भारतकोश
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अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

दीपिकाटीकासहितः । ४५ त्वाज्ज्योतिष्टोमविकारः । अतस्ते त्रयोऽपि पशुयागाः साद्यस्के चोदकप्राप्ताः । तेषां च तत्र साहित्यं श्रुतं 'सह पशूनालभेत' इति । तच्च साहित्यं सवनी- यदेशे, तस्य प्रधानप्रत्यासत्तेः, स्थानातिक्रमसाम्याच्च । विकृति याग में आश्विनग्रहण के बाद ही सवनीय याग का स्थान है यह बत- लाने के लिये याग का पहले प्रकृति याग में सवनीय स्थान बतलाते हैं—ज्योतिष्टोम में तीन पशुयाग हैं—अग्नीषोमीय, सवनीय और आनुबन्ध्य । इन तीनों यागोंके अलग २ देश हैं । जैसे औपवसथ्यनामकदिनमें अग्नीषोमीयका और सुत्याकाल में सवनीयका तथा अवभृथके बाद आनुबन्ध्यका विधान है । साद्यस्क सोमयाग का नाम है । साद्यस्कमें किसी देवताका निर्देश नहीं है अतः यह याग ज्योतिष्टोम का विकृतियाग है । इसलिये “प्रकृतिवद् विकृतिः कर्तव्या” इस अतिदेशसे साद्यस्क यागमें भी पूर्वोक्त तीनों पशुयाग प्राप्त होते हैं । साद्यस्क यागमें ( सह पशूनालभेत ) इस वचनसे उन तीनों पशुयागोंमें साहित्य का श्रवण होता है । वह साहित्य सवनीयदेशमें ही होगा क्योंकि जैसे ज्योतिष्टोमरूपप्रकृति यागमें सुत्या ( सोमरस निकालनेका ) समयकालिक सवनीय को प्रधान ( सोम ) के साथ प्रत्यासत्ति ( सम्बन्ध ) है उसी तरह विकृति साद्यस्क यागमें भी सुत्याकालिक सवनीयका प्रधान ( सोम ) के साथ प्रत्यासत्ति है और सवनीयदेशमें साहित्य होनेसे ( केवल अग्नीषोमीय और आनुबन्ध्यके ही स्वस्व- स्थानका अतिक्रमण होता है । अतः साद्यस्कमें भी तीनोंका स्थान सवनीयदेश ( सुत्याकाल ) ही माना जाता है । सवनीयदेशे ह्यनुष्ठानेऽग्नीषोमीयानुबन्ध्ययोः स्वस्वस्थानातिक्रमो भवति ( प्रधानप्रत्यासत्तिलाभश्च । ) अग्नीषोमीयदेशे त्वनुष्ठाने सवनीयस्य स्व- स्थानातिक्रममात्रम् । अग्नीषोमीयस्य सवनीयस्थानातिक्रमः अनुबन्ध्यस्य तु स्वस्थानातिक्रमः सवनीयस्थानातिक्रमश्च स्यादिति त्रयाणां स्वस्वस्था- नातिक्रमः । एवमनुबन्ध्यदेशेऽग्नीषोमीयस्य द्रष्टव्यः स्थानातिक्रमः । तथा च सवनीयदेशे सर्वेषामनुष्ठाने कर्तव्ये सवनीयस्य प्रथममनुष्ठानम् । आश्विनग्रहणानन्तरं हि सवनीयदेशः । उक्त स्थानातिक्रममें लाघव बतलाते हैं, सवनीयदेश (सुत्याकाल)में अनुष्ठान करनेसे केवल अग्नीषोमीय और आनुबन्ध्यके ही अपने २ स्थानका अतिक्रमण

४६ : अर्थसंग्रहः - होता है और प्रधान (सोम) के साथ प्रत्यासत्तिका भी लाभ होता है किन्तु सवनीय का सुत्याकाल रूप स्वस्थान का अतिक्रमण नहीं होता है। और अग्नीषोमीय देश (औपवसथ्यदिन)में अनुष्ठान करने पर सवनीय का स्वस्थान (सुत्याकाल) का अतिक्रमण होता है एवं विकृति यागमें साहित्यविषयक “सह पशूनालभेत” इस विधिसे अग्नी- षोमीयपशुका जो सवनीय देश है उसका भी अतिक्रमण होता है इसी तरह आनुबन्ध्यपशुके स्वस्थान (अवभृथके बाद) का अतिक्रमण होता है और साहित्य-विधिसे प्राप्त सवनीय स्थान (सुत्याकाल) का अतिक्रमण होता है। एवं आनुबन्ध्यदेश (अवभृथान्त) में तीनोंके अनुष्ठान करनेसे सवनीयके स्वस्थान (सौत्यदिन) का अतिक्रमण (दूसरे स्थान पर चला जाना) होता है और आनुबन्ध्यपशुका साहित्य-विधिसे प्राप्त जो सवनीय देश है उसका अतिक्रमण होता है एवं अग्नीषोमीयपशुके स्वस्थान (औपवसथ्यदिन) का अतिक्रमण और पूर्वोक्त रीतिसे प्राप्त सवनीय देशका भी अतिक्रमण होता है। अतः सवनी- यदेशमें अनुष्ठान करने पर सवनीयपशुका स्वस्थानातिक्रमण नहीं होता है। अन्य देशोंमें करनेसे तो सबोंका स्वस्थानातिक्रमण होता है। इस लिये सवनीय देश में ही अनुष्ठान करना चाहिए। इस तरह सवनीय देशमें सब अनुष्ठानोंके निर्णय होने पर सर्वप्रथम सवनीयपशुका ही अनुष्ठान होगा। क्योंकि आश्विन (सोमग्रह) ग्रहणके अव्यवहित उत्तर कालमें ही उसकी उपस्थिति सर्वप्रथम होती है। प्रकृता- "वाश्विनंग्रहं कृत्वा त्रिवृता यूपं परिवीय आग्नेयं सवनीयं पशु- मुपाकरोती"त्याश्विनग्रहणानन्तरं सवनीयो विहित इति साद्यस्केऽप्याश्विन- ग्रहणे कृते सवनीय एवोपस्थितो भवति। अतो युक्तं तस्य स्थानात्प्रथम- मनुष्ठानमितरयोस्तु पश्चादित्युक्तम् । विकृति यागके सवनीय स्थानका निर्णायक प्रकृति याग सम्बन्धि सवनीय स्थान को श्रुतिसे सिद्ध करते हैं-प्रकृति (ज्योतिष्टोम) याग में (त्रिगुणितरज्जु) से यूप- का परिवेष्टन कर आश्विन (सोम ग्रह) ग्रहणको करनेके बाद सवनीयपशुका उपाकरण (स्पर्श) करना चाहिए इस तरह आश्विन ग्रहणके बाद सवनीय का देश सिद्ध होता है। अतः साद्यस्कमें भी आश्विन ग्रहण करनेके बाद सव- नीय ही उपस्थित होता है। इसलिये स्थान क्रमसे सवनीयपशुका सर्वप्रथम अनुष्ठान करना उचित है।

दीपिकाटीकासहितः । ४७ मुख्यक्रमलक्षणम् । प्रधानक्रमेण योऽङ्गानां क्रमः स मुख्यक्रमः । येन हि क्रमेण प्रधानानि क्रियन्ते तेनैव क्रमेण तेषामङ्गान्यनुष्ठीयन्ते चेत् तदा सर्वेषामङ्गानां स्वैः स्वैः प्रधानैस्तुल्यं व्यवधानं भवति । व्युत्क्रमेणानुष्ठाने केषांचिदङ्गानां स्वैः प्रधानैरत्यन्तमव्यवधानं केषांचिदत्यन्तं व्यवधानं स्यात् , तच्चायुक्तं, प्रयो- गविध्यवगतसाहित्यबाधापत्तेः । अतः प्रधानक्रमोऽप्यङ्गक्रमे हेतुः । अत एव प्रयाजशेषेणादावाग्नेयहविषोऽभिधारणं पश्चादैन्द्रस्य दध्नः, आग्नेयै- न्द्रयागयोः पौर्वापर्यात् । एवं च द्वयोरभिधारणयोः स्वस्वप्रधानेन तुल्यमे- कान्तरितं व्यवधानं, व्युत्क्रमेणाचारे त्वाग्नेयहविर्भिधारणाग्नेययागयो- रत्यन्तमव्यवधानम् , ऐन्द्रदध्यभिधारणैन्द्रयागयोर्द्वयन्तरितं व्यवधानं तच्चायुक्तमित्युक्तमेव । जिस क्रमसे प्रधानोंका अनुष्ठान किया जाय उसी क्रमसे अंगोंका जो अनु- ष्ठान किया जाय उसको मुख्य क्रम कहते हैं । क्योंकि जिस क्रमसे प्रधानोंका अनुष्ठान होता हो उसी क्रमसे यदि अंगोंका अनुष्ठान किया जाय तो सब अंगों का अपने २ प्रधानोंसे तुल्य व्यवधान होता है ( व्युत्क्रम ) विपरीत क्रमसे अनु- ष्ठान करने पर किसी अंगका अपने प्रधानके साथ अत्यन्त अव्यवधान ( सामी- प्य ) हो जायगा और किसी अंगका अपने प्रधानके साथ अत्यन्त व्यवधान ( दूर ) हो जायगा यह उचित नहीं है । क्योंकि प्रयोगविधिसे अंगोंके साथ प्रधान का जो साहित्य होता है उसका उच्छेद हो जायगा । इसलिये अंगोंके क्रममें प्रधानोंका क्रम कारण है । अतः अंग क्रममें प्रधान क्रमको कारण होनेसे ही प्रयाजके शेष ( अन्तभाग ) में प्रथम आग्नेय हविषका अभिधारण ( पिघला हुआ घृतसे अभिषेक ) होता है पश्चात् ऐन्द्रदधि हविषका अभिधारण होता है । क्योंकि प्रथम आग्नेय याग और पश्चात् ऐन्द्रयाग होता है यह बात पहले भी कह चुके हैं । इस तरहसे दोनों अभिधारणोंमें स्वस्व प्रधानसे एकान्तरित ( मध्यमें एक ) व्यवधान होता है । जैसे पहले आग्नेय हविषका अभिधारण तब ऐन्द्रदधिका अभिधारण बादमें आग्नेय याग तब ऐन्द्रयाग होनेसे आग्नेय हविष अभिधारण और आग्नेय यागके बीच केवल एक ऐन्द्रदधिका अभिधारण व्यवधान होता है एवं ऐन्द्रदध्यभिधारण और ऐन्द्रयागके मध्यमें केवल आग्नेय याग व्यवधान

४८ । अर्थसंग्रहः—

होता है। विपरीत क्रमसे करने पर आग्नेय हविष अभिघारण और आग्नेय याग में कोई व्यवधान नहीं होगा और ऐन्द्रदध्यभिघारण और ऐन्द्रयागमें दो व्यवधान होंगे। जैसे प्रथम ऐन्द्रदध्यभिघारण तब आग्नेय हविष अभिघारण उसके बाद आग्नेय याग तब ऐन्द्रयाग करने पर दो व्यवधान स्पष्ट हैं। ऐसा व्यवधान होना अनुचित है यह पहले कह चुके हैं। स च मुख्यः क्रमः पाठक्रमाद् दुर्बलः। मुख्यक्रमो हि प्रमाणान्तरसापे- क्षप्रधानक्रमप्रतिपत्तिसापेक्षतया विलम्बितप्रतिपत्तिकः। पाठक्रमस्तु निरपेक्षस्वाध्यायपाठक्रममात्रसापेक्षतया न तथेति बलवान्। स चायं मुख्यः क्रमः प्रवृत्तिक्रमाद् बलवान्। प्रवृत्तिक्रमे हि बहूनामङ्गानां प्रधा- नविप्रकर्षात्, मुख्यक्रमे तु संनिकर्षात्। यह मुख्य क्रम पाठक्रमसे दुर्बल है क्योंकि पहले प्रमाणान्तरसे प्रधान क्रमका ( प्रतिपत्ति ) ज्ञान होगा बादमें प्रधान क्रम ज्ञानसे मुख्य क्रमका ज्ञान होगा अतः मुख्य क्रमका ज्ञान विलम्बसे होगा। पाठक्रम में केवल स्वाध्याय पाठक्रम की ही अपेक्षा होती है और स्वाध्याय पाठक्रममें किसीकी अपेक्षा नहीं होती है। अतः पाठक्रम बलवान् है। जैसे दर्श-पूर्णमास में पूर्णिमामें उपांशु ( याग ) और अग्नीषोमीय याग कहे हैं। उनमें उपांशुयागका द्रव्य आज्य ( घृत ) है आज्यका धर्म उत्पवन ( ऊपर फेकना ) प्रभृति है। अग्नीषोमीय यागका द्रव्य पुरोडाश है। और उसका धर्म निर्वापन ( काटना ) अवघात प्रभृति है। यहां पर यह संशय होता है कि पहले आज्य धर्मका अनु- ष्ठान होना चाहिए अथवा पुरोडाश धर्मका अनुष्ठान होना चाहिये ? तब पूर्वपक्ष होता है कि प्रधान क्रमके अनुसारसे ही अंगोंका क्रम होता है। यहां पर पहले उपांशु याग है पश्चात् अग्नीषोमीय याग। अतः पहले उपांशुयागका द्रव्य आज्य धर्मका ही अनुष्ठान होना चाहिए पश्चात् पुरोडाश धर्मका। उसके बाद सिद्धान्त करते हैं कि प्रथम पुरोडाश धर्मका पाठ है पश्चात् आज्यधर्मका पाठ है। उनमें मुख्य क्रमसे आज्यधर्मका अनुष्ठान प्राप्त रहने पर भी उसको बाधकर पाठक्रम से पुरोडाश धर्मका ही अनुष्ठान करना चाहिए। क्योंकि वैदिक शब्दोंसे पाठ- क्रमका ज्ञान शीघ्र हो जाता है और मुख्य क्रमानुसारी क्रमका तो युक्तियोंसे कल्पना करने पर ज्ञान होता है। अतः पाठक्रमसे मुख्य क्रम दुर्बल है। परन्तु प्रवृत्ति क्रमसे मुख्यक्रम बलवान् होता है क्योंकि प्रवृत्ति क्रममें बहुतों अंगोंको

दीपिकाटीकासहितः । ४९ प्रधानके साथ विप्रकर्ष ( दूरता ) हो जाता है और मुख्य क्रममें अंगोंको प्रधान के साथ ( संनिकर्ष ) सामीप्य रहता है । जैसे दर्शपूर्णमास यागमें आग्नेय यागका अनुष्ठान होता है पश्चात् सांनाय्य ( दधि-दूध रूप हविविशेष ) का अनुष्ठान होता है सांनाय्यके वत्सापाकरण ( बछड़ेको हटाना ) दोहनादि अर्थात् दुग्धधर्म = वत्ससंयोग और हटाना एवं दुहना आदि धर्मोंका पहले अनुष्ठान होता है वहां यदि प्रवृत्तिक्रमसे अवदानाभिघारण प्रभृति सभी अंगोंका पहले ही अनुष्ठान हो पश्चात् आग्नेय धर्म=अवदानादिका अनुष्ठान तब आग्नेय यागका और बाद में सांनाय्य यागका अनुष्ठान किया जाय तो सभी सांनाय्य धर्मोंको अपने प्रधान सांनाय्य यागके साथ मध्यमें आग्नेय धर्मानुष्ठान और आग्नेय यागानुष्ठान दो से व्यवधान होगा । यदि वत्सापाकरण प्रभृति कितने धर्मोंका पहले अनुष्ठान करने पर भी अवदानादि दूसरे धर्मोंका अनुष्ठान मुख्य क्रमानुरोधसे आग्नेय धर्मानुष्ठान करनेके बाद ही करते हैं तब सभी आग्नेय और सान्नाय्य धर्मोंका अपने २ प्रधानके मध्यमें विजातीय एक २ व्यवधान होता है अर्थात् आग्नेय धर्मोंका सान्नाय्य धर्मोंसे और सान्नाय्य धर्मोंका आग्नेय यागसे व्यवधान होता है । अतः प्रवृत्तिक्रमसे मुख्य क्रम बलवान् है । प्रवृत्तिक्रमलक्षणम् । सहप्रयुज्यमानेषु प्रधानेषु संनिपातिनामङ्गानामावृत्त्यानुष्ठाने कर्तव्ये हि द्वितीयादिपदार्थानां प्रथमानुष्ठितपदार्थक्रमाद्यः क्रमः स प्रवृत्तिक्रमः । यथा प्राजापत्यपश्वङ्गेषु । प्राजापत्या हि 'वैश्वदेवीं कृत्वा प्राजापत्यैश्चर- न्ती'ति वाक्येन तृतीयानिर्देशात्सेतिकर्तव्यताका एककालत्वेन विहिताः, अतस्तेषां तदङ्गानां चोपाकरणनियोजनप्रभृतीनां साहित्यं संपाद्यम् । तच्च प्राजापत्यपशूनां संप्रतिपन्नदेवताकत्वेन युगपदनुष्ठानादुपपद्यते । तदङ्गानां चोपाकरणादीनां युगपदनुष्ठानमशक्यम् । अतस्तेषां साहित्यमव्यवहिता- नुष्ठानात्संपाद्यम् । अंगोंके साथ २ अनुष्ठान किये जानेवाले प्रधानोंमें ( संनिपातिनामंगानाम् ) सन्निपत्योपकारक अंगोंकी आवृत्तिसे अनुष्ठान कर्तव्य हो तो द्वितीयादि पदार्थोंका प्रथमानुष्ठित पदार्थ क्रमसे जो क्रम होता है उसको प्रवृत्तिक्रम कहते हैं । जैसे प्राजापत्य पशुओंके अंगोंमें “वैश्वदेवीं कृत्वा प्राजापत्यैश्चरन्ति” यहां पर प्राजा-

३. विनियोगक प्रमाण: श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान व समाख्या

५० : अर्थसंग्रहः - पत्यैः इस तृतीया श्रुतिसे इतिकर्तव्यताके साथ २ समानकालमें अंग और प्राजापत्य पशुओं ( प्रजापतिर्देवता यस्य सः प्राजापत्यः स एव पशुयागः ) का अनुष्ठान विहित है अतः प्राजापत्य और उनके अंगोंके उपाकरण-नियोजनादि ( यूपबन्धन ) का साहित्य-सम्पादन करना चाहिए । तच्चैकस्योपाकरणं विधायापरस्योपाकरणं विधेयम् । एवं नियोजनादि- कमपि । तथा च प्राजापत्येषु कस्माचित्पशोरारभ्य एकं सर्वत्रानुष्ठाय द्वितीयादिपदार्थस्तेनैव क्रमेणानुष्ठेयः स प्रवृत्तिक्रमः । सोऽयं श्रुत्यादिभ्यो दुर्बलः । तदेवं संक्षेपतो निरूपितः षड्विधक्रमनिरूपणेन प्रयोगविधिः । ( तच्च ) यह साहित्य प्राजापत्य पशुओंका प्रजापति देवताकाल-( वैश्वदेवी अनुष्ठानके बाद जो काल ) त्व प्राप्त होनेके कारण युगपत् ( एक कालमें ) अनुष्ठान करनेसे हो सकता है । परन्तु प्राजापत्य पशुओंके जो उपाकरणादि अंग हैं उनका युगपत् अनुष्ठान अशक्य है क्योंकि प्राजापत्य पशु १७ हैं उन सबको एक समयमें एक आदमी उपाकरण और नियोजनादि नहीं कर सकता है । इसलिये उपाकरणादि अंगोंका अव्यवधानसे अनुष्ठान द्वारा साहित्य हो सकता है । अर्थात् एक पशुका उपाकरण कर दूसरे पशुका उपाकरण करनेसे अव्यवधानेन साहित्य हो सकता है । इसी तरह एक पशुका नियोजन ( यूपमें बन्धन ) कर दूसरेका नियोजन करना चाहिए । वैसा करने पर प्राजापत्य पशुओंमें एक पशुसे आरम्भ कर सब पशुओंमें क्रमशः उपाकरण कर उसी क्रमसे नियोजनादि भी करना चाहिए । इसीको प्रवृत्तिक्रम कहते हैं । यह प्रवृत्तिक्रम श्रुत्यादिक्रमसे दुर्बल है । इस तरहसे संक्षेपमें ६ वों प्रकारके क्रमोंके निरूपणके साथ प्रयोगविधिका निरूपण हुआ ॥ अधिकारविधिलक्षणम् । कर्मजन्यफलस्वाम्यबोधको विधिरधिकारविधिः । कर्मजन्यफलस्वाम्यं कर्मजन्यफलभोक्तृत्वम् । स च 'यजेत स्वर्गकामः' इत्यादिरूपः । स्वर्गमु- द्दिश्य यागं विदधताऽनेन स्वर्गकामस्य यागजन्यफलभोक्तृत्वं प्रतिपाद्यते । 'यस्याहिताग्नेरग्निर्गृहान्दहेत्सोऽग्नये क्षामवतेऽष्टाकपालं निर्वपे दि'त्या- दिनाऽग्निदाहादौ निमित्ते कर्म विदधता निमित्तवतः कर्मजन्यपापक्षय- रूपफलस्वाम्यं प्रतिपाद्यते । एवं 'अहरहः सन्ध्यामुपासीते' त्यादिना

दीपिकाटीकासहितः । ५१ शुचिविहितकालजीविनः संध्योपासनजन्यप्रत्यवायपरिहाररूपफलस्वाम्यं बोध्यते । कर्म (यागादि) जन्य फल (स्वर्गादि) स्वाम्यके बोधक विधिको अधिकार विधि कहते हैं । कर्मजन्य फलभोक्तृत्व (भोग)-को ही कर्मजन्यफलस्वाम्य कहते हैं । कर्मके तीन भेद हैं नित्य, नैमित्तिक और काम्य । जिसको नहीं करने पर प्रत्यवाय (पातक) हो और करने पर प्रत्यवाय-परिहारके अतिरिक्त कोई विशेष फल नहीं हो उसे नित्य कर्म कहते हैं । जिसे नहीं करने पर प्रत्यवाय हो और करने पर फल मिले उसे नैमित्तिक कर्म कहते हैं । और जिसको नहीं करनेसे प्रत्यवाय नहीं हो और करनेसे फल हो उसे काम्य कर्म कहते हैं । इनमें काम्य कर्म के अधिकार विधिका उदाहरण देते हैं—"यजेत स्वर्गकामः" इत्यादि, यह विधि स्वर्ग- को उद्देश्य करके यागका विधान करती हुई स्वर्गकाम पुरुषको यागजन्य स्वर्ग- रूपफलभागी बतलाती है । एवं नैमित्तिक कर्ममें अधिकारविधिका उदाहरण देते हैं—'यस्याहिताग्नेरि'त्यादि । इसका यह अर्थ है कि जिस अग्न्याधान करनेवाले पुरुषोंका गृह अग्निसे जल जाय वह क्षाम (खिन्नता) गुणविशिष्ट अग्निको अष्टाकपाल (आठ कपालोंमें बनाया गया) पुरोडाश है । यह विधि अग्निदाहरूप निमित्तमें कर्म बतलाती हुई निमित्तवत्पुरुषको (जिनका घर जल गया है उनको) कर्मजन्यपापक्षयरूप फलभागी बतलाती है । अब नित्यकर्ममें अधिकार विधिका उदाहरण देते हैं 'अहरहः संध्यामुपासीत' यह विधि (शुचि) पवित्र होकर विहित कालमें जीनेवाले पुरुषोंको संध्योपासनजन्यप्रत्यवायपरिहाररूप फल- भागी बतलाती है । तच्च फलस्वाम्यं तस्यैव योऽधिकारविशिष्टः, अधिकारश्च स एव यद्वि- धिवाक्येषु पुरुषविशेषणत्वेन श्रूयते । यथा काम्ये कर्मणि फलकामना, नैमित्तिके कर्मणि निमित्तनिश्चयः, नित्ये संध्योपासनादौ शुचिविहितका- लजीवित्वम् । अत एव 'राजा राजसूयेन स्वाराज्यकामो यजेत' त्यनेन विधिवाक्येन स्वाराज्यमुद्दिश्य विदधतापि न स्वाराज्यमात्रकामस्य तत्फ- लभोक्तृत्वं प्रतिपाद्यते, किंतु राज्ञः सतः स्वाराज्यकामस्यैव, राजत्वस्या- प्यधिकारिविशेषणत्वेन श्रवणात् । जो व्यक्ति अधिकारविशिष्ट है उसीको फलभोक्तृत्व है । जिसका विधि वाक्यमें पुरुषविशेषणतया श्रवण हो वही अधिकार है । जैसे काम्यकर्ममें फल-

५२ : अर्थसंग्रहः— ( स्वर्गादि ) कामना, नैमित्तिककर्ममें निमित्त-( अग्निदाहादि ) निश्चय और नित्यसंध्योपासनादि कर्ममें शुचि-विहितकाल-जीवित्व । अतएव विधिवाक्यमें पुरुषका विशेषण होकर श्रूयमाणको अधिकार होनेके कारणसे ही 'स्वाराज्य चाहनेवाला राजा राजसूययाग करे' यह विधिवाक्य स्वाराज्यको उद्देश्य करके यागका विधान करता हुआ भी केवल स्वाराज्यकाम पुरुषको ही राजसूययाग-जन्यफलभागी नहीं बतलाता है । अपितु राजा होता हुआ स्वाराज्यकाम पुरुषको ही उक्त फल- भागी बनाता है क्योंकि विधि ('राजा राजसूयेने'त्यादि) वाक्यमें अधिकारिपुरुषमें राजत्वका विशेषणरूपसे श्रवण होता है । यहां राजशब्देन क्षत्रियमात्रका ग्रहण है, राज्यसम्बन्धी मात्रका ग्रहण नहीं है । अतः राजसूययाग करनेका अधिकार क्षत्रियको ही है दूसरेको नहीं है । क्वचित्तु पुरुषविशेषणत्वेनाश्रुतमप्यधिकारिविशेषणम् । यथाध्ययन- विधिसिद्धा विद्या, क्रतुविधीनामर्थज्ञानापेक्षणीयत्वेनाध्ययनविधिसिद्धार्थ- ज्ञानवन्तं प्रत्येव प्रवृत्तेः । एवमग्निसाध्यकर्मसु आधानसिद्धाग्निमत्ता । अग्निसाध्यकर्मणामग्न्यपेक्षत्वेन तद्विधीनामाधानसिद्धाग्निमंतं प्रत्येव प्रवृत्तेः । कहीं पर विधिवाक्यमें पुरुषका विशेषणरूपसे जिसका श्रवण नहीं है वह भी अधिकारीका विशेषण होता है । जैसे अध्ययनविधिसे विद्याका विधिवाक्यमें श्रवण नहीं रहने पर भी विद्या अधिकारीका विशेषण होती है अर्थात् वेदाध्ययनसे जिसको विद्यालाभ हुआ है उसीको यागमें अधिकार है क्योंकि ऋतु ( यज्ञ ) विधियोंमें अर्थज्ञानकी अपेक्षा होती है इसलिये अध्ययनसे अर्थज्ञानवालेको ही उद्देश्य करके ऋतु-विधिकी प्रवृत्ति होती है । इसी तरहसे अग्निसाध्य विधिमें आधान ( स्थापन ) से अग्निमत्ताका श्रवण नहीं रहने पर भी वह अधिकारी का विशेषण है अर्थात् जिसने अग्न्याधानसे अग्निका लाभ किया है उसीको अग्नि- साध्यकर्ममें अधिकार है क्योंकि अग्निसाध्यकर्मोंमें अग्निकी अपेक्षा रहती है अतः अग्निसाध्यविधिकी प्रवृत्ति आधानसिद्ध अग्निवालोंको उद्देश्य करके ही होगी । इन दोनों विशेषणोंसे यह सूचित होता है कि शूद्रको यागमें अधिकार नहीं है । क्योंकि 'उपनीय तु यः शिष्यं वेदमध्यापयेत्' इस वाक्यसे उपनयनोत्तर ही वेदाध्ययन का विधान है । उन्नयन ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यका ही होता है अतः शूद्रको वेदाध्ययनमें अधिकार ही नहीं है । एवं 'वसन्ते ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत' इस विधिसे

दीपिकाटीकासहितः । ५३ अग्न्याधानमें भी शूद्रको अधिकार नहीं है । यद्यपि 'रथकारोऽग्नीनादधीत', इस वाक्यसे रथकार ( शूद्रविशेष ) को भी अग्न्याधानमें अधिकार कहा गया है । यहां पर 'रथं करोती'ति इस विग्रहसे त्रैवर्णिकका ग्रहण नहीं होता है किन्तु 'योगाद् रूढिर्बलीयसी' योगसे रूढि बलवती होती है इस नियमसे जातिविशेष वाचक ही रथकार शब्द है । अर्थात् वैश्यामें क्षत्रियसे उत्पन्नको माहिष्य कहते हैं और शूद्रामें वैश्यसे उत्पन्नको करणी कहते हैं और करणीमें माहिष्यसे उत्पन्नको रथकार कहते हैं । श्रीयाज्ञवल्क्य मुनिका वचन भी है—'माहिष्येण करण्यान्तु रथकारः प्रजायते' इति । तथापि इस रथकारको उत्तरकर्ममें अधिकार नहीं है । जिस यागमें उक्त वचनसे शूद्रका अधिकार हो उस यागमें भी अपूर्वविद्याकी कल्पना करके ही अधिकार होता है दूसरे यागोंमें नहीं । एवं सामर्थ्यमपि 'आख्यातानामर्थं ब्रुवतां शक्तिः सहकारिणी'ति न्यायान् समर्थं प्रत्येव विधिप्रवृत्तेः । तदेवं निरूपितो विधिः । इसी तरह विधिवाक्योंमें अश्रुत सामर्थ्य भी अधिकारीका विशेषण होता है ! क्योंकि 'अर्थको कहनेमें आख्यात ( तिङन्त-यजेत ) का सहकारी कारण सामर्थ्य ( शक्ति ) होता है' इस न्यायसे समर्थ अधिकारीको उद्देश्य करके विधिकी प्रवृत्ति होती है । अधिकारीमें सामर्थ्यविशेषण देनेसे यह सूचित होता है कि अन्ध और बधिर प्रभृतिको यागमें अधिकार नहीं है । यहां पर यह विचारणीय विषय है कि अन्ध और बधिर प्रभृति जब चेतन हैं तब उनको भी निरतिशय- सुखरूप स्वर्गकी इच्छा हो सकती है अतः यागमें उनका अधिकार क्यों नहीं है । यदि कहें कि अन्धको आज्य देखनेका सामर्थ्य नहीं है एवं बधिरको अध्वर्युप्रोक्त- मन्त्रश्रवणका सामर्थ्य नहीं है अतः यागमें अधिकार नहीं है तो भी वे यथाशक्ति अंगों का अनुष्ठान कर सकते हैं । क्योंकि 'यजेत स्वर्गकामः' इस प्रधानवाक्यसे सबको अधिकार की प्रतीति होती है अतः अन्धप्रभृतिको भी यागमें अधिकार होना चाहिये । इसका उत्तर कहते हैं कि यदि आज्यादिका अवेक्षणादि पुरुषार्थरूप से विहित किया जाता तो अवेक्षणादि-सामर्थ्य न रहने पर भी यागमें वैकल्य ( अङ्गका नाश ) नहीं होता किन्तु अवेक्षण ( देखना ) प्रभृति यागका ही अंग रूपसे विहित है । उस अंगको नहीं करने पर यागमें वैकल्य होनेसे यागका सम्पन्न नहीं होगा अतः यागमें अन्धप्रभृति असमर्थोंका अधिकार नहीं है । इस तरहसे विधिका निरूपण हुआ ॥

५४ : अर्थसंग्रहः - अथ मन्त्रमीमांसा । प्रयोगसमवेतार्थस्मारका मन्त्राः । तेषां च तादृशार्थस्मारकत्वेनैवा- र्थवत्त्वम् । नतु तदुच्चारणमदृष्टार्थम् , संभवति दृष्टफलकत्वेऽदृष्टफलकल्प- नाया अन्याय्यत्वात् , न च दृष्टस्यार्थस्मरणस्य प्रकारान्तरेणापि संभवा- न्मन्त्राम्नानं व्यर्थमिति वाच्यम् । मन्त्रैरेव स्मर्तव्यमिति नियमविध्याश्रय- णात् । प्रयोग ( समवेत ) सम्बद्ध जो अर्थ ( प्रयोजन ) है उसका स्मारक मन्त्र है । मन्त्रका ही प्रयोजन है कि प्रयोगसमवेत अर्थका स्मरण करावे किन्तु मन्त्रोच्चारण का अदृष्ट प्रयोजन नहीं है क्योंकि दृष्टफलकी संभावना रहने पर अदृष्टफलकी कल्पना करना अनुचित है । यहां पर यह शंका होती है कि अर्थस्मरणरूपदृष्ट प्रयोजनका ब्राह्मण-वाक्योंसे भी सम्भव है अतः उसके लिये मंत्रोच्चारण करना व्यर्थ है । इसका उत्तर करते हैं कि 'मन्त्रोंसे ही अर्थका स्मरण करे' इस नियम विधिका आश्रयण करनेसे मंत्रका उच्चारण व्यर्थ नहीं होगा ॥ नियमविधिः । नानासाधनसाध्यक्रियायामेकसाधनप्राप्तावप्राप्तस्यापरसाधनस्य प्राप- को विधिर्नियमविधिः । यथाहुः 'विधिरत्यन्तमप्राप्तौ नियमः पाक्षिके सति । तत्र चान्यत्र च प्राप्तौ परिसंख्येति गीयत' इति । अस्यार्थः - प्रमाणान्तरेणाप्राप्तस्य प्रापको विधिरपूर्वविधिः, यथा 'यजेत स्वर्गकाम' इत्यादिः । स्वर्गार्थतयागस्य प्रमाणान्तरेणाप्राप्तस्यानेन विधानात् । जहां पर अनेकों कारणोंसे क्रियाकी सिद्धि सम्भव हो उनमें एक कारणके प्राप्त रहने पर अप्राप्त दूसरे कारणोंका प्रापक ( प्राप्ति करानेवाली ) विधिको नियमविधि कहते हैं । नियमविधिमें प्रमाण बतलाते हैं - 'विधिरत्यन्तमप्राप्तौ' इत्यादि । इसमें प्रथम चरणका यह अर्थ है कि प्रमाणान्तरसे अप्राप्तका विधायक जो विधि उसे अपूर्व विधि कहते हैं जैसे 'यजेत स्वर्गकामः' स्वर्गके लिये प्रमाणान्तरसे अप्राप्तयागका इससे विधान किया गया है। अतः 'यजेत स्वर्गकामः' यह अपूर्वविधि है॥ पक्षेऽप्राप्तस्य प्रापको विधिर्नियमविधिः । यथा 'व्रीहीनवहन्ति' त्या- दिः । कथमस्य पक्षेऽप्राप्तप्रापकत्वमिति चेदित्थम् । अनेन ह्यवघातस्य वैतुष्यार्थत्वं न प्रतिपाद्यतेऽन्वयव्यतिरेकसिद्धत्वात् । किंतु नियमः । स

दीपिकाटीकासहितः। ५५ चाप्राप्तांशपूरणम्। वैतुष्यस्य हि नानोपायसाध्यत्वाद्यदावघातं परित्यज्य उपायान्तरं ग्रहीतुमारभते, तदावघातस्याप्राप्तत्वेन तद्विधाननामकमप्राप्तां- शपूरणमेवानेन विधिना क्रियते। अतश्च नियमविधावप्राप्तांशपूरणात्मको नियम एव वाक्यार्थः। पक्षेऽप्राप्तावघातस्य विधानमिति यावत्। द्वितीयचरणका अर्थ और उदाहरण कहते हैं—पक्षमें अप्राप्तका प्रापक विधान को नियत विधि कहते हैं। जैसे ‘व्रीहीनवहन्ति’ आदि। यह विधि पक्षमें अप्राप्त का प्रापक कैसे होती है यह बतलाते हैं—इस विधिसे (वैतुष्य) तुषविमोकके लिये अवघात (मुशलसे कूटना) का विधान नहीं है क्योंकि यह अन्वयव्यतिरेक- सिद्ध है, अर्थात् अवघातादि होनेपर व्रीहिका तुषविमोक होगा और अवघातादि नहीं होने पर तुषविमोक नहीं होगा इस तरहके अन्वयव्यतिरेकसे ही वैतुष्यके लिये अवघात सिद्ध है अतः अवघातका अत्यन्त अप्राप्त नहीं होनेसे उसका विधान नहीं हो सकता है। किन्तु ‘व्रीहीनवहन्ति’ यह नियम विधि है, अर्थात् अवघातसे ही तुषविमोक करना चाहिए। यह नियम अप्राप्तांशका पूरक है क्योंकि अवघात और नखविदलन प्रभृति अनेकों उपायोंसे वैतुष्य हो सकता है। उनमें जब अवघातको छोड़कर नखविदलनसे ही तुषविमोक करना प्रारम्भ करते हैं तब अवघात अप्राप्त हो जाता है अतः उस वाक्यसे अवघात-विधान नामक अप्राप्तांशपूरणका ही विधान होता है। इसलिये नियम विधिमें अप्राप्तांशपूरणात्मक नियम ही वाक्यार्थ है। अर्थात् नियम विधिसे पक्षमें अप्राप्त अवघातका विधान होता है ॥ परिसंख्याविधिः । उभयोश्च युगपत्प्राप्तावितरव्यावृत्तिपरो विधिः परिसंख्याविधिः । यथा—‘पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या’ इति । इदं हि वाक्यं न पञ्चनखभक्षणं, तस्य रागतः प्राप्तत्वात् । नापि नियमपरं, पञ्चपञ्चनखभक्षणस्य युग- पत्प्राप्तेः पक्षेऽप्राप्त्यभावात् । अत इदमपञ्चनखभक्षणनिवृत्तिपरमिति भवति परिसंख्याविधिः । तृतीय और चतुर्थ चरण की व्याख्या करते हैं। युगपत् (एक समय) में दो की प्राप्ति रहने पर दूसरों की (व्यावृत्ति) निवृत्तिपरक वावयको ही परिसंख्या विधि कहते हैं। जैसे—"पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या ब्रह्मक्षत्रेण राघव। शशकः शल्लकी गोधा खड्गी कूर्मोऽथ पञ्चमः” खरगोश, शाही, गोह, गेंडा, कूर्म, इत्यादि, इस-

५६ अर्थसंग्रहः— वाक्यसे पञ्चनख-भक्षणका विधान नहीं है क्योंकि रागसे ही पञ्चनख-भक्षण प्राप्त है अत्यन्त अप्राप्त नहीं है अतः विधि भी नहीं है। एवं नियमपरक भी नहीं है क्योंकि एक कालमें शशकादि पञ्च पञ्चनखोंका भक्षण और शशकादिपञ्चभिन्न पञ्चनखोंका भक्षण प्राप्त होनेसे पक्षमें अप्राप्त नहीं है। अतः अपूर्व विधि और नियमविधि नहीं हो सकती है अपितु परिशेषात् परिसंख्या विधि होगी इस वाक्यसे शशकादि-पञ्चभिन्न पञ्चनख-भक्षण की निवृत्ति होती है। वस्तुतः उक्तपञ्च- पञ्चनखभिन्न पञ्चनख-भक्षणका निवृत्तिपरक वाक्य है ॥ परिसंख्यायाः श्रौतीत्वलाक्षणिकीत्वभेदौ । सा च द्विविधा-श्रौती लाक्षणिकी चेति। तत्र 'अत्र ह्येवावयन्ती'ति श्रौती परिसंख्या। एवकारेण पवमानातिरिक्तस्तोत्रव्यावृत्तेरभिधानात्। 'पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या' इति तु लाक्षणिकी इतरनिवृत्तिवाचकपदाभावात्। अत एवैषा त्रिदोषग्रस्ता। परिसंख्याके दो भेद हैं—श्रौती और लाक्षणिकी। उनमें श्रौती परिसंख्या का उदाहरण है—'अत्र ह्येवावयन्ति' यहां पर अवयन्तिका गायन (गान) अर्थ है। इस वाक्यमें श्रुत एवकारसे पवमान (स्तोत्र विशेषका नाम है) से अतिरिक्त स्तोत्र की निवृत्ति होती है। लाक्षणिकी परिसंख्याका उदाहरण है—"पञ्च पञ्च- नखा भक्ष्याः” । क्योंकि यहां इतरनिवृत्तिवाचक कोई पद नहीं है किन्तु लक्षणासे इतर की निवृत्ति करनी होती है इसलिये इस परिसंख्यामें तीन दोष हैं ॥ परिसंख्याया दोषत्रयम् । दोषत्रयं च श्रुतहानि-रश्रुतकल्पना प्राप्तबाधश्चेति । तदुक्तम्-‘श्रुता- र्थस्य परित्यागादश्रुतार्थप्रकल्पनात् । प्राप्तस्य बाधादित्येवं परिसंख्या त्रिदू- षणा' इति । श्रुतस्य पञ्चनखभक्षणस्य हानात् , अश्रुताऽपञ्चनखभक्षणनि- वृत्तेः कल्पनात् , प्राप्तस्य चापञ्चनखभक्षणस्य बाधादिति । अस्मिंश्च दोष- त्रये दोषद्वयं शब्दानिष्ठम् । प्राप्तबाधस्त्वर्थनिष्ठ इति दिक् । उक्त परिसंख्यामें तीनों दोषोंको बतलाते हैं—श्रुतहानि, अश्रुतकी कल्पना और प्राप्तका बाध । इसमें प्रमाण देते हैं-‘श्रुतार्थस्ये'त्यादि । अर्थ स्पष्ट है। उक्त तीनों दोषोंका समन्वय करते हैं—'पञ्च पञ्चनखा भक्ष्याः' इस वाक्यमें श्रुत पञ्च पञ्चनखभक्षण विधानका त्याग करना पड़ता है। तथा अश्रुत शशकादिपञ्च-

दीपिकाटीकासहितः । ५७ भिन्न-पञ्चनखभक्षणाभावकी कल्पना करनी पड़ती है और रागतः प्राप्तः उक्त पञ्चपञ्चनखभक्षणका बाध भी करना पड़ता है । इन तीनों दोषोंमें श्रुतार्थहानि और अश्रुतार्थकल्पना शब्दके दोष हैं और प्राप्तबाध अर्थका दोष है । येषां तु प्रयोगसमवेतार्थस्मारकत्वं न संभवति तदुच्चारणस्यानन्यग- त्याऽदृष्टार्थकत्वं कल्प्यत इति नानर्थक्यमिति । अब यह शंका होती है कि यदि मन्त्रोच्चारणका प्रयोजन प्रयोगसमवेतार्थ- स्मरण ही है तो 'हुं फट्' आदि मन्त्रोंसे किसी अर्थका स्मरण नहीं होता । अतः वह मन्त्र व्यर्थ हो जायगा । इसका उत्तर देते हैं कि जिन मन्त्रोंसे प्रयोग सम- वेत अर्थ का स्मरण नहीं होता है, उन मन्त्रोंका उच्चारण (अनन्य- गत्या ) दूसरा उपाय नहीं रहनेके कारण अदृष्टार्थ ही मानना चाहिये । अथ नामधेयमीमांसा । नामधेयानां च विधेयार्थपरिच्छेदकतयार्थवत्त्वम् । तथा हि-'उद्भिदा यजेत पशुकाम' इत्यत्रोद्भिच्छब्दो यागनामधेयं तेन च विधेयार्थपरि- च्छेदः क्रियते । तथा हि-अनेन वाक्येनाप्राप्तत्वात्फलोद्देशेन यागो विधी- यते । यागसामान्यस्याविधेयत्वात् यागविशेष एव विधीयते । तत्र कोऽ- सौ यागविशेष इत्यपेक्षायामुद्भिच्छब्दादुद्भिद्रूपो याग इति ज्ञायते । 'उद्भिदा यागेन पशुं भावयेदि'त्यत्र सामानाधिकरण्येन नामधेयान्वयात् । विधेयार्थपरिच्छेदकतया विजातीयके निवृत्तिपूर्वक विधेयार्थका निश्चय करता हुआ नामधेय सार्थक होता है । जैसे 'उद्भिदा यजेत पशुकामः' यहां पर उद्भिद् शब्द यागका वाचक है उद्भिद् शब्दसे विधेयार्थका निश्चय होता है । क्योंकि 'उद्भिदा यजेत' इस वाक्यसे गो आदि पशुरूप फलको उद्देश्य करके अप्राप्त यागका विधान होता है । किन्तु याग सामान्यका यहां विधान नहीं है क्योंकि कारणमें वैलक्षण्यके बिना कार्यमें वैलक्षण्य नहीं होता है अतः याग- विशेषका ही विधान होता है । वह यागविशेष कौन है इस तरहकी आकांक्षा होने पर उद्भिद् रूप यागविशेषका ज्ञान होता है क्योंकि 'उद्भिदा यागेन पशुं भावयेत्' यहां पर उद्भिद् और यागको ( सामानाधिकरण्य ) अभेदसे अन्वय होता है अतः उद्भिद् यागका नाम है ।

५८ अर्थसंग्रहः— नामधेयत्वे निमित्तचतुष्टयम् । नामधेयत्वं च निमित्तचतुष्टयात् । मत्वर्थलक्षणाभयाद्वाक्यभेदभयात्त- त्प्रख्यशास्त्रात्तद्व्यपदेशाच्चेति । निम्न चार निमित्तोंसे नामधेयत्व होता है । ( १ ) मत्वर्थ लक्षणाके भयसे । ( २ ) वाक्यभेदके भयसे । ( ३ ) तत्प्रख्य शास्त्रसे और ( ४ ) तद्व्यपदेशसे । नामधेयत्वस्य मत्वर्थलक्षणाप्रसङ्गरूपप्रथमनिमित्तोदाहरणम् । तत्र 'उद्भिदा यजेत पशुकाम' इत्यत्रोद्भिच्छब्दस्य यागनामधेयत्वं मत्वर्थलक्षणाभयात् । तथा हि न तावदनेन वाक्येन फलं प्रति यागविधा- नम् , तं प्रति च गुणविधानं युज्यते, वाक्यभेदापत्तेः । उद्भिच्छब्दस्य गुणसमर्पकत्वे च यागस्याप्यप्राप्तत्वात् गुणविशिष्टकर्मविधानं वाच्यम् । 'उद्भिद्वता यागेन पशुं भावयेदि'ति विशिष्टविधौ च मत्वर्थलक्षणेत्युक्तमेव । 'उद्भिदा यजेत पशुकामः' यहां पर मत्वर्थ लक्षणाके भयसे उद्भिद् शब्द यागका नाम है क्योंकि 'उद्भिदा यजेत' इस वाक्यसे पशुरूप फलको उद्देश्य करके यागका विधान और 'उद्भिद्यते भूमिः अनेन' इस विग्रह द्वारा यागको उद्देश्यकर खनित्र (कुदारी) का विधान नहीं कर सकते हैं क्योंकि दो विधेय होनेसे वाक्यभेद हो जायगा । यहां पर शंका उठती है कि 'दध्ना जुहोति' इस वाक्यसे जैसे गुणमात्रका विधान होता है उसी तरह खनित्ररूप गुणमात्रका ही विधान करना चाहिये । और जैसे 'गोदोहनेन पशुकामस्य' यहां पर गो- दोहनरूप गुणका फल पशु है उसी तरहसे 'खनित्ररूप गुणका फल पशु होगा' इस तरहसे 'उद्भिदा यजेत' यह गुण विधि ही होगी । इसका समाधान करते हैं—'पशुकामः' और 'यजेत' इन दोनों पदोंका अर्थ यह होता है कि यागसे पशु रूप फलकी भावना करे । इसके बाद 'किस यागसे' ? ऐसी आकांक्षा होने पर 'उद्भिदा' इस तृतीयान्त पदका यागनामधेयत्वसे अन्वय होता है । 'उद्भिद्यते प्राप्यते पशुफलमनेन यागेन' इस विग्रहसे भी यागका नाम उद्भिद् होता है । तथा हि उद्भिदा और यागेन इन दोनोंका अभेदान्वय ही नामधेयका निश्चय करता है । खनित्ररूप गुण विधान करने पर 'खनित्रसे साध्य किये जानेवाले यागसे पशुकी भावना करे' इस तरह अर्थ होने पर वैयधिकरण्येन (भेदसम्ब- न्धेन) अन्वय करना होगा । लेकिन अभेद सम्बन्धसे अन्वयका सम्भव हो तो भेद (खनित्रसाध्यत्व) सम्बन्धसे अन्वय अनुचित है । और उद्भिद् शब्द

दीपिकाटीकासहितः। ५९ का खनित्र रूप गुण अर्थ करने पर जिस यागमें वह गुण होगा वह याग भी प्रमाणान्तरसे अप्राप्त है अतः उसी वाक्यसे यागका भी विधान करके खनित्र रूप गुण विशिष्ट यागका विधान होगा। यह विशिष्ट विधान मत्वर्थ लक्षणाके विना नहीं हो सकता है। अतः मत्वर्थ लक्षणा में गौरव होगा। मत्वर्थ लक्षणा नहीं माननेसे वाक्यभेद होगा। यह विषय विध्यर्थ निरूपणमें 'सोमेन यजेत' यहां पर कह आये हैं अतः उद्भिद् शब्दका याग नाम ही मानना सर्वथा उचित है। नामधेयत्वस्य वाक्यभेदप्रसङ्गरूपद्वितीयनिमित्तोदाहरणम्। 'चित्रया यजेत पशुकाम' इत्यत्र चित्राशब्दस्य कर्मनामधेयत्वं वाक्य- भेदभयात्। तथा हि न तावदत्र गुणविशिष्टयागविधानं संभवति । 'दधि मधु पयो घृतं धाना उदकं तण्डुलास्तत्संसृष्टं प्राजापत्यमि'त्यनेन गुण- स्य विहितत्वात्तद्विशिष्टयागविध्यनुपपत्तेः। यागस्य फलसंबन्धे गुणसंबन्धे च विधीयमाने वाक्यभेदः। तस्माच्चित्राशब्दः कर्मनामधेयम्। तथा च 'चित्रायागेन पशुं भावयेदि'ति सामानाधिकरण्येनान्वयान्न वाक्यभेदः। “चित्रया यजेत पशुकामः”, यहां पर वाक्यभेदके भयसे चित्रा शब्द यागका नाम होता है। जैसे 'चित्रया यजेत' यहां चित्रवर्ण रूप गुण विशिष्ट यागका विधान नहीं होता है क्योंकि 'दधि मधु पयो घृतं' इत्यादिसे गुण विहित है अतः गुण विशिष्ट यागका विधान नहीं हो सकता है। 'दधि मधु' इत्यादिका अर्थ है कि दधि मधु दूध घृत धान जल और चावल इन द्रव्योंसे युक्त (तत्संसृष्ट) प्रजापति- देवताक याग होता है अतः दध्यादि गुणका स्पष्टतः विधान है। यदि यागमें पशुरूप फलके सम्बन्धका और चित्रवर्ण रूप गुणके सम्बन्धका विधान करेंगे तो वाक्यभेद हो जायगा। अतः चित्राशब्द याग विशेषका नाम है। तब 'चित्रा- यागसे पशु की भावना करे' यहां पर चित्रा और यागका सामानाधिकरण्य (अभेद) से अन्वय होता है अतः वाक्यभेद नहीं है। प्रकृतेष्टेरनेकद्रव्यत्वेन चित्राशब्दवाच्यत्वोपपत्तिः। प्रकृतेष्टि = प्रकृतयाग अर्थात् चित्रायाग दध्यादि अनेक द्रव्योंसे होता है। अतः चित्रा शब्दार्थ की भी उपपत्ति होती है। यहां पर यह शंका उठती है कि चित्रा शब्दसे चित्रत्व और स्त्रीत्वका ज्ञान होता है। स्त्रीत्व प्राणीका धर्म है अतः दध्यादि कर्मक यागमें उसका विशेषण नहीं हो सकता। इसलिये 'चित्रया यजेत' इस वाक्यमें यजेत पदसे 'अग्नीषोमीयं पशुमालभेत' एतद्विहित अग्नीषो- ५ अ० सं०

६० अर्थसंग्रहः मीयपशु यागका अनुवाद कर उसमें चित्रत्व और स्त्रीत्वका विधान हो सकता है तब चित्राशब्द याग विशेषका नाम कैसे होगा । इसका उत्तर करते हैं कि प्राप्तकर्ममें अनेक गुणोंका विधान होनेसे वाक्यभेद हो जाता है अतः अग्नीषो- मीय पशु यागमें चित्रत्व और स्त्रीत्व गुणोंका विधान होनेसे वाक्यभेद दुर्वार होगा। अभियुक्तोंका कथन भी है 'प्राप्ते कर्मणि नानेको विधातुं शक्यते गुणः। अप्राप्ते तु विधीयन्ते बहवोऽप्येकयत्नतः।' अतः चित्राशब्द यागविशेषका ही नाम है। तत्प्रख्यशास्त्रात्नामधेयत्वम् । 'अग्निहोत्रं जुहोति' त्यत्राग्निहोत्रशब्दस्य कर्मनामधेयत्वं तत्प्रख्यशा- स्त्रात् । तस्य गुणस्य प्रख्यापकस्य प्रापकस्य शास्त्रस्य विद्यमानत्वात् , अग्निहोत्रशब्दः कर्मनामधेयमिति यावत् । 'अग्निहोत्रं जुहोति' तत्प्रख्य शास्त्रसे अग्निहोत्र शब्द याग विशेषका नाम है। तत्प्रख्य शास्त्रका अर्थ करते हैं कि (तस्य) गुणका (प्रख्यापक) प्रापक अर्थात् प्राप्ति करानेवाला शास्त्र अर्थ है अतः अग्निहोत्र शब्द कर्मनामधेय है । नन्वयं गुणविधिरेव कुतो नेति चेन्न। यद्यग्नौ होत्रमस्मिन्निति सप्तमीसमासमाश्रित्य होमाधारत्वेनाग्निरूपो गुणो विधेयस्तदा 'यदाहव- नीये जुहोती'त्यनेनैवाग्नेः प्राप्तत्वात्तद्विधानानर्थक्यम् । अग्नये होत्र- मिति चतुर्थीसमासमाश्रित्य अग्निदेवतारूपगुणोऽनेन विधीयत इति चेन्न । तद्देवतायाः शास्त्रान्तरेण प्राप्तत्वात् । यहां शंका उठती है कि 'अग्निहोत्रं जुहोति' इस वाक्यसे गुणका ही विधान है नामधेय नहीं है। इसका उत्तर देते हैं कि अग्निहोत्र शब्दमें 'अग्नौ होत्रं अस्मिन्' इस विग्रहसे यदि सप्तमी समास मानकर यागका आधार अग्नि है। अतः अग्नि रूप गुणका विधान करेंगे तो 'यदाहवनीये जुहोति' इसीसे अग्नि रूपाधिकरण प्राप्त है पुनः उसका विधान करना व्यर्थ होगा। 'अग्नये होत्रम्' ऐसे चतुर्थी समास मानकर अग्निरूप देवताका भी विधान नहीं कर सकते क्योंकि— अग्निरूप देवता शास्त्रान्तरसे ही प्राप्त है अतः अग्निहोत्र नामधेय है । देवतारूपेणाग्नि प्रापकशास्त्रप्रश्नः । किं तच्छास्त्रान्तरमिति चेत् । 'यदग्नये च प्रजापतये च सायं जुहो- ती'ति केचित् । अपरे तु 'अग्निज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहे'ति मन्त्रवर्ण एवा- ग्निरूपदेवताप्रापकः ।

दीपिकाटीकासहितः । ६१ यहां पर यह प्रश्न होता है कि अग्निरूप देवता का प्रापक कौन शास्त्र है ? इसका उत्तर कोई देते हैं कि 'यदग्नये च' इत्यादि अग्नि देवता का प्रापक शास्त्रा- न्तर है । यहां पर केचित् पद से यह अस्वरस सूचित होता है कि 'अग्निर्ज्योति- रित्यादि मंत्र वर्ण से प्राप्त अग्नि का अनुवाद कर 'यदग्नये चे'त्यादि मंत्र से केवल अग्नि समुचित प्रजापतिमात्रका ही लाघव से विधान किया जाता है अतः 'यदग्नये च' इत्यादि शास्त्र अग्निदेवता प्रापक नहीं हो सकता है । अतः सिद्धान्त उत्तर 'अपरे तु' इत्यादि ग्रन्थ से देते हैं । (अपरे तु) सिद्धान्तवेत्ता कहते हैं कि 'अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा' यह मन्त्र वर्ण ही अग्नि रूप देवताका प्रापक है । नन्वग्नेर्मान्त्रवर्णिकत्वे प्रजापतिदेवतया बाधः स्यात् । मन्त्रवर्णस्य चतुर्थीतो दुर्बलत्वात् । यथाहुः-'तद्धितेन चतुर्थ्या वा मन्त्रवर्णेन वा पुनः । देवताया विधिस्तत्र दुर्बलं तु परं परम्'ति चेन्न । 'यदग्नये च प्रजा- पतये च सायं जुहोती'त्यत्र न केवलं प्रजापतिविधानम् , किन्तु मन्त्रव- र्णप्राप्तमग्निमनूद्य तत्समुचितप्रजापतेः । एवं च न बाधः, केवलप्रजाप- तिविधानाभावात् । न चात्र समुच्चितोभयविधानमेव कथं नेति वाच्य- म् । समुच्चितोभयविधानापेक्षयान्यतः प्राप्तमग्निमनूद्य तत्समुचितप्रजा- पतिमात्रविधाने लाघवात् । यहां पर यह शंका उठती है कि मंत्रवर्णसे यदि अग्निकी प्राप्ति मानेंगे तो प्रजापतिसे बाध होगा क्योंकि 'प्रजापतये' यहां पर चतुर्थीसे देवताकी उपस्थिति है और मंत्र वर्णमें देवता वाचक कोई पद नहीं है । अतः मंत्रवर्ण दुर्बल है । यद्यपि सम्प्रदानमें चतुर्थी होती है अतः चतुर्थीसे देवताका स्मरण नहीं हो सकता है तथापि इज्यमान द्रव्यका उद्देश्य और ग्रहण करनेवाला ही सम्प्रदान होता है और इज्यमान द्रव्यका उद्देश्य देवता है इसलिये सम्प्रदानके अन्दर देवताका प्रवेश हो गया है अतः सम्प्रदानसे देवताका स्मरणमें कोई बाधक नहीं है । अतः मंत्रवर्ण चतुर्थीसे दुर्बल है । अभियुक्तोंका कथन भी है कि 'तद्धित, चतुर्थी और मंत्रवर्णसे देवताका विधान होता है उनमें उत्तरोत्तर दुर्बल है अर्थात् तद्धितसे चतुर्थी और चतुर्थीसे मंत्रवर्ण दुर्बल है ।' तब अग्निदेवता प्रापक मंत्रवर्ण कैसे होगा । इसका समाधान इस तरह करते हैं कि 'यदग्नये च प्रजापतये' इत्यादिसे केवल प्रजापतिका विधान नहीं है किन्तु मन्त्रवर्णसे प्राप्त अग्निका

६२ अर्थसंग्रहः— अनुवाद कर अग्नि समुच्चित प्रजापतिका विधान है अतः विना मंत्रवर्णके 'यदग्नये च' इत्यादिसे विधान नहीं हो सकता । अतः प्रजापतिसे मंत्रवर्णका बाध नहीं होगा क्योंकि उपजीव्यविरोध लगेगा । 'यदग्नये च' इसीसे अग्निविशिष्ट प्रजापति अर्थात् अग्नि और प्रजापति दोनोंका विधान नहीं हो सकता । क्योंकि समुच्चित दोनोंके विधानकी अपेक्षा दूसरोंसे प्राप्त अग्निका अनुवादकर अग्नि समुच्चित प्रजापति मात्रके विधानमें लाघव है । एवं प्रयाजेषु समिदादिदेवतानां 'समिधः समिधो अग्न आज्यस्य व्य- न्त्वि'त्यादिमन्त्रवर्णैभ्यः प्राप्तत्वात् । 'समिधो यजती' त्यादिषु समिदा- दिशब्दास्तत्प्रख्यशास्त्रात्कर्मनामधेयम् । इसी तरह प्रयाजमें समिदादि देवताओंकी प्राप्ति 'समिधः समिधो अग्न' इत्यादि- मंत्रवर्णसे होती है । अतः 'समिधो यजति' इत्यादिमें समिध प्रभृति शब्द यागका नाम है । तद्व्यपदेशेन कर्मनामधेयत्वम् । 'श्येनेनाभिचरन्यजेते' त्यत्र श्येनशब्दस्य कर्मनामधेयत्वं तद्व्यपदे- शात् । तेन व्यपदेशादुपमानात्तदन्यथानुपपत्तेरिति यावत् । तथा हि यद्विधेयं तस्य स्तुतिर्भवति । यद्यत्र श्येनो विधेयः स्यात् , तदर्थवादैस्त- स्यैव स्तुतिः कार्या । अत्र 'यथा वै श्येनो निपत्यादत्त' इत्यनेनार्थवादेन श्येनः स्तोतुं न शक्यः, श्येनोपमानेनार्थान्तरस्तुतेः क्रियमाणत्वात् । 'श्येनेनाभिचरन् यजेत', यहां पर श्येन शब्द यागका नाम है । इस वाक्यसे सोमयागमें सोमरूप द्रव्यको बाधकर सोमके स्थानमें श्येन पक्षिरूप गुणका विधान नहीं होता क्योंकि तद्व्यपदेश ( कथन ) रूप हेतुसे श्येन नामक यागका ही विधान होता है । तद्व्यपदेश शब्दका अर्थ करते हैं कि ( तेन ) श्येनसे ( व्यप- देशात् ) उपमानसे अर्थात् श्येनकी उपमासे अर्थवाद वाक्य द्वारा विधेय याग विशेषकी स्तुति होती है क्योंकि उपमान और उपमेयमें भेद अवश्य रहता है । यदि श्येनपक्षिरूप गुणका विधान हो तो अर्थवाद वाक्यसे श्येनपक्षी की उपमासे श्येनपक्षीकी ही स्तुति असंगत होगी । यही विषय अर्थवादवचन प्रदर्शन द्वारा ग्रन्थकार बतलाते हैं—'तथाहि-' इत्यादि । जैसे श्येन ( बाज ) मत्स्यादि जन्तुका नाश करता है उसी तरह श्येन यागसे शत्रु का नाश होता है । इस अर्थ-

दीपिकाटीकासहितः। ६३ वाद वाक्यसे श्येनपक्षीकी स्तुति नहीं कर सकते क्योंकि श्येनकी उपमासे दूसरोंकी स्तुतिकी जाती है। न च श्येनोपमानत्वेन स एव स्तोतुं शक्यते, उपमानोपमेयभावस्य भिन्ननिष्ठत्वात्। यदा तु श्येनसंज्ञको यागो विधीयते तदार्थवादेन श्ये- नोपमानेन तस्य स्तुतिः कर्तुं शक्यत इति श्येनशब्दः कर्मनामधेयं तद्व्य- पदेशादिति। श्येनकी उपमासे श्येनकी ही स्तुति नहीं कर सकते क्योंकि उपमान और उपमेयमें भेद रहता है अतः स्वका उपमेय स्व नहीं होगा। जब श्येन नामक यागका विधान होता है तब श्येनपक्षीकी उपमासे श्येन यागकी स्तुति कर सकते हैं अतः तद्व्यपदेशसे श्येन यागका नाम है। कर्मनामधेयत्वे उत्पत्तिशिष्टगुणबलीयस्त्वम्। उत्पत्तिशिष्टगुणबलीयस्त्वमपि पञ्चमं नामधेयनिमित्तमिति केचित्। यथा 'वैश्वदेवेन यजेते' त्यादौ। अत्रोत्पत्तिशिष्टाग्न्यादीनां बलीयस्त्वा- द्वैश्वदेवशब्दस्य विश्वदेवदेवताभिधायकत्वं न संभवतीति कर्मनामधेयत्वम्। किसीका मत है कि उत्पत्तिशिष्ट-गुणबलीयस्त्व (उत्पत्ति विधिसे बोधित गुण प्रबल होता है) भी कर्मनामधेयमें पांचवां निमित्त है। जैसे 'वैश्वदेवेन यजेते' त्यादि यहांपर वैश्वदेव देवता वाचक नहीं है क्योंकि उत्पत्ति विधिसे प्राप्त अग्न्यादि देव प्रबल है इसलिये वैश्वदेव यागका नाम है। यहां पर यह समझना चाहिए कि चातुर्मासमें चार पर्व हैं—वैश्वदेव, वरुणप्रघास, साकमेध और शुनासीरीय। उनमें वैश्वदेव पर्वमें आठ याग हैं 'आग्नेयमष्टाकपालं निर्वपति सौम्यं चरुं सावित्रं द्वादशकपालं सारस्वतं चरुं पौष्णं मारुतं सप्तकपालम् वैश्वदेवीमामिक्षां द्यावापृ- थिव्यमेककपालम्।' इन आठों यागोंके समीपमें (वैश्वदेवेन यजेत') यह वाक्य पठित है। यहां पर संशय होता है कि वैश्वदेव शब्द यागका नाम है अथवा देवता वाचक है। तब पूर्वपक्ष होता है कि आठों यागोंका 'यजेत' पदसे अनुवाद करके विश्वदेव देवता रूप गुणका विधान है। यद्यपि वैश्वदेवी आमिक्षामें विश्वदेव देवता प्राप्त है तथापि आग्नेयादि सात यागोंमें विश्वदेव अप्राप्त है अतः उसका विधान किया जाता है यद्यपि आग्नेयादि सात यागोंमें अग्न्यादि देवताओंका श्रवण है तथापि अगत्या उन सातों यागोंमें विकल्पसे विश्वदेव देवताका विधान हो सकता है क्योंकि वैश्वदेव यागका नाम होगा तो द्रव्य और देवताका श्रवण नहीं

६४ | अर्थसंग्रहः- रहनेके कारण द्रव्य और देवता स्वरूप यागका स्वरूप ही नहीं बनेगा अतः 'वैश्वदे- वेन यजेत' वह विधि व्यर्थ हो जायगी । अतः गुणका ही विधान है । तब सिद्धान्त करते हैं कि उत्पत्ति वाक्यसे विहित आग्नेयादि आठों यागोंका 'यजेत' पदसे अनुवादकर उन आठोंके समुदायका वैश्वदेव नाम विधान किया जाता है। द्रव्य देवताका श्रवण न रहनेसे यद्यपि यह विधि शास्त्र नहीं है, तथापि 'प्राचीनप्रवणे वैश्वदेवेन यजेत' इत्यादिमें एकही वैश्वदेव शब्दसे आठों यागोंका व्यवहार होता है अतः 'वैश्वदेवेन यजेत' यह शास्त्र व्यर्थ नहीं है । इन आठों यागोंका नाम वैश्वदेव है। इसमें दो कारण हैं जैसे छत्री (राजा) और अच्छत्री समुदायमें 'छत्रिणो यान्ति' प्रयोग होता है उसी तरह आभिक्षा यागमें समस्त (विश्वदेवोंके याग होनेके कारण आठोंमें वैश्वदेवत्वका व्यवहार होगा । अथवा आठोंका कर्त्ता विश्वदेव है अतः आठों यागोंमें वैश्वदेवत्व रहेगा । ब्राह्मण भागका प्रमाण भी है 'यद्विश्वे देवाः समयजन्त तद्वैश्वदेवस्य वैश्वदेवत्वम्' । देवताओंका विकल्प जो पूर्वपक्षमें किया है वह नहीं हो सकता है क्योंकि समान बल होनेसे ही विकल्प होता है। यहां पर अग्न्यादि, उत्पत्ति शिष्ट होनेसे प्रबल है और विश्वदेव उत्पन्न- शिष्ट होनेसे दुर्बल है प्रबल और दुर्बलमें प्रबल ही बाधक होता है। अतः अग्न्यादि ही देव हैं और वैश्वदेव इन आठोंका नाम है यह सिद्ध हुआ । वस्तुतस्तु तत्प्रख्यशास्त्रादेवास्य कर्मनामधेयत्वं प्रकृतयागे विश्वदेवरूप- गुणसंप्रतिपन्नशास्त्रस्यार्थवादरूपस्यैव सत्त्वात् । 'यद्विश्वेदेवाः समयजन्त तद्वैश्वदेवस्य वैश्वदेवत्वम्' इति । अब सिद्धान्त समाधान 'वस्तुतस्तु' से कहते हैं कि 'वैश्वदेव शब्द तत्प्रख्य शास्त्रसे ही यागका नाम है इन आठों वैश्वदेव नामक यागमें 'यद्विश्वेदेवाः समय- जन्त' यह अर्थवाद ही विश्वदेव गुणका प्रापक है । अथ निषेधमीमांसा । पुरुषस्य निवर्तकं वाक्यं निषेधः, निषेधवाक्यानाम नर्थहेतुक्रियानि- वृत्तिजनकत्वेनैवार्थवत्त्वात् । तथा हि यथा विधिः प्रवर्त्तनां प्रतिपादयन्स्व- प्रवर्त्तकत्वनिर्वाहार्थं विधेयस्य यागादेरिष्टसाधनत्वमाक्षिपन्पुरुषं तत्र प्रवर्त्त- यति, तथा 'न कलञ्जं भक्षये'दित्यादिनिषेधोऽपि निवर्त्तनां प्रतिपाद- यन्स्वनिवर्त्तकत्वनिर्वाहार्थं निषेध्यस्य कलञ्जभक्षणस्य परानिष्टसाधनत्वमा- क्षिपन्पुरुषं ततो निवर्त्तयति ।