भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

क्या ईश्वर और धर्मके बिना काम चलेगा ? ७०७

उठ गया है। गिरते समय प्राणीके हाथ-पाँव यद्यपि स्वभावसे ही किसी सहारेको टटोलने लगते हैं और दुनियाके सम्पूर्ण सहारोंके कमजोर होनेपर, एकमात्र भगवान्‌का ही बल रह जाता है। अतः स्वाभाविक रूपसे भगवान्‌का आश्रयण ही शेष रह जाता है। फिर भी जब ब्रह्मा, शेष आदिके कहनेपर भी भगवान्‌के पुकारनेमें विश्वास न हो तो इसे राष्ट्रका दुर्भाग्य ही समझना चाहिये। रहा यह कि जप, पाठ, पूजा करते हुए भी सोमनाथका मन्दिर टूट गया, विश्वनाथ भाग गये, हिन्दू जातिका सर्वस्व लुट गया; फिर ईश्वर या धर्मको पुकारनेसे क्या लाभ ? परंतु यदि ठण्डे दिलसे विचार करें तो इस शंकाका कुछ भी महत्त्व नहीं है। पहले तो यह सोचना चाहिये कि क्या किसी उपायके कभी असफल हो जानेमात्रसे, सर्वदाके लिये उसे व्यर्थ और बेकाम समझ लेना उचित है ? क्या कभी वायुयानके फेल हो जाने या किसी यन्त्रके कल- पुर्जोंके बेकार हो जानेपर सर्वदाके लिये उनको बेकार समझ लिया जाता है ? देखते तो यह हैं कि बार- बार वायुयानों, मोटरों, रेलों तथा अन्यान्य यन्त्रोंके बेकार या हानिकारक होनेपर भी उनका निर्माण और संचालन बन्द नहीं हुआ। बड़े-बड़े आविष्कारक वैज्ञानिक बार-बार विफल होनेपर भी प्रयत्नका पीछा नहीं छोड़ते, फिर लाखों सफलताके भी तो उदाहरण विद्यमान हैं, फिर उनके आधारपर विश्वास ही क्यों न किया जाय ? असफलताका कारण कोई त्रुटि ही समझी जाती है। किसी यन्त्रके एक छिद्र या कीलोंकी गड़बड़ी या कमी-वेशीसे वह व्यर्थ या हानिकारक हो सकता है। इसी तरह जो कार्य-कारण-भाव अपौरुषेय अतएव भ्रम-प्रमादादि स्पर्शसे शून्य, प्रामाणिक शास्त्रसे सिद्ध है, कतिपयस्थलीय व्यभिचारदर्शनमात्रसे उसका विघटन नहीं समझा जा सकता। जैसे वैज्ञानिक- निर्दिष्ट पद्धतिसे विपरीत किंचित् भी उलट-फेर होनेपर यन्त्र-संचालन और निर्माण व्यर्थ ही नहीं, हानिकारक समझे जाते हैं, वैसे ही शास्त्र-निर्दिष्ट पद्धतिमें किंचित् भी गड़बड़ी होनेपर जप, पाठ, पूजा आदि धर्म बेकार या हानिकारक हो सकते हैं; परंतु इतनेमात्रसे ही उन शास्त्रोंका अप्रामाण्य या उन जप, पाठ, पूजाओंमें सर्वदाके लिये अश्रद्धा कदापि उचित नहीं। जब अनेक स्थलोंमें वैज्ञानिक-निर्दिष्ट पद्धतिसे काम करनेपर सफलता देखी जा चुकी है, तब तो स्पष्ट ही है कि जहाँ कहीं यन्त्रोंकी विफलता या हानिकारकता देखी जाय, वहाँ संचालन, निर्माणमें ही कर्तृ-क्रियादिकी विगुणता या अन्यान्य किसी प्रकारकी त्रुटिकी ही फल-बलसे कल्पना करना उचित है। इसी तरह जप, पाठ, पूजा आदि किन्हीं भी प्रामाणिक शास्त्रोक्त उपायोंको जब अनेक स्थलोंमें सफल होते देख रहे हैं तो कतिपय स्थलोंमें व्यर्थता देखकर फल-बलसे ही उनके अनुष्ठानमें या साधनोंमें या कर्ताओंमें अवश्य ही किसी प्रकारकी त्रुटि समझ लेनी चाहिये। चिकित्सकोंके शास्त्रोक्त अनेक उपाय कहीं व्यर्थ हो जाते हैं, साथ ही कहीं हानिकारक भी साबित होते हैं तो भी वे उपाय सर्वदा व्यर्थ और सर्वदाके लिये हानिकारक हैं, यह समझना भारी भूल है। किंतु यही समझना उचित है कि जब यह अनेक स्थलोंमें सफल होते हैं तो प्रयोक्ता या प्रयोगकी ही कोई त्रुटि होनेसे कहीं विफल होते हैं। इस तरह सहजहीमें समझा जा सकता है कि जब अनेक जगह पूजा, पाठ, जप आदिकी सफलता प्रत्यक्ष ही देखी जाती है, फिर भी कहीं सोमनाथ आदि स्थलोंमें यदि पूजादिकी व्यर्थता हुई तो इससे प्रयोक्ताओं या प्रयोगोंमें ही त्रुटिकी कल्पना कर लेनी चाहिये, न कि पूजादि उपायोंको ही सर्वदाके लिये व्यर्थ और हानिकारक मान लेना चाहिये। अध्यक्षों और पूजकोंके अत्याचारों, अनाचारों और मन्दिरोंके अपचारोंसे मूर्तिमेंसे देव-तत्त्व हट जाता है। अनुष्ठानोंमें, मन्त्रोच्चारणमें किसी तरहकी गड़बड़ी या अनुष्ठाताओंके आचार- विचारोंमें गड़बड़ीसे अनुष्ठान व्यर्थ और हानिकारक हो सकते हैं; परंतु इतनेसे ही सब अनुष्ठान वैसे ही नहीं समझे जा सकते। इसके सिवा जैसे दो मल्लोंके

७०८ भक्तिसुधा युद्धमें प्रबल मल्लकी विजय, दुर्बलका पराभव होता है, वैसे ही किसी अनर्थको दूर करनेके लिये किये गये पुरुषार्थसे, अनर्थके जनकभूत प्रारब्ध कर्मसे संघर्ष होता है। यदि पिछले अनर्थारम्भक कर्मोंकी प्रबलता रही और अनर्थ-निवारक वर्तमान पुरुषार्थ कमजोर रहा तो पुरुषार्थकी व्यर्थता हो जाती है; परंतु यदि अनर्थारम्भक प्रारब्ध कर्मोंसे पुरुषार्थ प्रबल हुआ तो अवश्य ही सफलता मिलती है। भेद यही है कि प्रारब्ध कर्म अब घटाये-बढ़ाये नहीं जा सकते, पुरुषार्थ बढ़ाया जा सकता है। अतः पुरुषार्थसे कभी भी निराश होनेकी आवश्यकता नहीं है। कोई भी अनुष्ठान, पूजन, भजन यदि तीव्र संवेगसे शुद्ध प्रयोक्ताद्वारा सुचारु रूपसे किया जाय तो वह अवश्य सफल होता है। जहाँ कहीं विफलता होती है, वहाँ उपर्युक्त त्रुटियोंकी ही कल्पना उचित है। अनुष्ठानादिमें अविश्वास उचित नहीं है। नैयायिकोंने भी शास्त्रोंके कुछ कर्मोंकी विफलता देखकर उनमें कर्तृ-क्रियादि वैगुण्यकी ही कल्पना की है। जो कहा जाता है कि ‘सोमनाथ आदिके मन्दिर तोड़नेवालोंको कुछ भी दण्ड न मिला’ सो ठीक ही है। एक बार काशीके एक योग्य विद्वान्‌ने मुझसे कहा कि ‘आज दुर्गाजीकी चाँदीकी आँखोंको चोर चुरा ले गये। महाराज! यदि दुर्गाजीसे अपने ही आँखकी रक्षा न हुई, तब वे हम सबकी रक्षा कैसे कर सकेंगी?’ किसी एक और व्यक्तिने शिवजीपर चढ़े हुए अक्षत या फलोंको ले जाती हुई मूषिकाको देखकर यह समझ लिया था कि ‘मूर्तिपूजा व्यर्थ है, मूर्तिमें देवत्व नहीं है।’ ऐसी बातोंपर विचार करनेसे विदित होता है कि यह कितनी मोटी दृष्टिकी बात है। व्यापक परब्रह्म परमात्मा सर्वत्र ही रहता है, सम्पूर्ण विश्व उन्हींमें रहता है। सोना, उठना, बैठना सम्पूर्ण कर्म उन्हींमें होता है। जिस तरह गर्भस्थ बालककी सम्पूर्ण चेष्टाएँ माँके गर्भमें ही होती हैं, फिर भी माता कुपित नहीं होती। वैसे ही जीवोंकी अनेक हलचलें उसी परमात्मामें होती हैं, ‘क्षमाशील परमात्मा सबको ही सहन करता है।’ उत्क्षेपणं गर्भगतस्य पादयोः किं कल्पते मातुरधोक्षजागसे। किमस्तिनास्तिव्यपदेशभूषितं तवास्ति कुक्षेः कियदप्यनन्तः॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।१२) ब्रह्माजी कहते हैं—‘हे अधोक्षज! गर्भगत बालकके पादोत्क्षेपणको जननी क्या अपराध मानती है? यदि नहीं तो अस्तिनास्ति व्यपदेशसे भूषित यह सम्पूर्ण विश्व क्या आपकी कुक्षिसे बाहर है?’ भगवद्ध्यानके प्रभावसे एक ज्ञानी प्राणी भी देहाभिमानशून्य होता है। उसके एक बाहुमें कोई कण्टक चुभाता है, दूसरे बाहुमें कोई चन्दन-लिम्पन करता है। वह उतना उदार, सहनशील एवं देहाभिमानशून्य होता है कि न अनुकूलाचरणवालोंपर प्रहृष्ट हो, न प्रतिकूलाचरणवालोंपर कुपित हो; फिर भी अपने-अपने कर्तव्यके अनुसार ही उन सबको यथासमय फल मिलता है। जब एक देहवाले भगवद्भक्त ज्ञानीकी ऐसी स्थिति है, तब अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक भगवान्‌का तो कहना ही क्या है। उसके तो अपरिगणित देह हैं और वह महाज्ञानी सर्वत्र असंग और अभिमानशून्य है। वह किसीके सम्मान या अपमानमें किस तरह क्षुब्ध हो सकता है? भावुक लोग शास्त्रोंके आज्ञानुसार उसकी अनन्तानन्त प्रतिमाओंका निर्माणकर मन्त्रोंसे आवाहन, प्रतिष्ठापनादिद्वारा उसकी आराधना करते हैं और अपने कर्मके अनुसार ही यथाकाल फल पाते हैं। शास्त्रके अनुसार मन्त्रों एवं आराधनाओंके अनुसार पूजा-ग्रहण करने और फल देनेके लिये ही भगवान्‌का उन मूर्तियोंमें प्राकट्य होता है। कोई उन मूर्तियोंका अपमान करके भगवान्‌का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है। जिस तरह सूर्यपर निष्ठीवन करनेसे वह सूर्यपर न जाकर अपने ही ऊपर पड़ेगा, आकाशपर मुष्टिप्रहार या तलवारका चलाना बेकार है, वैसे ही भगवान्‌पर प्रहार या उनकी मूर्तियोंका तोड़ना बेकार

क्या ईश्वर और धर्मके बिना काम चलेगा? [पृ. ७०९]

है। अनन्त मूर्तियोंमें रहनेवाले भगवान् विश्वमूर्ति एवं अमूर्ति भगवान् इतने उदार और क्षमाशील तो हैं ही कि मूर्ति तोड़नेवालोंके कर्म ही उन्हें फल देते हैं। साधारण व्यक्ति जैसे असहिष्णु कोई भी शासक नहीं होते, फिर परमेश्वरकी तो बात ही दूसरी है। किन्हीं कर्मोंके फल अवसरके अनुसार ही होते हैं। 'ओडायर' की हत्या करनेवाला व्यक्ति तत्काल ही पकड़ लिया गया था; परंतु तत्क्षण ही उसे फाँसी नहीं दी गयी, न गोलीसे उड़ाया गया। बाकायदे न्यायालयमें न्याय हुआ। फिर दण्ड निश्चित हुआ। यथाकाल दण्ड दिया गया। जब प्राकृत शासकोंमें भी इतनी सहिष्णुता और काल-प्रतीक्षा होती है, तब फिर परमेश्वर ही सहिष्णु और कालप्रतीक्षक क्यों न हों? सम्राट्, स्वराट्, विराट् या गवर्नर, कमिश्नर आदि कोई भी अपने अपमान करनेवाले व्यक्तिको स्वयं पकड़ने या तत्क्षण दण्ड देनेमें नहीं प्रवृत्त होते, किंतु उनके कर्मचारी लोग ही उसे पकड़नेमें प्रवृत्त होते हैं। वे ही न्यायाध्यक्षका न्याय पाकर यथाकाल दण्ड देते हैं। इसी तरह ईश्वरकी मूर्तियोंका अपमान करनेवालोंको तत्क्षण ही परमेश्वर दण्ड नहीं देता; किंतु उसके कर्मचारी ही यथाकाल दण्ड देते हैं। कितने ही अज्ञ कहा करते हैं कि 'यदि परमेश्वर सर्वशक्तिमान् हो तो मैं उसे गाली देता हूँ, उसकी मूर्तिको तोड़ता हूँ, मेरे सामने आये या मेरा मुँह बन्द कर दे।' परंतु सोचना यह चाहिये कि यदि बड़े-बड़े तपस्वी युगयुगान्तरों, कल्प-कल्पान्तरोंकी तपस्याके पश्चात् उसका दर्शन पाते हैं, अनन्त तपस्याओंसे उसका अस्तित्व निर्णय कर पाते हैं, फिर वह इन अज्ञोंके कहनेमात्रसे कैसे प्रकट हो या उनके कथनानुसार उनका मुँह कैसे बन्द करे? क्या किसी सम्राट्को ऐसा कहनेपर वह प्रवृत्त होगा? वस्तुतः जैसे सावधान पुरुष उन्मादी या बालककी बातोंपर ध्यान न देकर उसपर कृपा ही करता है, वैसे परमेश्वर भी कृपा ही करते हैं, ‘जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी॥’ (रा०च०मा० ७।१।५) द्वित, त्रित आदि महर्षियोंने किसी यज्ञमें भगवान्‌को प्रकट करनेकी प्रतिज्ञा कर ली; परंतु जब भगवान् प्रकट हुए, तब वे शाप देनेको प्रस्तुत हुए, इसपर ऋषियोंने समझाया कि वे प्रभु भक्तिसे ही प्रकट हो सकते हैं, अहंकारसे नहीं। अतः ऐसा करना साहस है। हिरण्यकशिपु आदिको भी मारनेके लिये भगवान्‌का प्रह्लादकी भावनासे प्राकट्य हुआ— सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा॥ (रा०च०मा० २।२६५।५) इसके अतिरिक्त वे भगवान्‌के नित्यपार्षद हैं, भगवान्‌की लीलाके अंग होकर ही उनका जन्म था। इसलिये उनके लिये भगवान्‌का प्राकट्य ठीक है; परंतु साधारण जन्तुओंके लिये तो वैसा ही होगा, जैसे मच्छरको मारनेके लिये तोपका दागना। जिन कीटोंको भगवान्‌की कोई भी शक्ति पूर्ण दण्ड दे सकती है, उनके कहनेसे भगवान्‌का प्रकट होना अत्यन्त ही अनुपयुक्त है। इसलिये मूर्तिभंजकोंको दण्ड देनेके लिये भगवान्‌का प्राकट्य नहीं हुआ और न कोई चमत्कारपूर्ण तात्कालिक घटना घटी। चींटी, मूषिका आदिकी प्रवृत्ति अज्ञानपूर्विका होती है, चौरादिमें भी अज्ञानकी ही बहुलता है। अतः उनकी स्थिति क्षम्य ही है; किंतु विद्वेषाभिनिविष्टचेष्टाओंको यथाकाल दण्ड भोगना पड़ा ही। सुना जाता है, औरंगजेबने मरते समय अपने पुत्रको पत्र लिखकर अपना दुःख बड़े दैन्यपूर्ण शब्दोंमें निवेदन किया और सोमनाथके मन्दिरको तोड़नेवाला महमूद गजनवी मरनेके समय अपने सामने सोने-चाँदीका ढेर लगवाकर (जिसे वह लूट लाया था) खूब रोया था। कहीं-कहीं लोगोंको बहुत सन्देह हो जाता है, जब वे देखते हैं कि अत्याचारी प्रसन्न हैं और सदाचारी धर्मात्मा दुःख पा रहे हैं। परंतु यह निश्चय रखना चाहिये कि जैसे विषवृक्षमें विषका ही फल लगता है, अमृतफल नहीं; वैसे ही पापसे दुःख ही होगा, सुख नहीं; पुण्यसे सुख ही होगा, दुःख नहीं। हाँ, विलम्ब हो सकता है। कोई भी बीज अपना फल

७१० भक्तिसुधा देनेमें कुछ काल ले सकता है: परंतु यह कभी नहीं हो सकता कि विषवृक्षमें अमृतका फल लगे। कोई प्राणी चैत्रमें भले ही मटर या चना बोता हो, परंतु यदि उसने कार्तिकमें गेहूँ बोया है तो उसे चैत्रमें काटनेको तो गेहूँ ही मिलेगा। इसी तरह कोई प्राणी भले ही अधर्म-अत्याचार कर रहा हो: मूर्ति तोड़कर, शास्त्र- धर्म तोड़कर पाप करता हो: परंतु इस समय फल तो वही भोगनेको मिलेगा जैसा कर्म पहले कर चुका है। हाँ, उग्र पापों और पुण्योंका फल जल्दी मिलता है; परंतु वह भी कुछ तो अवसरकी प्रतीक्षा करता ही है। त्रिभिर्वर्षैस्त्रिभिर्मासैस्त्रिभिः पक्षैस्त्रिभिर्दिनैः। अत्युग्रपुण्यपापानामिहैव फलमश्नुते ॥ (हितोपदेश १२८) इसीलिये नल, राम, युधिष्ठिरादि धर्मनिष्ठ होते हुए भी दुःखी थे। रावण, दुर्योधनादि विपरीतगामी होनेपर भी सुखी थे। परंतु अन्तमें उन्हें अपने पापोंका भी फल भोगना पड़ा ही। राम, युधिष्ठिरादि सुखी हुए, रावणादिका सर्वनाश हो गया। सौ लख पूत सवा लख नाती। तेहि रावन के दिया न बाती ॥ ऐसे ही औरंगजेब आदिकी भी पूर्वजन्मकी तपस्या थी, उसीके प्रभावसे उन लोगोंका उतना तेज और वैभव था। जबतक उसकी समाप्ति नहीं हुई, तबतक उनका पराभव असम्भव था। सामान्यतः यही होता है कि तपस्यासे राज्य और राज्यसे नरक होता है। जब प्राणी पीड़ित, पददलित, उच्छोषित, विताड़ित होता है, तब उसे न्याय, धर्म और ईश्वर सूझता है। ऐसा होते ही कुछ उन्नति और प्रभुता होती है; बस, उसी समय अपने-आपको सँभालना बुद्धिमानी है। अधिकारकी कुर्सी मिलते ही न्याय, धर्म और ईश्वरको भूल जाते हैं। नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं ॥ (रा०च०मा० १।६०।८) बस, उसी समय रावण, औरंगजेब-जैसी प्रवृत्ति होने लगती है। परमेश्वरीय दण्ड उन्हें मिलता है; परंतु न्यायकारी परमेश्वर कालकी प्रतीक्षा करके ही—शुभकर्मोंका फल भोग लेनेपर ही उन्हें अशुभ कर्मोंका फल प्रदान करते हैं। श्रीहनुमान्ने रावणके विचित्र वैभवको देखकर यही निश्चय किया कि 'अहो ! यदि इसमें अधर्म बलवान् न होता तो यह शक्रसहित समस्त लोकपालोंका स्वामी ही होनेयोग्य था'— यद्यधर्मो न बलवान् स्यादयं राक्षसेश्वरः। स्यादयं सुरलोकस्य सशक्रस्यापि रक्षिता ॥ लोकपाल भयभीत होकर इसके भ्रुकुटीका ही विलोकन करते रहते हैं— कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता ॥ (रा०च०मा० ५।२०।७) हनुमान्जीने समझाया कि रावण ! तुमने बहुत कुछ सत्कर्म किया है, उसका फल तुम्हें प्राप्त है— उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती। सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती ॥ बर पायहु कीन्हेहु सब काजा। जीतेहु लोकपाल सब राजा ॥ (रा०च०मा० ६।२०।३-४) परंतु अब अधर्मके फलभोगका समय आ रहा है, सावधान हो जाओ। तात्पर्य यही कि अत्याचारीको भी अपने असत्कर्मोंका फलभोग मिलता है, अवसर पाकर सत्कर्मोंका भी फल मिलता है। ऐसे ही धर्मात्माको भी पिछले प्रारब्ध—तीव्रतम अधर्मका भी फल भोगना पड़ता है। जो कहा जाता है कि भारत 'धर्म-धर्म' चिल्लाता है तो भी उसका पतन-ही-पतन दृष्टिगोचर होता है। दूसरे देश धर्मका नाम भी नहीं लेते, फिर भी हमपर शासन कर रहे हैं। परंतु यह भी अविचारित-रमणीय बात है। 'दूरके ढोल सुहावने लगते हैं।' यह हम कह चुके हैं कि जहाँ भी कहीं उन्नति देखो, वहाँ उसके मूलभूत धर्मकी कल्पना कर लेनी चाहिये। विषवृक्षमें अमृतफल कदापि नहीं लगता। जहाँ धर्मकी चर्चा नहीं, वहाँ ऐसी-ऐसी भयानक विपत्तियाँ आती हैं कि नगर-के-नगर ज्वालामुखियोंमें जल जाते हैं। कभी-कभी बड़े-बड़े देश-के-देश अकस्मात् धरातलमें विलीन हो जाते हैं,

क्या ईश्वर और धर्मके बिना काम चलेगा ? ७११

कभी समुद्रकी गोदमें दिखायी देते हैं। कभी भयानक संग्रामोंसे आपसमें ही कट मरते हैं, शान्तिकी दृष्टिसे आज भी भारतमें और देशोंकी अपेक्षा गनीमत है। आध्यात्मिकता और धार्मिकताका ही फल है कि आज भी यहाँ लूट-खसोटकर दूसरोंकी सम्पत्तियोंको आत्मसात् करनेमें संकोच है। यहाँकी सभ्यता- संस्कृति आज भी बची है। संसारमें हजारों संस्कृतियाँ उत्पन्न होकर मिट गयीं; परंतु प्राचीनतम भारतीय संस्कृति आज भी सुरक्षित है। आज भी भौतिक दृष्टिमें कितने ही बढ़े- चढ़े देशोंके समझदार विद्वान् भारतसे बहुत कुछ आशा कर रहे हैं। कितने ही पाश्चात्य विद्वान् शान्ति-सुखके लिये बराबर भारतकी शरण आ रहे हैं। इसके अतिरिक्त आज तो ऐसा कोई भी राष्ट्र और समूह नहीं है, जो धर्म या ईश्वरको किसी-न-किसी रूपमें न स्वीकार करता हो। धर्मवादिनी, ईश्वरवादिनी संस्थाओंको गैरकानूनी करार देनेवालों, ईश्वर और धर्मको साम्यविरोधी समझकर अपने देशसे निकल जानेका आदेश देनेवालोंने भी आज परमेश्वरको पुकारना प्रारम्भ किया है। लाखों वैज्ञानिक, हजारों विज्ञानशालाएँ जिनके आज्ञानुसार सफल प्रयोगोंमें तत्पर हैं, उन लोगोंने भी अस्त्र-शस्त्र, संगठन-बल, बाहु-बल, बौद्ध-बलसे सम्पन्न होकर भी आज परमेश्वरको पुकारनेमें अपना और अपने राष्ट्रका कल्याण समझना आरम्भ कर दिया है। ऐसी स्थितिमें भारतको आज धर्म और माला-जपकी आवश्यकता न प्रतीत हो, यह आश्चर्य है। जो कहा जाता है कि यहाँ आज भी धर्मके नामपर सब देशोंसे अधिक धन और समयका व्यय होता है, सो अवश्य ठीक है। परंतु सदुपयोग, दुरुपयोग नामकी भी तो कोई वस्तु है। यह स्पष्ट ही है कि अधिकतर धन और समयका धर्मके नामपर अपव्यय होता है। अपरिगणित धर्मादेकी सम्पत्तियोंका दुरुपयोग हो ही रहा है। यदि धर्मके यथार्थ स्वरूपका प्राकट्य या सच्छास्त्रोंके प्रचारसे अविद्यानिरसनमें उनका उपयोग हो तो सचमुच लाभ हो सकता है। तात्पर्य यह है कि शास्त्रके अनुसार शुद्ध भावनासे ही किया गया जप, तप, धर्मानुष्ठान लाभदायक होता है। अन्यथा देखते ही हैं कि धुन्धुने बहुत कालतक अनन्त तप किया था, परंतु भावना वेदादि शास्त्रों और धर्मके विरोधकी थी, इसीलिये उस तपका भी अन्तिम पर्यवसान उत्तम नहीं हुआ। सदुपयोगसे एक पैसेका भी दान लाभदायक होता है, दुरुपयोगसे हानिकारक होता है। एक पैसा दान देकर कोई रूई खरीदकर बत्ती-निर्माणकर ठाकुरजीकी आरती करता है; कोई एक पैसा पाकर बंसी खरीदकर मत्स्य मारता है। कोई अरबपति अहंकारसे प्रतिष्ठामात्रके लिये लाखोंका दान कर सकता है। बाह्य प्रयोजन उससे अधिक सम्पन्न हो सकते हैं। परंतु भावनाकी विशेषता उस दानमें नहीं है। एक वृद्धा गरीबनी श्रद्धासे अपने अर्ध सेटक अन्नसे छटाँक अन्नका दान करती है। भावनाकी दृष्टिसे अरबपतिके लक्षदानसे इस छटाँक दानका महत्त्व कहीं अधिक है। आज जहाँ साँपकी चर्बी, मछलीके तेलको घृतरूपमें विक्रय करके करोड़ों रुपयोंका लाभ प्राप्त कर लेनेपर लाखोंका दान किया भी गया तो वह कितने महत्त्वका हो सकता है ? उस दानको लेनेवालों, खानेवालोंकी क्या दशा होगी ? इसके अतिरिक्त आज दानके नामपर पापमयी संस्थाएँ भी तो चल रही हैं, जहाँसे नास्तिकोंका सृजन होता है, जहाँसे नास्तिकता तथा तन्मूलक धर्मका प्रचार होता है—ऐसी भी संस्थाएँ दान और धर्मके ही नामपर चल रही हैं। इस प्रकारके दान और धर्मसे देशको सुख-शान्ति कैसे प्राप्त हो सकती है ? अर्थ-काम-परायण संसार अर्थ-कामके सम्पादनमें तो अपना सम्पूर्ण पुरुषार्थ लगा देता है, परंतु धर्म और मोक्षको दैव या प्रारब्धपर छोड़ देता है। जितनी सावधानी और चतुरता है, सब अर्थ- काममें ही उपयुक्त की जा रही है। 'एक राजाके दो मन्त्री थे, एक व्यापार कार्यमें दक्ष, दूसरा संग्राममें दक्ष था; परंतु अनभिज्ञतावश राजाने उनका विपरीत

७१२ भक्तिसुधा

उपयोग किया। व्यापारनिपुणको संग्राममें, संग्रामनिपुणको व्यापारमें लगा दिया, जिसका फल व्यापारमें हानि और संग्राममें पराजय हुई।' इसी तरह हमने अर्थ- काम-सम्पादनमें चतुर प्रारब्धको धर्म, मोक्षमें लगा दिया; धर्म-मोक्ष-सम्पादनमें चतुर पुरुषार्थको अर्थ- काममें नियुक्त कर दिया है। इसीलिये दोनोंके विषयमें गड़बड़ी हो रही है। वस्तु और अवसरका दुरुपयोग होनेसे हानियोंका ठिकाना नहीं रहता। ज्ञान, विज्ञान, धर्म और ईश्वर बड़ी उत्तम चीज हैं, परंतु इन्हींका दुरुपयोग करनेसे अनर्थ हो सकता है। ईश्वर और धर्मके सहारे सामाजिक, लौकिक विचारणीय स्थितिकी उपेक्षा बुरी है। समाज-राष्ट्रके हितका प्रश्न आनेपर वैराग्य और विश्वमिथ्यात्व भावनाका प्राधान्य खतरनाक है; जब कि भोजन-पानादिसे वैसा उत्कट वैराग्य नहीं है। आज कितने ही व्यक्ति तो साधुओंको धर्म- संस्कृतिके रक्षणमें अप्रवृत्त देखकर उन्हें कोसते हैं। कितने ऐसे भी हैं, जो दुनियाके अनर्थ करनेमें, प्रपंच रचनेमें किंचित् भी संकोच नहीं करते; परंतु धर्म- संस्कृतिके रक्षणार्थ उद्योगको प्रपंच ही मानते हैं। राष्ट्र और विश्वकी शान्तिको असम्भव और तदर्थ प्रयत्न करनेवालोंको सर्वथा स्वार्थपरायण ही सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं। विशेषतः गृहस्थों और युवकोंका कार्यकालमें वैराग्य, असमर्थोंका कार्यमें राग होना हानिकारक है। आज भी शास्त्र और धर्मको सरपंच मानकर, शास्त्र और धर्मका प्रसार करते हुए, उसीके आधारपर यदि संगठन किया जाय तो सम्पूर्ण अनर्थ दूर हो सकता है। परंतु शास्त्र जाननेवाले और धर्ममें प्रेम रखनेवाले इस ओरसे अत्यन्त अपरिचित और विमुख हो रहे हैं। शास्त्र और धर्मसे अपरिचित ही उच्छृंखल मार्गसे संघटन करना और विश्वकी समस्या हल करना चाहते हैं। दूसरेके गुणोंको न देखकर दोषोंका ही दर्शन करते हैं। अपने दोषोंका बिलकुल चिन्तन न करके गुण ही देखना चाहते हैं। शास्त्रज्ञ धार्मिक जन शास्त्रोक्त-मार्गके अनुसार चलकर राष्ट्र या संसारका पथप्रदर्शन नहीं करना चाहते। शास्त्र और धर्मके रहस्य और महत्त्वको न समझनेवाले लोग, धर्मों और शास्त्रोंमें आमूलचूल परिवर्तन करना चाहते हैं। वे श्रौतस्मार्तवर्णाश्रम- धर्मकी बातोंको आज अनावश्यक समझते हैं। भगवदाराधनामें अपेक्षित परम मांगलिक घण्टा- शंख-निनादको 'टन-टन', 'पों-पों' कहकर प्रहसन करते हैं। मठाधीश, मन्दिराधिपति, जागीरदार, सन्त- महन्त अपने द्रव्योंको धर्मकार्यमें, संस्कृत विद्यालय, पुस्तकालय तथा धर्म-प्रचार कार्यमें नहीं लगाना चाहते तो दूसरे उन सबको छीनकर सत्कार, पूजा आदिको हटाकर या साधारण करके स्कूल, कालेज और यूनिवर्सिटी बनाना चाहते हैं। विधवाश्रम, हरिजन फण्ड, अनाथालय तथा अस्पतालमें सब कुछ लगाना चाहते हैं। यदि आस्तिक अपनी माता, बहनोंको सावित्री, सीता-जैसी साध्वी बनानेका प्रयत्न नहीं करते तो दूसरे लोग विलायती लेडी बनानेमें सफल होना ही चाहते हैं। हम इतना ही कहना चाहते हैं कि समय रहते लोगोंको सावधान हो जाना चाहिये। लोग बड़े गर्वके साथ कहते हैं कि 'अब गत शताब्दियोंके दिन लद गये। आजके वैज्ञानिक युगमें पुराने जमानेके सड़े- गले नियमोंकी कोई आवश्यकता नहीं है। मनुष्यको चाहिये कि दुनियाके परिवर्तनके साथ ही अपने- आपको परिवर्तित करते चलें। देश-कालकी परिस्थितिके अनुसार धर्म, कर्म और शास्त्रका निर्माण होना चाहिये।' इन लोगोंकी बातोंपर ध्यान दिया जाय तो प्रतीत होगा कि यह विचार भी अब पुराने होते जा रहे हैं; तथापि जैसे सावनके अन्धेको ग्रीष्ममें भी हरियालीकी ही प्रतीति होती है, वैसे ही आजके लोगोंकी धारणा है। जिन विचारों और आचारोंको पाश्चात्य लोग भी छोड़ रहे हैं, भारतके नक्काल आज भी उन्हींकी नकल उतारनेमें तथा पाश्चात्योंकी भद्दी नकल उतारनेमें परेशान हैं। धार्मिकता, आध्यात्मिकतासे शून्य वैज्ञानिक-सभ्यताके दुष्परिणामसे

पाश्चात्य विद्वान् भी उद्विग्न हो रहे हैं, वे लोग भी धर्म और ईश्वरकी आवश्यकता समझ रहे हैं। परंतु भारतीयोंको आज भी नवीन सभ्यताका ही स्वप्न दीखता है। संसारमें कोई चीज पुरानी या नयी होनेसे ही आदरणीय नहीं होती; किंतु उसके गुणागुणकी ओर अच्छी तरहसे ध्यान देना चाहिये— ‘सन्तः परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः।’ पृथ्वी, आकाश, वायु और आत्मा पुराने ही हैं; परंतु क्या इतनेसे ही ये सब हेय हैं? भोजन करके भूख मिटाने और पानी पीकर प्यास मिटानेकी पद्धति पुरानी ही है, फिर भी क्या त्याज्य है? रोग, विपत्ति नवीन होनेपर भी क्या आदरणीय है? यदि नहीं, तब तो अनादि अपौरुषेय वेदादि सच्छास्त्रोंद्वारा प्रदर्शित मार्गसे लौकिक-पारलौकिक उन्नतिके लिये प्रयत्न करना ही उचित है। जो मार्ग शास्त्रोक्त न भी हो, फिर भी शास्त्रके अविरुद्ध हो तो काममें लाया जा सकता है। वेद, इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र, दर्शनशास्त्र, राजनीतिशास्त्रके अध्ययन-अध्यापनका प्रचार होनेपर सब तरहकी समस्याओंका समाधान हो जाता है। कोई भी मार्ग, यदि वह परिणाममें हानिकारक न हो, तभी स्वीकृत होना चाहिये। जिस विषसंयुक्त भोजनसे अन्तमें मौतके मुँहमें पड़ना पड़े, फिर भले ही उससे तात्कालिक तुष्टि, पुष्टि, क्षुन्निवृत्ति भी हो तो क्या लाभ ? जिस शास्त्र या धर्म-विरुद्ध उपायसे तात्कालिक लाभ भी हो; परंतु यदि अन्तमें पतन हो तो उससे क्या लाभ ? इसीलिये तो बुद्धिमानोंने अनर्थानुबन्ध, अकर्मानुबन्ध, अननुबन्ध अर्थको छोड़कर अर्थानुबन्ध और धर्मानुबन्ध अर्थको ही श्रेष्ठ समझा है। धर्मोल्लंघन करके प्राप्त किये गये अर्थको अनादरणीय बतलाया है। अकृत्वा परसन्तापमगत्वा खलमन्दिरम्। अनुल्लङ्घ्य सतां मार्गं यत्स्वल्पमपि तद्बहु ॥ ‘दूसरोंको सन्ताप न पहुँचाकर, खलोंके घर न जाकर, सज्जनोंका मार्गलंघन न करके जो थोड़ी भी चीज है, वही बहुत बड़ी समझनी चाहिये। अतिक्लेशेन ये ह्यर्थाः धर्मस्यातिक्रमेण च। शत्रूणां प्रणिपातेन मा च तेषु मनः कृथाः ॥ ‘अतिक्लेशसे, धर्मोल्लंघनसे, शत्रुप्रणिपातसे जो अर्थ मिलता हो, उसमें कभी भी मन न लगाना चाहिये।’ आस्तिकों, शास्त्रज्ञोंका यह आग्रह नहीं कि कोई नवीन मार्ग सामाजिक, नैतिक, राष्ट्रीय उत्थानके लिये न ग्रहण करना चाहिये। यदि कोई सरल- सुगम-निर्विघ्न उपाय प्राप्त होता हो तो शास्त्रोक्त मार्गकी कठिनाईका अनुभव क्यों करें ? ‘अक्के चेन्मधु विन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत्।’ ‘यदि गृहकोणमें मधु मिल जाय तो मधुके लिये पर्वतपर क्यों जाया जाय ?’ परंतु यदि शास्त्रविरुद्ध मार्गसे परिणाममें पतन और नरकादि दुःख भोगना पड़े, तब तो उसकी उपेक्षा उचित ही है। यही अध्यात्मवादी आस्तिकोंकी भौतिकवादियोंसे विशेषता है। भौतिकवादी सामाजिक या वैयक्तिक अभ्युत्थानके मार्गका निर्धारण करते हुए धार्मिक-आध्यात्मिकके हानि-लाभकी चिन्ता नहीं रखते। अध्यात्मवादी, धर्मवादी लोग भी पूर्णरूपसे राष्ट्रीय, सामाजिक अभ्युत्थानका प्रयत्न करते हैं; परंतु सर्वदा यह ध्यान रखते हैं कि उसी उपायका अवलम्बन किया जाय, जिससे लाभकी अपेक्षा परिणाममें हानि न हो और परलोक न बिगड़े।

चतुर्थ खण्ड—ज्ञानतत्त्वदर्शन वेदान्तरससार मंगलाचरण जयति रघुवंशतिलकः कौसल्याहृदयनन्दनो रामः। दशवदननिधनकारी दाशरथिः पुण्डरीकाक्षः॥ वेदप्रामाण्य-तात्पर्यविमर्श वेदशास्त्रार्थपरिशीलन-संस्कृतमानस महानुभावोंसे यह तिरोहित नहीं है कि प्राणियोंके चतुर्वर्गकी अविकलरूपसे प्राप्तिका अति सुन्दर पथ वेदोंने प्रदर्शित किया है। विशेषतः धर्म और ब्रह्मके बोधमें तो एकमात्र वेद ही प्रमाणभूत है। अतएव 'चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः' (जैमिनीयसूत्र १।१।२) (प्रवर्तक और निवर्तक वैदिक वाक्योंसे लक्षित, अनर्थ श्येनादिसे व्यावर्तित, अग्निहोत्र-दर्श-पौर्णमासादि अर्थ ही धर्म है), 'यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य' (गीता १६।२३), 'तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते' (गीता १६।२४), 'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि' (बृहदारण्यक० ३।९।२६), 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः', (गीता १५।१५) इत्यादि श्रौत-स्मार्त वचनोंसे धर्म और ब्रह्मको वेदादिशास्त्रैकसमधिगम्य माना गया है। वेद अनादि-अविच्छिन्नसम्प्रदाय परम्परासे प्राप्त हैं। कोई भी पुरुष स्वातन्त्र्येण उनका निर्माण करनेवाला नहीं है। परमात्मा भी पूर्वकल्पीयवेदानुपूर्वी सापेक्ष ही उत्तरकल्पीय आनुपूर्वीका निर्माण करते हैं। अतः प्रमाणान्तरसे अर्थोपलम्भपुरःसर निर्मातृत्व- रूप कर्तृत्व उन परमात्मामें भी नहीं है। अतः अपौरुषेय वेदोंका ही सकल पुंदोषशंकाकलंक- पंकसे असंस्पृष्ट होनेके कारण सर्वानपेक्ष (सर्वथा निरपेक्ष) प्रामाण्य है। अतएव परमेश्वरनिर्मितत्व वेदोंके प्रामाण्यका प्रयोजक नहीं है, अपितु परमेश्वरके स्वरूपादिकी सिद्धि ही वेदोंके अधीन है। अन्यथा वैदिक जिन- जिन युक्तियोंसे वेदकारको परमेश्वर या तदवतार मानकर तन्निर्मितत्वेन वेदोंका प्रामाण्य व्यवस्थापन करेंगे, उन्हीं-उन्हीं युक्तियोंसे भिन्न-भिन्न मतवादी भी अपने धर्मग्रन्थ-रचयिताको परमेश्वर सिद्ध करके उससे निर्मित अपने धर्मग्रन्थोंका प्रामाण्य व्यवस्थापन करेंगे। अस्तु, इन सब बातोंके कथनका आशय यही है कि वेदोंका धर्म और ब्रह्मस्वरूपके निर्णयमें अनपेक्ष प्रामाण्य है। कल्पसूत्र, स्मृत्यादि और अन्यान्य आर्षग्रन्थोंका प्रामाण्य वेदसापेक्ष ही है। अतएव वेदके साथ जिन वचनोंका विरोध होता है, उनका प्रामाण्य कभी भी स्वीकार नहीं किया जाता, चाहे वे वचन किसी भी आर्षग्रन्थके क्यों न हों। वेदोंमें अवान्तर अनेक भेदोंके होते हुए भी प्रधान रूपसे मन्त्र और ब्राह्मण ये दो भाग हैं। शाखाभेद होनेसे उनमें अनेकता होनेपर भी विषय प्रायः सबका समान ही है। प्रायेण मन्त्र, ब्राह्मण और कल्पसूत्र साथ ही चलते हैं। यद्यपि उन सभीका महातात्पर्य सर्वप्राणिपरप्रेमास्पद परिपूर्ण परमानन्दघन भगवान्में ही है, यथा 'सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति' (कठ० १।२।१५) तथापि अदृश्य, अग्राह्य, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य, परमसूक्ष्म भगवत्तत्त्वकी उपलब्धि और उसमें स्थिति बहिर्मुख प्राणियोंके लिये कठिन ही नहीं, अपितु असम्भव है। अतः योग्यता-सम्पादनके लिये अनेक प्रकारके कर्म और उपासनाओंकी अत्यन्त आवश्यकता है। अतः वेदोंका अवान्तर तात्पर्य उनमें भी है। वेदोंके महातात्पर्यके विषयभूत परमानन्दघन भगवान्में ही सकल प्रपंचकी उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और प्रतीति होती है, अतः जैसे तरंगके भीतर, बाहर, मध्यमें जल ही भरपूर होता है, वैसे ही भोक्ता-भोग्य सकल प्रपंचके भीतर, बाहर, मध्यमें परमानन्द रसात्मक भगवान् ही भरपूर हैं। किं बहुना एक आनन्द-सुधा-सिन्धु भगवान् ही अपनी

वेदान्तरससार ७१५ अघटितघटनापटीयसी मायाशक्तिके प्रभावसे नाना जैसे आनन्दस्वरूप चैतन्यात्मक ब्रह्मसे जड़ तथा दृश्य रूपमें प्रतीत होते हैं, यथा- 'आनन्दाद्धयेव दुःखात्मक प्रपंचका होना सम्मत है, वैसे ही खल्विमानि भूतानि जायन्ते, आनन्देन जातानि परमार्थसत्य परमात्मासे मिथ्या प्रपंचका प्रादुर्भाव जीवन्ति, आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।' (तैत्तिरीय० मानना युक्त है। इन विवेचनोंसे सिद्ध हुआ कि ३।६) 'तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय' (छान्दो० परमानन्द स्वप्रकाश परमार्थसत्य भगवान्से दुःखात्मक, ६।२।३) इत्यादि। जडात्मक, मिथ्या अर्थात् अपरमार्थिक व्यवहारोपयोगी, ब्रह्मकी सच्चिदानन्दरूपता और व्यावहारिक प्रपंचका प्रादुर्भाव होता है। जगत्की असच्चिदानन्दरूपता मायाकी अनिर्वचनीयता जैसे आनन्दस्वरूपसे दुःखात्मक प्रपंच प्रादुर्भूत जैसे अग्निकी दाहिका-शक्ति अग्निसे विलक्षण होता है, वैसे ही चैतन्यसे जड प्रपंचका प्रादुर्भाव होती है, वैसे ही त्रिकालाबाध्य सद्रूप ब्रह्मकी होता है। यह बात अभिन्ननिमित्तोपादान कारणवादियोंको प्रपंचोत्पादिनी शक्ति ब्रह्मसे विलक्षण है। अतः माननी पड़ती है और उसी तरह त्रिकालाबाध्य त्रिकालाबाध्यरूप सत्से विलक्षण उसकी शक्ति शुद्ध परमार्थ सत्य भगवान्से अनृतात्मक प्रपंचका प्रादुर्भाव सद्रूप अधिष्ठानके बोधसे बाधित होती है। साथ ही होता है, यह भी मानना चाहिये। क्वचिदपि कथंचिदपि (कहीं भी, किसी प्रकार भी) प्रपंच आनन्दसे उत्पन्न होनेवाला और आनन्दमें न प्रतीत होनेवाले अत्यन्त असत् खपुष्पादि (आकाश- विलीन होनेवाला है, यह उपर्युक्त श्रुतिसे स्पष्ट कुसुमादि)-से भी विलक्षण सत्की शक्ति है; क्योंकि सिद्ध होता है। जैसे समुद्रसे उत्पन्न और उसमें वही सकल प्रपंचकी जननी है। इस तरह जिससे विलीन होनेवाला तरंग समुद्र ही है, वैसे ही परमात्मा अपने-आपको सकल प्रपंचरूपसे व्यक्त आनन्दसे उत्पन्न और उसीमें विलीन होनेवाला करता है, परमात्मनिष्ठ वह शक्ति सत् और असत् प्रपंच भी आनन्दात्मक ही होना चाहिये तथा दोनोंसे विलक्षण है, अतएव उसको अनिर्वचनीय सर्वप्रकाशक चैतन्यघनसे उत्पन्न होनेवाला प्रपंच कहते हैं। चेतनात्मक ही होना चाहिये। परंतु प्रपंचमें दुःखरूपता इस शक्तिको ही 'माया', 'प्रकृति', 'अविद्या', और जड़ता सर्वानुभवसिद्ध एवं सर्वमान्य है, अतः 'अज्ञान' आदि शब्दोंसे कहा जाता है। जैसे कहना पड़ता है कि कारणगत अनिर्वचनीय शक्तिसे 'योगमायासमावृतः' (गीता ७।२५) इत्यादि वचनोंसे कार्यमें अनिर्वचनीय विलक्षणता होती है। इसी मायाद्वारा ज्ञानानन्दस्वरूप ब्रह्मका आवरण कहा है, वास्ते यद्यपि स्पष्ट देखते हैं कि जलसे भिन्न बर्फ वैसे ही 'अज्ञानेनावृतं ज्ञानम्' (गीता ५।१५)- और तन्तुसे भिन्न पट कोई पृथक् पदार्थ नहीं है तो इस वाक्यसे अज्ञानको भी आवरक कहा है। जैसे भी जल और तन्तुओंकी अपेक्षा उनमें (बर्फ और 'मायामेतां तरन्ति ते' (गीता ७।१४)- इस वाक्यमें पटमें) विलक्षणता अवश्य है। इसीलिये आनन्द मायाको तरण कहा है, वैसे ही 'ज्ञानेन तु तदज्ञानं और स्वप्रकाशचैतन्यरूप परमात्मासे भिन्न (विलक्षण) येषां नाशितमात्मनः' (गीता ५।१६)- इस वचनसे जड़ और दुःखरूप प्रपंच उत्पन्न होता है। ज्ञानको अज्ञानका नाशक कहा है। अब यह देखना चाहिये कि दुःख तथा ज्ञानाभावरूप अज्ञान आवरणकर्तृत्व नहीं हो जडरूप प्रपंच सत्य है या मिथ्या? यदि पूर्वोक्त सकता, भावाभावके असमकालिक (एक कालमें न्यायसे विचार करें तो स्पष्ट विदित होगा कि कार्य अनवस्थित) होनेसे ज्ञानसे ज्ञानाभावरूप अज्ञानका और कारणमें अनिर्वचनीय विलक्षणता है। अतः नाश भी नहीं हो सकता, अतः अज्ञान सदसद्विलक्षण

७१६ भक्तिसुधा


मायाशक्तिरूप ही है। जैसे 'चित्', 'अचित्' इन दोनों शब्दोंसे चेतन और जड़ दोनों भावरूप ही गृहीत होते हैं, वैसे ही ज्ञान-अज्ञान इन दोनों शब्दोंसे परमात्मा और उसकी शक्ति अनिर्वचनीय माया गृहीत होती है। वह शक्ति जैसे सद्विलक्षण है, वैसे ही चित्से भी विलक्षण है, अतः 'अचित्' जड़ समझी जाती है। उसके द्वारा सच्चिदानन्दात्मक (सत्-चित्स्वरूप) तत्त्वका अनित्य जड प्रपंचरूपसे विवर्त होता है।

ज्ञानस्वरूपविमर्श

जैसे शक्तिकी स्थिति, प्रवृत्ति और प्रकाश अपने आधारभूत शक्तिमान्से ही सुलभ होते हैं, वैसे ही अचित्की स्थिति, प्रवृत्ति और प्रकाश अचित्के आधारभूत ही सुलभ होते हैं। यह स्पष्ट ही है कि अचित्की प्रवृत्ति और स्फूर्ति चित्से ही सम्भव है। यदि वह स्वतःप्रकाश हो, तब तो उसे अचित् ही नहीं कह सकते। ऐसे ही अज्ञानकी स्थिति, प्रवृत्ति और स्फूर्ति ज्ञानस्वरूप परमात्मासे ही सम्भव है। अतएव 'मैं अज्ञ (अज्ञानी) हूँ' इस प्रकार अज्ञानका प्रकाश नित्य अखण्ड ज्ञानस्वरूप साक्षीसे ही होता है। यहाँ यह समझना चाहिये कि ज्ञान दो प्रकारका है। एक तो अन्तःकरणकी चैतन्यप्रतिबिम्बोपेत वृत्तिरूप, जो उत्पन्न होनेवाले और विनाशीरूपसे लोकमें शब्द-ज्ञान, स्पर्श-ज्ञानादिरूपसे प्रसिद्ध है और दूसरा स्वप्रकाश चैतन्यान्द ब्रह्मरूप, जो लौकिक ज्ञान और निद्रा-अज्ञानादिका भासक, कूटस्थरूप, 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तैत्तिरीयो० २।१), 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' (बृहदारण्यक० ३।९।२८) इत्यादि श्रुतियोंमें प्रसिद्ध है। ब्रह्मरूप ज्ञान ही अचिच्छक्तिरूप अज्ञान एवं तत्कार्यरूप सकल प्रपंचको सत्त्व और प्रकाश देकर कार्यकारणक्षम बनाता है। इस तरह परमानन्द रसात्मक भगवान्से ही सत्ता, स्थिति, स्फूर्ति प्राप्त करके नीरस, असत्, स्फूर्तिरहित प्रपंच सरस, सत्य, स्फूर्तिमान्-सा प्रतीत हो रहा है। अतएव जैसे दहन-सामर्थ्यशून्य लौहपिण्डको अनित्य और सातिशय दहन-सामर्थ्य प्रदान करनेवाला, नित्यनिरतिशय दहन- सामर्थ्यसम्पन्न अग्नि दग्धाका भी दग्धा कहा जाता है और जैसे अनेक प्रान्ताधिपतियोंको राजा बनानेवाला सर्वाधिपति राजराज कहा जाता है, वैसे ही अनित्योंको नित्य, अचेतनोंको चेतन, असत्योंको सत्य बनानेवाले वेदान्त-वेद्य परमानन्द रसात्मक भगवान् नित्योंके नित्य, चेतनोंके चेतन, सत्योंके सत्य, सुखोंके सुख और रसोंके रस कहे जाते हैं। जैसे सर्वाधिपति राजराजसे निर्मित राजगण प्रजाकी अपेक्षा राजा होते हुए भी सम्राट्की अपेक्षा प्रजा ही हैं; वैसे ही नित्योंके नित्य, चेतनोंके चेतन, सत्योंके सत्य भगवान्से निर्मित व्यावहारिक नित्य, चेतन, सत्यपदार्थ प्रातिभासिक रज्जु-सर्पादिकी अपेक्षा चेतन, नित्य, सत्य होते हुए भी परमनित्य, सत्य, चैतन्यकी अपेक्षा अनित्य, असत्य, अचेतन ही हैं। जैसे आकाशकी उत्पत्ति श्रुति-सिद्ध है तथापि क्षणिक पदार्थोंकी अपेक्षा वह स्थिर है, अतः उसको न्यायसिद्धान्तानुसार नित्य कहते हैं; जैसे उत्पत्ति- विनाशवाले, साभासवृत्तिरूप ज्ञान जड होते हुए भी घटादिकी अपेक्षा चेतन कहे जाते हैं, वैसे ही लोकसिद्ध मिथ्या रज्जु-सर्पादिकी अपेक्षा अबाध्य होनेके कारण रज्ज्वादि तथा घटादि भी सत्य कहे जाते हैं। इन्हीं आपेक्षिक नित्य-चेतन, सत्य, सरस पदार्थोंको वेदान्ती सकल सत्शास्त्रोंके महातात्पर्यका विषयीभूत, निखिल रसोंके समुद्गम-स्थान, भगवान्की अपेक्षा अनित्य, जड़, नीरस, दुःखरूप या व्यवहारोपयुक्त, व्यावहारिक नित्य, व्यावहारिक सत्य, व्यावहारिक चेतन अथवा व्यावहारिक सुख कहते हैं।

भगवत्तत्त्व-प्रतिपादन

पारमार्थिक सत्य, चैतन्य, नित्य आनन्दरस- स्वरूप तो भगवान् ही हैं, इसी अभिप्रायसे 'नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनाम्' (कठ० २।२।१३), 'सत्यस्य सत्यम्' (बृहदारण्यक० २।३।६) इत्यादि श्रुति-वचन भगवान्को नित्य-

वेदान्तरससार ७१७ का-नित्य, सत्य-का-सत्य कहते हैं। गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी भी अपने रामको प्राण-के-प्राण, जीव-के-जीव, सुख-के-सुख कहते हैं— आनँदहू के आनँद दाता॥ प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम। तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहि बिधि बाम॥ (रा०च०मा० १।२१७।२; २।२९०) जैसे घटाकाशका जीवन महाकाश और तरंगका जीवन समुद्र है, वैसे ही जीवके जीवन भगवान् हैं। अस्तु, इस तरह सिद्ध हुआ कि परमार्थतः सब कुछ भगवान् ही हैं। भगवान्‌से भिन्न जो कुछ प्रतीत होता है, वह मिथ्या ही है। जैसे रज्जुमें सर्पका भ्रम होता है, वैसे ही परमात्मामें प्रपंचका भ्रम है। यही सत्यसे मिथ्या पदार्थकी उत्पत्तिका प्रकार है। इसी सिद्धान्तको श्रीगोस्वामीजीने भी श्रीरामचरितमानसमें पुष्ट किया है— झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें॥ (रा०च०मा० १।११२।१) अतः सिद्ध हुआ कि परमानन्दघन भगवान्‌से भिन्न होकर परमार्थ सत्य कोई भी पदार्थ नहीं है। जैसे वायु आदि क्रमसे आकाशके द्वारा ही समुद्भूत घटरूप उपाधिसे आकाशमें महाकाश और घटाकाश ये दो भेद हो जाते हैं, वैसे ही परमात्मासे समुद्भूत उपाधियोंके द्वारा चैतन्यानन्दघन भगवान्‌में ही जीव और परमेश्वर ये दो भेद हो जाते हैं। वस्तुतः घट, आकाशका कार्य होनेसे उससे पृथक् नहीं है। अतएव इस तथ्यको मर्मज्ञ विद्वान् तैत्तिरीयो- पनिषद्की विधासे जैसे घटरूप कार्यको पृथिव्यादि विलोमक्रमसे चरमोपादान आकाशरूप कारणमें प्रलीन करके, घटरूप उपाधिको आकाशमें बाधितकर घटाकाश और महाकाशके भेदको बाधित कर देते हैं; वैसे ही अधिष्ठानरूप, शुद्ध सत्यके बोधसे, सदसद्विलक्षण अनिर्वचनीय शक्ति एवं तत् कार्यरूप उपाधियोंको सद्रूप ब्रह्ममें ही बाधित करके, जीव और परमेश्वरके भेदका भी निराकरण कर देते हैं अर्थात् जैसे घटको पृथ्वीमें, पृथ्वीको जलमें, जलको तेजमें, तेजको वायुमें एवं वायुको आकाशमें लय करनेपर महाकाशसे भिन्न न घटरूप उपाधि रहता है और न घटोपहित घटाकाश ही रहता है, वैसे ही सुबालोपनिषदादिकी प्रक्रियासे आकाशको अहंतत्त्वमें, अहंतत्त्वको महत्तत्त्वमें और उसको अव्यक्तमें, अव्यक्तको सत्तत्त्वमें विलीन कर देनेपर देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अज्ञानरूप उपाधि तथा इन उपाधियोंसे उपहित जीव, ये सभी अखण्डानन्द-रस भगवान् ही हो जाते हैं। भगवान्‌से भिन्न उनका कोई भी स्वरूप नहीं रहता। इसी वास्ते भगवती श्रुतिने कहा है—‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत’, ‘ऐतदात्म्यमिदꣳ सर्वं···· स आत्मा तत्त्वमसि’, (छान्दोग्य० ३।१४।१; ६।८।७) ‘अयमात्मा ब्रह्म’ (माण्डूक्य० २), ‘अहं ब्रह्मास्मि’ (बृहदारण्यक० २।५।१९; १।४।१०) अर्थात् यह सब कुछ ब्रह्म ही है, क्योंकि तज्ज, तल्ल, तदन है— स्वातिरिक्त सबका उत्पत्ति, लय और स्थितिस्थान है। ब्रह्मसे ही समस्त प्रपंचकी उत्पत्ति, स्थिति एवं संहृति सम्भव है। यह सर्व दृश्य प्रपंच इस आत्माका स्वरूप ही है, ब्रह्म ही समस्त प्रपंचकी आत्मा है और ब्रह्म ही तुम हो। यह आत्मा ब्रह्म है। ‘अहं’ पद लक्ष्यार्थ प्रत्यगात्मा ब्रह्म ही है। किं बहुना ‘सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः’, (मुण्डक० २।१।२) ‘बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च’ (गीता १३।१५) अर्थात् चराचर सकल प्रपंचके भीतर-बाहर ब्रह्म ही है और जिस चराचर प्रपंचके भीतर-बाहर ब्रह्म है, वह चराचर प्रपंच भी ब्रह्म ही है। सर्वदृश्यरूप क्षेत्र और द्रष्टारूप क्षेत्रज्ञ—ये सभी भगवान् ही हैं। श्रीभगवान्‌की भी उक्ति है—‘क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।’ (गीता १३।२) बाह्याभ्यन्तर कार्यकारण सब कुछ अज अव्यक्त ब्रह्म ही है। ‘अजायमानो बहुधा वि जायते’, (यजु० ३१।१९) ‘एकोऽहं बहु स्याम्’ (छान्दोग्य० ६।२।३), ‘इन्द्रो मायाभिः

७१८ भक्तिसुधा पुरूरूप ईयते' (बृहदारण्यक० २।५।१९) अर्थात् अजायमान और एक ही परमतत्त्व मायासे बहुरूपमें जायमान-सा प्रतीत होता है। जो इस अजायमान अखण्डैकरस, अद्वितीय वस्तुमें वस्तुतः जायमानता और नानात्व देखता है. जो ब्रह्मकी निर्विकारकूटस्थता और अखण्डैकरसताका व्यापादन या उसे कलंकित करना चाहता है. वह प्राणी उसी अपराधसे पुनः- पुनः मृत्युको प्राप्त होता है। अतः इसे परमार्थतः एक रूपसे ही देखना चाहिये। 'मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥' (कठ० २।१।१०) अर्थात् जो भगवान्‌में थोड़ा भी भेदकी कल्पना करता है, उसे भय होता है। 'उदरमन्तरं कुरुते। अथ तस्य भयं भवति। (तैत्तिरीय० २।७), द्वितीयाद्वै भयं भवति ॥' (बृहदारण्यक० १।४।२) इतना ही नहीं, संसारमें ब्रह्म और धर्म, लोक एवं वेद, किं बहुना जिस किसी भी पदार्थको प्रभुसे भिन्न या पृथक् देखा जाता है, वह पदार्थ ही अपना घोर अपमान समझकर भिन्नदर्शीको परमार्थसे प्रच्युत कर देता है। 'सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनः सर्वं वेद' (बृहदारण्यक० २।४।६) प्रियतमका विप्रयोग किसीके लिये भी सह्य नहीं है। प्रेमकी पराकाष्ठा यही है कि प्रियतमसे वियुक्त होकर प्रेमी क्षणभर भी अपना जीवन न रख सके। श्रीव्रजांगनाओंका अपने प्रियतम श्रीकृष्णके वियोगमें एक क्षण भी अनन्त कोटि कल्पके समान प्रतीत होता था। परमार्थ दृष्टिसे तो प्रियतमका वियोग होते ही प्रेमीका स्वरूप ही नहीं रह सकता। क्या बिम्बसे वियुक्त होकर प्रतिबिम्बका और महाकाशसे वियुक्त होकर घटाकाशका एवं महासमुद्रसे वियुक्त होकर तरंगका स्वरूप रह सकता है ? इनमें तो कहनेके लिये भेद है, वस्तुतः भेद नहीं है। इसीलिये श्रीगोस्वामीजीने श्रीराम और जनकनन्दिनीमें जल और बीचिका दृष्टान्त रखकर अभेद सिद्ध किया है- 'गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।' (रा०च०मा० १।१८) फिर कोई भी तत्त्व भगवान्‌की सत्ता और स्फूर्तिसे वियुक्त होकर अपना स्वरूप कैसे रखे; क्योंकि सत्ता- स्फूर्तिसम्बन्धशून्य होनेपर सभी तत्त्व निःसत्त्व और निःस्फूर्ति हो जाते हैं। स्फूर्ति और सत्तारहित पदार्थका स्वरूप ही क्या हो सकता है, अतः जिन पदार्थोंको परमार्थ सद्रूप, स्वयंप्रकाश, स्फूर्तिरूप भगवान्‌से भिन्न समझा जाता है, उन्हें मानो उनके प्रियतमसे वियुक्त किया जाता है। उन्हें सत्तास्फूर्तिविहीन तथा निःसत्त्व, निःस्फूर्ति बनाकर अपमानित किया जाता है। अतः वे पदार्थ उन भिन्नदर्शीको स्वार्थसे प्रच्युत कर देते हैं। इन्हीं श्रुति-स्मृति-सिद्ध-पारमार्थिक अभेद और काल्पनिक व्यवहारमें आनेवाले व्यावहारिक भेदको सिद्ध करनेके लिये वेदान्तोंमें बिम्ब-प्रतिबिम्ब, घटाकाश-महाकाश, समुद्र-तरंग आदि अनेक दृष्टान्त जीव और भगवान्‌के स्वरूपमें रखे गये हैं। दृष्टान्त एकदेशी हुआ करते हैं। उनका सर्वांश दाष्ट्रान्तिकमें नहीं संगत हुआ करता। इसी वास्ते जैसे घटके गमनमें, जिस आकाशके साथ घट-सम्बन्ध विच्छिन्न हुआ, वह महाकाश हुआ और जो महाकाश था, वही घटके संसर्गसे घटाकाश हो गया। इसी तरह अन्तःकरणके गमनमें पूर्वदेशस्थ अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य मुक्त हो गया एवं उत्तर-देशस्थ अन्तःकरणा- वच्छिन्न अपूर्व चेतन बद्ध हो गया। जब नीरूप निरवयव पदार्थ न प्रतिबिम्बित होता है और न प्रतिबिम्बका आधार होता है। फिर आत्मा और अन्तःकरण ये दोनों ही नीरूप एवं निरवयव हैं। आत्माका प्रतिबिम्ब कैसे होगा एवं अन्तःकरणकी प्रतिबिम्बाधारता कैसे होगी इत्यादि शंकाएँ निर्मूल हैं, कारण कि अलौकिक अर्थमें लौकिक पदार्थ पूर्णरूपसे दृष्टान्त नहीं हुआ करते। केवल विवक्षित अंशमें दृष्टान्त-दाष्ट्रान्तिकी समता होती है। यहाँ केवल उपाधिद्वारा उपहितमें काल्पनिक भेद तथा उपाधिगत दूषण या भूषणका भान होना और परमार्थतः अभेद तथा सर्वोपाधिदोषादिविवर्जित होना-इतना ही अंश विवक्षित है। जैसे घटाकाशका

वेदान्तरससार ७१९ महाकाशसे भेद और उसमें गमनागमनादि नाना प्रकारकी कार्यकारणक्षमता यह सब घटोपाधिकृत हैं, जैसे महासमुद्रसे तरंगका भेद और उसका चांचल्यादि वायुरूप उपाधिसे जन्य है, जैसे प्रतिबिम्बमें बिम्बका भेद एवं मलिनता, चंचलता आदि जलदर्पणादि उपाधिजन्य है, उसी तरह जीवमें निर्विकार, परमचैतन्यतानन्द, रसात्मक भगवान्से भिन्नता कर्तृत्व- भोक्तृत्व, सुखित्व-दुःखित्वादि नाना अनर्थोंका योग एवं अविद्या और अन्तःकरणरूप उपाधिकृत है। उपाधिके विलयनमें एक परमानन्द भगवान् ही अवशेष रहता है। इस प्रकारसे तत्त्वकी अद्वितीयता, अनन्तता और लोकसिद्ध व्यवहारकी उपपत्ति दिखलानेके लिये अनेक प्रकारके दृष्टान्तोंका उपपादन है। जिसकी बुद्धिमें जिस दृष्टान्तसे पारमार्थिक अभेद और व्यावहारिक भेद बुद्ध्यारूढ़ हो, उसके लिये वही दृष्टान्त प्राधान्येन उपादेय है; क्योंकि शास्त्रोंका किसी दृष्टान्तमें तात्पर्य नहीं है। तात्पर्य तो केवल व्यावहारिक भेदोपपादनपूर्वक पारमार्थिकाद्वैत-बोधनमें ही है। इस प्रकार यही सिद्ध होता है कि परमानन्द- रसात्मक भगवान् ही चिदानन्दमयी जीवशक्तिके भीतर, बाहर तथा मध्यमें भरपूर हैं। किं बहुना जीवशक्ति विशुद्धस्वरूप भगवान् ही है। आनन्दसुधासिन्धु भगवान्की लहरीरूप जीवशक्ति भी 'चेतन अमल सहज सुखरासी' (रा०च०मा० ७।११७।२) ही है। जैसे बर्फकी पुतली सिन्धुके बीचमें रहकर प्यासकी रटन रटे, किंवा जैसे निखिल रसामृतसिन्धुसारसर्वस्व कृष्णसुधामें अहर्निश सर्वांगीण संश्लेषरूप अवगाहन करती हुई भी कृष्णप्रेयसी श्रीवृषभानुनन्दिनी अधिरूढ़ महाभावकी विलक्षण अवस्था-विशेष परवश होकर 'हा प्राणवल्लभ, कहाँ हो?' इस प्रकार मिलनके लिये व्यग्र होती हैं—'अङ्कस्थितेऽपि दयिते किमपि प्रलापं हा मोहनेति मधुरं विदधत्यकस्मात्' (राधासुधा ४६) वैसे ही प्रियतमकी मोहिनीमायाशक्तिसे परमानन्दरसार्णव भगवान्में बर्फ पुतलीकी तरह निमग्न जीव-शक्ति, प्रियतमको भूलकर, अनन्त संतापोंमें निमग्न सन्तप्त हो रही है। शास्त्र तथा आगमोंके प्रबोधनसे ही अज्ञानजन्य विस्मरण तथा विभ्रमकी निवृत्ति होती है—'आनँद- सिंधु-मध्य तव बासा। बिनु जाने कस मरसि पियासा॥' (विनय-पत्रिका १३६।२) 'सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा॥' (रा०च०मा० ७।१११।६) तू वही है, तुझमें-उसमें किंचित् भी भेद नहीं है, जैसे जल और बीचिका भेद 'कहिअत भिन्न न भिन्न।' (रा०च०मा० १।१८) कहनेको भिन्न है, वस्तुतः अभिन्न ही है। श्रीमद्भागवतके पुरंजन और पुरंजनीके आख्यानमें, जिस समय जीवरूप पुरंजन मायावश अपने परम अन्तरंग प्रियतम सखाको भूलकर बुद्धिरूपा पुरंजनीका अत्यन्त अनुरागी होकर अनवरत पुरंजनीके चिन्तनमें तन्मय हो गया, उस समय पुण्यपरिपाकसे, पतिरूप गुरुकी आराधनासे सन्तुष्ट होकर श्रीहंसरूपधारी भगवान्ने प्रकट होकर पूछा कि तुम हमें जानती हो? पुरंजनीने कहा— 'प्रभो! मैं आपको नहीं जानती।' इसपर भगवान्ने कहा—'ठीक है, मेरे विस्मरणका ही तो यह फल है। मुझे भूलनेसे ही अनेकानर्थमूल संसृतिचक्रमें प्राणियोंको भटकना पड़ता है। देखो—'अहं भवान् न चान्यस्त्वं त्वमेवाहं विचक्ष्व भोः। न नौ पश्यन्ति कवयश्छिद्रं जातु मनागपि॥' (श्रीमद्भा० ४।२८।६२) मैं ही तुम्हारा पारमार्थिक स्वरूप हूँ, तुम मुझसे पृथक् नहीं हो। मैं ही तुम हो और तुम ही मैं हूँ। इस भावको गम्भीरतासे देखो। कवि लोग हमारे और तुम्हारेमें कभी किंचिन्मात्र भी भेद नहीं देखते।' श्रीपरीक्षित्की भी अन्तमें 'अहं ब्रह्म परं धाम ब्रह्माहं परमं पदम्।' (श्रीमद्भा० १२।५।११) ऐसी ही दृढ़ धारणा हुई। अन्यान्य वैदिक मन्त्रद्रष्टा ऋषियोंकी भी ऐसी धारणा है—'अहं वै भगवो देवते त्वमसि त्वं वै भगवो देवते अहमस्मि।' हे भगवन्! मैं ही तुम हो और तुम ही मैं हूँ; क्योंकि जो लोग प्रेम करते हैं तो उन्हें यही

७२० भक्तिसुधा कहना पड़ता है कि मुझे कुछ नहीं चाहिये, केवल प्रभुप्रेममें या प्रभुस्वरूपके सौन्दर्य-माधुर्य-सुधासमा- स्वादनमें मुझे लोकोत्तर रस आता है। ऐसी स्थितिमें विवेकी जनोंको स्पष्ट हो जाता है कि वह प्रेमी अपने आनन्दके लिये ही प्रभुमें प्रेम करता है, प्रभु-स्वरूप- सम्बन्धी सौन्दर्य-माधुर्य-रसामृतके आस्वादनसे ही उसकी आत्माको आनन्द होता है। इसीलिये जिनके ऐसे भी भाव हैं कि प्रियतम मुझसे अनुकूल हों या प्रतिकूल, सर्वगुणसम्पन्न हों या सर्वगुणरहित, सौन्दर्य-माधुर्य-सुधाजलनिधि हों या सौन्दर्य-माधुर्य-विहीन, सब प्रकारसे हमारे ध्येय, ज्ञेय, प्रियतम प्रभु ही हैं— असुन्दरः सुन्दरशेखरो वा गुणैर्विहीनो गुणिनां वरो वा। द्वेषी मयि स्यात् करुणाम्बुधिर्वा श्यामः स एवाद्य गतिर्ममायम्॥ (उज्ज्वलनीलमणि-स्थायिभाव २९) उनकी आत्माको सुख और शान्ति सब प्रकारसे प्रभुसमाश्रयणमें ही होता है। इसलिये ये समस्त भाव आत्माके लिये हुए। प्रभुके लिये लोक- परलोक सब प्रकारकी सुखशान्तिका, किं बहुना प्राणादि समस्त प्रियतम वस्तुओंका त्याग किया जाता है। यहाँपर भी सूक्ष्म रूपसे देखनेपर यही विदित होता है कि उस प्रेमीकी आत्माको ऐसा ही करनेपर सुख मिलता है, अतः यह सब कुछ आत्माके लिये ही है। भगवत्तत्त्वकी आत्मरूपता लोकमें कोई धार्मिक पुरुष धर्म-रक्षाके लिये आत्माकी आहुति दे देते हैं। वेदोंमें भी एक यज्ञ ऐसा है, जिसमें यजमान अपना सर्वस्व ब्राह्मणोंको देकर स्वयं अपनेको अग्निकुण्डमें समर्पण कर देता है। परंतु इन सभी स्थलोंमें इस प्रकारके उत्कट त्याग और तपस्याओंका लक्ष्य अन्तरात्माकी अनन्त शान्तिमें ही है। इसी प्रकारके भावोंको लक्ष्यमें रखकर आत्माके औपाधिक चिदाभासस्वरूपके बाधके लिये साधिष्ठान चिदाभाससे ही प्रयत्न किया जाता है। इसीलिये भगवती श्रुतिने स्पष्ट निर्णय करके यहाँ भी सर्वोपप्लव- विवर्जित, परमानन्दरूप चिदात्माका शेष रहना लक्ष्य रखा है—'आत्मानमेव प्रियमूपासीत।' (बृहदारण्यक० १।४।८) अर्थात् प्रिय रूपसे आत्माकी ही उपासना करनी चाहिये। 'योऽन्यमात्मनः प्रियं ब्रुवाणं ब्रूयात् प्रियं रोत्स्यतीति' (बृहदारण्यक० १।४।८) आत्मासे भिन्नको जो प्रिय कहता है, उसे प्रियके लिये रुदन करना पड़ता है। जब ब्रह्माने श्रीकृष्णके गोवत्सों और वत्सपालोंका हरण किया, तब एक वर्षपर्यन्त श्रीकृष्ण ही वत्स और वत्सपालके रूपमें व्यक्त हुए। उस समय समस्त गौओंको अपने-अपने बछड़ोंमें और व्रजदेवियोंको अपने-अपने शिशुओंमें ऐसा अभूतपूर्व लोकोत्तर प्रेम हुआ, जैसा कभी अपने मुख्य अंगजोंमें नहीं हुआ था। इस बातको श्रीशुकदेवके मुखारविन्दसे श्रवण करके जब श्रीपरीक्षित्जीने आश्चर्य प्रकट करते हुए इसका कारण पूछा, तब श्रीशुकदेवजीने यही कहा कि राजन्! संसारमें समस्त वस्तुओंकी अपेक्षा आत्मा ही प्रिय होता है; तदितर पुत्र, वित्त, कलत्रादि आत्माके लिये ही प्रिय होते हैं, देहको ही आत्मा माननेवाले जो देहात्मवादी हैं, उन्हें भी जितना देह प्रिय है, उतने देह-सम्बन्धी पुत्रादि नहीं। श्रीकृष्ण समस्त जीवोंके अन्तरात्मा हैं, अतः समस्त प्राणियोंके निरतिशय एवं निरूपाधिक प्रेमके आस्पद हैं, उनमें अपने आत्मजोंकी अपेक्षा अधिक प्रेम होना युक्त ही है। सर्वेषामपि भूतानां नृप स्वात्मैव वल्लभः। इतरेऽपत्यवित्ताद्यास्तद्वल्लभतयैव हि॥ 'देहात्मवादिनां पुंसामपि राजन्यसत्तम।' 'कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्।' (श्रीमद्भा० १०।१४।५०, ५२, ५५) जिसमें प्रेम किसी दूसरेके लिये होता है, उसमें कभी प्रेमका अभाव भी हो जाता है; क्योंकि वह औपाधिक प्रेम होता है। अतएव अनित्य एवं सातिशय होता है, जैसे अनुष्ण जलमें उष्णता अग्निके संसर्गसे होती है, स्वतः नहीं, अतएव

जलमें औपाधिक उष्णता अनित्य एवं सातिशय है, परंतु जिस अग्निके संसर्गसे जलमें उष्णता व्यक्त हुई, उस अग्निमें तो उष्णता नित्य एवं निरतिशय है। इसी तरह संसारकी समस्त वस्तुओंमें प्रेम आत्माके संसर्गसे ही होता है। वित्त, क्षेत्र, साम्राज्यादिमें प्राणियोंको प्रेम नहीं होता; क्योंकि कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी रूपमें, साम्राज्यादि अनेक प्रकारके अभ्युदयसम्बन्धी साधन हैं ही। मान लीजिये कि हम और हमारा देश किसी राष्ट्रके बिल्कुल परतन्त्र हो, हमारा सर्वस्व किसीने अपहरण कर लिया हो तो भी सम्पत्ति और राष्ट्र या साम्राज्य आक्रमणकारी अपहर्ताके पास तो हैं ही, उसमें हमें सन्तोष क्यों नहीं होता ? यहाँ विज्ञसम्मत हेतु यही हो सकता है कि यद्यपि कहीं-न-कहीं तो सब कुछ है सही तथापि वह हमारा तो नहीं है। वित्त, क्षेत्र, राष्ट्र या साम्राज्यमात्रमें ही हमारा प्रेम नहीं होता, किंतु हमारा 'अपने' वित्त, क्षेत्र, राष्ट्रादिमें प्रेम होता है। इस तरह स्वसम्बन्धसे ही स्वदेश, स्वराज्य, स्ववित्त, स्वक्षेत्रमें प्राणियोंको अधिक प्रेम होता है। सुन्दर पुत्रकलत्रमें भी स्वसम्बन्ध होनेसे ही प्रेम होता है। सुन्दरी कामिनीमें भी 'यह मुझे मिले, मेरी हो जाय' इस तरह स्वसम्बन्धित्वापादनकी ही रुचि होती है। इसी तरह 'उच्च-से-उच्च ऐश्वर्य मुझे, मेरे देशको, मेरे सम्बन्धियोंको हो' इस प्रकार स्वसम्बन्धीमें ही, स्वानुकूलमें ही, प्रेम दृष्टिगोचर होता है। किंबहुना अनन्त कोटि ब्रह्माण्डनायक भगवान् ही अपनी अचिन्त्य दिव्यलीलाशक्तिसे श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्र एवं श्रीकृष्णचन्द्रस्वरूपमें प्रकट होते हैं, परंतु उनमें भी स्वसम्बन्धसे प्रेमका तारतम्य देखा जाता है। जो अपने इष्टदेव हैं, उनके सौन्दर्य, माधुर्य, ऐश्वर्य एवं चरित्रादिमें जितना प्रेम, जितना आकर्षण होता है, उतना अन्यमें नहीं। और तो क्या, कृष्णस्वरूपमें ही महानुभावोंने पाँच भेदोंकी कल्पनाकर डाली है। वे द्वारकास्थ, मथुरास्थ कृष्णके अतिरिक्त 'व्रजे वने निकुञ्जे च श्रैष्ठ्यमत्रोत्तरोत्तरम्' के अनुसार पूर्ण, पूर्णतर, पूर्णतम भेदसे व्रजस्थ, वृन्दावनस्थ, लीलानिकुञ्जस्थ श्रीकृष्णमें भेद स्वीकारकर पूर्णतम लीलानिकुञ्जनायक श्रीकृष्णमें ही अपना हृदय आसक्त करते हैं। अन्यके स्वरूपसौन्दर्यादिमें उनके चित्त आकर्षित नहीं होते हैं। अतएव एक बार लीलया किसी निकुंजमें छिपे हुए श्रीकृष्णको ढूँढ़ती हुई व्रजांगनाएँ जब मनमोहनके पास पहुँच गयीं, तब श्रीकृष्णने शीघ्र ही विष्णुस्वरूपमें प्रकट होकर अपने उस व्रजराजकुमारस्वरूपको छिपा लिया और अपने-आपको सर्वगुणसमलंकृत श्रीमन्नारायणके रूपमें प्रकट किया; पर श्रीव्रजांगनाओंका मन उस रूपमें किंचित् भी आकर्षित नहीं हुआ, किंतु उन्हें प्रणामकर वे 'हे देव ! हमारे प्रियतमको मिला दो' यह कहकर वहाँसे अपने प्रियतमको ढूँढती हुई आगे चली गयीं। वस्तुके उत्कर्षसे उसमें प्रेम नहीं होता है, किंतु स्वसम्बन्धसे ही वस्तुकी उत्कृष्टता भी व्यक्त होती है। अतएव 'गुणैर्विहीनो गुणिनां वरो वा' इत्यादि वचनोंसे पहले ही कह आये हैं कि 'अनन्त गुणसमलंकृत हो या सर्वगुणविहीन हो, जो अपना है, वही सर्वस्व है।' पूर्णतम होनेके कारण ही उनकी ओर सभीका चित्त आकर्षित नहीं होता है— महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥ (रा०च०मा० १।८०) जिसमें स्वसम्बन्धकी घनिष्ठता हो गयी, वही सर्वस्व है। जिसमें जितनी-जितनी स्वानुकूलता है, उसमें ही प्रेमकी उतनी अधिकता होती है और जिसमें जितनी स्वप्रतिकूलता है, उसमें ही द्वेषकी उतनी अधिकता होती है। कोई व्यापारी बहुत दिनोंके बाद अपने घरको लौट रहा था। मार्गमें किसी सरायमें उसने निवास किया। दैवात् उसी सरायमें रातको उसकी स्त्री अपने अत्यन्त रुग्ण पुत्रको लेकर आयी। रुग्ण बालक दुःखसे घबराकर, चीख मारकर रो रहा था। उस व्यापारीने अपनी

नींदमें बाधक समझकर बालक और उसकी माँको रोषके साथ खरी-खोटी सुनायी। परंतु प्रातःकाल होनेपर जब उसे यह ज्ञात हुआ कि यह तो मेरी ही स्त्री और मेरा ही पुत्र है, तब तो उनके साथ ही वह अपने-आप भी रोने लगा। इस तरह विचार करनेपर यही सिद्ध होता है कि निकृष्ट-से-निकृष्ट वस्तुमें भी आत्माके स्वसम्बन्धकी घनिष्ठतासे प्रेमकी अतिशयता और अत्यन्त उत्कृष्ट वस्तुमें भी स्वसम्बन्धकी घनिष्ठता न होनेसे प्रेमकी न्यूनता होती है। इतना ही नहीं, दूसरेकी उत्कृष्ट वस्तुमें द्वेष या ईर्ष्या-पर्यन्तका संचार हो जाता है। तभी तो ये कट्टर नवीन शैव-वैष्णव परस्पर एक-दूसरेके इष्टका उत्कर्ष नहीं सहन कर सकते हैं। अब सोचनेकी बात है कि जिसके सम्बन्धसे निकृष्टमें भी लोकोत्तर प्रेम और जिसके सम्बन्धके बिना परम उत्कृष्टमें भी द्वेष या ईर्ष्या होती है, वह निरतिशय निरुपाधिक प्रेमका आस्पद है कि नहीं। जब शर्कराके सम्बन्धसे स्वभावतः माधुर्य-शून्य पदार्थोंमें भी मधुरिमाका अनुभव होता है, तब क्या शर्करामें मधुरिमाका अभाव कहा जा सकता है? जब स्वस्वरूप आत्माके सम्बन्धसे प्रेमके अयोग्य पदार्थोंमें भी प्रेम होता है, तब क्या आत्मामें अन्यशेषता या प्रेमकी अपकर्षता कही जा सकती है? प्रत्युत स्पष्ट रूपसे यही कहा जा सकता है कि आत्माके सन्निहितमें प्रेमका आधिक्य और विप्रकृष्टमें प्रेमकी न्यूनता होती है। तभी देखते हैं कि प्रियतम, कलत्र एवं पुत्रकी रक्षाके लिये अनेकानेक प्रयत्नसे उपार्जन की हुई रत्नादि सम्पत्तियोंको त्याग देनेमें विलम्ब नहीं होता, किंतु कलत्र, पुत्र प्रभृति यदि अपने शरीरके प्रतिकूल प्रतीत होते हैं तो अप्रिय ही नहीं, अपितु शत्रु समझे जाते हैं। किसी गृहमें अग्नि लग रही है, पता चलता है कि अत्यन्त प्रिय पुत्र गृहके भीतर रह गया है। गृहपति अत्यन्त व्याकुल होता है, रुदन करता है, लोगोंसे कहता है—'भाई, चाहे कोई हमारा समस्त धन-धान्य रत्नादि ले ले, परंतु हमारे प्रिय पुत्रको जलते हुए भवनसे निकाल लाये।' यह सब कुछ होते हुए भी अपना शरीर इतना प्रिय है कि कोई अत्यन्त धनके लोभसे भी उसका नाश नहीं सहन कर सकता। जिसका प्रिय पुत्र है, वह स्वयं जलते हुए घरमें प्रवेश नहीं करता; केवल बाहर दूर खड़ा तड़फड़ाता है। ठीक ही है, संसारके समस्त नाते इस देहके ही साथ हैं, उसके नष्ट होनेपर समस्त नाते मिट जाते हैं। नहीं तो इस अपार संसारमें अनन्त जन्मके देह-सम्बन्धियोंका यदि स्मरण रहे तब कितनी माताएँ, कितने पिता और कितने पुत्र- कलत्रादि कुटुम्बी कहाँ-कहाँ हैं, उन सभीके सुख- दुःखमें कितना सुख-दुःख देखना (भोगना) पड़े। एक ही जन्मके कुटुम्बियोंके सम्बन्धमें क्या दशा हो रही है। अस्तु, देहके नष्ट होते ही स्त्री, पुत्र, धन- धान्य तथा अखण्ड साम्राज्यसे सम्बन्ध छूट जाता है। कदाचित् दूसरे जन्ममें किसीको स्मरण भी रहे कि यह साम्राज्य और विशाल धवलधाम सब मेरे ही हैं। पर अब बिना वर्तमान अधिपतिकी आज्ञाके उसे अपने ही निर्मित उस धवलधाममें प्रवेश करनेका अधिकार नहीं है और गत जन्ममें उसके नियुक्त भृत्य ही उसे प्रवेश नहीं करने देते हैं। ठीक है, देहतक ही समस्त सांसारिक सम्बन्ध हैं। अतः समस्त पुत्र, कलत्रादि बहिरंग पदार्थोंकी अपेक्षा देह प्रिय होती है। ऐसे ही देहकी अपेक्षा इन्द्रियाँ, उनकी अपेक्षा मन, मनकी अपेक्षा बुद्धि एवं बुद्धिसे भी अहमर्थ और उससे भी अन्तरंग विशुद्ध चिदात्मा प्रिय है। इन्द्रिय-शक्तिके बिना शरीर मृतकप्राय हो जानेके कारण भाररूप हो जाता है। जब मन किन्हीं कांचन, कामिनी प्रभृति विषयोंकी ओर खिंच जाता है, तब प्राणी मनःसन्तोषार्थ देह और इन्द्रियोंकी भी परवाह नहीं करते। किसी प्रकारकी अकीर्ति आदिसे यदि मनको उद्वेग होता है, तब देहादि-त्यागके लिये विष या शस्त्रका प्रयोग किया जाता है। जब प्राणी

मनकी चंचलतासे संतप्त होता है, तब उसके भी निग्रहका उपाय ढूँढता है और निश्चयात्मिका बुद्धि- द्वारा संकल्प-विकल्पात्मक मनका भी निग्रह करता है। जब प्राणीको मन आदि करणग्रामके निरोध या उसकी निर्व्यापारताका आनन्द अनुभव होने लगता है, तब तो वह दुःखात्मक दृश्यके प्रतीति-निरोधके लिये बुद्धिको भी निगृहीत करनेकी चेष्टा करने लगता है। यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम्॥ (कठ० २।३।१०) इस रीतिसे क्रमशः आत्माके सन्निहित अतएव अन्तरंग बुद्ध्यादिके उद्वेग-निराकरण एवं अनुकूलता- सम्पादन करनेके लिये बहिरंग करणोंका निग्रह किया जाता है। शोधित अहमर्थकी प्रत्यगात्मरूपता अध्यात्मशास्त्रोंमें मनोनाश वासनाक्षय प्रसिद्ध ही है। यहाँतक कि जो यह 'अहं' पदका वाच्यार्थ है, वह भी अन्तःकरणके अहंकारांशसे उपहित आत्माका औपाधिक रूप है। अतः वह भी असह्य होनेके कारण निर्ग्राह्य हो जाता है; क्योंकि 'अहं' पदका लक्ष्यार्थरूप जो निरुपाधिक शुद्ध स्वरूप है, वही मन, बुद्धि एवं अहमर्थ और उसके सुखित्व, दुःखित्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि सर्व दृश्यका भासक और मिथ्याभूत समस्त भास्यके बाधका साक्षी, वस्तुतः भास्यभासकातीत, सर्वोपप्लव-विवर्जित, त्रिकालाबाध्य, स्वप्रकाश परमानन्द चिदात्मा है। उसके स्वाभाविक अखण्डानन्दकी अभिव्यक्तिमें 'अहमर्थ' भी प्रतिबन्धक ही है। अभिप्राय यह है कि यद्यपि कुछ दार्शनिकोंके मतमें 'अहं' का वाच्यार्थ ही आत्मा है, जो कि 'अहं कर्ता', 'अहं भोक्ता' 'अहं सुखी', 'अहं दुःखी' इस रूपसे अनुभवमें आ रहा है, अतः उसका नाश आत्माका ही नाश है। मेरी देह, मेरी इन्द्रियाँ, मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरा अहंकार—इस प्रकार जो ममताके आस्पद हैं, वे अनात्मा हैं और मेरी बुद्धि सुस्थिर है, मैं अपनी बुद्धिद्वारा अपने मनको निगृहीत करूँगा, इस प्रकार जो 'अहंता' का आस्पद 'अहमर्थ' है, वही शुद्ध आत्मा है। उससे परे जीवका अपना कोई स्वरूप नहीं है, अतः 'अहमर्थ' का नाश करना आत्माका ही नाश करना है। तथापि अभिज्ञ वेदान्तीका सिद्धान्त है कि 'अहं' का वाच्यार्थ आत्मा नहीं है, किंतु लक्ष्यार्थ ही आत्मा है अर्थात् जैसे अग्निके सम्बन्धसे अग्निकी दाहकता, प्रकाशकता आदि शक्तियोंसे युक्त होनेसे लौहपिण्डमें अग्निका भ्रममात्र होता है, शुद्ध निरुपाधिक अग्नि लौहपिण्डसे पृथक् है, वैसे ही आत्माके घनिष्ठ संसर्गसे अहमर्थ (मैं)-में प्रेमास्पदता और चेतनता अधिक प्रतीत होती है, अतएव उसमें आत्माकी भ्रान्तिमात्रता है। वस्तुतस्तु मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरा सुख, मेरा दुःख, मैं कर्ता, भोक्ता, सुखी, दुःखी या केवल मैं, ये सभी भास्य हैं, इनकी प्रतीति होती है, इनका सुस्पष्ट भान होता है। भास्यसे भासक या भान पृथक् ही है। जिस रीतिसे चार्वाक प्रभृतिको देहमें ही आत्मबुद्धि हुई; क्योंकि आत्माके ही पारम्परीण सम्बन्धसे देहमें भी किंचित् चेतनता, इष्टता या प्रेमास्पदता भासित होती है और उसीसे उन अत्यन्त अज्ञ, लौकिक, पामर एवं चार्वाकोंको देह-नाशमें ही आत्म-नाशकी बुद्धि हुई, उसी प्रकार 'अहमर्थनाश' में 'आत्मनाश' की बुद्धि इतर दार्शनिकोंको भी हुई। 'अहं श्यामो', 'अहं गौरः' मैं काला हूँ, मैं गौर हूँ, स्थूल हूँ, कृश हूँ—इस तरह स्थौल्यादि धर्मवान् देहमें जैसे अहमर्थके अभेदका अध्यास होता है, वैसे ही चिज्जडग्रन्थि अहमर्थमें चैतन्यान्दघन भगवान्का अभेदाध्यास होता है। इसी वास्ते सर्वस्पर्शविहीन ('स्पृश्यन्ते इति स्पर्शाः विषयाः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार समस्त दृश्य ही स्पर्श हैं) अर्थात् सर्वदृश्यविहीन, परम सूक्ष्म, सर्वावभासक, स्वप्रकाश, चैतन्यान्दघन, परम

७२४ भक्तिसुधा अभय भगवान्‌में अज्ञोंको भय होता है। देखा जाता है कि प्राणियोंको स्थूल पदार्थोंका ही आधिक्येन भान होता है, इसीलिये नील, पीत, हरित रूपोंकी जैसी स्फुट प्रतीति होती है; वैसी अनेक रूपोंका प्रकाश करनेवाली प्रभाकी स्फुटता नहीं होती। प्रभाका प्रकाश करनेवाले नेत्रालोकका विज्ञान उससे भी अधिक दुर्लभ है। कोई ही यह समझता है कि जैसे प्रभाके न होनेपर रूपका प्रकाश नहीं हुआ और प्रभाके होनेपर रूपका प्रकाश हुआ, अतः प्रभा रूपसे पृथक् है, वैसे ही नेत्र-निमीलन-कालमें प्रभाका भी भान नहीं था और नेत्रोन्मीलन-कालमें प्रभाकी प्रतीति हुई, अतः नेत्रके उन्मीलन-कालमें एक अति सूक्ष्म नेत्रालोक ही प्रभापर व्याप्त होकर प्रभाका प्रकाशन करता है। अस्तु, इसके उपरान्त भी नेत्रालोककी मन्दता और पटुताका प्रकाश करनेवाला मानसालोक (मानस-प्रकाश) नेत्रालोकसे पृथक् ही है, जिससे कि मेरी नेत्र-ज्योति मन्द है या तीव्र है, यह जाना जाता है। मनुष्य मनके काम, संकल्प, संशय आदि अनेक विकारोंको जानकर निश्चयात्मिका बुद्धिसे निश्चय करता है कि मैं स्थिर बुद्धिसे मन और उसके विकारोंको निरुद्ध करूँगा। यहाँ स्पष्टतया तीनों अंशोंकी प्रतीति होती है—जिसका निरोध या नाश करेंगे, वह मन और उसके संशयादि विकार, जिससे निरोध करेंगे, वह साधनरूपा निश्चयात्मिका बुद्धि जिसके विषयमें उसकी बुद्धि मन्द या अत्यन्त सूक्ष्म है, इस तरहके अनुभव होते हैं और जो बुद्धिद्वारा मनका निरोध करनेवाला है, वह 'अहं' अर्थात् 'मैं'। इसी प्रकारसे 'अहं बुद्ध्या मनः संयच्छामि' (मैं बुद्धिसे मनका नियन्त्रण करूँगा) ऐसे अनुभवमें 'मैं', 'बुद्धि' और 'मन' इन तीनोंकी प्रतीति होती है। अतः ये सभी तो प्रतीतिके विषय हो गये, इनकी प्रतीति या भान इनसे अवश्य पृथक् है; क्योंकि एकमें प्रकाश्य-प्रकाशकभाव नहीं बन सकता। इसीलिये प्रकाश्यसे प्रकाशक भिन्न होता है, यह बात लोकमें प्रसिद्ध है। प्रकाशान्तर-निरपेक्ष प्रकाशमान 'स्वयंप्रकाश' कहा जाता है। मन, बुद्धि और 'मैं' का भासक, अकेला शुद्ध भान तो भास्य न होनेसे स्वयंप्रकाश है। अतः यह भान ही सर्वदा प्रकाशान्तर-निरपेक्ष भासमान होकर स्थिर है और तदतिरिक्त सभी भास्य अस्थिर हैं। इसीलिये जाग्रत् और स्वप्नमें 'अहं' और 'बुद्धि' एवं 'मन' यद्यपि उपलब्ध होते हैं, परंतु सुषुप्तिमें इन सबका अभाव हो जाता है। उस समय भी जाग्रत् और स्वप्नमें सकल दृश्यके भावका और सुषुप्तिमें समस्त व्यक्त दृश्यके अभावका प्रकाश करनेवाला एवं सर्व दृश्यके विलयनका आधारभूत, सुषुप्ति एवं गाढ़ निद्रा या अज्ञानका भासन करनेवाला, कूटस्थ भानरूप आत्मा ही विराजमान रहता है। इसीका संकेत भागवतमें इस तरह किया है— सन्ने यदीन्द्रियगणेऽहमि च प्रसुप्ते कूटस्थ आशयमृते तदनुस्मृतिर्नः ॥ (श्रीमद्भा० १२।३।३२) स्वयं श्रुतिने इस तथ्यका प्रकाश किया है— 'नाहं खल्वयमेवं सम्प्रत्यात्मानं जानात्य- यमहमस्मीति।' (छान्दोग्य० ८।११।१) इस प्रकार अखण्ड, अनन्त, परमसूक्ष्म वस्तुका बोध अत्यन्त दुर्लभ है। जिन स्थूल पदार्थोंका बोध प्राणियोंको है, उनके नाशमें सर्वनाश या आत्मनाशकी प्रतीति होनी युक्त ही है। इसीलिये श्रीगौडपादाचार्य भगवान् कहते हैं कि—'अस्पर्शयोगो वै नामैष दुर्दर्शः सर्वयोगिभिः। योगिनो बिभ्यति ह्यस्मादभये भयदर्शिनः॥' (माण्डुक्य० ३९) सर्वस्पर्श, सर्वदृश्य- सम्बन्धसे रहित, भास्य-विवर्जित, परमसूक्ष्म, अखण्डानन्दरूप काल्पनिक सर्वभाव तथा अभावोंका भासक, कूटस्थ भानस्वरूप आत्मा तत्त्वज्ञसे भिन्न समस्त योगियोंके लिये दुर्दर्श है; क्योंकि दृश्य ही जिनका सर्वस्व है, दृश्यसे भिन्न स्वप्रकाश अखण्डानन्द द्रष्टापर जिनकी कभी दृष्टि गयी ही नहीं, उन्हें दृश्यके नाशसे परमानन्दसुधासिन्धुके सर्वतोभावेन

भरपूर होनेपर भी सर्वस्वनाश होनेकी ही प्रतीति होती है। किसी भिक्षुकीके सौन्दर्यपर मुग्ध होकर किसी सम्राट्ने उसे साम्राज्ञी होनेको कहा; किंतु भिक्षुकी यह समझकर कि हमारी भिक्षा माँगनेकी सामग्री और भिक्षाका आनन्द चला जायगा, साम्राज्ञी बननेसे डर गयी। कारण कि साम्राज्ञीके सुखकी कल्पना कभी उसकी दृष्टिमें हुई ही नहीं, उसे तो भिक्षा और उसके ही आनन्दका सर्वदा संस्कार रहा। ठीक इसी तरह जिन्हें कभी अखण्डानन्दमय, निर्विकार दृक्के अनन्त सौख्यकी अनुभूति हुई ही नहीं, केवल कटु दृश्यके ही अक्षुण्ण संस्कार प्राप्त हो रहे हैं, उनको दृश्य ही सरस प्रतीत होता है। परमात्मस्वरूप उन्हें उद्वेजक प्रतीत होता है। जैसे सेंधा नमकका ढेला पानीमें मिल जानेसे नष्ट हुआ कहा जाता है, वास्तवमें उपाधिके साथ संसर्ग मिटनेसे केवल उसका औपाधिक रूप ही मिटता है, वैसे ही पंचकोशादि उपाधि मिटनेसे चेतनमें तत्कृत अवच्छेद ही मिटता है, आत्मतत्त्व शुद्ध निर्विकार भानरूपमें तो विद्यमान ही रहता है। जैसे नीमके कीड़ेको नीममें ही स्वाद आता है और मिसरी या चीनीमें उसे उद्वेग होता है, वैसे ही दृश्य-रागीको अत्यन्त कटु दृश्यमें ही प्रीति होती है। सर्व दृश्य- रूप उपद्रवसे रहित, परमानन्दघन भगवान्‌से उसे घबराहट होती है। जैसे पुत्र कलत्रादि कुटुम्बके अनुरागी विषयी प्राणियोंको स्वर्ग या वैकुण्ठ भी रुचिकर प्रतीत नहीं होता, वैसे ही सप्रपंच सुखके रागियोंको निरावरण अद्वैतानन्दमें रुचि नहीं होती। इसीलिये वे अद्वैत, अखण्ड, अनन्त, ब्रह्मानन्दरूप मुक्तिसे घबराते हैं। किसी-किसीका तो यहाँतक कथन है कि चाहे वृन्दावनमें शृगाल भले ही हो जायें, परंतु अद्वैतियोंका निर्विशेष मोक्ष हमें नहीं चाहिये। ठीक ही है, विषयीका तो सर्वस्व विषय ही है। अतः जहाँ विषयका अत्यन्त अभाव हो, ऐसे ब्रह्म या मोक्षसे उसका क्या सम्बन्ध ? जिस मोक्षमें नृत्य, वादित्र, गीत और सरस रूप एवं मधुररसकी अनुभूति नहीं, ऐसे नीरस, निर्विषय मोक्षमें उन्हें शुष्क पाषाण-बुद्धि क्यों न हो? वस्तुतः यह उनके संस्कारोंका ही दोष है। सप्रपंच, सातिशय, क्षुद्र साधन-परतन्त्र सुखका ही उन्हें अनुभव है। उन्हींमें उन्हें संस्कार या राग है तो फिर तद्विलक्षण, निष्प्रपंच, निरतिशय, अनन्त, स्वतन्त्र, आनन्दाम्बुधिकी कल्पना भी उनके मनमें कैसे हो? ब्रह्मात्मतत्त्वकी रसरूपता अति स्वल्प भी विवेचन करनेपर विवेकियोंको निरायास, निष्प्रपंच, अपरिच्छिन्न आनन्दकी महत्ताका ज्ञान हो जाता है। जब किसी रसिकको अत्यन्त अभिलषित रसमय पदार्थ एवं रसमयी कान्ताकी प्राप्ति होती है, तब किंचित् काल उसे अत्यन्त हर्ष होता है। परंतु अन्तमें उसे छोड़कर वही पुरुष सोनेके लिये प्रवृत्त होता है। क्यों? यह क्या बात है? जिस प्रियतमा कान्ताके मिलनके लिये पहले उसे इतनी व्यग्रता, इतनी व्याकुलता थी, आज उसी प्रेयसीके सम्मिलनमें केवल उसीमें उसकी तल्लीनता होनी चाहिये, पर अब वह निद्राको बुलाता है। मनुष्यकी तो कौन कहे, ब्रह्मा और विष्णुकी भी जिनके सन्निधानमें दिव्यातिदिव्य रमण-सामग्रियाँ विद्यमान हैं, द्वैत प्रपंचमें जितनी भी उच्च-से-उच्च कोटिकी सौख्य-सामग्रियाँ हैं, वे सभी वहाँ विद्यमान हैं, फिर भी उन अद्भुत सप्रपंच सौख्योंको छोड़कर सुषुप्तिमें क्यों प्रवृत्ति होती है? इसीलिये कि वहाँ निष्प्रपंच, अद्वैत सुखकी अनुभूति होती है, जिनकी एक छायामात्र ही सातिशय प्रपंच सुखमें परिलक्षित होती है। किं बहुना भगवद्भावापन्न, अत्यन्त उच्च कोटिके अनुरागी, जिन्हें अपने प्रियतम प्राणधनके वियोगमें मरणसे भी अनन्त कोटि गुणित संताप होता है; जिनके क्षणमात्रके प्रियतम-वियोगजन्य तीव्र तापको निरीक्षण करके अनन्त कोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत अनन्त पाप यह सोचकर संतापसे दुर्बल हो जाते हैं कि हम सभी अनन्त कोटि ब्रह्माण्डान्तर्गत अनन्त प्राणियोंके

अनन्त पाप एकत्रित होकर भी, अनन्त कल्पोंमें भी रौरवादि महानरकोंद्वारा इतना सन्ताप नहीं सम्पादन कर सके, जितना सन्ताप (कष्ट) इन्हें एक क्षणके प्रियतम-वियोग-जन्य तीव्र तापमें हुआ है। जिन प्रेमियोंको केवल ध्यानमें प्राप्त प्रियतमके मानस आलिंगनमें ऐसा अद्भुत आनन्द होता है, जिसे देखकर अनन्त ब्रह्माण्डके पुण्यपुंज यह सोचकर क्षीण हो जाते हैं कि हम सभी पुण्य मिलकर भी क्या अनन्त कल्पोंमें किसीको इतना आनन्द दे सकते हैं, जितना आनन्द इन्हें अपने प्रियतमके मानस परिष्वंगसे एक क्षणमें हुआ है? वे ही प्रेमी सौभाग्यवश जब अपने प्रियतमके चिर अभिलषित उस मंगलमय धाममें पहुँच जाते हैं, जहाँ-कहीं मरकतमयी भूमिपर सुवर्णवर्णा लतावल्ली एवं अद्भुत अनन्त ज्योतिर्मय वृक्ष हैं। कहीं कनकमयी भूमिपर मरकतमयी लताप्रतान एवं परम मनोहर श्यामल दूर्वाएँ हैं। अपनी दिव्य दीप्तियोंसे सूर्य-चन्द्रकी दीप्तियोंको भी तिरस्कार करनेवाले मणि तथा रत्न प्रकाश कर रहे हैं, हंस, सारस, कारण्डव, पिकादि कलरव कर रहे हैं; कहीं नाना प्रकारके अद्भुत खग-मृग विचरते हैं। कहीं मरकत मणियोंके समान वृक्षोंपर कनकमयी वल्लियाँ शोभायमान हो रही हैं, कहीं कनकमय मंजुल-कुंजोंपर मरकतमयी लताएँ विराजमान हैं, कहीं पद्मराग मणिके वृक्ष स्फटिकमयी लताओंसे परिवेष्टित हैं और अनेक प्रकारकी विचित्र मणिमयी शाखाओंसे शोभित हो रहे हैं। प्रत्येक शाखा अद्भुत अनन्त रंगोंके विचित्र मणिमय पल्लवोंसे भूषित है। प्रत्येक पल्लव नाना रंगोंके पुष्पस्तबकोंसे शोभायमान है तथा प्रत्येक पुष्पपर नाना प्रकारके सौगन्ध्यमधुलुब्ध भ्रमर गुंजार कर रहे हैं। नाना प्रकारकी दीप्तियोंसे दीप्यमान प्रकट पुष्पोंसे शोभित मधुमयी मनोरम लताएँ विलक्षण शोभा फैलाती हैं। समस्त वृक्ष और लताएँ एक कालमें ही मुकुलित, प्रफुल्लित, फलित एवं पक्व फलोंसे भी युक्त हो रहे हैं। वहाँके अद्भुत सौन्दर्य, माधुर्यादि गुणोंका वर्णन शारदाके लिये भी अशक्य है। ऐसे मंगलमय धाममें प्रेमी अपने सर्वस्व चिराभिलषित प्रियतमका परिष्वंग करके फूले नहीं समाते हैं। परंतु यदि प्रियतम और उनकी मंगलमयी लीलाकी मंजु सामग्री अखण्ड अनन्त आनन्दस्वरूप ही है, तब तो उस अपरिमित रसके आस्वादनसे उनको विरति नहीं हो सकती; क्योंकि वह अद्वैत आनन्दैकरस ही हैं, दूसरी वस्तु नहीं। यदि वस्तुतः पारमार्थिक अखण्डैकरस अद्वैत आनन्दसे पृथक् है, तब तो वही बात हुई कि जैसे लोकमें किसीको दुष्प्राप्य धवलधाम और मनोहर उद्यान देखकर उनकी प्राप्तिके लिये बड़ी उत्कण्ठा होती है और उनके मिलनेपर कुछ क्षण बड़ा हर्ष भी होता है, परंतु कुछ ही कालमें चित्त अन्य विषयोंके चिन्तनमें व्यग्र हो जाता है और वे समस्त सौख्य-सामग्रियाँ सामने होनेपर भी अपना प्रभाव उसके चित्तपर नहीं डाल सकतीं। फिर तो वह और ही चिन्तामें ग्रस्त हो जाता है। दूसरेकी दृष्टिमें वह बहुत सुखी होनेपर भी अपनी दृष्टिमें दुःखी होता है। ठीक वैसे ही थोड़ी देरमें नाना प्रकारके रसास्वादनके अनन्तर मन कुछ और चाहने लगता है। वहाँ भी यदि नींदमें बाधा पड़ी, तब तो प्रजागर दोष समझा जाने लगता है। कहनेका आशय यही है कि प्रियतमासे मिलकर भी प्रेमीकी सोनेके लिये प्रवृत्ति होती है। वस्तुतः जिनके पास जितनी अधिक भोग-सामग्री है, वे उतना ही अधिक सोनेमें प्रवृत्त होते हैं। यह सब इसीलिये कि चाहे कितना ही सुख क्यों न हो, परंतु वह दुःखरूप ही है। दृश्यदर्शनमें श्रम है, अतः उससे परिश्रान्त होकर प्राणी निरायास, अखण्ड, आनन्द ब्रह्ममें विश्रान्ति चाहता है। वास्तवमें सभी तत्त्व अपने अधिष्ठानभूत परमात्मासे वियुक्त होकर संतप्त होते हैं। जैसे किसी सूत्रमें बँधा हुआ कोई पक्षी प्रतिदिशामें भ्रमण करनेसे परिश्रान्त होकर विश्रान्तिके लिये बन्धनसूत्रके आश्रय काष्ठका ही