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बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

४५४ . बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । चोर आदि तथा फोड़ा आदि का भय स्त्री पुत्रादि को कष्ट होता हैं। इसके बाद सुख होता है। राहु शुभग्रह से युक्त और शुभग्रह के अंश में हो तो।।४१।। देहारोग्यं मनस्तुष्टी राजप्रीतिकरं सुखम्। लग्नादुपचये राहौ योगकारकसंयुते।।४२।। शरीर में आरोग्यता, मन को संतोष, राजा से मित्रता और सुख होता है। लग्न से उपचय (३।६।११) स्थान में योगकारक ग्रह से युक्त हो।।४२।। दायेशाच्छुभराशिस्थे राजसन्मानकीर्त्तिदम्। भाग्यवृद्धिं यशोलाभं दारपुत्रादिपीडनम्।।४३।। और दशेश से शुभ स्थान में हो तो राजा से सम्मान और कीर्त्ति में वृद्धि, भाग्य वृद्धि, यश का लाभ, स्त्री पुत्रादि को पीड़ा।।४३।। पुत्रोत्सवादिसन्तोषं गृहे कल्याणशोभनम्। दायेशात्षष्ठरिःफस्थे रंध्रे वा बलवर्जिते।।४४।। पुत्रोत्सव आदि उत्सव गृह में होते हैं। दशेश से ६।१२।८ भाव में राहु हो और निर्बल हो तो।।४४।। बंधनं स्थाननाशश्च कारागृह निवेशनम्। चौराहिब्रणभीतिश्च दारपुत्रादिवर्द्धनम्।।४५।। बंधन स्थान हानि, जेलखाना, चोर, सूर्य, फोड़ा से भय, स्त्री पुत्रादि को सुख।।४५।। चतुष्पाज्जीवनाशश्च गृहक्षेत्रादिनाशनम्। गुल्मक्षयादिरोगश्च अतिसारादिपीडनम् ।।४६।। चौपाये जानवर की हानि, गृह क्षेत्र की हानि, गुल्म, क्षय और अतिसार रोग से पीड़ा होती है।।४६।। द्विसप्तस्थे तथा राहौ तत्स्थानाधिपसंयुते । अपमृत्युभयं चैव सर्वभीतिश्च सम्भवेत् ।।४७।। २।७ भाव में इन स्थानों के स्वामी से युत राहु हो तो अपमृत्यु का भय तथा अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ता है।।४७।। दुर्गाजपं च कुर्वीत छागदानं समाचरेत् । कृष्णांगां महिषीं दद्याच्छान्तिमाप्नोत्यसंशयम् ।।४८।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४५५ इसकी शांति के लिये दुर्गापाठ, बकरी, काली गौ, भैंस का दान करना चाहिये इससे आराम होता है।।४८।। रविदशायांगुर्वन्तर्दशाफलम् - सूर्यस्यान्तर्गते जीवे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । स्वोच्चमित्रस्य वर्गस्थे विवाहं राजदर्शनम् ।।४९।। सूर्य की दशा में अपने उच्च वा अपने मित्र के वर्ग में स्थित केन्द्र वा त्रिकोण में रहने वाले गुरु के अंतर में विवाह राजा का दर्शन।।४९।। धनधान्यादिलाभं च पुत्रलाभं महत्सुखम् । महाराजप्रसादेन इष्टकामार्थलाभकृत् ।।५०।। धन; धान्य का लाभ, पुत्र सुख, बड़ा सुख, राजा की प्रसन्नता से इष्ट कार्य, धन का लाभ।।५०।। ब्राह्मणप्रियसन्मानं प्रियवस्त्रादिलाभकृत् । भाग्यकर्माधिपवशाद्राज्यलाभं महोत्सवम् ।।५१।। ब्राह्मण और मित्रों से सम्मान, प्रियवस्त्रादि का लाभ होता है। भाग्येश और कर्मेश हो तो राज्य का लाभ, बड़ा उत्सव।।५१।। नरवाहनयोगश्च स्थानाधिक्यं महत्सुखम् । दायेशाच्छुभराशिस्थे भाग्यवृद्धिः सुखावहा ।।५२।। मनुष्य की सवारी (पालकी) स्थान लाभ, सुख होता है। दशेश से शुभ राशि में हो तो भाग्यवृद्धि, सुख। दानधर्मक्रियायुक्तो देवताराधनप्रियः । गुरुभक्तिः मनः सिद्धिःपुण्यकर्मादिसंग्रहः ।।५३।। दान आदि धार्मिक क्रिया में प्रवृत्त देवता का आराधन, गुरु की भक्ति और पुण्य कर्मों का संग्रह होता है।।५३।। दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे नीचे वा पापसंयुते । दारपुत्रादिपीडाच देहपीडा महद्भयम् ।।५४।। दशेश से ६।८ स्थान में अपने नीचराशि में पापग्रह से युत हो तो स्त्री पुत्र आदि को पीड़ा, शरीर में पीड़ा, बड़ा भय।।५४।। राजकोपं प्रकुरुते इष्टवस्तुविनाशनम् । पापमूलाद्द्रव्यनाशं देहभ्रष्टं मनोरुजम् ।।५५।।

४५६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । राजकोप, इष्टवस्तु का नाश, पापमूल से धन का नाश देह में कष्ट और मानसिक कष्ट होता है।।५५।। स्वर्णदानं प्रकुर्वीत इष्टजाप्यं च कारयेत् । गवां कपिलवर्णानां दानेनारोग्यमादिशेत् ।।५६।। शान्ति के लिये सोना का और कपिला गौ का दान करना चाहिये। इष्टदेव (गुरु) का जप कराने से आरोग्यता प्राप्ति होती है।।५६।। अथ रविदशायांशन्यन्तर्दशाफलम् - सूर्यस्यान्तर्गते मन्दे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । शत्रुनाशं महत्सौख्यं स्वल्पधान्यार्थलाभकृत् ।।५७।। सूर्य की दशा में लग्न से केन्द्र त्रिकोण में गये हुये शनि के अतर में शत्रुओं का नाश, सुख, अल्प धन धान्य आदि का लाभ।।५७।। विवाहोत्सव कार्याणि शुभकार्य शुभावहम् । स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे मन्दे सुहृद्ग्रहसमन्विते ।।५८।। विवाहोत्सव आदि कार्य, शुभ क्रियायें होती हैं। यदि शनि अपने उच्च, अपनी राशि में हो अपने मित्र ग्रह से युत हो तो।।५८।। गृहेकल्याणसम्पत्तिर्विवाहादि च सत्क्रियाम् । राजसन्मानकीर्त्तिश्च नानावस्त्रधनागमः ।।५९।। गृह में कल्याण, सम्पत्ति, विवाहादि अच्छी क्रियायें, राजा से सम्मान, कीर्त्ति और अनेक प्रकार के वस्त्र तथा धन का लाभ होता है।।५९।। दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते । वातशूलमहाव्याधिज्वरातीसारपीडनम् ।।६०।। दशेश से ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युत हो तो वात, शूल, महाव्याधि, ज्वर, अतिसार की पीड़ा।।६०।। बन्धनं कार्यहानिश्च वित्तनाशं महद्भयम् । अकस्मात्कलहश्चैव दायादजनविग्रहम् ।।६१।। बन्धन, कार्य की हानि, धन का नाश, बड़ा भय, अकस्मात् झगड़ा, दायादों से विग्रह होता है।।६१।। भुक्त्यादौ मित्रहानिः स्यान्मध्ये किंचित्सुखावहम्। अन्ते क्लेशकरं चैव नीचे तेषां तथैव च ।।६२।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४५७ अन्तर के आदि में मित्रों की हानि, मध्य में कुछ सुख और अन्त में क्लेश होता है, इसी प्रकार नीच राशि में रहने से भी होता है।।६२।। पितृमातृवियोगं च गमनागमनं तथा । द्वितीयद्यूननाथेतु अपमृत्युभयं भवेत् ।।६३।। यदि शनि २।७ भावों का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है। पिता माता का वियोग और आनाजाना लगा रहता है।।६३।। कृष्णां गां महिषीं दद्यान्मृत्युञ्जय जपं चरेत् । छागदानं प्रकुर्वीत सर्वसम्पत्प्रदायकम् ।।६४।। शान्ति के लिये काली गौ, भैंस का दान करना चाहिये और मृत्युञ्जय का जप करना चाहिये और बकरी का दान करने से सभी सुख का लाभ होता है।।६४।। अथ रविदशायांबुधान्तर्दशाफलम् - सूर्यस्यान्तर्गते सौम्ये स्वोच्चे वास्वर्क्षगेऽपिवा । केन्द्रत्रिकोणलाभस्थे बुधे वर्गबलैर्युते ।।६५।। सूर्य की दशा में अपने उच्च राशि वा अपनी राशि में केन्द्र वा त्रिकोण वा ११ में गये हुये अपने वर्ग में बली बुध के अन्तर में।।६५।। राज्यलाभं महोत्साहं दारपुत्रादि सौख्यकृत् । महाराजप्रसादेन वाहनाम्बरभूषणम् ।।६६।। राज्य का लाभ बड़ा उत्साह स्त्री पुत्रादि को सुख, राजा की प्रसन्नता से वाहन, वस्त्र आभूषण।।६६।। पुण्यतीर्थकलाप्राप्तिर्गृहे गोधनसंकुलम् । भाग्यलाभाधिपैर्युक्ते लाभवृद्धिकरोभवेत् ।।६७।। पुण्यतीर्थ, कला के ज्ञान की प्राप्ति, गृह में गोधन की वृद्धि होती है। यदि ९।११ भाव के स्वामी से युत हो तो लाभ में वृद्धि करता है।।६७।। भाग्यपंचमकर्मस्थे सन्मानो भवति ध्रुवम् । स्वकर्मधर्मबुद्धिश्च गुरुपित्रद्विजार्चनम् ।।६८।। यदि बुध ९।५।१० भाव में हो तो सम्मान होता है। अपने धर्मकर्म में वृद्धि गुरु, पिता ब्राह्मण का पूजन।।६८।। धनधान्यादिसंयुक्तं विवाहं पुत्रसम्भवम् । दायेशाच्छुभरांशिस्ये सौम्यभुक्तौ महत्सुखम् ।।६९।।

४५८ . बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । धन, धान्य से युक्त, विवाह और पुत्र का लाभ होता है। दशेश से शुभ राशि में हो तो बड़ा सुख ।।६९।। वैवाहिकं यज्ञकर्म दान धर्म जपादिकम् । स्वनामांकितपद्यानि नामद्वयमथापि वा ।।७०।। वैवाहिक यज्ञ धर्म, जप आदि होते हैं, नामांकित पद्य बनते हैं ।।७०।। भोजनाम्बरभूषाप्तिरमरेशो भवेन्नरः । दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे रिष्फगे नीचगेऽपिवा ।।७१।। भोजन वस्त्र की प्राप्ति और इन्द्र के समान सुख देता है। दशेश से ६।८।१२ भाव में वा नीचराशि में हो तो ।।७१।। देहपीडा मनस्तापो दारपुत्रादिपीडनम् । भुक्त्यादौ दुःखमाप्नोति मध्येकिञ्चित्सुखावहम् ।।७२।। शरीर में पीड़ा मन में सन्ताप, स्त्री पुत्रादि को कष्ट होता है। तथा अन्तर के आरम्भ में दुःख मध्य में कुछ सुख ।।७२।। अन्ते तु राजभीतिश्च गमनागमनं तथा । द्वितीयद्यूननाथे तु देहजाड्यं ज्वरादिकम् ।।७३।। और अन्त में राजभय और गमनागमन होता है। २।७ भाव के स्वामी हो तो देह में जड़ता और ज्वर आदि से कष्ट होता है ।।७३।। विष्णुनामसहस्रंच ह्यन्नदानं च कारयेत् । रजतप्रतिमादानं कुर्यादारोग्य प्राप्तये ।।७४।। आरोग्यता के लिये विष्णुसहस्र स्तोत्र का पाठ, अन्नदान और चाँदी की प्रतिमा का दान करना चाहिये ।।७४।। अथ रविदशायाकेत्वन्तर्दशाफलम् - सूर्यस्यान्तर्गते केतौ देहपीडा मनोव्यथा । अर्थव्ययं राजकोपं स्वजनादिरुपद्रवम् ।।७५।। सूर्य की दशा में केतु के अन्तर में शरीर में पीड़ा, मन में कष्ट धन का व्यय, राजभय, अपने ही लोगों से उपद्रव होता है ।।७५।। लग्नाधिपेन संयुक्ते आद्ये सौख्यं धनागमम् । मध्ये तत्क्लेशमाप्नोति मृतवार्तागमं वदेत् ।।७६।। लग्नेश से युत हो तो पहले सुख धन का लाभ होता है, मध्य में उन्हीं क्लेशों

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४५९ को पाता है और अन्त में मरण सन्देश को सुनता है।।७६।। षष्ठाष्टमव्ययेचैवं दायेशात्पापसंयुते । कपोलदंतरोगश्च मूत्रकृच्छ्रस्य संभवम् ।।७७।। दाशेश से ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युत हो तो कपोल और दांत का रोग और मूत्रकृच्छ्र रोग की संभावना होती है।।७७।। स्थानविच्युतिरर्थस्य मित्रहानिः पितुर्मृतिः । विदेशगमनं चैव शत्रुपीड़ा महद्भयम् ।।७८।। स्थान और धन की हानि, मित्र की हानि, पिता की मृत्यु, विदेश यात्रा शत्रुपीड़ा और बड़ा भय होता है।।७८।। लग्नादुपचये केतौ योगकारकसंयुते । शुभांशे शुभवर्गे च शुभकर्म फलप्रदम् ।।७९।। लग्न से उपचय (३।६।१०।११) स्थान में केतु योगकारक ग्रह से युत हो शुभांश से शुभ राशि में हो तो शुभकर्म होते हैं।।७९।। पुत्रदारादिसौख्यं च सन्तोषं प्रियवर्द्धनम् । विचित्रवस्त्रलाभं च यशोवृद्धिः सुखावहा ।।८०।। पुत्र स्त्री आदि को सुख, संतोष और प्रिय वस्तुओं की वृद्धि, विचित्र वस्त्रों का लाभ, यश की वृद्धि और सुख होता है।।८०।। द्वितीयद्यूननाथे वा ह्यपमृत्युभयं वदेत् । दुर्गाजपं च कुर्वीत छागदानं तथैव च । महामृत्युंजय जपं कुर्याच्छान्तिमवाप्नुयात् ।।८१।। द्वितीयेश वा सप्तमेश हो तो अपमृत्यु का भय होता है! शान्ति के लिये दुर्गापाठ, बकरी का दान और महामृत्युंजय का जप कराना चाहिये।।८१।। अथ रविदशायां शुक्रान्तर्दशाफलम् - सूर्यस्यान्तर्गते शुक्रे त्रिकोणे केन्द्रगेऽपिवा । स्वोच्चे मित्रस्ववर्गस्थे हृष्टस्त्री भोगसम्पदाम् ।।८२।। सूर्य की दशा में त्रिकोण वा केन्द्र में गये हुये वा अपने उच्च वा मित्र वा अपने वर्ग में गये हुये शुक्र के अन्तर में प्रसन्न स्त्री का भोग, सम्पत्ति।।८२।। ग्रामान्तरप्रयाणं च ब्राह्मणप्रभुदर्शनम् । राज्यलाभं महोत्साहं छत्रचामरवैभवम् ।।८३।।

४६० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । ग्रामांतर की यात्रा, ब्राह्मण, राजा का दर्शन, राज्य का लाभ, महाउत्सव, छत्र, चामर आदि वैभव का लाभ।।८३।। गृहे कल्याण सम्पत्तिर्नित्यं मिष्टान्नभोजनम् । विद्रुमादिरत्नलाभं मुक्तावस्त्रादिलाभकृत् ।।८४।। गृह में नित्यं कल्याण और सम्पत्ति तथा मिष्टान्न का भोजन होता है। मूंगा आदि रत्न का लाभ, मोती, वस्त्र का लाभ।।८४।। चतुष्पाज्जीवलाभः स्याद्बहुधान्यधनादिकम् । उत्साहं कीर्त्तिसम्पत्तिर्नरवाहनसम्पदाम् ।।८५।। चतुष्पद जीव का लाभ, बहुत धन, धान्य का लाभ, उत्साह, कीर्त्ति, सम्पत्ति, मनुष्य की सवारी का लाभ होता है।।८५।। षष्ठाष्टमव्यये शुक्रे दायेशाद्बलवर्जिते । राजकोपं मनः क्लेशं पुत्रस्त्रीधननाशनम् ।।८६।। दशेश से ६।८।१२ वें शुक्र हो और निर्बल हो तो राजकोप, मनमें कष्ट, पुत्र, स्त्री और धन का नाश होता है।।८६।। भुक्त्यादौ मध्यमं मध्ये लाभः शुभकरोभवेत् । अन्तेयशोनाशनं च स्थानभ्रंशमथापिवा ।।८७।। अन्तर के आरम्भ में मध्यम फल, मध्य में लाभ और शुभ तथा अन्त में यश की हानि, स्थान की हानि होती है।।८७।। बन्धुद्वेषमनन्तं च श्वकुलाद्भोग नाशनम् । भार्गवे द्यूननाथेतु देहे जाड्यं मनोरुजम् ।।८८।। बन्धुओं से द्वेष, अपने ही कुल से सुख की हानि होती है शुक्र सातवें भाव का स्वामी हो तो देह में जड़ता होती है और मानसिक कष्ट होता है।।८८।। रन्ध्ररिष्फसमायुक्ते अपमृत्युर्भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युञ्जयजपं चरेत् । श्वेतां गां महिषीं दद्याद्रुद्र जाप्यं च कारयेत् ।।८९।। यदि ८।१२ वें में हो तो अपमृत्यु का भय होता है। शान्ति के लिये सफेद गौ, भैंस का दान, मृत्युंजय का और रुद्राध्याय का जप कराना चाहिये।।८९।। इति सूर्यान्तर्दशाफलम्।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४६१ अथ चन्द्रदशायांचन्द्रान्तर्दशाफलम् - स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे चन्द्रे त्रिकोणे लाभगेऽपिवा । भाग्यकर्माधिपैर्युक्ते गोजाश्वाम्बरसंकुलम् ।।९०।। चन्द्रमा की दशा में अपनी उच्चराशि वा अपनी राशि में गये हुये केन्द्र वा त्रिकोण में वा लाभस्थानगत भाग्येश कर्मेश से युक्त चन्द्रमा का अन्तर हो तो गौ, बकरी, घोड़ा वस्त्र का लाभ।।९०।। देवतागुरुभक्तिश्च पुण्यश्लोकादि कीर्त्तनम् । राज्यलाभं महत्सौख्यं यशोवृद्धिः सुखावहा ।।९१।। देवता गुरु की भक्ति, पुण्यप्रद श्लोकों का पाठ, राज्यलाभ, सुखयश में वृद्धि होती है।।९१।। पूर्णचन्द्रे पूर्णबले सेनाधिपमहत्सुखम् । पापयुक्तेऽथवा चन्द्रे नीचे वा रिष्फषष्ठगे ।।९२।। चन्द्रमा पूर्ण हो और पूर्णबली हो तो सेनाधिपति ऐसा अधिकार और बड़ा सुख होता है।।९२।। चन्द्रमा पापग्रह से युक्त हो वा नीच राशि में हो वा १२।८ भाव में हो तो।।९२।। तत्काले धननाशः स्यात्स्थानच्युतिमथापिवा । देहालस्यं मनस्तापं राजमन्त्रिविरोधकृत् ।।९३।। धन का नाश और स्थानच्युति देह में आलस्य, मन में सन्ताप, राजमन्त्री से विरोध।।९३।। मातृक्लेशं मनोदुःखं निगडं बन्धुनाशनम् । द्वितीयद्यूननाथेतुं , रन्ध्ररिष्फसमन्विते ।।९४।। माता को कष्ट, दुख, बन्धन और बन्धुओं की हानि होती है। चन्द्रमा २ वा ७ भाव का स्वामी हो और ८ या १२ भाव में हो तो।।९४।। देहजाड्यं महाभङ्गमपमृत्योर्भयं भवेत् । श्वेतांगां महिषीं दद्याद्दानेनारोग्यताभवेत् ।।९५।। शरीर में जड़ता, और अप मृत्यु का भय होता है। आरोग्यता के लिये सफेद गौ, भैंस का दान करना चाहिये।।९५।।

४६२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथचन्द्रदशायां भौमान्तरदशाफलम् - चन्द्रस्यान्तर्गते भौमे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । सौभाग्यं राजसन्मानं वस्त्राभरणभूषणम् ॥९६॥ चन्द्रमा की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये भौम के अन्तुर में सौभाग्य, राजा से सम्मान, वस्त्र, आभूषण का लाभ ॥९६॥ यत्नात्कार्यार्थसंसिद्धिः भविष्यति न संशयः । गृहक्षेत्राभिवृद्धिश्च व्यवहारे जयोभवेत् ॥९७॥ प्रयत्न से कार्य और धन का लाभ होता है। गृह, खेत की वृद्धि, व्यवहार में विजय ॥९७॥ कार्यलाभं महत्सौख्यं स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे फलम् । षष्ठाष्टमव्यये भौमे पापयुक्तेऽथवा यदि ॥९८॥ कार्य में लाभ, बड़ा सुख होता है यदि भौम अपने उच्च वा अपनी राशि में हो भौम ६।८।१२ भाव में पापग्रह से ॥९८॥ दायेशादशुभस्थाने देहार्तिः शत्रुवीक्षिते । गृहक्षेत्रादिहानिश्च व्यवहारे तथैव च ॥९९॥ अथवा दशेश से अशुभ स्थान में हो शत्रु से देखा जाता हो तो शरीर में पीड़ा, गृह, खेती आदि की हानि, व्यवहार में भी हानि ॥९९॥ भृत्यवर्गेषु कलहं भूपालस्य विरोधनम् । आत्मवन्धुवियोगं च नित्यं निष्ठुरभाषणम् ॥१००॥ नौकरों से कलह, राजा से विरोध, अपने कुटुम्बियों से विक्षोभ और नित्य निष्ठुर वचन सुनने को मिलता है ॥१००॥ द्वितीयद्यूननाथेतु रन्ध्रे रन्ध्राधिपोयदा । तद्दोष परिहारार्थं ब्राह्मणस्यार्चनं चरेत् ॥१०१॥ यदि २।१२ भावों का स्वामी हो और अष्टमेश में हो तो इस दोष की शान्ति के लिये ब्राह्मण का पूजन करना चाहिये ॥१०१॥ अथचन्द्रदशायांराह्वन्तर्दशाफलम् - चन्द्रस्यान्तर्गते राहौ लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । आदौ स्वल्पफलं ज्ञेयं शत्रुपीडा महद्भयम् ॥१०२॥ चन्द्रमा की दशा में लग्न से केन्द्र या त्रिकोण में गये हुये राहु के अन्तर में

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४६३ पहले अल्पफल होता है, शत्रुपीड़ा, भय, चौर, सर्प और राजभय होता है॥१०२॥ चौराहिराजभीतिश्च चतुष्पाज्जीवपीडनम् । बन्धुनाशं मित्रहानिं मानहानिं मनोव्यथाम् ॥१०३॥ चौपायों को कष्ट, बन्धुओं की हानि मित्र की हानि, मानहानि और मन में कष्ट होता है॥१०३॥ शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे लग्नादुपचयेऽपि वा । योगकारकसम्वन्धे इष्टकार्यार्थसिद्धिदम् ॥१०४॥ राहु शुभग्रह से युक्त शुभग्रह से दृष्ट हो और लग्न से ३।६।१०।११ भाव में हो योगकारक से सम्बन्ध करता हो तो अभीष्ट कार्य और धन का लाभ होता है॥१०४॥ नैर्ऋत्ये पश्चिमेभागे क्वचित्प्रभुसमागमः । वाहनाम्बरलाभं च इष्टकार्यार्थसिद्धिकृत् ॥१०५॥ नैर्ऋत्य वा पश्चिम दिशा में किसी श्रेष्ठ से समागम, वाहन, वस्त्र का लाभ, इष्टसिद्धि होती है॥१०५॥ दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा बलवर्जिते । स्थानभ्रष्टं मनोदुःखं पुत्रक्लेशं महद्भयम् ॥१०६॥ दशेश से ६।८।१२ भाव में निर्बल हो तो स्थानभ्रष्ट, मन में दुःख, पुत्र- को कष्ट, भय॥१०६॥ राजकार्यप्रलापं च दारपीडा महद्भयम् । वृश्चिकादिविषाद्भीतिश्चौराहिनृपपीडनम् ॥१०७॥ राजकार्य में प्रलाप, स्त्री को कष्ट, महाभय, बिच्छू आदि के विष का भय, चौर, सर्प, राजा से पीड़ा होती है॥१०७॥ दायेशात्केन्द्रकोणे वा दुश्चिक्येलाभगेऽपिवा । पुण्यतीर्थकलावाप्तिर्देवतादर्शनं महत् ॥१०८॥ दशेश से केन्द्र वा त्रिकोण वा ३।११ भाव में राहु हो तो पुण्यतीर्थ कला का लाभ, देवता का दर्शन होता है धर्म आदि के संग्रह होते हैं॥१०८॥ परोपकारकर्मादि पुण्यधर्मादिसंग्रहः । द्वितीयद्यूनराशिस्थे देहबाधा भविष्यति । छागदानं प्रकुर्वीत देहारोग्यं प्रजायते ॥१०९॥

४६४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । २ वा ७ भाव में हो तो शरीर को कष्ट होता है। इससे शान्ति के लिये बकरी का दान करना चाहिये ॥१०९॥ अथचन्द्रदशायां गुर्वन्तर्दशाफलम् – चन्द्रस्यान्तर्गते जीवे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । स्वगेहे लाभस्वोच्चे वा राज्यलाभं महोत्सवम् ॥११०॥ चन्द्र की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये स्वगृह, लाभं स्थान वा अपने उच्च में गये हुये गुरु के अन्तर में राज्य का लाभ, बड़ा उत्सव ॥११०॥ वस्त्रालङ्कारभूषादि राजप्रीतिं धनागमम् । इष्टदेवप्रसादेन गर्भाधानादिकं फलम् ॥१११॥ वस्त्र, आभूषण, राज्य प्राप्ति, राजा की प्रसन्नता से धन का लाभ, इष्टदेव की प्रसन्नता से गर्भाधानादि फल होते हैं ॥१११॥ शुभशोभनकार्याणि गृहेलक्ष्मीकटाक्षकृत् । राजाश्रयं धनं भूमिगजवाजिसमन्वितम् ॥११२॥ और राजा की प्रसन्नता से सुखकर इष्टसिद्धि होती है। शुभ शोभन कर्म, लक्ष्मी का लाभ, राजा के आश्रय से धन भूमि आदि का लाभ ॥११२॥ महाराज प्रसादेन इष्टसिद्धिः सुखावहा । षष्ठाष्टमव्ययेजीवे नीचे वास्तंगते यदि ॥११३॥ ६।८।१२ भाव में गुरु हों वा नीचे राशि में वा अस्त हों वा पापयुक्त हों तो ॥११३॥ पापयुक्तेऽशुभं कर्म गुरुपुत्रादिनाशनम् । स्थानभ्रंशं मनोदुःखमकस्मात्कलहं ध्रुवम् ॥११४॥ अशुभ कार्य माता पिता पुत्र का नाश स्थान की हानि मन को दुःख अकस्मात् कलह होता है ॥११४॥ गृहक्षेत्रादिनाशं च वाहनाम्बरनाशनम् । दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा बलवर्जिते ॥११५॥ गृह-भूमि की हानि, वाहन की हानि होती है। दशेश से ६।८।१२ वें में हों निर्बल हों तो ॥११५॥ करोति कुत्सितान्नं च विदेशगमनं तथा । भुक्त्यादौ शोभनं प्रोक्तमन्ते क्लेशकरं भवेत् ॥११६॥

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४६५ खराब अन्न का भोजन, विदेश-यात्रा होती है, अन्तर के आदि में शुभफल और अन्त में कष्ट कारक होता है।।११६।। द्वितीयद्यूननाथे च ह्यपमृत्युर्भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रकं जपेत् ।।११७।। दूसरे वा सप्तम का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है। इस दोष की शान्ति के लिये शिव सहस्र नाम का जप।।११७।। स्वर्णदानमिति प्रोक्तं सर्वसम्पत्प्रदायकम् । दायेशात्केन्द्र कोणे वा दुश्चिक्येलाभगेऽपिवा ।।११८।। सुवर्ण का दान करने से सभी सम्पत्तियों का लाभ होता है दशेश से केन्द्र वा त्रिकोण वा तीसरे या लाभ स्थान में हों तो।।११८।। भोजनाम्बरपश्वादि महोत्साहं करोति च । भ्रात्रादिसुखसम्पत्तिर्धैर्यं वीर्यपराक्रमम् ।।११९।। भोजन, वस्त्र आदि का लाभ बड़ा उत्सव होता है। भाई आदि से सुख, सम्पत्ति, धैर्य, बल और पराक्रम में वृद्धि।।११९।। यज्ञदीक्षा विवाहश्च राज्यश्रीधनसम्पदः । चन्द्रस्यान्तर्गते मन्दे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे ।।१२०।। यज्ञ, दीक्षा, विवाह, राज्य, लक्ष्मी आदि की प्राप्ति होती है चन्द्रमा की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये।।१२०।। अथचन्द्रदशायांशन्यन्तर्दशाफलम् – स्वक्षेत्रेवा स्वांशगे चैव मन्दे तुङ्गांशगेऽथवा । शुभदृष्टियुते वापि लाभे वा बलसंयुते ।।१२१।। अपनी राशि वा अपने नवांश वा अपने उच्चांश में गये हुये शुभग्रह से दृष्ट वा युत ११ भाव में बलवान शनि के अन्तर में।।१२१।। पुत्रमित्रार्थसम्पत्तिः शूद्रप्रभुसमागमम् । व्यवसायात्फलाधिक्यं गृहक्षेत्रादिवृद्धिकृत् ।।१२२।। पुत्र मित्र धन सम्पत्ति का लाभ, शूद्रवर्ण के राजा से संगति, व्यवसाय से लाभ, गृह, भूमि का लाभ।।१२२।। पुत्रलाभं च कल्याणं राजानुग्रह वैभवम् । षष्ठाष्टमव्यये मन्दे नीचे वा धनगेऽपि वा ।।१२३।।

४६६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । पुत्र का लाभ कल्याण तथा राजा के अनुग्रह से वैभव का लाभ होता है ६।८।१२ स्थान में अपनी नीच राशि वा २ रे भाव में शनि हो तो।।१२३।। तद्वृत्त्यादौ पुण्यतीर्थे स्नानं चैव तु दर्शनम् । अनेकजनत्रासश्च शस्त्रपीडा भविष्यति ।।१२४।। उसके अन्तर के आरम्भ में पुण्यतीर्थ का स्नान और दर्शन होता है। अनेक लोगों का भय तथा हथियार से पीड़ा होती है।।१२४।। दायेशात्केन्द्रराशिस्ये त्रिकोण वलगेऽपि वा । क्वचित्सौख्यं धनाप्तिश्चदारपुत्रविरोधकृत् ।।१२५।। दशेश से केन्द्र या त्रिकोण में बली हो तो कभी सुख धन का लाभ, स्त्री पुत्रादि से विरोध होता है।।१२५।। द्वितीयद्यूनरन्ध्रस्थे देहबाधा भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं मृत्युंजयजपं चरेत् । कृष्णां गां महिषीं दद्याद्दानेनारोग्यमादिशेत् ।।१२६।। २।७।८ भाव में हो तो देह में रोगादि का भय होता है। इस दोष के शान्त्यर्थ मृत्युंजय का जप, काली गौ, भैंस का दान करने से आरोग्यता होती है।।१२६।। अथचन्द्रदशायांबुधान्तर्दशाफलम् - चन्द्रस्थान्तर्गते सौम्ये केन्द्रलाभत्रिकोणगे । स्वर्क्षे नवांशके सौम्ये तुङ्गे वा बलसंयुते ।।१२७।। चन्द्रमा की दशा में अपनी राशि, वा अपने नवांश वा अपनी उच्चराशि में बलवान्। बुध केन्द्र वा त्रिकोण में हो तो उसके अन्तर में।।१२७।। धनागमं राजमानं प्रियवस्त्रादिलाभकृत् । विद्याविनोदसङ्गोष्ठी ज्ञानवृद्धिः सुखावहा ।।१२८।। धन का आगमन, राज्यलाभ, प्रियवस्त्रों का लाभ होता है। विद्या विनोद, अच्छी सभा, ज्ञान में वृद्धि, सुख।।१२८।। सन्तानप्राप्ति सन्तोषं वाणिज्याद्धनलाभकृत् । वाहनच्छत्रसंयुक्तं नानालंकारभूषितम् ।।१२९।। सन्तान का लाभ, सन्तोष, व्यापार से धन का लाभ, वाहन, छत्र से युक्त अनेक आभूषणों का लाभ होता है।।१२९।।

अथान्तर्दशाफलविचारोध्यायः । ४६७ दायेशात्केन्द्रकोणे वा लाभे वा धनगेऽपि वा । विवाहं यज्ञदीक्षां च दानधर्मशुभादिकम् ।।१३०।। दशेश से केन्द्र वा त्रिकोण वा लाभ स्थान में वा धन स्थान में बुध हो तो विवाह यज्ञ, दीक्षा, दान, धर्म आदि शुभकार्य ।।१३०।। राजप्रीतिकरं चैव विद्वज्जन समागमम् । मुक्तामणिप्रवालानि वाहनाम्बरभूषणम् ।।१३१।। राजा से प्रेम, विद्वानों का समागम, मुक्ता, मणि, मूंगा, वाहन, वस्त्र, आभूषण का लाभ होता है।।१३१।। आरोग्यप्रीतिसौख्यं च सोमपानादिकं सुखम् । दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्यये वा नीचगेऽपि वा ।।१३२।। आरोग्यता, प्रसन्नता, सुख और सोमपान आदि का लाभ होता है। दशेश से ६।८।१२ भाव में वा अपनी नीच राशि में बुध हो तो।।१३२।। तद्भुक्तौ देहबाधा च कृषिगोभूमिनाशनम् । कारागृहप्रवेशं च दारपुत्रादि पीडनम् ।।१३३।। उसके अन्तर में शरीर में बाधा, कृषि, गौ, भूमि का नाश जेल यात्रा, स्त्री पुत्र आदि को कष्ट होता है।।१३३।। द्वितीयद्यूननाथे च ज्वरपीडां महद्भयम् । छागदानं प्रकुर्वीत विष्णुसाहस्त्रकं जपेत् ।।१३४।। २ वा ७ भाव का स्वामी हो तो ज्वर से पीड़ा और बड़ा भय होता है। शान्त्यर्थ बकरी का दान और विष्णु सहस्त्र नाम का जप कराना चाहिये।।१३४।। अथचन्द्रदशायांकेत्वन्तर्दशाफलम्- चन्द्रस्यान्तर्गते केतौ केन्द्रलाभ त्रिकोणगे । दुश्चिक्ये बलसंयुक्ते धनलाभं महत्सुखम् ।।१३५।। चन्द्रमा की दशा में केन्द्र वा त्रिकोण में वा ३ रे भाव में बलवान् केतु के अन्तर में धन का लाभ, बड़ा सुख होता है।।१३५।। पुत्रदारादि सौख्यं च मित्रकर्म करोति च । भुक्त्यादौ धनहानिः स्यान्मध्यगे सुखमाप्नुयात् ।।१३६।। पुत्र, स्त्री को सुख, मित्रों के कार्य को करता है। अन्तर के आरम्भ में धन की हानि और मध्य में सुख होता है।।१३६।।

४६८- \qquad बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । दायेशात्केन्द्रलाभे वा त्रिकोणे बलसंयुते । क्वचित्फलं दशादौ तु दारसौख्यंसुखावहम् ।।१३७।। दशेश से केन्द्र या एकादश वा त्रिकोण में बलवान् हो तो कभी दशा के आरंभ में ही स्त्री को सुख आदि शुभ फल होते हैं।।१३७।। गोमहिष्यादिलाभं च भुक्त्यन्ते चाथनाशनम् । पापयुक्तेऽथवा दृष्टे दायेशाद्रन्ध्ररिष्फगे ।।१३८।। गौ भैंस आदि का लाभ तथा दशा के अन्त में धन की हानि होती है। पापग्रह से युक्त वा दृष्ट हो और दशेश से २ या १२ भाव में हो तो।।१३८।। हीनशत्रुत्वकार्याणि अकस्मात्कलहं ध्रुवम् । द्वितीयद्यूनराशिस्थे अनारोग्यं महद्भयम् । मृत्युञ्जयजपं प्रकुवीते सर्वसम्पत्प्रदायकम् ।।१३९।। हीन कार्य शत्रुता करने वाले कार्य को करता है और अकस्मात् झगड़ा होता है। २ रे ये ७ वें भाव में हो तो कष्ट और बड़ा भय होता है। मृत्युंजय का जप कराने से सब प्रकार के सुख का अनुभव होता है।।१३९।। चन्द्रस्यान्तर्गते शुक्रे केन्द्रलाभत्रिकोणगे । स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे वापि राज्यलाभं करोति च ।।१४०।। यदि चन्द्रमा की दशा में केन्द्र या त्रिकोण वा अपने उच्चराशि अपने राशि में गये हुये शुक्र का अन्तर हो तो राज्यलाभ होता है।।१४०।। महाराजप्रसादेन वाहनाम्बरभूषणम् । चतुष्पाज्जीवलाभं स्याद्दारपुत्रादिवर्धनम् ।।१४१।। नूतनागारनिर्माणं नित्यं मिष्टान्नभोजनम् । सुगन्धपुष्पदायादिरम्यस्त्र्यारोग्यसम्पदाम् ।।१४२।। महाराजा की प्रसन्नता से वाहन, वस्त्र, आभूषण का लाभ, चतुष्पद जीव का लाभ, स्त्री पुत्रादि की वृद्धि। नूतन मकान का निर्माण होता है, नित्य मिठाई खाने को प्राप्त होती है। सुगन्धित पुष्प, दायाद, सुन्दर स्त्री, आरोग्यता और सम्पत्ति का लाभ होता है।।१४२।। दशाधिपेन संयुक्ते देहसौख्यं महत्सुखम् । सत्कीर्त्तिर्मुखसम्पत्तिर्गृहक्षेत्रादि वृद्धिकृत् ।।१४३।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४६९ दशेश के साथ शुक्र हो तो देह का सुख, बड़ा हर्ष, अच्छी कीर्त्ति, सुखं सम्पत्ति का लाभ, गृह, भूमि की वृद्धि होती है।।१४३।। धनस्थानगते शुक्रे स्वोच्चे स्वक्षेत्रसंयुते । निधिलाभं महत्सौख्यं भूलाभं पुत्रसम्भवम् ।।१४४।। यदि शुक्र धन स्थान में अपनी उच्चराशि वा अपनी राशि में हो तो निधि (गड़ा धन) का लाभ, सुख, भूमि का लाभ, पुत्र का लाभ होता है।।१४४।। भाग्यलाभाधिपैर्युक्ते भाग्यवृद्धिकरो भवेत् । महाराजप्रसादेन इष्टसिद्धिः सुखावहः ।।१४५।। यदि भाग्येश वा लाभेश से युक्त हो तो भाग्य की वृद्धि करता है महाराज की प्रसन्नता से इष्ट की सिद्धि होती है।।१४५।। देवब्राह्मणभक्तिश्च मुक्ताविद्रुमलाभकृत् । दायेशाल्लाभगे शुक्रे त्रिकोणे केन्द्रगेऽपिवा ।।१४६।। देवता ब्राह्मण में भक्ति होती है। मोती-मूंगा का लाभ होता है। दशेश से लाभ स्थान में शुक्र हो वा त्रिकोण वा केन्द्र में हो तो।।१४६।। गृहक्षेत्राभिवृद्धिश्च वित्तलाभं महत्सुखम् । नीचेवास्तंगते शुक्रे पापग्रहयुतेक्षिते ।।१४७।। गृह-भूमि में वृद्धि, धन का लाभ और सुख होता है। यदि शुक्र अपनी नीची राशि वा अस्त हो, पापग्रह से युत वा दृष्ट हो।।१४७।। भूनाशं पुत्रमित्रादिनाशनं पत्निनाशनम् । दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थेव्यये वा पापसंयुते ।।१४८।। तो भूमि का नाश, पुत्र मित्र आदि का नाश और स्त्री का नाश होता है। दशेश से ६।८।१२ वें पापग्रह से युत हो तो।।१४८।। विदेशवास दुःखार्ति मृत्युचौरादिपीडनम् । द्वितीयद्यूननाथे तु अपमृत्युभयं भवेत् ।।१४९।। विदेश में वास, दुःख, पीड़ा, मृत्यु, चौरादि से पीड़ा होती है। २।७ भाव का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है।।१४९।। तद्दोषोपशान्त्यर्थं रुद्रजाप्यं च कारयेत् । श्वेतां गां रजतं दद्याच्छान्तिं प्राप्नोत्यसंशयः ।।१५०।। इस दोष के शान्त्यर्थ रुद्र जप, सफेद गौ, चाँदी का दान करने से निश्चय ही शान्ति प्राप्त होती है।।१५०।।

४७० वृहतत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ चन्द्रदशायांसूर्यान्तर्दशाफलम्- चन्द्रस्यान्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रसंयुते । केन्द्रत्रिकोणलाभे वा धने वा सोदरे बले ।।१५१।। चन्द्रमा की दशा में अपने उच्च या अपने राशि में गये हुये केन्द्र या त्रिकोण या लाभ में वा धन वा तीसरे भाव में बैठे हुये बली सूर्य के अन्तर में ।।१५१।। नष्टराज्य धनप्राप्तिं गृहे कल्याण शोभनम् । मित्रराजप्रसादेन ग्रामभूम्यादिलाभकृत् ।।१५२।। नष्ट हुये राज्य और धन का लाभ, गृह में कल्याण का अनुभव होता है तथा मित्र और राजा की प्रसन्नता से ग्राम भूमि आदि का लाभ ।।१५२।। गर्भाधानकलत्राप्तिर्गृहे लक्ष्मीकटाक्षकृत् । भुक्त्यन्ते देहजाड्यत्वं ज्वरपीडा भविष्यति ।।१५३।। स्त्री की प्राप्ति और गर्भ की संभावना होती है; गृह में लक्ष्मी का वास होता है। दशा के अन्त में शरीर में जड़ता और ज्वर से पीड़ा होती है।।१५३।। दायेशाद्रिपुरन्ध्रस्थे व्ययेवा पापसंयुते । नृपचौराग्निभीतिश्च ज्वररोगादिसम्भवम् ।।१५४।। दशेश से ६।८।१२ वें भाव में पापग्रह से युत हो तो राजा, चोर अग्नि का भय, ज्वररोग की सम्भावना।।१५४।। विदेशगमनंचार्त्तिः लभते फल वैभयम् । द्वितीयद्यूननाथे तु ज्वरपीडा भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं शिवपूजां च कारयेत् ।।१५५।। विदेश यात्रा और कष्ट तथा भय होता है। यदि २।७ भाव का स्वामी हो तो ज्वर पीड़ा होती है। इस दोष के शान्त्यर्थ शिवजी का पूजन करना चाहिये।।१५५।। इति चन्द्रान्तर्दशाफलम् । अथ भौमदशायां भौमान्तर्दशाफलम् - कुजस्यान्तर्गते भौमे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । लाभे वा धन संयुक्ते दुश्चिक्ये शुभसंयुते ।।१५६।।

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४७१ भौम की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण वा लाभ वा धन वा ३रे भाव में शुभग्रह से युत।।१५६।। लग्नाधिपेन संयुक्ते राजानुग्रहवैभवम् । लक्ष्मीकटाक्षचिन्हानि नष्टराज्यार्थलाभकृत् ॥१५७॥ वा लग्नेश से युत भौम के अन्तर में राजा की कृपा से वैभव, लक्ष्मी के आगमन का चिह्न, नष्ट हुये राज्य की प्राप्ति।।१५७।। पुत्रोत्सवादिसन्तोषं गृहे गोक्षीरसंकुलम् । स्वोच्चे वा स्वर्शगे भौमे स्वांशे वा वलसंयुते ॥१५८॥ पुत्रोत्पत्ति का उत्सव, सन्तोष, गृह में गौ, दूध आदि का संग्रह, यदि अपने उच्च वा अपने राशि वा अपने नवांश में बली भौम हो।।१५८।। गृहक्षेत्राभिवृद्धिश्च गोमहिष्यादि लाभकृत् । महाराजप्रसादेन इष्टसिद्धिः सुखावहा ॥१५९॥ गृह, खेत, भूमि में वृद्धि, गौ, भैंस आदि का लाभ और महाराजा की प्रसन्नता से इष्ट की सिद्धि और सुख होता है।।१५९।। षष्ठाष्टमव्यये भौमे पापद्ग्योगसंयुते । मूत्रकृच्छ्रादिरोगश्च मेहाधिक्यं व्रणाद्वयम् ॥१६०॥ यदि ६।८।१२ भाव में पापग्रह से दृष्टयुत भौम हो तो मूत्रकृच्छ (सुजाक), प्रमेह और फोड़ा से भय।।१६०।। चौराहिराजपीडाच धनधान्यपशुक्षयम् । द्वितीयद्यूननाथे तु देहजाड्यं मनोरुजम् ॥१६१॥ चोर, सर्प राजा से कष्ट, धनधान्य और पशु की हानि होती है। द्वितीय, सप्तम का स्वामी हो तो शरीर में जड़ता और मानसिक कष्ट होता है।।१६१।। तद्दोषपरिहारार्थं रुद्रजाप्यं च कारयेत् । अनड्वाहं प्रदद्याच्च कुजदोष निवृत्तये । आरोग्यं कुरुते तस्य सर्वसम्पत्तिदायकम् ॥१६२॥ इस दोष की शान्ति के लिये रुद्रजप करावे, बैल का दान करे इससे भौम के दोष की निवृत्ति होकर शरीर आरोग्य होता है और सभी सम्पत्ति का लाभ होता है।।१६२।।

४७२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ भौमदशायांराह्वन्तर्दशाफलम् - भौमस्यान्तर्गते राहौ स्वोच्चे मूलत्रिकोणगे । शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे केन्द्रलाभत्रिकोणगे ॥१६३॥ भौम की दशा में अपने उच्च, मूलत्रिकोण में शुभग्रह से युत वा दृष्ट केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये राहु के अन्तर में॥१६३॥ तत्काले राजसन्मानं गृहभूम्यादिलाभकृत् । कलत्रपुत्रलाभः स्याद्व्यवसायात्फलाधिकम् ॥१६४॥ राजा के सम्माने, गृह, भूमि आदि का लाभ, स्त्री, पुत्र का लाभ तथा रोजगार से अधिक लाभ होता है॥१६४॥ गङ्गास्नानफलावाप्तिं विदेशगमनं तथा । षष्ठाष्टमव्यये राहौ पापयुक्तेऽथ वीक्षिते ॥१६५॥ गंगा स्नान का लाभ और विदेश की यात्रा होती है। यदि भौम ६।८।१२ भाव में पापयुक्त वा पापदृष्ट हो तो॥१६५॥ चौरादिब्रणभीतिश्च चतुष्पाज्जीवनाशनम् । वातपित्तक्षयं चैव कारागृह निवेशनम् ॥१६६॥ चोर, फोड़ा आदि का भय, चतुष्पद की हानि, वात, पित्त की हानि, जेल यात्रा॥१६६॥ धनस्थानगते राहौ धननाशं महद्भयम् । द्वितीये द्यूनगेवापि ह्यपमृत्युभयं महत् ॥१६७॥ धन स्थान में राहु हो तो धन का नाश और भय होता है २।७ भाव में हो तो अपमृत्यु का भय होता है॥१६७॥ नागदानं प्रकुर्वीत देवब्राह्मण भोजनम् । मृत्युंजयं जपं कुर्यादायुरारोग्य प्राप्तये ॥१६८॥ इसके शान्त्यर्थ नाग की मूर्त्ति का दान, ब्राह्मण भोजन, मृत्युंजय का जप कराना चाहिये॥१६८॥ अथ भौमदशायांगुर्वन्तर्दशाफलम् - भौमस्यान्तर्गते जीवे त्रिकोणे केन्द्रमेऽपि वा । लाभे वा धनसंयुक्ते तुङ्गाशे स्वांशभेऽपि वा ॥१६९॥ मंगल की दशा में गुरु का अन्तर हो और यदि गुरु त्रिकोण में वा केन्द्र में -

अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४७३ वा एकादश भाव वा द्वितीय भाव में अपने उच्चांश में वा अपने अंश में हो तो।।१६९।। सत्कीर्त्ति राजसन्मानं धनधान्यस्यवृद्धिकृत् । गृहेकल्याणसम्पत्तिर्दारपुत्रादिलाभकृत् ।।१७०।। श्रेष्ठ कीर्ति, राजा से सम्मान, धनधान्य की वृद्धि होती है। और गृह में कल्याण, सम्पत्ति, स्त्री पुत्र आदि का लाभ होता है।।१७०।। दायेशात्केन्द्रराशिस्ये त्रिकोणेलाभगेऽपि वा । भाग्यकर्माधिपैर्युक्ते वाहनाधिपसंयुते ।।१७१।। यदि गुरु दशेश से केन्द्र वा त्रिकोण वा लाभ में भाग्येश कर्मेश से युत हो वा सुखेश से युत हो।।१७१।। लग्नाधिपसमायुक्ते शुभांशे शुभवर्गगे । गृहक्षेत्राभिवृद्धिश्च गृहे कल्याणसम्पदः ।।१७२।। वा लग्नेश से युत हो शुभग्रह के अंश में शुभग्रह के वर्ग में हो तो गृह क्षेत्र आदि की वृद्धि गृह में कल्याण सम्पत्ति।।१७२।। देहारोग्यं महत्कीर्तिर्गेहे गोकुलसंग्रहः । चतुष्पाज्जीवलाभ स्याद्व्यवसायात्फलाधिकम् ।।१७३।। शरीर में आरोग्यता, महान कीर्त्ति, गौओं की वृद्धि, व्यवसाय करने से अधिक लाभ।।१७३।। कलत्रपुत्रविभवं राजसन्मान वैभवम् । षष्ठाष्टमव्यये जीवे नीचे वास्तंगते यदि ।।१७४।। स्त्री पुत्रादि का सुख और राजा से सम्मान और वैभव की प्राप्ति होती है। यदि गुरु ६।८।१२ स्थान में अपनी नीच राशि में वा अस्तंगत हो।।१७४।। पापग्रहेणसंयुक्ते दृष्टे वा दुर्बले यदि । चौरादिनृपभीतिश्च पित्तरोगार्दि सम्भवम् ।।१७५।। पापग्रह से युक्त दृष्ट हो वा दुर्बल हो तो चौरादिकों से और राजा से भय होता हैं, पित्त के रोगों की संभावना होती है।।१७५।। प्रेतवाधां भृत्यनाशं सोदराणां विनाशनम् । द्वितीयद्यूननाथे तु अपमृत्युज्वरादिकम् । तद्दोषपरिहारार्थ शिवसाहस्रकं जपेत् ।।१७६।।