बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
ग्रहाणामवस्थाध्यायः २४३ सर्वदानन्दधर्ता जनो ज्ञानवान्यज्ञकर्ता धराधीशसद्मस्थितः। पद्मबन्धावरातेर्भयं स्वाननः काव्यविद्याप्रलापी मुदा कौतुके ।।६३।। कौतुक अवस्था में हो तो सदा आनंद करने वाला, ज्ञानी, यज्ञ करने वाला, राजगृह में रहने वाला, शत्रु से भयभीत, सुंदर मुख और काव्य करने वाला होता है।।६३।। निद्राभरारक्तनिभे भवेतां निद्रागते लोचनपद्मयुग्मे। रवौ विदेशे वसतिर्जनस्य कलत्रहानिः कतिथार्थनाशः।।६४।। निद्रा अवस्था में हो तो निद्रा से भरे नेत्रों वाला, विदेशी, स्त्री की हानि और अनेक प्रकार से धन का नाशक होता है।।६४।। अथ चन्द्रावस्थाफलम्- जनुःकाले क्षपानाथे शयनं चेदुपागते। मानी शीतप्रधानश्च कामी वित्तविनाशकः।।६५।। यदि चंद्रमा शयन अवस्था में हो तो उसकी दशा में जातक मानी, शीतल स्वभाव, कामी और धन का नाश करने वाला होता है।।६५।। रोगार्दितो मन्दमतिर्विशेषाद्वित्तेन हीनो मनुजः कठोरः। अकार्यकारी परवित्तहारी क्षपाकरे चेदुपवेशनस्थे।।६६।। उपवेशन अवस्था में हो तो रोगी, मंदबुद्धि, धनहीन, कठोर, कुकर्म में रत, दूसरे के धन को हरण करने वाला होता है।।६६।। नेत्रपाणौ क्षपानाथे महारोगी नरो भवेत्। अनल्पजल्पको धूर्त्तः कुकर्मनिरतः सदा।।६७।। नेत्रपाणि अवस्था में हो तो महारोगी, व्यर्थ बोलने वाला, धूर्त्त और कुकर्म करने वाला होता है।।६७।। यदा राकानाथे गतवति विकाशं च जनने विकाराः संसारे विमलगुणराशेरवनिपात्। नवाशामाला स्यात्करितुरगलक्ष्म्या परिवृता विभूषा योषाभिः सुखमनुदिनं तीर्थगमनम्।।६८।। यदि प्रकाश अवस्था में हो तो संसार में प्रसिद्ध, अपने गुणों से राजा से द्रव्य प्राप्त करने वाला, हाथी, घोड़ा, लक्ष्मी से युक्त, स्त्री से सुखी और तीर्थयात्री होता है।।६८।।
२४४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् सितेतरे पापरतो निशाकरे विशेषतः क्रूरतरो नरो भवेत्। सदाक्षिरोगैः परिपीड्यमानो बलक्षपक्षे गमने भयातुरः॥६९॥ यदि चंद्रमा कृष्णपक्ष में गमन अवस्था में हो तो पापी और क्रूर स्वभाव का, नेत्ररोगी और शुक्लपक्ष में भयभीत होता है॥६९॥ विधावागमने मानी पादरोगी नरो भवेत्। गुप्तपापरतो दीनो मतितोषविवर्जितः॥७०॥ आगमन अवस्था में हो तो मानी, चरण में रोग युक्त, गुप्त पाप करने वाला दीन, मलिन और असंतोषी होता है॥७०॥ सकलजनवदान्यो राजराजेन्द्रमान्यो रतिपतिसमकान्तिः शान्तिकृत्कामिनीनाम्। सपदि सदसि याते चारुबिम्बे शशाङ्के भवति परमरीतिप्रीतिविज्ञो गुणज्ञः॥७१॥ सभावस्था में हो तो सभी मनुष्यों में श्रेष्ठ, राजाओं का मान्य, कामदेव के समान सुंदर, स्त्रियों को सुखदाता, प्रीति के रीति को जाननेवाला होता है॥७१॥ विधावागमने मर्त्यो वाचालो धर्मपूरितः। कृष्णपक्षे द्विभार्यः स्याद्रोगी दुष्टनरो हठी॥७२॥ आगमन अवस्था मे हो तो वक्ता, धर्मात्मा, कृष्णपक्ष हो तो दो स्त्री वाला, रोगी, दुष्ट और हठी होता है॥७२॥ भोजने जनुषि पूर्णचन्द्रमा मानयानजनतासुखं नृणाम्। आतनोति वनितासुतासुखं सर्वमेव न सितेतरे शुभम्॥७३॥ भोजन अवस्था में हो तो मान-प्रतिष्ठा, सवारी और सुख से संपन्न, स्त्री-पुत्र से सुखी होता है। कृष्णपक्ष का चन्द्रमा हो तो उक्त फल नहीं होता है॥७३॥ नृत्यलिप्सागते चन्द्रे सबले बलवान्नरः। गीतज्ञो हि रसज्ञश्च कृष्णो पापकरो भवेत्॥७४॥ नृत्यलिप्सा अवस्था में हो और चन्द्रमा शुक्लपक्ष का हो तो बलवान्, गीतज्ञ, रसज्ञ होता है और कृष्णपक्ष का हो तो पापी होता है॥७४॥ कौतुकभवनं गतवति चन्द्रे भवति नृपत्वं वा धनपत्वम्। कामकलासु सदा कुशलत्वं वारवधूरतिरमणपटुत्वम्॥७५॥
ग्रहाणामवस्थाध्यायः २४५ कौतुक अवस्था में हो तो राजा वा धनी, कामकला में कुशल और स्त्रियों का प्रेमी होता है।।७५।। निद्रागते जन्मनि मानवानां कलाधरे जीवयुतं महत्त्वम्। यदाङ्गनासञ्चितवित्तनाशः शिवालये रौति विचित्रमुच्चैः।।७६।। निद्रा अवस्था में हो, गुरु से युत हो तो प्रतिष्ठावान् होता है। गुरु से युत न हो, चन्द्रमा क्षीण हो तो स्त्री और संचित धन का नाश और सियारिन उसके घर में उच्च स्वर से रोती है।।७६।। अथ भौमावस्थाफलम्- शयने वसुधापुत्रे जन्तुरङ्गे व्रणो भवेत्। बहुना कण्डुना युक्तो दद्रुणा च विशेषतः।।७७।। शयन अवस्था में भौम हो तो जातक के शरीर में बहुधा व्रण, खुजली और दाद से पीड़ित रहता है।।७७।। बली सदा पापरतो नरः स्यादसत्यवादी नितरां प्रगल्भः। धनेन पूर्णो निजधर्महीनो धरासुतश्चेदुपवेशनस्थः।।७८।। उपवेशन अवस्था में हो तो पापरत, असत्यभाषी, प्रगल्भ, धन से पूर्ण और अपने धर्म से हीन होता है।।७८।। यदा भूमिसुतो लग्ने नेत्रपाणिमुपागतः। दरिद्रता सदा पुंसामन्यभे नगरेशता।।७९।। यदि नेत्रपाणि अवस्था में लग्न में हो तो सदा दरिद्र, अन्यभाव में हो तो नगरसेठ होता है।।७९।। प्रकाशो गुणस्यापि वासः प्रकाशे धराधीशभर्तुः सदा मानवृद्धिः। सुते भूसुते पुत्रकान्तावियोगो भवेद्राहुणा दारुणो वा निपातः।।८०।। प्रकाशावस्था में हो तो गुणों का विकास, राजा से सम्मान, यदि पाँचवें भाव में भौम हो तो पुत्र-स्त्री का वियोग, राहु से युक्त हो तो घोर पतन होता है।।८०।। गमनागमने कुरुतेऽनुदिनं व्रणजालभयं वनिताकलहः। बहुदद्रुककण्डुभयं बहुधा वसुधातनयो वसुहानिकरः।।८१।।
२४६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् गमन अवस्था में हो तो सदा यात्रा करने वाला, व्रणभय, स्त्री से कलह, दाद, खुजली का भय और धन की हानि होती है॥८१॥ आगमने गुणशाली मणिमाली वा करालकरवाली। गजगंता रिपुहन्ता परिजनसन्तापहारको भौमे॥८२॥ आगमन अवस्था में हो तो गुणी, मणियों की माला धारण करने वाला, भीषण तलवार से युक्त, हाथी पर चलने वाला, शत्रुनाशक, अपने परिजनों के संताप को हरने वाला होता है॥८२॥ तुङ्गे युद्धकलाकलापकुशलो धर्मध्वजो वित्तपः कोणे भूमिसुते सभांमुपगते विद्याविहीनः पुमान्। अन्तेऽपत्यकलत्रमित्ररहितः प्रोक्तेतरस्थानगे- ऽवश्यं राजसभाबुधो बहुधनी मानी च दानी जनः॥८३॥ अपनी उच्चराशि में होकर सभा अवस्था में हो तो युद्धकला में निपुण, धर्मध्वजी, धनी होता है। यदि ५-९ भाव में हो तो विद्या से रहित होता है। १२वें भाव में हो तो पुत्र, स्त्री और मित्र से रहित होता है। इनसे भिन्न स्थानों में हो तो राजसभा का पंडित, बड़ा धनी, मानी और दानी होता है॥८३॥ आगमे भवति भूमिजे जनो धर्मकर्मरहितो गदातुरः। कर्णशूलगुरुशूलरोगवानेव कातरमतिः कुसङ्गमी॥८४॥ आगम अवस्था में भौम हो तो जातक धर्म-कर्म से हीन, रोगी, कान के दर्द एवं बड़े शूलरोग से पीडित, कातरबुद्धि और दुष्टों की संगति करने वाला होता है॥८४॥ भोजने मिष्टभोजी च जनने सबल कुजे। नीचकर्मकरो नित्यं मनुजो मानवर्जितः॥८५॥ भोजन अवस्था में हो तो मिठाई खानेवाला, नीचकर्म करने वाला और अप्रतिष्ठित होता है॥८५॥ नृत्यलिप्सागते भूसुते जन्मिनामिन्दिराराशिरायाति भूमीपतेः। स्वर्णरत्नप्रवालैः सदा मण्डिता वासशाला नराणां भवेत्सर्वदा॥८६॥ नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो राजा के यहाँ से लक्ष्मी की प्राप्ति, सदा सुवर्ण, रत्न, मूंगा आदि से युक्त गृह वाला होता है॥८६॥
ग्रहाणामवस्थाध्यायः २४७ कौतुकी भवति कौतुके कुजे मित्रपुत्रपरिपूरितो जनः। उच्चगे नृपतिगेहमण्डितः पूजितो गुणवरैर्गुणाकरैः ।।८७।। कौतुक अवस्था में हो तो कौतुक करने वाला, मित्र, पुत्र से परिपूर्ण, यदि उच्च में भौम हो तो राजगृह और गुणियों से पूजित होता है।।८७।। निद्रावस्थां गते भौमे क्रोधी धीधनवर्जितः। धूर्तो धर्मपरिभ्रष्टो मनुष्यो गदपीडितः ।।८८।। निद्रा अवस्था में भौम हो तो क्रोधी, बुद्धि-धन से हीन, धूर्त, धर्म से भ्रष्ट और रोगी होता है।।८८।। अथ बुधावस्थाफलम्— क्षुधातुरो भवेदङ्गे खञ्जो गुञ्जानिभेक्षणः। अन्यभे लम्पटो धूर्तो मनुजः शयने बुधे।।८९।। बुध शयन अवस्था में होकर लग्न में हो तो भूखा, चलने में असमर्थ, गुंजा के समान (लाल) नेत्रवाला होता है। अन्य भावों में हो तो लंपट, धूर्त होता है।।८९।। शशाङ्कपुत्रे जनुरङ्गगेहे यदोपवेशे गुणराशिपूर्णः। पापेक्षिते पापयुते दरिद्रो हिते शुभे वित्तसुखी मनुष्यः।।९०।। उपवेशन अवस्था में बुध लग्न में हो तो गुणी, पापग्रह से युत-दृष्ट हो तो दरिद्र, शुभग्रह वा मित्र से युत-दृष्ट हो तो धनी होता है।।९०।। विद्याविवेकरहितो हिततोषहीनो मानी जनो भवति चन्द्रसुतेऽक्षिपाणौ। प्रजालये सुतकलत्रसुखेन हीनः कन्याप्रजा नृपतिगेहबुधो वरार्थः ।।९१।। नेत्रपाणि अवस्था में हो तो विद्या-विवेक से रहित, मित्रतारहित, अभिमानी, ५वें भाव में बुध हो तो स्त्री-पुत्र के सुख से रहित, कन्या संततिवाला, राजा से धन प्राप्त करने वाला होता है।।९१।। दाता दयालुः खलु पुण्यकर्त्ता विकाशने चन्द्रसुते मनुष्यः। अनेकविद्यार्णवपारगन्ता विवेकपूर्णः खलवर्गहन्ता ।।९२।। प्रकाश अवस्था में हो तो दानी, दयालु, पुण्यात्मा; अनेक विद्याओं को जानने वाला, विवेकी और दुष्टों का दमन करने वाला होता है।।९२।।
२४८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् गमनागमने भवतो गमने बहुधा वसुधाधिपतेर्भवने । भवनं च विचित्रमलं रमया विदि नुश्च जनुः समये नितराम् ॥ ९३ ।। गमन अवस्था में हो तो राजगृह में जाने वाला, लक्ष्मी से पूर्ण गृहवाला होता है। यही फल आगमन अवस्था का भी होता है ।।९३।। सपदि विदिजनानामुच्चगे जन्मकाले सदसि धनसमृद्धिः सर्वदा पुण्यवृद्धिः। धनपतिसमता वा भूपता मन्त्रिता वा हरिहरपदभक्तिः सात्त्विकी मुक्तिलब्धिः ।। ९४ ।। सभा अवस्था में हो तो धनी, पुण्यकर्त्ता, उच्चराशि में हो तो बहुत धनी, राजा का मंत्री तथा ईश्वर का भक्त और अंत में मुक्ति पानेवाला होता है ।। ९४ ।। आगमे जनुष जन्मिनां यदा चन्द्रजे भवति हीनसेवया । अर्थसिद्धिरपि पुत्रयुग्मता बालिका भवति मानदायिका ।। ९५ ।। आगमन अवस्था में हो तो नीच सेवा से धन प्राप्त करने वाला, दो पुत्र और एक कन्या प्रतिष्ठा को देनेवाली होती है ।। ९५ ।। भोजने चन्द्रजे जन्मकाले यदा जन्मिनामर्थहानिः सदा वादतः । राजभीत्या कृशत्वं चलत्वं मतेरङ्गसङ्गो न जाया न मायासुखम् ।। भोजन अवस्था में हो तो वाद-विवाद (मुकदमे में) में द्रव्य की हानि, राजभय, कृशता, मन की अस्थिरता, शरीर, स्त्री तथा धन का सुख नहीं होता है ।। ९६ ।। नृत्यलिप्सागते चन्द्रजे मानवो मानयानप्रवालव्रजैः संयुतः । मित्रपुत्रप्रतापैः सभापण्डितः पापभे वारवामारतो लम्पटः ।। ९७ ।। नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो मान, वाहन, रत्न, मित्र, पुत्र और प्रताप से युक्त होता है। पापराशि में हो तो वेश्याप्रेमी और लम्पट होता है ।। ९७ ।। कौतुके चन्द्रजे जन्मकाले नृणामङ्गभे गीतविद्याऽनवद्या भवेत् । सप्तमे नैधने वारवध्वा रतिः पुण्यभे पुण्ययुक्ता मतिः सद्गतिः ।। कौतुकावस्था में होकर लग्न में हो तो गीतविद्या का पंडित, सातवें आठवें भाव में हो तो वेश्यागामी, ९वें भाव में हो तो पुण्यवान् बुद्धि होती है ।। ९८ ।।
.ग्रहाणामवस्थाध्यायः २४९ निद्राश्रिते चन्द्रसुते न निद्रासुखं सदा व्याधिसमाधियोगः। सहोत्यवैकल्यमनल्पतापो निजेन वादो धनमाननाशः।।९९।। निद्रावस्था में हो तो निद्रा से सुख, आधि-व्याधि से पीडित, सहोदर से हीन, अधिक संताप, अपने कुटुंब से विवाद और धन का नाश होता है।।९९।। अथ गुरोरवस्थाफलम्— वचसामधिपे तु जनुःसमये शयने बलवानपि हीनरवः। अतिगौरतनुः खलु दीर्घहनुः सुतरामरिभीतियुतो मनुजः ।।१००।। यदि जन्मसमय में गुरु शयनावस्था में हो तो बलवान् होते हुए भी जातक हीन शब्द (मंदस्वर), अत्यंत गौरवर्ण, लंबी दाढ़ीवाला और निरंतर शत्रु के भय से युक्त होता है।।१००।। उपवेशं गतवति यदि जीवे वाचालो बहुगर्वपरीत:। क्षोणीपतिरिपुजनपरितप्तः करजङ्घास्यपदव्रणयुक्तः।।१०१।। उपवेशन अवस्था में हो तो वक्ता, अत्यंत गर्वीला, राजा और शत्रु से संताप पानेवाला, हाथ, जंघा, मुख और पैर में घाव से युक्त होता है।।१०१।। नेत्रपाणि गते देवराजार्चिते रोगयुक्तो वियुक्तो वरार्थश्रिया। गीतनृत्यप्रियः कामुकः सर्वदा गौरवर्णो विवर्णोद्भवप्रीतियुक् ।। नेत्रपाणि अवस्था में हो तो रोगी, धन से हीन, गाने-नाचने का प्रेमी, कामी, गौरवर्ण, विजातियों से प्रेम करने वाला होता है।।१०२।। गुणानामानन्द विमलसुखकन्दं वितनुते सदा तेजःपुञ्जं व्रजपतिनिकुञ्जं प्रतिगमम्। प्रकाशं चेदुच्चे द्रुतमुपगतो वासवगुरु- र्गुरुत्वं लोकानां धनपतिसमत्वं तनुभृताम् ।।१०३।। प्रकाश अवस्था में हो तो गुणों का आनंद, स्वच्छ सुख के समूहों का आनंद, तेजस्वी कृष्णचंद्र के स्थान (वृन्दावन) को जाने को उद्यत, यदि गुरु उच्चराशि का हो संसार में मान्यता और कुबेर के समान धनी होता है।।१०३।। साहसी भवति मानवः सदा मित्रवर्गसुखपूरितो सदा। पण्डितो विविधवित्तमण्डितो वेदविद्यादि गुरौ गमं गते ।।१०४।।
२५० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् यदि गमनावस्था में हो तो साहसी, मित्रवर्ग के सुख से पूर्ण, पंडित, अनेक सम्पत्तियों से युक्त और वेद को जानने वाला होता है।।१०४।। आगमने जनता वरजाया यस्य जनुःसमये हरिमाया। मुञ्चति नालमिहालयमद्धा देवगुरौ परितः परिविद्धा।।१०५।। आगमन अवस्था में हो तो उसके गृह में जनता, सुंदरी स्त्री और लक्ष्मी (धन) सदा उपस्थित रहता है।।१०५।। सुरगुरुसमवक्ता शुभ्रयुक्ता फलाढ्यः सदसि सपदि पूर्णो वित्तमाणिक्ययानैः। गजतुरगरथाढ्यो देवताधीशपूज्यो जनुषि विविधविद्यागर्वितो मानवः स्यात् ।।१०६।। सभावस्था में हो तो बृहस्पति के समान वक्ता, सुंदर मोतियों से युक्त, धन, रत्न, हाथी, घोड़ा, रथ आदि सवारियों से युक्त, इन्द्र से पूज्य और अनेक विद्याओं को जानने वाला गर्वयुक्त होता है।।१०६।। नानावाहनमानयानपटलीसौख्यं गुरावागमे- भृत्यापत्यकलत्रमित्रजसुखं विद्यानवद्या भवेत्। क्षोणीपालसमानतानवरतं चातीव हृद्या मतिः काव्यानन्दरतिः सदा हितगतिः सर्वत्र मानोन्नतिः ।।१०७।। आगमन अवस्था में हो तो संसार में मान-प्रतिष्ठा से युक्त, अनेक वाहन-समूह से युक्त, नौकर, पुत्र, स्त्री, मित्र का सुख, उत्तम विद्या, राजा के समान, अत्यन्त तीक्ष्ण बुद्धिवाला, काव्यप्रेमी, अच्छे मार्ग से चलने वाला और मान-मर्यादा वाला होता है।।१०७।। भोजने भवति देवगुरौ यस्य तस्य सततं सुभोजनम्। नैव मुञ्चति रमालयं तदा वाजिवारणरथैश्च मण्डितम् ।।१०८।। भोजनावस्था में हो तो उसे निरंतर सुंदर भोजन मिलता है, कभी भी धन उसका साथ नहीं छोड़ता है। हमेशा घोड़ा, हाथी, रथ आदि सवारियों से घिरा रहता है।।१०८।। नृत्यलिप्सागते राजमानी धनी देवताधीशवन्द्यः सदा धर्मवित्। तन्त्रविज्ञो बुधैर्मण्डितः पण्डितः शब्दविद्यानवद्यो हि सद्यो जनः ।। नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो राजा से मान्य, धनी, धर्म को जानने वाला, तंत्रविद्या को जानने वाला, पंडितों से घिरा हुआ श्रेष्ठ पंडित और शब्दशास्त्र (व्याकरण) का पंडित होता है।।१०९।।
ग्रहाणामवस्थाध्यायः २५१ कुतूहली सकौतुके महाधनी जनः सदा निजान्वये च भास्करः कृपाकलाधरः सुखी। निलिम्पराजपूजिते सुतेन भूनयेन वा युतो महाबली धराधिपेन्द्रसद्मपण्डितः।।१९०।। कौतुक अवस्था में हो तो कुतूहली, महाधनी, अपने घर में सूर्य के समान तेजस्वी, कृपालु, सुखी, पुत्र, भूमि से युक्त और नीतिमान्, महाबली और राजपंडित होता है।।१९०।। गुरौ निद्रागते यस्य मूर्खता सर्वकर्मणि। दरिद्रतापरिक्रान्तं भवनं पुण्यवर्जितम्।।१९१।। निद्रावस्था में हो तो वह सभी कर्मों में मूर्खता करने वाला, दरिद्रता से युक्त और पुण्यहीन होता है।।१९१।। अथ भृगोरवस्थाफलम्- जनो बलीयानपि दन्तरोगी भृगौ महारोषसमन्वितः स्यात्। धनेन हीनं शयनः प्रयाते वराङ्गनासङ्गमलम्पटश्च।।१९२।। यदि जन्मसमय शुक्र शयन अवस्था में हो तो जातक बलवान् होते हुए भी दंतरोगी, महाक्रोधी, निर्धन और स्त्रीलंपट होता है।।१९२।। यदि भवेदुशना उपवेशने नवमणिव्रजकाञ्चनभूषणैः। सुखमजस्रमरिक्षय आदरादवनिपादपि मानसमुन्नतिः।।१९३।। उपवेशन अवस्था में हो तो नूतन मणि, सुवर्ण के आभूषणों से सुखी, शत्रुओं का नाश करने वाला, राजा से आदर और प्रतिष्ठा में वृद्धि वाला होता है।।१९३।। नेत्रपाणिं गते लग्नगेहे कवौ सप्तमे मानभे यस्य तस्य ध्रुवम्। नेत्रपाते निपातो धनानामलं चान्यभे वासशाला विशाला भवेत्।। नेत्रपाणि अवस्था में शुक्र लग्न, सप्तम वा दशम भाव में हो तो नेत्रहीनता के कारण धन का नाश होता है व अन्य भाव में हो तो बड़ा मकान होता है।।१९४।। स्वालये तुङ्गभे मित्रभे भार्गवे तुङ्गमातङ्गलीलाकलापीजनः। भूपतेस्तुल्य एव प्रकाशं गते काव्यविद्याकलाकौतुकी गीतवित्।।
२६२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् प्रकाश अवस्था में हो और अपने उच्च, स्वगृह वा मित्रगृह में हो तो मतवाले हाथी के समान बलवान्, राजा के सदृश धनी, सुखी, काव्य और संगीत में पारंगत होता है।।१९५।। गमने जनने शुक्रे तस्य माता न जीवति। आधियोगो वियोगश्च जनानामरिभीतितः ।।१९६।। गमन अवस्था में हो तो माता नहीं जीती है, मानसिक चिन्ता, बंधुओं का वियोग और शत्रु से भय होता है।।१९६।। आगमनं भृगुपुत्रे गतवति वित्तेश्वरो मनुजः। सत्तीर्थभ्रमणशाली नित्योत्साही करांघ्रिरोगी च।।१९७।। आगमन अवस्था में हो तो महाधनी, तीर्थयात्री, उत्साही और हाथ- पैर के रोग से युक्त होता है।।१९७।। अनायासेनालं सपदि महसा याति सहसा प्रगल्भत्वं राज्ञः सदसि गुणविज्ञः किल कवौ। सभायामायाते रिपुनिवहहन्ता धनपतेः समत्वं वा दाता बलतुरगगन्ता नरवरः।।१९८।। सभावस्था में हो तो अनायास ही अपने ही प्रताप से राजदरबार में प्रगल्भता होती है। स्वयं गुणी, शत्रु का नाश करने वाला, महाधनी दाता और हाथी तथा घोड़े की सवारी पर चलनेवाला होता है।।१९८।। आगमे भार्गवे नागमो जन्मिनामर्थराशेररातेरतीव क्षतिः। पुत्रपातो निपातो जनानामपि व्याधिभीतिः प्रियाभोगहानिर्भवेत् ।। आगमन अवस्था में हो तो शत्रु द्वारा धन की अधिक हानि, पुत्र, परिजनों का वियोग, रोग का भय और स्त्री के सुख की हानि होती है।।१९९।। क्षुधातुरो व्याधिनिपीडितः स्यादनेकधारातिभयार्दितश्च। कवौ यदा भोजनगे युवत्या महाधनो पण्डतमण्डितश्च।।१२०।। भोजन अवस्था में हो तो भूख से व्याकुल, रोग से पीडित और बारम्बार शत्रु से पीडित होता है।।१२०।। काव्यविद्यानवद्या च हृद्या मतिः सर्वदा नृत्यलिप्सागते भार्गवे। शङ्खवीणामृदङ्गादिगानध्वनिव्रातनैपुण्यमेतस्य वित्तोन्रतिः।।
- ग्रहाणामवस्थाध्यायः २५३ नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो काव्य करने वाला, बुद्धिमान्, वीणा, मृदंग आदि बाजों को बजाने में चतुर और धन की उन्नति करने वाला होता है।।१२१।। कौतुकभवनं गतवति शुक्रे शक्रेशत्वं सदसि महत्त्वम्। हृद्या विद्या भवति च पुंसः पद्मा निवसति सद्मादरतः।।१२२।। कौतुक अवस्था में हो तो इन्द्र के समान पराक्रमी, सभा में चतुर, उत्तम विद्या और गृह मे सदा लक्ष्मी के वास वाला होता है।।१२२।। परसेवारतो नित्यं निद्रामुपगते कवौ। परनिन्दापरो वीरो वाचालो भ्रमते महीम्।।१२३।। यदि निद्रावस्था में हो तो दूसरे की सेवा करने वाला, दूसरे की निंदा करने वाला; व्यर्थ बोलनेवाला और व्यर्थ घूमने वाला होता है।।१२३।। अथ शनेरवस्थाफलम्- क्षुत्पिपासापरिक्रान्तो विश्रान्तः शयने शनौ। वयसि प्रथमे रोगी ततो भाग्यवतां वरः।।१२४।। यदि शनि शयनावस्था में हो तो जातक बाल्यकाल में रोगी, भूख-प्यास से पीडित रहता है, परन्तु वृद्धावस्था में भाग्यवान् होता है।।१२४।। भानोः सुते चेदुपवेशनस्थे करालकारातिजनानुतप्तः। अपायशाली खलु दद्रुमाली नराऽभिमानी नृपदण्डयुक्तः।।१२५।। उपवेशन अवस्था में हो तो प्रबल शत्रु द्वारा पीड़ित, व्यर्थ अपव्यय करने वाला, दाद-खुजली रोग वाला, अभिमानी और राजदंड से दंडित होता है।।१२५।। नयनपाणिगते नृपनन्दने परमया रमया रमया युतः। नृपतितो हिततो मतितोषकृद्बहुकलाकलितो विमलोक्तिकृत्।।१२६।। नेत्रपाणि अवस्था में हो तो परम सुंदरी स्त्री और संपत्ति से युक्त, राजा और मित्रों से उपकृत, अनेक कलाओं का ज्ञाता और प्रिय बोलने वाला होता है।।१२६।। नानागुणग्रामधनाधिशाली सदां नरो बुद्धिविनोदमाली। प्रकाशने भानुसुते सुभानुः कृपानुरक्तो हरपादभक्तः।।१२७।। प्रकाश अवस्था में हो तो अनेक गुण-ग्राम-धन से युक्त, बुद्धिमान्,
२५४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् कृपालु और ईश्वरभक्त होता है॥१२७॥ महाधनी नन्दननन्दितः स्यादपायकारी रिपुभूमिहारी। गमे शनौ पण्डितराजभावं धरापतेरायतने प्रयाति॥१२८॥ गमन अवस्था में हो तो महाधनी, पुत्र से युक्त, खर्चीला, शत्रु की भूमि को लेने वाला, राजा का पंडित होता है॥१२८॥ आगमने पदगर्दभयुक्तः पुत्रकलत्रसुखेन विमुक्तः। भानुसुते भ्रमते भुवि नित्यं दीनमना विजनाश्रयभावम्॥१२९॥ आगमन अवस्था में हो तो स्थान का भय, रोगभय, पुत्र, स्त्री के सुख से रहित, दीन स्थिति में निरंतर घूमने वाला होता है॥१२९॥ रत्नावलीकाञ्चनमौक्तिकानां व्रातेन नित्यंव्रजति प्रमोदम्। सभागते भानुसुते नितान्तं नयेन पूर्णो मनुजो महौजाः॥१३०॥ सभा अवस्था में हो तो रत्न-सुवर्ण-मुक्ता के समूह से नित्य आनंदित, नीतियुक्त, महातेजस्वी होता है॥१३०॥ आगमे गदसमागमो नृणामब्जबन्धुतनये यदा तदा। मन्दमेव गमनं धरापतेर्याचनाविरहिता मतिः सदा॥१३१॥ आगमन अवस्था में हो तो रोग युक्त, मंदगति और राजा से लाभ पाने की बुद्धि से हीन होता है॥१३१॥ सङ्गते जनुषि भानुनन्दने भोजनं भवति भोजनं रसैः। संयुक्तं नयनमन्दतानना मोहतापपरितापिता मतिः॥१३२॥ भोजन अवस्था में हो तो सरस भोजन का लाभ, नेत्रज्योति मन्द और माया-मोह से मन्द बुद्धि वाला होता है॥१३२॥ नृत्यलिप्सागते मन्दे धर्मात्मा वित्तपूरितः। राजपूज्यो नरो धीरो महावीरो रणाङ्गणे॥१३३॥ नृत्यलिप्सा अवस्था में हों तो धर्मात्मा, धन से पूर्ण, राजा से पूज्य, धीर, महावीर होता है॥१३३॥ भवति कौतुकभावमुपागते रविसुते वसुधावसुपूरितः। अतिसुखी सुमुखी सुखपूरितः कवितयामलया कलया नरः॥ कौतुक अवस्था में हों तो भूमि, धन से पूर्ण, अत्यंत सुखी, स्त्रीसुख से पूर्ण और कविता करने वाला होता है।।१३४।। निद्रागते वासरनाथपुत्रे धनी सदा चारुगुणैरुपेतः।
ग्रहाणामवस्थाध्यायः २५५ पराक्रमी चण्डविपक्षहन्ता सुवारकान्तारतिरीतिविज्ञः ।।१३५।। निद्रा अवस्था में हो तो धनी, सुंदर गुणों से युक्त, पराक्रमी, दुष्टों का नाश करने वाला और वेश्यागामी होता है ।।१३५।। अथ राहोरवस्थाफलम्- यदागमो जन्मनि यस्य राहौ क्लेशाधिकत्वं शयनं प्रयाते । वृषेऽथ युग्मेऽपि च कन्यकामजे समाजो धनधान्यराशेः ।।१३६।। यदि राहु जन्मसमय में शयन अवस्था में हो तो जातक अधिक क्लेश से युक्त होता है। किन्तु वृष, मिथुन, कन्या या मेष में शयन अवस्था में हो तो धन-धान्य से पूर्ण होता है ।।१३६।। उपवेशनमिह गतवति राहौ दद्गुगदेन जनः परितप्तः। राजसमाजयुतो बहुमानी वित्तसुखेन सदा रहितः स्यात् ।।१३७।। उपवेशन अवस्था में हो तो दाद से पीडित, राजा से सम्मानित, अभिमानी, धनसुख से हीन होता है ।।१३७।। नेत्रपाणावगौ नेत्रे भवतो रोगपीडिते । दुष्टव्यालारिचोराणां भयं तस्य धनक्षयः ।।१३८।। नेत्रपाणि अवस्था में हो तो नेत्ररोग से पीडित, दुष्ट सर्प, शत्रु और चोर के भय से युक्त और धन की हानि होती है ।।१३८।। प्रकाशने शुभासने स्थितिः कृतिः शुभा नृणां धनोन्नतिर्गुणोन्नतिः सदा विदामगाविह । धराधिपाधिकारिता यशोलता तता भवे- न्नवीननीरदाकृतिर्विदेशतो महोन्नतिः ।।१३९।। प्रकाश अवस्था में हो तो सुंदर स्थान, सुंदर यश, धन और गुण की उन्नति, राजा से अधिकार की प्राप्ति, नूतन मेघ के समान आकृति और विदेश में उन्नति पाने वाला होता है ।।१३९।। गमने च यदा राहौ बहुसन्तानवान्नरः । पण्डितो धनवान्दाता राजपूज्यो नरो भवेत् ।।१४०।। गमन अवस्था में राहु हो तो बहुत संतानवाला, पंडित, धनी, दाता, राजा से पूज्य होता है ।।१४०।। राहावागमने क्रोधी सदा धीधनवर्जितः । कुटिलः कृपणः कामी नरो भवति सर्वथा ।।१४१।।
२५६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् आगमन अवस्था में हो तो क्रोधी, बुद्धि तथा धन से हीन, कुटिल, कृपण, कामी होता है॥१४१॥ सभागतो यदा राहुः पण्डितः कृपणो नरः। नानागुणपरिक्रान्तो वित्तसौख्यसमन्वितः ॥१४२॥ सभा अवस्था में राहु हो तो पंडित और कृपण, अनेक गुणों से युक्त, धनसुख से युक्त होता है॥१४२॥ चेदगावागमं यस्य याते तदा व्याकुलत्वं सदारातिभीत्या भयम्। महद्बन्धुवादो जनानां निपातो भवेद्वित्तहानिः शठत्वं कृशत्वम्॥ आगमन अवस्था में हो तो हमेशा शत्रुभय से भयभीत और व्याकुल, बंधुओं से बड़ा विवाद और पतन, धन की हानि, मूर्खता और कृशता होती है॥१४३॥ भोजने भोजनेनालं विकलो मनुजो भवेत्। मन्दबुद्धिः क्रियाभीरुः स्त्रीपुत्रसुखवर्जितः॥१४४॥ भोजन अवस्था में हो तो भोजन के बिना विकल, मन्दबुद्धि, कार्य में आलसी, स्त्री-पुत्र के सुख से रहित होता है॥१४४॥ नृत्यलिप्सागते राहौ महाव्याधिविवर्धनम्। नेत्ररोगी रिपोर्भीतिर्धनधर्मक्षयो नृणाम् ॥१४५॥ नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो महाव्याधि का भय, नेत्र में रोग, शत्रुभय, धन-धर्म का नाश होता है॥१४५॥ कौतुके च यदा राहौ स्थानहीनो नरो भवेत्। परदाररतो नित्यं परवित्तापहारकः॥१४६॥ कौतुकावस्था में हो तो स्थानहीन, परस्त्रीगामी और परधन हरण करने वाला होता है॥१४६॥ निद्रावस्थां गते राहौ गुणग्रामयुतो नरः। कान्तासन्तानवान्धीरो गर्वितो बहुवित्तवान् ॥१४७॥ निद्रावस्था में हो तो गुण-समूह से युक्त, स्त्री-संतान से युक्त, धीर, गर्वीला और अधिक धनी होता है॥१४७॥ अथ केतोरवस्थाफलम्— मेषे वृषेऽथ युग्मे वा कन्यायां शयनं गते। केतौ धनसमृद्धिः स्यादन्यभे रोगवर्धनम् ॥१४८॥
ग्रहाणामवस्थाध्यायः २५७ केतु शयनावस्था में मेष, वृष, मिथुन वा कन्या राशि में हो तो जातक धनी होता है। अन्य राशि में हो तो रोग की वृद्धि होती है॥१४८॥ उपवेशं गते केतौ दद्रुरोगविवर्धनम्। अरिवातन्नृपव्यालचौरशङ्का समन्ततः॥१४९॥ उपवेशनावस्था में हो तो दादरोग की वृद्धि, शत्रु-वायु-राज-सर्प-चोर का भय होता है॥१४९॥ नेत्रपाणिं गते केतौ नेत्ररोगः प्रजायते। दुष्टसर्पादिभीतिश्च रिपुराजकुलादपि॥१५०॥ नेत्रपाणि अवस्था में हो तो नेत्र-रोग, दुष्ट सर्प आदि का भय, शत्रु तथा राजकुल से भी भय होता है॥१५०॥ केतौ प्रकाशने संज्ञे धनवान्धार्मिकः सदा। नित्यं प्रवासी चोत्साही सात्त्विको राजसेवकः॥१५१॥ प्रकाश अवस्था में हो तो धनी, धार्मिक, नित्य परदेशी, उत्साही, सात्त्विक और राजसेवक होता है॥१५१॥ गमेच्छायां भवेत्केतुर्बहुपुत्रो महाधनः। पण्डितो गुणवान्दाता जायते च नरोत्तमः॥१५२॥ गमन अवस्था में हो तो महाधनी, पंडित, गुणी, दाता होता है॥१५२॥ आगमे च यदा केतुर्नानारोगो धनक्षयः। दन्तघाती महारोगी पिशुनः परनिन्दकः॥१५३॥ आगमन अवस्था में हो तो अनेक रोग होते हैं, धन का नाश, दंतरोग, महारोग, कृपण, दूसरे की निंदा करने वाला होता है॥१५३॥ सभावस्थां गते केतौ वाचालो बहुगर्वितः। कृपणो लम्पटश्चैव धूर्त्तविद्याविशारदः॥१५४॥ सभावस्था में हो तो वाचाल, गर्वीला, कृपण, लम्पट और धूर्त्तविद्या का पंडित होता है॥१५४॥ यदागमे भवेत्केतुः केतुः स्यात्पापकर्मणाम्। बन्धुवादरतो दुष्टो रिपुरोगनिपीडितः॥१५५॥ आगम अवस्था में केतु हो तो पापकर्म करनेवालों में श्रेष्ठ, बंधुओं से विवादरत, दुष्ट और शत्रु तथा रोग से पीडित होता है॥१५५॥
२५८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् भोजने तु जनो नित्यं क्षुधया परिपीडितः। दरिद्रो रोगसन्तप्तः केतौ भ्रमति मेदिनीम्॥१५६॥ भोजन अवस्था में हो तो भूख से पीडित, दरिद्र, रोग से संतप्त होकर घूमता है॥१५६॥ नृत्यलिप्सामते केतौ व्याधिना विकलो भवेत्। बुद्बुदाक्षो दुराधर्षो धूर्तोऽनर्थकरो नरः॥१५७॥ नृत्यलिप्सा अवस्था में हो तो व्याधि से विकल, चकाचौंध नेत्रवाला, किसी के वश में न होने वाला, धूर्त और अनर्थकारी होता है॥१५७॥ कौतुकी कौतुके केतौ नटवामारतिप्रियः। स्थानभ्रष्टो दुराचारी दरिद्रो भ्रमते महीम्॥१५८॥ कौतुक अवस्था में हो तो वेश्या आदि से प्रेम करने वाला, स्थान- भ्रष्ट, दुराचारी और दरिद्र होता है॥१५८॥ निद्रावस्थां गते केतौ धनधान्यसुखं महत्। नानागुणविनोदेन कालो गच्छति जन्मिनाम्॥१५९॥ निद्रा अवस्था में हो तो धन-धान्य का बड़ा सुख होता है। अनेक गुणों की चर्चा में समय व्यतीत करने वाला होता है॥१५९॥ अथ ग्रहावस्थानुसारेण भावफलम्– शयने येषु भावेषु यस्य तिष्ठन्ति सद्ग्रहाः। नित्यं तस्य शुभंज्ञानं निर्विशङ्कं द्विजोत्तम॥१६०॥ जन्म समय शयन अवस्था में स्थित शुभ ग्रह जिन-जिन भावों में होता है तो उन-उन भावों के फलों को शुभकारक होता है॥१६०॥ भोजने येषु भावेषु पापास्तिष्ठन्ति सर्वथा। तदा सर्वविनाशोऽपि नात्र कार्या विचारणा॥१६१॥ एवं भोजन अवस्था में गया हुआ पापग्रह जिन भावों में होता है उनके फलों का नाश करता है॥१६१॥ निद्रायां च यदा पापो जायास्थाने शुभं वदेत्। यदि पापग्रहैर्दृष्टो न शुभं च कदाचन॥१६२॥ यदि निद्रा अवस्था में पापग्रह सातवें भाव में हो तो शुभ फल, यदि पापग्रह से दृष्ट हो तो अशुभ फल करता है॥१६३॥
ग्रहाणामवस्थाध्यायः २५९ सुतस्थाने स्थितः पापो निद्रायां शयनेऽपि वा। तदा शुभं भवेत्तस्य नात्र कार्या विचारणा॥१६३॥ पाँचवें भाव मे निद्रा या शयन अवस्था में पापग्रह हो तो शुभद नहीं होता है॥१६३॥ मृत्युस्थानस्थितः पापो निद्रायां शयनेऽपि वा। तदा तस्यापमृत्युः स्याद्राजतः परतस्तथा॥१६४॥ आठवें स्थान में पापग्रह निद्रा या शयन अवस्था में हो तो उसकी अपमृत्यु राजा के द्वारा या शत्रु के द्वारा होती है॥१६४॥ शुभग्रहैर्यदा युक्तः शुभैर्वा यदि वीक्षितः। तदा तु मरणं तस्य गङ्गायां च विशेषतः॥१६५॥ यदि पापग्रह शुभग्रहों से युक्त वा दृष्ट हो तो गंगा नदी में मृत्यु होती है॥१६५॥ कर्मस्थाने यदा पापः शयने भोजनेऽपि वा। तदा कर्मविपाकः स्यान्नानादुःखप्रदायकः॥१६६॥ कर्मभाव में पापग्रह शयन या भोजन अवस्था में हो तो कर्म से अनेक दुःख होते हैं॥१६६॥ दशमस्थो निशानाथो कौतुके च प्रकाशने। तदैव राजयोगः स्यान्निर्विशङ्कं द्विजोत्तम॥१६७॥ दशम स्थान में चन्द्रमा कौतुक या प्रकाशन अवस्था में हो तो राजयोग होता है॥१६७॥ बलाबलविचारेण ज्ञायते च शुभाशुभम्। एवं क्रमेण बोद्धव्यं सर्वभावेषु बुद्धिमान्॥१६८॥ ग्रहों के बल और निर्बलता को देखकर शुभ-अशुभ फलों को बुद्धिमान् को जानना चाहिए।॥१६८॥ इति ग्रहाणामवस्थाध्यायः॥
२६० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् आयुर्दायाध्यायः मैत्रेय उवाच– दरिद्रधनयोगौ च कथितौ प्राङ्महामुने ! । नराणामायुषो ज्ञानं कथं जातं महामुने ! ॥१॥ मैत्रेय ने कहा– हे मुने ! आपने दरिद्र और धन योग को कहा। हे महामुने ! मनुष्यों की आयु का ज्ञान कैसे होता है, इसे कहिए ॥१॥ पराशर उवाच– साधु पृष्टं त्वया विप्र ! नराणां हितकाम्यया । आयुर्ज्ञानं प्रवक्ष्यामि दुर्लभं यत् सुरैरपि ॥२॥ पराशरजी ने कहा– हे विप्र ! मनुष्यों के हित की कामना से तुमने बड़ा ही उत्तम प्रश्न किया है, अब मैं आयुष्य ज्ञान को कहता हूँ, जो कि देवताओं को भी दुर्लभ है ॥२॥ अंशायुसाधनम्– समाहता भांशकलाविलिप्ता गजाभ्रचन्द्रैर्गहपर्ययेभ्यः । विकर्त्तनैः संविहतावशेषेऽब्दमासाद्यस्त्रादिकमायुरेवम् ॥३॥ ग्रहों की राशि अंश, कला, विकला को १०८ से गुणा कर १२ से भाग देने से शेष वर्ष, मास, दिन, घटी आदि ग्रह की आयु होती है ॥३॥ होरादायोष्येवमत्राधिवीर्यं लग्नं चेद्राशितुल्यैस्तथाब्दकैः । युक्तं शेषं भागपूर्वद्विनिघ्नं बाणैर्भक्तं मासपूर्वैर्युतं तत् ॥४॥ इसी प्रकार लग्न की भी आयु होती है, किन्तु लग्न अधिक बली हो तो लग्न राशि के तुल्य वर्ष और शेष अंशादि को २ से गुणाकर ५ से भाग देने से मास आदि आयु होती है ॥४॥ अंशायुषि साधने विशेषः– नीचेऽस्तगेऽर्द्धमरिभे त्रिलवं हरन्ति नास्तङ्गतौ शनिसितौ व्ययतौऽत्र वामम् । सर्वार्धकत्रिकचतुर्थशरर्तुभागान् हरन्त्यशुभदाः शुभदास्तदर्धम् ॥५॥ यदि ग्रह अपनी नीचराशि में हो या अस्त हो तो आयु का आधा, शत्रु की राशि में हों तो आयु का तीसरा भाग कम आयु देता है। किन्तु शनि,
आयुर्दायाध्यायः २६१ शुक्र अस्त होते हुए भी आधा हानि नहीं करते हैं। बारहवें भाव से विलोम संपूर्ण, आधा, तृतीयांश, चतुर्थांश, पंचमांश और षष्ठांश पापग्रह अपने आयु की हानि करते हैं और शुभग्रह इन्हीं भावों में आधा हानि करते हैं। अर्थात् १२वें भाव में पापग्रह हों तो अपने संपूर्ण आयु का नाश, ग्यारहवें भाव में हो तो आधा इत्यादि ।।५।। एकस्थानस्थिताश्चेत्स्युर्द्वात्रयो गगनेचराः। तदा बलयुतः खेटो हरत्येकेन चापरे ।।६।। एक ही स्थान में दो-तीन ग्रह बैठे हों तो उनमें जो बलवान् हो उसी के आयु का अपहरण होता है।।६।। वर्गोत्तमस्वर्क्षनवांशदृक्के द्विसंगुणं तत्सकलं विधेयम्। वक्रोच्चयोस्तत्त्रिगुणं विधेयं द्वित्रिगुणत्वे त्रिगुणं सकृच्च ।।७।। जो ग्रह वर्गोत्तम नवांश, अपनी राशि या नवांश या द्रेष्काण में हो उसके संपूर्ण आयु को दूना कर देना चाहिए। जो वक्री हो या अपनी उच्चराशि में हो तो उसकी आयु को तिगुना कर देना चाहिए। एक ही ग्रह की आंयु द्विगुणित और त्रिगुणित करनी हो तो केवल त्रिगुणित ही करना चाहिए।।७।। अंशायु-साधन का उदाहरण पृ. २४ में दिये हुए स्पष्ट ग्रहचक्र और जन्माङ्ग को देखना चाहिए। सूर्य ३।१८।२६।३४ है। ३ १८ २६ ३४ × १०८ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯ ३२४ ८६४ ६४८ ४३२ १०८ २१६ ३२४ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯ ३२८ १९४४ २८०८ ३६७२ ÷ ६० ६६ ४७ ६१ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯ ⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯ ३२ ÷ १२ ३९० ÷ १२ १९९१ ÷ ३० २८६९ ÷ ६० ८ शेष ६ शेष ११ शेष ४९ शेष १२ शेष = ८।६।११।४९।१२ सूर्यायुर्दाय वर्षादि। इसी प्रकार से लग्न सहित सभी ग्रहों के अंशायु का साधन करना चाहिए।
२६२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् असंस्कृतांशायुचक्रम्
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ल. | ग्रहायु |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ८ | ० | ० | १ | ३ | ७ | ३ | ६ | वर्ष |
| ६ | ९ | ९ | ७ | १० | ६ | ६ | १ | मास |
| ११ | १ | ३ | ११ | ७ | ५ | १९ | २९ | दिन |
| ४९ | २४ | ५० | २२ | ३७ | ३३ | ५७ | ७ | घटी |
| १२ | ३६ | २४ | १२ | १२ | ० | ३६ | ४८ | पल |
| विशेष संस्कार | ||||||||
| सूर्य सातवें भाव में है, अतः सूर्यायुवर्षादि ८।६।११।४९।१२ ÷ ६ = | ||||||||
| १।५।१।५८।१२ लब्धि वर्षादि हुई। इस लब्धि को सूर्यायु | ||||||||
| ८।६।११।४९।१२ में | ||||||||
| लब्धि- १।५।१।५८।१२ को घटाया तो | ||||||||
| = स्पष्टसूर्यायुवर्षादि ७।१।९।५१।० हुए। | ||||||||
| चन्द्र में हानि-वृद्धि का कोई योग न होने के कारण स्पष्ट चन्द्रायुवर्षादि | ||||||||
| ०।९।१।२४।३६ हुए। | ||||||||
| भौम अपने नवमांश (मेष) में होने के कारण भौमायु ०।९।३।५०।२४ | ||||||||
| × २ = ०।१८।७।४०।४८ भौम का स्पष्टायुवर्षादि हुआ। | ||||||||
| बुध में हानि वृद्धि के कोई योग न होने से स्पष्ट बुधायुवर्षादि = | ||||||||
| १।७।११।२२।१२ हुए। | ||||||||
| गुरु आठवें भाव में है अतः आधा भाग कम होना चाहिए, अतः गुरु | ||||||||
| की आयुवर्षादि ३।१०।७।३७।१२ ÷ २ = १।११।३।४८।३६ लब्धि को | ||||||||
| गुरु आयुवर्षादि ३।१०।७।३७।१२ में | ||||||||
| लब्धि १।११।३।४८।३६ घटाया तो | ||||||||
| शेष १।११।३।४८।३६ वर्षादि हुए। | ||||||||
| गुरु अपने द्रेष्काण का है अतः हानिकृत गुरु आयुवर्षादि | ||||||||
| १।११।३।४८।३६ ×२ = २।२२।७।३७।१२ स्पष्ट गुरु की आयु हुई। | ||||||||
| शुक्र में कोई हानि-वृद्धि के योग न होने से स्पष्ट शुक्रायुवर्षादि | ||||||||
| ७।६।५।३३।० हुए। | ||||||||
| शनि शत्रु राशि में है, अतः शनि के आयुवर्षादि ३।६।१९।५७।३६ | ||||||||
| ÷ ३ लब्धि १।२।५।१९।१२ को घटाना चाहिए। अतः शनि की आयुवर्षादि | ||||||||
| ३।६।१९।५७।३६ में | ||||||||
| लब्धि १।२।५।१९।१२ को घटाया तो | ||||||||
| स्पष्टशन्यायु २।४।१०।३८।२४ वर्षादि हुए। |