चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
१८ ३९३ ( रीव्हिंग्सन २०८ ) बाज आमदने राव अज शिकार व मालूम कदन इतआम खफियते लोरक ( रावके शिकारस वापस आने पर नाईका लोरकके सम्बन्धमें बताना ) होइ अहेर राउ घर आवा । नाठ जाइ कही फुर पावा ॥१ पूछा राइ कठन यहु भवा । बस सुनाैँ तस नाउँ कहा ॥२ राठ कहा फबँ दीन्हि उतारा । ऊँच मंदिर नीक घोरसारा ॥३ रहै नर नाँखेड थियमी जानैं । अस दिनभर तस फिरति बखानै ॥४ सुन रायँ अस कीरत कीन्हा । बोर्ग जगत मदिर पैहि दीन्हा ॥५ आहि गोवर फर, लोरक नाउँ कहा जुझार ॥६ जिह कारन राठ रूपचंद मारा, ऊँहै पाँछा नार ॥७ टिप्पणी—(४) दिनभर—दिनरर, सूध । (७) कदै—वही । ३९४ ( रीव्हिंग्सन २९ : बम्बई १ ) आमदने लोरक पेशा राव सेतम ( लोरकका राव सेतमके पास आना ) खेम हुसर निसि खेलि बिहानी' । रग राती निसि पिरम कह्वानी ॥१ देइ पिछौरा राठ' जोहारा । राठ मया कै लोर हँकारा ॥२ राठ पूछहि तुम्ह कैसँ आयहु । बाट घाट कस आपन पायहु ॥३ नगर सोगोर' छोड़ि हम आये । राठ करिका मेज बुठाये ॥४ देखन पाइ राइ के आमठैँ । दयी सैंबोगैं आन पिरायठैँ ॥५ भले लोर तुम्ह आयउ इहवाँ, राखहु चित्त हमार ।६ जो कछु आह हमारैं'', सो पुनि जानु तुम्हार ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—आमदने लोरक बर रावके सेतम व सलाम कदन (लोरका राव सेतम के पास आकर जुहार करना )
२९९ १—बिहानी । २—कहानी । ३—रा० । ४—बीर । ५—राइ । ६—मागीर । ७—राइ । ८—हँऊरामे । ९—सँबोगे । १० — मिलवउँ । ११—हमारैं । टिप्पणी—(४) सोगीर—सम्भवतः शुद्ध पाठ मागीर है जैसा कि बम्बई प्रतिमें है । यह उड़ीसाका एक प्रसिद्ध स्थान है । राइ करिंका—सम्भवतः करिका, कलिङ्गका रूप है और यहाँ तात्पर्य कलिङ्गनरेशसे है । इन भौगोलिक पहचानोंकी प्रामाणिकता काव्यमें आये अन्य भौगोलिक पहचानों पर ही निर्भर है । ३९५ ( रौलेण्ड्स २८ : बम्बई २ ) अस्वान दहानीदने राव मर लोरक रा व बर्गे सम्ब दादन ( रावको लोरकको घोड़ा और पान देना ) सेंइप राइ पान कर लीन्हों । निभर$^१$ हँकार लोर कहँ दीन्हों ॥१ सीस चढ़ाइ$^२$ लोरक$^३$ लेतसि । रहसि फैंकान राइ फुनि देतसि ॥२ सिंहि तुरिया चढ़ि लोर पहिरावा । इनै$^४$ ताजिन घोर दौराया$^५$ ॥३ रहैंसा लोर तुरी सो पावा । बचन सगुन सो इहवाँ आवा ॥४ पुरुख सोइ जो पर हिथें$^६$ जाइ । जग सुने तिन्हि करत भलाई ॥५ लोर चाँद गोबर बिसार$^१०$, अगयै$^११$ हरदी धास । ६ बरस दिवस औ कतिक मासा$^१२$ कीन्हा भोग बिलास ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—मरहमत कर्दने राव अस्तम व बर्गे दादन लोरक रा (राव सेतकका लोरकके प्रति कृपा भाव व्यक्त करना और पान देना) । इस प्रति में पंक्ति ३ और ४ के पद इस प्रति में परस्पर मिले हुए हैं । अर्थात् पदों क्रम है ३।२ और ४।१; ३।१ और ४।२ । यही क्रम ठीक भी जान पड़ता है । १—बीर । २—जाइ कें । ३—लोरक । ४—एक । ५—हने । ६— बीरवा । ७—हीं । ८—दिठै । ९—गिद्द । १०—विसारा । ११— ऐहल । १२—केतिक । टिप्पणी—(१) सेंइप राइ—हरदीपाटनके रावका नाम जान पड़ता है । पर कड़वक १०५ में उनका नाम ऐम्प प्रकट होता है । हो सकता है पाठ में
रूप राह' हो । पर उसकी कोई संगति नहीं बैठती । बियर—निकट । हँकार—पुकारर । (२) हँसि—हंसित होकर, प्रसन्न होकर । कशान—चोहा । (३) तुरपा—घोड़ा । ताजिब—(वा ताज़ियाना)—चाबुक कोड़ा । ( ) पर दियेँ—यह अशुद्ध पाठ जान पड़ता है । शुद्ध पाठ होगा "पर दियेँ" जैसा कि बम्बई प्रतिमें है । (६) अध्यैँ—अङ्गीकार किया । ३९६ ( रीडँड्र्स २८१ ) मताये जाना व कनीज़गान व गुलामान व जामहा बौरकराव राब भोरक रा ( लोरकके पास राघका गृहस्थीका सामान दासी नौकर और वस्त्र यादि भेजना ) जना सहस रथि राउ दौराये । चींभर झापर पाग पहिराये ॥१ डला बीस फुरि मरि लीन्हें । ते लै चेरन्हि माथै दीन्हें ॥२ चेरन्हि काँबर काँधैँ लिया । हरदि लोन तेल सभ दिया ॥३ चेरी दस फेर अमरन दीन्हें । अठर संजोग जो काठ न दीन्हें ॥४ औनों भाँत जुजहबा अहे । खाट पालकी पार्संग सहे ॥५ मरु अमरन रानी दीन्हें, चाँद पहिरन जोग ।६ लोर चाँद कहूँ मया जस कीन्हें, कौतुक मयठ सो लोग ॥७ ३९७ ( रीडंग्स २९१ बम्बई ७ ) : बस्त्व पर्यने लोरक बर पाउन रा ( पाउन नगरमें लोरकका वास ) टाँका सौ एक' लाख लीन्हा । पीर पालि नाऊँ कहूँ दीन्हाँ ॥१ औरहिं दीन्हि जिहूँ जस बानों । सभ लोगहिं कहूँ देवसि थानों ॥२ धीर बस्तर आगें लै आये । जे आये सो सम्पुद पठाये ॥३
५१ खोल पिटारा झपर देखे । अभरन अछरन आहँ पिसेखे ॥४ घेर लोग भरा घर बारू । जस चाहत तस दीन्ह करतारू ॥५ चाँद सुरुज मन रहँसे, तिल तिल करहिं बढ़ाउ ।६ एक समो गोवर हुँत आये, हरदींपाटन रहाउ' ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—सखावत कर्दने लोरक बराय फुकरा दर शहर (नगरम लोरक का फकीरो (?) को दान देना) । इस प्रतिम पंक्ति ३ के पद पीछे-आगे हैं । १—एक सी । २—जोराँइँ । ३—सिह । ४—सने । ५—होग । ६—पुनि । ७—कीन्हि । ८—घरी फेर । ९—भाठ । टिप्पणी—(१) टँका—टंका चाँदीका एक सिक्का जो दिल्ली-सुल्तानोंक समयमे प्रचलित था । पीरै (फारसी-पीर)—ब्राह्मण । झाकि—निछावर करके । भाड—नाई, हज्जाम । (२) थानों—पहनावा । (३) बस्तर—वस्त्र । (७) समो—समय । ३९८ ( बम्बई १८ ) बयान कर्दैन पुरखारिये मैना ( मैनाके दुःखका वर्णन ) निसि दुख भैनहि रोइ बिहाई । सभ दिन रहैं नैन पँथ लाई ॥१ मकु लोरक इहिं मारग आवइ । फे फे[रि*]आफे आपु जनावइ ॥२ निसि दिन झुरपइ आस बजासी । रोइ रोइ खिन खिन होइ निरासी ॥३ लोर लोर कहि दिन पुरावइ । अउर पधनहर मुइँदि न आवइ ॥४ छपते असुदी रैन बिहाइ । जस मछरी बिनु नीर झुरसाइ ॥५ बिरह सँताई मना, अँहि परि दिन औ रात ।६ सभ लीन्हेइ दुख लोरगैं फेरा, बिरहा कीन्हि भैपात॥७ टिप्पणी— (६) मकु—कदाचित् शायद । फे फे [रि ] आफे—यह अनुमानित किन्तु संगत पाठ है । मूलमें फार वे पे है य, भाँर फार ए,
३ २ इस प्रकार तीन शब्द या शब्द-खण्ड हैं जो 'के वया के' पढ़े जा सकते हैं । उन्हें 'वैप दिया क' भी पढ़ सकते हैं । पहला पाठ अर्थ- हीन है । दूसरे पाठका अर्थ होगा—'हवसकी व्यथाको' । इस अर्थके साथ पाठ ग्रहण किया जा सकता है । जो भी हो, पाठ सन्दिग्ध है । (३) हरबइ—(स० स्मृ धातुका प्रा० यात्वादेश हरइ) याद करती है चिन्तन करती है; सोचती है । भास बेआसी—बिना आशाके आशा । निरासी—निराश । (५) पुरावइ—व्यतीत करती है । बचनहर—शब्द । ३९९ (रीसेंण्ड्स ५८३ : बम्बई ४८) पुरखीदने सोझिन सिरमन य पुरखीदने अरुवारे गोरक (झोझिनका सिरजनसे गोरककी खबर पूछना) दीदी सुनउ सुनी एक बाता । आवा ठाँव कहा दोसौ साता ॥१ केंरें आइ सेंकट¹ कें मेला । पूछहु आन कवन मुँह खोला² ॥२ झोझिन नायक परहि³ पुछावा । पूछसि ठाँव कहाँ⁴ हुत आवा ॥३ कउन मनिज लादेते⁵ पर परधाना । कउन रात⁶ तुम्ह देत⁷ पयाना ॥४ कउन लोग घर कहाँ तुम्हारा । कउन नाँउ किंह कुटुंब हँकारा⁸ ॥५ आसा सुषुधैं पूछउँ, को परदेसी आइ ।६ मोर धार परबस बिरोधा, सुखहिं जाहि को पाइ⁹ ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—सुनीदने मैना व झोझिन कि कसी ताजस्यान अस तरफे हरदौं आमद (मैना और झोझिनका सुनना कि हरदौरी ओरसे कोई वणिक आया है) । १—कौंदे सैंकट आइ । २—पूछेउ ठाँव कवन मुखं लेग । ३— मन्दिर । ४—कहवाँ । ५—वाषो । ६—रेत । ७—दैत । ८— हमारा । ९—आसा षड़पै हीं हुत, पूछउ को परदेशी आड । ⁹ —पाठ । टिप्पणी—(१) दीदी—मैनाने यहाँ अपनी सासको 'दीदी' सम्बोधित किया है जो असाधारण है । कड़वक ४६ में मैनाकी ननदने अपनी माँके लिए इस
३ ३
सम्बोधनका प्रयोग किया है। टाँड—साथवाह, कारवाँ, व्यापारी समूह। ढोर्से—'दिबसे' पाठ भी सम्भव है। (२) बार—बाल, पुत्र।
४०० (रीडिंग्स २८४) जवाब दादने नायक खोकिन रा कैफियते बनिज (नायकका खोकिमसे वणिजका वृत्तान्त कहना)
मैज मँजीठ चिरौंजि सुपारी। नरियर गोवा लौंग छुहारी ॥१ सौ दिक मँइहूँ कुँकूँ चलाषा। पतरज बरनहि गनति न बाषा॥२ पाट पटोर चीवर बहु भाँती। दिये मैं सहस सहस कै पाँती ॥३ हीर पटोर रूप बहुतायता। बेर्ना चन्दन अगर भर लायता ॥४ गोबर फा भौमन सिरजन नाऊँ। हरदीपाटन पुरुबहि बाऊँ ॥५ बरद सहस दस जापन, औ मेला यह आइ ।६ दखिन हुतैं भर लायता, पाटन मेलसि बाइ ॥७
टिप्पणी—(१) मैज—सम्भवतः मेनफल एक फल जो ओषधि के काम आता है। मंजीठ—एक फल जो औषधि के काम आता है; लाल रंग। नरियर—नारियल। गोवा—(सं गुवाक)—एक प्रकारकी सुपारी। छुहारी—छुहारा। (३) पाट पटोर—देखिये टिप्पणी ३२७। चीवर—वस्त्र। (४) हीर पटोर—देखिये टिप्पणी २८७। बेर्ना (सं बीरण)—खस। (५) भौमन—ब्राह्मण। (६) बरद—बैल।
४०१ (रीडिंग्स २४५: काफी) गिरियाकदने खोकिन व पाये सिरजन उफ्तादने मैना (खोकिमका रोना और मैनाका सिरजनके पैर पड़ना)
सुन पाग्न रोलिन सम राधा। नैन नीर¹ मुख धूड़ी² धाधा ॥१ मैना माइ पायँ लै परी। सिरजन पाँगु कहूँ एक घरी ॥२
१४ नाँह मोर हाँ पारि पियारी । ल गइ चाँदा पाटन ताही ॥३ लोरक नाँउ सुरुझ कें करा। सेठ लैं चाँद पाटन धरा ॥४ मई सज सुरुझ चाँद लैं भागा। दूसर समो आइ अब लागा ॥५ सब दिन नैन जोवत पन्थ, औ निसि जागत आइ ।६ मोर संदेस लोर कहूँ, इहैं पर गेइ घड़ाइ ॥७ पाठान्तर—काशी प्रति— शीर्षक—दर पाव सिरजन उफ्तादन मैना व अहवाल गुफ्तन (सिरजनक पैरों पर गिरकर मैना का अपना हाल कहना) १—पेड़ैम । २—रकत । ३—झूठी । ४—छोरि । ५—चाँदा । ६— नैन जुवाई । ७—ओ सब निसि । ८—अन्तिम पद प्रतिमे मिट गया है । टिप्पणी—(१) कहूँ—कहीं । (३) नाँह—पति । पारि—पाला दुपटी । (४) करा—कजा । सेठ—उठे । (५) समो—समय । (६) जोवत--निहारते हुए । ४०२ ( रॉकण्डूल २८६ ) कैफियते माह सावन गुफ्तने मैना बर सिरजन बाँज दुखारी खुद (मैनाका सिरजनसे अपनी सावन मासकी अवस्था कहना ) साँवन मास नैन झर लाये । जखरन नाँह दिन एकौ पाये ॥१ बरसि भरे भुइँ खार खँदोला । मियें न छकै खीर अमोला ॥२ घरउ काजर चख रहे न पावा । खिन खिन मैना रोइ बहावा ॥३ सावन चाँद लोर लै भागी । मैना नैन पूर झर लागी ॥४ इहैं पर नैन जुवाई अरघानी । सरि गै झार ढोर तिहूँ पानी ॥५ जिह सावन सुरुझ गवनें, सो मैना धरत साग ।६ सिरजन कहहु लोरकौँ, माँवर फेर अभाग ॥७
२०५ ४०३ ( रीजेन्ड्स २८० ; बम्बई ४९ ) कैफियते माह भादों ( भादों मासकी अवस्था ) भादों मास निसि भइ' अँधियारी । रैन डरावन हौं घनि पारी ॥१ बिजुलि' चमक मोर हियग' भागै । मंदिर नाह बिनु अहि डहिलागै ॥२ संग न साथी न सखी सहेली । देखि फाटि हिय मंदिर अकेली' ॥३ तिहि दुख नैन फूटि निसि बहैं' । धरती पूरि सायर भर रहे ॥४ निफर चलतें पाँ' घली न जाइ । भुइँ' बूड़ि रहा थल छाइ ॥५ दुखत पचन स्रवन' कँ, लोर बिदेसहि' छाण्ड ।६ नीर लाइ नैन दुइ बरखा", सिरजन रोइ पहायठ ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—सफतो माह ग्वधों गुफ्तन मैना पेशे सिरजन पैगाम बजानिबे लोरक (सिरजन के आगे मैनाका अपनी भादों मासकी दुरवस्था कहना और लोरकके लिए संदेशा भेजना ) १—मादों बरत चमक । २—पंचम । ३—हीउर । ४—हाधि । ५—सहनी । ६—अपनी । ७—एहि दुख फूटि नैन छल । ८—पग । ९—भुमहि । १०—सर्वैन । ११—परबसहि । १२—लाइ नैन दुइँ वरखा । ४०४ ( रीजन्ड्स २८८क ) कैफियते माह कुआर ( कुआरकी अवस्था ) चढ़ा कुआर अगस्त घिताथा । नीर घट पै कन्त न आवा ॥१ फुल फांस हाँस सिर छाय । मागस दुरलाई खिडरिज आय ॥२ निरवा पार न अपुम्प पारी । अति रम भइ नाँइ पियारी ॥३ नव रितु लाग पितरपख होई । राइ राँक घर सीस रझाइ ॥४ ९
१८ सिरजन छोर बनिज गा, हौं नित गारतौं माँस ॥६ कौन ठाम फिइ भूले, लोरक पूँछी होइ बिनास ॥७ ४०८ ( रीडैंग्स २९ ब ) कैफियते माह माघ ( माघ मासकी अवस्था ) माह माँस निसि परै तुसारू । कँपहि हार डोर बनहारू ॥१ कँपहि दसन नीर चखु झरा । बिरह अँगूठी हींउर धरा ॥२ एफ बिरहँ अरु दुहेतँ तुसारा । मार बिरह यह जीवँ हमारा ॥३ तुम बिनु पात भइस हौं भमी । पुरई वइस भूख दहि गभी ॥४ भर हीउ बहुर बँग साठैं । लेगइ चाँद सुरुज कित पाऊँ ॥५ हेँवत मोहिं पिसारे, बिहि पर कामिनि राखइ ।६ सिरजन मुयउँ तुसार, बेग कहु अहन्त आवइ ॥७ टिप्पणी—(१) माह—माघ । ४०९ ( रीडैंग्स २९ ब ) कैफियते माह फागुन ( फागुन मासकी अवस्था ) फागुन सीठ फागुन फहा । अठर पवन सकति होइ रहा ॥१ भाग सराइउँ ठार मो आवइ । सीठ मरत गिय साइ जियावइ ॥२ घर पर रचहिं दन्डाहर थारी । अति सुहाग यह राजदुलारी ॥३ मुगु बँधाल चरत फाजर पूरहिं । अग माँग मिर चीर सिंदूरहिं ॥४ नापहि फागु इइ झनफाग । विह रस भइ नइ सर्यसारा ॥५ रक्त राइ म अस क, चोलि चीर रवनार ।६ कहु मिरगन तार चैनाँ, भइ होरी जरि छार ॥७ टिप्पणी (७) छार—राख ।
९९ ४१० (अनुपलब्ध) ४११ ( रामपुर ) [ - - - - ] । [ - - - - ] ॥१ [ - - - ] । [ - - ] ॥२ [ - - ] । [ - - - - ] ॥३ कोइल जस फिरउँ सब रूखा । पिउ पिउ करत जीम मोर सूखा ॥४ मैनखंड विरिख रहा नहिं कोई । कवन डार जिंह लागि न रोई ॥५ एक घाट गइ हरदी, दूसर गई महोब ।६ ऊभ माँह के चाँदा नवह, कवन घाट हम होम ॥७ टिप्पणी—यह अंश पद्मावतकी प्रतीक आवरण पर उद्धरण रूप में अंकित है । इस कारण शीर्षक और प्रथम तीन पंक्तियाँ अप्राप्य हैं । ४१२ ( बम्बई ३८ ) हमे हाले खुद गुफ्तने मैना पीश सिरजन पैगाम बेजानिबे लोरक ( मैनाका सिरजनसे अपना हाल कहना और लोरकके पास सन्देश भेजना ) मैं मम दुख तुम्ह आगें रोवा । चाँद नाँह मुहि देहु बिछोवा ॥१ तैं हर पूनेउँ चाँद सपूनी । खगरितु फीनी सेज मोर छूनी ॥२ कहु सिरजन अस चाँद न कीजइ । नाँह मोर मुहि दुख ना दीजइ ॥३ एक परिस मुहि गा पिनु नाहाँ । दइ कै डर कीजइ चित माँहाँ ॥४ तिहुँ आदि तिरिया कै जाती । पिउ बिनु मरसी रैन हिय फाटी ॥५ हूँ र निसोंकी नारि, सोक मन माँहि बिगास ।६ (लीन्हें) सुरसि नाँह मोर, कस अपहूँ न ऑस ॥७ मूलपाठ—७—नीह (मूलका नुक्ता छूट जानेसे ही यह पाठ है) । टिप्पणी—(४) गा—बीत गया । (७) सुरसि—स्नेह ।
३१ ४१३ ( बम्बई ५९ ) बाकये हाले खुद गुफ्तने मैना पेश सिरजन पैगाम बेदानिदे लोरक ( मैनाका सिरजनसे हाल कहना और लोरक के पास सन्देश भेजना ) काहे कँह बिधि हौ औतारी । गरु औतरतईं मरतिउँ भारी ॥१ चाँद मया कर दइ अहिबात् । मैंहि पारी सर ऊपर छातू ॥२ यह दुख मार सहै को वारी । तिहि निसि रोइ देवस महँ जारी ॥३ सोरहकरौं सरग परगाससि । बारह मदिर सेज तूँ बाससि ॥४ सहसकरौ सुरुज उनियारा । साईं मोर तिहि मयठ पियारा ॥५ पायें परतौं जो गवनसु, औ सिरजन पूछा सारठँ ।६ चारफरौँ जो परगासै, तासौं कैसें पारठँ ॥७ टिप्पणी-(१) औतारी—अवतार दिया; जन्म दिया । भरतिउ—मार डालते । वारी—कन्या । (२) अहिबात्—पति के जीवित होनेका सौभाग्य । (३) गवनसु—जाओ । ४१४ ( बम्बई ५२ ) ब शिकायत गुफ्तने मैना हाले खुद पेश सिरजन पैगाम बेदानिदे चाँदा ( चाँद के पास सन्देश भेजनेके लिये मैनाका सिरजनसे अपना हाल कहना ) मोर मढार सरग कै राषसि । औ निसि मंहि सर ऊपर भाषसि ॥१ बाँमन देठ लोग मंहि दीन्हा । सो तैं लोर सैल कै लीन्हा ॥२ तूँ बिनु साथ कानि तिहिं नाहीं । नँइ मोर गोपसि परछाँहीं ॥३ मुहि राखसि अपनें उजियारी । लोर रूसि पर पर अँधियारी ॥४ पावन पुहुप भा तोर बिबाहा । लोरक मोर गहसि दुहुँ काहाँ ॥५ सिरमन बिनबतौं चाँद कहूँ, पठहि लोर दिबाइ ।६ छोड़ि देहि पर आवइ, मैंहि दिय आस तुलाइ ॥७
५१२ टिप्पणी—(१) राबसि—रम्य करती है । (२) बैल के सीन्हा—बैल बना दिया (मुहावरा) वशीभूत कर दिया । ४१५ ( बम्बई ५१ ) पाये तफ्तादने मैना बज बराये रसीदने पैगाम बेशा नियै लोरक ( लोरकके पास सन्देश ले जाने के निमित्त मैना का पाँव पड़ना ) सिरजन पाडर डैलें मैना । बनिज तुम्हार मोर दुख पैनाँ ॥१ लादि गोंड़ विंहि घरहु गुँसाईं । जिह पाटन गा लोरक सांईं ॥२ जिह पाटन गइ चाँद सुभागी । तिँह पाटन गवनहु महि लागी ॥३ जिह पाटन पिउ रहा लुभाई । लोभी चाँद न लै घर आई ॥४ तिँह पाटन लै बनिज पिसारा । औ बेसहैं कहँ लोर हँकारा ॥५ देतँ तुरी चढ़ि सिरजन, उदरै पवन पँख लाइ ।६ दस गुन लाभ देब मैं तोकइँ, लोर पेसाइँ जाइ ॥७ टिप्पणी—(१) बाडर—पागल । डैलै—डेलती है, डरती है भेजती है । बनिज— व्यापार सामग्री । (२) पाटन—पत्तन बन्दरगाह यहाँ तात्पर्य हरदीपाटनसे है । किन्तु 'बाटन' पाठ भी सम्भव है । उस अवस्था में अर्थ होगा—मार्ग । (३) गवनहु—गमन करो बाबा । महि लागी—मर निमित्त; मेरे निहारे । (५) बिसार—बिक्रय वस्तु । बेसइ—क्रयके निमित्त । (७) देब—दूँगी । तोकइँ—तुमको । ४१६ (रीफैण्ड्स २११ । बम्बई ७ ) गुफ्तन रोलिन सिरजन नायक रा व रवान कदन ( लोलिनका सिरजन नायकस कहना और उम भेजना ) रोलिन नायक दुन्हु कर गहा । आपुन पीर हियें कै कहा ॥१ रकत हाय अँधरी कँ लइ' । हाँ न लखत टेफ मार गयीं ॥२ पियर धूप अप नीथन मोरा । यह पछताठ रहसि तुम्ह लोरा ॥३
११२ मूइ मयसि खोलिन हुँभलानी⁶। तुम बिनु पूत खींधि को पानी ॥४ आइ देखु हों अँधवत माहा। भययें आइ करियहु फाहाँ ॥५ मोर जियतईं जो⁷ सिरजन, लोरक आइ दिखाठ ।६ नैन नीर छायर अति बहइ⁸, [घोइ⁹] पीठ¹⁰ दोइ पाठ ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—गुफ़्तन रोलिन वाक़या हाल खुद बदपी पैगाम बबानिब लोरक (रोलिनका अपने बुढ़ापेकी अवस्था कहकर लोरकके पास सन्देश भेजना) ॱस प्रति में पंक्ति १ ४ और ५ क्रमशः ४ ५ और १ हैं । १—रोलिन । २—कंसत छूटी अँधरी के गयी । ३—मुर ॱॱ । ४— यह । ५—पीह । ६—मूइ कयसि रोलिन डुँबजानी । ७—तिह । ८—अभये⁹ आइ करि पुनि फाहा । ९—मोहि जियत जिन । १०— नैन नीर भर छरकर । ११—पिकठै । ४१७ ( रीठींग्स २९ : बम्बई ३१ ) रवान शुदन सिरजन सूये हरदीपाटन ( सिरजनका हरदीपाटनकी ओर रवाना होना ) कवन बनिस तुम्ह¹ नायक कीन्हा²। सोक संताप बिरह दुख लीन्हा³॥१ दंड उदेग उधार बिसाहा। अब बैराग्य खपारे⁴ ओ आहा ॥२ अरथ हरष सब बाखर भरा⁵। पाखर कीन बिरह दुखँ बरा ॥३ महर दानौर सब दीं लागा। झार न सहैँ साथि सब भागा ॥४ मारग धर धै⁶ जरतै⁷ जाइ। मैना काम न आग⁸ बुझाइ ॥५ दानी माँगत दान महारथ, ओ बैठ बटपार⁹ ।६ कहत सुनत हाँ बाधे, सिरजन करहु उपकार ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—पैगामे सिरक हासिल शुदने सिरजन रा व रवाँ कदन बजा गौवर बेजानिबे लोरक (बिरहका उपदेश लेकर सिरजनका गौवरसे लोरकके पास जाना) १—सुनु । २—कीन्हा । ३—दीन्हा । ४—अति अथवा उठ । ५— समाइ । ६—करनी मरन करनि सब भरा । ७—जर । ८—तहे ।
९—सम । १०—ठन । ११—जरतै । १२—भाग न । १३—महारब औ बटपार । १४—सिरजन गये भेपार । टिप्पणी—(१) इन्द्र—द्वन्द्व । उद्वेग—उद्वेग । उचाट—खिंचता । (प्रथम वाचनमें ये शब्द “दण्डदीक व्यबात' पढ़े गये थे। पर उनका कोई अर्थ नहीं जान पड़ा। अन्य कोई पाठ समझमें नहीं आता । मिरगावर्तिमें कई स्थानोंपर इस वाक्यांश का प्रयोग हुआ है । भारत कला भवन काशीमें इसके कैथी लिपिमें लिखित कुछ सचित्र पृष्ठ हैं । उसमें यही पाठ है । उसीके आधारपर हमने प्रस्तुत पाठ ग्रहण किया है किन्तु हमें इस पाठ और अर्थसे सन्तोष नहीं है । (३) आध—अध । दरब—द्रव्य । जरब दरब—धन दौलत । वाजार— घर । (४) अह्वर शामीर—रात दिन । दी—अग्नि । (५) वै—से । जरतै—जलते हुए । (६) बटपार—बटमार, रास्तेमें लूटनेवाले लुटेरे । ४१८ ( फील्ड्स ४१८ : बम्बई ५१ ) कैफियते दर फिराक सिरजन गायद ( सिरजनकी विरह अवस्था ) मिरिग जा पन्थ लांघि कहूँ जाहीं । धूम¹ धरन हाइ जाइ पराही ॥१ जाँवत परिख उरधि उड़ि गये । किशन बरन कोइला जरि³ भये ॥२ घालहु मिरजन होइ भाँवारा । फारिया दहुँ नाउ गुनधारा ॥३ मायर दाहि मँछि ददिदहे । टहे करंजवा जलहर अहे ॥४ अइस झार विरह क भइ । धरती दाहि गगन लहि गइ ॥५ मरग चँदरमँहि मेला, औ घूम पखि भइ कार ।६ सिरजन बनिज तुम्हारे", उबर [पूह न प*]ार ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—अज फिराक मैना आहूवान सोख्तन व अनपरान दग्गी व आहियान दर आव साख्तन (मैनाके विरहमे हिरनों पशुओं और जलचरोंका जल उठना)
३१४ १—मिरग फब कैसे जो आहीं। २—बरम (धूम) लिखिने 'वाव'को 'रे' की तरह लिखा है। ३—छार । ४—कितन। ५—उरि कोरना । ६—बिंदु तर आइ होइ मैंतारा। ७—सरवर। ८—मइस। — सागर। ९ —बरम (धूम) नैन भये कार। १०—तुह्यारें। टिप्पणी—(१) धूम—धूम्र काला । (२) काँधत—बाबत, जितने भी। पंखि—पक्षी। उरथि—उच्च आकाश। किसान—कुन्त। बरन—वर्ण रंग। करि—कराकर । (३) करिया—कर्णधार; पतवार संभालने वाला। नाउ—नाव । गुनचारा—रस्सी खींचकर किनारे लाने वाला नाविक। इस शब्दका प्रयोग पदमावत (१८।६) और मधुमालति (१५।१) में भी हुआ है; किन्तु दोनों ही स्थानोंपर माताप्रसाद गुप्तने इसे 'कंदहारा' पढ़ा है। गाफ (काफ) नून दाल (दाल) हे अन्वि रे, अलिफ़को 'कंदहारा' पढ लेना सहज है। किन्तु नौकाचलन सम्बन्धी शब्दावलीमे कन्दहारा जैसा कोई शब्द नहीं है। माताप्रसाद गुप्त और वासुदेव शरण अग बाल दोनोंने इस तथ्यसे परिचित न होनेके कारण इसे संस्कृतक कर्णधारक—कणधारका रूप मान लिया है। किन्तु कर्णधार (पतवार सम्भालनेवाले नाविक) के लिए करिया शब्द है। नौकाचलनमें नाविक तीन प्रकारके होते हैं—(१) डाँड चलानेवाले—इनका काम नावको डाँडके सहारे गति देना होता है। इन्हें खेवक या डाँडेया कहते हैं। (२) पतवार सम्हालनेवाला—इसका काम पानी काटकर आगे बढने तथा दिशा नियन्त्रित करनेके निमित्त पतवारका सञ्चालन करना होता है। इसे करिया कहते हैं। इन दोनों प्रकारके नाविकोंका काम जलके मध्यमें होता है। (३) रस्सीके सहारे नावको खींचकर किनारे लानेवाला नाविक। इसको गुनचार कहते हैं। बिना इसकी सहायताके नावका किनारे आना सम्भव नहीं। (४) सायर—सागर। मॅडि—मण्डक मछली। कैरवहा—एक पक्षी विशेष। अडडर—अडम्बर। (५) कहि—सब । ४१९ (दीर्घकूट १९१) रसीदन सिरकन दर शहरे बाउन व खुद रफ्तन दर मुलाकाते गोरख (सिरजनका पाटन नगरमें पहुँचकर गोरखस मिलने जाना) माँझ चार बति पाट पटाई। हरदीपाटन उतरा बाइ ॥१॥
३१५ पाटन नगर पाइ अँधारा । देखि धौराहर इगुर द्वारा ॥२ गिरसन पन्तर माज पहिगाये । नरियर गावा धार मगाय ॥३ राग गजर पिंर्गजी लिय । सिञ्जन मेंट लार फकें गय ॥४ पूरन गरन लेग दुआरा । प्रनिहार मरि पैठ पारा ॥५ पात जनावहु पीर कएँ, परदेसी एक आयउ ।६ मारत नार धागदर, पैपरी जाइ लगायउ ॥७ टिप्पणी—(२) अँधारा—रस्ता, ... दिया । द्वारा—... ॥ (३) वन्ता—... । माज—पान कर । पहिराव—... । (५) प्रनिहार ... । ५१० ( चित्ररेखा ) .... ( .... ) जिन एक नन नींद मई आई । गय पैठ[रि] पा झाउ लगाई ॥१ दोमन एक पैवर र टारा । फिरिक दुआटम दन्तर फारा ॥२ दर्श बर्शि हाय दणारी । जन कान दूर पहुँची गयी ॥३ अनउ काँप बन्धात नगाउ । आग पुन साथ पहिगयी ॥४ पिग प्रद् गाम अदावन परा । आइ पुरन्तर डा फडा ॥ दहित दहा दिषरागर पाया वाशि दुगन ।६ दिर भाग नै माझ दूगर लगा न तान ॥७ टिप्पणी— .... .... .... .... .... .... .... ....
१७४ ४२१ ( रीश्दहूम ३ १ ) बरून आमदने लोरक व मुलाकात करदन बा सिरजन ( लोरकका बाहर आकर सिरजनसे भेंट करना ) लोर बचन सुनि पँवरि सिभारा । पँवरी बैरमन आइ जुहारा ॥१ पीरहि पीर सुनत आँधारी । बेर क्याइ तुम्ह रूपमरारी ॥२ विधि कल्यान पुछि भल पायहु । लउ आँधार सइस अरगामहु ॥३ अन्त गवर जग रास फरै सो । परै पियास खांडे अस ले जो ॥४ रूपवन्त धनवन्त सुलख्खन । सिरीवन्त जजमान विचख्खन ॥५ अमकें बहुतैं असीसा, पीर लोरकहिं दीन्हि ।६ पुन पतरैं चइ बैठउँ सिरजन, पोथि हाथ के लीन्हि ॥७ टिप्पणी—(१) बैरमन—ब्राह्मण । (२) पीर—(फारसी) ब्राह्मण । आँधारी—आया । (५) सुलख्खन—सुलक्षण । सिरीवन्त—श्रीमन्त । जजमान—यजमान । विचख्खन—विचक्षण । ४२२ ( रीश्दहूम ३ २ ) दीदने सिरजन ताल-ए-लोरक व तासीरे सितारगाने साद व नहस ( सिरजनका शुभ अशुभ ग्रहोंको देख कर लोरकका भाग्य बताना ) सेठ अन अवसि बलबारी । मख रासि तुम रूपमरारी ॥१ मेख बिरिख आर मिथुन मँजे । कर्क सिंह कन्या जो गुंजे ॥२ तुला बिरश्चिक धनु आइ सुलावइ । मकर कुम्भ गुन मीन सुनावई ॥३ मेख चँदर जनम पर आवा । विसरें घर सुरुज दिखरावा ॥४ नवमें घरें भय परकासू । सतमें मंगर आइ आबासू ॥५ चार नखत तुम्ह दाहिन, कहीं गुनति अति देखि ।६ मघर बुध विरस्पत, जनम चँदर बिसेसि ॥७
१२७ टिप्पणी—(१) मेख--मेष । रासि—राशि । (२) खिरिख—वृष । (३) बिरखिक—वृश्चिक । (५) मंगर—मगल । ४२३ ( रीकेण्ड्स ३ १ ) ऐजन ( वही ) चौथे बुध सुख कछु आवइ । बिहफइ सोइम राज करावइ ॥१ दूसरे मंगर पाँच परवानी । बइठर पाप धरम कर हानि ॥२ छठयें सनीचर देखि मेरावा । केठे अल्लैनै पुनि हाथ आवा ॥३ राहु केतु भइ आयसु दिलामहिं । मिलैं कुटुंब घर दसमैं आपहिं ॥४ ओ न होइ अस भीठ उतारउँ । गुनित टूट तो पोथा फारउँ ॥५ गंग नीर तुम्ह अन्हउब, दाख बेल फर खाब ।६ पाप तुम्ह सब तज लोरक, गंगा सुद्ध नहाय ॥७ टिप्पणी—(१) बिहफइ—बृहस्पति । सोइम—( फारसी—सोयम ) तीसरा । ४२४ ( रीकेण्ड्स ३ ३८ : बम्बइ १७ ) बजियत सितारगान गोयद ( ग्रह अवस्था कहना ) उसिय समो सब सुख पर आयहु' । पवि परना सब दुख अन्दायहु ॥१ राजा चँदर पाट बेंसारा । महत बिरस्पत सुरुज उमारा ॥२ पंद्रह बिसवा धरम जनावइ । पाप पाँच बायें दिसि पावइ' ॥३ अठ बिसवा दस पूषि मखाने । बारह बिसवा मोर बार आन' ॥४ सतरह बिसवाँ कहौं तू मानी' । बिसवाँ दोइ पाप केउ ज्ञानी ॥५
११८ राज पाठ तुम्ह गावरा अहँ, मैना' कर गुसाँइ ॥६ चाँदहि गगन चढ़ायहु, मना धरती काँइ ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—ताज्ये खाब नमूद्ने सिरजन बज रस्तने लोरक बजने गरीबे खुद (सिरजनको लोरकका घर बापल आनकी शुभ बड़ी दखना)। १—अरी सम्हे समे सुगर बामहु। २—बित्सों फब्बर धरम चुकाया ३—पाप पाँच वामै दिति पावा। ४—जन बित्सों चौदह तिन खावा। ५—पाठ सठ बित्सों नी बाता। ६—हारह रिसबों बिदव बगानी। ७—बर बित्सों मुन्दु बैठ न जानी। ८—तुम्ह कारह है। —मै (लिपिक व दोषत 'ना' छूट गया है। ९ —चाँदा। १०—नारी। ४२५ ( रीकण्डम् ३ २५ : बम्बई ६१ ) पुरोबने लोरक ( लोरकका सुनना ) मैना सबद पीर जो सुनावा । सुनतँ लार हियँ' घबराबा ॥१ मैना बात बाँमन कित पायहु । औ चाँदा किइ आइ सुनायहु ॥२ कहु पंडित फिर कितहुत आवा । कैँ तुम्ह' हरदींनगर पठावा ॥३ मैना नाउ कहा तुम्ह सुनौं । औ चाँदा पर कइसौ गुनौं ॥४ तूँ न इह बाँमन परदेसी । दखतँ' लखतँ आइ सहदेसी ॥५ खह पाइ खर क्षार करेहिं, आपन सीस चढ़ाठें ॥६ माइ माइ मैना कर, कुसर खुम ' खा पाठें ॥७ पाठान्तर—बम्बई प्रति— शीर्षक—सुनीदन लोरक हाले बाकने मैना व गिरिह्याकन बा फिराक बजने मैना (लोरकका मैनाका हाल सुनकर दुःखी होना)। १—हिय। २—सुनौं और हिये। ३—पाँव। ४—औ मैना ५। —आयहु। ६—ताँ। ७—पठाबहु। ८—तूँ। —कर। १०— हालि । ११ —कसन। १२ —सह पा० तोर बाँभन अपने सीस चढ़ाठैं। १३ —मय कुठार।
टिप्पणी—(१) पौर—ब्राह्मण । (२) बाँभन—ब्राह्मण । (३) किसहुत—कहाँ से । (५) सहदेसी—अपने देश का । (६) बरैहि—बरोनियों से मूँहा क । ४२६ ( रीडिंग्स ३ ५८ ) गुफ्तने सिरजन बर्रैरे रुजाई इसा असीशन ( सिरजनक बरवाकौक कुसल समाचार कहना ) कँवरू माइ तोर महतारी। लोग कुँटुम घर मैना नारी ॥१ तोरैं चिन्त रैन दिन आहाँहिं। नैन पसार विहि मारग चाहहिं ॥२ अन पानि चरू टेरि न भावइ। बागहि रैन दिन नीँद न आवइ ॥३ पन्थ बगाऊ पूछहिं लोरा। फोउ न कहैं सकूसर तोरा ॥४ सोक सो (मैनामॉअर) भइ। झार विरह अधिक अरि गइ ॥५ दुइ ताहि न सोफ, लोर सँ जो दई न डराइ ।६ तजफे बारि पियाहुत आपन, लीन्हा (नारि) पराइ ॥७ मूलपाठ—( ) मैना बन भैनी मॉअर म् । (७) पुरुग् (प्रमंग फ अनुसार यह पाट सर्वथा असंगत है) । ४२७ ( रीडिंग्स ३ ५६ ; बम्बई ४२ ) कजियत आवर्दने बनिज गुफ्तन सिरजन पसु लोरक ( सिरजनक लाएकय अपने बनिजकी बात कहना ) हाँ र पनिज गापरा¹ लै आयउँ। भिरव लेन कौँ² कँवरू भुलायउँ ॥१ उगेय मंदिर अहौँ बसतारा³। अड उठलें कँ भया हँकारा ॥२ पूछसि कौन पनिज तुम्ह आनौँ । कौन दसहुते कियत पयानौँ ॥३ कहा दस धँ गागरौँ आयउँ । गय माँस दाइ पुरुष चलायउँ ॥४ कहा लार नम आपन ठाँऊँ । गाबर का बाँभन मिरजन नाऊँ ॥५