बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
४६ नारदीयपुराणम् वृक्षहीनं यथारण्यं जलहीना यथा नदी । वेगहीनो यथा वाजी तथा पित्रा विनाऽर्भकः ॥२४॥ यथा लघुत्तरो लोके मातर्याच्ञापरो नरः । तथा पित्रा विहीनस्तु बहुदुःखान्वितः सुतः ॥२५॥ इतीरितं सुतेनैषा श्रुत्वा निःश्वस्य दुःखिता । संपृष्टं तद्यथावृत्तं सर्वं तस्मै न्यवेदयत् ॥२६॥ तच्छ्रुत्वा सगरः क्रुद्धः कोपसंरक्तलोचनः । हनिष्यामीत्यरातींन्स प्रतिज्ञामकरोत्तदा ॥२७॥ प्रदक्षिणीकृत्य मुनिं जननीं च प्रणम्य सः । प्रस्थापितः प्रतस्थे च तेनैव मुनिना तदा ॥२८॥ और्वाश्रमाद्विनिष्क्रान्तः सगरः सत्यवाक् शुचिः । वशिष्ठं स्वकुलाचार्यं प्राप्तः प्रीतिसमन्वितः ॥२९॥ प्रणम्य गुरवे तस्मै वशिष्ठाय महात्मने । सर्वं विज्ञापयामास ज्ञानदृष्ट्या विजानते ॥३०॥ ऐन्द्रास्त्रं वारुणं ब्राह्ममाग्नेयं सगशे नृपः । तेनैव मुनिनाऽवाप खङ्गं वज्रोपमं धनुः ॥३१॥ ततस्तेनाभ्यनुज्ञातः सगरः सौमनस्यवान् । आशीर्भिरर्चितः सद्यः प्रतस्थे प्रणिपत्य तम् ॥३२॥ एकेनैव तु चापेन स शूरः परिपन्थिनः । सपुत्रपौत्रांत्सगणानकरोत्स्वर्गवासिनः ॥३३॥ तच्चापमुक्तबाणाग्निसंतप्तास्तदरातयः । केचिद्विनष्टा संत्रस्तास्तथा चान्ये प्रदुद्रुवुः ॥३४॥ केचिद्विशीर्णकेशाश्च वल्मीकोपरि संस्थिताः । तृणान्यभक्षयंकेचिन्नग्नाश्च विविशुर्जलम् ॥३५॥ शकाश्च यवनाश्चैव तथा चान्ये महीभृतः । सत्वरं शरणं जग्मुर्वशिष्ठं प्राणलोलुपाः ॥३६॥ जितक्षितिर्बाहुपुत्रो रिपुन्गुरुसमीपगान् । चारैर्विज्ञातवान्सद्यः प्राप्तश्चाचार्यसन्निधिम् ॥३७॥ सज्जनों से हीन सभा, करुणा से हीन तपस्या की कुछ भी सार्थकता नहीं उसी प्रकार पिता से रहित बालक का जीवन निरर्थक है। जिस प्रकार वृक्ष विहीन वन, जल हीन नदी, वेग हीन (बिना चाल के) अश्व का कुछ भी मूल्य नहीं उसी प्रकार उस बालक का कुछ भी महत्त्व नहीं जिसके पिता का कुछ पता न हो। माता ! जिस प्रकार याचक का जीवन संसार में तुच्छ है उसी प्रकार पितृ विहीन बालक का जीवन दुःखों से ही घिरा रहता है। ॥२४-२५॥ बालक सगर की उपर्युक्त बातों को सुनकर माता अत्यन्त दुःखी हुई। उसने लम्बी साँस लेकर जैसा पुत्र ने प्रश्न किया था तदनुरूप सारी घटना कह सुनाई। सारी घटनायें सुन कर सगर क्रुद्ध हो उठा। उसके नेत्र क्रोध से लाल हो गए। उसने तत्काल शत्रुओं के मारने की प्रतिज्ञा की। तदनन्तर वह मुनि और माता की प्रदक्षिणा कर उसी मुनि की आज्ञा और योजना के अनुसार वहाँ से चल पड़ा। सत्यवादी और पवित्र वह सगर मुनि और्व के आश्रम को छोड़कर कुल गुरु वशिष्ठ के आश्रम में आया। स्वकुलाचार्य गुरु के आश्रम को देखकर उसको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥२६-२९॥ गुरु को प्रणाम कर उसने ज्ञान दृष्टि से सब कुछ जान लेने वाले गुरु वशिष्ठ से सारी कथा कह दी। गुरु के अनुग्रह से राजा सगर ने उसी गुरु मुनि से ऐन्द्र, वारुण, ब्राह्म और आग्नेयास्त्र भी प्राप्त कर लिया और उसी मुनि से उसने एक खड्ग और वज्र के समान एक धनुष भी प्राप्त किया। तदनन्तर गुरु का आशीर्वाद पाकर मनस्वी सौम्य सगर लक्ष्मण गुरु को प्रणाम कर उनकी कृपा का वरदान प्राप्त कर शत्रु संहार के लिए चल पड़ा। उसी एक धनुष से उस शूर ने अपने सभी शत्रुओं को कुटुम्ब सहित यमलोक पहुँचा दिया ॥३०-३३॥ उसके धनुष से छूटे हुए बाणों की ज्वाला से कितने शत्रु नष्ट हो गए, कुछ भयत्रस्त हो गए और कितने तो देश छोड़कर भाग निकले। कितने शिर केश मुँड़वा कर डर के मारे वल्मीक पर जा बैठे, कितने शत्रुओं ने दाँतों तले तृण रखकर अधीनता स्वीकार की और कुछ नंगे होकर जल में छिप गए। प्राण रक्षा के लाभ से कितने शक, यवन एवं अन्य दूसरे राजा शीघ्र गुरु वसिष्ठ की शरण में गए। बाहु-पुत्र सगर ने जब सारी पृथ्वी जीत ली तब वह गुप्तचरों के द्वारा यह जान कर कि आचार्य वसिष्ठ के समीप शत्रु छिपे हुए हैं शीघ्र गुरु के समीप पहुँचा। मुनि वसिष्ठ ते
अष्टमोऽध्यायः ४७ समागतं बाहुसुतं निशम्य मुनिर्वशिष्ठः शरणागतांस्तान् । त्रातुं च शिष्याभिहितं च कर्तुं विचारयामास तदा क्षणेन ॥३८॥ चकार मुण्डाञ्शबरांयवनांलम्बमूर्द्धजान् । अन्धांश्च श्मश्रुलांत्सर्वान्मुण्डान्वेदबहिष्कृतान् ॥३६॥ वसिष्ठमुनिना तेन हतप्रायान्निरीक्ष्य सः । प्रहसन्नाह सगरः स्वगुरुं तपसो निधिम् ॥४०॥ सगर उवाच भो भो गुरो दुराचारानेतान्रक्षसि तान्वृथा । सर्वथाहं हनिष्यामि मत्पितुर्देशहारकान् ॥४१॥ उपेक्षेत समर्थः सन्धर्मस्य परिपन्थिनः । स एव सर्वनाशाय हेतुभूतो न संशयः ॥४२॥ बाधन्ते प्रथमं मत्ता दुर्जनाः सकलं जगत् । त एव बलहीनाश्चेद्भजन्तेऽत्यन्तसाधुताम् ॥४३॥ अहो मायाकृतं कर्म खलाः कश्मलचेतसः । तावत्कुर्वन्ति कार्याणि यावत्स्यात्प्रबलं बलम् ॥४४॥ दासभावं च शत्रूणां वारस्त्रीणां च सौहृदम् । साधुभावं च सर्पाणां श्रेयस्कामो न विश्वसेत् ॥४५॥ प्रहासं कुर्वते नित्यं यान्दन्तान्दर्शयन्खलाः । तानेव दर्शयन्त्याशु स्वसामर्थ्यविपर्यये ॥४६॥ पिशुना जिह्वया पूर्वं परुषं प्रवदन्ति च । अतीव करुणं वाक्यं वदन्त्येव तथाबलाः ॥४७॥ श्रेयस्कामो भवेद्यस्तु नीतिशास्त्रार्थकोविदः । साधुत्वं समभावं च खलानां नैव विश्वसेत् ॥४८॥ दुर्जनं प्रणतिं यान्तं मित्रं कैतवशीलिनम् । दुष्टां भार्या च विश्वस्तो मृत एव न संशयः ॥४६॥ मा रक्ष तस्मादेतान्वै गोरूपव्याघ्रकर्मिणः । हत्वैतानखिलान् दुष्टांस्त्वत्प्रसादान्महीं भजे ॥५०॥ वशिष्ठस्तद्वचः श्रुत्वा सुप्रीतो मुनिसत्तमः । कराभ्यां सगरस्याङ्गं स्पृशन्निदमुवाच ह ॥५१॥ बाहु पुत्र सगर का आश्रम में आना सुना तो शीघ्र ही शरणागत शत्रुओं की रक्षा का उपाय और शिष्य की प्रार्थना का उत्तर सोच निकाला। लम्बे-लम्बे केश रखने वाले शबर और यवनों के बाल मुंड़वा दिये और वेद विमुख उन दाढ़ी रखने वाले अन्धों की दाढ़ी मुंड़वा कर मुण्डी बना दिया । मुनि वशिष्ठ द्वारा शत्रुओं की यह दशा देखकर राजा ने उनको मरा सा समझ लिया और हँसकर तपोनिधि गुरु वसिष्ठ से कहा ॥३४-४०॥ सगर बोला- हे गुरुदेव ! आप इन दुराचारी शत्रुओं की क्यों व्यर्थ में रक्षा कर रहे हैं ? मेरे पिता का सर्वस्व अपहरण करने वाले इन शत्रुओं को अवश्य मारूँगा । जो समर्थ होते हुए भी धर्मद्रोही शत्रुओं की उपेक्षा करता है अन्त में वे ही शत्रु उसके सर्वनाश का कारण बनते हैं। (बल से) उन्मत्त दुर्जन व्यक्ति पहले तो सारे संसार को कष्ट पहुँचाते हैं, पर बलहीनदशा में वे ही अत्यन्त साधु बन जाते हैं। अहो ! दुष्ट हृदय पामर जनों की विचित्र माया है । वे तब तक ही अच्छे कार्य करते हैं जब तक उनकी शक्ति नहीं बढ़ जाती है। कल्याणેચ્છु व्यक्ति को शत्रुओं के दास-भाव, वेश्याओं की सहृदयता और साँपों की सरलता पर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए ॥४१-४५॥ दुष्ट जन विभव-काल में जिन दाँतों को दिखाकर (अट्टहास कर) दूसरों की हंसी उड़ाते हैं, हीन दशा आ जाने पर उन्हीं दाँतों को दिखाकर अपनी दीनता को दिखाते हैं । धूर्त शत्रु जिस जिह्वा से पहले बढ़-चढ़ कर बातें करते हैं, निर्बल हो जाने पर उसी जीभ से करुण वाक्य बोलते हैं। जो श्रेय चाहने वाले व्यक्ति नीति कुशल होते हैं वे दुष्टों के साधुभाव और उनके सौम्य व्यवहार पर कभी भी विश्वास नहीं करते हैं । नम्र होने वाले शत्रु, कपट परायण मित्र एवं दुष्ट भार्या पर जो विश्वास करता है, वह मरा हुआ ही है, इसमें कुछ सन्देह नहीं ॥४६-४६॥ इसलिए गुरुदेव ! आप इन बाघ के समान हिंसक परन्तु इस समय गाय के समान दीन शत्रुओं की रक्षा मत कीजिए । आज मैं आपकी कृपा से इन दुष्टों का वधकर सम्पूर्ण पृथ्वी का उपभोग करूँगा । मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ शिष्य की नीतियुक्त बातों को सुनकर प्रसन्न हो गए और हाथ से सगर के अंगों को स्नेहपूर्वक सहलाते हुए यह बोले ॥५०-५१॥
४८ नारदीयपुराणम् वसिष्ठ उवाच साधु साधु महाभाग सत्यं वदसि सुव्रत । तथापि मद्वचः श्रुत्वा परां शान्तिं लभिष्यसि ॥५२॥ मयैते निहताः पूर्वं त्वत्प्रतिज्ञाविरोधिनः । हतानां हनने कीर्तिः का समुत्पद्यते वद ॥५३॥ भूमीश जन्तवः सर्वे कर्मपाशेन यन्त्रिताः । तथापि पापैर्निहताः किमर्थं हंसि तान्पुनः ॥५४॥ देहस्तु पापजनितः पूर्वमेवैनसा हतः । आत्मा ह्यभेद्यः पूर्णत्वाच्छास्त्राणामेष निश्चयः ॥५५॥ स्वकर्मफलभोगानां हेतुमात्रा हि जन्तवः । कर्माणि दैवमूलानि दैवाधीनमिदं जगत् ॥५६॥ यस्माद्दैवं हि साधूनां रक्षिता दुष्टशिक्षिता । ततो नरैरस्वतन्त्रैः किं कार्यं साध्यते वद ॥५७॥ शरीरं पापसम्भूतं पापेनैव प्रवर्तते । पापमूलमिदं ज्ञात्वा कथं हन्तुं समुद्यतः ॥५८॥ आत्मा शुद्धोऽपि देहस्थो देहीति प्रोच्यते बुधैः । तस्मादिदं वपुर्भूप पापमूलं न संशयः ॥५६॥ पापमूलवपुर्हन्तुः का कीर्तिस्तव बाहुज । भविष्यतीति निश्चित्य नैतांहिसीस्ततः सुत ॥६०॥ इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं विरराम स कोपतः । स्पृशन्करेण सगरं नन्दनं मुनयस्तदा ॥६१॥ अथाथर्ववनिधिस्तस्य सगरस्य महात्मनः । राज्याभिषेकं कृतवान्मुनिभिः सह सुव्रतैः ॥६२॥ भार्याद्वयं च तस्यासीत्केशिनी सुमतिस्तथा । काश्यपस्य विदर्भस्य तनये मुनिसत्तम ॥६३॥ राज्ये प्रतिष्ठिते दृष्ट्वा मुनिरौर्वस्तपोनिधिः । वनादागत्य राजानं संभाव्य स्वाश्रमं ययौ ॥६४॥ कदाचित्तस्य भूपस्य भार्याभ्यां प्रार्थितो मुनिः । वरं ददावपत्यार्थमौर्वो भार्गवमन्त्रवित् ॥६५॥ वशिष्ठ बोले—महाभाग ! धन्य हो धन्य हो ! सुव्रत ! ठीक हो कह रहे हो । फिर भी मेरी बातों को सुनो, तुमको परम शान्ति मिलेगी। तुम्हारी प्रतिज्ञा के विरुद्ध आचरण करने वाले इन शत्रुओं को तो मैंने पहले ही मार डाला है। सोचो तो सही इन जीवन हीनों को पुनः मारने से कौन सा यश प्राप्त करोगे। भूपति ! सब प्राणी अपने कर्मों के बन्धन से बँधे हुए हैं। इसके अतिरिक्त ये अपने पापों से स्वयं मार डाले गए हैं। अब पुनः इनको क्यों मारना चाहते हो ? पाप से प्राप्त शरीर तो पापों के कारण पहले ही नष्ट हो गया, केवल आत्मा अभिन्न अविनाशी है, ऐसा शास्त्रों का एकमात्र निर्णय है। ये प्राणी तो अपने पूर्व कृत कर्मों को भोगने के लिए एक निमित्त मात्र हैं, कर्म दैव के अधीन हैं। इस प्रकार यह सारा जगत् दैवाधीन है ॥५२-५६॥ यतः दैव ही साधुओं का रक्षक और दुष्टों को शिक्षा देने वाला है अतः दैवाधीन, परतन्त्र मनुष्य क्या कर सकते हैं, यह बताओ । यह शरीर पाप से ही उत्पन्न हुआ है और पाप की प्रेरणा से ही प्रत्येक कार्यों को करता है तो इन सम्पूर्ण कार्य कलापों को पाप पर ही आश्रित समझ कर क्यों इनका वध करने पर तुले हुए हो ? शुद्ध-बुद्ध होता हुआ भी यह आत्मा देहस्थ होने के कारण विद्वानों द्वारा देही (शरीर वाला) कहा जाता है। इसलिए भूपाल ! यह शरीर ही पापों का मूल है इसमें कुछ सन्देह नहीं । बाहुतनय ! इस पाप मूल शरीर को मारकर तुम कौन सी कीर्ति प्राप्त करोगे ? यह सोच समझ कर तुम निश्चय कर लो, तब इनको मारो ॥५७-६०॥ गुरु की इन बातों को सुनकर वह सगर क्रोध से विरत हो गया । शिष्य की शान्ति मुद्रा को देखकर मुनि अपने प्रिय शिष्य के अंगों का स्नेह से स्पर्श करने लगे । इसके पश्चात् अथर्ववेद के ज्ञाता गुरु ने तपस्वी मुनियों के सहयोग से उस महात्मा सगर का राज्याभिषेक किया। मुनिश्रेष्ठ ! उस राजा की दो स्त्रियाँ थीं। एक का नाम केशिनी और दूसरी का नाम सुमति था। दोनों विदर्भ नरेश काश्यप की कन्या थीं। तपोनिधि मुनि और्व राजा सगर को राज्यासन पर प्रतिष्ठित जानकर वन से आये और उसको उपदेश देकर अपने आश्रम को लौट गए ॥६१-६४॥ किसी समय उन दोनों राजपत्नियों ने पुत्र कामना से और्व मुनि को प्रार्थनापूर्वक बुलाया।
अष्टमोऽध्यायः ४६ क्षणं ध्यानस्थितो भूत्वा त्रिकालज्ञो मुनीश्वरः । केशिनीं सुमतिं चैव इदमाह प्रहर्षयन् ॥६६॥ और्व उवाच एका वंशधरं चैकमन्या षड्युतानि च । अपत्यार्थं महाभागे वृणुतां च यथेप्सितम् ॥६७॥ अथ श्रुत्वा वचस्तस्य मुनेरौर्वस्य नारद । केटिन्येकं सुतं वव्रे वंशसन्तानकारणम् ॥६८॥ तथा षष्टिसहस्राणि सुमत्य। ह्यभवन्सुताः । नाम्नासमंजाः केशीन्यास्तनयो मुनिसत्तम ॥६६॥ असमंजास्तु कर्माणि चकारोन्मत्तचेष्टितः । तं दृष्ट्वा सागराः सर्वे ह्यासन्दुर्वृत्तचेतसः ॥७०॥ तद्बालभावं संदुष्टं ज्ञात्वा बाहुसुतो नृपः । चिन्तयामास विधिवत्पुत्रकर्म विगर्हितम् ॥७१॥ अहो कष्टतरा लोके दुर्जनानां हि संगतिः । कारुकैस्ताड्यते वह्निरयःसंयोगभावतः ॥७२॥ अंशुमान्नाम तनयो बभूव ह्यसमंजसः । शास्त्रज्ञो गुणवान्धर्मी पितामहहिते रतः ॥७३॥ दुर्वृत्ताः सागराः सर्वे लोकोपद्रवकारिणः । अनुष्ठानवतां नित्यमन्तराया भवन्ति ते ॥७४॥ हुतानि यानि यज्ञेषु हवींषि विधिवद्विजैः । बुभुजे तानि सर्वाणि निराकृत्य दिवौकसः ॥७५॥ स्वर्गादाहृत्य सततं रम्भाद्या देवयोषितः । भजन्ति सागरास्ता वै कचग्रहबलात्कृताः ॥७६॥ पारिजातादिवृक्षाणां पुष्पाण्याहृत्य ते खलाः । भूषयंति स्वदेहानि मद्यपानपरायणाः ॥७७॥ साधुवृत्तीः समाजह्रुः सदाचाराननाशयन् । मित्रैश्च योद्धुमारब्धा बलिनोऽत्यन्तपापिनः ॥७८॥ एतद्दृष्ट्वातिदुःखार्ता देवा इंद्रपुरोगमाः । विचारं परमं चक्रू रेतेषां नाशहेतवे ॥७६॥ निश्चित्य विबुधाः सर्वे पातालान्तरगोचरम् । कपिलं देवदेवेशं ययुः प्रच्छन्नरूपिणः ॥८०॥ भार्गव मंत्र के ज्ञाता मुनि ने उन दोनों को पुत्र प्राप्ति का वर दिया। क्षण भर ध्यान मग्न होकर त्रिकालज्ञ मुनि ने केशिनी और सुमति को प्रसन्न करते हुए कहा ॥६५-६६॥ और्व बोले- महाभागे ! एक को वंश बढ़ाने वाला एक पुत्र और दूसरे को साठ हजार बलशाली पुत्र होंगे, इनमें से इच्छानुसार वरदान स्वयं स्वीकार कर लो। नारद ! जितेन्द्रिय और्व मुनि की आज्ञा को सुनकर केशिनी ने वंश विस्तार करने वाले एक पुत्र होने का वर माँगा। और सुमति के साठ हजार पुत्र हुए। मुनिश्रेष्ठ ! केशिनी के पुत्र का नाम असमंजस् रखा गया। असमंजस् अपने राजमद के कारण अनर्थाचरण करने लगा। उसके अनुचित कार्यों को देखकर सगर के और पुत्र भी उपद्रवी हो गए। बाहुसुत राजा सगर पुत्रों की यह स्थिति देखकर उनके बुरे कर्मों पर विचार करने लगा। 'अहो! दुर्जनों की संगति संसार में अत्यन्त कष्टप्रद है; क्योंकि लोहे की छेनी के पा जाने से ही शिल्पी पत्थर पर चोट मारता और अग्नि उत्पन्न करता है ॥६७-७२॥ असमंजस् के अंशुमान् नामक पुत्र हुआ जो अत्यन्त गुणी, शास्त्रज्ञ, धार्मिक और पितामह की सेवा में लगा रहता था। इधर वे दुष्ट सगर-पुत्र लोक में उपद्रव मचाने लगे, नित्यप्रति यज्ञ करने वाले याज्ञिकों के यज्ञानुष्ठान में बाधा डालने लगे। द्विजगण यज्ञों में विधिपूर्वक जो कुछ हवन करते थे, उसको देवताओं का अनादर करके वे दुष्ट स्वयं खा जाते थे। स्वर्ग से रम्भा आदि अप्सराओं को केश पकड़ कर हठात् खींच लाते थे और उनका यथेच्छ भोग करते थे। वे दुष्ट मद्यपान कर मतवाले रहते थे पारिजात आदि देव वृक्षों के फूल तोड़ लाते थे और उससे अपने को सजाते थे ॥७३-७७॥ साधु आचरण सर्वथा लुप्त हो गए, सदाचार का उन दुष्टों ने नाश कर दिया। अत्यन्त पापी और बली वे मित्रों से ही युद्धकरने लगे। यह अनर्थ देखकर इन्द्र आदि प्रमुख देवता दुःख से कातर हो उठे और उन दुष्टों के नाश के उपाय सोचने लगे। आपस में विचार विनिमय कर वे देवता गुप्त रूप से पाताल में निवास करने वाले कपिल मुनि के पास गए, जो परम आनन्द के ७-ना० पु०
५० नारदीयपुराणम् ध्यायन्तमात्मनात्मानं परानन्दैकविग्रहम् । प्रणम्य दण्डवद् भूमौ तुष्टुवुस्त्रिदशास्ततः ॥८१॥ देवा ऊचुः नमस्ते योगिने तुभ्यं साङ्ख्ययोगरताय च । नररूपप्रतिच्छन्नविष्णवे जिष्णवे नमः ॥८२॥ नमः परेशभक्ताय लोकानुग्रहहेतवे । संसारारण्यदावाग्ने धर्मपालनसेतवे ॥८३॥ महते वीतरागाय तुभ्यं भूयो नमो नमः । सागरैः पीडितानस्मांस्त्रायस्व शरणागतान् ॥८४॥ कपिल उवाच ये तु नाशमिहेच्छन्ति यशोबलधनायुषाम् । त एव लोकान्बाधन्ते नात्राश्चर्यं सुरोत्तमाः ॥८५॥ यस्तु बाधितुमिच्छेद्य जनान्निरपराधिनः । तं विद्यात्सर्वलोकेषु पापभोगरतं सुराः ॥८६॥ कर्मणा मनसा वाचा यस्त्वन्यान्बाधते सदा । तं हन्ति दैवमेवाशु नात्र कार्या विचारणा ॥८७॥ अल्पैरहोभिरेवैते नाशमेष्यन्ति सागराः । इत्युक्ते मुनिना तेन कपिलेन महात्मना । प्रणम्य तं यथान्यायं गता नाकं दिवौकसः ॥८८॥ अत्रान्तरे तु सगरो वसिष्ठाद्यैर्महर्षिभिः । आरेभे हयमेधाख्यं यज्ञं कर्तुमनुत्तमम् ॥८९॥ तद्यज्ञे योजितं सप्तितमपहृत्य सुरेश्वरः । पाताले स्थापयामास कपिलो यत्र तिष्ठति ॥९०॥ गूढविग्रहशक्त्रेण हतमश्वं तु सागराः । अन्वेष्टुं बभ्रमुर्लोकान् भूरादींश्च सुविस्मिताः ॥९१॥ अदृष्टसप्तयस्ते च पातालं गन्तुमुद्यताः । चक्रुर्महीतलं सर्वमेकैको योजनं पृथक् ॥९२॥ मृत्तिकां खनितां ते चोदधितीरे समाकिरन् । तद्द्वारेण गताः सर्वे पातालं सगरात्मजाः ॥९३॥
एकमात्र आधार परमात्मा के ध्यान में निमग्न थे । यह देखकर देवताओं ने साष्टांग दण्डवत् किया और स्तुति करने लगे ॥७८-८१॥ देवगण बोले—सांख्य योग में सर्वदा लीन रहने वाले तुम योगेश्वर को नमस्कार है । नर रूप में गुप्त रूप से रहने वाले जयशील विष्णु को नमस्कार है । परम प्रभु के भक्त, लोक पर अनुग्रह करने वाले, संसाररूपी अरण्य में, जो माया मोह रूपी अधर्म की दावाग्नि से जल रहा है, केवल स्वयं धर्म की प्रतिष्ठा करने वाले मुनि को नमस्कार है । तुम वीतराग महान् मुनि को वार-वार नमस्कार है । महामुनि ! सगर के पुत्रों से त्रस्त पीड़ित अपने इन शरणागत भक्तों की रक्षा कीजिए ॥८२-८४॥ कपिल बोले—सुरोत्तमवृन्द ! जो अपने यश, बल, धन और आयु का नाश चाहते हैं वे ही लोक को पीड़ा पहुँचाते हैं, अतः आश्चर्य करने की आवश्यकता नहीं है । देवगण ! जो निरपराध प्राणियों को बाधा पहुँचाना चाहता है, उसे सब लोकों में पाप-भोग करने में निरत समझना चाहिए । जो सर्वदा पूज्यों को मन, वचन और कर्म से पीड़ा पहुँचाते हैं उनको शीघ्र दैव विनष्ट कर देता है, इसमें शंका नहीं करनी चाहिए । ये सगर-पुत्र थोड़े दिनों में ही नष्ट हो जायेंगे, उस महात्मा कपिल मुनि की बातों को सुनकर वे देववृन्द यथोचित रीति से मुनि को प्रणाम कर स्वर्ग चले गये ॥८५-८८॥ इसी बीच राजा सगर वशिष्ठ आदि महर्षियों की अनुज्ञा से परमोत्तम अश्वमेध यज्ञ करने लगे । उस यज्ञ में अभिषिक्त अश्व को देवेन्द्र गुप्त रूप से चुराकर पाताल में जहाँ कपिल मुनि रहते थे, बाँध आये । यह देखकर सगर-पुत्र परम विस्मित हुए और पृथ्वी आदि लोकों को घोड़े का पता पाने के लिए छान डाले । घोड़े का पता न पाकर वे पाताल लोक जाने की तैयारी करने लगे । पृथक्-पृथक् एक-एक योजन भूतल को खोद कर खोदी हुई मिट्टी को समुद्र तट पर फैला दिया । उसी विवर द्वार से वे उद्धत सगर पुत्र पाताल में पहुँच गए ॥८६-९३॥ वहाँ मदोन्मत्त की भाँति विवेक को तिलाञ्जलि
५१ अष्टमोऽध्यायः विचिन्वन्ति हयं तत्र मदोन्मत्ता विचेतसः । तत्रापश्यन्महात्मानं कोटिसूर्यसमप्रभ ॥६४॥ कपिलं ध्याननिरतं वाजिनं च तदन्तिके ॥६५॥ ततः सर्वे तु संरब्धा मुनिं दृष्ट्वाऽतिवेगतः । हन्तुमुद्युक्तमनसो विद्रवन्तः समासदन् ॥६६॥ हन्यतां हन्यतामेष बध्यतां बध्यतामयम् । गृह्यतां गृह्यतामाशु इत्युचुस्ते परस्परम् ॥६७॥ हृताश्वं साधुभावेन बकवद्ध्यानतत्परम् । सन्ति चाहो खला लोके कुर्वन्त्याडम्बरं महत् ॥६८॥ इत्युच्चरन्तो जहसुः कपिलं ते मुनीश्वरम् । समस्तेंद्रियसंदोहं नियम्यात्मानमात्मनि ॥६९॥ आस्थितः कपिलस्तेषां तत्कर्म ज्ञातवान्नहि ॥१००॥ आसन्नमृत्यवस्ते तु विनष्टमतयो मुनिम् । पद्भिः संताडयामासुर्बाहू च जगृहुः परे ॥१०१॥ ततस्त्यक्तसमाधिस्तु स मुनिर्विस्मितस्तदा । उवाच भावगम्भीरं लोकोपद्रवकारिणः ॥१०२॥ ऐश्वर्यमदमत्तानां क्षुधितानां च कामिनाम् । अहंकारविमूढानां विवेको नैव जायते ॥१०३॥ निधेराधारमात्रेण मही ज्वलति सर्वदा । तदेव मानवा भुक्त्वा ज्वलन्तीति किमद्भुतम् ॥१०४॥ किमत्र चित्रं सुजनं बाधन्ते यदि दुर्जनाः । महीरुहांश्चानुतटे पातयन्ति नदीरयाः ॥१०५॥ यत्र श्रीर्यौवनं वापि शारदा वापि तिष्ठति । तत्राश्रीर्वृद्धता नित्यं मूर्खत्वं चापि जायते ॥१०६॥ अहो कनकमाहात्म्यमाख्यातुं केन शक्यते । नामसाम्यादहो चित्रं धत्तूरोऽपि मदप्रदः ॥१०७॥ भवेद्यदि खलस्थ श्रीः सैव लोकविनाशिनी । यथा सखाग्नेः पवनः पन्नगस्य यथा विषम् ॥१०८॥ अहो धनमदान्धस्तु पश्यन्नपि न पश्यति । यदि पश्यत्यात्महितं स पश्यति न संशयः ॥१०६॥
देकर यज्ञाश्व को ढूंढ़ने लगे । वहां उन मूढों ने करोड़ों सूर्य के समान तेजस्वी ध्यान-मग्न कपिल मुनि को देखा जिनके पास ही वह अश्व बँधा था । तदनन्तर उस मुनि को देखकर वे क्रोध से पागल हो गए और बड़े वेग से उनको मारने की इच्छा से मुनि की ओर दौड़ पड़े और परस्पर इसको मारो मारो, पकड़ो पकड़ो, आदि अनुचित बातें कह कर चिल्लाने लगे । आश्चर्य है कि संसार में खल लोग व्यर्थ के महान् आडम्बर फैलाये रखते हैं ॥६४-६८॥ यह खल भी स्वयं घोड़े को चुराकर बक ध्यान लगाए हुए है, ऐसी कटु बातें कहकर उस कपिल मुनि की, जो समस्त इन्द्रियों को आत्मा के वश में कर ध्यान मग्न थे, खिल्ली उड़ाने लगे । मुनि तो ध्यानमग्न थे । उन्होंने इन दुष्टों के अपकर्मों को सर्वथा न जाना; परन्तु वे दुर्बुद्धि, जिनके शिर पर मौत नाच रही थी, उस मुनि को पैरों से मारने लगे ओर कुछ लोगों ने उनके हाथ पकड़ लिए । तदनन्तर मुनि की समाधि भङ्ग हुई और उनको आश्चर्य हुआ । तब उन्होंने गम्भीर मुद्रा धारण कर, संसार में उपद्रव मचाने वाले उन राजपुत्रों से कहा—ऐश्वर्य के मद में चूर, भूख से व्याकुल, कामात्तं और अहंकार के कारण ज्ञान-शून्य व्यक्तियों को विवेक बुद्धि नहीं रह जाती है । निधि के धारण मात्र से पृथिवी सर्वदा जलती रहती है । उसी निधि का उपभोग कर यदि मनुष्य भी जलता है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं ॥६६-१०४॥ यदि दुर्जन व्यक्ति सज्जनों को पीड़ा पहुँचाते हैं तो इसमें आश्चर्य ही क्या है ? नदी के वेग तटवर्ती वृक्षों को तो सर्वदा गिराते ही रहते हैं । जहाँ सम्पत्ति, यौवन अथवा सरस्वती रहती है वहीं दरिद्रता वृद्धता और मूर्खता भी होती है । अहो ! इस कनक (सुवर्ण) की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है ? क्योंकि केवल नाममात्र की समता से धतूरा (कनक) भी मद उत्पन्न कर देता है । यदि मूर्खो को धन मिल जाता है तो वह लोक-नाश का कारण बनता है, जिस प्रकार अग्नि अपने सहायक वायु और सर्प विष को पाकर लोक को कष्ट पहुँचाने वाले हो जाते हैं । अहो ! धन के मद से अन्धा व्यक्ति नेत्र रहते हुए भी नहीं देख पाता है । यदि वह आत्महित की ओर ध्यान देता है तो अवश्य
५२ नारदीयपुराणम् इत्युक्त्वा कपिलः क्रुद्धो नेत्राभ्यां ससृजेऽनलम् । स वह्निः सागरान्सर्वान्भस्मसादकरोत्क्षणात् ॥११०॥ यन्नेत्रजानलं दृष्ट्वा पातालतलवासिनः । अकालप्रलयं मत्वा चुक्रुशुः शोकलालसाः ॥१११॥ तदग्नितापिता सर्वे दन्दशूकाश्च राक्षसाः । सागरं विविशुः शीघ्रं सतां कोपो हि दुःसहः ॥११२॥ अथ तस्य महीपस्य समागम्याध्वरं तदा । देवदूत उवाचेदं सर्वं वृत्तं हि यत्क्षते ॥११३॥ एतत्समाकर्ण्य वचः सगरः सर्ववित्प्रभुः । दैवेन शिक्षिता दुष्टा इत्युवाचाति हर्षितः ॥११४॥ माता वा जनको वापि भ्राता वा तनयोऽपि वा । अधर्मं कुरुते यस्तु स एव रिपुरिष्यते ॥११५॥ यस्त्वधर्मेषु निरतः सर्वलोकविरोधकृत् । तं रिपुं परमं विद्याच्छास्त्राणामेष निर्णयः ॥११६॥ सगरः पुत्रनाशेऽपि न शुशोच मुनीश्वर ! । दुर्दान्तनिधनं यस्मात्सतामुत्साहकारणम् ॥११७॥ यज्ञेष्वनधिकारत्वादपुत्राणामिति स्मृतेः । पौत्रं तमंशुमन्तं हि पुत्रत्वे कृतवान्प्रभुः ॥११८॥ असमञ्जस्सुतं तं तु सुधियं वाग्विदांवरम् । युयोज सारविद्भूयो ह्यश्वानयनकर्मणि ॥११९॥ स गतस्तद्विलद्वारे दृष्ट्वा तं मुनिपुङ्गवम् । कपिलं तेजसां राशिं साष्टाङ्गं प्रणनाम ह ॥१२०॥ कृताञ्जलिपुटो भूत्वा विनयेनाग्रतः स्थितः । उवाच शान्तमनसं देवदेवं सनातनम् ॥१२१॥ अंशुमानुवाच दौःशील्यं यत्कृतं ब्रह्मन्मत्पितृव्यैः क्षमस्व तत् । परोपकारनिरताः क्षमासारा हि साधवः ॥१२२॥ दुर्जनेष्वपि सत्त्वेषु दयां कुर्वन्ति साधवः । नहि संहरते ज्योत्स्नां चन्द्रश्चाण्डालवेश्मनः ॥१२३॥ बाध्यमानोऽपि सुजनः सर्वेषां सुखकृद्भवेत् । ददाति परमां तुष्टिं भक्ष्यमाणोऽमरैः शशी ॥१२४॥ वह देखता है ॥६६-१०६॥ यह कहकर कपिल मुनि ने क्रुद्ध होकर अपने नेत्रों से महानल उत्पन्न किया जिसने तत्काल उन सगर पुत्रों को जला कर भस्म कर दिया । उस ऋषि के नेत्रों से उत्पन्न उस अग्नि को देखकर सभी पातालवासी प्राणी अकाल प्रलय समझ कर शोकमग्न होकर हाहाकार करने लगे । उस अग्नि की ज्वाला से दग्ध होकर सभी नाग और राक्षस शीघ्र ही समुद्र में घुस गए क्योंकि सज्जनों का कोप सबके लिए दुःसह होता है ॥११०-११२॥ तदनन्तर देवदूत ने उस राजा सगर के यज्ञ में आकर उन सारी घटनाओं को कह सुनाया । इन बातों को सुनकर सर्वज्ञ भूमिपति सगर यह कहकर कि स्वयं दैव ने ही उन दुष्टों को अच्छी शिक्षा दी; अति प्रसन्न हुए । माता-पिता-भाई या पुत्र चाहे कोई हो यदि वह अधर्म करता है तो वह शत्रु ही समझा जाता है । सब लोकों का विरोधी जो व्यक्ति सर्वदा पापकर्म में निरत रहता है उसको बहुत बड़ा शत्रु समझना चाहिए, ऐसा शास्त्रों का निर्णय है ॥११३-११६॥ मुनीश्वर ! सगर पुत्रनाश को देखकर भी शोकातुर नहीं हुए, क्योंकि दुराचारियों की मृत्यु सज्जनों के उत्साह का ही कारण है । 'यज्ञों में पुत्ररहित का अधिकार नहीं है' इस स्मृति- वचन का स्मरण कर राजा ने अंशुमान् को ही अपना पुत्र बनाया । उस तत्त्वविद् सगर ने असमंजस् के उस परम विनीत और विद्वान् पुत्र को पुनः अश्व लाने के कार्य में नियुक्त किया । वह उस बिल द्वार से पाताल पहुँचा और तेजोनिधान उस मुनि श्रेष्ठ को देखकर साष्टाङ्ग प्रणाम किया । वह हाथ जोड़कर विनीत भाव से उस मुनि के सम्मुख उपस्थित हुआ और शान्त सनातन देव-देव की स्तुति करने लगा ॥११७-१२१॥ अंशुमान् बोला- ब्रह्मन् ! मेरे पितृव्यों ने जो कुछ अविनय दिखाया है उसको आप क्षमा कर दें, क्योंकि सर्वदा परोपकार में रत रहने वाले साधुजन क्षमा की मूर्ति होते हैं । साधुजन दुष्टप्राणियों पर भी दया दिखाते हैं। चन्द्र चाण्डालों के घर पर से अपनी किरणें नहीं हटाते हैं। सज्जन दूसरों से कष्ट पाने पर भी सबको सुखी ही बनाते हैं; क्योंकि देवताओं का भक्ष्य बनकर भी चन्द्रमा उनको सुखी ही बनाता है। चन्दन स्वयं भग्न होकर और कटकर भी अपनी सुगन्ध से दूसरों को सुगन्धित ही करता है।
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अष्टमोऽध्यायः ५३ दारितश्छिन्न एवापि ह्यामोदेनैव चन्दनः । सौरभं कुरुते सर्वं तथैव सृजनो जनः ॥१२५॥ क्षान्त्या च तपसाचारैस्तद्गुणज्ञा मुनीश्वराः । संजातं शासितुं लोकांस्त्वां विदुः पुरुषोत्तम ॥१२६॥ नमो ब्रह्मन्मुने तुभ्यं नमस्ते ब्रह्ममूर्त्तये । नमो ब्रह्मण्यशीलाय ब्रह्मध्यानपराय च ॥१२७॥ इति स्तुतो मुनिस्तेन प्रसन्नवदनस्तदा । वरं वरय चेत्याह प्रसन्नोऽस्मि तवानघ ॥१२८॥ एवमुक्ते तु मुनिना ह्यंशुमान्प्रणिपत्य तम् । प्रापयासम्पितॄन्ब्राह्मं लोकमित्यभ्यभाषत ॥१२९॥ ततस्तस्यातिसंतुष्टो मुनिः प्रोवाच सादरम् । गङ्गामानीय पौत्रस्ते नयिष्यति पितॄन्दिवम् ॥१३०॥ त्वत्पौत्रेण समानीता गङ्गा पुण्यजला नदी । कृत्वैतान्धूतपापांन्वैनयिष्यति परं पदम् ॥१३१॥ प्रापयेनं हयं वत्स यतः स्यात्पूर्णमध्वरम् । पितामहान्तिकं प्राप्य साश्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥१३२॥ सगरस्तेन पशुना तं यज्ञं ब्राह्मणैः सह । विधाय तपसा विष्णुमाराध्याय पदं हरेः ॥१३३॥ जज्ञे ह्यंशुमतः पुत्रो दिलोप इति विश्रुतः । तस्माद्भागीरथो जातो यो गङ्गामानयद्दिवः ॥१३४॥ भगीरथस्य तपसा तुष्टो ब्रह्मा ददौ मुने । गङ्गां भागीरथ्यायाः चिंतयामास धारणे ॥१३५॥ ततश्च शिवमाराध्य तद्द्वारा स्वर्णदीं भुवम् । आनीय तज्जलंः स्पृष्ट्वा पुतान्निन्ये दिवं पितॄन् ॥१३६॥ भगीरथान्वये जातः सुदासो नाम भूपतिः । तस्य पुत्रो मित्रसहः सर्वलोकेषु विश्रुतः ॥१३७॥ वसिष्ठशापात्प्राप्तः स सौदासो राक्षसों तनुम् । गङ्गाबिन्दुनिषेवेण पुनर्मुक्तो नृपोऽभवत् ॥१३८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गामाहात्म्यं नाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ ऐसा ही सज्जनों का भी स्वभाव होता है ॥१२२-१२५॥ आपके गुणों के जानने वाले मुनिवर आपको पुरुषोत्तम समझते हैं—जो कि अपनी शान्ति, तपस्या और सदाचार से लोक को शिक्षा देने के लिए यहां आए हुए हैं। ब्रह्मन् ! मुने ! ब्रह्ममूर्ति आपको नमस्कार है। ब्राह्मणों के रक्षक ब्रह्मध्यानपरायण आपको नमस्कार करता हूँ। अंशुमान् की इस प्रकार की स्तुति सुनकर मुनि प्रसन्न हो गए और कहा कि अनघ ! वर मांगो। मैं तुमसे प्रसन्न हूँ! मुनि की ऐसी बातें सुनकर अंशुमान् उनके चरणों पर गिर पड़ा और कहा कि किसी प्रकार मेरे पितरों को ब्रह्मलोक पहुंचाइये । अंशुमान् की प्रार्थना सुनकर मुनि प्रसन्न हो गए और आदर पूर्वक बोले—तुम्हारा पौत्र गंगा को पृथ्वो पर लाकर तुम्हारे पितरों को स्वर्ग पहुँचा देगा ॥१२६-१३०॥ तुम्हारे पौत्र से लाई हुई पुण्यसलिला गंगा इन मृत पितरों को निष्पाप बनाकर परम पद पर पहुँचा देगी। वत्स ! इस अश्व को तुम अपने यहाँ ले जाओ जिससे कि यज्ञ पूर्ण हो जाय । अंशुमान् ने अपने पितामह के निकट जाकर अश्व और पितरोद्धार की सारी कथा कह दी। सगर ने ब्राह्मणों की सहायता से उस पशु के द्वारा यज्ञ समाप्त किया और विष्णु की आराधना कर विष्णुलोक को प्राप्त किया अंशुमान् से दिलोप नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, दिलोप से भगीरथ हुआ, जिसने गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा। मुने ! भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने गंगा को तो दे दिया परन्तु 'गंगा को कौन धारण करेगा ?' इसको चिन्ता करने लगे । तब भगीरथ ने शिव की आराधना की उनकी सहायता से देवनदी गंगा को पृथ्वी पर लाकर उसके जल से अपने पितरों को पवित्र किया और उनको स्वर्ग पहुँचाया । उस भगीरथ के कुल में सुदास नामक भूपति उत्पन्न हुआ। उसका पुत्र मित्रसह विश्व में विख्यात हुआ । वसिष्ठ के शाप से मित्रसह को राक्षस-शरीर प्राप्त हो गया था, परन्तु गंगाजल के स्पर्श से वह भूपति-श्रेष्ठ पुनः शुद्ध हो गया ॥१३१-१३७॥ श्रीनारदीयपुराण में गंगामाहात्म्य-वर्णन नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ॥८॥
नवमोऽध्यायः नारद उवाच शप्तः कथं वसिष्ठेन सौदासो नृपसत्तमः । गङ्गाबिन्दुभिषेकेण पुनः शुद्धोऽभवत्कथम् ॥१॥ सर्वमेतदशेषेण भ्रातर्मे वक्तुमर्हसि । शृण्वतां वदतां चैव गङ्गाख्यानं शुभावहम् ॥२॥ सनक उवाच सौदासः सर्वधर्मज्ञः सर्वज्ञो गुणवाञ्छुचिः । बुभुजे पृथिवीं सर्वां पितृवद्रञ्जयन्प्रजाः ॥३॥ सगरेण यथा पूर्वं महीयं सप्तसागरा । रक्षिता तद्वदमुना सर्वधर्माविरोधिना ॥४॥ त्रिंशदब्दसहस्राणि बुभुजे पृथिवीं युवा ॥५॥ सौदासस्त्वेकदा राजा मृगयाभिरतिर्वनम् । विवेश सबलः सम्यक् शोधितं ह्याप्तमन्त्रिभिः ॥६॥ निषादैः सहितस्तत्र विनिघ्नन्मृगसंचयम् । आसाद नदीं रेवां धर्मज्ञः स पिपासितः ॥७॥ सुदासतनयस्तत्र स्नात्वा कृत्वान्हिकं मुने । भुक्त्वा च मन्त्रिभिः सार्द्धं तां निशां तत्र चावसत् ॥८॥ ततः प्रातः समुत्थाय कृत्वा पौर्वाह्निकीं क्रियाम् । बभ्राम मन्त्रिसहितो नर्मदातीरजे वने ॥६॥ अध्याय ६ गंगाजल के सम्पर्क से राजा सौदास का शापोद्धार नारद बोले—वसिष्ठ ने सौदास को क्यों शाप दिया और पुनः गंगाजल के अभिषेक से वह कैसे शुद्ध हो गया ? भाई ! इस आख्यान को पूर्णरूप से आप कहिए, गंगा की कथा सुनने वाले और कहने वाले दोनों के लिए मङ्गलदायक होता है ॥१-२॥ सनक बोले—सौदास सब धर्मों का ज्ञाता, सर्वज्ञ, गुणी और सदाचारी था । उसने अपने पिता के समान प्रजा का पालन कर सम्पूर्ण पृथ्वी का उपभोग किया । जिस प्रकार प्राचीनकाल में इस सप्त-समुद्रा पृथ्वी की रक्षा सगर ने की थी उसी प्रकार इसने न्याय और धर्म पूर्वक पृथ्वी की रक्षा की । उस युवक ने अपने पुत्र- पौत्रों के साथ सब प्रकार के वैभवों का उपभोग करते हुए तीस हजार वर्षों तक पृथ्वो का शासन किया ॥३-५॥ एक दिन मृगया-प्रेमी राजा सौदास अपने सैनिकों के साथ वन में गया जिस वन की पहले से ही विश्वस्त मन्त्रियों ने भली भाँति परीक्षा कर ली थी । वह धर्मज्ञ राजा निषादों को साथ लेकर अनेकों जंगली पशुओं का शिकार करता हुआ प्यास से व्याकुल होकर गोदावरी नदी के तट पर गया ॥६-७॥ मुने ! सुदास- पुत्र ने नर्मदा में स्नान कर सन्ध्या-वन्दनादि नित्य क्रिया की और मंत्रियों के सहित भोजन कर उस रात को वहीं रह गया । तदनन्तर प्रातः काल उठकर प्रातःकालीन क्रियाओं को समाप्त कर मन्त्रियों के साथ नर्मदा
नवमोऽध्यायः ५५ वनाद्वनान्तरं गच्छन्नेक एव महीपतिः । आकर्णाकृष्टबाणः सन् कृष्णसारं समन्वगात् ॥१०॥ दूरसैन्योऽश्वमारूढः स राजानुव्रजन्म्गम् । व्याघ्रद्वयं गुहासंस्थमपश्यत्सुरते रतम् ॥११॥ मृगपृष्ठं परित्यज्य व्याघ्रयोः संमुखं ययौ । धनुःसंहितबाणेन तेनासौ शरशास्त्रवित् ॥१२॥ तां व्याघ्रीं पातयामास तीक्ष्णाग्रनतपर्वणा । पतमाना तु सा व्याघ्री षट्त्रिंशद्योजनायता ॥१३॥ तडित्वद्घोरनिर्घोषा राक्षसी विकृताभवत् । पतितां स्वप्रियां वीक्ष्य द्विषन्स व्याघ्रराक्षसः ॥१४॥ प्रतिक्रियाम् करिष्यामीत्युक्त्वा चांतर्दधे तदा । राजा तु भयसंविग्नो वने सैन्यं समेत्य च ॥१५॥ तद्वृत्तं कथयन्सर्वान्स्वां पुरीं स न्यवर्तत् । शङ्कमानस्तु तद्रक्षःकृत्याद्राजा सुदासजः ॥१६॥ परित्यत्याज मृगयां ततः प्रभृति नारद । गते बहुतिथे काले हयमेधमखं नृपः ॥१७॥ समारभे प्रसन्नात्मा वशिष्ठाद्यैर्मुनीश्वरैः । तत्र ब्रह्मादिदेवेभ्यो हविर्दत्त्वा यथाविधि ॥१८॥ समाप्य यज्ञनिष्क्रांतो वशिष्ठः स्नातकोऽपि च । अत्रान्तरे राक्षसोऽसौ नृपहिंसितभार्यकः ॥ कर्तुं प्रतिक्रिया राज्ञे समायातो रुषान्वितः ॥१९॥ स राक्षसस्तस्य गुरौ प्रयाते वशिष्ठवेषं तु तदैव धृत्वा । ॥२०॥ राजामभ्येत्य जगाद भोक्ष्ये मांसं समिच्छाम्यहमित्युवाच भूयः समास्थाय स सूपवेषं पक्वमामिषं मानुषमस्य चादात् । ॥२१॥ स्थितश्च राजापि हिरण्यपात्रे धृत्वागुरोरागमनं प्रतीक्षन् तन्मांसं हेमपात्रस्थं सौदासो विनयान्वितः । समागताय गुरवे ददौ तस्मै स सादरम् ॥२२॥ तं दृष्ट्वा चिन्तयामास गुरुः किमिति विस्मितः ॥२३॥ तटवर्ती वनमें घूमने लगा । धनुष की डोरी कान तक खींचे हुए तथा अकेले ही एक वन से दूसरे वन में जाते हुए राजा को मृग मिला । घोड़े पर सवार होकर उस मृग के पीछे दौड़ता हुआ अपने सैनिकों से बहुत दूर निकल गया । उसी समय उसने किसी गुफा में रति क्रीड़ा करते हुए व्याघ्र-युग्म को देखा । वह शीघ्र मृग का पीछा छोड़कर उन बाघों के सामने गया । धनुर्विद्या में प्रवीण उस राजा ने धनुष पर चढ़े हुए उस बाण से जो अत्यन्त तीक्ष्ण और जिसका फल आगे की ओर कुछ झुका हुआ था—मादा बाघ को मार गिराया । गिरते समय वह व्याघ्री छत्तीस योजन विस्तृत शरीर वाली एक भयङ्कर राक्षसी हो गई जिसने बादल के समान भयङ्कर चीत्कार किया ।।८-१३।। अपनी प्रिय स्त्री को इस प्रकार मरते देखकर वह व्याघ्र आकार वाला राक्षस क्रुद्ध हो गया और द्वेषपूर्वक यह कहता हुआ कि इसका बदला लूँगा, उस समय अन्तर्हित हो गया । यह घटना देखकर राजा भय से व्याकुल हो गया अपनी सेना के पास आकर सारी घटना कह दी और अपनी राजधानी को लौट आया । नारद ! उस राक्षस की प्रतिक्रिया के भय से उस दिन से राजा ने आखेट करना बन्द कर दिया । बहुत दिन बीत जाने पर प्रसन्न होकर राजा ने वसिष्ठ आदि मुनियों के साथ अश्वमेध यज्ञ प्रारम्भ किया । उस यज्ञ में विधिपूर्वक देवों को हवि प्रदान किया गया ।।१४-१८।। यज्ञ समाप्त होने पर वसिष्ठ जी स्नातकों के साथ चले गये । इसी बीच अवसर पाकर वह राक्षस—जिसकी भार्या को राजा ने मार डाला था—अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए क्रुद्ध होकर आया । वह राक्षस राजगुरु वसिष्ठ के चले जाने पर गुरु का ही वेष धारण कर राजा के पास आया और बोला—'मैं मांस भोजन करना चाहता हूँ' । पुनः शीघ्र ही वह पाचक (रसोइयाँ) का वेष धारण कर मनुष्य का मांस पकाकर राजा को दे दिया । राजा भी उस पक्व मांस को सोने के बर्तन में परस कर गुरु के आने की प्रतीक्षा करने लगा । राजा सुदास ने आगत गुरु को बड़े आदर के साथ उस सोने के पात्र में परसे हुए मांस को दे दिया ।।१६-२२।। उस को देखकर गुरु वसिष्ठ विस्मित हो गए सोचने लगे कि यह क्या है । अपनी ज्ञानदृष्टि द्वारा उन्होंने उस मांस को देख लिया । 'अहो ! राजा
५६ नारदीयपुराणम् अपश्यन्मानुषं मांसं परमेण समाधिना । अहोऽस्य राज्ञो दौःशील्यमभक्ष्यं दत्तवान्मम ॥२४॥ इति विस्मयमापन्नः प्रमन्युर्भवन्मुनिः । अभोज्यं मद्विघाताय दत्तं हि पृथिवीपते ॥२५॥ तस्मात्तवापि भवतु ह्ये तदेव हि भोजनम् । नृमांसं रक्षसामेव भोज्यं दत्तं मम त्वया ॥२६॥ तद्याहि राक्षसत्वं त्वं तदाहारोचितं नृप । इति शापं ददत्यस्मिन्सौदासो भयविह्वलः ॥२७॥ आज्ञप्तो भवतेवेति सकंपोऽस्य व्यजिज्ञपत् । भूयश्च चिन्तयामास वशिष्ठस्तेन नोदितः ॥२८॥ रक्षसा वंचितं भूपं ज्ञातवान् दिव्यचक्षुषा । राजापि जलमादाय वशिष्ठं शप्तुमुद्यतः ॥२६॥ समुद्यतं गुरुं शप्तं दृष्ट्वा भूयो रुषान्वितम् । मदयंती प्रिया तस्य प्रत्युवाचाथ सुव्रता ॥३०॥ मदयंत्युवाच भो क्षत्रियदायाद कोपं संहर्तुमर्हसि । त्वया यत्कर्म भोक्तव्यं तत्प्राप्तं नात्र संशयः ॥३१॥ गुरुं तुंकृत्य हुंकृत्य यो वदेन्मूढधीर्नरः । अरण्ये निर्जले देशे स भवेद्ब्रह्मराक्षसः ॥३२॥ जितेन्द्रिया जितक्रोधा गुरुशुश्रूषण रताः । प्रयान्ति ब्रह्मसदनमिति शास्त्रेषु निश्चयः ॥३३॥ तयोक्तो भूपतिः कोपं त्यक्त्वा भार्यां ननन्द च । जलं कुत्र क्षिपामीति चिन्तयामास चात्मना ॥३४॥ तज्जलं यत्र संसिक्तं तद्भवेद्भस्म निश्चितम् । इति मत्वा जलं तत्तु पादयोर्न्यक्षिपत्स्वयम् ॥३५॥ तज्जलस्पर्शमात्रेण पादौ कल्माषतां गतौ । कल्माषपाद इत्येवं ततः प्रभृति विस्तृतः ॥३६॥ कल्माषपादो मतिमान् प्रिययाश्वासितस्तदा । मनसा सोऽतिभीतस्तु ववन्दे चरणं गुरोः ॥३७॥ उवाच च प्रपन्नस्तं प्राञ्जलिनंयकोविदः । क्षमस्व भगवन्सर्वं नापराधः कृतो मया ॥३८॥ की यह नीचता कि इसने अभक्ष्य मांस मुझे भोजन के लिए दे दिया ! यह सोचकर आश्चर्य-चकित मुनि को अत्यन्त क्रोध हुआ । 'पृथ्वोपति ! तुमने मेरे सर्वनाश के लिए अभक्ष्य मांस दिया है, अतः तुम्हारा भी यही भोजन होगा मनुष्य का मांस राक्षसों का ही भोजन है, वही आज तुमने मुझे दिया इसलिये राजन् ! तुम उसी आहार के योग्य 'राक्षस' बनो, गुरु को इस प्रकार शाप देते देखकर राजा सौदास भय से विह्वल हो गया ॥२३-२७॥ कांपते हुए उसने कहा 'आपने ही तो ऐसी आज्ञा दी है । उसके ऐसा कहने पर वसिष्ठ जी पुनः सोचने लगे । अपनी दिव्य दृष्टि से उन्होंने जान लिया कि राक्षस ने राजा को ठग लिया । राजा भी हाथ में जल लेकर गुरु को शाप देने के लिए तैयार हो गया । क्रोधान्ध पति को गुरु को शाप देने के लिए उद्यत देखकर उसकी प्रिय व्रतशील भार्या मदयन्ती ने कहा ॥२८-३०॥ मदयंती बोली-क्षत्रिय-दायाद ! तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिए, जो कुछ भोगना है वही इस समय प्राप्त हुआ है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । जो मूर्ख मनुष्य गुरु से 'तुम कह कर, या हुँ कह कर' कुछ कहता है वह वनमें जलशून्य स्थान में ब्रह्मराक्षस होता है। इन्द्रियनिग्रही, परमशान्त और गुरु की शुश्रूषा में लीन रहने वाले मनुष्य ब्रह्मलोक में स्थान पाते हैं, ऐसा शास्त्रों का निर्णय है। पत्नी के इस प्रकार समझाने पर भूपति ने क्रोध छोड़ दिया और भार्या पर प्रसन्न हो गया। अपने मनमें सोचने लगा कि इस शाप जल को कहाँ फेंकूं, जहाँ यह जल फेंका जायगा वह तो अवश्य जल कर भस्म हो जायगा यह निश्चित है। यह सोचकर उस जल को अपने पैरों पर छोड़ दिया ॥३१-३५॥ उस जल के गिरते ही दोनों पैर काले हो गए। तभी से उसका नाम कल्माषपाद ही प्रसिद्ध हो गया । मतिमान् कल्माषपाद ने प्रिया के इस प्रकार समझाने पर कुछ आश्वस्त हुआ और मन में अत्यन्त भय से त्रस्त होकर गुरु के चरणों पर गिर पड़ा । नीति-विशारद राजा ने हाथ जोड़ कर विनीत भाव से कहा। भगवन् ! क्षमा कीजिए मैंने जान बूझकर अपराध नहीं किया है। मुनि ने राजा की
५७ नवमोऽध्यायः
तच्छ्रुत्वोवाच भूपालं मुनिर्निश्वस्य दुःखितः । आत्मानं गर्हयामास ह्यविवेकपरायणम् ॥३६॥ अविवेको हि सर्वेषामापदां परमं पदम् । विवेकरहितो लोके पशुरेव न संशयः ॥४०॥ राज्ञा त्वजानता नूनमेतत्कर्मोचितं कृतम् । विवेकरहितोऽज्ञोऽहं यतः पापं समाचरेत् ॥४१॥ विवेकनियतो याति यो वा को वापि निवृतिम् । विवेकहीनमाप्नोति को वा यो वाप्यनियतिम् ॥४२॥ इत्युक्त्वा चात्मनात्मानं प्रत्युवाच मुनिर्नृपम् । नात्यन्तिकं भवेदेतद्द्वादशाब्दं भविष्यति ॥४३॥ गङ्गाबिन्दुभिरिक्तस्तु त्यक्त्वा वै राक्षसीं तनुम् । पूर्वरूपं त्वमापन्नो भोक्ष्यसे मेदिनीमिमाम् ॥४४॥ तद्विन्दुसेकसंभूतज्ञानेन गतकल्मषः । हरिसेवापरो भूत्वा परां शान्तिं गमिष्यसि ॥४५॥ इत्युक्तवाथर्वविद्व्रूपं वशिष्ठः स्वाश्रमं ययौ । राजापि दुःखसंपन्नो राक्षसीं तनुमाश्रितः ॥४६॥ क्षुत्पिपासाविशेषात्तो नित्यं क्रोधपरायणः । कृष्णपक्षायुतिर्भीमो बभ्राम विजने वने ॥४७॥ मृगांश्च विविधांस्तत्र मानुषांश्च सरीसृपान् । विहङ्गमान्प्लवङ्गांश्च प्रशस्तांस्तानभक्षयत् ॥४८॥ अस्थिभिर्बहुभिर्भूयः पीतरक्तकलेवरैः । रक्तान्तप्रेतकेशैश्च चितासीद्भूर्भयंकरी ॥४६॥ ऋतुत्रये स पृथिवीं शतयोजनविस्तृताम् । कृत्वातिदुःखितां पश्चाद्वनान्तरमुपागमत् ॥५०॥ तत्रापि कृतवान्नित्यं नरमांसाशनं सदा । जगाम नर्मदातीरं मुनिसिद्धनिषेवितम् ॥५१॥ विचरन्नर्मदातीरे सर्वलोकभयंकरः । अपश्यत्कंचन मुनिं रमन्तं प्रियया सह ॥५२॥ क्षुधानलेन संतप्तस्तं मुनिं समुपाद्रवत् । जग्राह चातिवेगेन व्याधो मृगशिशुं यथा ॥५३॥
बातें सुनकर लंबी सांस ली और दुःखी होकर अपनी विवेकहीनता को कोसते हुए राजा से बोले-- 'अविवेक सब आपत्तियों का एकमात्र स्थान है, इस लोक में विवेकशून्य प्राणी पशु के तुल्य है; इसमें कुछ भी सन्देह नहीं ॥३६-४०॥ राजा ने तो अज्ञान वश ऐसा कर्म किया है जो कि सबसे हो सकता है, किन्तु मैं तो विवेक शून्य, अज्ञ हूँ कि सब कुछ जानता हुआ भी ऐसा पाप कर्म कर डाला । विवेक से युक्त कोई भी मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है और विवेकहीन को सांसारिक बंधन प्राप्त होता है ॥४१-४२॥ इस प्रकार स्वयं अपने प्रति पश्चात्ताप सूचक बातें कहकर मुनि ने राजा से कहा 'यह शाप अधिक दिनों तक नहीं केवल बारह वर्ष तक ही रहेगा'। पुनः गंगाजल के अभिषेक से अपने राक्षस शरीर को छोड़कर पूर्व शरीर प्राप्त कर लोगे और तब इस साम्राज्य का उपभोग करोगे । उस गंगाजल के अभिषेक से ज्ञान प्राप्त होगा और तब निष्पाप होकर हरिसेवा में रुचि होगी जिसके फलस्वरूप परम शान्ति पा जाओगे ॥४३-४५॥ राजा से यह कहकर अथर्व-ज्ञाता वसिष्ठ जी अपने आश्रम को चले गए । राजा भी राक्षस शरीर पाकर दुःखी हो गया । भूख-प्यास से व्याकुल होकर नित्य प्रति क्रोध में ही जलता रहता था, उसका शरीर अमावस्या की रात्रि के समान कृष्ण वर्ण और भयंकर हो गया । इस प्रकार वह राक्षस बन कर विजन वन में इधर-उधर भटकने लगा । वन में विविध पशुओं मनुष्यों और रेंगकर चलने वाले जीवों, पक्षियों, वन्दरों एवं अन्य जीवों को खाता फिरता था। वन की सारी भूमि मरे हुए जीवों की अनगिनत हड्डियों, पीले और लाल रंग के कटे हुए अंगों, मृतकों के रक्त से सने बालों से अद्भुत और भयंकर बन गई ॥४६-४६॥ तीनों ऋतुओं में वह सौ योजन विस्तृत भू भाग को अपने अत्याचार से प्राणि-हीन बना दूसरे वनमें चला गया । वहाँ भी वह नित्य मनुष्यों की हत्या कर सर्वदा नर मांस खाता फिरता था। एक दिन सारे संसार को भयभीत करने वाला वह राक्षस नर्मदा तट पर घूमता हुआ सिद्धों और मुनियों के प्रदेश में पहुँचा । वहाँ उसने किसी मुनि को प्रिया के साथ विहार करते हुए देखा । क्षुधा-ज्वाला से जला वह उस मुनि की ओर बड़े वेग से झपटा और जिस ८--नार०
५८ नारदीयपुराणम् ब्राह्मणी स्वपतिं वीक्ष्य निशाचरकरस्थितम् । शिरस्यञ्जलिमाधाय प्रोवाच भयविह्वला ॥५४॥ ब्राह्मप्युवाच भो भो नृपतिशार्दूल त्राहि मां भयविह्वलाम् । प्रियप्राणप्रदानेन कुरु पूर्णमनोरथाम् ॥५५॥ नाम्ना मित्रसहस्त्वं हि सूर्यवंशसमुद्भवः । न राक्षसस्ततोऽनाथां पाहि मां विजने वने ॥५६॥ या नारी भर्तृरहिता जीवत्यपि मृतोपमा । तथापि बालवैधव्यं किं वक्ष्याम्यरिमर्दन ॥५७॥ न मातापितरौ जाने नापि बंधुं च कंचन । पतिरेव परो बंधुः परमं जीवनं मम ॥५८॥ भवान्वेत्यखिलान्धर्मान्योषितां वर्त्तनं यथा । त्रायस्व बन्धुरहितां बालापत्यां जनेश्वर ॥५९॥ कथं जीवामि पत्यास्मिन्हीना हि विजने वने । दुहिताहं भगवतस्त्राहि मां पतिदानतः ॥६०॥ प्राणदानानात्परं दानं न भूतं न भविष्यति । वदन्तीति महाप्राज्ञाः प्राणदानं कुरुष्व मे ॥६१॥ इत्युक्त्वा सा पापातस्य राक्षसस्य पदाग्रतः । एवं संप्राथ्यमानोऽपि ब्राह्मण्या राक्षसो द्विजम् अभक्षयत्कृष्णसारशिशुं व्याघ्रो यथा बलात् । ॥६२॥ ततो विलप्य बहुधा तस्य पत्नी पतिव्रता । पूर्वशापहतं भूपमशपत्क्रोधित पुनः ॥६३॥ पतिं मे सुरतासक्तं यस्माद्धिसितवान्बलात् । तस्मात्स्त्रीसङ्गमं प्राप्तस्त्वमपि प्राप्स्यसे मृतिम् ॥६४॥ शप्त्वैवं ब्राह्मणी क्रुद्धा पुनः शापान्तरं ददौ । राक्षसत्वं ध्रुवं तेऽस्तु मत्पतिर्भक्षितो यतः ॥६५॥ सोऽपि शापद्वयं श्रुत्वा तया दत्तं निशाचरः । प्रमन्युः प्राह विसृजन्कोपादङ्गारसंचयम् ॥६६॥ दुष्टे कस्मात्प्रदत्तं मे वृथा शापद्वयं त्वया । एकस्यैवापराधस्य शापस्त्वेको ममोचितः ॥ ६७॥
प्रकार व्याघ्र मृगशावक को पकड़ लेता है उसी प्रकार मुनि को उसने पकड़ लिया । ब्राह्मणी अपने पति को राक्षस के पंजे में फंसा देखकर भयविह्वल हो गई और हाथ जोड़कर राक्षस से बोली ॥५०-५४॥ ब्राह्मणी बोली—'हे भूपश्रेष्ठ ! भय से व्याकुल मेरी रक्षा करो, मेरे पति के प्राणों को देकर मुझे कृतकृत्य करो । तुम सूर्य वंश के मित्रसह नामक नरपाल हो, राक्षस नहीं हो अप: भूपाल होने के नाते इस निर्जन वन में मेरी रक्षा करो । जो नारी पतिहीन है वह जीते हुए भी मरे के समान है, तिस पर बालवैधव्य तो और ही कष्टकर है । अरिसूदन ! इस विषय में और क्या कहूँ । इस समय न तो मेरे माता-पिता अथवा कोई बन्धु ही हैं, केवल पति ही मेरे सर्वस्व और एक मात्र आधार हैं। आप सब धर्म तत्त्वों को जानते हैं और यह भी जानते हैं कि नारी जीवन का आधार क्या है, नरपाल ! असहाय शिशु सन्तान वाली, मेरी रक्षा करो, इस निर्जन वन में पति के अवलम्ब के बिना कैसे जी सकूँगी ? मैं आपकी पुत्री हूँ मुझे पतिदान देकर रक्षा कीजिए ॥५५-६०॥ प्राणदान से बढ़कर कोई दूसरा दान न तो है न होगा, ऐसा महाबुद्धिमान् व्यक्ति कहते हैं । यह कहकर वह राक्षस के चरणों के समीप गिर पड़ी। ब्राह्मणो के इस प्रकार प्रार्थना करने पर भी उस राक्षस ने कुछ ध्यान नहीं दिया और उस ब्राह्मण को इस प्रकार खा गया जिस प्रकार बाघ काले मृग छौने को हठात् खा जाता है ॥६१-६२॥ इसके बाद उसकी पतिव्रता ब्राह्मणो बहुत विलाप करने लगी और क्रुद्ध होकर पहले से ही शाप प्राप्त उस राजा को शाप दे दिया कि जिस लिए तुमने रति आसक्त मेरे पति को क्रूरता पूर्वक मार डाला है इसलिए तुम भी कभी स्त्री प्रसङ्ग करोगे तभी मर जाओगे । तुमने मेरे पति को खा लिया है इसलिए तुम्हारा यह राक्षस भाव सर्वदा के लिए स्थिर रहेगा । वह निशाचर भी ब्राह्मणी के दिये हुए दो शापों को सुनकर क्रोधान्ध हो गया और क्रोध से अग्नि की ज्वाला बरसाता हुआ सा बोला- दुष्टे ! तुमने व्यर्थ मुझे दो शाप क्यों दे दिये । एक अपराध के लिए एक ही शाप उचित था परन्तु
नवमोऽध्यायः ५६ यस्मात्क्षिपसि दुष्टाग्रे मयि शापान्तरं ततः । पिशाचयोनिमद्यैव याहि पुत्रसमन्विता ॥६८॥ तेनैवं ब्राह्मणी शप्ता पिशाचत्वं तदा गता । क्षुधार्ता सुस्वरं भीमा रुरोदापत्यसंयुता ॥६९॥ राक्षसश्च पिशाची च क्रोशन्तौ निर्जने वने । जग्मतुर्नर्मदातीरे वनं राक्षससेवितम् ॥७०॥ औदासीन्यं गुरौ कृत्वा राक्षसों तनुमाश्रितः । तत्रास्ते दुःखसंतप्तः कश्चिल्लोकविरोधकृत् ॥७१॥ राक्षसं च पिशाचीं दृष्ट्वा स्ववटमागतौ । उवाच क्रोधबहुलो वटस्थो ब्रह्मराक्षसः ॥७२॥ किमर्थमागतौ भीमौ युवां मत्स्थानमीप्सितम् । ईदृशो केन पापेन जातौ मे ब्रूवतां ध्रुवम् ॥७३॥ सौदासस्तद्वचः श्रुत्वा तया यच्चात्मना कृतम् । सर्वं निवेदयित्वास्मै पश्चादेतदुवाच ह ॥७४॥ सौदास उवाच कस्त्वं वद महाभाग त्वया वै किं कृतं पुरा । सख्यम॑र्मातिस्नेहेन तत्सर्वं वक्तुमर्हसि ॥७५॥ करोति वञ्चनं मित्रे यो वा को वापि दुष्टधीः । स हि पापफलं भुंक्ते यातनास्तु युगायुतम् ॥७६॥ जन्तूनां सर्वदुःखानि क्षीयन्ते मित्रदर्शनात् । तस्मान्मित्रेषु मतिमान्न कुर्याद्वञ्चनं कदा ॥७७॥ कल्मषापादेनेत्युक्तो वटस्थो ब्रह्मराक्षसः । उवाच प्रीतिमापन्नो धर्मवाक्यानि नारद ॥७८॥ ब्रह्मराक्षस उवाच अहमासं पुरा विप्रो मागधो वेदपारगः । सोमदत्त इति ख्यातो नाम्ना धर्मपरायणः ॥७९॥ प्रमत्तोऽहं महाभाग विद्यया वयसा धनैः । औदासीन्यं गुरोः कृत्वा प्राप्तवानीदृशीं गतिम् ॥८०॥ न लभेऽहं सुखं किंचिन्नराहारोऽतिदुःखितः । मया तु भक्षिता विप्राः शतशोऽथ सहस्रशः ॥८१॥ तुमने मुझ दुष्ट के ऊपर दूसरा शाप भी रख दिया इसलिए तुम अभी अपने पुत्र के सहित पिशाच योनि को प्राप्त हो जाओ ॥६३-६८॥ उस राक्षस से इस प्रकार शाप पाकर वह ब्राह्मणी तत्काल राक्षसी हो गई । पुत्र सहित वह भयङ्कर आकार वाली राक्षसी भूख प्यास से व्याकुल होकर जोर-जोर से चिल्लाने लगी । रोते चिल्लाते हुए वे दोनों राक्षस और पिशाची उस निर्जन वनमें घूमने लगे । घूमते हुए वे दोनों नर्मदा-तटवर्ती उस वनमें गए जहाँ गुरु की अवज्ञा के कारण राक्षस बन कर एक दूसरा दुःखो लोकविरोधी राक्षस रहता था । उस राक्षस और पिशाची को अपने वट की ओर आते देख कर उस वट पर रहने वाले ब्रह्म राक्षस ने क्रोध पूर्वक कहा ॥६६-७२॥ भयङ्कर आकार वाले तुम दोनों क्यों मेरे इस प्रिय निवास स्थान पर आए ? ऐसा कौन सा पाप किया जिससे तुम दोनों राक्षस हो गए, सारी बातें मुझसे पूर्ण रूप से कहो । सौदास ने स्वयं और उस पिशाची ने जो कुछ किया था कह दिया और उसके बाद उस ब्रह्मराक्षस से पूछा ॥७३-७४॥ सौदास बोला- महाभाग ! तुम कौन हो, तुमने इसके पूर्व कौन सा पाप किया, कहो । तुम मेरे सखा हो, इसलिए प्रेमपूर्वक सारी बातें तुम अवश्य कहो । जो कोई दुष्टबुद्धि अपने मित्र के प्रति वंचना करता है वह दस हजार युगों तक उस पाप का फल भोगता है । प्राणियों के सभी दुःख मित्रदर्शन से नष्ट हो जाते हैं । इसलिये बुद्धिमान् व्यक्ति मित्रों के प्रति कभी भी कपट व्यवहार नहीं करते हैं । कल्माषपाद के ऐसा कहने पर वट- निवासी ब्रह्मराक्षस ने प्रसन्न होकर धर्म युक्त बातें कहीं ॥७५-७८॥ ब्रह्मराक्षस बोला- मैं पहले सोमदत्त नामक परम धार्मिक वेदज्ञ और मगध देश का रहने वाला ब्राह्मण था । महाभाग ! विद्या, युवावस्था और धन के मद से मतवाला होकर गुरु का अपमान कर दिया जिससे इस गति को प्राप्त हुआ हूँ । मित्र ! इस अवस्था में कहीं भी किसी प्रकार का सुख नहीं पा रहा हूँ, केवल निराहार
६० नारदीयपुराणम् क्षुत्पिपासापरो नित्यमन्तस्तापेन पीडितः । जगत्त्रासकरो नित्यं मांसाशनपरायणः ॥८२॥ गुर्ववज्ञा मनुष्याणां राक्षसत्वप्रदायिनी । मयानुभूतमेतद्धि ततः श्रीमान्न चाचरेत् ॥८३॥ कल्माषपाद उवाच गुरुस्तु कीदृशः प्रोक्तः कस्त्वया श्लाघितः पुरा । तद्वदस्व सखे सर्वं परं कौतूहलं हि मे ॥८४॥ ब्रह्मराक्षस उवाच गुरवः सन्ति बहवः पूज्या वन्द्याश्च सादरम् । तानहं कथयिष्यामि शृणुष्वैकमनाः सखे ॥८५॥ अध्यापकश्च वेदानां वेदार्थद्युतिबोधकः । शास्त्रवक्ता धर्मवक्ता नीतिशास्त्रोपदेशकः ॥८६॥ मन्त्रोपदेशव्याख्याकृद् देसंदेहहृत्तथा । व्रतोपदेशकश्चैव भयत्रातान्नदो हि च ॥८७॥ श्वशुरो मातुलश्चैव ज्येष्ठभ्राता पिता तथा । उपनेता निवेक्ता च संस्कर्ता द्विजसत्तम ॥८८॥ एते हि गुरवः प्रोक्ता पूज्या वन्द्याश्च सादरम् ॥८६॥ कल्माषपाद उवाच गुरवो बहवः प्रोक्ता एतेषां कतमो वरः । तुल्याः सर्वेऽप्युत सखे तद्यथावद्धि ब्रूहि मे ॥६०॥ ब्रह्मराक्षस उवाच साधु साधु महाप्राज्ञ यत्पृष्टं तद्ददामि ते । गुरुमाहात्म्यकथनं श्रवणं चानुमोदनम् ॥६१॥ सर्वेषां श्रेय आधत्ते तस्माद्वक्ष्यामि सांप्रतम् । एते समानपूजार्हाः सर्वदा नात्र संशयः ॥६२॥ रहकर दुःखमय जीवन बिता रहा हूँ। मैंने सैकड़ों हजारों दीन ब्राह्मणों को अपना आहार बना डाला । अतः नित्य प्रति भूखा प्यासा रह कर भूख की ज्वाला से जलता रहता हूँ। नित्य प्रति मांस-भक्षण में ही लगा रहता और संसार को त्रस्त करता रहता हूँ। गुरु का अपमान मनुष्य को राक्षस बना देता है, इसका पूर्ण रूप से अनुभव मुझे हो गया है । इसलिए बुद्धिमान् व्यक्ति कभी भी गुरु का अपमान न करें । ॥७६-८३॥ कल्माषपाद बोला-गुरु किसे कहते हैं ? कौन तुम्हारे गुरु थे, जिसके प्रति पहले पूज्य भावना थी ? मित्र ! सारी बातें मुझसे कहो; मुझे महान् कौतूहल हो रहा है। ब्रह्मराक्षस बोला-सखे ! गुरु बहुत प्रकार के होते हैं जो आदर पूर्वक पूजने और वन्दना करने के योग्य हैं, उनके विषय में मैं कह रहा हूँ सावधान होकर सुनो। वेदों को पढ़ाने वाले, वेदार्थ की अर्थ संगति बताने वाले, शास्त्रोपदेशक, नीतिशास्त्र का उपदेश देने वाले, मन्त्रोपदेशक, भाष्यकार, सन्देह निवारण करने वाले, व्रतोपदेशक, भय से रक्षा करने वाले, अन्नदाता, पत्नी के पिता, मामा, बड़े भाई, पिता (पालक), उपनयन करने वाला, उत्पादक (जन्मदाता), और संस्कार करने वाला इतने गुरु कहे गये हैं जो सर्वथा वन्दनीय और पूजनोय हैं ॥८४-८६॥ कल्माषपाद बोला-गुरु तो बहुत से कहे गए हैं; इनमें कौन श्रेष्ठ हैं ? अथवा सभी समान हैं ? इसको अपनी बुद्धि के अनुसार मुझसे कहो । ब्रह्मराक्षस बोला-महाप्राज्ञ ! तुम धन्य हो ! धन्य हो ! तुमने जो पूछा है उसको अवश्य कहूँगा। गुरु की महिमा का वर्णन करना और उसकी सुनना सब को कल्याण प्रदान करते हैं। इसलिए इस समय गुरु-
नवमोऽध्यायः ६१ तथापि शृणु वक्ष्यामि शास्त्राणां सारनिश्चयम् । अध्यापकश्च वेदानां मन्त्रव्याख्याकृतस्तथा ॥६३॥ पिता च धर्मवक्ता च विशेषगुरवः स्मृताः । एतेषामपि भूपाल शृणुष्व प्रवरं गुरुम् ॥६४॥ सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञैर्भाषितं प्रवदामि ते । यः पुराणानि वदति धर्मयुक्तानि पण्डितः ॥६५॥ संसारपाशविच्छेदकरणानि स उत्तमः । देवपूजार्हकर्माणि देवतापूजने फलम् ॥६६॥ जायते च पुराणेभ्यस्तस्मात्तानीह देवताः । सर्ववेदार्थसाराणि पुराणानीति भूपते ॥६७॥ वदन्ति मुनयश्चैव तद्वक्ता परमो गुरुः । यः संसारार्णवं तर्तुमुद्योगं कुरुते नरः ॥६८॥ शृणुयात्स पुराणानि इति शास्त्रविभागकृत् । प्रोक्तान्सर्वधर्मांश्च पुराणेषु महीपते ॥६९॥ तर्कस्तु वादहेतुः स्यान्नीतिस्त्वैहिकसाधनम् । पुराणानि महाबुद्धे इहामुत्र सुखाय हि ॥१००॥ यः शृणोति पुराणानि सततं भक्तिसंयुतः । तस्य स्यान्निर्मला बुद्धर्भूयो धर्मपरायणः ॥१०१॥ पुराणश्रवणाद्भक्तिर्जायते श्रीपतौ शुभा । विष्णुभक्तनृणां भूप धर्मबुद्धिः प्रवर्तते ॥१०२॥ धर्मात्पापानि नश्यन्ति ज्ञानं शुद्धं च जायते । धर्मार्थकाममोक्षाणां ये फलान्यभिलिप्सवः ॥१०३॥ शृणुयुस्ते पुराणानि प्राहुरित्थं पुराविदः । अहं तु गौतममुनेः सर्वज्ञब्रह्मवादिनः ॥१०४॥ श्रुतवान्सर्वधर्मार्थं गङ्गातीरे मनोरमे । कदाचित्परमेशस्य पूजां कर्तुमहं गतः ॥१०५॥ उपस्थितायापि तस्मै प्रणामं न ह्यकारिषम् । स तु शान्तो महाबुद्धिर्गौतमस्तेजसां निधिः ॥१०६॥ मन्त्रोदितानि कर्माणि करोतीति मुदं ययौ । यस्त्वर्चितो मया देवः शिवः सर्वजगद्गुरुः ॥१०७॥ गुर्ववज्ञा कृता येन राक्षसत्वे नियुक्तवान् । ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि योऽवज्ञां कुरुते गुरोः ॥१०८॥ महिमा कह रहा हूँ । ये सभी गुरु समान भाव से पूज्य हैं, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । फिर भी शास्त्रों में जो कुछ तत्त्व-निर्णय किया गया है उसको कह रहा हूँ, सुनो । वेद पढ़ाने वाले, मन्त्र की व्याख्या करने वाले, पिता और धर्मोपदेशक विशेष (उत्तम) गुरु कहे गये हैं । इनमें भी जो परमोत्तम गुरु है उनको सुनो ॥६०-६४॥ सब शास्त्रों के तत्त्वों के ज्ञाता पण्डितों ने इस विषय में जो कुछ कहा है उसको तुमसे बता रहा हूँ । पुराणों से संसार के बन्धनों से मुक्ति दिलाने वाली विधियाँ, देव-पूजन प्रकार, उनके फल आदि जाने जाते हैं अतः वे पुराण देवता हैं और इन धार्मिक पुराणों के प्रवक्ता पण्डित ही उत्तम गुरु हैं । भूपते ! पुराण सब वेदों के सारभूत हैं और उनके वक्ता परम गुरु हैं ऐसा मुनिगण कहते हैं । जो इस संसार सागर से पार पाने का उद्योग करते हैं वे पुराणों को अवश्य सुनें; ऐसा शास्त्रों के विभाग करने वाले पण्डितों ने कहा है । राजन् ! पुराणों में सब प्रकार के धर्म कहे गए हैं । तर्क शास्त्र केवल विवाद में सहायक होता है, नीतिशास्त्र केवल सांसारिक सुख प्रदान करता है; परन्तु हे महाबुद्धि मान् ! पुराण लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार के कल्याण देने वाले हैं ॥६५-१००॥ जो सर्वदा भक्ति पूर्वक पुराणों का श्रवण करता है उसकी बुद्धि निर्मल होती है और वह परम धार्मिक हो जाता है । पुराणों के सुनने से श्रीपति विष्णु में अचल भक्ति होती है । भूप ! विष्णुभक्तों की धर्माचरण में रुचि बढ़ती है । धर्म से पाप नष्ट हो जाते हैं और शुद्ध ज्ञान प्राप्त हो जाता है । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का फल जो प्राप्त करना चाहते हैं उनको अवश्य पुराण श्रवण करना चाहिए, ऐसा पुराणविद् कहते हैं । गंगा के मनोरम तट पर मैंने सर्वज्ञ, ब्रह्म- वादी गौतम मुनि से सब धर्मों का सार सुना था । एक दिन मैं परम प्रभु (शिव) की पूजा करने के लिए गया । ॥१०१-१०५॥ उपस्थित होते हुए भी गौतम मुनि को मैंने प्रणाम नहीं किया; परन्तु वे परम तेजस्वी शान्त मुनि यह सोचकर कि यह मन्त्रानुकूल कर्म को कर रहा है, प्रसन्न होकर चले गए । परन्तु मैं जिन देवेश जगद् गुरु शंकर की पूजा कर रहा था उन्होंने गुरु-अपमान के कारण मुझको इस राक्षस-योनि में भेज दिया । जान- बूझ कर या अनजान रूप से भी जो गुरु का तिरस्कार करता है उसकी बुद्धि, विद्या, धन, पुत्र तथा सारी क्रियायें
६२ नारदीयपुराणम् तस्यैवाशु प्रणश्यन्ति धीविद्यार्थात्मजैक्रियाः । शुश्रूषां कुरुते यस्तु गुरूणां सादरं नरः ॥१०८॥ तस्य संपद्भवेद्भूष इति प्राहुर्विपश्चितः । तेन शापेन दग्धोऽहमन्तश्चैव क्षुधाग्निना ॥११०॥ मोक्षं कदा प्रयस्यामि न जाने नृपसत्तम । एवं वदति विप्रेन्द्र वटस्थेऽस्मिन्निशाचरे ॥१११॥ धर्मशास्त्रप्रसंगेन तयोः पापं क्षयं गतम् । एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तः कश्चिद्विप Generic्रोऽतिधार्मिकः ॥११२॥ कलिङ्गदेशसंसूतो नाम्ना गर्ग इति स्मृतः । वहन्गङ्गाजलं स्कंधे स्तुवन् विश्वेश्वरं प्रभुम् ॥११३॥ गायन्नामानि तस्यैव मुदा हृष्टतनूरुहः । तमागतं मुनिं दृष्ट्वा पिशाचीराक्षसौ च तौ ॥११४॥ प्राप्ता नः पारणेत्युक्त्वा प्राद्रवन्नूर्ध्वबाहवः । तेन कीर्तितनामानि श्रुत्वा दूरे व्यवस्थिताः । अशक्तास्तं धर्षयितुमिदमूचुश्च राक्षसाः ॥११५॥ अहो विप्र महाभाग नमस्तुभ्यं महात्मने । नामकीर्तनमाहात्म्याद्राक्षसा दूरगा वयम् ॥११६॥ अस्माभिर्भक्षिताः पूर्वं विप्राः कोटिसहस्रशः । नामप्रावरणं विप्र रक्षति त्वां महाभयात् ॥११७॥ नामश्रवणमात्रेण राक्षसा अपि भो वयम् । परां शान्ति समापन्ना महिम्ना ह्यच्युतस्य वै ॥११८॥ सर्वथा त्वं महाभाग रागादिरहितो ह्यसि । गंगाजिलाभिषेकेन पाह्मास्मान्महापातकोच्चयात् ॥११९॥ हरिसेवापरो भूत्वा यश्चात्मानं तु तारयेत् । स तारयेज्जगत्सर्वमिति शंसन्ति सूरयः ॥१२०॥ अपहाय हरेर्नाम घोरसंसारभेषजम् । केनोपायेन लभ्येत मुक्तिः सर्वत्र दुर्लभा ॥१२१॥ लोहोडुपेन प्रतरन्निमज्जत्युदके यथा । तथैवाकृतपुण्यास्तु तारयन्ति कथं परान् ॥१२२॥ अहो चरित्रं महतां सर्वलोकसुखावहम् । यथा हि सर्वलोकानामानन्दाय कलानिधिः ॥१२३॥ नष्ट हो जाती हैं। जो मनुष्य आदर पूर्वक गुरु की शुश्रूषा करता है, भूपाल ! उसको अवश्य सम्पत्ति मिलती है और वह सुखी रहता है, ऐसा विद्वान् कहते हैं। उस शाप से ही मैं नष्ट हो गया और इस प्रकार भूख की ज्वाला से सदा जलता रहता हूँ ॥१०६-११०॥ नृपसत्तम ! कब इस योनि से छुटकारा मिलेगा, मैं नहीं जानता। विप्रेन्द्र ! इस प्रकार वट पर रहने वाले निशाचर से वार्तालाप करने पर धर्मशास्त्र की चर्चा के प्रभाव से उन दोनों के पाप क्षीण हो गए। इसी बीच कलिङ्ग देश का रहने वाला गर्ग नामक अति धार्मिक ब्राह्मण वहाँ आया जो कन्धे पर गंगाजल लिए हुए था और विश्वेश्वर प्रभु की स्तुति कर रहा था । भगवान् के नामों का उच्चारण करता हुआ वह भक्त आनन्दा- तिरेक से पुलकित हो जाता था । उस मुनि को अपनी ओर आते देखकर वे दोनों पिशाची और राक्षस 'आज हम लोगों को भोजन मिल गया, यह कह कर हाथ ऊपर उठाए हुए उस मुनि की ओर दौड़े परन्तु उसके नामो- च्चारण को सुनकर दूर ही ठिठक गए। उस मुनि पर आक्रमण करने में अपने को असमर्थ पाकर उन दोनों राक्षसों ने कहा ॥१११-११५॥ हे महाभाग विप्र ! आप महात्मा को नमस्कार है, आपके नाम संकीर्तन के प्रभाव से हम दोनों राक्षस दूरस्थ ही हैं। पहले हम लोगों ने हजारों करोड़ों ब्राह्मणों को अपना आहार बना डाला परन्तु आज तुमको भगवन्नामोच्चारण रूपी कवच महाभय (मृत्यु) से बचा रहा है। नाम श्रवण मात्र से राक्षस होते हुए भी हम दोनों भगवान् अच्युत की महिमा से परम शान्ति का अनुभव कर रहे हैं ॥११६-११८॥ महाभाग ! तुम तो सर्वथा रागादि दोषों से शून्य हो, अतः गंगाजल के अभिषेक से हमें इस महापाप से बचाओ। जो हरिसेवा में निरत रह कर आत्मोद्धार करता है वह सारे संसार का उद्धार कर सकता है, ऐसा मनीषीजन कहते हैं। हरिनाम को छोड़ कर इस कराल माया से मुक्ति दिलाने वाली कोई दूसरी ओषधि नहीं है। इसको छोड़ कर किसी दूसरे उपाय से नहीं प्राप्त की जा सकती है। वह तो सर्वथा और सर्वदा परम दुर्लभ है। जिस प्रकार लोहे की बनी नौका के सहारे तैरने का साहस करने वाला बीच में डूब जाता है। उसी प्रकार अकृतपुण्य (पापी) कैसे
६३ नवमोऽध्यायः पृथिव्यां यानि तीर्थानि पवित्राणि द्विजोत्तम । तानि सर्वाणि गङ्गायाः कणस्यापि समानि न ॥१२४॥ तुलसीदलसंमिश्रमपि सर्षपमात्रकम् । गङ्गाजलं पुनात्येव कुलानामेकविंशतिम् ॥१२५॥ तस्माद्विप्र महाभाग सर्वशास्त्रार्थकोविद । गङ्गाजलप्रदानेन पाह्मास्मान्पापकर्मिणः ॥१२६॥ इत्याख्यातं राक्षसैस्तैर्गङ्गामाहात्म्यमुत्तमम् । निशम्य विस्मयाविष्टो बभूव द्विजसत्तमः ॥१२७॥ एषामपीदृशी भक्तिर्गङ्गायां लोकमातरि । किमु ज्ञानप्रभावाणां महतां पुण्यशालिनाम् ॥१२८॥ अथासौ मनसा धर्मं विनिश्चित्य द्विजोत्तमः । सर्वभूतहितो भक्तः प्राप्नोतीति परं पदम् ॥१२९॥ ततो विप्रः कृपाविष्टो गङ्गाजलमनुत्तमम् । तुलसीदलसंमिश्रं तेषु रक्षःस्वसेचयत् ॥१३०॥ राक्षसास्तेन सिक्तास्तु सर्षपोपमर्बिदुना । विसृज्य राक्षसं भावमभवन्देवतोपमाः ॥१३१॥ ब्राह्मणी पुत्रसंयुक्ता सोमदत्तस्तथैव च । कोटिसूर्यप्रतीकाशा बभूवुर्विबुधर्षभाः ॥१३२॥ शंखचक्रगदाचिह्ना हरिसारूप्यमागताः । स्तुवन्तो ब्राह्मणं सम्यक्ते जग्मुर्हरिमन्दिरम् ॥१३३॥ राजा कल्मषपादस्तु निजरूपं समास्थितः । जगाम महतीं चिन्तां दृष्ट्वा तान्मुक्तिगानधान् ॥१३४॥ तस्मिन् राज्ञि सुदुःखार्त गूढरूपा सरस्वती । धर्ममूलं महावाक्यं बभाषेऽगाधया गिरा ॥१३५॥ भो भो राजन्महाभाग न दुःखं गन्तुमर्हसि । राजंस्तवापि भोगान्ते महच्छ्रेयो भविष्यति ॥१३६॥ सत्कर्मधूतपापा ये हरिभक्तिपरायणाः । प्रयान्ति नात्र सन्देहस्तद्विष्णोः परमं पदम् ॥१३७॥ सर्वभूतदयायुक्ता धर्ममार्गप्रवर्तिनः । प्रयान्ति परमं स्थानं गुरुपूजापरायणाः ॥१३८॥ दूसरों का उद्धार कर सकते हैं ? अहो ! महान् व्यक्तियों का चरित्र उसी प्रकार सब लोगों के लिए सुख दायक होता है जिस प्रकार चन्द्रमा का उदय सब प्राणियों के लिए आनन्ददायक होता है। द्विजवर्य ! इस भूतल के जितने पवित्र तीर्थ हैं वे सभी गंगाजल के क्षुद्र अंश की भी समानता नहीं कर सकते ॥११६-१२४॥ तुलसी दल से मिला गंगाजल का एक सरसों के बराबर बिन्दु भी इक्कीस कुल परम्परा का उद्धार करता है । इसलिए हे सब शास्त्रों के तत्त्वज्ञ ! महाभाग विप्र ! गंगाजल को देकर हम पापियों का उद्धार करो । इस प्रकार उन राक्षसों ने गंगा का उत्तम माहात्म्य कह कर सुनाया ॥१२५-१२७॥ इस बातों को सुनकर वह द्विज आश्चर्य चकित हो गया कि जब इन पाप परायण जनों की भी लोक-माता गंगा में यह श्रद्धा है तब तो ज्ञानी महात्माओं के विषय में क्या कहा जाय ? द्विजोत्तम ! इसके अनन्तर उस भद्र पुरुष ने विचार पूर्वक अपना कर्त्तव्य निश्चित किया कि सब प्राणियों की हित कामना में रत रहने वाला भक्त अवश्यमेव परम पद को प्राप्त करता है । तदन्तर उस विप्र ने कृपा करके तुलसीदल मिश्रित गंगा जल उन राक्षसों पर छिड़का । केवल सरसों के बराबर गंगाजल-विन्दु के अभिषेक मात्र से वे सब राक्षस शरीर को छोड़कर देवता के समान हो गए । ।१२८-१३१॥ पुत्र के सहित वह ब्राह्मणी और सोमदत्त कोटि सूर्य के समान तेजोमय शरीर वाले देवता हो गए ओर शंख, चक्र, गदा धारी हरि के समान रूप पा गए। वे उस ब्राह्मण की भलीभांति स्तुति करने के बाद भगवान् के मन्दिर में गए। राजा कल्माषपाद अभी अपने को राक्षस रूप में ही पाकर और उन पापी सहयोगियों को मुक्त देखकर घोर चिन्ता करने लगा । राजा को इस प्रकार चिन्तातुरदे खकर सरस्वती ने अप्रत्यक्ष रूप से गम्भीर स्वर में धर्म-सम्मत बातें कहीं । हे राजन् ! महाभाग ! दुःखी होने की आवश्यकता नहीं, राजन् तुम भी कर्म-भोग के अनन्तर महान् श्रेय प्राप्त करोगे ॥१३२-१३६॥ जिन्होंने सत्कर्मों के द्वारा अपने पापों को विनष्ट कर दिया है और हरि पूजा में जो सर्वथा लीन हैं वे अवश्यमेव परम पद को प्राप्त करते हैं । निखिल प्राणिसमूह पर दया करने वाले धर्म की प्रतिष्ठा करने वाले और गुरुपूजा में निरत रहने वाले परम स्थान को प्राप्त करते हैं । सरस्वती की इन
६४ नारदीयपुराणम् इतीरितं समाकर्ण्य भारत्या नृपसत्तमः । मनसा निर्वृतिं प्राप्य सस्मार च गुरोर्वचः ॥१३९॥ स्तुवन्गुरुं च तं विप्रं हरिं चैवातिहर्षितः । पूर्ववृत्तं च विप्राय सर्वं तस्मै न्यवेदयत् ॥१४०॥ ततो नृपस्तु कालिङ्गं प्रणम्य विधिवन्मुने । नामानि व्याहरन्विष्णोः सद्यो वाराणसीं ययौ ॥१४१॥ षण्मासं तत्र गङ्गायां स्नात्वा दृष्ट्वा सदाशिवम् । ब्राह्मणीदत्तशापात्तु मुक्तो मित्रसहोऽभवत् ॥१४२॥ ततस्तु स्वपुरीं प्राप्तो वसिष्ठेन महात्मना । अभिषिक्तो मुनिश्रेष्ठ स्वकं राज्यमपालयत् ॥१४३॥ पालयित्वा महीं कृत्स्नां भुक्त्वा भोगान्स्त्रियं विना । वसिष्ठात्प्राप्य सन्तानं गतो मोक्षं नृपोत्तमः ॥१४४॥ नैतच्चित्रं द्विजश्रेष्ठ विष्णोर्वाराणसीगुणान् । गृणञ्छृण्वन्स्मरन्गङ्गां पीत्वा मुक्तो भवेन्नरः ॥१४५॥ तस्मान्महिम्नो विप्रेन्द्र गङ्गायाः शक्यते नहि । पारं गन्तुं सुराधीशैर्ब्रह्मविष्णुशिवैरपि ॥१४६॥ यन्नामस्मरणादेव महापातककोटिभिः । विमुक्तो ब्रह्मसदनं नरो याति न संशयः ॥१४७॥ गङ्गा गङ्गेति यन्नाम सकृदप्युच्यते यदा । तदैव पापान्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥१४८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गामाहात्म्ये नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥
बातों को सुनकर नृप को कुछ मन में संतोष हुआ और गुरु के कथन का स्मरण किया । बड़ी प्रसन्नता से अपने गुरु की, उस ब्राह्मण की और भगवान् की स्तुति करने लगा और उस विप्र से अपने जीवन की पूर्वकालीन सारी घटना कह सुनाई ॥१३७-१४०॥ मुनिश्रेष्ठ ! स्तुति के बाद राजा ने विधि पूर्वक उस कलिङ्ग देश वासी ब्राह्मण को प्रणाम किया और हरिनाम का उच्चारण करता हुआ शीघ्र वाराणसी चला गया । वहाँ छह महीने तक गंगा स्नान और सदाशिव का दर्शन कर वह मित्रसह राजा ब्राह्मणी के शाप से मुक्त हुआ । इस प्रकार पाप-मुक्त होकर वह अपनी राजधानी में गया और महात्मा वशिष्ठ से पुनः अभिषिक्त होकर अपने राज्य का पालन करने लगा । ॥१४१-१४३॥ उस नृपवर्य ने सम्पूर्ण पृथ्वी का पालन और भोगों का भोग किया परन्तु शाप-भय से स्त्री-भोग से अपने को बचाये रहा । वसिष्ठ द्वारा क्षेत्रज पुत्रों को उत्पन्न करा कर अन्त में वह मोक्ष का भी अधिकारी हुआ । द्विजश्रेष्ठ ! इसमें आश्चर्य करने की आवश्यकता नहीं, मनुष्य भगवान् विष्णु और गंगा की महिमा का वर्णन और श्रवणकर एवं गंगाजल का पान कर अवश्य मुक्त हो जाता है । विप्रेन्द्र ! इसलिए गंगा की महिमा के वर्णन करने में देवेन्द्र ब्रह्मा, विष्णु और शंकर भी सफल नहीं हो सकते हैं। गंगा के नाम स्मरण मात्र से मनुष्य अपने करोड़ों पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को चला जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । जो एक बार भी 'गंगा, गंगा, ऐसा उच्चारण करता है वह तत्काल पाप मुक्त होकर ब्रह्मलोक में पूजित होता है ॥१४४-१४८॥ श्री नारदीय पुराण में गंगा-महात्म्य-वर्णन नामक नवां अध्याय समाप्त ॥६॥
दशमोऽध्यायः नारद उवाच विष्णुपादाग्रसंभूता या गङ्गेत्यभिधीयते । तदुत्पत्तिं वद भ्रातरनुग्राह्योऽस्मि ते यदि ॥१॥ सनक उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि गङ्गोत्पत्तिं तवानघ । वदतां शृण्वतां चैव पुण्यदां पापनाशनीम् ॥२॥ आसीदिन्द्रादिदेवानां जनकः कश्यपो मुनिः । दक्षात्मजे तस्य भार्ये दितिश्चादितिरेव च ॥३॥ अदितिर्देवमातास्ति दैत्यानां जननी दितिः । ते तयोरात्मजा विप्र परस्परजयैषिणः ॥४॥ सदा सपूर्वदेवास्तु यतो दैत्याः प्रकीर्तिताः । आदिदैत्यो दितेः पुत्रो हिरण्यकशिपुर्बली ॥५॥ प्रह्लादस्तस्य पुत्रोऽभूत्सुमहान्दैत्यसत्तमः । विरोचनस्तस्य सुतो बभूव द्विजभक्तिमान् ॥६॥ तस्य पुत्रोऽतितेजस्वी बलिरासीत्प्रतापवान् । स एव वाहिनीपालो दैत्यानामभवन्मुनेः ॥७॥ बलेन महता युक्तो बुभुजे मेदिनीमिमाम् । विजित्य वसुधां सर्वां स्वर्गं जेतुं मनो दधे ॥८॥ गजाश्च यस्यायुतकोटिलाक्षास्तावन्त एवाश्वरथा मुनीन्द्र । गजे गजे पंचशती पदातेः किं वर्ण्यते तस्य चमूर्वरिष्ठा ॥९॥ अध्याय १० राजा बलि से देवताओं की पराजय नारद बोले—भाई ! यदि आप का मेरे ऊपर अनुग्रह है तो कृपा कर विष्णु के चरणों के निकली हुई गंगा नदी की उत्पत्ति कथा कहिए ॥१॥ सनक बोले—निष्पाप ! सुनो । आज तुमसे श्रोता और वक्ता दोनों के पापों को नष्ट करने वाली गंगा की उत्पत्ति कथा कह रहा हूँ । इन्द्र आदि देवताओं को उत्पन्न करने वाले कश्यप नामक एक मुनि थे, उनकी दक्षपुत्री दिति और अदिति नाम की दो भार्याएँ थीं । अदिति देवों की माता और दिति दैत्यों की जननी थी । विप्र ! उनके ये पुत्र परस्पर सर्वदा एक दूसरे को जीतना चाहते थे क्योंकि दैत्य सर्वदा से देवों के अग्रज कहे गए हैं । दिति पुत्र बली हिरण्यकशिपु आदि दैत्य था । उसका दैत्य-प्रवर महातेजस्वी प्रह्लाद नामक पुत्र हुआ । प्रह्लाद का विरोचन नामक परम ब्राह्मण-भक्त पुत्र हुआ । उसका भी महाबलवान्, तेजस्वी बलि नामक पुत्र हुआ, जो स्वयं दैत्य-वाहिनी का एक मात्र पालक और रक्षक था ॥२-७॥ उसने अपने सैन्य बल से इस मेदिनी को वश में किया और पृथ्वी को जीत लेने के बाद स्वर्ग-विजय की भी कामना करने लगा । मुनीन्द्र ! जिसकी सेना में दश सहस्र करोड़ लड़ाकू हाथी उतने ही अश्व और रथ, एवं प्रत्येक हाथी के पीछे पचास पैदल सिपाही थें तब उसकी विशाल वाहिनी का क्या वर्णन किया जाय । उसके मंत्रि-समूह में अग्रगण्य दो मंत्री थे, जिनमें एक का नाम ६—नार०