्तिसंयुतौ ॥ ३ ॥<br>रामः सुग्रीवमालिङ्ग्य पृष्ट्वाऽनामयमन्तिके ।<br>स्थापयित्वा यथान्यायं पूजयामास धर्मवित् ॥४॥ | |
| ततोऽब्रवीद्रघुश्रेष्ठं सुग्रीवो भक्तिनम्रधीः ।<br>देव पश्य समायान्तीं वानराणां महाचमूम् ॥ ५ ॥ | तब सुग्रीवने भक्तिवश अति विनीत होकर श्रीरघुनाथजीसे कहा—"भगवन् ! देखिये, वानरोंकी यह महान् सेना आ रही है ॥ ५ ॥ |
| कुलाचलाद्रिसम्भूता मेरुमन्दरसन्निभाः ।<br>नानाद्वीपसरिच्छैलवासिनः पर्वतोपमाः ॥ ६ ॥<br>असङ्ख्याताः समायान्ति हरयः कामरूपिणः ।<br>सर्वे देवांशसम्भूताः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ७ ॥ | प्रभो ! हिमालय आदि कुलपर्वतोंपर उत्पन्न हुए, सुमेरु और मन्दराचलके समान डील-डौलवाले, भिन्न-भिन्न द्वीप नदी-तट और पर्वतोंके ऊपर रहनेवाले तथा पर्वतके समान अगणित विशालकाय वानर आ रहे हैं। ये सभी देवताओंके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। ये इच्छानुसार रूप धारण कर सकते हैं और युद्ध करनेमें भी अति कुशल हैं ॥ ६-७ ॥ |
| अत्र केचिद्गजवलाः केचिद्दशगजोपमाः ।<br>गजायुतबलाः केचिदन्येऽमितबलाः प्रभो ॥ ८ ॥ | हे प्रभो ! इनमेंसे किन्हींमें एक, किन्हींमें दश और किन्हींमें दश हजार हाथियोंका बल है तथा किन्हींके बलका तो कोई परिमाण ही नहीं है ॥ ८ ॥ |
| केचिदञ्जनकूटाभाः केचित्कनक सन्निभाः ।<br>केचिद्रक्तान्तवदना दीर्घवालास्तथाऽपरे ॥ ९ ॥ | देखिये, कोई कज्जलगिरिके समान काले हैं, कोई सुवर्णके समान सुनहरी हैं, किन्हींका मुख रक्तवर्ण है और किन्हींके शरीरपर बड़े-बड़े बाल हैं ॥ ९ ॥ |
| शुद्धस्फटिकसङ्काशाः केचिद्राक्षससन्निभाः ।<br>गर्जन्तः परितो यान्ति वानरा युद्धकाङ्क्षिणः ॥१०॥ | कोई शुद्ध स्फटिकमणिके समान दिखायी देते हैं और कोई राक्षस-जैसे मालूम पड़ते हैं। ये सभी वानर युद्धके लिये अति उतावले हैं इसीलिये गर्जते हुए इधर-उधर दौड़ रहे हैं ॥ १० ॥ |
| त्वदाज्ञाकारिणः सर्वे फलमूलाशनः प्रभो ।<br>ऋक्षाणामधिपो वीरो जाम्बवान्नाम बुद्धिमान् ॥११॥ | हे प्रभो ! ये सब आपकी आज्ञाका पालन करनेवाले और फल-मूल आदि ही खानेवाले हैं। (इनके निर्वाहके लिये आपको कोई चिन्ता नहीं करनी पड़ेगी)। ये रीछोंके अधिपति |
| १८२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ६ |
|---|
एष मे मन्त्रिणां श्रेष्ठः कोटिभल्लूकवृन्दपः ।
हनूमानेष विख्यातो महासत्त्वपराक्रमः ॥१२॥
वायुपुत्रोऽतितेजस्वी मन्त्री बुद्धिमतां वरः ।
नलो नीलश्च गवयो गवाक्षो गन्धमादनः ॥१३॥
शरभो मैन्दवश्चैव गजः पनस एव च ।
वलीमुखो दधिमुखः सुषेणस्तार एव च ॥१४॥
केसरी च महासत्त्वः पिता हनुमतो बली ।
एते ते यूथपा राम प्राधान्येन मयोदिताः ॥१५॥
महात्मानो महावीर्याः शक्रतुल्यपराक्रमाः ।
एते प्रत्येकतः कोटिकोटिवानरयूथपाः ॥१६॥
तवाज्ञाकारिणः सर्वे सर्वे देवांशसम्भवाः ।
एष वालिसुतः श्रीमानङ्गदो नाम विश्रुतः ॥१७॥
वालितुल्यबलो वीरो राक्षसानां बलान्तकः ।
एते चान्ये च बहवस्त्वदर्थे त्यक्तजीविताः ॥१८॥
योद्धारः पर्वताग्रैश्च निपुणाः शत्रुघातने ।
आज्ञापय रघुश्रेष्ठ सर्वे ते वशवर्तिनः ॥१९॥
रामः सुग्रीवमालिङ्ग्य हर्षपूर्णाश्रुलोचनः ।
प्राह सुग्रीव जानासि सर्वं त्वं कार्यगौरवम् ॥२०॥
मार्गणार्थं हि जानक्या नियुङ्क्ष्व यदि रोचते ।
श्रुत्वा रामस्य वचनं सुग्रीवः प्रीतमानसः ॥२१॥
प्रेषयामास बलिनो वानरान् वानरर्षभः ।
दिक्षु सर्वासु विविधान्वानरान् प्रेष्य सत्वरम् ॥२२॥
दक्षिणां दिशमत्यर्थं प्रयत्नेन महाबलान् ।
युवराजं जाम्बवन्तं हनूमन्तं महाबलम् ॥२३॥
नलं सुषेणं शरभं मैन्दं द्विविदमेव च ।
प्रेषयामास सुग्रीवो वचनं चेदमब्रवीत् ॥२४॥
विचिन्वन्तु प्रयत्नेन भवन्तो जानकीं शुभाम् ।
मासादर्वाङ्निवर्तध्वं मच्छासनपुरःसराः ॥२५॥
जाम्बवान् बड़े ही वीर और बुद्धिमान् हैं। ये एक करोड़ भालुओंके यूथपति हैं और मेरे मन्त्रियोंमें अग्रगण्य हैं। अपने महान् बल और पराक्रमके लिये सर्वत्र विख्यात ये परम तेजस्वी पवन-पुत्र हनूमान्जी हैं। ये बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ और मेरे (प्रमुख) मन्त्री हैं। इनके अतिरिक्त हे रामजी ! नल, नील, गवय, गवाक्ष, गन्धमादन, शरभ, मैंदव, गज, पनस, वलीमुख, दधिमुख, सुषेण, तार, तथा हनूमान्के पिता महाबली और परम धीर केशरी—ये मेरे प्रधान-प्रधान यूथपति हैं, सो मैंने आपको बता दिये ॥ ११-१५ ॥ ये सब बड़े महात्मा, वीर और इन्द्रके समान पराक्रमी हैं; तथा इनमेंसे प्रत्येक करोड़ों वानरोंके यूथका अधिपति है ॥ १६ ॥ ये सभी आपके आज्ञाकारी और देवताओंके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। ये वालीके पुत्र परम विख्यात श्रीमान् अंगदजी हैं ॥ १७ ॥ ये भी वालीके समान ही बलवान् और राक्षसदलका दलन करनेवाले हैं। इस प्रकार ये सब तथा और भी बहुत-से वानर-वीर आपके लिये प्राण निछावर करनेको उद्यत हैं ॥१८॥ ये पर्वत-शिखर लेकर लड़ा करते हैं और शत्रु का नाश करनेमें बड़े कुशल हैं। हे रघुश्रेष्ठ ! ये सब आपके अधीन हैं, आप इन्हें इच्छानुसार आज्ञा दीजिये” ॥१९॥
तब श्रीरामचन्द्रजीने नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भरकर सुग्रीवको हृदय लगा लिया और कहा—"सुग्रीव ! तुम मेरे कार्यकी कठिनताके विषयमें जानते ही हो ॥ २० ॥ यदि तुम ठीक समझो तो इन्हें यथायोग्य जानकीजीकी खोजके लिये नियुक्त कर दो।" रामका यह वचन सुनकर वानरश्रेष्ठ सुग्रीवने प्रसन्न होकर बहुत-से बलवान् वानरोंको सीताकी खोजके लिये भेजा। इस प्रकार तुरन्त ही समस्त दिशाओंमें अनेकों वानरोंको भेजकर दक्षिण-दिशामें अधिक प्रयत्नके साथ महाबली युवराज अंगद, जाम्बवान्, हनूमान्, नल, सुषेण, शरभ, मैंद और द्विविद आदिको भेजा तथा उनसे इस प्रकार कहा—॥२१-२४॥ "मेरी आज्ञासे तुम सब लोग बड़े प्रयत्नसे शुभलक्षणा जानकीजीकी खोज करो और एक मासके भीतर ही लौट आओ ॥ २५॥
सर्ग ६ ] किष्किन्धाकाण्ड १८३
सीतामदृष्ट्वा यदि वो मासादूर्ध्वं दिनं भवेत् ।
तदा प्राणान्तिकं दण्डं मत्तः प्राप्स्यथ वानराः ॥२६॥
इति प्रस्थाप्य सुग्रीवो वानरान् भीमविक्रमान् ।
रामस्य पार्श्वे श्रीरामं नत्वा चोपविवेश सः ॥२७॥
गच्छन्तं मारुतिं दृष्ट्वा रामो वचनमब्रवीत् ।
अभिज्ञानार्थमेतन्मे अङ्गुलीयकमुत्तमम् ॥२८॥
मन्नामाक्षरसंयुक्तं सीतायै दीयतां रहः ।
अस्मिन् कार्ये प्रमाणं हि त्वमेव कपिसत्तम ॥
जानामि सत्त्वं ते सर्वं गच्छ पन्थाः शुभस्तव ॥२९॥
एवं कपीनां राज्ञा ते विसृष्टाः परिमार्गणे ।
सीताया अङ्गदमुखा बभ्रमुस्तत्र तत्र ह ॥३०॥
भ्रमन्तो विन्ध्यगहने ददृशुः पर्वतोपमम् ।
राक्षसं भीषणाकारं भक्षयन्तं मृगान् गजान् ॥३१॥
रावणोऽयमिति ज्ञात्वा केचिद्वानरपुङ्गवाः ।
जघ्नुः किलकिलाशब्दं मुञ्चन्तो मुष्टिभिः क्षणात् ॥३२॥
नायं रावण इत्युक्त्वा ययुरन्यन्महद्वनम् ।
तृषार्ताः सलिलं तत्र नाविन्दन् हरिपुङ्गवाः ॥३३॥
विभ्रमन्तो महारण्ये शुष्ककण्ठोष्ठतालुकाः ।
ददृशुर्गह्वरं तत्र तृणगुल्मावृतं महत् ॥३४॥
आर्द्रपक्षान् क्रौञ्चहंसान्निःसृतान्ददृशुस्ततः ।
अत्रास्ते सलिलं नूनं प्रविशामो महागुहाम् ॥३५॥
इत्युक्त्वा हनुमानग्रे प्रविवेश तमन्वयुः ।
सर्वे परस्परं धृत्वा बाहून्बाहुभिरुत्सुकाः ॥३६॥
अन्धकारे महद्दूरं गत्वाऽपश्यन् कपीश्वराः ।
जलाशयान्मणिनिभतोयान् कल्पद्रुमोपमान् ॥३७॥
यदि सीताजीको बिना देखे तुम्हें एक माससे एक दिन भी अधिक हो जायगा तो हे वानरो ! याद रखो, तुम्हें मेरे हाथसे प्राणान्त-दण्ड भोगना पड़ेगा" ॥ २६ ॥
उन महापराक्रमी वानरोंको इस प्रकार भेजकर सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम कर उनके पास जा बैठे ॥ २७ ॥ उस समय पवन-नन्दन हनूमान्को जाते देख श्रीरघुनाथजीने कहा—"हे कपिश्रेष्ठ ! तुम मेरी यह अँगूठी ले जाओ, इसपर मेरे नामाक्षर गुदे हुए हैं। इसे अपने परिचयके लिये तुम एकान्तमें सीताजीको देना । हे कपिश्रेष्ठ ! इस कार्यमें तुम्हीं समर्थ हो । मैं तुम्हारा बुद्धिबल अच्छी तरह जानता हूँ। अच्छा, जाओ । तुम्हारा मार्ग कल्याणमय हो" ॥ २८-२९॥
इस प्रकार वानरराज सुग्रीवके भेजे हुए वे अंगदादि वानरगण सीताजीकी खोज करते हुए पृथिवीपर जहाँ-तहाँ विचरने लगे ॥ ३० ॥ घूमते-घूमते उन्होंने विन्ध्याचलके गहन वनमें एक पर्वताकार भयंकर राक्षस देखा, जो जंगलके मृग और हाथियोंको पकड़-पकड़कर खा रहा था ॥ ३१ ॥ कुछ वानरोंने यह समझकर कि 'यही रावण है' बड़ा किलकिला-शब्द करते हुए उसे एक क्षणमें ही घूँसोंसे मार डाला ॥ ३२ ॥ फिर ( उसे इतनी सुगमतासे मरा हुआ देख-कर ) 'यह रावण नहीं है' ऐसा कहते हुए वे एक दूसरे घोर वनमें गये । वहाँ उन्हें बड़ी प्यास लगी किन्तु जल कहीं भी दिखायी न देता था ॥ ३३ ॥
उस भयंकर वनमें घूमते-घूमते उनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये; तब उन्होंने वहाँ तृण, गुल्म और लता आदिसे ढँकी हुई एक विशाल गुहा देखी ॥ ३४ ॥ उसमेंसे उन्होंने भीगे हुए पंखोंवाले क्रौञ्च और हंसों-को निकलते देखा । तब यह कहकर कि 'चलो इस गुहामें चलें, इसमें अवश्य जल होगा' सबसे आगे हनूमान्जीने उसमें प्रवेश किया, उनके ही पीछे अन्य सब वानर भी एक दूसरेकी बाँहमें बाँह डालकर उत्सुकतापूर्वक उसमें घुस गये ॥ ३५-३६ ॥
बहुत दूरतक अन्धकारहीमें जानेके अनन्तर उन वानरोंने देखा किं वहाँ ( स्फटिक ) मणिके समान
| १८४ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ६ |
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वृक्षान्पक्वफलैर्नम्राम्धुद्रोणसमन्वितान् ।<br>गृहान् सर्वगुणोपेतान् मणिवस्त्रादिपूरितान् ॥३८॥<br><br>दिव्यभक्ष्यान्नसहितान्मानुषैः परिवर्जितान् ।<br>विस्मितास्तत्र भवने दिव्ये कनकविष्टरे ॥३९॥<br><br>प्रभया दीप्यमानां तु ददृशुः स्त्रियमेककाम् ।<br>ध्यायन्तीं चीरवसनां योगिनीं योगमास्थिताम् ४०<br><br>प्रणेमुस्तां महाभागां भक्त्या भीत्या च वानराः ।<br>दृष्ट्वा तान्वानरान्देवी प्राह यूयं किमागताः॥४१॥<br><br>कुतो वा कस्य दूता वा मत्स्थानं किं प्रधर्षथ ।<br>तच्छ्रुत्वा हनुमान्प्राह शृणु वक्ष्यामि देवि ते ॥४२॥<br><br>अयोध्याधिपतिः श्रीमान् राजा दशरथः प्रभुः ।<br>तस्य पुत्रो महाभागो ज्येष्ठो राम इति श्रुतः ॥४३॥<br><br>पितुराज्ञां पुरस्कृत्य सभार्यः सानुजो वनम् ।<br>गतस्तत्र हृता भार्या तस्य साध्वी दुरात्मना ॥४४॥<br><br>रावणेन ततो रामः सुग्रीवं सानुजो ययौ ।<br>सुग्रीवो मित्रभावेन रामस्य प्रियवल्लभाम् ॥४५॥<br><br>मृगयध्वमिति प्राह ततो वयमुपागताः ।<br>ततो वनं विचिन्वन्तो जानकीं जलकाङ्क्षिणः॥४६॥<br><br>प्रविष्टा गह्वरं घोरं दैवादत्र समागताः ।<br>त्वं वा किमर्थमत्रासि का वा त्वं वद नः शुभे॥४७॥<br><br>योगिनी च तथा दृष्ट्वा वानरान् प्राह हृष्टधीः ।<br>यथेष्टं फलमूलानि जग्ध्वा पीत्वाऽमृतं पयः ॥४८॥<br><br>आगच्छत ततो वक्ष्ये मम वृत्तान्तमादितः ।<br>तथेति भुक्त्वा पीत्वा च हृष्टास्ते सर्ववानराः ॥४९॥ | स्वच्छ जलसे पूर्ण कई सरोवर हैं; उनके पास ही पके फलोंके भारसे झुके हुए कल्पतरुके समान सुन्दर वृक्ष हैं जिनमें शहदके छत्ते लगे हुए हैं। पास ही, मणिमय वस्त्रालंकारोंसे युक्त और दिव्य भक्ष्य-भोज्य आदि सामग्रियोंसे पूर्ण सर्वगुणसम्पन्न निर्जन भवन हैं। उनमेंसे एक दिव्य भवनमें उन्होंने अति आश्चर्यचकित हो एक रमणीको अकेली सुवर्ण-सिंहासनपर विराजमान देखा । वह सुन्दरी योगाभ्यासमें तत्पर एक योगिनी थी, अपने तेजसे वह उस स्थानको प्रकाशित कर रही थी तथा शरीरपर चीर-वस्त्र धारण किये उस समय ध्यान कर रही थी ॥३७-४०॥<br><br>उस महाभागा युवतीको देखकर वानरोंने भय और प्रीतिसे उसे प्रणाम किया । तब उस देवीने उनकी ओर देखकर कहा—"तुमलोग क्यों और कहाँसे आये हो ? तुम किसके दूत हो ? तथा मेरे स्थानको क्यों भ्रष्ट कर रहे हो ?" यह सुनकर हनूमान्जीने कहा—"देवि ! मैं आपसे सब वृत्तान्त निवेदन करता हूँ, सुनिये—॥ ४१-४२ ॥ परम ऐश्वर्यसम्पन्न महाराज दशरथ अयोध्याके अधिपति थे । उनके महा भाग्यशाली ज्येष्ठ पुत्र राम नामसे विख्यात हैं ॥ ४३ ॥ वे अपने पिताकी आज्ञा मानकर अपनी भार्या और छोटे भाईके सहित वनमें आये थे, यहाँ उनकी परम साध्वी पत्नीको दुरात्मा रावण हर ले गया । तब वे अपने अनुजके सहित वानरराज सुग्रीवके पास आये । सुग्रीवने उनसे मित्र-भाव हो जानेके कारण हमें यह आज्ञा दी है कि तुमलोग रामकी प्राणप्रियाकी खोज करो । अतः हम वहींसे आये हैं। यहाँ वनमें जानकीको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते हमें जलकी आवश्यकता हुई । इससे हम इस भयंकर कन्दरामें घुसे और दैवयोगसे यहाँ आ गये । हे शुभे ! आप यहाँ किसलिये रहती हैं और कौन हैं ? यह हमें बताइये" ॥ ४४-४७ ॥<br><br>यह सब देखकर उस योगिनीको बड़ा हर्ष हुआ और वह वानरोंसे बोली—"पहले तुम इच्छानुसार फल-मूलादि खाकर अमृतमय जल पान करो । फिर मेरे पास आना, तब मैं आरम्भसे तुम्हें अपना सब वृत्तान्त सुनाऊँगी ।" तब उन वानरोंने 'बहुत अच्छा' कह यथेष्ट फल-मूलादि खाकर जल पीया और फिर |