बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
अथ एकोनसप्ततितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच अथापरं वायुसूनोश्चरितं पापनाशनम् । यदुक्तं स्वासु रामेण आनन्दवनवासिना ॥१॥ सद्योजाते महाकल्पे श्रुतवीर्ये हनूमति । मम श्रीरामचन्द्रस्य भक्तिरस्तु सदैव हि ॥२॥ शृणुष्व गदतो मत्तः कुमारस्य कुमारक । चरितं सर्वपापघ्नं शृण्वतां पठतां सदा ॥३॥ वांwhite/वांछाम्यहं सदा विप्र संगमं कीशरूपिणा । रहस्यं रहसि स्वस्य ममानन्दवनोत्तमे ॥४॥ परीतेऽत्र सहायो मे सख्यश्च विगतज्वराः । क्रीडंति सर्वदा चात्र प्राकट्येऽपि रहस्यपि ॥५॥ कस्मिंश्चिदवतारे तु यद्वृत्तं च रहो मम । तदद्य प्रकटं तुभ्यं करोमि प्रीतमानसः ॥६॥ आविर्भूतोऽस्म्यहं पूर्वं राज्ञो दशरथक्षये । चतुर्व्यूहात्मकस्तत्र तस्य भार्यात्रये मुने ॥७॥ ततः कतिपयैरब्दैरागतो द्विजपुंगवः । विश्वामित्रोऽर्थयामास पितरं मम भूपतिम् ॥८॥ यक्षरक्षोविधातार्थं लक्ष्मणेन सहैव माम् । प्रेषयामास धर्मात्मा सिद्धाश्रममरण्यकम् ॥९॥ तत्र गत्वाश्रममृषेर्दूषयन्तौ निशाचरौ । ध्वस्तौ सुबाहुमारीचौ प्रसन्नोऽभूत्तदा मुनिः ॥१०॥ अस्त्रग्रामं ददौ मह्यं मासं चावासयत्तथा । ततो गाधिसुतो धीमान् ज्ञात्वा भाव्यर्थमादरात् ॥११॥ मिथिलामनयत्तत्र रौद्रं चादर्शयद्धनुः । तस्य कन्यां पणीभूतां सीतां सुरसुतोपमाम् ॥१२॥ अध्याय ७६ हनुमान का चरित्र-वर्णन सनत्कुमार बोले--अब हनुमान् का दूसरा पापनाशन चरित्र सुनो, जिसे आनन्दवनवासी राम ने मुझसे कहा था । राम ने कहा--"कुमार ! महाकल्प में सद्यः उत्पन्न होने वाले अति पराक्रमी हनुमान् में सदा मेरी भक्ति रहे । मैं हनुमान् का चरित्र वर्णन करता हूँ । जो इस चरित्र को सुनेगा या पढ़ेगा उसके सकल पाप नष्ट हो जायेंगे । विप्र ! मैं तो सदा पवननन्दन का साथ चाहता हूँ । मेरे इस उत्तम आनन्दवन में वे गुप्त रूप से रहते हैं । यहाँ उनके अतिरिक्त भी मेरे कतिपय सखा और सखियां प्रकट रूप से या गुप्त रूप से क्रीड़ा करती रहती हैं। किसी अवतार में जो मेरा रहस्यमय वृत्तान्त हुआ था, उसे मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें सुना देता हूँ ॥१--६॥ पूर्व समय में राजा दशरथ की तीन रानियों से चतुर्व्यूह (राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न) रूप में अवतीर्ण हुआ । कुछ वर्षों के बाद द्विजश्रेष्ठ विश्वामित्र ने आकर मेरे पिता से मुझे मांगा । तब धर्मात्मा भूपति ने लक्ष्मण सहित मुझे सिद्धाश्रम को भेज दिया । वहाँ मुनि के आश्रम में पहुँचकर सुबाहु और मारीच नामक दो उपद्रवी निशाचरों को मैंने मारा । इससे प्रसन्न होकर मुनि ने मुझे बहुत से अस्त्र-शस्त्र दिये तथा एक मास तक अपने ही आश्रम में रखा । अनन्तर भावी वृत्तान्त को जान कर श्रीमान् विश्वामित्र आदरपूर्वक मुझे मिथिला ले आये और शिवधनुष को दिखला दिया । धनुष को तोड़कर मैंने माननीय जनक की देवकन्यातुल्य पुत्री सीता
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ६८५ धनुर्विभज्य समिति लब्धवान्मानिनोऽस्य च । ततो मागं भृगुपतेर्दपं मूढं चिरं स्मयन् ॥१३॥ व्यपनीयागमं पश्चादयोध्यां स्वपितुः पुरीम् । ततो राज्ञाहमाज्ञाय प्रजाशीलनमानसः ॥१४॥ यौवराज्ये स्वयं प्रीत्या सम्मंत्र्याप्तैर्विकल्पितः । तच्छ्रुत्वा सुप्रिया भार्या कैकयी भूपतिं मुने ॥१५॥ देवकार्यविधानार्थं विदूषितमतिर्जगौ । पुत्रो मे भरतो नाम यौवराज्येऽभिषिच्यताम् ॥१६॥ रामश्चतुर्दशसमा दण्डकान्प्रविवास्यताम् । तदाकर्ण्याहमुद्युक्तोऽरण्यं भार्यानुजान्वितः ॥१७॥ गंतुं नृपतिनानुक्तोऽप्यगमं चित्रकूटकम् । । तत्र नित्यं वन्यफलैर्मांसैश्चावर्तितक्रियः ॥१८॥ निवसन्नेव राजस्तु निधनं चाप्यवागमम् । ततो भरतशत्रुघ्नौ भ्रातरौ मम मानदौ ॥१९॥ मातृवर्गयुतौ दीनौ साचार्यामात्यनागरौ । व्यजिज्ञपतमागत्य पंचवट्यां निजाश्रमम् ॥२०॥ अकल्पयं भ्रातृभार्यासहितश्च त्रिवत्सरम् । ततस्त्रयोदशे वर्षे रावणो नाम राक्षसः ॥२१॥ मायया हृतवान्सीतां प्रियां मम परोक्षतः । ततोऽहं दीनवदन ऋष्यमूकं हि पर्वतम् ॥२२॥ भार्यामन्वेषयन्प्राप्तः सख्यं हर्यधिपेन च । अथ वालिनमाहत्य सुग्रीवस्तत्पदे कृतः ॥२३॥ सह वानरयूथैश्च साहाय्यं कृतवान्मम । विरुध्य रावणेनालं मम भक्तो विभीषणः ॥२४॥ आगतो ह्यभिषिच्याशु लंकेशो हि विकल्पितः । हत्वा तु रावणं संख्ये सपुत्रामात्यबांधवम् ॥२५॥ सीतामादाय संशुद्धामयोध्यां समुपागतः । ततः कालांतरे विप्र सुग्रीवश्च विभीषणः ॥२६॥ निमंत्रितौ पितुः श्राद्धे षट्कुलाश्च द्विजोत्तमाः । अयोध्यायां समाजग्मुस्ते तु सर्वे निमंत्रिताः ॥२७॥ ऋते विभीषणं तत्र चिंतयाने रघूत्तमे । शंभुर्ब्राह्मणरूपेण षट्कुलैश्च सहागतः ॥२८॥ अथ पृष्टो मया शंभुर्विभीषणसमागमे । नीत्वा मां द्रविडे देशे मोचय द्विजबंधनात् ॥२९॥ से जिसके लिये प्रण किया गया था, विवाह किया। मार्ग में परशुराम के दर्प को चूर करते हुए अपने पिता की राजधानी अयोध्या पहुँचा। तब मुझ पर प्रजा अनुरक्त रहती थी, यह जान कर पिता ने मंत्रियों से सलाह लेकर मेरा राज्याभिषेक करना चाहा। किन्तु उनकी अत्यन्त प्रिय भार्या कैकेयी, जिसकी बुद्धि को देवताओं ने स्वकार्य-संपादन के लिये भ्रष्ट कर दिया था, राजा के समीप जाकर कहने लगी—मेरे पुत्र भरत को युवराज के पद पर अभिषिक्त कीजिये और राम को चौदह वर्ष का वनवास दीजिये।" यह सुनकर पिता के न कहने पर मैंने स्त्री तथा अनुज सहित चित्रकूट को चल दिया। वहाँ पहुँच कर वन्य फल तथा मांस से जीवन निर्वाह करते हुए हम रहने लगे। इसी समय मेरे पिता का भी देहान्त हो गया ।। १७-१८३॥ तब मेरे मनस्वी दो भाई भरत और शत्रुघ्न ने मातृसमूह, आचार्य, मन्त्री तथा नागरिकों के साथ पंचवटी में मेरे आश्रम पर आकर सब समाचार सुनाया (अर्थात् अयोध्या लोट चलने के लिये मुझसे प्रार्थना की; किन्तु मैंने उन्हीं को समझा-बुझा लौटा दिया)। अनन्तर अनुज तथा स्त्री के साथ तीन वर्षों तक वहाँ रहा। तेरहवें वर्ष में रावण नामक राक्षस ने मेरी प्रिया सीता को मेरे परोक्ष में माया से हर लिया। तब मैं दीन वदन होकर प्रियतमा को ढूंढ़ते हुए ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचा। वहाँ वानराधीश सुग्रीव से मित्रता कर बाली को मारा और सुग्रीव को उसके पद पर प्रति- ष्ठित किया। फिर संग्राम में पुत्र, अमात्य तथा बांधव सहित रावण को मारकर अग्निपरीक्षा से शुद्ध की हुई सीता को लेकर अयोध्या आया। विप्र ! वहाँ कुछ दिनों के उपरान्त सुग्रीव, विभीषण तथा अपने छह कुलों को पिता के श्राद्ध में निमंत्रित किया। उस श्राद्ध में एक विभीषण को छोड़कर सब आये ।।१९-२७३।। ब्राह्मण का रूप धारण कर शंकर भी छह कुलों के साथ आये। जब मैंने विभीषण के आने के बारे में शंकर से पूछा तब उन्होंने कहा,
६८६ नारदीयपुराणम् मया निमंत्रितः श्राद्धे ह्यगस्त्याद्या मुनीश्वराः । संभोजितास्तु प्रययुः स्वस्वमाश्रममंडलम् ॥३०॥ ततः कालांतरे विप्रा देवा दैत्या नरेश्वराः । गौतमेन समाहूताः सर्वे यज्ञसभाजिताः ॥३१॥ ते सर्वे स्फाटिकं लिंगं त्र्यंबकाद्रौ निवेशितम् । संपूज्य न्यवंसंस्तत्र देवदैत्यनृपाग्रजाः ॥३२॥ तस्मिन्समाजे वितते सर्वलिंगे समर्चिते । गौतमोऽप्यथ मध्याह्ने पूजयामास शंकरम् ॥३३॥ सर्वे शुक्लांबरधरा भस्मोद्धूलितविग्रहाः । सितेन भस्मना कृत्वा सर्वस्थाने त्रिपुंड्रकम् ॥३४॥ नत्वा तु भार्गवं सर्वे भूतशुद्धि प्रचक्रमुः । हृत्पद्ममध्ये सुषिरं तत्रैव भूतपञ्चकम् ॥३५॥ तेषां मध्ये महाकाशमाकाशे निर्मलामलम् । तन्मध्ये च महेशानं ध्यायेद्दीप्तिमयं शुभम् ॥३६॥ अज्ञानसंयुक्तं भूतं समलं कर्मसंगतः । तं देहमाकाशदीपे प्रदहेज्ज्ञानवह्निना ॥३७॥ आकाशस्यावृति चाहं दग्ध्वाकाशमथो दहेत् । दग्ध्वाकाशमथो वायुमग्निभूतं तथा वहेत् ॥३८॥ अब्भूतं च ततो दग्ध्वा पृथिवीभूतमेव च । तदाश्रितान्गुणान्दग्ध्वा ततो देहं प्रवाहयेत् ॥३९॥ एवं प्रदग्ध्वा भूतादि देही तज्ज्ञानवह्निना । शिखामध्यस्थितं विष्णुमानंदरसनिर्भरम् ॥४०॥ निष्पन्नचंद्रकिरणसंकाशकिरणं शिवम् । शिवांगोत्पन्नकिरणैरमृतद्रवसंयुतैः ॥४१॥ सुशीतला ततो ज्वाला प्रशांता चंद्ररश्मिवत् । प्रसारितसुधारश्मिः सांद्रीभूतश्च संप्लवः अनेन प्लावितं भूतग्रामं संचितयेत्परम् ॥४२॥ इत्थं कृत्वा भतशुद्धिं क्रियार्हो मर्त्यः शुद्धो जायते ह्येव सद्यः । पूजां कतुं जप्यकर्मापि पश्चाद्देवं ध्यायेद्ब्रह्महत्यादिशुद्ध्यै ॥४३॥
मुझे द्रविड़ देश में ले जाकर द्विज-बंधन से मुक्त कीजिये। पश्चात् श्राद्ध में निमन्त्रित अगस्त्य आदि मुनिवर अच्छी तरह भोजन करके अपने-अपने आश्रम को गये ॥२८-३०॥ पुनः कुछ काल के उपरान्त गौतम ने यज्ञ समारोह में ब्राह्मण, देवता, दैत्य, राजा आदि सबको बुलाया। सबों ने कैलास पर्वत पर स्फटिकमय शिवलिंग की प्रतिष्ठा कर उनकी पूजा की। देव, दैत्य तथा राजशिरोमणियों ने जब लिंग की अर्चना कर ली तब मध्याह्न में गौतम ने भी शंकर की आराधना की। समस्त उपासक श्वेत वस्त्र पहने, संपूर्ण शरीर में भस्म रमाये और सब स्थानों में उज्ज्वल भस्म का त्रिपुण्ड लगाये हुए थे। सब ने शिव को प्रणाम कर भूतशुद्धि क्रिया की। वह क्रिया इस तरह की जाती है कि हृत्पद्म के मध्य में सुषिर (छिद्र) तथा उस सुषिर के मध्य में पंच महाभूतों का ध्यान करे ॥३१-३५॥ महाभूतों के मध्य में महाकाश, आकाश में प्रकाश और प्रकाश में देदीप्य- मान शुभमूर्ति महेश का संस्मरण करे। अज्ञान से संपृक्त भूत समल है। इससे कर्म का संयोग होने पर शरीर बनता है। उस शरीर को ज्ञानाग्नि के द्वारा आकाश दीप में जलाये। फिर आकाश के आवरण को जला- कर आकाश को जलाये। फिर वायु, अग्नि, पृथिवि तथा तदाश्रित गुणों को देह को जलाये। इस प्रकार भूतादि को ज्ञानाग्नि से जलाकर देही शिखामध्यस्थित विष्णु तथा शिव का इस प्रकार ध्यान करे कि विष्णु आनन्द स्वरूप हैं और शिव चंद्रकिरण के समान शीतल तथा धवल हैं। शिव के अंगोत्पन्न किरणों से जो अमृत टपकाती है, चन्द्ररश्मि की तरह प्रशांत ज्वाला निकलती है। उससे अमृत की सघन वर्षा होती है, जिससे भूतसमूह आप्लावित हो जाता है ॥३६-४२॥ इस तरह भूतशुद्धि क्रिया करने से मनुष्य शुद्ध हो जाता है। ब्रह्महत्या आदि दोष निवारण के लिये भी भूतशुद्धि करनी चाहिये। इसे कर लेने के बाद ही पूजा, जप, ध्यान आदि करे।
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ६६७ एवं ध्यात्वा चंद्रदीप्तिप्रकाशं ध्यानेनारोप्याशु लिंगे शिवस्य । सदाशिवं दीपमध्ये विचिंत्य पञ्चाक्षरेणार्चनमव्ययं तु ॥४४॥ आवाहनादीनुपचारांस्तथापि कृत्वा स्नानं पूर्ववच्छंकरस्य । औदुम्बरं राजतं स्वर्णपीठं वस्त्रादिच्छन्नं सर्वमेवेह पीठम् ॥४५॥ अंते कृत्वा बुद्बुदाभ्यां च सृष्टिं पीठे पीठे नागमेकं पुरस्तात् । कुर्यात्पीठे चोर्ध्वके नागयुग्मं देवाभ्याशे दक्षिणे वामतश्च ॥४६॥ जपापुष्पं नागमध्ये निधाय मध्ये वस्त्रं द्वादशप्रातिगुण्ये । सुश्वेतेन तस्य मध्ये महेशं लिंगाकारं पीठयुक्तं प्रपूज्यम् ॥४७॥ एवं कृत्वा साधकास्ते तु सर्वे दत्त्वा दत्त्वा पंचगंधाष्टगंधम् । पुष्पैः पत्रैः श्रोतिलैरक्षतैश्चतिलोन्मिश्रैः केवलैश्च प्रपूज्य ॥४८॥ धूपं दत्त्वा विधिसंप्रयुक्तं दीपं दत्त्वा चोत्तमेवोपहारम् । पूजाशेषं ते समाध्याय सर्वे गीतं नृत्यं तत्र तत्रापि चक्रुः ॥४९॥ कालेचास्मिन् सुव्रते गौतमस्य शिष्यः प्राप्तः शंकरात्मेति नाम्ना ॥५०॥ उन्मत्तवेषो दिग्वासा अनेकां वृत्तिमास्थितः । क्वचिद्विप्रातिप्रवरः क्वचिच्चंडालसन्निभः ॥५१॥ क्वचिच्छूद्रसमो योगी तापसः क्वचिदप्युत । गर्जत्युत्पतते चैव नृत्यति स्तौति गायति ॥५२॥ रोदिति शृणुतेऽप्युक्तं पतत्युत्तिष्ठति क्वचित् । शिवज्ञानैकसंपन्नः परमानंदनिर्भरः ॥५३॥ संप्राप्तो भोज्यवेलायां गौतमस्यांतिकं ययौ । बुभुजे गुरुणा साकं क्वचिदुच्छिष्टमेव च ॥५४॥ क्वचिल्लिहति तत्पात्रं तूष्णीमेवाभ्यगात्क्वचित् । हस्तं गृहीत्वैव गुरोः स्वयमेवाभुनक्क्वचित् ॥५५॥ भूत शुद्धि करने के उपरान्त गौतम प्रभृति साधकों ने ध्यान से उस शिवलिंग में चंद्रिका की तरह प्रकाश को अधिष्ठित किया । फिर दीप मध्य में सदाशिव का ध्यान कर पंचाक्षर मन्त्र से उन अव्यय शिव की अर्चना की । आवाहन, स्नान आदि उपचारों से उनका पूजन कर गूलर की लकड़ी, चांदी तथा सोने के बने पीठों पर, जो वस्त्र आदि से आवृत थे, उन्हें स्थापित किया । अंत में बुलबुलों से सृष्टि करके प्रत्येक पीठ पर एक-एक नाग की स्थापना की । पीठ के ऊपर तथा शंकर के दक्षिण एवम् वाम पार्श्व में दो-दो नागों की स्थापना कर नागों के मध्य में जपापुष्प तथा बारह श्वेत वस्त्रों को रखा । उनके मध्य में समस्त साधकों ने पंच गंध, अष्टगंध, पुष्प, पत्र, श्रोतिल तथा तिलमिश्रित अक्षतों से शिव की समर्चर्चना कर विधिवत् धूप, दीप तथा उपहार समर्पित किया । पूजनसमाप्ति के बाद उन लोगो ने वहाँ नृत्य गीत भी किया ॥४३-४९॥ उस महोत्सव में शंकरात्मा नामक गौतम के शिष्य वहाँ आ पहुँचे । उनका वेष उन्मत्त का-सा था । वे दिगम्बर थे । उनकी वृत्तियां अनेक प्रकार की थीं । कहीं तो वे उत्तम ब्राह्मण के रूप में रहते थे, कहीं चांडाल के रूप में, कहीं शूद्र, कहीं योगी और कहीं तपस्वी के रूप में उनकी स्थिति होति थी । वह कहीं गरजते, कहीं कूदते, कहीं नाचते, कहीं स्तुति करते, कहीं गाते, कहीं रोते, कहीं स्पष्ट सुनते, कहीं गिरते और कहीं उठते थे । भोजन करने के समय वे गौतम के समीप चले जाते थे । कभी गुरु के साथ भोजन करते तो कभी उच्छिष्ट खा लेते थे । कभी बरतन को जीभ से चाट लेते तो कहीं चुपचाप उठ कर भाग जाते थे । कभी गुरु के हाथ से, कभी स्वयं अपने हाथ से खाते थे । कभी वे घर के अन्दर ही मूत्र त्याग देते तो कभी शरीर में कीचड लेप लेते थे ।
६८८ नारदीयपुराणम् क्वचिद् गृहांतरे मूत्रं क्वचित्कर्दमलेपनम् । सर्वदा तं गुरुर्दृष्ट्वा करमालंब्य मंदिरम् ॥५६॥ प्रविश्य स्वीयपीठे तमुपवेश्याप्यभोजयत् । स्वयं तदस्य पात्रेण बुभुजे गौतमो मुनिः ॥५७॥ तस्य चित्तं परिज्ञातुं कदाचिदथ सुंदरी । अहल्या शिष्यमाहूय भुङ्क्ष्वेति प्राह तं मुदा ॥५८॥ निर्दिष्टो गुरुपत्नया तु बुभुजे सोऽविशेषतः यथा पपौ हि पानीयं तथा वह्निमपि द्विज । कंटकानन्नवद्भुक्त्वा यथापूर्वमतिष्ठत ॥५९॥ पुरो हि मुनिकन्याभिराहूतो भोजनाय च । दिने दिने तत्प्रदत्तं लोष्टमंबु च गोमयम् ॥६०॥ कर्दमं काष्ठदंडं च भुक्त्वा पीत्वाथ हर्षितः । एतादृशो मुनिरसौ चंडालसदृशाकृतिः ॥६१॥ सुजीर्णोपानहौ हस्ते गृहीत्वा प्रलपन्हसन् । अंत्यजोचितवेषश्च वृषपर्वाणमभ्यगात् ॥६२॥ वृषपर्वेशयोर्मध्ये दिग्वासाः समतिष्ठत । वृषपर्वा तमज्ञात्वा पीडयित्वा शिरोऽच्छिनत् ॥६३॥ हते तस्मिन्द्विजश्रेष्ठे जगदेतच्चराचरम् । अतीव कलुषं ह्यासीत्तवस्था मुनयस्तथा ॥६४॥ गौतमस्य महाशोकः संजातः सुमहात्मनः । निर्ययौ चक्षुषो वारि शोकं संदर्शयन्निव ॥६५॥ गौतमः सर्वदैत्यानां सन्निधौ वाक्यमुक्तवान् । किमनेन कृतं पापं येन च्छिन्नमिदं शिरः ॥६६॥ मम प्राणाधिकस्येह सर्वदा शिवयोगिनः । ममापि मरणं सत्यं शिष्यच्छद्मा यतो गुरुः ॥६७॥ शैवानां धर्मयुक्तानां सर्वदा शिववर्तिनाम् । मरणं यत्र दृष्टं स्यात्तत्र नो मरणं ध्रुवम् ॥६८॥ तच्छ्रुत्वा ह्यसुराचार्यः शुक्रः प्राह विदांवरः । एनं संजीवयिष्यामि भार्गवं शंकरप्रियम् ॥६९॥ किमर्थं म्रियते ब्रह्मन्पश्य मे तपसो बलम् । इति वादिनि विप्रेन्द्रे गौतमोऽपि ममार ह ॥७०॥ तस्मिन्मृतेऽथ शुक्लोऽपि प्राणांस्तत्याज योगतः । तस्यैवं हतिमाज्ञाय प्रह्लादाद्या दितीश्वराः ॥७१॥ गुरु उनका हाथ पकड़ कर अपने घर ले जाते । और अपने आसन पर बैठा कर भोजन कराते थे । गौतममुनि स्वयं भी उन्हीं के पात्र में खाने लगते थे ॥५०-५७॥ किसी समय शंकरात्मा के चित्त की परीक्षा करने के लिये सुन्दरी अहिल्या ने हर्षपूर्वक उनसे कहा--'तुम मेरे साथ भोजन करो' । गुरुपत्नी के ऐसा कहने पर बिना 'ननु- नच' किये उन्होंने यथेच्छ भोजन किया । द्विज ! वे जैसे जल पोते वैसे आग भी पी जाते थे । कांटे को अन्न की तरह खा कर यथापूर्व स्वस्थ रहते थे । मुनि की बालिकाएं उन्हें बुलाकर ढेले, जल, गोबर, कीचड़ तथा लकड़ी खाने को दे देती थीं । उन चीजों को खाकर भी वे प्रसन्न रहते थे । (एक दिन) इस तरह के वे मुनि, जिनका चंडाल का-सा वेश था, टूटे-फटे जूते को हाथ में लेकर बड़बड़ाते एवम् हंसते हुए वृषपर्वा के पास पहुँचे । वहाँ वृषपर्वा तथा शिव के मध्य वे दिगम्बर होकर खड़े हो गये । वृषपर्वा ने उन्हें नहीं पहचाना, इसलिये बुरी तरह उनका शिर काट डाला । उन द्विजवर का निधन हो जाने पर चराचर विश्व में हाहाकार मच गया । मुनि- समाज तथा महात्मा गौतम को महान् शोक हुआ ॥५८-६४½॥ शोक संतप्त गौतम की आँखों से आंसू बहने लगे । तब उन्होंने समस्त दैत्यों के समक्ष यह बात कही—"मेरे प्राणाधिक प्रिय तथा शिवयोगी शिष्य ने क्या अपराध किया जो इसका शिर काट दिया गया ? अब मेरा भी मरण अवश्यंभावी है। जहाँ धर्मयुक्त सदाशिव- योग में निरत रहने वाले शैवों की मृत्यु देखी जाय वहाँ हमारा भी मरण निश्चित है" ।।६५-६८।। गौतम की बात सुनकर महाज्ञानी असुराचार्य शुक्र ने कहा-- "ब्रह्मन् ! क्यों आप मर रहे हैं? मैं इस शंकरप्रिय भृगुवंशी को जिलाऊँगा । देखिए आप मेरा तपोबल ।" दैत्यगुरु इतना कह ही रहे थे कि गौतम का प्राण त्याग हो गया । उनके मर जाने पर शुक्र ने भी योग
एकोनाशीतितमोऽध्यायः ६८६ देवा नृपा द्विजाः सर्वे मृता आसंस्तदद्भुतम् । मृतमासीदथ बलं तस्य बाणस्य धीमतः ॥७२॥ अहल्या शोकसंतप्ता रुरोदोच्चैः पुनः पुनः । गौतमेन महेशस्य पूजया पूजितो विभुः ॥७३॥ वीरभद्रो महायोगी सर्वं दृष्ट्वा चुकोप ह । अहो कष्टमहोकष्टं महेशा बहवो हताः ॥७४॥ शिवं विज्ञापयिष्यामि तेनोक्तं करवाण्यथ । इति निश्चित्य गतवान्मंदराचलमध्ययम् ॥७५॥ नमस्कृत्य विरूपाक्षं वृत्तं सर्वमथोक्तवान् । ब्रह्माणं च हरिं तत्र स्थितौ प्राह शिवो वचः ॥७६॥ मद्भक्तैः साहसं कर्म कृतं ज्ञात्वा वरप्रदम् । गत्वा पश्यामि हे विष्णो सर्वं तत्कृतसाहसम् ॥७७॥ इत्युक्त्वा वृषमारुह्य वायुना धूतचामरः । नन्दिकेन सुवेषेण धृते छत्रेऽतिशोभने ॥७८॥ सुश्वेते हेमदंडे च नान्ययोग्ये धृते विभो । महेशानुमतिं लब्ध्वा हरिर्नागांतके स्थितः ॥७९॥ आरक्तनीलच्छत्राभ्यां शुशुभे लक्ष्मकौस्तुभः । शिवानुमत्या ब्रह्मापि हंसारूढोऽभवत्तदा ॥८०॥ इंद्रगोपप्रभाकारच्छत्राभ्यां शुशुभे विधिः । इन्द्रादिसर्वदेवाश्च स्वस्ववाहनसंयुताः ॥८१॥ अथ ते निर्ययुः सर्वे नानावाद्यानुमोदिताः । कोटिकोटिगणाकीर्णा गौतमस्याश्रमं गताः ॥८२॥ ब्रह्मविष्णुमहेशाना दृष्ट्वा तत्परमाद्भुतम् । स्वभक्तं जीवयामास वामकोणनिरीक्षणात् ॥८३॥ शंकरो गौतमं प्राह तुष्टोऽहं ते वरं वृणु । तदाकर्ण्य वचस्तस्य गौतमः प्राह सादरम् ॥८४॥ यदि प्रसन्नो देवेश यदि देयो वरो मम । त्वल्लिङ्गार्चनसामर्थ्यं नित्यमस्तु ममेश्वर ॥८५॥
से प्राणों को छोड़ दिया । उनकी इस प्रकार मृत्यु जान कर प्रह्लाद आदि दैत्येश्वर, देवता, नृप तथा द्विज सब के सब मर गये । धीमान् बाण की सेना भी मर गई । यह अद्भुत घटना हुई । इस घटना को सुनकर शोकसंतप्ता अहल्या बड़े उच्च स्वर से आर्तनाद करने लगी । गौतम ने शिवपूजन के समय महायोगी एवम् अतुलपराक्रमी वीरभद्र की भी पूजा की थी । उन्होंने जब इस घटना का सब समाचार सुना तो वे बहुत क्रुद्ध हुए और कहने लगे--"हाय ! बड़े दुःख की बात है कि बहुत-से शिवभक्त मारे गये । मैं शंकर से जाकर सब बातें बतलाऊंगा और उनके आदेशानुसार आगे कर्तव्य करूंगा ।” ऐसा निश्चय करके वे अविनाशी मंदरपर्वत पर गये । वहां त्र्यंबक को नमस्कार कर सब समाचार सुना दिया ॥६९-७५३॥ तब शिव ने अपने समीपस्थ ब्रह्मा तथा विष्णु से कहा- "अहो ! मेरे भक्तों ने बड़ा साहस का काम किया । उनका यह कार्य वरप्रद हुआ । विष्णु ! हमें चलकर उनका साहसपूर्ण कार्य देखना चाहिए ।।" इतन' कहकर शंकर वृष पर आरूढ़ हो गये । वायुदेव चामर डुलाने लगे । नंदिक ने अतिमनोहर श्वेत छत्र, जिसका दंड सुवर्ण का था और जिसे अन्य व्यक्ति धारण नहीं कर सकता था, विभु के ऊपर लगा दिया ॥७६-७८३॥ महेश की अनुमति पाकर विष्णु भी गरुड़ पर सवार हुए । श्रीवत्स चिह्न तथा कौस्तुभ मणि धारण करने वाले हरि लाल एवम् नील रंग के छत्रों से सुशोभित हुए । शिव की अनुमति से ब्रह्मा भी हंस पर आरूढ हुए । उनके छत्र इन्द्रगोप के समान लाल तथा प्रभा के सदृश चमकदार थे । इन्द्र आदि देवगण भी अपने-अपने वाहनों पर चढ़कर विविध वाद्यों के साथ प्रयाण करने लगे । इस तरह कोटि-कोटि गणों से युक्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश गौतम के आश्रम पर पहुँचे । उन्होंने वहाँ के उस अद्भुत वातावरण को देख कर अपने भक्त को वाम नेत्रनिरीक्षण से जिला दिया ॥७९-८३॥ फिर शंकर ने गौतम से कहा- 'मैं तुम से प्रसन्न हूँ, वर मांगो ।' उनके वचन को सुनकर गौतम आदरपूर्वक कहने लगे- "देवेश ! यदि आप प्रसन्न हैं और वर देना चाहते हैं तो यह ८७ ना० पु०
६६० नारदीयपुराणम् वृतमेतन्मया देव त्रिनेत्र शृणु चापरम् । शिष्योऽयं मे महाभागो हेयादेयादिवर्जितः ॥८६॥ प्रेक्षणीयं ममत्वेन न च पश्यति चक्षुषा । न घ्राणग्राह्यं देवेश न पातव्यं न चेतरत् ॥८७॥ इति बुद्ध्या तथा कुर्वन्स हि योगी महायशाः । उन्मत्तविकृताकारः शंकारात्मेति कीर्तितः ॥८८॥ न कश्चित्तं प्रति द्वेषी न च तं हिंसयेदपि । एतन्मे दीयतां देव मृतानाममृतस्तथा ॥८९॥ तच्छ्रुत्वोमापतिः प्रीतो निरीक्ष्य हरिमव्ययः । स्वांशेन वायुना देहमाविशज्जगदीश्वरः ॥९०॥ हरिरूपः शंकरात्मा मारुतिः कपिसत्तमः । पर्यायैरुच्यतेऽधीशः साक्षाद्विष्णुः शिवः परः ॥९१॥ आकल्पमेश प्रत्येकं कामरूपमुपाश्रितः । ममाज्ञाकारको रामभक्तः पूजितविग्रहः ॥९२॥ अनंतकल्पमीशानः स्थास्यति प्रीतमानसः । त्वया कृतमिदं वेश्म विस्तृतं सुप्रतिष्ठितम् ॥९३॥ नित्यं वै सर्वरूपेण तिष्ठामः क्षणमादरात् । समर्चित्ताः प्रयास्यामः स्वस्ववासं ततः परम् ॥९४॥ अथाबभाषे विश्वेशं गौतमो मुनिपुंगवः । अयोग्यं प्रार्थयामीश ह्यर्थी दोषं न पश्यति ॥९५॥ ब्रह्माद्यलभ्यं देवेश दीयतां यदि रोचते । अथेशो विष्णुमालोक्य गृहीत्वा तत्करं करे ॥९६॥ प्रहसन्नंबुजाभाक्षमित्युवाच सदाशिवः । क्षामोदरोऽसि गोविंद देयं ते भोजनं किमु ॥९७॥ स्वयं प्रविश्य यदि वा स्वयं भुंक्ष्व स्वगेहवत् । गच्छ वा पार्वतीगेहं या कुक्षिं पूरयिष्यति ॥९८॥
दीजिये कि आपके (शिव) लिंग की पूजा करने का सामर्थ्य मुझमें सदा बना रहे । देव ! त्रिनेत्र ! एक तो मेरा यहो वर है और दूसरा यह है कि यह महाभाग्यशाली मेरा शिष्य त्याज्य एवम् ग्राह्य कर्मों से रहित है । यह नेत्रों से नहीं देखता, नाक से नहीं सूंघता । सब कुछ बुद्धियोग से करता हुआ यह महायशस्वी योगी है। शंकरात्मा इसका नाम है, उन्मत्त की तरह स्वरूप है । देव ! इससे न कोई द्वेष करे ओर न इसे मारे । जितने व्यक्ति मर गये हैं, वे सब भी जी जायें। यह वर मुझे दीजिए ॥८४-८९॥ गौतम का निवेदन सुनकर अविनाशी उमापति प्रेम से हरि को देख कर अपने अंश वायु रूप से उनकी देह में प्रविष्ट हो गये । वही हरिरूप शंकरात्मा पवनसुत हनुमान् जी हुए। वे धीश, साक्षात् विष्णु एवम् शिव कहलाते हैं। प्रत्येक कल्प में वे अपनी इच्छा से रूप धारण करते हैं। वे शिव के आज्ञाकारी, मेरे भक्त तथा महाबलवान् हैं ॥९०-९२॥ तदुपरान्त शंकर ने प्रीतिपूर्वक कहा—"तुम्हारा बनाया हुआ यह मन्दिर बहुत विस्तृत एवम् सुप्रतिष्ठित है । हम लोग नित्य इस मन्दिर में एक क्षण तक निवास करेंगे और तुम्हारी पूजा ग्रहण कर अपने-अपने आवास को लौटेंगे" ॥९३-९४॥ इसके बाद मुनिश्रेष्ठ गौतम ने महेश से कहा--"ईश ! मैं एक अयुक्त प्रार्थना करता हूँ। क्योंकि प्रार्थी अपने दोष को नहीं देखता है। सो यदि आप प्रसन्न हैं तो ब्रह्मा आदि को भी न मिलने वाला यह वर दीजिए कि आप मेरे यहाँ भोजन करें।" गौतम की प्रार्थना सुनने के पश्चात् सदाशिव विष्णु का हाथ अपने हाथ में लेकर हँसते हुए कमलाक्ष केशव से कहने लगे--"गोविन्द ! तुम्हारा पेट क्षीण (खाली) मालूम पड़ता है। क्या तुम्हें भोजन दूँ ? या अपने घर की तरह मेरे घर में पैठ कर स्वयं खा लोगे ? अथवा पार्वती के घर जाओ । वह तुम्हारा पेट भर देगी ।" इतना कहकर शंकर विष्णु का हाथ पकड़े ही एकान्त स्थान में चले गये और द्वाराध्यक्ष नंदी को आदेश दे गये कि तुम जाकर भोजन का प्रबन्ध करो। नंदी ने गौतम से जाकर विष्णु तथा शंकर का वार्तालाप सुना दिया और कहा--"मुने ! हम देवगण भोजन करना चाहते हैं। आप प्रबन्ध कीजिए ॥९५-९८॥"
एकोनाशीतितमोऽध्यायः ६६१
इत्युक्त्वा तत्करालम्बी ह्येकांतमगमद्विभुः । आदिश्य नन्दिनं देवो द्वाराध्यक्षं यथोक्तवत् ॥९६॥ स गत्वा गौतमं वाथ ह्यब्रूत्वान्विष्णुभाषणम् । संपाद्यान्नं देवेशा भोक्तुकामा वयं मुने ॥१००॥ इत्युक्तवैकांतमगमद्वासुदेवेन शंकरः । मृदुशय्यां समारुह्य शयितौ देवतोत्तमौ ॥१०१॥ अन्योन्यं भाषणं कृत्वा प्रोत्तस्थतुरभावपि । गत्वा तडागं गंभीरं स्नास्यन्तौ देवसत्तमौ ॥१०२॥ करांबुपातमन्योन्यं पृथक्कृत्वोभयत्र च । मुनयो राक्षसाश्चैव जलक्रीडां प्रचक्रिरे ॥१०३॥ अथ विष्णोर्महेशश्च जलपानानि शीघ्रतः । चक्रतुः शंकरः पद्मकिंजलकांजलिना हरेः ॥१०४॥ अवाकिरन्मुखे तस्य पद्मोत्फुल्लविलोचने । नेत्रे केशरसंपातात्प्रमीलयत केशवः ॥१०४॥ अत्रांतरे हरेः स्कंधमारुरोह महेश्वरः । ह्युत्तमांगं बाहुभ्यां गृहीत्वा संन्यमज्जयत् ॥१०६॥ उन्मज्जयित्वा च पुनः पुनश्चापि पुनःपुनः । पीडितः स हरिः सूक्ष्मं पातयामास शंकरम् ॥१०७॥ अथ पादौ गृहीत्वा तं भ्रामयन्विचकर्ष ह । अताडयद्धरेर्वक्षः पातयामास चाच्युतम् ॥१०८॥ अथोत्थितो हरिस्तोयमादायांजलिना ततः । शीर्षे चैवाकिरच्छंभुमथ शंभुरथो हरिः ॥१०८॥ जलक्रीडैवमभवदथ र्षषिगणांतरे । जलक्रीडासंभ्रमेण विश्लस्तजटबंधनाः ॥११०॥ अथ संभ्रमतां तेषामन्योन्यजटबंधनम् । इतरेतरबद्धासु जटासु च मुनीश्वराः ॥१११॥ शक्तिमंतोऽशक्तिमत आकर्षंति च सभ्यथम् । पातयंतोऽन्यतश्चापि क्रोशंतो रुदतस्तथा ॥११२॥ एवं प्रवृत्ते तुमुले संसूते तोयकर्मणि । आकाशे वानरेशस्तु ननर्त च ननाद च ॥११३॥ विपंचीं वादयन्वाद्यं ललितां गीतिमुज्जगौ । सुगीत्या ललिता यास्तु अगायत विधा दश ॥११४॥ शुश्राव गीति मधुरां शंकरो लोकभावतः । स्वयं गातुं हि ललितं मंदमंदं प्रचक्रमे ॥११५॥ स्वयं गायति देवेशे विश्रामं गलदेशिकम् । स्वरं ध्रुवं समादाय सर्वलक्षणसंयुक्तम् ॥११६॥
वासुदेव के साथ शंकर विविक्त स्थान में जाकर कोमल शय्या पर लेट गए। दोनों देवश्रेष्ठ आपस में बातचीत करते-करते सो गए। नींद टूटने पर दोनों सुरवर स्नान करने के लिये एक गहरे तालाब में उतरे वहाँ वे अपने हाथों में जल ले ले कर एक दूसरे पर फेंकने लगे। उस समय मुनि तथा राक्षस भी जलक्रीड़ा में सम्मिलित हो गये। विष्णु और महेश कमलपत्र में जल लेकर पी लेते थे। एक बार शंकर ने विष्णु के कमल- मुख में पद्मकेसर मिश्रित जल डाल दिया। केसर के गिरने से केशव ने आँखें मूँद ली। उसी बीच महेश्वरहरि के कंधे पर चढ़ गये और उनके शिर को हाथों से पकड़ कर बार-बार पानी में डुबाने लगे। जब हरि को इससे थोड़ी-सी पीड़ा हुई तब उन्होंने शंकर को गिरा दिया और उनके पैरों को पकड़ कर घुमाने लगे। उस समय शिव ने अच्युत की छाती पर लात मारी। जिससे वे गिर पड़े। फिर उठने पर उन्होंने अंजलि में जल लेकर शंकर के मस्तक पर गिराया। तब शम्भु ने भी उनके शिर पर जल छोड़ दिया। इस प्रकार (एक ओर) हरि-हर की जल-क्रीड़ा हो रही थी और (दूसरी ओर) ऋषिगण अपनी-अपनी जटा को खोल कर जलकेलि में विभोर हो रहे थे। यहाँ तक कि उन मुनीश्वरों की जटायें आपस में उलझ जाती थीं तब जो सबल थे, वे दुर्बल को खींच कर व्यथा पहुँचाते थे और एक दूसरे को गिरा कर घसीट देते एवम् रुला देते थे ॥९९-११२॥ जिस समय इस प्रकार की तुमुल जलकेलि हो रही थी उसी समय आकाश में वानरेश (हनुमान्) नाचते तथा शब्द करते हुए वीणा एवम् अन्य वाद्यों को बजाने लगे। ललित स्वर में उन्होंने दश प्रकार के गीत गाये। उनका मधुर संगीत सुनकर स्वयं शंकर लोक-भाव से ललित राग में मंद-मंद गाने लगे। जब महेश्वर सर्वलक्षणसम्पन्न विश्राम, गलदेशिक तथा ध्रुव स्वर में धाराप्रवाह रूप से गा रहे थे तब वासुदेव हाथों से झाम बजा रहे थे। (उस
६६२ नारदीयपुराणम् स्वधारामृतसंयुक्तं गानेनैवमपोनयन् । वासुदेवो मर्दलं च कराभ्यामप्यवादयत् ॥११७॥ अम्बुजांगश्चतुर्वक्त्रस्तुंबुरुर्मु खरो बभौ । तानका गौतमाद्यास्तु गायको वायुजोऽभवत् ॥११८॥ गायके मधुरं गीतं हनूमति कपीश्वरे । म्लानमम्लानमभवत्कृशाः पुष्टास्तदाभवन् ॥११९॥ स्वां स्वां गीतिमतः सर्वे तिरस्कृत्यैव मूच्छिताः । तूष्णीभूतं समभवद्देवर्षिगणदानवम् ॥१२०॥ एकः स हनुमान् गाता श्रोतारः सर्व एव ते । मध्याह्नकाले वितते गायमाने हनूमति ॥१२१॥ स्वस्ववाहनमारुह्य निर्गताः सर्वदेवताः गानप्रियो महेशस्तु जग्राह प्लवगेश्वरम् । प्लवग त्वं मयाज्ञप्तो निःशंको बृषमारुह ॥१२२॥ मम चाभिमुखो भूत्वा गायस्वानेकगायनम् । अथाह कपिशार्दूलो भगवंतं महेश्वरम् ॥१२३॥ वृषभारोहसामर्थ्यं तव नान्यस्य विद्यते । तव वाहनमारुह्य पातकी स्यामहं विभो ॥१२४॥ मामेवारुह देवेश विहंगः शिवधारणः । तव चाभिमुखं गानं करिष्यामि विलोकय ॥१२५॥ अथेश्वरो हनूमंतमारुरोह यथा वृषम् । आरूढे शंकरे देवे हनुमत्कंधरां शिवः ॥१२६॥ छित्वा त्वचं परावृत्य सुखं गायति पूर्ववत् । शृण्वन्गीतिसुधां शंभुर्गौतमस्य गृहं ततः ॥१२७॥ सर्वे चाप्यागतास्तत्र देवर्षिगणदानवाः । पूजिता गौतमेनाथ भोजनावसरे सति ॥१२८॥ यच्छुष्कं दारुसंभूतं गृहोपकरणादिकम् । प्ररूढमभवत्सर्वं गायमाने हनूमति ॥१२९॥ तस्मिन्गाने समस्तानां चित्रं दृष्टिरतिष्ठत ॥१३०॥ द्विबाहुरीशस्य पदामिवंदनः समस्तगात्राभरणोपपन्नः । प्रसन्नमूर्तिस्तरुणः सुमद्ध्ये विन्यस्तमूर्द्धांजलिभिः शिरोभिः ॥१३१॥
समय) कमलयोनि ब्रह्मा तुम्बुरु (तानपूरा) बजा रहे थे । गौतम आदि राग-ताल मिला रहे थे और वायुपुत्र तो गायक ही थे । कपीश्वर हनुमान् का गाना सुनकर सूखी चीजें हरी-भरी हो गईं और क्षीण पुष्ट हो गईं । वहाँ अन्य जो गायकगण थे, वे लज्जा से मानो मूर्च्छित हो गये । देवता, ऋषि तथा दानवों ने मौन भाव अवलम्बन कर लिया । केवल वे हनुमान् गाता और अन्य सब के सब श्रोता रहे । जब इस तरह महावीर के गाते-गाते दोपहर का समय हो आया तब सकल देवगण अपने-अपने वाहन पर आरूढ होकर चले गये । अनन्तर गानप्रिय महेश ने कपीश्वर को पकड़ कर यह कहा- "कपि ! तुम निःशंक होकर मेरे बैल पर चढ़ जाओ । और मेरे संमुख होकर अनेक प्रकार के गाने सुनाओ । परन्तु कपिवर ने भगवान् शंकर से कहा--"विभो ! वृष पर चढ़ने का सामर्थ्य आपको छोड़कर दूसरे किसी में नहीं है । मुझे आपके वाहन पर चढ़ने से महापाप होगा । इसलिये हे देवेश ! आप मुझ पर ही चढ़ जायें और मैं आपको धारण करके आकाश में उड़ जाऊँगा तथा सामने गाऊँगा और आप सुनेंगे" ॥११३-१२५॥ इसके अनन्तर उमापति जैसे वृष पर चढ़ते थे उसी तरह हनुमान् के कंधे पर चढ़ गये । शंकर के आरूढ़ हो जाने के बाद पवनसुत पश्चिम की ओर मुंह घुमा कर पहले की तरह सुख से गाने लगे । गीतिसुधा का पान करते हुए महादेव गौतम के घर पहुँचे । वहाँ अन्य देव, ऋषि तथा दानवगण भी आये । गौतम ने सबकी पूजा की और भोजन के लिये आग्रह किया ॥१२६-१२८॥ उस समय हनुमान् का संगीत सुनकर लकड़ी के बने जितने गृहोपकरण थे, वे सजीव-से और समस्त श्रोतागण निर्जीव-से प्रतीत हो रहे थे । हनुमान् के दोनों हाथ शंकर की वन्दना कर रहे थे । उनके समस्त अंगों में आभूषण थे । चेहरा प्रसन्न था । युवा अवस्था थी । ललाट के समीप अंजलि बाँधकर शिव को प्रणाम कर रहे थे । इतने में शंकर ने अपने हाथों से हनुमान् का शिर पकड़ कर पूरब की ओर मुख घुमा दिया । तब
एकोनाशीतितमोऽध्यायः ६६३ शिरः कराभ्यां परिगृह्य शंकरो हनूमतः पूर्वमुखं चकार । पद्मासनासीनहनूमतोऽञ्जलौ निधाय पादं त्वपरं मुखे च ॥१३२॥ पादांगुलीभ्यामथ नासिकां विभुः स्नेहेन जग्राह च मन्दमन्दम् । स्कंधे मुखे त्वंसतले च कण्ठे वक्षःस्थले च स्तनमध्यमे हृदि ॥१३३॥ ततश्च कुक्षावथ नाभिमंडले पादं द्वितीयं विदधाति चांजलौ । शिरो गृहीत्वाऽवनमय्य शंकरः पस्पर्श पृष्ठं चिबुकेन सोऽध्वनि ॥१३४॥ हारं च मुक्तापरिकल्पितं शिवो हनूमतः कंठगतं चकार ॥१३५॥ अथ विष्णुर्महेशानमिदं वचनमुक्तवान् । हनूमता समो नास्ति कृत्स्नब्रह्माण्डमण्डले ॥१३६॥ श्रुतिदेवाद्यगम्यं हि पदं तव कपिस्थितम् । सर्वोपनिषदव्यक्तं त्वत्पदं कपि सर्वयुक् ॥१३७॥ यमादिसाधनैर्योगैर्न क्षणं ते पदं स्थिरम् । महायोगिहृदंभोजे परं स्वस्थं हनूमति ॥१३८॥ वर्षकोटिसहस्रं तु सहस्राब्दैरथान्वहम् । भक्त्या संपूजितोऽपीश पादो नो दर्शितस्त्वया ॥१३९॥ लोके वादो हि सुमहाञ्छंभुर्नारायणप्रियः । हरप्रियस्तथा शंभुर्न तादृग्भाग्यमस्ति मे ॥१४०॥ तच्छ्रुत्वा वचनं शंभुर्विष्णोः प्राह मुदान्वितः । न त्वया सदृशो मह्यं प्रियोऽन्योऽस्ति हरे क्वचित् ॥१४१॥ पार्वती वा त्वया तुल्या वर्तते नैव भिद्यते । अथ देवाय महते गौतमः प्रणिपत्य च ॥१४२॥ व्यजिज्ञपदमयात्मन्देवेहि करुणानिधे । मध्याह्नोऽयं व्यतिक्रांतो भुक्तिवेलाखिलस्य च ॥१४३॥ विभु ने अपना एक पैर पद्मासन लगा कर बैठे हुए हनुमान् की अंजलि पर और दूसरा उनके मुख पर रखा । फिर स्नेह से उनकी नासिका को पैर की अंगुलियों से धीरे-धीरे पकड़ लिया। अनन्तर दूसरे चरण को हनुमान् के कंधे, मुख, कंठ, वक्षःस्थल, स्तनमध्य, हृदय, कुक्षि, नाभिमंडल तथा अंजलि पर क्रमशः रखा। फिर शिर को पकड़ कर झुकाते हुए अपनी ठुड्डी से उनके पीठ का स्पर्श किया और मोती का एक हार उनके गले में पहना दिया ॥१२९-१३५॥ तदनन्तर विष्णु ने महेश से यह वचन कहा--"निखिल ब्रह्माण्डमंडल में हनुमान् के समान कोई (भाग्यवान्) नहीं है । क्योंकि श्रुति तथा देवादि से अप्राप्य आपका चरण, जो संपूर्ण उपनिषदों का सार तथा अव्यक्त है, हनुमान् के ऊपर अवस्थित हुआ । आपके उस चरण को यम आदि साधन तथा योगाभ्यास के द्वारा एक क्षण के लिये भी कोई अपने हृदय में स्थिर नहीं कर पाता । परन्तु वही चरण महायोगी हनुमान् के हृदय-कमल पर विराजमान रहा । मैंने एक सहस्र कोटि तथा एक हजार वर्षों तक भक्तिपूर्वक आपके चरणों की अर्चना की। परन्तु कभी आपने अपना चरणदर्शन नहीं होने दिया । यद्यपि लोक में यह बात प्रसिद्ध है कि शम्भु नारायण के अत्यन्त प्रिय हैं और नारायण शम्भु के, किन्तु मैं तो अपने को ऐसा भाग्यवान् नहीं समझता" ॥१३६-१४०॥ विष्णु की बात सुनकर शंकर ने हर्ष से कहा- "हरे ! तुम्हारे समान प्रिय मेरा कोई नहीं है अथवा पार्वती तुम्हारी ही सदृश है, परन्तु वह तो मुझसे भिन्न नहीं है।" एतदुपरान्त गौतम महादेव को प्रणाम कर बोले- "अमेयात्मन् ! करुणानिधे ! मध्याह्न हो गया, भोजन का समय अतिक्रान्त हो रहा है ।"
६६४ नारदीयपुराणम् अथाचम्य महादेवो विष्णुना सहितो विभुः । प्रविश्य गौतमगृहं भोजनायोपचक्रमे ॥१४४॥ रत्नांगुलीयैरथ नूपुराभ्यां दुकूलबन्धेन तडित्सुकांच्या । हारैरनेकैश्च कण्ठनिष्क्यज्ञोपवीतोत्तरवाससी च ॥१४५॥ विलंबिचञ्चन्मणिकुंडलेन सुपुष्पधम्मिल्लवरेण चैव । पंचांगगंधस्य विलेपनेन बाह्वंगदैः कंकणकांगुलीयैः ॥१४६॥ अथो विभूषितः शिवो निविष्ट उत्तमासने । स्वसंमुखं हरिं तथा न्यवेशयद्वरासने ॥१४७॥ देवश्रैष्ठौ हरीशौ तावन्योन्याभिमुखस्थितौ । सुवर्णभाजनस्थान्नं ददौ भक्त्या स गौतमः ॥१४८॥ त्रिंशत्प्रभेदान्भक्ष्यांस्तु पायसं च चतुर्विधम् । सुपक्वं पाकजातं च कल्पितं यच्छतद्वयम् ॥१४९॥ अपक्वं मिश्रकं तद्वैत्रिंशतं परिकल्पितम् । शतं शतं सुकन्दानां शाकानां च प्रकल्पितम् ॥१५०॥ पंचविंशतिधा सर्पिःसंस्कृतं व्यंजनं तथा । शर्कराद्यं तथा चूतमोचाखर्जूरदाडिमम् ॥१५१॥ द्राक्षेक्षुनारगं च मिष्टं पक्वं फलोत्करम् । प्रियालकं जम्बुफलं विकंकतफलं तथा ॥१५२॥ एवमादीनि चान्यानि द्रव्याणीशे समर्प्य च । दत्वापोशानकं विप्रो भुंक्ष्वमिति चाब्रवीत् ॥१५३॥ भुंजानेषु च सर्वेषु व्यजनं सूक्ष्मविस्तृतम् । गौतमः स्वयमादाय शिवविष्णू अवीजयत् ॥१५४॥ परिहासमथो कर्तुमियेव परमेश्वरः । पश्य विष्णो हनूमन्तं कथं भुंक्ते स वानरः ॥१५५॥ वानरं पश्यति हरौ मण्डकं विष्णुभाजने । चिक्षेप मुनिसंघेषु पश्यत्स्वपि महेश्वरः ॥१५६॥ हनूमते दत्तांश्च स्वोच्छिष्टं पायसादिकम् । त्वदुच्छिष्टमभोज्यं तु तवैव वचनाद्विभो ॥१५७॥ अनर्हं मम नैवेद्यं पत्रं पुष्पं फलाविकम् । मह्यं निवेद्य सकलं कूप एव विनिःक्षिपेत् ॥१५८॥ अनन्तर विष्णु सहित महादेव आचमन करके भोजन के लिए गौतम के घर पहुँचे । वहाँ गौतम ने विभु को रत्न की बनी अंगूठी, नूपुर, दुकूलबन्ध (धोती) 'बिजली की तरह चमकती हुई कांची' अनेक प्रकार के हार, स्वर्णयज्ञोपवीत, उत्तरीय वस्त्र, मणि के बने बड़े-बड़े कुंडल, पुष्पसुशोभित पाग (पगड़ी), अंगद तथा कंकण से विभूषित करके पंच गंधों का लेप लगाया । तब शिव उत्तम आसन पर बैठ गये और अपने संमुख श्रेष्ठ आसन पर हरि को भी बैठाया । जब सुरवर हरि तथा हर परस्पर अभिमुख होकर आसीन हुए तब गौतम भक्तिपूर्वक सुवर्णपात्रों में भोजन परोसने लगे ॥१४१-१४८॥ उन्होंने तीस प्रकार का भक्ष्यपदार्थ चार प्रकार का खीर, दो सौ प्रकार का सुन्दरतया पकाया हुआ भोजन तीस प्रकार का अपक्व तथा मिश्रित (पक्वापक्व) भोजन, सौ प्रकार के कंद तथा शाक, पचीस प्रकार के घी से बनाये हुए व्यंजन (तरकारी) शक्कर, आम, केला, खजूर, दाडिम, दाख, ईख, नारंगी, प्रियालक, जंबुफल, विकंकतफल, अन्य मिष्ट एवम् सुपक्व फल तथा भाँति-भाँति के भोज्यपदार्थ परसे । फिर ईश को जल समर्पण कर 'भोजन करिये, यह कहा । जब शिव आदि समस्त देवगणों ने भोजन करना प्रारम्भ किया तब गौतम एक सुमनोहर पंखा लेकर हरि-हर के ऊपर झलने लगे । उस समय शंकर ने मनोविनोद करने के वास्ते केशव से कहा—'विष्णो ! हनुमान् को देखो, कैसे वह बन्दर खा रहा है' ॥१४६-१५५॥ शिव के कहने पर विष्णु कपि की तरफ ताकने लगे । इधर महेश ने मुनिसमूह के देखते ही देखते विष्णु के पात्र में मंडक (मट्ठा) डाल दिया और हनुमान् को अपने उच्छिष्ट पायस आदि दे दिये । परन्तु कपि पूछ बैठे— "विभो ! आपका उच्छिष्ट नहीं खाना चाहिए-यह आप ही का वचन है" ॥१५६-१५७॥ शिव ने उत्तर दिया— "पत्र, पुष्प, फल आदि मेरा नैवेद्य वास्तव में अभोज्य है । उसे समर्पित करके कूप में ही फेंक
एकोनाशीतितमोऽध्यायः ६६५ अभुक्ते त्वद्वचो नूनं भुक्ते चापि कृपा तव । बाणलिंगे स्वयंभूते चन्द्रकांते हृदि स्थिते ॥१५८॥ चांद्रायणसमं ज्ञेयं शम्भोर्नैवेद्यभक्षणम् । भुक्तिवेलेयमधुना तद्वैरस्यं कथांतरात् ॥१६०॥ भुक्त्वा तु कथयिष्यामि निर्विशंकं विभुंश्व तत् । अथासौ जलसंस्कारं कृतवान् गौतमो मुनिः आरक्तसुस्निग्धसुसूक्ष्मगात्राननेकधाधौतसुशोभितांगान् । तडागतोयैः कतबीजघर्षितैर्विशोधितैस्तैः करकानपूरयत् ॥१६२॥ नद्याः सैकतवेदिकां नवतरां संछाद्य सूक्ष्मांबरैः, शुद्धैः श्वेततरैरथोपरि घटांस्तोयेन पूर्णान्निक्षिपेत् । लिप्त्वा नालकजातिमास्तपुटकं तत्कौल्कं कारिका- चूर्णं चन्दनचन्द्ररश्मिविशदां मालां पुटांतं क्षिपेत् । यामस्यापि पुनश्च वारिवसनेनाशोध्य कुम्भेन तत्- चंद्रग्रन्थिमथो निधाय बकुलं क्षिप्त्वा तथा पाटलम् ॥१६३॥ शेफालीस्तवकमथो जलं च तत्र विन्यस्य प्रथमत एव तोयशुद्धिम् । कृत्वाथो मृदुतरसूक्ष्मवस्त्रखण्डेनावेटेत्सूणिकमुखं च सूक्ष्मचन्द्रम् ॥१६४॥ अनातपप्रदेशे तु निधाय करकानथ । मंदवातसमोपेते सूक्ष्मव्यजनवीजिते ॥१६५॥ सिंचेच्छीतैर्जलैश्चापि वासितैः सृणिकामपि । संस्कृताः स्वायतास्तव नरा नार्योऽथवा नृपाः ॥१६६॥ तत्कन्या वा क्षालितांगा धौतपादास्सुवाससः । मधुपिंगमनिर्यासम्सांद्रमगुरुद्भवम् ॥१६७॥ बाहुमूले च कंठे च विलिप्यासांद्रमेव च । मस्तके जापकं न्यस्य पंचगंधविलेपनम् ॥१६८॥ देना चाहिये। फिर हनुमान् ने कहा-- "अब यदि मैं नहीं खाऊंगा तो आपके वचन का पालन नहीं होगा और यदि खा लूंगा तो आपकी कृपा होगी।" (तब शंकर ने कहा-- "मेरे स्वयंभूत बाणलिंग या चंद्रकांतमणि- निर्मित लिंग या मुझे हृद्गत करके जो मेरा नैवेद्य भक्षण करता है, उसे चांद्रायण व्रत करने का फल मिलता है। हे अथवा अभी भोजन करने का समय है। इसलिये इस तरह की बात करना छोड़ दो। भोजनोपरान्त मैं बता दूंगा। तावत्काल शंकारहित होकर भोजन करो" ॥१५८-१६०३॥ सबके भोजन कर लेने के बाद गौतम मुनि ने जलसंस्कार किया (अर्थात् सबको हाथ-मुंह धुलाया)। (जलसंस्कार इस प्रकार किया जाता हैः- किञ्चित् लाल रंग वाले तथा बहुत चिकने अवयवों वाले और अनेक वार धोये जाने के कारण सुन्दर अंगों वाले घटों को तालाब के ऐसे जल से, जो निर्मली से स्वच्छ कर दिया गया हो, भर देना चाहिए ॥१६१-१६२॥ अनन्तर नदी के रेतीले तट पर नया चबूतरा बनाकर उसे उज्ज्वल सूक्ष्म वस्त्रों से ढककर उस उन (जल) पूर्ण घटों को स्थापित करे। उन पर चावल के चूर्ण तथा सिन्दूर से चित्रकारी करके चन्द्रकिरण के समान धवल माला को चन्दनचर्चित करके उनमें डाल दें। फिर एक पहर तक जल से शुद्ध करके कर्पूरचूर्ण, मोलसिरोपुष्प, पाटलपुष्प तथा शेफालिका के गुच्छे उनमें डाले, पुनः जल-शुद्धि करे। पश्चात् उनके मुखों को, जहाँ कर्पूरचूर्ण से लिप्त अंकुश रखा हुआ हो, कोमल तथा महीन वस्त्र खंडों से लपेट दे। उन घटों को धूप-रहित स्थान में रखना चाहिए ॥१६३-१६४३॥ मंद वायु से युक्त हल्के पंखे को चलाकर शीतल, सुगंधित जल से अंकुश (या लार ?) को भी सींचे। वहाँ सुसंस्कृत तथा स्वाधीन नर- नारियों या राजा या राजकन्याओं का पूजन करना चाहिए। वे रमणियां शरीर की स्वच्छता करके पैरों को धोकर सुन्दर वस्त्रों से सुसज्जित हों। वे अगर के गोंद को, जो ललाई लिये भूरे रंग का हो, बाहुमूल तथा कंठ में लगावें। फिर मस्तक पर मंत्र जप करके पांच सुगन्धित पदार्थों का लेप करें। उनके बाल फूलों से सुसज्जित
६८६ नारदीयपुराणम् पुष्पनद्धसुकेशास्तु ताः शुभाः स्युः सुनिर्मलाः । एवमेवार्चिता नार्य आप्तकुंकुमविग्रहाः ॥१६६॥ युवतयश्चारुसर्वांग्यो नितरां भूषणैरपि । एतादृग्वनिताभिर्वा नरैर्वा दापयेज्जलम् ॥१७०॥ तेऽपि प्रदानसमये सूक्ष्मवस्त्राल्पवेष्टनम् । अथ वामकरे न्यस्य करकं प्रेक्ष्य तत्र हि ॥१७१॥ दोरिकान्यस्तमुन्मुच्य ततस्तोयं प्रदापयेत् । एवं स कारयामास गौतमो भगवान्मुनिः ॥१७२॥ महेशादिषु सर्वेषु भुक्तवत्सु महात्मसु । प्रक्षालितांघ्रिहस्तेषु गंधोद्वर्तितपाणिषु ॥१७३॥ उच्चासनसमासीने देवदेवे महेश्वरे । अथ नीचसमासीना देवाः सर्षिगणास्तथा ॥१७४॥ मणिपात्रेषु संवेष्ट्य पूगखंडान्सुधूपितान् । अकोणान्वर्तुलांन्स्थूलान्सूक्ष्मानंकुशानपि ॥१७५॥ श्वेतपत्राणि संशोध्य क्षिप्त्वा कर्पूरखंडकम् । चूर्णं च शंकरायाथ निवेदयति गौतमे ॥१७६॥ गृहाण देव तांबूलमित्युक्तवचने मुनौ । कपे गृहाण तांबूलं प्रयच्छ मम खंडकान् ॥१७७॥ उवाच वानरो नास्ति मम शुद्धिर्महेश्वर । अनेकफलभोक्तृत्वाद्वानरस्तु कथं शुचिः ॥१७८॥ तच्छ्रुत्वा तु विरूपाक्षः प्राह वानरसत्तमम् । मद्वाक्यादखिलं शुद्ध्येन्मद्वाक्यादमृतं विषम् ॥१७९॥ मद्वाक्यादखिला वेदा मद्वाक्याद्देवतादयः । मद्वाक्याद्धर्मविज्ञानं मद्वाक्यान्मोक्ष उच्यते ॥१८०॥ पुराणान्यागमाश्चैव स्मृतयो मम वाक्यतः । अतो गृहाण तांबूलं मम देहि सुखंडकान् ॥१८१॥ हरिर्वामकरेणाधात्तांबूलं पूगखंडकम् । ततः पत्राणि संगृह्य तस्मै खंडान्समर्पयत् ॥१८२॥ कर्पूरमग्रतो दत्तं गृहीत्वाभक्षयच्छिवः । देवे तु कृततांबूले पार्वती मंदराचलात् ॥१८३॥ जयाविजययोर्हस्तं गृहीत्वायान्मुनेर्गृहम् । देवपादौ ततो नत्वा विनम्रावदनामभवत् ॥१८४॥
किये जायें । इस प्रकार अन्य पवित्र एवं निर्मल नारियां जिनके शरीर में केसर मला गया हो, पूजी जानी चाहिए। सर्वाङ्ग सुन्दरी युवतियों को आभूषणों से सम्मानित करना चाहिए। ऐसी नारियों या नरों से जल दिलाना चाहिए जो कि जल देने के समय सूक्ष्म वस्त्र को थोड़ा-सा लपेट लें । अथवा दर्पण में घटों को देख कर उनकी डोरी खोलकर जल दें। इस प्रकार भगवान् गौतम मुनि ने जल का संस्कार कराया ॥१६५-१७२॥ जब महेश आदि समस्त महात्मा गण भोजन करके हाथ-पैर धो चुके और हाथों में किंचिन्मात्र भी गंध नहीं रही तब देव-देव शङ्कर उच्चासन पर और ऋषिवृन्द समेत देवगण नीचासन पर आसीन हुए। अनन्तर मणिपात्रों में सुगंधित सुपारी के खण्ड, जो कोणों से रहित, गोल, स्थूल, असूक्ष्म तथा अंकुश थे, और श्वेतपत्र (ताम्बूल), जिनमें कर्पूरखण्ड तथा चूर्ण (मसाला) डाला हुआ था, रखकर गौतम ने शिव से कहा—'देव ! तांबूल (मुखशुद्धि) ग्रहण कीजिये ।' मुनि के यह कहने पर महेश्वर ने कपि से कहा—'पान तुम ले लो और सुपारी मुझे दे दो ।' परन्तु हनुमान् ने उत्तर दिया – “विभो ! मेरी शुद्धि नहीं होती। मैं अनेक (कर्म) फलों का भोगने वाला बन्दर हूँ। तब मैं कैसे पवित्र हो सकता ?'' यह बात सुनकर विरूपाक्ष ने वानरश्रेष्ठ से कहा—'मेरे वाक्य से सबकुछ शुद्ध हो जाता है, विष भी अमृत हो जाता है ॥१७३-१७९॥ मेरे ही वाक्य पर अखिल वेद, देवता, धर्म, विज्ञान, मोक्ष, पुराण, शास्त्र तथा स्मृतियां आधारित हैं। इसलिए तुम तांबूल ले लो और सुपारी मुझे दो।, शंकर के कहने पर कपि ने बांये हाथ से तांबूल लेकर सुपारी के खण्ड महेश्वर को समर्पण कर दिये । शिव ने भी कर्पूर सहित पूगीफल खा लिये । जब महादेव मुखशुद्धि कर चुके तब मंदराचल से पार्वती जया, विजया के साथ गौतम के घर आ पहुँचीं। वे शङ्कर की पादवंदना कर मुँह नीचे करके अवस्थित हुईं ॥१८०-१८४॥ किन्तु त्रिलोचन ने उनके मुख को
एकोनाशीतितमोऽध्यायः ६८७ उन्नमय्यमुखं तस्या इदमाह त्रिलोचनः । त्वदर्थं देवदेवेशि अपराधः कृतो मया ॥१८५॥ यत्त्वां विहाय भुक्तं हि तथान्यच्छृणु सुन्दरि । यत्त्वां स्वमंदिरे त्यक्त्वा महदेनो मया कृतम् ॥१८६॥ क्षंतुमर्हसि देवेशि त्यक्तकोपा विलोकय । न बभाषेऽप्येवमुक्ता सारुंधत्या विनिर्ययौ ॥१८७॥ निर्गच्छंतीं मुनिर्ज्ञात्वा दंडवत्प्रणनाम ह । अथोवाच शिवा तं च गौतम त्वं किमिच्छसि ॥१८८॥ अथाह गौतमो देवीं पार्वतीं प्रेक्ष्य सस्मिताम् । कृतकृत्यो भवेयं वै भुक्तायां मद्गृहे त्वयि ॥१८९॥ ततः प्राह शिवा विप्रं गौतमं रचितांजलिम् । भोक्ष्यामि त्वद्गृहे विप्र शंकरानुमतेन वै ॥१९०॥ अथ गत्वा शिवं विप्रे लब्धानुज्ञस्त्वरागतः । भोजयामास गिरिजां देवीं चारुंधर्ती तथा ॥१९१॥ भुक्त्वाथ पार्वती सर्वांगधूपपुष्पाद्यलंकृता । सहानुचर कन्याभिः सहस्राभिर्हरं यथा ॥१९२॥ अथाह शंकरो देवीं गच्छ गौतममंदिरम् । संध्योपास्तिमहं कृत्वा ह्यागमिष्ये तवांतिकम् ॥१९३॥ इत्युक्त्वा प्रययौ देवी गौतमस्यैव मंदिरम् । संध्यावंदनकामास्तु सर्व एव विनिर्गताः ॥१९४॥ कृतसंध्यास्तडागे तु महेशाद्याश्च कृत्स्नशः । अथोत्तरमुखः शंभुर्न्यासं कृत्वा जजाप ह ॥१९५॥ अथ विष्णुर्महातेजा महेशमिदमब्रवीत् । सर्वैनमस्यते यस्तु सर्वैरैव समर्च्यते ॥१९६॥ हूयते सर्वयज्ञेषु स भवाञ्कि जपिष्यति । रचितांजलयः सर्वे त्वामेवैकमुपासते ॥१९७॥ स भवान्देवदेवेशः कस्मै विरचितांजलिः । नमस्कारादिपुण्यानां फलदस्त्वं महेश्वर ॥१९८॥ तव कः फलदो वंद्यः को वा त्वत्तोऽधिको वद । तच्छ्रुत्वा शंकरः प्राह देवदेवं जनार्दनम ॥१९८½॥ ऊपर उठा दिया और कहा—'देवों की ईश्वरी ! मैंने तुम्हारा अपराध किया जो तुम्हें छोड़कर भोजन करने आया । सुन्दरि ! तुम्हें अपने घर पर छोड़कर जो मैं निमन्त्रण खाने चला आया—यह मेरा घोर अपराध हुआ । किन्तु देवेश्वरि ! क्षमा करो । क्रोध का त्याग कर मेरी ओर ताको ।' शिव के इस तरह कहने पर भी उमा नहीं बोली; अपितु वहाँ से उठकर अरुंधती के समीप जाने लगी ॥१८५-१९१॥ मुनि ने यह समझकर उन्हें प्रणाम किया तब शिवा ने पूछा—'गौतम ! तुम क्या चाहते हो ?' मुनि ने मुस्कराती हुई पार्वती को देख कर उत्तर दिया—"यदि आप मेरे घर में भोजन कर लेतीं तो मैं कृतकृत्य हो जाता ।" तब गौरी ने अंजलि बांधे गौतम से कहा—'विप्र ! मैं शङ्कर से अनुमति लेकर तुम्हारे घर में भोजन करूँगी ।' यह सुनते ही गौतम शिव से आज्ञा ले आये और उन्होंने अरुंधती सहित देवी गिरजा को भोजन कराया । भोजनोपरान्त गंध, पुष्प आदि से अलंकृता होकर पार्वती सहस्रों परिचारिकाओं के साथ शङ्कर के समीप गईं । परन्तु शंभु ने कहा—"अभी तुम गौतम के घर जाओ । मैं संध्योपासन करके तुम्हारे पास आऊँगा ।" यह सुनकर गौरी गौतम के घर चली गईं और सब देवगण संध्यावंदन करने के लिये बाहर निकले ॥१९२-१९४॥ तालाब में जाकर महेशा आदि देवों ने संध्यावंदन किया । तदुपारन्त जब उत्तर मुख होकर शंभु न्यास तथा जप कर चुके तब महातेजस्वी विष्णु ने शङ्कर से कहा—"जिन्हें समस्त देवगण नमस्कार करते हैं, जिनकी सब अर्चना करते हैं और सकल यज्ञों में जिनको आहुतियाँ दी जाती हैं, वे देव (आप) किस चीज का जप करते हैं ? निखिल सुरगण अंजलि बांध कर एक आप ही की उपासना करते हैं । तब देवदेवेश्वर होकर आप किसको प्रणाम करते हैं ? महेश्वर ! नमस्कार आदि पुण्यों का फल देने वाले आप हैं । फिर आपको कौन फल देगा ? या आपसे बढ़कर कौन है ?—बतलाइए ।" १९५-१९८½॥ यह सुनकर शङ्कर ने देवाधीश्वर जनार्दन से कहा—"गोविन्द ! मैं न कुछ ध्यान करता हूँ, न ८८ ना० पु०
६६८ | नारदीयपुराणम् ध्याये न किंचिद्गोविंद नमस्ये ह न किंचन । किंतु नास्तिकजंतूनां प्रवृत्त्यर्थमिदं मया ॥२००॥ दर्शनीयं हरे चैतदन्यथा पापकारिणः । तस्माल्लोकोपकारार्थमिदं सर्वं कृतं मया ॥२०१॥ ओमित्युक्त्वा हरिरथ तं नत्वा समतिष्ठत । अथ ते गौतमगृहं प्राप्ता देवर्षयस्तदा ॥२०२॥ सर्वे पूजामथो चक्रुर्देवदेवाय शूलिने । देवो हनूमता सार्द्धं गायन्नास्ते मुनीश्वर ॥२०३॥ पञ्चाक्षरीं महाविद्यां सर्व एव तदाऽजपन् । हनुमत्करमालंब्य देव्याभ्यां संगतो हरः ॥२०४॥ एकशय्यासमासीनौ तावुभौ देवदंपती । गायन्नास्ते च हनुमांस्तुंबुरुप्रमुखस्तथा ॥२०५॥ नानाविधविलासांश्च चकार परमेश्वरः । आहूय पार्वतीमीश इदं वाक्यमुदाच ह ॥२०६॥ रचयिष्यामि धम्मिल्लमेहि मत्पुरतः शुभे । देव्याह न च युक्तं तद्भर्त्रा शुश्रूषणं स्त्रियः ॥२०७॥ केशप्रसाधनकृतावनर्थांतरमापतेत् । केशप्रसाधने देव तत्त्वं सर्वं न चेप्सितम् ॥२०८॥ अथ बंधे कृते पश्चादंसप्रांतप्रमार्जनम् । ततश्चरमसंलग्न केशपुष्पादिमार्जनम् ॥२०६॥ एतस्मिन्वर्तमाने तु महात्मानो यदागमन् । तदा किमुत्तरं वाच्यं तव देवादिंवंदित ॥२१०॥ नायांति चेदथ विभो भीतिर्नाशमुपैष्यति । एवं हि भाषमाणां तां करेणाकृष्य शंकरः ॥२११॥ स्वोर्वोः संस्थापयित्वैव विस्रस्य कचबंधनम् । विस्रज्य च कराभ्यां स त्रसत्सार नखैरपि ॥२१२॥ विष्णुदत्तां पारिजातस्रजं कचगतामपि । कृत्वा धम्मिल्लमकरोदथ मालां करागताम् ॥२१३॥ मल्लिकास्रजमादाय बबंध कचबंधने । कल्पप्रसूनमालां च ब्रह्मदत्तां महेश्वरः ॥२१४॥ पार्वतीनवसने गूढगन्धाढ्ये च समाददात् । अथांसपृष्ठ संलग्ममार्जनं कृतवान् विभुः ॥२१५॥ श्लथन्नीवीरोधो देव्या वस्त्रवेष्टादधोगतः । किमिदं देवि चेत्युक्त्वा नीवीबंधं चकार ह ॥२१६॥
नमस्कार हो । केवल नास्तिक लोगों को प्रवृत्त कराने के लिए (लोकशिक्षणार्थ) यह सब कुछ मैं करता हूँ। हरे ! इस तरह की चेष्टा करके लोगों को दिखाना चाहिए; अन्यथा पापियों की वृद्धि हो जायगी । बस, यही सोचकर मैंने लोकोपकार की दृष्टि से ऐसा किया।" ठीक--यह कह कर हरि ने हर को प्रणाम किया । पश्चात् समस्त देव एवम् ऋषि गौतम के घर आये । सबों ने देव-देव शङ्कर की आराधना की । मुनीश्वर ! उस समय महादेव हनुमान् के साथ गा रहे थे और सब देवादिगण पंचाक्षर मन्त्र (नमःशिवाय) का जप कर रहे थे । अनन्तर शंभु हनुमान् का हाथ पकड़ कर विष्णु के साथ पार्वती के समीप पहुँचे । वहाँ दोनों दम्पति एक शय्या पर आसीन हुए । तब हनुमान् तुंबुरु आदि वाद्यों को बजाते हुए गाने लगे ॥१९९-२०५॥ इधर देव ने पार्वती को संबोधित करते हुए कहा--'कल्याणि ! यहाँ मेरे सामने आओ । मैं तुम्हारा जूड़ा बांधूंगा।' परन्तु देवी ने उत्तर दिया--'न-न-न, पति पत्नी की सेवा करे, यह उचित नहीं । देव ! आप यदि जूड़ा बांधेंगे तो अनर्थ हो जायगा । क्योंकि इस कार्य में विलम्ब होता है । जैसे बालों को संवारना, उनमें लगे पुष्प आदि को हटाना और पुनः पुष्प आदि से उसे सुसज्जित करना होता है । उतने में यदि कोई महात्मा आ जायेंगे तो क्या कहेंगे ? मान लीजिए, कदाचित् कोई न भी आये तो भी तो हम लोगों को उनके आने की शंका बनी ही रहेगी ।, इस प्रकार कहती हुई पार्वती को शङ्कर ने हाथ से खींच कर अपने जंघे पर सुला दिया और उनके बालों को खोल कर अपने हाथों की अँगुलियों एवम् नखों से बिलगाने लगे ॥२०६-२१२॥ पुनः संवार कर विष्णु की दी हुई पारि- जातकुसुम की माला से जूड़ा बांध कर उसमें मालतीमाला तथा ब्रह्मा की दी हुई कल्पप्रसूनमाला भी बांध दी । पुनः कंधे तथा पीठ आदि पर पड़े बालों को झाड़ कर उमा की नीवी को खींचते हुए कहा--'देवि ! यह क्या ?' इतना कह कर नीवी को भी बांध दिया ॥२१३-२१६॥
एकोनाशीतितमोऽध्यायः ६८६ नासाभूषणमेतत्त्वे सत्यमेव वदामि ते । ततः प्राह शिवा शंभुं स्मित्वा पर्वतनंदिनी ॥२१७॥ अहो त्वन्मंदिरे शंभो सर्ववस्तु समृद्धिमत् । पूर्वमेव मया सर्वं ज्ञातप्रायमभूत्किल ॥२१८॥ सर्वद्रविणसंपत्तिर्भूषणैरेवगम्यते । शिरो विभूषितं देव ब्रह्मशीर्षस्य मालया ॥२१९॥ नरकस्रग् तथा माला वक्षःस्थलविभूषणम् । शेषश्च वासुकिश्चैव सविषौ तव कङ्कणौ ॥२२०॥ दिशोऽम्बरं जटा केशा भसितं चांगरागमम् । महोक्षो वाहनं गोत्रं कुलं चाज्ञातमेव च ॥२२१॥ ज्ञायेते पितरौ नैव विरूपाक्षं तथा वपुः । एवं वदन्तीं गिरिजां विष्णुः प्राहातिकोपनः ॥२२२॥ किमर्थं निंदसे देवि देवदेवं जगत्पतिम् । दुष्प्राणा न प्रिया भद्रे तव नूनमसंयमात् ॥२२३॥ यत्रेशानिंदनं भद्रे तत्र नो मरणव्रतम् । इत्युक्तवाथ नखाभ्यां हि हरिश्चेत्तुं शिरो गतः ॥२२४॥ महेशस्तत्करं गृह्य प्राह मा साहसं कृथाः । पार्वतीवचनं सर्वं प्रियं मम न चाप्रियम् ॥२२५॥ ममाप्रियं हृषीकेश कर्तुं यत्किंचिदिष्यते । ओमित्युक्तवाथ भगवांस्तूष्णींभूतोऽभवद्धरिः ॥२२६॥ हनुमानथ देवाय व्यज्ञापयदिदं वचः । अर्थयामि विनिष्कामं मम पूजाव्रतं तथा ॥२२७॥ पूजार्थमप्यहं गच्छे मामनुज्ञातुमर्हसि । तच्छ्रुत्वा शंकरो देवः स्मित्वा प्राह कपीश्वरम् ॥२२८॥ कस्य पूजा क्व वा पूजा किं पुष्पं किं दलं वद । को गुरुः कश्च मंत्रस्ते कीदृशं पूजनं तथा ॥२२९॥ एवं वदति देवेशे हनुमान्नितिसंयुतः । वेपमान समस्तांग स्तोतुमेवं प्रचक्रमे ॥२३०॥ नमो देवाय महते शंकरायामितात्मने । योगिने योगधात्रे च योगिनां गुरवे नमः ॥२३१॥ फिर नासिका भूषण लेकर कहने लगे--'यह तुम्हारी नाक का आभूषण है, मैं सत्य कहता हूँ। इसे पहन लो।' तब पर्वतनन्दिनी शिवा मुस्कराती हुई बोली--'शंभो; आपके घर में किसी वस्तु की कमी नहीं है, यह पहले ही समझ गई थी। आभूषणों से ही तो प्रचुर धन-संपत्ति का पता चलता है। देखिये न, आपका मस्तक ब्रह्ममुण्डमाला से कैसा शोभित हो रहा है। वक्षःस्थल भी तो आपका नरमुण्डमाला से विभूषित है ॥२१७-२१८३॥ अहा ! यह आपके कंगन विषधर शेष तथा वासुकी हैं, वस्त्र दिशायें हैं, अंगराग भस्म है, वाहन गवेन्द्र है, गोत्र- वंश तो अज्ञात ही है। आपके माता-पिता को भी तो कोई नहीं जानता। शरीर में नेत्र भी दो नहीं तीन हैं।, इस तरह, उपहास करती हुई गिरिजा से विष्णु ने क्रोधपूर्वक कहा- देवि ! क्यों तुम देवदेव जगदीश्वर की निन्दा कर रही हो ? भद्रे ! मालूम पड़ता है कि तुम्हें अपने असंयम के कारण स्वकीय प्राण प्रिय नहीं हैं। शुभे ! जहां शंकर की निंदा होती है वहां हमलोगों को मरणव्रत आरम्भकर देना चाहिये । ॥२१९-२२३३॥ इतना कह कर विष्णु अपने नखों से ही उमा का शिर काटने को तैयार हो गये। परन्तु महेश ने उनका हाथ पकड़ लिया और समझाया-'ऐसा साहस मत करो। पार्वती की सभी बातें मुझे प्रिय लगती हैं, अप्रिय नहीं। हृषिकेश! तुम जो कुछ करने जा रहे हो, वही मुझे अप्रिय लग रहा है।' शिव का वचन सुनकर हरि 'अस्तु' कहते हुए चुप हो गये। तब हनुमान् ने महादेव से निवेदन किया--'देव! मैं निष्काम पूजा व्रत करना चाहता हूँ ॥२२४-२२७॥ इस लिये आप आज्ञा प्रदान कीजिये।' यह सुन कर शंकर मन्द हास्य करते हुए कपीश्वर से बोले-'किसकी पूजा करोगे ? कहाँ करोगे ? पत्र-पुष्प क्या होंगे ! गुरु कौन है ? तथा पूजा किस प्रकार की होगी। देवेश की यह बात सुनकर हनुमान् अत्यंत विनयावनत हो गये । उनके समस्त अंग काँपने लगे। तब उन्होंने इस तरह स्तुति करना प्रारंभ किया- "महान् देव, शंकर, अमितात्मा, योगी, योगघाता तथा योगियों के गुरु को नमस्कार है। योग
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७०० नारदीयपुराणम् योगगम्याय देवाय ज्ञानिनां पतये नमः । वेदानां पतये तुभ्यं देवानां पतये नमः ॥२३२॥ ध्यानाय ध्यानगम्याय ध्यातॄणां गुरवे नमः । अष्टमूर्ते नमस्तुभ्यं पशूनां पतये नमः ॥२३३॥ अंबकाय त्रिनेत्राय सोमसूर्याग्निरुचक्षुषे । भृङ्गिराजधत्तूरद्रोणपुष्पप्रियस्य ते ॥२३४॥ बृहतीपूगपुन्नागचंपकादिप्रियाय च । नमस्तेऽस्तु नमस्तेऽस्तु भूय एव नमोनमः ॥२३५॥ शिवो हरिमय प्राह मा भैषीर्वद मेऽखिलम् । ततस्त्यक्तत्वा भयं प्राह हनुमान् वाक्यकोविदः ॥२३६॥ शिवलिंगार्चनं कार्यं भस्मोद्धूलितदेहिना । दिवा संपादितैस्तोयैः पुष्पाद्यैरपि तादृशैः ॥२३७॥ देव विज्ञापयिष्यामि शिवपूजाविधिं शुभम् । सायंकाले तु संप्राप्ते अशिरःस्नानमाचरेत् ॥२३८॥ क्षालितं वसनं शुष्कं धृत्वाचम्य त्रिस्सुधीः । अथ भस्म समादाय आग्नेयं स्नानमाचरेत् ॥२३६॥ प्रणवेन समामंत्र्य अष्टवारमथापि वा । पञ्चाक्षरेण मन्त्रेण नाम्ना वा येन केनचित् ॥२४०॥ सप्ताभिमंत्रितं भस्म दर्भपाणिः समाहरेत् । ईशानः सर्वविद्यानामुक्त्वा शिरसि पातयेत् ॥२४१॥ तत्पुरुषाय विद्महे मुखे भस्म प्रसेचयेत् । अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यः भस्म वक्षसि निक्षिपेत् ॥२४२॥ वामदेवाय नमः इति गुह्यस्थाने विनिक्षिपेत् । सद्योजातं प्रपद्याम निक्षिपेदथ पादयोः ॥२४३॥ उद्धूलयेत्समस्तांगं प्रणवेन विचक्षणः । त्रैवर्णिकानामुदितः स्नानादिविधिरुत्तमः ॥२४४॥ शूद्रादीनां प्रवक्ष्यामि यदुक्तं गुरुणा तथा । शिवेति पदमुच्चार्य भस्म संमन्त्रयेत्सुधीः ॥२४५॥ सप्तवारमथादाय शिवायति शिरस्यथ । शंकराय मुख प्रोक्तं सर्वज्ञाय हृदि क्षिपेत् ॥२४६॥ स्थाणवे नम इत्युक्त्वा मुखे चापि स्वयंभुवे । उच्चार्य पादयोः क्षिप्त्वा भस्म शुद्धमतः परम् ॥२४७॥ द्वारा प्राप्य देव, ज्ञानियों के स्वामी, वेदों के पति, देवों के पति, ध्यानरूप ध्यानमग्न तथा ध्यान करने वालों के गुरु को नमस्कार है। अष्टमूर्ते ! आपको नमस्कार है। पशुओं के पति को नमस्कार है। अम्बक तथा त्रिनेत्र को नमस्कार है। सोम, सूर्य तथा अग्निरूप नेत्र वाले, भृंगराज धत्तूर तथा द्रोण पुष्पों के प्रिय और बृहती, पूग, पुन्नाग तथा चंपक आदि के प्रिय को नमस्कार है। आपको नमस्कार है। बार-बार आपको नमस्कार है" ।।२२८-२३५।। इसके बाद शिव ने कपि से कहा—'डर मत करो। मुझे सब कुछ कह डालो।' तब निर्भय होकर वाक्- चतुर हनुमान् बोले--'देव! कल्याण देने वाली शिवपूजा की विधि मैं श्रीमान् से निवेदन करता हूँ। साधक संपूर्ण शरीर में भस्म रमा कर शिवलिंग की अर्चना करे। दिन में जल आदि से पूजन और सायंकाल बिना शिर भिगोये स्नान करके वस्त्र पहन कर सावधानी से तीन बार आचमन करे। तदनन्तर भस्म लेकर आग्नेय स्नान करना चाहिये ।।२३६-२३६।। भस्म को प्रणव से आठ बार आमन्त्रित कर पंचाक्षर मन्त्र या जिस किसी नाम (मन्त्र) से सात बार अभिमन्त्रित करे। फिर हाथ में कुश लेकर 'ईशानः सर्वविद्यानाम्' यह कहते हुए शिर पर भस्म डाले। 'तत्पुरुषायविद्महे' यह पढ़कर मुख में, 'अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यः' यह पढ़ कर छाती में, 'वामदेवाय नमः' यह कह कर गुह्यस्थान में, 'सद्योजातम् प्रपद्यामि' यह कह कर पैरों में और प्रणव का उच्चारण कर संपूर्ण अङ्गों में भस्म लगाये। यह स्नान आदि की विधि तीन वर्णों के लिये उत्तम कही गई है और शूद्र आदि के लिये तो जैसा गुरु ने मुझे बतलाया है, वह मैं निवेदन कर देता हूँ। वे (शूद्र आदि) 'शिव' इस पद का सात बार उच्चारण कर भस्म को अभिमन्त्रित करें। पुनः उसे लेकर 'शिवाय नमः' इसका उच्चारण करते हुए शिर में, 'शंकराय नमः' यह पढ़ते हुए हृदय में, 'सर्वज्ञाय नमः' यह पढ़ते हुए हृदय में, 'स्थाणवे नमः' यह कहते हुए पुनः मुख में 'स्वयंभुवे नमः' यह कहते हुए पैरों में और 'नमः शिवाय' कह कर संपूर्ण अंगों में भस्म लेपे ॥२४०-२४७॥
एकोनाशीतितमोऽध्यायः ७०१ नमः शिवायेत्युच्चार्यं सर्वाङ्गोद्धूलनं स्मृतम् । प्रक्षाल्य हस्तावाचम्य दर्भपाणिः समाहितः ॥२४८॥ दर्भाभावे सुवर्णं स्यात्तदभावे गवालुकाः । तदभावे तु दूर्वाः स्युस्तदभावे तु राजतम् ॥२४६॥ संध्योपास्ति जपं देव्याः कृत्वा देवगृहं व्रजेत् । देववेदीमथो वापि कल्पितं स्थंडिलं तु वा ॥२५०॥ मृण्मयं कल्पितं शुद्धं पद्मादिरचनायुतम् । चातुर्वर्णकरं गैरैश्च श्वेतेनैकेन वा पुनः ॥२५१॥ विचित्राणि च पद्मानि स्वस्तिकावि तथैव च । उत्पलादिगदाशंखत्रिशूलडमरूं स्तथा ॥२५२॥ शरोक्तपंचप्रासादं शिवलिंगमथैव च । सर्वकामफलं वृक्षं कुलकं कोलकं तथा ॥२५३॥ षट्कोणं च त्रिकोणं च नवकोणमथापि वा । कोणे द्वादशकांदोलापादुकाब्यजनानि च ॥२५४॥ चामरच्छत्रयुगलं विष्णुब्रह्मादिकांस्तथा । चूर्णैरिवरचेद्वेद्यां धीमान्देवालयेऽपि वा ॥२५५॥ यत्रापि देवपूजा स्यात् तत्रैव कल्पयेद्बुधः । स्वहस्तरचितं मुख्यं क्रीतं चव तु मध्यमम् ॥२५६॥ याचितं तु कनिष्ठं स्याद्वलात्कारमयोऽधनम् । अर्हेषु यत्त्वनर्हेषु बलात्कारात्तु निष्फलम् ॥२५७॥ रक्तशालिजपाशाणकलमासिरक्तकैः । ततंदुलैर्ब्रीहिमाषोत्थैः कणैश्चैव यथाक्रमम् ॥२५८॥ उत्तमैर्मध्यमैश्चव कनिष्ठैरधमैस्तथा । पद्मादिस्थापनैरेव तत्सम्यग्यागमाचरेत् ॥२५६॥ प्रागुत्तरमुखो वापि यदि वा प्राङ्मुखो भवेत् । आसनं च प्रवक्ष्यामि यथादृष्टं यथा श्रुतम् ॥२६०॥ कौशं चार्मं चैलतल्पे दारवं तालपत्रकम् । कांचनं चैव राजतं ताम्रमेव च ॥२६१॥ गोकरीषाकंजैर्वापि ह्याससनं परिकल्पयेत् । वैयाघ्रं रौरवं चैव हारिणं मार्गमेव च ॥२६२॥ चार्मं चतुर्विधं ज्ञेयमथ बंधुकमेव च । यथासंभवमेतेषु ह्यासनं परिकल्पयेत् ॥२६३॥
भस्मस्नान के उपरान्त साधक हाथ धोकर आचमन कर हाथ में कुश ले समाहितचित्त से संध्योपासन तथा जप करे । यदि कुश न मिले तो सुवर्ण, उसके अभाव में गवालुक (गोरोचन), तदभाव में दूर्वा और उसके भी अभाव में चांदी ग्रहण करे । तदनन्तर देवमंदिर (शिवालय) में जाकर देववेदी का निर्माण करे । वेदी मृत्तिका की होनी चाहिये । उसमें गेरू या किसी श्वेत द्रव्य से कमल आदि का चित्र लिखना चाहिये । अर्थात् तरह-तरह के पद्म, स्वस्तिक, उत्पल, गदा, शंख, त्रिशूल, डमरू, पांच प्रासाद, शिवलिंग, सकल कामना रूपी फल वाला वृक्ष, कुलक, कोलक, षट्कोण, त्रिकोण, नवकोण, द्वादश कोण, दोला, पादुका, व्यजन, चामर, छत्र, विष्णु तथा ब्रह्मा आदि देवों के चित्र लिखे ॥२४८-२५४॥ धीमान् व्यक्ति वेदी, देवालय अथवा जहाँ कहीं देव पूजा करे, वहाँ भी इसी प्रकार रचना करे । अपने हाथ से इसकी रचना करना उत्तम है । द्रव्य देकर दूसरे से कराना मध्यम, मंगनी में कराना कनिष्ठ और बलपूर्वक कराना अधम है । योग्य एवम् अयोग्य कर्मों में बलात्कार करने से कर्म निष्फल हो जाता है । लाल चावल, जपाकुसुम, शाण (?), कलमी धान्य, काले और लाल रंग के चावल और सामान्य धान्य के कणों से क्रमशः याग करना चाहिये । उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ और अधम प्रकार के पद्म आदि के स्थापन द्वारा याग का सम्यक् अनुष्ठान करना चाहिए । पूर्व-उत्तर मुंह होकर अथवा पूर्व मुंह होकर कर्म करना चाहिये । अब मैं आसन का विधान, जैसा देखा एवम् सुना है, बतलाता हूँ ॥२५५-२६०॥ कुश, चर्म, वस्त्र, तल्प, दारु, लालपत्र, कंबल, सुवर्ण, चांदी, तांबा, गौ के गोबर तथा आक की लकड़ी का आसन बनाना चाहिये । चर्म चार प्रकार के कहे गये हैं । व्याघ्र चर्म, रुरु चर्म, हरिण चर्म और मृग चर्म से आसन बना सकते हैं । बन्धुक (दपहरिया फूल) के काष्ठ का भी आसन होता है । इन चीजों में से यथासंभव आसन बनाकर उस पर पद्मा-
७०२ नारदीयपुराणम्
कृतपद्मासनो वापि स्वस्तिकासन एव वा । दर्भभस्मसमासीनः प्राणानायम्य वाग्यतः ॥२६४॥ तावत्स देवरूपो ध्यानं जातः समाचरेत् । शिखांते द्वादशांगुल्ये स्थितं सूक्ष्मतनुं शिवम् ॥२६५॥ अंतश्चरंतं भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखम् । सर्वारणरसंसंयुक्तमणिमादिगुणान्वितम् ॥२६६॥ ध्यात्वा तं धारयेच्चित्ते तद्दीप्या पूरयेत्तनुम् । तया दीप्या शरीरस्थं पापं नाशमुपागतम् ॥२६७॥ स्वर्णपादेरसंपकार्रक्तं श्वेतं यथा भवेत् । तद्द्वादशदलावृत्तमष्ट पंच त्रिरेव वा ॥२६८॥ परिकल्प्यासनं शुद्धं तत्र लिंगं निधाय च । गुहास्थितं महेशानं लिंगेशं चिंतयेत्तथा ॥२६९॥ शोधिते कलशे तोयं शोधितं गंधवासितन् । सुगन्धपुष्पं निक्षिप्य प्रणवेनाभिमंत्रितम् ॥२७०॥ प्राणायामश्च प्रणवः शूद्रेषु न विधीयते । प्राणायामपदे ध्यानं शिवेत्योंकारसंन्वितम् ॥२७१॥ गन्धपुष्पाक्षतादीनि पूजाद्रव्याणि यानि च । तानि स्थाप्य समीपे तु ततः संकल्पमाचरेत् ॥२७२॥ शिवपूजां करिष्यामि शिवतुष्ट्यर्थमेव च । इति संकल्पयित्वा तु तत आवाहनादिकम् ॥२७३॥ कृत्वा तु स्नानपर्यंतं ततः स्नानं प्रकल्पयेत् । नमस्तेत्यादिमंत्रेण शतरुद्रविधानतः ॥२७४॥ अविच्छिन्ना तु या धारा मुक्तिधारेति कीर्त्तिता । तया यः स्नापयेन्मासं जपन् रुद्रमुखांश्च वा ॥२७५॥ एकवारं त्रिवारं च पंच सप्त नवापि वा । एकादश तथा वारमथैकादशधान्वितम् ॥२७६॥ मुक्तिस्नानमिदं ज्ञेयं मासं मोक्षप्रदायकम् । शैव्या विद्यया स्नानं केवलं प्रणवेन वा ॥२७७॥ मृण्मयैर्नालिकेरस्य शकलैर्रोमभिस्तथा । कांस्येन मुक्ताशुक्त्या च पुष्पादिकेसरेण वा ॥२७८॥ स्नापयेद्देवदेवेशं यथासंभवमीरितैः । शृंगस्य च विधि वक्ष्ये स्नानयोग्यं यथा भवेत् ॥२७९॥
सन या स्वस्तिकासन लगाकर बैठे । कुश तथा भस्म धारण कर वाक्संयमपूर्वक प्राणायाम करे ॥२६१-२६४॥ स्वयं देवरूप बनकर अन्तःकरण में शिव का ध्यान करे । ध्यान इस तरह करे कि मेरी द्वादशांगुलिप्रमाण शिखा के अन्त में सूक्ष्म शरीर वाले, प्राणियों के हृदय में निवास करने वाले, सब ओर मुख वाले, समस्त आभूषणों एवम् अणिमा आदि गुणों से युक्त शंकर अवस्थित हैं। ध्यानोपरान्त चित्त में उनको धारण कर उनके प्रकाश से अपने शरीर को प्रकाशित करे। ऐसा करने से शरीरस्थ पाप नष्ट हो जाता है। पश्चात् सुवर्ण का बारह या आठ या पाँच या तीन पत्र वाला कमल बना कर उस पर शिवलिंग की स्थापना करे । फिर गुहास्थित महेश लिंगेश का ध्यान कर पवित्र घट में सुवासित निर्मल जल तथा सुगंधित पुष्प डाल कर प्रणव से जल को अभि- मंत्रित करे ॥२६५-२७०॥ परन्तु शूद्र प्राणायाम तथा प्रणवोच्चारण न करे। वह प्राणायाम के बदले ध्यान तथा प्रणव के स्थान में 'शिव' पद का उच्चारण करे । गंध, पुष्प, अक्षत आदि पूजाद्रव्यों को लिंग के समीप रखकर संकल्प करे कि मैं शंकर की प्रसन्नता के लिये शिवपूजा करूंगा। संकल्प करने के उपरान्त आवाहन आदि करके "नमस्ते" इत्यादि मंत्र से शतरुद्री विधान के अनुसार स्नपन करे । जलधारा अविच्छिन्न होनी चाहिये । ऐसी ही धारा मुक्तिधारा कहलाती है । उसी धारा से शतरुद्रीपाठ करते हुए एक मास तक शिव को स्नान कराये । एक बार या तीन बार या पाँच बार या सात बार या नौ बार या ग्यारह बार स्नान कराने का ही नाम मुक्तिस्नान है । एक मास तक ऐसा करने से मोक्ष मिलता है ! स्नान शिव मन्त्र या केवल प्रणव से ही कराना चाहिये । मिट्टी, नारियल, काँसा, मोती तथा सीप के पात्र से पुष्प तथा केसर के साथ महेश का स्नपन करे ॥२७१-२७८१/२॥ अब मैं शृंग का विधान बतलाता हूँ, जिससे समुचित प्रकार से शिव को स्नान कराया जा सकता है ।
पूर्वमंतस्तु संशोध्य बहिरंतस्तु शोधयेत् । सुस्निग्धं लघु कृत्वाथ नांगं छिद्यात्कथंचन ॥२८०॥ नीचैकदेशविध्यस्तद्वारद्रोण्या सुहृत्तया । कृशानुयुक्तं स्नानं तु देवाय परिकल्पयेत् ॥२८१॥ एवं गवयश्रृंगस्य जलपूर्तिरथोच्यते । द्वारे निषिद्धलोहार्द्धसंधिद्वारासमन्विते ॥२८२॥ योगवक्रं नागदंडं नागाकारं प्रकल्पयेत् । फलस्थाने तु चषकं दंडेने समरंध्रकम् ॥२८३॥ तत्रैव पातयेत्तोयं मूर्द्धयंत्रघटे स्थितम् । पातयेदथ वाम्येन वामेनैव करेण वा ॥२८४॥ मुक्तिधारा कृता तेन पवित्रं पापनाशनम् । एवं संस्थाप्य देवेशं पंचगव्यैस्तथैव च ॥२८५॥ पंचामृतैरथ स्नाप्य मधुरत्रितयेन च । विभूष्य भूषणैर्देवं पुनः स्नाप्य महेश्वरम् ॥२८६॥ शीतोपचारं कृत्वाथ तत आचमनादिकम् । वस्त्रं तथोपवीतं च गंधद्रव्यकमेव च ॥२८७॥ कर्पूरमगरुं चापि पाटीरमथवा भवेत् । उभयमिश्रितं चापि शिवलिंगं प्रपूजयेत् । कृत्स्नं पीठं गंधपूर्णं यद्वा विभवसारतः । तूष्णीमथोपचारं वा कालीयं पुष्पमेव च ॥२८८॥ श्रीपत्रमरुचित्याज्यं यथाशक्त्यखिलं यथा । अनेकद्रव्यधूपं च गुग्गुलं केवलं तथा ॥२८९॥ कपिलाघृतसंयुक्तं सर्वधूपं प्रशस्यते । धूपं दत्वा यथाशक्ति कपिलाघृतदीपकान् ॥२९०॥ अथवा पूजामात्रेण दीपान्दत्त्वोपहारकम् । नैवेद्यमपूपन्तं च दत्त्वा पुष्पसमन्वितम् ॥२९१॥ मुखशुद्धिं ततः कृत्वा दत्वा तांबूलमादरात् । प्रदक्षिणनमस्कारौ पूजैवं हि समाप्यते ॥२९२॥ गीत्यंगपंचकं पश्चात्तानि विज्ञापयामि ते । गीतिर्वाद्यं पुराणं च नृत्यं हासोक्तिरेव च ॥२९३॥ नीराजनं च पुष्पाणामंजलिश्वाखिलार्पणम् । क्षमापनं चोद्वसनं प्रोक्तं पंचोपचारकम् ॥२९४॥
श्रृंग के भीतर तथा बाहर अच्छी तरह साफ कर उसे चिकना बनाये । वह कटा-फटा नहीं होना चाहिए । उसका निचला भाग ऐसा बनाया जाय, जिससे जल की सूक्ष्मधारा अविच्छिन्न गति से गिरे । पहिले हाथ में कुश लेकर तब शंकर को स्नान कराना चाहिये । इस प्रकार नीलगाय के नर के सींग का बना श्रृङ्ग जल-पूर्ति के लिए कहा गया है । उस श्रृङ्ग के मुखभाग में तथा जोड़ों में वैध धातु को मढ़ देना चाहिए । उस श्रृङ्ग को टेढ़ा, नागदंडाकार या नागाकार बनाना चाहिए । उसका अग्रभाग प्याले की तरह हो और दंड के अन्त में छिद्र हो । उसी छिद्र के द्वारा शिवलिंग के ऊपर स्थापित यंत्र-घट के जल को गिरावे । उस श्रृङ्ग को बायें हाथ या दाहिने हाथ से पकड़कर जल गिराना चाहिए । जो शंकर को मुक्तिधारा (अर्थात् मुक्तिस्नान) कराता है वह पवित्र एवम् पाप- रहित हो जाता है ॥२७९-२८४३॥ देवेश को पंचगव्य, पंचामृत तथा त्रिमधुरयुक्त जल से नहलाकर आभूषणों से विभूषित करे । पुनः स्नान तथा आचमन आदि कराकर वस्त्र, यज्ञोपवीत, सुगंधित द्रव्य, कर्पूर, अगर या चंदन या दोनों से शिवलिंग की पूजा करे । संपूर्ण पीठ को सुवासित करके पूजन करना चाहिये । अथवा अपने सामर्थ्य के अनुसार अर्चना करे । चुपचाप या मंत्रपूर्वक कालीय पुष्प, बिल्वपत्र तथा कुरवक-पुष्पों की राशि, घी, अनेक द्रव्यों का बना धूप तथा केवल गुग्गुल समर्पण करे । कपिला गौ के घी से मिश्रित धूप सर्वोत्तम माना जाता है । यथाशक्ति धूप देकर कपिलाघृतपूर्ण दीप समर्पित करे । तदनन्तर उपहार, नैवेद्य तथा पुष्प समर्पण कर मुखशुद्धि करने के लिये तांबूल अर्पित करे । फिर प्रदक्षिणा तथा नमस्कार करके पूजा समाप्त करे ॥२८५- २९२॥ पश्चात् पांच अंगों से युक्त संगीत करना चाहिये । गीति, वाद्य, पुराण, नृत्य तथा हास्योक्ति- ये पाँचों गीत्यंग कहलाते हैं । नीराजन, पुष्पांजलि, सर्वसमर्पण, क्षमाप्रार्थना तथा उद्धसन-ये पाँचों उपचार