बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
४७६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । नीतिमार्गप्रसङ्गश्च नित्यं मिष्टान्नभोजनम् । वाहनाम्बरपश्वादिराजकर्म सुखानि च ॥१९०॥ नीति मार्ग का अवलम्बन और नित्य मिष्टान्न का भोजन, वाहन, वस्त्र, पशु का लाभ, राजकार्य में व्यस्त और सुख॥१९०॥ कृषिकर्मफलं सिद्धिर्वारणाम्बरभूषणम् । नीचे वास्तंगते वापि षष्ठाष्टव्ययगेऽपि वा ॥१९१॥ कृषि कर्म में प्रवृत्ति और भूषणादि तथा वाहन की प्राप्ति होती है। यदि बुध नीच वा अस्त हो अथवा ६।८।१२ भाव में हो तो॥१९१॥ हृद्रोगं मानहानिश्च निगडं बन्धुनाशनम् । दारपुत्रार्थनाशः स्याच्चतुष्पाज्जीवनाशनम् ॥१९२॥ हृदय रोग, धन की हानि, बंधन, बन्धुओं की हानि, स्त्री पुत्र चतुष्पद का नाश होता है॥१९२॥ दशाधिपेन संयुक्ते शत्रुबुद्धिर्महद्भयम् । विदेशगमनं चैव नानारोगस्तथैव च ॥१९३॥ दशेश से युक्त हो तो शत्रुता की वृद्धि, और भय, विदेशयात्रा, अनेक रोग॥१९३॥ राजद्वारे विरोधश्च कलहः सौम्यमुक्तिषु । दायेशात्केन्द्रकोणे वा स्वोच्चे युक्तार्थलाभकृत् ॥१९४॥ राजा से विरोध और कलह होता है। दशेश से केन्द्र वा अपने उच्च में हो तो धन का लाभ॥१९४॥ अनेकधननाथत्वं राजसन्मानमेव च । भूपालयोगं कुरुते धनाम्बरविभूषणम् ॥१९५॥ अनेक धनी संस्थाओं का स्वामी। राजा से सम्मान, राजयोग का सुख, धन- वस्त्र आभूषण का लाभ॥१९५॥ भूरिवाद्यमृदङ्गादि सेनापत्यं महत्सुखम् । विद्याविनोदविमला वस्त्रवाहनभूषणम् ॥१९६॥ बहुत से बाजों मृदङ्ग आदि का सुख सेनापतित्व और बड़ा सुख, विद्या का विनोद, वस्त्र, वाहन आभूषण॥१९६॥
अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४७७ दारपुत्रादिविभवं गृहेलक्ष्मीकटाक्षकृत् । दायेशात्षष्ठरिःफस्थे रन्ध्रे वा पापसंयुते ।।१९७।। स्त्री, पुत्र आदि का सुख और गृह में लक्ष्मी का प्रवेश होता है। दशेश से ६।१२।८ स्थान में पापग्रह से युत हो तो।।१९७।। तद्दाये मानहानिस्यात्क्रूरबुद्धिस्तु क्रूरवाक् । चौराग्निनृपपीडा च मार्गे चौरभयादिकम् ।।१९८।। बुध के अन्तर में मानहानि, दुष्टबुद्धि होती है कटुवचन, चोर, अग्नि, राजा से पीडा, मार्ग में चोरों का भय।।१९८।। अकस्मात्कलहश्चैव बुधभुक्तौ न संशयः । द्वितीयद्यूननाथेतु महाव्याधिर्भयंकरा ।।१९९।। अकस्मात् कलह होता है इसमें संशय नहीं है। यदि बुध २।१२ भाव का स्वामी हो तो महाभयंकर व्याधि होती है।।१९९।। अश्वदानं प्रकुर्वीत विष्णोर्नामसहस्रकम् । सर्वसम्पत्प्रदं सौख्यं सर्वारिष्टप्रशांतिदम् ।।२००।। इसके शान्त्यर्थ अश्वदान करना चाहिये और विष्णुसहस्रनाम का पाठ करने से सभी प्रकार की सम्पत्तियों का लाभ और सभी अरिष्टों का नाश होता है।।२००।। अथ भौमदशायांकेन्वन्तर्दशाफलम्- कुजस्यान्तर्गते केतौ त्रिकोणे केन्द्रगेऽपि वा । दुश्चिक्ये लाभगे वापि शुभयुक्ते शुभेक्षिते ।।२०१।। भौम की दशा में त्रिकोण वा ३ वा ११ भाव में गये हुये शुभग्रह से युक्त दृष्ट केतु के अन्तर में।।२०१।। राजानुग्रहशान्तिश्च बहुसौख्यं धनागमम् । किञ्चित्फलं दशादौ तु भूलाभं पुत्र लाभकृत् ।।२०२।। राजा की कृपा से शान्ति और बहुत सुख की प्राप्ति, धन का आगमन होता है। कुछ फल दशा के आदि में होता है बाद में भूमि लाभ, पुत्र का लाभ होता है।।२०२।। राजसंलाभकार्याणि चतुष्पाज्जीवलाभकृत् । योगकारकसंस्थाने बलवीर्यसमन्विते ।।२०३।।
४७८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । राज्यं लाभकारी कार्यों में संलग्न चतुष्पद जीवों का लाभ होता है योगकारक के स्थान में बलवान् केतु के रहने से॥२०३॥ पुत्रलाभो यशोवृद्धिर्गृहे लक्ष्मीकटाक्षकृत् । भृत्यवर्गधनप्राप्तिः सेनापत्यं महत्सुखम् ।।२०४।। पुत्र का लाभ, यश की वृद्धि, गृह में लक्ष्मी का प्रवेश, नौकरों द्वारा भी धन का लाभ॥२०४॥ भूपालमित्रं कुरुते यानाम्बर विभूषणम् । दायेशात्षष्ठरिःफस्थे रन्ध्रे वा पापसंयुते ।।२०५।। राजा से मित्रता और यज्ञ आदि से वस्त्र आभूषण का लाभ होता है। दशेश से ६।१२।८ स्थान में पापग्रह से युत हो तो॥२०५॥ कलहो दन्तरोगश्च चौरव्याघ्रादिपीडनम् । ज्वरातिसारकुष्ठादिदारपुत्रादिपीडनम् ।।२०६।। कलह दांत में रोग, चोर व्याघ्र से पीड़ा होती है। ज्वरातिसार और कुष्ठ रोग होता है, स्त्री पुत्रादि को पीड़ा होती है॥२०६॥ द्वितीयसप्तमस्थाने देहे व्याधिर्भविष्यति । सन्मानं धनसन्तापं धनधान्यस्य प्रच्युतिम् । मृत्युंजयं प्रकुर्वीत सर्वसम्पत्प्रदायकम् ।।२०७।। २।७ स्थान में हो तो शरीर में व्याधि का भय, धन का संताप, धन-धान्य की हानि होती है। इसके शान्त्यर्थ भी सम्पत्ति को देने वाले मृत्युंजय मंत्र का जप कराना चाहिये॥२०७॥ अथभौमदशायांशुक्रान्तर्दशाफलम्- कुजस्यान्तर्गते शुक्रे केन्द्रलाभत्रिकोणगे । स्वोच्चे वा स्वक्षेंगे वापि शुभस्थानाधिपेऽथवा ।।२०८।। भौम की दशा में केन्द्र, लाभ, त्रिकोण वा अपने उच्च, अपनी राशि में गये हुये शुक्र के अन्तर में वा शुभ स्थान के स्वामी शुक्र के अन्तर में॥२०८॥ राज्यलाभं महत्सौख्यं गजाश्वाम्बरभूषणम् । लग्नाधिपेन सम्बन्धे पुत्रदारादिवर्धनम् ।।२०९।। राज्य का लाभ, बड़ा सुख, हाथी, घोड़ा, वस्त्र, आभूषण का सुख होता है। लग्नेश से संबन्ध करता हो तो पुत्र, स्त्री आदि की वृद्धि॥२०९॥
अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४७९ आयुषो वृद्धिंरैश्वर्यं भाग्यवृद्धिसुखं भवेत् । दायेशात्केन्द्रलाभस्थे कोणेवा धनगेऽपि वा ॥२१०॥ आयुष्य की वृद्धि, ऐश्वर्य और भाग्यवृद्धि तथा सुखं होता है। दशेश से केन्द्र लाभ, त्रिकोण वा धन स्थान में हो तो।।२१०।। तत्काले श्रियमाप्नोति पुत्रलाभं महत्सुखम् । स्वप्रभोश्च महत्सौख्यं श्वेतवस्त्रादिलाभकृत् ॥२११॥ तत्काल लक्ष्मी की प्राप्ति पुत्र का लाभ और बहुत सुख होता है। अपने स्वामी की कृपा से बड़ा सुख सफेद वस्त्र आदि का लाभ होता है।।२११।। महाराजप्रसादेन ग्रामभूम्यादिलाभदम् । मुक्त्यन्ते फलमाप्नोतिगीतनृत्यादिलाभकृत् ॥२१२॥ राजा की कृपा से ग्राम, भूमि आदि का लाभ होता है, दशा के अन्त में गती, नृत्य आदि का सुख ।।२१२।। पुण्यतीर्थस्नानलाभं कर्माधिपसमन्विते । दानधर्मदयापुण्यं तडागं कारयिष्यति ॥२१३॥ पुण्यतीर्थ में स्नान का लाभ होता है। कर्मेश से युक्त हो तो दान, धर्म, दया, पुण्य होता है और तालाब आदि को बनवाता है।।२१३।। दायेशाद्रन्ध्ररिःफस्थे षष्ठे वा पापसंयुते । करोति दुःखबाहुल्यं देहपीडां धनक्षयम् ॥२१४॥ दशेश से ८।१२।६ स्थान में पापग्रह से युत हो तो अत्यन्त दुःख, शरीर में पीड़ा, धन का नाश।।२१४।। राजचौरादिभीतिश्च गृहे कलहमेव च । दारपुत्रादिपीडा च गोमहिष्यादिनाशकृत् ॥२१५॥ राजा, चोर का भय, घर का कलह, स्त्री पुत्रादि को कष्ट, गौ, भैंस आदि का नाश होता है।।२१५।। द्वितीयद्यूननाथे तु देहबाधा भविष्यति । श्वेतां गां महिषीं दद्यादायुरारोग्यप्राप्तये ॥२१६॥ २।७ भाव का स्वामी हो तो शरीर की बाधा होती है। इसकी शान्ति के लिये सफेद गौ सफेद भैंस का दान करना चाहिये।।२१६।।
४८० वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ भौमदशायां सूर्य्यान्तर्दशाफलम्- कुजस्यान्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे । मूलत्रिकोणलाभे वा भाग्यकर्मेशसंयुते ॥२१७॥ भौम की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में वा केन्द्र वा मूलत्रिकोण वा लाभ स्थान में गये हुये भाग्येश कर्मेश से युत सूर्य के अन्तर में॥२१७॥ तद्भुक्तौ वाहनं कीर्त्तिः पुत्रलाभं च विंदति । धनधान्यसमृद्धिः स्याद्गृहे कल्याणसम्पदः ॥२१८॥ वाहन, यश और पुत्र का लाभ होता है। धन धान्य आदि समृद्धि का लाभ, गृह में कल्याण॥२१८॥ क्षेमारोग्यं महैश्वर्यं राजपूज्यं महत्सुखम् । व्यवसायात्फलाधिक्यं विदेशे राजदर्शनम् ॥२१९॥ कुशल आरोग्यता, महाऐश्वर्य, राजा से पूजा, सुख, विदेश में रोजगार से लाभ और राजा का दर्शन होता है॥२१९॥ दायेशात्षष्ठरिःफेवा रन्ध्रे वा पापसंयुते । देहपीडा मनस्तापः कार्यहानिर्महद्भयम् ॥२२०॥ दशेश से ६।१२।८ स्थान में पापग्रह से युत हो तो शरीर में पीड़ा मन में संताप, कार्य की हानि, भय॥२२०॥ शिरोरोगं ज्वरादिश्च अतीसारमथापि वा । द्वितीयद्यूननाथे तु सर्पज्वरविषाद्भयम् ॥२२१॥ शिर में रोग, ज्वर और अतिसार होता है। २।७ भाव के स्वामी हों तो सर्प, ज्वर, विष से भय॥२२१॥ सुतपीडाकरं चैव शान्तिं कुर्याद्यथाविधि । देहारोग्यं प्रकुरुते धनधान्य समृद्धिदम् ॥२२२॥ पुत्र को पीड़ा होती हैं। इसकी यथाविधि शान्ति करने से देह में आरोग्यता और धन धान्य की वृद्धि होती है॥२२२॥ कुजस्यानन्तर्गते चन्द्रे स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे । भाग्यवाहनकर्मेशलग्नाधिपसमंन्विते ॥२२३॥ भौम की दशा में अपने उच्च वा अपनी राशि में केन्द्र में गये हुये भाग्य चतुर्थ, दशम, और लग्नेश से युक्त चन्द्रमा के अन्तर में॥२२३॥
अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४८१ करोति विपुलं राज्यं गन्धमाल्याम्बरीदिकम् । तडागं गोपुरादीनां पुण्यधर्मादिसंग्रहम् ॥२२४॥ बड़े राज्य का गंध, माल्य वस्त्रादि के साथ लाभ होता है, तालाब किला आदि का निर्माण होता है, पुण्य धर्म आदि होते हैं॥२२४॥ विवाहोत्सवकर्माणि दारपुत्रादिसौख्यकृत् । पितृमातृसुखप्राप्तिं गृहे लक्ष्मीकटाक्षकृत् ॥२२५॥ विवाहादि उत्सव होता है। स्त्री पुत्रादि का सुख होता है, पिता-माता का सुख होता है और गृह में लक्ष्मी का वास होता है॥२२५॥ महाराजप्रसादेन इष्टसिद्धिसुखादिकम् । पूर्णचन्द्रे पूर्णफलं क्षीणे स्वल्पफलं भवेत् ॥२२६॥ राजा की प्रसन्नता से अभीष्ट की सिद्धि होती है पूर्ण चन्द्रमा हो तो पूर्णफल और क्षीणचन्द्र हो तो अल्प फल होता है॥२२६॥ नीचारिस्थेऽष्टमे व्यये दायेशाद्रिपुरंध्रके । मरणं दारपुत्राणां कष्टं भूमतिनाशनम् ॥२२७॥ यदि चन्द्रमा नीच राशि. में ६।८।१२ भाव में वा दशेश से ६।८ भाव में हो तो अपने अन्तर में स्त्री पुत्र का मरण और भूमि की हानि होती है॥२२७॥ पशुधान्यक्षयं चैव चौरादिरणभीतिकृत् । द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युर्भविष्यति ॥२२८॥ पशु, धान्य का नाश चौर आदि का और संग्राम का भय होता है। २।७ भाव का स्वामी हो तो अकाल मृत्यु होती है॥२२८॥ देहजाड्यं मनोदुःखं दुर्गालक्ष्मीजपं चरेत् । श्वेतां गां महिषीं दद्याद्दानेनारोग्यमादिशेत् ॥२२९॥ देह जड़ता और मानसिक दुःख होता है। शान्ति के लिये दुर्गा और लक्ष्मी का जप, सफेद गौ और भैंस का दान कराना चाहिये इसके करने से आरोग्यता होती है॥२२९॥ • इति कुजदशायामन्तर्दशाफलम्। अथ राहुदशायांराह्वन्तर्दशाफलम्- कुलीरे वृश्चिके चैव कन्यायां वा चापगेहगेऽगौ । तद्भुक्तौ राजसन्मानं वस्त्रवाहनभूषणम् ॥२३०॥
४८२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । कर्क वा वृश्चिक वा कन्या वा धन में राहु हो तो राहु की दशा में राहु के ही अन्तर में राजा से सम्मान, वस्त्र, वाहन का लाभ होता है।।२३०।। व्यवसायात्फलाधिक्यं चतुष्पाज्जीवलाभकृत् । प्रयाणं पश्चिमे भागे वाहनाम्बरलाभकृत् ।।२३१।। व्यवसाय (रोजगार) से अधिक लाभ, चतुष्पद का लाभ होता है। पश्चिम दिशा की यात्रा होती है और उससे वाहन, वस्त्र का लाभ होता है।।२३१।। लग्नादुपचये राहौ शुभग्रहयुतेक्षिते । मित्रांशेतुङ्गलाभेशे योगकारकसंयुते ।।२३२।। लग्न से उपचय (३।६।१०।११) भाव में राहु शुभग्रह से युत दृष्ट हो वा मित्रांश में वा उच्चांश में लाभ दशम के अंश में हो और योगकारक से युत हो तो।।२३२।। राज्यलाभं महोत्साहं राजप्रीतिं शुभावहाम् । गृहे कल्याणसम्पत्तिर्दारपुत्रादिवर्धनम् ।।२३३।। राज्य का लाभ, उत्साह, और राजा से प्रेम होता है। गृह में कल्याण, सम्पत्ति, स्त्री पुत्र आदि की वृद्धि होती है।।२३३।। षष्ठाष्टमव्यये राहौ पापयुक्तेऽथवीक्षिते । चौरादिब्रणपीडाच सर्वत्र जनपीडनम् ।।२३४।। यदि राहु ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युत दृष्ट हो तो चोर आदि से, फोड़ा- आदि से पीड़ा और परिवार के लोगों को कष्ट होता है।।२३४।। राजद्वारजनद्वेष इष्टबन्धुविनाशनम् । दारपुत्रादिपीडा च सर्वत्र जनपीडनम् ।।२३५।। राजकर्मचारियों से शत्रुता अभीष्ट बंधु का नाश होता है, स्त्री पुत्रादि को पीड़ा और अपने लोगों को कष्ट होता है।।२३५।। द्वितीयद्यूननाथेतु सप्तमस्थानमाश्रितः । सदा रोगं महाकष्टं शांतिकुर्याद्यथाविधि । आरोग्यं सम्पदश्चैव भविष्यति न संशयः ।।२३६।। २।७ भाव का स्वामी हो और ७ वें भाव में बैठा हो तो सदा रोग और महाकष्ट होता है। इसकी शान्ति यथाविधि करने से आरोग्य और सम्पत्ति का लाभ होता है इसमें संशय नहीं।।२३६।।
अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४८३ अथराहुदशायांगुर्वन्तरफलम्- राहोरन्तर्गते जीवे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे वापिसुतुङ्गांशेस्वांशगेपिवा ।।२३७।। राहु की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में वा अपनी उच्चराशि वा अपनी राशि में वा उच्चांश वा अपने नवांश में गये हुये गुरु के अन्तर में ।।२३७।। स्थानलाभं मनोधैर्यं शत्रुनाशं महत्सुखम् । राजप्रीतिकरं सौख्यं महतीव समश्नुते ।।२३८।। स्थान का लाभ, मन में धैर्य, शत्रु का नाश, अत्यंत सुख, राजा से प्रीति, सुख होता है।।२३८।। दिने दिने वृद्धिरपि शुक्लपक्षे शशी यथा । वाहनादि धनं भूरि गृहे गोधनसंकुलम् ।।२३९।। दिन दिन शुक्लपक्ष के चन्द्रमा के समान वृद्धि होती है। वाहनादि धन का लाभ और घर में गोधन की वृद्धि होती है।।२३९।। नैर्ऋत्यां पश्चिमे भागे प्रयाणं राजदर्शनम् । इष्टकार्यार्थसिद्धिः स्यात्स्वदेशे पुनरेष्यति ।।२४०।। नैऋत्य वा पश्चिम की यात्रा और राजा का दर्शन होता है। इष्टकार्य की सिद्धि हो जाने से पुनः स्वदेश को लौट आता है।।२४०।। उपकारो ब्राह्मणानां तीर्थयात्रादिकर्मणाम् । वाहनग्रामलाभश्च देवब्राह्मणपूजनम् ।।२४१।। ब्राह्मणों का उपकार तीर्थ यात्रादि कर्म होते हैं। वाहन, ग्राम का लाभ और देवता ब्राह्मण का पूजन होता है।।२४१।। पुत्रोत्सवादिसंतोषं नित्यं मिष्टान्नभोजनम् । नीचे वास्तंगते वापि षष्ठाष्टव्ययराशिगे ।।२४२।। पुत्रोत्सव आदि से सन्तोष और नित्यमिष्टान्न का भोजन होता है। यदि गुरु नीच में हो वा अस्त हो वा ६।८।१२ भाव में हो।।२४२।। शत्रुक्षेत्रे पापयुक्ते धनहानिर्भविष्यति । कर्मविघ्नो मानहानिः धनहानिर्भविष्यति ।।२४३।।
४८४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथवा शत्रु राशि में पापयुत हो तो धन की हानि होती है कार्य में विघ्न, मानहानि, धन की हानि होती है।।२४३।। कलत्रपुत्रपीडा च हृद्रोगं राजकार्यकृत् । दायेशात्केन्द्रकोणे वा लाभे वा धनगेऽपिवा ।।२४४।। स्त्री-पुत्र को पीड़ा, हृदय का रोग होता है। दशेश से केन्द्र, कोण में हो वा एकादश वा धन स्थान में हो।।२४४।। दुश्चिक्ये बलसम्पूर्णे गृहक्षेत्रादिवृद्धिकृत् । भोजनाम्बरपश्वादिदानधर्मजपादिकम् ।।२४५।। वा तीसरे भाव में हो बली हो तो गृह, क्षेत्र आदि की वृद्धि करता है भोजन, वस्त्र, पशु आदि का लाभ, दान, धर्म, जप आदि होते हैं।।२४५।। भुक्त्यंते राजकोपाच्च द्विमासं देहपीडनम् । ज्येष्ठभ्रातृविनाशं च भ्रातृपित्रादिपीडनम् ।।२४६।। अन्तर दशा के अन्त में २ मास शरीर में पीड़ा होती है। ज्येष्ठ भाई का नाश और भाई, पिता आदि को कष्ट होता है।।२४६।। दायेशात्षष्ठरन्ध्रे वा रिःफे वा पापसंयुते । तद्भुक्तौ धनहानिः स्याद्देहपीडा भविष्यति ।।२४७।। दशेश से ६।८।१२ भाव में पापग्रह से युत हो उसके अन्तर में धन की हानि शरीर में पीड़ा होती है।।२४७।। द्वितीयद्यूननाथे वा ह्यपमृत्युर्भविष्यति । स्वर्णस्य प्रतिमादानं शिवपूजां च कारयेत् । देहारोग्यं प्रकुरुते शांतिकुर्याद्विचक्षणः ।।२४८।। २।७ भाव का स्वामी हो तो अपमृत्यु होती है। सुवर्ण की गुरु की प्रतिमा (मूर्ति) का दान और शिव की पूजा करने से शरीर आरोग्य होता है अतः शान्ति कराना चाहिये।।२४८।। अथराहुदशायांशन्यन्तर्दशाफलम्- राहोरन्तर्गते मन्दे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । स्वोच्चे मूलत्रिकोणे वा दुश्चिक्ये लाभराशिगे ।।२४९।। राहु की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में वा अपने उच्च वा मूल त्रिकोण में वा तीसरे भाव में एकादशभाव में गये हुये।।२४९।।
अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४८५ तद्भुक्तौ वाहनं सेवा राजप्रीतिकरं शुभम् । विवाहोत्सव कार्याणि कृत्वापुण्यानिभूरिशः ॥२५०॥ शनि के अन्तर में वाहन, नौकरी राजा से प्रीति होती है। विवाह आदि अनेक पुण्य कार्यों को मनुष्य करता है॥२५०॥ आरामकरणे दक्षो तडागं कारयिष्यति । शूद्रप्रभुवशादिष्टलाभं गोधनसंग्रहम् ॥२५१॥ बगीचा और तालाब बनाने को उत्सुक होता है। शूद्र स्वामी से गोधन का संग्रह॥२५१॥ प्रयाण पश्चिमेभागे प्रभुमूलाद्धनक्षयः । देहायासं फलाल्पत्वं स्वदेशे पुनरेष्यति ॥२५२॥ और लाभ होता है। पश्चिम दिशा की यात्रा से स्वामी द्वारा धन की हानि, देह में शिथिलता अल्पफल को प्राप्त हो पुनः स्वदेश को आता है॥२५२॥ नीचारिक्षेत्रगे मन्दे रन्ध्रे वा व्ययगेऽपिवा । नीचारिराजभीतिश्च दारपुत्रादि पीडनम् ॥२५३॥ यदि शनि नीच वा शत्रु गृह में हो वा ८।१२ भाव में हो तो नीचशत्रु और राजा से भय होता है और स्त्री-पुत्र को पीड़ा होती है॥२५३॥ आत्मबन्धुमनस्तापं दायादजनविग्रहम् । व्यवहारे च कलहमकस्माद्भूषणं लभेत् ॥२५४॥ आत्मीय बन्धुओं के मनमें सन्ताप और दायादों से शत्रुता होती है। व्यवहार में कलह और अकस्मात् आभूषण का लाभ होता है॥२५४॥ दायेशात्षष्ठरिःफे वा रन्ध्रे वा पापसंयुते । हृद्रोगं मानहानिश्च विवादः शत्रुपीडनम् ॥२५५॥ दशेश से ६।१२।८ भाव में पापग्रह से युत हो तो हृदय का रोग, मानहानि, विवाद और शत्रु से पीड़ा होती है॥२५५॥ अन्यदेशप्रयाणं च गुल्मवद्व्याधिभागभवेत् । कुभोजनं कोद्रवादि जातिदुःखाद्भयं भवेत् ॥२५६॥ विदेश की यात्रा होती है। गुल्मरोग के समानव्याधि कोद्रव आदि कुत्सित भोजन और जातीय लोगों से दुःख का भय होता है॥२५६॥
४८६ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । द्वितीयद्यूननाथे तु ह्यपमृत्युर्भविष्यति । कृष्णां गां महिषीं दद्याद्दानेनारोग्यमादिशेत् ।।२५७।। २।७ भाव का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है। काली गौ और भैंस के दान करने से आरोग्यता का लाभ होता है।।२५७।। अथराहुदशायां बुधान्तर्दशाफलम्- राहोरन्तर्गते सौम्ये भाग्ये वा स्वक्षगेऽपिवा । तुङ्गे वा केन्द्रराशिस्थे पुत्रे वा लाभगेऽपिवा ।।२५८।। राहु की दशा में भाग्य (९) वा अपनी राशि, अपने उच्च, केन्द्र, पंचम वा एकादश में गये हुये।।२५८।। राजयोगं प्रकुरुते गृहे कल्याणवर्धनम् । व्यापारेण धनप्राप्तिर्विद्यावाहनमुत्तमम् ।।२५९।। बुध के अन्तर में राजयोग का उदय, नित्य कल्याण की वृद्धि, व्यापार से धन लाभ, विद्या और वाहन का लाभ, विवाहोत्सव आदि कार्य, चतुष्पदों का लाभ होता है।।२५९।। विवाहोत्सवकार्याणि चतुष्पाज्जीवलाभकृत् । सौम्यमासे महत्सौख्यं स्ववारे राजदर्शनम् ।।२६०।। बुध के मास में महासुख और बुध के दिन राजा का दर्शन।।२६०।। सुगन्धपुष्पशय्यादिस्त्रीसौख्यं चातिशोभनम् । महाराजप्रसादेन धनलाभो महद्यशः ।।२६१।। सुगन्ध पुष्प, शय्या, और स्त्री का सुख होता है, महाराज के प्रसाद से धन का लाभ और बड़ा यश होता है।।२६१।। दायेशात्केन्द्रलाभे वा दुश्चिक्येः भाग्यकर्मगे । देहारोग्यं हृदुत्साहं इष्टसिद्धिः सुखावहा ।।२६२।। दशेश से केन्द्र वा लाभ वा तीसरे वा ९।१० भाव में बुध शरीरारोग्यता, हृदय में उत्साह, इष्टसिद्धि और सुख होता है।।२६२।। पुण्यश्लोकादिकीर्त्तिश्च पुराणश्रवणादिकम् । विवाहो यज्ञदीक्षा च दानधर्मदयादिकम् ।।२६३।। पुण्य-श्लोक, कीर्ति और पुराण श्रवण, विवाह, यज्ञ-दीक्षा दान-धर्म दया आदि होता है।।२६३।।
अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४८७ षष्ठाष्टमव्यये सौम्ये मन्दराशियुतेक्षिते । दायेशात्षष्ठरिःफे वा रंध्रे वा पापसंयुते ॥२६४॥ ६।८।१२ वें भाव में बुध हो और शनि की राशि में शनि से दृष्ट हो अथवा दशेश से ६।१२।८ भाव में पापग्रह से युत हो तो ॥२६४॥ देवब्राह्मणनिन्दा च भोगभाग्यविहीनभाक् । सत्यहीनश्च दुर्बुद्धिश्चौराहिनृपपीडनम् ॥२६५॥ देवता-ब्राह्मण की निन्दा, भोगादि से विहीन, सत्य से हीन, दुर्बुद्धि का उदय, चोर, सर्प राजा से पीड़ा होती है॥२६५॥ अकस्मात्कलहश्चैव गुरुपुत्रादि नाशनम् । अर्थव्ययो राजकोपो दारपुत्रादिपीडनम् ॥२६६॥ अकस्मात् कलह, गुरु पुत्र आदि का नाश, होता है। द्रव्य का व्यय, राजा का कोप, स्त्री पुत्र आदि को पीड़ा होता है॥२६६॥ द्वितीयद्यूननाथे वा ह्यपमृत्युं तयाऽश्रियम् । तद्दोषपरिहारार्थं विष्णुसाहस्रकं जपेत् । स्वगृह्योक्तविधानेन शान्तिं कुर्याद्विचक्षणः ॥२६७॥ २।७ भाव का स्वामी हो तो अपमृत्यु और दरिद्रता होती है। इस दोष के शान्त्यर्थ विष्णुसहस्र नाम का जप और अपने शाखा के अनुसार शान्ति करना चाहिये॥२६७॥ अथराहुदशायांकेत्वन्तर्दशाफलम्- राहोरन्तर्गते केतौ भ्रमणं राजकृद्धनम् । वातज्वरादिरोगश्च चतुष्पाज्जीवहानिकृद् ॥२६८॥ राहु की दशा में केतु की अन्तर्दशा में भ्रमण और राजा से धन प्राप्ति और वातज्वर आदि रोग, चतुष्पदजीवों की हानि होती है॥२६८॥ अष्टमाधिपसंयुक्ते देहजाड्यं मनोरुजम् । शुभयुक्ते शुभैर्दृष्टे देहसौख्यं धनागमः ॥२६९॥ अष्टमेश से युत हो तो शरीर में जड़ता और मानसिक कष्ट होता है। शुभग्रह से युत और दृष्ट हो तो सुख और धन का लाभ होता है॥२६९॥
४८८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । राजसन्मानभूप्राप्तिर्गृहे शुभकरो भवेत् । लग्नाधिपेन सम्बन्धे इष्टसिद्धिः सुखावहा ॥२७०॥ राजा से सन्मान, धन, भूमि का लाभ और गृह में शुभ कार्य होंगे लग्नेश हो सम्बंध होने से इष्ट सिद्धि होती है॥२७०॥ लग्नाधिपसमायुक्ते लाभोवा भवति ध्रुवम् । चतुष्पाज्जीवलाभः स्यात्केन्द्रे वाथ त्रिकोणगे ॥२७१॥ लग्नेश से सम्बन्ध हो तो अभीष्ट की सिद्धि और सुख होता है। यदि लग्नेश से युत हो तो धन का लाभ होता है। केन्द्र त्रिकोण में रहने से चतुष्पद का लाभ होता है॥२७१॥ रन्ध्रस्थानगते केतौ व्यये वा वलवर्जित । तद्भुक्तौ बहुरोगः स्याच्चौराग्निव्रणपीडनम् ॥२७२॥ ८।१२ स्थान में निर्बल केतु हो तो उसके अन्तर में अनेक रोग, चोर, अग्नि और फोड़ा से पीड़ा॥२७२॥ पितृमातृवियोगश्च भ्रातृद्वेषं मनोरुजम् । स्वप्रभोश्च महाकष्टं वैषम्यं चित्तहिंसकम् ॥२७३॥ पिता माता से वियोग, भाई से द्वेष, मानसिक कष्ट होता है और अपने मालिक से बैर और उससे कष्ट होता है॥२७३॥ द्वितीयद्युनाथे तु देहवाधा भविष्यति । तद्दोषपरिहारार्थं छागदानं च कारयेत् ॥२७४॥ २।७ भाव का स्वामी हो तो शरीर में बाधा होती है। इसके शान्त्यर्थ बकरी का दान करना चाहिये॥२७४॥ अथराहुदशायांशुक्रान्तर्दशाफलम्- राहोरन्तर्गते शुक्रे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । लाभे वा वलसंयुक्ते योगप्रावल्यमादिशेत् ॥२७५॥ राहु की दशा में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण वा एकादश स्थान में बलवान शुक्र हो तो प्रबल योग होता है॥२७५॥ विप्रमूलाद्धनप्राप्तिर्गोमहिष्यादिलाभकृत् । पुत्रोत्सवादिसन्तोषं गृहे कल्याणसम्भवम् ॥२७६॥ इसके अन्तर में ब्राह्मण द्वारा धन का लाभ, गौ भैंस का लाभ, पुत्रोत्सव, गृह में कल्याण॥२७६॥
अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४८९ सम्मानं राजसन्मानं राज्यलाभं महत्सुखम् । स्वोच्चे वा स्वर्शगे वापि तुङ्गांशे स्वांशगेऽपिवा ।।२७७।। सम्मान, राजा से आदर, राज्य सुख का लाभ होता है। यदि शुक्र अपने उच्च वा अपनी राशि में, उच्चांश में वा अपने नवांश में हो ।।२७८।। नूतनगृहनिर्माणं नित्यं मिष्ठान्नभोजनम् । कलत्रपुत्रविभवं मित्रसंयुक्तभोजनम् ।।२७८।। नूतन गृह का निर्माण, नित्य मिठाई का भोजन, स्त्री, पुत्र वैभव और मित्रों के साथ भोजन होता है।।२७८।। अन्नदानप्रियं नित्यं दानधर्मादिसंग्रहम् । महाराजप्रसादेन वाहनाम्बरभूषणम् ।।२७९।। अन्नदान तथा अन्य धार्मिक क्रियायें और महाराज की प्रसन्नता से वाहन- वस्त्र आभूषण का लाभ।।२७९।। व्यवसायात्फलाधिक्यं विवाहो मौंजिबंधनम् । षष्ठाष्टमव्यये शुक्रे नीचे शत्रुगृहेस्थिते ।।२८०।। व्यवसाय से अधिक लाभ और विवाह यज्ञोपवीत आदि उत्सव होते हैं। यदि शुक्र ६।८।१२ भाव में हो नीच में वा शत्रु गृह में हो।।२८०।। मन्दारफणिसंयुक्ते तद्भुक्तौ रोगमादिशेत् । अकस्मात्कलहं चैव पितृपुत्रवियोगकृत् ।।२८१।। शनि, भौम,राहु से युत हो तो इसके अन्तर में रोग, अकस्मात् कलह पिता- पुत्र से वियोग।।२८१।। स्वबंधुजनहानिश्च सर्वत्र जनपीडनम् । दायादि कलहं चैव स्वप्रभोः स्वस्यमृत्युकृत् ।।२८२।। अपने बन्धुओं की हानि, सभी जनों को कष्ट, दायादों से कलह, अपने स्वामी तथा अपने को मृत्युतुल्य कष्ट।।२८२।। कलत्रपुत्रपीडां च शूलरोगादि सम्भवम् । दायेशात्केन्द्रराशिस्थे त्रिकोणे वा समन्विते ।।२८४।। स्त्री पुत्र को कष्ट और शूल रोग की सम्भावना होती है। दशेश से केन्द्र वा त्रिकोण में वा युत हो।।२८४।।
४९० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । लाभे वा धर्मराशिस्थे क्षेत्रपालान्महत्सुखम् । सुगंधवस्त्रशय्यादिं गानविद्यापरिश्रमम् ॥२८५॥ लाभ या नवम भाव में शुक्र हो तो क्षेत्रपाल से सुख होता है॥२८५॥ छत्रचामरवाद्यादिगंधपद्मसन्वितम् । दायेशाद्रिपुरंध्रस्थे व्यये वा पापसंयुते ॥२८६॥ और छत्र, चामर, बाजा आदि गंधादि से युक्त होता है। दशेश से ६।८।१२ भाव में पापग्रहं से मुत शुक्र हो तो॥२८६॥ विषाहिनृपचौरादिमूत्रकृच्छ्रकान्महद्भयम् । प्रमेहाद्रुधिरं रोग कुत्सितान्नं शिरोरुजम् ॥२८७॥ उसके अन्तर में विष-सर्प-राजा-चोर आदि से तथा कृच्छ्र (सुजाक) रोग से भय होता है। प्रमेह से रक्त का रोग और खराब अन्न का भोजन तथा शिर में रोग होता है॥२८७॥ कारागृहप्रवेशं च राजदंडाद्धनक्षयम् । द्वितीयद्यूननाथे वा दारपुत्रादिनाशनम् ॥२८८॥ कारागाह (जेल) में प्रवेश, स्त्री पुत्रादि का नाश होता है। २।७ भाव का स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है॥२८८॥ आत्मपीडा भयं चैवाह्यपमृत्युस्तथाभवेत् । दुर्गालक्ष्मीजपं कुर्यान्मृत्युनाशकरो भवेत् ॥२८९॥ दुर्गा और लक्ष्मी का जय करने से मृत्यु का नाश होकर सुख होता है॥२८९॥ अथराहुदशायां सूर्यान्तर्दशाफलम्- राहोरन्तर्गते सूर्ये स्वोच्चे स्वक्षेत्रकेन्द्रगे । त्रिकोणे लाभगे वापि तुंगांशेस्वांशमेऽपिवा ॥२९०॥ राहु की दशा में अपने उच्च में वा अपनी राशि में केन्द्र त्रिकोण, ग्यारहवें वा अपने उच्चांश वा अपने नवांश में गये हुये॥२९०॥ शुभग्रहेण संदृष्टे राजप्रीतिकरं शुभम् । धनधान्यसमृद्धिश्च ह्यल्पसौख्यं सुखावहम् ॥२९१॥ शुभग्रह से देखे जाते हुये सूर्य के अन्तर में राजा से प्रेम, धन धान्य समृद्धि की प्राप्ति, अल्पसुख॥२९१॥
अथान्नर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४९१ अल्पग्रामाधिपत्यं च स्वल्पलाभो भविष्यति । भाग्यलग्नेशसंयुक्ते कर्मेशेन निरीक्षिते ॥२९२॥ छोटे ग्राम का आधिपत्य, अल्पलाभ होता है। भाग्येश और लग्नेश से युक्त हो और कर्मेश से देखा जाता हो तो॥२९२॥ राजाश्रयो महत्कीर्त्तिर्विदेशगमनं महत् । देशाधिपत्ययोगं च गजाश्वाम्बरभूषणम् ॥२९३॥ राजा से आश्रय की प्राप्ति, बड़ा यश, विदेशयात्रा होती है। यह देश का अधिपति योग होता है. इसमें ग्राम का अधिकार हाथी, घोड़ा वस्त्र आभूषण की प्राप्ति॥२९३॥ मनोभीष्टप्रदानं च पुत्रकल्याणसम्भवम् । दायेशाद्विःफरन्ध्रस्थे षष्ठे वा नीचगेऽपि वा ॥२९४॥ मन के अनुकूल इष्टसिद्धि, पुत्र के लाभ का सम्भव होता है यदि दशेश १२।८।६ स्थान में सूर्य हों वा नीच राशि में हों तो॥२९४॥ ज्वरातिसाररोगं च कलहंराजविद्विषम् । प्रयाणं शत्रुवृद्धिश्च नृपचौराग्निपीडनम् ॥२९५॥ ज्वरातिसार रोग, कलह, राजा से विद्वेष, यात्रा, शत्रुओं की वृद्धि, राजा चोर अग्नि से पीड़ा होती है॥२९५॥ दायेशात्केन्द्रकोणे वा दुश्चिक्ये लाभगेऽपिवा । विदेशे राजसन्मानं कल्याणं च शुभावहम् ॥२९६॥ दशेश से केन्द्र वा त्रिकोण वा तीसरे वा लाभ स्थान में हो तो विदेश में राजा से सम्मान, कल्याण और शुभ होता है॥२९६॥ द्वितीयद्यूननाथेतु महारोगो भविष्यति । सूर्यप्रसन्नशान्ति च कुर्यादारोग्यसम्भवम् ॥२९७॥ २।७ भाव का स्वामी हो तो महारोग होता है। सूर्य की प्रसन्नता की शान्ति करने से आरोग्यता होती है॥२९७॥ अथराहुदशायांचन्द्रान्तर्दशाफलम्- राहोरन्तर्गते चन्द्रे स्वक्षेत्रे स्वर्क्षगेऽपि वा । केन्द्रत्रिकोणलाभे वा मित्रर्क्षे शुभसंयुते ॥२९८॥ राहु की दशा में अपनी राशि, उच्चराशि में केन्द्रत्रिकोण, वा लाभ में वा मित्र की राशि में शुभग्रह से युत चन्द्रमा हो तो उसके अन्तर में॥२९८॥
४९२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । राज्यत्वं राजपूज्यत्वं धनार्थं धनलाभकृत् । आरोग्यभूषणं चैव मित्रस्त्रीपुत्रसंपदः ॥२९९॥ राजा होता है अथवा राजा से पूज्य होता है, धन के लिये धनका लाभ होता है, आरोग्यता, आभूषण, मित्र, स्त्री, पुत्र, सम्पत्ति का लाभ होता है॥२९९॥ पूर्णचन्द्रे पूर्णफलं राजप्रीत्या शुभावहम् । अश्ववाहनलाभः स्याद्गृहक्षेत्रादिवृद्धिकृत् ॥३००॥ पूर्ण चन्द्रमा हो तो पूर्णफल होता है और राजा की प्रसन्नता से शुभद फल होते हैं और घोड़ा आदि वाहनों का लाभ और गृह क्षेत्र आदि की वृद्धि होती है॥३००॥ दायेशात्सुखभाग्यस्थे केन्द्रे वा लाभगेऽपिवा । लक्ष्मीकटाक्षचिन्हानि गृहे कल्याणसम्भवम् ॥३०१॥ दशेश से चौथे नवें, केन्द्र वा लाभ स्थान में हो तो लक्ष्मी की कृपा के चिह्न दिखाई देते हैं, गृह में कल्याण होता है॥३०१॥ पूर्णकार्यार्थसिद्धिः स्याद्धनधान्यसुखावहम् । सत्कीर्त्तिलाभसन्मानं देव्याराधनमाचरेत् ॥३०२॥ पूर्णकार्य और धन का लाभ, कीर्त्ति वृद्धि और सन्मान होता है। देवाराधन करना चाहिये॥३०२॥ दायेशात्षष्ठरंध्रस्थे व्यये वा बलसंयुते । पिशाचक्षुद्रव्याघ्रादिगृहक्षेत्रार्थनाशनम् ॥३०३॥ दशेश से ६।८।१२ वें भाव में बलवान् हो तो पिशाच, क्षुद्रजन्तु-व्याघ्र आदि से गृह-खेती और धन का नाश होता है॥३०३॥ मार्गेचौरभयं चैव व्रणाधिक्यं महाभयम् । द्वितीयद्यूननाथेतु अपमृत्युस्तदा भवेत् । श्वेतांगा महिषीं दद्याद्दानेनारोग्यता भवेत् ॥३०४॥ मार्ग में चोर का भय और व्रण (फोड़ा) से बड़ा भय होता है। २।७ भाव के स्वामी हो तो अपमृत्यु का भय होता है। सफेद गौ भैंस के दान से आरोग्यता होती है॥३०४॥ अथराहुदशायां भौमान्तर्दशाफलम्- राहोरन्तर्गतेभौमे लग्नाल्लाभत्रिकोणगे । केन्द्रे वा शुभसंयुक्ते स्वोच्चे स्वक्षेत्रमेऽपि वा ॥३०५॥
अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४९३ राहु की दशा में लग्न से लाभ वा त्रिकोण वा केन्द्र में शुभग्रह से अपने उच्च वा अपनी राशि में गये हुये भौम के अन्तर में ॥३०५॥ नष्टराज्यधनप्राप्तिः गृहक्षेत्राभिवृद्धिकृत् । इष्टदेवप्रसादेन सन्तानसुखभोजनम् ॥३०६॥ नष्टराज्य की प्राप्ति गृह क्षेत्र की वृद्धि होती है। इष्टदेव की प्रसन्नता से सन्तान का सुख, भोजन का सुख होता है॥३०६॥ क्षिप्रभोज्यान्महत्सौख्यं भूषणाम्बरलाभकृत् । दायेशात्केन्द्रकोणेवा दुश्चिक्येलाभगेऽपिवा ॥३०७॥ शीघ्र भोजन महासुख, भूषण, वस्त्रादि का लाभ होता है। दशेश से केन्द्र वा कोण में वा तीसरे वा लाभ स्थान में हो तो॥३०७॥ रक्तवस्त्रादिलाभः स्यात्प्रयाणं राजदर्शनम् । पुत्रवर्गेषुकल्याणं स्वप्रभोश्च महत्सुखम् ॥३०८॥ लाल वस्त्रादि का लाभ, यात्रा और राजा का दर्शन, पुत्र वर्ग में कल्याण, महासुख॥३०८॥ सेनापत्यं महोत्साहं भ्रातृवर्गधनागमम् । दायेशाद्रिःफरंध्रे वा षष्ठे पापसमन्विते ॥३०९॥ सेनापतिपद का लाभ बड़ा उत्साह और भाइयों से धन का लाभ होता है। दशेश से १२।८।६ भाव में पापग्रह से युक्त हो तो॥३०९॥ पुत्रदारादिहानिश्च सोदराणां च पीडनम् । स्थानभ्रंशं बंधुवर्गदारपुत्रविरोधनम् ॥३१०॥ पुत्र स्त्री की हानि, भाइयों को पीड़ा, स्थान भ्रष्ट, बंधुओं से तथा स्त्री, पुत्र से विरोध होता है॥३१०॥ चौरादिब्रणभीतिश्च सोदराणां च पीडनम् । आदौ क्लेशकरंचैवमध्यान्ते सौख्यमाप्नुयात् ॥३११॥ चौर तथा व्रण से भय और भाइयों को कष्ट होता है। अन्तर पहले कष्ट और मध्य तथा अन्त में सुख होता है॥३११॥ द्वितीयद्यूननाथेतु देहालस्यं महद्भयम् । अनड्वाहं च गांदद्याद्देहारोग्यं भविष्यति ॥३१२॥ यदि २।७ भाव का स्वामी हो तो देह में आलस्य और बड़ा भय होता है। बैल और गौ का दान करने से आरोग्यता होती है॥३१२॥ इतिराहुदशायामन्तर्दशाफलम् ।
४९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथगुरुदशायांगुर्वन्तर्दशाफलम्- स्वोच्चे स्वक्षेत्रगे जीवे लग्नात्केन्द्रत्रिकोणगे । अनेकराज्याधीशश्च सम्पन्नो राजपूजितः ॥१॥ गुरु की दशा में अपने उच्च, अपनी राशि में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण में गये हुये गुरु के अन्तर में अनेक राज्यों का स्वामित्व सम्पन्नता और राजा से पूजनीयता॥१॥ गोमहिष्यादिलाभश्च वस्त्रवाहनभूषणम् । नूतनस्थाननिर्माणं हर्म्यप्राकारसंयुतम् ॥२॥ गौ, भैंस आदि का तथा वस्त्र आभूषण का लाभ होता है। नये स्थान का निर्माण गृह आदि का लाभ होता है॥२॥ गजान्तैश्वर्यसम्पत्तिर्भाग्यकर्मणिसंयुते । ब्राह्मणप्रभुसन्मानं समानप्रभुदर्शनम् ॥३॥ यदि गुरु भाग्य वा कर्म में हो तो हाथी आदि के ऐश्वर्य से युक्त॥३॥ स्वप्रभोः स्वफलाधिक्यं दारपुत्रादिलाभकृत् । नीचांशे नीचराशिस्थे षष्ठाष्टव्ययराशिगे ॥४॥ और अपने स्वामी से अधिक लाभ, स्त्री आदि का लाभ होता है। यदि गुरु नीचांश वा नीच राशि में ६।८।१२ भाव में हो तो॥४॥ नीचसङ्गं महादुःखं दायादजनविग्रहम् । कलहो न विचारोस्य स्वप्रभुह्यापमृत्युकृत् ॥५॥ नीचों की सङ्गति महादुःख, दायादों से विरोध, कलह, अपमृत्यु का भय॥५॥ पुत्रदारवियोगं च धनधान्यार्थहानिकृत् । सप्तमाधिपदोषेण देहवाधा भविष्यति ॥६॥ पुत्र स्त्री से वियोग, धन धर्म का नाश होता है। सप्तमेश होने से शरीर में रोग होता है॥६॥ तद्दोषपरिहारार्थं शिवसाहस्रकं जपेत् । रुद्रजाप्यं च गोदानं कुर्यादिष्टस्य प्राप्तये ॥७॥
अथान्तर्दशादिफलविचाराध्यायः । ४९५ इस दोष की शान्ति के लिये शिवसहस्र नाम का जप, रुद्राष्टाध्यायी का जप, गोदान करने से अभीष्ट की प्राप्ति होती है॥७॥ अथगुरुदशायांशनेरन्तर्दशाफलम्- जीवस्यान्तर्गते स्वोच्चे स्वक्षेत्रमित्रगे । लग्नात्केन्द्रत्रिकोणस्थे लाभे वा बलसंयुते ॥८॥ गुरु की दशा में अपने उच्च, अपने गृह वा अपने मित्र की राशि में लग्न से केन्द्र वा त्रिकोण वा लाभ में बलवान् शनि के अन्तर में॥८॥ राज्यलाभं महत्सौख्यं वस्त्राभरणसंयुतम् । धनधान्यादिलाभं च स्त्रीलाभं बहुसौख्यकृत् ॥९॥ राज्य का लाभ, महान् सुख, वस्त्र आभूषण का लाभ, धन धान्य का लाभ, स्त्री का लाभ अनेक सुख॥९॥ वाहनाम्बरपश्वादिभूलाभं स्थानलाभदम् । पुत्रमित्रादिसौख्यं च नरवाहनयोगकृत् ॥१०॥ वाहन, वस्त्र, पशु आदि तथा भूमि का लाभ और स्थान का लाभ होता है। पुत्र मित्र आदि का सुख और मनुष्य की सवारी का लाभ होता है॥१०॥ नीलवस्त्रादिलाभश्च नीलाश्वं लभते च सः । पश्चिमां दिशमाश्रित्य प्रयाणं राजदर्शनम् ॥११॥ नीले वस्त्र, नीले घोड़े का लाभ, पश्चिम दिशा की यात्रा और राजा का दर्शन॥११॥ अनेकयानलाभं च निर्दिशेन्मन्दभुक्तिषु । लग्नात्षष्ठाष्टमे मंदेव्यये नीचेऽस्तगेऽप्यरौ ॥१२॥ और अनेक प्रकार की सवारी का लाभ होता है लग्न से ६।८।१२ स्थान में शनि वा अस्त हो तो नीच वा शत्रु राशि में॥१२॥ धनधान्यादिनाशश्च ज्वरपीडा मनोरुजम् । स्त्रीपुत्रादिषु पीडा वा व्रणात्यादिकयुग्भवेत् ॥१३॥ धन धान्य का नाश ज्वर से पीड़ा-मानसिक कष्ट, स्त्री पुत्रादि को कष्ट व्रण का दुःख॥१३॥ गृहेत्वशुभकार्याणि भृत्यवर्गादिपीडनम् । गोमहिष्यादिहानिश्च बन्धुद्वेष्यो भविष्यति ॥१४॥