बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
अथ प्राणदशा फलाध्यायः। ५७५ सूर्य सूक्ष्मदशामध्येप्राणदशा चक्रम्।
| ग्रहाः | सू. | चं. | मं. | रा. | वृ. | श. | बु. | के. | शु. | यो. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| घट्य | ० | १ | ० | २ | २ | २ | २ | ० | २ | १६ |
| पला. | ४८ | २१ | ५६ | २५ | ९ | ३३ | १७ | ५६ | ४२ | १२ |
| विपला | ३६ | ० | ४२ | ४८ | ३६ | ५४ | ५२ | ४२ | ० | ० |
| अथ सूर्य प्राणदशाफलम्- | ||||||||||
| पौंश्चल्यं विषजावाधा शोषणं विषमेक्षणम् । | ||||||||||
| सूर्यप्राणदशायां तु मरणं कृच्छ्रमादिशेत् ।।२।। (सू.सू.) | ||||||||||
| सूर्य के सूक्ष्मांतर में सूर्य के प्राण में दुराचार, विष की बाधा, शरीर में शुष्कता, | ||||||||||
| नेत्र में विकार और मरण होता है।।२।। | ||||||||||
| सुखं भोजनसम्पत्तिः संस्कारो नृपवैभवम् । | ||||||||||
| उदारादिकृपाभिश्च रवेः प्राणगते विधौ ।।३।। (सू.चं.) | ||||||||||
| सूर्य के सूक्ष्मांतर में चन्द्रमा की प्राणदशा में सुख, भोजन की सामग्री, संस्कार | ||||||||||
| और उदार पुरुष की कृपा से राजवैभव की प्राप्ति होती है।।३।। | ||||||||||
| भूपोपद्रवमन्यार्थे द्रव्यनाशो महद्भयम् । | ||||||||||
| महत्यपचयप्राप्ति रवेः प्राणगते कुजे ।।४।। (सू.मं.) | ||||||||||
| सूर्य के सूक्ष्मांतर में भौम की प्राण दशा में राजा के उपद्रव की वृद्धि, धन | ||||||||||
| की क्षति, भय और धनादिका अपचय (हानि) होता है।।४।। | ||||||||||
| अन्नोद्भवा महापीड़ा विषोत्पत्तिर्विशेषतः । | ||||||||||
| अर्थाग्निराजभिः क्लेशं रवेः प्राणगतेप्यहो ।।५।। (सू.रा.) | ||||||||||
| सूर्य के सूक्ष्मान्तर राहु की प्राणदशा में अन्न से उत्पन्न महापीड़ा (हैजा आदि) | ||||||||||
| विशेषतः विष की संभावना, धन, अग्नि और राजा से कष्ट होता है।।५।। | ||||||||||
| नानाविद्यार्थसम्पत्तिः कार्यलाभो गतागतैः । | ||||||||||
| नीचजनाश्रय नाशो रवेः प्राणगते गुरौ ।।६।। (सू.वृ.) | ||||||||||
| सूर्य के सूक्ष्मान्तर में गुरु की प्राणदशा में अनेक विद्या, धन सम्पत्ति का लाभ, | ||||||||||
| गमना-गमन से कार्य की सिद्धि और नीचजनों की संगति का नाश होता है।।६।। | ||||||||||
| बंधनं प्राणनाशश्च चित्तोद्वेगस्तथैव च । | ||||||||||
| बहुबाधा महाहानी रवेः प्राणगते शनौ ।।७।। (सू.श.) |
५७६ वृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । सूर्य के सूक्ष्मान्तर में शनि की प्राणदशा में बंधन, प्राण का भय, चित्त में उद्वेग, अनेक बाधा और हानि होती हैं।।७।। राजान्नभोगः सततं राजलांछनतत्पदम् । आत्मासन्तर्पयेदेवं रवेः प्राणगतेबुधे ।।८।। (सू.बु.) सूर्य के सूक्ष्मान्तर में बुध की प्राणदशा में निरन्तर राजभोग राजकीय चिन्हों से युक्त और आत्मा को शान्ति मिलती है।।८।। अन्योन्यं कलहश्चैव वसुहानिः पराजयः । गुरुस्त्रीबंधुहानिश्च सूर्यप्राणगते ध्वजे ।।९।। (सू.के.) सूर्य के सूक्ष्मान्तर में केतु की प्राणदशा में परस्पर कलह धन की हानि और पराजय गुरु, स्त्री, बंधु की हानि होती है।।९।। राजपूजा धनाधिक्यं स्त्रीपुत्रादिभवं सुखम् । अन्नपानादिभोगश्च रवेः प्राणगते भृगौ ।।१०।। (सू.शु.) सूर्य के सूक्ष्मान्तर में शुक्र की प्राण दशा में राजा से पूजा, धनका विशेष लाभ, स्त्री पुत्रादि का सुख और अन्न पानादि का सुख होता है।।१०।। इति सूर्य प्राणदशाफलम्। अथ चन्द्रप्राणदशाफलम्। योगाभ्यासं समाधिं च स्त्रीपुत्रादिसुखं तथा । इति सर्व समासेन चन्द्रप्राणे भवन्ति च ।।११।। (चं.चं.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में चन्द्रमा की प्राणदशा में योगाभ्यास, समाधि, स्त्री पुत्रादि का सुख यह सब एक साथ ही होता है।।११।। क्षयं कुष्ठं बंधुनाशं रक्तस्त्रावान्महद्भयम् । भूतावेशादि जायेत चन्द्रप्राणगते कुजे ।।१२।। (चं.मं.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में भौम की प्राणदशा में क्षय रोग, कुष्ठ रोग की संभावना, बंधु का नाश, रक्तस्राव से कष्ट और भूत आदि का आवेश होता है।।१२।। सर्पभीतिविशेषेण भूतोपद्रववान्सदा । दृष्टिक्षोभोमतिभ्रंशश्चन्द्रप्राणगतेप्यहौ ।।१३।। (चं.रा.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में राहु की प्राणदशा में विशेषकर सर्प का भय, भूत का उपद्रव, दृष्टि में विकार और बुद्धि नाश होता है।।१३।।
अथ प्राणदशा फलाध्यायः। ५७७ धर्मबुद्धिः क्षमाप्राप्तिर्देवब्राह्मणपूजनम् । सौभाग्यं प्रियदृष्टिश्च चन्द्रप्राणगते गुरौ ॥१९४॥ (चं.बृ.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में गुरु की प्राणदशा में धर्मबुद्धि, क्षमा की प्राप्ति, देवता और ब्राह्मण का पूजन और भाग्योदय होता है॥१९४॥ सहसा देहपतनं शत्रुपद्रववेदना । अंधत्वं च धनप्राप्तिश्चन्द्रप्राणगते शनौ ॥१९५॥ (चं.श.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में शनि की प्राणदशा में अकस्मात् शरीर का पतन, शत्रुओं का उपद्रव, नेत्रान्धता और धन का लाभ होता है॥१९५॥ चामरछत्रसंप्राप्ती राज्यलाभो नृपात्ततः । समत्वं सर्वभूतेषु चन्द्रप्राणगते बुधे ॥१९६॥ (चं.बु.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में बुध की प्राणदशा में राजा से चामर छत्र और राज्य का लाभ और सभी प्राणियों में समदृष्टि होती है॥१९६॥ शस्त्राग्नि रिपुजापीडा विषाग्नि कुक्षिरोगता । पुत्रदारवियोगश्च चन्द्रप्राणगते शिखी ॥१९७॥ (चं.के.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में केतु की प्राणदशा में शस्त्र, अग्नि और शत्रु से पीड़ा, विष भय, कुक्षिगत रोग और पुत्र स्त्री से वियोग होता है॥१९७॥ पुत्रमित्रकलत्राप्तिर्विदेशाच्च धनांगयः । सुखसम्पत्तिरर्थश्च चन्द्रप्राणगते भृगौ ॥१९८॥ (चं.शु.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में शुक्र की प्राणदशा में पुत्र मित्र स्त्री आदि का लाभ विदेश से धन का लाभ और सुख सम्पत्ति का लाभ होता है॥१९८॥ तीव्रदोषी प्रदोषी च प्राणहानिर्मनोरुजम् । देशत्यागो महाभीतिश्चन्द्रप्राणगते रवौ ॥१९९॥ (क.सू.) चन्द्रमा के सूक्ष्मांतर में सूर्य की प्राणदशा में तीव्र दोष से प्राणहानि की संभावना देश त्याग और महाभय होता है॥१९९॥ इति चन्द्रप्राणदशाफलम्। अथ भौमप्राणदशाफलम्- युद्धे परजनाद्वद्धः शास्त्रेण परकेन वा । मृत्युना मरणं याति भौमे प्राणदशा फलम् ॥२००॥ (मं.मं.)
५७८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । भौम के सूक्ष्मांतर में भौम के प्राणदशा में युद्ध में शत्रु से बँधने वा शत्रु के शस्त्र से बँधन और मृत्यु बात तुल्य कष्ट होता है।।२०।। विच्युतः सुतदारादिवंधूपद्रवपीडितः । प्राणत्यागो विषेणैव भौमप्राणगतेप्यहौ ।।२१।। (मं.श.) भौम के सूक्ष्मांतर में राहु की प्राणदशा में पुत्र स्त्री से रहित, बंधुओं के उपद्रव से पीड़ा और विष से प्राणनाश होता है।।२१।। देवार्चनपरः श्रीमान्मन्त्रानुष्ठानतत्परः । पुत्रपौत्र सुखावाप्तिर्भौमप्राणगते गुरौ ।।२२।। (मं.वृ.) भौम के सूक्ष्मांतर में गुरु की प्राणदशा में देवता का पूजन में तत्पर, लक्ष्मी की प्राप्ति, मन्त्र के अनुष्ठान में तत्पर और पुत्र-पौत्र के सुख की प्राप्ति होती है।।२२।। अग्निबाधा भवेन्मृत्युरर्थनाशः पदच्युतिः । बंधुभिर्वधुतावाप्तिर्भौमप्राणगते शनौ ।।२३।। (मं.श.) भौम के सूक्ष्मांतर में शनि की प्राणदशा में अग्नि से बाधा, मृत्यु, धन का नाश, पद की अवनति और भाइयों से भ्रातृत्व का लाभ होता है।।२३।। दिव्याम्बरसमुत्पत्तिर्दिव्याभरण भूषितः । दिव्याङ्गनायाः सम्प्राप्तिर्भौमप्राणगते बुधे ।।२४।। (मं.बु.) भौम के सूक्ष्मान्तर में बुध की प्राणदशा में दिव्यवस्त्र का लाभ, दिव्य आभूषण का लाभ और दिव्य स्त्री का लाभ होता है।।२४।। पतनोत्पातपीडा च नेत्रक्षोभो महद्भयम् । भुजङ्गाच्च महाहानिर्भौम प्राणगते ध्वजे ।।२५।। (मं.के.) भौम के सूक्ष्मान्तर में केतु की प्राणदशा में पतन, उत्पात् - पीड़ा, नेत्र में पीड़ा महाभय और सर्प से हानि होती है।।२५।। धनधान्यादि सम्पत्तिर्लोकपूजा सुखावहा । नाना भोगैर्भवेद्रोगी भौम प्राणगते भृगौ ।।२६।। (मं.शु.) भौम के सूक्ष्मान्तर में शुक्र की प्राणदशा में धन, धान्य आदि सम्पत्ति का लाभ, लोक में प्रतिष्ठा और अनेक भोगों से रोग की संभावना होती है।।२६।।
अथ प्राणदशा फलाध्यायः। ५७९ ज्वरोन्मादः क्षयोऽर्थस्य राजविद्रोहसम्भवः । दीर्घरोगो दरिद्रः स्याद्भौमप्राणगते रवौ ॥२७॥ (मं.सू.) भौम के सूक्ष्मांतर में सूर्य की प्रशदशा में ज्वर, उन्माद, धन की हानि, राजा से विद्रोह की संभावना, दीर्घ रोग और दरिद्रता होती है॥२७॥ भोजनादि सुख प्रीतिर्वस्त्राभरण वांछितम् । शीतोष्णव्याधिपीडा च भौमप्राणगते विधौ ॥२८॥ (मं.चं.) भौम के सूक्ष्मांतर में चंद्रमा की प्राण दशा में भोजन आदि के सुख का लाभ, अभीष्ट वस्त्र आभूषण का लाभ और सर्दी गर्मी से कष्ट होता है॥२८॥ इति भौम प्राणदशा फलम्। अथ राहोः प्राणदशा फलम्- अन्नाशने विरक्तश्च विषभीतिस्तथैव च । सहसाधननाशश्च राहोः प्राणदशाफलम् ॥२९॥ (रा.रा.) राहु के सूक्ष्मान्तर में राहु की प्राण दशा में अन्न भोजन से विरक्ति विष से भय, और सहसा धन का नाश होता है॥२९॥ अङ्गसौख्यं विनिर्भीतिर्वाहनादेश्च व्यग्रता । नीचैः कलहसम्प्राप्ती राहोः प्राणगते गुरौ ॥३०॥ (रा.वृ.) राहु के सूक्ष्मान्तर में गुरु की प्राणदशा में शरीर सुख, निर्भयता, वाहन आदि से व्यग्रता और नीचों से कलह की संभावना होती है॥३०॥ गृहदाहशरीरे च नीचैरपहृतं धनम् । रोगबंधन सम्प्राप्ती राहोः प्राणगते शनौ ॥३१॥ (रा.श.) राहु के सूक्ष्मान्तर में शनि की प्राणदशा में गृह और शरीर में अग्नि का भय, नीच से धन का अपहरण, रोग बंधन की प्राप्ति होती है॥३१॥ गुरुपदेश विभवो गुरुसत्कारवर्धनम् । गुणवांञ्छीलवांश्चापि राहोः प्राणगते बुधे ॥३२॥ (रा.बु.) राहु की दशा में बुध की प्राण दशा में गुरु के उपदेश से वैभव प्राप्ति, गुरु के सत्कार में वृद्धि, गुण और शील में वृद्धि होती है॥३२॥
५८० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । स्त्रीपुत्रादि विरोधश्च गृहान्निष्क्रमणादयः । साक्षात्कार्यस्यहानिश्च राहोः सूक्ष्मगते ध्वजे ॥३३॥ (रा.के.) राहु के सूक्ष्मान्तर में केतु की प्राण दशा में स्त्री-पुत्र आदि से विरोध गृह त्याग और साक्षात् कार्य की हानि होती है॥३३॥ छत्रवाहनसम्पत्तिः सर्वार्थफलसंचयः । शिवार्चन गृहारम्भो राहोः प्राणगते भृगौ ॥३४॥ (रा.शु.) राहु के सूक्ष्मान्तर में शुक्र की प्राणदशा में छत्र वाहन आदि सम्पत्ति का लाभ सभी प्रकार के लाभ और संचय और शिवपूजन तथा गृहारम्भ होता है॥३४॥ अर्शादिरोगभीतिश्च राज्योपद्रवसम्भवः । चतुष्पदादिहानिश्च राहोः प्राणगते रवौ ॥३५॥ (रा.सू.) राहु के सूक्ष्मान्तर में सूर्य की प्राणदशा में अर्श (बवासीर) आदि रोग का भय, राजा से उपद्रव की संभावना और चौपाये जानवरों की हानि होती है॥३५॥ सौमनस्यं च सद्बुद्धिः सत्कारो गुरुदर्शनम् । पापभीतिर्मनः सौख्यं राहोः प्राणगते विधौ ॥३६॥ (रा.चं.) राहु के सूक्ष्मान्तर में चन्द्रमा की प्राणदशा में सज्जनता, सत्कार और गुरु का दर्शन, पाप से भय तथा सुख होता है॥३६॥ चांडालाग्निवशाद्धीतिः स्वपदच्युतिरापदः । मलिनः श्वादिवृत्तिश्च राहोः प्राणगते कुजे ॥३७॥ (रा.मं.) राहु के सूक्ष्मान्तर में भौम की प्राणदशा में चांडाल और अग्नि से भय, अवनति और आपत्ति, मलिनता और कुत्ते की वृत्ति होती है॥३७॥ इति राहोः प्राणदशा फलम्। अथ गुरोः प्राणदशा फलम्- शोकनाशो धनाधिक्यंमग्निहोत्रं शिवार्चनम् । वाहनं छत्रसंयुक्तं जीवप्राणदशाफलम् ॥३८॥ (वृ.वृ.) गुरु के सूक्ष्मान्तर में गुरु की प्राणदशा में शोकादि का नाश, धन की वृद्धि, अग्नि होत्र, शिव का पूजन और वाहन छत्र का सुख होता है॥३८॥
अथ प्राणदशा फलाध्यायः । ५८१ व्रतहा सूर्यवर्तिश्च विदेशे वसुनाशनम् । विरोधो धननाशश्च गुरोः प्राणगते शनौ ।।३९।। (वृ.श.) गुरु के सूक्ष्मान्तर में शनि की प्राण दशा में व्रत की हानि, विदेश में धन की हानि विरोध और धन की हानि होती है।।३९।। विद्याधर्मविवृद्धिश्च गुरुब्राह्मणपूजनम् । भाग्योदयसुखप्राप्तिर्गुरोः प्राणगते बुधे ।।४०।। (वृ.बु.) गुरु के सूक्ष्मान्तर में बुध की प्राणदशा में विद्या और धर्म की वृद्धि, गुरु और ब्राह्मण का पूजन, भाग्योदय और सुख का लाभ होता है।।४०।। ज्ञानं विभवपांडित्यं शास्त्रश्रोता शिवार्चनम् । अग्निहोत्रं गुरोर्भक्तिर्गुरोः प्राणगते ध्वजे ।।४१।। (वृ.के.) गुरु के सूक्ष्मान्तर में केतु के प्राण दशा में ज्ञान, वैभव और पांडित्य, शास्त्र श्रवण, शिवपूजन, अग्नि होत्र और गुरु भक्ति होती है।।४१।। रोगान्मुक्तिः सुखं भोगं धन धान्यसमागमम् । पुत्रदारादि सौख्यं गुरोः प्राणगते भृगौ ।।४२।। (वृ.शु.) गुरु के सूक्ष्मान्तर में शुक्र के प्राण दशा में रोग से मुक्ति, सुख, भोग, धन, धान्य का आगमन, पुत्र स्त्री का सुखं होता है।।४२।। वातपित्तप्रकोपं च श्लेष्मोद्रेकं तु दारूणम् । रसव्याधिकृतं शूलं गुरोः प्राणगते रवौ ।।४३।। (वृ.सू.) गुरु के सूक्ष्मान्तर से सूर्य के प्राण दशा में वायु पित्त के प्रकोप से कष्ट, और भयंकर कफवृद्धि तथा रस से उत्पन्न व्याधि होती है।।४३।। छत्रचामरसंयुक्तं वैभवंपुत्रसम्पदम् । नेत्रकुक्षिगता पीडा गुरोः प्राणगतेविधौ ।।४४।। (वृ.चं) गुरु के सूक्ष्मान्तर में चन्द्रमा की प्राण दशा में छत्र चामर का सुख, वैभव, पुत्र सम्पत्ति का लाभ और नेत्र तथा कुक्षि (कोष्ठय) में कष्ट होता है।।४४।। स्त्रीजनाच्च विषोत्पत्तिर्वधनं चातिविग्रहः । देशांतरगमोभ्रांतिर्गुरोः प्राणगते कुजे ।।४५।। (वृ.मं.)
५८२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । गुरु के सूक्ष्मान्तर में भौम की प्राणदशा में स्त्रियों से कष्ट बंधन अत्यंत विरोध देशांतर की यात्रा और भ्रांति होती है॥४५॥ व्याधिभिः परिभूतः स्याच्चौरैरपहृतं धनम् । सर्पवृश्चिकदष्टत्वं गुरोः प्राणगतेप्यहौ ॥४६॥ (वृ.रा.) गुरु के सूक्ष्मान्तर में राहु की प्राणदशा में व्याधि से व्याप्त, चोर द्वारा द्रव्य की हानि सर्प-बिच्छू के काटने का भय होता है॥४६॥ इति गुरोः प्राणदशा फलम्। अथ शनेः प्राणदशा फलम्- ज्वरेण ज्वलिता कान्तिःकुष्ठरोगोदरादिरूक् । जलाग्निकृतमृत्युः स्यान्मन्दप्राणदशाफलम् ॥४७॥ (श.श.) शनि के सूक्ष्मांतर में शनि की प्राणदशा में ज्वर से कान्ति नष्ट हो जाती है, कुष्ठ रोग की संभावना, जल अग्नि से मृत्यु की संभावना होती है॥४७॥ धनं धान्यं च मांगल्यं व्यवहाराभिपूजनम् । देवब्राह्मणभक्तिश्चः शनैः प्राणगते बुधे ॥४८॥ (श.बु.) शनि के सूक्ष्मान्तर में बुध की प्राणदशां में धन, धान्य, मंगल कृत्य, व्यवहार से पूजन, देवता ब्राह्मण में भक्ति होती है॥४८॥ मृत्युवेदन दुःखं च भूतोपद्रवसंभवः । परदाराभिभूतत्वं शनैः प्राणगते ध्वजे ॥४९॥ (श.के.) शनि के सूक्ष्मान्तर में केतु की प्राणदशा में मृत्यु तुल्य कष्ट, भूत उपद्रव की संभावना और पर स्त्री के वश में होने की संभावना होती है॥४९॥ पुत्रार्थविभवैः सौख्यं क्षितिपालादिना सुखम् । अग्निहोत्रं विवाहश्च शनैः प्राणगते भृगौ ॥५०॥ (श.शु.) शनि के सूक्ष्मान्तर में शुक्र की प्राणदशा में पुत्र, धन और वैभव का सुख, राजा आदि से सुख, अग्निहोत्र और विवाह होता है॥५०॥ अग्निपीडा शिरोव्याधिः सर्पशत्रुभयं भवेत् । अर्थहानिः महाक्लेशः शनैः प्राणगते रवौ ॥५१॥ (श.सू.)
अथ प्राणदशा फलाध्यायः। ५८३ शनि के सूक्ष्मान्तर में सूर्य की प्राणदशा में अग्नि से कष्ट, शिर का रोग, सर्प तथा शत्रु से भय, धन की हानि और महाकष्ट होता है।।५१।। आरोग्यं पुत्रलाभश्च शान्तिपौष्टिक वर्धनम् । देवब्राह्मणभक्तिश्च शनेः प्राणगते विधौ ।।५२।। (श.चं.) शनि के सूक्ष्मान्तर में चंद्रमा की प्राणदशा में आरोग्यता, पुत्र का लाभ, शान्तिक पौष्टिक क्रियायों की वृद्धि और देवता ब्राह्मण में भक्ति होती है।।५२।। गुल्मरोगः शत्रुभीतिर्मृगया प्राणनाशनम् । सर्पाग्निशत्रुतोभीतिः शनेः प्राणगते कुजे ।।५३।। (श.मं.) शनि के सूक्ष्मान्तर में भौम की प्राणदशा में गुल्म रोग। शत्रु का भय, प्राण जाने का भय, सर्प तथा अग्नि से भय होता है।।५३।। देशत्यागो नृपाद्भीतिर्मोहनं विषभक्षणम् । वातपित्तकृतापीड़ा शनेः प्राणगतेप्यहौ ।।५४।। (श.रा.) शनि के सूक्ष्मान्तर में राहु की प्राणदशा में देश का त्याग, राजा से भय और अहित, विषपान, वायु-पित्त से कष्ट होता है।।५४।। सेनापत्यं भूमिलाभं संगमं स्वजनैः सह । गौरवं बुधसन्मानं शनेः प्राणगते गुरौ ।।५५।। (श.बृ.) शनि के सूक्ष्मान्तर में गुरु की प्राणदशा में सेनापति का अधिकार, भूमि का लाभ, आत्मीय जनों से समागम, गुरुता और राजा से सम्मान होता है।।५५।। इति शनेः प्राणदशा फलम्। अथ बुध प्राणदशा फलम्- आरोग्यं सुखसम्पत्तिर्धर्मकर्मादिसाधनम् । समत्वं सर्वभूतेषु बुधप्राणदशाफलम् ।।५६।। (बु.बु.) बुध के सूक्ष्मान्तर में बुध की प्राणदशा में आरोग्यता, सुख संपत्ति, धर्म कर्म आदि का साधन और सभी प्राणियों में समता होती है।।५६।। दहनं चौरविद्धांगं परमाधिविषोद्भवा । देहांतकरणे दुःखं बुधप्राणगते ध्वजे ।।५७।। (बु.के.)
५८४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । बुध के सूक्ष्मान्तर में केतु की प्राणदशा में अग्नि भय, चौर से शरीर में चोट और विष से व्याधि की संभावना तथा मरण तुल्य कष्ट होता है।।५७।। प्रभुत्वं धनसम्पत्तिः कीर्तिर्धर्मः शिवार्चनम् । पुत्रदारादिकं सौख्यं बुधप्राणगते भृगौ ।।५८।। (बु.शु.) बुध के सूक्ष्मान्तर में शुक्र की प्राणदशा में प्रभुता, धन संपत्ति का लाभ, कीर्त्ति, धर्म और शिव पूजन, और पुत्र स्त्री का सुख होता है।।५८।। अन्तर्दाहोज्वरोन्मादौ बांधवानां रतिः स्त्रिया । पापनिस्तेय सम्पत्तिर्बुधप्राणगते रवौ ।।५९।। (बु.सू.) बुध के सूक्ष्मान्तर में सूर्य की प्राणदशा में अंतर्गत दाह, ज्वर और उन्माद बांधवों से तथा स्त्री से प्रेम और पापाचार से संपत्ति का लाभ होता है।।५९।। स्त्रीलाभश्चार्थसम्पत्तिः कन्यालाभो धनागमः । लभते सर्वतः सौख्यं बुध प्राणगते विधौ ।।६०।। (बु.चं.) बुध के सूक्ष्मान्तर में चंद्रमा की प्राणदशा में स्त्री, धन सम्पत्ति का लाभ, कन्या की उत्पत्ति, धन का आगम और सर्वत्र सुख की प्राप्ति होती है।।६०।। पतितः कुक्षिरोगी च दंतनेत्रादिजा व्यथा । अर्शार्तिः प्राणसंदेहो बुधप्राणगते कुजे ।।६१।। (बु.मं.) बुध के सूक्ष्मान्तर में भौम की प्राणदशा में पतन, कुक्षि में रोग, दांत नेत्र में पीड़ा अर्श रोग और प्राण हानि की संभावना होती है।।६१।। वस्त्राभरणसम्पत्तिः वियोगो विप्रवैरिता । सन्निपातोद्भवं दुःखं बुधप्राणगतेप्यहौ ।।६२।। (बु.रां.) बुध के सूक्ष्मान्तर में राहु की प्राणदशा में वस्त्र आभूषण आदि संपत्ति से वियोग, ब्राह्मण से वैर, सन्निपात रोग से कष्ट होता है।।६२।। गुरुत्वं धनसम्पत्तिर्विद्या सद्गुण संग्रहः । व्यवसायेन सल्लाभो बुधप्राणगते गुरौ ।।६३।। (बु.वृ.) बुध के सूक्ष्मान्तर में गुरु की प्राणदशा में गुरुता, धन संपत्ति विद्या और अच्छे गुणों का संग्रह, और व्यवसाय से लाभ होता है।।६३।। चौर्येण निधनप्राप्तिर्विधनत्वं दरिद्रता । याचकत्वं विशेषेण बुधप्राणगते शनौ ।।६४।। (बु.श.)
अथ प्राणदशा फलाध्यायः। ५८५ बुध के सूक्ष्मान्तर में शनि की प्राणदशा में चोर से मृत्युभय, निर्धनता और भिक्षावृत्ति का प्रादुर्भाव होता है॥६४॥ इति बुध प्राणदशा फलम्। अथ केतोः प्राणदशा फलम्- अश्वपातेन घातं च पादस्खलनमेवच। निर्विचारवधोत्पत्तिः केतोः प्राणदशाफलम्॥६५॥(के.के.) केतु के सूक्ष्मान्तर में केतु की प्राणदशा में घोड़े पर से गिरने से चोट, पैर फिसलने से चोट, कुत्सित विचार की उत्पत्ति होती है॥६५॥ क्षेत्रलाभो वैरिनाशो हयलाभो मनः सुखम्। पशुक्षेत्रधनाप्तिश्च केतोः प्राणगते भृगौ॥६६॥(के.शु.) केतु के सूक्ष्मान्तर में शुक्र की प्राणदशा में कुशल-लाभ, शत्रुओं का नाश, मन को सुख, पशु, क्षेत्र और धन का लाभ होता है॥६६॥ स्तेयाग्निरिपुभीत्यादिघातश्चैवावरोधयुक् । प्राणांतकरणं कृच्छ्रं केतोः प्राणगते रवौ॥६७॥(के.सू.) केतु के सूक्ष्मान्तर में सूर्य के प्राणदशा में चोर, अग्नि और शत्रु का भय, अवरोध जनित घात और प्राणांत तुल्य कष्ट होता है॥६७॥ देवद्विजगुरोः पूजा दीर्घयात्रा धनं सुखम्। कंठाश्रिते नेत्ररोगो केतोः प्राणगते विधौ॥६८॥(के.चं.) केतु के सूक्ष्मान्तर में चन्द्रमा की प्राणदशा में देवता, ब्राह्मण और गुरु की पूजा दूर की यात्रा, धन और सुख, कंठ और नेत्र का रोग होता है॥६८॥ तीव्ररोगोलसावृद्धिर्विभ्रमः सन्निपातजः। स्वबंधुजनविद्वेषः केतोः प्राणगते कुजे॥६९॥(के.मं.) केतु के सूक्ष्मान्तर में भौम के प्राणदशा से तीव्र रोग, आलसी बुद्धि, सन्निपात से भ्रम रोग और अपने बंधुओं से विरोध होता है॥६९॥ विरोधः स्त्रीसुताद्यैश्च गृहान्निष्क्रमणंभवेत्। स्वसाहसात्कार्यहानिः केतोः प्राणगतेप्यहौ॥७०॥(के.रा.)
५८६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । केतु के सूक्ष्मांतर में राहु की प्राणदशा में स्त्री, पुत्र आदि से विरोध, घर से निकाला होता है और साहस करने से कार्य की हानि होती है।।७०।। शस्त्रव्रणैर्महारोगैर्हृत्पीडादिसमुद्भवः । सुतदारवियोगश्च केतो प्राणगते गुरौ ।।७१।। (के.बु.) केतु के सूक्ष्मान्तर में गुरु की प्राणदशा में शस्त्र, व्रण और महारोग से हृदय में पीड़ा की संभावना, पुत्र, स्त्री आदि से वियोग होता है।।७१।। मतिविभ्रमतीक्ष्णश्च क्रूरकर्मरतः सदा । व्यसनाद्बंधनं दुःखं केतोः प्राणगते शनौ ।।७२।। (के.श.) केतु के सूक्ष्मान्तर में शनि की प्राणदशा में बुद्धि में भ्रम, स्वभाव में तीक्ष्णता, सदा क्रूरकर्म में आसक्त, व्यसन से बंधन और दुःख होता है।।७२।। कुसुमं शयनं भूषा लेपनं भोजनादिकम् । सौख्यं सर्वाङ्गभोग्यं च केतोः प्राणगते बुधे ।।७३।। (के.बु.) केतु के सूक्ष्मान्तर में बुध की प्राणदशा में पुष्प शय्या, आभूषण, लेपन, भोजनादि की प्राप्ति, सुख और सर्वांग का भोग प्राप्त होता है।।७३।। इति केतोः प्राणदशा फलम्। अथ भृगोः प्राणदशा फलम्- ज्ञानमीश्वरभक्तिश्च तोषकर्मरसायनम् । पुत्रपौत्रसमृद्धिश्च शुक्रप्राणगते फलम् ।।७४।। (शु.शु.) शुक्र के सूक्ष्मान्तर में शुक्र के प्राणदशा में ज्ञान की प्राप्ति ईश्वर में भक्ति, संतोष, रसायन और पुत्र पौत्र तथा समृद्धि का लाभ होता है।।७४।। लोकप्रकाशकीर्तिश्च सुतसौख्यं विवर्जितः । उष्णादिरोगजं दुःखं शुक्रप्राणगते रवौ ।।७५।। (शु.सू.) शुक्र के सूक्ष्मांतर में सूर्य के प्राणदशा में संसार में कीर्त्ति, पुत्र सुख से हीन, गर्मी से रोग और दुःख होता है।।७५।। देवार्चनैकर्मरतिर्मन्त्रतोषणतत्परः । धनसौभाग्यसम्पत्तिः शुक्रप्राणगते विधौ ।।७६।। (शु.चं.)
अथ प्राणदशा फलाध्यायः। ५८७ शुक्र के सूक्ष्मान्तर में चन्द्रमा की प्राणदशा में देवपूजन में प्रवृत्ति, संतोष, धन, सौभाग्य और सम्पत्ति का लाभ होता है॥७६॥ ज्वरो मसूरिका स्फोटकंडूचिपिटकादिकाः । देवब्राह्मणपूजा च शुक्र प्राणगते कुजे ।।७७।। (शु.मं.) शुक्र के सूक्ष्मान्तर में भौम की प्राणदशा में ज्वर, मसरिका, चेचक, खलुली, रोग और देवता ब्राह्मण का पूजन होता है।।७७।। नित्यं शत्रुकृता पीडा नेत्रकुक्षिरुजादयः । विरोधः सुहृदां पीडा शुक्र प्राणगतेप्यहौ ।।७८।। (शु.रा.) शुक्र के सूक्ष्मान्तर में राहु की प्राणदशा में नित्य शत्रु से पीड़ा नेत्र, कुक्षि में रोग, मित्रों से विरोध और पीड़ा होती है।।७८।। आयुरारोग्यमैश्वर्यं पुत्रस्त्री धनवैभवम् । छत्रवाहनसंप्राप्तिः शुक्रप्राणगते गुरौ ।।७९।। शुक्र के सूक्ष्मान्तर में गुरु की प्राणदशा में आयु, आरोग्यता और ऐश्वर्य की प्राप्ति, पुत्र स्त्री धन का सुख द्रव्य वाहन का लाभ होता है।।७९।। राजोपद्रवजाभीतिः सुखहानिर्महारुजः । नीचैः सह विवादं च शुक्रप्राणगते शनौ ।।८०।। (शु.श.) शुक्र के सूक्ष्मान्तर में शनि की प्राणदशा में राजा के उपद्रव का भय, सुख, की हानि महारोग और नीचों से विवाद होता है।।८०।। संतोषं राजसन्मानं नानादिग्भूमिसम्पदः । नित्यमुत्साहवृद्धिः स्याच्छुक्रप्राणगते बुधे ।।८१।। (शु.बु.) शुक्र के सूक्ष्मान्तर में बुध की प्राणदशा में संतोष, राजा से सम्मान, अनेक दिशा से भूमि सम्पत्ति का लाभ और नित्य उत्साह में वृद्धि होती है।।८१।। जीवितात्मयशोहानिर्धनधान्यपरिच्छदः । त्यागयोगधनानिस्युः शुक्रप्राणगते ध्वजे ।।८२।। (शु.के.) शुक्र के सूक्ष्मान्तर में केतु की प्राणदशा में आत्मा, यश की हानि, धन धान्य की हानि और त्यागवृत्ति होती है।।८२।। इति भृगोः प्राणदशाफलम्।
५८८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अथ समस्त ज्योतिः शास्त्रतत्वकामधेनुरूपम् सुदर्शन चक्रम्। [सुदर्शन चक्र: लग्न, चन्द्र तथा सूर्य से द्वादश भावों एवं ग्रहों की स्थिति] सुदर्शनं द्वादशारं जन्मभेन्द्वर्कराशितः । ग्रहान् संस्थाप्य भावेषु वर्षमासादिकल्पयेत् ।।१।। केन्द्रकोणाष्टगो राहुः पापात्यै च शुभोमुदे । विरिःफादि शुभैः पापैस्त्रिषडायेषु बै शुभम् ।।२।। तं तं भावं प्रकल्प्यांगं तत्तत्तन्वादिजं फलम् । गुरुपदेशात्संवाच्यं भोजनं स्वप्नपूर्वकम् ।।३।।
सुदर्शनचक्रम्। ५८९ चक्र परिचय- यह चक्र वृत्ताकार जन्मपत्र में ग्रहों की स्थिति प्रगट करने को खींचा गया है। बाहरी वृत्त में जन्म लग्न से प्रारम्भ कर ग्रह लिखे गये हैं। दूसरे में चन्द्रमा से ग्रहों की स्थिति लिखी गई है तथा तीसरे वृत्त में सूर्य से ग्रहों की स्थिति लिखी गई है। इस प्रकार से यह चक्र एक ही में तीनों स्थितियों की तुलना को दिखलाता है। भाव विचार करने के नियम- किसी भाव का विचार करते समय उस भाव को प्रगट करने वाली तीनों राशियों का विचार करना चाहिये, जैसे दूसरे स्थान का विचार करते समय लग्न से चन्द्र से और सूर्य से दूसरे स्थान से स्थित ग्रहों का विचार करना चाहिये। १।४।७।१०।८ भाव में राहु या पापग्रह हो तो कष्टकारक होते हैं। शुभ ग्रह हों तो शुभ होता है। १२ वें भाव को छोड़कर अन्य भावों में शुभग्रह और ३।६।११ भावों में पापग्रह शुभ फल देनेवाले होते हैं। विशेषरूप से राहु जहाँ रहता है वह अशुभ फल देता है। यदि किसी भाव में शुभग्रह है तो उस भाव का फल शुभ होगा और पूर्ण प्रभावशाली होगा। शुभग्रह शुभ फल ही देते हैं। जहाँ भी पापग्रह हो यदि उस पर शुभग्रह की दृष्टि हो तो शुभफल कहना चाहिये। सप्तवर्ग में अधिक अशुभ वर्गोंवाले शुभग्रह के अपने शुभकारी गुण नष्ट हो जाते हैं। अनेक शुभग्रहों के वर्गों से युक्त होने पर पापग्रह भी अपेक्षया शुभद हो जाता है। यदि कोई स्थान या भाव रिक्त हो तो उसका प्रभाव उस भाव के देखनेवाले ग्रहों से निकालना चाहिये। यदि कोई न देखता हो तो उसके स्वामी को देखना चाहिये। उदाहरण-जैसे सुदर्शन चक्र में १०वाँ स्थान रिक्त है तथा अपने स्वामी से देखा जाता है जो चन्द्रमा के साथ बैठा है। अतः यहाँ यह कहा जा सकता है कि यह व्यक्ति अपने पेशे में पूर्णरूप से सफल होगा। विशेष-सूर्य प्रथम भाव में शुभफल देनेवाला माना जाता है अन्य स्थानों में अशुभ माना जाता है। पापग्रह अपनी राशि में अशुभ नहीं होते हैं।
५९० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । वार्षिक भविष्यवाणियाँ- सुदर्शन चक्र से वार्षिक फल कहने के लिये जन्म से प्रथम १२ मास तक प्रथम भाव को लग्न मानकर किया जाता है। दूसरे वर्ष में द्वितीय भाव को लग्न माना जाता है, तीसरे वर्ष में तीसरा स्थान ही लग्न माना जाता है। इस प्रकार में लग्न प्रति वर्ष एक-एक राशि खिसकता जाता है। वार्षिक भविष्यवाणियों में मंदगति वाले ग्रहों राहु केतु शनि आदि का ही विचार किया जाता है। १२।२४।३६।४८ वें वर्ष के अन्त में वैसी ही स्थिति हो जाती है जैसी कि जन्मकाल में होती है। इसी प्रकार लग्नादि १२ भाव एक-एक मास के द्योतक होते हैं। दिन फल कहने के लिये एक-एक भाव में ढाई दिन कल्पना करना चाहिये। अथ राहुदृष्टिमाहुः- सुतमदननवांते पूर्णदृष्टिं तमस्य युगलदशमगेहे चार्धदृष्टिंवदन्ति । सहजरिपुविपश्यन् पाददृष्टिं मुनीन्द्रा निजभवनमुपेतोलोचनान्धः प्रदिष्टः ।। ग्रहाणामुदयवर्षाणि- आकृत्योजिनसम्मितागजकरा नेत्राग्नयः षोडश- तत्त्वान्यङ्गगुणाद्विवेद प्रमिताः सूर्यादिकानां समा यः खेटः स्वगृहे स्वतुङ्गभवने षड्वर्गशुद्धश्च यः- तस्याब्दे हि नृणां भवेदति सुखं भाग्योदयो निश्चितम् ।। इति सुदर्शनचक्र विवरणं समाप्तम्। इति वृहत्पाराशरहोरायाः पूर्वार्धे सूर्यादि ग्रहाणां प्राणदशा फलाध्यायः। समाप्तश्चायं पूर्वार्धभागः।
श्रीः वृहत्पाराशरहोरायाः उत्तरार्धम् भाषाटीका सहितम् अष्टकवर्गाध्यायः । मैत्रेय उवाच- भगवन्सर्वमाख्यातं जातकं विस्तरेण मे । सहस्रायुतश्लोकैरशीत्यध्यायसंयुतैः ॥१॥ मैत्रेयजी ने कहा- हे भगवन् ! आपने एक हजार श्लोकों से युक्त ८० अध्याय (पूर्वखंड) में विस्तार पूर्वक सभी जातक को मुझसे कहा।।१।। संकरात्तत्फलानां तु ग्रहाणां गतिसंकरात् । नान्येनहीदृगस्येदमिति वक्तुमलं नराः ॥२॥ किन्तु ग्रहों की गति का परस्पर (संकर) मिश्रण होने से उनके फल में भी मिश्रण हो जाता है अतः इस प्रमाण से ऐसा फल कहना ऐसा निश्चय कर कहने को कोई समर्थ नहीं होता है।।२।। कलौ युगे ततोऽल्पैव बुद्धिः पापोत्तरा नराः । अतो न चास्य प्रचयगमनं न प्रयोजनम् ॥३॥ क्योंकि कलियुग में पूर्व युग से अल्प ही बुद्धि के और अधिक पापी होते हैं अतः उनके लिये इस महान् ग्रंथ का विचार करना और उसके प्रयोजन का कहना दुर्लभ ही है।।३।। एतावंतं कलामस्य प्रयोजनं प्रचयगमनं च कथमासीत् इति शंकायामाह- अत्र त्रेतायुगे केचिद्द्वापरे च कृतेयुगे । कुशाग्रमतयः सर्वे पुण्यभाजश्चिरायुषः ॥४॥ आप यह कह सकते हैं इतने काल पर्यन्त इस ग्रंथ का उपयोग कैसे हुआ और अब क्यों नहीं हो पा रहा है, इसका उत्तर स्वयं दे रहे हैं- हे मुनीश्वर! इस त्रेतायुग में, द्वापर में तथा सत्ययुग में मनुष्य कुशाग्रबुद्धि, पुण्यवान् और दीर्घायु होते थे। अतः वे पूर्व के कहे हुये शास्त्र को देखने और कहने में समर्थ थे।।४।।
५९२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । अतोऽल्पबुद्धिगम्यं यच्छास्त्रमेतद्वदस्य मे । लोकयात्रापरिज्ञानमायुषो निर्णयं तथा ॥५॥ इसलिये इस युग (कलियुग) के अल्पबुद्धि वाले लोगों के जानने योग्य शास्त्र का निर्देश करें जिसके अभ्यास से प्राणियों की लोकयात्रा (सुख दुःख) का परिज्ञान हो और आयुष्य का निर्णय भी हो सके॥५॥ पराशर उवाच- साधुपृष्टं त्वया ब्रह्मन्वदामि तव सुव्रत । लोकयात्रापरिज्ञानमायुषो निर्णयं तथा ॥६॥ पराशरजी ने कहा— हे ब्रह्मन्! तुमने बड़ा ही अच्छा प्रश्न किया है मैं लोकयात्रा का ज्ञान और आयुष्य का निर्णय॥६॥ संकरस्याविरोधं च शास्त्रस्यापि प्रसिद्धये । प्रयोजनस्य लोकानामुपकाराय तच्छृणु ॥७॥ और ग्रहों की गति की संकरता से फल में विपर्यास होता है इसे भी शास्त्र की सिद्धता के लिये अविरोध प्रकार और प्रयोजन भी लोकोपकार के लिये कहता हूँ उसे सुनो॥७॥ भावानांशुभाशुभत्वमाह- लग्नादिव्ययपर्यंता भावाः संज्ञानुरूपतः । फलदाः शुभसंदृष्टायुक्ता वा शोभना मताः ॥८॥ लग्न से लेकर व्यय भाव पर्यन्त सभी भाव यदि शुभग्रह से युक्त वा दृष्ट हों तो उन भावों के संज्ञानुरूप शुभफल को देते हैं॥८॥ पापदृष्टयुताभावाः कल्याणोतरदायकाः । नितरां शत्रुनीचस्थैर्न च मित्रोच्चगैश्च तैः ॥९॥ पापग्रह से दृष्ट या युक्त हों तो अशुभ फल को देते हैं। यदि पापग्रह अपने शत्रु की राशि में वा नीचराशि में हों तो अत्यंत अशुभ फल देता है किन्तु अपने मित्र की राशि या उच्चराशि में हों तो शुभफल को ही देता है॥९॥ एवं सामान्यतः प्रोक्तं होराविद्भिस्तु सूरिभिः । मयैतत्सकलं प्रोक्तं पूर्वाचार्यानुवर्तिनी ॥१०॥
अष्टकवर्गाध्यायः । ५९३ इस प्रकार होराशास्त्र के जानने वालों ने सामान्य रीति से कहा है उसे मैंने संपूर्ण पूर्वाचार्यों के अनुसार कहा है॥११०॥ आयुश्च लोकयात्रा च शास्त्रेऽस्मितत्प्रयोजनम् । निश्चेतुं तन्न शक्नीति वशिष्ठो वा बृहस्पतिः ॥१११॥ इस शास्त्र में आयु का प्रमाण और मनुष्यों के सुख दुःख का वर्णन है यही इसका प्रयोजन है। किन्तु उन सबके निर्णय करने में वशिष्ठ या बृहस्पति भी समर्थ नहीं हो सकते हैं॥१११॥ किं पुनर्मनुजास्तत्र विशेषात्तु कलौ युगे । नष्टादिषु च नातीव द्रेष्काणादि फलेषु च ॥११२॥ साधारण मनुष्य कहां से निश्चय कर सकता है। विशेषकर कलियुग में विशेषकर नष्ट चौर आदि के प्रश्नों के उत्तर द्रेष्काणादि से देने में समर्थ नहीं हो सकते हैं॥११२॥ आचार्यस्य मुखादेतच्छास्त्रं तु शृणुयाद्बुधः । संप्रदायेन यः श्रोतश्चास्मिञ्छास्त्रे महामतिः ॥११३॥ इस शास्त्र को आचार्य के मुख से सुन कर संप्रदायानुसार इसमें परिश्रम करने वाला पुरुष श्रेष्ठ दैवज्ञ होता है॥११३॥ कर्मज्ञानविदा वेदो द्विधा यद्वत्तदाह्वये । होराशास्त्रं द्विधा प्रोक्तं संकीर्णनिश्चयादिति ॥११४॥ जिस प्रकार कर्मकांड और ज्ञानकांड से युक्त वेद एक होते हुये भी दो प्रकार का है उसी प्रकार से संकीर्ण और निश्चय से यह ज्योति शास्त्र भी दो प्रकार का है॥११४॥ प्रोक्तः संकीर्णभागस्तु निश्चयांशस्तु कथ्यते । योवेत्ति सम्यगेतत्तु दैवज्ञः स उदाहृतः ॥११५॥ इसमें संकीर्णभाग पूर्वार्ध (पूर्वभाग) में वर्णित है और निश्चय भाग को इस उत्तरार्ध में कह रहा हूँ जो सम्यक् प्रकार से इसे जानता है उसे ही दैवज्ञ कहते हैं॥११५॥ भावदृष्ट्यांदिषु प्रोक्तानर्थान्सम्यग्विचार्य च । समीचीनांस्तु संगृह्य विरुद्धांस्तु परित्यजेत् ॥११६॥
५९४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् । तनु आदि बारह भाव और उसपर दृष्टि का योग ठीक-ठीक विचार कर जो उत्तम बल हों उनको ग्रहण कर हीनवल का त्याग कर दे।।१६।। आयुर्दायैः परं योगैः फलान्यष्टकवर्गंतः । तन्वादीनां तु भावानां सूक्तैर्भावादिभिः फलैः ।।१७।। ज्ञात्वादौ करणं स्थानं बिन्दुरेखे च वर्गणाम् । क्रमादष्टकवर्गस्य पृथक्कृत्य फलं वदेत् ।।१८।। पहले आयुष्य का ज्ञान करे इसके बाद नाभासादिक योगों के फल का ज्ञान करें दोनों का ज्ञान हो जाने के बाद प्रत्येक भावों के अष्टकवर्ग के अनुसार करण और स्थान को बिन्दु और रेखा के स्थान पर मानकर योगकर उन भावों के फल को कहे।।१८।। अथ रवेः करणसंख्यां-करणप्रदग्रहांश्चाह- तनुस्वायुस्त्रिरिष्फेषु पंचकामेऽर्णवाः सुखे । अरौ भाग्ये त्रयः पुत्रे षट् करौ खे भवे चभूः ।।१९।। लग्नेकुजीवशुक्रज्ञास्तन्नौखे मरणेऽपि च । रविभौमार्कि चन्द्रार्या व्यये ज्ञेन्दुसितार्यकाः ।।२०।। अष्टक वर्ग क्या है— प्रायः फलकहने के तीन प्रकार हैं (१) जन्म लग्न से ग्रहों की स्थिति के अनुसार। (२) चन्द्रलग्न से ग्रहों की स्थिति के अनुसार। (३) नवांश कुंडली के अनुसार फल कहने की विधि है। जातक के जन्म लग्न से उसके शरीर के सुख दुःखादि का विचार किया जाता है और चन्द्रमा से मन का विचार किया जाता है। मन ही की शान्ति एवं अशान्ति और सबलता वा निर्बलता के अनुसार इहलौकिक और पारलौकिक सभी शुभ अशुभ कार्य हुआ करते हैं। अतः फलादेश का मुख्य अंग चन्द्रमा ही हुआ, इसलिये ही आचार्यों ने यह निश्चय किया है कि मनुष्य के जन्म के समय चन्द्रमा जिस राशि पर हो उस राशि से जिन जिन भावों में ग्रहगण भ्रमण करते हुये जाते हैं वैसा वैसा ही फल उस उस समय में मनुष्यको होते हैं। इसी को गोचर फल कहते हैं। किन्तु यह विधि गौण है। क्यों कि सम्पूर्ण मानव मात्र के चन्द्रमा इन्हीं बारह राशियों में से किसी राशि में रहता है। अतः साधारण गोचर फल केवल बारह ही प्रकार का होगा किन्तु ऐसा होता नहीं है। इसलिये आचार्यों