अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
अत्रिसमृतिः ॥ ३५
ऋतुकालउपासीत पुष्पकालेनशुद्ध्यति ।
रजकश्चर्मकारश्च नटोबुरुडएवच ॥ १९५ ॥
कैवर्त्तमेदभिल्लाश्च सप्तैतेऽन्त्यजाःस्मृताः ।
एषांगत्वास्त्रियोमोहा-त्भुक्तवाचप्रतिगृह्यच ॥१९६॥
कृच्छ्राब्दमाचरेद्ज्ञाना-दज्ञानादेव तद्द्वयम् ।
सकृद्भुक्तातुयानारी म्लेच्छैःसापापकर्मभिः ॥१९७॥
प्राजापत्येनशुद्ध्येत ऋतुप्रस्रवणेनतु ।
बलोद्धृतास्वयंवापि परप्रेरितयायदि ॥१९८॥
सकृद्भुक्तातुयानारी प्राजापत्येनशुद्ध्यति ।
प्रारब्धदीर्घतपसां नारीणांयद्रजोभवेत् ॥१९९॥
ऋतु के समय (रज के दीखने) वाद १६ सोलह दिन के भीतर स्त्री का संग करै और फिर रजके समय शुद्ध हो जाती है धोबी चमार नट बुरट (जो बांस की डलियां बनाते हैं) ॥१९५॥ धीमर मेदे,कत्ताल भील ये सात अंत्यज कहे हैं इन जातियों की स्त्री को भोगकर और इन जातियों में भोजन करके और इन से प्रतिग्रह ( दान ) को लेकर ॥ १९६ ॥ यदि जान बूझ कर पूर्वोक्त तीनों कर्म किये हों तो एक वर्ष तक कृच्छ्र और अज्ञान से दो कृच्छ्र व्रत करे–जो स्त्री म्लेच्छ पापकर्मियों ने एक बार भोगी हो ॥ १९७ ॥ वह प्राजापत्यव्रत से और ऋतु ( मासिक धर्म ) के होने से शुद्ध होती है, यदि बल से पकड़ली हो अथवा स्वयं चली गई हो अथवा किसी के कहने से गई हो ॥१९८॥
वि० (१९९) यहां से सिद्ध है कि पूर्वकाल में स्त्रियां तपस्विनी भी होती थीं वे ही ब्रह्मवादिनी कहाती थीं । इस कारण प्राचीन स्त्री पुरुषों की बराबरी वर्त्तमान के स्त्री पुरुष नहीं कर सकते । सुवर्ण मणि आदि में मैला लगजाय तो वह फेंकने लायक नहीं होता । परन्तु रोटी आदि पकाया अन्न मैले के संसर्ग से अति दूषित हो जाता है वैसे ही पहिले स्त्री पुरुष जिन दोषों से पतित नहीं होते थे । उन्हीं दोषों से अब के नर नारी पतित होजाते हैं ॥
३६ भाषार्थसहिता-
नतेनतद्व्रतंतासां विनश्यतिकदाचन । मद्यसंस्पृष्टकुम्भेषु यत्तोयं पिवतिद्विजः ॥२००॥ कृच्छ्रपादेनशुद्ध्येत पुनःसंस्कारमर्हति । अन्त्यजस्यतुयेवृक्षा-बहुपुष्पफलोपगाः ॥२०१॥ उपभोग्यास्तुतेसर्वे पुष्पेषुचफलेषुच । चाण्डालेनतुसंस्पृष्टं यत्तोयं पिवतिद्विजः ॥२०२॥ कृच्छ्रपादेनशुद्ध्येत आपस्तम्बोऽब्रवीन्मुनिः । श्लेष्मौपानहविण्मूत्र स्त्रीरजोमद्यमेवच ॥२०३॥ एभिःसंदूषितेकूपे तोयंपीत्वाकथंविधिः । एकंद्व्यहंत्र्यहंचैव द्विजातीनांविशोधनम् ॥२०४॥ प्रायश्चित्तंपुनश्चैव नक्तंशूद्रस्यदापयेत् । सद्योवांतेसचैलंतु विप्रस्तुस्नानमाचरेत् ॥२०५॥
और एक बार ही भोगी हो तो प्राजापत्य व्रत करने से शुद्ध होती है—जिन स्त्रियों ने बहुत दिनों तक तप (व्रत) प्रारम्भ किया हो और उसी बीच में जो मासिक धर्म हो जाय तो उस से उन स्त्रियों का वह व्रत कदाचित् भी नष्ट नहीं होता—मदिरा का स्पर्श जिस में हुआ हो ऐसे घड़े के जल को जो द्विज पीले ॥२००॥ तो चौथाई कृच्छ्र करने से शुद्ध होता है और फिर उपनयन के योग्य होता है—अन्त्यजों के जो वृक्ष हों और उन पर बहुत फल पुष्प आते हों॥२०१॥ उन वृक्षों के पुष्प और फलों के भोगने में दोष नहीं है—चांडाल के स्पर्श किये हुए जल को जो द्विज पीता है ॥२०२॥ वह चौथाई कृच्छ्र से शुद्ध होता है यह आपस्तम्ब मुनि ने कहा है । थूके हुए कफ—जूता—विष्ठा—मूत्र—स्त्रीका रज—और मदिरा ॥२०३॥ इन से भ्रष्ट हुए कूप के जल को पीके कैसे विधि करे, ब्राह्मण एक दिन क्षत्री दो दिन, वैश्य तीन दिन व्रत करने से शुद्ध होते हैं ॥२०४॥ और फिर प्रायश्चित्त यह है कि शूद्र नक्त (रात्रि ही को भोजन) करे और उसी समय वमन कर दियाहोतो ब्राह्मण सचैल स्नानकरे॥२०५॥
अत्रिस्मृतिः ॥ ३१
पर्युषितेत्वहोरात्र-मतिरिक्तेदिनत्रयम् । शिरःकंठोरुपादांश्च सुरयायस्तुलिप्यते ॥२०६॥ दशषट्त्रितयैकाहं चरेदेवमनुक्रमात् । अत्राप्युदाहरन्ति ॥ प्रमादान्मद्यपसुरां सकृत्पीत्वाद्बिजोत्तमः ॥ २०७ ॥ गोमूत्रयावकाहारो दशरात्रेणशुद्ध्यति । मद्यपस्यनिषादस्य यस्तुभुङ्क्तेद्विजोत्तमः ॥ २०८ ॥ गोमूत्रयावकाहारो दशरात्रेणशुद्ध्यति । मद्यपस्यनिषादस्य यस्तुभुंक्तेद्विजोत्तमः ॥ २०६ ॥ नदेवाभुञ्जतेतत्र नपिबन्तिहविर्जलम् । चितिभ्रष्टातुयानारी ऋतुभ्रष्टाचव्याधितः ॥२१०॥ प्राजापत्येनशुद्ध्येत ब्राह्मणानांतुभोजनात् ।
उक्त कूप का जल पीकर वामी होगया पच गया होय तो एक रातदिन उपवास करे और अधिक समय बीत गया हो तो तीन उपवास करे। शिर कण्ठ जांघ पैर इन को जो मदिरा से लीपले तो ॥ २०६॥ वह क्रम से दश-छः-तीन एक-दिन के व्रत को करे इस विषय में और ऋषि भी कहते हैं-कि प्रमाद से मदिरा पीनेवाले की मदिरा को ब्राह्मण एक वार भी पी लेतो ॥२०७॥ गोमूत्र और जौको खाता हुआ दश दिन में शुद्ध होता है और जो ब्राह्मण मदिरा पीने वाले और निषाद (बधिक बहेलिया) के यहां भोजन करता है ॥ २०८ ॥ वह भी गोमूत्र और जौ को खाता हुआ दश दिन में शुद्ध होता है जो ब्राह्मण मदिरा पीने वाले और निषाद का भोजन खाता है । २०९॥ उस के यहां देवता हवि (साकल्य) को नहीं खाते और न जल पीते हैं। जो स्त्री चिति (ज्ञान) से भ्रष्ट (बावली) हो और व्याधि के द्वारा मासिक धर्म भ्रष्ट होगई हो ॥२१०॥ वह प्राजापत्यव्रत और ब्राह्मणों के जिमाने से शुद्ध होती है-जो ब्राह्मण सं-
| ३८ | भाषार्थसहिता- |
|---|
येचप्रव्रजिताविप्राः प्रव्रज्याग्निजलावहाः ॥२११॥
अनाशकान्निवर्तन्ते चिकीर्षन्तिगृहस्थितिम् ।
धारयेत्रीणिकृच्छ्राणि चान्द्रायणमथापिवा ॥२१२ ॥
जातकर्मादिकंमोक्तं पुनःसंस्कारमर्हति ।
नाशौचंनोदकंनाश्रु नापवादानुकम्पने ॥ २१३ ॥
ब्रह्मदण्डहतानांतु नकार्यं कटधारणम् ।
स्नेहंकृत्वाभयाद्विभ्यो यस्त्वेतानिसमाचरेत् ॥२१४॥
गोमूत्रयावकाहारः कृच्छ्रमेकंविकशोधनम् ।
वृद्धःशौचस्मृतेर्लुप्तः प्रत्याख्यातभिषक्क्रियः ॥२१५॥
आत्मानंघातयेद्यस्तु शृङ्ग्यग्न्यनशनाम्बुभिः ।
तस्यत्रिरात्रमाशौचं द्वितीयेत्वस्थिसंचयः ॥ २१६ ॥
न्यास की अग्नि और जल में बहते हुए अर्थात् सन्यासियों के धर्म में आरूढ़ हुए संन्यासी होगए हैं ॥ २११ ॥ फिर अशक्ति (असामर्थ्य) से संन्यासी के धर्म से निवृत्त होते हैं और घर में रहना चाहते हों तो वे तीन कृच्छ्र अथवा एक चांद्रायण व्रत का अनुष्ठान करें ॥२१२॥ और जात कर्मादि उपनयनतकसंस्कार उनसंन्यास से लौटने वालों के फिर करने होते हैं-शौच, और जल का दान-शीघ्र श्राद्धादि निंदा-दया ॥ २१३ ॥ और मृतक की पिंजरी का उठा-ना ये काम उन के मरने पर न करै जिन को ब्राह्मणों ने शाप दिया हो, औरजो प्रीति के कारण वा किसीभयादिकारण से पूर्वोक्तशौच आदि को करता है॥२१४॥ तो गोमूत्र और जौ को खाते हुए उस की एक कृच्छ्र से शुद्धि होती है-जो पु-रुष वृद्ध हो और अशुद्ध हो और जिसे कुछ ज्ञान न हो, और वैद्यों की चि-कित्सा भी जिसने त्याग दी हो ॥२१५॥ और वह सींग वाले पशु(बैल आदि) अग्नि, भोजन का त्याग-और जल में डूबना इन से अपने आत्मा का घात करै तो उस मनुष्य का आशौच (सूतक) तीन दिन का होता है और दू-सरे दिन अस्थि संचय होता है ॥ २१६ ॥
तृतीयेतूदकंकृत्वा चतुर्थे श्राद्धमाचरेत् ।
अत्रिसमृतिः ॥ ३९
तृतीयेतूदकंकृत्वा चतुर्थे श्राद्धमाचरेत् ।
यस्यैकापिगृहेनास्ति धेनुर्वत्सानुचारिणी ॥२१७॥
मंगलानिकुतस्तस्य कुतस्तस्यतमःक्षयः ।
अतिदोहातिवाहाभ्यां नासिकाभेदनेनवा ॥२१८॥
नदीपर्वतसंरोधे मृतेपादोनमाचरेत् ।
अष्टागवंधर्महलं षड्गवं व्यावहारिकम् ॥ २१९ ॥
चतुर्गवंनृशंसानां द्विगवंगववध्यकृत् ।
द्विगवंवाहयेत्पादं मध्यान्हेतुचतुर्गवम् ॥२२०॥
षड्गवंतुत्रिपादोक्तं पूर्णाहस्त्वष्टभिःस्मृतः ।
काष्ठलोष्टशिलागोघ्नः कृच्छ्रं सांतनं चरेत् ॥ २२१ ॥
प्राजापत्यंचरेन्मुष्ट्या अतिकृच्छ्रंतु आयसैः ।
तीसरे दिन जलदान करके चौथे दिन श्राद्ध करे-जिस के घर में एक भी गौ बछ-
ड़े वाली अर्थात् दूध देती न हो ॥२१७॥ उस के घर में मंगल कहां और अ-
न्धकार का नाश कहां अर्थात गृहस्थ के यहां गौ का रखना और उस की ठीक
२ सेवा करना अत्यावश्यक धर्म है ।-बहुत दूध निकालने बछड़े को न छोड़ने
वा बहुत कम छोड़ने से बहुत जोतने और नाक के छेदने से ॥ २१८ ॥ नदी
अथवा पर्वत में रोकने से जो पशु की मृत्यु हो जाय तो जितना उस पशु मा-
रने का प्रायश्चित्त कहा है उस की चौथाई प्रायश्चित्त करे-आठ हैं बैल जिस
पर ऐसा हल, धर्मानुकूल है । छः बैल का व्यवहार में मध्यम हल है ॥२१९॥
चार जिस पर बैल हों वह हल नृशंसों ( हत्यारों ) का है और दो बैल का
हल तो बैलों को मारने वाला है-दो बैल के हल को प्रातःकाल चौथाई दिन
में और चार बैल के को मध्यान्ह तक, ( आधे दिन ) चलावे २२० छे बैल
के को तीनपाद ( तीन पहर ) चलावे और आठ बैल के को संपूर्ण दिन चला-
ना धर्म शास्त्र में कहा है- लकड़ी ढेला-पत्थर इन से जो बैल वा गौकी
हत्या करे वह सांतपन कृच्छ्र करे २२१ मुष्टि ( मुक्का ) से जो गोहत्य करें वह
४० भाषार्थसहिता ॥
प्रायश्चित्तेनतच्छीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम् ॥ २२२ ॥
अनुडुत्सहितांगांच दद्याद्विप्रायदक्षिणाम् ।
शरभोष्ट्रहयान्नागान् सिंहशार्दूलगर्दभान् ॥ २२३ ॥
हत्वाचशूद्रहत्यायाः प्रायश्चित्तंविधीयते ।
मार्जारंगोधानकुलं मण्डूकांश्चपतत्रिणः ॥२२४॥
हत्वात्र्यहंपिवेत्क्षीरं कृच्छ्रंव्यापादिकंचरेत् ।
चाण्डालस्यचसंस्पृष्टं विण्मूत्रोच्छिष्टमेववा ॥ २२५॥
त्रिरात्रेणविशुद्धेहि भुक्तोच्छिष्टंसमाचरेत् ।
वापीकूपतडागानां दूषितानांचशोधनम् ॥२२६॥
उद्धरेत्घटशतंपूर्णं पंचगव्येनशुध्यति ।
अस्थिचर्मावसिक्तेषु खरश्वानादिदूषिते ॥ २२७॥
उद्धरेदुदकंसर्वं शोधनंपरिमार्जनम् ।
प्राजापत्यव्रत करे और लोहे के डंड से जो करे वह अतिकृच्छ्रव्रत करे और प्रायश्चित्त करने के अनन्तर ब्राह्मणों को जिमावे ॥२२२॥ और बैल सहित एक गौ ब्राह्मणों को दक्षिणा दे-शरभ नामक मृग, ऊंट-घोड़ा-हाथी-सिंह-शार्दूल-और-गधा॥२२३: इन कीहत्याकरने परशूद्र की हत्याकाजो प्रायश्चित्त है उसे करे बिलाव-गोह-नेवला मेंढक-पक्षी ॥२२४॥ इन को मारकर तीन दिन तक दुग्ध पीवे और मारने में जो कृच्छ्र कहा है उसे करे-चांडाल के स्पर्श किये और विष्ठा तथा मूत्र से छुए हुए उच्छिष्ट को खाकर ॥२२५॥ तीन दिन में विशुद्ध होकर उच्छिष्ट के भक्षण में जो प्रायश्चित्त है उसे करे-अशुद्ध पदार्थ से दुष्टता को प्राप्त हुए बावड़ी कूप और ताल इन का शोधन यह है कि ॥ २२६ ॥ भरे हुए काफी १०० घड़े भर २ जल निकाले फिर पंचगव्य घेरने से शुद्ध होते हैं हड्डी चाम जिनमें पड़गये हों और गधा-कुत्तादि से जोदूषित होगए हों ॥२२७॥ तो उनवापीआदिकासबजल निकाले और स्वच्छकरे--गौको जिस पात्र में दुहते
ळ
अत्रिसमृतिः ॥ ४१
गोदोहनेचर्मपुटेचतोयं यंत्राकरेकारुकंशिल्पहस्ते ॥२२८॥
स्त्रीबालवृद्धाचरितानियान्यप्रत्यक्षदृष्टानिशुचीनितानि ।
प्राकाररोधेविषमप्रदेशे सेवानिवेशेभवनस्यदाहे ॥२२९ ॥
अवास्ययज्ञेषुमहोत्सवेषु तेष्वेवदोषानविकल्पनोयाः ।
प्रपास्वरव्येघटकस्यकूपे द्रोण्यांजलंकोशविनिर्गतंच ॥२३० ॥
श्वपाकचाण्डालपरिग्रहेतु पीत्वाजलं पंचगव्येनशुद्धिः।
रेतोविण्मूत्रसंस्पृष्टं कौपंयदिजलं पिबेत् ॥ २३१ ॥
त्रिरात्रेणैवशुद्धिःस्यात् कुंभेसांतपनंतथा ।
त्रिलग्नेभिन्नशवयत्स्या-दज्ञानाच्चतथोदकम् ॥२३२॥
प्रायश्चित्तंचरेत्पीत्वा तप्तकृच्छ्रंद्विजोत्तमः ।
उष्ट्रीक्षीरंखरीक्षीरं मानुषीक्षीरमेवच ॥२३३ ॥
प्रायश्चित्तंचरेत्पीत्वा तप्तकृच्छ्रं द्विजोत्तमः ॥
हो उसका और चाम के पात्र का जो जल है-यंत्र में का, खान का कारीगर और चित्र काढ़ने वाला इन के हाथ का जो जल है ॥२२८॥ स्त्री बालक और वृद्ध इन के आचरित (छुए हुए) जो जल हैं और प्रत्यक्ष देखे न हों वे संपूर्ण शुद्ध हैं परन्तु परकोटा की रोक में विषम (संकट के) देश में सेवा के स्थान में भवन में अग्नि लगने के समय ॥ २२९ ॥ असम्पूर्ण यज्ञ में बड़े उत्सवों में इन में दोषों की शंका नहीं करनी । प्याऊओं में वन में रंहट के कूप में द्रोणी (एक जल का बड़ा पात्र जो कुये के पास रक्खा रहता है) में और कोश (हौद) से निकला जल शुद्ध हैं ॥२३०॥ श्वपाक (जो कुत्ते को खाते हैं) और चाण्डाल इन के घर पर जल पीकर पंचगव्य पीने से शुद्धि होती है वीर्य विष्ठा मूत्र इन का जिस में मेल हो ऐसे कूप के जल को यदि पीले ॥ २३१ ॥ तो तीन दिन में शुद्धि होती है और वीर्य विष्ठा मूत्र जिस में रक्खे गये हों ऐसे घड़े के जल को जो पीवे वह सांतपन व्रत से शुद्ध होता है । शव (मुर्दा) से जो जल मलिन हो जाय अज्ञान से उस जल को ॥ २३२ ॥ पीकर ब्राह्मण तप्तकृच्छ्र प्रायश्चित्त करें। ऊंटनी गधी और किसी मनुष्य की स्त्री के दूध को ॥ २३३ ॥ पीकर ब्राह्मण तप्तकृच्छ्र प्रायश्चित्त करै यदि
९
४२ भाषार्थसहिता-
वर्णबाह्येनसंस्पृष्ट उच्छिष्टस्तुद्विजोत्तमः ॥ २३४ ॥
पंचरात्रोषितोभूत्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ।
शुचिगोतृप्तिकृत्तोयं प्रकृतिस्थंमहीगतम् ॥ २३५ ॥
चर्मभाण्डंतुधाराभिस्तथायंत्रोद्ध तंजलम् ।
चाण्डालेनतुसंस्पृष्टः स्नानमेवविधीयते ॥ २३६ ॥
उच्छिष्टस्तुचसंस्पृष्ट स्त्रिरात्रेणैवशुद्ध्यति ।
आकराद्गतवस्तूनि नाशुचीनिकदाचन ॥ २३७ ॥
आकराःशुचयःसर्वे वर्जयित्वासुरालयम् ।
भ्रष्टाभ्रष्टयवांश्चैव तथैवचणकाःस्मृताः ॥ २३८ ॥
खर्जूरं चैवकपूर मन्यद्भ्रष्टतरंशुचिः ।
अमीमांस्यानिशौचानि स्त्रीभिराचरितानिच ॥२३९॥
गोकुलेकंदुशालायां तैलयंत्रेक्षुयंत्रयोः ।
अदुष्टाःसंततधारा वातोद्धू ताश्चरेजवः ॥ २४० ॥
उच्छिष्ट ब्राह्मण को वर्णबाह्य (यवन आदि) नीच स्पर्श करलें ॥ २३४ ॥ तो पांच दिन तक उपवास करके पंचगव्य पीने से शुद्ध होता है जिस जल से गोतृप्तहो सके ऐसा पृथ्वी पर टिका निर्मल जल शुद्ध है ॥२३५॥ चाम के पात्र का जल, निरन्तरधारा पड़ने से, और यंत्र से निकाला जल शुद्ध हैं- चाण्डाल के छू लेने पर स्नान मात्र करै ॥ २३६ ॥ जो उच्छिष्ट को चांडाल छूले तो तीन दिन में शुद्ध होता है । किसी खान से निकली वस्तु कभी भी अशुद्ध नहीं होती ॥ २३७ ॥ मदिरा के स्थान को छोड़ कर अन्य सब खाने वा कारखाने शुद्ध हैं और भुने जौ और चने भी शुद्ध कहे हैं ॥ २३८ ॥ खजूर और कपूर ये दोनों और जो २ भुना पदार्थ हो वह सब शुद्ध है । स्त्रियों ने आचरण किये शौच विचारने योग्य नहीं हैं ॥ २३९ ॥ गौओं के झुण्ड में कंदुशाला (भाड़) में तेल और ईख के कोल्हू में शुद्धि का विचार नहीं भाड़ आदि का भुना अन्नादि सदा शुद्ध मानो-निरन्तर पड़ती हुई जल धारा जो दूषित न हो और वायु से उड़ी रेणु (धूल) ये भी पवित्र हैं ॥ २४० ॥
अत्रिसमृतिः ॥ ४३
बहूनामेकलग्नाना-मेकश्चेदशुचिर्भवेत् । अशौचमेकमात्रस्य नेतरेषांकथंचन ॥ २४१ ॥
एकपंत्युपविष्टानां भोजनेषुपृथक्पृथक् । यद्येकोलभतेनीलीं सर्वेतेऽशुचयःस्मृताः ॥ २४२ ॥
यस्यपट्टेपट्टसूत्रे नीलीरक्तोहिदृश्यते । त्रिरात्रंतस्यदातव्यंशेषाश्चैकोपवासिनः ॥ २४३ ॥
आदित्येऽस्तमितेरात्रा-वस्पृशंस्पृशतेयदि । भगवन्केनशुद्धिःस्या-त्ततोब्रूहितपोधन ! ॥ २४४ ॥
आदित्येऽस्तमितेरात्रौ स्पर्शहीनंदिवाजलम् । तेनैवसर्वशुद्धिःस्यात् शवस्पृष्टंतुवर्जयेत् ॥ २४५ ॥
देशंकालंचवयःशक्तिं पापंचावेक्ष्यतत्वतः । प्रायश्चित्तंप्रकल्प्यंस्याद्यस्यचोक्ताननिष्कृतिः ॥२४६॥
एक फर्से आदि पर बैठे हुए मनुष्यों में से जो एक अशुद्ध होजाय तो वही अशुद्ध होता है अन्य मनुष्य कदाचित् भी अशुद्ध नहीं होते ॥ २४१ ॥ भोजन करने के समय एक पंक्ति में अलग २ बैठे मनुष्यों में जो एक मनुष्य के देह में नील का वस्त्रादि छूजाय तो वे सब अशुद्ध हो जाते हैं ॥ २४२ ॥ और पूर्वोक्त एक पङ्क्ति में बैठे हुओं के बीच में जिस के वस्त्र अथवा पट्ट वस्त्र (दुपट्टा) पर नील का रंग दीख पड़े तो उसे तीन दिन का उपवास और शेष मनुष्यों को एक २ उपवास करना चाहिये ॥ २४३ ॥ हे भगवन् अत्रिजी ! सूर्य के छिप जाने पर रात्रि में यदि स्पर्श करने के अयोग्य वस्तु का स्पर्श क-रले तो किस से शुद्धि हो उस शुद्धि को कहो ॥ २४४ ॥ सूर्य के छिप जाने पर रात्रि में किसी का न छुआ निर्मल जो दिन का जल उसी से सब की शुद्धि होती है किन्तु जिसने मुर्दे का स्पर्श किया हो उसकी शुद्धि जल मात्र से नहीं होती ॥ २४५ ॥ और देश-समय-सामर्थ्य और पाप को भी यथार्थ देखकर उस पाप के प्रायश्चित की कल्पना विद्वान् करले जिस पाप का प्रायश्चित्त शास्त्र में नहीं कहाहो ॥ २४६ ॥
४४ भाषार्थसहिता ॥
देवयात्राविवाहेषु यज्ञप्रकरणेषु च । उत्सवेषुचसर्वेषु स्पृष्टास्पृष्टंनविद्यते ॥२४७॥ आलनालंतथाक्षीरं कन्दुकन्दधिसक्तवः । स्नेहपक्वं च तक्रंच शूद्रस्यापिनदुष्यति ॥२४८॥ आर्द्रमांसंघृतंतैलं स्नेहाश्चफलसम्भवाः । अन्त्यभांडस्थितास्त्वेते निष्क्रान्ताःशुद्धिमाप्नुयुः॥२४९॥ अज्ञानात्पिबतेतोयं ब्राह्मणःशूद्रजातिषु । अहोरात्रोषितःस्नात्वा पंचगव्येनशुद्ध्यति ॥२५०॥ आहिताग्निस्तुयोविप्रो महापातकवान्भवेत् । अप्सु प्रक्षिप्यपात्राणि पश्चादग्निंविनिर्दिशेत् ॥२५१॥ योगृहीत्वाविवाहाग्निं गृहस्थइतिमन्यते । अन्नंतस्यनभोक्तव्यं वृथापाकोहिसःस्मृतः ॥२५२॥
तीर्थादि पर देवताओं की यात्रा-विवाह-यज्ञ का प्रकरण और संपूर्ण उत्सवों में स्पर्श करने के योग्य और अयोग्य का दोष नहीं होता है ॥२४७॥ आल का नाल ( चने आदि की खटाई ) दूध-कन्दुक (भाड़) दही सत्तू-स्नेह ( घी तेल ) से पका हुआ पदार्थ-और मठा ये वस्तु शूद्र के भी दूषित नहीं हैं किन्तु खा लेने योग्य होते हैं ॥ २४८ ॥ गीला मांस-घृत-तेल-फल से उत्पन्न हुए तैलादि अन्त्यज के पात्र में रक्खे भी हों पर निकाल लेने पर शुद्ध हो जाते हैं ॥२४९॥ जो ब्राह्मण शूद्र जातियों का जल अज्ञान से पीले तो दिन रात का उपवास और पंचगव्य पीकर शुद्ध होता है ॥ २५० ॥ जो अग्निहोत्री ब्राह्मण महापातकी हो जाय तो होम के पात्रों को जल में फेंककर फिर विधिपूर्वक अग्नि को स्थापित करे ॥२५१॥ जो विवाह की अग्नि को ग्रहण करके अर्थात् स्मार्त्त अग्निहोत्र को लेकर अपने को गृहस्थी मानता है अर्थात् उस अग्नि में पक्षयाग तथा पंचमहायज्ञादि नित्य २ नहीं करता इस से उस का अन्न नहीं खाना जिस से ऋषियों ने उसे वृथापाक कहा है ॥२५२॥
अग्निस्मृतिः ॥ ४५
वृथापाकस्यभुञ्जानः प्रायश्चित्तंचरेद्द्विजः ।
प्राणानप्सुत्रिरायम्य घृतंप्राश्यविशुद्ध्यति ॥२५३॥
वैदिकेलौकिकेवापि हुतोच्छिष्टेजलेक्षितौ ।
वैश्वदेवंप्रकुर्वीत पंचसूनापनुत्तये ॥ २५४ ॥
कनीयान्गुणवांश्चैव ज्येष्ठश्चेन्निर्गुणोभवेत् ।
पूर्वं पाणिंगृहीत्वाच गृह्याग्निंधारयेद्बुधः ॥२५५॥
ज्येष्ठश्चेद्यदिनिर्दोषो गृह्णात्यग्नियवीयसः ।
नित्यंनित्यंभवेत्तस्य ब्रह्महत्यानसंशयः ॥२५६॥
महापातकि संस्पृष्टः स्नानमेवविधीयते ।
संस्पृष्टस्ययदाभुंक्ते स्नानमेवविधीयते ॥२५७॥
पतितैःसहसंसर्गं-मासादुर्द्धंमासमेवच ।
गोमूत्रयावकाहारोमासार्द्धेनविशुद्ध्यति ॥ २५८ ॥
वृथापाक के अन्न को जो द्विजखाले वह इस प्रायश्चित्त को करे कि जलके मध्य में तीन बार प्राणायाम करके घृत को खाकर शुद्ध होता है ॥२५३॥
विधिपूर्वक स्थापित किये वा चूल्हे आदि के वा जिस में होम हो चुका हो ऐसे अग्नि में वा जल में अथवा भूमि पर बलि वैश्वदेव को पांच हत्या के दूर करने के निमित्त अवश्य करे ॥२५४॥
यदि जेठा भाई मुर्ख हो और छोटा विद्वान् हो तो ज्ञानी छोटा भाई जेठे से पहिले विवाह करके गृह्य अग्नि को धारणा करे ॥२५५॥
यदि जेठा भाई निर्दोष हो और छोटा भाई अग्निहोत्र को ग्रहण कर ले तो प्रतिदिन उसे ब्रह्महत्या लगती है इस में संशय नहीं है ॥२५६॥
महापातकी ने जिस को छू लिया हो वह, और महापातकी से स्पर्श किये हुए के भोजन को जिस ने किया हो वह इन दोनों की स्नान मात्र से शुद्धि होती है ॥२५७॥
पतित के साथ जिसने पन्द्रह दिन अथवा एक मास तक मेल मिलाप किया हो वह पन्द्रह दिन तक गोमूत्र और जौ को खाकर शुद्ध होता है ॥ २५८ ॥
४६ भाषार्थसहिता ॥
कृच्छ्रार्द्धंपतितस्यैवसकृद्भु क्त्वाद्विजोत्तमः । अविज्ञानाच्चतद् भुक्त्वा कृच्छ्रं सांतपनंचरेत् ॥ २५९ ॥ पतितानांयदाभुक्तं भुक्तं चाण्डालवेश्मनि । मासार्द्धंतु पिवेद्वारि इतिशातातपोऽब्रवीत् ॥ २६० ॥ गोब्राह्मणहतानांच पतितानांतथैवच । अग्निनानचसंस्कारःशंखस्यवचनंयथा ॥ २६१ ॥ यश्चाण्डालीं द्विजोगच्छे-त्कथंचित्काममोहितः । त्रिभिःकृच्छ्रैर्विशुद्ध्येत प्राजापत्यानुपूर्वशः ॥२६२॥ पतिताच्चान्नमादाय भुक्त्वावान्ब्राह्मणोयदि । कृत्वा तस्यसमुत्सर्गमतिकृच्छ्रं विनिर्दिशेत् ॥ २६३ ॥ अन्त्यहस्तात्तुविक्षिप्तं काष्ठंलोष्ठंतृणानिच । नस्पृशेत्तुतथोच्छिष्ट-महोरात्रं समाचरेत् ॥२६४॥ चाण्डालपतितंम्लेच्छंमद्यभाण्डंरजस्वलाम् ।
पतितके अन्न को जानबूझ एक बारखालेतो सांतपन कृच्छ्र व्रत करे तथा अज्ञान से पतित का अन्न खाले तो कृच्छ्रसान्तपनव्रत करे ॥ २५९ ॥ यदि पतितों का भोजन किया हो अथवा चाडालके घर में भोजन किया हो तो पन्द्रह दिन तक जल ही पीकर रहे उपवासकरे यह शातातप ऋषि ने कहा है ॥२६०॥ शंख के वचनानुसार गौ और ब्राह्मणों से मारे गये और पतितों का अग्नि से दाह नहीं करना चाहिये ॥२६१॥यदि कामदेव से मोहित द्विज किसी प्रकार से चांडा- ली के संग गमन करे तो प्राजापत्य व्रत के पश्चात तीन कृच्छ्र व्रत करके शुद्ध होता है ॥२६२॥ पतितके अन्न को लेकर या खाकर ब्राह्मण उस अन्न के त्यागने पर - अतिकृच्छ्रव्रतकरे ॥ २६३ अन्त्यज के हाथ से फेंके हुए काठ-ढेला और तृणों को और अन्त्यज के उच्छिष्ट को स्पर्श करके एक दिन रात का व्रत करे ॥२६४॥यदि भोजन करता हुआ द्विज चांडाल-पतित-म्लेछ-मदिरा का पात्र और रजस्व-
अत्रिस्मृतिः ॥ ४९
द्विजःस्पृष्ट्वानभुञ्जीत भुञ्जानोयदिसंस्पृशेत् ॥२६५॥
अतःपरंतुभुञ्जीत त्यक्त्वाऽन्नंस्नानमाचरेत् ।
ब्राह्मणैःसमनुज्ञातस्त्रिरात्रमुपवासयेत् ॥२६६॥
सघृतंयावकं प्राश्य व्रतशेषंसमापयेत् ।
भुञ्जानः संस्पृशेद्यस्तु वायसंकुकुटंतथा ॥ २६७ ॥
त्रिरात्रेणैवशुद्धिःस्या-दथोच्छिष्टस्त्वहेनतु ।
आरूढोनैष्ठिकेधर्मे यस्तुप्रच्यवतेपुनः ॥ २६८ ॥
चान्द्रायणंचरेन्मास-मितिशातातपोऽब्रवीत् ।
पशुवेश्याभिगमने प्राजापत्यंविधीयते ॥ २६९ ॥
गवांगमनेमनुप्रोक्तं व्रतं चान्द्रायणंचरेत् ।
अमानुषीषुगोवर्जं मुदक्यायामयोनिषु ॥ २७०॥
रेतःसिक्त्वाजलेचैव कृच्छ्रं सांतपनंचरेत् ।
उदक्यांसूतिकांवापि अंत्यजांस्पृशतेयदि ॥२७१॥
का छून का स्पर्श करे तो भोजन न करे-अर्थात् उपवास करे ॥ २६५ ॥ स्पर्श
करने के पश्चात् भोजन न करे किन्तु उस अन्न को त्याग कर स्नान करे और
ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर तीन उपवास करे ॥२६६॥ और घीमें मिले जौ को
खाकर बाकी व्रत को पूरा करे-यदि भोजन करता हुआ काक और मुरगे को
छूले ॥२६७॥ तो तीन दिन में शुद्धि होती है यदि उच्छिष्ट हुआ पूर्वोक्तों का स्पर्श
करले तो एक दिन में शुद्ध होता है-जो नैष्ठिक धर्म जन्मभर ब्रह्मचारी रहता हु-
आ गुरु सेवाकी प्रतिज्ञा करके उसको त्यागता है ॥२६८॥ वह एक मासभर
चांद्रायण व्रत करै यह शातातप ऋषिने कहा है । पशु और वेश्या के संग गमन
करने से प्राजापत्य व्रत कहा है ॥२६९॥ गौवों के संग गमन (मैथुन) कर के मनु
के कहे हुए चांद्रायण व्रतको करे-गौसे भिन्न पशु की योनि और रजस्वला और
योनि से भिन्न (भूमि आदि) में ॥२७०॥ और जल में वीर्य को सींच कर सांतपन
कृच्छ्रकरै । चांडाली-सूतिका-और अंत्यज की स्त्री इनका यदि स्पर्शकरै तो ॥२७१॥
४८ भाषार्थंसहिता ॥
त्रिरात्रेणैवशुद्धिःस्या-द्विधिरेषपुरातनः ।
संसर्गंयदिगच्छेच्चे-दुदक्यावातथांत्यजैः ॥ २७२ ॥
प्रायश्चित्तीसविज्ञेयः पूर्वंस्नानंसमाचरेत् ।
एकरात्रंचरेन्मूत्रं पुरीषंतुदिनत्रयम् ॥ २७३ ॥
दिनत्रयंतथापानं मैथुनेपंचसप्तवा ।
स्मृत्यन्तरे
अंगीकारेणज्ञातीनां ब्राह्मणानुग्रहेणच ॥ २७४ ॥
पूयन्तेतत्रपापिष्ठा महापातकिनोऽपिये ।
भोजनेतुप्रसक्तानां प्राजापत्यंत्रिधीयते ॥ २७५ ॥
दंतकाष्ठेत्वहोरात्र-मेषशौचविधिःस्मृतः।
रजस्वलायदास्पृष्टा श्वानचांडालवायसैः ॥ २७६ ॥
निराहाराभवेत्तावत् स्नात्वाकालेनशुद्ध्यति ।
तीन दिन में शुद्धि होती है,यह पुरानी विधिहै-रजस्वला और अन्त्यज स्त्री इनके संग जो मेल होजाय ॥२७२॥ तो वह इस प्रायश्चित्त के योग्य है कि पहिले स्नान करै फिर एक दिन गोमूत्र और तीन दिन गोबर को भक्षण करै ॥ २७३ ॥ रजस्वला तथा अंत्यजा स्त्री इनके जलपान और मैथुन करने में पांच अथवा सात दिन पूर्वोक्त प्रायश्चित्त करे-यह अन्यस्मृ-तियों में लिखा है कि कुटुम्बी पुरुषों के स्वीकार करने और ब्राह्मणों के अनुग्रह से ॥ २७४ ॥ जो महापातकी भी पापी हैं वे भी पवित्र हो जाते हैं और निषिद्ध नीच लोगों के भोजन में जो आसक्त हैं वे प्राजापत्यव्रत करें ॥२७५॥ नीच मनुष्यकी दी दातौन करने में जो प्रसक्त हैं वे एक दिनरात प्रायश्चित्त करें यह शौच की विधि कही=जिस रजस्वला स्त्री को कुत्ता चांडाल काक ये स्पर्श करलें ॥२७६॥ वह रजकी शुद्धितक निराहार रहे और शुद्ध होनेके समय (चौथेदिन) स्नान करके शुद्ध हो जाती है-यदि रजस्वला स्त्री को ऊंट-
अत्रिसमृतिः ॥ ४२
रजस्वलायदास्पृष्टा उष्ट्रजंबुकशंबरैः ॥ २७७ ॥
पञ्चरात्रंनिराहारा पंचगव्येनशुद्ध्यति ।
स्पृष्टारजस्वलान्यो न्यंब्राह्मणयाब्राह्मणीचया २७८
एकरात्रंनिराहारा पंचगव्येनशुद्ध्यति ।
स्पृष्टारजस्वलान्योन्यं ब्राह्मण्याक्षत्रियाचया ॥२७६॥
त्रिरात्रेणविशुद्धिःस्याद् व्यासस्यवचनंयथा ।
स्पृष्टारजस्वलान्योन्यं ब्राह्मण्याशूद्रसंभवा ॥ २८० ॥
षट्रात्रेणविशुद्धिःस्याद् ब्राह्मणीकामकारतः ।
स्पृष्टारजस्वलान्योन्यंब्राह्मण्यावैश्यसंभवा ॥ २८१ ॥
चतूरात्रंनिराहारा पंचगव्येनशुद्ध्यति ।
अकामतश्चरेदूर्ध्वं ब्राह्मणीसर्वतःस्पृशेत् ॥ २८२॥
चतुर्णामपिवर्णानां शुद्धिरैषाप्रकीर्तिता ।
उच्छिष्टेनतुसंस्पृष्टो ब्राह्मणो ब्राह्मणेनयः ॥ २८२ ॥
गौण्ड-शंबर (बड़शिंगा) कालै ॥२७७॥ तो पांच दिन तक निराहार रहे और फिर पंचगव्य से शुद्धि होती है-यदि ब्राह्मणी रजस्वला ने ब्राह्मणी रजस्वला का स्पर्श कर लिया हो ॥२७८॥ तो एक दिन निराहार रह कर पंचगव्य से शुद्धि होती है-यदि ब्राह्मणी रजस्वला ने क्षत्रिया रजस्वला का स्पर्श कर लिया होय ॥ २७९॥ तो व्यास के वचन के अनुसार क्षत्रिया तीन दिन में शुद्ध होती है-यदि ब्राह्मणी रजस्वला शूद्राणी रजस्वला का स्पर्श करले॥२८०॥ तो शूद्र स्त्री छः दिन में शुद्ध होती है और पूर्वोक्त रजस्वला ब्राह्मणी अपनी इच्छा के अनुसार कुछ व्रत आदि कर के शुद्ध हो जाती है-यदि ब्राह्मणी रजस्वला ने वैश्य जातिकी रजस्वला का स्पर्श कर लिया होय ॥२८१॥ तो वैश्य स्त्री चार दिन निराहार रह कर पंचगव्य से शुद्ध होती है औरों की ॥ इच्छा के अनुसार ब्राह्मणी प्रायश्चित्त करे और फिर सब का स्पर्श करे ॥२८२॥ चारों वर्णों की यह शुद्धि कही है-यदि उच्छिष्ट ब्राह्मण ने उच्छिष्ट ब्राह्मण का स्पर्शकर लिया हो तो ॥ २८२ ॥
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५७ | भाषार्थसहिता ॥
भोजनेमूत्रचारेश्च शंखस्यवचनंयथा ।
स्नानंब्राह्मणसंस्पर्शे जपहोमौतुक्षत्रिये ॥ २८३ ॥
वैश्येनक्तंचकुर्वीत शूद्रेचैवोपपोषणम् ।
चर्मकेर जकेवैश्ये धीवरेनटकेतथा ॥ २८४ ॥
एतान्स्पृष्ट्वाद्विजोमोहा·दाचमेत्प्रयतोपिसन् ।
एतैःस्पृष्टोद्विजोनित्य·मेकरात्रंपयःपिबेत् ॥ २८५ ॥
उच्छिष्टैस्तैस्त्रिरात्रंस्याद् घृतंप्राश्यविशुद्ध्यति ।
यस्तुछायांश्र्वपाकस्य ब्राह्मणस्त्वधिगच्छति ॥ २८६ ॥
तत्रस्नानंप्रकुर्वीत घृतंप्राश्यविशुद्ध्यति ।
अभिशस्तोद्विजोऽरण्ये ब्रह्महत्याव्रतंचरेत् ॥ २८७ ॥
मासोपवासंकुर्वीत चान्द्रायणमथापिवा ।
वृथामिथ्योपयोगेन भ्रूणहत्याव्रतंचरेत् ॥ २८८ ॥
अभक्षोद्वादशाहेन पराकेणैवशुद्ध्यति ।
भोजन के उच्छिष्ट में अथवा मूत्र के त्याग के उच्छिष्ट में शंखऋषि के वचनानुसार ब्राह्मण के स्पर्श में स्नान और क्षत्रिय के स्पर्श में जप होम कहे हैं ॥ २८३ ॥ और वैश्य के स्पर्श में रात भर व्रत करे और शूद्र के स्पर्श में एक उपवास करे-और चमार धोबी-वैश्य (वैश्या का पुत्र) धींबर- और नट ॥२८४॥ इन का अज्ञान से ब्राह्मण स्पर्श करके सावधान होकर आचमन करे यदि ये ब्राह्मण का स्पर्श करलें तो एक दिन दुग्धपान करे ॥२८५॥ और यदि पूर्वोक्त चमार आदि उच्छिष्ट हुए ब्राह्मण का स्पर्श करलें तो ब्राह्मण तीन दिन का व्रत करके घृत को खाकर शुद्ध होता है-यदि ब्राह्मण श्वपाक की छाया में चले बैठे वा खड़ा रहे २८६ ॥ तो स्नान करे और घृत खाकर शुद्ध होता है । जो ब्राह्मण अभिशस्त (कलंकित) हो वह वन में जाकर ब्रह्म-हत्या का व्रत करै कि ॥२८७ ॥ एक मास तक उपवास करे अथवा चान्द्रायण करे । यदि वृथा हीं (झूठा) हिंसा का दोष लगा हो तो भ्रूणहत्या का व्रत करै कि ॥२८८॥ बारह दिन जलका ही भक्षण करके पराक व्रत से शुद्ध
अत्रिस्मृतिः ॥ ५२
शठंचब्राह्मणंहत्वा शूद्रहत्याव्रतंचरेत् ॥ २८९ ॥ निर्गुणं चगुणीहत्वा पराकंव्रतमाचरेत् । उपपातकसंयुक्तो मानवोम्रियतेयदि ॥ २९० ॥ तस्यसंस्कारकर्ताच प्राजापत्यद्वयंचरेत् । प्रभुञ्जानोतिसस्नेहं कदाचित्स्पृश्यतेद्विजः ॥ २९१ ॥ त्रिरात्रमाचरेन्नक्तं निःस्नेहमथवाचरेत् । विडालवायसोच्छिष्टं जग्ध्वाश्वनकुलस्यच ॥२९२॥ केशकीटावपन्नंच पिबेद्ब्राह्मींसुवर्चसम् । उष्ट्रयानंसमारुह्य खरयानंचकामतः ॥ २९३ ॥ स्नात्वाविप्रोजितप्राणः प्राणायामेनशुद्ध्यति सव्याहृतींसप्रणवां गायत्रींशिरसासह ॥ २९४ ॥ त्रिःपठेदायतप्राणः प्राणायामःसउच्यते ।
होता है । शठ ब्राह्मण को मार कर शूद्र की हत्या का व्रत करै ॥ १८९ ॥ विद्वान् ब्राह्मण मूर्ख को मार डाले तो पराक व्रत करे यदि जिस को उपपातक लगा हो वह मनुष्य मरजाय तो ॥ २९० ॥ उस का मृतक कर्म करने वाला दो प्राजापत्यव्रत करै । अत्यंत स्नेह सहित पदार्थ को भक्षण करते हुए ब्राह्मण को कदाचित् कोई छूले तो ॥ २९१ ॥ तीन दिन तक नक्त व्रत करै अथवा घृत के बिना सूखा भोजन करै । विलाव काक-कुत्ता-नीला इन के उच्छिष्ट को भक्षण करके ॥२९२॥ और जिस में बाल या कीड़े, पड़े हों उसे खाकर ब्राह्मी ओषधिको पीवे । अपनी इच्छा से ऊंट=गधा इन के यान (सवारी) पर बैठे तो ॥२९३॥ ब्राह्मण स्नान और सूक्ष्म भोजन करके प्राणायाम से शुद्ध होता है । भूआदि सातव्याहृती और (ओम् आपोज्योती०) यह गायत्री शिर इससहित गायत्री को॥२९४॥तीन वार श्वासरोककर जो पढ़े उसे प्राणायाम कह-
५२ भाषार्थसहिता ॥
शकृद्द्विगुणगोमूत्रं सर्पिर्दद्याच्चतुर्गुणम् ॥ २९५ ॥ क्षीरमष्टगुणं देयं पंचगव्यंतथादधि । पंचगव्यंपिवेच्छूद्रो ब्राह्मणस्तुसुरांपिवेत् ॥ २९६ ॥ उभौतौतुल्यदोषौचवसतोनरकेचिरम् । अजागावोमहिष्यश्च अमेध्यंभक्षयन्तियाः ॥ २९७ ॥ दुग्धंहव्येचकव्येच गोमयंनविलेपनेत् । ऊनस्तनीमधीकांवा याचस्वस्तनपायिनी ॥ २९८ ॥ तासांदुग्धंनहोतव्यं हुतंचैवाहुतं भवेत् । ब्राह्मौदनेचसोमेच सीमन्तोन्नयनेतथा ॥ २९९ ॥ जातश्राद्धेनवश्राद्धे भुक्त्वाषान्द्रायणंचरेत् । राजान्नंहरतेतेजः शूद्रान्नंब्रह्मवर्चसम् ॥ ३०० ॥ स्वसुतान्नंचयोभुङ्क्ते सभुङ्क्तेपृथिवीमलम् । स्वसुताअप्रजाताच नाश्नीयात्तद्गृहेपिता ॥ ३०१ ॥
ते हैं। गोबर से दूना गोमूत्र चौगुना घी-॥२९५॥ आठ गुना दूध और आठ गुना दही डाले यह पंचगव्य कहाता है। यदि शूद्र उक्त पंचगव्य को पीवे और ब्राह्मण मदिरा को पीवे ॥ २९६ ॥ तो वे दोनों तुल्य दोष के भागी हैं और चिरकाल तक नरक में वसते हैं। जो बकरी गौ और भैंस विष्ठादि अशुद्ध वस्तु को खाती हों ॥२९७॥ तो हव्य और कव्य में उन का दूध न ले और उन के गोबर से लीपे भी नहीं। जिस के थन छोटे हों अथवा ४ से अधिक हों- जो रोगिन हो और जो अपने थन को स्वयं पीती हो ॥२९८॥ ऐसी गौ आदि के दुग्ध से होम न करे क्योंकि वह किया हुआ होम बिन किए के समान हो जाता है। ब्राह्मौदन (अग्न्याधानादि के समय चावल बनते हैं) सोम यज्ञ - सीमंत, इन में ॥२९९॥ और जातकर्म के श्राद्ध और नवक श्राद्ध में भोजन करके चांद्रायण व्रत करे। राजा का अन्न तेज को और शूद्र का ब्रह्म तेज को हरता है ॥३००॥ अपनी लड़की के अन्न को जो खाता है वह जानो पृथिवी के मल को खाता है और जिस लड़की के संतान न हुई हो उसके घर में भी पिता न खाये ॥३०१॥
अत्रिस्मृतिः ॥ ५३
भुङ्क्तेत्वस्यामाययान्नं पूयसंनरकंब्रजेत् । अधीत्यचतुरोवेदान्सर्वशास्त्रार्थतत्ववित् ॥ ३०२ ॥ नरेन्द्रभवनेभुक्त्वा विष्ठायांजायतेकृमिः । नवश्राद्धेत्रिपक्षेच षण्मासेमासिकेऽब्दिक ॥३०३॥ पतन्तिपितरस्तस्य योभुङ्क्तेनापदिद्विजः । चान्द्रायणंनवश्राद्धे पराकोमासिकेतथा ॥३०४॥ त्रिपक्षेचातिकृच्छ्रँ स्यात् षण्मासेकृच्छ्रमेवच । आब्दिक पादकृच्छ्रं स्या-देकाहःपुनराब्दिक ॥३०५॥ ब्रह्मचर्यमनाधाय मासश्राद्धेषुपर्व्वसु । द्वादशाहेत्रिपक्षेऽब्दे यस्तुपक्षेद्विजोत्तमः ॥३०६॥ पतन्तिपितरस्तस्य ब्रह्मलोकेगताअपि । पक्षेवायदिवामासे यस्यनाश्नन्तिवैद्विजाः ॥३०७॥
और जो प्रजा हीन लड़की के अन्न को छल से खाता है वह पूयस नामक नरक में जाता है-चार वेदों को पढ़कर सब शास्त्रों के तत्त्व को जानने बाला पुरुष ३०२॥ राजा के घर में भोजन करके विष्टा में कीड़ा होता है। नवक श्राद्ध [मनुष्य के मरने पर ग्यारहवें दिन के श्राद्ध को नव वा नवक श्राद्ध कहते हैं] त्रिपक्ष का, छमाही का मासिक और वार्षिक इन श्राद्धों में ॥३०३॥ आपत्ति के बिना जो ब्राह्मण भोजन करता है उस के पितर नरक में पड़ते हैं। नवक श्राद्ध में चांद्रा-यण, मासिकश्राद्ध में पराक, ॥३०४॥ त्रिपक्ष (१॥ मास) के श्राद्ध में अति कृच्छ्र छेमाही के श्राद्ध में कृच्छ्र पहिले वार्षिक वर्षों में पाद कृच्छ्र, और दूसरे वार्षिक में एक दिन उपवास करै ॥३०५॥ बिना ब्रह्मचर्य से किए मासिक श्राद्ध में पर्व्व (पूर्णामासी आदि) में मृतक के द्वादशाह में—त्रिपक्ष में—और वार्षिक श्राद्ध में जो ब्राह्मण भोजन करता है ॥ ३०६ ॥ ब्रह्मलोक में गये भी उस के पितर नरक में जाते हैं। जिस गृहस्थी के घर में पक्ष अथवा महीने में ब्राह्मण भो-जन न करते हों॥ ३०७ ॥
एकादशाहेऽहोरात्रं भुक्त्वासंचयनेत्र्यहम् ॥ ३०८ ॥
५४ भाषार्थसहिता ॥
भुक्त्वादुरात्मनस्तस्य द्विजश्चान्द्रायणंचरेत् । एकादशाहेऽहोरात्रं भुक्त्वासंचयनेत्र्यहम् ॥ ३०८ ॥ उपोष्यविधिवद्विप्रः कूष्मांडीर्जुहुयाद्घृतम् यन्नवेदध्वनिस्नातं नचगोभिरलंकृतम् ॥३०९॥ यन्नबालैःपरिवृतं श्मशानमिवतद्गृहम् । हास्येपिबहवोयत्र विनाधर्मंवदन्तिहि ॥३१०॥ विनापिधर्मशास्त्रेण सधर्मोपावनःस्मृतः । हीनवर्णेचयःकुर्यात् अज्ञानादभिवादनम् ॥ ३११ ॥ तत्रस्नानंप्रकुर्वीत घृतंप्राश्यविशुद्ध्यति । समुत्पन्नेयदास्नाने भुङ्क्ते वापिपिबेद्यदि ॥३१२॥ गायत्र्यष्टसहस्रंतु जपेत्स्नात्वासमाहितः । अंगुल्यादन्तकाष्टंच प्रत्यक्षंलवणंतथा ॥ ३१३ ॥
उस दुष्टचित्त वाले के अन्न को खाकर द्विज चांद्रायण व्रत करे । सूतक के ग्यारह वें दिन भोजन करके एक रात दिन और अस्थि संचयन के दिन भोजन करेतो तीन दिन तक ॥३०८॥ विधि से उपवास करके बैठे और घी से हवन करे । जो घर वेद के उच्चारण से पवित्र नहीं-और जो गौओं से शोभायमान नहीं है ॥ ३०९ ॥ और जो बालकों से भराहुआ नहीं है वह घर मरघट भूमि के तुल्य है । हंसी में भी जहां बहुत मनुष्य अधर्म से भिन्न जो कुछ कर्त्तव्य कहते हों ३१० ॥ और चाहे वह उन बहुत मनुष्यों का कथन धर्म शास्त्र के विरुद्ध भी होती वह उनका कथन परम धर्म कहा है- जो अपने से नीचे वर्ण को अज्ञान से अभिवादन करता है ॥ ३११ ॥ वह मनुष्य स्नान कर के घी को चाटे तो शुद्ध होता है-जो स्नान के योग्य मनुष्य विना स्नान किये भोजन करले अथवा जलपान करले तो ॥३१२॥ स्नान करके सावधानता से आठ हजार गायत्री जपै । अंगुली सहित दातौन प्रत्यक्ष (केवल) लवण का भक्षण ॥ ३१३ ॥