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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ४ ] बालकाण्डम् २२३


आनयामास श्रीरामो ददौ हेमासनं वरम् । कुम्भोदरो मुनिः शीघ्रं भूमौ डण्डकमण्डलू ॥४२॥
स्थापयामास वीराणि ननाम रघुनायकम् । रामः शीघ्रं कराभ्यां तं प्रत्युत्थाप्य मुनीश्वरम् । ४३ ।
गाढमालिङ्गय बाहुभ्यां ततो मुनिमभाषत । नाहं योग्यो वदनार्थं त्वया राजवघातकः ॥४४॥
इति रामवचोध्वैर्बाणैः संताडितो हृदि । कुम्भोदरस्तदोवाच यतवाटे रघूत्तमम् । ४५॥
राम राम महाबाहो न कोपः क्रियतां मयि । अपराधक्षम्यहं ते हि क्षमस्व रघुनायक । ४६॥
न मया स्वार्थमिष्टार्थं दोषारोपः कृतस्त्वयि । कृतः परोपकारार्थं तथा कीर्त्यै तवापि च ॥४७ ।
शिक्षार्थं सर्वलोकानां लल्लोभं च त्वयापि हि । यथैते मुनयः सर्वे तव मन्त्रोन्ननिर्मिते ॥४८॥
शतशो भोजनं चक्रुस्तथा भुक्तं मयाऽपि च । तदा कुतो महस्कीर्तिर्भवन्न मे रघुनन्दन ॥४९॥
इति निश्चित्य हृदये मया पूर्वं हिताय हि । लोकानां च कृतो यत्त्वन्मय्यपि दोषानुकीर्तनैः ॥५०॥
नोचेद्यात्रामप्रयुक्तः कथं राम भवेत्तव । यत्र यत्र च देशेषु तीर्थेषूपवनेषु च । ५१
आश्रमागमग्रामेषु नदीवनगिरिष्वपि । ये ये मनुजाः सर्वत्र नाना रूपेषु सत्पथाः ॥५२ ।
तव दर्शनलाभस्तु तेषां जातः सुखप्रदः । तत्राहं कारणं मन्ये चात्मानं रघुनन्दन ॥५३॥
ममान्तमुपकारंस्तु जनैः सर्वत्र कीर्त्यते । कुम्भोदरप्रसादेन नः सीतारामदर्शनम् । ५४॥
जातं विषयलुब्धानामिति मे कृतकृत्यता । जाता समन्ततः कीर्तिन्त्वयि दोषानुकीर्तनात् ॥५५॥
तवापि कीर्तिः सर्वत्र जाताऽत्र रघुनन्दन । रामेश्वरश्च सर्वत्र रामतीर्थान्यनेकशः ॥५६॥
यावद्भूभ्यां प्रमीयेत तावत्कीर्तिंस्तथापि च । अन्यच्च लोकशिक्षाऽपि जाता मद्वाक्यकारणात् ।५७।
कुम्भोदरेण मुनिना राघवस्य महात्मनः । दोषारोपः कृतः पूर्वं कथं नो न भविष्यति । ५८।
स्वदोषपरिहारार्थं राघवेण महात्मना । तीर्थयात्रा कृता पूर्वमस्माकं का कथा पुनः । ५९॥
इति स्मृत्वा भयं चित्ते सर्वत्र जगतीतले । करिष्यन्ति जना यात्रां स्वदोषक्षालनाय हि । ६०॥


बड़ा सम्मानसे लाये और कुम्भोदरका गलास प्रणाम करके हाथम हाथ मिलाते हुए यज्ञमण्डपम न लाये और उन्हें सुवर्णनिर्मित आसन बैठनेक लिए दिया ॥ ४२॥ कुम्भोदरने भी शीघ्र ही भूमपर दण्ड कमण्डलु रख कर रघुनायक रामको प्रणाम किया । ४२॥ रामने शीघ्र मुनिको हाथाम उठा लिया और बाहुओंस दृढालिङ्गन करके बोले हे भगवन् ! रावणपालक मै आपकी वन्दना करन योग्य नहीं हूँ ।॥४३॥ ४४ । इस तरह रामके वाक्यवाणसे हृदयमे विद्ध कुम्भोदर रामसे कहने लगे ॥४५॥ हे राम ! हे महाबाहो ! आपको इस तरह मेरे ऊपर क्रोध नहीं करना चाहिए । मै आपका अपराधी हूँ। मुझ क्षमा करें ॥ ४६ ॥ मैने स्वार्थसिद्धिके लिए आपके उपर दोषारोपण नहीं किया था। किन्तु संसारका उपकार करनेके लिये, आपकी कीर्तिवृद्धिके लिए और संसारको शिक्षित करनेके लिए ही मैने ऐसा किया था सो आपन जान ही लिया होगा । ४७ ॥ ॥ ४८ ॥ जैसे इन मुनियोंने आपके अन्नसत्रम सैकडो बार भोजन किया है वैसे ही मैने भी भोजन किया है। आपकी और मेरी कीर्ति कैसे हो, पहलेसे ही यह निश्चय करके संसारके हितके लिए मैने आपकी निन्दा की थी ॥ ४९ ॥ ५० ॥ अन्यथा हे राम ! विभिन्न तीर्थों तथा देशोंके लिए आपकी यात्रा नहीं होती । विविध तीर्थ, नदी, बन बगीचा तथा आश्रमोंम जो मनुष्य नाना कर्मान लिप्त हो रहे है, उनका जो आपका सुखप्रद दर्शनलाभ हुआ । उसमे मैं अपनेको ही कारण मानता हूँ ॥ ५१-५३ ॥ सब मनुष्य सभी जगह मेरे इस उपकारका कीर्तन करते हैं । वे कहते हैं कि कुम्भोदरको कृपासे ही हम लोगांको सीतारामके दर्शन मिल गये ॥ ५४ ॥ आपके ऊपर दोषारोपण कर दम्प विषयो जनांका भी आपका दर्शन प्राप्त हुआ । इससे मैं कृतकृत्य हो गया और चारो तरफ आपकी कीर्ति फैल गयी ॥ ५५ ॥ जबतक भूमण्डलपर विविध रामेश्वर महादेव और रामतीर्थ रहेंगे, तबतक आपकी कीर्ति संसारमे स्थिर रहेगा ॥ ५६ ॥ और फिर मेरे दुर्व्वाक्यके कारण ही यह लोकशिक्षा भी हो गयी कि कुम्भोदर मुनिन जब रामजीको दोष लगाया तब हमलोगोको कैसे न लगेगा ॥ ५७ । ।५८॥ प्राचीन समयमें महात्मा रामचन्द्रने दोषोंको नष्ट करनेके लिए तीर्थ किया था तो फिर हमलोगोंका तो कहना

२२४आनन्दरामायणे[ सर्गः ४

मयि ब्रह्मणि पूर्णे च दोषारोपः कथं भवेत् । पद्मपत्रे जलस्पर्शो न घटेत यथा तथा ॥६१॥
यस्य भ्रूभंगमात्रेण ब्रह्मांडप्रलयो भवेत् । ब्रह्मांडांतर्गतान् जीवान् हरसि त्वं यदा मुहुः ॥६२॥
तदा दावानलोत्पन्ने किं घटेत जनार्दन । सर्पाणां च कथं मृत्युर्विदधाति तवाज्ञया ॥६३॥
तत्र संख्याऽत्र का कार्या त्वया दोषाः कृतास्त्विति । यथा चित्राणि कुड्ये हि लिखितानि सहस्रशः ॥६४॥
संमार्जितानि तेनैव तत्र दोषो भवेत्कथम् । तथा त्वमपि श्रीराम त्रिधा भूत्वा त्रिभिर्गुणैः ॥६५॥
सृष्टिं करोषि रजसा सत्त्वरूपेण पालनम् । तमोरूपेण संहारं विधिर्विष्णुशिवात्मकः ॥६६॥
अस्माभिस्तव तोषार्थं तीर्थयात्रा विधीयते । तव तीर्थैस्तु किं राम तीर्थीभूतगुणस्य च ॥६७॥
सर्वतीर्थेषु मुख्या या कीर्त्यते स्वर्गधुनी भुवि । तव दक्षिणपादस्यांगुष्ठाग्रजनिता तु सा ॥६८॥
सर्वाघिरजसः स्पर्शात्पवित्रा कीर्तिता भुवि । तव पादरजोमिश्रा दृश्यतेऽद्यापि सा सिता ॥६९॥
रजांस्यद्यापि दृश्यन्ते तव भागीरथीजले । इति नानाविधैर्वाक्यैस्तोपयामास राघवम् ॥७०॥
अष्टोत्तरशतं नाम्नां श्रीरामस्यान्ववेक्ष्य च । स्तुत्वा रामं राघवेण पूजितः स्थितवान्मुनिः ॥७१॥
रामोऽपि गुरुसान्निध्ये तस्थौ सीतासमन्वितः । निजासनेषु सर्वत्र तस्थुस्ते सकला जनाः ॥७२॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे यानकाण्डे कुम्भोदरदर्शनं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥


पञ्चमः सर्गः

( रामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्र )
विष्णुदास उवाच

गुरो ते प्रष्टुमिच्छामि तत्त्वं वद सविस्तरम् । कुम्भोदरेण मुनिना यत्स्तोत्रं समुदीरितम् ॥ १ ॥
अष्टोत्तरशतं नाम्नां राघवस्य शुभप्रदम् । श्रवणे तस्य मे प्रीतिर्जाताऽस्ति कथयस्व तत् ॥ २ ॥


हो गया है ॥ ५९ ॥ इस तरह पृथ्वीतलपर मनुष्यमात्र अपने चित्तम भयका अनुभव करके स्वदाहपरिहारार्थ तीर्थयात्रा करेंगे ॥ ६० ॥ जैसे कमलके पत्तेपर जलका स्पर्श नहीं हो सकता, वैसे ही आप पूर्ण ब्रह्ममें दोषारोप नहीं हो सकता ॥ ६१ ॥ जिसके भ्रूभङ्गमात्रसे ब्रह्माण्डका प्रलय हो जाता है वहा आप ब्रह्माण्डान्तर्गत सब जीवों- को आनन्द विलीन करते हैं ॥ ६२ ॥ तब हे जनार्दन आपपर दावानल कैसे हो सकता है ? अब आप ही की आज्ञासे मृत्यु सबका क्षय करती है ॥ ६३ ॥ तब आपने कितने दोष किये हैं ? इसकी गणना कौन कर सकता है। ६४ ॥ जैसे किसीने भित्तिपर चित्र लिखा और फिर उमान अपने हाथसे मिटा दिया। तब उसमें क्या दोष हो सकता है। उसी तरह आप भी तीनों गुणोंसे तीन तरहके अर्थात् ब्रह्मा-विष्णु-शिवरूपमें परिणत होकर रजोगुणसे सृष्टि, सत्त्वसे पालन और तमोगुणसे संहार करते हैं ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ हम लोग आपकी प्रसन्नताके लिए ही तीर्थयात्रा करते हैं। स्वतः तीर्थस्वरूप आपका तीर्थोसे क्या प्रयोजन है ॥ ६७ ॥ जिस गङ्गाकी लोग सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ मानते हैं, वह गङ्गा आपके दक्षिण पैरके अंगूठेस उत्पन्न हुई है ॥ ६८ ॥ वह आपके चरण रजस्पर्शसे ही पवित्र माना गया है इसी हाथन यह आज तक श्वेत दिखाई पड़ती है ॥ ६९ ॥ आज भी गङ्गाजीमे आपकी चरण-रज देख रहीं है। इस प्रकारके वाक्योंसे कुम्भोदरमुनि भगवान् रामको प्रसन्न किया ॥ ७० ॥ इसके बाद रामाष्टोत्तरशतनामसे रामकी स्तुति करके और रामके द्वारा पूजित होकर वे यथास्थान बैठ गये ॥ ७१ ॥ रामजी भी गुरुके समीप सीताके साथ जा बैठे। अन्यान्य लोग भी अपने-अपने आसनोंपर विराजमान हो गये ॥ ७२ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे कुम्भोदरदर्शनं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥

श्रीविष्णुदास बोले - हे गुरु ! मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ। जो प्रश्न मैं पूछना चाहता हूँ, उसका आप विस्तृत उत्तर दीजिए ॥ १ ॥ कुम्भोदर मुनिने रामके जो अष्टोत्तरशत नामोंका शुभप्रद स्तोत्र कहा

सर्गः ५ ] यज्ञकाण्डम् २२५

सर्गः ५ ] यज्ञकाण्डम् २२५


श्रीरामदास उवाच

शृणु शिष्य महाबुद्धे सम्यक् पृष्टं त्वया मम । अष्टोत्तरशतं नाम्नां राघवस्य वदाम्यहम् ॥ ३ ॥
सर्वेश्वरः सर्वमयः सर्वभूतोपकारकः । सर्वेषामुपकारार्थं यः साकारो निराकृतिः ॥ ४ ॥
स एवैत्य लोकेऽस्मिन् समग्रभयनाशनः । यदा यदा हि लोकानां भयमुत्पद्यते तदा ॥ ५ ॥
अवतीर्यावनीं श्रीमान् दुष्टदैत्यशिरोरत्नन् । मत्स्यकूर्मवराहादिरूपेण परमार्थदृक् ॥ ६ ॥
तत्कालेषु च सर्वेषु सर्वसद्रूपधारकम् । साधूनां मयचित्तानां भक्तानां बत्सरुत्सलः ॥ ७ ॥
उपकर्तुं निराकारः सकारेण जायते । अत्रास्य जायतेऽनन्तो विभूतो भूःभारतः । ८ ॥
तदा तदाऽवतरति भक्तानामनुकम्पया । क्षीराब्धौ देवदेवेशो लक्ष्मीनारायणो विभुः । ९ ॥
अशेषैः शङ्खचक्राभ्यां दैवतैरंशादिभिः सह । शेषोऽभूल्लक्ष्मणो लक्ष्मीर्जानकी सुखचक्रके ॥१०॥
आदी भरतशत्रुघ्नौ देवाः सर्वेऽपि वानराः । प्रापन् पुरैव सर्वेऽपि देवानां भयशांतये ॥११॥
तत्र नारायणो देवः श्रीराम इति विश्रुतः । सर्वलोकापकाराय भूमौ स्वयमवातरत् ॥१२।
ध्यानमात्रेण देवेशो महापातकनाशनम् । कीर्तनश्रवणाभ्यां च हत्याकोटिनिवारणः ॥१३।
कलौ स कीर्तनेनैव सर्वं पापं व्यपोहति । राम रामेति रामेति ये वदन्त्यतिपापिनः ॥१४।
पापकोटिसहस्रेभ्यस्तानुद्धरति नान्यथा । अष्टोत्तरशतं नाम्नां तस्य स्तोत्रं वदाम्यहम् ।१५।

ॐ अस्य श्रीरामचन्द्रनामाष्टोत्तरशतमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । जानकीवल्लभः श्रीरामचन्द्रो देवता । ॐ बीजम् । नमः शक्तिः । श्रीरामचन्द्रः कीलकम् । श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः । ॐ नमो भगवते राजाधिराजाय परमात्मने हृदयाय नमः । ॐ नमो भगवते विद्याधिराजाय हयग्रीवाय शिरसे स्वाहा । ॐ नमो भगवते जानकीवल्लभाय नमः शिखायै वषट् ।


हैं, उसे सुननेकी मेरी प्रबल इच्छा है। वह कहिए ॥ २॥ श्रीरामदास बोले-हे महाबुद्ध शिष्य ! सुनो ! तुमने अच्छा प्रश्न पूछा है। मैं तुम्हें रामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्र सुना रहा हूँ ॥ ३ । राम सर्वेश्वर हैं, सर्वमय हैं और सब प्राणियोंका उपकार करनेवाले हैं वे निराकार होते हुए भी संसारके कल्याणार्थ साकार मनुष्यदेह धारण करते हैं । ४ । जब जब प्रजाको भय होता है, तब-तब उस भयको नष्ट करनेके लिये वे इस लोकमें अवतार होते हैं ॥ ५ । अवतीर्ण होकर वे मत्स्य-कूर्म-वराहादि रूपसे दानववृन्दका विनाश करते हैं । भगवान् जो कुछ करते हैं, वह सब परमार्थकी दृष्टिसे ही करते हैं ॥ ६ ॥ वे भक्तवत्सल प्रभु समदर्शी हैं। साधुओं और भक्तोंके उपकारार्थ निराकार होते हुए भी अल्पकालमें ही साकार हो जाते हैं। वे मूलपावन प्रभु अनन्त एवं अज हैं और इन्हीं नामोंसे प्रसिद्ध हैं । वे समय समयपर भक्तोंपर अनुकम्पा करके अवतार्य होते हैं। वे देवदेव इन्द्रके भी शासक हैं। वे क्षीरसागरमें शयन करते हैं और सर्वत्र व्यापक हैं ॥ ७-९॥ वे ही लक्ष्मीनारायण वखिल देवोंके साथ त्रैलोक्यके भयप्रशम्यथं रामरूपसे संसारमें अवतीर्ण हुए । शेष लक्ष्मण बने । लक्ष्मी जानकी बनी और भगवान्‌के पार्षद शङ्ख-चक्र भरत-शत्रुघ्नके रूपमें उत्पन्न हुए और सब देवता वानर बने ॥ १० ॥ ११ ॥ जो श्रीराम इसी नामसे प्रसिद्ध हैं, वे साक्षात् नारायण हैं और लोकोपकारार्थ समहन्त स्वयं अवतरे हैं ॥ १२ ॥ उन भगवान् रामके ध्यानमात्रसे महापातक भी नष्ट हो जाते हैं। वे कीर्तन श्रवण करनेसे कोटि हत्याओंके पापको भी निवारण कर देते हैं ॥ १३ ॥ वे भगवान् कलियुगमें नाम कीर्तन करनेसे ही सब पापोंको नष्ट कर देते हैं। जो घोर पापी भी रामरूप उच्चारण करते हैं तो राम उनका सहस्रकोटि पापोंसे उद्धार कर देते हैं। उन भगवान्‌के अष्टोत्तरशतनाममन्त्रको कहता हूँ ॥१४। १५॥ रामचन्द्रके इस महान्तर रामनाम मन्त्रके ब्रह्मा ऋषि हैं । अनुष्टुप् छन्द है । जानकीवल्लभ श्रीरामचन्द्रना-मक देवता हैं। ॐ बीज है। नमः शक्ति है। श्रीरामचन्द्र कीलक है । श्रीरामप्रीत्यर्थ इसका विनियोग होता है । ॐ हृदयमें बैठे हुए राजाधिराज परमात्मस्वरूप भगवान्‌को बारम्बार नमस्कार है। मस्तकमें विराजमान विद्याधिराज हयग्रीव भगवान्‌को नमस्कार है। शिखामें विराजमान जानकीवल्लभ भगवान्‌को नमस्कार और

२२६ आनन्दरामायणे [सर्गः ६


ॐ नमो भगवते रघुनन्दनायामिततेजसे कवचाय हुम् । ॐ नमो भगवते क्षीराब्धिमध्यस्थाय शरायणाय नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ नमो भगवते सर्वप्रकाशाय रामाय अस्त्राय फट् । इति षडंगन्यासः । एवं अंगुलिन्यासः कार्यः ।

अथ ध्यानम्

मन्दारकुंतिपुण्यधामविलसद्वक्षःस्थलं कोमल शांतं शांतमहेंद्रनीलरुचिशोभं सहस्राननम् ।
वंदेऽहं रघुनंदन सुरपतिं कोदण्डदीक्षागुरुं रामं सर्वजगत्सुसेवितपदं सीतामनोवल्लभम् ॥१६॥

सहस्रशीर्षे वै तुभ्यं सहस्राक्षाय ते नमः । नमः सहस्रहस्ताय सहस्रचरणाय च ॥१७॥
नमो जीमूतवर्णाय नमस्ते विश्वतोमुख । अच्युताय नमस्तुभ्यं नमस्ते शेषशायिने ॥१८॥
नमो हिरण्यगर्भाय पंचभूतात्मने नमः । नमः मूलप्रकृतये देवानां हितकारिणे ॥१९॥
नमस्ते सर्वलोकेश सर्वदुःखनिषूदन । शंखचक्रगदापद्मजटामुकुटधारिणे ॥२०॥
नमो धर्माय तत्त्वाय ज्योतिषां ज्योतिषे नमः । ॐ नमो वासुदेवाय नमो दशरथात्मज ॥२१॥
नमो नमस्ते राजेन्द्र सर्वसम्पत्प्रदाय च । नमः कारुण्यरूपाय कैकेयीप्रियकारिणे ॥२२॥
नमो दांताय शांताय विश्वामित्रप्रियाय ते । यज्ञेश च नमस्तुभ्यं नमस्ते क्रतुपालक ॥२३॥
नमो नमः केशवाय नमो माधाय शार्ङ्गिणे । नमस्ते रामचन्द्राय नमो नारायणाय च ॥२४॥
नमस्ते रामचन्द्राय माधवाय नमो नमः । गोविन्दाय नमस्तुभ्यं नमस्ते परमात्मने ॥२५॥
नमस्ते विष्णुरूपाय रघुनाथाय ते नमः । नमस्तेऽनाथनाथाय नमस्ते मधुसूदन ॥२६॥
त्रिविक्रम नमस्तेऽस्तु सीतायाः पतये नमः । वामनाय नमस्तुभ्यं नमस्ते राघवाय च ॥२७॥
नमो नमः श्रीधराय जानकीवल्लभाय च । नमस्तेऽस्तु हृषीकेश कदर्पाय नमो नमः ॥२८॥


वषट्कार है। बाहुओमें कवचरूपेण विद्यमान अमिततेज उन रघुनन्दनको नमस्कार है, जिनके हुङ्कारमात्रसे सब शत्रु नष्ट हो जाते हैं। नेत्रोंमें वौषट् अर्थात् ज्योतिस्सम्पन्न विद्यमान तथा क्षीरसागरमें शयन करनेवाले भगवान्को नमस्कार है। अस्त्रस्वरूप फट्स्वरूप और सर्वप्रकाश स्वरूप रामको नमस्कार है। इस प्रकार भगवान्‌को छहों अङ्गोंमें न्यास अर्थात् विराजमान करे। इसी तरह अंगुलियोंमें न्यास करे। अब महर्षि एक श्लोकमें रामका ध्यान करके स्तोत्र आरम्भ होता है। जिनकी मनोहर आकृति है जो पुण्यधाम है। मालाओंसे जिनका वक्षःस्थल सुशोभित हो रहा है, जो कोमल एवं शान्त हैं। जो सुन्दर महेन्द्रनीलमणिकी कान्तिके समान सुशोभित हैं। जो धनुर्वेदकी शिक्षा में संसारके गुरु हैं, संसार जिनके चरणोंको पूजता है, उन सुरपति रूप सीताके प्राणवल्लभ रामको मैं प्रणाम करता हूँ॥१६॥ हे राम ! सहस्र मस्तकवाले आपको नमस्कार है। मेघके समान कान्तिवाले आपको नमस्कार है। हे विश्वतोमुख ! आपको नमस्कार है। अच्युतको नमस्कार है ! शेषशायीको प्रणाम है ॥१७॥१८॥ हिरण्यगर्भको प्रणाम है। पञ्चभूतात्माको प्रणाम है । मूलप्रकृतिको नमस्कार है ॥१९॥ हे सर्वलोकनाथ ! सब दुःखोंको दूर करनेवाले ! आपको प्रणाम है। हे शंख चक्र गदा पद्म तथा जटा-मुकुट धारण करनेवाले राम आपको नमस्कार है ॥२०॥ धर्मस्वरूप आपको प्रणाम है। तत्त्वस्वरूपको प्रणाम है। ज्योतियोंकी भी ज्योतिको नमस्कार है। वसुदेवके पुत्रको प्रणाम है। दशरथपुत्र रामको प्रणाम है। २१॥ हे राजेन्द्र ! सब संपत्ति देनेवाले आपको प्रणाम है। हे दयाके मूर्त्तस्वरूप तथा कैकेयीके प्रिय करनेवाले ! आपको नमस्कार है ॥२२॥ दान्त, शान्त एवं विश्वामित्रके प्रियकर्ता आपको प्रणाम है। हे यज्ञेश ! हे ऋतुपालक ! आपको प्रणाम है ॥२३॥ केशवको नमस्कार है। शार्ङ्गिको नमस्कार है। रामचन्द्रके लिए नमस्कार है। नारायणके लिए नमस्कार है । २४ । हे रामचन्द्र ! आपको प्रणाम है। हे माधव ! आपको प्रणाम है। हे गोविन्द ! हे परमात्मन् ! आपका नमस्कार है । २५ ॥ हे विष्णुरूप रघुनाथ ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे दीनोंके नाथ मधुसूदन ! आपको प्रणाम है ॥ २६ ॥ हे त्रिविक्रम ! हे सीतायते ! हे वामन ! हे रामचन्द्र ! मैं

सर्गः २ ] युद्धकाण्डम् ७२३

सर्गः २ ] युद्धकाण्डम् ७२३


नमस्ते भरताग्रज ईश्वरत्वाद्यकारिणे । नमो गजानन च नमस्ते लक्ष्मणप्रिय । २९ ।
नमो नमस्ते काकुत्स्थ नमो दाशरथाय च । विभीषणपरित्रातः संकटनाश च ॥ ३० ॥
वासुदेव नमस्तेऽस्तु नमस्ते शंकराय च । प्रद्युम्नाय नमस्तुभ्यमनिरुद्धाय ते नमः ॥ ३१ ॥
सदमङ्गलिरूपाय नमस्ते पुरुषोत्तम । यज्ञांगाय नमस्तेऽस्तु मखसाधनरूप च ॥ ३२ ॥
खरदूषणहर्त्रे श्रीनृसिंहाय ते नमः । अच्युताय नमस्तुभ्यं नमस्ते सेतुबन्धक ॥ ३३ ॥
जनार्दन नमस्तेऽस्तु नमो हनूमदाश्रय । उपेन्द्रचन्द्रबंधाय मारीचवधनाय च ॥ ३४ ॥
नमो बालिवहरण नमः सुग्रीवराज्यद । जामदग्न्यमदच्छेद्रे हरये नमः ॥ ३५ ॥
नमो नमस्ते कृष्णाय नमस्ते भरताग्रज । नमस्ते पितृभक्ताय नमः शत्रुघ्नपूर्वज ॥ ३६ ॥
अयोध्याधिपते तुभ्यं नमः शत्रुघ्नसेवित । नमो नित्याय सत्याय बुद्ध्यादिक्लेशहारिणे ॥ ३७ ॥
अद्वैतमलरूपाय ज्ञानगम्याय ते नमः । नमः पूर्णाय रम्याय माधवाय चिदात्मने ॥ ३८ ॥
अयोध्मेशाय श्रेष्ठाय चिन्मात्राय परमात्मने । नमोऽरण्योद्धारगाय नमस्ते चापभञ्जिने ॥ ३९ ॥
सीतागपाय सेव्याय स्तुत्याय परमेष्ठिने । नमस्ते बाणहस्ताय नमः कोदण्डधारिणे ॥ ४० ॥
नमः कबन्धहन्त्रे च बालिहन्त्रे नमोऽस्तु ते । नमस्तेऽस्तु दशग्रीवप्रजसंहारकारिणे १०८ ॥ ४१ ॥
अष्टोत्तरशतं नाम्नां रामचन्द्रस्य पावनम् । रहस्योक्तं मया श्रेष्ठं सर्वपातकनाशनम् ॥ ४२ ॥
भ्रमन्ति ये ह्यलोके प्राण्यरूपवशानुगाः । तस्य कीर्त्तनमात्रेण जना यास्यन्ति सद्गतिम् ॥ ४३ ॥
तावद्विजृम्भन्ते पाप ब्रह्महत्यापुरःसरम् । यावन्नामाष्टकशतं पुरुषो न विकीर्त्तयेत् ॥ ४४ ॥
तावत्कलेर्महोत्साहो निःशंकं संप्रवर्त्तते । यावच्छ्रीरामचन्द्रस्य शतनाम्नां न कीर्त्तनम् ॥ ४५ ॥
तावद्यमभटाः क्रूराः संचरिष्यन्ति निर्भयाः । यावच्छ्रीरामचन्द्रस्य शतनाम्नां न कीर्त्तनम् ॥ ४६ ॥
तावत्स्वरूपं रामस्य दुर्बोधं प्राणिनां स्फुटम् । यावन्न निष्ठा रामनाममाहात्म्यमृतमत् ॥ ४७ ॥


आपका बारम्बार प्रणाम करता हूँ ॥ २७ ॥ हे माधव ! हे जानकवल्लभ ! हृषीकेश ! कन्दर्प ! मैं आपको बारम्बार प्रणाम करता हूँ ॥ २८ ॥ हे रघुनाथ ! हे कीर्त्तय-हूर्त्तकारिन् ! कमलनयन ! लक्ष्मणप्रिय ! मैं आपको पुनः पुनः प्रणाम करता हूँ ॥ २९ ॥ हे काकुत्स्थ ! दशरथनन्दन ! संकटनाशन ! विभीषणसंरक्षक ! आपका मैं पुनः पुनः प्रणाम करता हूँ ॥ ३० ॥ हे वासुदेव ! शंकरप्रिय प्रद्युम्न ! अनिरुद्ध ! मैं आपका पुनः पुनः प्रणाम करता हूँ ॥ ३१ ॥ हे सदसद्मूर्त्तिस्वरूप ! पुरुषोत्तम ! यज्ञांगस्वरूप ! मखसाधनरूप ! आपको कोटिशः प्रणाम है ॥ ३२ ॥ हे खरदूषणहन्ता ! श्रीनृसिंह ! अच्युत ! सेतुबन्धनकारिन् राम ! आपका कोटिशः प्रणाम है ॥ ३३ ॥ हे जनार्दन ! हनुमदाश्रय ! उपेन्द्रचन्द्रबंधी ! मारीचवधभंजनकारिन् ! आपको कोटिशः प्रणाम है ॥ ३४ ॥ हे बालिवधहरण ! सुग्रीवराज्यद ! जामदग्नि ! महादुःखहर हरे ! आपको कोटिशः प्रणाम है ॥ ३५ ॥ हे कृष्ण ! भरताग्रज ! पितृभक्त ! शत्रुघ्नपूर्वज ! मैं आपका सहस्रों बार प्रणाम करता हूँ ॥ ३६ ॥ हे अयोध्याधिपते ! शत्रुघ्नसेवित ! नित्यसत्य ! बुद्ध्यादिक्लेशनाशक ! आपको प्रणाम है ॥ ३७ ॥ हे अद्वैत मङ्गलस्वरूप ! ज्ञानगम्य ! माधव ! पूर्ण ! रम्य ! चिदात्मन् ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ ॥ ३८ ॥ हे अयोध्याेश श्रेष्ठ ! चिन्मात्र ! परमात्मन् ! बहुदण्डाधारक ! सुचापभञ्जन् आपका प्रणाम है ॥ ३९ ॥ हे सीतासेव्य ! स्तुत्य ! परमेष्ठिन् ! बाणहस्त ! धनुर्धारिन् ! आपको अनेकशः प्रणाम है ॥ ४० ॥ हे कबन्धहन्त ! पालिहन्त ! दशग्रीवप्रायसंहार-कारिन् ! मैं आपको पुनः पुनः नमस्कार करता हूँ ॥ ४१ ॥ सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला श्रेष्ठ एवं पावन रामचन्द्रका यह अष्टोत्तरशतनामरत्न मैंने तुमसे कहा ॥ ४२ ॥ हे द्विज ! जो प्राणी अपने दुर्भागयवश इस लोकमें भ्रमण करते हैं। इस स्तोत्रके पठनमात्रसे वे सद्गतिको प्राप्त होंगे ॥ ४३ ॥ ब्रह्महत्यादि पाप तभीतक उपद्रव करते हैं, जब तक पुरुष इस स्तोत्रका पाठ नहीं करता ॥ ४४ ॥ प्रणाश तभी तक कलिकृत प्रबल रहता है जब तक यह रामचन्द्रके इस स्तोत्रका स्मरण पठन नहीं करता ॥ ४५ ॥ तभी तक भयंकर यमराजके दूतगण निर्भय विचरण करते हैं, जबतक प्राणी इस स्तोत्रका पाठ नहीं करता ॥ ४६ ॥ तब तक रामका स्वरूपशक्तियानको

२२८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६


कीर्त्तितं पठितं चित्ते धृतं संस्मारितं मुदा । अन्यतः शृण्वदन्मर्त्यैः सोऽपि मुच्येत पातकात् ॥ ४८ ॥ ब्रह्महत्यादिपापानां निष्कृतिं यदि वाञ्छति । रामस्तोत्रं मासमेकं पठित्वा मुच्यते नरः ॥ ४९ ॥ दुष्प्रतिग्रहदुर्भोक्तृदुरालापादिजम्भवम् । पापं सकृत्कीर्तनेन रामस्तोत्रं विनाशयेत् ॥ ५० ॥ श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासोपामशतानि च । अर्हन्ति नाल्पां श्रीरामनामकीर्तिकलामपि ॥ ५१ ॥ अष्टोत्तरशतं नाम्नां सीतारामस्य पावनम् । अस्य संकीर्तनादेव सर्वान् कामाँल्लभेनरः ॥ ५२ ॥ पुत्रार्थी लभते पुत्रान् धनार्थी धनमाप्नुयात् । स्त्रियं प्राप्नोति पत्न्यर्थी स्तोत्रपाठश्रवादिनः ॥ ५३ ॥ कुम्भोदरेण मुनिना येन स्तोत्रेण राघवः । स्तुतः पूर्वं यज्ञवाटे तदेतत्ते मयोदितम् ॥ ५४ ॥

इति श्रीमत्कोटिरमचचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे श्रीरामनामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥


षष्ठः सर्गः

( रामकी दिनचर्या )

श्रीरामदास उवाच

अथ कुम्भोदरे दिव्ये चासनोपरि संस्थिते । यज्ञस्तम्भे श्यामकर्णं बबन्धुस्ते हि ऋत्विजः ॥ १ ॥ तस्याङ्गानि समस्तानि पृथङ् मन्त्रैर्यथाविधि । मन्त्रयित्वापि शमित्रा तं निजघ्नुर्द्विजपुङ्गवाः ॥ २ ॥ तन्मांसखण्डैराज्याक्तैर्होमं चक्रुः सविस्तरम् । तथा नानाविधैर्द्रव्यैः सक्तुपायसगोधूमैः ॥ ३ ॥ मध्वाक्ततिलदूर्वाद्यैः समिधाभिश्च सादरम् । गोघृतेन वसोर्धारां वह्नौ स्थूलामखण्डिताम् ॥ ४ ॥ गोशृङ्गेनोर्ध्वबद्धेन ददुर्मन्त्रैः सविस्तरम् । चिरकालं होमकुण्डे यावद्यज्ञसमापनम् ॥ ५ ॥ तदा धूमचयैर्व्याप्तमाकाशं च समन्ततः । नाद्यापि दृश्यते शुभ्रं नीलाभं प्रहृश्यते ॥ ६ ॥ चैत्रमासे महापुण्ये वसन्ततौ सुखावहे । एवं प्रवर्त्तयामासुर्वाजिमेधं मुनीश्वराः ॥ ७ ॥


दुर्बोध रहता है, जबतक इस उत्तम स्तोत्रमें निष्ठा नहीं होती ॥ ४७ ॥ जो इसको पढ़ता और कीर्तन करता है, जो डम चित्तमें धारण करता है, प्रेमसे स्मरण करता है और औरोंसे सुनता है, वह भी पातकोंसे छूट जाता है ॥ ४८ ॥ जो ब्रह्महत्यादि पापोंकी निष्कृति चाहता हो, वह पुरुष एक महीने इसका पाठ करे ॥ ४९ ॥ इसके एक बार कीर्तन करनेसे मनुष्य दुष्प्रतिग्रह, दुर्भोज्य तथा दुरालापादिजन्य पापोंसे छूट जाता है ॥ ५० ॥ श्रुति-स्मृति-पुराण-इतिहास-आगम (वेद) और स्मृति इसकी सोलहवीं कलाको भी नहीं पहुंचते ॥ ५१ ॥ श्रीसीतारामके इस पावन अष्टोत्तरशतनामका जो मनुष्य पाठ करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। इसका पाठ एवं श्रवण करनेसे पुत्रार्थीको पुत्र, धनार्थीको धन और स्त्री चाहनेवालेको स्त्री मिलती है ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ बागस्त्य मुनिने जिस स्तोत्रके द्वारा अश्वमेध यज्ञमें रामचन्द्रकी स्तुति की थी, वही स्तोत्र मैंने तुमसे कहा है ॥ ५४ ॥

इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे श्रीरामनामाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥

श्रीरामदास बोले—इसके अनन्तर कुम्भोदर मुनि दिव्य आसनपर बैठ गये । उधर ऋत्विक् लोगोंने यज्ञस्तम्भमें श्यामकर्ण अश्वको बांध दिया ॥ १ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! उसके अंगोंको शास्त्रानुसार मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके ब्राह्मणोंने उसका वध किया ॥ २ ॥ तब घृतमें सने हुए घोड़ेके मांसखण्डों एवं सक्तु पायस गोधूम आदि नाना द्रव्योंसे ऋत्विक् लोग हवन करने लगे ॥ ३ ॥ हे हूं! मधुमें सने हुए तिल, दूर्वा, समिधा तथा गोघृतकी अखंड एवं स्थूल वसोर्धाराको अग्निमे छोड़ने लगे ॥ ४ ॥ चिरकाल पर्यन्त जब तक यज्ञ समाप्त नहीं हुआ, तबतक वे ऊपर बँधे हुए गोशृङ्गके द्वारा होमकुण्डमें समन्त्र आहुति देने रहे ॥ ५ ॥ इसके सम्पूर्ण आकाश-मंडल धूमसमूहसे व्याप्त हो गया । उसीके कारण आज भी आकाश श्वेत नहीं, नीला ही दीखता है । सुखावह वसन्त ऋतु एवं पुनीत चैत्रमासमें इस तरह वे मुनीश्वर लोग वह अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे ॥ ६ ॥ ७ ॥

सर्गः ६ ] यागकाण्डम् २२९

सर्गः ६ ] यागकाण्डम् २२९

ईजुस्ते यज्ञविधिना हविर्होत्रादिलालपैः । शङ्खतूर्यस्वनैर्नादैर्ब्रह्मघोषैर्महेश्वरम् ॥ ८ ॥ प्रत्यहं प्रातरुत्थाय रामचन्द्रः सर्मयया । नत्वा शम्भुं च देवेशानमुनींश्चापि पृथक्पृथक् ॥ ९ ॥ कौसल्याद्याश्च मातॄश्च कामधेनुं हृदि स्थितम् । चिन्तामणिं कोशाध्यक्षं कल्पवृक्षं द्विजोत्तमम् ॥ १० ॥ पृष्ठतः यज्ञवाटस्य देवतां यज्ञपूरुषम् । ततो गङ्गागमनार्थे समाज्ञाप्य यथाविधि ॥ ११ ॥ कृत्वा नित्यविधिं सर्वं पूजयामास शङ्करम् । उपहारान् समर्प्याथ कामधेनुसमुद्गतान् ॥ १२ ॥ समानितान् रत्नपात्रैः सीताया शृण्वदन्तः । ततः संप्रूजयामास धेनुं विधिपूर्वकं स विस्तरम् ॥ १३ ॥ ऋत्विजश्च तु मण्डपस्थांश्चैव सुहृद्विदां । प्रदाने ऋत्विजः सर्व यदाज्ञा मुमुचून् ॥ १४ ॥ स्नात्वा नित्यविधिं कृत्वा सम्पूज्यस्य महेश्वरैः । गमाज्ञयाऽथ सौमित्रिनृपादीनां प्रपूजनम् ॥ १५ ॥ दिव्यैर्नानोपहारार्थैः कामधेनुसमुद्भवैः । ततश्चकार सौमित्रिनृपादीनां प्रपूजनम् ॥ १६ ॥ तथा सीताऽथ साऽप्याज्ञाप्योर्मिला लक्ष्मणप्रिया ॥ १७ ॥ मांडवी श्रुतकीर्तिश्च सर्वस्त्रीकः प्रपूजयत् । अथ ते ऋत्विजश्वक्रुः स्वाहाकारैर्यथाविधि ॥ १८ ॥ होमं नानाविधैर्द्रव्यैः सुगन्धैर्यज्ञमण्डपे । पुरोडाशान् वरान् दिव्यान्भक्षयन्तोऽप्यमानवाः ॥ १९ ॥ वाजिमेधे राघवस्य साक्षाद्देवाः स्वयं मुदा । हवींषि भक्षयामासुःप्रत्यक्षाणि पावके ॥ २० ॥ अस्तु वौषडिति प्रोचुराद्ययातः स मेघवत् । श्रूयते यज्ञशालासु मन्त्रान्वितवशाननः ॥ २१ ॥ मध्ये कुण्डं महारम्यं व्याप्तमृत्विजनैः शुभम् । ततो मुनीश्वराः सर्वे ततो देवाः समन्ततः ॥ २२ ॥ ततः सर्वाः स्त्रियः श्रेष्ठास्ततो विद्याधराः स्थिताः । ततो यक्षाश्च गन्धर्वाः किन्नराः प्लवगास्तथाः ॥ २३ ॥ ततस्ते क्षत्रियाः सर्वे तत्तत्तेषां तु सेवकाः । ततः स्थिता वश्याश्चैवान्येनो माघवशंवदाः ॥ २४ ॥ ददृशुः संस्थिता यज्ञमण्डपे यज्ञकौतुकम् । मध्याह्नावधि हुत्वा ते ऋत्विजश्च प्रतिष्ठरन् ॥ २५ ॥

इत्याख्यान एवं क्रियाश्राव नियम वैदिक अग्निहोत्र दीक्षा प्राकृत एवं वैदिक विधियोंसे संपादन कर रहे थे ॥ ८ ॥ रामचन्द्रजी नित्य प्रातःकाल उठ तथा शौचादि क्रियाओंसे निवृत्त होकर शंभु, ब्रह्मा एवं अन्य देवताओंका, मुनियोंका, कामधेनुका, हृदयस्थ चिन्तामणिका, कल्पवृक्षके समान कान्तान् को, सुवर्ण का, पृष्ठपर विराजमान, यक्षक देवता तथा यज्ञ भगवान्‌को प्रणाम करते थे ॥ ९ ॥ १० ॥ इसके बाद यथाविधि गंगातटपर जाकर स्नान करते थे ॥ ११ ॥ इसके अनन्तर सम्पूर्ण दैनिक कृत्य करते और कामधेनुसे प्राप्त उपहारोंकी भेंट देते थे ॥ १२ ॥ सीताके द्वारा रत्नपात्रमें लाये गये सब रसोंसे कामधेनुकी पूजा करके बाद विस्तारपूर्वक ब्रह्माकी पूजा करते थे ॥ १३ ॥ तदनन्तर ऋत्विजोंकी पूजा करके याज्ञिकोंके पास बैठ जाते थे। ऋत्विक्, होता एवं सब मुनीश्वर भी नित्यकर्मोंको समाप्त करक यज्ञमण्डपमें बैठ जाते थे। रामकी आज्ञासे लक्ष्मणजी उनकी पूजा करते थे ॥ १४ ॥ १५ ॥ बादमें कामधेनुसे उत्पन्न नाना प्रकारके स्वर्गीय उपहारोंसे राजाओंकी पूजा करते थे ॥ १६ ॥ दिव्य वस्त्राभरणों तथा विविध पक्वान्नोंसे लक्ष्मणप्रिया उर्मिला एवं माण्डवी-श्रुतकीर्ति प्रभृति स्त्रियां भी सीताके आज्ञानुसार सब स्त्रियोंका पूजन करती थीं ॥ १७ ॥ इस तरह प्रत्येक मनुष्योंकी यथायोग्य पूजा हो चुकनेके बाद ऋत्विक् लोग स्वाहाकारो द्वारा विविध सुगन्धित द्रव्योंसे यज्ञमण्डपमें हवन करते थे ॥ १८ ॥ सीता और राम दृष्टियोंकी तृप्तिपर भेंट एवं दिव्य पुरोडाशों को खाती थे ॥ १९ ॥ रामचन्द्रजीके अश्वमेध यज्ञमें देवता प्रत्यक्ष प्रकट होकर बड़े आनन्दसे अग्निमें प्राक्षित हवियोंको खाते थे ॥ २० ॥ ऋत्विक् लोग 'अस्तु वौषट्' इस प्रकार बोलते थे और बाजे बजाते थे। जिनका मेघध्वनिके सदृश गम्भीर बांथ समस्त यज्ञशालामें सुनायी पड़ता था ॥ २१ ॥ मध्यमें रमणीय एवं ऋत्विकजनोंसे व्याप्त हवनकुण्ड था। उनके पास मुनीश्वर बैठे थे। चारों तरफ देवता बैठे थे ॥ २२ ॥ इसके बाद सम्पूर्ण स्त्रियाँ थीं। उनके बाद विद्याधर बैठे थे। उनके बाद यक्ष, यक्षोंके बाद गन्धर्व, गन्धर्वोंके बाद किन्नर, किन्नरोंके बाद बन्दर, उनके बाद क्षत्रिय, क्षत्रियोंके बाद सेवकवर्ग, उनके बाद वैश्यादि, उनके बाद मगध और बंदीजन बैठे थे ॥ २३ ॥ २४ ॥ इस तरह अपने-अपने स्थानपर बैठे हुए सब लोग यज्ञका कौतुक देख रहे थे ॥ २५ ॥

२३० आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

ततो माध्याह्निकं कर्तुं ययूस्तेऽ वग्यु नदीषु, कृत्वा माध्याह्निकं कर्म गत्वा तु यज्ञमण्डपे । २६॥ द्रव्यासनं तु सम्प्रेष्य नामरेखपदं स्थितः । दद्याद्याश्चाग्रगश्चाञ्च तन्मूर्द्धन्यासनोपरि । २७॥ लक्ष्मणस्वान् प्रपूज्याथ भरतेन स शत्रुहा । मध्येऽप्य हेमपात्राणि मर्यषां गुरुवस्तदा ॥२८॥ जानकीं त्वत्वरामास परिवेषणकर्मण । अथ सांतानिना रम्या नया सा मांडवी शुभा । २९॥ श्रुवकीर्तिमिशिवन्यः सुहत्पत्न्यः सहस्रशः । परिवेषणकर्माण चक्रुस्ता यज्ञमण्डपं ॥३०॥ नानाविघरसवंश्च कामधेनुःसुसुर्ब्वे । मुनायणादकाः सर्वे तोषमापुस्तदाऽध्वरं ॥३१॥ मीनादीनां ह न रीगां तदा यज्ञस्य मंडपे । नूपुरणा किंकिणीनां शुश्रूवे मवतो ध्वनिः ॥३२॥ यथेच्छ भुजतां सर्वं याच्यता यद्धृदि स्थितम् । मा शङ्का भोजने कार्या त्यक्तव्यं यन्न रोचते ॥३३॥ अयाचितानि देयानि पक्वान्नानि यथारुचि । अखण्डिताज्यधाराञ्च कार्या राघवशासनात् ॥३४॥ गृह्णीतां किञ्चिदुत्सृज्ये नेति नेति द्विजाः पुनः । इति भोजनकाले वै शुश्रुवे सर्वतो ध्वनिः ॥३५॥ किंचिदपेक्षित स्वामिनिति रामेण प्रार्थिताः । चक्रुस्ते भोजनं सर्वे दीजता व्यञ्जनादिभिः ॥३६॥ उर्लेकणोदकैरूच्छ्वैः रूङ्गशुद्धिं मुनीश्वरी । ततो गृहीत्वाऽत्यूत्वा मुनयस्ते तु निर्जराः ॥३७॥ गृहीत्वा दमुद्रां हि राघवेण पृथक् पृथक् । समर्पितां दक्षिणार्थं जग्मुर्वामस्थलानि हि ॥३८॥ ततः पूर्वोपचारार्थैः कथितैरथ पार्थिवाः । चक्रुस्ते भोजनं सर्वं चकुरेषामस्ततः परम् ॥३९॥ स्त्रीणां भोजनशालासु पूर्व भुक्त्वाऽवरस्त्रियः । सहिता मुनिपत्नीभिस्ततस्ताः क्षत्रियस्त्रियः ॥४०॥ चक्रुर् भोजनं सर्वाः सीतया प्रार्थिता मुहुः । ततो वैश्यास्तथच्छ्रूः पौग्न र्यस्ततः परम् ॥४१॥ तत शूद्रास्त्वथार्येषु मुदा चक्रुश्च भोजनम् । शालासु पुरनार्या च ततो वानरराक्षसाः ॥४२॥ ऋक्षाः पौरा जानपदायर्जुर्माजनमुत्तमम् । ततः शूद्रादयः सर्व ततः पार्थिवसत्रकाः ॥४३।


ऋत्विक् लोग मध्याह्नस्त स्नानाद्यवश्यक हवन कृत्य माध्याह्निक कृत्य करनेके लिए सरयूपर जात भये ॥ २६ ॥ माध्याह्निक कृत्य करके वे यज्ञमण्डपमें जिसका स्थान पूर्वनिर्मित आसान पर बैठ जन थे उसी तरह अपना अपना कृत्य समाप्त करके देवता भी दिव्य आसनपर विराज गये ॥ २७ ॥ तदनन्तर भरत, लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न उनकी पूजा करके सुवर्णके भोजनपात्र उनके सामने रख दिये ॥ २८ ॥ तब भगवान् रामचन्द्र ने अन्न परोसनेके लिए सीताको आज्ञा दई थी । तब सीता, ऊर्मिला, मण्डवी, श्रुतकीर्ति एव हजारस मित्रपत्नियां परोसती थीं । २९ ॥ ३० ॥ नाना प्रकारका उन उत्कृष्ट भोजनसामग्रियोंसे व मुनश्वरादिक अत्यंत प्रसन्न होते थे । ३१ ॥ जिस समय सीता प्रभृति स्त्रियां यज्ञमण्डपमें भोजन परोसती थीं, उस समय नूपुरों एवं किकिणियोंका मधुर ध्वान सबन सुनाई पड़ता था ॥३२॥ सब लोग यथेष्ट भोजन करें, जो पसंद हो सो मांगें, भोजनके विषयमें कोई किसी तरहकी शंका न करे और जिसका जो पदार्थ न रुचे, उस छोड़ दें । बिना मांग ही यथेष्ट पक्वान्न दो और उनका आज्योद्य अखण्ड घृतधारा डालो । इस प्रकार रामचन्द्र परोसनेवालाको आज्ञा देते थे ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ परोसनेवाले कहते थे और लीजिये, ब्राह्मण कहते थे 'नही'। इस प्रकार भोजनकालम सर्वत्र यही ध्वनि सुनाई पड़ती थी । ३५॥ भगवान् रामचन्द्रजी कहते थे-भगवन् ! क्या चाहिये ? इसके उत्तरमें ब्राह्मण सब पागूर्ण हैं ऐसा कहते थे। इस प्रकार आनन्दके साथ पक्वान्नां द्वारा स्रात हुए विप्रगण भोजन करते थे ॥ ३६ ॥ भोजनान्तर ठण्डे एवं उष्णोदकसे हस्त-दन्त शुद्धि करके व ताम्बूल खाते थे ॥ ३७ ॥ इसके बाद राम द्वारा दक्षिणार्थ समर्पित स्वर्णमुद्राको लेकर वे मुन वर एवं देवता डरपर चले जाते थे ॥ ३८ ॥ इसके बाद पूर्वोक्त उपचारास राजालाग भोजन करते थे । तदुपरा्न्त वैश्यप भोजन करतेथ ॥ ३६ ॥ स्त्रियाक भाजनाशालान पहल दवाङ्गनार्थे, फिर मुनिपलियां और उनके बाद क्षत्रियपत्नियां भाजन करती थी । तदनन्तर सभा न्वियों सीताकी प्रार्थना-पर भोजन करतो थी । इसके बाद वणिक् स्त्रियां तदुपरात्न पुरनारियां एव शूहवणिप भाजन करते थे । पुरवासी भोजनालयम बानर, राक्षस, ऋक्ष, पुरवासा, शूद्रा द एवं राजनयक पे सब क्रमशः भोजन करते थे

सर्गः ६ ] यागकाण्डम् २३१


न कश्चित् क्षुधितस्तत्र नासीत्कस्य निषेधनम् । ततो रामः सुहन्मित्रैर्बंधुभिः सचिवादिभिः । ४४।
चकार भोजनं स्वस्थः सीतया प्रार्थितो मुहुः । यावन्तो भूमिकणिका यावन्तस्तोयबिन्दवः ॥४५॥
यावत्युडूनि गगने तावन्तो राघवध्वरे । प्रत्यहं भोजनं चक्रुर्विप्राद्यास्तत्स्त्रियोऽपि च ॥४६
शुभ्रिर्मंत्रिपत्नीभिस्तथा देवपत्नीभिः । चकार भोजनं सीता दिव्यान्र्नैः स्वस्थ्यमानसा । ४७
ततश्चतुर्थप्रहरे मणीं कृत्वा तु मंडपे । कथाभिः कीर्त्तनाद्यैर्निः शास्त्रवादैः सुपूण्यदैः ॥४८।
वारस्त्रीणां नृत्त्यगीतैर्निन्चे रामो दिनक्षयम् । सन्ध्यादिकं कृत । पुनहूत्वा यथाविधि । ४९।
पूर्वोक्तैस्तु कथाद्यैश्च निशायाः प्रहरद्वयम् । मणीं क्रम्य निद्रार्थं मवानीतान्पृथग्दा । ५० ।
गत्वा स्वस्वस्थलं सर्वे निद्रां चक्रुर्यथामुखम् । पट्टकूलासने भूमौ सीतया स जितेंद्रियः । ५१ ।
चकार निद्रां श्रीरामो हृदि चिन्तयेष्टदेवताः । आज्ञाभंगो नरेन्द्राणां विप्राणां मानखंडनम् ॥ ५२ ।
पृथक् शय्या च नारीणामशस्त्रवध उच्यते । यतः स सीतया युक्तश्चकार शरणं प्रभुः । ५३ ।
एवमासीत्प्रत्यहं वै दिनचर्याऽध्वरे प्रभोः ॥ ५४ ।
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे
यज्ञ रं भे रामदिनचर्यावर्णनं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ।


सप्तमः सर्गः

( ध्वजारोपणव्रतकी महिमा )
श्रीरामदास उवाच
सौत्येऽहन्यवनीपालो याजकान्ससदस्पतीन् । अपूजयन्महाभागान् यथावत्सुसमाहितः ॥ १ ।
अथ चैत्रे सिते पक्षे राजानः प्रतिपत्तिथौ । ध्वजानारोपयामासुर्विधिनाऽध्वरमण्डपे ॥ २ ॥
श्रीविष्णुदास उवाच
आरोपिता ध्वजाः प्रोक्ताः पार्थिवैर्यज्ञमण्डपे । गुरो तेषां विधानं मां सम्यग्वक्तुं त्वमर्हसि । ३ ।


॥ ४०-४३ ॥ किसीके लिए भोजनका निषेध नहीं था। अर्थात् कोई भूखा नहीं रहता था। सबके भोजन कर लेनेके बाद रामचन्द्रजी स्वयं सीताके बारम्बार प्रार्थना करनेपर अपने पुत्र, मित्र, बन्धु एवं सचिवोंके साथ भोजन करते थे ॥ ४४। पृथ्वीमें जितनी रेणुकण हैं जितने जलविन्दु हैं तथा आकाशम जितने नक्षत्र हैं उतनी संख्यामें ब्राह्मण प्रभृति पुरुष एवं स्त्रीवृन्द रामचन्द्रके यज्ञमें प्रतिदिन भोजन करत थे ॥ ४५ । ४६ । रामचन्द्रके भोजनोपरान्त श्रीसीताजी भी सास, मन्त्रिपत्नी तथा देवपत्नियोंके साथ दिव्य अन्न खाती थीं । ४७॥ पुनः चौथे पहर यज्ञमण्डपमें सभा करके कथा, हरिकीर्तन, पुण्यप्रद शास्त्रचर्चा तथा वेश्याओंके नृत्यगान द्वारा राम अवशिष्ट समय बिताते थे । ४८ । पुनः सायंकाल सन्ध्या एवं हवनकृत्य पूर्ण करके कथादिके द्वारा रात्रिके दो प्रहर बिताकर सब लोगोंको शयन करनका आज्ञा देत थे ॥ ४९ । ५० ॥ तब सब लोग अपने अपने स्थानों- पर सानन्द शयन करते थे। राम भी अपने इष्टदेवताका हृदयमें स्मरण करके भूमिपर पट्टदुकूलासन बिछा तथा जितन्द्रिय होकर सीताके साथ सोते थे ॥ ५१ ॥ राजाओंकी आज्ञा तोडना, ब्राह्मणोंका मानमर्दन एवं स्त्रियोंकी पृथक् शय्या करना अशस्त्रवध कहलाता है। अतः भगवान् रामचन्द्र सीताके साथ ही सोते थे ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ इस प्रकार यज्ञमें भगवान्‌का वह प्रतिदिनका काम था ॥ ५४ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्ड यज्ञारम्भे रामचर्यावर्णनं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

श्रीरामदास कहने लगे— सौत्यपर्वके दिन राजा रामचन्द्रने सावधान होकर याजकों एवं सदस्योंकी यथावत् पूजा की ॥ १ ॥ चैत्र शुक्लपक्ष प्रतिपदाके दिन राजालोग विधिपूर्वक यज्ञमण्डपके ऊपर ध्वजाओंको फहराने लगे । २॥ विष्णुदासने कहा— हे गुरो ! आपने कहा कि राजा लोग यज्ञमण्डपके ऊपर ध्वजा

२३२आनन्दरामायणे[ सर्गः ७

श्रीरामदास उवाच

सम्यक्प्रश्नः कृतः शिष्य त्वया लोकोपकारकः । सावधानमना भूत्वा शृणुष्व त्वं मयोच्यते ॥ ४ ॥
नारम्भ्यां व्रतं चैवं पूर्वदृष्ट्या सभागमम् आरोपितो ध्वजाः सर्वेर्यज्ञवाटे तदा मुदा ॥ ५ ॥
ते चेद्विष्णुगृहेन्वागेष्वारोपणीया ध्वजा नृभिः । मधुशुक्लदशम्यां वा पुण्यायां प्रतिपत्तिथौ ॥ ६ ॥
अथवा रोपणं कार्यं श्रीरामनवमीदिने । मधुशुक्लदशम्यां वा दशम्यामश्विने सिते ॥ ७ ॥
अथवोजेऽथ नभसि शुक्लप्रतिपदोऽपि भो द्विज । एते कल्पा मया प्रोक्ता व्रतस्यास्य नरोत्तमः ॥ ८ ॥
अधुना संप्रवक्ष्यामि ध्वजारोपणमुत्तमम् । व्रतं पापहरं पुण्यं रामसंतोषकारकम् ॥ ९ ॥
यः कुर्याद्विष्णुभवने ध्वजारोपणसंज्ञकम् । महत्पुण्यं विचित्सार्थैः किमन्त्यैर्बहुभाषितैः ॥ १० ॥
हेमभारसहस्रं तु यो दद्याच्च कुटुम्बिने । तत्फलं समवाप्नोति ध्वजारोपणकर्मणः ॥ ११ ॥
ध्वजारोपणतुल्यं स्थान्न गंगास्नानमुत्तमम् । न वरा तुलसीसेवा शिवलिंगप्रपूजनम् ॥ १२ ॥
अहोऽश्वमेधोऽश्वमेधोऽयं महत्कर्म सर्वपापहरं कर्म ध्वजारोपणसंज्ञितम् ॥ १३ ॥
तानि सर्वाणि वक्ष्यामि शृणु त्वं गदतो मम ॥ १४ ॥
अथ चैत्रे सिते पक्षे व्रतं हि प्रतिपत्तिथौ । मधुशुक्लदशम्यां वा नवम्यां राघवस्य वा ॥ १५ ॥
कार्यं वाऽऽश्विनमासस्य दशम्यां शुक्लपक्षके । ऊर्जशुक्लप्रतिपदि दशम्यां वा विधीयताम् ॥ १६ ॥
अवश्यं चैत्रमासे हि कार्यं चैतद्व्रतोत्तमम् । अतिक्रान्ते चैत्रमासे कार्यं चैतरवर्षेषु ॥ १७ ॥
चैत्रशुक्लप्रतिपदि प्रभाते प्रयतो नरः । स्नानं कुर्यात्प्रयत्नेन दन्तधावनपूर्वकम् ॥ १८ ॥
ततः कृत्वा नित्यकर्म पश्चाद्विष्णुं समर्चयेत् । चतुर्भिर्ब्राह्मणैः सार्द्धं कृत्वा च स्वस्तिवाचनम् ॥ १९ ॥
नान्दीश्राद्धं प्रकुर्वीत ध्वजारोपणकर्मणि । ध्वजस्तम्भौ च गायत्र्या प्रोक्षयेद्वस्त्रसंयुतौ ॥ २० ॥
पताकयोर्लेखनीयौ वैनतेयाञ्जनासुतौ । सूर्यं चन्द्रं मारुतिं च वैनतेयं प्रपूजयेत् ॥ २१ ॥
धातारं च विधातारं पूजयेत्कुम्भकद्वये । हरिद्राऽक्षतदूर्वाद्यैः शुक्लपुष्पैर्विशेषतः ॥ २२ ॥


...। जो उस ध्वजारोपणका क्या विधान है यह कृपा करके मुझे बताइए ॥ ३ । श्रीरामदासजीने कहा कि-हे शिष्य ! तुमने अच्छा प्रश्न किया है। यह प्रश्न लोकोपकारक है। तुम सावधान होकर सुनो। मैं कहता हूँ ॥ ४ ॥ ध्वजारोपणका कार्य समयको प्राप्त जानकर राजाओंने यज्ञमण्डपमें ध्वजाओंको आरोपित करना आरम्भ कर दिया ॥ ५ ॥ यज्ञका समय न हो तो चैत्र शुक्लपक्षकी प्रतिपदा विष्णुमन्दिरके ऊपर ध्वजा आरोपित करे ॥ ६ ॥ अथवा रामनवमी दशमी तथा विजयादशमीको ध्वजारोपण करे । ७॥ अथवा कार्तिकशुक्ल प्रतिपदाको ध्वजारोपण करे । ये ही विधियाँ ध्वजारोपणके लिए उत्तम होती हैं जो मैंने तुम्हें बतलायी है ॥ ८ ॥ अब मैं ध्वजारोहण व्रतका विधान बतलाता हूँ यह व्रत रामको अत्यन्त प्रिय और अमोघ पुण्यात्पादक है ॥ ९ ॥ इस विषयमें अधिक बहुतों की आवश्यकता नहीं है। जो प्राणी विष्णुमन्दिरके ऊपर ध्वजारोपण करता है, उसकी ब्रह्मादिक पदमा भी पूजा करना * ॥ १० ॥ कुटुम्बी विप्रको हजार तोला सुवर्ण दानम जो फल प्राप्त होता है, वही फल ध्वजारोपणका भी है ॥ ११ ॥ ध्वजारोपण कर्मके समान न गङ्गास्नान है न तुलसीसेवा और न शिवपूजा ही है । १२ ॥ यह कार्य इतना उत्तम है कि इसको करनेसे सब पाप नष्ट हो जाते हैं । १३ ॥ इसका सब विधान मैं तुम्हें बतलाता हूँ- सुनो ॥ १४ । इसको करनेका चैत्रादि मास उपयुक्त समय है । यदि इनमेंसे पहला समय न मिले तो इतर वर्षमें ही ध्वजारोपण करे ॥ १५-१७ ॥ चैत्र शुक्ल प्रतिपदाको प्रातःकाल दन्तधावनपूर्वक स्नान करे । १८ । फिर नित्यकर्मसे निवृत्त होकर विष्णुभगवान्- की पूजा करे । तदनन्तर चार ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराके नान्दीश्राद्ध करे और वस्त्रामृत ध्वजाओंको गायत्रीमन्त्रसे प्रोक्षित करे ॥१९॥ उन ध्वजाओंमें गरुड़ और हनुमान्जीका चित्र बना रहे । फिर उसपर सूर्य चन्द्र- गरुड़ एंव हनुमानजीकी पूजा करे । तदनन्तर दो घरोंपर हरिद्रा, अक्षत, दूर्वा एवं विशेष करके श्वेत पुष्प-

सर्गः ७ ] | यागकाण्डम् | २३३

सर्गः ७ ] | यागकाण्डम् | २३३

ततो गोचर्ममात्रं तु स्थण्डिलं चापलिप्य च। शालावाग्निं समुद्धृत्य स्थापयेद्वह्निकल्पवत् ॥२३। जुहुयात्पायसेनेव घृतेनाष्टोत्तरं शतम् । प्रथमं पौरुषं सूक्तं विष्णोर्नूकमनन्तरम् ॥२४॥ ततश्च वैनतेयाय स्वाहेत्यष्टहुतीस्तथा। मातङ्गेनाहुतीश्च कृत्वा स्वाहेति होमयेत् ॥२५। सोमो धेनुं समुच्चार्य जुहुयात्सम्पदन्तरम्। वैष्णवं मन्त्रमन्त्रं जपेत्तत्र शान्तिसूक्तानि भक्तितः ॥२६। रात्रौ जागरणं कुर्यादग्रतो हरेः शुचिः। एवं नवदिनं कार्यं पूजनं परमोत्सवः ॥२७॥ यथाऽग्रे जागरणं कुर्यान्नित्यं सुकीर्तनैः। ततो दशांशमष्टमिं सम्पूज्याथ व्रती शुचिः । २८। प्रातः स्नात्वा नित्यकर्म समाप्य च ततः परम्। गन्धपुष्पादिभिर्देवानर्चयेत्पूर्ववत्क्रमात् ॥२९॥ ततो मङ्गलवाद्यैश्च शुक्लपर्यङ्कके शोभने। नृत्यैश्च स्तोत्रपठनैर्नयेद्विष्ण्वालयं ध्वजम् ॥३०॥ देवस्य द्वारदेशे वा शिखरे वा मुदान्वितः। सुस्थिरं स्थापयेद्ध्वजं ध्वजस्तम्भं सुशोभितम् ॥३१॥ मधुपूपाक्षतैर्दीपैर्धूपैर्नमनोरमैः। भक्ष्यभोज्यादिसंयुक्तैर्नैवेद्यैश्च हरिं यजेत् ॥३२। आप्रतिपदारभ्य दशम्यवधि सत्वरैः। ध्वजयोः पूजनं कुर्यादेकादश्यां हरिन्मन्दिरे ॥३३। आरोपणीयं शिखरे पुरतो वा यथामुखम्। अथवा रोपणौयो हि दशम्यां तौ ध्वजोत्तमो। ३४। नवम्यां वा द्वितीयायां चतुर्थ्यामष्टमीदिने। पञ्चम्यां वा रोपणीयो तौ पूर्वं पूज्य यथाविधि ॥३५। व्रतस्य प्रतिपद्येव प्रारम्भोनतरे दिने। पूर्वोक्तेषु हरेः कार्यो न मासेष्वितरेषु च ॥३६॥ माघामितचतुर्दश्यामेवं शम्भोर्गृहे ध्वजो। नन्दीभृङ्ग्यङ्कितौ कृत्वा रोपणीयो यथाविधि ॥३७॥ आश्विनस्य सिताष्टम्यां मधोर्वा गिरिजागृहे। नभस्यस्य चतुर्थ्यां हि प्रोक्तो गणपतेर्गृहे ॥३८। मार्गशीर्षे शुक्लषष्ठयामेवं मार्तण्डमद्गृहे। एवं हि सर्वदेवानामुत्तरादिवसेष्वपि ॥३९।


के पत्र और विधानकी पूजा करे। तदनन्तर गोचर्ममात्र स्थण्डिलके ऊपर परिसमूहनादि पञ्चभूमस्कार करके रक्षणयोग्य गृहोक्त विधानसे कुण्डमे अग्नि स्थापित करे ॥ २०-२३॥ पुनः क्रमशः पायस और घृतसे आघार-आज्यभाग नामकी अष्टात्तरशत आहुति दे। अथवा आधारराज्यभागको आहुति देकर पुनः क्रमशः पायस और घृतकी अष्टोत्तरशत आहुति दे। प्रथम आहुतियां पुरुषसूक्तके मन्त्रोंसे और दूसरी आहुतियां विष्णोर्नूकं इस मन्त्रसे दे ॥ २४ ॥ फिर गरुडके निमित्त आठ आहुतियां और मातङ्गिके निमित्त आठ आहुतिये हवन करे 'गरुडाय स्वाहा' मन्त्रसे पहली आठ आहुतियां एवं 'मातङ्गये स्वाहा' इस मन्त्रसे दूसरी आठ आहुतियां दे ॥ २५ ॥ पुनः 'सोमो धेनु' मंत्रका उच्चारव करके संसम्पूक्त हवन करे। तदनन्तर सौर मन्त्रोंका जप और शान्तिसूक्तका पाठ करे ॥ २६ ॥ रात्रिमे श्रीहरिके समीप जागरण करे। फिर दशमी-को सम्भ्रमसबके साथ भगवान्‌का पूजन करे ॥ २७ ॥ नित्य हरिकीर्तन करके नवरात्र पर्यन्त जागरण करे। दशवे दिन प्रातः स्नान-संध्यादि नित्यकृत्योंसे निवृत्त होकर पूर्ववत् पूजनसम्भारसे भगवान्‌की पूजा करे ॥ २८ ॥ २९ ॥ इसके बाद मंगलमय वाद्य-गाजेके साथ स्त्रापपात्र करते हुए ध्वजाको विष्णुमन्दिरमे ले जाय ॥ ३० ॥ मन्दिरके द्वार तथा शिखरपर पुष्पमालासे सुशोभित ध्वजका स्थापित करे। ३१ ॥ वहां गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप एवं भक्ष्य-भोज्यादि युक्त नैवेद्यसे श्रीहरिका पूजन करे अथवा प्रतिपदासे लेकर दशमी तक क्रमसे ध्वजाओंकी पूजा करके एकादशीको विष्णुमन्दिरके शिखर या द्वारपर उन ध्वजाओ-को स्थापित करे। अथवा दशमीको ही स्थापित कर दे । ३२-३४ । अथवा द्वितीया, चतुर्थी षष्ठी, अष्टमी तथा नवमीको सुविधानुसार समय देखकर उपर्युक्त विधानसे पूजा करके ध्वजा स्थापित करे ॥ ३५ ॥ किन्तु व्रतका प्रारम्भ प्रतिपदाको ही होता है। श्रीहरिके निमित्त ध्वजारोपण पूर्वोक्त मासोंमें ही करे, अन्य मासमे नहीं । ३६ ।। इसी प्रकार माघकृष्ण चतुर्दशीका शिवालयपर ध्वजारोपण करे। उस ध्वजामें यथाविध नन्दी और भृङ्गीकी अंकित करे ॥ ३७ । आश्विन शुक्ल अष्टमीको या चैत्रके नवरात्रमे पार्वतीके मन्दिरपर ध्वजा फहराये। भाद्रपद चतुर्थीको गणेशके मन्दिरपर ध्वजारोपण करे। ३८ ।। मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठिको सूर्यके मन्दिरपर ध्वजस्थापन करे। इस प्रकार देवताओ के उत्तरादिवसमें ही यह कार्य सम्पन्न करे ॥ ३९ ॥

२३४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ७


मधूर्जाश्विनमासेषु विना विष्णोर्न चेतरे । एवं देवालये स्थाप्य शोभनौ तौ ध्वजोत्तमौ ॥४०॥
संपूज्य विष्णुं विधिवत् वित्तशाठ्यं विना ततः । प्रदक्षिणमनुव्रज्य स्तोत्रेणेदमुदीरयेत् ॥४१॥
नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन । नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुषपूर्वज ॥४२॥
येनेदमखिलं जातं यस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् । लयमेष्यति यत्रैतत् प्रणतोऽस्मि माधवम् ॥४३॥
न जानंति परं देवं मयं ब्रह्मादयः सुराः । योगिनो यं प्रशंसति तं वंदे ज्ञानरूपिणम् ॥४४॥
अन्तरिक्षं तु यन्नाभिर्द्यामूर्धा यस्य चैव हि । पादादभूच्च वै पृथ्वीं तं वंदे विश्वरूपिणम् ॥४५॥
यस्य श्रोत्रे दिशः सर्वा यच्चक्षुर्दिनकृच्छशी । ऋक्सामयजुषो येन तं वंदे ब्रह्मरूपिणम् ॥४६॥
यन्मुखाद्ब्राह्मणा जाता यद्बाह्वोश्चाभवन्नृपाः । वैश्या यस्योद्गता जाताः पद्भ्यां शूद्रस्त्वजायत ॥४७॥
मनसश्चंद्रमा जातो दिनेशश्चक्षुषस्तथा । प्राणेभ्यः पवनो जातो मुखादग्निरजायत ॥४८॥
पापसं दाहमात्रेण वदंति पुरुषं तु यम् । स्वभावविमलं शुद्धं निर्विकारं निरंजनम् ॥४९॥
क्षीराब्धिशायिनं देवमनवद्यमपराजितम् । सहस्रकमलं विष्णुं भक्तिगम्यं नमाम्यहम् ॥५०॥
पृथ्व्यादीनि भूतानि तन्मात्राणींद्रियाणि च । सुसूक्ष्माणि च येनासंस्तं वंदे सर्वतोमुखम् ॥५१॥
यदब्रह्म परमं धाम सर्वलोकोत्तमोत्तमम् । निर्गुणं परमं सूक्ष्मं प्रणतोऽस्मि पुनः पुनः ॥५२॥
निर्विकारमजं शुद्धं सर्वज्ञं वह्निमीश्वरम् । यमामनंति योगींद्राः सर्वकारणकारणम् ॥५३॥
एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकदाः । त्रीँल्लोकान् व्याप्य भूतात्मा भुंक्ते विषयमव्ययः ॥५४॥
निर्गुणः परमानंदः स मे विष्णुः प्रसीदतु । हृदयस्थोऽपि दूरस्थो मायया मोहितात्मनाम् ॥५५।
ज्ञानिनां सर्वधर्मस्थु स मे विष्णुः प्रसीदतु । चतुर्भिञ्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पंचभिरेव च ॥५६।
हृयते च पुनर्द्वाभ्यां स मे विष्णुः प्रसीदतु । ज्ञानिनां कर्मणा चैव तथा भक्तिमतां नृणाम् ॥५७॥

चैत्र आश्विन तथा कार्तिक इन तीन मासामें विष्णुके सिवाय अन्य देवताकाक लिए ध्वजारोपण नहीं करना चाहिए ॥ ४० ॥ इस प्रकार वित्तशाठ्य त्यागकर देवालयपर ध्वजारोपण करक विधिवत् विष्णुको पूजा करे । तदनन्तर प्रदक्षिणा करके इस स्तोत्रका पाठ करे—। ४१ ॥ हे पुण्डरीकाक्ष ! हे हृषीकश ! हे महापुरुषपूर्वज ! आपको बनकणः प्रणाम है ॥ ४२ ॥ जिससे यह संसार उत्पन्न हुआ है, जिसके आधारपर टिका हुआ है और जिसमें लय होगर, मै उन माधव भगवान्‌को प्रणाम करता हूँ ॥ ४३ ॥ जिसका ब्रह्मादि देवता भो भला भांति नहीं जानन और योगी जिनकी प्रशंसा करते हैं, उन परब्रह्म परमा त्मक। म प्रणाम करता हूँ ॥४४॥ अन्तरिक्ष जिसको नाभि है आकाश जिसका मस्तक है ओर जिसके चरणसे भूमि उत्पन्न हुई है, मैं उस ब्रह्माण्डको प्रणाम करता हूँ ॥ ४५ ॥ दिशाए जिसके कान हैं, सूर्य एवं चन्द्र जिसके नेत्र हैं, ऋक्साम एवं यजुर्वेद जिससे उत्पन्न हुए हैं, उस ब्रह्माको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ४६ ॥ जिसके मुखस ब्राह्मण, बाहुसे क्षत्रिय, ऊरुस्थलसे वैश्य और पैरोंसे शुद्र उत्पन्न हुए हैं, उन ई वरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ४७ ॥ स्वभावतः निरंजन, निष्कल, निर्विकार एवं शुद्ध परमात्माक नामस्मरणमात्रने समस्त पापसमूह नष्ट हो जाता है ॥ ४८ ॥ जिसके मनसे चन्द्रमा, चक्षुष सूर्य प्राणोंसे पवन एव मुखसे अग्नि उत्पन्न हुआ है, उस परमात्माको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ४९ ॥ क्षीरसागरम शयन करनेवाले, अशोक प्रेमी, भक्तिगम्य, अपराजित और अनन्तस्वरूप विष्णुको मै प्रणाम करता हूँ ॥ ५० । पृथिव्यादि पञ्चभूत, तन्मात्रा, एकादश इन्द्रियाँ और सूक्ष्म प्राणसमूह जिससे उत्पन्न हुए हैं, उन सर्वतोमुख भगवान्‌को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५१ ॥ जो ब्रह्म है, सर्वलोकोत्तम उत्तम है निर्गुण हे एवं परम सूक्ष्म है, उस परमात्माको मै पुन प्रणाम करता हूँ ॥ ५२ । योगन्द्रजन जिसको निर्विकार अज, शुद्ध, ईश्वर एवं संसारका आदि कारण कहते हैं, उस परब्रह्मको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५३ ॥ जो विश्वव्यापक और अव्यय है, जो एक होता हुआ भी अलग-अलग पञ्च महाभूतों एवं तीनों लोकोंमें व्याप्त है, उस भूतात्माको मै प्रणाम करता हूँ ॥ ५४ ॥ जो निर्गुण है, परमानन्दस्वरूप है और हृदयमें रहते हुए भी जिस प्राणीको आत्मा मायासे मुग्ध है, वह उससे दूर है ॥ ५५ ॥ जो ज्ञानियोंका सर्वस्व है। वह विष्णु

सर्गः ७ ] बालकाण्डम् २६५

गतिदाता विश्वगुरुः स मे विष्णुः प्रसीदतु । जगद्धितार्थे यो देहम्भारम्भालयः प्रभुः ॥५८॥
यमर्चयंति विबुधाः स मे विष्णुः प्रसीदतु । यम मनसि यं मंत्र, सर्वदाऽऽनन्दविग्रहम् ॥५९॥
निर्गुणं च गुणाधारं स मे विष्णुः प्रसीदतु । परेशः परमानन्दः परम्परात्परः प्रभुः ॥६०॥
चिद्रूपश्च परिज्ञेयः स मे विष्णुः प्रसीदतु । य इदं कीर्तयेन्नित्यं स्तोत्राणामुत्तमोत्तमम् ॥६१॥
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते । य इदं कीर्तयेद्विष्णुं ब्राह्मणांश्च प्रपूजयेत् ॥६२॥
आचार्यं पूजयेत्पश्चाद्भिन्नाच्छादनादिभिः । ब्राह्मणांन् भोजयेत्पश्चाद्भक्तितः सत्यभाषणः ॥६३॥
पुत्रमित्रकलत्राद्यैर्बन्धुभिः सह वाचयेत् । कुर्वीत पाष्णौ शिष्य नारायणपरायणः ॥६४॥
यस्त्वेतत्कर्म कुर्वीत ध्वजारोपणमुत्तमम् तस्य पुण्यफलं वक्ष्ये शृणुध्वं सुसमाहितः ॥६५॥
यथा ध्वजस्य वस्त्रं तु वात्येतेन वायुना । तथन्स्यपापजालानि नश्यन्त्यत्र न संशयः ॥६६॥
महापातकयुक्तो वा युक्तश्चेत्सर्वपातकैः । ध्वजं विष्णोगृहे कृत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥६७॥
यावद्दिनानि वसति ध्वजो हरिगृहोपरि । तावद्युगसहस्राणि हरेः सामीप्यमाप्नुयात् ॥६८॥
आरोपितं ध्वजं दृष्ट्वा येऽभिवदंति धार्मिकाः । तेऽपि सद्यो विमुच्यन्ते ह्युपपातककोटिभिः । ६९॥
आरोपितं ध्वजं दृष्ट्वाऽऽयुगृहे पुनस्त्वत्रक पटम् । कर्तुः सर्वाणि पापानि नुनाति निमिषार्धतः ॥७०॥
एवं शिष्य मया प्रोक्तं यथा पृष्टं मया मम । ध्वजारोपणमाहात्म्यं सविधानं मनोरमम् ॥७१॥
समागतां प्रतिपदं ज्ञात्वा वैशासितां नृपैः । आरोपिता ध्वजाः सर्वे द्वितीयायां पृथक् पृथक् ॥७२॥
शाम्ब्रा रामं महाविष्णुं तर्पयन्त्वाद्यमंडपे । कृत्वा वैकदिनं यत्स्ववामगेहेषु पूजनम् ॥७३॥
ध्वजस्य पूजनं गेहे नवरात्र समारभेत् । यथाशक्त्यनुसारं वा नैकरात्रमथापि वा ॥७४॥
यज्ञोऽस्माद्दर्शनाच्चैव कृतमेकदिनं नृपैः । चकार रघुश्वपि पूर्वमेव ध्वजोत्सवम् ॥७५॥
माघमासे कृष्णपक्षे चातुर्दश्यां द्विजोत्तमः । तदा ध्वजैर्महोच्चैस्तैः शुशुभे गगनांगणम् । ७६।।


मुझपर प्रसन्न हों ॥ ५८ ॥ बार-बार ऋत्विकू जिनका प्रत्यर्थ हवन करते हैं, कभी द्वादा ओर कभी चौबीस तथा फिर दन्दा ऋत्विक हवन करते हैं, वे विष्णु मेरे ऊपर प्रसन्न हों ॥ ५९ ॥ जो ज्ञानिया, कर्मी एवं भक्तोकी गति हैं जो विश्वगुरू हैं, वे विष्णु मेरे ऊपर प्रसन्न हों। जो संसारके हितके लिए शरीर धारण करते हैं ॥ ५८ ॥ जिनकी विद्वान् पूजा करते हैं। मन्त्र तथा जिनको सदा आनन्दविग्रह कहते हैं, वे विष्णु मुझपर प्रसन्न हों । जो निर्गुण हैं और सगुण भी हैं। जिनका सर्वेश, परमानन्द, परमात्मा एवं चिद्रूप इन कि नामोंसे परिचय मिलता है, वे विष्णु मेरे ऊपर प्रसन्न हों ॥ ५९ । ६० ॥ जो पुरुष इस उत्तम स्तोत्रका पाठ करता है, वह समस्त पापोंसे विनिर्मुक्त होकर विष्णुलोकमें पूजित होता है। जो इसका कीर्त्तन करता चाहे वह पुत्र मित्र-कलत्रादिके साथ सत्यपरायण होकर इस स्तोत्रका कीर्तन करे पश्चात् ऋत्विज् ब्राह्मण एवं आचार्यकी पूजा करे । बादमे ब्राह्मणभोजन कराये ॥ ६१-६४ । जो पुरुष ध्वजारोपण करता है उसका पुण्यफल सावधान होकर सुनो ॥ ६५ ॥ आरोपित ध्वजाका वस्त्र वायुसे जैसे-जैसे हिलता है वैसे-वैसे उस पुरुषका सब पाप नष्ट होता जाता है ॥ ६६ । विष्णुमन्दिरके ऊपर ध्वजारोपण करनेसे एक महापातक क्या सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। वह आरोपित ध्वजा जितने दिनों तक हरिमन्दिरपर सुशोभित रहती है, उतने सहस्र युगपर्यन्त ध्वजारोपणकर्ता श्रीहरिके समीप रहता है ॥ ६७ ॥ ६८ ॥ जो धार्मिक पुरुष ध्वजाकी वन्दना करते हैं, वे कोटि उपपातकोंसे छूट जाते हैं ॥ ६९॥ वह आरोपित ध्वजा अपने वस्त्र फैलाती हुई निमिषार्धमें आरोपणकर्ताके पापोंको नष्ट कर देती है। हे शिष्य ! तुमने जो मनोहर ध्वजारोपणमाहात्म्य पूछा, वह सब विधिपूर्वक मैने कहा ॥ ७० ॥ इसलिए चैत्रशुक्ल प्रतिपदाको आया हुआ जानकर राजाओंने द्वितीयाको ध्वजाओंका आरोपण किया यज्ञमण्डपमें स्थित रामको महाविष्णु समझकर ही वे रात्रि ध्वजाका अपने अपने तम्बुओंमें अलग-अलग पूजन करने लगे । ७१-७३ ॥ पूजा नवरात्र पर्यन्त अथवा अपनी शक्तिके अनुसार करे। अथवा एक ही रात करे ॥ ७४ ॥ यज्ञो-

२३६आनन्दरामायणे[ सर्गः ८

इदं चारित्रं परमं मनोहरं श्रीमद्रघूत्तमचरितविस्तारसंज्ञितम् ।
पठंति शृण्वंति नराः सुपुण्यदं भवेच्च तेषां नियतं विचिन्तनम् ॥ ७७ ॥
इति श्रीमत्कह्नितनयपण्डितनगेन्द्र श्रीमद्भागवतानन्द विरचिते वाल्मीकीये यागकाण्डे
ध्वजारोहणव्रतं नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥


अष्टमः सर्गः

( अवभृथस्नानोत्सवका वर्णन )
श्रीरामदास उवाच

अथ चैत्रसिते पक्षे नवम्यां रामजन्मनि तदाऽवभृथस्नानार्थं वाजिमेधफलाप्तये । १ ॥
चकार सूचनां शङ्खे गंधवाप गुरुः स्वयम् । त्वरय मांस तं राम रचितावभृथाम्बुभिः । २ ॥
वसिष्ठवचनं श्रुत्वा रामो लक्ष्मणमब्रवीत् । अद्यावभृथस्नानायोत्सववद्गमनं मम ॥ ३ ॥
गमनार्थं मया ज्ञात्वा करणीयं मयोच्यते । आहापनीया राजानो निजसैन्यरथादिभिः ॥ ४ ॥
सस्त्रीयुताः सावरोधास्तिष्ठध्वमिति मण्डपे । सिद्धे कार्ये निजं सैन्यं ज्ञात्वाऽप्यायश्चाग्रतः ॥ ५ ॥
अश्वपत्तिसमायुक्तं तुङ्गोष्ट्रगर्जयुतम् । नववाद्यध्वनिः कार्या तूर्यादीनां स्वनोऽपि च ॥ ६ ॥
पताकाश्च ध्वजाश्चापि तोरणादि समंततः । मुक्ताप्रवालपुष्पाणि हाराश्चाध्वरमण्डपात् ॥ ७ ॥
बन्धनीया रामतीर्थपर्यन्तं सैकतेऽपि च । कदलैर्ना महास्तंभाश्चैक्षुदण्डाः समंततः ॥ ८ ॥
पुष्पाणि वाटिकाश्चापि मुग्धात्रादिषु निर्मिताः । स्थापनीयाश्च सर्वत्र नृत्यंतु वेश्योषितः ॥ ९ ॥
सेचनायो रामतीर्थमार्गश्चन्दनवारिभिः । पुष्पैराच्छादनीयो हि पट्टकूलादिभिस्तथा ॥ १० ॥
अन्यच्चापि यथायोग्यं यन्नोक्तं च मया तत्र । तत्कुरुष्वाऽप्रयत्नेन ममपृष्ट्वा विचारितम् ॥ ११॥
तथेत्युक्त्वा लक्ष्मणोऽपि तथा सर्वं चकार सः । अथ तं शृण्विजश्रेष्ठगमनोत् सुविस्तराम् ॥ १२॥


ऋव ध्वजके निमित्त राजाओ तथा रामजीने एक ही दिनम सब कृत्य सम्पन्न कर लिया था । ७५ ॥ इसी
तरह माघकृष्णा चतुर्दशीको शिवजीके सम्मुख ध्वजारोपण किया । उस ऊंचा ध्वजासे गगनमण्डल अत्यन्त
सुशोभित हुआ ॥ ७६ ॥ ध्वजारोपणविधानसञ्ज्ञक इस परम मनोहर एवं पुण्यप्रद चारत्रका जो लोग पढ़न और
और सनत हे उनका विन्चितार्थ अवश्य पूर्ण होता है ॥ ७७ ॥ इति श्रीमन्नवाहिरामदत्तवितानतेन श्रीमदानन्द-
रामायण यागकाण्डे ज्यात्स्ना' भाषाटीकाया ध्वजारोहणव्रतं नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

श्रीरामदास कहते लगे--चैत्रशुक्ल रामनवमीका अश्वमेध यज्ञके फलप्राप्त्यर्थ अवभृथ-स्नानके लिये स्वयं
गुरु वसिष्ठने रामको सूचना दी और सूर्यनारस भरसे मन्दरा करनक लिए कहन लगे । १ ॥ २ ॥ वसिष्ठके
वाक्य सुनकर रामने लक्ष्मणसे कहा--आज अवभृथ स्नानके लिए मै उत्सवपूर्वक रामतीथको जाऊंगा अतः
उस समयका जो कर्तव्य है, सो सुनो । ३ । राजाओ को आज्ञा दी कि वे अपना-अपनी सेना एवं हाथी-गाड़ीके
साथ अन्तःपुरकी स्त्रियोंको लेकर यज्ञमण्डपंम आएँ ॥ ४ ॥ इसी तरह जब सब बाहरी लोग भी आ जावें, तब
अपनी सेना, हाथी, घोड़े, शिबिका एवं ऊँटोंकी पंक्ति आओ । नवीन तथा प्राचीन वाद्योकी ध्वनिके साथ
सब लोग रामतीर्थ चले । ५ ॥ ६ । यज्ञमण्डपक चारो ओर पताका, ध्वजा, तोरण, मुक्तामाला, प्रवाल
एवं पुष्पोंके हारोंसे सजावट कर दी जाय ॥ ७ । रामतीर्थ पर्यन्त रेतले प्रदेशम भी हजारो पताकाएँ बाँध
दी जायँ और चारों ओर इक्षुदण्ड एवं कदलीके महान् स्तम्भ खड़े कर दिये जायें । ८ । रामतीर्थ पुष्पवारी
सजा दी जाय और सर्वत्र वेश्याएँ नृत्य कर । ९ । रामतीर्थके माग चन्दनके जलसे सिंचनाकर पुष्पो तथा
पट्टदुकूलोंसे आच्छादित करा दिया जाय ॥ १० । और भी जा कुछ करने योग्य हो, किन्तु जिसको मैंने नहीं कहा
हो, वह सब बिना पूछे ही विचारपूर्वक सब व्यवस्था कर दा। इस प्रकार रामकी आज्ञा सुनकर लक्ष्मणते

सर्गः ८ ] उत्तरकाण्डम् २१७

सर्गः ८ ] उत्तरकाण्डम् २१७

वाजिवाहे रथे वह्निं पात्राणि स्थाप्य गच्छतु । सीतां चाग्रेऽथ च गुरुश्चाग्रेऽथर्त्विजः सह ।।११। मुनयो वेदघोषांश्च सर्वे चक्रुः समन्ततः । स यत्र द्रुपदासङ्घ मध्य रुक्ममालिनम् ॥१२। ययौ शनैः शनैर्मार्गे मुदा वन्दिजनैः स्तुतः अग्रे गजाः पताकाभिश्चामरैश्चाथ वाजिनः ।।१३।। स्वस्तै तूर्यघोषाणां कर्त्तारस्तत्समन्विताः । ततस्ते राजभृत्याश्च विप्रोर्वीपाः मुदण्डिनः ।।१४।। शतो वन्दिबट्वाश्च शर्त्सङ्घा ततो गणाः । ततो देवाः सगन्धर्वास्ततो रामः स मारुतः ।।१५।। ऋषिराजन्यैर्युक्तो वह्निमुखैः स्यन्दनस्थितः । ततो मुनीश्वराः सर्वे ऋषिपत्न्यस्ततो ययुः ।।१६। हत क्षत्रियपल्याद्याः विप्राः सर्वाः समेयुः । ततस्ते क्षत्रियाः सर्वे नाना हयसमस्थिताः । ।१७।। ततस्तेषां हि सैन्यानि ततोऽन्ये राजसेवकाः । शय्यागृहपतीनां च वाग्पाश्चासन पङ्क्तु ।२०। वनश्रोष्ट्रास्तु बाणानां शकटाः शस्त्रपूरिताः । लेदकागन्धकञ्चैव चक्रकाम्पतः परम् ॥२१॥ भूमिसानप्रकर्त्तारो रज्जुहस्तैर्लहस्तकाः । ययौर्यथाक्रमं सर्वे तदा परवान्सर्वः ।।२२।। तदा निनेदुर्वाद्वानि ननृतुश्चाप्सरोगणाः । मुनिपत्न्यस्तथाप्यन्ये चक्रुः पुष्पवृष्टिभिः ।।२३। मार्गे वन्दिजनाद्याश्च तुष्टुवु रघुनन्दनम् । पङ्गादिस्खराना गन्धर्वाः प्रजगः पार्थिवे मुदा ।।२४।। चकुन्ते वेदघोषांश्च मुनयः स्वरभूवैःक्रनैः । एवं गयः शनैर्मार्गे कौतुकानि समन्ततः ।।२५।। पश्यन् जनकनन्दिन्या ययौ चामरवी जनः । तत्र रामस्य मार्ग हि सीताया मुखपङ्कजम् ।।२६।। द्रष्टुं कोलाहलं चक्रुः भृशदाम्यकला जनाः । ततस्तान्ताडयामासुः यतयो वेत्रपाणयः ।।२७।। विद्रुपेण तदानीन्म महान् कोलाहलो द्विज । तन्मदं रावयो दृष्ट्वा श्रुत्वा च प्राह लक्ष्मणम् ।।२८।। एते सर्वे पुष्पकस्था जनाः सीतां च मा सुखम् । पश्यंतु कलहो माऽभूत्तथाऽन्चिति स लक्ष्मणः ।।२९।। सर्वानारोहयामास पुष्पके तान् जनान् मुदा । ततस्ते पुष्पकारूढा जना राम मनोहरम् ।।३०।।

'अच्छा महाराज' कहकर सम्पूर्ण व्यवस्था कर दी इसके बाद ऋत्विग्गण अग्निहोत्र सामानों को एकत्र करने लगे ॥११। १२॥ घोड़े जुते रथमें अग्नि तथा पात्राको रखकर आगे गुरु वशिष्ठ और ऋत्विक् चले कराके गृह वसिष्ठ भी रथमें बैठ गये ॥ १२ जब मन्दगामी रामचन्द्र सुवर्णनिर्मित रथपर चढ़े, तब ऋत्विक लोग वेदघोष करने लगे । १४॥ बन्दीजनोंसे स्तूयमान होते हुए राम धीरे-धीरे समतीर्थको चले । आगे-आगे पताकाओंसे युक्त हाथी, उसके बाद घोड़े, इसके बाद कोडीवर चढ़े हुए दण्डनायक तथा बाजा बजानेवाले और उनके बाद सुन्दर पागड़ी पहने हुए दण्डधर ब्राह्मण चले ॥१५, १६॥ इसके बाद बन्दीजन, उसके बाद वैश्यवृन्द, उसके बाद देवता तथा गन्धर्व चले ॥ १७॥ तदनन्तर स्वसम्बन्ध तथा वह्निसंयुक्त ऋषिसमुदायके परिजनोंसहित राम और सीता चलीं । इसके बाद ऋषि और ऋषिपत्नियां चलीं ॥ १८ । उसके बाद राजपत्नी प्रभृति सम्पूर्ण स्त्रियां चलीं । इसके अनन्तर विविध वाहनपर चढ़े हुए क्षत्रिय चले ॥ १९ ॥ इसके बाद उनकी सेना तथा अन्य राजसेवक चले । इसके बाद बेत्रधारक चले ॥ २० ॥ इसके बाद बाणोंसे भरे ऊंट और शस्त्रोंसे भरे शकट चले । इसके बाद लोहक गन्धक, बारूद सब चमचे से चलाने लगे ॥ २१ ॥ इसके बाद भूमिकी नाप-जोख करनेवाले रस्सी एवं कुदाल हाथमें लिये मजदूर चलने लगे । इस तरह आनन्दमय बड़े सम्पूर्ण जनसमुदाय चलने लगा ॥ २२ । उस समय बाजे बजने लगे और अप्सराएं नाचने लगीं । मुनिपत्नियां और राजपत्नियां रामपर पुष्पवृष्टि करने लगीं । २३ । मागध बन्दीजन स्तुति करने लगे, गन्धर्व गाने लगे और मुनिलोग उच्चस्वरसे वेदघोष करने लगे ॥ २४ इस प्रकार जनकनन्दिनी सीताके साथ विविध कौतुक देखते हुए राम चले ॥ २५ ॥ उस समय राम एवं सीताके दर्शनके लिए परस्पर स्पर्धा हुई जनता में कोलाहल मच गया । उसको शान्त करनेके लिए पुलिस डंडे से जनताको ताड़ना देने लगा ॥ २६ ॥ २७ ॥ जब अधिक कोलाहल होने लगा तब रामने देखा और बुद्धिमन् बक्ता लक्ष्मणसे बोले- ॥ २८ ॥ तुम ऐसी व्यवस्था करो कि जिससे जनता हमारा दर्शन कर सके और कलह समाप्त हो जाय । इन सबको पुष्पक विमानपर चढ़ा लो । लक्ष्मणने कहा 'बहुत अच्छा' ॥ २९ ॥ इस प्रकार रामकी आज्ञासे सबको पुष्पकपर चढ़ा लिया गया । तब

२३८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८

जानकीसहितं यान्तं ददृशुः पथि ये शनैः। केचिदूचुरथ धन्याः परिपूर्णमनोरथाः ॥३१॥ अद्य रामं ससीतं च पश्यामोऽद्य महोत्सवे । केचिदूचुश्च नो धन्यो पितरौ न सुजन्मदौ ॥३२॥ ययोः पुण्यचयेनैव नः सीतारामदर्शनम् । एवं गच्छत्सु श्राम्यन्त्यः स्त्रियः सर्वाः परस्परम् ॥३३॥ समंञ्च पुष्पकं स्थातुं प्रार्थयन्ति स्म जानकीम् । तदा सा जानकी प्राह लक्ष्मणं पुरतः स्थितम् ॥३४॥ स्त्रियः सर्वास्त्वरा शीघ्रं नागेशालासु पुष्पके। आरोह्यायामे शक्त्यैतान् प्रार्थयन्त्यत्र मां मुहुः ॥३५॥ लक्ष्मणोऽपि तथेत्युक्त्वा ताः सर्वाश्च पुष्पक्रे, स्वरूपाऽऽरोढयामास साक्षालासु यथासुखम् ॥३६॥ ततस्ताः पुष्पकं रूढान्दृष्ट्वाजानपदैस्ततः । ददृशुः सीतया रामं ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ॥३७॥ मृदङ्गशङ्खपणवधुन्धुर्यामण्डगोमुखाः । वादिताणि विचित्राणि नेदुरावभृथोत्सवे ॥३८॥ नर्तक्यो ननृतुहृष्टा गायका गृधशो जगुः । वीणावेणुसलोन्मादस्तेषां स दिवमस्पृशत् ॥३९॥ चित्रध्वजपताकाद्यैर्गजेन्द्रस्यन्दनैर्हयैः स्वलंकृतैर्भटैर्भूपा निर्ययु रुक्ममालिनः ॥४०॥ यदुसृञ्जयकाम्बोजकुरुकेकयकोसलाः । कम्पयन्तो भुव सैन्यैर्यजमानपुरःसराः ॥४१॥ सदस्यनिर्विजब्रह्मा ब्रह्मघोषं भूयसा। देवापिनिगणगन्धर्वास्तुष्टुवुः पुष्पवृष्टिभिः ॥४२॥ स्वलंकृता नरा नार्यो गन्धस्रग्भूषणाम्बरैः, विलिप्यन्त्योऽभिषिञ्चन्त्यो विजह्रुर्विविधै रसैः ॥४३॥ तैल गोरसगन्धोदहरिद्रामान्द्रकुंकुमैः । चुभिलिताः प्रलिम्पन्त्यो विजह्रुर्वारयोषितः ॥४४॥ एवं नानामयुत्वाहैः श्रीरामश्च समीनया। पश्यन्नानाकौतुकानि स्यन्दनेन यनेः शनैः ॥४५॥ अगमत्सरयूतीरे रामतीर्थं शुभावहम् । अवरुह्य रथाद्रामः मंजनार्थे सयूजले ॥४६॥ स चकार जलेष्टिं तैऋत्विग्भिः परिवेष्टितः । पत्नीसमावाजबभृथैरकरित्या ते समृद्धिजः ॥४७॥ सर्वे रामहृदे विप्रा यजमानपुरःरग । आचान्तं स्नापयाञ्चक्रुः सरय्यां सह सीतया ॥४८॥

पुष्पकस्थ जनता रास्तेमें जाते हुए भग रामका दर्शन करने लगी ॥ ३० ॥ वे कहने लगे-हम धन्य हैं और परिपूर्ण मनोरथ हैं, जो अपने नेत्रोंसे सीतारामका रूप देख रहे हैं। कोई बोले कि हमारे जन्मदाता माता पिता धन्य हैं। जिनके पुण्यसे हमको सीतारामके दर्शन हो रहे हैं ॥ ३१ । इस तरह कौतुक देखते हुए श्रीराम आगे जा रहे थे तब अन्यान्य स्त्रियां परस्पर विचार करके पुष्पकमें बैठनेके लिए जानकीसे प्रार्थना करने लगीं । ३२।३३ इनको प्रार्थना सुनकर सीतानें सामने खड़े लक्ष्मणसे कहा - । ३४। ये स्त्रियां बारम्बार मुझसे प्रार्थना कर रही हैं, अतः मेरी आज्ञासे इनको भी पुष्पकविमानकी स्वेटोंपर विश्राम बैठा दो ॥ ३५ ॥ लक्ष्मणजीने उत्तरमें 'बहुत अच्छा' कहकर उन स्त्रियोंको शीघ्र पुष्पककी नागेशालामें बिठा दिया ॥ ३६ ॥ उसपर आरूढ़ होकर प्रजाकेलोगोंने सीताको देखा और पुष्पोंकी वर्षा करने लगी ॥ ३७ ॥ उस अवभृथस्नानो-त्सवके उपलक्ष्यमें लोग मृदङ्ग, शंख, पणव ( ढोल ), दुन्धुर्भानक नगाड़े एवं गोमुख ( मेरी ) प्रभृति विचित्र विचित्र वाद्योंको बजाने लगे । ३८ ॥ नर्तकियां प्रसन्न होकर नाचने लगीं । गायकसमूह गान्धर्व गाने लगे और वीणावेणु प्रभृति वाद्योंका शब्द आकाशको गुञ्जित करने लगा ॥ ३९ । चित्र-विचित्र ध्वजा-पता-काओंसे सुशोभित हाथी घोडे तथा रथोंके द्वारा सजे हुए योद्धाओंके साथ सब राजे चल रहे थे । ४०॥ यदु, सृञ्जय, काम्बोज, कुरु, केकय एवं कोसलवंशी राजाओंका वृन्द श्रीरामको आगे करके पृथ्वीमण्डलको कँपाता हुआ चल रहा था ॥ ४१ ॥ सदस्य, ऋत्विक् एवं ब्राह्मणवृन्द वेदघोष करने लगा ओर देवता, ऋषि, पितर एवं गन्धर्व पुष्पवृष्टि करने लगे ॥ ४२ । गन्ध, माला, आभूषण एवं वस्त्रोंसे अलंकृत नारियां विविध रंगोंको छिड़कती हुई पुरुषोंके साथ विहार करने लगीं ॥ ४३ ॥ वेश्याएं भी तेल, गोरस, गन्धोदक हरिद्रा तथा गीला कुमकुम परस्परमें उंडेलती हुई उनके साथ खेलने लगी । ४४ ॥ इस तरह अनेक प्रकारके आनन्दमय कौतुक देखते हुए श्रीराम और सीता रथके द्वारा धीरे २ सरयूके तीरस्थ शुभावह र मतीर्थपर पहुँचे और वहां उतर पड़े ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ ऋत्विजोंसे परिवेष्टित श्रीराम सरयूके जलमें जलेष्टि करने लगे । ऋत्विक लोगोंने इनको पत्नीके साथ समाज एवं अवभृथ स्नान करवाया ॥ ४७ । ब्राह्मण लोग रामतीर्थके सरयूसलिलमें सीताके

सर्ग ८ ] बालकाण्डम् २३९


वसिष्ठेन पुरोधाभिनांनातीर्थजलैस्तदा । समाभिषेकं ते चक्रुरुद्यतं मंत्रैर्मुनीश्वराः ॥४९॥
देवदुन्दुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः । मुमुचुः पुष्पवृष्टींश्च देवाश्चैव विमानतः ॥५०॥
संस्नुस्तत्र ततः सर्वे वर्णाश्रममुखा जनाः । मग्ना भक्तिनद्यां भक्त्वा मुक्ताः स्वपातकात् ॥५१॥
अथ रामोऽहते क्षौमे परिधाय स्वलङ्कृतः । शुशुभे नितरां दिव्यकंकणाभ्यां सुमंडितः ॥५२॥
केयूराभ्यां कुण्डलाभ्यां मुक्ताहारैश्च चारुभिः । कटिसूत्रेणहैमेन रत्नानां नूपुरादिभिः ॥५३॥
हृदि चिन्तामणियुतः कण्ठे कौस्तुभमण्डितः । दिव्यगन्धोपलिप्ताङ्गो प्रत्यक्षा दीप्तितारका ॥५४॥
कोटिसूर्यप्रतीकाशः सितच्छत्रेण धारितेन । सर्वलक्षणसंयुक्त ऋषिभिः परिवारितः ॥५५॥
अर्थार्थिभ्योऽददात्काले यथाशास्त्रं च दक्षिणाः। स्वलङ्कृतेभ्यो वप्रुत्थ्य गोधनुर्गजवाजिनः ॥५६॥
कामधेनुमलङ्कृत्य गुरवे दातु मुद्यतः । वसिष्ठस्तु चिन्तयामास वसिष्ठाङ्गश्चयेरिति ॥५७॥
अस्ति मे नन्दिनी नाम्नी कामधेनुसुता शुभा । तस्याः प्रसोतिरेवेयं मया पूर्वं समर्पिता ॥५८॥
अस्यैवास्तु कामधेनुर्गवां योग्यो रघूत्तमः । वर्जयित्वा स्वलङ्कारान्सीतां याचेऽथ भामिनीम् ॥५९॥
याचाम्यहं शुभां सीतां सालङ्कारां सुदक्षिणाम् । यं दातुं गच्छेयाद्दर्शयिष्येऽहमहं जनान् ॥६०॥
इति निश्चित्य स गुरुमृद्रा प्राह रघूत्तमम् । संप्रति किं वृथादानेन तृप्तिर्न मे भवेत् ॥६१॥
यदि दास्यसि देया मे सासाऽलङ्कारा शुभा सीता। तन्निश्चलम्मन्ये नान्यैर्गवाशतनैरपि ॥६२॥
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा वसिष्ठस्य जनास्तदा । हाहाकारं महञ्चक्रुर्विषण्णा भयविह्वलाः ॥६३॥
केचिदूचुर्गमिष्ठोऽयं किं भ्रांतो जठरोऽथ किम्। केचिदूचुर्विनोदोऽयं कुतोऽस्मिन्मुनिभाषितः ॥६४॥
केचिदूचू राघवस्य धैर्यं पश्यन्त्ययं मुनिः । केचिदूचु सघोऽथ किं करिष्यति पश्यताम् ॥६५॥
एतस्मिन्नन्तरे रामः श्रुत्वा तत्त्वं गुरोर्वचः । सत्यं संजया सीतामाहूय गुरूसन्निधौ ॥६६॥


साथ श्रीरामको आचमन कराकर स्नान कराया ॥४८॥ तदनन्तर मार्गमें पहले अवधूतके लाये हुए विचित्र तीर्थोंके जलसे उन्हें स्नान कराया ॥४९॥ उस समय मधुरोक नगाड़ाहरू राग-साथ देवताओंके नगाड़े भी बजने लगे और देवता ऋषि, पितर मेघतुल्य पुष्प बरसाने लगे ॥५०॥ तथा वर्णाश्रमी लोग रामतार्थमें स्नान करने लगे। समस्त वर्णों भी वहाँ स्नान करके अपने पातकोंसे छूट गये ॥५१॥ इसके बाद राम नवीन रेशमी वस्त्र पहिन तथा हाथोंमें सुन्दर कंकण बाँधकर अत्यन्त सुशोभित होने लगे ॥५२॥ दोनों बाजुओंम केयूर, कानोंमें कुण्डल, गलेमें मुक्ताहार तथा कमरमें करधनी और पैरोंमें रत्नजड़ित नूपुरोंको पहनते हुए सीताजी भी अत्यन्त सुशोभित हो रही थीं ॥५३॥ भगवान् राम हृदयपर चिन्तामणि और कण्ठमें कौस्तुभ मणि दक्षिण हुए थे । इस विलासपूर्ण सौंदर्यकी कान्ति चमत्कृत हुए कोटि सूर्योंकी कान्तिके समान तेजस्वी श्रीरामचन्द्र ऋषियोंगणोंसे परिवेष्टित होकर श्वेतच्छत्र लगाये हुए श्रेष्ठ आसनपर सीताके साथ बैठ गये ॥५४॥ ५५॥ तदनन्तर अर्थियोंकी याचनाके अनुसार और ब्राह्मणोंको अलंकृत करके व शास्त्रानुसार गो, भूमि, घोड़े एवं हाथी दान देने लगे ॥५६॥ जब वे कामधेनुको भी अलंकृत करके गुरु वसिष्ठको देनेके लिए उद्यत हुए, तब वसिष्ठ विचार करने लगे- ॥५७॥ मेरे पास इनकी कन्या नन्दिनी है ही, तब इससे मेरा क्या अर्थ सिद्ध होगा। मुझे इसका कोई प्रयोजन नहीं है। यह कामधेनु राम ही के पास रहे तो अच्छा हो। क्योंकि इसके योग्य राम ही हैं। इसको छोड़कर मैं सुवर्ण आदि अलङ्कारोंसहित सालंकृता एवं सुरूपा सीताको मांगता हूँ। ऐसा करके मैं आज रघुकुलमें अपनी शक्ति को प्रदर्शित करूँगा ॥५८-६०॥ ऐसा निश्चय करके वसिष्ठजी बोले -क्या आप कामधेनु दान करेंगे? इससे मेरी तृप्ति नहीं होगी ॥६१॥ यदि देना ही हो तो अलङ्कारोंसे सुशोभित सीताको दीजिये, उसके देनेसे मुझे तृप्ति होगी। अन्य सैकड़ों स्त्रियोंसे भी मेरी तृप्ति न होगी ॥६२॥ इस प्रकार ऋषि वसिष्ठके वचन सुनकर विषण्ण एवं भयविह्वल जनता महान् हाहाकार करने लगी ॥६३॥ जनता कहने लगी-"मालूम पड़ता है कि बूढ़ा बोमट पागल हो गया है" "नहीं भाई' किसीने कहा "ऋषिने रामसे मजाक किया है" ॥६४॥ कोई कहने लगा-'ऋषि रामजीके धैर्यको आजमा रहे हैं"। कोई कहन

१४० आनन्दरामायणे [ सर्गः ८

सीतायाः स्वकरेणैव धृत्वा वामकरं मुदा । सभार्यो राघवः प्राह वसिष्ठं तोषयन्मुदा ॥६७॥ सीतादानमन्त्रो वक्तव्यः सीतादानं करोमि ते । तथेति प्रतिगृह्णेऽस्तु वसिष्ठश्च यथाविधि ॥६८॥ अङ्गीकृत्य सीतादानं राघवेण समर्पितम् । चकितं च तदाऽभूदं सर्वं स्थावरजङ्गमम् ॥६९॥ दत्तमार्गे न कस्यासीत्तदानींनिश्चितिश्चन । तदा सीतां मुनिः प्राह मत्सन्निधौ तिष्ठ बालिके ॥७०॥ मम दत्ताऽसि रामेण त्वां मन्येऽहं सुतोपमाम् । तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा सीता सा खिन्नमानसा ॥७१॥ शङ्क्यन्त्यनेकशः साध्वी मुनेः पृष्ठे ह्यपाविशत् । बाष्पाश्रुपूर्णनेत्रा सा रोमाञ्चितविग्रहा ॥७२॥ ततो रामः पुनः प्राह वसिष्ठं विनयान्वितः । रुद्राणीं सुरभिं चापि सीतायै हर्षितः पुरा ॥७३॥ मया तोषेण कैलासे मन्मथेशोपयाचिनी । मयाऽपि दातुमानीता तच्छ्रुत्वा गुरुह्यब्रवीत् ॥७४॥ राम राम महाबाहो त्वयि दाढर्यं च दर्शितम् । याचिता तव पत्नीयं मया तेऽस्तु पुनः शुभा ॥७५॥ अस्याः कुरु तुलामद्य सुवर्णेन रघूत्तम । अष्टाङ्गं प्रतुलितं सीतया रुद्रप्रमुत्तमम् ॥७६॥ मां दत्त्वैव त्वया ग्राह्या पुनः सद्यदि मद्विरा । अन्यत्किञ्चिच्छृणुष्व त्वं वचनं यन्मयोच्यते ॥७७॥ धेनुं चिन्तामणिं सीतां कौस्तुभं पुष्पकं पुरीम् । स्वयं राज्य मयोध्यां त्वं येन कस्य प्रदास्यसि ॥७८॥ अग्रे कदा तदाऽऽज्ञा मे त्वया लुप्ता भविष्यति । ममलाभहृदोषेण बहुक्लेशा भविष्यसि ॥७९॥ मदुक्तैः समधी राजन् विना यत्कर्त्तुमर्हसि । तत्तद्दत्त्वा विप्रेभ्यो त्वं सुखं प्रविचारतः ॥८०॥ तद्गुरोर्वचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा रघूत्तमः । सीतां तुलायामारोप्य सुवर्णेनाप्यतोलयत् ॥८१॥ तुलितां प्रतिजग्राह गुरोः साध्वी स्मिताननाम् । दिव्यालंकारहीनां तां कंचुकीवस्त्रसंवृताम् ॥८२॥ तदा निनेदुर्वादित्राणि ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः । सुरस्त्रियो विमानस्थाः सीतारामौ मुदान्विता ॥८३॥

लगा—"देख, अब रामजी क्या करते हैं" ॥६५॥ इस तरह गुरुका वचन सुना तो रामजीने हंसकर संकेतसे सब राजा और गुरु वसिष्ठको बुला लिया ॥६६॥ इसके अनन्तर सभार्य्य हो आनन्दपूर्वक अपने हाथसे सीताका हाथ पकड़कर गुरुजीका प्रसन्न करते हुए बोले ॥६७॥ 'गुरुदेव ! आप सीतादानका मन्त्र बोलिये, मैं सुन कर दान करता हूँ' वसिष्ठजीने 'तथाऽस्तु' कहकर रामके द्वारा दिये हुए सीतादानको यथाविधि स्वीकार कर लिया । उस समय सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम जगत् आश्चर्य्य चकित रह गया ॥६८॥६९॥ उस समय सारा संसार चित्रलिखित सा हो गया, किसी को अपनी देहकी भी सुधि नहीं रही। तब मुनि वसिष्ठ सीतासे बोले—बेटी ! मेरे पीछे आकर बैठो ॥७०॥ रामजीने दानमें मुझे दान किया है। मैं तुमको पुत्री की तरह मानता हूँ । इस तरह मुनिका वचन सुनकर दुःखिता साध्वी सीता मुनिके पीछे जाकर बैठ गयीं। उस समय उनके रोंगटे खड़े हो गये और वे फूट-फूटकर रोने लगीं ॥७१॥७२॥ तदनन्तर चित्तमें रामजी सोचने लगे कि मैंने प्रसन्न होकर कैलास पर्वतपर रुद्राणीकी सम्मति पा दी थी। अतः इस मनस्तापदायिनी रुद्राणीको भी लेलेंगे, क्योंकि आपको देनेके लिए ही मैंने इसको मंगाया था। यह सुनकर गुरु वसिष्ठ बोले— ॥७३॥७४॥ हे राम ! हे महाबाहो ! मैंने आपकी जानबूझके लिए ही सीताको मांगा था। अतएव अब मेरे द्वारा दी हुई यह आपकी भार्या हो जाय ॥७५॥ हे रघूत्तम ! सुवर्णके बराबर इसको तौलिये, आठ बार तोलनेपर जितना सुवर्ण हो, उस सब टक्कर मेरे प्रणामसे आप पुनः सीताको ले लें। और भी जो मैं कहता हूँ सुनिये ॥७६॥७७॥ धेनु, कामधेनु, चिन्तामणि, सीता, कौस्तुभ रत्न, पुष्पक विमान, अयोध्यापुरी और अपना राज्य यदि आप किसी को दोगे तो आगे अतीवगोत्रय-दोषसे अत्यन्त दुखी होवेंगे । क्योंकि आगेरुक आपके कथा में न जाने क्या बात कही है ॥७८॥७९॥ अतः हे राजन ! मुनिदिष्ट वस्तुको छोड़कर जो इच्छा हो, बिना विचार ब्राह्मणों को देकर आप सुखी हो ॥८०॥ इस तरह गुरुके वचन सुनकर रघूत्तम रामने कहा—'बहुत अच्छा गुरुदेव' और सीता का आठ बार सुवर्ण से तौलकर उनसे वापस ले लिया, तथा सब केवल कंचुकी वस्त्र पहने तथा दिव्यालंकारों से रहित भी सीता प्रसन्न हो गयीं। इसके अनन्तर बाजे बजने लगे और विमानपर बैठी हुई देवांगनाए प्रसन्न होकर सीतारामके ऊपर पुष्पवृष्टि करने

सर्गः ९ ]

सर्गः ९ ] यज्ञकाण्डम् २४१

पूर्वाधिकानलंकारान्वस्वदेहे जानकी दधौ । जनाः सर्वे सुसंतुष्टास्तदाऽऽसन्मुदिताननाः ॥८४॥ अथ सीता पतिं नत्वा तत्पार्श्वे सस्थिताऽभवत् । स्मिताननाऽऽनन्दमग्ना लज्जिता रामलोचना ॥८५॥ ततो रामोऽप्यनेकानि कृत्वा दानानि बिस्तरात् । ऋत्विक्सदस्यमुख्यादीनानर्च्यभिगणैर्वरैः ॥८६॥ स्वीयान्भ्रातृन्नृपान्मित्रसुहृदोऽन्यांश्च सर्वशः । अभीक्ष्ण पूजयामास वस्त्रालंकारभूषणैः ॥८७॥ सर्वे जनाः सुललितोन्मणिकुण्डलस्रग्भूष्णीषकञ्चुकदुकूलमहार्घहाराः । नार्यश्च कुण्डलयुगालकदत्तपुष्पवस्त्रश्रियः कनकमेखलया विरेजुः ॥८८॥ इति श्रीमत्सतचिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे अवभृथोत्सववर्णनं नामाष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥


नवमः सर्गः

(अश्वमेध महायज्ञकी समाप्ति)

श्रीरामदास उवाच

श्रीरामेऽवभृथस्नाते शंभुर्ब्रह्मादिभिः सुरैः । रामं वेदस्तवैः स्तुत्वा प्रत्युवाच पुरः स्थितः ॥ १ ॥ अद्य धन्या वयं सर्वे यत्त्वां स्नानं सुमंगलम् । पश्यामो याज्ञ्यवभृथे सीतया बन्धुभिः सह ॥ २ ॥ अस्माकं हर्षकालोऽयं देवदेव दयानिधे । तस्मादयं सदा पुण्यः श्रेष्ठकालो भविष्यति ॥ ३ ॥ त्वं चाप्यंगीकुरुष्वाद्य देह्यस्मभ्यं सुबहून्वरान् । अन्यच्चात्र प्रत्यहं येन ते दर्शनं भवेत् ॥ ४ ॥ तथा कुरु रघुश्रेष्ठ तीर्थायास्मै वरान्प्रद । अन्यानि चत्वया पूर्वं यानि भूम्यां कृतानि हि ॥ ५ ॥ यात्राकाले सुतीर्थानि लिंगान्यपि निजाख्यया । तेषामपि वरानद्य वद त्वं मम वाक्यतः ॥ ६ ॥ पुरीषु श्रेष्ठाऽयोध्या स्याद्याच्याद्य राघव । नदीषु सरयूः श्रेष्ठा वरैः कार्याऽथ मन्दिरा ॥ ७ ॥ तच्छ्रुवचनं श्रुत्वा प्रहस्य रघुनन्दनः । हर्षकालेऽब्रवीद्वाक्यं यत्त्रैलोक्योपकारकम् ॥ ८ ॥


लगीं ॥ ८२-८३॥ जब जानकीजीने पहलेसे भी अधिक आभूषणोंको अपने शरीरम पहिना तो उससे जनता अत्यन्त सन्तुष्ट हुई ॥ ८४ ॥ इसके बाद पतिको प्रणाम करके हँसती हुई माताजी आनन्दमग्न होकर लज्जापूर्वक रामके पास बैठ गयीं । तदनन्तर रामजीने खूब दान दिये एवं ऋत्विक, सदस्य, राजे, मित्र, सुहृद् तथा अपने भाई-बन्धुओंका वस्त्रामूषणोंसे भली भाँति सत्कार किया ॥ ८५ । ८६ । उस समय रामजीके यज्ञमें सब पुरुष मनोहर मणियोंसे जटित कुण्डलों एवं मालाओंको पहिन तथा बहुमूल्य पगड़ी कञ्चुकी और दुबटोंम सुशोभित हो रहे थे। इसी तरह कुण्डल, रत्नजटित आभूषण तथा झांवाकी मेखला (तगड़ी) से सुशोभित स्त्रियं भी विराज रही थीं ॥ ८७ । ८८ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे यागकाण्डे नव रामतेजपाण्डेयकृत-'ज्योत्स्ना' भाषाटीकायामवभृथोत्सववर्णनं नाम अष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

श्रीरामदासजी कहने लगे—श्रीरामने जब अवभृथ स्नान कर लिया, तब ब्रह्मादि देवोंके साथ महादेव रामजीकी स्तुति करके कहने लगे—॥ १ । आज हम लोग धन्य हैं, जो सीता एवं बन्धुओंके सहित आपको यह अश्वमेधका अवभृथ स्नान किये हुए देख रहे हैं, जो अतन्त मंगलकारक है । २ हे देवदेव ! हे कृपानिधे ! यह समय हम लोगोंके लिए बड़ा हर्षप्रद है। अतः यह सदा अत्यन्त श्रेष्ठ और पुण्यवर्द्धक होगा । ३ ॥ आप भी इसको अङ्गीकार करें और इसके लिए अच्छे एवं बहुतसे ऐसे वर दें कि जिससे हमलोगोंका प्रतिदष आपका दर्शन मिलता रहे ॥ ४ । हे रघुश्रेष्ठ ! आप इस तीर्थके लिए भी बहुतरे वरोंको द । यात्रा करते समय पहले भी आपने जिन तीर्थों एवं लिंगोंको स्थापित किया है, उनको भी मेरे कहनेसे आप वरदान दें ॥ ५ । ६ ॥ हे राघव, आज मेरे कहनेसे आप ऐसा कह दीजिये कि सब नागरिकोंके लिए श्रेष्ठ यह अयोध्या नगरी है एवं

२५२ । आनन्दरामायणे [ सर्गः १

श्रीराम उवाच

यत्प्रार्थितं त्वया शंभो तदेव हृदि मे स्थितम् । शृणुष्व वचनं मेऽद्य यत्पुनःप्रोच्यते शुभम् ॥ ९ ॥
सर्वेषामेव मासानां श्रेष्ठश्चायं मधुर्भवेत् । वैशाखात् कार्त्तिकः श्रेष्ठः कार्त्तिकान्माघ एव च ॥ १० ॥
माघमासाद्वरश्चायं चैत्रमासो भविष्यति ।
चैत्रमासेऽभवज्जन्म मम यस्मात्तथा पुनः ॥ ११ ॥
वाजिमेधावभृथेषु स्नानेनापि विशेषतः । सर्वेषामधिकश्चास्तु मधुस्ते वाक्यगौरवात् ॥ १२ ॥
चैत्रमासे कृतं दानं हुतं स्नानं विचिन्तितम् । सर्वं कोटिगुणं प्रोक्तमदोभ्यासां विशेषतः ॥ १३ ॥
सर्वासु प्रथमा चेयं पुरीषु नगरी मम । अयोध्या मुक्तिदात्री तु भविष्यति शिरा मम ॥ १४ ॥
अन्यत्र यत्कृतं पुण्यं षष्टिप्रवत्सरैः शुभम् । तदत्र दिवसेकेन भविष्यति नृणां सदा ॥ १५ ॥
पुरीणां मधुरा श्रेष्ठा गङ्गाध्मानो शुभप्रदा ।
त्वयाऽस्यै याचितो यस्माद्वरश्चेहसदागतः ॥ १६ ॥
तव वाक्याद्गौरवेण तव काश्याः शताधिका । भविष्यति पुरी चेयमयोध्या मम वल्लभा ॥ १७ ॥
नदीषु सरयूश्चेयं श्रेष्ठाऽस्तु वचनान्मम । सरयूसदृशी नान्या नदी भूता भविष्यति ॥ १८ ॥
अस्मादग्रे मया चेदं रामतीर्थं विनिर्मितम् । निजतेजःप्रभावेन तीर्थेषु मुकुटोपमम् ॥ १९ ॥
भविष्यति न सन्देहः सर्वपातकनाशनम् ।
तथा यानि पृथिव्यां हि मया तीर्थानि वै पुरा ॥ २० ॥
लिंगान्यपि स्वीयनाम्ना कृतानि तानि शंकर । स्नाने दर्शनावर्चामुक्तिदान्यत्र संतु वै ॥ २१ ॥
रामतीर्थे चैत्रमासे प्रत्यब्दं भुवि मानवै । स्नातव्यं विधिवता सम्यद्यतियमैर्यम व स्यतः ॥ २२ ॥
यत्फलं ह्यश्वमेधेन यद्गोमेधेन वै फलम् । यत्फलं सोमयागेन तच्चैत्रेऽत्रावगाहनात् ॥ २३ ॥
सूर्यग्रहे कुरुक्षेत्रे यत्पुण्यं स्नानदानतः ।
तन्पुण्यं स्यान्मधौ स्नानादयोध्यायां सुरेश्वर ॥ २४ ॥


नदियोंमे उत्तम सरयू नदी है । शिवजीका यह कथन सुनकर प्रसन्न हुए राम सदन विदुक्तोपकारिणी वाणी बोले ॥ ७ ॥ ८ ॥ श्रीरामने कहा-हे शम्भो ! आप जो चाहते हैं, वही मेरे भी मनमें है। अब मेरी बात सुनिये। मैं हर्षपूर्वक यह कल्याणमय वाक्य कहता हूँ । ९ । सम्पूर्ण मासोंमें श्रेष्ठ यह चैत्र मास होगा। वैशाखसे कार्तिक, कार्तिकसे माघ एवं माघ महीनासे भी चैत्र श्रेष्ठ होगा। इसी मासमें मेरा जन्म हुआ है। इसलिए भी यह चैत्र मास श्रेष्ठ है । १० । ११ । अश्वमेधका अवभृथ स्नान होने तथा आपके वाक्यगौरवसे भी यह महीना सबसे श्रेष्ठ होगा ॥ १२ ॥ चैत्र मासमें यहाँ स्नान-दान आदिमं कोटिगुण फल होगा। अभ्यासमें किया हुआ सुकर्म तो और भी अधिक पुण्यप्रद होगा ॥ १३ ॥ सब मेरी पुरी ममें यह शिरोरूप उत्तम है तथा मेरी वाणीसे यह मुक्तिदात्री भी अवश्य होगी । १४ । और जगह किया हुआ पुण्य ६० वर्षमें फलदायक होता है, किन्तु यहाँ किया हुआ पुण्य एक ही दिनमें फलद होता है ॥ १५ ॥ सब पुरियोंमें शुभप्रद पुरी मधुराको श्रेष्ठता क्योंकि आपने मुझसे वर मांगा है ॥ १६ ॥ अतएव आपके वाक्यगौरवसे यह मेरा प्रिया अयोध्यापुरी गुणोंमें आपकी काशीसे भी सौगुना श्रेष्ठ होगा ॥ १७ ॥ मेरे वचनसे सरयू श्रेष्ठ नदीयोंमें श्रेष्ठ होगी। सरयू जैसी नदी न है और न होगी ॥ १८ ॥ इसमें भी मेरा बनाया हुआ यह रामतीर्थ अपने प्रभावसे सम्पूर्ण तीर्थोंमें मुकुट सदृश होगा ॥ १९ ॥ हे शङ्करजी ! मैंने अपने नामसे भूमिपर जितने भी तीर्थ एवं शिवलिंग स्थापित किये हैं वे सब स्नान-दर्शन एवं पूजनसे मुक्ति देनेवाले तथा सर्वपापनाशक होंगे। इसमें कोई सन्देह नहीं है। २० । २१ ॥ मनुष्योंको प्रतिवर्ष चैत्र मासमें विधिवतर्क, यम नियमादिके साथ रामतीर्थ में स्नान करना चाहिये । २२॥ अश्वमेध, गोमेध एवं सोमयाग करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही फल रामतीर्थपर स्नान करनेसे मिल जाता है ॥ २३ ॥ सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रमें स्नान-दान करनेसे जो फल होता है, वही फल चैत्रम अयोध्यास्नान करनेसे