श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १ ] | मनोहरकाण्डम् | ५७५
| सर्गः १ ] | मनोहरकाण्डम् | ५७५ |
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सीतागुहो विना पूजा रामस्यैकस्य नाचरेत् , कृता चेद्विघ्नकर्त्री सा भवदत्र न संशयः ॥ १४८ ॥
नवायतनपूजा सा श्रेष्ठा ज्ञेया शुभप्रदा । या पञ्चायतनी पूजा ज्ञेया सा मध्यमाऽत्र हि ॥ १४९ ॥
त्रिदेवत्या तु या पूजा कनिष्ठा सा निगद्यते । अतिकनिष्ठा पूजा सा द्विदैवत्या स्मृता हि सा ॥ १५० ॥
कोदण्डं वामहस्ते च तूणीरं वामपार्श्वके । निजनामाङ्कितं बाणं दधानं दक्षिणे करे ॥ १५१ ॥
एवं श्रीरामचन्द्रं स्थाप्य ततः पूजां समारभेत् । आत्मनो वामभागे च जलकुम्भं निधाय हि ॥ १५२ ॥
आत्मनो दक्षिणे भागे पूजापात्रं निवेदयेत् । आत्मनः पुरतः पात्रं स्थापयेद्विस्तृतं वरम् ॥ १५३ ॥
प्राङ्मुखः सुखमासीनो धृतपद्मासनः शुचिः मौनी धृताक्षतुलसीमालो निश्चलमानसः ॥ १५४ ॥
बद्धग्रंथिशिखः शुद्धवस्त्रो धृतपवित्रकः । मृद्गङ्गाद्यतीर्थमृत्तिलको मुद्रिकाङ्कितः ॥ १५५ ॥
नमस्त्वादौ गणराजं च निधिवार्गादि कीर्तयेत् ।
भूमिशुद्धिं भूतशुद्धिं न्यासौ कृत्वा यथाक्रमम् । प्रोक्षणीपात्रमेकं तु जलपूर्णं प्रकारयेत् ॥ १५६ ॥
दूर्वागन्धाक्षतपुष्पैरन्यत्पात्रं परिपूरयेत् । प्रोक्षयेत्तेन नीरेण पूजाद्रव्यं महामनाः ॥ १५७ ॥
पाद्यार्घ्याचमनार्थं तु त्रीणिपात्राणि विन्यसेत् । गणराजं पूजयित्वा सम्पूज्य रुरुजं ततः ॥ १५८ ॥
पाञ्चजन्यं पूजयित्वा प्रोक्षयेत्तज्जलैरपि पूजाद्रव्यं पूर्वोक्तं स्वात्मानं च गुरुं तथा ॥ १५९ ॥
धेनुशङ्खचक्रधनुराजमुद्राः प्रदर्शयेत् शैली दारुमयी लौही लेप्या लेख्या च सैकती ॥ १६० ॥
मनोमयी मणिमयी प्रतिमाऽष्टविधा स्मृता । अथ ध्यायेद्रामचन्द्रं ससीतं पुरतः स्थितम् ॥ १६१ ॥
द्विभुजं धृततूणीरं चापबाणधृतायुधम् । दिव्यलङ्कृतसंयुक्तं पीतकौशेयवाससम् ॥ १६२ ॥
सलक्ष्मणं सशत्रुघ्नं भरतेन समन्वितम् । हनुमत्सेवितपदं सिंहासनविराजितम् ॥ १६३ ॥
सितछत्रसमायुक्तं दिव्यचामरवीजितम् । विभीषणनमत्पुक्तं सुग्रीवपरिवेष्टितम् ॥ १६४ ॥
करे ॥ १४६ ॥ १४७ ॥ सीता और लक्ष्मण बिना अकेले रामकी पूजा कभी न करे यदि ऐसा पूजा का जाता है तो वह प्रायः विघ्न करनेवाली ही हुआ करती है। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १४८ ॥ नवायतनपूजा सर्वश्रेष्ठ और पञ्चायतन पूजा मध्यम होती है ॥ १४९ ॥ त्रिदेवकी पूजा कनिष्ठ कहा गया है। वह पूजा तो अत्यन्त कनिष्ठ होती है जिसमें केवल दो देवताओंकी पूजा की जाती है ॥ १५० ॥ जिनके बायें हाथमें धनुष और बायें बगल तरकश है, अपने नामसे अङ्कित बाण दाहिने हाथमें है ॥ १५१ ॥ इस तरहके रामचन्द्रकी स्थापना करके पूजा प्रारम्भ करे। पूजा करते समय वामभागमें एक कलश भी अवश्य रख लेना चाहिए ॥ १५२ ॥ अपने दाहिने बगल पूजापात्र रखना चाहिए और आगे भी विस्तृत पात्र रखना उचित है। १५३ ॥ उपासकको चाहिए कि ज्ञानपूर्वक पूर्वकी ओर मुख करके पद्मासनसे बैठे और निश्चल मन करके तुलसीकी माला लिये, शिखामें ग्रन्थि दिये, हाथोमे पवित्री तथा शरीरमें पवित्र वस्त्र धारण किये, द्वारकाकी शुद्ध मृत्तिकाका तिलक लगाकर ॥ १५४ ॥ १५५ ॥ पहले गणेशजीको प्रणाम करे; फिर क्रमशः निधि-वार आदिका उच्चारण करके भूमिशुद्धि, भूतशुद्धि तथा अङ्गन्यास करन्यास करके प्रोक्षणपात्रमे जल भरे। दूर्वा, गन्धाक्षत, पुष्प आदि उसमें डाले और प्रोक्षणीपात्रके जलसे पास रक्खी हुई पूजनसामग्रीका प्रोक्षण करे। पाद्य, अर्घ्य एवं आचमनके लिये सामने तीन पात्र रक्खे। फिर गणेशजी, शङ्ख तथा पाञ्चजन्य शंखका पूजन करके उसके जलसे अपना, पूजन-सामग्री तथा गुरुजीका प्रोक्षण करे ॥ १५६-१५९ ॥ इसके अनन्तर सुरभी, शंख, चक्र, गरुड़ एवं राममुद्राका प्रदर्शन करे। पत्थरकी, काष्ठकी, चूना-ईंटकी रङ्गके बनी, चित्रकारी की हुई, बालूकामयी, मानसी और मणिमयी ये आठ प्रकारकी प्रतिमाएँ होती हैं। ऊपर बतलायी क्रियायें कर लेनेके बाद उपासकको चाहिए कि सीताके साथ बैठे हुए इस प्रकारके रामका ध्यान करे जिनके दो भुजाएँ हैं, जो तूणीर तथा धनुष-बाण आदि विविध प्रकारके शस्त्र धारण किये हैं, उनके शरीरमें दिव्य अलङ्कार पड़े हैं और वे पीला कौशेय वस्त्र धारण किये हैं ॥ १६०-१६२ ॥ लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न उनके साथ हैं, हनुमान्जी उनके चरणकी सेवा कर रहे हैं और रत्न जड़ान सिंहासनपर बैठे हैं ॥१६३॥ ऊपर सफेद छत्र लगा है, दिव्य चामर ढल रहे हैं, विभीषण और सुग्रीव
५८० आनन्दरामायणे [ सर्गः ३
जाम्बवता समायुकमङ्गदेन परिष्टुतम् । अयोध्यावासिनं राममेवं हृदि विचिन्तयेत् ॥१६५॥ सीताराम समागच्छ मदग्रे त्वं स्थिरो भव । गृहाण पूजां महतां कृतमावाहनं तव ॥१६६॥ हिरण्मयं रत्नयुक्तं नानारत्नविचित्रितम् । सिंहासनं सुवस्त्रं च कामनाथे ददामि ते ॥१६७। चन्दनागुरुसंयुक्तैर्जलैस्तीर्थसमुद्भवैः । पाद्यं गृहाण श्रीराम मया दत्तं प्रमोद मे ॥१६८। पुष्करादिषु तीर्थेषु गङ्गादिषु सरित्सु च । यत्तोयं तन्मयाऽऽनीतं दत्तमर्घ्यं गृहाण भोः ॥१६९। सुगन्धवामितं तोयं बहुतीर्थसमुद्भवम् । आचमनार्थमानीतं गृहाण त्वं सुरेश्वर ॥१७०। हरिद्राकुङ्कुमैर्युक्तं सुगन्धद्रव्यमिश्रितम् । सुगन्धस्नेहसम्मिश्रमुद्वत्तनमथास्तु ते ॥१७१। कामधेनूद्भवं क्षीरं नन्दिन्या दधि सुन्दरम् । कपिलाया घृतं श्रेष्ठं मधु विन्ध्याद्रिसम्भवम् ॥१७२। सितोपलसमानाभं सितायुक्तं मनोहरम् । पञ्चामृतं मयाऽऽनीतं स्नानार्थं त्वं गृहाण भोः ॥१७३॥ गङ्गा च यमुना चैव गोदावरी सरस्वती । नर्मदा सिन्धुकावेरी सरयू गण्डकी तथा ॥१७४॥ ताम्रपर्णी भीमरथी कृष्णा वेणी महानदी । गोमती सागराः सप्त पयोष्णी मत्रनाशिनी ॥१७५। पूर्णा तापी तुङ्गभद्रा क्षिप्रा वेगवती तथा । पिनाकी प्रवरा सिन्धुरेशा सार्द्धत्रयो नदाः ।१७६॥ घृतमाला कृतमाला मही निक्षेपिका तथा । पयोष्णी प्रेमगङ्गा च चित्रगङ्गा करानदी ॥१७७। नीरा चर्मण्वती वृद्धा वज्रा च पुनः पुनः । सिन्धुशीरा च वैकुण्ठाऽलकनन्दा च वारणा ॥१७८। इत्यादिसर्वतीर्थेषु यत्तोयं वर्तते शुभम् । तन्मयाऽऽनीतमद्यात्र स्नानं कुरु रघूत्तम ॥१७९॥ पुनराचमनं रम्यं सर्वतीर्थसमुद्भवम् । गृहाण रघुनाथ त्वं दीयते यन्मया तव ॥१८०॥ सुवर्णतन्तुमिश्रितं पीतकौशेयसम्भवम् । वस्त्रयुग्मं प्रदास्यामि गृहाण रघुनायक ॥१८१॥ शुद्धं हेममयं रम्यं नवतन्तुसमुद्भवम् । ब्रह्मग्रन्थिसमायुक्तं यज्ञसूत्रं प्रगृह्यताम् ॥१८२॥
आगे खड़े वन्दना कर रहे हैं ॥ १६४ ॥ जाम्बवान्के साथ साथ अङ्गदभी खड़े स्तुति कर रहे हैं। इस प्रकार अयोध्यावासी रामका मनमें ध्यान करे । १६५ ॥ और कहे-हे सीताराम ! आप मेरे सामने आकर बैठिए । मैं आपका पूजन करूंगा। मैं आपका आवाहन करता हूँ। आप आइए और मेरी पूजा स्वीकार करिए ॥ १६६ ॥ सुवर्णका बना हुआ तथा रत्नखचित होनेसे चित्र-विचित्र मालूम पड़नेवाला और सुन्दर वस्त्रस सहित सिंहासन मैं आपकी बैठनेके लिए देता हूँ ॥ १६७ ॥ चन्दन और पुष्पसे मिले हुए तीर्थोंके जलका पाद्य बनाकर आपको देता हूँ । इसे आप स्वीकार करें और मेरे ऊपर प्रसन्न हों ॥ १६८ ॥ पुष्कर आदि तीर्थों तथा गङ्गा आदि नदियों-से लाये जलका अर्घ्य बनाकर मैं आपको देता हूँ, इसे स्वीकार करिए ॥ १६९ ॥ सुगन्धसे वासित एवं कितने ही तीर्थोंसे लाया हुआ जल मैं आपको आचमनके लिए देता हूँ । हे सुरेश्वर ! इसे आप ग्रहण कीजिए । १७० ॥ हल्दी कुमकुम और बहुतसे सुगन्धद्रव्योंसे मिश्रित तथा सुगन्धमय तेल आदिस मिला हुआ जल मैं आपको स्नान करानेके लिये देता हूँ ॥ १७१ । कामधेनुका दूध नन्दिनी गौका दही, कपिला गौका घृत विन्ध्य-पर्वतसे उत्पन्न उत्तम मधु, ॥ १७२ । सफेद पत्थरके समान चमकती हुई चीनीसे मिल्य पंचामृत मैं आपको स्नान करानेके लिए देता हूँ। इसे आप ग्रहण करिए ॥ १७३ ॥ गङ्गा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु, कावेरी, सरयू, गण्डकी, ताम्रपर्णी, भीमरथी, कृष्णा, वेणी, महानदी, गोमती, सातों सागर, मवनाशिनी, पयोष्णी, पूर्णा, तापी, तुङ्गभद्रा, क्षिप्रा, वेगवती, पिनाकी, प्रवरा, सिन्धुरेशा, स'ढे तीन नद, घृतमाला, कृतमाला, मही, निक्षेपिका पयोष्णी प्रेमगङ्गा, चित्रगङ्गा, करानदी, नीरा, चर्मण्वती, वृद्धा, वज्जरा, सिन्धुशीरा, वैकुण्ठा अलकनन्दा, वारणा इत्यादि ॥ १७४-१७८ ॥ नदियोंमें जो पवित्र जल विद्यमान है वह मैं आज यहाँ ले आया हूँ । हे रघूत्तम आप इससे स्नान कीजिए ॥ १७९ ॥ सब तीर्थोंका पवित्र जल मैं आपको पुनराचमनके लिये दे रहा हूँ । इसे आप ग्रहण कीजिए ॥ १८० ॥ सुवर्णके सूतोसे बना तथा चित्र-विचित्र दीखनेवाला पीत कौशेय वस्त्र मैं आपको दे रहा हूँ, इसे स्वीकार करिये । १८१ ॥ शुद्ध, सुवर्णमय,
सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ५८२
सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ५८२
मुकुटं कुण्डले रम्ये मुद्रिकाः कङ्कणे तथा। नूपुरे रत्नजालानाः केयूरे रत्नमण्डिते ॥१८४॥ इत्यादीन्नामभूषांश्च दिव्यस्वर्णमयान्यविभो। त्वदर्थं च मयानीतानलङ्कारान् गृहाण भोः ॥१८४॥ छत्रं सव्यजनं रम्यं चामरद्वयसंयुतम्। त्वदर्थं च मयाऽऽनीतं गृहाण विपुलोदन ॥१८५॥ सुगन्धं चन्दनं दिव्यं कस्तूरीमिश्रितं तथा। रक्तचन्दनसंयुक्तं गृहाण त्वं मयाऽर्पितम् ॥१८६॥ अक्षतांश्च वरान् दिव्यान्मुक्ताफलविनिर्मितान्। कर्पूराद्रान्द्रुमेशान्चान् गृहाण परमेश्वर ॥१८७॥ माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो। मयाऽहृतानि पूजार्थं गृहाण रघुपायक ॥१८८॥ वनस्पतिरसोद्भूतं गन्धयुक्तं सुशोभनम्। आघ्रेयं सर्वदेवानां धूपं गृहाण राघव ॥१८९॥ आज्यं त्रिवर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया। दीपं गृहाण भो राम त्रैलोक्यतिमिरपह ॥१९०॥ अन्नमन्नरसं सम्यक् पायसंघृतमिश्रितम्। शर्करामधुसंयुक्तं नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥१९१॥ आम्रादीनि सुपक्वानि फलानि विविधानि च। समर्पितानि ते राम गृहाण रघुनन्दन ॥१९२॥ पूगीफलसमायुक्तं नागवल्लीदलैर्युतम्। कर्पूरैलायुतं ताम्बूलं स्वीकुरु प्रभो ॥१९३॥ हिरण्यं ब्रह्मसम्भूतं वह्नितेजःसमुद्भवम्। दीयते दक्षिणार्थे ते गृहाण रघुनन्दन ॥१९४॥ एवं मया षोडशोपचाराः सविस्तरं ते कथिताः विशाम्पते। आवाहनाद्यश्च हि दक्षिणांतः शेषा अप्यंशं सकलां हि दृश्ये ॥१९५॥ पञ्चवर्तिमसंयुक्तं कपिलाऽऽज्यविमिश्रितम्। वह्निना योजितं रम्यं गृहाण त्वं निराजनम् ॥१९६॥ जाती चंपककन्दारौ केतकी तुलसी तथा। दमनो मुनिकुन्दैश्च ददामि स्वामिनं तव ॥१९७॥ एभिर्नवविधैः पुष्पैर्मन्त्रपुष्पाणि राघव। मयाऽर्पितानि गृहाण प्रसीद परमेश्वर ॥१९८॥ यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च। तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिण पदे पदे ॥१९९॥
२८४ नवोर सूत्रसे बना तथा सुवर्णसंयुक्त यज्ञसूत्र मैं आपको देता हूँ, इसे आप स्वीकार करिये ॥ १८२ । मुकुट, रत्न कुण्डल, मुद्रिका, कंकण, नूपुर स्वर्णनिर्मित जंजीरका माला, रत्नमण्डित केयूर इत्यादि परम रम्य, दिव्य, स्वर्ण और बाणमय दन अलंकार मैं आपके लिए लाया हूँ। इन आप ग्रहण करिए ॥ १८४ ॥ १८४.५ ॥ व्यजन और चमर संयुक्त छत्र मैं आपके लिए लाया हूँ। हे रघुनन्दन, इसे आप स्वीकार करिए ॥ १८५ ॥ सुन्दर गन्धयुक्त, दिव्य कस्तूरी अमिश्रित तथा लाल चन्दन (घिसा चन्दन) मैं आपके लिए लाया हूँ सो आप ग्रहण कीजिए ॥ १८६ । पाजाके टुकड़ासे बनाया हुआ कर्पूरा और दुमट्ममिश्रित अक्षत मैं आपको समर्पण करता हूँ, इसे आप ग्रहण करें ॥ १८७ ॥ मालती आदि सुगन्धित कुशस बनी माला मैं आपको पूजाके निमित्त लाया हूँ, हे रघुपायक ! इन आप ग्रहण कीजिए ॥ १८८ ॥ वनस्पतिकारस उत्पन्न, गन्ध-युक्त, उत्तम सूंघनेवाला और सब देवताओंके सूँघने योग्य धूप आपके लिए लाया हूँ इसे ग्रहण कीजिए ॥ १८९ ॥ घीसे भीगी तीन बत्तियोंवाले दीपकको लाया हूँ। हे तीनों लोकोंका अन्धकार दूर करनेवाले राम ! इसे आप ग्रहण करिए ॥ १९० ॥ साने योग्य अन्न, दूध घी, चामर तथा मधुमिश्रित नैवेद्य मैं आपको अर्पण करता हूँ, इसे ग्रहण करिए ॥ १९१ ॥ आम्र आदिक खूब पके अच्छे अच्छे फल मैं आपको अर्पण करता हूँ, इसे ग्रहण करें ॥ १९२ ॥ सुपारी युक्त पानके पत्तोंस झाड़ा हुआ और अनेक मसालों युक्त ताम्बूल आप ग्रहण करें । १९३ ॥ हे रघुनन्दन ! ब्रह्मस उत्पन्न तथा अग्निके तेजसे आयमान सुवर्ण मैं दक्षिणाके लिए आपको देता हूँ, उसे आप स्वीकार करें ॥ १९४ ॥ हे वत्स ! इस तरह मैंने विस्तारपूर्वक आवाह्नसे दक्षिणा तकके षोडश उपचायोंको कह सुनाया। शेष पूजनादि आगे बतलाता हूँ ॥ १९५ ॥ पाँच वत्तियोंसे युक्त, कपिला गौके घृतसे मिश्रित एवं अग्निसे संयोजित रम्य नीराजन मैं आपको अर्पण करता हूँ सो स्वीकार करिए ॥ १९६ ॥ जूही, चम्पा, कन्दार, केतकी, तुलसी दमनक, अगस्त और दो प्रकारके मुनिकुन्द इन नौ फूलोंका मन्त्रपुष्प मैं आपको देता हूँ। हे परमेश्वर ! इसे स्वीकार करिए और मेरेपर प्रसन्न होइए । १९७ ॥ १९८ ॥ जन्मान्तरमें भी मैने जिस किन्हीं पापोंको किया हो, वे नष्ट हो जायें।
५८२ आनन्दरामायणे [सर्गः ३
उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा । पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां साष्टांगश्च नमोऽस्तु ते ॥२००॥ आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् । पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वर ॥२०१। मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं रघूत्तम । यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे ॥२०२॥ एवं श्रीरामचन्द्रस्य भक्त्या कार्यं प्रपूजनम् । निरन्तरं तथा कार्यं नवम्यां च विशेषतः ॥२०३॥
विष्णुदास उवाच गुरो नवविधैः पुष्पैस्त्वया पुष्पांजलिः कथम् । निवेदितोऽत्र रामस्य पूजने तद्वदस्व माम् ॥२०४। त्वत्तो नानाविधाः पूजाः सुरणां च मया श्रुताः । एवं तन्मे श्रुतो नैव नवपुष्पांजलिः कदा ॥२०५॥
श्रीरामचन्द्र उवाच सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य सावधानमनाः शृणु । आसीत्पुरा द्विजवरः कावेर्या उत्तरे तटे ॥२०६। रामनाथपुरे कश्चित्सुन्दरश्चाऽतिभक्तिमान् । तस्याऽभवन् पुत्राश्च रामचिंतनतत्पराः ॥२०७॥ चन्द्रोऽथचन्द्रश्चन्द्राभश्चन्द्रायश्चंद्रशेखरः । चन्द्रांशुर्जितचन्द्रश्च चन्द्रचूड़ोऽष्टमः स्मृतः ॥२०८॥ रामचन्द्रांशतः नव गृहाप्ताश्च नव स्मृताः । एकदा ते त्रयोऽोध्यायां रामं भक्तकृपाकरम् ॥२०९॥ द्रष्टुं मधुचैत्रमासे तस्थुस्ते सरयूतटे तावत्तत्र समायाता नानादेशान्तरस्थिताः । २१०॥ जनानां कोटयश्च नानावाहनसंस्थिताः । सरय्यां शमतीर्थे हि चैत्रस्नानमादरात् ॥२११। तेषां समागतानां हि समर्द्दस्तत्र वै बभूत् । समर्दाद्रामचन्द्रस्य तेषां नाभूच्च दर्शनम् ॥२१२॥ तदा ते मंत्रयामासुर्नव विप्राः परस्परम् । कथं श्रीरामवभ्रयात्र समर्दे दर्शनं भवेत् ॥२१३.। खेजातं त्वतियत्नेन तर्हि यत्किं न दर्शनम् यावत्सम्येन मनसा राघवो न निरीक्षितः । २१४। तावत्तद्दर्शनं नैव तृप्तिं नो जनयिष्यति । तदा चन्द्रोऽब्रवीज्ज्येष्ठस्त्वत्रैव शमदर्शनम् ॥२१५।
एक-एक पग चलकर मैं आपकी प्रदक्षिणा करता हूँ ॥१९९॥ हृदयसे, मस्तकसे, दृष्टिसे, मनसे, वचनसे, हाथोंसे, पैरोंसे और घुटनोंसे मैं साष्टांग प्रणाम करता हूँ ॥२००॥ हे परमेश्वर ! न मैं आवाहन करना जानता हूँ, न विसर्जन करना आता है। पूजन करना भी मैं नहीं जानता। यदि कुछ भ्रम हुआ हो तो आप क्षमा करें ॥२०१॥ हे रघूत्तम ! मंत्रसे, क्रियासे और भक्तिसे हीन मैने जो कुछ पूजा की है हे देव ! वह सब परिपूर्ण हो जाय । २०२। इस तरह निरन्तर भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिए और नवमीको विशेष करके ऐसा करना उचित है ॥२०३॥ विष्णुदासने कहा-हे गुरो ! इस पूजनके प्रसङ्गमें आपने नौ प्रकारके फूलोंसे पुष्पाञ्जलि देनेकी विधि क्यों बतलाई है ? सो आप हमसे कहिये ॥२०४॥ अबतक आपने मुझे बहुतसे देवताओंका विविध पूजन बताया, किन्तु उनमें नवपुष्पाञ्जलि आपने कहीं नहीं बतलायी ॥२०५॥ श्रीरामदासने कहा- हे शिष्य ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है, सो सावधान मन होकर सुनो। बहुत दिनों-की बात है, कावेरी नदी के उत्तर तटपर रामनाथपुरम अति भक्तिमान् सुन्दर नामका एक ब्राह्मण रहता था। वह रामका ध्यान करता था। रामका ध्यान करनेवाले उस भक्तके नौ बेटे थे ॥२०६॥२०७॥ चन्द्र, अति-चन्द्र, चन्द्राभ, चन्द्राय, चन्द्रशेखर, चन्द्रांशु, जितचन्द्र, चन्द्रचूड़ और गूढ़ाम रामचन्द्र ये उन लड़कोंके नाम थे। एक बार चैत्रके महीनेमें वे नवों लड़के भगवान् रामचन्द्रका दर्शन करनेके लिये अयोध्या गये। वहीं पहुंचकर वे सरयूके तटपर पहुंचे। तब तक अनेक देशोंके रहनेवाले करोड़ों मनुष्य चैत्रमास स्नानके लिये अनेक प्रकारकी सवारियोंपर चढ़कर वहाँ आ पहुंचे ॥२०८-२११॥ उन आये हुए लोगोंकी भारी भीड़के कारण वे नवों ब्राह्मणकुमार रामचन्द्रजी का दर्शन नहीं पा सके ॥ २१२॥ उस समय उन्होंने परस्पर मंत्रणा की कि इस प्रकारका भीड़में रामचन्द्रजीका दर्शन कैसे हो ॥२१३॥ बहुत प्रयत्न करनेपर यदि थोड़ा-सादर्शन हो भी जाय तो जबतक अच्छी तरह उन्हें न देख सकूँ तो दर्शनसे लाभ ही क्या ? ॥२१४॥ उस क्षणिक दर्शनसे हमें सन्तोष नहीं होगा। उनमेंसे ज्येष्ठ भ्राता चन्द्र बोला कि हमलोग तीव्र तपस्या करके यहीं ही रामचन्द्रजीका
सर्गः १] मनोहरकाण्डम् ५८३
वयं क्षेणेण तपसा प्राप्स्यामस्तत्फलं हरः। तच्चन्द्रवचनं श्रुत्वा पुनः प्रोचुर्द्विजोत्तमाः ॥११६॥
एककाले तु सर्वेषां वक्ष्यामस्त्वन्तरेण हि। कस्यादौ रामचन्द्रश्च दास्यत्यत्र प्रहर्शनम् ॥११७॥
कस्य दास्यति पश्चाच्च विदितं तद्भविष्यति। कस्यास्मासु दृढा भक्तिर्विदिता सा भविष्यति ॥११८॥
एवं परस्परं चोक्त्वा ते सर्वे द्विजसूनवः। त्यक्तादाश बाष्पुमञ्चार्थकान्ते तत्परेण हि ॥११९॥
गत्वाऽतिदूरं संमर्दात्सेदुः सर्वे तपो महत्। तत्सर्वं राघवौ ज्ञात्वा सर्वसाक्षी जगत्प्रभुः ॥१२०॥
तेषां स्वदर्शनं दातुं नवमे दिवसे मुदा। संवादामास श्रीरामः सर्ग चिन्ते समास्थितः ॥१२१॥
एककाले तु सर्वेषां यदि दास्यामि दर्शनम्। तर्ह्येष तुष्टिः सर्वेषां भविष्यति न चेतरहि ॥१२२॥
अतोऽद्याहं करिष्यामि नव रूपाणि निश्चयात्। एवं संमन्त्र्य श्रीरामो लक्ष्मणं प्राह सादरम् ॥१२३॥
शिविकामानयस्वाद्य बहिर्गच्छाम्यहं मुदा। तथेति राघववाक्येन शिविकां लक्ष्मणाऽथवा ॥१२४॥
आनयामास दूतैः स राघवाय न्यवेदयत्। तदा सिंहासनाद्रामश्चोत्थार्य शिविकास्थितः ॥१२५॥
बन्धुमित्रैर्विवृत्तैश्च सुहृन्मित्रादिभिर्युतः। वाहैः शनैश्चयोध्याया ययौ रामो मुदान्वितः ॥१२६॥
ततस्तं जनसंमर्दं समतिक्रम्य राघवः। चकार नव रूपाणि ह्यात्मनः परमेश्वरः ॥१२७॥
शिविकाः सुहृदो भ्रातॄन्तान्मित्रान्भ्रातृन्वाहनान्। चकार नवधा राघवेन्द्रा म क्षणमात्रतः ॥१२८॥
निरीक्षितुं समायाता नास्यान तान् जनानापि। चकार नवधा रामस्तद हुतमिवाभवत् ॥१२९॥
ततस्तैस्तैर्जनैर्मित्रैर्हूतैर्बन्धुजनैः सह। नवानां भूसुराणां हि ययावग्रे रघूत्तमः ॥१३०॥
ततस्ते भूसुराः सर्वे तदेकसमये प्रभुम्। आत्मनः पुरतो रामं ददृशुस्तं पृथक् पृथक् ॥१३१॥
तुष्टुष्टमनसः सर्वे प्रणेमू रघुनन्दनम्। शिविकाभ्योऽवततारामस्तवुरुढ्वा पृथक् पृथक् ॥१३२॥
नवरूपधराः सर्वांन्विप्रानालिंग्य सादरम्। ऊचुर्मधुरया वाचा प्रसन्नमुखपङ्कजाः ॥१३३॥
दर्शन पा लेंगे। चन्द्रकी इस बातको सुनकर वे सब बोल उठे कि यदि हम सब भाई एक साथ तपस्या करने लग जायें तो रामचन्द्रजी किसको पहिले दर्शन देंगे ॥ ११५-११७॥ और किसको सबसे पीछे? इससे यह बात भी ज्ञात हो जायगी कि हममेंसे किसकी भक्ति दृढ है ॥११८॥ इस तरह परस्पर बातचीत करके वे सब ब्राह्मणबालक उस भीड़से दूर जा बैठे और भोजन त्यागकर केवल जप पंन्त हुए एकाग्र मनसे तपस्या करने लगे। सारे संसारके साक्षी तथा निमित्त जाननेके प्रभु रामचन्द्रसे यह बात छिपी नहीं रही ॥ ११९॥ १२०॥ नवें दिन उन्होंने अपनी सभामें उनको दर्शन देनेके विषयमं मन्त्रणा की ॥ १२१॥ इसके बाद क्षण भर अपने मनमें विचार किया कि यदि उनको एक ही समयमें दर्शन न दूंगा तो वे सन्तुष्ट नहीं होंगे ॥ १२२॥ इस कारण आज मैं नौ रूप धारण करूँगा। ऐसा निश्चय करके उन्होंने लक्ष्मणसे सादरपूर्वक कहा- ॥ १२३॥
हे लक्ष्मण ! पालकी मँगाओ। आज मैं बाहर घूमने जाऊँगा बहुत अच्छा कह तथा दूतों द्वारा लक्ष्मणने पालकी मँगवाकर रामचन्द्रजीको इसकी खबर दी तब सिंहासनसे उतरकर राम पालकी में बैठे और भाईयों, मन्त्रियों, सम्बन्धियों तथा मित्रोंके साथ धीरे धीरे अयोध्यासे बाहर निकले ॥ १२४-१२६ ॥ उस विशाल भीडको पार करके रामचन्द्रने नौ रूप धारण किया ॥ १२७॥ क्षण भरके भीतर रामने पालकी, सम्बन्धों, सब भाई, दूत तथा वाहन समेत सब मित्रोंको नौ रूपमें परिणत कर दिया ॥ १२८॥ केवल अपने तथा अपने साथियों ही की उन्होंने नौ संख्या नहीं बनायी, बल्कि जो लोग वहाँ दर्शन करने आये थे, उनको भी उन्होंने नौ संख्यामें विभक्त कर दिया। यह एक विचित्र बात हुई। १२९ ॥ इसके अनन्तर उन बन्धुओं, मित्रो दूतों, बन्धुजनों तथा ब्राह्मणोंसे आगे-आगे रामचन्द्रजी चलने लगे। १३० । फिर क्या था, उन नवों ब्राह्मणोंने एक ही समयमें प्रभुको अपने-अपने आगे खड़े देखा ॥ १३१ ॥ इससे प्रसन्न होकर उन्होंने रामको प्रणाम किया। इसके बाद वे नवों राम अपनी-अपनी पालकियोंसे उतरे और उन ब्राह्मणोंको गलेसे लगाया। फिर मीठी-मीठी वाणीमें उनसे बोले ॥ १३२ ॥ १३३ ॥ उन्होंने कहा-हे ब्राह्मणों ! आप लोगोंने बड़ा कष्ट किया है।
५८४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३
भो विप्राः श्रमित्वा यूयं युष्माकं कृतनिश्चयम्। बुद्ध्वा वयं पृथक् रूपैर्जाताः स्मो नवधाऽद्य हि ॥२३४॥ एकाकालेऽत्र तपसां सर्वेषां दर्शनं निजम्। कस्य देयं तु पूर्वं हि पश्चात्कस्य प्रदीयताम् ॥२३५॥ इति सम्मन्त्र्य हृदयेन स्वयंकसमयेन हि। युष्माकं दर्शनं दत्तं वरप्यर्थं वरानितः ॥२३६॥ रामाणां वचनं श्रुत्वा ते प्रोचुर्भूसुरोत्तमाः। येनास्माकं भवेत्कीर्तिः स वरो दीयतां तु नः ॥२३७। तेषां वचनं श्रुत्वा रामाः प्रोचुर्द्विजान्पुनः। युष्माकं दर्शनार्थं हि नवरूपधरा वयम् ॥२३८॥ अद्य जाता यतस्तस्माद्युष्माकं नामभिः सदा। नव रामाः परा ख्यातिं गमिष्यन्त्यवनीतले ॥२३९॥ अस्माकं नव यत्किञ्चित्प्रियं हि भविष्यति। ते तेषां तु रामाणां वाक्यं श्रुत्वा द्विजोत्तमाः ॥२४०॥ सन्तुष्टस्ते नता नेमुः स्वं स्वं रामं मुहुर्मुहुः। तदा सर्वे जना रामान् लक्ष्मणान् भरतादिकान्॥२४१। आत्मानं नवधा जातान्दृष्ट्वा विस्मयमागताः। ततो रामाः शिविकासु स्थित्वा पृष्ट्वा द्विजोत्तमान्॥२४२॥ पश्यान्त्य ययुः सर्वे मार्गे त्वेकोऽभवन्पुनः। सर्वे जातास्त्वेकदापस्तथा ते विस्मयं ययुः । २४३ । ततो रामो बन्धुभिश्च पूर्ववन्नगरीं ययौ। गत्वा गेहे तु सीतायै सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥२४४। अतस्ते नव विप्राणां नामभिर्जगतीतले । ख्यातिं रामा यपुस्तत्र नव यच्च तप्रियम्।२४५॥ यथार्का द्वादश प्रोक्ता एकविंशद्गणाधिपः। रुद्रा एकादश प्रोक्ता यथाष्ट भैरवाः स्मृताः ॥२४६। नव दुर्गा यथा त्वत्र तथा रामा नव स्मृताः। प्रियं द्वादश सूर्याय एकादश शिवप्रियम् ॥२४७॥ एकविंशत्प्रियं यद्गगणेशाय महात्मने। प्रियमष्ट भैरवाय दुर्गायै तु नव प्रियम् ॥२४८॥ यथा यथाऽत्र रामाय नव शिष्य प्रियं सदा। तस्मान्नवविधेः पुष्पैर्गङ्गलिस्तत्प्रियो मतः ॥२४९॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे मनोहरकांडे रामपूजावृत्तविस्तारो नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥
आपके कष्टको देखकर ही मैं अलग-अलग रूप धारण करके एक ही समयमें सबके समक्ष आया हूँ ॥ २३४ ॥ मैंने अपने मनमें सोचा कि ये सब भाई एक साथ एक ही समयमें तपस्या करने वाले हैं, ऐसी अवस्थामें मैं किसे पहले दर्शन दूँ और किसे पीछे ॥ २३५ ॥ यह विचारकर मैंने आज एक ही समय तुम लोगोंको दर्शन दिया है। अब अपने इच्छानुसार वर भी मांग लो । २३६। उनकी वाणी सुनकर ब्राह्मणोंने कहा—हे प्रभो ! जिससे संसारमें हमारी कीर्ति हो, हमें आप वही वरदान दीजिये ॥ २३७। इस तरह उनकी बात सुनकर रामने उन ब्राह्मणोंसे कहा कि आप लोगोंको दर्शन देनेके लिये मैंने नौ रूप धारण किया है। अतएव आप लोगोंके नामसे ही मैं नौ रामके नामसे विख्यात होऊँगा । २३८ ॥ २३९ ॥ जो कोई भी नौ चीजें मुझे देगा, वे हमें अतिशय प्रिय होंगी। इस तरह उनका बात सुनकर प्रसन्न मनसे उन ब्राह्मणोंने बार-बार रामको प्रणाम किया । उधर रामके साथवाले लक्ष्मण भरत आदि लोग अपनेको नौ रूपवाले देखकर बड़े चकराये । तदनन्तर वे सब राम पालकियोंमें बैठे और उन ब्राह्मणोंसे पूछकर अयोध्याके लिये लौट पड़े । २४०-२४२ । रास्तेमें रामने उन नवों रामोंका रूप समट लिया और फिर ज्योंके त्यों एक राम हो गये। यह घटना देखकर भी लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ २४३ ॥ इस तरह राम अपने बान्धवोंके साथ नगरीको गये। घर पहुंचकर उन्होंने सीताको उस दिनका सारा समाचार कह सुनाया ॥२४४॥ हे शिष्या ! इसी कारण राम उन नौ नामोंसे विख्यात हुए और जो-जो चीजें नौ संख्याकी दी जाती हैं, वे उन्हें विशेष प्रिय हुआ करती हैं। २४५ ॥ जैसे बारह आदित्य माने गये हैं इक्कीस गणेशजी, ग्यारह रुद्र, आठ भैरव तथा नौ दुर्गायें मानी गयी हैं, उसी तरह राम भी नौ माने जाते हैं ॥ २४६ ॥ बारह सङ्ख्याकी चीजें सूर्यको, एक इससङ्ख्यक रुद्रको, इक्कीस गणेशजीको, आठ भैरवको और नौ वस्तुयें दुर्गाको प्रिय होती हैं ॥ २४७ ॥ २४८॥, इसी तरह जो चीजें नौ होंगी, रामको अत्यंत प्रिय हुआ करेंगी। इसलिये नौ प्रकारके फूलोंसे अञ्जलीदानका विधान मैंने बतलाया है ॥ २४९ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे ज्योत्स्ना भाषाटीकासहिते मनोहरकांडे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥
सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ५८५
सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ५८५
चतुर्थः सर्गः
( लघुरामोतोभद्रका विस्तार )
श्रीविष्णुदास उवाच
स्वामिंस्त्वया रामनाम्नामष्टोत्तरसहस्रकम् । भद्रमुक्तं तथा चाष्टोत्तरशतमनुत्तमम् ॥ १ ॥
रामनाम्नां भद्रमुक्तं रामचन्द्रप्रपूजने । तत्कीदृशे ते तु भद्रे लेखनीये मनोरमे ॥ २ ॥
ते मां विस्तरतो ब्रूहि यथाऽहं वेद्मि तत्त्वतः । तयोर्ये ये विशेषाश्च भद्रयोस्तेऽपि मां वद ॥ ३ ॥
श्रीरामदास उवाच
शृणु शिष्य प्रवक्ष्यामि भद्राणां रचनाः शुभाः । यथा पृष्टा त्वया मह्यं रामनाम्नां मनोहराः ॥ ४ ॥
अष्टोत्तरशतं रामलिङ्गतोभद्रमुत्तमम् । आदौ मया विस्तरेण कथ्यते तन्निशामय ॥ ५ ॥
अत्रोपास्या राममुद्रा रुद्रश्चोपासकः स्मृतः । श्रीरामालिङ्गतोभद्रमत एतौच्यते बुधैः ॥ ६ ॥
तिर्यगूर्ध्वे वदा रेखा द्वे शते रेखयाधिके । तत्रादौ कृष्णपरिधिस्ततो रक्तः सितस्ततः ॥ ७ ॥
ततः पीतश्च परिधि कोणेन्दुस्त्रिपदः स्मृतः । चन्द्राग्रे शृङ्खला कृष्णा स्मृता द्वादशपादिका ॥ ८ ॥
हरिता च ततो वल्ली त्रयोविंशत्यदात्मिका । ततः पीता शृङ्खला च स्मृता द्वादशपादिका ॥ ९ ॥
विंशत्पादभवं भद्रं रक्तं वापी सिता ततः । त्रयोदशपदा ज्ञेया लिंगं षड्विंशपादजम् ॥ १० ॥
कृष्णाश्चतुष्पदो मूर्द्धा नाभिर्युग्मपदः स्मृतः । मूलस्कन्धौ षट्पदजौ पार्श्वं तुर्यपदात्मके ॥ ११ ॥
ततो रक्तश्च परिधिर्मर्यादाख्योऽर्कपादजः । ततो मुद्रा तुर्यतुर्यभूमियादमिता स्मृता ॥ १२ ॥
ततो मर्यादापरिधिर्लिंगमुद्राः पुनः पुनः । एवं हरा नव ज्ञेया मुद्राश्चाष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ १३ ॥
परिधयः षोडशैव हान्ते लिंगोर्ध्वपार्श्वके । निर्णेयं भद्रं नवपदैः पीतं वा हरितं क्वचित् ॥ १४ ॥
रक्तभद्रोर्ध्वतः शेषपदानि यानि सन्ति हि । पयेच्छ विचित्ररङ्गैश्च शृङ्खलार्थं नियोजयेत् ॥ १५ ॥
विष्णुदासने कहा—हे स्वामिन् ! आपने हमें रामनामका अष्टोत्तर सहस्रका भद्र ( आसन ) और अष्टोत्तरशत नामका भद्र रामचन्द्रकी पूजाके प्रसङ्गमें बतलाया है। उन भद्रोंको किस प्रकार बनाना चाहिए, यह हमें विस्तारपूर्वक बतलाइए। जिससे कि मैं ठीक तरहसे समझ सकूँ। उनकी जो विशेषतायें हों सो भी हमें बतला दीजिए। १-३॥ श्रीरामदास बोले—हे शिष्य ! उन भद्रोंकी रचनाका प्रकार जिस तरह तुमने पूछा है, सो मैं पहले अष्टात्तरशत रामलिङ्गतोभद्रका रचनाप्रकार विस्तारपूर्वक बतला रहा हूँ, सुनो ॥ ४ । ५ ॥ इसमें राममुद्रा उपास्य है और रुद्र उपासक हैं। इसी कारण लोग इसे रामलिङ्गतोभद्र कहते हैं ॥ ६ ॥ वह भद्र बनानेवालेको चाहिए कि सीधी और बंदी दो सौ रेखाएँ खींचे। उसमें पहलेकी परिधि काली, फिर लाल, फिर सफेद रक्वे ॥ ७ ॥ इसके बादकी परिधि पीली और फिर कोणमें त्रिपद चन्द्रका आकार बनाये। चन्द्रमाके आगे काले रङ्गकी ऐसी शृङ्खला बनाये, जिसमें द्वादश पाद ( कोष्ठक ) विद्यमान हों। फिर हरे रङ्गकी तेईस पदकी वल्ली बनाये। फिर द्वादश पदकी पीली शृङ्खला रक्खे ॥ ८ ॥ ९ ॥ फिर बीस पादका भद्र बनाये। तदनन्तर सफेद रङ्गकी वापिका निर्माण करे। जिसके तेईस पाद बने हों। फिर छब्बीस पादका लिंग बनाये फिर चार पाद । कोष्ठक का काले रङ्गने मस्तक बनाये, फिर दो पादकी नाभि बनाये। उसके दो मूल स्कन्ध छः छः पादोंके बनाये और चार पादका पार्श्वभाग बनाये। फिर बारह पादकी मर्यादा बनाये, जो लाल रङ्गसे रही हो। फिर चार-चार पादोंकी मुद्रा बनाये। फिर मर्यादाकी परिधि एवं लिङ्गामुद्रा बनाये। इसी तरह नौ शिव एवं आठ मुद्रायें बनाये ॥ १०-१३ ॥ फिर लिंगके ऊपर और बगलमें सोलह परिधियोंकी रचना करे। फिर नौ पादका कहीं पीले और कहीं हरे रङ्गके भद्र बनावे ॥ १४ । रक्त भद्रके ऊपर जितने भी चरण हों, उनकी शृङ्खलाके लिए चित्र-
| ५८४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ४ |
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मध्यलिङ्गोर्ध्वयोश्च सिते नेत्रे स्मृते शुभे। पीते लिङ्गस्कंधयोध शृंखले त्रित्रिपादजे ॥१६॥ अधोमुख हरौर्ध्वं च रक्तं भद्रं द्विपट्पदम्। तिर्यग्भद्रं तु हरिते स्मृतेऽष्टादशपादजे ॥१७॥ अतः पंक्तेरूर्ध्वभागे हरितः परिधिः स्मृतः। तत ऊर्ध्वं पीतवर्णः प्रोक्तश्च परिधिः शुभः । १८ । एव प्रोक्ता प्रथमेयं पंक्तिः सर्वत्र कारयेत्। द्वितीयाया विशेषं च वक्ष्यामि न पुरेतिवत् ॥१९॥ सप्त मुद्रा हश क्षांश परिधयश्चतुर्दश । भद्रं रक्तं षट्पदं च शेषं सर्वं तु पूर्ववत् ॥२०। तृतीयायांततः पंक्तौ मुद्राः पञ्च शिवा रसाः । परिधयो दश ज्ञेया भद्रं त्रिंशत्पदान्मकम् ॥२१,। अतः पंक्तौ चतुर्थ्यां तु त्रीशा मुद्रापतुष्टयम् । परिधयोऽष्ट विज्ञेया भद्रं च नव वेदजम् ॥२२। हरिपीतयोर्मध्ये हि लोहितः परिधिः स्मृतः । पञ्चमायां ततः पंक्तौ मुद्रैका शङ्करद्वयम् ।२३॥ परिधयश्च चत्वारि भद्रं नवतिपादजम् । हरिद्रारक्तपीतवर्णा परिधयश्च पूर्ववत् ॥२४॥ षष्ठयां च ततः पंक्तौ मुद्रैका परिधिद्वयम्। नव वेदमदं भद्रं लिङ्गः परिधयोऽपि च ।२५॥ मध्येऽपि सर्वतोभद्रं वेदनेत्राग्निपादजम् । शिवदत्तुः शृंखलाश्च कृष्णाः पञ्चपदा मताः । २६।। एकादशपदा वल्ली भद्रं नवपदान्मकम् । चतुर्विंशत्पदा वापी पीतश्च परिधिः स्मृतः ॥२७॥ पदेषु षोडशेष्वेव मध्ये पद्मं यथारुचि । कर्णिका पीतवर्णा च शेषं शुद्धया नियोजयेत् ॥२८॥ एतदष्टोत्तरशतं रामलिंगात्मकं स्मृतम् । तत्र मुद्रास्वरूपं च वेदवेदैर्दुभिः स्मृतम् । २९॥ राज्यकाण्डे उत्तरार्धस्य सर्गेऽष्टादशमे पुरा। उक्तं मुद्रास्वरूपं च तथाप्यत्र तु कथ्यते ॥३०॥ पंक्तयोऽर्केमितास्तत्र सर्वा द्वादशपादजाः । तासु पूर्वदिगारभ्य क्रमेणैव प्रपूरयेत् ॥३१॥ प्रथमा सप्तमी चोभे पंक्ती कृष्णे प्रपूरयेत् । ऊर्ध्वाधः पञ्च पञ्चैव पंक्तयस्तत्क्रमं ब्रुवे ॥३२॥ पंचपंक्तिषु चोध्वं हि प्रथमायाः प्रपूरयेत्। प्रथमं चेन्द्रदिग्भागं च कृष्णवर्णं न चापरम् ॥३३॥
विचित्र वर्णोंका बनाये ॥ १५ ॥ मध्यलिङ्गके दोनों कन्धोंपर सफेद रङ्गके दो नेत्र रहें। लिङ्गके स्कन्धमें पीले रङ्गकी तीन-तीन पादोंवाली दो शृङ्खलाएँ रहें ॥ १६ ॥ शिवके ऊपर अधोमुखके ऊपर आठ पाद (कोष्ठक) से लाल रङ्गका भाग रहेगा। अष्टादश पादका तिरछा भद्र हरे रङ्गसे बनेगा। १७॥ पंक्तिके ऊर्ध्वभागमें हरे रङ्गकी परिधि रहेगी। उसके ऊपर पीले वर्णकी परिधि रहेगी ॥ १८ । उक्त रीतिसे प्रथम पंक्ति बनायी जायगी। अब दूसरी पंक्तिकी विशेषताएँ बतलाता हूँ, जो पहले नहीं बतलायी थीं ॥ १९॥ दूसरी पंक्तिमें सात मुद्रा, आठ शिव एवं चौदह परिधियाँ रहेंगी। यह भद्र छः पदोंवाला एवं लाल रङ्गका रहेगा और तीस पादका भद्र बनेगा । २० ॥ २१॥ चौथी पंक्तिमें तीन शिव, चार मुद्रा, आठ परिधियाँ और चार पादका भद्र बनेगा ॥ २२ ॥ हरे-पीतके मध्यमें लाल रङ्गकी परिधि रहेगी। पाँचवीं पंक्तिमें एक मुद्रा रहेगी और दो शिव रहेंगे ॥ २३ ॥ चार परिधि रहेगी और नव्वे पादका भद्र बनेगा। बाकी हरे-लाल-पीले वर्णकी परिधियाँ पूर्ववत् रहेंगी ॥ २४ ॥ छठवीं पंक्तिमें एक मुद्रा, दो परिधि, चार पादकी नौ और सोलह परिधियाँ रहेंगी ॥ २५ ॥ मध्यमे तीन सौ चोत्रीस पादका सर्वतोभद्र रहेगा, तीन पादकी चन्द्राकार शृङ्खला रहेगी और पाँच पादकी कृष्ण बल्लियाँ रहेंगी ॥ २६ । इसमे एकादश पादकी वल्ली रहेगी और नौ पादका भद्र रहेगा। चौबीस पादकी बापी रहेगी और वह पीले रङ्गकी रहेगी ॥ २७॥ सोलह पादोंके बीचमें अपनी पसन्दके माफिक कमल रहेगा। उसकी कर्णिकाएं पीले रङ्गकी होंगी। बाकी सब अवयव अपनी रुचिके अनुसार होंगे । २८॥ यह सैन अष्टोत्तरशत रामलिंगात्मक बतलाया है इसमें मुद्राका स्वरूप १४४ रहेगा ॥ २९ । यद्यपि राज्यकाण्डके उत्तरार्द्ध भागके अट्ठारहवें सर्गमें कह आये हैं फिर भी मुद्राका स्वरूप यहाँ बतला रहे हैं ॥ ३०॥ इसमे कुल बारह पंक्तियाँ होती हैं और हर पंक्तियोंमें बारह पाद (कोठे) होते हैं। पूर्व दिशासे आरम्भ करके उन्हें पूर्ण करना चाहिए ॥ ३१। पहली और सातवीं पंक्ति काले रङ्गसे रंगी रहनी चाहिए। ऊपर-नीचे पाँच-पाँच पंक्तियाँ रहेंगी। उनका क्रम बतलाते हैं ॥ ३२ ॥ ऊपरकी पाँच
सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ५८७
तदधश्च द्वितीयायाः प्रथमं च द्वितीयकम् चतुर्थं सप्तमं षष्ठं अष्टमं नाम तथा ॥३४॥
तथैकादशमं चापि कृष्णवर्णानि पूरयेत् तदधश्च तृतीयायाश्चतुर्थं पञ्चममे ॥३५॥
तथैकादशमं चापि कृष्णवर्णानि पूरयेत् । चतुर्थ्याश्च द्वावक्षणि प्रथमं च द्वितीयकम् ॥३६॥
चतुर्थं सप्तमं यत्र नवमं रुद्रसंमितम् तदधः पञ्चमायाश्च चतुर्थं च द्वितीयकम् ॥३७॥
चतुर्थं च तथा षष्ठ नवमैकादशे तथा । एतानि कज्जलैः शुक्लैर्द्रव्यैः पत्रपंक्तिषु ॥३८॥
पञ्चपंक्तिष्वधश्चाथ प्रथमायाश्च पूर्ववत् । तदधश्च द्वितीयायाः प्रथमं न द्वितीयकम् । ३९॥
चतुर्थं सप्तमं षष्ठं नवमं दशमं ततः । तथा चैकादशमं कृष्णवर्णानि पूरयेत् । ४०॥
तृतीयायाश्चतुर्थं च षष्ठमकं च सप्तमम् । चतुर्थ्याः प्रथमं षष्ठ द्वितीयं च चतुर्थकम् ॥४१॥
अष्टमं नवमं चाकं दशमं चापि पूरयेत् पञ्चम याः प्रथमं च द्वितीयं च चतुर्थकम् ॥४२॥
षष्ठमष्टममं चापि सप्तमं दशमं तथा । नवमं कृष्णवर्णानि रामेति द्वेऽक्षलाकयेत् ॥४३॥
राजा रामेति नाम्नानि बहुवर्णानि निर्दिशेत् अन्यथ राजनारायण युनङ्गा काण्डैर नरः ।४४।
अथवा राम रामेति तृतीयं नाम कारयेत् । विधानं तत्र वक्ष्यामि यथाः पञ्चसु पंक्तिषु ॥४५॥
पंक्तेश्चतुर्थ्याः प्रथमं पदं कृष्णेन कल्पयेत् । नाकारान्तं तु द्रष्टव्या रामनामवलोकयेत् ॥४६॥
अथवा राम रामेति विशेषोथोथवर्णवत् । प्रथमा पूर्ववज्ज्ञेया द्वितीयायास्ततः परम् । ४७ ।
प्रथमं च द्वितीयं च तृतीयं पञ्चमं तथा । अष्टमं नवमं षष्ठं तथैकादशमं तथा । ४८।
तृतीयायाश्च प्रथमं रुद्रं षष्ठं च सप्तमम् । चतुर्थ्याः प्रथमं चैव द्वितीयं च तृतायकम् ।४९।
पञ्चमं सप्तमं चापि तथैव नवमं तथा । तथैकादशमं चापि कृष्णवर्णानि पूरयेत् ५०॥
पञ्चमायाः प्रथमं च द्वितीयं च तृतायकम् । पञ्चमं सप्तमं षष्ठं अष्टमं नवमं तथा । ५१॥
तथैकादशमं चापि वर्णानि द्वेऽक्षरं मित । नामान्तरानि सर्वाणि चतुर्धाऽत्र योजयेत् । ५२।
पंक्तियों भरे और पहला तथा ईशानय उनके ... ॥ ३३ । उसके नीचे दूसरी पंक्ति के पहिले, दूसरे, चौथे, छठवें, सातवें, आठवें तथा ग्यारहवें कोष्ठक काले रंग से भरे। उसके नीचे तीसरी का चौथा, छठा सातवां और ग्यारहवें को ... दूसरा, चौथा, सातवां, नवां और ग्यारहवां कोष्ठक को भरे ... दूसरा, चौथा, छठां, नवां और ग्यारहवां कोष्ठक को भरे ... पाँचों पंक्ति में 'राम राजा' यह दो अक्षर सुन्दर देखने के दर्शन चाहिए। ३४-३८ ॥ ... कोष्ठकों को पूर्ववत् रक्खे उनके नीचे दूसरी पंक्ति का पहला, दूसरा, चौथा, सातवां, छठवां, नवां, दशवां और ग्यारहवां कोष्ठक काले रंग से भरे ॥ ३९ ॥ ४० ॥ तीसरी पंक्ति का चौथा, छठा, बारहवां तथा सातवां कोष्ठक पूर्ववत् रक्खे । चौथी पंक्ति का प्रथम, दूसरा, चौथा, छठां, ग्यारहवां, आठवां, नवमं, दशमं और तीसरे कोष्ठक को काले रंग से भरे । जिससे 'राम' यह दो अक्षर साफ दिखाई दें ... इसमें 'राजाराम' यह चार अक्षर दिखलाई देने लगे । अपने बुद्धि से इसमें ... कर सकते हैं। अथवा राम राम राम इन तीनों नामों की कल्पना करे । ... । ४४ ॥ ४५ ॥ चौथी पंक्ति का पहला कोष्ठक काले रंग से पूरा ... और 'राम' यह साफ साफ मालूम पड़ने लगे ॥ ४६ ॥ अथवा ... पहली पंक्ति पूर्ववत् रहेगा । इसके बाद दूसरी पंक्ति के पहिले, दूसरे, तीसरे, पांचवें, आठवें, नवें, छठवें तथा ग्यारहवें कोष्ठक, तीसरी पंक्ति का पहला, बारहवां, छठा, सातवां, चौथी पंक्ति का पहला, दूसरा, तीसरा, पाँचवां, सातवां, आठवां, नवाँ तथा ग्यारहवां कोष्ठक कृष्णवर्ण से भर दे । ४७-५० ॥ पञ्चम पंक्ति का पहला, दूसरा, तीसरा, पाँचवां, छठां, सातवाँ, नवां तथा ग्यारहवां कोष्ठक भी काले रंग से भर दे । ऐसा करने से
६८८ आनन्दरामायणे [सर्गः ४
तद्युङ्मुद्रान्वितं रामलिङ्गाख्यं भद्रमुच्यते महा शिष्याधुना तन्मे शृणुष्वैकाग्रमानसः ॥५३॥ तिर्यगूर्ध्वमेकपञ्चाशद्रेखास्तत्पदगेषु च । सप्त सप्तपदा ने द्वौ परिधी पीतवर्णके ॥५४॥ कार्यो तत्र कोणदेशेबिन्दुश्चित्पदशुक्लतः । शृङ्खलैकपदा कृष्णा त्रयोदशपदा लता ॥५५॥ हरिनेत्रो वसुपदः कृष्णवर्णा प्रकल्पयेत् । विपरं कोणिनं कार्यं भद्रं वल्ल्यग्निकल्पितम् ॥५६॥ षष्टिपादात्मिका मुद्रा सर्वतोऽष्टदिकेष्वथ । त्यक्त्वा पक्तिकोणकोष्ठं मिथुनेऽग्नितस्तथा ॥५७॥ मिथुनं'क्तां च सप्तायाः पक्तेः षट् स्वयः । मतिगा पूरयेत्त्र मति रामेति सप्तकम् ॥५८॥ तत्रादावग्निमुद्रा स्यात्समीवापस्थित्यनन्तरम् । कलिङ्गद्वयं मद तथा लिङ्गोपरि स्थितम् ॥५९॥ पदद्वयं पीतवर्णं वीथीवल्ल्या नियोजयेत् द्वितीये त्वेकमुद्रा द्वे परिधी द्वौ शिवौ मतं । ६०॥ भद्रं नवपदं लिङ्गस्कन्धेऽप्यर्थे रमाष्टकम् । भद्रं शान लिङ्गोपरि रक्तं नृपपदन्तकम् ॥६१॥ लिङ्गस्कन्धपदं द्वे द्वे द्वारते वीथिकाऽपि च । भद्राणि तीणिक्षेत्राणि पाद द्वे लोहितेऽत्र हि । ६२. मनोऽन्तः गर्वतोभद्रं कार्यं तत्र तु वापिका । चतुविंशत्पदं भद्रमकंकं तु लते मिते । ६३। त्रिषदोऽब्जः पञ्चपदा शृंखला परिधिस्ततः । मध्ये पद्मं रक्तवर्णं रचयेद्वा विचित्रितम् ॥६४ पीतशुक्लरक्तकृष्णाश्चतस्रो परिधयो मताः । एतत्पोटमुद्राभि र्ममलिङ्गख्यभद्रकम् ६५ सदानन्दमयं रामं चिज्ज्योतिषमनामयम् । सर्वावभासकं नित्यं स्वान्तस्थं समुपास्महे ॥६६। चन्द्रकलं रामलिङ्गतोभद्रं यद्विरुचेऽस्तु । निर्विकारं नास्ति यस्मिन्विवेकः सावधिष्यते ॥६७ कल्पितः स नरो राजा रामलिङ्गायुतः स्मृतः । रामगात्रम् इत्युक्तो योगिगम्यं परं महः ॥६८। लीयन्ते यत्र भूतानि निर्गच्छन्ति यतः पुनः । तेन चित्रं परं व्योमेत्युक्तं ब्रह्मविदुत्तमैः ॥६९
"राम" ये दो अक्षर सप्तर रखना लगे । इन चारों नमोका चारा अंग १६ ५२ । ५२ हे शिष्य अब सपुङ्काकित रामलिङ्गातोभद्र बतलाता हूँ सान सावधान होकर सुनो ५३ । खड़ी और पड़ा ५१ रेखा खींचा। उनके सात सात कनाम दल तथा दो परिधियाँ बनाये । ५४ ॥ बाणभयभ तीन काकोनि स्पद रक्त दो इन्दु बनावे । छः कलावा एक शृंखला और तेरह क कोष्टोंकी लता बनावे ५५ ॥ आठ पादका हर रंगका शिव बनावे। लायरङ्गकी षट्कोण वास हो तीन पादका भद्र बनावे ॥ ५६ ॥ साठ पादकी मुद्रा और चन्द्रमाबाकी गणना रखना ६० क कान और १२ पादका भद्र छोड़कर क्षार बतलायी गयी मुद्रा गणना चाहिये। इसके अनन्तर सबने वामपद तथारे बाणकाणा क? स्याहीस भर दे हो 'राम' ऐसा स्पष्ट दिखायी देने लगेगा । ५७ ॥ ५८ एक अष्ट दिक अग्निमुद्रा और इसको बाकी परिधियां सात रङ्गस रंगा। इन कोणोंके भद्र तथा लिङ्गके ऊपर शिव दोनों याद पञ्चवर्णम विनियहिये । इसम बाई वल्ला तथा वीथियां बनाने चाहिये । दूसरे म एक मुद्रा, दो परिधि दो शिव नौ पादका भद्र, लिंग और पंकिक मध्यम छः भद्र बनावे लिङ्ग इश्र्वारा षट् पाल रङ्गका हो और चार काष्ठशको लाल रङ्गस रग्ना चाहिये ॥ ५९-६१ ॥ लिकक स्कन्धपर्यन्त नाना हर एकएक भद्र रक्खे ओर वापर्दा दूरं ह? बह्रर्क. रक्खे । यहाँपर तीन भद्र रङ्ग, एक दीक्षा ओर दो दाण । ऊपर मध्यभागमें सर्वतोभद्र बनगा। जिसमे चौबीस स्थान रहेंगे, नौ कोष्टकोकी लता बनोगी और शिव भी बनेगे । ६२ । तीन पादक अब्ज (कमल) ओर पाँच पा की शृङ्खला और परिधि रहेगा । मध्यम रङ्गवल या कई रङ्गक कमल बनावे ॥ ६३ । ६४ ॥ इसके अन्तमे पील, सफेद, लाल और काले रङ्गकी परिधि रहेगी। इन पोषश मुद्राओंस रामलिङ्गतोभद्र बनता है। ६५ ॥ सदा आनन्दमय, चिन् ज्योतिष्य, व्याधिरहित और सबके अवभासक, ऐसे अपना बा रूपमा रामकी मै उपासना करता हूँ । ६६ । सोलह कलाओका यह रामलिङ्गातोभद्र जों मैने बतलाया है वह विचारविहीन नहीं है उसमे जा विचार है, अब उसकी विवेचना करते है । ६७। राजाराम इस चिह्नका निर्माण करने- वाला मनुष्य धन्य है। सब लीपोकी अनन्द दास कारण रामका "राम" यह नाम पड़ा है। योगीजनोको ही विति अवगत है उसका सर्वोत्कृष्ट रूप है । ६८ ॥ उन्हीमे संसारके सब प्राणी लोन होते है और फिर
सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ५८९
सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ५८९
लिङ्ग्यते चिन्त्यते येन भावेन भगवान् शिवः । लिङ्गरूपं स रामेति लिंगं चेति द्विनामकृत् ॥७०॥ बहूनि सन्ति नामानि रामेशस्य महात्मनः । रजांसि गणयेत्कोऽपि मूर्तेर्नावाखिलेशितुः ॥७१॥ तस्मिन्सर्वतोभद्रं हृदयं तन्प्रकीर्तितम् । तत्र पद्ममष्टदलं सकेसरमकणिकम् ॥७२॥ तन्मूर्त्यानं रामलिङ्गस्य ध्यानार्थं परिकल्पितम् । अन्यथा सर्वगण्यास्य कथं देशादिभेदता ॥७३॥ दिव्यैर्पातः परमात्मार्थं स्वमाययावशंगतः । धर्मार्थकाममोक्षार्थं सृष्ट्युपाधिं प्रविष्टवान् ॥७४॥ तस्य चैतन्यचन्द्रस्य षोडशैताः कलाः पराः । चित्प्रकाशा द्वयाभूता घटं दीपेन्द्रियादिवत् । ७५॥ प्रकाशयन्ति गृह्णन्ति सृजन्ति चम्प्रसारत' बुद्धिमन्मात्रमेतस्मिन् संभिकृष्टा श्चित्रम्मनः ॥७६॥ अतो ज्ञानप्रधाना मा नज्ज्ञानं चतुरो दरा प्रमत्तं मत्तप्रच्छादान् ज्ञानान् सुन्दरोदराः ॥७७॥ चतुर्दा वृत्तिभेदेन प्रोक्ता तत्त्वार्थदर्शिभि प्रयोजनं न तेनात्र प्रकृतं नाद्रविष्यते ॥७८॥ क्रियाप्रधानः प्राणश्च पञ्चधाऽसौ व्यवस्थितः । प्राणापानौ तथा व्यानः समानोदानकस्त्विति ॥७९॥ वागादिकर्मेन्द्रियेषु क्रिया प्राणाश्रया मता श्रोत्रं नयनं घ्राणं स्पर्शनेन्द्रियं तथा ॥८०॥ पञ्चैतानि चेन्द्रियाणि ज्ञानद्वाराणि वै विदुः । वाक्पाणिपादपायूपस्थानि कर्मेन्द्रियाणि च ॥८१॥ एव षोडशसङ्ख्यानं कलानामुच्यते बुधैः । तासु सर्वासु चैतन्यं रामनाथेति विश्रुतम् ॥८२॥ प्रविष्टं टीप्पने प्रज्ञाचेन विश्वं विचेष्टते । अनादिगगनावृत्तः कर्मनूरुफलात्मकः ॥८३॥ देहाभिमानिनो जीवाः फलभागाव पक्षिणः । यथारूपं सुखं दुःखं खादन्ति स्वस्वार्गपतम् ॥८४॥ कश्चिज्जन्मसहस्रेषु ज्ञानवान् जयते यदा । तदान्तस्थं रामरूपं ज्ञात्वा मोक्षी भवत्यलम् ॥८५॥
उन्मूलनमा प्रविर्भूत होते हैं। इसी कारण ऋचाओं ने आकाश के आगान इस परम व्योम कहा है ॥ ६९ ॥ जिस भावसे भगवान् शिवकी पूजा की जाती है, वे ही रूप शिव और राम इन दो नामोसे पुकार जात हैं ॥ ७० ॥ उन महात्मा रामके बहुतसे नाम हैं। सत्र रचना के सं प्राणी पृथ्वीके रजकणोंको भले ही गिन ले । किन्तु भगवान्के नामोंकी गणना कोई भी नहीं कर सकता ॥ ७१ ॥ उसमें जो सर्वतोभद्र है, वही हृदय जानना चाहिए । उसमें आठ पत्तोंका केशर और पखुड़ियों युक्त जो कमल है, वह रामके लिङ्गका ध्यान करनेके लिए ही बनाया जाता है। नहीं तो सर्वव्यापी अभेद इस देशदिनदता किस प्रकार मानी जाती ॥ ७२ ॥ ७३ । चिज्ज्योतिमंय वे परमात्मा अपनी मायाके वशीभूत होकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इस चतुर्वर्गको साधन करनेके लिए ही समागम आये थे ॥ ७४ ॥ उस चैतन्य चन्द्रमा षोडश कलाएं सर्वश्रेष्ठ मानी गयी हैं वे संसारको स्व वन्धुआप चित्प्रकाश करते हैं ॥ ७५ ॥ । वे स्वभावसे ही सबका प्रकाशित करते, समय पड़नेपर फिर आह दबा ओर कमा कता सिर अण्डम नष्ट लिया करता है। पचित आत्मावालाक लिए बुद्धिमात्र कला हैं ओर वह तबक पास रहती है ॥ ७६ ॥ इससे यह वस्तु बुद्धि रहित रही ज्ञानप्रधान मानी जाती है। वह शब्दस्पर्शाय संसारके चेह हुए उपाय का अच्छी तरह जानता है ॥ ७७ ॥ यह वृत्तिभेदसे चार प्रकारका मानी गयी है। यहाँ उसके विषयमे विशेष विवेचनकी काई आवश्यकता नहीं बान पड़ती । अतएव इस विषयमे वास्तविक विवेचना करत हैं ॥ ७८ । अपनी वृत्तिके अनुसार प्राणक्रिया प्रधान मानी जाती है ओर इसके पाँच भेद है-प्राण, अपान, व्यान, समान तथा उदान ॥ ७९ ॥ वाक् आदि कर्मेन्द्रियों की सारी क्रियाएँ प्राणाश्रयी हुआ करती हैं। श्रवण, नयन, घ्राण (नाक), त्वचा और जीभ ॥ ८० ॥ ये ही पाँच ज्ञानेन्द्री मानी गयी है। वाक्, पाणि (हाथ) पाद पायु (गुदा), उपस्थ (लिङ्ग), ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ है ॥ ८१ ॥ इसलिए कलाओकी सोलह सङ्ख्या कही गयी है। उन सबोंमें उन रमानाथकी चेतन्य शक्ति, विद्यमान रहती है ॥ ८२ ॥ इन्हींके प्रवेशस यह संसार स्वायमान होता है और उन्हींकी चेष्टासे सचेष्ट रहा करता है। वे अनादि संसाररूपी वृक्ष हैं और सबको कर्मानुसार फल देते हैं ॥ ८३ ॥ देहका अभिमान करनेवाले जीव पक्षियोंकी तरह अपने प्रभुके दिये हुए सुख-दुःखरूपी कर्मोंको भोगते हैं ॥ ८४ ॥ हजारों वार जन्म लेनेके बाद कही कोई ज्ञानवान् होता है और अपनी आत्माम स्थित रामका रूप जानकर मोक्षपद-
५१० आनन्दरहमायण [ सर्गः ४
इन्द्रियाणि पराण्याहुस्तेभ्यो बुद्धिः परा मता। ततः परः परमात्मा च सर्वव्यापी विनिश्चितः ॥८६॥ द्वौ सुपर्णावेकवृक्षं समाश्रित्य स्थितौ खगौ। एकः स्वादु फलं खादत्यन्यो विचक्षते ॥८७॥ त्रिषु धामसु यद्भोग्यं भोक्ता भोग्यञ्च यद्भवेत् तेभ्यो विलक्षणः साक्षीन्माहं भाथवणी श्रुतिः ॥८८॥ यच्चास्त्रीह यत्स्फुरति यच्चानन्दयति स्वयम् । यस्मिंश्च महति प्रत्यये सर्वे वेदाः समन्विताः ॥८९॥ विषयादि श्रीपर्यन्तं जडं मतिमतामदः, सम्पर्के च प्रियं चैतमप्रमात्मा महाप्रियः । ९०॥ सर्वेषां प्राणिनां ह्यात्मा परप्रेमास्पदो मतः स तु स्वयंक एव नेह दानास्ति गच्छति । ९१॥ चिन्मयं हृद्गतं ज्ञात्वा योऽसौ सोऽहमितिप्रथा। आचारेऽन्यथा सम्यक् परलोकेऽन गतः । ९२॥ आत्मानमकृतार्थ्यात्फलानुमे परमात्मनि। अप्सद्वयं पुनस्तस्य न कार्यं विद्यते भवे ॥९३। सर्वेऽप्युपायाः शास्त्रेषु यज्ज्ञानार्थं प्रयोजिताः। स चेत्सारसंसारेण इत्यादिः किं परं ततः ॥९४॥ दृष्टेऽस्मिन् रचिते भद्रे यस्य प्रविचायते वक्ष विषे परा प्रीतिर्जायते विदुषां सताम् ॥९५॥ नमो रामाय ज्ञानाय लिङ्गरूपधराय च शम्भवे विष्णवे तुभ्यं शङ्कराय शिवात्मने ।९६। अथवाऽऽद्ये स्थले भद्रं कार्यं नवपदात्मकम्। तिर्यग् भद्रं षट्पदञ्च रक्तपातेऽत्र ते स्मृते ।९७। द्विद्विपदात्मके कार्यं शेषं सर्वं हि पूर्ववत्। रामतोभद्रमेतच्च केवलं रामतुष्टिदम् ॥९८॥ स्थले द्वितीयभद्रं हि रक्तं विंशत्पदात्मकम् । तिर्यग् भद्रं नवपदैः पीतं चित्रे तु शुक्लके ।९९। नन्वंशानं राममानन्दकन्दं मायातीतं निर्विकारं निरीहम् । विद्याधीशं षड्गुणाकाश्रयं च वश्यं भद्रं रामनामांकितं तत् ।१००।
को प्राप्त होता है .. ८५ , पहले तो इन्द्रियाँ ही प्रधान हैं, उनमें बुद्धि श्रेष्ठ है और उससे भी श्रेष्ठ सर्वसाक्षी परमात्मा है ।। ८६ ।। दो पक्षी एक वृक्षपर बैठे हैं, उनमें एक तो फलोंका फल खा रहा है दूसरा दूरपर देख रहा है ॥ ८७ ।। तीनों धामों में जो भोग्य वस्तु, भोक्ता तथा भोग्य पदार्थ हैं। उन सबसे साक्षी परमात्मा विचक्षण है यह अथर्व वेद कहता है ॥८८॥ इस संसारमें जो कुछ प्रकाश युक्त वस्तुएं हैं और जिससे सबोंको आनन्दकी प्राप्त होती है। उसको विषयमें स्वयं यह एकमत होकर कहता है कि विषयसे लेकर बुद्धिपर्यन्त सब वस्तुएं जड़ और ज्ञानहीन हैं। जिसके सम्पर्कसे वह सब प्रिय मालूम होते हैं, वह परमात्मा राम सर्वप्रिय है ।८९।९०॥ सब सब प्राणियोंका अपना आत्मा स्वयं सबसे बढ़कर प्रिय होता है, यद्यपि वह एक है, फिर भी अनेक प्रकार दिखलाई देता है ।९१। जो प्राणी सबमें इस भावनासे चिन्मय रामको अपने हृदयमें सदा वर्तमान समझकर आचरण द्वारा हुई ईर्ष्यासे रामकी उपासना करता है, वह परमात्माका दूर्वा अथवाके फलीभूत होनेपर अनेकों बार इस संसारमें जन्म लेता है, किन्तु जबतक दृढ़ हो जानेपर फिर संसारमें उसे कुछ करना बाक़ी नहीं रह जाता अर्थात् उसकी मुक्ति हो जाती है ।। ९२ ।। ९३ ।। शास्त्रोंमें जितने भी उपाय बतलाये गये हैं, उनका एकमात्र प्रयोजन ज्ञान प्राप्त करना है यदि वह सांसारिक उपायोंसे प्राप्त हो सके तो फिर क्या कहना । ९४ । यदि उक्त प्रकारसे बनाये हुए भद्रका आसन देखकर उसपर विचार किया जाय तो विद्वानांके हृदयम ईश्वरके प्रति महती प्रीतिका उत्पाद होता है ।। ९५॥ शान्ति, लिङ्गरूपधारी, शम्भु, विष्णु, शङ्कर तथा शिवात्मा रामको प्रणाम है ।। ९६ ।। यदि उक्त प्रकारका भद्र आपमकों न रुचे तो नौ पदका भद्र बनावे। इस तिरछे भद्रम छः पाद (कोष्ठक) होंगे और दो भद्र लाल और पीत रहेंगे ।। ९७ ।। फिर दूसरा लाल भद्र बीस पादका होगा। तिरछा भद्र नौ पादका होगा। इसका पीत रङ्ग रहेगा और कई रङ्गाक फलस इसमें दो-दो पादोंकी दा शृङ्खलाएं बनायी जायेंगी ॥ ९८ ॥ बाकी सब पूर्ववन् रहेंगी। इस भद्रका नाम रामतोभद्र है और यह केवल रामचन्द्रको प्रसन्न करनेवाला है ।। ९६ ।। आनन्दकन्द, मायातीत, निर्विकार, निरीह, विद्याके स्वामी और षड्गुणोंके एकमात्र आश्रय जिनका यह भद्र नहीं प्रसन्न कर सकता। इसलिए है
सर्गः ४ ] मत्स्येष्टकाण्डम् ५९१
प्रागुदग्वा द्विसप्तत्येकनवाधिका २९० च रेखाः समाः सुपरिकल्प्य पदेषु तासाम् ।
कोणांगणत्र उपगीदृशकुंकमस्यः २१ रीताश्च ते परिधयः परिकल्पनायाः ॥१०१
कोणाब्जशृङ्खललताः सितकृष्णपीत वर्णानि चित्ररचनान्यरुणानि तानि ।
मुद्राश्च नवतिप्रथमा सिताश्च रक्ताः सपरिघाश्च जलंयंत्रि [निं] मूर्तीनाम् ॥१०२।
मुद्रा तु षष्टिपदसहिता च तत्र पक्षौ विहाय यमवायवदिकनभस्थे ।
प्रत्येककोणकपदानि चतुष्टयादि पंक्तिद्वयं स्मृतगुणंक्रमजंनभश्च ॥१०३॥
कृत्वा पदैकमशनव्यय मप्रमात्स्वेनातिसुन्दरतरं परिभाति भाण्डम् ।
रामेति द्व्यक्षरमुमेशजपं निधानं प्राणप्रयाणसमये जपतां महोदयम् ॥१०४॥
रचयेदादितः सव्यम्पादैद्विशत्यन्तावधि पर्यन्तं राममुद्रासु मध्येषु परिधिद्वयम् ॥१०५॥
आदौ तन्त्वमिता मुद्राश्चे विशन्त्येतानस्ततः द्वाविंशतिर्विंशतिषट्पञ्चद्वयमाप्ताः ॥१०६॥
घट्चतुर्दशत्रयोदशद्वादशद्रकः नवसप्तषट्पञ्च त्रयैकश्चाप्यनुक्रमं तु ॥१०७॥
भद्रं षोडशपदं च त्रिंशन्त्रिंशत्षडधिकम् ।
चन्द्रकं तत्समितं त्रिशत्त्रिमिश्रुविंशकम् ॥१०८।
नन्वषडग्निनेत्रांषुनिशिविंशत्र्यंशाधिकम् ।
षट्त्रिंशत्पाण्डुरपदं तच्चदे त्रिशद्धिमिश्रुयुतम् ॥१००॥
विंशत्कोष्ठं कमादेवं भवेन्पार्श्वेऽनुपूर्पये एकविंशत्पदे अष्टमेकोष्ठे च वापिका ॥११०॥
चतुर्विंशत्पदा कार्या परिध्यन्तेऽरुणावृधम् । अदीवाणि यत्र यत्र पदान्युर्वरितानि च ॥१११॥
तिर्यक् भद्रशृङ्खलार्थं यथेच्छं पूरयेद्धिया मध्ये शृङ्खलाः पश्चपदैरेकादशी लता ॥११२।
त्रिपदश्च शशी ज्ञेयः परिधयो षड्ि क्रमान् । कृष्णरक्तशुकलपीताश्चतुर्दिक्षु समन्ततः ॥११३॥
एतदष्टास्रदशशतं १००८ ज्ञेयं रामस्य भद्रकम् ।
अथवा मनु १४ रेखानां वृद्धिं कृत्वा प्रकल्प्य च ॥११४॥
एक दूसरा भद्र बतला रहा हूं ॥ १००॥ बहल ... की ओर से २९० रेखा खींचें। उसमें २१ कोष्ठवाले पीले रंगका परिधियां बनाये ॥ १०१ ॥ काणमे कमल बनाकर रूप-२, काले और पीले रंगकी शृङ्खला और लताएं बनावे। उनमें सब गा रू भिन्न भिन्न प्रकारक ... करके रहें। उसमें बनी सफेद और काल रंगकी मुद्राय मूर्तियोंके मध्यम थी अमुग उत्पन्न किये बिना वही रहती ॥ १०२ ॥ इसमें साठ कोष्ठोंकी मुद्रा बनली जात, हे किन्तु दक्षिणमुख तथा दक्षिण काणके पंक्तिही सारी छोड़ दी जाती है। प्रत्येक कोणक चार पाद, दो पक्ति तथा छटी और चौथी पंक्ति काम रङ्गकी रहेंगी ॥ १०३। इसके अतिरिक्त सातवीं पंक्तिके नीच एक पाद काम रङ्गका बनायेगा। वह भद्रके भारका तरह बहुत ही सुन्दर लगेगा। राम यह दो अक्षर शिवजीके जपपुञ्जका एक बड़ा खजाना है। यदि प्राण निकलने समय इसका जप किया जाय तो बड़ा कल्याण हो ॥ १०४ ॥ आदिस लेकर बाईसवे कोष्ठक पर्यन्त भद्रकी रचना करता आय। हर एक राम-मुद्राके बीचमे दो परिधियाँ रहेंगी। १०५ ॥ फिर पश्चात् मुद्रा रहेंगी। इसके बाद बाईस, इक्कीस, बीस, अठारह, सत्रह, सोळह, चौदह, तेरह, बारह ग्यारह, नौ, आठ सात, छ, चार तीन, दो, एक ये मुद्रायें रहेंगी, ॥१०६॥१०७॥ इस भद्रमें बीस, तीस, छत्तीस, बान्ह, पच्चीस, बीस, बयालीस, बास, पच्चीस, छत्तीस, बयालीस ॥ १०८। १०९॥ इस प्रकार बीस बीस कोष्ठ च गे आए रहेंगे। इक्कीस कोष्ठका भद्र रहेगा और भी कोष्ठकोंकी बापी बनेगी ॥ ११० ॥ चौबीस कोष्ठोंमें परिधिके पास कमल बनेगा। जो पाद बाकी बचे हों, उन्हें अपनी बुद्धिस भरें। इसमें पांच पादोंकी शृङ्खला रहेगी और ग्यारह पादोंकी लताएं बनाया जायेंगी ॥ १११ ॥ ११२ ॥ तीन पादोंका चन्द्रमा बनेगा और उदक आस-पास चारों ओर काली, लाल, सफेद तथा
६९२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
परिधिस्तत्र लिङ्गानामेविंशाधिकं शतम् । वाप्यो भद्राणि षट्प्रादिवत्स्र्पार्वेषु योजयेत् ॥११५॥ चतुर्विंशपदं लिङ्गं वाप्यष्टशतपादिका । द्वे भद्रे नव नव पदे ह्यष्ट षट्पदानि षट् ॥११६॥ त्रिंशल्लिङ्गानि वाप्यस्तु सप्तविंशन्मिता मताः । एकस्मिन् पार्श्वके लिङ्गाधिक्ये भद्रे प्रकल्पयेत् ॥११७॥ षष्ट्यष्टपदे शेषाण्यंककोष्ठानि योजयेत् । लिंगं कृष्णं सिता वाप्याः शेषं सर्वं पुरोदितम् ॥११८॥ पदानि शेषभूतानि यत्र यत्रेह तानि च । भद्रश्रृङ्खलयोध्यानि तदर्थे विनियोजयेत् ॥११९॥ कृष्णरक्तशुक्लपीता अन्ते परिधयो मताः । एवं लिंगयुतं रामतोभद्रं परिकीर्तितम् ॥१२०॥ अनेन देवौ सुप्रीतौ रामेशौ सत्रतस्सिव्हदौ । रामस्य पूजनार्थं हि त्विदं प्रोक्तं वरासनम् ॥१२१॥ आचार्यान् ज्ञानसंपन्नम्नत्वा तेषां प्रसादतः । वक्ष्येऽहं रामतोभद्राकृतिं च संभ्रर्मयुताम् ॥१२२॥ प्रकृतिं रामतोभद्रं विकृतिं लिंगसंयुतम् । अन्ये विकृराः संज्ञेया ह्येवं कृतिस्त्रिधोच्यते ॥१२३॥ तिर्यगूर्ध्वमान्यधिकाः शतरेखाः प्रकल्पयेत् । तत्पदेषु परिधयः षट्पडन्ते पडेव तु ॥ १२४॥ पीताः कोणेषु त्रिपदः शुक्लेन्दुः शृङ्खलाऽसिता । पञ्चदशैकादशिका वल्ली भद्रसंकमात् ॥१२५॥ सिन्धुषोडशसूर्येन्दुयुगषोडशकोष्ठकम् । कल्पयेच्चतुष्कोणेषु राममुद्रां हि पूर्ववत् ॥१२६॥ अष्टौ षष्ठ च पञ्चैधिर्धुवद्विश्चन्द्रमिनाः शुभाः तासां सीमापरिधयस्त्वेकान्तु लोहिताः १२७॥ रजनीशनेत्रमिधुपैंक्तिषु मध्यभाश्वपः । मर्यादाख्याः परिधयो भवंति द्विगुणीकृताः ॥१२८॥ अंतिम तु परिव्यन्ते सर्वतोभद्रकं लिखेत् । विशेषस्त्वत्र वापी तु चतुर्विंशपदान्मिका । १२९ । भद्रं नवपदं पद्मं परिष्यंतः सुलोहितम् । पीता नत्कर्णिका कार्या अन्ते परिधयोऽपि च ॥१३०॥
पीली परिधियां रहेंगी । ११३ । यह एक हजार आठ खानेका भद्र है। अथवा चौदह रेखाओको कल्पना करके उनकी वृद्धि करे। उसमे एक सौ इक्कीस कोष्ठोंकी परिधि बनगो वापी-भद्र आदि पहलेकी तरह समझ ॥ ११४ ॥ ११५ । चौबीस कोष्ठोंका लिंग बनेगा और अठारह पादकी वापी बनायी जायगी। दो भद्र नौ-नौ पादके रहेंगे और दस-दस पादोंके छ भद्र बनाये जायेंगे । ११६ ॥ उनमें तीस तथा बीस पादोंके लिंग रहेंगे और सत्त इस पादोंकी वापी बनायी जायगी जो कुछ बाका पाद बच उनमे दस दस पादोंसे दो भद्रोंकी रचना करे ॥ ११७ ॥ बाकी नौ का कोष्ठो यथास्थान रक्खे। इसमें लिंग काला और बापी सफेद रहेगी। बाकी सब पहलेके भद्रोंकी तरह ज्योके त्यों रहगे । ११८ । बाकी जितने पाद हैं, वे सब भद्र और शृङ्खलाके काममे आ जायेंगे ॥ ११९ ॥ काल, लाल, सफेद और पीले रङ्गकी इसकी परिधियां रहेंगी इस प्रकारके लिंगसे रामतोभद्रकी रचना बतलायी गयी ॥ १२० । इस भद्रसे राम तथा शिवजी दोनो प्रसन्न होते हैं। यहाँ रामका पूजन करनेके लिय वरासन बतलाया गया ॥ १२१॥ अब मैं ज्ञानसम्पन्न आचार्योंको प्रणाम करके उनकी कृपासे ह्मभ्रंयुक्त रामतोभद्रकी रचनाका प्रकार बतलाऊँगा ॥ १२२ ॥ इसमें रामतोभद्रको प्रकृति विकृत रहती है और भी कई तरहकी विकृतियाँ इसमें होती हैं ॥ १२३ ॥ खड़ी और बेड़ी कुल एक सो तीन रेखाएँ खींचे। इसमें भी छःछः पादकी परिधियाँ रहेंगी । १२४ ॥ कोनोमें तीन-तीन पाद पीले रङ्गके रहेंगे। चन्द्रमा उज्ज्वल रहेगा और शृङ्खला काले रङ्गकी रहेगा। सोलह पादकी वल्लरी बनायी जायगी । १२५ ॥ चार, सोलह, बारह छ, चार, सोलह पादके क्रमसे कोष्ठोंका पूर्ववत् राममुद्राकी रचना करे । १२६। आठ, छ, पाँच, चार, तीन एक, इस पादक्रमसे इसको परिधियां बनेंगी और एक परिधि लाल रङ्गकी रहेगी । १२७ । एक दो, चार और दस इनकी द्विगुणित क्रमसे मर्यादासंज्ञक परिधियां होतो हैं ॥ १२८ ॥ अन्तिम परिधिके बीचम सर्वतोभद्र बनाना चाहिये । यहाँ यह विशेषता है कि इसमें चौब स चौबीस कोष्ठोकी वापी बनायी जायगी ॥ १२९ ॥ नौ कोष्ठोंका भद्र बनेगा और परिधिके भीतर लाल
सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ५९३
सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ५९३
पीतशुक्लरक्तकृष्णवर्णानि यत्र पदानि च । भद्रोर्ध्वं शेषभूतानि तानि युक्त्या प्रपूरयेत् ॥१३१॥
तिर्यग्भद्रमुमुख्याद्यैः पीतचित्रे च ते स्मृते । एतदष्टोत्तरशतं रामतोभद्रमीशितुम् ॥१३२॥
एकं मन्त्राशून्यं मरुत्समुदनिधिं सच्चिदानन्दरूपं
मायायोगेन विश्वात्मकमिदममलं ब्रह्मविष्ण्वीशसंज्ञम् ।
सृष्टिस्थित्यन्तरहेतुं निगमकुविदृतं मन्त्रभूतात्मभूतं
सर्वज्ञं सर्वशक्तिं गुणगणममलं तन्महो भावयेऽहम् ॥१३३॥
नत्वा श्रीदेशिकेन्द्रस्य पादाब्जमप्रदम् । वक्ष्ये चाध्यात्मिकीं मुक्तिं सतां चित्तचमत्कृतिम् ॥१३४॥
पशूनां मत्सगोमादि सर्वमर्थाय कल्पते । मृगस्य नरदेहस्य सृष्टिदोषोयदोदितः ॥१३५॥
एकमेवामुना साध्यं ज्ञानं यन्मध्यरूपदम् । तद्विना तु पशुभ्यश्च नरो हीनतरो मतः ॥१३६॥
प्रतिभागान्पुण्यतमः श्रद्धावान् गुरूबोधते । कोटिष्वेकः स्वयं साक्षादङ्गे नारायणो भवेत् ॥१३७॥
केचिद्रामतोभद्रं मुद्रा मद्रिवदन्त्यिदम् । गयाकिना च मंवद्गं विविच्यन्ते च ते उभे । १.८।
लोकाः सप्त यथाऽङ्गेऽस्मिंस्तथा सप्त प्रकीर्तिताः । तेनैव रचना तुल्या ज्ञेया हस्तसमुद्भवैः । १३९॥
ब्रह्मांडं रामतोभद्रं मुद्रामूतानि मन्महे । रामशेषेणयुक्तानि सम्मतानि तु सूरिभिः ॥ १४०॥
यस्यां स्यान्मुद्रित वस्तु या मुद्रेति निगद्यते मुद्रेव पिहितं चाथ विहितं यदधो भवेत् ॥१४१॥
तद्वन्मवासु चैतासु ब्रह्ममुद्रितमुच्यते । तथाप्यासां मवाद्भातिचैतन्यः संप्रकाशनं ॥१४२।
आच्छादितोऽपिकनकश्चेत् स्फटिकैऽन्तर्बहिः किल । दीपः प्रकाशते क्कन्न लोपयेच्च नतथ्वते । १४३॥
मृण्मयिखनं ताम्रग्मं तदाकारं प्रपद्यते तथा ब्रह्म निगकारं मुद्राकारं विभायते ॥१४४॥
रङ्गका कमल रहेगा। उस कमलके रङ्ग बताये जायेंगे ॥ १३० । पीले, सफेद, लाल और काले
रङ्गको परिमित रहेंगे। भद्रमें बाकी बचे जिनन काष्ट हों, उन्हें युक्ति के साथ रङ्गोंसे पूर्ण कर दें ॥१३१॥ इसकी
शृङ्खला तथा भद्र पीले और विविध रङ्गके होंगे ॥ १३२ ॥ मैं आत्माके उस रूपका ध्यान करता हूँ जो
सदात्म अकेला है, समस्त सुखका विधान है, सच्चिदानन्दरूप आनन्दकन्द है। जिसने अपनी मायाके योगसे इस
निर्मल विश्वके प्रपञ्चोंको ब्रह्मा, विष्णु और शिवके नामसे अंगीकार कर रक्खा है। जो सृष्टि, पालन और
विनाशका हेतु है। जिसके ऋषिलाग बार-बार शास्त्रोंके अनुसार पाणिपात्रका प्राप्त हैं, जो सब कुछ
जानता है, जिसके पास सब प्रकारकी शक्तियां हैं, जो परमात्मा अनन्त और अमृतरूप है ॥ १३३ ॥ अब
मैं श्रीदेशिकेन्द्रके भ्रमरपद प्राप्त करानेवाले चरणकमलोंको प्रणाम करके सज्जनोंके चित्तमें चमत्कार उत्पन्न
करनेवाली आध्यात्मिक मुक्तिका वर्णन करूँगा ॥१३४॥ मृत पशुओके नललोम आदि सब पदार्थ
काम आ जाते हैं, किन्तु मनुष्यके मर जानेपर यह किसी काम नहीं आता है कि विधाताने इसकी
सृष्टि करके बड़ा भारी अपराध किया है ॥१३५ । इस शरीरसे आत्माका स्वरूप पहचान्नेकी साधना
की जा सकती है। यदि यह काम नहीं किया तो यह मनुष्य पशुसे भी हीन माना जायगा ॥ १३६ । करोड़ों
मनुष्योंमें कहीं कोई एक मनुष्य पवित्र गुरु तथा भगवद्भक्त रत्न रूप होता है। जो ऐसा होता है, वह
साक्षात् नारायण ही है ॥ १३७॥ कुछ लोग ऊपर वरणन किये हुए रामतोभद्रकी रचना करके उसमें साठ कोठकीकी
मुद्रा बनाकर इस प्रकार विवेचना करते हैं— ॥ १३८ । जिस प्रकार ऊपर कहे हुए सातों लोक हैं, ठीक उसी तरह यह
रामतोभद्र भी है ॥ १३९ । रामतोभद्र ब्रह्माण्ड है। इसका मुद्रा में ही प्रतिरूपमद् बनता है। उसमें रामरूप
चैतन्य (जीव) है। ऐसा कितने ही तत्त्वदर्शियोंने कहा है ॥ १४० ॥ जिसमें कोई वस्तु मुद्रित हो (अर्थात्
लपेटकर रक्खी हो) उसे लोग मुद्रा कहते हैं। मुद्रितका अर्थ है—पिहित या विहित (घिराया हुआ)।
यह शरीरादिमें ब्रह्मसे मुद्रित है। फिर भी इसके बाहर चैतन्यका प्रकाशन हो रही है ॥ १४१ ॥ १४२॥
स्फटिक मणिका कलश बना और उसके भीतर दीपक रखकर चाहे वह चारों ओरसे ढॉक दिया जाय, फिर
भी दीपकका प्रकाश कोई लुप्त नहीं कर सकता। ठीक यही दशा इस ब्रह्माण्डकी भी है ॥ १४३ ॥ जिस तरह कि
५९४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
पुश्चक्रे प्रभुः सर्व्वाः पुरः पुरुष आदिशन्। इत्युक्तं जन्मचाभावात्प्रन्यवापि हि पञ्चमे १४४॥ एको वशी सर्वभूतान्तरात्मेति श्रुतेर्वचः। एको देवः सर्वभूतेष्विति चैवापरा श्रुतिः॥१४५॥ पुरः सृष्ट्वा परेशोऽन नैन ताभिरतुष्यथ म सृष्ट्वा मानुषीं मुद्रो परं तोषमगात् सः १४६॥ देवताश्चास्सृजत्पूर्वं दृष्टेमों पौरुषीं तनुम्। रूप तादृक्ष सुकृत बतेति श्रूयते स्फुटम् १४७॥ पुरुषं त्वेवाविशन्मात्मेत्याद श्रुतिः स्वयम्। पुग सृष्टैः सर्वभूतैरगृहायः स्वरट् ॥१४८। श्रद्धावल्लोमणिगण नग दृष्ट्वा मुदं गतः। इत्थस्माभिर्विष्णुतत्व श्रूयते भगवद्वचः ॥१५०। मुदं करोति देवस्य द्रावयेद्दुःखसञ्चये। इति मुद्रानिरुक्तिश्च मन्त्रशास्त्रेऽपि श्रूयते ॥१५१। अतः सर्वेषु देहेषु मनुष्याणां नृणाम् स्वर्गापवर्गयोरादाऽधिकारोऽस्मिन्न चेतरे। १५२॥ लोके प्रसिद्धिर्र्यः कश्चिद्राजमुद्राङ्कितो नरः। अधिकारीति मन्यन्ते पूज्यश्चामरादिभिः १५३। तथान्याङ्कितो जीवोऽधिकार्थं शास्त्रभूमिषु। नान्याभिर्गो विनिर्ज्ञासु शक्यन्ते म्वस्ममनः पदम् १५४॥ तस्मिंश्चैष सोपाधौ पदानि षडि गनि हि । तानि संक्षेपतः सम्यक् प्रदर्श्यन्तेऽवरुद्धये ।१५५॥ अविद्याकामकर्माणि भोक्तृभोगी सुषुप्तिश्च। एतादृशनि न षडानि देहे कारणसञ्ज्ञके । १५६॥ तमोऽज्ञानमविद्येति शब्दा एकार्थवाचिनः। अत्र गुणत्रयो नाव दृश्यते पदमु मो द्विज । १५७। लिंगे पुर्यष्टकेऽविद्याऽऽकामकर्मत्रयं स्मृतः। न साधनं तु हेतुत्वान्त्रयाणां ग्रहणं कृतम् ॥१५८॥ कार्यमस्त्वेष्वथवान्य नाहकारणे कारणात्मना। कामस्य कर्मणश्चात्र स्थितिस सूक्ष्मरूपता १५९॥ अविद्या या मुख्यतोऽत्र विद्यते कारणात्मना। दृश्यतान्तु न कामोऽत्र कामना वा श्रूयेर्तनम् ॥१६०॥
सुवर्णसे साभा ढाला जाता है ता सब उसमें अपने आप पिघल जाता है यही दृष्टान्त इस निराकार ब्रह्मकी भी है ॥ १४४ ॥ प्रभुने पहले इन जीवोंको नासृष्ट किया । उस समय उस पुरुषमें समावेश किया । ऐसा कथन अन्य कहा गया है अन्य स्थान में भी इन पूर्व वाक्यों से नहीं होता उसका ऐसा कहना है ॥ १४५ ॥ श्रुतिका कथन है कि सब प्राणियोंके अन्तरूप में रहनेवाला एक ही परमात्मा है । दूसरी श्रुति भी इस बातकी पुष्ट करती हुई कहती है कि वह एक ही परमात्मा है, जो सबतरफ सब प्राणियोंमें विद्यमान रहता है ॥ १४६ ॥ सृष्टिकर्त्तान पहिले अनेक तरहकी सृष्टियाँ कीं, किन्तु उससे उस ईश्वरको तृप्ति हुई। फिर जब उसने इस मानुषी मुद्राकी सृष्टि की, तब उसे बडा प्रसन्नता हुई ॥ १४७ ॥ अगणित क्षण करके लिए देवताओंने पुरुषका शरीर देखा तो इससे सन्तुष्ट होकर बोले कि आपने यह बहुत अच्छा किया जा इसपर सब लोग सन्तोष करते हैं ॥ १४८॥ विस्तारविशाल मुख्य आत्माका ही श्रुतिने पुरुष कहा है उस परमात्माने अग और प्राणियोंकी सृष्टि की, किन्तु उसका दृश्य प्रसन्न नहीं हुआ और जब उसने इस मानव शरीरका रूप देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुए । हे विष्णुदास इस प्रकार इन भगवान् प्रभुका कथन सुनते हैं ॥ १५०॥ वह उन रचनाओंको प्रसन्न करता हुआ सब दुःखों और पापों को धोने वाला जान फल कहा जाता है इस प्रकार मुद्रांकी निरुक्ति मन्त्रशास्त्र- में भी की गयी है ॥ १५१ ॥ इसलिए उसने सब देहों में मनुष्यों पर अधिकार दिया है । स्वर्ग और अपवर्गका अधिकार भी इसी नरजातिका दिया गया है—औरौंकी नहीं ॥ १५२॥ संसारमें भी यह बात प्रसिद्ध है कि जिस मनुष्यके पास राजाकी मुद्राका प्रमाणपत्र होता है। उसे लोग अधिकारी समझते हैं और उसकी पूजा करते हैं । १५३ । ईसी प्रकार इस राजमुद्रापदकी मुद्रा से अङ्कित जीव शास्त्रभूमिका अधिकारी माना जाता है, अन्य योनिके जीव अवश्य-धरता आत्मपद नहीं जान सकते । १५४ ॥ इस आत्मा उपाधिमें कुल साठ पद हैं । उनकी जानकारी के लिए यहाँ स्वच्छ तरह बतलाते हैं । १५५ । कारणसंज्ञक देहमं अविद्या, काम, कर्म भोक्ता भोग और सुषुप्तिके स्थान हैं ॥ १५६॥ हे द्विज तम, अज्ञान और अविद्या इन तीनों शब्दोंका एक ही मतलब है। इसमें इसमें किस गुणका ग्रहण किया जाना मुझे दीखता ॥ १५७॥ सातवें शरीररूपमें अविद्या, काम और कर्मका ग्रहण किया गया है। फिर भी कारण रूप इन तीनोंको ग्रहण ही करना पड़ता है ॥ १५८॥ कामणका चाहे कोई कार्य हो वा न हो, वहीं कारणरूपसे रहता ही है।
सर्गः ४ ] मनोहराकाण्डम् ५१५
अष्टत्रिंशत्पदानि ह विद्यन्ते सूक्ष्मदेहके । दशेंद्रियाणि पञ्चैव प्राणा बुद्धिम॑हंकृतिः ॥ १६१॥ सप्तदशात्मकं लिंगं प्रसिद्धं शास्त्रसम्मतम् । पञ्चविंशत्यनेण पञ्च कर्मक्रियात्मनः ॥ १६२॥ एष प्राणांख्यव्यापारः सकलश्च निश्वयान्मतिः । ममांश चैव धर्माः प्रसिद्धाः शास्त्रसम्मतः । १६३॥ स्वप्नाभिमानी भोर्गी रजश्चेति चतुष्टयम् । देवानामिंद्रियाणां च व्यापारश्चर्तुरुत्तर पदो १६४। स्थूलदेहे षोडशैव पदानि सम्मतानि हि । गुणाः सप्तदश तेषामपानव्यानयोः पदे ॥ १६५॥ पायूपस्थस्थानयोर्द्वये वाचोऽपि निकेतने । प्राणस्य मनसश्चापि बुद्धिस्थाने पदं विदुः ॥ १६६॥ पदानि द्वादशे मानि धीमद्भिर्येन तथा गुणः अवस्था जागृतिश्चैताः कथितानि मनीषिभिः ॥ १६७॥ मुद्रामेतादृशीं प्राप्य वेद वेदान्तार्थाम्पदम् । तस्य जन्म कृतार्थ स्यान्महतो नहिन्यथा । १६८॥ मुद्रारूपं विविच्यैव यन्नाम्नां भांकिनोनि च । उक्तं तदधुना किंचित्संक्षेपेण निरूच्यते ॥ १६९॥ रामेति लोकरमणाद्रमन्ते योगिनोऽमले । परमानन्दरदं नित्यं तेन राम इतीर्यते । १७०॥ रसेनेवामुना सर्वे जीवा जीवन्ति नान्यथा । इमं रमणथ लब्ध्वा भवन्त्य नन्दिनोऽखिलाः ॥ १७१॥ विशता येन विश्वेषु सर्वं चेतयते जगत् । न तं चेतयते कश्चिन्न राम इति कीर्त्यते । १७२॥ सत्ता येनाखिले विश्वे म देवोऽत प्रकीर्त्यते । अमन्मनाप्रदः साक्षाद्राम इत्यभिधीयते । १७३॥ यथा प्रसिद्धं रामेति ब्रह्मणो नामनायकम् तथा लिंग पदं व्योम निष्कलः परमात्मातः ॥ १७४॥ लीयन्ते यत्र भूतानि निर्गच्छन्ति यतः पुनः । तेन लिंग पद व्योम निष्कलः परमः शिवः ॥ १७५॥ इति शास्त्रविदां वाणी श्रूयते तत्त्वदर्शनाम् । अतः सर्वाणि नामानि स्थाण्वन्तान्तरात्मनः ॥ १७६॥ सति तेन शब्दभेदं रूपभेदेऽपि सर्वथा । तत्त्वतो नैव भेदोऽस्ति व्यर्थैकस्य वस्तुनः ॥ १७७॥
उस शरीरमे काय और कर्म ये दोन तु मलगम रहते है । १५९॥ इस कारणात्मामे अविद्याकी प्रधानता है । आत्मसवे मे इसमे काम रहता है भोक्तृत्व भावका हा रहता है । यह ज्ञानका सिद्धान्त है १६० । इस सूक्ष्म देहमें कुल साठ पद हैं। दस इन्द्रियका पाँच ५ प्राणका, बुद्धि, मन और १ अहङ्कारका सत्रह पद शास्त्रों-में कहा गया है। पाँच ५ विषय ग्रहण करनेवाली इन्द्रियांका, पांच कर्मकारियोंका और पाँच प्राणोंके व्यापाराका कुल सत्रह होकर अड़तालीस पद होते हैं। १६१ - १६३। स्वप्न, अभिमानी, भोग और रज ये चार देवताओं और इन्द्रियोंमें प्रवृत्ति न करने वाले इमलिय स्वप्न अवस्था सम्बन्धी साठ ही पद माने गये हैं। किन्तु गुण सत्रहका ही रहेगा। उनमेंसे दो पद अपान और व्यान वायुका है ॥ १६४। १६५। पायु और उपस्थस्थानका दो पद, वाणी और रसनाका दो पद, प्राण, मन तथा बुद्धिका एक-एक पद ॥ १६६॥ ये बारह पद मान्त्रा और अंतम पांच ५ इन्द्रियोंके गुण, अवस्था तथा जागृति कहा है। १६७। इस प्रकारकी मुद्रा प्राप्त करके प्राणी वेदान्त अर्थवाली पद पाता है। इसको पाकर जन्म कृतार्थ हो जाता है। अन्यथा नष्ट ही हो जाता है॥ १६८। मुद्राके रूपका विवेचन करके उसके नामोंसे संकेतित मुद्राओंकी बात संक्षेप रूपसे बतलाते हैं॥ १६९ । संसारके प्राणियोंको आनन्द देनेके कारण भगवानका 'राम' नाम पड़ा है। योगीलोग इसी अमल परमानन्द पदमें आनन्द लेते हैं। इस लिए भी राम 'राम' कहे जाते हैं ॥ १७०। इसी प्रकार संसारके सब जीव जीते हैं, इस सरस पदको पाकर लोग आनन्दमय हो जाते हैं ॥ १७१। जो भगवन् प्रविष्ट होकर सारे जगत्को चैतन्य कर देता है। जिन रामको चैतन्य करनेवाला कोई भी नहीं है, व ही राम 'राम' कहे जाते हैं ॥ १७२। जिन भगवान्की सत्ता समस्त विश्वमें है। वे इसी कारण सर्वेश कहलाते हैं। वे भगवन् जगत्में भी अपनी सत्ता बनाये रखते हैं। अतएव लोग उन्हें राम कहते हैं ॥ १७३॥ जिस तरह उनका राम यह नाम प्रसिद्ध हुआ। उसी तरह परमात्माके लिङ्ग और रूप भी हैं।॥ १७४॥ लिंग लिंगका अर्थ इस प्रकार करते हैं-जिसम जगत्के सब प्राणी अन्तमे लीन होते और सृष्टिके आदिमे जिससे प्रादुर्भूत होते हैं उसकी लिंग संज्ञा है। वह लिंग, शून्य निष्कल और परम कल्याणकारी है ॥ १७५॥ इस प्रकार तत्त्वदर्शी शास्त्रोंकी बातें सुनायी पड़ती हैं। इससे यह
५९६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
स ब्रह्मा स शिवश्चाथ स हरिः स सुरेश्वरः। सोऽक्षरः परमश्चैव स स्वराडिति वेदवाक् ॥१७८॥ यस्यैवै सच्चिदानन्दाः स व्यापी सर्ववस्तुषु, नेदानीं नु प्रियं भाति वस्त्वमात्रं प्रदृश्यते ॥१७९॥ वार्तायां च सर्वत्र रामनामाङ्ककीर्तनम्। अत्रिद्विद्यापमानेषु श्रूयते गुरुपुङ्गवात् ॥१८०॥ अग्रेत्वेक आत्मा वा इदमग्रः पुरा जनैः। आसीत्ततैव लोकानां पालानां सृष्टिरिच्छया ॥१८१॥ पुनश्च सर्वदेवानामनुकल्पार्थमीप्सितम्। इन्द्रायतनं तन्न सृष्टेस्तेभ्यस्ततः परम् ॥१८२॥ विचार्य स्वापदां पश्यन्त्सीमाशं प्रविष्टवान्। तदात्मानं ब्रह्म तत दृष्ट्वांशदेतो किल ॥१८३॥ कश्चैष मनि सप्रश्नं येन पश्यन्ति विन्दति। इत्यादिभिर्विभज्यैवं तदेतद्द्रष्ट्रादिभिः ॥१८४॥ संज्ञोऽन्तःसम्य नामानि चोक्त्वाऽन्यच्चेतसोऽयमा। एष ब्रह्मेत्यादिभिश्चेदंश्चोक्तं चाखिलं जगत् ॥१८५॥ प्रज्ञानेत्रं च प्रज्ञाने प्रतिष्ठितन्नेनेव हि। प्रज्ञानं ब्रह्म श्रुत्यान्ते त्रिकाले विनिश्चितम् ॥१८६॥ तद्राम सच्चिदानन्दघनानन्दं न संशयः। तैत्तिरीयस्यशाखायां ब्रह्मण लक्षणं पुरा ॥१८७॥ सत्यं ज्ञानमनन्तं सङ्कीर्त्य वेत्तुगुहादिकम्। यस्माद्वस्तुते कामानामंग्युपपद्येव हि ॥१८८॥ फलं ज्ञानस्य चोक्त्वाऽथ तस्माद्ब्रह्मात्मकं किल। क्रमोत्पत्तिर्हि शुभानां कोश निकवेदनम् ॥१८९॥ तत्फलं तदनात्मत्वं मदष्ट्यानन्दात्मनः पुच्छं ब्रह्मेति निर्णीय तदसत्समशीनितः ॥१९०॥ असन्नेद्भवति ज्ञेयं सत्तीर्त्य च तत परम्। कामयित नदेवेदं सृष्ट्वाऽभूत् जगदात्मना ॥१९१॥ कृत्वा तस्मिन् प्रविष्टेव मच्चामच्चाभवत्किल। अपानप्राणयोश्चेष्टा यस्या सीन्वे प्रजायते ॥१९२॥ अन्यायस्य त्वेव आनन्दयति चाखिलान्। भयहेतुस्तदेवेह त्रासादीनां प्रदर्शकम्। ॥१९३॥ मानुष्यारभ्य ब्रह्मान्ता आनन्दा ये शतोत्तराः। सिद्धस्तत्र परब्रह्मानन्दज्योतिं विनिश्चितम्। ॥१९४॥
सिद्ध हुआ कि उस सच्चिदानन्द ही नाम और रूपान्तर बहुत हुए भी वास्तवमें सब एक हैं। इसकी वास्तविक् स्थितिमें कोई भी अन्तर नहीं आता ॥१७८॥ १७९॥ वही ब्रह्मा, वे ही शिव, वे ही विष्णु और वे ही देवराज इन्द्र हैं। वे ही अक्षर ब्रह्म और वही सर्वव्यापक तथा विश्वरूप स्वराट् हैं ॥१७८॥ वे ही सब वस्तुमात्र रूप चित् और आनन्द रूपसे आनन्दरूप हैं। जिसके कारण सब चीज अच्छी लगती हैं ॥१७९॥ सब वेदोंमें रामरूपी ब्रह्मका कीर्तन विद्यमान है। गुरुकुल के अनुग्रहसे आदि, मध्य, अन्त सब समयमें रामहीका कीर्तन सुनायी पड़ता है ॥१८०॥ ऐतरेय उपनिषदमें लिखा है कि सर्वप्रथम यह आत्मा अकेला था। उसकी यह इच्छा हुई कि हम लोक और लोकपालोंकी सृष्टि करें ॥१८१॥ ऐसा विचार होनेपर उसने सृष्टिके अनन्तर नाना प्रकारके इन दानादिक और उत्तम प्रकारके जीवोंकी सृष्टि की ॥१८२॥ तदनन्तर उन्होंने अपने-अपन स्वरूपमितका विचार किया और एक सधाम देवनगरोंके राजा इन्द्र बने ॥१८३॥ जो कि इस संसारका देवता तथा संसारको चलानेवाला कौनसा है वह कौन है? इसका ज्ञान आदि नाम बतलाते हुए "यह आत्मा ही सब कुछ है" आदि वाक्यसे उन्होंने इस प्रश्नको हल कराया ओर बतलाया कि सन्, चित्, आनन्दम् लेकर चुने नयन नाम हो गया है। पूर्व समय तैत्तिरीयक श्रुतिमें ब्रह्मका लक्षण बतलाते हुए रामने सत्य, ज्ञान और अनन्तरूप उपाधि दी है। इस संसारमें जो कुछ दृश्य साधनका भोक्ता और खाने-पीनेका है, वह ब्रह्म ही है। इनमें से, यह ले पाया गया कि समस्त सृष्टि ब्रह्ममयी है। सब प्राणियोंका क्रम-उत्पांत, पंचकोशका ज्ञान और आत्माकी विभिन्नता आदि दिखाकर बतलाया है कि सत् और असत्का प्रतीयमान इन सबका मूल कारण ब्रह्म ही है। १८४-१९०॥ फिर कहकर कहा कि सत् और असत् यह क्या वस्तु है? इस प्रश्नको हल करते हुए कहते हैं कि जो अदृश्य अव्यक्त और जगत्का आत्मा बनकर कामनाओंको धारणा हुआ उसमें लीन हो जाता है वही सत् है। जिसके अस्तित्त्वमें प्राण और अपानकी चेष्टा जायमान होती है, उसे असत् कहते हैं ॥१९१॥ १९२॥ यह आत्मा ही सारे संसारको आनन्दित करता है। वास्तविका एकमात्र ब्रह्म भयहेतु है ॥१९३॥ मनुष्यसे लेकर ब्रह्मपर्यन्त तथा इसके भी आगे जो आनन्दविन्दु है, वह एकमात्र परब्रह्मानन्दका ही आभास है।
सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् १९७
म यस्यायं नरोपाश्चादित्येवञ्च वर्तते । स एक इति ज्ञात्वा' पापं पुण्यं कृतञ्चने ॥१९५॥
न संतापयतस्स्वेवं सम्यक् सर्वं प्रकीर्तितम् । यत्प्रब्रह्म हेयापेक्ष्यः सङ्गत्स्येति न संशयः ॥१९६॥
छांदोग्येऽपि स वेदेति मन्त्रोपक्रम्य प्रक्रणः । तेजोऽन्नादिका सृष्टिः यन्मूला मा स्थितिरितिः १७ ।
जीवात्मना प्रवेशश्च व्याकृतिर्नाम रूपयोः अनेकत्वान्नपदस्य मन्यर्दनेकत्वताऽपि च ।
मदर्थभावना-! च मनुष्ये च बहूक्तिता । १९८।
लज्जाने च गुगेतांन ज्ञानन्मोक्षोःपुनर्भवः ।
मध्यब्रह्माभिमंन्ग्रन्येव मन्त्रब्रह्मकीर्तनम् । तद्रामान परं ब्रह्म सृष्टिस्थित्यन्तहेतुकम् ।।१९९।।
अन्यस्यामपि शाखायां प्रश्नप्र-युक्तिः स्फुटम् । मनःप्र, णेन्द्रियाणां यन्मनः प्राणैन्द्रियं हि तत् ॥२००॥
सर्वपामनुभूतेः सन्निष्टितारिद्वितात्परम् विषयो नेन्द्रियाणामित्युक्त्वा तस्य शभापनम्२०१ ।
सर्वदर्शी सर्ववेतृदेवना जयकारणम् । तदत्ताने च देवानां गुरुह्यानुपूर्णात्निता ॥२०२।
धैर्यन्न नान्यन्मानुष्यं प्राप्य जन्म न वेत्त चेत् । विनाष्टिमहती तस्य चेति प्रोक्त ततः परम् ॥२०३।
अध्यात्माधिदैवसिद्धा विद्यापाश्चमत्र च ब्रह्मज्ञालिन राज्ञाना हानिन्मन्प्रमितित्ययम् ॥२०४॥
मम्रजो महिमा श्रुत्या कीर्तितो ह्यामना मण्म् । तद्रामपि गुरोश्चेय नान्यथा ग्रन्थकाटिभिः ॥२०५॥
मुडकेऽपि परा विद्या शिष्या जय ब्रह्मणः । सृष्टिश्चानेकदृष्टांतरुक्ता तस्मिन्न मस्थिता ॥२०६॥
लपन्नासि हि सर्वत्र विश्वं मत्र हि गन्मयम् तारुण धनुषा चैव लक्ष्य आत्मानपर्ण तथा ।।२०७।
एषा लिखा है। जो मनुष्यका उपाधिय भूत विद्यमान है। उस एकमात्र प्रभुका ज्ञान सत्तपद कर्म-अधर्म तथा पाप पुण्य कुछ शेष नहीं रह जाता, १९४ । १९५, तब किसी प्रकारका सन्ताप नहीं करना पड़ता। ये सब गुण जिसमें हैं, वह ब्रह्म ही है। उसको आत्मा देखकर निश्चित होता है कि वह ब्रह्म आराधनकारी ही है। इसमें संशय नहीं है ॥१९६॥ छान्दोग्य उपनिषदमें यह कहा है कि ब्रह्मसे ही अन्नादिका सृष्टि हुई है और उसीके आधारसे इस जगत्का पालन-पोषण होता है । १९७ । जीवात्माके द्वारा ही जगतका प्रवेश होता है, किन्तु देहके अभाववश उसके नाम और रूपमें अन्तर पड़ जाता है। स्वस्वरूपका उसके विचार शिक्षा ही का विषय मात्र था, इसलिये साव एकता ज्ञान ही मुक्ति का सर्वोत्कृष्ट साधन है। जब तक मनु पदका ज्ञान नहीं होता, तब तक एकता रहता है और सद् ब्रह्म विद्यमान रहनेपर एकताके स्थानपर बहुत्व आ जाता है। उस मन् पदका ज्ञान होनेपर गुरु द्वारा ज्ञान प्राप्त होता है और ज्ञान प्राप्त होकर पुनर्जन्मविमुक्त मोक्षपद प्राप्त होता है॥ १९८॥ शाखाके सद्ब्रह्म जिसका कथन उपमानों है, उसका इतना ही यथार्थकीर्तन है कि वह राम ही परब्रह्म हैं। उन्हींके द्वारा इस जगत्की सृष्टि, पालन और प्रलय होता है ।१९९॥ अन्य शाखाओंमें भी प्रश्न और उत्तरके रूपमें अनेक प्रश्न और प्रत्युक्तियां हुई हैं। उनसे भी यही सिद्ध होता है कि मन, प्राण और इन्द्रियोंका जो मन, प्राण और इन्द्रिय है। वह ब्रह्म ही है। वह प्रत्यक्षदृश्य प्रकृत जन और अज्ञान इन दोनोंसे परे है। यह सबका अनुभव है। किन्तु वह इन्द्रियोंके विषयगोचर नहीं होता अर्थात् अनुभवसे ही जाना जाता है। यह कहकर उसका समापन किया गया है ।। २०० ।। २०१ ।। वह प्रत्यक्ष सब कुछ देखता है सब जानता है देवताओंके विजयका कारण है और वह देवताओंके लिए भी अज्ञात रहता है। गुरुका उपासन करनेसे ही ज्ञानकी प्राप्ति होती है॥ २०२॥ विद्या ही मनुष्यका मनुष्यत्व है। इस संसारमें जन्म पाकर जिसने विद्या नहीं पायी तो यह उसका एक बहुत बड़ा विनाश है। ऐसा कहा गया है ॥ २०३ ॥ अधिदैवका भी अदर्शन करनेवाला बह्मज्ञानका विद्याका साधन होता है, परोक्ष ज्ञान होता है और अन्तमें उसे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है ।। २०४ ।। श्रुतिने स्वयं विस्तारपूर्वक ब्रह्मकी महिमाका गान किया है। इसलिए जिज्ञासुको चाहिए कि वह गुरुसे रामका ज्ञान प्राप्त करे। वैसे करोड़ों ग्रन्थ पढ़नेसे भी उनका सच्चा ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता ॥२०५॥ मुण्डक उपनिषदमें कहा गया है कि ब्रह्म और ब्रह्मका विषय जाननेके लिए गुरु प्रधान हैं। उक्त उपनिषदने अनेक दृष्टान्तोंसे सृष्टिका वर्णन किया है ॥ २०६ ॥ वह कहता है कि यह सारी सृष्टि उसी ब्रह्ममें स्थित है और अन्तमें उसीमें
५५८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
महिमातिशयस्तस्य तद्भावा भाव्यशेषकम् । अगोचरं च सर्वेषां ध्यायमानोऽनुपश्यति ॥२०८॥ वेद हि तं गुहायां योऽविद्याग्रंथिं भिनत्त्यसः । कृपया वृणुते ब्रह्म यं कश्चित् सुमधस्करम् ॥२०९॥ तेनैव लभ्यतं साक्षान्नान्यथा यत्नतोऽपि हि । अथवा य परब्रह्म प्राप्तुमिच्छेन्न भावकः ॥२१०॥ तेनैव हेतुना लभ्यो नान्यथा साधनान्तरैः । दलहीनादिर्भानेदं लभ्यते तैस्तु लभ्यते ॥२११॥ मन्थामयोगतः सत्त्वं शुद्धं येषां विचारतः । ते परान्तेन कालेन परिमुच्यन्ति नान्यथा ॥२१२॥ यथा नद्यः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपतः । तथा विद्वान्कलावैद्यप्रतिष्ठाणं च भक्ष्यम् ॥२१३॥ प्रारब्धकर्मणां साक्षान्मोक्षमप्युपतेभवेत् । यो वेद परं ब्रह्म स ब्रह्म भवतीति च ॥२१४॥ सर्वं ममुदितं दृश्यानन्दामत्रकाचदूषणम् । पूर्णमदः पूर्णामिदं काण्डकाया सनातनः ॥२१५॥ आदिमध्यावसानेषु पूर्णं ब्रह्मव निश्चितम् । पूर्णं पराक्षरूपेण ज्ञातं तत्पदमक्षिरम् ॥२१६॥ प्रत्यक्षं त्वपदारूप्येन स्थितं भूतमयेषु च । पूर्णातिरूपज्ञान्पूर्णं सोपाधिकमिहोच्यते ॥२१७॥ सम्पूर्ण शाखग्राम्दृष्ट्यां स्वाविद्यानाशतः स्वयम् । प्रत्यग्दण्डमय लक्ष्यावाशेषविशद्रिग ॥२१८॥ विगतापाधिकं सर्वं पूर्णमेवावशिष्यते । तद्रामं परमं ब्रह्म योगिध्येयं सनातनम् ॥२१९॥ सर्वधर्मानवेधंन श्रुतिगान परात्परम् । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥२२०॥ मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव २२१ इत्याह भगवान् साक्षाद्वेदाव तज्जलानांते । एवं मयामु श्रुतिषु स्मृत्यादिषु यदीरितम् ॥२२२॥
लय सा हो जायगा क्योंकि समस्त विश्व उसका स्वरूप है ... कि जैसे धनुर्धारी एक लक्ष्य-फोड़ धनुषसे लक्ष्य बंधना सीखता है। उसीतरह व ध र-२... ब्रह्मके लिए आत्मसमर्पण करना सुगम ॥ २०७ ॥ उस ब्रह्मकी बड़ी महिमा है। उसका जन्म बहुत दूर सकता है। वह सबसे छुपा हुआ है, किन्तु ध्यान द्वारा देखा भी जा सकता है॥ २०८ ॥ जो प्राणी हृदयके उस बन्द हुए ब्रह्मको जान लेता है, वह अविद्याका कठिन पाश काट... सा है। वही प्राणी इन सबनाम उसे साक्षात् उस प्राण... प्राप्त हो सकता। इसके अतिरिक्त जिस किसी भी साधन द्वारा ईश्वरको प्राप्त करनेका अभिलाषी प्रयत्नपूर्वक साधनासे ही वह प्राप्त हो सकता है अन्यथा कदापि नहीं ॥ ... प्राप्त कर सकता। बहुधा, उद्धारका हित सकता है, विचार द्वारा जिसका चित्त एवं पवित्र व शुद्ध हो जाता है, वे सब लोग महापदको प्राप्त होकर कल्पके अन्तमें मुक्त होते हैं ... । जिस तरह कि नदियाँ नाम और रूपके साथ अन्तमें समुद्रमें जाकर मिल जाती हैं उसी प्रकार कलाके मोहका त्याग तथा कलाकी प्रतिष्ठामें लीन हो जाता है ॥ २१३ ॥ वह अपने प्रारब्ध कर्मोंके भोगनेके पश्चात् ऐसा प्राप्त होता है कि जो उस परब्रह्मको जानता है वह साक्षात् ब्रह्म ही हो जाता है ॥ २१४ ॥ ... संसार बना है, वह सब ही चिदानन्दरूप ब्रह्म ही है। काण्डक श्रुति भी संसारके लिए इस प्रकार कहा गया है कि बस, वह ही पूर्ण है बाकी सब अपूर्ण है ॥ २१५ ॥ आदि, मध्य और अन्तमें सब पूर्ण ही पूर्ण है वह निर्विकल्प है पराक्षर रूप भी वही पूर्ण माना जा चुका है। २१६ ॥ वह प्रत्यक्षमें सब प्राणमयमें रहता है। इस पूर्णके निरूपणसे वह सोपाधि कहा जाता है ॥ २१७ ॥ वह शास्त्र और शाखा इन भारोंसे स्वयं अपनी अविद्यानावका नाश करता हुआ उपनिषद्की आलोक आधारपर सब काम करता है ॥ २१८ ॥ जबकि उसकी उपाधि नष्ट हो जाती है तो वह पूर्णरूपसे शेष होकर अकेला रह जाता है। जो दुख हरण करनेवाला है, वे योगियोंके ध्येय एकमात्र राम हैं ॥ २१९ ॥ समस्त धर्मोका निर्णय करते हुए श्रुतियों द्वारा भगवान्ने स्वयं यह कहा है कि मैं इस संसारका प्रभव (उत्पन्नकर्ता), और प्रलय (नाशक) हूँ ॥ २२० ॥ हे धनंजय मुझसे परे और कुछ है ही नहीं। यह समस्त विश्व मुझमें उसी तरह पिरोया हुआ है, जैसे धागेमें मणियाँके दाने पिरोये रहते हैं ॥ २२१ ॥ ऐसा भगवान्ने वेदोंमें कहा है। उसी तरह श्रुतियों और स्मृतियोंमें भी कहा है कि परब्रह्म राम जी