भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
| प्रधानकारणतावादभङ्गः ] | हन्दीसहितभामतीसंवलितम् | १९७ |
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तृत्वं प्रधानस्य कल्प्येत, यथाऽग्निनिमित्तमयःपिण्डादेर्दग्धृत्वम् ; तथा सति यन्निमित्तमीक्षितृत्वं प्रधानस्य तदेव सर्वज्ञं मुख्यं ब्रह्म जगतः कारणमिति युक्तम् ।
यत्पुनरुक्तं—ब्रह्मणोऽपि न मुख्यं सर्वज्ञत्वमुपपद्यते, नित्यज्ञानक्रियत्वे ज्ञानक्रियां प्रति स्वातन्त्र्यासम्भवादिति । अत्रोच्यते— इदं तावद्भगवान्प्रष्टव्यः, कथं नित्यज्ञानक्रियत्वे सर्वज्ञत्वहानिरिति । यस्य हि सर्वविषयावभासनक्षमं ज्ञानं नित्यमस्ति सोऽसर्वज्ञ इति विप्रतिषिद्धम् । अनित्यत्वे हि ज्ञानस्य कदाचिज्जानाति कदाचिन्न जानातीत्यसर्वज्ञत्वमपि स्यात् । नासौ ज्ञाननित्यत्वे दोषोऽस्ति । ज्ञाननित्यत्वे ज्ञानविषयः स्वातन्त्र्यव्यपदेशो नोपपद्यत इति चेन्न, प्रततौष्ण्यप्रकाशेऽपि सवितरि दहति प्रकाशयतीति स्वातन्त्र्यव्यपदेशदर्शनात् । ननु सवितुर्दाह्यप्रकाश्यसंयोगे सति दहति प्रकाशयतीति व्यपदेशः स्यात्, नतु ब्रह्मणः प्रागुत्पत्तेर्ज्ञानकर्मसंयोगोऽस्तीति विषमो दृष्टान्तः । न; असत्यपि कर्मणि सविता प्रकाशत इति कर्तृत्वव्यपदेशदर्शनात् । एवम-
भामती
चाद्वैतश्रुतिभिरपास्तमिति भावः । पूर्वपक्षबीजमनुभाषते ॐ यत् पुनरुक्तं ब्रह्मणोऽपि इति ॐ । चैतन्यस्य शुद्धस्य नित्यत्वेऽप्युपहितं सदनित्यं, कार्यमाकाशमिव घटावच्छिन्नमित्यभिसन्धाय परिहरति ॐ इदं तावद्भवान् इति ॐ । ॐ प्रततौष्ण्यप्रकाशे सवितरि ॐ । इत्येतदपि विषयावच्छिन्नप्रकाशः कार्यमित्येतदभिप्रायम् । वैषम्यं चोदयति । ॐ ननु सवितुः इति ॐ किं वास्तवं कर्माभावमभिप्रेत्य वैषम्यमाह भवान् ? उत तद्विवक्षाभावम् ? तत्र यदि तद्विवक्षाभावं, तदा प्रकाशयतीत्यनेन मा भूत् साम्यं, प्रकाशत इत्यनेन त्वस्ति । नह्यत्र कर्म विवक्षितम् । अथ च प्रकाशस्वभावं प्रत्यस्ति स्वातन्त्र्यं सवितुरिति परिहरति ॐ नासत्यपि कर्मणि इति ॐ । असत्यपीत्यविवक्षितेऽपीत्यर्थः । अथ वास्तवं कर्माभावमभिसन्धाय
भामती-व्याख्या
अचेतन प्रधान में नहीं। अद्वैत श्रुतियों के द्वारा इस सर्वज्ञत्व का भी खण्डन किया जा चुका है।
पूर्वपक्षोद्भावित दोष का अनुवाद करते हैं—"यत्पुनरुक्तं ब्रह्मणोऽपि न मुख्यं सर्वज्ञत्वमुपपद्यते, नित्यज्ञानक्रियत्वे ज्ञानक्रियां प्रति स्वातन्त्र्यासम्भवात्"। चैतन्यस्वरूप ज्ञान दो प्रकार का है—(१) निरवच्छिन्न और (२) सावच्छिन्न । यद्यपि निरवच्छिन्न या शुद्ध ज्ञान नित्य है, तथापि सावच्छिन्न ज्ञान वैसे ही अनित्य या कार्यरूप माना जाता है, जैसे— घटाद्यवच्छिन्न आकाश । इस आशय से उक्त दोष का उद्धार किया जाता है—"इदं तावद् भवान् प्रष्टव्यः कथं नित्यज्ञानक्रियत्वे सर्वज्ञत्वहानिः ?"
भाष्यकार ने जो कहा है कि "प्रततौष्ण्यप्रकाशे सवितरि दहति प्रकाशयतीति स्वातन्त्र्यव्यपदेशदर्शनात्"। वह भी इसी आशय से कहा है कि यद्यपि वस्त्रादि का दाहक सूर्य-प्रकाश पहले से विद्यमान है, अभी उत्पन्न नहीं हुआ, तथापि सूर्यकांत मणि में प्रतिफलित (सोपाधिक) प्रकाश उत्पन्न हुआ माना जाता है, जिसको लेकर सूर्य में दाह-कर्तृत्व का व्यवहार हो जाता है।
शङ्का—सूर्य में दाह्य और प्रकाश्य पदार्थ के संयोग का जनक व्यापार होने के कारण दहति और प्रकाशयति—ऐसा व्यवहार हो जाता है, किन्तु ब्रह्म में ज्ञान की उत्पत्ति से पहले घटादि कर्म कारण के साथ न तो ब्रह्म का संयोग उत्पन्न होता है और न संयोग-जनक कोई व्यापार ही ब्रह्म में उत्पन्न होता है, 'ब्रह्म सर्वं जानाति'—ऐसा व्यवहार क्योंकर होगा ?
समाधान—दाह्य (दाह क्रिया के कर्मभूत) पटादि के साथ सूर्य का सम्बन्ध होने पर ही सूर्य में 'दहति'—यह व्यवहार होता है—यह आवश्यक नहीं, क्योंकि पटादि पदार्थों के न होने पर भी 'सविता प्रकाशते'—ऐसा व्यवहार देखा जाता है, इसी प्रकार ज्ञान के
१९८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ५
सत्यपि ज्ञानकर्मणि ब्रह्मणः 'तदैक्षत' ( छान्दो० ६।२।३ ) इति कर्तृत्वव्यपदेशोपपत्तेर्न वैषम्यम् । कर्मापेक्षायां तु ब्रह्मणीक्षितृत्वश्रुतयः सुतरामुपपन्नाः । किं पुनस्तत्कर्म, यत्प्रागुत्पत्तेरीश्वरज्ञानस्य विषयो भवतीति ? तत्त्वान्यत्वाभ्यामनिर्वचनीये नामरूपे अव्याकृते व्याचिकीर्षिते इति ब्रूमः । यत्प्रसादाद्धि योगिनामप्यतीतानागतविषयं प्रत्यक्षं ज्ञानमिच्छन्ति योगशास्त्रविदः, किमु वक्तव्यं तस्य नित्यसिद्धस्येश्वरस्य सृष्टि-स्थितिसंहृतिविषयं नित्यज्ञानं भवतीति ।
यदप्युक्तं प्रागुत्पत्तेर्ब्रह्मणः शरीरादिसंबन्धमन्तरेणेक्षितृत्वमनुपपन्नमिति, न तच्चो-
भामती
वैषम्यमुच्यते, तन्न, असिद्धत्वात् कर्माभावस्य, विवक्षितत्वाच्चात्र कर्मण इति परिहरति ॐ कर्मापेक्षायां तु इति ॐ । यासां सति कर्मण्यविवक्षिते श्रुतीनामुपपत्तिस्तासां सति कर्मणि विवक्षिते सुतरामित्यर्थः । ॐ यत्प्रसादात्तु इति ॐ । यस्य भगवत ईश्वरस्य प्रसादात्तस्य नित्यसिद्धस्येश्वरस्य नित्यं ज्ञानं भवतीति किमु वक्तव्यमिति योजना । तथाह्युर्योगशास्त्रकाराः । ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च' इति ।
भामती-व्याख्या
कर्मकारकभूत जगत् के न होने पर भी ब्रह्म में ईक्षण-कर्तृत्व का व्यवहार निभ जाता है । आशय यह है कि शङ्कावादी क्या वास्तविक कर्म और कर्माभाव को लेकर सूर्य और ब्रह्म में वैषम्य सिद्ध करना चाहता है कि सूर्य-प्रकाश का कर्मकारक रूपादि पदार्थ विद्यमान है और ब्रह्म के ज्ञान का कर्मभूत जगत् अपनी उत्पत्ति से पहले नहीं ? अथवा कर्म के अविवक्षितत्व को लेकर वैषम्य दिखाना चाहता है कि सवितृप्रकाश का रूपादि कर्म सत् भी है और विवक्षित भी है, किन्तु ब्रह्म-ज्ञान का कर्मभूत अध्यस्त प्रपञ्च होने पर भी अविवक्षित है । कर्म के विवक्षाभाव को लेकर यदि वैषम्य विवक्षित है, तब 'सविता प्रकाशयति'- ऐसा सकर्मक धातु का प्रयोग ब्रह्म के लिए 'ब्रह्म प्रकाशयति' ऐसा साम्य न होने पर भी 'प्रकाशते'— ऐसे प्रयोग का साम्य है ही, क्योंकि प्रकाशते'— यह अकर्मक धातु का प्रयोग है, कर्म की विवक्षा और विवक्षा के अभाव का प्रसङ्ग ही नहीं उठता । यदि प्रकाशस्वरूप कर्म की अपेक्षा सविता में स्वतन्त्र कर्तृत्व माना जाता है, तो उसका परिहार किया गया है कि "न, असत्यपि कर्मणि" । अर्थात् कर्म के अविवक्षित होने पर भी सविता में कर्तृत्व-व्यवहार होता है— 'सविता प्रकाशते ।' सविता के प्रकाश का वास्तविक कर्मकारक घटादि पदार्थ है, किन्तु ब्रह्म-ज्ञान का वास्तविक कर्म नहीं— इस प्रकार विषमता यदि अभिप्रेत है, तब वह सम्भव नहीं, क्योंकि ब्रह्म-ज्ञान का कर्माभाव ही सिद्ध नहीं, क्योंकि यहाँ कर्म विवक्षित है— "कर्मापेक्षायां तु ब्रह्मणीक्षितृत्वश्रुतयः सुतरामुपपन्नाः" । जिन श्रुतियों की सत् किन्तु अविवक्षित कर्म में उपपत्ति हो जाती है, उन श्रुतियों की अनिर्वचनीय नाम-रूपात्मक प्रपञ्चरूप सत् एवं विवक्षित कर्म में सुतरां ( भली प्रकार ) उपपत्ति हो जाती है । "यत्प्रसादाद्धि" । जिस परमेश्वर की कृपा से योगियों को अतीतानागत विषय का ज्ञान-लाभ माना जाता है, उस नित्य सिद्ध ईश्वर का सर्वविषयक ज्ञान नित्य क्यों न होगा ? ईश्वर की कृपा से योगियों को सर्वविषयक ज्ञान की प्राप्ति योगसूत्रकार ने कही है— "ततः प्रत्यक्चेतनाऽधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च" ( यो. सू. १।२९ ) । इस सूत्र के भाष्य में कहा गया है— "भक्तिविशेषादावर्जित ईश्वरस्तमनुगृह्णाति ज्ञानवैराग्यादिना" । योगी की विशेष ( अनन्य ) भक्ति के द्वारा प्रसादित ईश्वर उस पर ज्ञान और वैराग्य-प्रदान करने का अनुग्रह करता है ।
यह जो आक्षेप किया गया कि प्रपञ्च की उत्पत्ति से पहले शरीरादि साधनों के न होने के कारण ईक्षण और ईक्षण-कर्तृत्व क्योंकर बनेगा ? वह आक्षेप उचित नहीं, क्योंकि
प्रधानकारणतावादभङ्गः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १९९
द्यमवतरति; सवितृप्रकाशवद्ब्रह्मणो ज्ञानस्वरूपनित्यत्वे ज्ञानसाधनापेक्षानुपपत्तेः। अपि चाऽविद्यादिमतः संसारिणः शरीराद्यपेक्षा ज्ञानोत्पत्तिः स्यात्, न ज्ञानप्रतिबन्धकारणरहितस्येश्वरस्य। मन्त्रौ चेमावीश्वरस्य शरीराद्यनपेक्षतामनावरणज्ञानतां च दर्शयतः—'न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च' (श्वेता० ६।८) इति। 'अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः। स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्' (श्वेता० ३।१९) इति च। ननु नास्ति तावज्ज्ञानप्रतिबन्धकारणवानीश्वरादन्यः संसारी, 'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति विज्ञाता' (बृह० ३।७।२३) इति श्रुतेः। तत्र किमिदमुच्यते संसारिणः शरीराद्यपेक्षा ज्ञानोत्पत्तिर्नेश्वरस्येति? अत्रोच्यते—सत्यम्, नेश्वरादन्यः संसारी, तथापि देहादिसंघातोपाधिसंबन्ध इष्यत एव, घटकरकगिरिगुहाद्युपाधिसंबन्ध इव व्योम्नः। तत्कृतश्च शब्दप्रत्ययव्यवहारो लोकस्य दृष्टो घटच्छिद्रं करकादिच्छिद्रमित्यादिराकाशाव्यतिरेकेऽपि, तत्कृता चाकाशे घटाकाशादिभेदमिथ्याबुद्धिर्दृष्टा। तथेहापि देहादिसंघातोपाधिसंबन्धाविवेककृतेश्वरसंसारिभेदमिथ्याबुद्धिः। दृश्यते चात्मन एव सतो
भामती
तद्भाष्यकाराश्च भक्तिविशेषावावर्जित ईश्वरस्तमनुगृह्णाति ज्ञानवैराग्यादिनेति ॐसवितृप्रकाशवद् इति ॐ। वस्तुतो नित्यस्य कारणानपेक्षां स्वरूपेणोक्त्वा व्यतिरेकमुखेनाप्याह ॐ अपि चाविद्यादिमतः ॐ इत्यादि। आदिग्रहणेन कामकर्मादयः संगृह्यन्ते। ॐ न ज्ञानप्रतिबन्धकारणरहितस्य इति ॐ। संसारिणां वस्तुतो नित्यज्ञानत्वेऽप्यविद्यादयः प्रतिबन्धकारणानि सन्ति, न तु ईश्वरस्याविद्यारहितस्य ज्ञानप्रतिबन्धकारणसम्भव इति भावः। न तस्य कार्यमावरणाद्यपगमो विद्यते, अनावृतत्वादिति भावः। ज्ञानबलेन क्रिया। प्रधानस्य त्वचेतनस्य ज्ञानबलाभावान्नजगतो न क्रियेत्यर्थः। अपाणिर्ग्रहीता, अपादो जवनो वेगवान् विहरणवान् अतिरोहितार्थमन्यत्। स्यादेतत्—अनात्मनि व्योम्नि घटाद्युपाधिकृतो भवत्ववच्छेदविभ्रमः, न तु आत्मनि स्वभावसिद्धप्रकाशे स घटत इत्यत आह। ॐ दृश्यते चात्मन एव सतः इति ॐ। ॐ अभि-
भामती-व्याख्या
सूर्य-प्रकाश को जैसे शरीरादि की अपेक्षा नहीं होती, वैसे ही नित्य ब्रह्मस्वरूप ज्ञान (ईक्षण) को ज्ञान के साधनीभूत शरीरादि की अपेक्षा ही नहीं होती, केवल सूर्यात्मक प्रकाशरूप कर्म के समान ब्रह्मस्वरूप ईक्षणात्मक ज्ञान की अपेक्षा से 'ऐक्षत'—ऐसा व्यवहार हो जाता है। वस्तुतः नित्य पदार्थ को साधन की अपेक्षा नहीं—यह अन्वय-मुखेन दिखाकर व्यतिरेक के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है—"अपि चाविद्यादिमतः संसारिणः शरीराद्यपेक्षा ज्ञानोत्पत्तिः स्यात्, न ज्ञानप्रतिबन्धकारणरहितस्येश्वरस्य"। 'आदि' पद के द्वारा काम और कर्मादि साधनों का ग्रहण किया जाता है, अर्थात् यद्यपि जीव का ज्ञान भी नित्य है, तथापि अविद्यादि प्रतिबन्धक होते हैं, उनकी निवृत्ति के लिए साधनों की अपेक्षा होती है, किन्तु अविद्या, काम और कर्मादि रूप प्रतिबन्धकों से रहित ईश्वर को शरीरादि साधनों की अपेक्षा क्यों होगी?
"न तस्य कार्यं करणं च विद्यते, न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते। पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥ (श्वेता. ६।८) इस श्रुति में 'कार्यम्' का अर्थ प्रतिबन्धकीभूत आवरण का अभाव है, वह ईश्वर के ज्ञान में नहीं, क्योंकि उसका ज्ञान अनावृत होता है।
"ज्ञानबलेन क्रिया"। अचेतन प्रधान में ज्ञानरूप बल का अभाव होने के कारण जगत् की क्रिया (उत्पत्ति) नहीं होती। "अपाणिपादो जवनो ग्रहीता" (श्वेता. ३।१९) इस श्रुति में अपाणिर्ग्रहीता, अपादो जवनः—ऐसा अन्वय कर लेना चाहिए, 'जवन' शब्द का अर्थ वेगवान्
| २०० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [अ. १ पा. १ सू. ६ |
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देहादिसंघातेऽनात्मन्यात्मत्वाभिनिवेशो मिथ्याबुद्धिमात्रेण पूर्वेण। सति चैवं संसारित्वे देहाद्यपेक्षमीक्षितृत्वमुपपन्नं संसारिणः। यद्युक्तं प्रधानस्यानेकात्मकत्वान्मृदादिवत्कारणत्वोपपत्तिर्नासंहतस्य ब्रह्मण इति, तत्प्रधानस्याशब्दत्वेनैव प्रत्युक्तम्। यथा तु तर्केणापि ब्रह्मण एव कारणत्वं निर्वोढुं शक्यते, न प्रधानादीनां, तथा प्रपञ्चयिष्यति— ‘न, विलक्षणत्वादस्य-’ (ब्र. २।१।४) इत्येवमादिना॥ ५॥
अत्राह—यदुक्तं नाचेतनं प्रधानं जगत्कारणम्, ईक्षितृत्वश्रवणादिति, तदन्यथाप्युपपद्यते, अचेतनेऽपि चेतनवदुपचारदर्शनात्। यथा प्रत्यासन्नपतनतां नद्याः कूलस्यालक्ष्य कूलं पिपतिषतीत्यचेतनेऽपि कूले चेतनवदुपचारो दृष्टः, तद्वदचेतनेऽपि प्रधाने प्रत्यासन्नसर्गे चेतनवदुपचारो भविष्यति ‘तदैक्षत’ इति। यथा लोके कश्चिच्चेतनः स्नात्वा भुक्त्वा चापराह्णे ग्रामं रथेन गमिष्यामीतीक्षित्वाऽनन्तरं तथैव नियमेन प्रवर्तते, तथा प्रधानमपि महदाद्याकारेण नियमेन प्रवर्तते, तस्मादचेतनवदुपचर्यते। कस्मात्पुनः कारणाद्विहाय मुख्यमीक्षितृत्वमौपचारिकं कल्प्यते? ‘तत्तेज ऐक्षत’, ‘ता आप ऐक्षन्त’ (छान्दो० ६।२।३, ४) इति चाचेतनयोरप्यप्तेजसोश्चेतनवदुपचारदर्शनात्। तस्मात्सत्कर्तृकमपीक्षणमौपचारिकमिति गम्यते, ‘उपचारप्राये वचनात्’ इति। एवं प्राप्त इदं सूत्रमारभ्यते—
गौणश्चेन्नात्मशब्दात् ॥ ६ ॥
यदुक्तं प्रधानमचेतनं सच्छब्दवाच्यं, तस्मिन्नौपचारिक ईक्षतिः, अप्तेजसोरिवेति। तदसत्, कस्मात्? आत्मशब्दात्। ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’ इत्युपक्रम्य ‘तदैक्षत तत्तेजोऽसृजत’ (छान्दो० ६।२।१, ३) इति च तेजोऽबन्नानां सृष्टिमुक्त्वा तदेव प्रकृतं सदीक्षितृ, तानि च तेजोऽबन्नानि, देवताशब्देन परामृश्याह—‘सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि’ (छान्दो० ६।३।२) इति। तत्र यदि प्रधानमचेतनं गुणवृत्त्येक्षितृ कल्प्येत, तदेव
भामती
निवेशः ꣸ मिथ्याभिमानः। ꣸ मिथ्याबुद्धिमात्रेण पूर्वेण इति ꣸। अनेनानादिता दर्शिता। मात्रग्रहणेन विचारासङ्गत्वेन निर्वचनीयता निरस्ता। परिशिष्टं निगदव्याख्यातम्॥ ५-६॥
भामती-व्याख्या
या विहरणवान् होता है! शेष अर्थ अत्यन्त स्पष्ट है। 'आकाशादि अनात्म पदार्थों का घटादि उपाधियों के द्वारा अवच्छेदादिभ्रम हो सकता है, किन्तु सहज सिद्धस्वभाव आत्मप्रकाश में वह कैसे घटेगा?' इस प्रश्न का उत्तर है—"दृश्यते चात्मन एव सतो देहादिसंघातेऽनात्मन्यात्मत्वाभिनिवेशो मिथ्याबुद्धिमात्रेण पूर्वेण"। यहाँ अभिनिवेश का अर्थ है—मिथ्याभिमान, वह अपने से पूर्वभावी मिथ्या ज्ञान से प्रयुक्त है—यह अध्यास की अनादिता दिखाते समय पहले कहा जा चुका है। 'मात्र' पद के प्रयोग से मिथ्या ज्ञान की निर्वचनीयता का निरास किया जाता है, क्योंकि वह सदसद्रूपता के विचार की कसौटी पर चढ़ाया नहीं जा सकता। शेष भाष्य सुबोध है एवं "तत्तेज ऐक्षत" (छां. ६।२।३), "ता आप ऐक्षन्त" (छां. ६।२।४) इत्यादि गौण ईक्षण के प्रायपाठ की शङ्का और उसका समाधान पहले ही किया जा चुका है। छठे सूत्र के भाष्य में केवल "सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मना" (छां. ६।३।२) इस श्रुति में प्रयुक्त 'आत्मा' शब्द के बल पर प्रधान के गौण ईक्षण का निरास विशेष रूप किया गया है॥ ५-६॥
प्रधानस्य जगतकारणत्वभङ्गः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २०१
प्रकृतत्वात्सेयं देवतेति परामृश्येत । न तदा देवता जीवमात्मशब्देनाभिदध्यात् । जीवो हि नाम चेतनः शरीराध्यक्षः प्राणानां धारयिता, तत्प्रसिद्धेर्निर्वचनाच्च । स कथमचेतनस्य प्रधानस्यात्मा भवेत् ? आत्मा हि नाम स्वरूपम्, नाचेतनस्य प्रधानस्य चेतनो जीवः स्वरूपं भवितुमर्हति । अथ तु चेतनं ब्रह्म मुख्यमीक्षितृ परिगृह्यते, तस्य जीवविषय आत्मशब्दप्रयोग उपपद्यते । तथा 'स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो' ( छान्दो० ६।१४।३ ) इत्यत्र 'स आत्मा' इति प्रकृतं सदणिमानमात्मानमात्मशब्देनोपदिश्य 'तत्त्वमसि श्वेतकेतो' इति चेतनस्य श्वेतकेतोरात्मत्वेनोपदिशति । अप्तेजसोस्तु विषयत्वादचेतनत्वं, नामरूपव्याकरणादौ च प्रयोक्तृत्वेनैव निर्देशात् । नचात्मशब्दवर्तिकचिन्मुख्यत्वे कारणमस्तीति युक्तं कूलवद् गौणत्वमीक्षितृत्वस्य । तयोरपि च सदधिष्ठितत्वापेक्षमेवेक्षितृत्वम् । सतस्त्वात्मशब्दान्न गौणमीक्षितृत्वमित्युक्तम् ॥ ६ ॥
अथोच्येत-अचेतनेऽपि प्रधाने भवत्यात्मशब्दः, आत्मनः सर्वार्थकारित्वाद्, यथा राज्ञः सर्वार्थकारिणि भृत्ये भवत्यात्मशब्दो ममात्मा भद्रसेन इति । प्रधानं हि पुरुषस्यात्मनो भोगापवर्गौ कुर्वदुपकरोति, राज्ञ इव भृत्यः संधिविग्रहादिषु वर्तमानः । अथवाक एवात्मशब्दश्चेतनाचेतनविषयो भविष्यति, भूतात्मेन्द्रियात्मेति च प्रयोगदर्शनात् । यथैक एव ज्योतिःशब्दः क्रतुज्वलनविषयः । तत्र कुत एतदात्मशब्दादीक्षतेरगौणत्वमिति-अत उत्तरं पठति-
तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् ॥ ७ ॥
न प्रधानमचेतनमात्मशब्दालम्बनं भवितुमर्हति, 'स आत्मा' इति प्रकृतं सदणिमानमादाय 'तत्त्वमसि श्वेतकेतो' ( छान्दो० ६।८।७ ) इति चेतनस्य श्वेतकेतोर्मोक्षयितव्यस्य तन्निष्ठामुपदिश्य 'आचार्यवान्पुरुषो वेद, तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये' ( छान्दो० ६।१४।२ ) इति मोक्षोपदेशात् । यदि ह्यचेतनं प्रधानं सच्छब्दवाच्यं तदसीति ग्राहयेन्मुमुक्षुं चेतनं सन्तमचेतनोऽसीति, तदा विपरीतवादि
भामती
❄ तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशाद् ❄ इति शङ्कोत्तरत्वेन वा स्वातन्त्र्येण वा प्रधाननिराकरणार्थं सूत्रम् , शङ्का च भाष्ये उक्ता ॥ ७ ॥
भामती-व्याख्या
"तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात्" ( ब्र. सू. १।१।७ ) इस सिद्धान्त सूत्र का सामञ्जस्य दो प्रकार से किया जा सकता है-( १) "तत्त्वमसि" ( छां. ६।१४।३ ) इस मोक्षोपाय के उपदेश में जो 'तत्' पद से प्रधान के ग्रहण की शङ्का की गई है, उसका यह उत्तर है कि 'आत्मनिष्ठ' का ही मोक्ष होता है, प्रधाननिष्ठ का नहीं । ( २ ) अथवा स्वतन्त्ररूप से प्रधानकारणतावाद का इस सूत्र के द्वारा निराकरण अभिप्रेत है ।
[ 'तन्निष्ठ' शब्द का अर्थ है-तस्मिन् निष्ठा ( आत्मरूपापत्तिः ) यस्य, अर्थात् जगत् के कारणीभूत तत्त्व को जो अपना आत्मा निश्चय कर लेता है, वह मुक्त होता है । मुमुक्षु जीव के लिए प्रधान तत्त्व को अपना आत्मा समझना सम्भव नहीं, क्योंकि आत्मा का अर्थ है-स्वरूप । विजातीय पदार्थं विजातीय पदार्थ का आत्मा या स्वरूप नहीं हो सकता । जो श्रुति अचेतन प्रधान को जीव का स्वरूप बताती है-'तत्त्वमसि', उस श्रुति को विपरीतार्थवादी और अप्रमाण कहा जायगा, किन्तु वेदान्त-श्रुति सर्वथा निर्दोष और स्वतः प्रमाणभूत है, उसमें अप्रामाण्य की कल्पना नहीं कर सकते । यदि शास्त्र भोले-भाले मुमुक्षु को कह देता २६
| २०२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. ७ |
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शास्त्रं पुरुषस्यानर्थायेत्यप्रमाणं स्यात्। न तु निर्दोषं शास्त्रमप्रमाणं कल्पयितुं युक्तम्। यदि चाज्ञस्य सतो मुमुक्षोरचेतनमनात्मानमात्मेत्युपदिशेत्प्रमाणभूतं शास्त्रं, स श्रद्दधानतयान्धगोलाङ्गूलन्यायेन तदात्मदृष्टिं न परित्यजेत्, तद्व्यतिरिक्तं चात्मानं न प्रतिपद्येत, तथा सति पुरुषार्थाद्विहन्येतानर्थं च ऋच्छेत्। तस्माद्यथा स्वर्गार्थिनोऽग्निहोत्रादिसाधनं यथाभूतमुपदिशति, तथा मुमुक्षोरपि 'स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो' इति यथाभूतमेवात्मानमुपदिशतीति युक्तम्। एवं च सति तप्तपरशुग्रहणमोक्षदृष्टान्तेन सत्याभिसंधस्य मोक्षोपदेश उपपद्यते। अन्यथा ह्यमुख्ये सदात्मतत्त्वोपदेशे 'अहमुक्थमस्मीति विद्यात्' ( ऐ० आर० २।१।२।६) इतिवत्संपन्मात्रमिदमनित्यफलं स्यात्। तत्र मोक्षोपदेशो नोपपद्येत। तस्मान्न सदणिमन्यात्मशब्दस्य गौणत्वम्। भृत्ये तु स्वामिभृत्यभेदस्य प्रत्यक्षत्वादुपपन्नो गौण आत्मशब्दो ममात्मा भद्रसेन इति। अपि च क्वचिद् गौणः शब्दो दृष्ट इति नैतावता शब्दप्रमाणकेऽर्थे गौणी कल्पना न्याय्या, सर्वत्रानाश्वासप्रसङ्गात्। यत्तूक्तं-चेतनाचेतनयोः साधारण आत्मशब्दः क्रतु-ज्वलनयोरिव ज्योतिःशब्द इति,-तन्न, अनेकार्थत्वस्यान्याय्यत्वात्। तस्माच्चेतनविषय एव मुख्य आत्मशब्दश्चेतनत्वोपचाराद् भूतादिषु प्रयुज्यते भूतात्मेन्द्रियात्मेति च। साधारणत्वेऽप्यात्मशब्दस्य न प्रकरणमुपपदं वा किंचिन्निश्चायक मन्तरेणान्यतरवृत्तित्ता निर्धारयितुं शक्यते। नचात्राचेतनस्य निश्चायकं किंचित्कारणमस्ति। प्रकृतं तु सदीक्षितृ, सन्निहितश्चेतनः श्वेतकेतुः। न हि चेतनस्य श्वेतकेतोरचेतन आत्मा संभवतीत्यवोचाम। तस्माच्चेतनविषय इहात्मशब्द इति निश्चीयते। ज्योतिःशब्दोऽपि लौकिकेन प्रयोगेण ज्वलन एव रूढः, अर्थवादकल्पितेन तु ज्वलनसादृश्येन क्रतौ प्रवृत्त इत्यदृष्टान्तः। अथवा—पूर्वसूत्र एवात्मशब्दं निरस्तसमस्तगौणत्वसाधारणत्वाशङ्कतया व्याख्याय ततः स्वतन्त्र एव प्रधानकारणनिराकरणहेतुर्व्याख्येयः—'तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात्' इति। तस्मान्नाचेतनं प्रधानं सच्छब्दवाच्यम् ॥ ७ ॥
भामती-व्याख्या
है कि यह (अचेतन प्रधान) ही तेरा आत्मा है और श्रद्धालु मुमुक्षु उस उपदेश को वैसे ही कस करके पकड़ लेता है, जैसे किसी अन्धे बैल की पूछ कोई अन्धा व्यक्ति पकड़ ले। तब उस बेचारे मुमुक्षु की क्या दुर्गति होगी, यह कल्पना भी नहीं कर सकते। अतः जैसे कर्मकाण्ड अपने स्वर्गार्थी अधिकारी पुरुष को यथावत् स्वर्ग के साधनीभूत अग्निहोत्रादि का उपदेश करता है, वैसे ही वेदान्त-शास्त्र का भी प्रामाण्य और श्रद्धेयता इसी में है कि वह भी अपने मुमुक्षु पुरुष को "स आत्मा तत्त्वमसि"—ऐसा यथाभूत उपदेश करे, तब तो ब्रह्मतत्त्व में ही जगतकारणता और आत्मरूपता उपपन्न होती है, अन्यत्र नहीं। "पुरुष सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्त्यपहार्षीत् परशुमस्मै तपतेति स यदि तस्य कर्त्ता भवति सोऽनृताभिसन्धोऽनृतेनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति, स दह्यते। अथ यदि तस्याकर्ता भवति, तत एव सत्यमात्मानं कुरुते, स सत्याभिसन्धो न दह्यतेऽथ मुच्यते" (छां. ६।१६।१-२) इस प्रकार आत्मा में आत्मत्वावधारण (सत्यभिसन्धि) मोक्ष का सच्चा साधन है, इस साधन को अपनानेवाला पुरुष वैसे ही मुक्त हो जाता है, जैसे सत्यवादी पुरुष तप्त परशु का ग्रहण कर लेने पर भी नहीं जलता और बन्धन से मुक्त हो जाता है। 'आत्मा' शब्द के अनेक अर्थ मानना सर्वथा अनुचित है। जब कहीं जड़ वस्तु के लिए इसका प्रयोग हो जाता है, तब वह गौण प्रयोग है, प्रकृत में मुख्य] ॥ ७॥
प्रधानस्य जगत्कारणत्वभङ्गः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २०३
कुतश्च न प्रधानं सच्छब्दवाच्यम्—
हेयत्वावचनाच्च ॥ ८ ॥
यद्यनात्मैव प्रधानं सच्छब्दवाच्यं 'स आत्मा तत्त्वमसि' (छान्दो० ६।८।७) इतीहोपदिष्टं स्यात्, स तदुपदेशश्रवणादनात्मज्ञतया तन्निष्ठो मा भूदिति मुख्यमात्मानमुपदिदिक्षुस्तस्य हेयत्वं ब्रूयात्। यथाऽरुन्धतीं दिदर्शयिषुस्तत्समीपस्थां स्थूलां ताराममुख्यां प्रथममरुन्धतीति ग्राहयित्वा तां प्रत्याख्याय पश्चादरुन्धतीमेव ग्राहयति, तद्वन्नायमात्मेति ब्रूयात्, नचैवमवोचत्। सन्मात्र आत्मावगतिनिष्ठतैव हि षष्ठप्रपाठकपरिसमाप्तिरीक्ष्यते। चशब्दः प्रतिज्ञाविरोधाभ्युच्चयप्रदर्शनार्थः। सत्यपि हेयत्ववचने प्रतिज्ञाविरोधः प्रसज्येत। कारणविज्ञानाद्धि सर्वं विज्ञातमिति प्रतिज्ञातम्। 'उत तमादेशमप्राक्ष्यो येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्', 'एवं सोम्य स आदेशो भवति' (छा० ६।१।१, ३) इति वाक्योपक्रमे श्रवणात्। न च सच्छब्दवाच्ये प्रधाने भोग्यवर्गकारणे हेयत्वेनाहेयत्वेन वा विज्ञाते भोक्तृवर्गो विज्ञातो भवति, अप्रधानविकारत्वाद्वोक्तृवर्गस्य। तस्मान्न प्रधानं सच्छब्दवाच्यम् ॥ ८ ॥
कुतश्च न प्रधानं सच्छब्दवाच्यम् —
स्वाप्ययात् ॥ ९ ॥
भामती
स्यादेतद्—ब्रह्मैव ज्ञोप्सितं, तच्च न प्रथमं सूक्ष्मतया शक्यं श्वेतकेतुं ग्राहयितुमिति तत्सम्बद्धं प्रधानमेव स्थूलतयाऽऽत्मत्वेन ग्राह्यते श्वेतकेतुरुन्धतीमिवातीव सूक्ष्मां दर्शयितुं तत्सन्निहितां स्थूलतारकां दर्शयन्तीयमसावरुन्धतीति । अस्यां शङ्कायामुत्तरम् ⁕ हेयत्वावचनाच्च ⁕ इति सूत्रम् । चकारोऽनुक्तसमुच्चयार्थः । तच्चानुक्तं भाष्य उक्तम् ॥ ८ ॥
अपि च जगत्कारणं प्रकृत्य स्वपितीत्यस्य निरुक्तं कुर्वती श्रुतिश्चेतनमेव जगत्कारणं ब्रूते । य...
भामती-व्याख्या
शङ्का—वेदान्तियों की यदि यह बात मान भी ली जाय कि मोक्ष के लिए ब्रह्म का ज्ञान आवश्यक है, तब भी ब्रह्म ऐसा सूक्ष्मतम पदार्थ है कि उसका नितान्त कुशाग्र बुद्धि के मुमुक्षु को भी सहसा दर्शन नहीं कराया जा सकता, अतः जैसे अरुन्धती नाम के अत्यन्त नन्हें तारे को दिखाने के लिए पहले उसके समीप का वसिष्ठनामक स्थूल तारा अरुन्धती के रूप में दिखाकर क्रमशः वास्तविक अरुन्धती का दर्शन कराया जाता है, वैसे ही पहले जगत् के कारणीभूत प्रधान तत्त्व को दिखाकर 'तत्त्वमसि'—ऐसा उपदेश करके क्रमशः उसके साक्षी-भूत आत्मतत्त्व तक मुमुक्षु को पहुँचाया जाय।
समाधान—उक्त शङ्का का समाधान करने के लिए कहा गया है—"हेयत्वावचनाच्च" (ब्र. सू. १।१।८)। सूत्र में चकार का ग्रहण जिस अनुक्तार्थ का संग्रह करने के लिए प्रयुक्त है, वह अनुक्त अर्थ भाष्य में कहा गया है—"चशब्दः प्रतिज्ञाविरोधाभ्युच्चयप्रदर्शनार्थः"। श्रुति में यह प्रतिज्ञा की गई है कि जगत् के कारणीभूत एक तत्त्व के ज्ञान से अनन्त कार्यों का ज्ञान हो जाता है—"यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद् वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्" (छां. ६।१।३)। प्रधान को यदि कारण माना जाता है, तब एक प्रधान तत्त्व ज्ञातव्यत्वेन उपादेय होता, उसे अब त्याज्य बताना प्रतिज्ञा-विरुद्ध है ॥ ८ ॥
जगत् के कारणीभूत तत्त्व में ही जीव का अप्यय (तद्रूपतापत्ति) दिखाया गया है—
२०४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [अ. १ पा. १ सू. १०]
तदेव सच्छब्दवाच्यं कारणं प्रकृत्य श्रूयते–‘यत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते स्वं ह्यपीतो भवति’ (छा० ६।८।१) इति । एषा श्रुतिः स्वपितीत्येतत्पुरुषस्य लोकप्रसिद्धं नाम निर्वक्ति । स्वशब्देनेहात्मोच्यते । यः प्रकृतः सच्छब्दवाच्यस्तमपीतो भवत्यपि- गतो भवतीत्यर्थः । अपिपूर्वस्यैतेर्लयार्थत्वं प्रसिद्धं, प्रभवाप्ययावित्युत्पत्तिप्रलययोः प्रयोगदर्शनात् । मनःप्रचारोपाधिविशेषसम्बन्धादिन्द्रियार्थान्गृह्णन् तद्विशेषापन्नो जीवो जागर्ति । तद्वासनाविशिष्टः स्वप्नान् पश्यन् मनःशब्दवाच्यो भवति । स उपाधिद्वयो परमे सुषुप्तावस्थायामुपाधिकृतविशेषाभावात्स्वात्मनि प्रलीन इवेति ‘स्वं ह्यपीतो भवति’ इत्युच्यते । यथा हृदयशब्दनिर्वचनं श्रुत्या दर्शितम्–‘स वा एष आत्मा हृदि तस्यैत- देव निरुक्तं हृदयमिति तस्माद् हृदयमिति’ (छा० ८।३।३) इति । यथा वाऽशनायोद- न्याशब्दप्रवृत्तिमूलं दर्शयति श्रुतिः–‘आप एव तदशितं नयन्ते, तेज एव तत्पीतं नयते’ (छा० ६।८।३, ५) इति च, एवं स्वमात्मानं सच्छब्दवाच्यमपीतो भवतीतीममर्थं स्वपितिनामनिर्वचनेन दर्शयति । न च चेतन आत्माऽचेतनं प्रधानं स्वरूपत्वेन प्रति- पद्येत । यदि पुनः प्रधानमेवात्मीयत्वात्स्वशब्देनैवोच्येत, एवमपि चेतनोऽचेतनमप्ये- तीति विरुद्धमापद्येत । श्रुत्यन्तरं च–‘प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरम्’ (बृह० ४।३।२१) इति सुषुप्तावस्थायां चेतनेऽप्ययं दर्शयति । अतो यस्मि- न्नप्ययः सर्वेषां चेतनानां तच्चेतनं सच्छब्दवाच्यं जगतः कारणं न प्रधानम् ॥ ९ ॥
कुतश्च न प्रधानं जगतः कारणम्–
गतिसामान्यात् ॥ १० ॥
यदि तार्किकसमय इव वेदान्तेष्वपि भिन्ना कारणावगतिरभविष्यत् क्वचिच्चेतनं ब्रह्म जगतः कारणं, क्वचिदचेतनं प्रधानं, क्वचिदन्यदेवेति, ततः कदाचित्प्रधान-
भामती स्वशब्द आत्मवचनस्तथापि चेतनस्य पुरुषस्याचेतनप्रधानत्वानुपपत्तिः । अथात्मीयवचनस्तथाप्यचेतने पुरुषार्थतयाऽऽत्मीयेऽपि चेतनस्य प्रलयानुपपत्तिः । न हि मृदात्मा घट आत्मीयेऽपि पाथसि प्रलीयतेऽपि त्वात्मभूतायां मृद्येव । न च रजतमनामभूते हस्तिनि प्रलीयते, किन्त्वात्मभूतायां शुक्तावेवेत्याह ॐ स्वाप्ययात् ॐ ॥ ९ ॥ ॐ गतिसामान्यात् ॐ । गतिरवगतिः । ॐ तार्किकसमय इव इति ॐ । यथा हि तार्किकाणां
भामती-व्याख्या "यत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति, स्वमपीतो भवति" (छां. ६।८।१) । स्वपिति का निर्वचन है—‘स्वमपीतो भवति', यहाँ ‘स्व’ शब्द यदि आत्मा का वाचक है, तब जीव का अचेतनभूत प्रधानरूप होना सम्भव नहीं। यदि ‘स्व’ शब्द आत्मीय का बोधक है, तब प्रधान का ‘स्व’ पद से ग्रहण हो जाने पर भी उसमें जीव का प्रलय (अभिभव) नहीं हो सकता, क्योंकि मृन्मय घट आत्मीय (अपने सम्बन्धित जल) पदार्थ में प्रलीन नहीं होता, अपितु स्वात्मभूत मृत्तिका में ही विलीन होता है। रजतादि पदार्थ कभी भी अपने आरोप के अनाधारभूत हस्ती में प्रलीन नहीं होता, अपितु शुक्ति में ही विलीन होता है, अतः जीव का प्रलय ब्रह्म में ही सम्भव होने के कारण वही जगत् का उपादान कारण है, प्रधान नहीं ॥ ९ ॥
सभी वेदान्त-वाक्यों से जगत्कारणत्वेन एकमात्र ब्रह्म की ही गति (अवगति या ज्ञान) होती है, तार्किक (न्याय, वैशेषिक, सांख्यादि) मतवादों के अनुसार विविधता प्रतीत नहीं होती ।
धानस्य जगतकारणत्वभङ्गः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २०५
कारणवादानुरोधेनापीक्षत्यादिश्रवणमकल्पयिष्यत । नत्वेतदस्ति, समानैव हि सर्वेषु वेदान्तेषु चेतनकारणावगतिः ।' 'यथाऽग्नेर्ज्वलतः सर्वा दिशो विस्फुलिङ्गा विप्रतिष्ठेरन्नेवमेवैतस्मादात्मनः सर्वे प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः' ( कौ० ३।३ ) इति । 'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः' ( तै० २।१ ) इति । 'आत्मन एवेदं सर्वम्' ( छा० ७।२६।१ ) इति । 'आत्मन एष प्राणो जायते' ( प्र० ३।३) इति चात्मनः कारणत्वं दर्शयन्ति सर्वे वेदान्ताः । आत्मशब्दस्य चेतनवचन इत्यवोचाम । महच्च प्रामाण्यकारणमेतद्यद्वेदान्तवाक्यानां चेतनकारणत्वे समानगतित्वं, चक्षुरादीनामिव रूपादिषु । अतो गतिसामान्यात्सर्वज्ञं ब्रह्म जगतः कारणम् ॥ १० ॥
कुतश्च सर्वज्ञं ब्रह्म जगतः कारणम्—
श्रुतत्वाच्च ॥ ११ ॥
स्वशब्देनैव च सर्वज्ञ ईश्वरो जगतः कारणमिति श्रूयते श्वेताश्वतराणां मन्त्रोपनिषदि सर्वज्ञमीश्वरं प्रकृत्य—'स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः' ( श्वे० ६।९ ) इति । तस्मात्सर्वज्ञं ब्रह्म जगतः कारणं, नाचेतनं प्रधानमन्यद्वेति सिद्धम् ॥ ११ ॥
भामती
समयभेदेषु परस्परपराहताथेता, नैवं वेदान्तेषु परस्परपराहतिः, अपि तु तेषु सर्वत्र · जगत्कारणचेतन्यावगतिः समानेति । ॐ चक्षुरादीनामिव रूपादिषु इति ॐ । यथा हि सर्वेषां चक्षू रूपमेव ग्राहयति, न पुना रसादिकं कस्यचिद्दर्शयति कस्यचिद्रूपम् । एवं रसनादिष्वपि गतिसामान्यं दर्शनीयम् ॥ १० ॥
ॐ श्रुतत्वाच्च ॐ । तदैक्षतेत्यत्र ईक्षणमात्रं जगत्कारणस्य श्रुतं न तु सर्वविषयम् । जगत्कारणसम्बन्धितया तु तदर्थात् सर्वविषयमवगतं श्वेताश्वतराणां तूपनिषदि सर्वज्ञ ईश्वरो जगत्कारणमिति साक्षादुक्तमिति विशेषः ॥ ११ ॥
भामती-व्याख्या
"चेतनकारणत्वे समानगतित्वं चक्षुरादीनामिव रूपादिषु" । अर्थात् जैसे चक्षु से सभी आँखवाले पुरुषों को समानरूप से रूप और रूपी पदार्थों की ही अवगति होती है, वैसे सभी वेदान्त-वचनों से चेतन-कारणता की ही अवगति होती है, अतः प्रधानादि अचेतन पदार्थों को जगत् का उपादान कारण नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार रसादि दृष्टान्तों में भी रसनादि से समान अवगति दिखाई जा सकती है ॥ १० ॥
प्रधान-कारणता कहीं भी साक्षात् श्रुत नहीं, अपितु "तदैक्षत"—इत्यादि श्रुतियों में जगत्कारणीभूत पदार्थ में ईक्षणमात्र श्रुत है, वह भी सर्वविषयक नहीं। जगत्कारणता का सामञ्जस्य करने के लिए ईक्षण में सर्वविषयत्व की कल्पना ही की जाती है, किन्तु श्वेताश्वतरोपनिषत् में सर्वज्ञ ईश्वर का प्रकरण उठा कर कहा है—'स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः' ( श्वेता० ६।९ ) । वह सर्वज्ञ ईश्वर ही जगत् का कारण, करणाधिपों ( जीवों ) का अन्तर्यामी है, इसका न तो कोई जनक है और न कोई सञ्चालक अतः सर्वज्ञ ईश्वर को छोड़ कर प्रधानादि को जगत् का कारण नहीं माना जा सकता ॥ ११ ॥
| २०६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १२ |
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( ६ आनन्दमयाधिकरणम् । सू० १२-१९ )
'जन्माद्यस्य यतः' इत्यारभ्य 'श्रुतत्वाच्च' इत्येवमन्तैः सूत्रैर्याण्युदाहृतानि वेदान्तवाक्यानि तेषां सर्वज्ञः सर्वशक्तिरीश्वरो जगतो जन्मस्थितिलयकारणमित्येतत्स्यार्थस्य प्रतिपादकत्वं न्यायपूर्वकं प्रतिपादितम्। गतिसामान्योपन्यासेन च सर्वे वेदान्ताश्चेतनकारणवादिन इति व्याख्यातम्, अतः परस्य ग्रन्थस्य किमुत्थानमिति ? उच्यते—द्विरूपं हि ब्रह्मावगम्यते, नामरूपविकारभेदोपाधिविशिष्टं, तद्विपरीतं च सर्वोपाधिविवर्जितम्। 'यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्' (बृह० ४।५।१५) 'यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाऽथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम्' (छान्दो० ७।२४।१) 'सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाऽभिवदन् यदास्ते' (तै० आ० ३।१२।७) 'निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्। अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम्' (श्वे० ६।१९) 'नेति नेति' (बृ० २।३।६) इति 'अस्थूलमनणु' (बृ० ३।८।८) 'न्यूनमन्यत्स्थानं संपूर्णमन्यत्' इति चैवं सहस्रशो विद्याविद्याविषयभेदेन ब्रह्मणो द्विरूपतां दर्शयन्ति वाक्यानि । तत्राविद्यावस्थायां ब्रह्मण उपास्योपासकादिलक्षणः सर्वो व्यवहारः। तत्र कानिचिद् ब्रह्मण उपासनान्यभ्युदयार्थानि, कानिचित्क्रममुक्त्यर्थानि, कानिचित्कर्मसमृद्ध्य-
भामती
उत्तरसूत्रसन्दर्भमाक्षिपति ॐ जन्माद्यस्य यत इत्यारभ्य इति ॐ । ब्रह्म जिज्ञासितव्यमिति प्रतिज्ञातं, तच्च शास्त्रैकसमधिगम्यं, शास्त्रञ्च सर्वज्ञे सर्वशक्तौ जगदुत्पत्तिस्थितिप्रलयकारणे ब्रह्मण्येव प्रमाणं न प्रधानादाविति न्यायतो व्युत्पादितम्। न चास्ति कश्चिद्वेदान्तभागो यस्तद्विपरीतमपि बोधयेदिति च गतिसामान्यादित्युक्तम्। तत् किमपरमवशिष्यते यदर्थमुत्तरसूत्रसन्दर्भस्यावतारः स्यादिति। ॐ किमुत्थानमिति ॐ किमाक्षेपे। समाधत्ते ॐ उच्यते, द्विरूपं हि इति ॐ । यद्यपि तत्त्वतो निरस्तसमस्तोपाधिरूपं ब्रह्म तथापि न तेन रूपेण शक्यमुपदेष्टुमित्युपहितेन रूपेणोपदेष्टव्यमिति। तत्र च क्वचिदुपाधिर्विवक्षितः। तदुपासनानि ॐ कानिचिदभ्युदयार्थानि ॐ मनोमात्रसाधनतयात्र पठितानि। ॐ कानिचित्
भामती-व्याख्या
संगति—अग्रिम अधिकरण के सूत्र-सन्दर्भ पर आक्षेप किया जाता है—"जन्माद्यस्य यतः" इत्यारभ्य "श्रुतत्वाच्च" इत्येवमन्तैः सूत्रैः सर्वज्ञ ईश्वरो जगत्कारणमिति प्रतिपादितम्। अतः परस्य ग्रन्थस्य किमुत्थानम् ?" अर्थात् 'ब्रह्म जिज्ञासितव्यम्'—ऐसी प्रतिज्ञा की गई, वह (ब्रह्म) केवल वेदान्त-वेद्य है, वह वेदान्त शास्त्र सर्वज्ञ, सर्वशक्ति-सम्पन्न, जगत्कारणीभूत ब्रह्म में ही प्रमाण है, प्रधानादि में नहीं—ऐसा न्यायों और युक्तियों के द्वारा सिद्ध किया गया। वेदान्त का कोई भी भाग ऐसा नहीं, जो उसके विपरीत कहता हो—यह बात "गतिसामान्यात्"—इस सूत्र से कही गई। अब और क्या शेष रह गया कि जिसके लिए आगे के सूत्रों की रचना की गई, अतः कहा गया—"किमुत्थानम्"। यहाँ 'किम्' शब्द आक्षेपार्थक है।
उक्त आक्षेप का समाधान किया जाता है—"उच्यते द्विरूपं हि ब्रह्मावगम्यते नामरूपविकारभेदोपाधि-विशिष्टम्, तद्विपरीतं च"। यद्यपि ब्रह्म तत्त्व समस्त उपाधियों से रहित है, तथापि उस अनौपाधिक रूप से उसका उपदेश नहीं किया जा सकता, अतः किसी-न-किसी उपाधि से विभूषित कर उसका उपदेश करना होगा। किसी-किसी क्रिया में उपाधि विवक्षित होती है, जैसे उपासना विधि में। कतिपय (प्रतीकादि) उपासनाओं का फल अभ्युदय
प्रधानस्यानन्दमयत्वम् ] हिन्दोसहितभामतीसंवलितम् २०७
र्थानि। तेषां गुणविशेषोपाधिभेदेन भेदः। एक एव तु परमात्मेश्वरस्तैस्तैर्गुणविशेषैर्विशिष्ट उपास्यो यद्यपि भवति, तथापि यथागुणोपासनमेव फलानि भिद्यन्ते। 'तं यथा यथोपासते तदेव भवति' इति श्रुतेः, यथाक्रतुरस्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति' (छा० ३।१४।१) इति च। स्मृतेश्च—'यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥' (गी० ८।६) इति। यद्यप्येक आत्मा सर्वभूतेषु स्थावरजङ्गमेषु गूढः, तथापि चित्तोपाधिविशेषतारतम्यादात्मनः
भामती
क्रममुक्त्यर्थानि, कानिचित्कर्मसमृद्ध्यर्थानि ॐ । क्वचित् पुनरुक्तोऽप्युपाधिरविवक्षितः, यथाऽत्रैवान्नमयादय आनन्दमयान्ताः पञ्च कोशाः। तदत्र कस्मिन्नुपाधिर्विवक्षितः कस्मिन्नेति नाद्यापि विवेचितम्। तथा गतिसामान्यमपि सिद्धवदुक्तं, न त्वद्यापि साधितमिति। तदर्थमुत्तरग्रन्थसन्दर्भारम्भ इत्यर्थः। स्यादेतत्—परस्यात्मनस्तत्तदुपाधिभेदविशिष्टस्याप्यभेदात् कथमुपासनाभेदः कथञ्च फलभेद इत्यत आह ॐ एक एव तु इति ॐ । रूपाभेदेऽप्युपाधिभेदादुपहितभेदादुपासनाभेदस्तथा च फलभेद इत्यर्थः। ॐ क्रतुः ॐ सङ्कल्पः। ननु यद्येक आत्मा कूटस्थनित्यो निरतिशयः सर्वभूतेषु गूढः कथमेतस्मिन् भूताश्रये तारतम्यश्रुतय इत्यत आह ॐ यद्यप्येक आत्मा इति ॐ । यद्यपि निरतिशयमेकमेव रूपमात्मन ऐश्वर्यं ज्ञानं चानन्दश्च,
भामती-व्याख्या
(स्वर्गादि) माना जाता है। कर्म-निरपेक्ष केवल मन के द्वारा सम्पादित होने के कारण ऐसी उपासनाओं को कर्मकाण्ड में न पढ़ कर यहाँ (वेदान्त-काण्ड) में स्थान दिया गया है। "कानिचित् क्रममुक्त्यर्थानि, कानिचित् कर्मसमृद्ध्यर्थानि"। कहीं-कहीं ब्रह्म की कथित उपाधि भी अविवक्षित होती है, जैसे—यहाँ [आनन्द ब्रह्म के प्रसङ्ग में] ही 'अन्नमय', 'प्राणमय', 'मनोमय', 'विज्ञानमय' और 'आनन्दमय'—ये पाँच कोश। कहाँ उपाधि विवक्षित है और कहाँ नहीं ? ऐसा विचार अभी तक नहीं किया गया। उसी प्रकार 'गतिसामन्य' का भी उपदेश मात्र कर दिया गया, अभी तक उसकी सिद्धि नहीं की गई, इसके लिए अग्रिम सूत्र-ग्रन्थ की रचना की गई है।
विविध उपाधियों से विशिष्ट भी परमात्मा तो एक अभिन्न ही है, तब उसकी उपासनाओं का भेद क्योंकर होगा? उपासना-भेद न होने पर फल-भेद क्यों होगा? ऐसी शङ्का का समाधान है—"एक एव तु परमात्मेश्वरः तैस्तैर्गुणविशेषैर्विशिष्ट उपास्यो यद्यपि भवति, तथापि यथागुणोपासनमेव फलानि भिद्यन्ते "तं यथा यथोपासते, तदेव भवति" (मुद्गलो. ३।३) इति श्रुतेः। "यथाक्रतुरस्मिन् लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति" (छां. ३।१४।१) इति च"। आशय यह है कि उपधेय का अभेद होने पर भी उपाधियों का भेद होने के कारण उपासना का भेद हो जाता है। उपासना का भेद होने से फल-भेद हो जाता है। उक्त श्रुति में 'क्रतु' शब्द का अर्थ है—'सङ्कल्प। भाष्यकार ने भी इस मन्त्र की व्याख्या में कहा है—"क्रतुर्निश्चयोऽध्यवसायः याहङ् निश्चयोऽस्मिँल्लोके पुरुषो भवति, तथेतां मृत्वा भवति"। जीव का निश्चय अपने कर्मों पर निर्भर है और उस निश्चय पर भावी जन्म।
यदि एक ही आत्मा कूटस्थ, नित्य और निरतिशय सभी भूतो में व्याप्त है, तब उसके उपास्य-उपासकादिरूप तारतम्य का प्रतिपादन श्रुतियाँ क्यों करती हैं? इस प्रश्न का उत्तर है—"यद्यप्येक आत्मा सर्वभूतेषु स्थावरजङ्गमेषु गूढः, तथापि चित्तोपाधिविशेषतारतम्या-दात्मनः कूटस्थनित्यस्यैकरूपस्याप्युत्तरोत्तराविकृतस्य तारतम्यम्"। अर्थात् आत्मा का रूप, ऐश्वर्य और ज्ञान एक ही प्रकार का है, तथापि अनादि अविद्यारूप अन्धकार से आवृत्त होकर किसी (स्थावरादि) शरीर में असत्-जैसा (नहीं के बराबर), कहीं अत्यन्त
| २०८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १२ |
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कूटस्थनित्यस्यैकरूपस्याप्युत्तरोत्तरमाविष्कृतस्य तारतम्यमैश्वर्यशक्तिविशेषैः श्रूयते—'तस्य य आत्मानमाविस्तरां वेद' (ऐ० आ० २।३।२।१) इत्यत्र। स्मृतावपि—'यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोऽंशसंभवम्॥' (गी० १०।४१) इति। यत्र यत्र विभूत्याद्यतिशयः स स ईश्वर इत्युपास्यतया चोद्यते। एवमिहाप्यादित्यमण्डले हिरण्मयः पुरुषः सर्वपाप्मोदयलिङ्गात्पर एवेति वक्ष्यति। एवं 'आकाशस्तल्लिङ्गात्' (ब्र० १।१।२२) इत्यादिषु द्रष्टव्यम्। एवं सद्योमुक्तिकारणमध्यात्मज्ञानमुपाधिविशेषद्वारेणोपदिश्यमानमप्यविवक्षितोपाधिसंबन्धविशेषं परापरविषयत्वेन संदिह्यमानं वाक्यगतिपर्यालोचनया निर्णतव्यं भवति। यथैहैव तावद् 'आनन्दमयोऽभ्यासाद्' इति, एवमेकमपि ब्रह्मापेक्षितोपाधिसम्बन्धं निरस्तोपाधिसंबन्धं चोपास्यत्वेन ज्ञेयत्वेन च वेदान्तेषूपदिश्यत इति प्रदर्शयितुं परो ग्रन्थ आरभ्यते। यच्च 'गतिसामान्याद्' इत्यचेतनकारणनिराकरणमुक्तं, तदपि वाक्यान्तराणि ब्रह्मविषयाणि व्याचक्षाणेन ब्रह्मविपरीतकारणनिषेधेन प्रपञ्च्यते—
आनन्दमयोऽभ्यासात् ॥ १२ ॥
तैत्तिरीयकेऽन्नमयं, प्राणमयं, मनोमयं, विज्ञानमयं, चानुक्रम्याम्नायते—'तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयात्। अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः' (तै० २।५) इति। तत्र संशयः—किमिहानन्दमयशब्देन परमेव ब्रह्मोच्यते यत्प्रकृतम् 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तै० २।१) इति, किंवाऽन्नमयादिवद् ब्रह्मणोऽर्थान्तरमिति ? किं तावत्प्राप्तं ? ब्रह्मणोऽर्थान्तरममुख्य
भामती
तथाप्यनाद्यविद्यातमःसमावृतं तेषु तेषु प्राणभृद्भेदेषु क्वचिदसदिव क्वचित्सदिव क्वचिदत्यन्तापकृष्टमिव क्वचित्सत्तु क्वचित् प्रकर्षवत् क्वचिदत्यन्तप्रकर्षवदिव भासते, तत् कस्य हेतोः ? अविद्यातमसः प्रकर्षनिकर्षतारतम्यादिति। यथोत्तमप्रकाशः सविता दिङ्मण्डलमेकरूपेणैव प्रकाशेनापूरयन्नपि वर्षासु निकृष्टप्रकाश इव शरदि तु प्रकृष्टप्रकाश इव प्रथते, तथेदमपीति। अपेक्षितोपाधिसम्बन्धम् उपास्यत्वेन, 'निरस्तोपाधिसम्बन्धं ज्ञेयत्वेन इति।
तत्र तावत्प्रथममेकदेशिमतेनाधिकरणमारचयति। ॐ तैत्तिरीयकेऽन्नमयम् ॐ इत्यादि।
गौणप्रवाहपातेऽपि युज्यते मुख्यमीक्षणम्। मुख्यत्वे तूभयोस्तुल्ये प्रायदृष्टिविशेषिका॥
भामती-व्याख्या
अपकृष्ट, कहीं अपकृष्टतर, कहीं सत्, कहीं प्रकृष्ट और कहीं अत्यन्तोत्कृष्ट प्रतीत होता है। ऐसा किस कारण से हुआ ? इसका उत्तर इतना ही है कि उसकी उपाधिभूत अविद्या के उत्कर्षापकर्षतारतम्य के कारण वैसे ही वह वैसा हो जाता है, जैसे कि भगवान् सूर्य एकविध अपने उत्तमरूप से सभी दिशाओं को पूरित और अवभासित करता है, किन्तु वर्षा काल में उसका प्रकाश मन्द और शरत् काल में प्रखर होता है। भाष्य में "अपेक्षितोपाधिसम्बन्धं" का "उपास्यत्वेन" और "निरस्तोपाधिसम्बन्धं" का "ज्ञेयत्वेन" के साथ अन्वय विवक्षित है। अर्थात् उपास्य और ज्ञेय ब्रह्म का श्रौत उपदेश प्रशस्त करने या ब्रह्म में सद्रूपता और चिद्रूपता सिद्ध करने के अनन्तर आनन्दरूपता सिद्ध करने के लिए अग्रिम सूत्र-सन्दर्भ प्रस्तुत किया जाता है।
एकदेशी के मत से अधिकरण-रचना
संशय— "अन्योऽन्तर आत्मा आनन्दमय" (तै. उ. २।५)। यहाँ 'आनन्दमय' शब्द से ब्रह्म का ग्रहण किया जाय? अथवा अन्य पदार्थ का ? इस संशय के अनुसार पहले एकदेशि-मत के अनुसार अधिकरण की रचना की जा रही है—
आनन्दमयस्य जीवत्वाशङ्काः ] हिन्दीसहितभामतीसंचलितम् २०९
आत्मानन्दमयः स्यात् । कस्मात् ? अन्नमयाद्यमुख्यात्मप्रवाहपतितत्वात् । अथापि स्यात्सर्वान्तरत्वादानन्दमयो मुख्य एवात्मेति, न स्यात्प्रियाद्यवयवयोगाच्छारीरत्वश्र-
भामती
आनन्दमय इति हि विकारे प्राचुर्ये च मयटस्तुल्यं मुख्यार्थत्वमिति विकारार्थान्न मयादिपद-प्रायपाठादानन्दमयपदमपि विकारार्थमेवेति युक्तम् । न च प्राणमयादिषु विकारार्थत्वायोगात् स्वार्थिको मयडिति युक्तम् । प्राणाद्युपाध्यवच्छिन्नो ह्यात्मा भवति प्राणादिविकारो घटाकाशमिव घटविकारः । न च सत्यर्थे स्वार्थिकत्वमुचितम् ,
भामती-व्याख्या
गौणप्रवाहपातेऽपि युज्यते मुख्यमीक्षणम् ।
मुख्यत्वे तूभयोस्तुल्ये प्रायदृष्टिविशेषिका ॥
पूर्व अधिकरण से गौण ईक्षण का ग्रहण किया जाय ? अथवा मुख्य ईक्षण का ? इस प्रकार के संशय का निर्णायक प्राय-पाठ गौण ईक्षण के पक्ष में था, उसकी उपेक्षा करके मुख्य ईक्षण का ग्रहण किया गया। किन्तु इस अधिकरण में 'मयट्' प्रत्यय के दो मुख्यार्थ प्रसिद्ध हैं—
(१) विकार [ "मयड्वैतयोर्भाषायामभक्ष्याच्छादनयोः" (पा. सू. ४।३।१४३) इस सूत्र से विकारार्थक मयट् विहित है ] । (२) प्राचुर्य [ "तत्प्रकृतवचने मयट्" (पा. सू. ५।४।२१) इस सूत्र में प्राचुर्येण प्रस्तुत पदार्थ का 'प्रकृत' शब्द से ग्रहण कर प्राचुर्यार्थक मयट् विहित है ] । इन दोनों मुख्यार्थों में से यहाँ किस अर्थ का ग्रहण किया जाय ? इस संशय का निरास करने के लिए प्राय-पाठ का अनुशासन मानते हुए प्राचुर्य अर्थ का ही ग्रहण किया गया है।
पूर्वपक्ष - 'आनन्दमय' शब्द यद्यपि 'विकार' और 'प्राचुर्य'—इन दोनों अर्थों में विहित है, तथापि “तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमय” (तै. उ. २।२), “तस्माद्वा एतस्मात् प्राणमयादन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः” (तै. उ. २।३ ), “तस्माद्वा एतस्मान्मनोमया-दन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः” (तै. उ. २।४), “तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयादन्योऽन्तर आत्मा आनन्दमयः” (तै. उ. २।५) इन श्रुतियों में अन्नमयकोशादि का जो प्रतिपादन है, वह अन्न का विकार मात्र है, अतः विकारार्थक अन्नमयादि पदों के प्राय में पठित 'विज्ञानमय' पद भी गौण आत्मा का उपस्थापक है, मुख्य आत्मा (ब्रह्म) का नहीं ।
शङ्का—जैसे अन्नमय (स्थूल) शरीर तो अन्न का विकार है, वैसे प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय शरीर अर्थात् सूक्ष्म शरीर प्राणादि का विकार नहीं, अपितु इन तीन कोशों से घटित एक निकाय है, अतः वहाँ 'मयट्' विकारार्थक नहीं माना जा सकता, अतः प्राय-पाठ विघटित हो जाने के कारण 'आनन्दमय' शब्द में 'मयट्' की विकारार्थता का सन्देह नहीं उठाया जा सकता।
समाधान—यह पहले ही कहा जा चुका है कि नित्य निरवच्छिन्न पदार्थ सावच्छिन्न होकर कार्य या विकार माना जाता है, अतः प्राणादि उपाधियों से अवच्छिन्न आत्मा वैसे ही प्राणादि का विकार माना जाता है, जैसे घटावच्छिन्न आकाश घट का विकार, अतः विकारार्थक 'मयट्' का प्राय-पाठ सुरक्षित है, उसके बल पर 'आनन्दमय' भी आनन्द का विकार कहा जा सकता है। यद्यपि 'आनन्द एव आनन्दमय'—इस प्रकार स्वार्थ में मयट् प्रत्यय वैसे ही माना जा सकता है, जैसे 'देव एव देवता'—इत्यादि स्थलों पर 'तल' होता है। तथापि स्वार्थक प्रत्यय एक प्रकार से निरर्थक-सा ही माना जाता है, अतः जहाँ तक कोई विशेष अर्थ सुलभ होता है, वहाँ तक स्वार्थक प्रत्यय नहीं माना जाता, प्रकृत में जब विकारार्थ का लाभ हो रहा है, तब प्रत्यय को स्वार्थपरक नहीं माना जा सकता ।
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२१० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १२
वणाच्च । मुख्यश्चेदात्मानन्दमयः स्यात्, न प्रियादिसंस्पर्शः स्यात् । इह तु ‘तस्य प्रियमेव शिरः’ इत्यादि श्रूयते । शारीरत्वं च श्रूयते—‘तस्यैष एव शारीर आत्मा, यः पूर्वस्य’ इति । तस्य पूर्वस्य विज्ञानमयस्यैष एव शारीर आत्मा य एष आनन्दमय इत्यर्थः । न च सशरीरस्य सतः प्रियाप्रियसंस्पर्शो वारयितुं शक्यः । तस्मात्संसार्येवानन्दमय आत्मेत्येवं प्राप्ते इदमुच्यते—
भामती
चतुष्कोशान्तरत्वेन न सर्वान्तरतोचिता ।
प्रियादिभागी शारीरो जीवो न ब्रह्म युज्यते ॥
न च सर्वान्तरतया ब्रह्मैवानन्दमयं न जीव इति साम्प्रतम् , नहीयं श्रुतिरानन्दमयस्य सर्वान्तरतां ब्रूतेऽपि त्वन्नमयादिकोशचतुष्टयान्तरतामानन्दमयकोशस्य । न चास्मादन्यस्यान्तरस्याश्रवणादयमेव सर्वान्तर इति युक्तम् , यदपेक्षं यस्यान्तरत्वं श्रुतं तत्तस्मादेवान्तरं भवति । न हि देवदत्तो बलवानित्युक्ते सर्वान् सिंहशार्दूलादीनपि प्रति बलवान् प्रतीयतेऽपि तु समानजातीयान्तरमपेक्ष्य । एवमानन्दमयोऽप्यन्नमयादिभ्योऽन्तरो न तु सर्वस्मात् । न च निष्कलस्य ब्रह्मणः प्रियाद्यवयवयोगः, नापि शारीरत्वं युज्यत इति संसार्येवानन्दमयः । तस्मादुपहितमेवात्रोपास्यत्वेन विवक्षितं, न तु ब्रह्मरूपं ज्ञेयत्वेनेति पूर्वः पक्षः । अपि च यदि प्राचुर्यार्थोऽपि मयट् , तथापि संसार्येवानन्दमयः, न तु ब्रह्म, आनन्दप्राचुर्यं हि तद्विपरीतदुःखलवसम्भवे भवति, न तु तदत्यन्तासम्भवे । न च परमात्मनो मनागपि दुःखलवसम्भवः, आनन्दैकरसत्वादित्याह ॐ न च सशरीरस्य सतः इति ॐ । अशरीरस्य पुनरप्रियसम्बन्धो मनागपि नास्तीति
भामती-व्याख्या
शङ्का—अन्नमयादि चार कोशों की प्रस्तुति के अनन्तर श्रुति उन चारों के अन्तर ( मध्य ) में व्याप्त पदार्थ को 'आनन्दमय' कह रही है, चार कोशों की अन्तर-व्याप्ति सर्वान्तरत्व का उपलक्षक है, सर्वान्तर एकमात्र ब्रह्म है, अतः इस सर्वान्तरता के निर्देश से प्राय-पाठ का बाध हो जाता है।
समाधान—यहाँ सर्वान्तरता का उल्लेख नहीं और न चतुष्कोशान्तरता मात्र के उल्लेख से सर्वान्तरता का उन्नयन ही हो सकता है—
चतुष्कोशान्तरत्वेन न सर्वान्तरतोचिता ।
प्रियादिभागी शारीरो जीवो न ब्रह्म युज्यते ॥
'सर्वान्तर ब्रह्म ही है, अतः सर्वान्तरता के संकीर्तन से ब्रह्म की ही अवगति होती है, जीव की नहीं'—ऐसी शङ्का यहाँ नहीं की जा सकती, क्योंकि यहाँ केवल अन्नमयादि चार कोशों के अन्तर ही आनन्दमय बताया गया है, सर्वान्तर नहीं। आनन्दमय के अन्तर किसी अन्य का निर्देश न होने के कारण भी आनन्दमय को सर्वान्तर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जिसकी अपेक्षा से जो पदार्थ अन्तर कहा जाता है, उसी की अन्तरता अवगत होती है, जैसे यज्ञदत्ताद् देवदत्तो बलवान्—ऐसा कहने से देवदत्त में सभी सिंह, शार्दूल ( तेन्दुआ ) आदि से बलवत्ता का लाभ नहीं होता, अपितु यज्ञदत्तादि अपने सजातीय व्यक्तियों की अपेक्षा ही बलवत्ता अधिगत होती है। उसी प्रकार आनन्दमय में अन्नमयादि चार की ही अभ्यन्तरता प्राप्त होती है, सर्वान्तरता नहीं, प्रत्यूत उसके भी अन्तर कोई अन्य हो सकता है।
‘तस्य प्रियमेव शिरः, मोदो दक्षिणः पक्षः, प्रमोद उत्तरः पक्षः, आनन्द आत्मा, ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा’ ( तै. उ. २।५ ) इस वाक्य के द्वारा प्रियादि पदार्थों को आनन्दमय का अवयव कहा गया है, निरवयव ब्रह्म के अवयव सम्भव नहीं। परिशेषतः 'आनन्दमय' शब्द के द्वारा संसारी आत्मा का ही उपास्यत्वेन निर्देश मानना उचित है, ब्रह्मस्वरूप का प्रतिपादन कथमपि सम्भावित नहीं।
आनन्दमयस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २११
आनन्दमयोऽभ्यासात् ॥ १२ ॥
पर एवात्माऽऽनन्दमयो भवितुमर्हति । कुतः ? अभ्यासात् । परस्मिन्नेव ह्यात्मन्यानन्दशब्दो बहुकृत्वोऽभ्यस्यते । आनन्दमयं प्रस्तुत्य ‘रसो वै सः’ ( तै० २।६ ) इति तस्यैव रसत्वमुक्त्वोच्यते—‘रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दीभवति’ इति, ‘को ह्येवान्यात्कः प्राण्यात्, यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् । एष ह्येवानन्दयति’ ( तै० २।७ ) ‘सैषानन्दस्य मीमांसा भवति’, ‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति’, ‘आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कुतश्चन’ ( तैत्ति० २।८,९) इति । ‘आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्’ (तैत्ति० ३।६ ) इति च । श्रुत्यन्तरे च ‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ ( बृ० ३।९।२८ ) इति ब्रह्मण्येवानन्दशब्दो दृष्टः । एवमानन्दशब्दस्य बहुकृत्वो ब्रह्मण्याभ्यासादानन्दमय आत्मा ब्रह्मेति गम्यते । यत्तूक्तमन्नमयाद्यमुख्यात्मप्रवाहपतितत्वादानन्दमयस्याप्यमुख्यत्वमिति, नासौ दोषः,
भामती
प्राचुर्यार्थोऽपि मयड् नोपपद्यत इत्यर्थः । उच्यते—आनन्दमयावयवस्य तावद् ब्रह्मणः पुच्छस्याङ्गतया न प्राधान्यम्, अपित्वङ्गिन आनन्दमयस्यैव ब्रह्मणः प्राधान्यम् । तथा च तदधिकारे पठितमभ्यस्यमानमानन्दपदं तद्बुद्धिमाबध्नात् तस्यैवानन्दमयस्याभ्यास इति युक्तम् । ज्योतिष्टोमाधिकारे वसन्ते वसन्ते ज्योतिषेति ज्योतिष्पदमिव ज्योतिष्टोमाभ्यासः कालविशेषविधिपरः । अपि च साक्षादानन्दमयात्माभ्यासः श्रूयते ॐ एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति इति ॐ । पूर्वपक्षबीजमनुभाष्य दूषयति ॐ यत्तूक्तमन्नमयादि
भामती-व्याख्या
यदि 'मयट्' को प्राचुर्यार्थक भी मान लिया जाय, तब भी संसारी ( जीव ) आत्मा ही आनन्दमय ठहरता है, ब्रह्म नहीं, क्योंकि आनन्द की प्रचुरता वहीं ही मानी जायगी, जहाँ न्यून मात्रा में दुःख भी विद्यमान हो, दुःख का अत्यन्ताभाव नहीं । ब्रह्म में तो दुःख का लेशमात्र भी नहीं होता, क्योंकि वह आनन्दैकरस है, जीव वैसा नहीं—"न च सशरीरस्य सतः प्रियाप्रियसंसर्शी वारयितुं शक्यः" । अतः ब्रह्म को आनन्दप्रचुर नहीं कहा जा सकता, अतः प्राचुर्यार्थक 'मयट्' मान कर भी अभीष्ट-सिद्धि नहीं होती ।
सिद्धान्त —[ 'यद्यपि आनन्दमयो ब्रह्म, अभ्यस्यमानत्वात्'—इस सिद्धान्त्यभिमत अनुमान में स्वरूपासिद्धि प्रतीत होती है, क्योंकि "एष ह्येवानन्दयति" ( तै. उ. २।७ ), 'सैषा आनन्दस्य मीमांसा भवति" ( तै. उ. २।८ ), "आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन" ( तै. उ. २।९ ) इत्यादि वाक्यों में 'आनन्द' अभ्यस्यमान ( पुनः पुनः चर्चित ) है, 'आनन्दमय' नहीं, 'आनन्दमय' शब्द का 'आनन्द' शब्द एक भाग ( अवयव ) है, अत एव आनन्दरूप ब्रह्म को आनन्दमय की पुच्छ ( अवयव ) कहा गया है—"तस्य ( आनन्दमयस्य ) प्रियमेव शिरः, मोदो दक्षिणः पक्षः, प्रमोद उत्तरः पक्षः, आनन्द आत्मा, ब्रह्म पुच्छम्" ( तै. उ. २।५ )। तथापि ] 'आनन्दमय' पदार्थ ही मुख्य, अङ्गी एवं प्रकरणी है, अत एव भाष्यकार ने कहा है—"आनन्दमयं प्रस्तुत्य" । 'आनन्दमय' पदार्थ का निर्देश 'आनन्द' पद के द्वारा ही किया गया है । 'ज्योतिष्टोम' याग के प्रकरण में पठित "वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेत" ( तुलना आप. श्रौ. सू. १०।२।१५ ) इस वाक्य के द्वारा ज्योतिष्टोम का अभ्यास वसन्तरूप काल का विधान करने के लिए किया गया है, जैसा कि शबरस्वामी कहते हैं—'यजेत स्वर्गकामो वसन्ते-वसन्ते' इति फलगुणसम्बन्धार्थः" ( शाबर. २।२।१७ ) । जैसे वेद में ज्योतिष्टोम के लिए 'ज्योतिः' शब्द का और लोक-व्यवहार में सत्यभामा के लिए 'भामा' शब्द का प्रयोग देखा जाता है, वैसे ही प्रकृत में आनन्दमय के लिए 'आनन्द' शब्द का प्रयोग हो गया है, फलतः कथित अनुमान में अभ्यस्यमानत्व हेतु स्वरूपासिद्ध नहीं । केवल 'आनन्द' पद के द्वारा ही
२१२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १३
आनन्दमयस्य सर्वान्तरत्वात् । मुख्यमेव ह्यात्मानमुपदिदिक्षु शास्त्रं लोकबुद्धिमनुसरत्, अन्नमयं शरीरमनात्मानमत्यन्तमूढानामात्मत्वेन प्रसिद्धमनूद्य मूषानिषिक्तद्रुतताम्रादिप्रतिमावत्ततोऽन्तरं ततोऽन्तरमित्येवं पूर्वेण पूर्वेण समानमुत्तरमुत्तरमनात्मानमात्मेति ग्राहयत्, प्रतिपत्तिसौकर्यापेक्षया सर्वान्तरं मुख्यमानन्दमयमात्मानमुपदिदेशेति श्लिष्टतरम् । यथारुन्धतीनिदर्शने बह्वीष्वपि तारास्वमुख्यास्वरुन्धतीषु दर्शितासु याऽन्त्या प्रदर्श्यते सा मुख्यैवारुन्धती भवति, एवमिहाप्यानन्दमयस्य सर्वान्तरत्वान्मुख्यमात्मत्वम् । यत्तु ब्रूषे—प्रियादीनां शिरस्त्वादिकल्पनाऽनुपपन्ना मुख्यस्यात्मन इति, अतीतानन्तरोपाधिजनिता सा, न स्वाभाविकीत्यदोषः । शारीरत्वमप्यानन्दमयस्यान्नमयादिशरीरपरम्परया प्रदर्श्यमानत्वात्, न पुनः साक्षादेव शारीरत्वं संसारिवत्, तस्मादानन्दमयः पर एवात्मा ॥ १२ ॥
विकारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात् ॥ १३ ॥
**अत्राह—**नानन्दमयः पर आत्मा भवितुमर्हति । कस्मात् ? विकारशब्दात् । प्रकृतिवचनादयमन्नमयः शब्दो विकारवचनः समधिगतः, आनन्दमय इति मयटो विका-
भामती
इति ॐ । न हि मुख्यारुन्धतीदर्शनं तत्तदमुख्यारुन्धतीदर्शनप्रायपठितमप्यमुख्यारुन्धतीदर्शनं भवति । तादर्थ्यात्पूर्वदर्शनानामन्त्यदर्शनानुगुण्यं न तु तद्विरोधितेति चेद्, इहाप्यानन्दमयादान्तरस्यान्यस्याश्रवणात् । तस्य त्वन्नमयादिसर्वान्तरत्वश्रुतेस्तत्पर्यवसानात्तादर्थ्यं तुल्यम् । प्रियाद्यवयवयोगशारीरत्वे च निगदव्याख्यातेन भाष्येण समाहिते । प्रियाद्यवयवयोगवद् दुःखलवयोगोऽपि परमात्मन औपाधिक उपपादितः । तथाऽऽनन्दमय इति प्राचुर्यार्थता मयट उपपादितेति ॥ १२-१४ ॥
भामती-व्याख्या
आनन्दमय का अभ्यास प्रस्तुत नहीं किया गया, अपितु साक्षात् 'आनन्दमय' पद के माध्यम से भी आनन्दमय का अभ्यास उपलब्ध होता है—"एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति" ( तै. उ. २।८ ) ।
पूर्वपक्ष की युक्तियों का अनुवाद करके खण्डन किया जाता है—'यत्तूक्तमन्नमयाद्यमुख्यात्मप्रवाहपतितत्वादानन्दमयस्यामुख्यत्वम्, नासौ दोषः, आनन्दमयस्य सर्वान्तरत्वात्'। जैसे मुख्य अरुन्धती तारे का दर्शन कहीं अमुख्य अरुन्धती-दर्शन के प्राय में पठित अमुख्य अरुन्धती का दर्शन नहीं होता, वैसे ही मुख्य आनन्दमय अन्नमयादि अमुख्यात्म-प्रवाह में पड़ कर भी अमुख्य नहीं हो सकता । 'पूर्व-पूर्व दर्शन जब उत्तरोत्तर दर्शन की उपपत्ति के लिए है, तब अन्तिम दर्शन पूर्व दर्शनों से विपरीत क्यों ?' इस शङ्का का समाधान यह है कि आनन्दमय के अभ्यन्तर अन्य किसी पदार्थ का निर्देश न होने के कारण अन्नमयादि कोशों एवं समस्त प्रपञ्च की अभ्यन्तरता आनन्दमय में सिद्ध हो जाती है, सर्वान्तर एक मात्र ब्रह्म है। उसकी अवगति के साधनभूत अन्नमयादि कोशों की समानता कदापि सम्भव नहीं । प्रियादि अवयवों के निर्देश से जो शारीर आत्मा का पूर्व पक्ष उठाया गया था, उसका निरास भी भाष्यकार ने कर दिया है—"यत्तु ब्रूषे प्रियादीनां शिरस्त्वादिकल्पनाऽनुपपन्ना मुख्यस्यात्मन इति, अतीतानन्तरोपाधिजनिता सा, न स्वाभाविकीत्यदोषः।" आनन्दमय में सावयवत्व और शारीरत्व का व्यवहार जो देखा जाता है, वह स्वाभाविक नहीं, अपितु अन्नमय शरीरादि अतीत उपाधियों एवं जीव से अनन्तरता ( अनौपाधिक एकता ) को लेकर हो जाता है, अतः आनन्दमय की ब्रह्मरूपता में किसी प्रकार का दोष नहीं रह जाता ।
'मयट्' प्रत्यय विकारार्थक नहीं, अपितु प्रचुरार्थक है, क्योंकि "तत्प्रकृतवचने मयट्"
आनन्दमयस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २१३
रार्थत्वात् । तस्मादन्नमयादिशब्दवद्विकारविषय एवानन्दमयशब्द इति चेत्, न, प्राचुर्यार्थेऽपि मयटः स्मरणात् । 'तत्प्रकृतवचने मयट्' (पा० ५।४।२१) इति हि प्रचुरतायामपि मयट् स्मर्यते । यथा 'अन्नमयो यज्ञः' इत्यन्नप्रचुर उच्यते, एवमानन्दप्रचुरं ब्रह्मानन्दमय उच्यते । आनन्दप्रचुरत्वं च ब्रह्मणो मनुष्यत्वादारभ्योत्तरस्मिन्नुत्तरस्मिन्स्थाने शतगुण आनन्द इत्युक्त्वा ब्रह्मानन्दस्य निरतिशयत्वावधारणात् । तस्मात्प्राचुर्यार्थे मयट् ॥ १३ ॥
तद्धेतुव्यपदेशाच्च ॥ १४ ॥
इतश्च प्राचुर्यार्थे मयट्, यस्मादानन्दहेतुत्वं ब्रह्मणो व्यपदिशति श्रुतिः—'एष ह्येवानन्दयाति' इति । आनन्दयतीत्यर्थः । यो ह्यन्यानानन्दयति स प्रचुरानन्द इति प्रसिद्धं भवति । यथा लोके योऽन्येषां धनिकत्वमापादयति स प्रचुरधन इति गम्यते, तद्वत् । तस्मात्प्राचुर्यार्थेऽपि मयटः संभवादानन्दमयः पर एवात्मा ॥ १४ ॥
मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते ॥ १५ ॥
इतश्चानन्दमयः पर एवात्मा । यस्मात् 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' इत्युपक्रम्य 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' (तै० २।१) इत्यस्मिन्मन्त्रे यत्प्रकृतं ब्रह्म सत्यज्ञानानन्तविशेषणैर्निर्धारितम्, यस्मादाकाशादिक्रमेण स्थावरजङ्गमानि भूतान्यजायन्त, यच्च भूतानि सृष्ट्वा तान्यनुप्रविश्य गुहायामवस्थितं सर्वान्तरं, यस्य विज्ञानाय 'अन्योऽन्तर आत्माऽन्योऽन्तर आत्मा' इति प्रक्रान्तं, तन्मान्त्रवर्णिकमेव ब्रह्मेह गीयते 'अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः' (तै० २।५) इति । मन्त्रब्राह्मणयोश्चैकार्थत्वं युक्तम्, अविरोधात् ।
भामती अपि च मन्त्रब्राह्मणयोरुपेष्योपायभूतयोः सम्प्रतिपत्तेर्ब्रह्मैवानन्दमयपदार्थः, मन्त्रे हि पुनःपुनरन्योऽन्तर आत्मेति पर ब्रह्मण्यान्तरत्वश्रवणात्तस्यैव चान्योऽन्तर आत्माऽऽनन्दमय इति ब्राह्मणे प्रत्यभिज्ञानात्
भामती-व्याख्या
(पा. सू. ५।४।२१) इस सूत्र के द्वारा प्राचुर्यार्थ में भी मयट् विहित है, जैसे 'अन्नमयो यज्ञः"—ऐसा व्यवहार उसी यज्ञ के लिए होता है, जिसमें अन्न की प्रचुरता होती है। उसी प्रकार मनुष्यादि के आनन्द से उत्तरोत्तर शतगुण आनन्द बढ़ता-बढ़ता ब्रह्मानन्द में पूर्ण हो जाता है।
'मयट्' की प्रचुरार्थता श्रुति के उस व्यपदेश से भी सिद्ध होती है, जिसमें ब्रह्म को आनन्द का हेतु कहा गया है—"एष ह्येवानन्दयाति" (तै. उ. २।७)। जो पदार्थ अपने योग से औरों को भी मधुर बनाता है, वह स्वयं माधुर्यमय होता है, जो दूसरों को धनी बनाता है, वह 'प्रचुरधनः' कहा जाता है, उसी प्रकार जो दुःखमय प्रपञ्च को भी अपने सम्बन्ध से आनन्दित करता है, वह आनन्दप्रचुर या आनन्दमय क्यों न होगा ? ॥ १२-१४ ॥
[ 'मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते'—इस सूत्र की व्याख्या में भाष्यकार ने 'मन्त्र' पद से "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तै. उ. २।१) इस वाक्य का ग्रहण करके कहा है कि इस मन्त्र के द्वारा प्रतिपादित सच्चिदानन्दरूप ब्रह्म की ही प्रत्यभिज्ञा "अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः" (तै. उ. २।५) इस ब्राह्मण वाक्य में हो रही है, अतः आनन्दमय और सच्चिदानन्द ब्रह्म की एकता निश्चित है, क्योंकि मन्त्र और ब्राह्मण की एकार्थपरता होती है—"मन्त्रब्राह्मणयोश्चैकार्थत्वं युक्तम्" । 'मन्त्र' का लक्षण है—"तच्चोदकेषु मन्त्राख्या" (जै. सू. २।१।३२) और उससे भिन्न वाक्यों को ब्राह्मण कहा जाता है—"शेषे ब्राह्मणशब्दः" (जै. सू. २।१।३३) । इन लक्षणों के अनुसार "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म"—इस वाक्य को 'मन्त्र' कहना दुष्कर है, क्योंकि अनुष्ठानोपयोगी पदार्थों के प्रतिपादक या स्मारक वाक्यों को ही याज्ञिकगण मन्त्र
| २१४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १६ |
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अन्यथा हि प्रकृतहानाप्रकृतप्रक्रिये स्याताम् । न चान्नमयादिभ्य इवानन्दमयादन्योऽन्तर आत्माऽभिधीयते । एतन्निष्ठैव च 'सैषा भार्गवी वारुणी विद्या' ( तै० २।६ ) तस्मादानन्दमयः पर एवात्मा ॥ १५ ॥
नेतरोऽनुपपत्तेः ॥ १६ ॥
इतश्चानन्दमयः पर एवात्मा । नेतरः । इतर ईश्वरादन्यः संसारी जीव इत्यर्थः । न जीव आनन्दमयशब्देनाभिधीयते । कस्मात् ? अनुपपत्तेः । आनन्दमयं हि प्रकृत्य श्रूयते—'सोऽकामयत । बहु स्यां प्रजायेयेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा । इदं सर्वमसृजत , यदिदं किंच' ( तै० २।६ ) इति । तत्र प्राक्शरीराद्युत्पत्तेरभिध्यानं, सृज्यमानानां च विकाराणां स्रष्टुरव्यतिरेकः, सर्वविकारसृष्टिश्च न परस्मादात्मनोऽन्यत्रोपपद्यते ॥ १६ ॥
भामती
परब्रह्मैवानन्दमयमित्याह सूत्रकारः ॐ मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते ॐ । मान्त्रवर्णिकमेव परं ब्रह्म ब्राह्मणेऽप्यानन्दमय इति गीयते इति ॥ १५ ॥
अपि चानन्दमयं प्रकृत्य शरीराद्युत्पत्तेः प्राक् स्रष्टृत्वश्रवणाद् बहु स्यामिति च सृज्यमानानां स्रष्टुरानन्दमयादभेदश्रवणादानन्दमयः पर एवेत्याह सूत्रम् ॐ नेतरोऽनुपपत्तेः ॐ । नेतरो जीव आनन्दमयः, तस्यानुपपत्तेरिति ॥ १६ ॥
भामती-व्याख्या
कहा करते हैं, “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”—यह वाक्य तो ऐसे ब्रह्म का प्रतिपादक है, जो धर्मानुष्ठानादि का उपयोगी नहीं, प्रत्युत विरोधी माना गया है। फलतः “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”—इस वाक्य को गौणरूप से ही 'मन्त्र' कहना होगा। जब सूत्र-घटक 'मन्त्रवर्ण' पद औपचारिक या गौणार्थक है, तब अन्नमयादि चार कोशों के प्रतिपादक वाक्य-समूह का 'मन्त्रवर्ण' पद से ग्रहण करना ही उचिततर है और “अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः”—इस वाक्य को तो ब्राह्मण वाक्य कहा ही गया है। इन दोनों में परस्पर उपायोपेयभाव और एकार्थपरत्व निश्चित है, जैसे ब्राह्मण वाक्य मन्त्रार्थ का निर्णायक या उपाय होता है, वैसे ही 'कोश-वाक्य' भी 'आनन्दमय-वाक्य' की अर्थावगति में उपकारक है, दोनों की प्रतिपाद्य वस्तु में प्रत्यभिज्ञा भी स्पष्ट है—इस आशय को लेकर श्री वाचस्पति मिश्र कहते हैं—] मन्त्र-वाक्य उपेय ( निर्णय ) और ब्राह्मण वाक्य उपाय ( निर्णायक होता है। प्रकृत में दोनों वाक्यों की एकार्थ-प्रतिपत्ति को ध्यान में रखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि आनन्दमय ब्रह्म ही है, क्योंकि 'तस्माद्वा एतस्मादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः' इत्यादि चारों वाक्य-खण्डरूपी मन्त्र में प्रयुक्त 'अन्य' और 'अन्तर' पद परब्रह्म के ही समर्पक हैं, उसी ब्रह्म की 'अन्योऽन्तर आत्मानन्दमयः'—इस ब्राह्मण में प्रत्यभिज्ञा हो रही है, अतः 'आनन्दमय' शब्द से परब्रह्म का ही ग्रहण करना चाहिए, ऐसा सूत्रकार का कहना है—“मन्त्रवर्णिकमेव च गीयते” अर्थात् मान्त्रवर्णिक परब्रह्म ही उक्त ब्राह्मण वाक्य में 'आनन्दमय' पद के द्वारा अभिहित होता है। [ मिश्रजी के मन्त्र भाग में ब्राह्मण की सन्निधि और सन्निधि-प्रयुक्त प्रत्यभिज्ञा का जैसा सामञ्जस्य है, वैसा सच्चिदानन्दात्मक ब्रह्म का उद्बोधकत्व स्पष्ट नहीं, जैसा कि भाष्यकार का मन्त्रवर्ण है ] ॥ १५ ॥
'आनन्दमय' का प्रकरण आरम्भ करके जीव के शरीरादि की उत्पत्ति से पहले ही कामना, ईक्षण और स्रष्टृत्व का प्रतिपादन किया गया है—'सोऽकामयत, बहु स्याम् प्रजायेय, स तपोऽतप्यत, स तपस्तप्त्वा इदं सर्वमसृजत” (तै. उ. २।६)। सृष्टि के रचयिता का आनन्द-
आनन्दमयस्थ ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २१५
भेदव्यपदेशाच्च ॥ १७ ॥
इतश्च नानन्दमयः संसारी। यस्मादानन्दमयाधिकारे—'रसो वै सः। रसं ह्ये- वायं लब्ध्वानन्दीभवति' ( तै० २।७ ) इति जीवानन्दमयौ भेदेन व्यपदिशति। नहि लब्धैव लब्धव्यो भवति। कथं तर्हि 'आत्माऽन्वेष्टव्यः', 'आत्मलाभान्न परं विद्यते' इति श्रुतिस्मृती ? यावता न लब्धैव लब्धव्यो भवतीत्युक्तम्। बाढम्, तथाप्यात्मनो- ऽप्रच्युतात्मभावस्यैव सतस्तत्त्वानवबोधनिमित्तो मिथ्यैव देहादिष्वनात्मस्वात्मत्व- निश्चयो लौकिको दृष्टः। तेन देहादिभूतस्यात्मनोऽप्यात्माऽनन्विष्टोऽन्वेष्टव्योऽलब्धो लब्धव्योऽश्रुतः श्रोतव्योऽमतो मन्तव्योऽविज्ञातो विज्ञातव्य इत्यादिभेदव्यपदेश उपपद्यते। प्रतिषिध्यत एव तु परमार्थतः सर्वज्ञात्परमेश्वरादन्यो द्रष्टा श्रोता वा
भामती
ॐ भेदव्यपदेशाच्च ॐ । रसः सारो ह्ययमानन्दमय आत्मा रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दीभवतीति । सोऽयं जीवात्मनो लब्धृभाव आनन्दमयस्य च लभ्यता नाभेद उपपद्यते । तस्मादानन्दमयस्य जीवात्मनो भेदे परब्रह्मत्वं सिद्धं भवति । चोदयति ॐ कथं तर्हि इति ॐ । यदि लब्धा न लब्धव्यः, कथं तर्हि परमात्मनो वस्तुतोऽभिन्नेन जीवात्मना परमात्मा लभ्यत इत्यर्थः । परिहरति ॐ बाढं तथापि इति ॐ । सत्यं परमार्थतोऽभेदेऽप्यविद्यारोपितं भेदमपाश्रित्य लब्धृलब्धव्यभाव उपपद्यते । जीवो ह्यविद्यया परब्रह्मणो भिन्नो दर्शितः, न तु जीवादपि । तथा चानन्दमयश्चेज्जीवो न जीवस्याविद्ययापि स्वतो भेदो दर्शित इति न च लब्धृलब्धव्यभाव इत्यर्थः । भेदाभेदौ च न जीवपरब्रह्मणोरित्युक्तमधस्तात् । स्यादेतत् — यथा परमेश्वरादभिन्नो जीवात्मा द्रष्टा न भवत्येवं जीवात्मनोऽपि द्रष्टुर्न भिन्नः परमेश्वर इति जीवस्या-
भामती-व्याख्या
मयात्मा से अभेद-प्रतिपादन यह सिद्ध करता है कि "नेतरोऽनुपपत्तेः"। इतर अर्थात् ब्रह्म से भिन्न जीव को आनन्दमय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि शरीरादि की उत्पत्ति से पहले उसमें अभिध्यान और सृष्टि-कर्तृत्व की उपपत्ति नहीं हो सकती ॥ १६ ॥
आनन्दमय को अभिलक्ष्य करके कहा गया है—"रसो वै सः, रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी- भवति" ( तै. उ. २।७ ) अर्थात् आनन्दमयात्मा वह आनन्दरस है, जिसको प्राप्त करके यह ( जीव ) आनन्दित हो जाता है। जीवात्मा जब उस आनन्दमय का लब्धा ( प्रापक ) और आनन्दमय लब्धव्य है, इस प्रकार जीव और आनन्दमय का भेद-प्रतिपादन यह सिद्ध करता है कि आनन्दमय जीव नहीं।
शङ्का—यदि लब्धा लब्धव्य नहीं होता, तब श्रुति और स्मृति में जीव के लिए अभिन्न- स्वरूप परमात्मा को अन्वेष्टव्य ( गवेषणीय ) क्यों कहा है ?
समाधान -- यद्यपि जीवात्मा और परमात्मा का वस्तुतः अभेद है, तथापि अविद्या के द्वारा आपादित भेद को लेकर लब्धृत्व और लब्धव्यत्व की उपपत्ति हो जाती है अर्थात् देहादि-तादात्म्यापन्न आत्मा प्रापक और सर्वोपाधि-रहित आत्मा लब्धव्य हो जाता है। आशय यह है कि अविद्या के द्वारा जीव को ब्रह्म से ही भिन्न दर्शाया गया है, जीव से जीव को भिन्न नहीं कहा गया है, यदि आनन्दमय को जीव कहा जाता है, तब जीव की अविद्या के द्वारा वह स्वयं अपने से भिन्न क्योंकर सिद्ध होगा? भेद के विना जीव में लब्धृत्व और आनन्दमय में लब्धव्यत्व नहीं बन सकता। जीव और ब्रह्म का भेदाभेद पहले ही खण्डित हो चुका है।
शङ्का —जैसे परमात्मा से भिन्न जीवात्मा द्रष्टा नहीं होता, वैसे ही जीवात्मारूप द्रष्टा से परमेश्वर भिन्न नहीं, अतः जीव यदि अनिर्वाच्य है, तब परमेश्वर भी अनिर्वाच्य ही हो
२१६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १९
'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा' (बृ० ३।७।२३) इत्यादिना । परमेश्वरस्त्वविद्याकल्पिताच्छा- रीरात्कर्तुर्भोक्तुर्विज्ञानात्माख्यादन्यः । यथा मायाविनश्चर्मखङ्गधरात्सूत्रेणाकाशमधिरो- हतः स एव मायावी परमार्थरूपो भूमिष्ठोऽन्यः । यथा वा घटाकाशादुपाधिपरिच्छि- न्नादनुपाधिरपरिच्छिन्न आकाशोऽन्यः । ईदृशं च विज्ञानात्मपरमात्मभेदमाश्रित्य 'नेतरोऽनुपपत्तेः', 'भेदव्यपदेशाच्च' इत्युक्तम् ॥ १७ ॥
कामाच्च नानुमानापेक्षा ॥ १८ ॥
आनन्दमयाधिकारे च 'सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय' (तै० २।६) इति काम- यितृत्वनिर्देशान्नानुमानिकमपि सांख्यपरिकल्पितमचेतनं प्रधानमानन्दमयत्वेन कारण- त्वेन वाऽपेक्षितव्यम् । 'ईक्षतेर्नाशब्दम्' (ब्र० सू० १।१।५) इति निराकृतमपि प्रधानं पूर्व- सूत्रोदाहृतां कामयितृत्वश्रुतिमाश्रित्य प्रसङ्गात्पुनर्निराक्रियते गतिसामान्यप्रपञ्च- नाय ॥ १८ ॥
अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ॥ १९ ॥
इतश्च न प्रधाने जीवे वानन्दमयशब्दः । यस्मादस्मिन्नानन्दमये प्रकृत आत्मनि प्रतिबुद्धस्याऽस्य जीवस्य तद्योगं शास्ति । तदात्मना योगस्तद्योगः, तद्भावापत्तिः ।
भामती
निर्वाच्यत्वे परमेश्वरोऽप्यनिर्वाच्यः स्यात् तथा च न वस्तु सन्नियत आह ॐ परमेश्वरस्त्वविद्याकल्पि- ताद् इति ॐ । रजतं हि समारोपितं न शुक्तितो भिद्यते । नहि तद्भेद्रेनाभेदेन वा शक्यं निर्वक्तुं, शुक्तिस्तु परमार्थसती निर्वचनीयानिवर्चनीयाद्रजताद्विविक्त एव । अत्रैव सरूपमात्रं दृष्टान्तमाह ॐ यथा मायाविन इति ॐ । एतदपरितोषेणात्यन्तरूपं दृष्टान्तमाह ॐ यथा वा घटाकाशाद् इति ॐ । शेषमति- रोहितार्थम् ॥ १७-१९ ॥
भामती-व्याख्या
जायगा । अनिर्वाच्य होने पर परमार्थसत् क्योंकर रह सकेगा ?
समाधान — उक्त शङ्का का समाधान करते हुए भाष्यकार ने कहा है— "परमेश्वरस्तु अविद्याकल्पितात् शारीरात् कर्तुर्भोंक्तुर्विज्ञानात्माख्यादन्यः" । जैसे शुक्ति में समारोपित रजत की सत्ता शुक्ति की सत्ता से भिन्न नहीं, किन्तु शुक्ति की सत्ता रजत की सत्ता से भिन्न होती है, वैसे ही जीवरूप अध्यस्त पदार्थ अपने अधिष्ठानभूत परमेश्वर से भिन्न नहीं, किन्तु परमेश्वर अपने में अध्यस्त जीव से भिन्न पारमार्थिक है । इसके अनुरूप दृष्टांत प्रस्तुत किया जाता हैं—"यथा माया- विनः चर्मखङ्गधरात् सूत्रेणाकाशमधिरोहतः स एव मायावी परमार्थरूपो भूमिष्ठोऽन्यः" । जैसे एक ही ऐन्द्रजालिक अपने वास्तविक रूप में भूमि पर खड़ा है और काल्पनिकरूप के द्वारा आकाश में लटक रहे एक सूत पर चढ़ रहा है । वहाँ उसके काल्पनिक रूप से उसका भूमि पर अवस्थित वास्तविक रूप भिन्न होता है, वैसे ही जीव से ब्रह्म भिन्न होता है । अन्य अनुरूप दृष्टान्त दिखाया जाता है— "यथा वा घटाकाशाद् उपाधिपरिच्छिन्नाद् अनुपाधिरपरि- च्छिन्न आकाशोऽन्यः" । जैसे घटादि उपाधियों से परिच्छिन्न आकाश की अपेक्षा अनवच्छिन्न आकाश भिन्न होता है, वैसे ही जीवरूप अवच्छिन्न चेतन की अपेक्षा ब्रह्मरूप अनवच्छिन्न चेतन भिन्न होता है । शेष भाष्य अत्यन्त सुबोध है । ["कामाच्च नानुमानापेक्षा"—इस सूत्र के द्वारा "सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय" (तै. उ. २।६) इस श्रुति में निर्दिष्ट कामयितृत्वा- नुपपत्ति दिखाकर प्रधान तत्त्व की आनन्दमयता का खण्डन किया गया । "अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति"—यह सूत्र कहता है कि मोक्षावस्था में जीव आनन्दमय तत्त्व से तादात्म्य स्थापित कर लेता है, अतः तादात्म्य के अनुयोगी का अपने प्रतियोगी से भिन्न होना स्वाभा-